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उत्तरकाशी सुरंग हादसे की सफलता में भी लिबरलों ने खोज ली सांप्रदायिक एंगल: टीम स्पिरिट को भूल हिंदू-मुस्लिम में बाँटने लगे

उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग में फँसे 41 मजदूर सफलतापूर्वक बाहर निकाल लिए गए हैं। इन मजदूरों को निकालने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर उत्तराखंड के स्थानीय प्रशासन ने कदम से कदम मिलाकर काम किया। हालाँकि, इस सफलता के बीच भी लिबरल समुदाय मजहबी प्रोपेगैंडा चलाना नहीं भूला।

सिलक्यारा के निर्माणाधीन सुरंग में ये सभी 41 मजदूर 12 नवम्बर 2023 से इसमें फँसे थे। इन्हें निकालने के लिए 3 फीट व्यास वाला एक पाइप डाला गया था। सुरंग से निकालने के बाद स्वास्थ्य की जाँच के लिए उन्हें ऋषिकेश के AIIMS ले जाया गया। उधर, सीएम पुष्कर सिंह धामी ने इन मजदूरों के परिजनों के साथ 29 नवंबर 2023 की शाम को दिवाली मनाने की घोषणा की है।

कैसे हुआ सफल ऑपरेशन – सरकारी और निजी क्षेत्र का समन्वय लाया कामयाबी?

12 नवम्बर 2023 को सुबह 5:30 बजे इस सुरंग में काम चल रहा था। इसी दौरान इसमें मलबा गिरा और अंदर काम कर रहे 41 मजदूर फँस गए। इनको निकालने के लिए सबसे पहले मलबा हटाने का प्रयास किया गया। हालाँकि, नया मलबा आते रहने के कारण यह तरीका कामयाब नहीं हुआ।

इसके बाद मलबे के भीतर से ही पाइप अन्दर डालने की योजना बनाई गई। जहाँ रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए यहाँ काम कर रह निजी कम्पनी ने मोर्चा संभाला तो वहीं यह पाइप लाने के लिए प्रशासन जुट गया। सबसे पहले देहरादून से पाइप भेजवाए गए।

केंद्र सरकार ने मामले पर अपडेट लेते हुए वायुसेना को तुरंत एक्शन मोड में ला दिया और वायुसेना के हवाई जहाजों ने देश भर से नए पाइप घटनास्थल तक पहुँचाए। अन्दर फँसे श्रमिकों तक खाना पानी पहुँचाने के लिए निजी कम्पनी और प्रशासन, दोनों ने ही कमर कसी।

प्रशासन ने वह सारी व्यवस्था निजी कम्पनियों को करके दी, जो उसे रेस्क्यू में सहायता कर रही थीं। जब जब इन रेस्क्यू टीम को नई मशीनों या अन्य संसाधनों की आवश्यकता पड़ी तो वायु सेना से लेकर राज्य सरकार ने उपलब्ध करवाए। चाहे वह ऑगर मशीन लाना हो या फिर हैदराबाद से प्लाज्मा कटर जैसी मशीनें लाना हो।

प्रशासन ने यहाँ देश विदेश से सुरंग के मामले के जानकारों को भी इकट्ठा किया और उन्हें व्यवस्थाएँ उपलब्ध करवाई। प्रधानमंत्री कार्यालय भी लगातार इस मामले में अपडेट लेता रहा। केंद्र की ओर से घटनास्थल पर केन्द्रीय राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पीके मिश्रा भी पहुँचे।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी पूरे रेस्क्यू को निजी स्तर पर देखा है। सुरंग के अन्दर बेहतर तकनीक के लिए यहाँ काम कर रही निजी कम्पनियों के इंजिनियर लगे रहे और लगातार नए तरीके अपनाते रहे। श्रमिकों को बाहर निकालने के लिए NDRF और SDRF की टीम लगाई गईं, जो सफलतापूर्वक उन्हें बाहर निकाल कर लाई।

ऑपरेशन कामयाब, लिबरल परेशान

जहाँ 17 दिनों के बाद श्रमिकों को सफलतापूर्वक निकाले जाने से पूरा देश प्रसन्न है, वहीं लिबरल गैंग अपने प्रोपगैंडा को चलाने में व्यस्त हो गया है। उसके लिए इन मजदूरों को निकालने वालों को धर्म जानना बहुत जरूरी हो गया है। रेस्क्यू मिशन में लगे 2,000 लोगों में से इन प्रोपगैंडा करने वालों को कुछ ऐसे नाम मिले जो कि मुस्लिम थे।

कथित पत्रकार सागरिका घोष ने सबसे पहले इन रेस्क्यू करने वालों को धर्म के आधार पर बाँटा और उनमें प्रमुखता से मुस्लिम नामों को दोहराया। एंकर राजदीप सरदेसाई ने भी यही किया। कई प्रोपगैंडाबाजों ने यही तरकीब अपनाई और कुछ मुस्लिम रेस्क्यू पर्सनल को पूरा श्रेय देने का प्रयास किया।

हालाँकि, हर बात में हिन्दू-मुस्लिम ढूँढने वालों को एक्स पर ही कड़ा जवाब मिला। भारत के पूर्व विदेश सचिव कँवल सिब्बल ने इस पर प्रश्न पूछा कि यदि रेस्क्यू करने वाले सारे व्यक्ति हिन्दू होते तो क्या उनका नाम सम्मान से नहीं लिया जाता?

