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लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार का बड़ा ऐलान, दिल्ली मेट्रो और जवानों के लिए सौगात

लोकसभा चुनाव सर पर हैं और सभी राजनीतिक पार्टियाँ इसे जीतने की कोशिश में जुटी हैं। चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दलों की तरफ से तरह-तरह के वायदे किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में चुनाव की तारीख के ऐलान के ठीक पहले मोदी सरकार ने जनता के सामने सौगातों की झड़ी लगा दी है।

दरअसल गुरुवार को मोदी सरकार ने आखिरी कैबिनेट बैठक में 30 अहम फैसले लिए। वहीं पिछले हफ्ते कैबिनेट में 39 फैसले लिए गए थे, यानी कि आठ दिनों में दो कैबिनेट की बैठकों में कुल 69 फैसले लिए गए।

गुरुवार को जो लोक लुभावने फैसले किए गए, उसमें दिल्ली मेट्रो के लिए तीन नई लाइनें- एरो सिटी से तुगलकाबाद, आरके आश्रम से जनकपुरी वेस्ट और मौजपुर से मुकुंदपुर शुरू की जाएँगी। इन पर ₹24,948 करोड़ खर्च करने को मंजूरी दी गई है।

कैबिनेट की इस बैठक में देश भर के जवानों को लेकर भी फैसला लिया गया है। तकरीबन 40 हजार से ज्‍यादा पूर्व सैनिकों को स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना के दायरे में लाए जाने का फैसला किया गया है। इस सुविधा का लाभ द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग ले चुके सैनिकों, इमरजेंसी कमिशंड ऑफिसर्स, शार्ट सर्विस कमिशन ऑफिसर्स और समय पूर्व रिटायर हुए फौजियों को भी दिया जाएगा।

इसके साथ ही सरकार ने 50 नए केंद्रीय विद्यालयों को भी मंजूरी दी है और इस शैक्षणिक सत्र से इन विद्यालयों की शुरुआत भी हो जाएगी, जिससे लगभग एक लाख बच्‍चों को फायदा पहुँचेगा। बता दें कि सरकार की तरफ से पाँच सालों के दौरान इन केंद्रीय विद्यालयों के विकास के लिए ₹1,579 करोड़ खर्च किए जाएँगे।

जब अदरक-लहसुन तहज़ीब का भार हिन्दुओं की रीढ़ तोड़ता है, तब मध्यस्थता होती है

अस्सी प्रतिशत जनसंख्या, केन्द्र में ‘हिन्दुत्व प्रोपेगेंडा’ के नाम पर हर रोज गाली सुनती मोदी की सरकार, राज्य में प्रखर हिन्दुत्व के पोस्टर ब्वॉय जो स्वयं महंत हैं, और हिन्दुओं के हाथ में क्या आता है? लहसुन। जी, हिन्दुओं के हाथ लहसुन ही आता रहा है क्योंकि हम अपने वेदों, उपनिषदों, पुराणों और शास्त्रों के एक ही हिस्से के दर्शन से ‘सर्वसमावेशी’ और ‘प्लूरलिस्टिक’ बनने के चक्कर में अपनी अस्तित्व से समझौता किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं…

दशकों से केस खिंच रहा है, कोर्ट पर कोर्ट, तारीख़ पर तारीख़, जज पर जज और वकील पर वकील, और इस देश का उच्च न्यायालय कहता है कि बेटा तीन हिस्से में रोटी तोड़कर खा लो। फिर अपील होती है, तो सालों बाद सुप्रीम कोर्ट कहने लगता है बैठकर बात कर लो। आखिर न्यायालयों का औचित्य क्या है? फिर तो राम जन्मभूमि का मसला खाप पंचायत को दे देते?

जब साक्ष्य हैं, खुदाई हो चुकी है, जानकार लोगों ने किताबें और शोधग्रंथ लिखकर रख दिए हैं, तब न्याय के सबसे बड़े दरवाज़े की घंटी इतनी ऊँची क्यों कर दी गई है कि आम आदमी की उँगलियाँ पहुँच न सके? आखिर, क्या वजह है कि लगातार मुद्दे को टालते रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट को अतंरराष्ट्रीय स्तर के ‘बिचौलियों’ को इसमें लाना पड़ रहा है?

तुमने राम के अस्तित्व को नकारा, हिन्दुओं ने सुन लिया; तुमने मंदिर के न होने की बात की, खुदाई में मंदिर निकल आए; तुमने इतिहास को नकारना चाहा, लेकिन तथ्य यही हैं कि हिन्दुओं के हजारों बड़े और लाखों छोटे मंदिर तोड़े गए। आखिर सहिष्णुता की चादर हिन्दुओं के ही घर तक क्यों?

इस कोर्ट ने इस न्यायिक प्रक्रिया का इतना मजाक बनाया कि संवैधानिक पीठ में पाँच धर्म के जज रख दिए थे! क्यों? ट्रिपल तलाक के मसले पर सुनवाई होनी थी। इससे आखिर सुप्रीम कोर्ट क्या संदेश देना चाह रहा था? या, आज जो रिटायर्ड जस्टिस इब्राहिम खलीफुल्ला को मध्यस्थता कमिटी का चेयरमेन बनाने की बात हुई है, उससे सुप्रीम कोर्ट क्या संदेश देना चाह रही है?

और ये मध्यस्थता कैसे होगी? बंद कमरे में। बंद कमरे में मध्यस्थता नही होती, डील होती है। अगर ये सवाल करोड़ों लोगों की भावनाओं का है, तो फिर खुली जगह पर इन बिचौलियों के तर्कों का प्रसारण होना चाहिए ताकि हर पक्ष के लोग जाने सकें कि क्या बातें हो रही हैं। न्यायिक व्यवस्था भारतीय नागरिक का अंतिम पड़ाव है, जहाँ अभी भी लोग विश्वास जताते हैं। सुप्रीम कोर्ट जब इस तरह की बातें करता है तो  वो सिर्फ अपना ही उपहास नहीं करता, बल्कि व्यवस्था पर लोगों को सवाल उठाने का मौका देता है क्योंकि ऐसी बातें तर्क से परे होती हैं। 

इसे महज़ संयोग माना जाए कि सुप्रीम कोर्ट ने लॉटरी सिस्टम से ऐसा किया है, या फिर ये जानबूझकर लिया गया एक क़दम है कि किसी समुदाय या मतावलंबियों को बताया जाए कि सुप्रीम कोर्ट ने सबका ध्यान रखा है? मुझे किसी इब्राहिम, खेहार, जोसफ़, नरीमन, गोगोई की योग्यता पर शक नहीं है, मुझे अजीब लगता है कि न्याय के जिस मंदिर में साक्ष्य सर्वोपरि होते हैं, वहाँ इस तरह के टोकनिज्म की क्या ज़रूरत है?

