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बंगाल-बिहार-तमिल-मराठी… सबकी आग में पूरे भारत को झोंकना चाहते हैं राहुल गाँधी, कहाँ से आई इतनी नफरत?

बिहार में एक नेता हुआ करते थे। लोग उसे लालू यादव के नाम से जानते हैं। अब वो अपराधी है। सजायाफ्ता कैदी भी। अपनी नेतागिरी के दिनों में वो जात-पात की बात करते थे। भाषणों में अगड़े-पिछड़े की बात से तालियाँ बटोरते थे। रैलियों में लाठी से दम ठोकते थे। ‘भूरा बाल साफ करो’ की न सिर्फ बात करते थे बल्कि सरकारी नौकरियों-नियुक्तियों में भूमिहार-राजपूत-ब्राह्मण-लाला (कायस्थ) लोगों से भेदभाव की लकीर भी खींच दी गई थी।

नतीजा क्या हुआ? बिहार दशकों पीछे चला गया। कभी दलहन-तिलहन का कटोरा कहा जाने वाला राज्य पलायन की मार झेलने लगा। अभी तक झेल रहा। कभी चीनी और राइस मिल जिसकी पहचान थे, वहीं के लोग अब दूसरे राज्यों में मजदूरी करने को विवश हैं। ग्लोबल ब्रांड वाली मॉर्टन टॉफी और कुकीज़ कभी बिहार में ही बनकर विदेशियों तक के दिलों पर राज करती थी। अब क्या हुआ उस बिहार को? जो कभी अस्मिता हुआ करती थी, अब वही गाली बन चुकी है।

उस नेता लालू का इन सबसे और इस पूरे प्रकरण में क्या बिगड़ा? क्या उसका परिवार पलायन करके किसी और राज्य में गया रोजी-रोटी के लिए? क्या उसके बेटे को ‘बिहारी’ कह कर गाली देने की किसी में हिम्मत है? क्या जब लालू यादव अपराधी साबित हुआ तो जिस परिवेश से उठ कर वो सीएम की कुर्सी तक आया था, उसी चपरासी क्वॉर्टर में लौट गए उसके बीवी-बच्चे? नहीं।

जिस राजनीति की सीढ़ी चढ़ लालू यादव ने सत्ता की कुर्सी पर कब्जा जमाया, उससे वो खुद और साथ में उसका परिवार अभी तक मलाई चाट रहा। कोई भुगत रहा तो वो है पूरा बिहारी समाज।

राहुल मतलब आग-लगावन राजनीति

बिहार में लालू ने जो किया, देश भर में वही जहर राहुल गाँधी घोल रहे। जात-पात, अगड़े-पिछड़े की बात कर रहे। वो ऐसा कर रहे, क्योंकि उनको देश के सबसे मलाईदार सत्ता सर्कल मतलब लुटियंस दिल्ली में एक सरकारी बंगले की जरूरत है। वो बखूबी जानते हैं कि केंद्रीय सत्ता तो मिलने से रही, ऐसे में कॉन्ग्रेस का प्रिंस बने रहने के लिए किसी भी तरीके से सांसदी बची रहे और एक बंगला मिल जाए। इसमें उनका फायदा स्पष्ट है। स्पष्ट यह भी है कि बिहार की तरह नुकसान उठाएगा वोटर, वो भी दशकों तक।

राहुल गाँधी की संक्रमणकारी और जहरीली राजनीति को समझना है तो एक शब्द को समझना होगा – नक्सलबाड़ी। बिहार से ज्यादा दूर नहीं है। अभी जिस राज्य पर ममता बनर्जी का कब्जा है, वहीं है यह गाँव। इस गाँव से फैला संक्रमण इतना खतरनाक है कि क्या हिंदी क्या अंग्रेजी… वामपंथ की हत्यारी विचारधारा का नाम ही इसके नाम पर पड़ गया।

नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ खूनी खेल अब तक देश के छिटपुट हिस्सों में खेला जा रहा। तमाम खर्चे और सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिल कर काम करने की रणनीति के बावजूद नक्सल नाम के इस नासूर को अब तक जड़ से उखाड़ा नहीं जा सका। ‘मैं तुम्हें बंदूक दूँगा, उसको मार दो’ के बजाय इसकी शुरुआत हुई थी ‘अत्याचारी-पीड़ित’ का बीज बोकर। नतीजा इतना भयावह है कि आज वही तथाकथित पीड़ित अपने ही बच्चों के स्कूल तक को बम से उड़ा देता है। अपने ही समाज के भाई-दोस्त को ‘मुखबिर’ कह कर गला काट देता है।

जो काम कल ‘दिमागी वामपंथियों’ ने किया था, वही आज राहुल गाँधी कर रहे। किसानों को पीड़ित बता रहे, उद्योगपतियों को अत्याचारी, छोटे व्यापारी बनाम सरकारी जीएसटी, कंपनियों को कामगारों का शोषक आदि-इत्यादि वाक्यांश गढ़ कर वो बीज बो रहे हैं खूनी खेल का। इतना तय है कि दिमागी वामपंथियों की तरह वो भी सिर्फ इसकी मलाई चाभेंगे, खुद इस खूनी खेल का हिस्सा नहीं बनेंगे। जो उनके षड्यंत्र में फँसेंगे, वो मरेंगे, उनका परिवार दुख-दर्द भोगेगा।

दादी इंदिरा गाँधी का जिक्र हमेशा करते हैं कॉन्ग्रेस के प्रिंस। अफसोस कि उनसे सीख नहीं ले पाए कुछ भी। यह इंदिरा ही थीं जिनके समय में तमिलनाडु में हिंदी-विरोधी स्वर बुलंद हुआ था। नतीजा देश को भी पता है और कॉन्ग्रेस को भी। भारत के दक्षिणी हिस्से में कॉन्ग्रेस न सिर्फ कमजोर हुई बल्कि क्षेत्रिय पार्टियाँ भी अपने-अपने इलाकों में पनपी। अगर इतना सब कुछ जानते राहुल गाँधी तो अमूल-नंदिनी विवाद पैदा नहीं करते।

एक राज्य को दूसरे राज्य से लड़ा दो, एक कंपनी को दूसरी कंपनी के खिलाफ भड़का दो… राहुल गाँधी को लगता है कि इससे उनके 2-4 वोट बढ़ जाएँगे। अपने सहयोगी ठाकरे का राजनीतिक पतन देख कर भी उन्हें समझ नहीं आया। वैसे समझ जाते तो राहुल गाँधी के लिए एक विशेष नाम का प्रयोग सोशल मीडिया पर देश की जनता क्यों करती भला! जिस मराठा राजनीति के दम पर ठाकरे परिवार पैदा हुआ, उसी महाराष्ट्र में आज उसका नाम-निशान दोनों खत्म हो चुका है।

बंगला और कुर्सी: राहुल गाँधी का एक्के मकसद

देश में कितनी जाति के लोग रहते हैं? इन जातियों का जनसंख्या में प्रतिशत कितना है? पिछड़े लोगों की कितनी आबादी है? किस जाति के कितने लोग IAS/IPS/डॉक्टर/इंजीनियर हैं? मीडिया में कौन जाति वाला मालिक है, कौन नौकरी कर रहा? मराठी लोगों की नौकरियाँ गुजरातियों को क्यों? गुजराती दूध-दही कर्नाटक में क्यों? गरीब लोगों के साथ 24 घंटे अन्याय क्यों होता है? किसान के खिलाफ अन्याय कौन रहा है? भारत की जल-जंगल-जमीन पर जिन आदिवासियों का सबसे पहला हक है, उन पर अत्याचार करने वाले कौन हैं?

