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‘बांग्लादेश में तो बस एक हिंदू जला है, हम तुम सबको फूँक देंगे’: गुजरात के सानंद में इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं पर की पत्थरबाजी; OpIndia से महिलाएँ बोलीं- मुस्लिमों के कारण घर से बाहर निकलना मुश्किल

गुजरात के अहमदाबाद के कलाना गाँव में एक हिंदू परिवार पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया। पुलिस घटना की जाँच कर रही है, लेकिन मामले में बांग्लादेश से जुड़ा पहलू भी सामने आया है। पीड़ितों का कहना है कि बांग्लादेश में एक हिंदू युवक की हत्या के बाद, गाँव के एक हिंदू युवक द्वारा सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए एक पोस्ट से मुस्लिम हमलावर भड़क उठे।

यह बात तब सामने आई जब ऑपइंडिया ने पीड़ितों से मुलाकात की और उनसे बातचीत की। इस घटना में सबसे पहले जिस व्यक्ति पर हमला हुआ, वह एक हिंदू नाबालिग था। हमले में उसके पिता भी घायल हो गए। उन्होंने अस्पताल में इलाज के दौरान ऑपइंडिया से बात की।

पीड़ित के पिता ने बताया कि उनके बेटे ने बांग्लादेश में दीपू दास की हत्या के बारे में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें उसने न्याय की माँग की थी। उन्होंने आरोप लगाया कि इस पोस्ट को देखने के बाद स्थानीय मुस्लिमों ने उसे धमकी दी कि बांग्लादेश में एक हिंदू को जला दिया गया है और अगर उसने ऐसी पोस्ट डाली तो पूरे ठाकुरवास को जला दिया जाएगा।

स्थानीय हिंदू महिलाओं का आरोप: बेटियों और बहनों को लंबे समय से किया जा रहा परेशान

इसके अलावा स्थानीय महिलाओं ने आरोप लगाया है कि कुछ स्थानीय मुस्लिम पुरुष पिछले 12 महीनों से उन्हें परेशान कर रहे हैं। हिंदू महिलाओं और बेटियों को घर से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है, उनके प्रति अश्लील इशारे किए जाते हैं। हिंदुओं का आरोप है कि तिलक लगाने पर उन्हें धमकियाँ दी जा रही हैं और गाँव में कोई भी हिंदू त्योहार या उत्सव शांतिपूर्वक नहीं मनाने दिया जा रहा है।

एक अन्य महिला ने आरोप लगाया कि काम से लौटने पर उसके पति या परिवार के अन्य सदस्यों की पिटाई की जाती है। हिंदू बहनों और बेटियों के घर से बाहर निकलने पर उनसे अश्लील इशारे करवाए जाते हैं। उसने माँग की कि आरोपितों को सजा दी जाए और हिंदुओं को न्याय मिले।

अन्य महिलाएँ रोते हुए और अपनी आपबीती सुनाते हुए उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी से न्याय की माँग कर रही थीं। महिलाओं ने बताया कि वे तीन दिनों से बिना भोजन-पानी के ये सब सहन कर रही हैं और अब उन्हें न्याय चाहिए। एक अन्य महिला ने ठाकुर समाज के नेता अल्पेश ठाकुर से भी सवाल किए।

गाँव की एक हिंदू महिला ने पत्थरबाजी के बारे में बताते हुए कहा कि एक ही दिन में इतने सारे पत्थर आना संभव नहीं है और इसके लिए पहले से योजना बनाई गई होगी। उन्होंने बताया कि सुबह उठकर जब वह चाय-पानी कर रही थीं, तभी पत्थरबाजी शुरू हो गई। ऑपइंडिया ने उनके घर के दृश्य भी दिखाए हैं।

फुटेज में दिख रहा है कि पाइपों समेत घर की छत गिर गई है। घर में मौजूद महिला ने बताया कि जब वह कपड़े धो रही थी, तभी छत से पत्थर गिरने लगे। इसके अलावा जहाँ उसका बच्चा सो रहा था, वहाँ भी पत्थर गिरे। उसने बताया कि इतने ज्यादा पत्थर गिर रहे थे कि उसके घर की छत गिर गई।

पूरी घटना क्या थी?

यह पूरी घटना सोमवार (29 दिसंबर 2025) की रात को घटी। इसके बाद मंगलवार (30 दिसंबर 2025) की सुबह भी पथराव हुआ। बाद में पुलिस बल गाँव पहुँचा और तलाशी अभियान चलाया। वहीं दूसरी ओर, कार्रवाई के डर से आरोपित अपने घरों से भागकर गाँव के खेतों में छिप गए, जहाँ ड्रोन की मदद से तलाशी के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

एक नाबालिग हिंदू व्यक्ति की शिकायत पर पुलिस ने शाहरुख समेत 22 मुस्लिम व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। शिकायत के आधार पर पुलिस ने सानंद जीआईडीसी पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता की धारा 115(2), 352, 351(3), 189(2), 191(2), 190, 194(2), 324(2) और 125(ए) के तहत आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज कर आगे की जाँच शुरू की और बाद में 42 लोगों को हिरासत में लिया।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में लिंकन सोखाडिया ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

हाथ में कुरान, उमर खालिद को चिट्ठी और मोदी से घृणा: साधारण नहीं है जोहरान ममदानी का न्यूयॉर्क में मेयर बनना, समझिए इस्लामी कट्टरपंथी क्यों हैं खुश

लोकतंत्र में हर चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं होता, कई बार वह भविष्य की चेतावनी भी होता है। न्यूयॉर्क जैसे शहर का मेयर बनना केवल एक नगर निगम पद नहीं है, यह वैश्विक राजनीति की प्रयोगशाला में प्रवेश का टिकट होता है। यही वजह है कि जोहरान ममदानी का सत्ता में आना केवल अमेरिका की आंतरिक घटना नहीं रह गया, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया में राजनीतिक चिंता का विषय बन गया है।

अमेरिका के सबसे बड़े और प्रभावशाली शहर न्यूयॉर्क की मेयर की कुर्सी पर बैठते ही जोहरान क्वामे ममदानी ने ऐसा कदम उठाया है, जो न केवल विवादास्पद है, बल्कि भारत के लिए सीधी चुनौती जैसा लगता है। 1 जनवरी को शपथ लेने के ठीक अगले दिन उनका एक हैंडरिटन पत्र सामने आया, जो दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद विवादित कार्यकर्ता उमर खालिद के नाम लिखा गया था। इस पत्र ने भारत में आग की तरह फैलते गुस्से को और भड़का दिया है। कई लोग इसे ममदानी की भारत विरोधी मानसिकता का खुला प्रमाण बता रहे हैं।

जोहरान ममदानी खुद को प्रोग्रेसिव और डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट कहता है, लेकिन उसके पहले ही कदम से साफ लगता है कि उसकी प्राथमिकता में सेलेक्टेड चीजे हैं। यानी उसके मुद्दे बहुत सोच-विचार के चुने हुए हैं, खासकर जो मुस्लिम पहचान और कथित इस्लामी पीड़ितों से जुड़े हों।

ममदानी के मेयर बनने के बाद ही क्यों सामने आया उमर खालिद को लिखा पत्र?

कोई भी नया निर्वाचित नेता आम तौर पर शहर की समस्याओं से शुरुआत करता है। अपने शहर की आवास, ट्रांसपोर्ट, अपराध, शिक्षा से जुड़ी समस्या। लेकिन ममदानी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि ममदानी ने सत्ता संभालते ही भारत से जुड़े एक अत्यंत विवादित मुद्दे या यूँ समझें कि आतंकवादी को चुना। वो है दिल्ली की जेल में बंद उमर खालिद।

यह कोई संयोग नहीं था। यह एक सोचा-समझा राजनीतिक संकेत था। जोहरान ममदानी जानता था कि उमर खालिद का नाम भारत में किस तरह ध्रुवीकरण पैदा करता है। UAPA जैसे कानून, देशद्रोह के आरोप, दंगे, हिंसाये सब ऐसे विषय हैं जिन पर भारत की न्यायिक प्रक्रिया बेहद संवेदनशील है। इसके बावजूद एक अमेरिकी मेयर का इस मुद्दे पर टिप्पणी करना साफ बताता है कि उसका मकसद ‘मानवाधिकारट से ज्यादा ‘वैश्विक पहचान’ बनाना था।

यह कहानी सिर्फ वामपंथ की नहीं, बल्कि उस वैचारिक इस्लामी राजनीति की है, जो अब लोकतांत्रिक संस्थानों के भीतर घुसपैठ कर रही है।

वामपंथी या इस्लामी… ममदानी की असली पहचान क्या?

जोहरान ममदानी खुद को वामपंथी कहता है। लेकिन दुनिया जानती है कि आधुनिक वामपंथ अब केवल आर्थिक असमानता की लड़ाई नहीं रह गया। यह पहचान की राजनीति में तब्दील हो चुका है, जहाँ धर्म, जाति और नस्ल को हथियार बनाया जाता है। ऐसे में ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि अगर ममदानी सिर्फ वामपंथी है, तो उसकी संवेदनशीलता बार-बार केवल इस्लामी मुद्दों पर ही क्यों दिखती है? अगर वो मानवाधिकारों का पैरोकार है, तो चीन के उइगर, पाकिस्तान के बलूच, बांग्लादेश के हिंदुओं पर उसकी आवाज़ क्यों खामोश रहती है? यही सेलेक्टिव नैतिकता ही असली समस्या है।

कुरान हाथ में लेकर शपथ को मानें उसका राजनीतिक संदेश

अमेरिका में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर शपथ लेना कानूनी रूप से गलत नहीं है। लेकिन राजनीति में प्रतीक कभी मासूम नहीं होते। ममदानी द्वारा कुरान पर हाथ रखकर शपथ लेना सिर्फ निजी आस्था नहीं था, बल्कि वह एक सांस्कृतिक संदेश था। यह संदेश न्यूयॉर्क के मतदाताओं से ज्यादा वैश्विक इस्लामी राजनीति के लिए था कि सत्ता के केंद्रों में ‘हमारा आदमी’ पहुँच चुका है।

यही वह बिंदु है जहाँ मजहब निजी नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक हथियार बन जाता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममदानी ने हाल ही में एक पत्र लिखकर खालिद के अम्मी-अब्बू को सौंपा। पत्र में लिखा है, “प्रिय उमर, मैं अक्सर तुम्हारे कड़वाहट न अपनाने वाले शब्दों के बारे में सोचता हूँ। तुम्हारे माता-पिता से मिलकर खुशी हुई। हम सभी तुम्हारे बारे में सोच रहे हैं।”

यह छोटा पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और भारतीय मीडिया में सुर्खियाँ बटोर रहा है। सवाल यह है कि न्यूयॉर्क के मेयर को भारत के आंतरिक मामलों में इतनी दिलचस्पी क्यों? पद संभालते ही शहर की समस्याओं क्राइम, हाउसिंग, ट्रैफिक की बजाय दिल्ली जेल के एक कैदी को पत्र लिखना क्या संयोग है या सोचा-समझा प्रोपेगेंडा?

UAPA केस में मुख्य साजिशकर्ता है उमर खालिद

उमर खालिद का मामला कोई साधारण नहीं है। पूर्व जेएनयू छात्र खालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली दंगों की साजिश के लिए गिरफ्तार किया गया। उन पर यूएपीए जैसे सख्त कानून लगे, जिसमें देशद्रोह और आतंकवादी गतिविधियों के आरोप हैं। सरकार के पास सबूत हैं कि दंगे भड़काने में उनकी भूमिका थी। पाँच साल से ज्यादा जेल में हैं, ट्रायल शुरू नहीं हुआ। उनके समर्थक इसे राजनीतिक बदला बताते हैं। हालाँकि वो ऐसे व्यक्ति सैयद कासिम रसूल इलियास का बेटा है,जो प्रतिबंधित आतंकी संगठन SIMI से जुड़ा हुआ था।

भारत पर क्यों साध रहा निशाना?

भारत आज उभरती वैश्विक शक्ति है। भारत का लोकतंत्र, उसकी न्यायपालिका और उसके कानून अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी नैरेटिव के लिए असहज हैं। फिर UAPA जैसे कानून इसीलिए भी निशाने पर रहते हैं क्योंकि वे ‘पीड़ित’ और ‘अल्पसंख्यक’ की उस कहानी को तोड़ते हैं, जिसे वैश्विक मंच पर बेचा जाता है।

ऐसे में ममदानी का भारत पर फोकस इसी रणनीति का हिस्सा है। भारत को ‘असहिष्णु’ दिखाओ, उसकी संस्थाओं पर सवाल उठाओ और फिर खुद को नैतिक ऊँचाई पर खड़ा करो।

भारत और हिंदुओं को पहले भी बनाता रहा है निशाना

मेयर जोहरान ममदानी का राजनीतिक करियर उसके तीखे और विवादास्पद बयानों के कारण भी चर्चा में रहा है। वो न सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ आग उगलता रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधता रहा है। उसने पीएम मोदी को युद्ध अपराधी तक कहा था, वो भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही। वो अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘हिंदुत्व फासीवाद’ का प्रतीक बता चुका है।

न्यूयॉर्क से आगे की तैयारी?

यह मानना भोलापन होगा कि ममदानी सिर्फ मेयर बनकर संतुष्ट हो जाएगा। न्यूयॉर्क अमेरिकी राजनीति की सीढ़ी है, मंज़िल नहीं। इतिहास गवाह है कि जो न्यूयॉर्क जीतता है, वह राष्ट्रीय राजनीति की दहलीज़ पर पहुँच जाता है। आज वो भारत पर बोल रहे हैं, कल वो अमेरिका की विदेश नीति पर प्रभाव डालना चाहेगा। भले ही आज वो ‘मानवाधिकार’ की बात कर रहा है, लेकिन कल उसकी बोली इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव से अलग ही जहरीली हो चुकी होगी।

कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ममदानी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोट बैंक को मजबूत करके। अमेरिका में मुस्लिम नेता जैसे इल्हान उमर, रशीदा तलीब पहले से हैं और ममदानी उन कट्टरपंथियों का नेक्स्ट जेन वर्जन लगते हैं।

मेयर बनते ही पत्र का सामने आना कोई साधारण बात नहीं

जोहरान ममदानी का पत्र अकेला नहीं। ठीक इसी समय आठ अमेरिकी सांसदों ने भारत के राजदूत को पत्र लिखकर खालिद को बेल और निष्पक्ष ट्रायल की माँग की। ये सांसद डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव विंग से हैं, जो अक्सर भारत पर मानवाधिकार के नाम पर दबाव बनाते हैं। खालिद के पैरेंट्स की इनसे मुलाकात भी हुई थी।

ममदानी और इन सांसदों के पत्र की टाइमिंग संदेह पैदा करता है। क्या यह संयोग है कि मेयर बनते ही ममदानी ने यह कदम उठाया? विश्लेषक इसे खुद को मुस्लिम दुनिया में हीरो बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

क्या ममदानी वाकई भारत के लिए बन सकता है खतरा?