मेरी समस्या जस्टिस खलीफुल्ला को लेकर नहीं है, न ही मेरी योग्यता है कि मैं उनकी दक्षता पर सवाल करूँ, लेकिन एक सामान्य विवेक का प्राणी होने के कारण मेरी अभिव्यक्ति यही है कि जब कोर्ट के भीतर अधिकतर पार्टियों ने मध्यस्थता से इनकार कर दिया, तो फिर सुप्रीम कोर्ट इंटरनेशनल दलालों को मैदान में उतारकर क्या संदेश देना चाह रही है?

फिर तो सड़कों से कानून भी बनें क्योंकि हमारी सर्वोच्च न्यायिक संस्था ने बंद बक्सों में पड़े साक्ष्यों को एक तरह से दरकिनार करते हुए, एक बार फिर से करोड़ों लोगों को ठगने की कोशिश की है। आखिर जब कोर्ट यह मानता है कि यह ज़मीन से बढ़कर भावनाओं का मसला है, तो फिर कोर्ट यह भी बताए कि किन-किन मसलों को भावनाओं से जोड़कर देखा जाए, किन मसलों को छोड़ दिया जाए।

कोर्ट चाहे जितना कह ले, लेकिन ये मसला घूम-फिर कर ज़मीन का ही है। ये मसला एक इस्लामी आतंकवादी बाबर द्वारा इस देश पर किए गए अत्याचार के प्रतीक की पुनर्स्थापना का है, जो कि भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा पर एक वैसे घाव की तरह है, जिसका इलाज जल्दी होना चाहिए। पहले तो ऐसे मसलों पर बात ही नहीं होनी चाहिए, और अगर हो भी रही है तो खुदाई में निकले मंदिर और बक्सों में बंद सबूतों को बाहर लाकर, उस पर निर्णय हो, न कि दलाली से, जिसके लिए आपने मीडिएशन और मध्यस्थता जैसे सुनने में अच्छे लगने वाले शब्द बना दिए हैं। 

मसला ज़मीन का ही है, और मसला न्यायालय ही सुलझाए। हिन्दुओं ने अपनी मंदिरों के दीवारों में मस्जिदें देखी हैं, और रोज देखते हैं। हिन्दुओं ने मस्जिदों की सीढ़ियों में मंदिर के अवशेष देखे हैं। हिन्दुओं ने काशी विश्वनाथ को मस्जिद से ढकने की कोशिशें देखी हैं। हिन्दुओं ने राम के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न को स्वीकारा है। हिन्दुओं ने इस केस को जानबूझकर टालने की हर कोशिश होती देखी है।

अगर अब भी मोदी और योगी जैसे ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ का तमग़ा लेकर घूमने वाले लोगों ने इस पर संवैधानिक दायरे में रहकर दख़लंदाज़ी नहीं की, तो ये मामला हिन्दुओं को उस कोने में ढकेल देगा जहाँ से उनके पास दो ही विकल्प बचेंगे: मणिकर्णिका घाट या मणिकर्णिका की तलवार।

PM ने किया काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का शिलान्यास, कहा: ‘काशी की नई पहचान बनने वाली है’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज वाराणसी के दौरे पर हैं। इस दौरान पीएम ने काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर का शिलान्यास किया। मोदी ने कुदाल चलाकर काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर की नींव रखी। बता दें कि ये कॉरिडोर बाबा विश्वनाथ मंदिर से शुरू होकर गंगा किनारे घाट तक जाएगा। इस कॉरिडोर को लेकर काफी विवाद रहा था, लेकिन इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने इस परियोजना को आगे बढ़ाया।

कॉरिडोर का शिलान्यास करने के बाद उन्होंने काशी विश्वनाथ में पूजा अर्चना की। उन्होंने कहा कि अब माँ गंगा को सीधे बाबा भोलेनाथ से जोड़ दिया गया है। अब श्रद्धालु गंगा स्नान करके सीधे भोले बाबा के दर्शन करने आ सकेंगे। ये काशी विश्वनाथ धाम, अब काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के रूप में जाना जायेगा। इससे काशी की पूरे विश्व में एक अलग पहचान बनेगी।

प्रधानमंत्री ने कहा, “आज भोले बाबा की मुक्ति का पर्व है। पहले यह स्थान चारों तरफ से घिरा हुआ था। 300 सम्पत्तियों का अधिग्रहण किया गया। कई बार दुश्मन ने ये जगह ध्वस्त की। आस्था ने इस जगह को फिर जीवन दिया। काशी की नई पहचान बनने वाली है। काशी के लोगों ने भी सरकार का साथ दिया।”

चित्र आभार: ANI

पिछली सरकारों पर तंज कसते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “काशी का काम मेरे नसीब में लिखा था। 70 सालों से पहले की सरकारों ने कुछ नहीं किया।”

चित्र आभार: ANI

इस दौरान मोदी के साथ यूपी के सीए योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल राम नाइक भी मौजूद रहे। मोदी ने कहा कि विश्वनाथ धाम एक ऐसी परियोजना है जिसके बारे में वो लंबे समय से सोच रहे थे और सक्रिय राजनीति में आने से पहले ही वो काशी आ गए थे। तब से ही उनके मन में मंदिर परिसर को लेकर कुछ करने की इच्छा थी, जो कि अब भोले बाबा के आशीर्वाद से उनका ये सपना सच हो रहा है।

रामजन्मभूमि मामले में मध्यस्थता से निकलेगा समाधान: SC का बड़ा फैसला

अयोध्या में रामजन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला आया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अयोध्या मसले का समाधान मध्यस्थता से निकाला जाए। मध्यस्थता के लिए पूर्व जस्टिस कलीफुल्ला की अध्यक्षता में एक पैनल बनाया जाएगा। इस पैनल में श्री श्री रविशंकर, वरिष्ठ वकील श्रीराम पांचू होंगे। मध्यस्थता की कार्यवाही पूरी तरह से गोपनीय होगी। मध्यस्थता की प्रक्रिया फैज़ाबाद में होगी। यह ।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मामले की रिपोर्टिंग न की जाए। मध्यस्थता की प्रक्रिया एक हफ्ते में शुरू हो जानी चाहिए। चार हफ्ते में पहली रिपोर्ट आ जानी चाहिए और आठ हफ्ते में पूरी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। यह फैसला पाँच जजों पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने दिया है जिसमें चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस ए बोबडे शामिल थे।

पैनल के सदस्य और सदस्यों को भी पैनल का सदस्य बना सकते हैं। पक्षकार पैनल के सामने यह भी कहने को स्वतंत्र हैं कि वो मध्यस्थता नहीं चाहते।

लिप्सटिक नारीवाद: सिंदूर पोंछ दो, चूड़ियाँ तोड़ दो, साड़ियाँ खोल लो, ब्रा उतार दो