हाल-फिलहाल ऊपर की लिखी एक भी लाइन अगर आपने कहीं पढ़ी-सुनी-देखी है तो उसे आँख मूँद कर राहुल गाँधी से जोड़ लीजिए। कब कहा, कहाँ कहा, किसको टारगेट करके कहा… इन सब तथ्यों को खोजने की जरूरत नहीं। जरूरत इसलिए नहीं क्योंकि राहुल गाँधी के अलावा ऐसी घिसी-पिटी, समाज को तोड़ने वाली बात इस देश में और कोई नेता कर नहीं रहा।

आज की पीढ़ी वाले जिन नेताओं के बाप-दादा ने समाज में जहर घोला था, अपने-अपने हिस्से में आग लगाई/लगवाई थी, उसी के दम पर क्षेत्रिय राजनीति पर कब्जा किया था… वो भी आज नौकरी/रोजगार/कमाई/विकास आदि की बात कर रहे। इनसे उलट राहुल गाँधी समाज के हर एक तबके को भड़काने का काम कर रहे हैं क्योंकि उनको लगने लगा है कि वो देश के ‘प्रिंस’ हैं। उनके परदादा-दादी-पिता ने देश के लिए ‘बलिदान’ दिया, इसलिए देश पर पहला हक उनका है।

राहुल गाँधी बस यह भूल जाते हैं कि भले उनके पूर्वजों ने पीएम की कुर्सी संभाली है, लेकिन इसके बदले उन्हें सैलरी/सुविधाएँ मिलती थीं। पीएम की कुर्सी पर बैठने वाला व्यक्ति देश पर अहसान करता है, अभी तक वो इसी भुलावे में जी रहे हैं। और अगर मौत/हत्या वाले तर्क पर पीएम की कुर्सी मिलने का अधिकार जताने का राग अलापा जाए तो न जाने कितने डॉक्टर-इंजीनियर-IAS-IPS आदि भी नौकरी करते हुए मरे/मारे गए। तो क्या उनके बच्चे भी इन सरकारी पदों को अपनी बपौती समझने लगें?

राहुल गाँधी अब तक सिर्फ गलत ही किए, कर रहे हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। जिन मुद्दों पर उन्होंने समाज में अभी तक जहर नहीं घोला है, उसके लिए उनकी जय-जयकार। ओवैसी और बाकी कट्टरपंथी मुस्लिम नेता देश की सेना और पुलिस में किस मजहब/धर्म/पंथ के कितने लोग हैं, ऐसा सवाल पूछते रहते हैं। राहुल गाँधी ने अभी तक यह नहीं किया है। इस पर उनके लिए ताली तो बनती है। 

‘नहीं किया है’ और ‘नहीं करेंगे’ में हालाँकि धागे भर का फर्क है। अभी उनकी माँ सोनिया गाँधी स्वास्थ्य कारणों से राज्यसभा के रास्ते सांसदी बचाने निकल पड़ी हैं। वजह वही है – सरकारी बंगला। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद जिस दिन राहुल गाँधी को यह लगा कि वो अब कॉन्ग्रेस में भी प्रिंस के लायक नहीं… उसी दिन वो जात-पात-अगड़ा-पिछड़ा वाले पतन के रास्ते पर और नीचे गिरेंगे। मुस्लिम-सिख-ईसाई सबको अपने जहर से लुभाएँगे। स्पष्ट है कि तब भी फायदा उनको ही होगा, दशकों तक कोई झेलेगा तो वो होगा सिर्फ और सिर्फ वोटर। 

राहुल गाँधी न तो पहले हैं, ना ही आखिरी होंगे। तमाम ऐसे नेताओं के नाम आपको याद होंगे, जो कहलाते तो ‘जनता के सेवक’ हैं, लेकिन एक उम्र के बाद लोकतंत्र में उनकी सेवा सासंद वाली एक कुर्सी और दिल्ली में एक बंगला कब्जाने के अलावा कुछ और नहीं रही। ‘प्रिंस’ राहुल गाँधी की राजनीति भी आज महज एक कुर्सी और बंगले को बचाकर रखने तक सिमट गई है।

कंगना, अक्षय, युवराज, पवन सिंह… BJP की लिस्ट से पहले सूत्रों ने लोकसभा चुनाव में उतारी सितारों की फौज, देर रात CEC की बैठक के बाद लिस्ट का इंतजार

भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2024 के लगभग 100 उम्मीदवारों के नाम तय कर लिए हैं। इसकी पहली सूची कभी भी जारी की जा सकती है। इस सूची को अंतिम रूप देने के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक गुरुवार की रात लगभग 11 बजे से शुरू होकर शुक्रवार तड़के लगभग 3.30 बजे समाप्त हुई। इस बैठक को लेकर पीएम मोदी, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित तमाम बड़े नेता शामिल हुए।

इस बैठक में नामों को लेकर तमाम मीडिया संस्थान सूत्रों के हवाले से नाम अपनी-अपनी राय रख रहे हैं। इन रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि बैठक में तय किया गया है कि वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गाँधी नगर से गृहमंत्री अमित शाह, लखनऊ से रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, नागपुर से नितिन गडकरी, अमेठी से स्मृति ईरानी चुनाव लड़ेंगे। इनका नाम बैठक में फाइनल हो गया है।

सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि बंगाल के आसनसोल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को टक्कर देने के लिए भाजपा भोजपुरी के सुपर स्टार पवन सिंह को उतार सकती है। कंगना रनौत हिमाचल प्रदेश के मंडी से लोकसभा चुनाव लड़ सकती हैं। वहीं, बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार को दिल्ली के चाँदनी चौक और क्रिकेटर युवराज सिंह को पंजाब के गुरदासपुर से मैदान में उतारा जा सकता है।

वहीं, यह भी कहा जा रहा है कि मध्य प्रदेश के भोपाल से वर्तमान भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का टिकट काटा जा सकता है। उनकी जगह प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मैदान में उतार सकती है। वहीं, दिल्ली से भाजपा कई चेहरों को बदलने की तैयारी कर रही है। इसमें उत्तर-पूर्वी दिल्ली से मनोज तिवारी का नाम भी शामिल है। तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के अन्नामलाई को भी मैदान में उतारे जाने की संभावना है।

वहीं, अगर हिंदुस्तान के सूत्रों की मानें तो मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को विदिशा लोकसभा सीट से मैदान में उतारा जा सकता है। सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि भूपेन्द्र यादव, धर्मेंद्र प्रधान और मनसुख मांडविया सहित कई केंद्रीय मंत्रियों को इस बार मैदान में उतारा जा सकता है। इन नेताओं को राज्यसभा के लिए हाल में हुए चुनावों में उम्मीदवार नहीं बनाया गया था।

