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नैनीताल के अवैध मदरसे पर चला प्रशासन का बुलडोजर: छापे के वक्त भीतर मिले थे 24 बच्चे, न मिलता था खाना-न साफ पानी

उत्तराखंड के नैनीताल में एक मदरसे पर बुलडोजर कार्रवाई की गई है। इस अवैध मदरसे को जाँच के बाद ढहा दिया गया है। इस मदरसे पर 8 अक्टूबर 2023 को छापा पड़ा था। छापे के दौरान मदरसे से 24 बच्चे मिले थे जो कि बीमार थे और बहुत बुरी हालत में थे।

इस घटना के बाद मदरसे के संचालक को इस संबंध में नोटिस भी जारी किया गया था जिसके जवाब से जिला प्रशासन संतुष्ट नहीं हुआ। अब यह अवैध मदरसा कोर्ट से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेकर इसके 266 वर्गमीटर हिस्से को बुलडोजर से ढहा दिया गया है।

जोली कोट क्षेत्र में स्थित इस मदरसे को लेकर कुछ चौंकाने वाले खुलासे हुए थे। इस मदरसे में छापेमारी के दौरान प्रशासन को कई अनियमितताएँ भी मिली थी। 2010 से ही ये मदरसा यहाँ संचालित किया जा रहा था, यानी पिछले 13 वर्षों से। जिलाधिकारी वंदना सिंह को इसके बारे में शिकायतें प्राप्त हुई थीं।

इसके बाद हल्द्वानी की सिटी मजिस्ट्रेट ऋचा सिंह और तहसीलदार संजय सिंह को मौके पर भेजा गया था। जब टीम यहाँ चेंकिंग के लिए पहुँची तो 24 बच्चे रहते हुए मिले। चौंकाने वाली बात ये है कि ये सभी बीमार थे।

बच्चे काफी बीमार थे, लेकिन उनके इलाज के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। उनके हाथ-पाँव में चोट के निशान भी मिले थे। बच्चों ने बताया है कि उनके साथ मारपीट की जाती थी, उनमें से कई भाग भी गए। सफाई व्यवस्था के निरीक्षण में भी कई गड़बड़ियाँ मिलीं।

सिटी मजिस्ट्रेट ऋचा सिंह ने बताया कि कमरे भी गंदे थे और बच्चों के पीने के लिए साफ़ पानी तक उपलब्ध नहीं था। उनके रहने के लिए कोई साफ़ जगह नहीं थी। यहाँ तक कि उन्हें खाने के लिए भोजन तक ठीक से नहीं मिलता था। मदरसे में गन्दगी का ढेर लगा हुआ था।

मदरसा सील करने के बाद सभी बच्चों के अभिभावकों को बुलाया गया है और उनके साथ छात्रों को घर भेजा जा रहा है। जाँच की जा रही है कि बच्चों के शरीर पर चोट के निशान के क्या-क्या कारण हैं।

उत्तराखंड में लगभग 50 मदरसे ऐसे बताए जा रहे हैं, जिन्हें नियम-कानून का पालन किए बिना अवैध तरीके से संचालित किया जा रहा है। हालिया दिनों में ये पहला मौका है, जब पहाड़ी राज्य में मदरसा सील करने के बाद उसे ढहाने की कार्रवाई की गई हो।

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार इसे लेकर सख्त है। उत्तर प्रदेश में तो पहले ही मदरसों में राष्ट्रगान से लेकर स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में पढ़ाने का निर्णय लिया गया है। वहाँ मदरसों के सिलेबस में गणित और विज्ञान अनिवार्य है।

पोल में कक्का की हवा, जमीन पर भूपेश बघेल हक्का-बक्का: छत्तीसगढ़ में हर दिन मजबूत हो रही BJP, कॉन्ग्रेस का खिसका आधार

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 में सभी पार्टियों ने पूरी ताकत झोंक दी हैं। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ में दो चरणों में मतदान होना है, जिसके नतीजे 3 दिसंबर 2023 को आएँगे। अब चुनाव परिणामों को लेकर अटकलें भी लगनी शुरू हो गई हैं। इस बीच, एक सर्वे आई है, जिसमें कॉन्ग्रेस को आगे दिखाया गया है। हालाँकि, ये सर्वे जमीनी हकीकत से दूर नजर आता है, क्योंकि छत्तीसगढ़ में लगभग हर मुद्दे पर कॉन्ग्रेस जो कुछ समय पहले आगे दिखती थी, वो अब पीछे छूट चुकी है, जिसका जिक्र इस लेख में किया जा रहा है।