भारत के लिए तो जरूर चिंता की बात है। एक विदेशी मेयर का भारत के कानूनी मामलों में दखल खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो गंभीर आरोपों में जेल में है, विदेशी हस्तक्षेप जैसा लगता है। न्यूयॉर्क के बदलते डेमोग्राफिक्स, बढ़ते मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोटर ने उसे जिताया, लेकिन इससे अमेरिका में इस्लामी राजनीतिक ताकतें मजबूत हो रही हैं। अगर ममदानी आगे बढ़े, तो भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर पड़ सकता है।

भारत को, अमेरिका को और दुनिया को यह समझना होगा कि आज की राजनीति में सबसे खतरनाक चीज बंदूक नहीं, बल्कि नैरेटिव है। और जो नेता सत्ता में आते ही नैरेटिव युद्ध शुरू कर देता है, वह सिर्फ एक शहर का मेयर नहीं रह जाता, वह एक वैश्विक एजेंडा बन जाता है।

ऑपरेशन कगार, नक्सलवाद पर प्रहार और 50 साल का संघर्ष: जानिए 2025 में कैसे मजबूत हुई आतंरिक सुरक्षा, शाह ने लिखी लाल आतंक के खात्मे की पटकथा

जब अमित शाह ने सार्वजनिक रूप से 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद के खात्मे की समयसीमा तय की, तो यह कोई नारा या राजनीतिक दावा नहीं था। यह एक स्पष्ट डेडलाइन थी। डेडलाइन तभी तय की जाती है जब जमीन पर नतीजे साफ दिखने लगते हैं और लड़ाई जीत की ओर अंतिम चरण में पहुँच जाती है।

नक्सलवाद भारत की सबसे लंबी आंतरिक सुरक्षा चुनौती रही है, जो करीब 50 साल तक चली। कई सरकारें बदलीं, बड़े वन क्षेत्र नक्सलियों के गलियारे के नाम से जाने गए और लंबे समय तक सरकार का लक्ष्य नक्सलवाद को खत्म करने से ज्यादा उसे नियंत्रित करना रहा। पहले मुठभेड़, बातचीत और हिंसा कम करने पर जोर दिया जाता था। जीत की बात बहुत संभलकर की जाती थी। लेकिन 2025 में यह सोच पूरी तरह बदल गई।

साल 2025 सिर्फ लाल आतंकियों के साथ मुठभेड़ों की संख्या बढ़ने का साल नहीं था, बल्कि यह नक्सलवाद को व्यवस्थित तरीके से तोड़ने का साल बना। नक्सल संगठन की वरिष्ठ नेतृत्व संरचना टूट गई, उनके सुरक्षित इलाके खत्म हो गए, भर्ती तंत्र कमजोर पड़ गया और लड़ाकों का मनोबल पूरी तरह गिर गया। कई जिले नक्सल प्रभाव से बाहर आ गए। सैकड़ों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और उनके ठिकाने एक-एक कर खत्म होते चले गए।

यह सिर्फ प्रगति नहीं थी, बल्कि एक ऐसे आंदोलन का अंतिम चरण था जो कभी खुद को शोषितों की आवाज बताता था, लेकिन अब केवल डर और हिंसा के सहारे टिका हुआ था। नक्सलवाद के खात्मे का दावा कोई राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि जमीनी आँकड़ों और घटनाओं पर आधारित निष्कर्ष है, जो सभी एक ही दिशा में इशारा करते हैं।

औपचारिक घोषणा भले ही 2026 में हो, लेकिन हकीकत यह है कि 2025 में ही नक्सलवाद की हार तय हो चुकी थी। यह लड़ाई अब पलटने वाली नहीं है। नक्सलवाद लगभग खत्म हो चुका है।

2025 ने सब कुछ क्यों बदल दिया

दशकों तक भारत की नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई एक ही चक्र में घूमती रही। किसी बड़े हमले या घात के बाद सुरक्षा बलों का अभियान चलता, फिर उसके बाद बातचीत, संघर्षविराम या राजनीतिक ठहराव आ जाता। लक्ष्य नक्सलवाद को खत्म करना नहीं, बल्कि काबू में रखना था। सड़कें सुरक्षित रहें, चुनाव शांतिपूर्ण हों, जानमाल का नुकसान कम हो और हिंसा शहरों तक न पहुँचे। नक्सलवाद को एक स्थायी बीमारी की तरह देखा गया, जिसे पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता। यह सोच 2025 में निर्णायक रूप से टूट गई।

2025 में बदलाव सिर्फ कार्रवाई की तीव्रता का नहीं था, बल्कि इरादे का था। सरकार ने नक्सलवाद को अब इलाके संभालने की समस्या नहीं माना, बल्कि एक ऐसे संगठन के रूप में देखा जिसे जड़ से खत्म करना है। प्रतीकात्मक मौजूदगी की जगह लगातार और स्थायी नियंत्रण पर जोर दिया गया। कुछ दिनों या हफ्तों के लिए नहीं, बल्कि महीनों तक। जो जंगल पहले माओवादी ठिकाने माने जाते थे, वहाँ अब सिर्फ छापे नहीं पड़े, बल्कि उन्हें घेरा गया, नक्शे बनाए गए और स्थायी रूप से कब्जे में लिया गया।

इस दौर में दुविधा की कोई जगह नहीं छोड़ी गई। न संघर्षविराम का दिखावा किया गया और न ही अभियानों के साथ-साथ समानांतर बातचीत चलाई गई। सुरक्षा तंत्र का संदेश साफ था। अब यह दौर जगह देने या बातचीत करने का नहीं, बल्कि पूरी जगह छीन लेने का है।

इस स्पष्टता का सीधा असर जमीन पर दिखा। स्थानीय लोगों को लगा कि सुरक्षा बल अस्थायी नहीं, बल्कि स्थायी रूप से आए हैं, जिससे खुफिया जानकारी की गुणवत्ता बेहतर हुई। नक्सली लड़ाकों को समझ आने लगा कि पहले की तरह भाग निकलने के रास्ते अब बंद हो चुके हैं।

शीर्ष नेतृत्व और जमीनी कैडर के बीच दूरी बढ़ती गई। नक्सल आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत समय का इंतजार करने की क्षमता अब उसके खिलाफ काम करने लगी। पहले नक्सलवाद सरकारों के बदलने का इंतजार कर के बचा रहता था। लेकिन 2025 में उसे एक ऐसी ताकत से टकराना पड़ा जो न रुक रही थी, न इंतजार कर रही थी, बस लगातार दबाव बनाकर उसे तोड़ती जा रही थी।

ऑपरेशन कगार और नया सुरक्षा सिद्धांत

अगर 2025 में नक्सलवाद के खिलाफ नीति बदली, तो ऑपरेशन कगार उस नीति को जमीन पर लागू करने का सबसे साफ उदाहरण बना। यह कोई एक दिन की कार्रवाई या सुर्खियाँ बटोरने वाला अभियान नहीं था। यह एक नई रणनीति का नाम बन गया लंबे समय तक चलने वाला, खुफिया जानकारी पर आधारित और बिना किसी समझौते के चलने वाला अभियान है।

ऑपरेशन कगार की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसका मकसद सिर्फ नक्सली इलाकों में घुसकर कार्रवाई करना नहीं था, बल्कि इलाके पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखना था। पहले सुरक्षा बल मुठभेड़ के बाद वापस लौट जाते थे, लेकिन अब वे गहरे जंगलों में टिककर बैठते है, जहाँ पहले पहुँचना भी मुश्किल था।

नक्सलियों के संचार तंत्र को बाधित किया गया, हथियारों के भंडार बरामद हुए, उनके आने-जाने के रास्ते बंद किए गए और ठिकानों को पूरी तरह नष्ट किया गया। जंगल, जो पहले नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाने थे, अब उनके लिए बंद क्षेत्र बन गए।

इस अभियान में एक बड़ा बदलाव यह भी था कि लक्ष्य किसे बनाया गया। पहले हमलों के बाद छोटे-छोटे नक्सली दस्तों के पीछे दौड़ा जाता था, लेकिन अब ध्यान इलाका कमांडरों, ज़ोनल नेताओं और वरिष्ठ नक्सली अधिकारियों को खत्म करने पर रहा, जो पूरे संगठन को जोड़े रखते थे।

छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आसपास के इलाकों में नक्सलियों की ताकत सिर्फ संख्या में नहीं, बल्कि अनुशासन और नेतृत्व संरचना में थी। जैसे ही यह रीढ़ टूटने लगी, पूरा आंदोलन बिखरने लगा।

तालमेल इस रणनीति की एक और अहम कड़ी थी। केंद्रीय बल, राज्य पुलिस और विशेष जंगल युद्ध इकाइयाँ आपस में रीयल टाइम खुफिया जानकारी साझा करते हुए एक साथ काम कर रही थीं।

अब अभियान न तो संसाधनों की कमी से रुके और न ही राजनीतिक हिचकिचाहट से। जब तक नतीजा नहीं निकला, दबाव लगातार बनाए रखा गया। ऑपरेशन कगार इस नई हकीकत का प्रतीक बन गया कि सरकार अब नक्सली इलाकों में सिर्फ जाती नहीं है, बल्कि उन्हें वापस लेती है और वहाँ टिककर रहती है।

लीडरशिप का सिर कलम करना: माओवादियों की पूरी टॉप कमांड को तोड़ना

नक्सलवाद को निर्णायक गिरावट की ओर ले जाने वाली सबसे बड़ी वजह सिर्फ इलाकों का नुकसान नहीं था, बल्कि उसके नेतृत्व ढाँचे का व्यवस्थित सफाया था। दशकों तक माओवादी आंदोलन झटके सहता रहा, क्योंकि उसकी कमांड चेन सुरक्षित रहती थी। लड़ाके बदले जा सकते थे, लेकिन कमांडर नहीं। 2025 में यही समीकरण पलट गया।

लगातार चले अभियानों में एरिया कमेटी के सदस्य, ज़ोनल कमांडर और वरिष्ठ रणनीतिकार एक-एक कर खत्म किए जाने लगे। ये कोई नाम मात्र के चेहरे नहीं थे, बल्कि वही लोग थे जो हमलों की योजना बनाते थे, भर्ती चलाते थे, पैसों का प्रबंधन करते थे और अलग-अलग नक्सली दस्तों को जोड़कर रखते थे। जब इन दिमागों को हटाया गया, तो आंदोलन सिर्फ कमजोर नहीं हुआ, बल्कि लकवाग्रस्त हो गया। इसका असर तुरंत दिखा।

नेतृत्व या तो मारा गया या लगातार भागता रहा। नतीजा यह हुआ कि स्थानीय दस्तों के पास न दिशा बची, न आदेश। आपूर्ति की कड़ियाँ टूट गईं, खुफिया जानकारियाँ लीक होने लगीं और संगठन के भीतर अविश्वास बढ़ गया। कई इलाकों में नक्सली लड़ाके लड़ने के बजाय बिखर गए।

सबसे अहम बात यह रही कि संगठन के पास कोई भरोसेमंद दूसरी पंक्ति तैयार नहीं थी। पुराना नेतृत्व उम्रदराज़ हो चुका था और नए भर्ती न तो वैचारिक रूप से मज़बूत थे, न ही उनके पास जमीनी लड़ाई का अधिकार या अनुभव था। नतीजतन, जो बचा वह हथियारों से लैस लेकिन नेतृत्वहीन संगठन था।

भीड़ के बजाय कमांड ढाँचे को निशाना बनाकर, सरकार ने वह कर दिखाया जो दशकों की मुठभेड़ें नहीं कर पाईं। उसने माओवादियों की एक संगठित आंदोलन के रूप में काम करने की क्षमता ही तोड़ दी। यही वजह है कि 2025 के बाद नक्सलवाद सिर्फ पीछे नहीं हटा, बल्कि अपने आप बिखरने लगा।

सैकड़ों की संख्या में सरेंडर, सरकार का संदेश: हथियार डालो या मरो

मुठभेड़ें दबाव दिखाती हैं, लेकिन आत्मसमर्पण टूटन का संकेत होता है। 2025 में नक्सलियों के आत्मसमर्पण की संख्या किसी भी गोलीबारी से ज्यादा बोलती दिखी। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आसपास के इलाकों में सैकड़ों नक्सली कैडरों ने हथियार डाल दिए, जिनमें इनामी कमांडर और वरिष्ठ नक्सली नेता भी शामिल थे, जो वर्षों से संगठन के भीतर सक्रिय थे।

ये लोग कोई बाहरी समर्थक नहीं थे, बल्कि प्रशिक्षित लड़ाके और संगठनकर्ता थे, जो आत्मसमर्पण के जोखिमों को अच्छी तरह समझते थे। उन्होंने एक मुठभेड़ के डर से नहीं, बल्कि इसलिए हथियार डाले क्योंकि नेतृत्व खत्म हो चुका था, जंगलों के सुरक्षित ठिकाने टूट चुके थे और भागने के रास्ते बंद हो गए थे। आत्मसमर्पण अब एक वास्तविक और सुरक्षित रास्ता बन चुका था।

सरकार की पुनर्वास नीतियों और सुरक्षा की गारंटी ने यह साफ कर दिया कि हथियार डालना अब कोई जाल नहीं, बल्कि नई जिंदगी की शुरुआत है। सच्चाई यह है कि कोई विद्रोह सिर्फ इसलिए खत्म नहीं होता कि वह हथियारों में कमजोर पड़ गया हो। वह तब खत्म होता है, जब उसके अपने लड़ाके लड़ाई को बेकार मानने लगते हैं। 2025 में नक्सलवाद का यही मोड़ सामने आया, जब उसके अपने कैडर ही इस लड़ाई से मुंह मोड़ने लगे।

सीजफायर का शोर और सरकार ने इसे नजरअंदाज क्यों किया

जैसे-जैसे दबाव बढ़ा और माओवादी ढाँचा टूटने लगा, वैसे-वैसे संघर्षविराम की माँगें तेज होने लगीं। इन अपीलों को वामपंथी सोच वाले कुछ कार्यकर्ताओं और सिविल सोसायटी के हिस्सों ने आगे बढ़ाया, जो लंबे समय से बातचीत की वकालत करते रहे हैं। लेकिन यह कोई वास्तविक शांति पहल नहीं थी, बल्कि कमजोर पड़ चुके नक्सल आंदोलन की दबाव बनाने की रणनीति थी।

इतिहास गवाह है कि संघर्षविराम का फायदा माओवादी संगठन अक्सर फिर से संगठित होने, हथियार जुटाने और अपनी पकड़ लौटाने के लिए करते रहे हैं। इस बार सरकार ने किसी भी तरह के रोक लगाने से इनकार कर दिया, जो उसके आत्मविश्वास को दिखाता है।

बातचीत समस्या के समाधान का साधन हो सकती है, लेकिन टूटते हुए आंदोलनों को बचाने का जरिया नहीं। संघर्षविराम की माँग ठुकराकर सरकार ने साफ संदेश दिया कि यह दौर नक्सलवाद के पतन को संभालने का नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह खत्म करने का है।

2026 में औपचारिक घोषणा होगी, युद्ध खत्म हो जाएगा

मार्च 2026 में जब सरकार आधिकारिक रूप से नक्सलवाद के अंत की घोषणा करेगी, तो वह असल जीत का नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक औपचारिकता होगी। निर्णायक बदलाव पहले ही हो चुका है। 2025 तक नक्सल आंदोलन अपना नेतृत्व, इलाकाई पकड़, भर्ती क्षमता और वैचारिक ताकत, ये चारों स्तंभ खो चुका था, जिनके सहारे ऐसे आंदोलन टिके रहते हैं।

अब जो बचा है, वह कोई संगठित ताकत नहीं, बल्कि बिखरे हुए अवशेष हैं। कभी एक सतत नक्सली क्षेत्र माने जाने वाला रेड कॉरिडोर अब अस्तित्व में नहीं है। जो जंगल पहले नक्सलियों के सुरक्षित ठिकाने थे, वहाँ अब लगातार सुरक्षा बलों की मौजूदगी है। क्रांति की अनिवार्यता का माओवादी दावा अपनी ही अप्रासंगिकता के बोझ तले ढह चुका है।

इसका मतलब यह नहीं कि बंदूकों के शांत होते ही काम खत्म हो जाता है। हिंसा से बाहर आए इलाकों में सुशासन, विकास और लंबे समय तक राजनीतिक जुड़ाव जरूरी होता है। हिंसा से पैदा हुआ खालीपन अगर स्थायी रूप से और साफ तौर पर राज्य द्वारा नहीं भरा गया, तो हालात दोबारा बिगड़ सकते हैं।

