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‘औरंगजेब के खिलाफ सबूत लेकर आओ’: सेंसर बोर्ड के सईद रबी हाशमी ने ‘छत्रपति सम्भाजी’ फिल्म को नहीं होने दिया रिलीज, 8 साल में बन कर तैयार हुई थी मूवी

आरोप है कि ‘छत्रपति सम्भाजी’ फिल्म को सेंसर बोर्ड के अधिकारी सईद रबी हाशमी ने प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया है। यह फिल्म 26 जनवरी, 2024 को रिलीज होनी थी लेकिन इसे सेंसर बोर्ड ने प्रमाण पत्र देने से मना कर दिया। इसको लेकर अब निर्माता ने सेंसर बोर्ड पर आरोप लगाए हैं कि लिखित सबूत दिए जाने के बाद भी प्रमाण पत्र नहीं दिया गया।

छत्रपति सम्भाजी फिल्म के निर्माता निर्देशक राकेश सुबेसिंह दुलगज ने कहा है कि उन्होंने सेंसर बोर्ड के सामने अपनी फिल्म की स्क्रीनिंग भी करवा दी थी लेकिन इसके बाद भी उन्हें 26 जनवरी तक प्रमाण पत्र नहीं दिया गया। इसके लिए सेंसर बोर्ड के मुंबई क्षेत्राधिकारी सईद रबी हाशमी ने औरंगजेब के खिलाफ सबूत दिखाने की बात कही।

दुलगज ने बताया है कि यह फिल्म पिछले 8 साल से बन रही है। फिल्म मराठा शासक छत्रपति सम्भाजी के जीवन के ऊपर बनी है। यह फिल्म मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में रिलीज होनी थी। इसको लेकर दुलगज ने सेंसर बोर्ड के समक्ष अपनी फिल्म के प्रमाण पत्र के लिए आवेदन दिया था। उन्होंने बताया कि 12 जनवरी, 2024 को सेंसर बोर्ड से फ़ोन आया कि अगले दिन उनकी फिल्म की स्क्रीनिंग रखी गई है। इसके बाद 13 जनवरी की सुबह उन्होंने पूरी फिल्म अधिकारियों को दिखा दी।

फिल्म देखने के बाद यहाँ के अधिकारियों ने कहा कि उन्हें यू/ए प्रमाण पत्र दिया जा रहा है। उनसे कहा गया कि 25 जनवरी, 2024 तक उन्हें प्रमाण पत्र दे दिया जाएगा। इसको लेकर दुलगज ने अपनी फिल्म की रिलीज डेट 26 जनवरी, 2024 को रख दी। हालाँकि, उन्हें प्रमाण पत्र नहीं दिया गया। दुलगज ने कहा कि उनसे जो बदलाव के लिए कहा गया था वह उन्होंने कर दिए थे लेकिन फिर भी उनकी फिल्म को रोका गया।

दुलगज ने कहा कि मुंबई क्षेत्रीय कार्यालय में नए आए अधिकारी सईद रबी हाशमी ने इस बात को लेकर सबूत दिखाने की माँग की कि क्या औरंगजेब ने छत्रपति सम्भाजी पर इस्लाम कबूलने का दबाव डाला था। इसको प्रमाणित करने वाली किताबें दुलगज से सेंसर बोर्ड में जमा कराने को कहा गया है।

गौरतलब है कि मुग़ल शासक औरंगजेब ने मराठा छत्रपति सम्भाजी महाराज को बंधक बनाकर कई दिनों तक यातनाएं दी थी और उन पर इस्लाम कबूलने का दबाव डाला था। जब उन्होंने इस्लाम कबूलने से मना कर दिया तो उन्हें मार दिया गया था। छत्रपति सम्भाजी के साथ हुई बर्बरता के विषय में यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

जब अवध के नवाब को हराकर राजा देवीबख्श सिंह ने अयोध्या में बनवाया राम चबूतरा: मौलवी के ऐलान पर हुआ था हिन्दुओं का नरसंहार, राजा जयदत्त सिंह भी हो गए थे बलिदान

अयोध्या में 22 जनवरी 2024 को भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा उनकी जन्मभूमि पर बनी मंदिर में हो गई। इसको लेकर दुनिया भर के हिन्दू उल्लासित हैं। उन रामभक्तों की आत्मा को भी शांति मिल रही होगी, जिन्होंने मुगल से लेकर मुलायम सिंह यादव के काल तक इसके लिए अपने प्राणों की आहुति दी। ऑपइंडिया की टीम ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में कई ऐसे बलिदानियों और घटनाओं से दुनिया को परिचित कराया, जिन्हें लोग या तो भूल चुके थे या वामपंथी इतिहासकारों ने साजिशन उन्हें स्थान नहीं दिया।

अयोध्या और उसके आसपास के क्षेत्र में अपने ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान ऑपइंडिया ने जब रामजन्मभूमि और इसे जुड़े मामलों की पड़ताल शुरू की तो हमें कई ऐसी जानकारियाँ मिलीं, जो लोगों को नहीं पता थीं। ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान हमें मुगलों की क्रूरता कई जानकारियाँ मिलीं। इनमें गोंडा नरेश राजा देवीबख्श सिंह और भीटी के राजा जयदत्त सिंह के बलिदान के साथ-साथ मौलाना अमीर अली द्वारा छेड़ा गया जेहाद और 1850 के आसपास अयोध्या में हुआ अभूतपूर्व दंगा भी शामिल है।

राजा देवीबख्स ने ब्रिटिश काल में छेड़ा युद्ध

इसके पहले वाली स्टोरी में हमने रामजन्मभूमि की रक्षा में अपने 80 हजार सैनिकों के साथ बलिदान हुए भीटी नरेश महताब सिंह के बारे में बताया था। उस स्टोरी में हमने यह भी बताया था कि मीर बाकी ने राजा महताब सिंह और उनके सैनिकों के खून से गारे बनाकर मस्जिद की नींव रखी थी। राजा महताब सिंह के बारे में और जानकारी जुटाई तो पता चला कि उनकी अगली पीढ़ी भी रामजन्मभूमि की रक्षा में वीरगति को प्राप्त हो गई थी।

भीटी नरेश राजा महताब सिंह राम मंदिर को बचाते हुए सन 1527-28 के आसपास वीरगति को प्राप्त हो गए थे। राजा महताब सिंह की वीरगति प्राप्त करने के लगभग 300 साल बाद उन्हीं के वंशज राजा जयदत्त सिंह रामजन्मभूमि की रक्षा करते हुए बलिदान हो गए थे। यह लड़ाई 1847 से 1857 के बीच हुई थी। इसी दौरान गोंडा के राजा देवीबख्श सिंह भी राम मंदिर के लिए लड़े और वहाँ राम चबूतरा बनवाया।