एक व्यक्ति ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “विश्व में 99% आतंकी हमले मुस्लिम करते हैं, लेकिन आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता। 2,000 रेस्क्यू करने वालों में 2 मुस्लिम हैं और ये अब कॉन्ग्रेसियों, वामपंथियों और लिबरलों के लिए हीरो बन गए हैं।”

एक्स पर इस सुरंग में रैट माइनिंग के जरिए मजदूरों को निकालने वाले रेस्क्यू पर्सनल का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें वह भारत माता की जय के नारे लगाते दिखे हैं।

लोगों ने कहा कि यह बिना किसी धर्म-जाति में बँटे हुए ये नारे लगाए हैं, जबकि लिबरल इसमें लोगों को बाँट रहे थे।

सुरेंद्र राजपूत: 17 साल पहले जिन्होंने 5 साल के प्रिंस को निकाला था बोरवेल से, उनकी बनाई पुली ट्रॉली के कारण 41 मजदूरों के घर मनी दिवाली

दिल्ली के निजामुद्दीन के रहने वाले सुरेंद्र राजपूत की उत्तराखंड में सिलक्यारा सुरंग में फँसे 41 मजदूरों को बचाने में अहम भूमिका रही। आखिर सभी की कोशिशें रंग लाई और 17 दिनों बाद सब सही सलामत बाहर निकल आए।

दिवाली के दिन 12 नवंबर 2023 की सुबह लैंड स्लाइड से सुरंग में मलबा भरने के कारण वहाँ काम कर रहे ये 41 लोग वहीं फँस गए थे। बाहर आने के बाद उनके लिए और उनके परिवार के लिए तो मंगलवार (28 नवंबर,2023) का दिन एक तरह से दिवाली की रोशनी लेकर आया।

उनकी जिंदगियों में बगैर किसी स्वार्थ के उजाला भरने वालों में इस बचाव अभियान में वैसे तो कई लोग शामिल रहे। लेकिन आखिर में आज से 17 साल पहले 21 जुलाई 2006 को हरियाणा के कुरुक्षेत्र के हल्देहड़ी गाँव में 5 साल के प्रिंस के 50 फीट गहरे बोरवेल से निकालने वाली टीम का हिस्सा रहे सुरेंद्र राजपूत का तजुर्बा रंग लाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक राजपूत 18 नवंबर को ही सिलक्यारा सुरंग पहुँच गए थे।

रैट माइनर्स के लिए बनाई पुली ट्रॉली

सिलक्यारा में सुरंग में फँसे 41 मजदूरों को बचाने में जब बड़ी-बड़ी आधुनिक मशीनें फेल हो गईं तो फिर रविवार यानी 26 नवंबर को साइट पर 6 ‘रैट होल’ माइनर्स की एंट्री हुई। झाँसी के जांबाज रैट माइनर्स परसादी लाल, राकेश और भूपेंद्र राजपूत वहाँ पहुँचे थे।

इन लोगों ने रैट माइनिंग के जरिए 21 घंटे में हाथ से ही 15 मीटर तक सुरंग खोद डाली। ये लोग शायद ये काम करने में सफल नहीं होते अगर इनके पास पुली ट्रॉली नहीं होती। और ये पुली ट्रॉली बगैर बुलाए वहाँ पहुँचे सुरेद्र राजपूत ने बना कर दी।

ट्राली से आसान हुआ मलबा निकालना

सुरेंद्र राजपूत के मुताबिक, उन्होंने मैनुअल ड्रिलिंग करने वाले रैट माइनर्स टीम के लिए 1.25 मीटर लंबी और 0.6 मीटर चौड़ी एक पुली ट्रॉली बनाई थी। चार बेयरिंग लगी इस ट्राली के जरिए ही मैनुअल ड्रिलिंग के बाद सुरंग के अंदर से मलबे को पाइप से बाहर निकाला गया।

एक बार में ही इस ट्रॉली से एक क्विंटल मलबा सुरंग से बाहर निकाला जाता था। इसके बाद ही सुंरग से मजदूरों के बाहर निकलने का रास्ता साफ हो पाया। राजपूत ये ट्रॉली इसलिए बना पाए क्योंकि उन्होंने 2006 में हरियाणा के कुरुक्षेत्र के हल्देहड़ी गाँव में प्रिंस को बचाने में भी अहम भूमिका निभाई थी।

तब पाँच साल का बच्चा प्रिंस अपने दोस्त के साथ खेलते हुए पास ही खुदे 60 फीट गहरे बोरवेल में जा गिरा था। तब राजपूत ने 60 मीटर गहरे कुएँ को दूसरे कुएँ से जोड़ने के लिए 10 फीट लंबी सुरंग बनाने का काम किया था। इसके बाद प्रिंस बोरवेल से सलामत बाहर आ पाया था।

सुरेंद्र राजपूत ने लगाई थी सिलक्यारा रेस्क्यू अभियान में शामिल होने की गुहार

सिलक्यारा सुरंग हादसे के 6 दिन बाद ही सुरेंद्र राजपूत सीधे दिल्ली से बचाव अभियान में सहयोग करने के लिए वहाँ पहुँच गए थे। वो बचाव एजेंसियों से अभियान में मदद करने का अनुरोध करते रहे।

वो उत्तराखंढ के प्रशासनिक अधिकारियों से मिले और इस फील्ड में अपने तजुर्बे के बारे में बताया। उनके बार-बार कहने पर अधिकारियों ने उनके बारे में पड़ताल की तो जानकारी मिली कि राजपूत हरियाणा के कुरुक्षेत्र व अंबाला के बीच एक गाँव में बोरवेल में गिरे बच्चे प्रिंस के बचाव अभियान में शामिल थे।

दरअसल हरियाणा सरकार की तरफ से तब राजपूत को उनके काम के लिए सम्मान दिया गया था। इन सब पर गौर करते हुए प्रशासन ने उन्हें अभियान में शामिल करने का फैसला लिया और ये फैसला सही साबित हुआ।

मणिपुर के सबसे पुराने उग्रवादी समूह ने डाले हथियार: अमित शाह ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में किया स्वागत, नई दिल्ली में शांति समझौते पर हस्ताक्षर

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर को लेकर बड़ी जानकारी शेयर की है। बता दें कि मणिपुर पिछले कई महीनों से अशांत रहा है, जहाँ महिलाओं को नग्न कर उनका जुलूस निकाले जाने और उनके सामूहिक बलात्कार तक के मामला सामने आए थे। आगजनी की तो कई घटनाएँ सामने आई थीं। अब अमित शाह ने बताया है कि मणिपुर में बड़ी संख्या में उग्रवादियों ने हिंसा का रास्ता त्याग कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया।