बेगूसराय (या बिहार-यूपी) के कपड़ों की दुकान से जब आप कपड़े लेकर निकलेंगे तो आपको जिस पन्नी (पॉली बैग) में कपड़ा दिया गया है, उसके ऊपर बड़े शब्दों में लिखा रहता है: फ़ैशन के दौर में गारंटी की इच्छा ना करें। हमारे तरफ के लोग छोटा वाला एस्टेरिक या स्टार मार्क लगाकर छुपाकर नहीं लिखते: कन्डीशन्स अप्लाय। पूरा फ़्रंट में, बढ़िया से लिखा होता है कि भाई कितना का भी कपड़ा लो, गारंटी नहीं है।

इसी तरह का फ़ैशनेबल कॉस्मेटिक्स एक ‘वाद’ पर आजकल चढ़ाया जाता है। इसको लिपस्टिक नारीवाद कहते हैं। ये नारीवाद तभी तक रहता है जब तक आपका चमचमाता, फ़्लेवर वाला लिप्सटिक रहता है। आजकल ऐसे नारीवादी बहुतायत में मिल जाएँगे।

इनका ज्ञान तो छिछला है ही, साथ ही इनकी समझ भी वैसी ही छिछली है। इनके तर्क नारीवादी ना होकर पुरुष-विरोधी होते हैं। यहीं सबसे बड़ी समस्या है। आप एक को जिताने के लिए, दूसरे को मार डालना चाह रहे हैं। इसकी कोई जरूरत नहीं है। लड़कियों या महिलाओं की बेहतरी के लिए उनकी आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा और सामाजिक स्थिति की बेहतरी ज़रूरी है ना कि इस बात कि आप कह रहे हैं ‘सिंदूर पोंछ दो, चूड़ियाँ तोड़ दो, साड़ियाँ खोल लो, ब्रा उतार दो’।

ये वैचारिक खोखलापन है। इसको कई लोग कन्डिशनिंग कहते हैं। कन्डिशनिंग हर स्तर पर है समाज में। हम घर बनाकर क्यों रहते हैं? हम पूजा क्यों करते हैं? हम कपड़े क्यों पहनते हैं? हम टाई क्यों लगाते हैं? हम बर्गर क्यों खाने लगे हैं? हम हॉलीवुड की फ़िल्में क्यों देखते हैं? हम जीन्स क्यों पहनते हैं? हम माँ-बाप के पैर क्यों छूते हैं? हम राखी क्यों बँधवाते हैं? हम स्कूल में किसी और से क्यों पढ़ते हैं?

मुझे नहीं लगता कि आपके सिंदूर पोंछ देने से, चूड़ियाँ तोड़ देने से, साड़ियाँ खोल लेने से, ब्रा उतार देने से नारीवाद आ जाएगा। क्योंकि वो दिक़्क़त नहीं है। पता कीजिए कि बीस साल से कम उम्र की कितनी लड़कियाँ सिंदूर लगाती हैं। पता कीजिए कि क्या मुस्लिम, ईसाई आदि धर्म की स्त्रियाँ स्वतंत्र हैं? पता कीजिए साड़ी नहीं पहनने वाली पंजाब-हिमांचल की औरतें स्वतंत्र हैं! पता कीजिए बिहार के गाँवों की औरतें जो ब्रा नहीं पहनती स्वतंत्र हैं?

कन्डिशनिंग तो आपकी भी हो गई है कि आपको लगता है कि हर वो चिह्न जो आपकी समझ से बाहर है, वो पितृसत्ता का परिचायक है। आपको सिंदूर मत लगाना है मत लगाईए, लेकिन ये मान लेना कि लोग एक कंडिशनिंग के कारण ऐसा करते हैं, मूर्खता है।

लिप्सटिक नारीवादियों को ये लगता है कि गाँव में खाना बनाती हर औरत पितृसत्ता का शिकार है। घर सँभालना किसी भी आठ घंटे वाली नौकरी से कठिन काम है। अगर मेरी माँ घर सँभालती है तो ये कन्डिशनिंग कैसे हो गई? और मैं जानता हूँ कि मेरी पाँचवीं पास माँ, जिसकी शादी तेरह साल में हो गई थी, वो दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ी अधिकांश लड़कियों से ज्यादा खुले विचारों वाली स्वतंत्र महिला है। 

अगर सब नौकरी करने लगें तो घर कौन सँभालेगा? नौकर? अब नौकर समाज में किस आर्थिक स्तर का व्यक्ति होगा? दलित, निचली जाति का? और आप लिपस्टिक नारीवादी होने के साथ दलित चिंतक भी हैं तो बताईए भला कि कोई और मेरा खाना क्यों बनाएगा? वहाँ आपको दिक़्क़त हैं कि नहीं? आपको ये क्यों लगता है कि खाना बनाना एक हेय कार्य है?

आप तो इस हद तक जाओगे कहने कि औरतें बच्चे क्यों जने? सही बात है, वो अंडे निकाल ले, मर्द शुक्राणु दे दें और फिर प्रयोगशालाओं में बच्चे पैदा हों, अपने आप पलें (क्योंकि बाकी लोग तो काम करेंगे ना) ताकि बचपन से ही आत्मनिर्भर बनें। है कि नहीं? क्या कहा? दाई रख लें? यहाँ पर दलित चिंतन अप्लाय होगा या नहीं? या मर्द से शुक्राणु क्यों लें, हम बंदर से लेंगे, बिल्ली से लेंगे, शेर से लेंगे… है कि नहीं?

कन्डिशनिंग क्या है मैं बताता हूँ। कन्डिशनिंग है आपका वही पढ़ना, और सुनना जो आपको अच्छा लगता है। फिर आपके विचार वैसे ही विकसित होते हैं। ये बंद हो जाना होता है। आपको फ़ौरन नारीवादी बनना है तो आपको जो भी औरत अभी के समाज में कर रही है, सबको बिना किसी तर्क के गरियाना शुरू करना चाहिए। 

लड़कियाँ पढ़ रही हैं। वो साड़ी भी पहनती है, ब्रा भी, सिंदूर भी लगाती है और मन करे तो चूड़ियाँ भी। आप फेसबुक पर बैठे-बैठे ज्ञान देते रहिए और गाँवों की सासें और मर्द अपने घरों में नई बहू को जीन्स भी पहनने को कह रहे हैं, पल्लू ना डाले ये भी कह रहे हैं क्योंकि अब वो ये स्वीकारने लगे हैं कि सबको ये करने में सहजता नहीं है।

लोगों ने समझना शुरू कर दिया है कि ये ज़रूरी नहीं है। स्त्रियों को सताना तब तक जारी रहेगा जब तक आप उसे पढ़ाते नहीं, नौकरी करने नहीं देते, या उसकी इच्छाओं का दमन सिर्फ इसलिए होता है कि वो लड़की है। लड़की पिछड़ती इसलिए नहीं कि उसे तो ब्रा पहनना होगा, उसे तो साड़ी पहननी होगी, चूड़ियाँ पहननी होगी… इस हिसाब से तो हर विधवा को स्वतंत्र होना चाहिए!