अभी सबसे पहले बात सर्वे की। टाइम्स नाऊ-इटीजी ने छत्तीसगढ़ के लिए जो सर्वे जारी किया है, उसमें कॉन्ग्रेस को 3 प्रतिशत वोटों से आगे दिखाया गया है। कॉन्ग्रेस के 42.30 प्रतिशत मतों के मुकाबले भाजपा को 39.30 प्रतिशत मत मिलते दिखाया जा रहा है, तो अन्य के खाते में 18.40 प्रतिशत मत जाते दिख रहा है। इस सर्वे के मुताबिक, कॉन्ग्रेस 51 से 59 सीटें जीत सकती है तो भाजपा को 27 से 35 सीटों के मिलने का अनुमान जताया जा रहा है। वहीं, अन्य के खाते में 2-6 सीटें मिलती दिख रही हैं।

औंधे मुँह गिरने वाले हैं सर्वे

छत्तीसगढ़ में चुनाव है। भूपेश बघेल के हाथ में सत्ता है, लेकिन उन्हें अपने ही दो साथियों के साथ लड़ाई लड़नी पड़ रही है। ताम्रध्वज साहू अपने बड़े साहू समाज की ओर से कॉन्ग्रेस में भूपेश बघेल को चुनौती दे रहे हैं, तो दूसरे हैं टीएस सिंहदेव, जिनकी नाराजगी किसी से छिपी नहीं है। सिंहदेव की नाराजगी थामने के लिए कॉन्ग्रेस हाईकमान को मजबूरी में उन्हें उप-मुख्यमंत्री बनाना पड़ा था। बात सिर्फ इतनी ही नहीं है, बल्कि बात है राज्य के सबसे बड़े मुद्दों की। भूपेश बघेल ने 2018 में छत्तीसगढ़ की जनता से शराबबंदी का वादा किया था, लेकिन वादा निभाना तो दूर, उनके बेटे पर ही 2000 करोड़ के शराब घोटाले का आरोप लगा है।

भूपेश बघेल ने राज्य में युवाओं को रोजगार देने की बात कही, लेकिन उनके राज्य में छत्तीसगढ़ पब्लिक सर्विस कमीशन का सबसे बड़ा घोटाला सामने आ चुका है। इस घोटाले में नेताओं और अफसरों के बच्चों-नजदीकियों को थोक के भाव कलेक्टर बनाया गया। छत्तीसगढ़ के युवाओं ने इसके खिलाफ खूब प्रदर्शन भी किए। यही नहीं, भूपेश बघेल की सरकार कॉन्ग्रेस के हाईकमान के लिए पैसे उगाहने की मशीनरी तक कही जाने लगी है। महिलाओं के कल्याण के मुद्दे पर ये सरकार अप्रभावी साबित हुई है, तो सबसे ज्यादा अनुसूचित जनजाति वाले राज्यों में से एक छत्तीसगढ़ में पिछले 5 सालों में एसटी वर्ग की क्या गत हुई है, ये किसी से छिपा नहीं है।

यही नहीं, भूपेश बघेल अपने पूरे कार्यकाल में कॉन्ग्रेस संगठन के लिए चुनावी मोड में खड़े रहे। राज्य में विकास कार्य पैरालाइज्ड हो चुके हैं। सामान्य अपराध से लेकर नक्सली हिंसा के नाम पर आम लोगों को मार देने का कलंक भी भूपेश बघेल सरकार के सिर पर लग चुका है। शिक्षा की हालत खराब है। केंद्र सरकार द्वारा पोषित योजनाओं का पैसा तो ले लिया गया, जनता तक वो पहुँचा नहीं। ऐसे में ये सर्वे किस आधार पर किया गया, सबसे बड़ा सवाल तो यही है। आगे हम विस्तार से बता रहे हैं कि क्यों कॉन्ग्रेस छत्तीसगढ़ के बचाव में मजबूत नहीं दिख रही है।

राजनीतिक नेतृत्व

कॉन्ग्रेस: छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस में ताकत के कई केंद्र हैं। भूपेश बघेल के साथ ही ताम्रध्वज साहू और टीएस सिंहदेव का अपना एक समर्थक वर्ग है। वहीं, भूपेश बघेल के पास ऐसा कोई समर्थक वर्ग नहीं दिखता है। वहीं, टॉप लीडरशिप में राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के अलावा कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी छत्तीसगढ़ पर नजर रख रहे हैं, लेकिन ये सभी नेता पड़ोस की मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीटों पर भी जुटे हुए हैं। वहीं, ताम्रध्वज साहू और टीएस सिंहदेव का समर्थक वर्ग भूपेश बघेल की सुनता तक नहीं है।

