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कॉन्ग्रेस की जीत के बाद कर्नाटक विधानसभा में लगे थे ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे, फॉरेंसिक जाँच से खुलासा: मीडिया में सूत्रों के हवाले से दावा

कर्नाटक विधानसभा में कॉन्ग्रेस नेता की जीत पर लगे नारों के बाद जो विवाद उपजा उस पर एक नई जानकारी सामने आई है। इंडिया टुडे ने अपने सूत्रों के हवालों से छापी रिपोर्ट में बताया है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट में ये बात सामने आई है कि वीडियो में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद-जिंदाबाद’ ही कहा जा रहा था।

इंडिया टुडे की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में कहा गया है कि जो फॉरेंसिक रिपोर्ट राज्य सरकार को दी गई है उसमें कन्फर्म है कि पाकिस्तान के समर्थन में नारेबाजी वीडियो और ऑडियो दोनों में हुई है। यानी कि जो फुटेज भाजपा नेताओं ने शेयर की थी वो बिलकुल भ्रामक नहीं है।

गौरतलब हो कि अगर इंडिया टुडे की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में दी जानकारी सही निकलकर आती है तो ये सवाल जरूर उठेगा कि आखिर ऑल्ट न्यूज वाले मोहम्मद जुबैर ने और कॉन्ग्रेस मंत्री प्रियांक खड़गे ने कौन सी रिपोर्ट के आधार पर कहा था कि सदन में कहीं पाकिस्तान समर्थन में नारे नहीं लगे और सारे आरोप भाजपा की साजिश हैं।

बता दें कि मोहम्मद जुबैर ने और प्रियांक खड़गे ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने के मामले में नासिर हुसैन के समर्थकों को क्लीन चिट उसी दिन दे दी थी जब ये मामला मीडिया में सामने आया था। कॉन्ग्रेस मंत्री प्रियांक खड़गे ने तो कहा था कि उन्होंने फॉरेंसिक जाँच भी करवा ली है और रिपोर्ट में ऐसा कुछ नहीं मिला।

हालाँकि उसके अगले ही दिन खबर आई कि पुलिस तो अभी इस मामले में जाँच कर ही रही है। उन्होंने बताया था कि उन्होंने ब्यादगी शहर से शफी नशीपुड़ी नाम के शख्स को हिरासत में लिया है और उसकी आवाज का सैंपल मिलाने के लिए जाँच के लिए भेजा है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार हावेरी के एसपी अंशु कुमार ने बताया था कि 27 फरवरी को विधानसभा में नारेबाजी को लेकर एक केस दर्ज हुआ था। बाद में इस मामले में मोहम्मद शफी को उठाया गया था। उससे पूछताछ हुई। वहीं शफी ने मीडिया में आकर सबको बताया कि उसने नासिर खान जिंदाबाद, नासिर साहब जिंदाबाद कहा है, जो आरोप लग रहे हैं वो सारे झूठे हैं।

अब देखना है कि सूत्रों के हवाले से जो एक्सक्लूसिव खबर इंडिया टुडे ने चलाई है उसकी सच्चाई क्या है। मामले में आधिकारिक बयान आने के बाद ही स्पष्ट होगा भाजपा नेताओं के दावे सच थे या फिर कॉन्ग्रेस मंत्री की बात।

सिद्धार्थ के पेट में अन्न का नहीं था दाना, शरीर पर थे घाव ही घाव: केरल में छात्र की मौत के बाद SFI के 9 गुंडों की तलाश, पीड़ित पिता बोले- डीन को सब पता था

केरल के वायनाड जिले में स्थित पुक्कोडे पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय में सेकंड ईयर के स्टूडेंट सिद्धार्थ जेएस की मौत को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। यहाँ एसएफआई के कार्यकर्ताओं पर उसकी हत्या के आरोप लगे हैं, जिसमें 8 को गिरफ्तार कर लिया गया है, तो अब सिद्धार्थ के पिता ने डीन डॉ एमके नारायणन पर मामले की लीपापोती के आरोप लगाए हैं। सिद्धार्थ के पिता जयप्रकाश टी ने कहा है कि डीन डॉ एमके नारायणन को घटना के बारे में पूरी जानकारी थी, इसके बावजूद वो छात्रों पर मुँह बंद करने का दबाव डालते रहे।

एसएफआई से जुड़े कई नेता गिरफ्तार

सिद्धार्थ आत्महत्या केस में 6 आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद कॉलेज यूनियन अध्यक्ष के. अरुण और एसएफआई के कॉलेज ईकाई सचिव अमल इहसन ने गुरुवार (29 फरवरी 2024) को आत्मसमर्पण कर दिया, जबकि एसएफआई से जुड़े आसिफ खान समेत 9 अन्य आरोपितों की तलाश पुलिस कर रही है। डीएसपी टीएन सजीव ने मीडिया से बातचीत में इस बात की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि आसिफ खान समेत 9 आरोपितों की तलाश जारी है, जल्द ही उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा। डीएसपी सजीव ने कहा कि शेष आरोपियों के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी करने की तैयारी चल रही है।

इस बीच, मृतक छात्र सिद्धार्थ के पिता जयप्रकाश ने कहा कि कैंपस के डीन डॉ नारायणन ने इस मामले में लीपापोती की है और उन्हें पूरे मामले की जानकारी थी। ऐसे में उन्हें भी आरोपित बनाया जाए। सिद्धार्थ के पिता ने कहा, “मुझे यही लग रहा था कि सिद्धार्थ की मौत आत्महत्या का मामला है और मैं इसके पीछे के कारण के बारे में सोच रहा था।” उन्होंने कहा, “एक छात्र ने मुझे बताया कि एसएफआई नेता ने उन्हें सिद्धार्थ की मौत की असलियत बताने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी है। यहाँ तक कि परिसर में शिक्षक और प्रशासनिक प्रमुख भी इन एसएफआई गुंडों की धुन पर नाचने वाली कठपुतली मात्र हैं। ऐसे कई अन्य छात्र हैं जिन्हें इसी तरह से प्रताड़ित किया गया।”

इस मामले में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार ने नारायणन से जवाब माँगा था कि सिद्धार्थ पर हमले को लेकर इतने दिनों तक कोई रिपोर्ट क्यों नहीं दी गई। इसका जवाब देते हुए नारायणन ने बताया कि वो व्यस्त थे। उन्होंने परिसर में सिक्योरिटी को बढ़ाने की घोषणा की और कहा कि सीसीटीवी कैमरों की संख्या के साथ ही सुरक्षाकर्मियों की संख्या भी बढ़ाई जाएगी। नारायणन ने कहा है कि इस मामले की जाँच की जा रही है, दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। बता दें कि पुलिस ने 6 आरोपितों को गिरफ्तार किया था। अब ये संख्या बढ़कर 8 हो चुकी है। 9 अब भी फरार हैं।

एसएफआई का गढ़ है पुक्कोड़ कैंपस

बता दें कि वायनाड के पुक्कोडे में केरल पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय (केवीएएसयू) परिसर एसएफआई का गढ़ रहा है, जहाँ अन्य राजनीतिक विचारधाराओं की कोई जगह नहीं है। यहाँ विरोधी विचारधारा को कुचल दिया जाता है। ऐसे में छात्रों के सामने सिर्फ एसएफआई से ही जुड़ने का रास्ता रहता है।