मेरी दादी ने, जिसके पति पैंतीस साल में छः बच्चों, और मात्र छः बीघा ज़मीन, जमीन के साथ छोड़कर परलोक सिधार गए, अपने सारे बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की और इस लायक बनाया कि वो अपनी जिंदगी में जहाँ जाएँ, बेहतर करें। क्या वो विधवा थी इसलिए ऐसा हो गया? जी नहीं, उसकी सोच थी कि पढ़ लिखकर आदमी सही जगह पहुँच सकता है। हमारे पिताजी को लगा कि घर कौन देखेगा तो सातवीं का बोर्ड दिए बग़ैर खेती में लग गए। 

पूरे घर की तरक़्क़ी का कारण दो महिलाएँ हैं, मेरी दादी और मेरी माँ। क्या इन दोनों की कंडिशनिंग नहीं हुई थी? आज की लिपस्टिक नारीवादी के लिए मैचिंग जूती, जीन्स, लिपस्टिक, इयररिंग, शेड्स, बैग ठीक है, लेकिन गाँव की स्त्री का बिन्दी लगाना पितृसत्तात्मक समाज का प्रतीक है! मतलब तुम्हारा फ़ैशन, फ़ैशन, लेकिन इनकी बिन्दी, सिंदूर, लोहरंगा, ठोररंगा, साड़ी, चूड़ियाँ ग़ुलामी का प्रतीक! 

तुम क्यों इतना मैचिंग के चक्कर में हो! किसके लिए? और वो क्यों शृंगार करती है, किसके लिए? उसकी इच्छाएँ, तुम्हारी इच्छाओं से कमतर कैसे हैं? क्या वो कंडिशनिंग है तो तुम्हारा मैचिंग हैंडबैग कंडिशनिंग कैसे नहीं है? 

क्या पूरे नारीवाद का विमर्श अब इतने पर आकर गिर गया है कि कोई सिंदूर क्यों लगाती है, बिंदी क्यों चिपकाती है, ब्रा क्यों पहनती है? 

कंडिशनिंग उनसे ज्यादा तुम्हारी हो गई है क्योंकि तुम बंद डिब्बे से बाहर सोच नहीं पाते। तुम्हें स्वतंत्रता क्या है और वो कैसे किसी को सशक्त करता है, इसका भान नहीं है। तुम्हें ये पता नहीं है कि एक औरत के अपनी रीढ़ पर सीधे खड़े होने के लिए सिंदूर-बिन्दी त्यागने से ज्यादा ज़रूरी है शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता। 

हर उस औरत को पति की तरफ से घर सँभालने हेतु पैसा मिलना चाहिए। सरकारों को ये नियम बनाना चाहिए कि उनके पति, बच्चे उनकी सेवा (बच्चों को पालना, खाना बनाना, घर की देखरेख) के लिए एक नियमित वेतन दें। अब वो वेतन वो फिर से अपने बच्चों पर खर्च करे, घर के टूटे हिस्से को ठीक करवाने में करे, ये उसकी मर्ज़ी।

ये स्वीपिंग जेनरलाइजेशन बंद होना चाहिए कि हर औरत जो सिंदूर लगा रही है वो दवाब में है। शादी मत करो अगर सिंदूर नहीं लगाना है तो। या शादी करो, और मत लगाओ अगर तुम्हें दिक़्क़त है तो। तुम ये क्यों सोचते हो कि जिसने लगाया है वो गुलाम है, कंडिशनिंग हो गई है उसकी? कंडिशनिंग तुम्हारी हो गई है कि नारीवाद पर लिखना हो तो ऐसे ही लिखा जाए। 

घूम फिर कर दस से बारह चीज़ें है तुम्हारे नारीवाद के बस्ते में: सिंदूर, ब्रा, चूड़ियाँ, साड़ी, शादी की संस्था, फ़्री सेक्स की आज़ादी का ना होना, कईयों से सेक्स करने की आज़ादी ना होना, लड़कियों का जो मन हो वो करें… इत्यादि। कुछ और होंगे जो तुम ख़ुद जोड़ लोगे।

इस सोच से बाहर निकलो। नारी को समझो, तब नारीवाद को समझ पाओगे। उसकी बेहतरी शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता में है। पढ़ाओगे तो वो समाज को समझेगी, उसे लगेगा कि लड़के-लड़की का भेदभाव गलत है। शिक्षित होने से विवेक आता है, और विवेक तुम्हें अच्छे और बुरे का फर्क सिखाता है। विवेक कभी नहीं कहता कि साड़ी नहीं पहनने से, सिंदूर पोंछ लेने से समानता मिल जाएगी। समानता पाने की एक प्रक्रिया है, ऑन ऑफ़ स्विच नहीं। 

क्योंकि सिंदूर का नारीवाद से कोई लेना-देना नहीं है। सिंदूर लगाती कई नारीवादियों को मैं जानता हूँ, और हाँ वो ब्रा भी पहनती हैं। 

भाजपा से पहले कांग्रेस ने जारी की उम्मीदवारों की पहली लिस्ट, राहुल-सोनिया यहाँ से लड़ेंगे चुनाव

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कॉन्ग्रेस ने आगामी लोकसभा चुनाव 2019  के लिए उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी कर दी है।

रॉबर्ट वाड्रा की सास सोनिया गाँधी अपने मौजूदा संसदीय क्षेत्र रायबरेली से और कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी अमेठी संसदीय क्षेत्र से चुनाव में किस्मत आजमाएँगे। कॉन्ग्रेस की पहली लिस्ट में कुल 15 उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं। जिसमें 4 गुजरात और 11 उत्तर प्रदेश की सीट शामिल हैं।

अब कॉन्ग्रेस का ‘बूट’ हुआ मजबूत, कॉन्ग्रेस समर्थकों में 10 मिनट तक चली ताबड़तोड़ सुताई और कुटाई

अभी भाजपा के सांसद और MLA के बीच हुई कुटाई को एक दिन भी नहीं हुआ था कि कॉन्ग्रेस ने भी आज ‘शक्ति प्रदर्शन’ कर डाला और भाजपा को कुटाई के मामले में पीछे छोड़ दिया। कल ही यूपी के संत कबीर नगर में बीजेपी सांसद और विधायक के बीच जूतम-पैजार के बाद उत्तराखंड में रुड़की से कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच दे-दनादन मार-कुटाई की खबर आई हैं। यहाँ कॉन्ग्रेसी आपस में भिड़ गए जिसमें उत्तराखंड के पूर्व CM हरीश रावत और संजय पालीवाल के समर्थक दस मिनट तक एक दूसरे पर ताबड़तोड़ दनादन लात, घूँसे और थप्पड़ बजाते रहे।