एनडीटीवी ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि उत्तर प्रदेश में आरएलडी, अपना दल, सुभासपा और निषाद पार्टी के लिए भाजपा लोकसभा की 6 सीटें छोड़ेगी। आरएलडी के लिए 2 लोकसभा सीटें, अपना दल के लिए 2 लोकसभा सीटें, सुभासपा और निषाद पार्टी के लिए 1-1 लोकसभा सीटें देने पर सहमति बनी है। वहीं, लगभग 56 लोकसभा सीटों पर भाजपा अपने उम्मीदवार उतारेगी।

शंभू बॉर्डर पर ‘किसान’ कर रहे इंतजार, गुजरात में घूम रहीं ‘हमदर्द’ रिहाना: अंबानी के आँगन में नाचने की लेंगी ₹74 करोड़, नेटिजन्स ने घेरा

गुजरात के जामनगर में अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की शादी से पूर्व अंबानी परिवार द्वारा आयोजित कार्यक्रम में देश-विदेश से कई हस्तियाँ शामिल होने आई हैं। इन्हीं जानी-मानी हस्तियों में एक नाम विदेशी सिंगर रिहाना का भी है। उन्होंने कार्यक्रम में स्टेज परफॉर्मेंस देने के लिए 66 करोड़ से लेकर 74 करोड़ रुपए के बीच की रकम ली है

यही मशहूर सिंगर रिहाना भारत में पिछली दफा तब चर्चा में आई थीं, जब उन्होंने किसान आंदोलन के नाम पर विदेश में बैठकर भारत को बदनाम करने का प्रयास किया था। संयोग से इस बार वह जब भारत में आई हैं तो भी कथित किसानों का आंदोलन चल रहा है। ऐसे में सवाल उठना तो लाजिमी है कि क्या किसानों से तब विदेश में बैठकर हमदर्दी दिखाने वाली रिहाना इस बार किसानों से मिलने शंभू बॉर्डर जाएँगी या फिर उनकी वो हमदर्दी नकली थी।

पत्रकार राजीव सचान ने रिहाना के पाखंड पर गौर कराते हुए लिखा, “चार साल पहले तीन कृषि कानूनों को जब अंबानी -अडानी कानून करार देकर किसान रास्तों पर बैठ गए थे, तब जिस रिहाना ने उनसे नकली हमदर्दी जताई थी, वही अब अंबानी के यहाँ शादी में नाचने- गाने आई है, जिसमें अडानी भी मेहमान हैं।”

बाला नाम के एक्टिव एक्स यूजर ने रिहाना के प्रोग्राम में जाने की वीडियो को शेयर करते हुए तंज भरे अंदाज में लिखा- “रिहाना जामनगर में अनंत-राधिका की प्री वेडिंग के लिए पहुँच गई है। हमें लगा था कि वो पहले किसानों के प्रदर्शन में जाएगी।”

मेघ अपडेट्स ने इस पर लिखा, “दो साल पहले रिहाना कथित किसान आंदोलन की ब्रांड अंबेसडर बन गई थीं लेकिन अब इस बार वो अंबानी के बेटे की शादी में नाचने आई हैं जब दूसरी बार वही ड्रामा चालू है।”

मालूम हो कि रिहाना के भारत आने पर जो लोग उनपर सवाल उठा रहे हैं वो बिलकुल निराधार नहीं हैं। साल 2021 में कथित किसानों के आंदोलन पर उन्होंने ट्वीट शेयर करके कहा था- ‘आखिर लोग इस बारे में क्यों नहीं बात कर रहे हैं।’

उनके इसी ट्वीट पर कुछ भारत विरोधी लोगों ने उनकी खूब वाह-वाही की थी लेकिन कुछ दिन बाद ही ये रिपोर्ट्स आ गई थी कि रिहाना के खालिस्तानी लिंक हैं जिन्होंने इस प्रदर्शन पर ट्वीट करने के लिए 18 करोड़ रुपए तक दिए

अगर उनसे जुड़ी ये रिपोर्ट झूठी थी और रिहाना की किसानों के प्रति संवेदना सच्ची थी तो उन्हें कथित किसानों की भावनाओं से अब भी मतलब होना चाहिए था। उन्हें अब भी भारत आकर एक बार शंभू बॉर्डर पर डटे किसानों से मुलाकात कर ही लेनी चाहिए थी। लेकिन नहीं, वो भारत आईं और उसी कार्यक्रम में गईं जहाँ जाने के लिए उन्हें मोटी रकम मिली है। इससे ये तो साफ होता ही है कि 2021 में किया गया ट्वीट सिर्फ प्रोपेगेंडा का हिस्सा था।

संदेशखाली में खेत बनते गए पोखर, सैटेलाइट को दिखा पर ममता सरकार बनी रही बेखबर: ग्रामीण बोले- यह शेख शाहजहाँ और उसके गुर्गों की करनी

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में टीएमसी नेता शेख शाहजहाँ ने ऐसा साम्राज्य बनाया था, जो राजनीति के अपराधीकरण की जीवंत मिशाल है। एक व्यक्ति, जो कभी मजदूरी करता था, उसने खुद को कैसे राजनीति की आड़ में मजबूत किया और फिर सत्ताधारी पार्टियों के सहयोग की बदौलत खुद को उसने ऐसे ‘बेताज बादशाह’ के रूप में बदल दिया, जिसका कोई विरोध करने की हिम्मत भी नहीं जुटा सकता था। इंडिया टुडे की ओपन-सोर्स इंटेलीजेंस टीम ने साल 2013 से अब तक के संदेशखाली की जमीन का सेटेलाइट डाटा के आधार पर विश्लेषण किया है, जो स्थानीय लोगों के उन दावों की पुष्टि करता है, जिसमें शेख शाहजहाँ और उसके संगठित आपराधिक-राजनीतिक गिरोह के लोगों ने जमीनों पर अवैध कब्जे किए।

इस रिपोर्ट में उत्तर 24 परगना जिले में स्थित संदेशखाली इलाके के सेटेलाइट डाटा का विश्लेषण किया गया है, जहाँ डेल्टाई क्षेत्र में पहले किसान चावल जैसे खाद्यान्न उगाते थे और अब वहाँ बड़े-बड़े भेरी (तालाब) दिखाई पड़ रहे हैं। इन सभी पोखरों (तालाबों) पर शेख शाहजहाँ, उसके भाई शिराजुद्दीन, उसके सहयोगी उत्तम सरदार, शिबू हाजरा जैसे लोगों का ही कब्जा है। यही नहीं, इस इलाके में मछली की मंडियों, जिसमें छोटे किसान अपनी उपज बेचते हैं, उन पर भी शेख शाहजहाँ का ही कब्जा है।