ऑपइंडिया ने राजा देवीबख्श सिंह के सेनापति रहे गुलाब सिंह बिसेन की 5वीं पीढ़ी के वंशज जितेंद्र सिंह बिसेन से बात की। जितेंद्र सिंह बिसेन के मुताबिक, ब्रिटिश फ़ौज में वो तमाम लड़ाके शामिल हो चुके थे, जो कभी मुगल फ़ौज के लिए मार-काट करते थे। मुगलों की कमजोरी को भाँपते हुए तत्कालीन गोंडा नरेश राजा देवीबख्श सिंह द्वारा विवादित ढाँचे पर हमला कर दिया गया था। इस समय तक रामजन्मभूमि पूरी तरह से मुगलों के कब्ज़े में थी।

हालाँकि, रामभक्त छिटपुट हमले जारी रखे हुए थे और जन्मभूमि को वापस लेने के प्रयास कर रहे थे। इस दौरान अवध की गद्दी पर नवाब वाजिद अली शाह बैठा था। राजा देवीबख्श सिंह के हमले से वाजिद अली और उसकी फ़ौज बुरी तरह से पराजित हुई थी। आखिरकार राजा देवीबख्श सिंह की सेना ने रामजन्मभूमि के अंदर घुसने का रास्ता बना लिया। साथ ही विजय स्वरूप विवादित ढाँचे के पास एक राम चबूतरा बनवा दिया था।

जेहाद के लिए निकला था मौलवी अमीर अली

जितेंद्र सिंह आगे बताते हैं कि राम चबूतरा बनने और वाजिद अली शाह के हार की जानकारी मिलते ही आसपास के मुस्लिम जमींदार नाराज हो गए। इन्हीं में से एक था अमेठी का मौलवी अमीर अली। अमीर अली अपने साथ मुगलों की एक टुकड़ी लेकर अयोध्या कूच कर गया। वह रामजन्मभूमि से हिन्दुओं को पूरी तरह से बेदखल करते हुए राम चबूतरे को ध्वस्त करना चाहता था। इस समय तक हिन्दू भी रामजन्मभूमि पर पूजा-पाठ शुरू कर चुके थे।

मौलवी अमीर अली किसी भी हाल में ये पूजा-पाठ बंद करवाना चाहता था। उसके साथ कुछ और मुस्लिम जमींदार भी मिलकर अयोध्या की तरफ बढ़ चले। इधर राजा देवीबख्श सिंह अंग्रेजों से लड़ाई लड़ते हुए नेपाल सीमा की ओर तराई तक चले गए थे। वो जीवन भर अंग्रेजों के हाथ नहीं लगे और अंतिम सांस उन्होंने नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहकर युद्ध लड़ते हुए ली थी।

अंग्रेजों ने उनके ठिकानों और सहयोगियों को खोज-खोज कर खत्म करना शुरू कर दिया था। आज भी राजा देवीबख्श सिंह के नाम पर गोंडा में क्रांति उपवन पार्क बना हुआ है। इस पार्क में उनका और उनके साथ 1857 की क्रान्ति में बलिदान हुए अन्य योद्धाओं का स्मारक बना हुआ है। इसी स्मारक में जितेंद्र सिंह बिसेन के पूर्वज गुलाब सिंह का भी नाम लिखा हुआ है।

गोंडा का क्रांति उपवन, जहाँ बना है राजा देवी बख्श सिंह और गुलाब सिंह का स्मारक

जितेंद्र सिंह बिसेन आगे चलकर हिन्दू महासभा से जुड़ गए और अयोध्या के राम मंदिर की लड़ाई लड़ी। रामलला विराजमान का केस हिन्दू महासभा ने ही लड़ा था। जितेंद्र सिंह बिसेन इसे अपना सौभाग्य बताते हैं कि उनके पुरखों द्वारा जलाई गई अलख का समापन होते हुए उन्होंने न सिर्फ स्वयं देखा, बल्कि उसमें अपने पूर्वजों की तरह अधिकतम सहयोग भी किया।

भीटी के राजा जयदत्त हुए बलिदान

राजा जयदत्त के वंशज प्रणव प्रताप सिंह ऑपइंडिया को बताते हैं कि जब मुगल रियासतदारों और मौलवियों की फ़ौज अयोध्या की तरफ बढ़ी तब इसकी जानकारी मिलते ही आसपास के हिन्दू राजा भी एकजुट होने लगे। उन्होंने अयोध्या धर्मक्षेत्र से दूर घेरा बना लिया। यह समय काल 1850 के आसपास का बताया जा रहा है। उस समय तक भारत पर अंग्रेजों ने पूरी तरह आधिपत्य स्थापित कर लिया था।

इस घेरे को तोड़ने का प्रयास मौलवी अमीर अली ने रौनाही के पास किया। यहाँ मोर्चा मीर बाकी से लड़कर राम मंदिर के लिए पहला बलिदान देने वाले भीटी नरेश राजा महताब सिंह के वंशज राजा जयदत्त सिंह ने सँभाल रखा था। राजा जयदत्त सिंह ने अमीर अली का सामना बहादुरी से किया और युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हो गए। कहा जाता है कि इसमें अमीर अली भी अपनी फ़ौज सहित ढेर हो गया था।

राजा जयदत्त की वीरता पर आज भी अवध क्षेत्र में लोकगीत गाए जाते हैं। कवीन्द्र लक्ष्मण दास ने लिखा है-
अवध विगारन हेतु जब, जवन जुरे चहुँ आय।
छोड़ि यात्रा कर लियो, कीन्हों समर सुभाय।
कुश पैंती सब छाँड़ि लिए, खड्ग भवानी दत्त।
अली अमारे सो भिरयो, समर सूर जयदत्त।

अर्थात – जब अयोध्या को बर्बाद करने के लिए भीड़ जुटी थी, तब हिन्दू राजा तीर्थयात्रा आदि को छोड़कर युद्ध के मैदान में आ गए थे। हाथ में ली हुई पूजा-पाठ की सामग्री को एकतरफ रखकर तब सम्राटों ने तलवारें उठा ली थीं। इन्हीं में से एक राजा योद्धा जयदत्त थे, जो अमीर अली से लड़े थे और शहीद हो गए थे।

राजा जयदत्त के जर्जर महल में आज भी दिखती है धार्मिकता

बाहर लड़ रहीं थीं सेनाएँ, अंदर हो रहा था दंगा

फैज़ाबाद गजेटियर के मुताबिक, जब मुस्लिम जमींदार और मौलवियों के साथ क्षत्रिय राजाओं की सेनाएँ लड़ रही थीं, ठीक उसी समय फैज़ाबाद शहर और राम मंदिर के आसपास हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच दंगा हो गया था। इतिहासकार कनिंघम बताते हैं कि अवध क्षेत्र में तब तक इतना बड़ा दंगा नहीं हुआ था। इस दंगे में हजारों लोगों की जान चली गई थीं।