कॉन्ग्रेस लोकसभा चुनाव के टिकट के लिए उत्तराखंड के राज्य भर में कार्यकर्ताओं से राय ले रही है। हरिद्वार लोकसभा की जिम्मेदारी पूर्व सांसद महेंद्र पाल को सौंपी गई है जो रुड़की कार्यकर्ताओं की राय जानने के लिए पहुँचे थे। उन्होंने बन्द कमरे में 5 से 10 कार्यकर्ताओं को बुलाकर बात की। उन्होंने कुल 100 कार्यकर्ताओं से बात की।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इसी बीच कमरे के बाहर कुछ कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ता नारेबाज़ी करने लगे। कुछ कार्यकर्त्ता उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पक्ष में थे तो कुछ पूर्व राज्य मंत्री संजय पालीवाल के नेतृत्व में नारेबाजी कर रहे थे। अचानक संजय पालीवाल के समर्थकों ने कहा, “हरीश रावत मुर्दाबाद बोलो, जिंदाबाद नहीं।” इतना सुनते ही राज्य के पूर्व CM हरीश रावत के समर्थक भड़क गए और दोनों पक्षों में नोक-झोंक होने लगी।

नोक-झोंक तुरंत मारपीट में बदल गई। अंदाजा लगा पाना मुश्किल है कि कल भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हुई मार-पिटाई ज्यादा खतरनाक थी, या फिर आज रूड़की में कॉन्ग्रेसी कार्यकर्ताओं के बीच की मारपीट।

कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच चली ये मारपीट इतनी गंभीर थी कि 10 मिनट तक दोनों पक्षों के लोग जमकर एक दूसरे पर घूँसे, लात और थप्पड़ बजाते रहे। बाद में कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों ने बीच बचाव किया।

‘सरहद का सुल्तान’ और कॉन्ग्रेसी रहनुमा गाज़ी फ़क़ीर, जिस पर हाथ डालते ट्रांसफर हो जाते हैं अधिकारी

राजस्थान का एक ऐसा नेता या एक मौलवी कह लीजिए, जिसके सामने अधिकारियों की एक नहीं चलती। भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का भी उस पर कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि उसकी सत्ता सरहद के इस पार भी चलती है और उस पार भी। मजहब विशेष के सिंधी उसे रहनुमा के रूप में देखते हैं। अपने इलाक़े में कॉन्ग्रेस का झंडा बुलंद करने वाले फ़क़ीर के रसूख का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि आपराधिक रिकॉर्ड-बुक खोलने वाला कोई भी अधिकारी इलाक़े में नहीं टिकता। एक और ख़ास बात यह कि अशोक गहलोत की सरकार आते ही उसका प्रभाव बढ़ जाता है। उसके परिवार और रिश्तेदारी में दर्जनों लोग अलग-अलग महत्वपूर्ण पदों पर काबिज़ हैं। जैसलमेर स्थित उसके गाँव से लेकर अजमेर जिला परिषद और राज्य मंत्रिमंडल तक हर जगह उसके लोग हैं।

मुख्यमंत्री गहलोत के साथ गाज़ी फ़क़ीर

आगे बढ़ने से पहले बता दें कि गाज़ी फ़क़ीर का बेटा सालेह मोहम्मद अभी राजस्थान सरकार में मंत्री है। वह पिछले 66 वर्षों में जैसलमेर जिले से मंत्री बनने वाला पहला व्यक्ति है। यह गाज़ी का ही प्रभाव था कि उसने अपने बेटे को 23 वर्ष की उम्र में ही पंचायत समिति का प्रधान बनवा दिया था। इसके बाद जिला प्रमुख से विधायक और फिर मंत्री तक के सफर में सालेह ने अपने पिता के हाथ को मजबूत किया। आज हम गाज़ी फ़क़ीर की बात इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि इससे जुड़ी एक बड़ी ख़बर आई है। उसके इतिहास और भूगोल को समझने से पहले हमें आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी के केस को समझना पड़ेगा, जिन्हें आज गुरुवार (मार्च 7, 2019) को बर्ख़ास्त कर दिया गया। इसीलिए पहले इस ख़बर को जानते हैं।

पंकज चौधरी को आज इसीलिए बर्ख़ास्त किया गया क्योंकि उनकी एक पत्नी के होते हुए दूसरी शादी करने का दोषी पाया गया। लेकिन, कुछ लोगों का मानना है कि भ्रष्टाचार व नेताओं के ख़िलाफ़ मुखर रहने के कारण उन पर गाज गिरती आई है। उन्होंने वरिष्ठ अधिकारी राजीव दावोस पर सार्वजनिक रूप से भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा है कि वे इस आदेश को चुनौती देंगे। पंकज पहली बार तब चर्चा में आए थे जब जैसलमेर से उनका तबादला करा दिया गया था। उनका अपराध बस इतना था कि उन्होंने तथाकथित डॉन गाज़ी फ़क़ीर की हिस्ट्रीशीट खोल दी थी। साढ़े पाँच दशकों से अपराध, राजनीति और वर्चस्व की दुनिया का माहिर खिलाड़ी गाज़ी साठ के दशक से ही अपराध की दुनिया में सक्रिय है।

मंत्री बनने के बाद पिता गाज़ी से मिलने पहुँचा बेटा सालेह

पोखरण पर राज करने वाले गाज़ी फ़क़ीर के बारे में पंकज चौधरी ने कई सनसनीखेज ख़ुलासे किए थे। देशद्रोह सहित कई मामलों में आरोपित गाज़ी कई वर्षों से भारतीय एजेंसियों के पकड़ में नहीं आ पाया क्योंकि उसके ख़िलाफ़ सबूत ही नहीं होते हैं। पुलिस हिस्ट्रीशीट में उसका नाम 1965 से ही आता रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस में उसके वर्चस्व के कारण कोई उसका बाल भी बाँका नहीं कर सका। पंकज चौधरी ने कहा था कि उनके पूर्ववर्तियों ने गाज़ी के बारे में फाइल्स में कई भयानक बातें लिख रखी थी। उन्होंने उसका अधिक विवरण देने से इनकार कर दिया था लेकिन उनके इस बयान से स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है। उसके ख़िलाफ़ जुलाई 1965 के एक तस्करी वाले मामले को फिर से खोला गया था।

