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‘असम में अगर शाहजहाँ या शाह ज़लाल से नाम पूछें तो बुद्धिजीवी Victim Card खेलते हैं’: CM सरमा बोले- लैंड जिहाद की लड़ाई में मुझे और मेरे परिवार को खतरा

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने एक प्रेस वार्ता के दौरान एक पत्रकार से उसका नाम पूछ लिया था। संयोग से वह पत्रकार मुस्लिम निकला था। इसके बाद वामपंथी-इस्लामी गैंग के साथ-साथ विपक्षी दलों ने सीएम सरमा को सांप्रदायिक बताते हुए हमला बोल दिया था। अब मुख्यमंत्री सरमा ने इसका करारा जवाब दिया है और कहा है कि यह सुरक्षा कारणों से जरूरी था।

उन्होंने अपने बयान का एक वीडियो शेयर करते हुए सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा, “प्रेस वार्ता में यह नियम होता है कि पत्रकार अपने नाम का परिचय देने के बाद सवाल पूछते हैं। यह सुरक्षा के लिए भी अनिवार्य है। लेकिन, असम में अगर शाहजहाँ या शाह ज़लाल से नाम पूछें तो बुद्धिजीवी ‘Victim Card’ खेलने लगते हैं।”

उन्होंने कहा कि वे असम में लैंड जिहाद के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं, इसलिए ‘टूलकिट’ गैंग द्वारा उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा, “लैंड जिहाद का Toolkit जानिए। असम में बदलते जनसांख्यिकी के खिलाफ जो मैं लड़ाई लड़ रहा हूँ, उससे मुझे और मेरे परिवार को बहुत बड़ा खतरा है। Ecosystem के लोग मुझे जितना भी गाली देना चाहें, दे सकते हैं, लेकिन मैं पीछे नहीं हटूँगा।”

कॉन्ग्रेस सहित विपक्षी दलों द्वारा इसे मुद्दा बनाने को लेकर सीएम ने कहा, “असम में लोकसभा चुनाव के बाद जिन क्षेत्रों में एक पार्टी ने अपना वोट शेयर बढ़ाया, वहाँ इस पार्टी के समर्थकों यानी एक विशेष समुदाय को इतना साहस प्राप्त हुआ कि वह अपना दबदबा बनाने के चक्कर में हैं। हिंदू महिलाओं पर जो अत्याचार की घटना आ रही है इसी का परिणाम है।”

उन्होंने आगे कहा, “असम में महिलाओं के खिलाफ अपराध भी एक बड़ी अतिक्रमण रणनीति का हिस्सा है। वे परिवारों को डराते हैं और फिर उनकी ज़मीन हड़प लेते हैं। धींग का पवित्र शहर और हाल ही में एक हिंदू नाबालिग के खिलाफ अपराध की जगह पर कभी 90% हिंदू आबादी थी। आज यहाँ 90% मुस्लिम आबादी है।”

दरअसल, 21 अगस्त को मीडिया से बातचीत के दौरान शाह आलम नाम के एक ऑनलाइन मीडिया के पत्रकार ने सीएम सरमा से सवाल पूछा। आलम ने पूछा था कि क्या राज्य सरकार ने उनके जालुकबारी निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मंडकाटा में पहाड़ियों की कटाई के खिलाफ कोई कार्रवाई की है।

इस पर सीएम सरमान ने आलम से कहा कि अगर उनके पास पहाड़ी काटने का वीडियो फुटेज है तो उसे साझा करें। उन्होंने कहा कि अगर पहाड़ी कट रही है तो उसे रोकना होगा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मंडकाटा पहाड़ी की कटाई गुवाहाटी में अचानक आई बाढ़ का कारण नहीं हो सकती।

इस दौरान सीएम ने पत्रकार से उसका नाम पूछ लिया। पत्रकार ने अपना नाम भी बताया। इसके बाद उन्होंने एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी का नाम लिया, जिसके संस्थापक एवं चांसलर एक मुस्लिम महबूबुल हक हैं। इससे पहले सरमा ने गुवाहाटी में बाढ़ के लिए इस यूनिवर्सिटी को भी जिम्मेवार बताया था।

उन्होंने कहा था कि मेघालय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के परिसर के निर्माण के लिए वनों की बड़े पैमाने पर कटाई की गई, जिसके कारण गुवाहाटी में अचानक बाढ़ आई। उन्होने कहा था कि विश्वविद्यालय के द्वार मक्का (सऊदी अरब का इस्लामी शहर) जैसे हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय के खिलाफ राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) का दरवाजा खटखटाने की बात कही थी।

इस मामले को वामपंथी और इस्लामी गैंग के साथ-साथ विपक्षी दलों ने सांप्रदायिक बताकर खूब उछाला था। कॉन्ग्रेस के जयराम रमेश ने कहा था, “असम के मुख्यमंत्री ने जो कहा वह अस्वीकार्य और निंदनीय है। बीमार दिमाग और बड़बोलापन एक जहरीला मिश्रण है।”

बांग्लादेश में तख्तापलट का फायदा मुस्लिम घुसपैठियों को, 1 महीने में 35 पकड़ाए: संघर्ष कर रहे हिंदुओं पर बोले असम के CM- हिंदू होते हैं मातृभूमि के भक्त

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने शनिवार (24 अगस्त 2024) को कहा कि बांग्लादेश में तख्ता पलट के बाद वहाँ के हिंदू लड़ रहे हैं, जबकि मुस्लिम भागकर भारत में घुसपैठ कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले एक महीने में 35 बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को गिरफ्तार किया गया है। सीएम सरमा का कहना है कि पिछले एक महीने में बांग्लादेश से एक भी हिंदू भारत नहीं आया।

हिमंता सरमा ने कहा कि जिन 35 बांग्लादेशियों को गिरफ्तार किया है, उनके पास पासपोर्ट नहीं है। वे सब भारत के असम राज्य में अवैध रूप से घुसे थे। उन्होंने कहा कि हाल ही में असम के करीमगंज में दो लोगों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें वापस भेज दिया गया। सरमा के अनुसार, “वहाँ की हिंदू कम्यूनिटी भारत आने की कोशिश नहीं कर रही है, मुस्लिम यहाँ आने की लगातार कोशिश कर रहे हैं।”