लेकिन एक निष्कर्ष अब साफ है और उस पर सवाल उठाना मुश्किल है, भारत नक्सलवाद के सिर्फ पतन को नहीं, बल्कि उसके पूर्ण समापन को देख चुका है। घोषणा भले 2026 में हो, लेकिन हर मायने में नक्सलवाद का अंत 2025 में ही हो गया था।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी टीम के ध्रुव मिश्रा की है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

GROK इस लड़की को बिन कपड़े के दिखाओ… X पर खुलेआम एलन मस्क के ‘स्पाइसी AI’ से की जा रही ऐसी डिमांड: महिलाओं की निजता और सुरक्षा को लेकर उठे कई सवाल

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक बेहद परेशान करने वाला ट्रेंड सामने आया है। लोग महिलाओं की सामान्य तस्वीरों पर xAI द्वारा बनाए गए एलन मस्क के AI चैटबॉट Grok को टैग करके उनसे महिलाओं के कपड़े बदलने, उन्हें बिकिनी पहनाने या और ज्यादा बोल्ड और अश्लील दिखाने को कह रहे हैं।

मई 2025 से Grok के लिए जानबूझकर नियम काफी ढीले रखे गए हैं। अब जब ऐसे अनुरोध बड़ी संख्या में आ रहे हैं, तो यह चैटबॉट बिना झिझक तस्वीरें एडिट करके महिलाओं को सेक्सुअल तरीके से प्रस्तुत कर रहा है। सबसे खतरनाक बात यह है कि ये AI से बदली गई तस्वीरें बिल्कुल असली जैसी दिखती हैं।

सीधे तौर पर कहें तो अजनबी लोग महिलाओं की तस्वीरें, जो अक्सर बिल्कुल सामान्य और गैर-यौन संदर्भ (non-sexual context) में शेयर की गई होती हैं, उसे उठा रहे हैं और सबके सामने एक AI से उन्हें ‘नंगा’ करने को कह रहे हैं।

Grok ऐसी तस्वीरें बनाकर जवाब दे रहा है, जिनमें महिलाएँ बिकिनी या इसी तरह के कपड़ों में दिखाई देती हैं। हैरानी की बात यह है कि अगर कोई यूजर महिला की पोज को भी वासना से भरा हुआ बनाने को कहता है, तो Grok वह भी कर देता है।

इसका असर तुरंत और साफ दिख रहा है। X पर Grok के रिप्लाई सेक्शन में ऐसे गैर-सहमति से बदले गए फोटो की भरमार हो गई है, जिससे भारी नाराजगी फैल रही है। दिलचस्प बात यह है कि Grok के X अकाउंट का मीडिया टैब बंद कर दिया गया है, लेकिन अगर कोई रिप्लाई सेक्शन में जाए, तो वहाँ अब भी ऐसी तस्वीरें भरी पड़ी हैं।

आमतौर पर AI चैटबॉट निजी माहौल में काम करते हैं। OpenAI का ChatGPT भी कुछ हद तक ऐसी इमेज बनाने की क्षमता रखता है, लेकिन वह सब निजी चैट तक सीमित रहता है। Grok यह सब खुलेआम, सबके सामने कर रहा है।

जो कंटेंट बाकी जगहों पर ब्लॉक हो जाता है या निजी चैट तक सीमित रहता है, वह यहाँ सार्वजनिक रूप से दिख रहा है। इससे अपमान, शर्मिंदगी और नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। जब OpIndia ने खुद Grok से पूछा कि यह सब क्यों हो रहा है, तो Grok ने जवाब दिया कि एलन मस्क ने उसे जानबूझकर ‘स्पाइसी’ AI के रूप में पेश किया है, जिसमें बाकी AI की तुलना में कम पाबंदियाँ हैं।

ग्रोक का ऑपइंडिया को दिया गया जवाब

मस्क खुद कह चुके हैं कि Grok उन सवालों के जवाब देगा, जिनसे दूसरे AI बचते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि Grok हर सीमा को धकेल रहा है और लापरवाह बन गया है। भले ही वह पूरी नग्नता से इनकार करता हो, लेकिन गैर-सहमति वाले सेक्सुअल कंटेंट की बिल्कुल सीमा तक पहुँच जाता है। कुछ यूजर्स का तो यह भी दावा है कि थोड़ी चालाकी से नग्नता की रोक भी पार की जा सकती है।

Grok का यह रवैया Google के Gemini या OpenAI के ChatGPT से बिल्कुल अलग है। ये दोनों बेहद लोकप्रिय AI हैं और निजी आउटपुट में भी सख्त फिल्टर लगाते हैं। कहीं अगर गलती हो भी जाए, तो उसका दायरा सीमित रहता है। Grok के मामले में नुकसान इसलिए ज्यादा है क्योंकि इसका आउटपुट सार्वजनिक होता है।

यह भी देखा गया है कि Grok की टाइमलाइन लगभग पूरी तरह महिलाओं को डिजिटल तरीके से ज्यादा बोल्ड बनाने वाली तस्वीरों से भरी रहती है। जो एक सामान्य AI टूल होना चाहिए था, वह voyeurism (ताक-झाँक) की सार्वजनिक गैलरी बन गया है।

नैतिक प्रभाव, महिलाओं की सहमति और गरिमा

यह ट्रेंड सहमति, स्वायत्तता और गरिमा जैसे बुनियादी नैतिक मूल्यों पर सीधा हमला है। महिलाओं की तस्वीरें उनकी अनुमति के बिना बदली जा रही हैं और उन्हें बिकिनी में दिखाया जा रहा है। यह AI का कोई अच्छा प्रयोग नहीं है, बल्कि निजता का खुला उल्लंघन है।

इस तरह की हरकतें महिलाओं की डिजिटल स्वायत्तता छीन लेती हैं और उन्हें मनोरंजन, ट्रोलिंग या उत्पीड़न का सामान बना देती हैं। यह image-based sexual abuse है, जिसे आज गंभीर मानसिक आघात देने वाला उत्पीड़न माना जाता है।

एक कानूनी विशेषज्ञ के शब्दों में, यह गलती से हुआ महिला-विरोध नहीं है, बल्कि डिजाइन से किया गया है। Grok की ढीली और उकसाने वाली सोच इस तरह के दुरुपयोग को आसान बनाती है और उसे सार्वजनिक मंच देकर और बढ़ावा देती है।

डिजिटल सहमति को भी असली दुनिया की सहमति जितना ही गंभीर माना जाना चाहिए। ऑनलाइन शेयर की गई तस्वीर किसी को उसे सेक्सुअल रूप से बदलने की इजाजत नहीं देती। बिना अनुमति किसी सामान्य फोटो को सेक्सुअल फोटो में बदलना डीपफेक पोर्न और मॉर्फिंग जैसे अपराधों जैसा ही है।

इसका नुकसान केवल सैद्धांतिक नहीं है। पीड़ित महिलाओं को शर्मिंदगी, बदनामी, डर और मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि कई महिलाएँ यह सब देखकर ऑनलाइन फोटो डालना ही बंद कर रही हैं, जो महिलाओं की डिजिटल मौजूदगी पर डर का साया डाल देता है।

इसका सांस्कृतिक नुकसान भी है। अगर इसे रोका नहीं गया, तो यह और खतरनाक डीपफेक, ब्लैकमेल और रिवेंज पोर्न तक पहुँच सकता है। Grok द्वारा इस व्यवहार को ‘मजेदार’ बताना इसकी असलियत को छिपाता है। यह बड़े पैमाने पर गैर-सहमति से किया गया यौन शोषण है, जो डिजाइन संबंधी विकल्पों के कारण संभव हुआ है और सार्वजनिक वितरण द्वारा और भी बढ़ गया है।

भारत में कानूनी पहलू और डिजिटल अधिकार

भारत में कानून के लिहाज से देखें तो किसी महिला की फोटो को बिना अनुमति सेक्सुअल इमेज में बदलना केवल अनैतिक ही नहीं, बल्कि गैरकानूनी भी हो सकता है। भले ही कानून में डीपफेक शब्द साफ तौर पर न लिखा हो, लेकिन कई धाराएँ ऐसे कृत्यों को कवर करती हैं।

आईटी एक्ट की धारा 66E निजता के उल्लंघन को दंडित करती है। भले ही बिकिनी को नग्नता न माना जाए, लेकिन AI से बनाई गई ऐसी तस्वीरें महिला की निजता और गरिमा पर हमला करती हैं। IPC की धारा 354D साइबर स्टॉकिंग से जुड़ी है। अगर किसी महिला को बार-बार इस तरह टारगेट किया जाए या उसकी बदली हुई तस्वीरें फैलायी जाएँ, तो यह ऑनलाइन उत्पीड़न माना जा सकता है।

IT एक्ट की धारा 67 और 67A अश्लील कंटेंट फैलाने पर रोक लगाती हैं। अगर AI आउटपुट ज्यादा अश्लील हो जाता है, तो उसे शेयर करने वाले जिम्मेदार हो सकते हैं। धारा 509, मानहानि के कानून और महिलाओं का अशोभनीय चित्रण निषेध अधिनियम भी लागू हो सकते हैं।

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 के तहत फोटो व्यक्तिगत डेटा है और बिना सहमति उसका इस्तेमाल कानून के खिलाफ है। IT रूल्स 2021 के अनुसार, प्लेटफॉर्म को ऐसे कंटेंट पर तुरंत कार्रवाई करनी होती है।

भारतीय अदालतें भी अब डीपफेक जैसे मामलों को गंभीरता से ले रही हैं। कई हस्तियों को AI से बने फर्जी कंटेंट के खिलाफ राहत मिली है। अदालतें साफ कह चुकी हैं कि बिना अनुमति किसी की तस्वीर या पहचान का इस्तेमाल उसकी गरिमा और निजता का उल्लंघन है।

पीड़ित महिलाओं के पास क्या हैं विकल्प

अगर किसी भारतीय महिला की तस्वीर का इस तरह दुरुपयोग होता है, तो उसके पास रास्ते मौजूद हैं। सबसे पहले सबूत इकट्ठा करें, जैसे स्क्रीनशॉट, लिंक, यूजरनेम और समय। X पर रिपोर्ट करें और साफ लिखें कि तस्वीर बिना सहमति बदली गई है।

स्थानीय साइबर क्राइम सेल या पुलिस में शिकायत दर्ज कराएँ। राष्ट्रीय साइबर क्राइम पोर्टल और राष्ट्रीय महिला आयोग से भी संपर्क किया जा सकता है। साइबर सुरक्षा एनजीओ या कानूनी सहायता संस्थाओं से मदद लें। दोष खुद पर न लें, गलती तकनीक का दुरुपयोग करने वालों की है। जरूरत पड़े तो कोर्ट से आदेश लेकर कंटेंट हटवाया जा सकता है।

यह पूरा मामला जवाबदेही, सख्त मॉडरेशन और सोच में बदलाव की माँग करता है। Reddit जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही गैर-सहमति वाले पोर्न और डीपफेक पर रोक लगा चुके हैं। पुराने ट्विटर में भी ऐसी नीतियाँ थीं। आज का X, इसके उलट, ऐसा AI होस्ट कर रहा है जो यही सब पैदा कर रहा है।

xAI और X को तुरंत सख्त नियम लागू करने होंगे। ‘एजि’ या ‘बोल्ड’ होने के नाम पर सहमति तोड़ने की कोई नैतिक या तकनीकी वजह नहीं हो सकती। अगर बाकी AI किसी की तस्वीर बिना अनुमति बदलने से इनकार कर सकते हैं, तो Grok भी कर सकता है। प्लेटफॉर्म स्तर पर भी साफ रिपोर्टिंग, तेज कार्रवाई और बार-बार गलती करने वालों पर बैन जरूरी है।

इसके साथ-साथ सोच में बदलाव भी जरूरी है। महिलाओं को डिजिटल तरीके से उतारने की उत्सुकता समाज की गहरी समस्या दिखाती है। डिजिटल सहमति पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए। सिर्फ इसलिए कि AI कुछ कर सकता है, इसका मतलब यह नहीं कि उसे बिना जिम्मेदारी इस्तेमाल किया जाए। xAI को तो कदम उठाने ही होंगे, लेकिन यूजर्स को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

BJP के बढ़ते कदम और INDI गठबंधन में डर: जानिए 2026 में होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में किसकी होगी असली परीक्षा, TMC से लेकर DMK की साख है दांव पर

भारत में 2026 का साल सियासी नजरिए से काफी अहम है। इस दौरान देश के 4 प्रमुख राज्यों और 1 केन्द्र शासित प्रदेश पुद्दुचेरी में चुनाव होने वाले हैं। इसके अलावा यूपी में स्थानीय निकाय चुनाव भी होने वाला है, जो 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए काफी अहम है। जहाँ चुनाव होने हैं, उनमें पूर्व में पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर का असम, दक्षिण के तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी शामिल है।

विपक्ष की साख दांव पर

इनमें से तीन राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में विपक्षी INDI गठबंधन की सरकार है। असम और पुद्दचेरी में एनडीए सरकार है। इस लिहाज से देखा जाए तो 2026 का चुनाव विपक्ष के लिए काफी अहम है। उनकी साख दांव पर है। क्योंकि ये राज्य राजनीतिक ताकत, मनोवैज्ञानिक बढ़त और 2029 की राष्ट्रीय रणनीति—तीनों को तय करने वाला है। ये चुनाव तय करेगा कि विपक्ष की 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति क्या होगी। इन तीन राज्यों में बीजेपी कभी सत्ता में नहीं रही। इसलिए बीजेपी के पास खोने के लिए इन राज्यों में कुछ भी नहीं है।

ममता की ‘एकला चलो रे’ की नीति

पहले बात करते हैं पश्चिम बंगाल की। पिछले 15 सालों से लेफ्ट को सत्ता से हटा कर सत्तासीन हुई ममता बनर्जी की टीएमसी यूँ तो इंडी गठबंधन का हिस्सा है, जिसमें कॉन्ग्रेस और लेफ्ट दोनों पार्टियाँ हैं। लेकिन, बंगाल में ममता बनर्जी न तो कॉन्ग्रेस को उभरने देना चाहती है और न ही लेफ्ट की बैसाखी पर चलना चाहती है। वह अपने दम पर चुनाव जीतना चाहती हैं। इसलिए पिछले चुनाव में भी ‘एकला चलो रे’ की नीति का अनुसरण करते हुए आगे बढ़ रही है।

चुनाव जीतने के लिए नित योजनाओं की घोषणा हो रही है। एसआईआर का विरोध कर चुनाव आयोग को कटघरे में खड़े करने की कोशिश हो रही है। इसके अलावा बंगाली अस्मिता का सवाल उठा कर लोगों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है। बंगाल में अगर तृणमूल कांग्रेस जीत जाती है तो INDI गठबंधन में उसकी स्थिति मजबूत हो जाएगी।

आगामी लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को झुका कर ममता बनर्जी दिल्ली का रास्ता तय करने की कोशिश कर सकती हैं। वह राज्य की जिम्मेदारी अपने भतीजे अभिषक बनर्जी को सौंप सकती है। ये दावा कर सकती हैं कि लगातार हार रहे विपक्ष को उन्होंने हौसला दिया है और बीजेपी के जीत के अभियान पर ब्रेक लगाया है।

वहीं बीजेपी भी अपना पूरा दमखम बंगाल में लगा रही है। बांग्लादेशी घुसपैठिया, भ्रष्टाचार, घोटाला, महिला सुरक्षा, डेमोग्राफी जैसे मुद्दे के दम पर वह हिन्दू वोटरों को एकीकृत करने की कोशिश कर रही है। साथ ही वादा कर रही है कि राज्य में अगर बीजेपी सत्ता में आई तो विकास की बयार बहेगी।