उन्होंने तस्वीरें शेयर करते हुए बताया, “एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई। पूर्वोत्तर में स्थायी शांति स्थापित करने के मोदी सरकार के अथक प्रयासों में एक नया अध्याय जुड़ गया है। यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (UNLF) ने नई दिल्ली में बुधवार (29 नवंबर, 2023) को एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किया। मणिपुर की पहाड़ियों के सबसे पुराने सशस्त्र समूह UNLF ने हिंसा के रास्ते को छोड़ कर मुख्यधारा में आने के लिए हामी भरी है।”

अमित शाह ने उन सभी का लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वागत करते हुए शांति एवं विकास के रास्ते पर उनकी उन्नति की कामना की। उन्होंने एक वीडियो भी शेयर किया, जिसमें UNLF के सभी उग्रवादी अपनी-अपनी बंदूकें सौंप रहे हैं। तस्वीरों में कई उग्रवादियों को पंक्ति में खड़े देखा जा सकता है। जबकि उनके हथियारों को भी जमीन पर रखा गया है। पिछले 59 वर्षों से मणिपुर में सक्रिय UNLF अलगाववादी विचारधारा वाला संगठन रहा है, जिसकी स्थापना 24 नवंबर, 1964 को हुई थी।

अरम्बम समरेंद्र सिंह ने इस समूह की स्थापना की थी। 70 एवं 80 के दशक में इसने जम कर भर्तियाँ की और अपना नेटवर्क बढ़ाया। 1990 के दशक में ये मणिपुर की कथित ‘आज़ादी’ की बातें करने लगा और इसने हथियार उठा लिए। 1990 में ही उसने ‘मणिपुर पीपल्स आर्मी’ भी बनाई थी। इसके अध्यक्ष राजकुमार मेघन उर्फ़ सना यैमा पर भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप लगा था। हालाँकि, उसने दावा किया था कि वो भारत के खिलाफ नहीं है, मणिपुर में सेना की उपस्थिति के खिलाफ है।

बॉयफ्रेंड के कहने पर गर्ल्स हॉस्टल के बाथरूम में लगाया कैमरा, बनाती थी दूसरी लड़कियों का वीडियो: पुलिस ने दोनों को पकड़ा, मोबाइल जब्त

चंडीगढ़ के एक पेइंग गेस्ट हाउस (PG) में लड़कियों के बाथरूम में हिडेन कैमरा लगाने का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि पीजी की ही एक अन्य लड़की ने अपने बॉयफ्रेंड के कहने पर यह कैमरा लगाया था। पुलिस ने लड़की और उसके बॉयफ्रेंड के खिलाफ केस दर्ज करके उन्हें गिरफ्तार कर लिया है। उनके मोबाइल फोन भी जब्त कर लिए गए हैं। घटना रविवार (26 नवंबर 2023) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना चंडीगढ़ के सेक्टर 22 की है। यहाँ संचिलात एक PG में 5 लड़कियाँ रहती हैं। इन्हीं में से एक लड़की मूलतः उत्तर प्रदेश की रहने वाली थी, जो IELTS की तैयारी कर रही थी। इन सभी लड़कियों का कॉमन बाथरूम था। 26 नवम्बर को एक लड़की नहाने गई तो अँधेरे में उसको गीजर के पीछे कुछ चमकता दिखाई पड़ा।

उसने बाकी लड़कियों को बुलाकर चेक करवाया तो वो एक हिडेन कैमरा निकला। इसके बाद लड़कियों ने इसकी जानकारी मकान मालिक को दी और उसने पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी। पुलिस ने 29 नवंबर 2023 को बताया कि 3 दिन पहले आई शिकायत पर पुलिस ने मौके पर जाकर जाँच की। जाँच में गीजर के पीछे हिडेन कैमरा रखने की पुष्टि हुई।

पुलिस ने बताया कि इस मामले में PG में रहने वाली एक लड़की को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई और उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। साथ ही उसने बताया कि 3 दिन पहले ही उसके बॉयफ्रेंड अमित हांडा ने एक कैमरा दिया था। पुलिस ने इस मामले में IPC की धारा 354C और 506 के साथ IT एक्ट की धारा 66 के तहत कार्रवाई की है।

अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वीडियो बनाए गए हैं या नहीं और यदि बने भी हैं तो कितने। मामला सामने आने के बाद बाकी लड़कियों के परिजन उन्हें अपने साथ लेकर घर चले गए हैं। फिलहाल PG खाली किया जा चुका है। सेक्टर 17 थाना पुलिस ने दोनों आरोपितों के मोबाइल और कैमरा को जब्त कर जाँच के लिए फोरेंसिक लैब भेज दिया है।

दोनों आरोपितों को जमानत पर छोड़ दिया गया है। पुलिस का कहना है कि जो कैमरा छुपाया था वह वेब कैमरा था। पुलिस का कहना है कि उसकी रिकॉर्डिंग कहाँ हो रही थी, उसका कंट्रोल और स्टोरेज सेंटर कहा है, इसकी जाँच की जा रही है। ये भी जाँच की जा रही है कि कहीं ये वीडियो ऑनलाइन तो नहीं चल रहे थे।

बताते चलें कि 10 अक्टूबर 2023 को चंडीगढ़ के ही एक प्रइवेट स्कूल में 70 छात्राओं की तस्वीरों को AI की मदद से एडिट करने का मामला सामने आया था। इस घटना में स्कूल के क्लास 12 मे पढ़ने वाले एक छात्र की संलिप्तता बताई गई थी।

NIT श्रीनगर की वेबसाइट हैक? पैगंबर मुहम्मद के ‘अपमान’ को लेकर हिंदू छात्र पर FIR, कट्टर इस्लामी भीड़ का प्रदर्शन

जम्मू कश्मीर के श्रीनगर स्थित ‘राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT)’ कॉलेज की वेबसाइट का होमपेज हैक हो गया है। NIT श्रीनगर की वेबसाइट ‘nitsri.ac.in’ को खोलने पर होमपेज पर लिखा हुआ आ रहा है – “हम तुरंत वापस आएँगे। असुविधा के लिए खेद है लेकिन हम इस समय कुछ मेंटेनेंस की प्रक्रिया में लगे हुए हैं। अगर आपको ज़रूरत है तो आप हमेशा हमसे संपर्क कर सकते हैं, अन्यथा हम तुरंत ऑनलाइन वापस आएँगे। – CSC वेब टीम।”