कट्टरपंथी मुस्लिम किसी भी हाल में राम चबूतरे को तोड़ने पर आमादा थे। वहीं, हिन्दू पक्ष हर हाल में जन्मभूमि पर अपने पूजास्थल की रक्षा करने में जुटा था। दंगों के दौरान मुस्लिमों ने हिंदुओं महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को भी निशाना बनाया, जबकि हिंदुओं ने मुस्लिम महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को हाथ तक नहीं लगाया। दंगों में अयोध्या के संतों को भी निशाना बनाया गया था। हिंसा का यह दौर 1853 से 1859 तक चला था।

तब अंग्रेेज 1857 की क्रान्ति के दमन में लगे थे, इस मामले से दूर रहे। जब उन्होंने राष्ट्रव्यापी स्वतंत्रता संग्राम का दमन कर लिया, तब उन्होंने अयोध्या में हस्तक्षेप किया। तब तत्कालीन अंग्रेज अधिकारियों ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। जन्मभूमि के आसपास ब्रिटिश फौज तैनात कर दी गईं। अंत में राजाओं और हिन्दू जनता के बलिदान से राम चबूतरा सुरक्षित बचा रहा और वहाँ पूजा-पाठ जारी रहा।

अगली रिपोर्ट में हम आपको बताएँगे कि किस प्रकार से भीटी नरेश राजा महताब सिंह द्वारा राम मंदिर की रक्षा के लिए किए गए पहले बलिदान से नाराज होकर मुगल फ़ौज ने उनके राज्य में अत्याचार किया था।

अब तक ₹4500 करोड़ का दान, 10 गुना से भी अधिक हो गई रोज आने वाले भक्तों की संख्या: राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के बाद अब ‘रामायण सर्किट’ पर फोकस

अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए भक्तों का अगाध प्रेम और भक्ति देखते ही बन रही है। अयोध्या में भगवान राम के भव्य मंदिर के लिए जब से भूमि पूजन हुआ है, सिर्फ तब से अब तक रामलला को 4500 करोड़ रुपए से अधिक का दान मिल चुका है। भक्तों ने देश-दुनिया से रामलला के लिए जमकर प्यार लुटाया है। मंदिर खुलने के बाद महज कुछ दिनों में ही अब तक करोड़ों की संपत्ति रामलला को मिल चुकी है।

श्री राम जन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के प्रभारी प्रकाश गुप्ता ने कहा कि मंदिर खुलने के बाद से तो रामलला के प्रति भक्तों का प्रेम और भी बढ़ गया है। हर दिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु रामलला के दर्शन के लिए अयोध्या पहुंच रहे हैं। मंदिर के खुलने के पहले जहाँ प्रतिदिन औसतन 20-30 हजार श्रद्धालु आते थे, वहीं अब यह संख्या 2 लाख से अधिक हो गई है। रामलला के लिए आए दान में बड़ी राशि ऑनलाइन दान के माध्यम से दी गई है। इसके अलावा, भक्तों ने चेक, नकद और सोने-चाँदी के रूप में भी दान दिया है।

भूमि पूजन के महज एक माह में 3550 करोड़ की राशि

प्रकाश गुप्ता ने बताया कि राम मंदिर के भूमि पूजन के बाद में जो निधि समर्पण अभियान चलाया गया था, उस एक महीने के अभियान में लगभग 3550 करोड़ रुपये का दान आ गया था। उसी दान से बहुत सारे निर्माण कार्य हो रहे हैं। रामलला के लिए आए दान का उपयोग मंदिर के निर्माण, मंदिर के पास यात्री सुविधाओं के विकास और रामायण सर्किट के विकास के लिए किया जाएगा।

शुरुआती चार दिनों में करोड़ का दान

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद से ही आम लोगों के लिए खोले जाने के बाद से ही राम मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिल रही है। शुरुआती सिर्फ चार दिनों में ही 7 करोड़ 8 लाख रुपए दान में आए। आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक, रामलला दर्शन के प्रथम दिन 2 करोड़ 90 लाख, 24 जनवरी को 2 करोड़ 43 लाख, 25 जनवरी को 8 लाख 50 हजार वहीं गणतंत्र दिन 26 जनवरी के दिन एक करोड़ 15 लाख रुपए दान में मिले हैं।

भक्तों का मानना है कि रामलला के मंदिर निर्माण से देश में अमन, शांति और समृद्धि आएगी। इसलिए वे अपने सामर्थ्य के अनुसार दान दे रहे हैं। रामलला के दान से प्राप्त राशि का उपयोग मंदिर निर्माण, मंदिर के आसपास के विकास कार्यों और मंदिर के रखरखाव के लिए किया जाएगा। यह दान भक्तों के प्रेम और आस्था का एक अनूठा उदाहरण है। इस दान से रामलला के प्रति भक्तों के प्रेम और भक्ति का अंदाजा लगाया जा सकता है। रामलला के भक्तों ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि भगवान राम भारत के लोगों के दिलों में बसे हुए हैं।

खंड-खंड इंडी गठबंधन : राहुल गाँधी की जुबान और घटिया सेंस ऑफ ह्यूमर बना रेत का महल ढहने की वजह, यूपी-बिहार-दिल्ली में बैकफुट पर ऐसे गई कॉन्ग्रेस

राहुल गाँधी ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ पर निकले हुए हैं। इस यात्रा के साथ ही कॉन्ग्रेस पार्टी का दुर्भाग्य भी खुलकर सामने आ गया है। जिस I.N.D.I. गठबंधन के सहारे सत्ताप्राप्ति का सपना कॉन्ग्रेस देखने लगी थी, उस सपने को ग्रहण भी लग चुका है। पश्चिम बंगाल में यात्रा घुसी ही थी कि दीदी ने आँख दिखा दी और पश्चिम बंगाल में लगभग एकतरफा तरीके से चुनाव लड़ने का इशारा कर दिया, तो अगले पड़ाव बिहार में जिस गठबंधन को बेस बनाने की कोशिश हुई, उसका प्लेटफार्म ही उखड़ गया।

जी हाँ, जिस नीतीश कुमार ने बीजेपी के खिलाफ इस गठबंधन को खड़ा करने में पूरी ताकत झोंक दी थी, वही नीतीश कुमार इस गठबंधन से निकल गए हैं। बिहार मे NDA की सरकार आ गई है। पर इतने बड़े बदलाव आखिर हुए कैसे? अब जो जानकारियाँ निकल कर सामने आ रही हैं, वो बता रही हैं कि इन सबके पीछे राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी की अपरिपक्वता है।