संदेशखाली ब्लॉक-1 के बोयेरमारी, हाटगाछी, नलकारा, सरबेरिया और राजबाड़ी इलाकों के साथ ही संदेशखाली ब्लॉक-2 के त्रिमोनी बाजार, झुपखाली, माझेरपारा और बरमुजूर जैसे क्षेत्रों में खेती की जमीनों को तालाब में बदला गया है। साल 2013 से 2024 के बीच की सेटेलाइट तस्वीरें सब कुछ दूध के दूध और पानी की पानी की तरह साफ कर रहे हैं। खास बात ये है कि संदेशखाली से करीब 18 किमी दूर के रूपामारी बाजार और उसके आसपास के इलाकों में भी इसी तरह से खेती की जमीनों को तालाबों में बदला जा चुका है।

इस मॉडस ऑपरेंडी को इस बात से समझा जा सकता है कि संदेशखाली पुलिस स्टेशन से बामुश्किल 500 की दूरी पर माझेरपारा के एक बड़े क्षेत्र में साल 2022 तक कुछ छोटे-छोटे तालाब थे। लेकिन साल 2022 के आखिर तक उन सभी तालाबों और आसपास की खेती की जमीन को मिला दिया गया, जिससे वो पूरा लगभग 100 एकड़ का इलाका एक बड़े तालाब में बदल दिया गया।

माझेरपारा के रूपदासी सरदार और चंपा सरकार उन 25 जमीन मालिकों में से हैं, जिनकी जमीनें उस 100 एकड़ के तालाब में समा चुकी हैं। उन्होंने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा, “शेख शाहजहाँ के लोगों ने उनके खेतों में खारा पानी भर दिया, जिसके बाद वो जमीन खेती के लिए अनुपयुक्त हो गई। इसके बाद हमें उनके द्वारा साल के 5000-6000 रुपए पर खेत को पट्टे पर देना पड़ा। हालाँकि शेख के लोगों ने हमें कोई पैसा भी नहीं दिया। यानी कि हमारी जमीन भी चली गई और हमें पैसा भी नहीं मिला।”

आदिवासी महिला रूपदासी सरदार की उम्र करीब 60 वर्ष है। वो कहती हैं, “उत्तम सरकार (शेख शाहजहाँ का करीबी सहयोगी) ने मेरी 3.3 बीघा जमीन पट्टे पर ले ली, लेकिन कभी उसने हमें पैसे भी नहीं दिए। हम उन्हें मना करने की हालत में नहीं थे, क्योंकि अन्य लोगों ने भी उत्तर सरदार को अपनी जमीनें दे दी थी। हमारी जमीन पर पानी भरा जा चुका था।”

चंपा सरदार की भी जमीन पर इसी तरह से कब्जा कर लिया गया। वो कहती हैं, “हम जब खेती करते थे, तो हमारी जरूरत भर का चावल पैदा हो जाता था। अब हम दुकानों से ज्यादा कीमत पर अनाज खरीद रहे हैं, क्योंकि हमारे पास कोई रास्ता नहीं है।”

वैसे, खेती लायक कितनी जमीन को शेख शाहजहाँ और उसके सहयोगियों ने कब्जाया है, इसका तो सटीक आँकड़ा नहीं है, लेकिन मोटे अनुमानों के मुताबिक, उन लोगों ने कम से कम 1000 एकड़ जमीन इसी तरह से कब्जाई है। गूगल अर्थ स्ट्री व्यू सेटेलाइट डाटा भी जमीन को बदले जाने के दावों की पुष्टि करता है।

ग्रामीणों का कहना है कि शेख शाहजहाँ के मछली कारोबार का काम उसका भाई जियाउद्दीन और उसका सहयोगी शिबू हाजरा, उत्तम सरदार देखते हैं। उन्होंने पट्टे के नाम जमीनों को हड़पने के काम साल 2013-14 में शुरू किया, लेकिन जब शेख शाहजहाँ 2018 में ग्राम पंचायत का उप-प्रमुख बन गया, तो इस काम में नाटकीय रूप से तेजी दर्ज की गई। वहीं, अधिकारियों ने दावा किया है कि 8 फरवरी से शुरू हुए विवाद के बाद से अब तक जमीनों पर अवैध कब्जे के 147 मामलों का निपटारा किया जा चुका है, जिसमें करीब 200 बीघा जमीन लौटाई जा चुकी है। अधिकारियों की कार्रवाई भी इस बात पर मुहर लगाती है कि शेख शाहजहाँ और उसके लोगों ने ग्रामीणों को जमीनों पर अवैध कब्जे किए और उनपर मछली पालन का कारोबार खड़ा किया।

सिर्फ खेती की जमीन ही नहीं, बल्कि खेल मैदान पर भी कब्जा

शेख शाहजहाँ की नजर सिर्फ खेती की जमीनों पर ही नहीं थी, बल्कि खेल के मैदान पर भी उसने कब्जा किया। आरोप है कि शेख शाहजहाँ ने श्री अरबिंद मिशन के एक खेल के मैदान पर कब्जा कर लिया और उसे ‘शेङ शाहजहाँ फैन क्लब’ मैदान का नाम दे दिया। ये मैदान सिंहपारा में करीब 2.86 एकड़ क्षेत्रफल में फैला हुआ था। हालाँकि स्थानीय अधिकारियों ने कहा है कि इस जमीन के कब्जे को भी अब शेख शाहजहाँ के चंगुल से निकाल लिया गया है।

बताया जा रहा है कि साल 2022 में इस मैदान पर ‘शेख शाहजहाँ फैन क्लब टूर्नामेंट’ नाम से बड़े फुटबाल टूर्नामेंट का भी आयोजन किया गया था। उस दौरान पूरे इलाके को टीएमसी के झंडों से पाट दिया गया और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बड़े-बड़े बैनर लगाए गए थे। इस टूर्नामेंट को भव्य रूप देने के लिए एलईडी स्क्रीन्स भी लगाई गई थी। इस टूर्नामेंट के विजेता को शानदार बाइक गिफ्ट की गई।

शेख शाहजहाँ ने पड़ोस के धमाखाली इलाके में 2 ईंट के भट्टे भी लगा रखे हैं, तो सरबेरिया में उसने एक बड़ा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स भी बनाया है। शेख शाहजहाँ न सिर्फ भेरी (तालाब) क्षेत्रों को कंट्रोल करता है, बल्कि मछली बाजारों को भी नियंत्रित करता है।

बता दें कि जिला परिषद के सदस्य शेख शाहजहाँ को 29 फरवरी 2024 को गिरफ्तार किया गया, जो करीब 55 दिनों से फरार था। उसके खिलाफ 5 जनवरी 2024 को छापेमारी के दौरान ईडी की टीम पर ही हमला हो गया था। ईडी की टीम पीसीएस भ्रष्टाचार मामले में जाँच करने पहुँची थी। इसके करीब एक माह बाद 8 फरवरी से महिलाओं ने शेख शाहजहाँ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उस पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न, जमीन हड़पने के आरोप लगाए गए। अभी तक शेख शाहजहाँ के खिलाफ दर्जनों महिलाएँ शिकायत दर्ज करा चुकी हैं, तो जमीन हड़पने के 700 से अधिक मामले उसके खिलाफ दर्ज किए जा चुके हैं।