सीएम सरमा ने शनिवार को कहा, “आज ही हमने करीमगंज में 2 लोगों को गिरफ्तार किया और उन्हें वापस भेजा। वे हिंदू नहीं थे।” उन्होंने बताया कि बांग्लादेशी मुस्लिम असम के जरिए कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु और तमिलनाडु के शहर कोयंबटूर जाना चाहते हैं। ये घुसपैठिए माधोपुर (बीडी)-अगरतला रूट के जरिए भी असम में घुस रहे हैं। असम पुलिस ने बदरपुर रेलवे स्टेशन दोनों पकड़ा है। 

हिमंता सरमा ने कहा कि करीमगंज में पकड़ाए दोनों बांग्लादेशी भी बेंगलुरु और कोयंबटूर की टैक्सटाइल इंडस्ट्रीज में नौकरी करना चाहते थे। उनकी पहचान मासूम खान और सोनिया अख्तर के रूप में हुई है। मासूम बांग्लादेश के मॉडलगंज पुलिस स्टेशन इलाके का रहने वाला है। वहीं, सोनिया ढाका की रहने वाली है। दोनों अगरतला रूट से असम आए थे।

असम के मुख्यमंत्री ने कहा है कि अगर बांग्लादेश के हिंदू भारत आना चाहते तो वे बँटवारे के समय ही आ जाते। वे बांग्लादेश को अपनी मातृभूमि मानते हैं, इसलिए वे नहीं आए। हिमंता सरमा ने आगे कहा, “हमें उनका सम्मान करना चाहिए। हमने प्रधानमंत्री मोदी से कहा है कि वे बांग्लादेश सरकार से हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने का दबाव डालें।”

बता दें कि बांग्लादेश में 5 अगस्त 2024 को तख्ता पलट हुआ था। आरक्षण खत्म करने की माँग को लेकर शुरू हुआ प्रदर्शन हिंसक हो और कट्टरपंथियों के हाथ में चला गया था। इसके बाद शेख हसीना ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देकर बांग्लादेश छोड़ दिया था। इसके बाद वहाँ के अल्पसंख्यक हिंदुओं के घरों-दुकानों एवं मंदिरों पर हमले हुए। कई लोगों की हत्या कर दी गई।

जो NPS में लगा चुके पैसा, उनके लिए UPS में क्या, कितना और कैसे होगा फायदा… OPS के मुकाबले कितना अलग: जानिए पॉइंट-बाइ-पॉइंट

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने यूनिफाइड पेंशन स्कीम (Unified Pension Scheme- UPS) को मंजूरी दी है। यह 1 अप्रैल 2025 से लागू हो जाएगा। इस योजना से 23 लाख केंद्रीय कर्मचारियों को लाभ मिलेगा। कर्मचारियों को राष्ट्रीय पेंशन योजना (NPS) और यूनिफाइड पेंशन योजना (UPS) में एक को चुनने का विकल्प दिया जाएगा। अब UPS, NPS और OPS के अंतर को समझने की कोशिश करते हैं।

यूनिफाइड पेंशन स्कीम (UPS)

UPS केंद्र की एनडीए सरकार द्वारा शुरू की गई नई पहल है। यह ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की ही तरह काम करेगा और साथ ही इसमें NPS के भी कुछ जरूरी फायदों को शामिल किया गया है। इसके तहत कर्मचारियों की बेसिक सैलरी के 50 फीसदी के बराबर आजीवन पेंशन देने का प्रावधान किया गया है। UPS का लाभ लेने के लिए 25 वर्ष की न्यूनतम अर्हक सेवा का मानदंड रखा गया है।

UPS चुनने वाले कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति से पहले अंतिम 12 महीनों के मूल वेतन के औसत का 50 प्रतिशत मिलेगा। लाभार्थी को न्यूनतम 10 वर्ष की सेवा की सेवानिवृत्ति पर कम-से-कम 10,000 रुपये प्रतिमाह मिलेंगे। केंद्रीय कर्मचारियों को NPS और UPS में से चुनाव का विकल्प मिलेगा। राज्य सरकारें भी इसे लागू कर सकती हैं।

इसमें महंगाई बढ़ने के हिसाब से डियरनेस अलाउंस में बढोतरी, कर्मचारी की मृत्यु पर परिजनों को पेंशन का 60 फीसदी देने की गारंटी है। इसमें ग्रेच्युटी के साथ एकमुश्त सुपरएनुएशन का भी प्रावधान किया गया है। महंगाई राहत औद्योगिक श्रमिकों के लिए अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI-IW) पर आधारित होगी। 

प्रत्येक छह महीने की सेवा के लिए सेवानिवृत्ति की तिथि पर मासिक पारिश्रमिक यानी वेतन और महंगाई भत्ते का दसवाँ हिस्सा दिया जाएगा। सरकारी कर्मचारी अपने वेतन का 10% यूपीएस में योगदान देंगे। अब जिस तरह से ओल्ड पेंशन स्कीम में सरकार का योगदान 14 फीसदी होता था, वो यूपीएस में बढ़ाकर 18.5 फीसदी कर दिया गया है।

केंद्रीय कर्मचारियों की तरह ही अब राज्य सरकारों को भी एकीकृत पेंशन योजना (UPS) और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) में से एक को चुनने का विकल्प दिया जाएगा। अगर राज्य सरकारें NPS के बजाय UPS चुनती हैं तो इसके लाभार्थियों की संख्या लगभग 90 लाख हो जाएगी। UPS प्राइवेट कर्मियों के लिए नहीं है। वहीं, NPS में प्राइवेट नौकरी वाले निवेश कर सकते हैं।

नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS)

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की सरकार ने नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) योजना को साल 2004 से लागू किया था। इस योनजा को ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS) की जगह पर लागू करने की योजना थी। हालाँकि, इसका बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था।

NPS के तहत कर्मचारियों से भी पेंशन में योगदान लिया गया था। यह योगदान 10 प्रतिशत है। इसके अलावा, इसमें कुछ और भी प्रावधान किए गए हैं। इसमें पेंशन की 60 फीसदी रकम टैक्स फ्री होती है और एकमुश्त निकाली जा सकती है। वहीं, इसकी 40 फीसदी रकम पर टैक्स ब्रैकेट के हिसाब टैक्स देना होता है।