साफ़ है, NIT श्रीनगर की वेबसाइट का होमपेज हैक हो गया है। दूसरी बात यह भी ध्यान देने लायक है कि वेबसाइट पर अन्य पेज खुल रहे हैं, लेकिन ये समस्या होमपेज पर ही है। वेबसाइट हैक होने के इस मामले पर ऑपइंडिया ने संस्थान को मेल कर जानकारी माँगी है। उनका रिप्लाई अभी तक नहीं आया है।

NIT श्रीनगर अभी चर्चा में है, क्योंकि वहाँ मुस्लिम भीड़ प्रदर्शन कर रही है। पैगंबर मुहम्मद के कथित अपमान का आरोप एक हिंदू छात्र पर लगाया गया है। उक्त छात्र के खिलाफ पुलिस ने मुस्लिम समाज की भावनाओं को आहत करने के लिए FIR भी दर्ज कर ली है। नीग्रीन पुलिस थाने में ये मामला दर्ज किया गया है।

इस मामले में पुलिस ने आम लोगों को भी सावधान किया है कि वो अफवाहों से बचें। प्रदर्शन में शामिल कट्टर मुस्लिम छात्रों ने आरोपित छात्र को ‘बाहरी’ बताते हुए उसके खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। ‘लब्बैक या रसूल अल्लाह’ के नारे लगाते हुए कट्टरपंथी भीड़ ने प्रदर्शन किया।

इस मामले पर राजनीति भी हो रही है और पूर्व मेयर शेख इमरान ने पुलिस पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाया है। NIT की अनुशासनात्मक समिति ने उक्त हिंदू छात्र को कॉलेज से 1 साल के लिए निकाल दिया है।

NIT श्रीनगर, होमपेज, हैक
जम्मू कश्मीर स्थित NIT श्रीनगर की वेबसाइट का होमपेज हैक

कॉलेजों की वेबसाइट हैक करने का ये पहला मामला नहीं है। गाजियाबाद के जिस इंजीनियरनिंग कॉलेज ABSE में जय श्री राम के नारे बोलने पर छात्र को मंच से उतारा गया था, वहाँ की वेबसाइट हैक हो गई थी। इसी तरह दिल्ली के जिस स्कूल में छात्रों ने ‘जय श्री राम’ बोलने पर खुद को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था, उसकी वेबसाइट हैक हो गई थी। अब नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, श्रीनगर की वेबसाइट का होमपेज हैक हो गया है।

41 मजदूरों के रेस्क्यू ऑपरेशन पर बॉलीवुड बना पाएगी ‘The 33’ जैसी फिल्म, या सरसों के खेत वाले गाने ठूँस मसाला-मूवी तक ही रहेगा इनका दायरा?

उत्तराखंड के उत्तरकाशी में स्थित सिल्कयारा की निर्माणाधीन सुरंग में पिछले 17 दिनों से फँसे 41 श्रमिकों को सकुशल बाहर निकाल लिया गया है। इस रेस्क्यू ऑपरेशन बेहद जटिल था, जिसे भारत और उत्तराखंड की सरकार ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया। यह देश के सबसे कठिन बचाव अभियानों में एक था। आमतौर पर 17 दिनों तक इस ऑपरेशन के बारे में सुन-पढ़कर इसकी गंभीरता का अंदाजा लगा पाना आम लोगों के लिए आसान नहीं है।

सुरंग में क्षैतिज रूप से 80 मीटर नीचे और 60 मीटर अंदर की ओर फँसे इन श्रमिकों को निकालना भौगोलिक रूप से पहाड़ी होने के कारण और जटिल बन गया। ये सिर्फ रेस्क्यूर टीम के लिए ही नहीं, बल्कि अंदर फँसे मजदूरों के धैर्य की भी परीक्षा था। 60 मीटर अंदर फँसे मजदूरों की मानसिक और शारीरिक स्थिति को समझना तो आम लोगों को हॉलीवुड की फिल्म ‘The 33’ देखना चाहिए।

फिल्म द 33 चिली देश में हुए एक सोने की खदान धँसने की वास्तविक घटना पर आधारित फिल्म है। चिली के रेगिस्तान में स्थित सैन जोस के कैपियापो खदान 5 अगस्त 2010 में ढह गया था, जिसके कारण 33 श्रमिक अंदर फँसकर गए थे। उनके पास सीमित खाना और पीने का पानी था। अमेरिका के नासा आदि संस्थाओं की सहयोग के बावजूद इन श्रमिकों को निकालने में 69 दिन लग गए थे।

जिस तरह से सिल्कयारा सुरंग में फँसे श्रमिकों को गब्बर सिंह नेगी मजदूरों को मानसिक रूप पर मजबूत करते रहे। इसी तरह सैन जोस खदान में फँसे श्रमिकों को लुईस उरुज संबल देते रहे। उनकी लीडरशिप के कारण सैन जोस खदान में फँसे सभी 33 सैनिक 69 दिनों तक सरवाइव करने में सफल रहे थे।

उस दौरान जिस कंपनी के खदान में मजदूर फँसे थे, वह उन मजदूरों को निकालने को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं थी। हालाँकि, चिली सरकार ने इन मजदूरों को निकालने का बीड़ा उठाया और अमेरिका से लेकर तमाम देशों से विशेषज्ञों को बुलाया। रेस्क्यू ऑपरेशन के जारी रहने के ऑगर मशी, ड्रिलिंग मशीन बार-बार टूट जा रही थी। हजारों क्विंटल के चट्टान रास्ते में आ रहे थे, लेकिन मजदूर कहाँ फँसे इसकी सही जानकारी नहीं मिल पा रही थी।