स्थानीय प्रशासन में उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि ऊपर से आदेश के बावजूद उसको छुआ तक नहीं जा सका। उसके ख़िलाफ़ तैयार की गई फाइल 1984 में गायब हो गई। उस समय राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। 1990 में एक एसपी आए जिन्होंने गाज़ी पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। एसपी सुधीर प्रताप सिंह को राजस्थान सरकार ने चुपचाप ट्रांसफर कर दिया। 2011 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार ने फिर से उस हिस्ट्रीशीट को बंद करवा दिया। इसके बाद दृश्य में पंकज चौधरी की एंट्री हुई जिन्होंने गाज़ी पर नकेल कसी। लेकिन अफ़सोस, उनका कार्य भी अधूरा रह गया और इससे पहले कि वे किसी नतीजे पर पहुँच पाते, उनका भी ट्रांसफर करवा दिया गया। आज उन्हें सेवा से बर्ख़ास्त ही कर दिया गया। ऐसे में, इस सिक्के के कई पहलू हो सकते हैं।

राजस्थान में फिर से कॉन्ग्रेस की सरकार है। अशोक गहलोत ही मुख्यमंत्री हैं। गाज़ी का बेटा उनके मंत्रिमंडल का अहम हिस्सा है। ऐसे में गाज़ी का वर्चस्व फिर से सर चढ़ कर बोलने लगा है। हालाँकि, 80 से भी अधिक के उम्र में उसकी सक्रियता ज़रूर कम हो गई है, लेकिन उसका प्रभाव अभी भी उतना ही है। गाज़ी के बारे में सबसे बड़ी बात श्रीकांत घोष की पुस्तक ‘Pakistan’s ISI: Network of Terror in India‘ में कही गई थी। इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 55 पर गाज़ी फ़क़ीर का जिक्र किया गया है और बताया गया है कि कैसे वह भारत में रह कर पाकिस्तान का कार्य करता आया है। घोष इस पुस्तक में लिखते हैं कि पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई राजस्थान में काफ़ी सक्रिया हो चली है और सरकार समय रहते जागृत नहीं हुई तो राज्य की हरेक गली में आईएसआई के आदमी होंगे।

एसपी पंकज चौधरी के ट्रांसफर के बाद CNN-IBN पर न्यूज़

घोष लिखते हैं कि भारतीय क्षेत्रों में इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा देना पाकिस्तान का एकमात्र लक्ष्य है। राज्य सरकारों ने वोट्स के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने एक बहुत बड़ा खुलासा करते हुए कहा है कि राजस्थान में स्थित मदरसों में आईएसआई एजेंट किसी न किसी रूप में घुसते रहे हैं और हज़ार किलोमीटर से भी अधिक की राजस्थान-पाकिस्तान सीमा से अवैध घुसपैठ कर पाकिस्तानी एजेंटों को भारतीय मदरसों में स्थापित किया जाता है। उन्होंने सीमा क्षेत्र में सक्रिय एक इस्लामी संस्था तबलीग-ए-जमात का जिक्र करते हुए लिखा है कि इलाक़े में सैयाद शाह मर्दान शाह-II यानी पीर पगारो का प्रभाव पढ़ रहा है। पीर पगारो पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एफ) का अध्यक्ष है।

इसके आगे श्रीकांत घोष ने जो लिखा है, वो आपको गाज़ी फ़क़ीर के बारे में बहुत कुछ साफ़ कर देगा। उन्होंने लिखा है कि गाज़ी फ़क़ीर पाकिस्तान के इसी अभियान का एक हिस्सा है जो पीर पगारो का भारतीय एजेंट है। जैसलमेर निवासी गाज़ी फ़क़ीर पाकिस्तान की सीमा पर की जा रही आतंकी गतिविधियों में उसकी मदद करता है। इसके अलावा वह पाकिस्तानी एजेंटों को भारतीय सीमा पर स्थित गाँवों में बसाने में मदद करता है। राज्य में भले ही कॉन्ग्रेस की सरकार हो लेकिन अजमेर, जैसलमेर सहित अन्य सीमावर्ती जिलों में गाज़ी ही सरकार होता है।

लगभग यही बात पंकज चौधरी ने भी कही। चौधरी ने बताया था कि कॉन्ग्रेस नेता सालेह मोहम्मद (गाज़ी का बेटा) के पेट्रोल पंप से एक पाकिस्तानी जासूस को गिरफ़्तार किया गया था। वह भारतीय वायु सेना के ‘ऑपरेशन फिस्ट वॉर एक्सरसाइज’ के बारे में पाकिस्तान को जानकारियाँ भेज रहा था। चौधरी ने कहा था कि राजनीतिक रसूख के कारण उसके पेट्रोल पंप से पाकिस्तानी जासूस के गिरफ़्तार होने के बावजूद उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी। एक एसपी का 1990 में हिस्ट्रीशीट खोलने के 28 दिन बाद तो दूसरे का 2013 में 48 घंटे बाद ट्रांसफर करवा दिया गया।

2013 में राजस्थान पुलिस के एक कॉन्स्टेबल ने अपना तबादला कराने की माँग की थी। जैसलमेर में तैनात कॉन्स्टेबल को अपनी जान का डर सताने लगा था। पप्पू राम ने यहाँ तक कहा था कि गाज़ी के बेटे ने (जो उस समय विधायक था) उसे पेट्रोल छिड़क कर जान से मार देने की धमकी दी थी। अपने और परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित पप्पू राम ने सरकार से कहा था कि उसे कहीं भी भेज दिया जाए, सिवाय जैसलमेर के। गाज़ी के बारे में यह जान कर आप दंग रह जाएँगे कि 2011 में तत्कालीन एसपी की अनुमति लिए बिना एक ASP रैंक के पुलिस अधिकारी ने उसकी फाइल बंद कर डाली थी। तत्कालीन अपराध सहायक ने इसका विरोध भी किया था। नियमानुसार एसपी ही फाइल बंद कर सकता है।

अल्पसंख्यकों के पास 2 ही विकल्प, BJP में शामिल हों या मजहब बदल लेंः आजम खान का MLA पुत्र

यूपी में जिला रामपुर में उर्दू गेट को जिला प्रशासन द्वारा गिराने को लेकर आजम खान के विधायक बेटे अब्दुल्ला आजम ने इसका ठीकरा योगी सरकार और जिला प्रशासन पर फोड़ा है। उन्होंने कहा कि एक समुदाय से नफरत की वजह से ऐसा किया गया है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री और समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान द्वारा बनवाया गया उर्दू गेट बुधवार (मार्च 06, 2019) को जिला प्रशासन ने गिरा दिया था। इस बात से नाराज आजम खान के बेटे और SP से विधायक मोहम्मद अब्दुल्ला आजम खान ने बयान दिया है कि अब समुदाय के लोगों के पास सिर्फ 2 ही रास्ते हैं, या तो BJP जॉइन कर लें या फिर धर्म बदल लें।

उत्तर प्रदेश सरकार पर निशाना साधते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि उर्दू गेट को गिराने के पीछे शासन-प्रशासन की साजिश थी। उस गेट का नाम उर्दू गेट था इसलिए उसे गिराया गया। प्रदेश सरकार को उर्दू और खास मजहब से नफरत है।

उन्होंने कहा, “सोचना चाहिए कि मु###न कैसे जिएँगे यहाँ, जब उनकी जुबान की निशानियों तक को सरकार बर्दाश्त नहीं कर सकती। बीजेपी ने अपनी सोच को दिखाया है जिसमें कहते आ रहे हैं कि 1947 के बाद मु###न किराएदार हो गया है उस सोच को लागू किया है। बीजेपी कहती है कि जब पाकिस्तान दिया गया था तो मु###न क्यों नहीं गए?”