NPS के तहत मिलने वाला पेंशन कर्मचारी द्वारा नौकरी के दौरान दिए गए योगदान पर निर्भर करता है। इसके साथ ही यह रकम शेयर बाजार आदि से जुड़ा होता है तो इससे मिलने वाली रकम मार्केट परफॉर्मेंस पर भी निर्भर करता है। इसमें सरकारी कर्मचारी अपने मूल वेतन और DA का 10% योगदान करते हैं, जबकि सरकार इसमें 14 फीसदी का योगदान करती है।

एनपीएस में कोई भी व्यक्ति अपना अकाउंट खोल सकता है। इसमें न्यूनतम योगदान 500 रुपए है। इसमें दो तरह के अकाउंट होते हैं। पहला, टियर-1 अकाउंट और दूसरा टियर-2 अकाउंट। टियर-1 अकाउंट अनिवार्य होता है और इस पर टैक्स छूट मिलती है। वहीं, टियर-2 वैकल्पिक होता है। इसमें से कभी भी निकाल सकते हैं। इस पर कर छूट का लाभ नहीं मिलता है।

NPS से कोई भी कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद एकमुश्त एक्यूमुलेटेड राशि के तौर पर पेंशन की कुल राशि का 60 फीसदी रकम निकाल सकते हैं। बाकी रकम का इस्तेमाल रेगुलर पेंशन के भुगतान के लिए एन्यूटी खरीदने में किया जा सकता है। इसमें 60 प्रतिशत राशि पर कोई भी टैक्स नहीं लगेगा।

ओल्ड पेंशन स्कीम (OPS)

ओल्ड पेंशन स्कीम में कर्मचारियों के आखिरी वेतन के आधार पर मासिक पेंशन देने का प्रावधान है। इस योजना के तहत कर्मचारियों को पेंशन में योगदान नहीं देना होता था। इसका खर्च सरकार वहन करती थी। इस योजना के स्थान पर अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने NPS योजना लागू की थी। OPS को फिर से लागू करने की माँग लगातार होती रहती है।

OPS सिर्फ उन सरकारी कर्मचारियों पर लागू होता है, जो 1 जनवरी 2004 से पहले नौकरी में शामिल हुए हैं। OPS में पेंशन की रकम में महंगाई भत्ते (DA) में समय-समय पर होने वाले बदलावों को भी शामिल किया जाता है। DA महंगाई से जुड़ा मामला है। इसके स्कीम के तहत मिलने वाली रकम पर कोई टैक्स नहीं लगता है।

OPS के तहत कर्मचारी अपनी रिटायरमेंट के बाद अंतिम वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन के रूप में निकाल सकते थे। इस योजना को सरकार ने अब बंद कर दिया है। अगर कर्मचारी NPS की जगह UPS का चुनाव करते हैं तो उन्हें जो अतिरिक्त राशि या उसका ब्याज बनेगा, उसे केंद्र भुगतान करेगा। यह अतिरिक्त रकम लगभग 800 करोड़ रुपए की होगी।

तीनों में कौन सा स्कीम बेहतर?

OPS सबसे बेहतर स्कीम था, क्योंकि इसमें कर्मचारियों को पेंशन के लिए कोई योगदान नहीं देना पड़ता था। इसका सारा खर्च सरकार वहन करती थी। हालाँकि, कुछ अन्य फायदों को उसकी जगह लाए गए NPS में जोड़ा गया था। सरकार का आकलन है कि अभी कार्यरत 99 फीसद केंद्रीय कर्मियों के लिए UPS फायदेमंद होगा। ऐसे में NPS और नया स्कीम UPS में कौन बेहतर है, यह जानना जरूरी है।

UPS में कर्मचारियों को एक निश्चित पेंशन मिलेगा, जो उनकी पिछले एक साल के औसत मूल वेतन एवं महंगाई भत्ता का 50 प्रतिशत होगा। वहीं, NPS में बाजार में निवेशित राशि के हिसाब से पेंशन राशि मिलने की व्यवस्था है। UPS में सेवा काल 10 से 25 वर्षों का है तो पेंशन की राशि अवधि के समानुपातिक आवंटन के आधार पर तय होगी। यह व्यवस्था NPS में नहीं है।

UPS में सेवानिवृत्त कर्मचारी की मृत्यु होने पर उसके आश्रित (पति या पत्नी) को पेंशन राशि का 60 फीसदी सुनिश्चत पारिवारिक पेंशन के तौर पर देने की व्यवस्था की गई है। इसकी महत्वपूर्ण व्यवस्था यह है कि इसमें न्यूनतम पेेंशन की राशि 10 हजार रुपए प्रतिमाह है, जबकि NPS में इस तरह की व्यवस्था नहीं है।

UPS की एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इसे महंगाई सूचकांक से जोड़ा गया है। अगर खुदरा महंगाई दर बढ़ती है तो उसके हिसाब से पेंशन की राशि भी बढ़ेगी। महंगाई भत्ता के आधार पर पेंशन, पारिवारिक पेंशन और न्यूनतम पेंशन तीनों का निर्धारण होगा। वहीं, NPS में इसका निर्धारण सिर्फ मार्केट के आधार होता है।

मोदी सरकार द्वारा पेश इस नई पेंशन स्कीम में सेवा काल के दौरान हर छह माह के लिए मूल वेतन का 10 फीसद राशि एकमुश्त मिलेगी, जो ग्रेच्यूटी के अलावा होगी। इसके अलावा, UPS में सरकार का योगदान 18.5 प्रतिशत होगा, जोकि NPS के योगदान से अधिक है। NPS में सरकार का योगदान 14 प्रतिशत है।

कुरान-पैगंबर को मानने वाले अहमदिया इस्लाम में कबूल नहीं, कट्टरपंथियों के सामने झुका पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट: जानिए कौन है यह समुदाय, जिसको पासपोर्ट भी नसीब नहीं

पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने उस फैसले को वापस ले लिया है, जिसमें उसने कहा था कि अहमदिया समुदाय अपने मजहब का पालन करने के लिए स्वतंत्र है। इस निर्णय के बाद सुप्रीम कोर्ट के बाहर विरोध प्रदर्शन हुए थे और जजों को धमकियाँ दी गई थीं। पाकिस्तानी जज अब अपने उस फैसले के लिए माफ़ी माँग रहे हैं और मौलवियों से सलाह ले रहे हैं।