भाजपा: भारतीय जनता पार्टी के पास छत्तीसगढ़ में नेतृत्व की कोई कमीं नहीं है। तीन बार मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह को भले ही भाजपा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाकर केंद्र में बुला लिया गया हो, लेकिन छत्तीसगढ़ में वो अब भी काफी प्रभावी हैं। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अमित शाह, भाजपा के मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा और भाजपा संघठन के महासचिव बीएल संतोष छत्तीसगढ़ में पूरी तरह से सक्रिय हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई रैलियाँ छत्तीसगढ़ में कर चुके हैं। ऐसे ही एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान टीएस सिंहदेव ने जब केंद्र सरकार की तारीफ कर दी, तो सिंहदेव को कॉन्ग्रेस आलाकमान ने माफी माँगने के लिए मजबूर कर दिया।

छत्तीसगढ़ में भाजपा के पास राज्य के कई बड़े चेहरे मौजूद हैं। भाजपा के लिए ओबीसी चेहरे के तौर पर अरुण साओ को प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है, तो रमन सिंह पहले की तरह चुनावी कार्यक्रमों का अहम हिस्सा हैं। इसके अलावा अनुसूचित जनजाति के नेताओं में रेणुता सिंह सेरुता मोर्चा संभाल रही हैं, तो ओम माथुर और मनसुख माँडविया जेसे धुरंधर छत्तीसगढ़ पर नजर रखे हुए हैं।

छत्तीसगढ़ का चुनावी इतिहास

छत्तीसगढ़ के चुनावी इतिहास को समझने के लिए सिर्फ थोड़ा ही पीछे जाना होगा। छत्तीसगढ़ में पहली बार कॉन्ग्रेस ने 2018 में जीत दर्ज की। भूपेश बघेल की अगुवाई में कॉन्ग्रेस ने 68 विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी, तो भाजपा को 90 में से सिर्फ 15 सीटें मिली थी, 7 सीटें अन्य के हाथों में हैं, तो 2 सीटों पर अन्य दलों\निर्दलीयों ने जीत हासिल की थी। भाजपा को कुल 33 प्रतिशत और कॉन्ग्रेस को 43 प्रतिशत वोट मिले थे। इस तरह से इस बार भाजपा और कॉन्ग्रेस के बीच महज 3 प्रतिशत के मतों का अंतर सर्वे में दिख रहा है, जो सीटों के लिहाज से लगभग दोगुने का अंतर तो कतई नहीं बैठता। ऐसे में ये आंकड़े संदिग्ध दिखते हैं।

वैसे, साल 2013 के विधानसभा चुनाव में आँकड़ा भाजपा के पक्ष में था। भाजपा ने 90 में से 49 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सरकार बनाई थी। कॉन्ग्रेस को 39 सीटें मिली थी। अन्य के हिस्से में दो सीटें गई थी। मत प्रतिशत की बात करें तो 2013 में भाजपा को 41 प्रतिशत तो कॉन्ग्रेस को 40 प्रतिशत कुल वोट पड़े थे। और अभी साल 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो भाजपा ने 51 प्रतिशत मत हासिल करते हुए 9 लोकसभा सीटें जीती थी, जबकि कॉन्ग्रेस को 42 प्रतिशत वोट मिले थे, और महज 2 सीटें उसकी झोली में गई थी। ये चुनाव 2018 के विधानसभा चुनाव के बाद हुए थे, जिसमें भाजपा ने बाजी मारी थी। ऐसे में इस विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को आगे दिखाने का मतलब है कि या तो आपका सैंपल साइज बहुत छोटा है, या आपके एक्सपर्ट छत्तीसगढ़ की राजनीति से अनभिज्ञ हैं।

छत्तीसगढ़ में कितने मतदाता, सीटें कितनी और आरक्षण कितना?

चुनाव आयोग के आँकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं। इसमें से 39 सीटें आरक्षित हैं। आरक्षित सीटों में से 10 अनुसूचित जातियों (एससी वर्ग) के लिए और 29 अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग के लिए सुरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ में कुल 2 करोड़ 3 लाख 80 हजार 79 मतदाता हैं। जिनमें 1 लाख 60 हजार 955 दिव्यांग मतदाता हैं, तो 790 मतदाता थर्ड जेंडर के हैं। इसके अलावा 80 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ मतदाताओं की संख्या 2 लाख 63 हजार 829 मतदाता हैं। वहीं, 2 लाख 63 हजार 829 मतदाता 18-19 साल के हैं, जो पहली बार मतदान करने वाले हैं।