अपना नाम न छापने की शर्त पर एक शिक्षक ने ओनमनोरमा से कहा, ‘चाहे वो छात्रों का आपसी विवाद हो, या छात्रों की शिक्षकों के खिलाफ शिकायतें, या कैंपस में किसी तरह की प्रशासनिक दिक्कत, सबकुछ एसएफआई से जुड़े छात्र नेताओं के हाथ में रहता है। यहाँ कंगारू कोर्ट लगाकर छात्रों, शिक्षकों को सजा दी जाती है और लोगों को डराया धमकाया जाता है।’ शिक्षक का कहना है कि अगर खुद शिक्षक या कोई कर्मचारी विरोध करता है या शिकायत करता है, तो उसे एसएफआई के लोगों का गुस्सा झेलना पड़ता है। वो व्यक्ति खुद मुसीबत में फंस जाता है।

एसआईटी करेगी मामले की जाँच

इस बीच, केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने मामले की जाँच के लिए एसआईटी के गठन का आदेश दिया है। सीएम कार्यालय की तरफ से इस बारे में नोट जारी कर बताया गया है कि “सभी आरोपितों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए एसआईटी का गठन किया गया है, जो पूरे मामले की जाँच करेगी।” वहीं, विपक्षी नेता वीडी सतीसन ने इस मामले में डीन को आरोपित बनाने की माँग की है। उन्होंने कहा कि अगर एसएफआई को कंट्रोल नहीं किया गया, तो यूडीएफ बड़ा विरोध-प्रदर्शन करेगी।

सिद्धार्थ नाम के छात्र ने कर ली थी आत्महत्या

गौरतलब है कि 18 जनवरी, 2024 को वायनाड के एक कॉलेज में पशु विज्ञान की पढ़ाई करने वाले छात्र जे एस सिद्धार्थ ने आत्महत्या कर ली थी। सिद्धार्थ को कॉलेज हॉस्टल के एक टॉयलेट में लटकता पाया गया था। इसके बाद सिद्धार्थ की पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट में कई खुलासे हुए। रिपोर्ट में बताया गया कि मौत से पहले सिद्धार्थ को बुरी तरीके से मारा पीटा गया था। उसका पेट खाली था और शरीर पर घाव थे।

इसके बाद पुलिस ने इस मामले में अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज किया। इस मामले में 12 छात्रों को कॉलेज से निलंबित भी कर दिया गया। निलंबित किए जाने वालों में एसएफआई के वामपंथी छात्र नेता भी हैं। सिद्धार्थ के पिता जयप्रकाश ने बताया है कि उनके बेटे को वामपंथी छात्रों ने काफी प्रताड़ित किया।

उन्होंने बताया कि सिद्धार्थ ने 14 फरवरी (वैलेंटाइन डे) के दिन एक छात्रा के साथ डांस किया था। वामपंथी छात्र इससे खीझ गए थे। वह अगले दिन घर लौटने वाला था। लेकिन इन SFI नेताओं ने बेटे को हॉस्टल में बुलाकर प्रताड़ित करना चालू किया। तीन दिनों तक लगातार उसे प्रताड़ित किया गया। उसे खाना पीना नहीं दिया गया। उसे रॉड से पीटा गया। उसको नंगा करके हॉस्टल में घुमाया गया और बेइज्जत किया गया। इसके बाद सिद्धार्थ के आत्महत्या की खबर आई।

महाराष्ट्र के मीरा भयंदर में 8 रोहिंग्या मुस्लिम गिरफ्तार, बिना वैध कागजात के मछली पकड़ने का करते थे काम: बोले- जम्मू-कश्मीर में रहता है उनका परिवार

महाराष्ट्र पुलिस ने गुरुवार (29 फरवरी 2024) को भारत में अवैध रूप से रह रहे म्यांमार के 8 रोहिंग्या मुस्लिमों को गिरफ्तार किया है। एक अधिकारी ने कहा कि इन अवैध घुसपैठियों को 26 फरवरी 2024 को उत्तान सागरी पुलिस ने गिरफ्तार किया है। उन पर विदेशी अधिनियम के साथ-साथ भारती पासपोर्ट अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए है।

जिन आठ लोगों को पुलिस ने पकड़ा है, उनकी पहचान हामिद हुसैन अली अकबर (55), नूरुल अमीन यूसुफ अली (52), अली हुसैन अब्दुल सोबी (49), अमीर हुसैन असद अली (42), मोहम्मद जौहर नूर मोहम्मद (39), कमाल हुसैन नूर कमाल (35), मोहम्मद जाकिर हुसैन अबू आलम (30) और इमाम हुसैन अब्दुल कासिम (25) के रूप में हुई है।

उत्तान सागरी पुलिस स्टेशन के अधिकारी ने कहा, “एक गुप्त सूचना पर उन्हें चौकगाँव मछली पकड़ने के घाट से गिरफ्तार किया गया है। वे वैध दस्तावेजों के बिना एमबीवीवी पुलिस सीमा में रह रहे थे। आगे की जाँच चल रही है।” इससे पहले पुलिस ने इन्हें पकड़ने की कोशिश की थी, लेकिन वे चकमा देकर फरार होने में कामयाब रहे थे। ये सभी हिंदी बोलने में निपुण हैं।

अवैध रूप से भारत में रह रहे इन रोहिंग्याओं ने दावा किया कि वे शरणार्थी हैं, जो मछली पकड़ने वाली नौकाओं में सहायक के रूप में नौकरियों की तलाश में तटीय क्षेत्र में आए थे। इसके बाद पुलिस ने नई दिल्ली में म्यांमार के दूतावास से संपर्क स्थापित किया और उनके बारे में अप्रवासी विवरण माँगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके परिवार जम्मू-कश्मीर में रहते हैं।

दरअसल, केंद्र सरकार ने हाल ही में भारतीय क्षेत्र में म्यांमार के नागरिकों के वीजा-मुक्त प्रवेश पर पूर्ण रोक लगाने के लिए फ्री मूवमेंट रिजिम (एफएमआर) को तत्काल निलंबित करने की सिफारिश की है। इस बीच, अवैध अप्रवासियों को ठाणे की जिला सत्र अदालत में पेश करने के बाद पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। आगे की जाँच चल रही थी।

बता दें कि बांग्लादेश और म्यांमार से अवैध रूप से भारत में घुसे रोहिंग्या एवं बांग्लादेशी मुस्लिम अब देश के लिए नासूर बनते जा रहे हैं। वे ना सिर्फ अवैध रूप से देश में घुसकर काम-काज कर रहे हैं, बल्कि खुद को यहाँ का निवासी साबित करने के लिए आधार और वोटर कार्ड जैसे फर्जी दस्तावेज भी बना रहे हैं। अब वे मृत लेगों के आधार और वोटर कार्ड आदि दस्तावेज अपने नामों पर हस्तांतरण करा रहे हैं।

ये घुसपैठिए भारत के अलग-अलग राज्यों में छिप कर रह रहे हैं और अपनी पहचान छिपाने के लिए ऐसे लोगों के पहचान पत्र का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनकी मौत हो चुकी है। इन नामों से ये घुसपैठिए ना सिर्फ अपना कारोबार चला रहे हैं कि बैंकों में खाते भी खुलवा लिए हैं। इस तरह के मामले सामने आने के बाद खुफिया एजेंसियाँ भी सतर्क हो गई हैं।

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) सहित भारत की अन्य एजेंसियों को हाल ही में इस तरह के कई सबूत मिले हैं, जिनमें इन्हें अवैध रूप से भारत में लाकर अलग-अलग राज्यों में बसाने वाले गिरोह का पता चला है।ऐसे लोगों की पहचान की जा रही है। कुछ बांग्लादेशी एवं रोहिंग्या मुस्लिमों को राज्य के विभिन्न जगहों से पकड़ा भी गया है।