इस पूरे मामले को कोलकाता के सिस्टर निवेदिया विश्वविद्यालय में सामाजिक विज्ञान के डीन सुरजीत मुखोपाध्याय बेहद खतरनाक बताते हैं। उन्होंने शेख शाहजहाँ के कारनामों को ‘राजनीतिक अर्थव्यवस्था के अपराधीकरण’ की मिसाल बताया है।

सिंदरी को PM ने 20 साल बाद लौटाया उसका ‘फर्टिलाइजर’, झारखंड को ₹35700 करोड़ के प्रोजेक्ट: कहा- पूरी हुई मोदी की गारंटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज शुक्रवार (1 मार्च 2024) को झारखंड के दौरे पर हैं। उन्होंने धनबाद के सिंदरी में 8939 करोड़ रुपए की लागत से नए हर्ल कारखाने को देश को समर्पित किया। इसके साथ ही झारखंड में उन्होंने 35,700 करोड़ रुपए की अलग-अलग योजनाओं की शुरुआत और ऑनलाइन शिलान्यास किया। इस दौरान एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि पीएम ने कहा कि ये मोदी की गारंटी थी और आज ये गारंटी पूरी हुई।

गोरखपुर, बरौनी और रामागुंडम में उर्वरक प्लांट के पुनरुद्धार के बाद सिंदरी देश का तीसरा उर्वरक संयंत्र है, जिसे पुनर्जीवित किया गया है। इसके अलावा, उन्होंने देवघर से गोड्डा को जोड़ने वाली मोहनपुर-हंसडीहा नई रेललाइन और देवघर-डिब्रूगढ़ ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर इसका शुभारंभ किया। पीएम ने झारखंड के लिए करीब 17,600 करोड़ रुपए की रेल परियोजनाओं का शिलान्यास किया।

लोगों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “मैंने हिंदुस्तान उर्वरक और रसायन लिमिटेड (HURL- हर्ल) सिंदरी उर्वरक संयंत्र को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया था। यह मोदी की गारंटी थी। 2018 में मैं आया था, इस संयंत्र की आधारशिला रखने के लिए यहाँ। इससे रोजगार के हजारों अवसर मिलेंगे। यह ‘आत्मनिर्भरता’ की दिशा में एक बड़ा कदम है।”

प्रधानमंत्री मोदी ने आगे कहा, “भारत में हर साल लगभग 360 लाख मीट्रिक टन यूरिया की आवश्यकता होती है। साल 2014 में 225 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन हुआ। इस अंतर को भरने के लिए भारत को यूरिया का आयात करना पड़ता था। तब हमने संकल्प लिया कि देश को यूरिया के मामले में आत्मनिर्भर बनाएँगे। अब पिछले 10 वर्षों में यूरिया का उत्पादन 310 लाख मीट्रिक टन हो गया है।”

दरअसल, 25 मई 2018 को प्रधानमंत्री मोदी ने कारखाने के पुनर्निर्माण की आधारशिला रखी थी। इस संयंत्र से प्रतिदिन 2250 मीट्रिक टन अमोनिया और 3850 टन यूरिया के उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। हर्ल के प्रबंध निदेशक एसपी मोहंती ने बताया कि 8939.25 करोड़ रुपए की लागत से लगभग चार साल में निर्मित हर्ल प्रोजेक्ट से इस साल 10 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया है।

केंद्र सरकार ने साल 2021 से ही यहाँ उत्पादन का लक्ष्य रखा था, लेकिन कोरोना संकट के कारण देरी हो गई। इसके बाद 17 नवंबर 2021, मार्च 2022 और फिर अप्रैल 2022 में शुरू करने की डेट तय हुई, लेकिन इसमें भी देरी हुई। अब यह पूरी तरह तैयार है और प्रतिदिन 4,100 मीट्रिक टन उर्वरक उत्पादन क्षमता के साथ तैयार है।

हिंदुस्तान उर्वरक और रसायन लिमिटेड में इस वर्ष 10 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन किया गया है। आने वाले वर्षों में इसका निर्धारित लक्ष्य 12 लाख मीट्रिक टन सालाना रखा गया है। मोहंती ने कहा कि अगर यह संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से काम करता है तो यह देश की दूसरी सबसे बड़ी खाद उत्पादन इकाई बन सकती है।

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस कारखाने का उद्घाटन किया है, उसकी शुरुआत 2 मार्च 1951 को हुई थी। 5 सितंबर 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने सिंदरी, गोरखपुर, तालचर और रामागुंडम के खाद कारखाने को बंद करने का निर्णय लिया था। इसके बाद 31 दिसंबर 2002 को यह कारखाना बंद कर दिया गया था।

‘आज गाँव, गरीब, मजदूर और किसान दुखी हैं…’: कॉन्ग्रेस ने शेयर किया नितिन गडकरी का ‘खतना’ वीडियो, करवा ली खुद की बेइज्जती

कॉन्ग्रेस के झूठ बोलने की आदत की अब कोई सीमा नहीं रह गई। वह अपने प्रचार के लिए किसी भी हद तक नीचे जाने को तैयार हो गए हैं। हाल में उन्होंने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की इंटरव्यू वीडियो की क्लिप शेयर करके ऐसा ही काम किया। उन्होंने आज सुबह 1 मार्च को एक 19 सेकेंड की वीडियो साझा की।

इस वीडियो में नितिन गडकरी को बोलते दिखाया गया कि आज गाँव, गरीब, मजदूर और किसान दुखी हैं। गाँव में अच्छे रोड नहीं हैं, पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं है, अच्छे अस्पताल नहीं हैं, अच्छे स्कूल नहीं।

इस वीडियो को शेयर करते हुए कॉन्ग्रेस ने ऐसा दिखाया जैसे नितिन गडकरी ने ये कहकर मोदी सरकार के कार्यों की पोल खोली हो। लेकिन इस वीडियो और कॉन्ग्रेस की ओछी हरकत की असलियत क्या है ये लल्लनटॉप की पूरी वीडियो देखने पर पता चलती है। 1 घंटे 42 सेकेंड की इस वीडियो में 15 मिनट के बाद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को इस पर बात करते देखा जा सकता है।

पूरी वीडियो में क्या कहा गया

वीडियो में 15:20 से 15:45 के स्लॉट में उनसे पत्रकार सौरभ द्विवेदी किसानों से संबंधित सवाल पूछते हैं जिसके बाद नितिन गडकरी उन्हें इसका उत्तर देते हैं। इसी वीडियो में 18 मिनट 07 सेकेंड के स्लॉट के बाद दौरान वह बताते हैं,

“कृषि पर जो पॉपुलेशन डिपेंड है वो 65 प्रतिशत है जब गाँधी जी थे जब 90% की आबादी गाँव में रहती थी और धीरे-धीरे 30% पलायन क्यों हुआ। इसका मतलब है कि आज गाँव गरीब, मजदूर, किसान दुखी है। इसका कारण है कि जल जंगल जमीन और जानवर… ये जो ग्रामीण इकोनॉमी है यहाँ अच्छे रोड नहीं है, पीने के लिए पानी नहीं है, अच्छा अस्पताल नहीं है, अच्छा स्कूल नहीं है, किसान के फसल को अच्छे भाव नहीं है… ऐसा नहीं है कि यहाँ विकास नहीं हुआ, लेकिन जिस हिसाब से बाकी जगह हुआ है उतना नहीं है। हमारी सरकार आने के बाद हम इसपर बहुत काम कर रहे हैं। ऐसे ब्लॉक निकाले गए हैं जहाँ विशेष रूप से कार्य करने की जरूरत है।”