जाति वर्ग आधारित मतदाताओं का डाटा

छत्तीसगढ़ में सामान्य वर्ग के मतदाता महज 5 प्रतिशत हैं। सबसे बड़े वर्ग के तौर पर ओबीसी और अनुसूचित जनजाति हैं। छत्तीसगढ़ के कुल मतदाताओं में 37 प्रतिशत ओबीसी वर्ग के हैं, जिसमें साहू समाज के सबसे ज्यादा वोटर हैं, तो अनुसूचित जनजाति (एसटी वर्ग) के 34 प्रतिशत मतदाता हैं। राज्य के 15 प्रतिशत मतदाता एससी कम्युनिटी के हैं। खास बात ये है कि छत्तीसगढ़ में भाजपा भले ही लगातार तीन चुनाव जीती हो, लेकिन महज 6 विधानसभा सीटों पर ही उसके मतदाता लगातार तीन चुनाव जीत सके। वहीं, कॉन्ग्रेस के पास ऐसी 9 सीटें हैं, जो पिछले तीन चुनाव से कॉन्ग्रेस के पास हैं। इसमें से दो सीटें एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। छत्तीसगढ़ में कुल 12 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहाँ अनुसूचित जनजाति का वर्चस्व है, तो बाकी की 78 सीटों पर एससी, एसटी और ओबीसी तीनों का प्रभाव है।

चुनाव आयोग ने क्या की है तैयारियाँ?

चुनाव आयोग ने इस बार थर्ड जेंडर, सेक्स वर्कर्स और दिव्यांगों को मतदान में शामिल करने के लिए कई अभियान चलाए हैं। चुनाव आयोग सभी वर्ग के मतदाताओं को मतदान में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। इसके लिए इस बार छत्तीसगढ़ में मतदान केंद्रों की संख्या भी बढ़ाई गई है। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कुल 23,677 मतदान केंद्र बनाए गए थे। इस बार इनकी संख्या बढ़ाकर 24 हजार 109 कर दी गई है। चुनाव आयोग ने दिव्यांगों के लिए व्हीलचेयर की सुविधा भी दी है, तो दृष्टिबाधित लोगों के लिए एक साथी को ले जाने की भी अनुमति दे दी है। चुनाव आयोग ने बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों में पहली बार 100 से अधिक मतदान केंद्र बनाए हैं, जिसकी सुरक्षा के लिए भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती की गई है।

छत्तीसगढ़ में मतदान और नतीजे कब?

छत्तीसगढ़ में मतदान दो चरणों में होने हैं। पहले चरण में 7 नवंबर और 17 नवंबर को मतदान होने हैं। पहले चरण में नक्सल हिंसा प्रभावित बस्तर और राजनांदगाँव डिवीजन के 7 जिलों की 20 विधानसभा सीटों पर 7 नवंबर को मतदान होंगे, तो दूसरे चरण में बाकी की 70 सीटों पर मतदान होंगे। छत्तीसगढ़ में बाकी राज्यों की तरह 3 दिसंबर को मतगणना होगी।

दिल थाम कर बैठिए, 3 दिसंबर को हो जाएगा सबकुछ साफ

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में सत्ता-विरोधी लहर एक बड़ा फैक्टर है। ऐसे में भाजपा कॉन्ग्रेस सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी भावना का फायदा उठाने की उम्मीद कर रही है। कॉन्ग्रेस पिछले पाँच साल से छत्तीसगढ़ में सत्ता में है, लेकिन जनता में कॉन्ग्रेस के प्रति काफी असंतोष दिखता है। जबकि भाजपा राज्य में अपनी मजबूत संगठनात्मक उपस्थिति से भी लाभान्वित होने की उम्मीद कर रही है।

भाजपा के पास एक अच्छी तरह से चलने वाला चुनावी मशीनरी है और यह उम्मीद की जा रही है कि वह मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होगी। वैसे, इस बार छत्तीसगढ़ में हमार राज पार्टी नाम से एसटी वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का दम भरने वाली पार्टी भी मैदान में है, जो एसटी वर्ग के लिए आरक्षित 29 विधानसभा सीटों पर कॉन्ग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।

बहरहाल, चुनाव के नतीजे तो 3 दिसंबर को आएँगे, लेकिन तब तक सभी दलों और सभी उम्मीदवारों की धड़कनें बढ़ी ही रहेंगी। इस बार भूपेश बघेल के सामने सिर्फ भाजपा की ही नहीं, बल्कि अजीत जोगी कॉन्ग्रेस भी चुनौती पेश कर रही है। उनके अपने परिवारी जन भी उन्हें चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में सर्वे के आंकड़ें कहाँ तक सटीक बैठेंगे, ये देखने वाली बात होगी।

तनवीर कर रहा था हिन्दू छात्रा से छेड़छाड़, गुंडे लाकर घर में घुसा: रोकने पर की गार्डों से मारपीट, UP पुलिस ने पकड़ा

नोएडा के सेक्टर 142 की एक सोसायटी में तनवीर अहमद ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर साथ में पढ़ने वाली एक हिन्दू छात्रा के परिवार वालों पर हमला कर दिया और जान से मारने की धमकियाँ दीं। इससे पहले तनवीर ने छात्रा के साथ छेड़खानी भी की थी। पीड़िता नोएडा के एक निजी विश्वविद्यालय में BALLB की छात्रा है।