दरअसल, पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने मुबारक सानी मामले में यह निर्णय दिया था। इस जजों ने समीक्षा निर्णय में सुधार के लिए पाकिस्तानी सरकार की अपील को स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही उसने अपने पिछले आदेश से उन सभी ‘विवादास्पद पैराग्राफों’ को हटा दिया है, जिसमें इस्लाम के अहमदिया समुदाय को अपने दीन-मजहब का अधिकार दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालय में उपस्थित मौलाना के अनुरोध पर समीक्षा करते हुए निर्णय से पैराग्राफ 7, 42 और 49-सी को हटा दिया। हटाए गए पैराग्राफ में प्रतिबंधित पुस्तक और अहमदिया समुदाय की धर्मांतरण गतिविधियों का उल्लेख था। सुनवाई के दौरान मौलाना फजलुर रहमान ने न्यायालय को सलाह दी कि वह अपनी भूमिका को जमानत देने तक सीमित रखे।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संघीय सरकार ने निर्णय की समीक्षा की माँग की थी और इस्लामिक विचारधारा परिषद (सीआईआई) की सिफारिशों पर विचार किया था। इससे पहले, न्यायालय के तीन सदस्यीय पीठ का नेतृत्व करने वाले मुख्य न्यायाधीश काज़ी फ़ैज़ ईसा ने इस मामले में मुफ़्ती तकी उस्मानी और मौलाना फ़ज़लुर रहमान सहित इस्लामी उलेमाओं से सहायता माँगी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने उलेमाओं से अपने निर्णय में किसी भी त्रुटि की पहचान करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को देखने बाद उलेमाओं ने फ़ैसले में संशोधन करने या फिर इसे पूरी तरह रद्द करने का सुझाव दिया था। तुर्किये से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए भाग लेते हुए मुफ़्ती तकी उस्मानी ने धर्मांतरण की व्याख्या पर चिंताओं का हवाला देते हुए पैराग्राफ़ 7 और 42 को हटाने की सिफ़ारिश की।

सुप्रीम कोर्ट ने उस्मानी की इन चिंताओं को स्वीकार किया और अन्य इस्लामी विद्वानों से आगे की राय माँगी। अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया कि संसद और मजहबी उलेमाओं ने संघीय सरकार से सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप का अनुरोध करने का आग्रह किया था, क्योंकि सिविल प्रक्रिया के तहत दूसरी समीक्षा संभव नहीं थी।

मुख्य न्यायाधीश काज़ी फ़ैज़ ईसा ने न्यायिक अखंडता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा, “मैं हर नमाज़ के बाद दुआ करता हूँ कि कोई गलत निर्णय न लिया जाए।” उन्होंने संसद के प्रति सम्मान भी व्यक्त किया। अदालत ने इस बात पर जोर देते हुए निष्कर्ष निकाला कि मुबारक सानी समीक्षा निर्णय से हटाए गए पैराग्राफों को भविष्य के मामलों में मिसाल के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।

दरअसल, मुबारक अहमद सानी पर ‘पंजाब दीनी किताब कुरान (मुद्रण और रिकॉर्डिंग) (संशोधन) अधिनियम 2021’ के तहत आरोप लगाया गया था। इस मामले में वह दोषी भी ठहराया गया था। हालाँकि, उसका अपराध यह कानून लागू होने से पहले हुआ था। इसके कारण उसे अदालत से जमानत और रिहाई मिल गई। इसके विरोध में सुप्रीम कोर्ट के बाहर भारी प्रदर्शन हुए।

पंजाब सरकार ने कानून, सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता से संबंधित संवैधानिक अधिकारों को स्पष्ट करने के लिए समीक्षा याचिका दायर की। 24 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता और धर्म को मानने का अधिकार कानून, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है। बाद में इस्लामिक विचारधारा परिषद ने अदालत से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया।

क्या है मुबारक सानी मामला?

ईंशनिंदा के आरोप में गिरफ्तार किए गए अहमदिया समुदाय के मुबारक अहमद सानी को पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया था। साल 2023 में उन्हें तफसीर-ए-सगीर (कुरान का छोटा संस्करण) बाँटने के लिए गिरफ्तार किया गया था। इसमें अहमदिया संप्रदाय के संस्थापक के बेटे मिर्ज़ा बशीर-उद-दीन महमूद अहमद द्वारा कुरान की 10 खंडों की व्याख्या की गई है।

सानी पर 2021 के पंजाब कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगाया गया था, जो कुरान से संबंधित टिप्पणियों के मुद्रण और वितरण पर रोक लगाता है। सानी ने तर्क दिया कि उन्होंने कानून लागू होने से पहले साल 2019 में इसे बाँटा था। पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश काज़ी फ़ैज़ ईसा ने अपने फैसले में कहा कि आपराधिक कानूनों को पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता है।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसे रिहा कर दिया। शुरू में इस पर किसी का ध्यान नहीं गया, लेकिन बाद में तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) ने इसे सोशल मीडिया खूब हाईलाइट किया। इसके बाद इस फैसले के विरोध में लोग सड़कों पर उतरने लगे। फजलुर रहमान जैसे कट्टरपंथी इसमें कूद पड़े और आग में घी डालने का काम किया।

इस साल 23 फरवरी को हज़ारों पाकिस्तानियों ने न्यायाधीश ईसा के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस ईसा के फैसले का बचाव करते हुए एक बयान जारी किया और कहा कि यह फैसला पाकिस्तान के इस्लामी संविधान का उल्लंघन नहीं करता है। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका के खिलाफ अभियान की निंदा की थी।

हालाँकि, विवाद बढ़ने के बाद पंजाब सरकार ने इस फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर की। कई मजहबी दलों ने भी याचिका दायर की। उधर कट्टरपंथी सुप्रीम कोर्ट पर लगातार दबाव बनाते रहे और सुप्रीम कोर्ट के सामने विरोध करते रहे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को चेतावनी दी थी कि अगर 7 सितंबर से पहले फैसले को बदला नहीं गया तो इस्लामाबाद में कोई शांति नहीं रहेगी।

आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को कट्टरपंथियों के आगे झुकना पड़ा। 24 जुलाई को प्रधान न्यायाधीश ईसा सहित तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने फैसले की दोबारा जाँच की। न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि अहमदिया समुदाय अभी भी मुस्लिमों के रूप में पहचान नहीं रखते हैं या ना ही अपनी इबादतगाहों के बाहर अपनी मान्यताओं का प्रचार कर सकते हैं।