अब इस वीडियो से साफ है कि गडकरी के बयान पर जो झूठ फैलाने का काम हो रहा है वो सरासर भ्रामक है। असल में केंद्रीय मंत्री ये बता रहे थे कि पलायन इसलिए हुआ क्योंकि उन्हें अच्छे संसाधन नहीं मिले और उनकी सरकार इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण रूप से काम कर रही है। न कि वो ये कह रहे हैं कि मोदी सरकार में देश के ये हालात हैं।

कॉन्ग्रेस के इस झूठ के बाद उन्हें सोशल मीडिया पर खूब लताड़ लग रही है। उनके पूछा जा रहा है कि वो क्यों वीडियो का खतना करके उसे शेयर कर रहे हैं। यूजर्स उन्हें फेक न्यूज फैलाने वाली पार्टी कह रहे हैं। साथ ही कहा जा रहा है कि वीडियो में बात गाँधी के समय के बाद की है जब कॉन्ग्रेस सत्ता में थी ऐसे में तो इसलिए उन्हें मोदी सरकार पर सवाल उठाने से पहले खुद के गिरेबान में देखना चाहिए।

सेक्स की भूख शाम में या भोर में: 12 बजे रात में शाहजहाँ शेख कैसे कर सकता है महिलाओं का यौन उत्पीड़न, ममता के मंत्री ने ‘पीठा’ खाने से की तुलना

संदेशखाली में प्रवर्तन निदेशालय पर हुए हमले के मामले में शेख शाहजहाँ को बंगाल पुलिस ने 29 फरवरी 2024 को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद खबर आई कि तृणमूल कॉन्ग्रेस ने उसे पार्टी से 6 साल के निलंबित कर दिया है। पार्टी के कुछ नेता जहाँ इस घोषणा के बाद इस मामले से पल्ला झाड़ते दिखे तो वहीं पर कुछ नेता ऐसे भी थे जो खुलकर शेख शाहजहाँ के समर्थन में आ गए।

ममता सरकार में कैबिनेट मंत्री उदयन गुहा उन्हीं लोगों में से एक हैं। संदेशखाली में इतना सब कुछ होने के बावजूद उदयन गुहा ने कहा कि उसे (शेख शाहजहाँ को) दुष्प्रचार के जरिए फँसाया गया है। अफवाह में फँसाया गया है। वरना शेख शाहजहाँ तो कभी भी ऐसा कुछ कर ही नहीं सकता।

उन्होंने शाहजहाँ का बचाव करते हुए कहा- “मैं पक्का नहीं कह कता है कि ये शेख शाहजहाँ को किसी की साजिश है या नहीं। लेकिन उसके ऊपर जो आरोप लगे हैं वो एक गलती हैं। उसे झूठा फँसाया गया है। ऐसा तब से हो रहा है जब से ईडी अधिकारियों पर हमला हुआ है। अतीत में, हमने शेख शाहजहाँ के खिलाफ ये आरोप कभी नहीं सुने हैं।”

ये जानते हुए शेख शाहजहाँ के खिलाफ संदेशखाली की कई स्थानीय महिलाओं ने यौन उत्पीड़न तक के गंभीर इल्जाम लगाए हैं… उदयन गुहा कहते दिखते हैं- “मुझे नहीं पता था कि उसे रात के 12 बजे पीठा (महिलाओं के यौन उत्पीड़न की ओर इशाारा करते हुए) खाना पसंद है। मैं जानता था कि ऐसी हरकत करने का मन सुबह-सुबह या फिर रात को सोते समय होता है।”

संयोग से ये शब्द जिन टीएमसी मंत्री के हैं उनपर उनके ही संसदीय क्षेत्र दिनहाटा में यौन उत्पीड़न का इल्जाम लग चुका है। एक वीडियो 21 फरवरी को वायरल हुई थी। इसमें एक महिला नजर आ रही थी जिसका कहना था कि उदयन गुहा ‘पीठा’ बनवाने के नाम पर उनका यौन उत्पीड़न करते थे।

महिला ने कहा था, “लगभग 12 बजे, उदयन गुहा और उनके साथियों ने पार्टी कार्यालय में ‘पीठा’ बनाने के लिए बुलाया। लेकिन मैंने इनकार कर दिया और आधी रात को पीठा बनाने की उनकी बेतुकी बात पर सवाल उठाया। क्या वे इसलिए हमारी इज्जत नहीं करते क्योंकि हम महिला हैं?…मुझे समय-समय पर उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा है। मैंने हाथ जोड़कर विनती की, क्या वे मुझे शांति से नहीं रहने देंगे? लेकिन वे नहीं माने। कल पंचायत और बूथ अध्यक्ष आए और मुझे कल आने का निर्देश दिया। लेकिन मैंने ये कहकर मना कर दिया कि मेरी कुछ इज्जत है। मैंने हाथ जोड़कर विनती की पर उनकी प्रतिक्रिया अधिक हिंसात्मक थी।”

संदेशखाली के हाल

बता दें कि बंगाल के संदेशखाली में 8 फरवरी 2024 को महिलाएँ हाथ में डंडा-झाड़ू लेकर टीएमसी के नेता शेख शाहजहाँ और उसके साथियों का विरोध करने सड़क पर उतरीं थीं। इसी दौरान उन्होंने वो चौंकाने वाले खुलासे किए थे जिसे सुन पूरा देश सन्न था।

ऐसे समय में ये मुद्दा मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में प्रमुखता से उठा। नतीजा ये हुआ कि देर ही सही लेकिन संदेशखाली की महिलाओं के अनुसार जो प्रशासन उनकी सुन नहीं रहा था उसी ने टीएमसी नेता के करीबियों को पकड़ना शुरू किया।

पहले शेख के करीबी शिबू हाजरा, उत्तम सरदार, अजीत मैती गिरफ्तार हुए। उसके बाद हाईकोर्ट की फटकार के बाद 29 फरवरी को शेख शाहजहाँ भी पकड़ लिया गया। कोर्ट ने उसे 10 दिन पुलिस हिरासत में भेजा है। वहीं टीएमसी ने उसे 6 साल के लिए निलंबित कर दिया है।

उसपर 5 जनवरी 2024 को ईडी की टीम पर हमला करवाने का भी आरोप है। पुलिस ने उसे इसी मामले में पकड़ा है। यौन उत्पीड़न के मामले में तो कहा गया कि जाँच के बाद कोई कार्रवाई होगी।

JNU में फिर भिड़े लेफ्ट और ABVP के छात्र: डंडा, साइकिल, धारदार हथियार सब चले; 1 माह में दूसरी झड़प