‘इंडियन एक्सप्रेस’ में कूमी कपूर का एक लेख छपा है। इस लेख में विस्तार से बताया गया है कि कैसे राहुल गाँधी का ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ ही कॉन्ग्रेस की जड़ में मट्ठा साबित हुआ। उसमें भी कॉन्ग्रेस के रणनीतिकारों ने ऐसी गलतियाँ की कि पूरी कॉन्ग्रेस पार्टी को ही शर्मिंदा होना पड़ा।

उत्तर प्रदेश में 13 साल पहले स्वर्ग सिधारे नेता के नाम पर सीट की माँग

कॉन्ग्रेस पार्टी की नजर यूपी फतह पर थी। यहाँ वो समाजवादी पार्टी के साथ I.N.D.I. गठबंधन में है। इसके विस्तार की कोशिश में वो BSP से भी गठबंधन करना चाहती थी। समाजवादी पार्टी ने इसके लिए दो-टूक मना कर दिया। इसके बाद समाजवादी पार्टी पर दबाव बनाने के लिए कॉन्ग्रेस की तरफ से पहले तो 40 सीटों की माँग की गई, फिर मामला तीस पर आया और आखिर में बीस पर। यहाँ पर कॉन्ग्रेस पार्टी ने एक ऐसी सीट पर दावेदारी उस नेता के नाम पर कर दी, जिसे दुनिया से गए 13 साल का लंबा वक्त बीत चुका है।

फिर क्या था, सपा ने इसके बाद कॉन्ग्रेस को 11 सीटों का झुनझुना थमाने का ऐलान कर दिया। बताइए, कि जिस नेता के निधन पर कॉन्ग्रेस की हरियाणा सरकार ने 3 दिनों का राजकीय शोक 2010 में घोषित किया था, उसके नाम पर लोकसभा सीट माँगते समय कॉन्ग्रेस को कुछ याद भी नहीं था? इस घटना ने सपा को ये साबित करने का मौका दे दिया कि कॉन्ग्रेस पार्टी न तो जमीन पर है और न ही उसके नेता जमीन पर रहते हैं।

इस लेख को एक्स पर साझा कर वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने बताने की कोशिश की है कि कैसे कॉग्रेस पार्टी को यूपी, बिहार, पंजाब और दिल्ली में लग रहे झटकों के पीछे खुद कॉन्ग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी का ‘हाथ’ ही नहीं, सबकुछ है। उन्होंने लिखा, “दस साल पहले स्वर्ग सिधारे नेता के लिए कॉन्ग्रेस समाजवादी पार्टी से माँग रही थी सीट? ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में कूमी कपूर ने अपने पाक्षिक स्तंभ ‘इनसाइड ट्रैक’ में लिखा है कि कॉन्ग्रेस उत्तर प्रदेश की बांसगाँव सीट से महावीर प्रसाद को खड़ा करना चाहती थी। शुरुआती बातचीत में कॉन्ग्रेस की ओर से उनका नाम रखा गया। इस पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने याद दिलाया कि महावीर प्रसाद जी का दस साल पहले निधन हो चुका है। इसके बाद बातचीत वहीं ख़त्म हो गई और अब सपा ने कॉन्ग्रेस को ग्यारह सीटें देने का एकतरफ़ा ऐलान कर दिया। इसी तरह राहुल गाँधी ने अरविंद केजरीवाल से कहा कि इससे पहले कि वे न्याय यात्रा पर जाएँ और केजरीवाल जेल, कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी को सीटों का बँटवारा कर लेना चाहिए।

राहुल गाँधी का ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ पड़ा भारी

I.N.D.I. गठबंधन की आखिरी बैठक के बाद से इस गठबंधन में दरार काफी चौड़ी हो गई। दरअसल, नीतीश कुमार, जिन्होंने इस गठबंधन को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई, अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी की वजह से कॉन्ग्रेस ने उन्हें किनारे लगा दिया। उन्हें संयोजक पद पर तब बैठाने की पेशकश की गई, जब अध्यक्ष पद पर पहले से ही मल्लिकार्जुन खड़गे की नियुक्ति कर दी गई। मायने साफ है, नीतीश कुमार जिस उम्मीद के साथ इस गठबंधन को खड़ा कर रहे थे, उसी में उन्हें ‘छोटा’ बना दिया गया। वहीं, अरविंद केजरीवाल के सामने राहुल गाँधी ने ऐसा मजाक कर दिया कि अरविंद केजरीवाल उखड़ ही गए।

इस लेख के मुताबिक, राहुल गाँधी ने ‘आम आदमी पार्टी’ (AAP) के साथ सीट समझौते में ये कहकर तेजी लाना चाहते थे कि ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ पर निकलने और ‘अरविंद केजरीवाल के जेल जाने’ से पहले ही सीटों का समझौता हो जाए। ये बात अरविंद केजरीवाल को नागवार गुजरी। हालाँकि, राहुल गाँधी ने अपने कथित ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ की आड़ में ये सब बोला, लेकिन संदेश जहाँ जाना था, वो चला ही गया। इस बात को ANI की शेफ एडिटर स्मिता प्रकाश ने अपने ट्वीट में हाईलाइट भी किया है।

राहुल गाँधी की वजह से कमजोर पड़ा गठबंधन!

नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल.. ये ऐसे नेता हैं, जो बीजेपी विरोध की धुरी बन सकते थे। ये नेता अपने राज्यों में बेहद मजबूत भी हैं। हालाँकि ये साफ है कि ये नेता धीरे-धीरे इस इंडी गठबंधन से बाहर निकल ही चुके हैं। ऐसे में यदि अन्य दलों ने भी INDI गठबंधन छोड़ने का निर्णय लिया, तो यह भाजपा के लिए 2024 के लोकसभा चुनावों में फायदेमंद साबित हो सकता है। हालाँकि इससे क्षेत्रीय दलों का महत्व बढ़ भी सकता है, लेकिन एनडीए के एकजुट और ताकतवर रहकर चुनाव जीतने की सूरत में उनके लिए भी आगे की डगर चुनौतीपूर्ण होगी।

ऐसे में जिन राज्यों में हाल-फिलहाल विधानसभा चुनाव होने हैं, वहाँ भी क्षेत्रीय पार्टियों को दबदबा बरकरार रखने में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

जिस शिलालेख पर लिखी है सच्चाई उसे खरोंच कर तहखाने में फेंका, मलबा डाल कर दिया बंद: जिसे कहते हैं मस्जिद वहाँ ASI को मिले ‘रूद्र’ और ‘उमेश्वर’