जानकारी के अनुसार, छात्रा के साथ ही पढ़ने वाले तनवीर अहमद ने 30 अक्टूबर को नोएडा की पारस टियरा सोसायटी में स्थित उसके अपार्टमेन्ट में घुस कर छेड़खानी की और प्रताड़ित किया। इसकी अगली सुबह तनवीर वापस आकर फिर छात्रा को परेशान करने लगा।

इस दौरान वह अपने साथ 8-10 गुंडे लेकर आया, जो कि छात्रा समेत पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी देने लगे। पीड़िता के हल्ला मचाने पर सोसायटी के गार्ड ने आकर उन्हें बचाया। पीड़िता ने बताया कि यदि गार्ड वहाँ आकर उनके परिवार को ना बचाते तो कोई बड़ी घटना भी हो सकती थी।

सोसायटी के गार्डों का गुंडों को रोकते हुए वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें दिखता है कि तनवीर अपने गुंडों के साथ गार्डों से मारपीट कर रहा है और उन्हें धमका रहा है। थोड़ी देर गार्डों से उलझने के बाद तनवीर अपने साथियों के साथ घटनास्थल से फरार हो गया।

घटना की जानकारी पुलिस को मिलने के पश्चात उसने बलवा, महिला से छेड़छाड़ करने और डराने धमकाने जैसी धाराओं में तनवीर के खिलाफ मामला दर्ज करके उसको गिरफ्तार कर लिया है। तनवीर के अन्य साथी अब भी फरार हैं।

इस मामले में नोएडा सेंट्रल के ADCP हिरदेश कठेरिया ने कहा, “सेक्टर 142 थाने को पारस टियरा सोसायटी में 29 और 30 अक्टूबर को हुई घटना के विषय में जानकारी दी गई। इस पर तुंरत कार्रवाई करते हुए आरोपित को गिरफ्तार किया गया। दोनों एक साथ ही पढ़ते हैं। 29 को तनवीर ने पीड़िता के घर पर अभद्रता की। इस मामले में अभियोग दर्ज कर उसे न्यायालय में पेश किया गया है और उसके अन्य साथियों की तलाश की जा रही है।”

PAK सेना ने उतारा मौत के घाट, आज तक नहीं मिला पार्थिव शरीर: जानें कौन थे धीरेन्द्रनाथ दत्ता, बंगाली भाषा के लिए किया था जिन्होंने उर्दू का विरोध

बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के बड़े नाम और बांग्ला भाषा के लिए जीवन भर पाकिस्तानी सरकार से लोहा लेने वाले क्रांतिकारी धीरेन्द्रनाथ दत्ता की आज 2 नवम्बर को जयंती है। उन्हें पाकिस्तान की सेना ने उनके बेटे के साथ घर से उठा कर मार दिया था। लेकिन उनका पार्थिव देह आज तक नहीं मिल सकी है।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता का जन्म वर्ष 1886 में 2 नवम्बर को बांग्लादेश (तब संयुक्त बंगाल) के कमिला जिले के रामरेल गाँव हुआ था। धीरेन्द्रनाथ दत्ता की शुरूआती पढ़ाई स्स्थानीय स्तर पर और फिर कोलकाता के रिपन कॉलेज में हुई थी। धीरेन्द्रनाथ दत्ता ने अपनी पढ़ाई के बाद वकालत का पेशा चुना।

वह वकील के तौर पर आमजनमानस में काफी लोकप्रिय थे। धीरेन्द्रनाथ दत्ता शुरुआत से ही क्रांतिकारी विचारों वाले थे। उन्होंने 1905 में कर्जन द्वारा प्रस्तावित बंगाल विभाजन, 1920 में असहयोग आन्दोलन और फिर 1942 में महात्मा गाँधी द्वारा चालू किए गए ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में भी हिस्सा लिया था।

धीरेन्द्रनाथ अपने इलाके में लोकप्रिय थे इसीलिए उनको वर्ष 1937 में बंगाल प्रांतीय विधानसभा में विधायक चुना गया था। धीरेन्द्रनाथ दत्ता बंगाली राष्ट्रवाद और बंगाली भाषा के बड़े समर्थक थे। उन्होंने इस कारण से भारत-पाक विभाजन के बाद बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में रहना चुना।

उनके पास देश की आजादी के बाद एक समय भारतीय बंगाल की विधानसभा या फिर संविधान सभा में जाने का विकल्प भी था लेकिन अपनी मातृभूमि से प्रेम के चलते वह वहीं रहे और पाकिस्तान की संविधान सभा में शामिल होने का निर्णय लिया।