हाल ही में यूपी एटीएस ने विदेशी फंडिंग लेकर अवैध घुसपैठियों की मदद करने वाले एक सिंडीकेट से जुड़े कुछ लोगों को पकड़ा था। कानपुर से पकड़े गए गिरोह के सक्रिय सदस्य और बांग्लादेश निवासी  मोहम्मद राशिद अहमद ने पूछताछ में बताया कि उसने पाँच अन्य बांग्लादेशियों को फर्जी दस्तावेजों की मदद से पहचान बदलकर देवबंद में ठिकाना दिलाया था।

इससे पहले पकड़े जा चुके बांग्लादेशी आदिलुर्रहमान को भी फर्जी दस्तावेज राशिद ने ही उपलब्ध कराए थे। एटीएस ने विदेशी फंडिंग के मास्टरमाइंड और एनजीओ चलाने वाले अबू सालेह मंडल को बीते दिनों लखनऊ से पकड़ा था। वह अपने एनजीओ में विदेशी फंडिंग लेता था और अवैध घुसपैठियों को भारत में बसाने में उनकी मदद करता था।

अबू सालेह ने ATS को बताया कि वह हरोआ-अल जमियातुल इस्लामिया दारूल उलूम मदरसा और कबीरबाग मिल्लत एकेडमी नाम से दो ट्रस्ट चलाता है। इन ट्रस्टों के FCRA खातों में ब्रिटेन के उम्मा वेलफेयर ट्रस्ट से साल 2018-22 तक लगभग 58 करोड़ रुपए आए। उम्मा ट्रस्ट को आतंकी गतिविधियों में शामिल होने और उनकी मदद करने के कारण अमेरिका प्रतिबंधित कर चुका है।

उधर, दैनिक भास्कर ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि NIA ने कार्रवाई करते हुए तमिलनाडु में मोहम्मद सोरीफुल बाबू मियां, शहाबुद्दीन हुसैन और मुन्ना उर्फ नूर करीम को गिरफ्तार किया था। ये तीनों लंबे समय से बांग्लादेश से भारत में लाए गए रोहिंग्या मुस्लिमों के लिए फर्जी आधार कार्ड, राशन कार्ड, पैन कार्ड, मार्कशीट आदि बनाकर देते थे।

इन तीनों ने पूछताछ में बताया कि रोहिंग्या मुस्लिमों को भारतीय पहचान देने के लिए वे मृतकों के दस्तावेज इस्तेमाल करते हैं। NIA को ऐसे लोगों की सूची आरोपितों से मिले हैं। इसकी पड़ताल और फर्जी दस्तावेज पर रह रहे घुसपैठियों की पहचान की जा रही है। NIA की जाँच में तमिलनाडु, हरियाणा, असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, जम्मू सहित कई राज्यों में रोहिंग्या घुसपैठियों के रहने की जानकारी मिली है।

बंगाल-बिहार-तमिल-मराठी… सबकी आग में पूरे भारत को झोंकना चाहते हैं राहुल गाँधी, कहाँ से आई इतनी नफरत?

बिहार में एक नेता हुआ करते थे। लोग उसे लालू यादव के नाम से जानते हैं। अब वो अपराधी है। सजायाफ्ता कैदी भी। अपनी नेतागिरी के दिनों में वो जात-पात की बात करते थे। भाषणों में अगड़े-पिछड़े की बात से तालियाँ बटोरते थे। रैलियों में लाठी से दम ठोकते थे। ‘भूरा बाल साफ करो’ की न सिर्फ बात करते थे बल्कि सरकारी नौकरियों-नियुक्तियों में भूमिहार-राजपूत-ब्राह्मण-लाला (कायस्थ) लोगों से भेदभाव की लकीर भी खींच दी गई थी।

नतीजा क्या हुआ? बिहार दशकों पीछे चला गया। कभी दलहन-तिलहन का कटोरा कहा जाने वाला राज्य पलायन की मार झेलने लगा। अभी तक झेल रहा। कभी चीनी और राइस मिल जिसकी पहचान थे, वहीं के लोग अब दूसरे राज्यों में मजदूरी करने को विवश हैं। ग्लोबल ब्रांड वाली मॉर्टन टॉफी और कुकीज़ कभी बिहार में ही बनकर विदेशियों तक के दिलों पर राज करती थी। अब क्या हुआ उस बिहार को? जो कभी अस्मिता हुआ करती थी, अब वही गाली बन चुकी है।

उस नेता लालू का इन सबसे और इस पूरे प्रकरण में क्या बिगड़ा? क्या उसका परिवार पलायन करके किसी और राज्य में गया रोजी-रोटी के लिए? क्या उसके बेटे को ‘बिहारी’ कह कर गाली देने की किसी में हिम्मत है? क्या जब लालू यादव अपराधी साबित हुआ तो जिस परिवेश से उठ कर वो सीएम की कुर्सी तक आया था, उसी चपरासी क्वॉर्टर में लौट गए उसके बीवी-बच्चे? नहीं।

जिस राजनीति की सीढ़ी चढ़ लालू यादव ने सत्ता की कुर्सी पर कब्जा जमाया, उससे वो खुद और साथ में उसका परिवार अभी तक मलाई चाट रहा। कोई भुगत रहा तो वो है पूरा बिहारी समाज।

राहुल मतलब आग-लगावन राजनीति

बिहार में लालू ने जो किया, देश भर में वही जहर राहुल गाँधी घोल रहे। जात-पात, अगड़े-पिछड़े की बात कर रहे। वो ऐसा कर रहे, क्योंकि उनको देश के सबसे मलाईदार सत्ता सर्कल मतलब लुटियंस दिल्ली में एक सरकारी बंगले की जरूरत है। वो बखूबी जानते हैं कि केंद्रीय सत्ता तो मिलने से रही, ऐसे में कॉन्ग्रेस का प्रिंस बने रहने के लिए किसी भी तरीके से सांसदी बची रहे और एक बंगला मिल जाए। इसमें उनका फायदा स्पष्ट है। स्पष्ट यह भी है कि बिहार की तरह नुकसान उठाएगा वोटर, वो भी दशकों तक।

राहुल गाँधी की संक्रमणकारी और जहरीली राजनीति को समझना है तो एक शब्द को समझना होगा – नक्सलबाड़ी। बिहार से ज्यादा दूर नहीं है। अभी जिस राज्य पर ममता बनर्जी का कब्जा है, वहीं है यह गाँव। इस गाँव से फैला संक्रमण इतना खतरनाक है कि क्या हिंदी क्या अंग्रेजी… वामपंथ की हत्यारी विचारधारा का नाम ही इसके नाम पर पड़ गया।

नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ खूनी खेल अब तक देश के छिटपुट हिस्सों में खेला जा रहा। तमाम खर्चे और सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिल कर काम करने की रणनीति के बावजूद नक्सल नाम के इस नासूर को अब तक जड़ से उखाड़ा नहीं जा सका। ‘मैं तुम्हें बंदूक दूँगा, उसको मार दो’ के बजाय इसकी शुरुआत हुई थी ‘अत्याचारी-पीड़ित’ का बीज बोकर। नतीजा इतना भयावह है कि आज वही तथाकथित पीड़ित अपने ही बच्चों के स्कूल तक को बम से उड़ा देता है। अपने ही समाज के भाई-दोस्त को ‘मुखबिर’ कह कर गला काट देता है।