ज्ञानवापी की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण रिपोर्ट ने 25 जनवरी 2024 को स्पष्ट कर दिया है कि जहाँ पर आज मस्जिद बनी हुई है, वहाँ कभी एक विशाल मंदिर हुआ करता था। इस रिपोर्ट में कई हैरान करने वाली जानकारियाँ सामने आई हैं। इससे स्पष्ट हुआ है कि यहाँ लम्बे समय से यह प्रयास चल रहा था कि मस्जिद के निर्माण और मंदिर के विध्वंस की जानकारियाँ और साक्ष्य मिटाए जाएँ। 800 से अधिक पन्ने की रिपोर्ट में ASI ने इन्हीं विषय में जानकारी दी है।

ASI की रिपोर्ट में बताया गया है कि ढाँचे के भीतर मंदिर का अस्तित्व प्रमाणित करने वाली कई कृतियों को जानबूझकर छुपाकर रखा गया था। ये सभी कृतियाँ (मूर्तियाँ, शिलाएँ, शिलालेख) उन तहखानों की जाँच में मिले हैं, जिन्हें जानबूझकर दीवालों और मलबों के सहारे बंद कर दिया गया था। ASI की रिपोर्ट बताती है कि ज्ञानवापी परिसर के पूर्वी हिस्से में 6 तहखाने हैं। इनमें से सीलबंद इलाके के दक्षिणी हिस्से में तीन और उत्तरी हिस्से में तीन हैं। इसके अलावा दो और तहखाने परिसर के नज दीक उत्तर के हिस्से में हैं।

तहखाने बंद किए, अंदर फेंक दी मूर्तियाँ, मलबे से भर दिया

ASI की रिपोर्ट बताती है कि इन तहखानों में कई काम में लिए जाते थे। रिपोर्ट ने स्पष्ट तौर पर बताया कि इनमें से अधिकाँश तहखानों को बंद कर दिया गया था। रिपोर्ट ने बताया है कि एक तहखाने को तो पत्थर की चिनाई से बंद कर दिया गया था। कुछ तहखानों को मलबा डालकर बंद किया गया था। ASI ने इनकी जाँच के लिए साफ़ कराया और इनके अंदर से वे प्रतीक निकाले, जो कि मंदिर के विषय में बताते हैं।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक दक्षिणी तहखानों में पाए हैं। इन तहखानों का नामकरण ASI ने S1-S6 तक किया है। ASI का कहना है कि S2 और S1 से घुसने के पाँच रास्ते हैं, लेकिन सभी को लखौरी ईंटों के द्वारा बंद किया गया या फिर यहाँ पत्थर लगाकर उनकी सीमेंट से चिनाई कर दी गई। इसी तरह S3 के सभी चार प्रवेश द्वारों को मिट्टी भरकर या फिर पत्थर रखकर बंद दिया गया।

तहखानों से निकली कृष्ण और विष्णु की मूर्तियाँ, शिवलिंग भी मिला

ASI की टीम जब S1 तहखाने में पहुँची तो उसे पता लगा कि इसके प्रवेश को जानबूझ कर ईंटों और मलबे से भरा गया था। इस मलबे को यहाँ की छतों में छेद करके रास्ता बंद किया गया तगा। यह भी बताया गया कि S2 तहखाना यहाँ पाई गई कलाकृतियों को भरने के लिए उपयोग में लाया गया था। इन तहखानो से एक छोटा मंदिर, भगवान विष्णु के विग्रह, शैव द्वारपाल और बजरंग बली की मूर्ति समेत कई अन्य टेराकोटा आकृतियाँ निकली हैं।

ज्ञानवापी में ASI रिपोर्ट में सामने आई मूर्ति

ASI रिपोर्ट से यह भी सामने आया है कि S2 तहखाने की पश्चिमी दीवाल वाले इलाके से बड़ी संख्या में शिवलिंग और योनिपट मिले हैं। यहाँ से विष्णु भगवान के विग्रह मिले हैं। इनमें से एक पूर्ण है और दूसरा उनकी बैठी हुई मुद्रा दिखाता है। यहाँ से कृष्ण भगवान की एक प्रतिमा और भगवान गणेश का पत्थर से निर्मित एक सिर भी मिला है। नंदी की भी दो तोड़ी हुई मूर्तियाँ भी बरामद की गई हैं। यहाँ कई अन्य प्रतीक भी मिले हैं, जिनकी पहचान नहीं हो पाई, क्योंकि वे काफी क्षत-विक्षत अवस्था में थे।

ज्ञानवापी में ASI रिपोर्ट

यहाँ संगमरमर का एक टूटा हुआ हिस्सा भी है, मिला जिस पर काले रंग से राम लिखा हुआ है। वहीं, बिना सिर वाली जो एक मूर्ति मिली है, उसे माना जा रहा है कि यह भगवान कृष्ण की मूर्ति है जिसे खंडित कर दिया गया है। इसके अलावा, एक मूर्ति का धड़ भी बरामद हुआ है। तहखाने से चिलम, हुक्का और लालटेन जैसी कई अन्य वस्तुएँ भी मिली हैं।

ज्ञानवापी में ASI रिपोर्ट में सामने आई मूर्ति

ASI की रिपोर्ट के आधार पर इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि ढाँचे के अंदर से हिन्दू देवी-देवताओं की कुल 55 मूर्तियाँ मिली हैं। इनमें से 15 शिवलिंग हैं। इसके अलावा भगवान विष्णु की तीन, भगवान गणेश की तीन, भगवान कृष्ण की दो, भगवान हनुमान की पाँच और नंदी की दो मूर्तियाँ मिली हैं।

कुल मिलाकर 259 पत्थर की आकृतियाँ बरामद की गई हैं। इनमें 55 पत्थर की मूर्तियाँ, 21 घरेलू सामग्री, 5 अभिलेख और 176 वास्तुशिल्प हैं। इसके अलावा, धातु के 113 समान और 93 सिक्के मिले हैं। इन सिक्कों में इनमें 40 ईस्ट इंडिया कंपनी, 21 क्वीन विक्टोरिया और तीन शाह आलम बादशाह-द्वितीय के सिक्के हैं।

हिन्दू शिलालेख निकले, इन पर रूद्र, उमेश्वर जैसे नाम

ज्ञानवापी परिसर के अंदर से मूर्तियों के अलावा कई अन्य साक्ष्य मिले हैं, जो इसे मंदिर होने की ओर इशारा करते हैं। ASI की रिपोर्ट में कहा गया है कि मस्जिद को बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए स्तम्भों पर कई ऐसी आकृतियाँ हैं, जिनका संबंध हिन्दू धर्म से है। इन्हें मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने में उपयोग किया गया है। इसके अलावा, मस्जिद के अंदर से 34 शिलालेख मिले हैं।