पाकिस्तान की संविधान सभा में धीरेन्द्रनाथ दत्ता अकेले और पहले ऐसे नेता थे जो कि बंगाली भाषा को पूर्वी पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बनाने की लड़ाई लड़ रहे थे। वह पूर्वी पाकिस्तान के पहले ऐसे नेता थे जिन्होंने पाकिस्तान में उर्दू के विरुद्ध आवाज उठाई थी जो कि आगे चल कर बांग्लादेश की आजादी का सबसे बड़ा कारण बनी।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता का कहना था कि भले ही पाकिस्तान के भीतर बांग्ला एक क्षेत्रीय भाषा है लेकिन पूर्वी पाकिस्तान में यह आमजन में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। उनका कहना था कि 6.9 करोड़ पाकिस्तानियों में से 4 करोड़ लोग बांग्ला भाषा बोलते हैं ऐसे में इसे ही आधिकरिक भाषा बनाया जाना चाहिए।

हालाँकि, उनकी इस माँग को पाकिस्तान की संविधान सभा में ठुकरा दिया गया। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मुहम्मद अली जिन्ना ने करोड़ों पूर्वी पाकिस्तानियों का अपमान करते हुए ढाका में एक रैली में स्पष्ट कर दिया था कि उर्दू के अलावा और कोई भी भाषा पाकिस्तान में नहीं चलेगी।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता बंगाल की प्रांतीय सरकार में रहकर बांग्ला भाषा के लिए काम करते रहे और बंगालियों के लिए अधिकारों की माँग करते रहे। वह पूर्वी बंगाल के मुख्यमंत्री अताउर रहमान की सरकार में स्वास्थ्य और समाज कल्याण मंत्री भी रहे।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता को वर्ष 1960 में पाकिस्तानी सरकार ने 1960 में विधानसभा से बर्खास्त कर दिया था। उन्हें 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान उनको घर में नजरबन्द कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास भी ले लिया था।

राजनीति से संन्यास लेने के बाद भी धीरेन्द्रनाथ बंगाली अधिकारों के लिए सक्रिय रहे और लगातार नए बंगाली नेताओं को बढ़ाने में सहायता करते रहे। हालाँकि, उनका यह रवैया पाकिस्तान के जनरल याहया खान की तानाशाह सरकार को पसंद नहीं आया।

29 मार्च 1971 को धीरेन्द्रनाथ दत्ता और उनके पुत्र दिलीप कुमार दत्ता को पाकिस्तान की सेना के द्वारा उनके घर से अगवा करके मैनामाटी कैंटोनमेंट में ले जाकर मार दिया गया। आजतक उनका शव भी बरामद नहीं हो सका है।

धीरेन्द्रनाथ दत्ता की आज 137वीं जयंती है। बंगाली राष्ट्रवाद और बांग्ला भाषा के अधिकारों के लिए लड़ने वाले धीरेन्द्रनाथ बांग्लादेश के निर्माण से पहले ही मार दिए गए। इस प्रकार उनका बांगला को आधिकारिक भाषा बनते देखने का सपना उनके जीवनकाल में पूरा नहीं हो सका।

बंगाल की जनता उनका आज भी सम्मान करती है और बांग्ला भाषा के लिए आवाज उठाने वाले पहले क्रांतिकारी के तौर पर जानती है। उनके बांग्लादेश के निर्माण में योगदान को लेकर फरवरी 2023 में डाक्यूमेंट्री भी रिलीज की गई थी।

‘तुरंत बताओ…कैसे कहा ‘अटैक’ करा सकती है सरकार’: IT मंत्रालय ने माँगा Apple कंपनी से जवाब, विपक्षी दलों ने अलर्ट आने पर उठाया था सवाल

भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने हाल ही में राजनेताओं एवं अन्य लोगों को भेजे गए ‘सरकार प्रायोजित हैकरों से सावधान’ वाले मैसेज पर एप्पल (Apple) से जवाब माँगा है। आईटी मंत्रालय ने गुरुवार (2 नवंबर 2023) को Apple को एक नोटिस भेजकर इस दावे का सबूत पेश करने को कहा गया। मंत्रालय ने इस नोटिस पर एप्पल से तुरंत जवाब माँगा है।

जानकारी के मुताबिक, आईटी मंत्रालय ने एप्पल प्रतिनिधियों से पूछा है कि उन्होंने कैसे फैसला किया कि हमला ‘राज्य प्रायोजित’ था। मंत्रालय ने एप्पल से ये भी सवाल किया है कि उसने ये फैसला किस आधार पर किया कि फोन को दूर से एक्सेस किया जाएगा और संवेदनशील डेटा लीक हो जाएगा।

गौरतलब है कि मंगलवार (31 अक्टूबर 2023) को एप्पल के आईफोन का इस्तेमाल करने वाले कई लोगों के पास कंपनी की तरफ से चेतावनी का नोटिफिकेशन गया था। इसमें एप्पल का डिवाइस इस्तेमाल करने वाले विपक्षी पार्टियों के सांसदों भी शामिल थे। आई मैसेज (iMessage) और एप्पल मेल में भेजे इस मैसेज में लिखा था कि सरकार के स्पॉन्सर्ड हैकर्स आपके आइफोन पर हमला कर सकते हैं।