अब्दुल्ला आजम ने कहा कि वर्तमान अधिकारियों के होने पर निष्पक्ष चुनाव होना मुमकिन नहीं है। सबसे बड़े अधिकारी की साजिश अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम सूची से काटने की है। उर्दू गेट तोड़े जाने को लेकर पार्टी लेवल पर अभी कोई रणनीति नहीं बनी है। जनता इसका इंसाफ करेगी।

कल ही उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री आजम खान द्वारा बनवाए गए उर्दू गेट को प्रशासन ने बुलडोजर चलवा कर ढाह दिया गया था। यह उर्दू गेट मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के स्वार रोड पर बनवाया गया था। आजम खान ने इसे अपने विधायक फंड से बनवाया था। सपा शासनकाल में बने इस गेट की ऊँचाई बहुत कम थी लेकिन तब आजम के मंत्री होने के कारण कई शिकायतों के बाद भी इस पर कार्रवाई नहीं की गई। अब योगी आदित्यनाथ की सरकार आने के बाद जनता की शिकायतों का संज्ञान लिया गया। इस गेट की ऊँचाई इतनी कम थी कि यहाँ से बस और ट्रक भी नहीं निकल पाते थे। ऐसे में, हमेशा दुर्घटना का ख़तरा बना रहता था। कई दुर्घटनाएँ हुई भी थी।

अगर देश का अर्थ मोदी नहीं, तो लोकतंत्र का अर्थ भी गाँधी परिवार नहीं है

आम चुनाव लगभग सर पर आ चुके हैं, सभी राजनीतिक दल अपने-अपने मोर्चों पर इम्तिहान की कड़ी तैयारी में तन-मन और धन से जुटे हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा कड़ी तैयारियाँ इन दलों के मीडिया में बैठे हुए समर्थकों और विरोधियों के बीच देखने को मिल रही हैं। पुलवामा हमले के बाद से मोदी सरकार को एक ही दिन में 25 तरह राय देने वाले मीडिया गिरोह के ‘रायचंदों’ में भारी उत्साह और बढ़ोत्तरी देखने को मिली।

ख़ास बात ये रही कि उनकी राय इस बात से ज्यादा प्रभावित होती नजर नहीं आई कि इतनी गंभीर परिस्थितियों में देशहित में क्या जरुरी है, बल्कि इस बात से प्रभावित नजर आती दिखी कि पाकिस्तान को घेरने के प्रयासों में मोदी सरकार को किस तरह से कमजोर साबित किया जाए। इस बीच जिन पाक अकुपाइड पत्रकारों (Pak Occupied Patrakaar) को पाकिस्तान की ओर से एक-आध बार री-ट्वीट भी किया गया, उनकी तो करियर सेक्युरिटी भी अब बढ़ चुकी है।

इस तमाम घटना के बाद जब इन्हीं पत्रकारिता के समुदाय विशेष के लोगों से जिम्मेदारीपूर्ण नजरिया अपनाने को कहा गया तो इनके जवाब हैं-

  • देश का मतलब मोदी नहीं है।
  • क्या सरकार से सवाल पूछना गुनाह है?
  • हम हाइपर नेशनलिज़्म की ओर बढ़ रहे हैं।

‘गाँधी परिवारिज़्म’ में लिप्त ये मीडिया गिरोह जब ‘हाइपर नेशनलिज़्म’ जैसे मुहावरों की रचना करता है तो इसकी व्याकुलता और कुंठा खुद सामने आ जाती है। इनके लिए जवाब सीधा सा है कि शायद देश-दुनिया के अन्य लोगों के ‘नेशनलिज़्म‘ की परिभाषा उनके जैसे ही गाँधी परिवार की चापलूसी मात्र तक सीमित नहीं है बल्कि भारत देश का सम्मान और गौरव है।

पुलवामा आतंकी हमले के बाद से ये बिन पेंदी का मीडिया गिरोह लगातार अपने तर्क और बयान बदलता रहा। मसलन, पुलवामा आतंकी हमले के दिन से मीडिया के इस समुदाय विशेष के लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 56 इंच की सरकार कहकर लगातार अपने भक्तमंडली को उकसाती रही और उन्हें खाद-पानी देती रही। इसके बाद जब सरकार ने भारतीय सेना को आतंकवादियों के खिलाफ खुली छूट देकर आतंकवादियों को सबक सिखाने का फैसला किया तब ये ‘शान्ति और बातचीत’ से हल निकालने की बात करने लगे।

अब, जबकि विंग कमांडर अभिनन्दन भारत वापस आ चुके हैं और युद्ध के हालातों के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, ऐसे समय में ये गाँधी परिवार-परस्त मीडिया गिरोह सरकार और भारतीय सेना से एयर स्ट्राइक के सबूत माँग कर अपनी जिम्मेदारी निभाने की बात कर रही है। ये बात अलग है कि IAF लगातार इस मामले पर साक्ष्य दे रही है, फिर भी मीडिया गिरोह का क्या है, वो तो मीडिया के आतंकवादी हैं सो अपना काम करेंगे ही।

मीडिया गिरोह और देश के आदर्श लिबरल समूह की बौखलाहट साफ़ है। इसे पिछले 4 सालों में हर दूसरे दिन ये कहते हुए सुना गया है कि देश का मतलब नरेंद्र मोदी नहीं है।

बेशक उनका कहना सही है। लेकिन जिस लोकतंत्र की हत्या की बात वो अपने भक्तजनों के मनोरंजन के लिए उठाते रहते हैं, उस लोकतंत्र का मतलब गाँधी परिवार की दासता भी नहीं है। अगर ऐसा न होता तो अवार्ड वापसी से लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक के मुद्दे पर एक विशेष समूह हमेशा तैयार न बैठा होता। ये वही लोग हैं जो  गाँधी परिवार के पुरस्कारों और उपाधियों तले दबे हुए हैं और जरूरत पड़ने पर अपनी स्वामी-भक्ति साबित करने के लिए वर्तमान सरकार के विरोध में माहौल तैयार करना शुरू कर देता हैं।