तमिलनाडु दक्षिण भारत का सबसे मजबूत भाजपा-विरोधी किला माना जाता है। तमिलनाडु में एमके स्टालिन के नेतृत्व में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके की सरकार है। कॉन्ग्रेस इसे समर्थन करती है। तमिलनाडु में जीत से इंडी गठबंधन कह सकता है कि दक्षिण भारत पूरी तरह विपक्ष के साथ है। एनडीए कहीं नहीं है। उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत की राजनीति के लिए ये निर्णायक है, यानी मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बनाने में तमिलनाडु काफी अहम है।

बंगाल- तमिलनाडु को जीतने में जुटी बीजेपी

मौजूदा भारतीय राजनीति में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विपक्ष के सबसे मजबूत गढ़ बने हुए हैं। इन दोनों गढ़ों का राजनीतिक रूप से ढहना देश में विपक्ष की आवाज के काफी कमजोर पड़ जाने का संकेत होगा। पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अब तक इन दोनों अभेद्य राजनीतिक किलों को भेदने में सफल नहीं हो सकी है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में यह जोड़ी पूरी तैयारी और उम्मीद के साथ पहली बार इन दुर्गों को फतह करने के इरादे से मैदान में उतरेगी।

तमिलनाडु में बीजेपी चुनाव दर चुनाव अपनी स्थिति मजबूत करती जा रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में, बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने राज्य की सभी 39 सीटें गंवा दी थी और DMK के नेतृत्व वाले गठबंधन ने क्लीन स्वीप किया था। हालाँकि बीजेपी का वोट शेयर बढ़ा था। लोकसभा चुनाव 2019 में यह 3.7% से बढ़कर 2024 में 11.24% हो गया। यह राज्य में पार्टी का अब तक का सबसे अधिक वोट शेयर है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने 4 सीटें जीती थीं। तमिलनाडु की छोटी छोटी पार्टियों को लेकर लोकसभा चुनाव 2024 में उतरी बीजेपी इस बार पूरा जोर लगा रही है। एनडीए की पूर्व सहयोगी एआईएडीएमके को भी साथ लेने की कोशिश की जा रही है।

जीतने पर स्टालिन का बढ़ जाएगा दबदबा

अगर स्टालिन अपने राजनीतिक दुर्ग को सुरक्षित रखने में सफल रहते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की रणनीति और मुद्दों के निर्धारण में उनका प्रभाव बढ़ जाएगा। वे खुद को उस तरह की केंद्रीय भूमिका में देखने लगेंगे, जैसी भूमिका एन.टी. रामाराव ने 1990 के दशक में निभाई थी। रामाराव ने उस वक्त केंद्र की राजीव गाँधी की सरकार को चुनौती देने के लिए एक मजबूत जमीन तैयार कर दी थी। इस वक्त केन्द्र में मोदी सरकार है इसलिए डीएमके अपनी ताकत इंडी गठबंधन में वर्चस्व स्थापित करने में लगा सकता है।

केरल में उपस्थिति दर्ज करा चुकी है बीजेपी

केरल में बीजेपी का कमल स्थानीय निकाय चुनाव में खिला है। पार्टी ने 40 साल से कब्जा वाले तिरुवनंतपुरम नगर निगम में जीत दर्ज की। इससे पार्टी काफी उत्साहित है। बीजेपी ने त्रिशूर लोकसभा सीट भी जीती थी। हालाँकि राज्य में लेफ्ट की सरकार है और कॉन्ग्रेस मुख्य विपक्षी दल है। दोनों पार्टियाँ इंडी गठबंधन में शामिल हैं। ऐसे में बीजेपी का पूरा फोकस राज्य में कॉन्ग्रेस की यूडीएफ को बेदखल कर मुख्य विपक्षी पार्टी बनना है।

इसके लिए हिन्दुओं को पार्टी साथ ला रही है, जो अब तक वामपंथी दलों के साथ रहे हैं। धर्मांतरण जैसे मुद्दे बीजेपी जोरशोर से उठा रही है। अगर कॉन्ग्रेस और लेफ्ट को विधानसभा चुनाव में कमजोर करने में बीजेपी सफल होती है, तो बीजेपी की मनोवैज्ञानिक जीत होगी और इंडी गठबंधन काफी कमजोर हो जाएगा। यूँ भी पूरे देश में लेफ्ट के पास एकमात्र राज्य केरल बचा है। यहाँ से जाने का मतलब है देश से कम्यूनिस्टों का खात्मा।

असम बीजेपी का ‘अजय किला’

पूर्वोत्तर में भाजपा का सबसे मज़बूत राज्य असम है। यह पूर्वोत्तर के ‘अभेद्य किले’ की तरह है। असम विधानसभा चुनाव इंडी गठबंधन के लिए सबसे मुश्किल लेकिन सबसे अहम है। इसकी जीत से पूर्वोत्तर का द्वार विपक्ष के लिए खुल जाएगा। लेकिन बीजेपी के नेतृत्व वाली हिमंता सरकार यहाँ जमकर पसीना बहा रही है। केन्द्र की योजनाओं का लोगों को फायदा हुआ है। रेलवे से कनेक्शन और सड़कों से सुदूर इलाकों का जुड़ना जनता को काफी फायदा पहुँचा रहा है।

बीजेपी ने राज्य में घुसपैठ के खिलाफ अभियान चला रखा है। घुसपैठियों को राज्य से बाहर करने और एसआईआर के द्वारा उनकी पहचान की जा रही है। अब देखना होगा कॉन्ग्रेस अपना वजूद यहाँ बचा पाती है या नहीं। पुद्दुचेरी विधासभा में बीजेपी-एआईएडीएमके के साथ कॉन्ग्रेस-डीएमके गठबंधन की टक्कर है। इस केन्द्र शासित प्रदेश को लेकर भी दोनों गठबंधन आमने-सामने हैं।

सबको कोर्ट ने कर दिया बरी, फिर 19 साल के विशाल कुमार को चाकुओं से गोदकर किसने मार डाला?: केरल के कॉलेज में हुई थी ABVP वर्कर की हत्या, पढ़िए अदालत के फैसले की डिटेल

केरल के मावेलिक्कारा की एक एडिशनल सेशंस कोर्ट ने मंगलवार (30 दिसंबर 2025) को साल 2012 के चर्चित विशाल कुमार हत्याकांड में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने इस मामले में नामजद सभी 20 आरोपितों को बरी कर दिया है। जज पीपी पूजा ने अपने फैसले में कहा कि सरकारी पक्ष (Prosecution) आरोपितों के खिलाफ लगे आरोपों को बिना किसी शक के साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। ऑपइंडिया के पास इस केस के फैसले की कॉपी मौजूद है।

अदालत ने अपने फैसले में इस बात से इनकार नहीं किया कि ABVP कार्यकर्ता विशाल कुमार की हत्या हुई थी, लेकिन कानूनी तौर पर यह साफ नहीं हो सका कि असल में यह हत्या किसने की। कोर्ट के मुताबिक, सबूतों के अभाव में इतनी बड़ी भीड़ को इस अपराध के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। वहीं, दूसरी ओर सरकारी पक्ष ने कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है।

यह फैसला पीड़ित परिवार के लिए किसी गहरे जख्म की तरह है। ऐसा इसलिए नहीं कि कोर्ट से बिना सबूत सजा देने की उम्मीद थी, बल्कि इसलिए क्योंकि बरी करने के जो कारण बताए गए, उन्होंने पूरी व्यवस्था की नाकामी को उजागर कर दिया। कोर्ट के फैसले से साफ हुआ कि जिस दिन विशाल की हत्या हुई, उसी दिन से शुरू हुई जाँच में बुनियादी कमियाँ थीं। पुलिस न तो शुरुआती बयान को ठीक से दर्ज कर पाई, न ही समय पर कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई। इसके अलावा, गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते थे और पहचान की प्रक्रिया व हथियारों की बरामदगी में भी भारी गड़बड़ी थी।

सिस्टम की इन लापरवाहियों की वजह से मामले में इतने छेद और विरोधाभास पैदा हो गए कि एक भीड़भाड़ वाले कैंपस में हुई हत्या का कानूनी नतीजा यह निकला कि किसी को सजा नहीं दी जा सकी। अंत में यह मामला एक ऐसी दुखद सुर्खी बनकर रह गया कि 13 साल पहले एक युवा ABVP कार्यकर्ता की सरेआम चाकू मारकर हत्या कर दी गई, लेकिन कानून की नजर में उसे ‘किसी ने नहीं मारा’।

जुलाई 2012 का कैंपस हत्याकांड

यह घटना जुलाई 2012 की है, जब विशाल कुमार सिर्फ 19 साल के थे। वह चेंगनूर के रहने वाले थे और कोन्नी के एनएसएस (NSS) कॉलेज में बीएससी प्रथम वर्ष के छात्र होने के साथ-साथ ABVP के एक्टिव कार्यकर्ता भी थे। 16 जुलाई की सुबह, वह नए छात्रों का स्वागत करने के लिए क्रिश्चियन कॉलेज पहुँचे थे। सरकारी पक्ष के अनुसार, वहाँ ‘कैंपस फ्रंट’ के कुछ सदस्य आए और एबीवीपी कार्यकर्ताओं के साथ गाली-गलौज और बहस करने लगे।

देखते ही देखते यह बहस हिंसक झड़प में बदल गई, जिसमें चाकू और अन्य हथियारों का इस्तेमाल किया गया। विशाल बीच-बचाव कर मामले को शांत करने की कोशिश कर रहे थे, उन पर ही चाकू से हमला कर दिया गया। इस हमले में विशाल के अलावा विष्णुप्रसाद और श्रीजीत नाम के दो अन्य ABVP कार्यकर्ता भी घायल हुए थे।

हमले के तुरंत बाद विशाल को चेंगन्नूर के सरकारी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ से उनकी गंभीर हालत को देखते हुए उन्हें कोट्टायम मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर कर दिया गया। लेकिन अगले दिन तड़के विशाल ने दम तोड़ दिया। यह कोई ऐसी घटना नहीं थी जो किसी सुनसान जगह या अकेले में हुई हो। यह सब कुछ एक कॉलेज के गेट के बाहर हुआ, जहाँ राजनीति की वजह से माहौल पहले से ही गरमाया हुआ था और उस वक्त वहाँ सैकड़ों छात्र मौजूद थे।

यह जानकारी बेहद अहम है क्योंकि कोर्ट के फैसले में बार-बार एक ही बात सामने आई- ऐसी स्थिति में, जहाँ घटना सैकड़ों लोगों के सामने हुई हो, सरकारी पक्ष (Prosecution) को या तो बहुत मजबूत और स्वतंत्र सबूत पेश करने चाहिए थे या फिर अपने मुख्य गवाहों के जरिए एक ऐसी कहानी रखनी चाहिए थी जिसमें कोई बदलाव या शक की गुंजाइश न हो। लेकिन, अदालत ने साफ तौर पर कहा कि सरकारी पक्ष की दलीलों में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया जिससे आरोपितों का दोष पक्का हो सके।

कौन थे आरोपित और क्यों गहराया सियासी साया?

अदालत ने जिन 20 लोगों को बरी किया है, उन्हें ‘कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया’ (CFI) का सदस्य बताया गया था। यह संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ (PFI) की छात्र शाखा थी, जिस पर भारत सरकार ने सितंबर 2022 में प्रतिबंध लगा दिया था। इस मामले में एक अन्य आरोपित घटना के समय नाबालिग था, इसलिए उसका केस अलग कर दिया गया और उसकी सुनवाई अलाप्पुझा के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (किशोर न्याय बोर्ड) में चल रही है।

कोर्ट द्वारा बरी किए गए लोगों की सूची में आशिक, शफीक, अंसार फैसल, आसिफ मोहम्मद, नसीम, सानुज, अल्थाज, समीर राऊथर, सफीर, अफजल, अब्दुल वहाब, शिबिन हबीब, शाहजहां मौलवी, नवाज शरीफ, समीर, सजीव और सलीम जैसे नाम शामिल थे।

इन सभी पर हत्या, घातक हथियारों के साथ गैरकानूनी तरीके से इकट्ठा होने, दंगा भड़काने, बंधक बनाने और साजिश रचने जैसे बेहद गंभीर आरोप लगे थे। कुछ लोगों पर आरोपितों को शरण देने का भी आरोप था। दूसरी ओर, बचाव पक्ष (डिफेंस) का तर्क था कि मामले को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया ताकि राजनीति के चलते ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसमें फँसाया जा सके। उनका कहना था कि हमला सिर्फ एक व्यक्ति ने किया था, लेकिन राजनीतिक नैरेटिव बनाने के लिए बाकी लोगों को भी इस ट्रायल में घसीट लिया गया।

निष्कर्ष के तौर पर, अदालत का फैसला बचाव पक्ष के तर्कों के काफी करीब रहा। ऐसा इसलिए नहीं हुआ कि कोर्ट ने बचाव पक्ष की हर बात मान ली, बल्कि इसलिए हुआ क्योंकि सरकारी पक्ष (Prosecution) सजा दिलाने के लिए जरूरी कड़े कानूनी मापदंडों और सबूतों को पेश नहीं कर पाया।

यहीं पर पीड़ित के नजरिए से मामले को देखना जरूरी हो जाता है। भले ही सबूतों की कमी होने पर अदालतों को आरोपितों को बरी करना पड़ता है, लेकिन असली सवाल यह है कि सबूत इतने कमजोर क्यों रह गए? कोर्ट के फैसले ने जाँच में उन कमियों की ओर इशारा किया है जिनसे बचा जा सकता था। ये कमियाँ सीधे तौर पर पुलिस और सरकारी पक्ष की उन नाकामियों को उजागर करती हैं, जिन्हें अगर समय रहते सुधारा जाता तो शायद नतीजा कुछ और होता।

तेरह साल की यात्रा और देरी की कीमत

शुरुआत में इस मामले की जाँच स्थानीय पुलिस ने की थी, जिसे बाद में क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया। पुलिस ने नाबालिग सहित कुल 20 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। पूरे ट्रायल के दौरान सरकारी पक्ष ने 55 गवाहों और 205 दस्तावेजों को अदालत के सामने पेश किया और समय-समय पर कई अधिकारियों ने इस केस की कमान संभाली।

अक्सर देखा जाता है कि जब केस सालों तक खिंचता है, तो गवाह अपनी बात से मुकरने लगते हैं और पुरानी यादें धुंधली हो जाती हैं, जिसका असर केस पर पड़ता है। लेकिन इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि केस की कमजोरियाँ केवल समय बीतने की वजह से नहीं थीं। जाँच में कई बड़ी खामियाँ तो पहले दिन से ही मौजूद थीं, जैसे शुरुआती जानकारी (FIR) को सही ढंग से दर्ज न करना, गवाहों की पहचान की सही प्रक्रिया का पालन न करना और बरामद किए गए सबूतों को दस्तावेजों में ठीक से पेश न कर पाना।

अदालत के इस फैसले को एक सबक की तरह देखा जाना चाहिए कि कैसे कानूनी प्रक्रिया में ‘संदेह का लाभ’ पैदा होता है। यहाँ अपराध तो साफ था, लेकिन पुलिस ने केस को कानूनी कसौटी पर इतनी मजबूती से खड़ा नहीं किया कि वह अदालत की जिरह का सामना कर पाता।

पहली खामी: केस का शुरुआती वर्जन ही निकला कमजोर

अदालत के फैसले में सरकारी पक्ष के लिए सबसे बड़ा झटका तब लगा जब कोर्ट ने माना कि केस की शुरुआती जानकारी (FIR) और उससे जुड़े दस्तावेजों के साथ हेरफेर की गई थी। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पुलिस का यह दावा भरोसे के लायक नहीं है कि घटना की रिपोर्ट सुबह 11:45 बजे लिखनी शुरू कर दी गई थी।