बस फिर क्या था, इसको लेकर विपक्षी दलों ने सरकार पर ब्लेम गेम शुरू कर दिया। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा, कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर, सुप्रिया श्रीनेत, पवन खेड़ा, केसी वेणुगोपाल, शिवसेना (यूबीटी) की राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी, आप सांसद राघव चड्ढा, AIMIM चीफ और सांसद असदुद्दीन ओवैसी मोदी सरकार पर हमलावर हो उठे।

केंद्र सरकार और खासकर केंद्रीय गृह मंत्रालय इनके निशाने पर आया। कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा तो एप्पल मैसेज का स्क्रीनशॉट शेयर कर ये तक कह गए, “मोदी सरकार, आप ऐसा क्यों कर रहे हो।” यही नहीं इन सांसदों और नेताओं ने अपने संबंधित एक्स हैंडल पर एप्पल की ओर से आए कथित नोटिफिकेशन के स्क्रीनशॉट भी पोस्ट किए। विपक्ष ने बुधवार (1 नवंबर 2023) को एप्पल अलर्ट मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश की।

महुआ मोइत्रा ने इसको लेकर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भी लिखा। उन्होंने इसकी जाँच के लिए आईटी की स्थायी संसदीय समिति की बैठक बुलाने की माँग की। इसको लेकर इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा था कि भारत सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा और निजता की रक्षा करने के लिए पूरी तरह से संजीदा है। उन्होंने इस मामले की जाँच कराने की बात कही थी।

अश्विनी वैष्णव ने यह भी बताया था कि एप्पल ने ऐसे मैसेज अलर्ट्स को लेकर 150 देशों में एडवाइजरी जारी की है। अब इसी बात पर कायम रहते हुए उनके मंत्रालय ने एप्पल से जवाब तलब किया है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के एक राजनीतिक सहयोगी और संघीय गृह मंत्रालय के दो अधिकारियों के मुताबिक, राजनेताओं की तरफ से जताई गई सभी साइबर सुरक्षा चिंताओं की जाँच की जा रही है।

भाजपा ने विपक्ष की बात को सिरे से नकारते हुए जॉर्ज सोरोस के फंडिंग वाले एक्सेस नाउ और आईफोन नोटिफिकेशन के बीच लिंक होने का इशारा किया था। बीजेपी ने कहा था कि इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी सब कुछ छोड़कर इस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने को उतावले हो गए। वहीं कॉन्ग्रेस नेता कार्ति चिदंबरम और सीपीआई (एम) सांसद जॉन ब्रिटास ने आईटी के लिए संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष को पत्र लिखा।

गौरतलब है कि गुरुवार (1 नवंबर 2023) को आईटी सचिव एस कृष्णन ने कहा था कि विपक्षी दलों के सांसदों ने एप्पल की तरफ से भेजे गए अलर्ट मैसेज का जो मुद्दा उठाया था, उसके लिए भारतीय कंप्यूटर आपात प्रतिक्रिया टीम यानी सीईआरटी-एन (CERT-N) जाँच करेगा। ये देश की कंप्यूटर सुरक्षा से जुड़े मामलों पर जवाब देने के लिए राष्ट्रीय नोडल एजेंसी है।

IIT कैंपस में घूम रही थी छात्रा, बाइक सवारों ने रोक कर कपड़े उतारे, वीडियो बनाया: नाराज छात्र BHU में धरने पर बैठे

आईआईटी बीएचयू में छेड़खानी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। मामला बुधवार (1 नवंबर, 2023) का है। जहाँ कैम्पस में ही रात करीब 2 बजे साथी संग घूम रही छात्रा को पहले बाइक सवार युवकों ने रोका, उनके साथी से मारपीट की और छात्रा को अलग ले जाकर उनसे छेड़खानी करके उसका वीडियो बना लिया। आरोप है कि उन मनबढ़ बदमाशों ने महिला स्टूडेंट के कपड़े फाड़े और फिर उसे सड़क किनारे आपत्तिजनक हालत में छोड़ गए। आरोपितों की संख्या 3 बताई जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, छेड़खानी की इस घटना की खबर गुरुवार (2 नवंबर, 2023) को जैसे ही परिसर में हुई, पूरे परिसर के छात्र इकट्ठा होकर धरने पर बैठ गए। धरना आज भी जारी है। छात्र IIT के गेट पर आरोपितों की गिरफ्तारी और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए धरने पर बैठे हैं। धरनारत छात्रों की माने तो परिसर में ऐसी घटनाएँ अक्सर होती हैं लेकिन सुरक्षा को लेकर यहाँ पर किसी तरह का कोई इंतजाम नहीं है।