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के कैंपस में एक बार फिर से लेफ्ट छात्रों में और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों में झड़प का मामला सामने आया है। घटना स्कूल ऑफ लैंग्वेज के पास की है। दोनों पक्षों में झड़प चुनावी कमेटी के सदस्यों को चुनने को लेकर हुई। घायल छात्रों को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती करवाया गया है।

कुछ वीडियोज भी सामने आई हैं जिसमें अराजक तत्व कहीं डंडा लेकर दूसरों को पीट रहे हैं तो कहीं दूसरे के ऊपर साइकिल उठाकर फेंक रहे हैं। इसके अलावा कुछ छात्रों को भीड़ द्वारा घेरकर मारा जा रहा है जिन्हें सिक्योरिटी गार्ड बचाता दिखाई दे रहा है।

दोनों संगठनों के छात्रों ने एक दूसरे के विरुद्ध शिकायत दी है। पुलिस ने बताया है कि उन्हें दोनों तरफ से शिकायत मिली है वो इस मामले में जाँच कर रहे हैं। तीन लोग घायल हुए हैं।

विश्वविद्यालय की ओर से इस मामले में कोई बयान नहीं आया है लेकिन इस झड़प की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। इसमें भीड़ में दोनों गुटों के सदस्यों को एक साथ भिड़ते देखा जा सकता है। एक शख्स इधर से उधर साइकिलें फेंक रहा है।

लेफ्ट सदस्यों का कहना है कि एबीवीपी के लोगों ने उनके ‘कॉमरेडों’ पर बुरी तरह हमला किया जिसकी वजह से वह बुरी तरह घायल हुए।

एबीवीपी वालों का कहना है कि जो छात्र स्कूल ऑफ लैंग्वेज में जनरल बॉडी मीटिंग अटेंड करने आए थे, उनपर लेफ्ट के गुंडों ने धारदार हथियार से वार किया। सिर्फ इसलिए क्योंकि वो चुनाव को निष्पक्ष ढंग से होता देखना चाहते थे। एबीवीपी के ट्वीट के मुताबिक कई छात्रों के चेहरे पर गहरी चोटें भी आई हैं।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार एबीवीपी के जेएनयू अध्य उमेश चंद्र अजमीरा ने कहा,”वाममपंथी छात्र चुनाव प्रक्रिया में धांधली करने का प्रयास कर रहे थे। स्कूल ऑफ लैंग्वेज के छात्रों ने आपत्ति जताई…पूरी प्रक्रिया 3-4 घंटे से अधिक समय तक रुकी रही…जब आधे घंटे बाद प्रक्रिया दोबारा शुरू हुई, तो आइशी घोष (जेएनयू अध्यक्ष) ने चार कम्युनिस्ट नामों की घोषणा की और कहा कि वे निर्वाचित हो गए हैं। कार्यकर्ताओं ने नाम उजागर करने और चयन प्रक्रिया की माँग की।”

उन्होंने आगे बताया, “इस दौरान दानिश (एआईएसएफ सदस्य) ने कहा कि चार नहीं बल्कि दो ही पुराने सदस्यों को दोबारा चुना गया है। आइशी और दानिश ने विरोधाभासी बातें कहीं जिसे सुन छात्र आपत्तियाँ उठा रहे थे…नामों का खुलासा करने को कहा जा रहा था और उन नामों को वापस लेने और स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रक्रिया के माध्यम से चयन करने की माँग की जा रही थी। इसी बीच वामपंथी छात्रों ने धक्का-मुक्की शुरू कर दी और ‘डफली’ को हथियार बनाकर छात्रों पर हमला कर दिया…200 से ज्यादा वामपंथी छात्रों ने वहाँ मौजूद 4-5 कार्यकर्ताओं पर हमला कर दिया…यह कोई नई बात नहीं है।

9 फरवरी को भी हुआ था हमला

बता दें कि इससे पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में 9 फरवरी 2024 को देर रात 2 छात्र संगठन (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और लेफ्ट ग्रुप) के सदस्यों के बीच मारपीट होने की खबर सामने आई थी। इस झगड़े में कुछ छात्र घायल हुए थे जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। घायलों का इलाज दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में हुआ था।

उस समय भी मुद्दा जनरल बॉडी मीटिंग पर चल रही मीटिंग पर हुआ था। एबीवीपी छात्रों का कहना था कि लेफ्ट संगठनों ने उनके कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट की, तो लेफ्ट के छात्रों का कहना था कि एबीवीपी के छात्रों ने चुनाव प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास किया। कुछ वीडियो सामने आई थी जिसमें एबीवीपी के छात्र दावा कर रहे थे कि लेफ्ट वालों ने उन्हें धारदार हथियार और अपनी स्टील की बनी ढपलियों से मारा।

वहीं, जेएनयू के AISA संगठन ने आरोप लगाया था कि एबीवीपी ने यूजीबीएम (जनरल बॉडी मीटिंग) को बाधित किया और उन्होंने जेएनयूएसयू के अध्यक्ष और अन्य लोगों के साथ हाथापाई की। साथ ही साउंड सिस्टम भी तोड़ दिया।

2 से ज्यादा बच्चे होने पर नहीं मिलेगी सरकारी नौकरी… SC ने माना नियम बिलकुल सही: खारिज की राजस्थान के पूर्व सैनिक की याचिका

किसी व्यक्ति को दो से ज्यादा बच्चे होने के कारण सरकारी नौकरी न देना कहीं से संविधान के खिलाफ नहीं है। ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के एक मामले में आदेश देते हुए कहा है। कोर्ट ने कहा कि ये नियम पॉलिसी दायरे में आता है, इसमें उन्हें हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है।

इस आदेश के साथ कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने पूर्व सैनिक रामजी लाल जाट की याचिका को खारिज किया। साथ ही राजस्थान हाई कोर्ट के निर्णय को बरकरार रखा। हाईकोर्ट में इस मामले पर निर्णय 12 अक्टूबर 2022 को आया था।

बता दें कि इस मामले पर याचिका पूर्व सैनिक रामजी लाल जाट ने डाली थी। वह 2017 में रिटायर हुए थे और उन्होंने 2018 में राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल की नौकरी के लिए आवेदन किया था। हालाँकि दो बच्चे से ज्यादा होने के कारण उनका आवेदन खारिज हो गया।

उनके आवेदन को राजस्थान पुलिस अधीनस्थ सेवा नियम 1989 के नियम 24(4) का हवाला देते हुए खारिज कर दिया गया था। ये नियम, 1 जून 2002 के बाद पैदा हुए दो से अधिक बच्चे वाले व्यक्ति को नौकरी देने से रोकता है।

नौकरी न मिलने पर रामजी लाल जाट ने इसी नियम के खिलाफ तर्क देते हुए पहले राजस्थान हाई कोर्ट में अपनी याचिका लगाई और फिर सुप्रीम कोर्ट में। हालाँकि दोनों ओर से उन्हें निराशा ही हाथ लगी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करने का फैसला बरकरार रखते हुए बताया कि ऐसा नियम पंचायत चुनाव लड़ने की योग्यता के तौर पर भी पेश किया गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा।