बचाव पक्ष की दलीलों में दम पाते हुए कोर्ट ने नोट किया कि दस्तावेजों को असली समय से पहले का दिखाने की कोशिश की गई (Antitimed) और शायद तारीखें भी पीछे की डाली गई थीं। अदालत ने इस बात पर गौर किया कि ये कागजात घटना के अगले दिन, यानी 17 जुलाई 2012 को सुबह 10:45 बजे कोर्ट पहुँचे थे। कोर्ट ने साफ कहा कि इस बात की पूरी संभावना है कि पुलिस ने कागजी कार्रवाई में जानबूझकर समय और तारीखों का खेल किया था।

यह कोई छोटी-मोटी तकनीकी गलती नहीं थी। किसी भी आपराधिक मामले में, शुरुआत में दी गई जानकारी (FIR) जितनी जल्दी और भरोसेमंद तरीके से दर्ज होती है, केस उतना ही मजबूत होता है। लेकिन जब शुरुआती कहानी ही शक के घेरे में आ जाए, तो पूरी जाँच ऐसी लगने लगती है जैसे उसे बाद में अपनी सुविधा के अनुसार गढ़ा गया हो। खासकर तब, जब बाद में दिए गए बयानों में नए नाम, भूमिकाएँ और मकसद जोड़ दिए जाते हैं जो शुरुआत में कहीं थे ही नहीं।

कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि पुलिस स्टेशन में सूचना कब मिली और उसे कैसे दर्ज किया गया, ये दावे भी भरोसे लायक नहीं हैं। कानून का सीधा सा नियम है- अगर अदालत शुरुआती कहानी को ही संदिग्ध मान ले, तो बाद में गवाहों द्वारा जोड़े गए नए तथ्यों को ‘कहानी में मिर्च-मसाला’ मानकर खारिज करना बहुत आसान हो जाता है।

दूसरी बड़ी बात: पुलिस ने आधी-अधूरी और एकतरफा कहानी सुनाई

अदालत के फैसले का एक अहम हिस्सा उस टकराव की वजह और वहाँ मौजूद अन्य छात्र संगठनों से जुड़ा था। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि सरकारी पक्ष (Prosecution) ने यह छिपाया कि असल में विवाद शुरू कैसे हुआ था। उन्होंने सिर्फ ABVP सदस्यों के पक्ष को ही सामने रखा, जिससे पुलिस की पूरी कहानी शक के घेरे में आ गई।

अदालत की यह टिप्पणी बेहद गंभीर है क्योंकि यह सिर्फ किसी गवाह के बयान बदलने का मामला नहीं था। जज ने माना कि पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में पूरी सच्चाई पेश नहीं की- जैसे कि विवाद की असली जड़ क्या थी, वहाँ कौन-कौन लोग मौजूद थे और वह झड़प वास्तव में कैसे शुरू हुई थी। इस अधूरे सच की वजह से पूरा केस कानूनी तौर पर कमजोर साबित हुआ।

कॉलेज कैंपस जैसे राजनीतिक माहौल में हुई घटनाओं के मामले में अदालतें निष्पक्षता और ठोस सबूतों की उम्मीद करती हैं। अगर मौके पर कई अलग-अलग गुट मौजूद थे, तो कोर्ट यह उम्मीद करता है कि पुलिस या तो स्वतंत्र गवाह पेश करे या कम से कम पूरी घटना का एक निष्पक्ष और साफ मंजर अदालत के सामने रखे। कोर्ट की सख्ती यह इशारा करती है कि इस केस की जाँच और सुनवाई के दौरान इन बुनियादी बातों पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया, जिससे पूरी कहानी एकतरफा नजर आई।

जब चश्मदीद ही नहीं जीत पाए कोर्ट का भरोसा

सरकारी पक्ष ने अपना पूरा भरोसा घायल चश्मदीदों पर टिकाया था, जो घटना के वक्त विशाल के साथ थे। आमतौर पर अदालतों में घायल गवाहों की बात को बहुत महत्व दिया जाता है, क्योंकि माना जाता है कि वे मौके पर मौजूद थे और असली हमलावरों को छोड़कर किसी निर्दोष को फँसाने का उनका कोई इरादा नहीं होगा।

लेकिन, कोर्ट फिर भी गवाहों की सच्चाई, उनकी बातों में तालमेल और कानूनी प्रक्रिया की बारीकी से जाँच करता है। इस मामले में, कोर्ट ने बार-बार पाया कि शुरुआती बयानों में बहुत सी बातें गायब थीं, जिन्हें बाद में जोड़कर सुधारने की कोशिश की गई। सबसे बड़ा सवाल यह उठा कि क्या गवाह आरोपितों को पहले से जानते थे? कोर्ट ने कहा कि अगर मुख्य गवाह आरोपितों को पहले से जानता था, जैसा कि उसने बाद में दावा किया, तो यह बात पहली रिपोर्ट (FIR) में ही होनी चाहिए थी। शुरू में इन जानकारियों का न होना आरोपितों की पहचान, वहाँ उनकी मौजूदगी और उनकी भूमिका पर गहरा शक पैदा करता है।

यहीं पर जाँच में देरी और लचर दस्तावेजीकरण का खामियाजा भुगतना पड़ा। नियम यह है कि अगर गवाह हमलावरों को पहले से जानता है, तो वह बात तुरंत रिकॉर्ड होनी चाहिए। और अगर वह उन्हें नहीं जानता, तो पुलिस को कानूनी तरीके से ‘शिनाख्त परेड’ (Identification Procedure) करानी चाहिए थी। पुलिस और सरकारी पक्ष दोनों ही मोर्चों पर फेल रहे। उन्होंने न तो शुरू में आरोपितों की पहचान दर्ज की और न ही बाद में अनजान हमलावरों की सही तरीके से पहचान करवाई। इसी उलझन और लापरवाही की वजह से पूरा केस कोर्ट में टिक नहीं पाया।

बड़ी कानूनी चूक: पहचान परेड न होने से मिला आरोपितों को फायदा

अदालत के फैसले में बार-बार एक ही बड़ी कमी सामने आई- आरोपितों की पहचान से जुड़े सबूतों की कमजोरी। कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले के हालात को देखते हुए, बिना ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ (शिनाख्त परेड) के केवल गवाहों के बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब गवाहों ने समय के साथ अपने बयानों में बदलाव किए हों, जिससे उनकी विश्वसनीयता कम हो गई हो।

कम से कम एक आरोपित के मामले में तो यह नोट किया गया कि किसी भी गवाह ने शिनाख्त परेड के जरिए उसकी पहचान नहीं की थी। असल में, सरकारी पक्ष के पास ऐसा कोई ठोस आधार ही नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि कई आरोपितों की पहचान सही कानूनी प्रक्रिया के तहत की गई थी।

यह कोई छोटी चूक नहीं थी। जब आरोपित पहले से परिचित न हों, तो ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ एक अनिवार्य प्रक्रिया है। यह गवाह की याददाश्त और पहचान की शुद्धता को तब सुरक्षित कर लेती है जब यादें ताजा होती हैं और गवाह ने मीडिया या पुलिस के जरिए आरोपितों की तस्वीरें न देखी हों।

जब पुलिस इस कदम को छोड़ देती है, तो बरसों बाद अदालत में खड़े होकर आरोपित की तरफ उंगली उठाना बेअसर हो जाता है, क्योंकि तब बचाव पक्ष आसानी से कह सकता है कि गवाह सिर्फ उसी व्यक्ति की तरफ इशारा कर रहा है जिसे पुलिस ने ‘आरोपित’ बताया है।

भीड़ द्वारा किए गए हमले के मामलों में पहचान और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर किसी व्यक्ति की मौके पर मौजूदगी ही पुख्ता तरीके से साबित नहीं हो पाती, तो पूरे समूह को दोषी ठहराने का कानूनी आधार ही ढह जाता है।

असली मकसद पर सवाल: शुरू में गायब था ‘लव जिहाद’ का दावा

सरकारी पक्ष ने दलील दी थी कि विशाल की हत्या का एक कारण यह भी था कि वह ‘लव जिहाद’ जैसी गतिविधियों का विरोध कर रहा था। लेकिन अदालत के फैसले ने इस दावे की पोल खोल दी। जज ने नोट किया कि शुरुआती बयानों में इस तरह की किसी भी बात का जिक्र तक नहीं था। यहाँ तक कि गवाहों ने भी खुद यह माना कि जाँच के शुरुआती दौर में उन्होंने ऐसा कोई बयान पुलिस को नहीं दिया था।

कानून की नजर में, जब किसी घटना का मकसद काफी समय बाद बताया जाता है, तो अदालतें उसे संदेह की दृष्टि से देखती हैं। हालाँकि, प्रत्यक्ष सबूत होने पर मकसद बताना हमेशा जरूरी नहीं होता, लेकिन जब चश्मदीदों की गवाही कमजोर पड़ने लगे, तो ‘मकसद’ ही वह कड़ी होती है जो पूरी कहानी को जोड़कर रखती है। और अगर यह कड़ी ही बाद में जोड़ी गई महसूस हो, तो पूरा केस और भी कमजोर हो जाता है।

यहाँ मुद्दा यह नहीं था कि ‘लव जिहाद’ का दावा हकीकत में सच था या झूठ। मुद्दा यह था कि पुलिस ने केस को कैसे तैयार किया। अगर पुलिस चाहती थी कि अदालत इस मकसद को गंभीरता से ले, तो उसे इसे शुरुआत में ही दर्ज करना चाहिए था और इसके पक्ष में ठोस सबूत जुटाने चाहिए थे। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं किया गया।

कमजोर कड़ियाँ: देरी से कागजी कार्रवाई और गवाहों का गायब होना

अदालत के फैसले में तलाशी और सबूतों की बरामदगी के तरीके पर भी गंभीर सवाल उठाए गए। विशेष रूप से उस आरोपित के घर की तलाशी को लेकर, जिस पर चाकू मारने का आरोप था। कोर्ट ने गौर किया कि जिस अधिकारी ने उस आरोपित के घर की तलाशी ली थी, न तो उसका नाम गवाहों की सूची में शामिल किया गया और न ही उसे गवाही के लिए बुलाया गया। इसके अलावा, तलाशी का मेमो (दस्तावेज) 17 जुलाई 2012 को तैयार किया गया बताया गया, लेकिन वह कोर्ट में 25 जुलाई को पहुँचा।

किसी भी गंभीर मुकदमे में तलाशी के कागजात का देरी से पहुँचना और तलाशी लेने वाले अधिकारी को पेश न करना, बचाव पक्ष के लिए किसी तोहफे से कम नहीं होता। इससे यह तर्क देने का मौका मिल जाता है कि सबूतों के साथ बाद में छेड़छाड़ की गई है या कागजी कार्रवाई मनगढ़ंत है। अदालत को सबूतों को सीधे तौर पर ‘झूठा’ घोषित करने की जरूरत नहीं होती। साबित करने के तरीके में इतनी देरी और लापरवाही ही उस सबूत को अविश्वसनीय बनाने के लिए काफी होती है।

कोर्ट का साफ कहना: फॉरेंसिक रिपोर्ट से भी नहीं मिली मदद

जब चश्मदीदों के बयानों पर विवाद छिड़ता है, तो अक्सर फॉरेंसिक जाँच ही पुलिस के डूबते हुए केस को बचाती है। लेकिन इस मामले में, कोर्ट के फैसले ने साफ कर दिया कि फॉरेंसिक से भी कोई खास मदद नहीं मिली। अदालत ने गौर किया कि बरामद किए गए सबूतों (हथियार और कपड़े) पर खून तो था, लेकिन वह इतनी कम मात्रा में था कि उसकी उत्पत्ति या ब्लड ग्रुप का पता लगाना नामुमकिन था। कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ कपड़ों पर इंसान का खून मिलना ही किसी को दोषी साबित करने के लिए काफी नहीं है, जब तक कि यह पक्का न हो जाए कि वह खून पीड़ित का ही था।

अक्सर नाकाम साबित होने वाले मुकदमों में यही पैटर्न देखा जाता है। जब हथियार या कपड़ों का पीड़ित से कोई पुख्ता वैज्ञानिक कनेक्शन नहीं जुड़ पाता, तो अदालतें उसे ठोस सबूत नहीं मानतीं- खासकर तब, जब गवाहों की बातें पहले से ही शक के घेरे में हों। इसका मतलब यह नहीं है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट ने पुलिस की कहानी को गलत साबित किया, बल्कि इसका मतलब यह है कि फॉरेंसिक रिपोर्ट इतनी मजबूत नहीं थी कि वह आरोपितों को सजा दिलाने के लिए जरूरी ‘कानूनी मानक’ को पार कर पाती।

नाकाम कोशिश: जब हत्या ही साबित न हुई, तो साजिश का आरोप भी फेल

जब अदालत ने पाया कि हत्या का मुख्य मामला ही संदेह से परे साबित नहीं हो सका, तो साजिश और अपराधियों को पनाह देने जैसे अतिरिक्त आरोपों के टिकने की गुंजाइश बहुत कम रह गई। कोर्ट के फैसले ने इशारा किया कि पुलिस यह ठोस तरीके से साबित नहीं कर पाई कि आरोपितों ने हमलावरों को शरण दी थी या कानून के मानकों के अनुसार उनके बीच कोई साजिश रची गई थी।

यह सिर्फ कोई तकनीकी नतीजा नहीं था, बल्कि इससे यह पता चला कि सरकारी पक्ष ने एक बहुत बड़ा जाल तो बुना, लेकिन उसकी बुनियाद को मजबूत करना भूल गया। राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में अक्सर यह प्रवृत्ति देखी जाती है कि मामले की गंभीरता दिखाने के लिए बहुत से लोगों पर साजिश और सामूहिक हमले की धाराएँ लगा दी जाती हैं। लेकिन इसका जोखिम यह है कि अगर आरोपितों की पहचान और कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह पुख्ता न हो, तो यही फैलाव केस की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। हर नया आरोपित संदेह का एक नया बिंदु बन जाता है, जिससे बचाव पक्ष को केस में छेद करने का मौका मिल जाता है और आखिरकार अदालत को फैसला सुनाने में झिझक होने लगती है।

अब आगे क्या?