मुझे याद नहीं आता है कि जिहादी मानसिकता से उपजे पुलवामा आतंकी हमले पर टुकड़े-टुकड़े गैंग, अवार्ड वापसी वाले स्वघोषित बुद्दिजीवी गैंग से लेकर ‘देश का मतलब मोदी नहीं’ और हाइपर नेशनलिज़्म जैसी शब्दावलियाँ रचने वाले इस झुण्ड ने एक बार भी आतंकवाद के लिए जिम्मेदार मानसिकता पर कोई बयान दिया हो। अपने ढलते करियर में रोजगार की कमी के चलते हर दिन अभिव्यक्ति छिन जाने की दुहाई देते रहने वाले नसीरुद्दीन शाह इतने दिनों तक कहाँ छुपे हैं, ये पूछा जाना चाहिए।

स्पष्ट बात है, समाज का जो वर्ग आज़ादी के इतने वर्षों बाद तक स्वेच्छा से एक गाँधी परिवार की गुलामी में जीता आ रहा है, उसे नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान गुलामी महसूस होनी स्वाभाविक है। इस मीडिया गिरोह और लिबरल गैंग ने शहीदों को शहीद का दर्जा दिए जाने का मुद्दा उठाने का बहुत सही समय चुना है। इस एक परिवार ने जो जिम्मेदारियाँ सौंपी हैं ये उसी बखूबी निभाता है। जैसे, जब सरकार पाकिस्तान के खिलाफ सामरिक और कूटनीतिक तैयारियों में व्यस्त थी, तब इसे आदेश दिए गए कि बलिदानी सैनिकों की मृत्यु से लेकर आतंकवादियों की तबाही पर सबूत माँगिए और सैनिकों की पेंशन का मुद्दा उठाकर सरकार की कार्रवाई में बाधा डालिए। मोर्चे पर ऐसे आदमी को खड़ा कर दिया गया है, जिसे शायद अब जलील होने में जरा भी शर्म नहीं महसूस होती है और कॉन्ग्रेस को उसकी योग्यता पर पूरा यकीन भी है।

अगर गौर किया जाए तो कुछ वर्षों को छोड़कर आज़ादी के बाद से लगातार कॉन्ग्रेस की ही सरकार देश में रही है। कॉन्ग्रेस के लिए कभी भी परिस्थितियाँ विषम नहीं थी। उन्होंने जब जो चाहा तब उस तरह के परिवर्तन देश में किए, खास बात है कि गाँधी परिवारिज़्म के चलते उस दौरान लोकतंत्र की कभी हत्या नहीं हुई। कभी संविधान में उठा-पटक की गई तो कभी लोगों को गायब कर दिया गया। इन सबके बीच कॉन्ग्रेस सरकार कुछ जरुरी काम अगर भूलती रही तो वो थी सैनिकों की सुरक्षा, ‘शहीद’ का दर्जा (जो कि किसी भी लिहाज से तार्किक नहीं है), सेना को बुलेटप्रूफ़ जैकेट और अच्छी गुणवत्ता वाले विमान।

विपक्ष को भी शायद मोदी सरकार पर पूरा यकीन है कि जो काम उनकी पीढ़ी-पुस्तैनी वाली सरकार नहीं कर पाई, उन्हें नरेंद्र मोदी जरूर पूरा कर देगा, और वास्तव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में वो सब कर के दिखाया भी है। उन्होंने जता दिया है कि जो काम राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते कॉन्ग्रेस कभी नहीं कर पाई उसे एक चाय बेचने वाला सिर्फ 5 सालों के भीतर कर सकता है।

नरेंद्र मोदी जनता का वो नेता है जिसने 60 साल के फासले को मात्र 5 सालों में समेट लिया और वो ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने अपने समय और कार्यकाल का इस्तेमाल खुद को भारत रत्न देने में और चापलूस जुटाने में नहीं बल्कि समाज के सबसे निचले तबके से लेकर हर वर्ग के लोगों को सामाजिक न्याय दिलाने के हर सम्भव प्रयासों को दिशा देने में किया और मात्र 5 साल के कार्यकाल में कर दिखाया कि ‘मोदी है तो मुमिकन है’।

नरेंद्र मोदी के नाम से सर के बाल नोंच लेने वाला ये मीडिया गिरोह अगर स्वयं से पूछे कि मोदी को आखिर इतना बड़ा बनाया किसने है तो इसका जवाब वो खुद ज्यादा बेहतर तरीके से जानते होंगे। पिछले 5 सालों में सरकार के हर छोटे-बड़े घटनाक्रमों में सीधा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जिम्मेदार ठहराने की व्याकुलता में ये मीडिया गिरोह अनजाने में ही मोदी का सीना 56 इंच से ज्यादा कर चुका है। जब आपकी नजर में लोगों के शौचालय में पानी न आने से लेकर पाकिस्तान में जैश-ए-मोहम्मद पर कार्रवाई तक के लिए सीधा प्रधानमंत्री मोदी जिम्मेदार होने लगे तो आप खुद ही एक व्यक्ति को सभी शक्तियों से ऊपर मान चुके होते हैं।

‘देश का मतलब मोदी नहीं’ कहने वालों को शायद अभी तक समझना बाकी है कि लोकतन्त्र स्वयं को भारत रत्न देने में नही बल्कि समाज से जुड़े और समाज को जोड़ने वाले लोगों को पहचान देने में निहित है। गाँधी परिवारिज़्म की भक्ति में भूल गए कि लोकतंत्र की परिभाषा ‘जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन’ से बदलकर कब चुनिंदा लोगों का ‘अपने फायदे के लिए, जनता पर शासन’ में तब्दील हो गया।

लोकतन्त्र का अर्थ वह व्यवस्था है जिसमें एक पार्टी कार्यकर्ता देश का प्रधनमंत्री बन जाता है। जब हम लोकतन्त्र की बात करें तो सवा सौ करोड़ भारतीय नागरिक दिखाई दें, न कि परिवार का कोई चिरयुवा सदस्य, जो माता के गर्भ से ही प्रधानमंत्री बनने का आरक्षण लेकर आता है।

हाइपर नेशनलिज़्म जैसी संज्ञा इज़ाद करने वालों को ज्ञात रहे कि गाँधी परिवारिज़्म की विचारधारा में लिप्त लोगों का ध्येय अगर लोकतंत्र मजबूत करना होता तो स्वतंत्रता के बाद का इतिहास कुछ अलग तरह से लिखा होता, जिसमें पाकिस्तान जैसा देश हमारा पड़ोसी मुल्क नहीं होता, कश्मीर का विवाद नहीं होता।

साथ ही मीडिया गिरोह और मोदी घृणा में बहुत दूर निकल चुके भक्तजनों को यह भी स्मरण रहना चाहिए कि लोकतंत्र को सिर्फ वोट की भीड़ बना देने वाले लोग कभी भी लोकतंत्र के अगुवा नहीं हो सकते।