जो काम कल ‘दिमागी वामपंथियों’ ने किया था, वही आज राहुल गाँधी कर रहे। किसानों को पीड़ित बता रहे, उद्योगपतियों को अत्याचारी, छोटे व्यापारी बनाम सरकारी जीएसटी, कंपनियों को कामगारों का शोषक आदि-इत्यादि वाक्यांश गढ़ कर वो बीज बो रहे हैं खूनी खेल का। इतना तय है कि दिमागी वामपंथियों की तरह वो भी सिर्फ इसकी मलाई चाभेंगे, खुद इस खूनी खेल का हिस्सा नहीं बनेंगे। जो उनके षड्यंत्र में फँसेंगे, वो मरेंगे, उनका परिवार दुख-दर्द भोगेगा।

दादी इंदिरा गाँधी का जिक्र हमेशा करते हैं कॉन्ग्रेस के प्रिंस। अफसोस कि उनसे सीख नहीं ले पाए कुछ भी। यह इंदिरा ही थीं जिनके समय में तमिलनाडु में हिंदी-विरोधी स्वर बुलंद हुआ था। नतीजा देश को भी पता है और कॉन्ग्रेस को भी। भारत के दक्षिणी हिस्से में कॉन्ग्रेस न सिर्फ कमजोर हुई बल्कि क्षेत्रिय पार्टियाँ भी अपने-अपने इलाकों में पनपी। अगर इतना सब कुछ जानते राहुल गाँधी तो अमूल-नंदिनी विवाद पैदा नहीं करते।

एक राज्य को दूसरे राज्य से लड़ा दो, एक कंपनी को दूसरी कंपनी के खिलाफ भड़का दो… राहुल गाँधी को लगता है कि इससे उनके 2-4 वोट बढ़ जाएँगे। अपने सहयोगी ठाकरे का राजनीतिक पतन देख कर भी उन्हें समझ नहीं आया। वैसे समझ जाते तो राहुल गाँधी के लिए एक विशेष नाम का प्रयोग सोशल मीडिया पर देश की जनता क्यों करती भला! जिस मराठा राजनीति के दम पर ठाकरे परिवार पैदा हुआ, उसी महाराष्ट्र में आज उसका नाम-निशान दोनों खत्म हो चुका है।

बंगला और कुर्सी: राहुल गाँधी का एक्के मकसद

देश में कितनी जाति के लोग रहते हैं? इन जातियों का जनसंख्या में प्रतिशत कितना है? पिछड़े लोगों की कितनी आबादी है? किस जाति के कितने लोग IAS/IPS/डॉक्टर/इंजीनियर हैं? मीडिया में कौन जाति वाला मालिक है, कौन नौकरी कर रहा? मराठी लोगों की नौकरियाँ गुजरातियों को क्यों? गुजराती दूध-दही कर्नाटक में क्यों? गरीब लोगों के साथ 24 घंटे अन्याय क्यों होता है? किसान के खिलाफ अन्याय कौन रहा है? भारत की जल-जंगल-जमीन पर जिन आदिवासियों का सबसे पहला हक है, उन पर अत्याचार करने वाले कौन हैं?

हाल-फिलहाल ऊपर की लिखी एक भी लाइन अगर आपने कहीं पढ़ी-सुनी-देखी है तो उसे आँख मूँद कर राहुल गाँधी से जोड़ लीजिए। कब कहा, कहाँ कहा, किसको टारगेट करके कहा… इन सब तथ्यों को खोजने की जरूरत नहीं। जरूरत इसलिए नहीं क्योंकि राहुल गाँधी के अलावा ऐसी घिसी-पिटी, समाज को तोड़ने वाली बात इस देश में और कोई नेता कर नहीं रहा।

आज की पीढ़ी वाले जिन नेताओं के बाप-दादा ने समाज में जहर घोला था, अपने-अपने हिस्से में आग लगाई/लगवाई थी, उसी के दम पर क्षेत्रिय राजनीति पर कब्जा किया था… वो भी आज नौकरी/रोजगार/कमाई/विकास आदि की बात कर रहे। इनसे उलट राहुल गाँधी समाज के हर एक तबके को भड़काने का काम कर रहे हैं क्योंकि उनको लगने लगा है कि वो देश के ‘प्रिंस’ हैं। उनके परदादा-दादी-पिता ने देश के लिए ‘बलिदान’ दिया, इसलिए देश पर पहला हक उनका है।

राहुल गाँधी बस यह भूल जाते हैं कि भले उनके पूर्वजों ने पीएम की कुर्सी संभाली है, लेकिन इसके बदले उन्हें सैलरी/सुविधाएँ मिलती थीं। पीएम की कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति देश पर अहसान करता है, अभी तक वो इसी भुलावे में जी रहे हैं। और अगर मौत/हत्या वाले तर्क पर पीएम की कुर्सी मिलने का अधिकार जताने का राग अलापा जाए तो न जाने कितने डॉक्टर-इंजीनियर-IAS-IPS आदि भी नौकरी करते हुए मरे/मारे गए। तो क्या उनके बच्चे भी इन सरकारी पदों को अपनी बपौती समझने लगें?

राहुल गाँधी अब तक सिर्फ गलत ही किए, कर रहे हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। जिन मुद्दों पर उन्होंने समाज में अभी तक जहर नहीं घोला है, उसके लिए उनकी जय-जयकार। ओवैसी और बाकी कट्टरपंथी मुस्लिम नेता देश की सेना और पुलिस में किस मजहब/धर्म/पंथ के कितने लोग हैं, ऐसा सवाल पूछते रहते हैं। राहुल गाँधी ने अभी तक यह नहीं किया है। इस पर उनके लिए ताली तो बनती है। 

‘नहीं किया है’ और ‘नहीं करेंगे’ में हालाँकि धागे भर का फर्क है। अभी उनकी माँ सोनिया गाँधी स्वास्थ्य कारणों से राज्यसभा के रास्ते सांसदी बचाने निकल पड़ी हैं। वजह वही है – सरकारी बंगला। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद जिस दिन राहुल गाँधी को यह लगा कि वो अब कॉन्ग्रेस में भी प्रिंस के लायक नहीं… उसी दिन वो जात-पात-अगड़ा-पिछड़ा वाले पतन के रास्ते पर और नीचे गिरेंगे। मुस्लिम-सिख-ईसाई सबको अपने जहर से लुभाएँगे। स्पष्ट है कि तब भी फायदा उनको ही होगा, दशकों तक कोई झेलेगा तो वो होगा सिर्फ और सिर्फ वोटर। 

राहुल गाँधी न तो पहले हैं, ना ही आखिरी होंगे। तमाम ऐसे नेताओं के नाम आपको याद होंगे, जो कहलाते तो ‘जनता के सेवक’ हैं, लेकिन एक उम्र के बाद लोकतंत्र में उनकी सेवा सासंद वाली एक कुर्सी और दिल्ली में एक बंगला कब्जाने के अलावा कुछ और नहीं रही। ‘प्रिंस’ राहुल गाँधी की राजनीति भी आज महज एक कुर्सी और बंगले को बचाकर रखने तक सिमट गई है।

कंगना, अक्षय, युवराज, पवन सिंह… BJP की लिस्ट से पहले सूत्रों ने लोकसभा चुनाव में उतारी सितारों की फौज, देर रात CEC की बैठक के बाद लिस्ट का इंतजार

भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2024 के लगभग 100 उम्मीदवारों के नाम तय कर लिए हैं। इसकी पहली सूची कभी भी जारी की जा सकती है। इस सूची को अंतिम रूप देने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक गुरुवार की रात लगभग 11 बजे से शुरू होकर शुक्रवार तड़के लगभग 3.30 बजे समाप्त हुई। इस बैठक को लेकर पीएम मोदी, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित तमाम बड़े नेता शामिल हुए।

इस बैठक में नामों को लेकर तमाम मीडिया संस्थान सूत्रों के हवाले से नाम अपनी-अपनी राय रख रहे हैं। इन रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि बैठक में तय किया गया है कि वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गाँधी नगर से गृहमंत्री अमित शाह, लखनऊ से रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, नागपुर से नितिन गडकरी, अमेठी से स्मृति ईरानी चुनाव लड़ेंगे। इनका नाम बैठक में फाइनल हो गया है।

सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि बंगाल के आसनसोल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को टक्कर देने के लिए भाजपा भोजपुरी के सुपर स्टार पवन सिंह को उतार सकती है। कंगना रनौत हिमाचल प्रदेश के मंडी से लोकसभा चुनाव लड़ सकती हैं। वहीं, बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार को दिल्ली के चाँदनी चौक और क्रिकेटर युवराज सिंह को पंजाब के गुरदासपुर से मैदान में उतारा जा सकता है।

वहीं, यह भी कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश के भोपाल से वर्तमान भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का टिकट काटा जा सकता है। उनकी जगह प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मैदान में उतार सकती है। वहीं, दिल्ली से भाजपा कई चेहरों को बदलने की तैयारी कर रही है। इसमें उत्तर-पूर्वी दिल्ली से मनोज तिवारी का नाम भी शामिल है। तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के अन्नामलाई को भी मैदान में उतारे जाने की संभावना है।

वहीं, अगर हिंदुस्तान के सूत्रों की मानें तो मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को विदिशा लोकसभा सीट से मैदान में उतारा जा सकता है। सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि भूपेन्द्र यादव, धर्मेंद्र प्रधान और मनसुख मांडविया सहित कई केंद्रीय मंत्रियों को इस बार मैदान में उतारा जा सकता है। इन नेताओं को राज्यसभा के लिए हाल में हुए चुनावों में उम्मीदवार नहीं बनाया गया था।

एनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि उत्तर प्रदेश में आरएलडी, अपना दल, सुभासपा और निषाद पार्टी के लिए भाजपा लोकसभा की 6 सीटें छोड़ेगी। आरएलडी के लिए 2 लोकसभा सीटें, अपना दल के लिए 2 लोकसभा सीटें, सुभासपा और निषाद पार्टी के लिए 1-1 लोकसभा सीटें देने पर सहमति बनी है। वहीं, लगभग 56 लोकसभा सीटों पर भाजपा अपने उम्मीदवार उतारेगी।

शंभू बॉर्डर पर ‘किसान’ कर रहे इंतजार, गुजरात में घूम रहीं ‘हमदर्द’ रिहाना: अंबानी के आँगन में नाचने की लेंगी ₹74 करोड़, नेटिजन्स ने घेरा

गुजरात के जामनगर में अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की शादी से पूर्व अंबानी परिवार द्वारा आयोजित कार्यक्रम में देश-विदेश से कई हस्तियाँ शामिल होने आई हैं। इन्हीं जानी-मानी हस्तियों में एक नाम विदेशी सिंगर रिहाना का भी है। उन्होंने कार्यक्रम में स्टेज परफॉर्मेंस देने के लिए 66 करोड़ से लेकर 74 करोड़ रुपए के बीच की रकम ली है।

यही मशहूर सिंगर रिहाना भारत में पिछली दफा तब चर्चा में आई थीं, जब उन्होंने किसान आंदोलन के नाम पर विदेश में बैठकर भारत को बदनाम करने का प्रयास किया था। संयोग से इस बार वह जब भारत में आई हैं तो भी कथित किसानों का आंदोलन चल रहा है। ऐसे में सवाल उठना तो लाजिमी है कि क्या किसानों से तब विदेश में बैठकर हमदर्दी दिखाने वाली रिहाना इस बार किसानों से मिलने शंभू बॉर्डर जाएँगी या फिर उनकी वो हमदर्दी नकली थी।

पत्रकार राजीव सचान ने रिहाना के पाखंड पर गौर कराते हुए लिखा, “चार साल पहले तीन कृषि कानूनों को जब अंबानी -अडानी कानून करार देकर किसान रास्तों पर बैठ गए थे, तब जिस रिहाना ने उनसे नकली हमदर्दी जताई थी, वही अब अंबानी के यहाँ शादी में नाचने- गाने आई है, जिसमें अडानी भी मेहमान हैं।”

बाला नाम के एक्टिव एक्स यूजर ने रिहाना के प्रोग्राम में जाने की वीडियो को शेयर करते हुए तंज भरे अंदाज में लिखा- “रिहाना जामनगर में अनंत-राधिका की प्री वेडिंग के लिए पहुँच गई है। हमें लगा था कि वो पहले किसानों के प्रदर्शन में जाएगी।”

मेघ अपडेट्स ने इस पर लिखा, “दो साल पहले रिहाना कथित किसान आंदोलन की ब्रांड अंबेसडर बन गई थीं लेकिन अब इस बार वो अंबानी के बेटे की शादी में नाचने आई हैं जब दूसरी बार वही ड्रामा चालू है।”

मालूम हो कि रिहाना के भारत आने पर जो लोग उनपर सवाल उठा रहे हैं वो बिलकुल निराधार नहीं हैं। साल 2021 में कथित किसानों के आंदोलन पर उन्होंने ट्वीट शेयर करके कहा था- ‘आखिर लोग इस बारे में क्यों नहीं बात कर रहे हैं।’

उनके इसी ट्वीट पर कुछ भारत विरोधी लोगों ने उनकी खूब वाह-वाही की थी लेकिन कुछ दिन बाद ही ये रिपोर्ट्स आ गई थी कि रिहाना के खालिस्तानी लिंक हैं जिन्होंने इस प्रदर्शन पर ट्वीट करने के लिए 18 करोड़ रुपए तक दिए।

अगर उनसे जुड़ी ये रिपोर्ट झूठी थी और रिहाना की किसानों के प्रति संवेदना सच्ची थी तो उन्हें कथित किसानों की भावनाओं से अब भी मतलब होना चाहिए था। उन्हें अब भी भारत आकर एक बार शंभू बॉर्डर पर डटे किसानों से मुलाकात कर ही लेनी चाहिए थी। लेकिन नहीं, वो भारत आईं और उसी कार्यक्रम में गईं जहाँ जाने के लिए उन्हें मोटी रकम मिली है। इससे ये तो साफ होता ही है कि 2021 में किया गया ट्वीट सिर्फ प्रोपेगेंडा का हिस्सा था।

संदेशखाली में खेत बनते गए पोखर, सैटेलाइट को दिखा पर ममता सरकार बनी रही बेखबर: ग्रामीण बोले- यह शेख शाहजहाँ और उसके गुर्गों की करनी