रेस्क्यू ऑपरेशन के कुछ दिन बाद एक ऐसा भी समय आया कि ऑपरेशन टीम ने इन श्रमिकों को निकालने का बंद करने का फैसला ले लिया। उन्हें लगा कि 17 दिन बीत जाने के बाद शायद ही कोई श्रमिक जिंदा होगा। सीमित खाना-पानी होने के बाद भी श्रमिकों के बीच फँसे मजदूरों को लुईस उरूज लगातार हौसला देते रहे। उन्हें विश्वास था कि कंपनी भले ही उन्हें छोड़ दे, लेकिन चिली की सरकार उन्हें मरने के लिए नहीं छोड़ेगी।

उरूज अपने साथियों को भरोसा दिलाते रहे कि एक दिन ऐसा वक्त आएगा, तब वे सभी अपने-अपने परिवारों के बीच रहेंगे। खाना-पानी को भी वे इस तरह मैनेज करते रहे कि अंदर फँसे लोग, अधिक से अधिक दिन तक जीवित रह सके। हालाँकि, उनके अधिकांश साथियों को उम्मीद नहीं थी कि वे फिर कभी सुरंग से बाहर निकल पाएँगे, लेकिन उरूज ऐसा नहीं मानते थे।

इन सब कोशिशों के रेस्क्यू टीम काम को बंद करना चाहती थी, लेकिन चिली की सरकार ने ऐसा करने से मना कर दिया। इस दौरान रेस्क्यू ऑपरेशन का लाइव प्रसारण चलता रहा और 55 लाख लोग हर समय इसे देखते रहे। चिली की मीडिया ने इन मजदूरों को एक सेकेंड के लिए भी नहीं छोड़ा। घटना के दिन से ही पल-पल की रिपोर्टिंग करते रहे। सरकारी हर फैसले की जानकारी देशवासियों तक पहुँचा रहे। वहाँ की मीडिया के लिए उस समय इन श्रमिकों से बड़ा कोई मुद्दा नहीं था।

आखिरकार, रेस्क्यू टीम ने प्लान को बदला और एक बार फिर से विदेशों से ड्रिलिंग मशीन को मंगाकर काम शुरू किया। टीम को पता नहीं था कि श्रमिक कहाँ हैं, लेकिन सौभाग्य और टीम के प्रयास से श्रमिकों तक ड्रिलिंग का काम पूरा हुआ। हालाँकि तब भी रेस्क्यू टीम सटीक लोकेशन और मजदूरों के जिंदा बचे होने को लेकर अनजान थी।

ऐसे में अंदर फँसे मजदूरों ने एक कपड़े पर सभी लोगों के जिंदा और सुरक्षित होने की जानकारी लिख कर ड्रिलिंग मशीन के एक छोर पर बाँध दी। ड्रिलिंग मशीन को जब ऊपर खींचा गया और उसमें श्रमिकों का संदेश मिला तो टीम का हौसला बढ़ गया।

इसके बाद उन लोगों को खाना, पानी, दवाई, कपड़े और कैमरा आदि अंदर भेजा गया और उनसे हर पल चिली सरकार कॉन्टैक्ट में रही। आखिरकार अगले 30 दिनों के बाद उन्हें एक कैप्सूल के जरिए सभी को सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया। कैप्सूल के जरिए लोगों का रेस्क्यू किया गया और

इस तरह के रेस्क्यू ऑपरेशन में आने वाली समस्याओं को लेकर बनी The 33 फिल्म एक बेहद शानदार फिल्म है। इसमें सरकार की कोशिश, टीम के प्रयास और श्रमिकों के हौसले को बखूबी दिखाया गया है। भारत में इस तरह की फिल्में बनने की उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि यहाँ कमर्शियल और डॉक्यू-ड्रामा फिल्मों को मापने का मानदंड ही अलग है।

हालाँकि, पश्चिम बंगाल के रानीगंज के महाबीर खदान में 13 नवंबर 1989 को कोयले से बनी चट्टानों को विस्फोट करके तोड़ा जा रहा था। इसी दौरान में पानी भर गया और वहाँ से काम कर रहे 232 लोगों में से 6 श्रमिकों की मौके पर मौत हो गई। वहाँ कैप्सूल के जरिए श्रमिकों को बाहर निकाला गया। इस ‘रानीगंज’ फिल्म भी बनी है, लेकिन इस फिल्म में भी वो बात नहीं है।

उम्मीदों का ‘जनरल’… सिलक्यारा का सुरंग ही नहीं, यमन, सूडान, इराक और यूक्रेन में भी कमाल दिखा चुके हैं VK सिंह: जहाँ-जहाँ संकट, वहाँ-वहाँ पहुँचे

उत्तराखंड के उत्तरकाशी की सिलक्यारा सुरंग में फँसे 41 श्रमिकों को निकालने का रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा हो चुका है। सभी श्रमिकों को सुरक्षित निकाल लिया गया है। इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन पर प्रधानमंत्री की सीधी नजर थी। प्रधानमंत्री की तरफ मौके पर केन्द्रीय राज्य सड़क और राजमार्ग मंत्री जनरल विजय कुमार सिंह भी पहुँचे थे।

चूँकि यह सुंरग प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी परियोजना ऑल वेदर रोड के अंतर्गत बन रही है। ऐसे में यह मामला जनरल वीके सिंह के विभाग से भी जुड़ा हुआ था। हालाँकि, यह कोई पहली बार नहीं है कि जनरल वीके सिंह ऐसी जगह समस्या सुलझाने पहुँचे हैं जहाँ देश के नागरिक फँसे हों।

जनरल वीके सिंह इससे पहले गृहयुद्ध में फँसे यमन, सूडान, यूक्रेन और इराक़ से भारतीयों को वापस लाने के ऑपरेशन का जिम्मा संभाल चुके हैं। वीके सिंह ऐसे मुश्किल जगहों पर जाकर भारतीयों को निकाल कर लाए हैं। वह ऐसी समस्याओं में भेजे जाने के लिए मोदी सरकार के ‘गो टू पर्सन’ हैं।

क्यों VK सिंह को ही चुनती है सरकार?