कट्टरपंथियों ने सीआईआई के अहमदिया को अपनी इबादतगाहों के भीतर अपना दीन मानने की अनुमति देने के फैसले की आलोचना की। उन्होंने अहमदिया समुदाय पर और कठोर नियम लागू करने की माँग की। तहफ़्फ़ुज़े-ख़त्मे नबुव्वत ने अदालत से इसे पूरी तरह से वापस लेने के लिए कहा और विरोध प्रदर्शन किया।

विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस को भीड़ नियंत्रित करने के लिए लाठी चार्ज और आँसू गैसे को गोले दागने पड़े। इसका सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए हैं। हालाँकि, कट्टरपंथी पीछे हटने को तैयार नहीं दिखे। आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को पीछे झुकना पड़ा और मौलवियों की सलाह के मुताबिक फैसले में संशोधन करना पड़ा।

पाकिस्तान में अहमदिया को मुस्लिम का दर्जा नहीं

पाकिस्तान में 20 से 50 लाख अहमदिया रहते हैं। अपनी मत के कारण इस्लाम के कट्टरपंथी सुन्नी उन्हें मुस्लिम नहीं मानते। अहमदिया को उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उन्हें मस्जिदों में नमाज पढ़ने, इस्लामी अभिवादन का उपयोग करने, कुरान को सार्वजनिक रूप से उद्धृत करने और धार्मिक सामग्री का उत्पादन या प्रसार करने से कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया गया है।

उन्हें नमाज पढ़ने के लिए सिर्फ अहमदिया संप्रदाय के लिए बनाए गए मस्जिदों का ही इस्तेमाल करने के लिए बाध्य किया जाता है। अहमदिया को पासपोर्ट या राष्ट्रीय पहचान पत्र प्राप्त करने के लिए खुद को गैर-मुस्लिम घोषित करना है। इन प्रतिबंधों का उल्लंघन करने पर उन्हें कारावास हो सकती है। इतना ही नहीं, उन पर ईशनिंदा जैसे कठोर कार्रवाई का भी सामना करना पड़ता है।

‘मिस इंडिया’ जीतने वाली लड़कियों में एक भी अल्पसंख्यक नहीं? संविधान लहराने वाले राहुल गाँधी के सामने रख दी गई लिस्ट तो फूटा गुब्बारा

कॉन्ग्रेस के साधारण कार्यकर्ता और पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी, जो अभी लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, उन्होंने यूपी के प्रयागराज में आयोजित संविधान सम्मान सम्मेलान में हिस्सा लिया। राहुल गाँधी ने संविधान सम्मान सम्मेलन में मिस इंडिया कॉन्टेस्ट को लेकर अजीबोगरीब दावा कर दिया। राहुल गाँधी ने कहा कि 90 प्रतिशत लोग सिस्टम का हिस्सा नहीं हैं, मैं तो मिस इंडिया की लिस्ट देख रहा था, उसमें कोई दलित-ओबीसी-आदिवासी, अल्पसंख्यक ही नहीं है।

राहुल गाँधी के बयान को कोट करते हुए एबीपी न्यूज ने बाकायदा स्टोरी भी पब्लिश कर दी। एबीपी न्यूज ने हेडलाइन दिया, ”मैंने मिस इंडिया की लिस्ट निकाली, उसमें एक भी दलित, अल्पसंख्यक नहीं…’, प्रयागराज में बोले राहुल गाँधी’। इस खबर के प्रकाशित होने के थोड़ी देर बाद उसके खुलने में दिक्कतें आने लगी और हेडलाइन में बदलाव करते हुए अल्पसंख्यक शब्द हटा दिया गया। बाकी राहुल गाँधी ने 90 प्रतिशत जनता की बात कही, तो उसमें ‘अल्पसंख्यक’ आते हैं या नहीं, ये वही बता सकते हैं।

एबीपी न्यूज के ट्विटर हैंडल का स्क्रीनशॉट

राहुल ने कहा, “90 फीसदी लोग सिस्टम का हिस्सा नहीं हैं। अल्पसंख्यक भी इसी में आते हैं। उनके पास हर तरह की प्रतिभा मौजूद है, लेकिन फिर भी वे सिस्टम से जुड़े नहीं हैं। यही कारण है कि हम जाति जनगणना की माँग कर रहे हैं।”

राहुल गाँधी के इस बयान और मीडिया की हेडलाइन देखने के बाद बीजेपी नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने राहुल गाँधी के दावे की हवा निकाल दी। तजिंदर बग्गा ने आजादी के बाद से अब तक उन महिलाओं की लिस्ट शेयर की, जिन्होंने मिस इंडिया का क्राउन पहना है। इसमें कई नाम हैं।

तजिंदर बग्गा ने एक्स पर लिखा, “राहुल गाँधी बेवक़ूफ़ है लेकिन बयान से पहले कम से कम पढ़ाई कर लेता तो इतनी जग हंसाई ना होती। चलो इसका थोड़ा ज्ञान वर्धन कर देते हैं। इस देश में मिस इंडिया कॉन्टेस्ट 1947 में शुरू हुई, उसमें अल्पसंख्यक समाज की ये बहनें विजेता बनी।” उन्होंने जो लिस्ट साझा की, उनमें एस्टर विक्टोरिया अब्राहम, इंद्रानी रहमान, फेरिअल करीम से लेकर नायरा मिर्जा, अंजुम मुमताज, फरजारा हबीब, सोनू वालिया, गुल पनाग, साराह जेन डायस, नवनीत कौर ढिल्लन तक के नाम हैं।

वैसे, ये बताना जरूरी है कि इंद्रानी रहमान और फेरिअल करीम शादीशुदा होने के बावजूद मिस इंडिया बनी थी। इसमें इंद्रानी की 6 साल की बेटी भी थी। इंद्रानी ने मिस इंडिया बनने के सालों पहले महज 15 साल की उम्र में हबीब रहमान नाम के आर्टिटेक्ट से साल 1945 में शादी की थी। ठीक उसी तरह से करीम भारत-लेबनीज मूल की क्रिश्चियन थी, लेकिन शादी के बाद मुस्लिम बन गई थी, उसके बाद मिस इंडिया बनी थी।