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में टीएमसी नेता शेख शाहजहाँ ने ऐसा साम्राज्य बनाया था, जो राजनीति के अपराधीकरण की जीवंत मिशाल है। एक व्यक्ति, जो कभी मजदूरी करता था, उसने खुद को कैसे राजनीति की आड़ में मजबूत किया और फिर सत्ताधारी पार्टियों के सहयोग की बदौलत खुद को उसने ऐसे ‘बेताज बादशाह’ के रूप में बदल दिया, जिसका कोई विरोध करने की हिम्मत भी नहीं जुटा सकता था। इंडिया टुडे की ओपन-सोर्स इंटेलीजेंस टीम ने साल 2013 से अब तक के संदेशखाली की जमीन का सेटेलाइट डाटा के आधार पर विश्लेषण किया है, जो स्थानीय लोगों के उन दावों की पुष्टि करता है, जिसमें शेख शाहजहाँ और उसके संगठित आपराधिक-राजनीतिक गिरोह के लोगों ने जमीनों पर अवैध कब्जे किए।

इस रिपोर्ट में उत्तर 24 परगना जिले में स्थित संदेशखाली इलाके के सेटेलाइट डाटा का विश्लेषण किया गया है, जहाँ डेल्टाई क्षेत्र में पहले किसान चावल जैसे खाद्यान्न उगाते थे और अब वहाँ बड़े-बड़े भेरी (तालाब) दिखाई पड़ रहे हैं। इन सभी पोखरों (तालाबों) पर शेख शाहजहाँ, उसके भाई शिराजुद्दीन, उसके सहयोगी उत्तम सरदार, शिबू हाजरा जैसे लोगों का ही कब्जा है। यही नहीं, इस इलाके में मछली की मंडियों, जिसमें छोटे किसान अपनी उपज बेचते हैं, उन पर भी शेख शाहजहाँ का ही कब्जा है।

संदेशखाली ब्लॉक-1 के बोयेरमारी, हाटगाछी, नलकारा, सरबेरिया और राजबाड़ी इलाकों के साथ ही संदेशखाली ब्लॉक-2 के त्रिमोनी बाजार, झुपखाली, माझेरपारा और बरमुजूर जैसे क्षेत्रों में खेती की जमीनों को तालाब में बदला गया है। साल 2013 से 2024 के बीच की सेटेलाइट तस्वीरें सब कुछ दूध के दूध और पानी की पानी की तरह साफ कर रहे हैं। खास बात ये है कि संदेशखाली से करीब 18 किमी दूर के रूपामारी बाजार और उसके आसपास के इलाकों में भी इसी तरह से खेती की जमीनों को तालाबों में बदला जा चुका है।

इस मॉडस ऑपरेंडी को इस बात से समझा जा सकता है कि संदेशखाली पुलिस स्टेशन से बामुश्किल 500 की दूरी पर माझेरपारा के एक बड़े क्षेत्र में साल 2022 तक कुछ छोटे-छोटे तालाब थे। लेकिन साल 2022 के आखिर तक उन सभी तालाबों और आसपास की खेती की जमीन को मिला दिया गया, जिससे वो पूरा लगभग 100 एकड़ का इलाका एक बड़े तालाब में बदल दिया गया।

माझेरपारा के रूपदासी सरदार और चंपा सरकार उन 25 जमीन मालिकों में से हैं, जिनकी जमीनें उस 100 एकड़ के तालाब में समा चुकी हैं। उन्होंने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा, “शेख शाहजहाँ के लोगों ने उनके खेतों में खारा पानी भर दिया, जिसके बाद वो जमीन खेती के लिए अनुपयुक्त हो गई। इसके बाद हमें उनके द्वारा साल के 5000-6000 रुपए पर खेत को पट्टे पर देना पड़ा। हालाँकि शेख के लोगों ने हमें कोई पैसा भी नहीं दिया। यानी कि हमारी जमीन भी चली गई और हमें पैसा भी नहीं मिला।”

आदिवासी महिला रूपदासी सरदार की उम्र करीब 60 वर्ष है। वो कहती हैं, “उत्तम सरकार (शेख शाहजहाँ का करीबी सहयोगी) ने मेरी 3.3 बीघा जमीन पट्टे पर ले ली, लेकिन कभी उसने हमें पैसे भी नहीं दिए। हम उन्हें मना करने की हालत में नहीं थे, क्योंकि अन्य लोगों ने भी उत्तर सरदार को अपनी जमीनें दे दी थी। हमारी जमीन पर पानी भरा जा चुका था।”

चंपा सरदार की भी जमीन पर इसी तरह से कब्जा कर लिया गया। वो कहती हैं, “हम जब खेती करते थे, तो हमारी जरूरत भर का चावल पैदा हो जाता था। अब हम दुकानों से ज्यादा कीमत पर अनाज खरीद रहे हैं, क्योंकि हमारे पास कोई रास्ता नहीं है।”

वैसे, खेती लायक कितनी जमीन को शेख शाहजहाँ और उसके सहयोगियों ने कब्जाया है, इसका तो सटीक आँकड़ा नहीं है, लेकिन मोटे अनुमानों के मुताबिक, उन लोगों ने कम से कम 1000 एकड़ जमीन इसी तरह से कब्जाई है। गूगल अर्थ स्ट्री व्यू सेटेलाइट डाटा भी जमीन को बदले जाने के दावों की पुष्टि करता है।

ग्रामीणों का कहना है कि शेख शाहजहाँ के मछली कारोबार का काम उसका भाई जियाउद्दीन और उसका सहयोगी शिबू हाजरा, उत्तम सरदार देखते हैं। उन्होंने पट्टे के नाम जमीनों को हड़पने के काम साल 2013-14 में शुरू किया, लेकिन जब शेख शाहजहाँ 2018 में ग्राम पंचायत का उप-प्रमुख बन गया, तो इस काम में नाटकीय रूप से तेजी दर्ज की गई। वहीं, अधिकारियों ने दावा किया है कि 8 फरवरी से शुरू हुए विवाद के बाद से अब तक जमीनों पर अवैध कब्जे के 147 मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जिसमें करीब 200 बीघा जमीन लौटाई जा चुकी है। अधिकारियों की कार्रवाई भी इस बात पर मुहर लगाती है कि शेख शाहजहाँ और उसके लोगों ने ग्रामीणों को जमीनों पर अवैध कब्जे किए और उनपर मछली पालन का कारोबार खड़ा किया।

सिर्फ खेती की जमीन ही नहीं, बल्कि खेल मैदान पर भी कब्जा

शेख शाहजहाँ की नजर सिर्फ खेती की जमीनों पर ही नहीं थी, बल्कि खेल के मैदान पर भी उसने कब्जा किया। आरोप है कि शेख शाहजहाँ ने श्री अरबिंद मिशन के एक खेल के मैदान पर कब्जा कर लिया और उसे ‘शेङ शाहजहाँ फैन क्लब’ मैदान का नाम दे दिया। ये मैदान सिंहपारा में करीब 2.86 एकड़ क्षेत्रफल में फैला हुआ था। हालाँकि स्थानीय अधिकारियों ने कहा है कि इस जमीन के कब्जे को भी अब शेख शाहजहाँ के चंगुल से निकाल लिया गया है।

बताया जा रहा है कि साल 2022 में इस मैदान पर ‘शेख शाहजहाँ फैन क्लब टूर्नामेंट’ नाम से बड़े फुटबाल टूर्नामेंट का भी आयोजन किया गया था। उस दौरान पूरे इलाके को टीएमसी के झंडों से पाट दिया गया और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बड़े-बड़े बैनर लगाए गए थे। इस टूर्नामेंट को भव्य रूप देने के लिए एलईडी स्क्रीन्स भी लगाई गई थी। इस टूर्नामेंट के विजेता को शानदार बाइक गिफ्ट की गई।