उनका 4 दशकों का सैन्य सेवा का अनुभव और एक दशक से अधिक का सार्वजनिक जीवन का अनुभव उन्हें ऐसे कठिन हालातों में समन्वय बनाने के लिए सबसे अच्छा विकल्प बनाता है। वह 1972 से लेकर 2012 तक सैन्य सेवा में रहे हैं। वह श्रीलंका में गृहयुद्ध में भी सेवाएँ दे चुके हैं।

सैन्य सेवा के साथ ही उनका ऐसे राहत बचाव ऑपरेशन में पुराना अनुभव है। 2005 में जम्मू कश्मीर में आए भूकम्प में भी उन्होंने वहाँ राहत बचाव ऑपरेशन का नेतृत्व किया था। यह काफी शक्तिशाली भूकम्प था और इसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी भारी तबाही हुई थी। VK सिंह की इस विशेषज्ञता को देखते हुए उन्हें मोदी सरकार ने ऐसे ऑपरेशन के लिए शुरुआत से ही चुना है।

ऑपरेशन राहत – यमन

वर्ष 2015 में यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच छिड़ी लड़ाई के कारण 4,000 से अधिक भारतीय फँस गए थे। लड़ाई गंभीर होने और सऊदी अरब जैसे देशों की बमबारी के कारण मानवीय संकट पैदा हो गया था। इन भारतीयों को यमन से सुरक्षित लाने के लिए जनरल वीके सिंह को मोदी सरकार ने जिबूती भेजा जो कि यमन के दूसरी और तट पर स्थित है। इस ऑपरेशन के तहत भारतीय वायु सेना और नौसेना ने 4,600 से अधिक भारतीयों को निकाला था।

जनरल वीके सिंह इस दौरान इस पूरे ऑपरेशन के कमांडर थे। प्रधानमंत्री मोदी ने भी जनरल वीके सिंह की तारीफ़ की, उन्होंने कहा था कि वह एक सैनिक तरह वहाँ खड़े रहे और भारतीयों को लेकर आए।

ऑपरेशन संकट मोचन – दक्षिणी सूडान

वर्ष 2016 में दक्षिणी सूडान में गृहयुद्ध छिड़ने के कारण 600 भारतीय फँस गए थे। इस ऑपरेशन को भी जनरल VK सिंह के हाथों में दिया गया था। इसमें 600 से अधिक भारतीयों को वायुसेना की सहायता से निकाला गया था। वीके सिंह इस ऑपरेशन के लिए खुद ही दक्षिणी सूडान गए थे।

इराक़ से शवों को वापस लाना

जनरल वीके सिंह वर्ष 2018 में इराक से 39 भारतीयों के शवों के अवशेषों को वापस लेकर आए थे। यह सभी इराक में इस्लामी आतंकी संगठन ISIS द्वारा मार दिए गए थे। इनके शवों को लाने के लिए वीके सिंह 2018 में वायुसेना के विशेष विमान द्वारा इराक गए थे।

ऑपरेशन गंगा – यूक्रेन

भारत ने फरवरी 2022 में चालू हुए यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद अपने नागरिकों को, जिनमें सबसे बड़ी संख्या में छात्र थे, निकालने के लिए ‘ऑपरेशन गंगा’ चालू किया था। परिस्थितियाँ विपरीत होने के बाद भी जनरल वीके सिंह को पोलैंड भेजा गया जहाँ से छात्रों को निकाला गया।

जनरल सिंह ने इस ऑपरेशन में पोलैंड पहुँच कर छात्रों के भारत वापस आने को सुनिश्चित किया था। वह कई दिन तक पोलैंड में रहे थे और जब भारतीय छात्र घर आ गए तब वह वापस आए।

शाहनवाज़, शोएब, शाहरुख़, राशिद, आज़ाद, अशरफ अली, परवेज, फैज़ल राशिद… दिल्ली दंगों में दिनेश अग्रवाल की दुकान जलाने वाले 9 बरी, मिला ‘संदेह का लाभ’

दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने साल 2020 दंगो के एक मामले में 9 आरोपितों को बरी कर दिया है। इनके नाम मोहम्मद शाहनवाज़, शोएब, शाहरुख़, राशिद, आज़ाद, अशरफ अली, परवेज, मोहम्मद फैज़ल और राशिद उर्फ़ मोनू हैं। कोर्ट ने शनिवार (25 नवंबर, 2023) को दिए गए अपने आदेश में आरोपितों के खिलाफ पुलिस की गवाही को नाकाफी बताया है। बरी हुए आरोपितों पर पुलिस ने आगजनी और तोड़फोड़ की धाराएँ लगाईं थीं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस केस की सुनवाई एडिशनल सेशन जज पुलत्स्य प्रमचला की कोर्ट में हुई। उन्होंने अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें सुनीं। अपने आदेश में उन्होंने केस में नामजद मोहम्मद शाहनवाज़, शोएब, शाहरुख़, राशिद, आज़ाद, अशरफ अली, परवेज, मोहम्मद फैज़ल और राशिद उर्फ़ मोनू को संदेह का लाभ दे कर बरी कर दिया। उन्होंने कहा कि आरोपितों पर पुलिस अपने लगाए गए चार्ज पर्याप्त सबूतों के आधार पर साबित नहीं कर पाई।

इस मामले में पुलिस के 2 जवान कॉन्स्टेबल विपिन और हेड कॉन्स्टेबल हरी बाबू बतौर गवाह दर्ज थे। दोनों ने आरोपितों को हिंसक हरकतें करते देखने का दावा किया था। कोर्ट ने दोनों पुलिसकर्मियों की गवाही पर सवाल खड़े किए। न्यायाधीश पुलत्स्य प्रमचला ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि चश्मदीद पुलिसकर्मी ने आरोपितों को सुबह 9 बजे से शाम के बाद रात होने तक साफ तौर पर देखा भी या नहीं। कोर्ट ने इस बात का भी जिक्र किया कि सिपाही विपिन घटना से पहले ही शाहनवाज और आज़ाद को जानता था।

सिपाही विपिन ने कोर्ट में बताया कि उन्होंने तीसरे आरोपित अशरफ को तब जाना जब वो अन्य केस में नामजद हो रहा था। न्यायाधीश पुलत्स्य ने यह भी कहा कि चश्मदीद शाहनवाज, अशरफ और आज़ाद को छोड़ कर पहले किसी को भी नहीं जानते थे।