नौकरी के अंतिम वर्ष में जितना वेतन, उसका आधा पेंशन: OPS-NPS के बाद मोदी सरकार लेकर आई UPS, सरकारी कर्मचारियों को तोहफा

मोदी सरकार ने यूनिफाइड पेंशन स्कीम (Unified Pension Scheme) को मंजूरी दी है। जो 1 अप्रैल, 2025 से लागू होगी। इस योजना से 23 लाख केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों को लाभ मिलेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने शनिवार (24 अगस्त 2024) को यूपीएस को मंजूरी दी।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इस योजना की जानकारी दी और बताया कि कर्मचारियों को राष्ट्रीय पेंशन योजना (NPS) और यूनिफाइड पेंशन योजना (UPS) के बीच चयन करने का विकल्प दिया जाएगा। यूनिफाइड पेंशन स्कीम के तहत लाभार्थी को 25 वर्ष की न्यूनतम अर्हक सेवा के लिए सेवानिवृत्ति से पहले अंतिम 12 महीनों में प्राप्त औसत मूल वेतन का 50 प्रतिशत मिलेगा। कम से कम 10 वर्ष की सेवा अवधि तक प्राप्त पेंशन आनुपातिक होगी।

मौजूदा एनपीएस ग्राहकों को भी यूपीएस में स्विच करने का मौका मिलेगा। सुनिश्चित न्यूनतम पेंशन के एक भाग के रूप में, लाभार्थी को न्यूनतम 10 वर्ष की सेवा के बाद सेवानिवृत्ति पर 10,000 रुपये प्रति माह मिलेंगे। सुनिश्चित पारिवारिक पेंशन के तहत, लाभार्थी को कर्मचारी की मृत्यु से ठीक पहले की पेंशन का 60 प्रतिशत मिलेगा। राज्य सरकारों को भी एकीकृत पेंशन योजना चुनने का विकल्प दिया जाएगा। अगर राज्य सरकारें यूपीएस चुनती हैं, तो लाभार्थियों की संख्या करीब 90 लाख हो जाएगी।

यूपीएस की खास बातें

  • न्यूनतम 25 साल तक कार्यरत रहे कर्मचारी को अंतिम 12 महीने के औसत वेतन का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा पेंशन के रूप में
  • पेंशनभोगी की मौत पर आश्रित को मृत्यु के वक्त मिलने वाली पेंशन का 60 प्रतिशत हिस्सा
  • अगर 10 साल के बाद नौकरी छोड़ते हैं तो दस हजार रुपए पेंशन मिलेगी
  • कर्मचारियों को अलग से अंशदान नहीं करना होगा, केंद्र सरकार 18 प्रतिशत अंशदान करेगी, कर्मचारी का अंशदान एनपीएस की ही तरह दस प्रतिशत
  • महँगाई इंडेक्सेशन का लाभ
  • रिटायरमेंट पर ग्रेच्युटी के अलावा इकट्ठा राशि अलग से
  • हर छह महीने की सेवा के बदले मासिक वेतन (वेतन+डीए) का दसवाँ हिस्सा जुड़ कर रिटायरमेंट पर मिलेगा

सरकार के मुताबिक बकाया राशि (एरियर) पर 800 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। पहले साल में सालाना लागत में करीब 6,250 करोड़ रुपये की बढ़ोतरी होगी। यह योजना 1 अप्रैल, 2025 से प्रभावी होगी। केंद्र सरकार के कर्मचारियों को राष्ट्रीय पेंशन योजना (NPS) और UPS में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया जाएगा। मौजूदा केंद्र सरकार के NPS ग्राहकों को UPS में स्विच करने का विकल्प भी दिया जाएगा।

सुनिश्चित पेंशन, सुनिश्चित पारिवारिक पेंशन और सुनिश्चित न्यूनतम पेंशन को मुद्रास्फीति सूचकांक का लाभ मिलेगा। महंगाई राहत औद्योगिक श्रमिकों के लिए अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI-IW) पर आधारित होगी, जैसा कि सेवारत कर्मचारियों के मामले में है। ग्रेच्युटी के अलावा सेवानिवृत्ति पर एकमुश्त भुगतान किया जाएगा। प्रत्येक छह महीने की सेवा के लिए सेवानिवृत्ति की तिथि पर मासिक पारिश्रमिक यानी वेतन और महंगाई भत्ते का दसवाँ हिस्सा दिया जाएगा। इस भुगतान से सुनिश्चित पेंशन की मात्रा कम नहीं होगी।

केद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि देशभर में सरकारी कर्मचारियों की तरफ से हमेशा मांग आती रही कि एनपीएस स्कीम में सुधार किया जाए। इस सुधार के लिए अप्रैल 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक कमेटी बनाई थी। डॉ सोमनाथन इस कमिटी के चेयरमैन थे। इस कमिटी ने 100 से अधिक सरकारी कर्मचारी संगठनों के साथ बात की। करीब सभी राज्यों के साथ इस कमिटी ने बातचीत की। राज्य सरकारों के कर्मचारियों के संगठनों को भी तरजीह दी गई। पीएम ने इस विषय को गंभीरता से लिया था। कमिटी की सिफारिश के आधार पर सरकार ने एकीकृत पेंशन स्कीम को मंजूरी दी है।

यूपी में रेलवे ट्रक पर डाल दिया लकड़ी का मोटा टुकड़ा, चालक की सूझबूझ से पलटने से बची ट्रेन: इससे पहले MP में डाल दिया था सरिया

उत्तर प्रदेश में कासगंज-फर्रुखाबाद पैसेंजर ट्रेन (05389) के सतर्क लोको पायलटों ने ट्रेन को पटरी से उतारने के लिए ट्रैक पर रखी लकड़ी को देख लिया और ट्रेन को दुर्घटनाग्रस्त करने की साजिश को विफल कर दिया। इससे पहले, कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश में ट्रेन की पटरी पर सरिया रखकर ट्रेन को दुर्घटनाग्रस्त करने की साजिश सामने आ चुकी है।

रेलवे अधिकारियों ने बताया कि एक अज्ञात व्यक्ति ने पटरियों पर लकड़ी का लट्ठा रख दिया था, जो ट्रेन के कैटल-गार्ड में फंस गया, बावजूद इसके कि लोको पायलटों ने लकड़ी को देखते ही तुरंत आपातकालीन ब्रेक लगा दिए।