शेख शाहजहाँ ने पड़ोस के धमाखाली इलाके में 2 ईंट के भट्टे भी लगा रखे हैं, तो सरबेरिया में उसने एक बड़ा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स भी बनाया है। शेख शाहजहाँ न सिर्फ भेरी (तालाब) क्षेत्रों को कंट्रोल करता है, बल्कि मछली बाजारों को भी नियंत्रित करता है।

बता दें कि जिला परिषद के सदस्य शेख शाहजहाँ को 29 फरवरी 2024 को गिरफ्तार किया गया, जो करीब 55 दिनों से फरार था। उसके खिलाफ 5 जनवरी 2024 को छापेमारी के दौरान ईडी की टीम पर ही हमला हो गया था। ईडी की टीम पीसीएस भ्रष्टाचार मामले में जाँच करने पहुँची थी। इसके करीब एक माह बाद 8 फरवरी से महिलाओं ने शेख शाहजहाँ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उस पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न, जमीन हड़पने के आरोप लगाए गए। अभी तक शेख शाहजहाँ के खिलाफ दर्जनों महिलाएँ शिकायत दर्ज करा चुकी हैं, तो जमीन हड़पने के 700 से अधिक मामले उसके खिलाफ दर्ज किए जा चुके हैं।

इस पूरे मामले को कोलकाता के सिस्टर निवेदिया विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान के डीन सुरजीत मुखोपाध्याय बेहद खतरनाक बताते हैं। उन्होंने शेख शाहजहाँ के कारनामों को ‘राजनीतिक अर्थव्यवस्था के अपराधीकरण’ की मिसाल बताया है।

सिंदरी को PM ने 20 साल बाद लौटाया उसका ‘फर्टिलाइजर’, झारखंड को ₹35700 करोड़ के प्रोजेक्ट: कहा- पूरी हुई मोदी की गारंटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज शुक्रवार (1 मार्च 2024) को झारखंड के दौरे पर हैं। उन्होंने धनबाद के सिंदरी में 8939 करोड़ रुपए की लागत से नए हर्ल कारखाने को देश को समर्पित किया। इसके साथ ही झारखंड में उन्होंने 35,700 करोड़ रुपए की अलग-अलग योजनाओं की शुरुआत और ऑनलाइन शिलान्यास किया। इस दौरान एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि पीएम ने कहा कि ये मोदी की गारंटी थी और आज ये गारंटी पूरी हुई।

गोरखपुर, बरौनी और रामागुंडम में उर्वरक प्लांट के पुनरुद्धार के बाद सिंदरी देश का तीसरा उर्वरक संयंत्र है, जिसे पुनर्जीवित किया गया है। इसके अलावा, उन्होंने देवघर से गोड्डा को जोड़ने वाली मोहनपुर-हंसडीहा नई रेललाइन और देवघर-डिब्रूगढ़ ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर इसका शुभारंभ किया। पीएम ने झारखंड के लिए करीब 17,600 करोड़ रुपए की रेल परियोजनाओं का शिलान्यास किया।

लोगों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “मैंने हिंदुस्तान उर्वरक और रसायन लिमिटेड (HURL- हर्ल) सिंदरी उर्वरक संयंत्र को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया था। यह मोदी की गारंटी थी। 2018 में मैं आया था, इस संयंत्र की आधारशिला रखने के लिए यहाँ। इससे रोजगार के हजारों अवसर मिलेंगे। यह ‘आत्मनिर्भरता’ की दिशा में एक बड़ा कदम है।”

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, “भारत में हर साल लगभग 360 लाख मीट्रिक टन यूरिया की आवश्यकता होती है। साल 2014 में 225 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन हुआ। इस अंतर को भरने के लिए भारत को यूरिया का आयात करना पड़ता था। तब हमने संकल्प लिया कि देश को यूरिया के मामले में आत्मनिर्भर बनाएँगे। अब पिछले 10 वर्षों में यूरिया का उत्पादन 310 लाख मीट्रिक टन हो गया है।”

दरअसल, 25 मई 2018 को प्रधानमंत्री मोदी ने कारखाने के पुनर्निर्माण की आधारशिला रखी थी। इस संयंत्र से प्रतिदिन 2250 मीट्रिक टन अमोनिया और 3850 टन यूरिया के उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। हर्ल के प्रबंध निदेशक एसपी मोहंती ने बताया कि 8939.25 करोड़ रुपए की लागत से लगभग चार साल में निर्मित हर्ल प्रोजेक्ट से इस साल 10 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया है।

केंद्र सरकार ने साल 2021 से ही यहाँ उत्पादन का लक्ष्य रखा था, लेकिन कोरोना संकट के कारण देरी हो गई। इसके बाद 17 नवंबर 2021, मार्च 2022 और फिर अप्रैल 2022 में शुरू करने की डेट तय हुई, लेकिन इसमें भी देरी हुई। अब यह पूरी तरह तैयार है और प्रतिदिन 4,100 मीट्रिक टन उर्वरक उत्पादन क्षमता के साथ तैयार है।

हिंदुस्तान उर्वरक और रसायन लिमिटेड में इस वर्ष 10 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया गया है। आने वाले वर्षों में इसका निर्धारित लक्ष्य 12 लाख मीट्रिक टन सालाना रखा गया है। मोहंती ने कहा कि अगर यह संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से काम करता है तो यह देश की दूसरी सबसे बड़ी खाद उत्पादन इकाई बन सकती है।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस कारखाने का उद्घाटन किया है, उसकी शुरुआत 2 मार्च 1951 को हुई थी। 5 सितंबर 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने सिंदरी, गोरखपुर, तालचर और रामागुंडम के खाद कारखाने को बंद करने का निर्णय लिया था। इसके बाद 31 दिसंबर 2002 को यह कारखाना बंद कर दिया गया था।

‘आज गाँव, गरीब, मजदूर और किसान दुखी हैं…’: कॉन्ग्रेस ने शेयर किया नितिन गडकरी का ‘खतना’ वीडियो, करवा ली खुद की बेइज्जती

कॉन्ग्रेस के झूठ बोलने की आदत की अब कोई सीमा नहीं रह गई। वह अपने प्रचार के लिए किसी भी हद तक नीचे जाने को तैयार हो गए हैं। हाल में उन्होंने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की इंटरव्यू वीडियो की क्लिप शेयर करके ऐसा ही काम किया। उन्होंने आज सुबह 1 मार्च को एक 19 सेकेंड की वीडियो साझा की।

इस वीडियो में नितिन गडकरी को बोलते दिखाया गया कि आज गाँव, गरीब, मजदूर और किसान दुखी हैं। गाँव में अच्छे रोड नहीं हैं, पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं है, अच्छे अस्पताल नहीं हैं, अच्छे स्कूल नहीं।

इस वीडियो को शेयर करते हुए कॉन्ग्रेस ने ऐसा दिखाया जैसे नितिन गडकरी ने ये कहकर मोदी सरकार के कार्यों की पोल खोली हो। लेकिन इस वीडियो और कॉन्ग्रेस की ओछी हरकत की असलियत क्या है ये लल्लनटॉप की पूरी वीडियो देखने पर पता चलती है। 1 घंटे 42 सेकेंड की इस वीडियो में 15 मिनट के बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को इस पर बात करते देखा जा सकता है।

पूरी वीडियो में क्या कहा गया

वीडियो में 15:20 से 15:45 के स्लॉट में उनसे पत्रकार सौरभ द्विवेदी किसानों से संबंधित सवाल पूछते हैं जिसके बाद नितिन गडकरी उन्हें इसका उत्तर देते हैं। इसी वीडियो में 18 मिनट 07 सेकेंड के स्लॉट के बाद दौरान वह बताते हैं,