क्या था मामला

28 फरवरी 2020 को दिल्ली के गोकुलपुरी थाने में SS ग्लास एन्ड प्लाईवुड कम्पनी के मालिक दिनेश अग्रवाल नाम के व्यक्ति ने लिखित तहरीर दी थी। तहरीर में उन्होंने बताया था कि 25 फरवरी 2020 को गोकुलपुरी स्थित उनकी दुकान में दंगाइयों ने आग लगा दी थी। इस आगजनी की चपेट में अग्रवाल का टेम्पू और बाइक भी आ गई थी। इसी मामले में मोहम्मद शाहनवाज़, शोएब, शाहरुख़, राशिद, आज़ाद, अशरफ अली, परवेज, मोहम्मद फैज़ल और राशिद उर्फ़ मोनू को पुलिस ने नामजद किया था।

वो अंत में निकले, मुस्कुराते हुए… जिनके जज्बे की बात अपने परिजनों से करते थे 40 मजदूर, उन गब्बर सिंह नेगी के PM मोदी भी हुए कायल: बेटे से कहा था – सबकी जिम्मेदारी मेरी

उत्तराखंड के उत्तरकाशी के सिलक्यारा सुरंग हादसे से 17 दिनों बाद वहाँ फँसे 41 मजदूर सकुशल बाहर निकल आए। लेकिन, पल-पल निराशा और आशा के बीच जूझते हुए उनका जो वक्त वहाँ गुजरा शायद वो उसे कभी भुला न पाएँ, इस सबके बीच ये सभी मजदूर गब्बर सिंह नेगी की ज़िंदादिली के भी ताउम्र के लिए कायल हो गए। गब्बर सिंह नेगी उन 41 श्रमिकों में शामिल थे, जो अंदर 17 दिनों तक फँसे रहे।

वो नेगी ही थे जिन्होंने मुश्किल की उन घड़ियों में जिंदगी जीने की उम्मीद इनके दिलों में जलाए रखी। यही वजह है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी कोटद्वार के पहाड़ के गब्बर के लिए कहना पड़ा, “देखो गब्बर सिंह, मैं तुम्हें तो विशेष रूप से बधाई देता हूँ, क्योंकि मुझे डेली रिपोर्ट हमारे मुख्यमंत्री जी बताते थे कि आप दोनों ने जो लीडरशिप दी और जो टीम स्प्रिट दिखाई मुझे तो लगता है शायद किसी यूनिवर्सिटी को एक केस स्टडी तैयार करनी पड़ेगी।”

गब्बर ने दिया सब को हौसला

बचाव अभियान के दौरान वो गब्बर सिंह नेगी ही थे जो मजदूरों को मानसिक रूप पर मजबूत करते रहे। यही नहीं, उनके जरिए ही सीएम से लेकर सभी ने मजदूरों से संपर्क साधा। सब उनके इस सहज नेतृत्व की सराहना करते रहे हैं। और करें भी क्यों न? आसान नहीं होता मुश्किल में फँसे एक दो नहीं बल्कि पूरे 40 लोगों को दिलासा देना, हिम्मत देना। दीवाली की सुबह 12 नवंबर, 2023 को हादसे के दिन इस साइट पर 51 साल के गब्बर सिंह नेगी बतौर फोरमैन तैनात थे।

भूस्खलन की वजह से सुरंग में मलबा गिरने से कुछ देर पहले ही वो सुरंग में अंदर गए थे। उनके बेहद करीब आकर मलबा गिरा और वो वहीं फँसे रह गए। इन मुश्किल हालात में उन्होंने अपने साथ वहाँ फँसे 40 मजदूर साथियों को हादसे के बारे में बताया ही नहीं बल्कि उन्हें न घबराने और शांति बनाए रखने के लिए कहा।

वहीं थे जिन्होंने सुरंग से बाहर भी वॉकी-टॉकी के जरिए हादसे के बारे में सूचना दी थी। वो मजदूरों के साथ ही सुरंग में फँसे थे, लेकिन इस दौरान जब सुरंग में मजदूरों को एक-एक दिन पहाड़ सा भारी लगने लगा तो इस पहाड़ी गब्बर ने मोर्चा सँभाल लिया। वो बाहर बचाव टीम से भी लगातार संपर्क बनाए रहे थे।

वो इन 17 दिनों में सभी मजदूरों को दिलासा देते रहे, हिम्मत बँधाते रहें। यही वजह रही की मजदूर सुरंग के अंदर से अपने परिवारवालों से बात करने के दौरान भी गब्बर सिंह नेगी का जिक्र करना और उनकी तारीफ करना नहीं भूले।

सुरंग में फँसे मजदूरों के परिजनों ने की तारीफ

लखीमपुर खीरी के मजदूर मंजीत लाल के पिता चौधरी ने कहा कि गब्बर सिंह नेगी की वजह से उनके बेटे का मनोबल बना रहा। वहीं दूसरी तरफ मजदूर सबा अहमद के भाई नैयर अहमद भी उनकी तारीफ करते नहीं थकते, वो कहते हैं कि गब्बर सिंह सरल स्वभाव के अनुभवी शख्स रहे जो सबका हौसला बढ़ाते रहे।

गब्बर सिंह नेगी के बेटे आकाश सिंह नेगी का कहना था, ‘‘मुझे कुछ सेकेंड के लिए पाइप के जरिए अपने पिता से बात करने की मंजूरी मिली थी। इस पाइप से सुरंग में फँसे श्रमिकों को आक्सीजन दी जा रही थी। पापा ने कहा वे सभी सुरक्षित हैं। उन्होंने हमसे फ़िक्र न करने को कहा और कहा कंपनी उनके साथ है।”

गब्बर सिंह ने बेटे आकाश को ये भी बताया था कि वह सुरंग में अकेले नहीं हैं और अन्य साथियों की सुरक्षा का जिम्मेदारी भी उनकी ही है। वो अपने साथियों का हौसला बढ़ा रहे हैं। तब आकाश पिता की बात सुन भावुक हो उठे। गब्बर सिंह के इस जज्बे को उनके पूरे परिवार ने भी सराहा था।