ये शिलालेख हिन्दू मंदिर की जानकारी से जुड़े हैं। ये शिलालेख देवनागरी, कन्नड़ और तेलुगु जैसी भाषाओं में लिखे गए हैं। इन पर रूद्र, उमेश्वर और जनार्दन जैसे नाम अंकित हैं। गौरतलब है कि रूद्र भगवान शिव को कहा जाता है। उमेश्वर शब्द उमा और ईश्वर से बना है। उमा देवी पार्वती को कहा जाता है। इसके अलावा, यहाँ एक शिलालेख मस्जिद की जानकारी देने वाला पाया गया है।

ASI की रिपोर्ट बताती है कि मस्जिद की जानकारी देने वाला शिलालेख में बताया गया है कि इस मस्जिद का निर्माण आलमगीर (मुगल आक्रांता औरंगजेब) ने वर्ष 1676-77 में करवाया था। इसमें वर्ष 1792-93 में इस मस्जिद की मरम्मत का भी जिक्र है। इस बार जब यह शिलालेख मिला तो इस पर से वे तारीखें खरोंच कर मिटा दी गई हैं।

कॉन्ग्रेस सरकार की पुलिस ने उतारा 108 फीट पर लहरा रहा हनुमान ध्वज, विरोध कर रहे ग्रामीणों को लाठी से पीटा: कर्नाटक के मंड्या का मामला

कॉन्ग्रेस के राज वाले कर्नाटक में हिन्दुओं द्वारा लगाया गया 108 फीट का भगवा हनुमान ध्वज पुलिस जबरदस्ती उतार दिया। इसका विरोध करने पर पुलिस ने हिन्दुओं पर लाठीचार्ज भी कर दिया। यह घटना कर्नाटक के मंड्या जिले के केरागोडू गाँव की है।

जानकारी के अनुसार, मंड्या जिले के केरागोडू गाँव में ग्रामीणों ने आपस में चंदा इकट्ठा करके एक 108 फीट लंबा पोल स्थापित किया था। इस पर भगवा ध्वज लगा था और आंजनेय (हनुमान जी को यहाँ आंजनेय कहा जाता है) की छवि थी। इसे गाँव के रंगमंदिर के पास लगाया गया था। बताया जा रहा है कि इसके लिए ग्राम पंचायत की भी अनुमति ले ली गई थी।

हालाँकि, गाँव के कुछ लोगों को यह पसंद नहीं आया और उन्होंने इसके विरुद्ध शिकायत कर दी। इस शिकायत के आधार पर मंड्या के प्रशासन ने शनिवार (27 जनवरी, 2024) को यहाँ पहुँच कर पोल से ध्वज हटा दिया था। यहाँ ध्वज हटाने के लिए प्रशासन भारी संख्या में पुलिस बल लाया था।

इस दौरान गाँव के लोग प्रदर्शन करते रहे और प्रशासन से अपील करते रहे कि यह ध्वज उन्होंने आपसी सहमति से लगाया है, इसके बाद भी प्रशासन नहीं माना। अजब ग्रामीणों ने अधिक प्रदर्शन किया तो उनको यहाँ से हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज तक कर दिया।

एक रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ध्वज हटाने के लिए रात का समय चुना गया। ध्वज शनिवार रात को हटाया गया। यहाँ हिन्दू रात से ही इकट्ठा होने लगे थे और आज सुबह (28 जनवरी, 2024) को यहाँ माहौल और तनावपूर्ण हो गया। प्रशासन के इस निर्णय से गुस्साए ग्रामीणों ने केरागोडू को बंद रखने का निर्णय लिया है।

ग्रामीणों ने विरोध में स्थानीय कॉन्ग्रेस विधायक रविंद्रकुमार के पोस्टर भी फाड़ दिए। कुछ लोगों ने उनके इस पूरे मामले के पीछे होने का आरोप लगाया है। यहाँ पर मौजूद बजरंग दल, भाजपा और जेडीएस के कार्यकर्ता लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं और भगवा ध्वज को दोबारा लगाए जाने की माँग कर रहे हैं। यहाँ महिलाओं के प्रशासन से उलझने और भक्तों के रोने की भी तस्वीरें सामने आई हैं। लोग स्थानीय विधायक पर भी काफी गुस्सा हैं।

‘संविधान निर्माताओं के लिए प्रेरणा स्रोत थे प्रभु राम’: अयोध्या प्राण प्रतिष्ठा के बाद PM मोदी की पहली ‘मन की बात’, बोले – जमीन पर काम करने वालों को मिला पद्म पुरस्कार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (28 जनवरी 2024) को ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 109वें एपिसोड में देश को संबोधित किया। पीएम मोदी ने कहा कि इस साल संविधान के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के भी 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं। साल 2024 के अपने पहले ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उन्होंने अयोध्या में हुए राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह की चर्चा की और रामराज्य का भी जिक्र किया।

पीएम मोदी ने कहा, “प्रभु राम का शासन हमारे संविधान निर्माताओं के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत था। इसलिए 22 जनवरी को अयोध्या में मैंने ‘देव से देश’ की बात की थी। ‘राम से राष्ट्र’ की बात की थी।” उन्होंने कहा कि अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के अवसर ने देश के करोड़ों लोगों को एकसूत्र में बाँध दिया है। सबकी भावना एक, सबकी भक्ति एक, सबकी बातों में राम, सबके हृदय में राम।

महिला सशक्तिकरण को लेर पीएम मोदी ने कहा कि इस बार 26 जनवरी की परेड अद्भुत रही। परेड में केंद्रीय सुरक्षा बलों और दिल्ली पुलिस की महिला टुकड़ियों ने कदमताल शुरू किया तो सभी गर्व से भर उठे। इस बार परेड में मार्च करने वाले 20 दस्तों में से 11 दस्ते महिलाओं के ही थे। झाँकी में भी सभी महिला कलाकार थीं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में करीब डेढ़ हज़ार लड़कियों ने हिस्सा लिया।

पीएम मोदी ने कहा, “इस बार 13 वुमेन एथलीट को अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। इन वुमेन एथलीट ने अनेकों बड़े टूर्नामेंटों में हिस्सा लिया और भारत का परचम लहराया। बदलते हुए भारत में हर क्षेत्र में बेटियाँ कमाल कर रही हैं। वुमेन सेल्फ हेल्प समूह में भी कमाल कर रही हैं। आज वुमेन सेल्फ हेल्प ग्रुपों की देश में संख्या भी बढ़ी है और उनके काम करने के दायरे का भी बहुत विस्तार हुआ है।”

पद्म पुरस्कार पाने वालों का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि इस बार भी ऐसे अनेकों देशवासियों को पद्म सम्मान दिया गया है, जिन्होंने जमीन से जुड़कर समाज में बड़े-बड़े बदलाव लाने का काम किया है। ये मीडिया हेडलाइन से दूर रहे। पीएम मोदी ने कहा कि पद्म पुरस्कार पाने वालों में 30 महिलाएँ हैं, जो जमीनी स्तर पर अपने कार्यों से देश और समाज को आगे ले जा रही हैं।