यह घटना शुक्रवार रात करीब 11.38 बजे भटासा और शमसाबाद रेलवे स्टेशनों के बीच हुई। पूर्वोत्तर रेलवे के इज्जतनगर डिवीजन के जनसंपर्क अधिकारी राजेंद्र सिंह ने बताया, “यह स्पष्ट रूप से ट्रेन को पटरी से उतारने के इरादे से की गई तोड़फोड़ का मामला था। हालाँकि, सतर्क लोको पायलटों ने संभावित दुर्घटना को सफलतापूर्वक टाल दिया। लोकोमोटिव के कैटल-गार्ड में लकड़ी का लट्ठा फंस जाने के कारण ट्रेन करीब आधे घंटे देरी से चली।”

रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रेन को अचानक झटका लगा, जिससे लोको पायलट को आपातकालीन ब्रेक लगाने पड़े और ट्रेन को रोकना पड़ा। बाद में पता चला कि लकड़ी का लट्ठा ट्रेन के इंजन से चिपक गया था। इसके बाद रेलवे कर्मचारियों ने लकड़ी के लट्ठे को हटाकर ट्रैक को साफ किया। 25 मिनट बाद ट्रेन का परिचालन फिर से शुरू हुआ। शमशाबाद रेलवे स्टेशन पर पहुँचने पर लोको पायलट ने मामले की सूचना दी।

शनिवार की सुबह रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ), कायमगंज से सिविल पुलिस और फर्रुखाबाद से सरकारी रेलवे पुलिस (जीआरपी) की एक टीम ने ट्रैक का गहन निरीक्षण किया। आरपीएफ के एसआई ओमप्रकाश मीना ने डॉग स्क्वॉड के साथ ट्रैक की जाँच की।

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, रेल ट्रैक से थोड़ी दूरी पर स्थित एक गिरे हुए आम के पेड़ को स्थानीय लोगों ने कई टुकड़ों में काट दिया था। यह संभव है कि किसी बदमाश ने इस स्थान से लकड़ी का लट्ठा उठाया और जानबूझकर उसे ट्रैक पर रख दिया। ट्रैक के आस-पास का इलाका आम और दूसरे पेड़ों से भरा हुआ है।

बच्चे माँगते रहे दया की भीख, अमृतसर में घर में घुस कर पगड़ी वालों ने NRI को मार डाला: लुधियाना में भी गोलीबारी, AAP सरकार में कानून व्यवस्था फेल

पंजाब में दो हमलावरों ने दिनदहाड़े एक NRI की उसके बच्‍चे के सामने गोली मार दी। इस दौरान माँ और बच्चे हमलावरों को रोकते रहे, गुहार लगाते रहे, बच्‍चा रोता रहा और हाथ जोडकर मिन्‍नते करता रहा, लेकिन बदमाशों का दिल नहीं पसीजा। ये पूरी घटना सीसीटीवी में कैद हो गई। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जो ये बताता है कि पंजाब के अंदर सुरक्षा व्यवस्था की क्या हालत है।

ऐसा ही घटनाक्रम बुधवार की रात लुधियाना में हुआ, जहाँ कार सवार बदमाशों ने ऑस्ट्रेलिया से लौटे NRI के घर पर आधा दर्जन गोलियाँ चलाई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये वारदात मकबूलपुरा थाना इलाके के दबुर्जी इलाके की है। जहाँ दो हमलावर बाइक से आए और फिर पीड़ित के घर के अंदर घुस गए। उन्होंने पिस्टल निकाली और एनआरआई सुखचैन सिंह पर 3 गोलियाँ चलाईं। इस दौरान माँ और बेटे हमलावरों से दया की भीख माँगते रहे, लेकिन हमलावरों का दिल नहीं पसीजा। इस दौरान बच्चा कहता रहा, “अंकलजी पापा को मत मारो।” अगर हमलावरों की पिस्टल नहीं फंसी होती, तो जाने कितनी गोलियाँ वो उतार चुके होते।

बताया जा रहा है कि एनआरआई सुखचैन सिंह अमेरिका में रहता है और कुछ दिनों के लिए अपने गाँव आया था। गोली लगने से घायल एनआरआई का अस्पताल में इलाज चल रहा है। इसे लेकर पुलिस ने कहा कि आरोपितों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

एनआरआई पर गोलीबारी की घटना को लेकर उनके ससुर सुखदेव सिंह ने कहा कि हमलावर उनके आवास में घुस गए और बंदूक की नोक पर सुखचैन सिंह को अंदर ले गए। इस मामले में एनआरआई की पूर्व पत्नी के परिवारवाले शामिल हो सकते हैं। वहीं, एनआरआई की पत्नी अमनदीप कौर ने कहा कि हमलावरों ने घर के अंदर घुसकर गोलीबारी शुरू कर दी। उन्होंने भी एनआरआई की पूर्व पत्नी के परिजनों पर संदेह जताया है। इस मामले में आरोपितों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने एक्स पर पोस्ट कर इस घटना पर दुख जताया। उन्होंने कहा कि पंजाब में कानून व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह से खराब हो चुकी है। शनिवार सुबह अमृतसर साहिब के दुबुर्जी निवासी एनआरआई सुखचैन सिंह के घर पर बदमाशों ने गोलीबारी की। माँ अपने बेटे को बचाने के लिए और मासूम बच्चा अपने पिता को बचाने के लिए हाथ जोड़ रहा है, लेकिन बेरहम बदमाश एक नहीं सुन रहे हैं। सीएम भगवंत मान के राज्य में आए दिन ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, पंजाबी अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं।

बताया जा रहा है कि बदमाशों ने एनआरआई पर तीन गोलियाँ चलाई, लेकिन उन्हें 2 ही गोली लगी है। पुलिस ने मौके से 3 खोखे बरामद किए हैं।

वहीं, लुधियाना में भी एक एनआरआई को निशाना बनाया गया है। उसके घर पर कार सवार बदमाश पहुँचे और गोलियाँ चला दी। लुधियाना का मामला बुधवार (21 अगस्त 2024) की रात का है। जहाँ ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले एनआरआई राजदीप सिंह चहल अपने गाँव आए हुए थे। वो 15-20 दिन पहले ही बीआरएस नगर स्थित अपने घर आए थे, लेकिन बदमाशों ने उन्हें निशाना बनाने के लिए करीब आधा दर्जन गोलियाँ चलाईं। हालाँकि गनीमत रही कि किसी इनसान को ये गोलियाँ नहीं लगी।