“कृषि पर जो पॉपुलेशन डिपेंड है वो 65 प्रतिशत है जब गाँधी जी थे जब 90% की आबादी गाँव में रहती थी और धीरे-धीरे 30% पलायन क्यों हुआ। इसका मतलब है कि आज गाँव गरीब, मजदूर, किसान दुखी है। इसका कारण है कि जल जंगल जमीन और जानवर… ये जो ग्रामीण इकोनॉमी है यहाँ अच्छे रोड नहीं है, पीने के लिए पानी नहीं है, अच्छा अस्पताल नहीं है, अच्छा स्कूल नहीं है, किसान के फसल को अच्छे भाव नहीं है… ऐसा नहीं है कि यहाँ विकास नहीं हुआ, लेकिन जिस हिसाब से बाकी जगह हुआ है उतना नहीं है। हमारी सरकार आने के बाद हम इसपर बहुत काम कर रहे हैं। ऐसे ब्लॉक निकाले गए हैं जहाँ विशेष रूप से कार्य करने की जरूरत है।”

अब इस वीडियो से साफ है कि गडकरी के बयान पर जो झूठ फैलाने का काम हो रहा है वो सरासर भ्रामक है। असल में केंद्रीय मंत्री ये बता रहे थे कि पलायन इसलिए हुआ क्योंकि उन्हें अच्छे संसाधन नहीं मिले और उनकी सरकार इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण रूप से काम कर रही है। न कि वो ये कह रहे हैं कि मोदी सरकार में देश के ये हालात हैं।

कॉन्ग्रेस के इस झूठ के बाद उन्हें सोशल मीडिया पर खूब लताड़ लग रही है। उनके पूछा जा रहा है कि वो क्यों वीडियो का खतना करके उसे शेयर कर रहे हैं। यूजर्स उन्हें फेक न्यूज फैलाने वाली पार्टी कह रहे हैं। साथ ही कहा जा रहा है कि वीडियो में बात गाँधी के समय के बाद की है जब कॉन्ग्रेस सत्ता में थी ऐसे में तो इसलिए उन्हें मोदी सरकार पर सवाल उठाने से पहले खुद के गिरेबान में देखना चाहिए।

सेक्स की भूख शाम में या भोर में: 12 बजे रात में शाहजहाँ शेख कैसे कर सकता है महिलाओं का यौन उत्पीड़न, ममता के मंत्री ने ‘पीठा’ खाने से की तुलना

संदेशखाली में प्रवर्तन निदेशालय पर हुए हमले के मामले में शेख शाहजहाँ को बंगाल पुलिस ने 29 फरवरी 2024 को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद खबर आई कि तृणमूल कॉन्ग्रेस ने उसे पार्टी से 6 साल के निलंबित कर दिया है। पार्टी के कुछ नेता जहाँ इस घोषणा के बाद इस मामले से पल्ला झाड़ते दिखे तो वहीं पर कुछ नेता ऐसे भी थे जो खुलकर शेख शाहजहाँ के समर्थन में आ गए।

ममता सरकार में कैबिनेट मंत्री उदयन गुहा उन्हीं लोगों में से एक हैं। संदेशखाली में इतना सब कुछ होने के बावजूद उदयन गुहा ने कहा कि उसे (शेख शाहजहाँ को) दुष्प्रचार के जरिए फँसाया गया है। अफवाह में फँसाया गया है। वरना शेख शाहजहाँ तो कभी भी ऐसा कुछ कर ही नहीं सकता।

उन्होंने शाहजहाँ का बचाव करते हुए कहा- “मैं पक्का नहीं कह कता है कि ये शेख शाहजहाँ को किसी की साजिश है या नहीं। लेकिन उसके ऊपर जो आरोप लगे हैं वो एक गलती हैं। उसे झूठा फँसाया गया है। ऐसा तब से हो रहा है जब से ईडी अधिकारियों पर हमला हुआ है। अतीत में, हमने शेख शाहजहाँ के खिलाफ ये आरोप कभी नहीं सुने हैं।”

ये जानते हुए शेख शाहजहाँ के खिलाफ संदेशखाली की कई स्थानीय महिलाओं ने यौन उत्पीड़न तक के गंभीर इल्जाम लगाए हैं… उदयन गुहा कहते दिखते हैं- “मुझे नहीं पता था कि उसे रात के 12 बजे पीठा (महिलाओं के यौन उत्पीड़न की ओर इशाारा करते हुए) खाना पसंद है। मैं जानता था कि ऐसी हरकत करने का मन सुबह-सुबह या फिर रात को सोते समय होता है।”

संयोग से ये शब्द जिन टीएमसी मंत्री के हैं उनपर उनके ही संसदीय क्षेत्र दिनहाटा में यौन उत्पीड़न का इल्जाम लग चुका है। एक वीडियो 21 फरवरी को वायरल हुई थी। इसमें एक महिला नजर आ रही थी जिसका कहना था कि उदयन गुहा ‘पीठा’ बनवाने के नाम पर उनका यौन उत्पीड़न करते थे।

महिला ने कहा था, “लगभग 12 बजे, उदयन गुहा और उनके साथियों ने पार्टी कार्यालय में ‘पीठा’ बनाने के लिए बुलाया। लेकिन मैंने इनकार कर दिया और आधी रात को पीठा बनाने की उनकी बेतुकी बात पर सवाल उठाया। क्या वे इसलिए हमारी इज्जत नहीं करते क्योंकि हम महिला हैं?…मुझे समय-समय पर उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा है। मैंने हाथ जोड़कर विनती की, क्या वे मुझे शांति से नहीं रहने देंगे? लेकिन वे नहीं माने। कल पंचायत और बूथ अध्यक्ष आए और मुझे कल आने का निर्देश दिया। लेकिन मैंने ये कहकर मना कर दिया कि मेरी कुछ इज्जत है। मैंने हाथ जोड़कर विनती की पर उनकी प्रतिक्रिया अधिक हिंसात्मक थी।”

संदेशखाली के हाल

बता दें कि बंगाल के संदेशखाली में 8 फरवरी 2024 को महिलाएँ हाथ में डंडा-झाड़ू लेकर टीएमसी के नेता शेख शाहजहाँ और उसके साथियों का विरोध करने सड़क पर उतरीं थीं। इसी दौरान उन्होंने वो चौंकाने वाले खुलासे किए थे जिसे सुन पूरा देश सन्न था।

ऐसे समय में ये मुद्दा मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में प्रमुखता से उठा। नतीजा ये हुआ कि देर ही सही लेकिन संदेशखाली की महिलाओं के अनुसार जो प्रशासन उनकी सुन नहीं रहा था उसी ने टीएमसी नेता के करीबियों को पकड़ना शुरू किया।

पहले शेख के करीबी शिबू हाजरा, उत्तम सरदार, अजीत मैती गिरफ्तार हुए। उसके बाद हाईकोर्ट की फटकार के बाद 29 फरवरी को शेख शाहजहाँ भी पकड़ लिया गया। कोर्ट ने उसे 10 दिन पुलिस हिरासत में भेजा है। वहीं टीएमसी ने उसे 6 साल के लिए निलंबित कर दिया है।

उसपर 5 जनवरी 2024 को ईडी की टीम पर हमला करवाने का भी आरोप है। पुलिस ने उसे इसी मामले में पकड़ा है। यौन उत्पीड़न के मामले में तो कहा गया कि जाँच के बाद कोई कार्रवाई होगी।