अदालत ने तब माना था कि दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित करने का प्रावधान कोई भेदभावपूर्ण और संविधान के दायरे से बाहर नहीं है। ये परिवार नियोजन को बढ़ावा देने वाला प्रावधान है।

कोर्ट ने कहा कि उन्हें इस मामले में ऐसा कुछ नहीं दिखता कि वो राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करें इसलिए यह याचिका खारिज की जाती है। दो बच्चे होने पर सरकारी नौकरी न देना संविधान के दायरे में है।

मजहबी कट्टरता पर NBDSA की मुहर, लव जिहाद-रामनवमी हिंसा की रिपोर्टिंग खटकी: ‘आज तक’ से सुधीर चौधरी के शो का वीडियो हटाने को कहा

समाचार ब्रॉडकास्टर्स एंड डिजिटल स्टैंडर्ड एसोसिएशन (NBDSA) ने देश के तीन प्रमुख न्यूज चैनलों पर कार्रवाई की है। इसके तहत टाइम्स नाउ नवभारत और न्यूज 18 इंडिया पर जुर्माना लगाते हुए ‘लव जिहाद’ से जुड़े एक शो का वीडियो हटाने को कहा है। वहीं आज तक को रामनवमी पर हुई हिंसा पर आधारित सुधीर चौधरी के एक शो का वीडियो सभी प्लेटफॉर्म से हटाने को कहा है।

2023 में रामनवमी पर देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई हिंसा पर आधारित सुधीर चौधरी के शो को लेकर NBDSA का मानना है कि यह एक विशेष समुदाय को निशाना बनाती है। न्यूज चैनल को भेजे नोटिस में कहा गया है कि कुछेक ‘उपद्रवी घटनाओं’ को सांप्रदायिक हिंसा से जोड़कर इस शो में समुदाय विशेष को निशाना बनाया गया है। चैनल को भविष्य में सावधानी बरतने की चेतावनी भी दी गई है।

यह नोटिस एक्स/ट्विटर यूजर इंद्रजीत घोरपड़े (@jeetxg) की शिकायत के आधार पर जारी किया गया है। इसमें वीडियो को हटाकर सात दिनों के भीतर इसकी जानकारी देने को कहा गया है। शो के दौरान कही गई कुछ बातों का हवाला देकर नोटिस में कहा गया है कि एंकर (सुधीर चौधरी) ने इसे बिल्कुल ‘अलग रंग’ देने का काम किया है।

गौरतलब है कि रामनवमी पर हुई हिंसा हिंदू घृणा और मुस्लिमों की मजहबी कट्टरता की उपज थी। इस्लामी कट्टरपंथी अक्सर यह दावा करते हैं कि मुस्लिम बहुल इलाकों से हिंदुओं का जुलूस निकालना भड़काऊ है। NBDSA की कार्रवाई इसी मजहबी असहिष्णुता पर सवाल उठाने को लेकर की गई है। यह गौर करने वाली बात है कि यदि हिंदू बहुल इलाके से इसी तरह मुस्लिमों के जुलूसों को गुजरने पर निशाना बनाया जाता तो उसे ‘कुछ उपद्रवियों की हिंसा’ की जगह ‘हिंदुओं की असहिष्णुता’ के तौर पर पेश किया जाता है।

रामनवमी पर हुई हिंसा का बचाव करने के लिए जिस तर्क का इस्तेमाल किया गया है, ठीक यही तर्क मजहबी आधार पर भारत के विभाजन के लिए इस्तेमाल हुआ था। मुस्लिम समुदाय और उनके नुमाइंदों ने तब दावा किया था इस्लाम की अपनी अलग रवायतें हैं और वे हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते। इसलिए उन्हें अलग देश दिया जाना चाहिए जो इस्लामी वसूलों पर चले। ऐसे में मजहबी असहिष्णुता और हिंदू घृणा के कारण अंजाम दी गई हिंसा पर सवाल उठाने को लेकर मीडिया चैनल को दंडित करना एक तरह से उन्हीं मजहबी दावों का समर्थन है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ था।

चाहे इस्लामवादी हों या लेफ्ट-लिबरल, वे अक्सर ‘मुस्लिम क्षेत्र’ जुमले का इस्तेमाल करते हैं। कई विपक्षी नेता भी मुस्लिम क्षेत्रों से हिंदुओं के जुलूस पर सवाल उठाते हैं। सुधीर चौधरी ने अपने शो में किसी इलाके के इसी तरह के वर्गीकरण पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि जब हम जनसंख्या के आधार पर किसी इलाके को हिंदू, सिख, जैन, पारसी या ईसाई क्षेत्र के तौर पर वर्गीकृत नहीं करते तो फिर किसी खास जगह को ‘मुस्लिम इलाका’ क्यों घोषित कर दिया जाता है। उन्होंने 2011 की जनगणना का हवाला देते हुए बताया था कि भारत की 81% आबादी हिंदू है। केवल 14% मुस्लिम हैं। उन्होंने पूछा था, “कुछ जगहों को ‘मुस्लिम इलाका’ क्यों बताया जाता है, जबकि सिख, ईसाई, हिंदू, पारसी या जैन कभी भी किसी खास जगह न तो अपना इलाका घोषित करते हैं और न ही वहाँ अन्य समुदाय को अपने धार्मिक आयोजनों से रोकते हैं।”

बता दें कि 30 मार्च 2024 को देश के अलग-अलग हिस्सों से रामनवमी शोभा यात्रा पर हमलों की सात बड़ी घटनाएँ पिछले साल सामने आई थी। इन घटनाओं के बारे में आप विस्तार से इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

टाइम्स नाउ नवभारत पर एक लाख का जुर्माना

लाइव लॉ के मुताबिक, समाचार प्रसारण और डिजिटल मानक प्राधिकरण ने टाइम्स नाउ नवभारत पर हिमांशु दीक्षित द्वारा होस्ट किए गए एक शो को लेकर कार्रवाई की है। दीक्षित ने उस शो में झारखंड के मानवी राज सिंह केस को दिखाया था और शो को नाम दिया था, ‘जिहादियों से बेटियों को बचाओ’। एनबीडीएसए ने कहा इस शो में सभी मामलों को एक जैसा बताया गया है। एनबीडीएसए का कहना है कि इस शो में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाते हुए अंतर-धार्मिक संबंधों को ‘लव जिहाद’ के तौर पर प्रचारित किया गया है। इसके लिए एनबीडीएसए ने टाइम्स नाउ नवभारत पर 1 लाख का जुर्माना लगाते हुए इस शो का वीडियो हटाने के लिए कहा है।

न्यूज18 इंडिया के खिलाफ भी कार्रवाई

एनबीडीएसए ने न्यूज18 इंडिया पर 50 हजार का जुर्माना लगाया है। एनबीडीएसए ने अमीश देवगन और अमन चोपड़ा के शो में श्रद्धा वॉकर केस को ‘लव जिहाद’ बताने पर नाराजगी जताई है और चैनल पर 50 हजार का जुर्माना ठोका है। यही नहीं, चैनल को अपने सभी प्लेटफॉर्म से इस शो से जुड़े वीडियो को हटाने के भी निर्देश दिए हैं।