दलित बच्ची को नाखून काटने के बहाने कमरे में ले गया हेडमास्टर जमाल कामिल, सलवार उठा करने लगा अश्लील हरकतें: लोगों ने कुटाई कर पुलिस को सौंपा

उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक सरकारी स्कूल के अंदर नाबालिग बच्ची से अश्लील हरकत और छेड़खानी का मामला सामने आया है। कक्षा 4 में पढ़ने वाली छात्रा और 11 वर्षीया पीड़िता दलित (SC समुदाय) की है। आरोपित प्रिंसिपल का नाम जमाल कामिल है जिसकी उम्र 50 वर्ष के आसपास है। लोगों ने आरोपित की पिटाई कर के पुलिस को सौंप दिया है। घटना शुक्रवार (23 अगस्त, 2024) की है। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना मेरठ के थाना क्षेत्र मवाना की है। यहाँ अनुसूचित जाति की एक महिला ने शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में पीड़िता ने बताया कि उनकी बेटी थाना क्षेत्र के ही एक सरकारी स्कूल में क्लास 4 में पढ़ती है। इस स्कूल में हेडमास्टर के तौर पर जमाल कामिल तैनात है जिसकी उम्र 50 वर्ष के आसपास है। आरोप है कि शुक्रवार को प्रिंसिपल जमाल कामिल बच्चों के नाखून चेक कर रहा था। जमाल कामिल उन बच्चों के नाखून खुद काटने लगा जिनके नाखून बढ़ गए थे।

बारी-बारी से नाखून चेक करते हुए पीड़िता का नंबर आया। जमाल कामिल ने पीड़िता का नाखून देखा और उसे अपने कमरे में बुलवाया। यहाँ उसने बच्ची को कुर्सी पर बिठा दिया और अपने हाथ से उनके नाखून काटने लगा। आरोप है कि ऐसा करते हुए जमाल कामिल ने बच्ची की सलवार ऊपर उठा दी और अश्लील हरकतें करने लगा। बच्ची डर गई और हाथ छुड़ा कर रोते हुए बाहर निकल आई। कुछ ही देर में बच्ची के परिजनों को सारी बात पता चल गई और वो स्कूल पहुँच गए।

इस दौरान बच्ची के परिजनों के साथ अन्य ग्रामीण भी स्कूल में पहुँचे। कुछ महिलाओं ने प्रिंसिपल की धुनाई कर दी। इस धुनाई का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। घटना की सूचना मिलते ही पुलिस फ़ौरन ही मौके पर पहुँची। पुलिस ने आरोपित को हिरासत में ले लिया और अपने साथ थाने ले गई। स्कूल में पढ़ने वाले कुछ अन्य छात्रों के अभिभावकों का आरोप है कि उनके बच्चों से प्रिंसिपल मालिश करवाता है। आखिरकार जमाल कामिल को गिरफ्तार कर लिया गया है।

अपनी शिकायत में पीड़िता के परिजनों ने आरोपित पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है। मवाना के डिप्टी एसपी सौरभ सिंह ने इस घटना पर मीडिया से बात की। उन्होंने बताया कि पीड़िता के बयान दर्ज करवाए गए हैं। इन बयानों के आधार पर जमाल कामिल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की सुसंगत धाराओं के साथ SC/ST व पॉक्सो एक्ट में केस दर्ज कर लिया गया है। मामले की जाँच व अन्य जरूरी कानूनी कार्रवाई की जा रही है।

मध्य प्रदेश के स्कूल-कॉलेज मनाएँगे कृष्ण जन्माष्टमी, CM मोहन यादव की सरकार ने जारी किया निर्देश: कॉन्ग्रेस ने किया विरोध

मध्य प्रदेश के सभी निजी और सरकारी स्कूलों, कॉलेजों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे। मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार ने इस बारे में दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मोहन यादव सरकार ने गुरु पूर्णियों के मौके पर एक माह पहले भी दो-दिवसीय कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश दिए थे, जो काफी सफल माना गया था। इस बार 26 अगस्त 2024 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जा रही है, जिसके लिए ये निर्देश जारी किए गए। हालाँकि कॉन्ग्रेस ने इसका तीखा विरोध किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सामान्य प्रशासन विभाग ने बुधवार (21 अगस्त 2024) को सभी जिला कलेक्टरों को छह सूत्री निर्देश जारी किए, जिसके तहत सभी स्कूलों और कॉलेजों (सरकारी और निजी दोनों) को विद्वानों द्वारा व्याख्यान और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने होंगे, जिनमें भगवान कृष्ण की शिक्षाओं के साथ-साथ मित्रता, जीवन दर्शन और मूल्यों के विषयों पर प्रकाश डाला जाएगा।

निर्देश में यह भी कहा गया है कि 26 अगस्त को स्कूलों और कॉलेजों में योग जैसी भारत की प्राचीन परंपराओं पर केंद्रित व्याख्यान और कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। इसके अतिरिक्त, जिला कलेक्टरों को सभी भगवान कृष्ण मंदिरों की सफाई सुनिश्चित करने और जन्माष्टमी के दौरान इन मंदिरों में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करने के निर्देश दिए गए।

आदेश में विशेष रूप से भगवान कृष्ण के जीवन से जुड़े माने जाने वाले धार्मिक स्थलों पर विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है, जिनमें जानापावा (देवास), अमझेरा (धार), नारायण और संदीपनी आश्रम (उज्जैन) शामिल हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस निर्देश का विरोध करते हुए तर्क दिया कि शिक्षण संस्थान सीखने के लिए होते हैं। भोपाल-मध्य से कॉन्ग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने कहा, “यह सरकार शिक्षण संस्थानों को बर्बाद करने की कोशिश क्यों कर रही है? धार्मिक अवसरों पर अवकाश घोषित करने का प्रावधान है।”

भोपाल के हुजूर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने सरकार का समर्थन किया है। इस फैसले का समर्थन करते हुए रामेश्वर शर्मा ने कहा, “हमारी सरकार ने पूरे राज्य में जन्माष्टमी मनाने का फैसला किया है। यह सरकार का सकारात्मक कदम है।”