वो लगातार अपने साथ फँसे मजदूरों से कहते रहे कि हम लोगों को जल्दी ही सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाएगा। उन्होंने अपने साथ फँसे मजदूरों से कहा था कि मैं सबसे आख़िर में बाहर आऊँगा और ऐसा ही किया भी था। गब्बर के भाई जयमाल सिंह नेगी ने बताया, “वह सबसे आख़िर में निकले। बाहर आने पर वो मुस्कुरा रहे थे।”

25 साल सुरंग में काम करने का अनुभव

सिलक्यारा सुरंग बना रही कंपनी नवयुग इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड में गब्बर सिंह नेगी फोरमैन पद पर है। वो पौड़ी जिले के कोटद्वार नगर निगम क्षेत्र के तहत आने वाले विशनपुर में रहते हैं और बीते 25 साल से सुंरग निर्माण कर रही कंपनियों में काम करते आ रहे हैं।

उन्हें भूस्खलन की घटनाओं का खासा अनुभव है। पीएम मोदी से बातचीत के दौरान उन्होंने ऐसे अनुभव पर बताया था, “सर उस वक्त में सिक्किम में था। तब एक लैंड स्लाइड हुआ था तब हम फँसे हुए थे। काफी परेशानी आई थी।” जवाहर सुंरग के निर्माण में भी वो काम कर चुके हैं। सुरंग में रहने के दौरान भी गब्बर सिंह नेगी ने अपने साथ फँसे अन्य 40 मजदूरों को बताया था कि वो कुछ साल पहले भी इस निर्माण के दौरान सुरंग में फँस चुके हैं।

गब्बर सिंह के बड़े भाई जयमल नेगी भी पाइप के जरिए उनसे लगातार बात करते रहे थे। बकौल जयमल गब्बर सिंह को सभी मजदूरों की जिंदगी की फिक्र है। इसलिए वो सुरंग के अंदर मजदूरों को टहलने और योगाभ्यास करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। प्रेम पोखरियाल की भी सुरंग में फँसे मजदूरों से लगातार बात होती रही थी। उनका कहना था कि गब्बर सिंह काफी समझदार हैं। वो सभी का हौसला बनाए हुए हैं और सुरंग के अंदर डॉक्टरों की टीम के निर्देशों का पालन भी मजदूरों से वही करवा रहे हैं।

कल्लू खान और नाज़िम ने राजू को धोखे से बुलाया घर; सिर पर डंबल मार कर ले ली जान… लाश के टुकड़ों को 15 पन्नियों में भर के नाले में फेंका

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में एक व्यक्ति की हत्या करके शव को कई टुकड़ों में काटकर फेंके जाने का मामला सामने आया है। मृतक का नाम राजू है, जबकि आरोपित नाज़िम और कल्लू खान हैं। राजू की लाश को पॉलीथिन में भर के अलग-अलग जगहों पर फेंका गया था। शव के कुछ हिस्से नाले में मिलने के बाद यह घटना प्रकाश में आई। नाज़िम और कल्लू खान को गिरफ्तार कर लिया गया है। दोनों आरोपितों के बीच अब्बा-औलाद का रिश्ता है। घटना 21 सितंबर 2023 की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला ग्वालियर के जनकगंज थाना क्षेत्र का है। यहाँ 28 सितंबर 2023 को रामकुई पुलिया के पास से गुजर रहे राहगीरों को स्वर्ण रेखा नाले में इंसानी अंग दिखे। इसके बाद लोगों को इसकी जानकारी पुलिस को दी। पुलिस ने अंगों को समेट कर मृतक के पहचान की कोशिशें शुरू कर दीं। शव किसी पुरुष का था।

इसी बीच पुलिस को पता चला कि बहोडपुर का रहने वाला राजू खान 21 सितंबर से लापता है। राजू के परिजनों ने अपने स्तर पर शुरू में उसे खोजने का काफी प्रयास किया था लेकिन सफलता नहीं मिली थी। आखिरकार उसकी गुमशुदगी थाने में दर्ज करवा दी गई थी। पुलिस ने राजू के परिजनों को शिनाख्त के लिए बुलवाया। परिजनों ने लाश राजू की ही होने का दावा किया।

जनकगंज थाने ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ केस दर्ज करके जाँच शुरू कर दी। इसी दौरान राजू खान की लाश का DNA टेस्ट भी करवाया गया, जो उसके परिवार वालों से मैच कर गया। मृतक के परिजनों ने नाज़िम और कल्लू खान पर राजू की हत्या का शक जताया। हत्याकांड में नाम आते ही नाज़िम और उसके अब्बा कल्लू फरार हो गए। ग्वालियर पुलिस ने नाज़िम की लोकेशन ट्रेस की तो वो आगरा में एक किराए के मकान में मिला।

इसके बाद पुलिस नाज़िम को गिरफ्तार कर के ग्वालियर लेकर आ गई। नाज़िम से उसके अब्बा कल्लू के बारे में पूछताछ की गई। नाज़िम ने बताया कि हत्या के कुछ दिन बाद ही उसके अब्बा कल्लू को स्मैक की तस्करी से संबंधित एक केस में गिरफ्तार कर लिया गया और वह फिलहाल ग्वालियर जेल में बंद है। नाज़िम ने यह भी बताया कि उसे शंका थी कि राजू खान पुलिस की मुखबिरी करता है।

एक बार कल्लू खान भी पकड़ा गया था। नाजिम ने बताया कि 21 सितंबर 2023 को दोनों ने साजिश के तहत राजू को समझौते के लिए बुलवाया। वहाँ दोनों ने राजू के सिर पर जोर से डंबल मारा, जिससे वो अचेत हो गया। बाद में इन्होंने बाक़ा और छुरी से राजू की लाश के कई टुकड़े कर दिए। किसी को शक न हो, इसके लिए दोनों ने मिल कर 15 अलग-अलग पॉलीथिन में शव भर कर फेंक दिए।