प्रधानमंत्री ने लोगों को अंगदान करने के लिए भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा, “हमारे बीच कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो जीवन के बाद भी समाज के दायित्वों को निभाते हैं। ये लोग अंगदान करके अपना दायित्व निभाते हैं। ये निर्णय आसान नहीं होता है, लेकिन ये निर्णय कई जिंदगियों को बचाने के लिए लिया जाता है। आज देश में कई संगठन भी इस दिशा में प्रेरक प्रयास कर रहे हैं।”

प्रधानमंत्री ने देश में आयुष मंत्रालय की उपलब्धियों पर भी चर्चा की। पीएम मोदी ने कहा, “आपमें से कई लोग होंगे जिन्हें इलाज के लिए आयुर्वेद, यूनानी या सिद्ध पद्धति से मदद मिलती है, लेकिन जब दूसरे डॉक्टर के पास जाते हैं तो हर डॉक्टर अपने हिसाब ने बीमारी का नाम और इलाज लिखता है, लेकिन आयुष विभाग ने अब इसका समाधान खोज लिया है। आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी पद्धति की शब्दावली की कोडिंग कर दी गई है।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि इस कोडिंग की मदद से अब सभी डॉक्टर एक जैसी भाषा लिखेंगे। इसका फायदा ये होगा कि अगर एक पर्ची लेकर दूसरे डॉक्टर के पास जाएँगे तो उसे समझने में आसानी होगी। उन लोगों को भी फायदा होगा जो रिसर्च के काम से जुड़े हैं। साथ ही दूसरे देशों के वैज्ञानिकों को मदद मिलेगी। इससे ये चिकित्सा पद्धति और बेहतर परिणाम देगी। इस दौरान उन्होंने अरुणाचल प्रदेश की रहने वाली हर्बल औषधि विशेषज्ञ यानुंग जामोह लैगोकी की भी चर्चा की।

विजय सिन्हा और सम्राट चौधरी बिहार के नए डिप्टी CM, 2 आक्रामक चेहरों को BJP ने किया आगे: सामान्य वर्ग को भी साधा, ‘लव-कुश’ भी पाले में

बिहार में एक बार फिर से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। वहीं उप-मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा ने इस बार 2 चौंकाने वाले चेहरों के नाम आगे किए हैं। विधानसभा अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष रहे विजय कुमार सिन्हा को डिप्टी CM बनाया गया है। वहीं प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी भी डिप्टी CM बनने जा रहे हैं। साफ़ है, 2 आक्रामक चेहरों को आगे कर के भाजपा नीतीश कुमार का भी नकेल कस के रखेगी। दोनों ही नेता अपनी सक्रियता और जनता से कनेक्शन के कारण भी जाने जाते हैं।

बता दें कि नीतीश कुमार ने राजद का साथ छोड़ कर भाजपा के साथ हाथ मिलाया है। इस्तीफा देकर उन्होंने फिर से मुख्यमंत्री पद का शपथ लेने की योजना बनाई। वो अपने पुरानी साथी भाजपा के पास लौट आए हैं। उधर राजद सुप्रीमो लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने ‘कूड़ा फिर से गया कूड़ेदानी में’ लिख कर नीतीश कुमार पर निशाना साधा है। शाम के 5 बजे शपथग्रहण समारोह होगा। वहीं जदयू नेता KC त्यागी ने कहा है कि कॉन्ग्रेस ने I.N.D.I. गठबंधन को हड़पने की कोशिश की।

विजय कुमार सिन्हा 2010 से लखीसराय विधानसभा क्षेत्र से जीतते रहे हैं और वहाँ उनका खासा प्रभाव है। भूमिहार समाज से आने वाले विजय सिन्हा को उप-मुख्यमंत्री बनाने के साथ ही भाजपा सवर्णों को भी साधेगी। पिछड़ों के लिए चल रहीं मोदी सरकार की योजनाओं का भी प्रचार-प्रसार किया जाएगा। विजय कुमार सिन्हा इससे पहले भी मंत्री रहे हैं। तिलकपुर में जन्मे विजय सिन्हा 56 वर्ष के हैं। बतौर स्पीकर भी सदन में उनके रुख की अक्सर चर्चा होती रहती थी।

वहीं सम्राट चौधरी के जरिए भाजपा लव-कुश समीकरण को अपने पक्ष में करेगी। कुर्मी समाज से आने वाले नीतीश कुमार और कोइरी समाज के उपेंद्र कुशवाहा भी भाजपा के साथ हैं। इसी समाज से सम्राट चौधरी भी आते हैं, जिनके पिता शकुनि चौधरी का मुंगेर और खगड़िया जिलों में कई दशकों तक प्रभाव रहा है। सम्राट चौधरी विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष रहे हैं। उससे पहले वो राबड़ी देवी की सरकार और नीतीश कुमार की सरकार में भी मंत्री रहे हैं।

बिहार की गिर गई डेढ़ साल पुरानी सरकार, नीतीश कुमार ने राज्यपाल को सौंपा इस्तीफा: भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने की तैयारी, 9वीं बार लेंगे सीएम पद की शपथ

बिहार में पिछले तीन दिनों से जारी उठा-पटक के बाद अब राजनीतिक स्थिति लगभग साफ हो गई है। महागठबंधन से अलग होने का निर्णय ले चुके नीतीश कुमार राजभवन पहुँचे और वहाँ राज्यपाल से मुलाकात करके उन्होंने आज रविवार (28 जनवरी 2024) को अपना इस्तीफा सौंप दिया। कहा जा रहा है कि वे भाजपा के साथ मिलकर आज ही राज्य में सरकार बनाएँगे।

इस्तीफा देने के नीतीश कुमार ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “मैं काम कर रहा था, लेकिन मुझे काम नहीं करने दिया जा रहा था। इससे लोगों को दुख हो रहा था। हमने अपने लोगों, पार्टी की राय को सुना और इसलिए आज इस्तीफा दे दिया। जो सरकार थी, वो समाप्त कर दिया।” उन्होंने आगे कहा, “आज अन्य पार्टियाँ जो पहले साथ में थीं वो तय करेंगी। आगे जो होगा वो देखिएगा।”

बिहार के राजभवन से राज्यपाल के साथ नीतीश कुमार की एक तस्वीर जारी की गई है। इसके साथ ही लिखा गया है, “माननीय राज्यपाल श्री राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार का त्यागपत्र स्वीकार कर लिया तथा वैकल्पिक व्यवस्था होने तक उन्हें कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करने को कहा।”