सरकारी पक्ष ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है। अब हाई कोर्ट यह देखेगा कि क्या निचली अदालत ने सबूतों को समझने में कोई गलती की, क्या कानूनी सिद्धांतों को गलत तरीके से लागू किया गया और क्या बरी करने के फैसले को पलटा जा सकता है। हालाँकि, बरी किए गए आरोपितों के खिलाफ अपील जीतना आसान नहीं होता, क्योंकि ऊपरी अदालतें तब तक दखल नहीं देतीं जब तक कि फैसले में कोई बहुत बड़ी और साफ गलती न दिखे।

लेकिन इन कानूनी उलझनों के बीच एक कड़वा सच नहीं बदलता। विशाल कुमार सिर्फ 19 साल का था। कॉलेज के गेट के बाहर हुए हमले में चाकू लगने से उसकी जान चली गई और वह कभी घर नहीं लौटा। उसके परिवार ने 13 साल तक इंसाफ का इंतजार किया, लेकिन जो फैसला आया उसने उनके जख्मों को भरने के बजाय और गहरा कर दिया।

अगर हमारा सिस्टम भविष्य में ऐसे नतीजों से बचना चाहता है, तो उसे इस फैसले से सबक लेना होगा। इसके लिए कोर्ट पर उंगली उठाने के बजाय उन जाँच अधिकारियों और वकीलों की जवाबदेही तय करनी होगी जो शुरू से ही जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी करने में नाकाम रहे। जब शुरुआती रिपोर्ट संदिग्ध हो, पहचान परेड न हुई हो, गवाह अपनी बातें बदलें और फॉरेंसिक रिपोर्ट साथ न दे, तो अदालत का फैसला पहले से ही तय हो जाता है। ऐसे में आरोपित आजाद हो जाते हैं, पीड़ित की यादें एक बार फिर दफन हो जाती हैं और समाज के सामने एक खौफनाक जुमला सच बनकर रह जाता है जो किसी भी सभ्य समाज के लिए सामान्य नहीं होना चाहिए।

विशाल कुमार को किसी ने नहीं मारा। ऐसा इसलिए नहीं कि कत्ल नहीं हुआ था, बल्कि इसलिए क्योंकि सरकार और पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि कातिल कौन था।

कोर्ट का फैसला आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कभी भारत का तीसरा सबसे अमीर राज्य था पश्चिम बंगाल, आज ‘आर्थिक तबाही’ की कगार पर खड़ा: समझें- कैसे वामपंथियों और TMC की नीतियों ने अर्थव्यवस्था की ध्वस्त

कभी भारत की आर्थिक ताकत का प्रतीक पश्चिम बंगाल आज अभूतपूर्व गिरावट का शिकार हो चुका है। 1960 में यह देश के सबसे अमीर राज्यों में तीसरे नंबर पर था, लेकिन आज 24वें स्थान पर लुढ़क गया है। राज्य की जीडीपी में हिस्सेदारी 10.5 प्रतिशत से घटकर 5.6 प्रतिशत रह गई है, जबकि प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 28 प्रतिशत ज्यादा से 16.3 प्रतिशत कम हो गई है।

यह गिरावट पिछले 60 सालों की है, जब दूसरे पिछड़े राज्य तेजी से आगे बढ़ रहे थे। कम्युनिस्ट राज की वैचारिक जिद और ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार की नीतियाँ इस बर्बादी की मुख्य वजह हैं।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) के डेटा से साफ होता है कि कैसे राज्य ने खुद अपनी संरचनात्मक गिरावट को अंजाम दिया। इस रिपोर्ट में हम टाइमलाइन के जरिए देखेंगे कि कैसे कम्युनिस्टों की मिलिटेंट यूनियनिज्म और ममता राज की उद्योग-विरोधी नीतियों ने बंगाल को आर्थिक रूप से तबाह कर दिया।

कभी देश का आर्थिक लीडर था बंगाल

1960 के दशक की शुरुआत में पश्चिम बंगाल सिर्फ एक राज्य नहीं, बल्कि भारत का औद्योगिक केंद्र था। 1960-61 में यहां की सापेक्ष प्रति व्यक्ति आय 127.5 प्रतिशत थी, यानी औसत बंगाली राष्ट्रीय औसत से 28 प्रतिशत ज्यादा कमाता था। कलकत्ता बंदरगाह, जूट उद्योग की एकाधिकार स्थिति और जेसप, ब्रेथवेट जैसी इंजीनियरिंग कंपनियां यहां की ताकत थीं। महाराष्ट्र और दिल्ली के साथ यह राज्य निवेशकों का पहला विकल्प था।

भारत में क्षमता निर्माण के लिए कोई भी पूँजी यहीं आती थी। लेकिन यह दौर ज्यादा नहीं चला। 1967 में कॉन्ग्रेस सरकार गिरने के बाद राज्य में अस्थिरता आई। नक्सलवाद के संघर्ष ने कंपनियों को मजदूरों की छंटनी करने या भागने पर मजबूर किया। बेरोजगारी बढ़ी और अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। 1977 में ज्योति बसु के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार बनी, जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नियंत्रण में थी। शुरू में राज्य शांत था, लेकिन कम्युनिस्टों की प्रो-लेबर नीतियाँ जल्दी ही मिलिटेंट बन गईं।

कम्युनिस्ट राज में उग्र यूनियनिज्म और पूँजी का पलायन से ‘डेथ क्रॉस’

पश्चिम बंगाल की इंडस्ट्रियल गिरावट कोई दुर्घटना नहीं थी। दरअसल, 1960 के अंत से बंगाल की समृद्धि का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा। 1980-81 तक सापेक्ष आय 96.9 प्रतिशत रह गई। यह वह ‘डेथ क्रॉस’ था जब औसत बंगाली औसत भारतीय से गरीब हो गया। कुछ वामपंथी इतिहासकार फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी जैसे बाहरी कारणों को दोष देते हैं, लेकिन मुख्य जख्म खुद का लगाया हुआ था।

कम्युनिस्ट राज में उग्र ट्रेड यूनियनवाद का उदय हुआ। ‘घेराव’ को हथियार बनाकर उद्योगों को बंधक बनाया गया। मुनाफे को ‘पाप’ माना गया और उद्योगपतियों को अपमानित किया गया। पूँजी ने भागना शुरू कर दिया। नवाचार के लिए जरूरी ‘एनिमल स्पिरिट्स’ कोलकाता से निकलकर मुंबई और गुजरात चले गए। 1970 में 678 स्ट्राइक्स और 128 लॉकआउट्स हुए, लेकिन 2003 तक स्ट्राइक्स घटकर 32 रह गईं जबकि लॉकआउट्स 400 हो गए। इससे 2.56 करोड़ मैन-डे लॉकआउट्स में खो गए।

कम्युनिस्टों ने छोटे उद्योगों पर फोकस किया, लेकिन मल्टीनेशनल निवेश रोक दिया गया। साल 1994 की नीति में विदेशी निवेश का स्वागत किया गया, लेकिन हल्दिया पेट्रोकेमिकल जैसे प्रोजेक्ट्स में भी देरी हुई। परिणामस्वरूप 1950-51 में राष्ट्रीय उत्पादन में 27 प्रतिशत हिस्सा 2007-08 तक 3.9 प्रतिशत रह गया। राजनीतिक हिंसा और बंद की वजह से स्थिति बिगड़ती गई। कम्युनिस्टों की पार्टी पर सरकारी नियंत्रण ने नौकरशाही को जकड़ लिया।

वैचारिक जाल में फंसा बंगाल छूट गया पीछे

साल 1991 में भारत ने लाइसेंस राज तोड़ा, तो दक्षिणी राज्य जैसे कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ने आईटी पार्क बनाए और ग्लोबल सप्लाई चेन को आकर्षित किया। लेकिन बंगाल ‘वैचारिक समय जाल’ में फँसा रहा। 70 के दशक का ट्रॉमा बना रहा। उग्रता कम हुई, लेकिन पूँजी के प्रति दुश्मनी की छवि बनी रही। कर्नाटक, आंध्र ने संपदा बढ़ाई, जबकि बंगाल कृषि आधारित कम विकास में फँस गया। इससे 1990 से 2010 तक रैंकिंग 15 से 21वें नंबर पर गिर गई।

निवेश डेटा बताता है कि 1991-2003 में बंगाल को 4,542 लेटर्स ऑफ इंटेंट मिले, लेकिन सिर्फ 14.6 प्रतिशत लागू हुए, जबकि गुजरात में 16 प्रतिशत। प्रति व्यक्ति निजी निवेश बंगाल में 1,952 रुपए था, गुजरात में 20,725 रुपए। इंफ्रास्ट्रक्चर में बंगाल 1980-81 में 9वें स्थान से 1990-91 में नीचे गिर गया। बिजनेस शुरू करने में 258 दिन लगते थे, जबकि अहमदाबाद में 144। कम्युनिस्ट राज की ये नीतियाँ राज्य को पिछड़ा बनाती रहीं।

ममता राज में डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन 2.0, सिंगुर स्टैंडऑफ बना टर्निंग प्वॉइंट

इंडस्ट्री का डेटा पश्चिम बंगाल की इस त्रासदी का कंकाल है, तो सिंगुर उसका दिल। 2008 में रतन टाटा का सिंगुर में नैनो प्लांट लगाने का फैसला एक मोड़ था। लेकिन ममता बनर्जी के नेतृत्व में विपक्षी आंदोलन ने टाटा को सानंद, गुजरात जाने पर मजबूर कर दिया। इससे ग्लोबल निवेशकों में संदेश गया कि बंगाल में जमीन अधिग्रहण राजनीतिक जोखिम से भरा है। ऐसे में बंगाल को दूसरी बार डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन झेलना पड़ा।

कम्युनिस्टों की तरह टीएमसी ने भी बंदों और राजनीतिक हिंसा को जारी रखा। साल 2011-2025 में 6,600 कंपनियाँ भागने को मजबूर हुईं, जिनमें 110 लिस्टेड कंपनियाँ भी शामिल हैं। राज्य में एफडीआई सिर्फ 2,534 करोड़ रुपए आई और वो टॉप 10 में भी जगह नहीं बना पाई।

2024-25 का ऑडिट बताता है बर्बादी का हाल

आज के समय का डाटा डराने वाला है। साल 1960 में रैंक 3 वाला राज्य 2024 में रैंक 24 पर आ चुका है। औसत बंगाली औसत भारतीय से 16.3 प्रतिशत कम कमाता है। तमिलनाडु, जो शुरू में नीचे था, सापेक्ष आय 150 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गया, जबकि बंगाल पूरी तरह से उलटफेर झेल रहा है।

फिस्कल डेफिसिट 38 प्रतिशत जीएसडीपी है, डेट-टू-जीएसडीपी 37.08 प्रतिशत। टैक्स कलेक्शन सुस्त (5.45 प्रतिशत जीएसडीपी), क्योंकि बड़ा अनौपचारिक सेक्टर है। सोशल ट्रांसफर्स 90.7 प्रतिशत तक पहुँच गए, लेकिन चुनावों से पहले बढ़ाए गए, जो वोटबैंक पॉलिटिक्स लगते हैं।

साल 2025 में ममता सरकार द्वारा लाए ‘रिवोकेशन ऑफ वेस्ट बंगाल इंसेंटिव स्कीम्स’ बिल से 1993 से दिए जा रहे इंसेंटिव्स वापस ले लिए गए। इससे डालमिया और बिड़ला ग्रुप को 430 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। हालाँकि ममता सरकार का ये कदम प्रॉमिसरी एस्टॉपल और आर्टिकल 14, 19 का उल्लंघन भी है।

कम्युनिस्ट-ममता राज ने विरासत में छोड़ी बर्बाद इंडस्ट्री

पश्चिम बंगाल की यह आर्थिक गिरावट छह दशकों की नीतियों का नतीजा है, जहाँ राजनीतिक एकजुटता को पूंजी संचय से ऊपर रखा गया। कम्युनिस्टों ने क्लास एनेमी बनाकर उद्योगों को तबाह किया, जबकि ममता ने सिंगुर जैसे आंदोलनों से निवेश रोका। आज बंगाल अनौपचारिक सेक्टर पर निर्भर है, जहाँ रिटेल, हॉस्पिटैलिटी, कंस्ट्रक्शन और कृषि में रोजगार है, लेकिन टैक्स कम मिलता है।

ऐसे में सवाल ये उठता है कि क्या पश्चिम बंगाल की स्थिति सुधर सकती है? क्योंकि अगर बंगाल आज बर्बाद हो चुका है, तो इसके पीछे कम्युनिस्ट-ममता राज की जिम्मेदारी साफ दिख रही है। ऐसे में अब जनता को भी ये सोचना होगा कि वो ऐसी पार्टी की सरकार बनाए, जो राज्य को आगे लेकर जाए, न कि 60 साल से बर्बादी की गर्त में जाते राज्य को और भी बर्बाद करे। बहरहाल, इसका निर्णय बंगाल की जनता को इसी साल यानी विधानसभा चुनाव में ही करना भी होगा।

ध्रुव राठी और कॉन्ग्रेस का ‘गिग वर्कर्स’ वाला प्रोपेगेंडा हुआ फ्लॉप: 31 दिसंबर को नहीं रुकी डिलीवरी, ऑपइंडिया के रियलिटी चेक में सच आया सामने

बीते कई दिनों से सोशल मीडिया और वामपंथी पोर्टल्स द्वारा यह माहौल बनाया जा रहा था कि 31 दिसंबर 2025 को देश के करोड़ों गिग वर्कर्स (स्विगी, ज़ोमैटो, ज़ेप्टो और ब्लिंकिट के डिलीवरी पार्टनर्स) हड़ताल पर रहेंगे। ध्रुव राठी जैसे यूट्यूबर और कॉन्ग्रेस समर्थित संगठनों ने पूरी ताकत लगा दी थी कि नए साल के जश्न के मौके पर देश की सेवाओं को ठप कर दिया जाए।

लेकिन ऑपइंडिया के रियलिटी टेस्ट और ग्राउंड रिपोर्ट में यह दाँव पूरी तरह उल्टा पड़ता नजर आया। काम पर निकले युवाओं और सामान्य रूप से होती डिलीवरी ने यह साफ कर दिया कि भड़काने की साजिशें पूरी तरह ‘फ्लॉप’ रही हैं।

राघव चड्ढा की मौजूदगी और ध्रुव राठी का प्रोपेगेंडा

दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर में आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा को गिग वर्कर्स के साथ देखा गया। राघव चड्ढा ने इसे संसद में उठाए गए मुद्दों से जोड़ने की कोशिश की, ताकि हड़ताल को एक राजनीतिक आधार दिया जा सके।

वहीं, जर्मनी में बैठे यूट्यूबर ध्रुव राठी ने वीडियो जारी कर लोगों से अपील की थी कि वे 31 दिसंबर को इन ऐप्स का इस्तेमाल न करें और गिग वर्कर्स से अपनी एक दिन की कमाई छोड़ने को कहा। देखते ही देखते पूरा लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम इस मुहीम में कूद पड़ा, लेकिन असलियत में जमीन पर इसका कोई असर नहीं दिखा।

ऑपइंडिया का रियलिटी टेस्ट: डिलीवरी जारी, हड़ताल गायब

ऑपइंडिया की पत्रकार ने इस कथित हड़ताल की सच्चाई जानने के लिए खुद ग्राउंड जीरो से जाँच की। जब उन्होंने ऐप्स पर ऑर्डर प्लेस किए, तो न केवल ऑर्डर आसानी से स्वीकार किए गए, बल्कि समय पर डिलीवर भी हुए।

डिलीवरी करने आए युवाओं से जब बातचीत की गई, तो उन्होंने साफ कहा, “हम अपनी कमाई नहीं छोड़ सकते, हमें काम करना है।” युवाओं ने किसी भी तरह की हड़ताल का हिस्सा होने से इनकार कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रोपेगेंडा चलाने वाले लोग असल श्रमिकों की जरूरतों से कोसों दूर हैं।

संजय गावा और कॉन्ग्रेस का संदिग्ध कनेक्शन

वहीं, गिग वर्कर्स की हड़ताल पर जाने के बारे में जब ऑपइंडिया के पत्रकार ने जाँच की, तो इस दौरान एक संगठन का नाम ऑल इंडिया गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स (AIGPWU) सामने आया, जिसके अध्यक्ष संजय गावा हैं। यह संगठन सीधे तौर पर कॉन्ग्रेस से जुड़ा हुआ है और गावा की तस्वीरें मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गाँधी के साथ मौजूद हैं।

जब ऑपइंडिया ने संजय गावा को फोन किया, तो पहले उन्होंने कहा कि उन्हें हड़ताल के बारे में कुछ पता ही नहीं है। लेकिन जब दोबारा फोन किया गया, तो वे अपनी बात से पलट गए और दावा करने लगे कि उनका संगठन इसमें शामिल है। एक राष्ट्रीय अध्यक्ष का अपनी ही तथाकथित हड़ताल पर इस तरह का विरोधाभासी बयान पूरी साजिश की कलई खोल देता है।

देश को ठप करने की पुरानी ‘टूलकिट’

यह पहली बार नहीं है जब किसी विशेष वर्ग को भड़काकर देश में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की गई हो। चाहे लेबर कोड बिल हो, किसान आंदोलन हो या ट्रक ड्राइवरों की हड़ताल- हर बार एक ही पैटर्न दिखाई देता है।

केंद्र सरकार ने पहले ही नए लेबर कोड में गिग वर्कर्स के हितों का ध्यान रखा है, लेकिन वामपंथी और कॉन्ग्रेसी मानसिकता वाले लोग केवल राजनीति चमकाने के लिए इन युवाओं की आजीविका को खतरे में डाल रहे हैं। जिस तरह इन ताकतों ने कभी कानपुर जैसे औद्योगिक हब को हड़तालों के जरिए खंडहर बना दिया था, अब वैसी ही कोशिश नए भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ की जा रही है।

प्रोपेगेंडा हार गया, पेट की भूख जीत गई

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि ध्रुव राठी जैसे ‘करोड़पति यूट्यूबर्स’ के लिए एक दिन की कमाई छोड़ने का ज्ञान देना आसान है, लेकिन उन गिग वर्कर्स के लिए जो हाड़-तोड़ मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालते हैं, काम ही उनकी पूजा है।

31 दिसंबर को देश की जनता को परेशान करने और अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाने का जो सपना लुटियंस दिल्ली और विदेशी जमीन पर बैठकर देखा गया था, उसे भारत के मेहनतकश युवाओं ने सड़क पर उतरकर और अपना काम जारी रखकर चकनाचूर कर दिया है। माहौल बनाने की सारी कोशिशें फेल रहीं और सच्चाई की जीत हुई।

विचारधाराओं की जंग के 100 साल: क्यों भारत में समाप्ति की कगार पर वामपंथ और समाज के हर तबके तक पहुँचता RSS

बीसवीं सदी के शुरुआती दशकों में भारत केवल स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं लड़ रहा था बल्कि एक गहरी वैचारिक जंग भी उसके भीतर आकार ले रही थी। यह जंग थी स्वाधीनता के बाद के भारत को परिभाषित करने की। इसके दो ध्रुव थे- एक तरफ था कि क्या भारत सभ्यता की जड़ों, सांस्कृति की निरंतरता और समाज को केंद्र में रखने वाली सोच के साथ आगे जाएगा तो वहीं, दूसरी तरफ था कि क्या भारत पश्चिम या अन्य देशों से आयातित एक वैचारिक फ्रेमवर्क के सहारे खुद को नई तरह में गढ़ेगा। इसी संघर्ष के दो प्रमुख ध्रुव बने- वामपंथ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)।

विचारधारा की लड़ाई कोई दिन, महीनों या कुछ वर्षों की नहीं होती बल्कि इसमें दशकों लगते हैं, सैकड़ों साल तक यह जंग चलती रहती है। आज हम 21वीं सदी के शुरुआती दशकों में हैं और RSS व CPI की स्थापना के 100 वर्ष हो गए हैं। सौ वर्षों के इस वैचारिक टकराव में आज स्थिति यह है कि वामपंथ भारत में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर हाशिये पर सिमटता दिख रहा है जबकि RSS समाज के लगभग हर तबके, हर शहर-गाँव तक अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। RSS की यह ताकत और वामपंथ की कमजोरी आकस्मिक नहीं बल्कि कई कारणों का परिणाम है जिसकी चर्चा हम इस लेख में करेंगे।

आयातित विचारधारा और मजबूत सांस्कृतिक शुरुआत: शुरुआती दिनों में CPI और RSS

वामपंथ का मूल समझे जाने वालीं मार्क्सवाद, लेनिनवाद जैसी धाराएँ यूरोप और रूस के औद्योगिक-सामाजिक संदर्भों से निकली थीं। भारत के लिए यह आयातित विचार था। वैसे तो 1920 में एम.एन. रॉय, मोहम्मद अली, एम.पी.टी. आचार्य जैसे लोगों ने देश से बाहर थे ताशकंद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नींव रखी। बाद में 1925 में कानपुर में एक सम्मेलन हुआ, जहाँ भारत के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे कम्युनिस्ट संगठन एक साथ आए और CPI को औपचारिक रूप मिला। अब वही इसका स्थापना दिवस माना जाता है।

वामपंथी विचारधारा उस समय आकर्षक लगी क्योंकि वह शोषण और असमानता के खिलाफ कड़ी बात करती थी। लेकिन इसकी एक बड़ी सीमा यह रही कि इसने भारतीय समाज को केवल ‘अमीर-गरीब’ या ‘वर्ग’ के नजरिये से देखा जबकि भारत का समाज परंपरा, धर्म, जाति और संस्कृति से मिलकर बना एक जटिल ढाँचा है।

इसी दौर में 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। RSS का उद्देश्य सत्ता पाना नहीं बल्कि समाज को मजबूत बनाना था। उसने राष्ट्र को सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई माना। संघ ने ऊपर से विचार थोपने के बजाय समाज के बीच जाकर काम करने का रास्ता चुना।

1925 से अबत तक संघ की असली ताकत उसकी तीन बातों में है- शाखा, प्रचारक और गुरु दक्षिणा। शाखा में रोज की गतिविधियों से अनुशासन और चरित्र का निर्माण होता है। प्रचारक अपना निजी जीवन त्यागकर संगठन को गाँव-गाँव तक ले जाते हैं। गुरु दक्षिणा से संघ आत्मनिर्भर रहता है और किसी बाहरी दबाव पर निर्भर नहीं होता। इन्हीं तीनों ने मिलकर RSS को सिर्फ एक विचार नहीं बल्कि राष्ट्रसेवा का जीवंत आंदोलन बनाया।

वामपंथी पार्टी में टूट और RSS का विस्तार

आजादी के बाद का शुरुआती समय वामपंथ के लिए राजनीतिक मजबूती जैसा था तो वहीं RSS के लिए यह मुश्किल की घड़ी थी। 1951-52 के पहले आम चुनाव में कॉन्ग्रेस के बाद CPI दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा तो वहीं RSS पर महात्मा गाँधी की हत्या के आरोप लगाकर उसपर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई। हालाँकि, इस लड़ाई में संघ तपकर और निखरा और मजबूती के साथ देश सेवा में जुटा रहा।

1957 में केरल में वामपंथी सरकार बनने के बाद CPI बेशक मजबूत दिख रही थी लेकिन 1950–60 के दशक में अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन में सोवियत संघ और चीन के बीच बढ़ते मतभेदों का असर भारत पर भी पड़ा। 1964 में इसी वैचारिक टकराव के चलते CPI से अलग होकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) CPI(M) बनी। 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन ने सशस्त्र क्रांति की राह अपनाने वाले धड़े को जन्म दिया। 1969 में CPI (मार्क्सवादी–लेनिनवादी) बनी, जिससे आगे चलकर कई नक्सली संगठन बने। अंततः 2004 में CPI (माओवादी) का गठन हुआ।

वामपंथ का आंदोलन जहाँ टूटने लगा था, वहीं RSS ने ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को केंद्र में रखकर लंबी दूरी की योजना बनाई थी। RSS ने सीधे राजनीतिक दल के रूप में काम करने के बजाय समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लिए अलग-अलग संगठन खड़े किए। 1948 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) छात्रों के लिए बनी। 1955 में भारतीय मजदूर संघ (BMS) ने श्रमिक वर्ग में काम शुरू किया। इसी तरह विद्या भारती (शिक्षा), विश्व हिंदू परिषद (धार्मिक-सामाजिक क्षेत्र), सेवा भारती (सेवा कार्य) जैसे संगठन बनते गए। ‘आनुषांगिक मॉडल’ से संघ विस्तार करता रहा।

भारत की संस्कृति: दो ध्रुवों पर खड़े RSS और वामपंथ

वामपंथ की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि उसने भारत को कभी समझने की ईमानदार कोशिश ही नहीं की। उसका वैचारिक जन्म यूरोप की फैक्ट्रियों, वहाँ के मजदूर संघर्ष और चर्च बनाम राज्य की लड़ाई से हुआ था। वामपंथियों के वैचारिक बाप कार्ल मार्क्स ने 19वीं सदी में धर्म को ‘जनता के लिए अफीम’ कहा तो भारत में भी वामपंथियों ने वही मान लिया। भारत में धर्म कभी सिर्फ पूजा-पाठ नहीं रहा। यहाँ धर्म जीवन का तरीका है, संस्कार है, समाज को जोड़ने वाली डोर है। वामपंथ ने यह फर्क कभी समझा ही नहीं और बिना सोचे-समझे वही विदेशी चश्मा भारत की आँखों पर चढ़ाने की कोशिश की।

यहीं से वामपंथ भारत से कटना शुरू हुआ। उसने मंदिर, त्योहार, परंपरा, राष्ट्रभाव- सबको शक की नजर से देखा। कभी कहा कि ये शोषण के औजार हैं, कभी कहा कि ये पिछड़ेपन की निशानी हैं। होली, दीवाली, राम, कृष्ण, गीता ये सब वामपंथ के लिए या तो ‘मिथ’ थे या ‘अफीम’। सवाल यह है कि जो चीजें करोड़ों लोगों को जोड़ती हैं अगर उन्हें आप लगातार गाली देंगे, तो लोग आपसे जुड़ेंगे या दूर भागेंगे?

इसके उलट RSS ने वो रास्ता लिया जो भारत को जैसा है, वैसा ही स्वीकार करता है। संघ ने संस्कृति को बोझ नहीं, ताकत माना और उसने परंपरा को साथ लेकर आगे बढ़ता गया। RSS ने हिंदू त्यौहारों को शाखाओं पर भी मनाया। जहाँ वामपंथ को भारत की पहचान से समस्या थी तो वहीं RSS ने उसी पहचान को समाधान माना। वामपंथ के लिए धर्म और राष्ट्र सब संदेह के घेरे में रहे तो RSS ने उन्हीं के सहारे लोगों को एकजुट किया।

हिंसा VS सेवा: वामपंथ VS RSS

हिंसा का प्रश्न इस वैचारिक जंग का एक अहम पहलू रहा है। वामपंथी आंदोलनों का एक बड़ा हिस्सा सशस्त्र संघर्ष और क्रांति की अवधारणा से जुड़ा रहा। नक्सलवाद इसका चरम उदाहरण है, जहाँ ‘देश के खिलाफ युद्ध’ को वैध ठहराया गया। इसके चलते जनजातीय क्षेत्रों में विकास रुक गया, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ प्रभावित हुईं और आम नागरिक हिंसा के बीच पिसता रहा। वामपंथियों के हमलों में सैकड़ों सुरक्षाबलों के जवान मारे गए।

केरल में वामपंथियों ने RSS के कार्यकर्ताओं तक को निशाना बना गया। वैचारिक युद्ध को हत्याओं तक पहुँचा दिया गया, स्वयंसेवकों को मारा-पीटा गया। इसके उदाहरण के तौर पर सदानंदन मास्टर जैसे स्वयंसेवक हैं। कम्युनिस्टों ने 1994 में उनके पैर काट दिए और अब उन्हें राष्ट्रपति ने राज्यसभा के सांसद के तौर पर मनोनीत किया है।

इसके उलट RSS ने सैद्धांतिक रूप से हिंसा को संगठनात्मक साधन के रूप में स्वीकार नहीं किया। 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध और लगातार आलोचनाओं के बावजूद RSS ने स्वयं को सामाजिक कार्यों, आपदा राहत, शिक्षा और सेवा के माध्यम से स्थापित किया। इससे उसकी छवि एक ‘ग्रासरूट’ संगठन की बनी, ना कि केवल विरोध की राजनीति करने वाले समूह की।

RSS देश के दूर-दराज और उपेक्षित इलाकों में सेवा कार्यों के माध्यम से लाखों लोगों के जीवन में बदलाव ला रहा है। वनवासी कल्याण आश्रम से लेकर सेवा भारती जैसे दर्जनों संगठन अपने-अपने तरीके से सेवा कार्यों में जुटे हैं। वनवासी कल्याण आश्रम देशभर में 20,000 से अधिक एकल विद्यालय चला रही है, जिनके माध्यम से लगभग 30 लाख आदिवासी बच्चों को बुनियादी शिक्षा मिल रही है। एकल विद्यालय की व्यवस्था सरल लेकिन प्रभावशाली है, जहाँ एक ही शिक्षक पूरे गाँव के बच्चों को पढ़ाता है।

वहीं, सेवा भारती जैसे संगठन शहरों और गाँवों दोनों में गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए काम कर रहे हैं- चाहे वह स्वास्थ्य शिविर हों, आपदा के समय राहत पहुँचाना हो या महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना। ऐसे ही प्रयासों के जरिए आरएसएस से प्रेरित करीब 1.6 लाख से अधिक सेवा प्रकल्प देशभर में चल रहे हैं, जहां स्वयंसेवक बिना किसी स्वार्थ के समाज को जोड़ने और राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहे हैं। ये काम किसी विदेशी फंड या बड़े प्रचार के सहारे नहीं बल्कि लाखों स्वयंसेवकों के त्याग और समाज की भागीदारी से चल रहे हैं। RSS ने सेवा को समाज को स्थायी रूप से सशक्त करने का माध्यम मान लिया है।

वामपंथी शासन की विफलता वैचारिक पतन की बड़ी वजह

करीब दो दशक पहले तक भारतीय राजनीति में वामपंथी दल एक निर्णायक ताकत माने जाते थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट पार्टियों ने कुल 59 सीटें जीती थीं और केंद्र की सत्ता में उनकी भूमिका इतनी प्रभावी थी कि UPA सरकार बाहर से उनके समर्थन पर टिकी थी। इसके बाद शुरू हुआ पतन अब लगभग अस्तित्व के संकट तक पहुँच चुका है।

2004 में 59 सीटों से शुरू हुआ लेफ्ट का सफर 2009 में सिमटकर 24 सीटों पर आ गया। 2014 में यह संख्या घटकर सिर्फ 10 रह गई और 2019 में तो वामपंथ महज 5 लोकसभा सीटों तक सीमित हो गया। 2024 के लोकसभा चुनाव में भले ही कुल सीटों की संख्या थोड़ी बढ़ी हो लेकिन यह बढ़त भी राजनीतिक तौर पर रसातल में जाने का संकेत ही है। इनमें वामपंथी पार्टियों को 8 सीटें मिलीं।

राज्यों में भी कमोबेश स्थिति यही है। वामपंथी शासन की विफलताओं का सबसे बड़ा उदाहरण पश्चिम बंगाल है। CPI(M) ने 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक राज्य की सत्ता संभाली। इतनी लंबी अवधि किसी भी दल को एक मजबूत विकास मॉडल खड़ा करने का अवसर देती है लेकिन बंगाल में उलटा हुआ। इस दौर में राज्य से उद्योग पलायन करता गया, कृषि विकास की रफ्तार थम गई और गरीबों की स्थिति देश के कई अन्य राज्यों की तुलना में और बदतर हो गई। स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था चरमरा गई, भ्रष्टाचार बढ़ा और राजनीतिक हिंसा आम होती चली गई। नतीजा यह हुआ कि 2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने लेफ्ट फ्रंट को सत्ता से बाहर कर दिया। आज बंगाल में पार्टी लगभग अप्रासंगिक हो चुकी है।

कुछ ऐसा ही हाल त्रिपुरा में देखने को मिला। यहाँ वामपंथी दल 1993 से 2018 तक यानी 25 साल तक सत्ता में रहे। लंबे शासन के बावजूद वे जनता की नई आकांक्षाओं के साथ खुद को ढाल नहीं सके। एंटी-इनकंबेंसी, संगठनात्मक जड़ता और बदलते राजनीतिक माहौल को न समझ पाने की कीमत उन्हें 2018 में चुकानी पड़ी, जब बीजेपी ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया।