नीतीश कुमार द्वारा मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के नई सरकार के गठन की तैयारियाँ तेज हो गई हैं। मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि JDU विधायक दल की बैठक के दौरान नीतीश कुमार ने भाजपा के एक शीर्ष नेता से फोन पर बात की। इस बीच राजभवन में शपथ ग्रहण की तैयारियाँ शुरू हो गई हैं। नीतीश कुमार आज ही नौंवी बार बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे।

सूत्रों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जनता दल यूनाइटेड (JDU) के विधायकों की बैठक में कहा कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के साथ रहना अब मुश्किल है और इस्तीफे का वक्त है। नीतीश कुमार के इस फैसले से राजद में अफरा-तफरी का माहौल है।

उधर, नीतीश कुमार को समर्थन देकर साथ में सरकार बनाने जा रही भाजपा ने अपने विधायकों के साथ बैठक शुरू कर दी है। इसमें भाजपा के विधायकों से समर्थन पत्र पर हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं। थोड़ी देर में भाजपा के विधायकों को मुख्यमंत्री आवास ले जाया जाएगा और वहाँ NDA विधायक दल की बैठक में नीतीश कुमार को नेता चुना जाएगा।

इस घटनाक्रम से राजद हक्का-बक्का है। राजद के मृत्युंजय तिवारी ने कहा, “अब तो जनता भी कह रही है कि देखा है पहली बार ऐसी पलटीमार सरकार। नीतीश कुमार के साथ तेजस्वी यादव जब सरकार में उपमुख्यमंत्री बनें तो इन 15 महीनों के कामों को कोई नहीं भुला सकता। यह हमारी उपलब्धि है। आगे जो भी होगा, उसका सामना किया जाएगा।”

वहीं, NDA के सहयोगी और राष्ट्रीय लोक जनता दल (RLJD) के प्रमुख उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा, “आज बिहार के लिए खास दिन है। नीतीश कुमार को आरजेडी को तरफ से गालियाँ दी जा रही थीं। मैंने कहा था की नीतीश कुमार अगर ज्यादा दिन आरजेडी के साथ रहे तो उनकी उम्र कम हो जाएगी। हम एनडीए के साथ हैं।”

 

रामलला की मूर्ति के लिए पत्थर भेजने वाले पर जुर्माना, हिंदुओं ने की कई गुने भरपाई, भाजपा सांसद प्रताप सिंह भी करेंगे सहायता

रामलला की प्रतिमा के लिए पत्थर भेजने वाले ठेकेदार श्रीनिवास नटराज पर कर्नाटक सरकार ने जुर्माना लगा दिया था। उनको यह जुर्माना भरने के लिए पत्नी के गहने भी गिरवी रखने पड़े थे। अब श्रीनिवास की कई लोगों ने मदद की है। उन्हें इस जुर्माने का 4-5 गुना ज्यादा पैसा मिल गया है। मैसुरु के सांसद प्रताप सिम्हा ने बताया है कि वह भी एक-दो दिन के भीतर भारतीय जनता पार्टी की तरफ से ₹80,000 की सहायता ठेकेदार श्रीनिवास को देंगे।

ऑपइंडिया से बात करते हुए मैसुरु सांसद प्रताप सिम्हा ने बताया, “ठेकेदार श्रीनिवास ने पत्थर अयोध्या में रामलला की मूर्ति बनाने के लिए भेजा था। इसके लिए उनके पास मैसुरु के खनन और भूगर्भ विभाग की अनुमति नहीं थी। उन्होंने पत्थर दलित किसान रामदास के खेत से निकलवा कर सीधा अयोध्या भेज दिया था। मैसुरु के खनन और भूगर्भ विभाग ने इस कारण से उन पर ₹80,000 का जुर्माना लगाया था जो कि उन्होंने भर दिया था।”

आगे सांसद प्रताप सिम्हा ने बताया, “उन पर लगे जुर्माने की खबर सामने आने के बाद कई लोगों ने ठेकदार श्रीनिवास की सहायता की है। श्रीनिवास को अब तक लगभग ₹4-5 लाख स्वेच्छा से लोगों ने दिए हैं। उन्हें कन्नड़ भाषा के लिए काम करने वाले एक संस्थान ने सम्मानित भी किया और उन्हें धनराशि भी दी। इसके अलावा लोगों ने आपस में पैसा मिलाकर भी श्रीनिवास को हुए नुकसान की पूर्ति कर दी है।” सांसद प्रताप सिम्हा ने भाजपा द्वारा भी ठेकेदार श्रीनिवास की सहायता किए जाने को लेकर जानकारी दी है।

ऑपइंडिया ने उनसे पूछा कि क्या वह निजी स्तर पर भी श्रीनिवास की सहायता कर रहे हैं? इस पर उन्होंने कहा, “हाँ, उन्हें पार्टी (भाजपा) की तरफ से भी जुर्माने की राशि को लेकर सहायता दी जा रही है। हम उन्हें एक-दो दिन के भीतर ₹80,000 की सहायता पार्टी की तरफ से देंगे।”

गौरतलब है कि अयोध्या के राम मंदिर में स्थापित की गई रामलला की श्यामल प्रतिमा के लिए कर्नाटक के मैसुरु के हरोहल्ली-गुज्जेगौदानपुरा गाँव के एक दलित किसान रामदास के खेत से पत्थर भेजा गया था। यह पत्थर स्थानीय ठेकेदार श्रीनिवास ने यहाँ से खनन करके मूर्तिकारों को भेजा था। यह पत्थर मूर्तिकार अरुण योगिराज को पसंद आया था।

हाल ही में यह खबर आई थी कि श्रीनिवास पर मैसुरु के खनन और भूगर्भ विभाग ने पत्थर के खनन करने के सम्बन्ध में अनुमति ना लेने के कारण ₹80,000 का जुर्माना लगा दिया था। श्रीनिवास को यह जुर्माना भरने के लिए अपनी पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़े थे। यह खबर जब बाहर आई तो लोगों ने कर्नाटक सरकार की आलोचना की और श्रीनिवास की सहायता करने का निर्णय लिया। मैसुरु के सांसद प्रताप सिम्हा ने भी ऐलान किया कि वह श्रीनिवास की सहायता करेंगे। इसके बाद से लगातार श्रीनिवास को सहायता पहुँचाई जा रही है।

जिन किसान रामदास के खेत से यह पत्थर निकला था, वह किसान रामदास अब अपने ही खेत में रामलला का एक मंदिर बनवा रहे हैं। उन्होंने इसके लिए अपने खेत का एक हिस्सा दान कर दिया था। इस मंदिर का शिलान्यास 22 जनवरी, 2024 (राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा) के दिन ही किया गया था।