आज अगर भारत में वामपंथ का कोई आखिरी मजबूत गढ़ माना जाता है तो वह केरल है। राज्य में फिलहाल वामपंथी सरकार है लेकिन राजनीतिक स्तर पर यहां भी चेतावनी के संकेत साफ हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में पूरे केरल से वामपंथी दलों को सिर्फ एक सीट मिली। 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में भी गैर-लेफ्ट फ्रंट ने बढ़त बनाई है और पहली बार तिरुवनंतपुरम में बीजेपी का मेयर बना। यह बदलाव बताता है कि जिस केरल को लेफ्ट का अभेद्य किला माना जाता था, वहाँ भी जमीन खिसक रही है।

वामपंथी पार्टियों का पतन सिर्फ चुनावी गणित का मामला नहीं है बल्कि उनके पास कोई ऐसा ठोस विकास मॉडल नहीं है जिसे वे देश के सामने प्रेरणादायक रूप में रख सकें। दशकों तक सत्ता में रहने के बावजूद न बंगाल, न त्रिपुरा और न ही अन्य राज्यों में वे ऐसा आर्थिक और सामाजिक ढाँचा खड़ा कर पाए जिसे उनकी उपलब्धि कहा जा सके। नतीजा यह है कि कभी राष्ट्रीय राजनीति को दिशा देने वाली लेफ्ट पार्टियाँ अब धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई हैं।

बौद्धिक मोर्चे पर भी पिछड़ता वामपंथ

कई दशकों तक भारत के विश्वविद्यालयों, मीडिया और साहित्यिक जगत पर वामपंथी विचारधारा का गहरा असर रहा। JNU हो, दिल्ली यूनिवर्सिटी हो या हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी हो इन जैसे परिसरों में वामपंथी छात्र संगठनों का वर्चस्व था और मीडिया में भी मार्क्सवादी विश्लेषण को ही बौद्धिक मानक माना जाता था। आज यह वामपंथ बौद्धिक विमर्श लगातार कमजोर पड़ता जा रहा है।

इस गिरावट का एक बड़ा कारण 1991 में सोवियत संघ का पतन रहा। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि भले ही भारत कभी कम्युनिस्ट देश नहीं रहा लेकिन भारतीय वामपंथ वैश्विक कम्युनिज्म से वैचारिक प्रेरणा लेता था। सोवियत संघ के टूटने से उस वैचारिक आधार को गहरा झटका लगा। इसके बाद भी भारतीय लेफ्ट आत्ममंथन करने के बजाय पुरानी भाषा और संरचनाओं में उलझा रहा जिससे नए विचारों का अभाव साफ दिखाई देने लगा।

विश्वविद्यालयों में यह बदलाव और स्पष्ट है। कभी वामपंथी राजनीति के गढ़ माने जाने वाले जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी में अब दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी विचारों का असर बढ़ा है। एक अध्ययन के अनुसार, वामपंथ जाति जैसे जटिल सामाजिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से समझने और संबोधित करने में असफल रहा। वर्ग संघर्ष तक सीमित सोच ने उसे सामाजिक रूप से कमजोर किया और छात्रों के बड़े वर्ग से दूरी बढ़ी।

मीडिया में भी वामपंथी प्रभाव कम हुआ है। भारतीय लेफ्ट संगठनात्मक बिखराव और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। बदलते डिजिटल दौर और नए पाठक वर्ग के साथ तालमेल न बैठा पाना भी उसकी कमजोरी बना है। वामपंथ की इस वैचारिक कमजोरी से जो खाली जगह बनती गई उसे RSS और उससे जुड़े विचारक भरते गए।

RSS और उससे जुड़े विचारकों ने इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रवाद को लेकर एक वैकल्पिक बौद्धिक विमर्श सामने रखा। यह विमर्श केवल वामपंथ के विरोध या प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रहा बल्कि हिंदू परंपरा को आधुनिक संदर्भ में समझने और प्रस्तुत करने का प्रयास रहा है। इसके माध्यम से समाज को जोड़ने और साझा सांस्कृतिक पहचान पर चर्चा को आगे बढ़ाया गया।

इतिहास के क्षेत्र में RSS से जुड़े विचारकों ने वैकल्पिक चर्चाएँ प्रस्तुत कीं, स्कूली किताबों तक में जो नैरेटिव वामपंथी लेखकों द्वारा बनाया गया था उसको क्रमश: तोड़ने की जारी हैं। सही और वैकल्पिक इतिहास छात्रों और समाज के समक्ष लाया जा रहा है। RSS के इतिहास संकलन समिति या अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना जैसे संगठन ‘इतिहास, संस्कृति, परम्परा आदि के क्षेत्र में प्रामाणिक, तथ्यपरक तथा सर्वांगपूर्ण इतिहास-लेखन’ के काम में जुटे हैं। इसे राष्ट्रवाद को पश्चिमी नजरिए से नहीं बल्कि भारतीय दृष्टिकोण से समझने में मदद मिल रही है। संघ से जुड़े सुरुचि जैसे प्रकाशन राष्ट्रवाद और संघ से जुड़ी पुस्तकें लोगों को उपलब्ध करवा रहे हैं। ऐसे कई संगठन हैं जो इसे ध्यान में रखकर बौद्धिक विमर्श की एक जमीन तैयार कर रहे हैं।

संस्कृति के स्तर पर RSS ने ‘अखंड भारत’ जैसी अवधारणाओं को मुख्य विमर्श का हिस्सा बनाया है जिसमें प्राचीन भारत के सांस्कृतिक प्रभाव को दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य क्षेत्रों तक फैला हुआ बताया गया। इस नजरिए में इतिहास को केवल राजनीतिक घटनाओं से बढ़कर सांस्कृतिक संपर्क, विचारों और परंपराओं के आदान-प्रदान के रूप में देखा गया। जो सीधे तौर पर भारतीय सभ्यता की निरंतरता और व्यापक प्रभाव को दिखाता है। समय के साथ RSS ने खुद को बदला है और डिजिटल युग सोशल मीडिया और नए संचार माध्यमों के जरिए संघ का दृष्टिकोण व्यापक समाज में लोगों तक पहुँचा है।

क्यों हाशिए पर चला गया वामपंथ?

भारत में वामपंथ की वैचारिक और राजनीतिक गिरावट के पीछे उसका मूल दृष्टिकोण एक बड़ा कारण रहा है। वामपंथ की राजनीति का केंद्र हमेशा सत्ता, राज्य और सिस्टम रहा। उसका मानना था कि सरकार और संस्थानों पर नियंत्रण के जरिए समाज को बदला जा सकता है। यही वजह रही कि जैसे-जैसे वामपंथ चुनावों में कमजोर पड़ा, वैसे-वैसे उसका सामाजिक और बौद्धिक प्रभाव भी सिकुड़ता चला गया। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में सत्ता से बाहर होते ही उसका जमीनी आधार तेजी से ढहता दिखा।

इसके उलट, RSS ने सत्ता को कभी अंतिम लक्ष्य नहीं माना। उसके लिए सत्ता की अनूकुलता एक साधन भर रही। सरकारें बदलीं, राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलीं लेकिन RSS का संगठन और उसका सामाजिक काम जमीन पर लगातार चलता रहा। यही कारण है कि सत्ता में उतार-चढ़ाव के बावजूद उसका विस्तार रुका नहीं और समाज में उसकी पकड़ बनी रही।

वामपंथ की एक बड़ी वैचारिक कमजोरी यह रही कि उसने खुद को ‘प्रगतिशील’ और जनता को ‘पिछड़ा’ मान लिया। उसने ऊपर से समाज को दिशा देने का रवैया अपनाया। इस सोच ने आम लोगों और वामपंथी नेतृत्व के बीच दूरी पैदा कर दी। वहीं, RSS ने समाज को उपदेश देने के बजाय उसके साथ चलने की रणनीति अपनाई। शाखाओं, सेवा कार्यों और अन्य गतिविधियों के जरिए उसने लोगों से सीधा जुड़ाव बनाया।

समय के साथ वामपंथ का विमर्श आम समाज से खिसकता चला गया। किसान, मजदूर या छोटे कस्बों के युवाओं की भाषा और समस्याएँ उसकी राजनीति और लेखन में कम होती गईं। उसका दायरा विश्वविद्यालयों, अंग्रेजी अखबारों, सेमिनार हॉल और एयर-कंडीशंड बहसों तक सिमट गया। नतीजा यह हुआ कि आम जनता खुद को उस विमर्श से जुड़ा महसूस नहीं कर पाई।

हर चुनावी और वैचारिक असफलता के बाद वामपंथ ने आत्ममंथन करने के बजाय जनता, मीडिया या सिस्टम को दोष देना ज्यादा आसान समझा। इसके उलट, RSS ने समय के साथ जरूरत पड़ने पर अपनी रणनीति, काम करने के तरीके में बदलाव किए लेकिन अपने मूल विचार से समझौता नहीं किया। यही फर्क आज साफ दिखाई देता है।

आज वामपंथ हताश और बिखरा हुआ नजर आता है। वहीं, RSS बिना ज्यादा शोर किए, बिना खुद को इकलौता बुद्धिजीवी घोषित किए लगातार समाज में अपनी जड़ें गहरी करता गया। यही अंतर भारत में वामपंथ की गिरावट और नए सामाजिक-राजनीतिक विमर्श के उभार को समझने की कुंजी है।

2026: भारत का वर्ष- नेतृत्व, निर्णायकता और दिशा

जब हम एक और अंग्रेजी नववर्ष में प्रवेश कर चुके हैं, तो इतिहास के दो वाक्य स्मृति में कौंधते हैं। एक, गोपाल कृष्ण गोखले का कथन कि ‘बंगाल जो आज सोचता है, भारत कल सोचता है’। दूसरा, लोकसभा में सुषमा स्वराज का निर्भीक उद्घोष कि ‘हाँ, हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम वंदे मातरम् गाने की वकालत करते हैं…’।

सनातन परंपरा में भले ही अंग्रेजी नववर्ष का कोई आध्यात्मिक महत्व न हो, किंतु वैश्विक समयबोध में यह केवल कैलेंडर परिवर्तन नहीं रह गया है। कुछ वर्ष ऐसे होते हैं, जो इतिहास की धुरी मोड़ देते हैं। 2026 ऐसा ही वर्ष है।

पिछले कई दशकों तक भारत से यह अपेक्षा की जाती रही कि वह हर मुद्दे पर ‘स्पष्टीकरण’ दे। कभी कश्मीर पर, कभी नागरिकता कानून पर तो कभी अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्रबोध पर।

लेकिन 2026 में भारत उस दौर से आगे निकल चुका है। आज का भारत सफाई नहीं देता। आज का भारत दिशा देता है। विमर्श निर्धारित करता है।

यह वर्ष उस आत्मविश्वास का प्रतीक है, जो केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं, बल्कि सभ्यतागत चेतना से उपजता है। वही चेतना जिसने भारत को सहस्राब्दियों तक जीवित रखा।

नववर्ष 2026 का संदेश: भारत- उदीयमान शक्ति नहीं, निर्णायक शक्ति

1 जनवरी 2026 से भारत BRICS की अध्यक्षता सँभाल रहा है। यह महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि वैश्विक विमर्श की धुरी सँभालने का क्षण है।

आज की विश्व व्यवस्था में भारत;

  • ग्लोबल साउथ की स्वाभाविक आवाज है
  • पूर्व और पश्चिम के बीच संतुलन का केंद्र है
  • लोकतंत्र, तकनीक और संस्कृति का जीवंत संगम है

जहाँ अमेरिका नेतृत्व खोने की बेचैनी में है, जहाँ यूरोप अपनी पहचान और ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, वहीं भारत स्थिरता और विश्वास का आधार बनकर उभरा है।

राष्ट्रवाद अब गाली नहीं, मॉडल है

एक समय था जब राष्ट्रवाद को पिछड़ेपन का पर्याय बताया गया। भारत को समझाया गया कि ‘सेकुलर और आधुनिक’ दिखने के लिए अपनी जड़ों से दूरी बनानी होगी। सुषमा स्वराज के जिस संबोधन का मैंने शुरुआत में जिक्र किया है, वह इसी टीस से निकली थी।

लोकसभा में 11 जून 1996 का उनका यह संबोधन इस विकृति के विरुद्ध चेतावनी थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि देश को यह समझना होगा कि धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक स्वरूप क्या है और उसे किस प्रकार विकृत किया गया।

इसी विकृति का परिणाम बंगाल ने भी भुगता। हिंदुओं के नरसंहार के बाद जिस प्रदेश ने विभाजन झेला, स्वतंत्रता के पश्चात उसी पर तुष्टिकरण, वामपंथी हिंसा और घुसपैठ को थोप दिया गया।

आज पश्चिम बंगाल पुनः वैचारिक और सामाजिक संकट के चौराहे पर खड़ा है। 2026 का विधानसभा चुनाव कोई साधारण राजनीतिक प्रक्रिया नहीं है। यह बंगाल के आत्मबोध और राष्ट्रीय चेतना की परीक्षा है। आज के भारत की सोच के साथ खड़ा होने का वर्ष है। फिर से उस वैभव की ओर लौटने का वर्ष है, जिसने गोखले को वह बात कहने को प्रेरित किया था, जिसके बिना आज भी बंगाल की बात पूर्ण नहीं होती है।

सेकुलरिज्म का अंत, सभ्यतागत राष्ट्रवाद का उदय

2026 में वह कृत्रिम सेकुलर विमर्श बिखर चुका है, जिसने राष्ट्रबोध को अपराधबोध में बदल दिया था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद को पुनः सम्मानजनक और वैश्विक रूप से स्वीकार्य बनाया है।

आज भारत का राष्ट्रवाद;

  • समावेशी है
  • आत्मविश्वासी है
  • वैचारिक रूप से स्पष्ट है
  • वैश्विक रूप से स्वीकार्य है

भारत ने यह सिद्ध किया है कि आधुनिकता के लिए आत्मविस्मरण आवश्यक नहीं और सहयोग के लिए संप्रभुता का त्याग अनिवार्य नहीं है।

ऑपइंडिया की भूमिका: सिर्फ खबर नहीं, वैचारिक हस्तक्षेप

नववर्ष 2026 में ऑपइंडिया की भूमिका केवल समाचार देने तक सीमित नहीं है। यह उस नैरेटिव के विरुद्ध खड़ा मंच है, जिसने;

  • भारत को निरंतर अपराधी ठहराया
  • हिंदू समाज को अपराध बोध से भरा
  • राष्ट्रहित को संदेह का विषय बना दिया

ऑपइंडिया का लक्ष्य स्पष्ट है- तथ्यों के साथ निर्भीकता और राष्ट्र के साथ स्पष्ट प्रतिबद्धता।

2026: किसका वर्ष?

यह वर्ष उनका नहीं होगा;

  • जो विदेशी प्रमाण-पत्र के बिना कुछ नहीं मानते
  • जो भारत की प्रत्येक उपलब्धि में संशय खोजते हैं
  • जो अपनी ही सभ्यता से संकोच करते हैं

यह वर्ष उनका होगा;

  • जो भारत को नेतृत्व करते देखना चाहते हैं
  • जो इतिहास से लज्जित नहीं, प्रेरित होते हैं
  • जो जानते हैं कि प्रगति जड़ों से कटकर नहीं आती

2026 का संकल्प

इस नववर्ष, ऑपइंडिया अपने पाठकों से केवल एक ही संकल्प चाहता है- सच के पक्ष में खड़े रहिए, भ्रम से लड़िए, और भारत को समझने में गर्व महसूस कीजिए।

2026 भारत के लिए परीक्षा नहीं, उद्घोषणा है। यह उस भारत की घोषणा है जो अब पूछता नहीं, बताता है।