छेड़खानी की घटना की खबर सुनकर प्रशासन भी चौकन्ना हो गया है। ऑपइंडिया ने डीन ऑफ़ स्टूडेंट अफेयर्स IT BHU से भी बात की। उन्होंने घटना की पुष्टि करते हुए अभ ज्यादा जानकारी होने से इनकार किया। कहा मामले में छात्रा की शिकायत पर एफआईआर दर्ज कराई गई है। वहीं इस बड़ी घटना के बाद आईआईटी बीएचयू में सुबह से ही छात्र-छात्राएँ सड़कों पर हैं। इतना ही नहीं संस्थान के सभी डिपार्टमेंट के सभी क्लासेस भी बंद हैं।

दर्ज शिकायत के अनुसार, आरोपितों ने छात्रा के कपड़े उतारे और किस किया। उन्होंने इसका वीडियो भी बनाया। जिससे छात्र भड़के हुए हैं। बड़ी संख्या में छात्र धर्मराज हॉस्टल चौराहे पर इकट्ठा होकर धरना दे रहे हैं। साथ ही हाथ में हैशटैग Campus Closed और हैशटैग जस्टिस लिखी हुई तख्तियाँ हाथ में लिए हुए कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी छात्रों ने बताया कि कैम्पस में लड़कियाँ सुरक्षित नहीं हैं। कैम्पस में ज्यादातर जगहों पर सुरक्षाकर्मी नहीं रहते और कैम्पस में लगे सीसीटीवी भी खराब पड़े हैं।  

छात्रा का बनाया आपत्तिजनक वीडियो, एफआईआर दर्ज

एफआईआर में छात्रा ने बताया, “मैं अपने हस्टल न्यू गर्ल्स IIT BHU से निकली थी। जैसे ही गाँधी स्मृति छात्रावास चौराहे के पास पहुँची, वहीं पर मेरा दोस्त मुझे मिला। हम दोनों साथ में जा रहे थे कि रास्ते में कर्मन बाबा मन्दिर से करीब 300-400 मीटर के बीच एक बाइक आई, जिस पर तीन लोग बैठे हुए थे। वे लोग अपनी बाइक वहीं खड़ी करके मुझे और मेरे दोस्त को अलग कर दिए। मेरा मुँह पूरी तरह से दबा लिए।

वे यहीं नही रुके मुझे एक कोने में लेकर गए। पहले मुझे किस किया। उसके बाद मेरे सारे कपड़े निकालकर विडियो और फोटो बनाया। जब मैं बचाव के लिए चिल्लाई तो मुझे मारने की धमकी दी। मेरा फोन नंबर भी लिया और 10-15 मिनट तक मुझे बंधक बनाए रखा। फिर आपत्तिजनक हालत में छोड़ गए।”

आरोपित छात्रा का मोबाइल भी अपने साथ ले गए एवं जाते-जाते जान से मारने की धमकी भी दी है। वहीं छात्रा ने घटना के बाद पास के ही एक प्रोफेसर घर मदद के लिए गई। प्रोफ़ेसर ने छात्रा को सुरक्षकर्मियों के पास पहुँचाया। जहाँ से बाद में लंका थाना में शिकायत की गई। छात्रा की शिकायत पर लंका थाने में धारा 354 , 506 IPC और IT एक्ट की धारा 66 E के तहत FIR दर्ज की गई है। 

घटना में 3 युवक थे शामिल

बताया जा रहा है घटना में 3 युवक शामिल थे। जो बाहरी बताए जा रहे हैं। हालाँकि, उनकी पहचान नहीं हो पाई है।  इस वारदात के बाद मौके पर लंका थाना के SO सहित कई पुलिस अधिकारी धरनास्थल पर मौजूद हैं। भेलूपुर एसीपी प्रवीण सिंह ने बताया कि इस मामले में छात्रों से बातचीत की जा रही है। उनके शिकायत के आधार पर आगे पुलिस कार्रवाई करेगी। 

गौरतलब है कि बीएचयू में 2017 में भी छेड़खानी की बड़ी घटना सामने आई थी। तब भी खूब बवाल हुआ था। 

बस नाम रख लिया INDI गठबंधन, काम कुछ हो नहीं रहा: कॉन्ग्रेस पर कुपित हुए नीतीश कुमार, अब किसके तरकश में बैठेगा तीर?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कॉन्ग्रेस पर हमला बोला है। उन्होंने कहा है कि कॉन्ग्रेसी नेता बिजी हैं, गठबंधन पर कोई काम नहीं हो रहा है। नीतीश कुमार का साफ कहना है कि अभी गठबंधन को लेकर कोई बात नहीं हो रही है, न ही कोई काम चल रहा है, क्योंकि कॉन्ग्रेस के नेता पाँच राज्यों के चुनाव में व्यस्त हैं। चुनाव खत्म होने के बाद ही इस गठबंधन को लेकर कोई बातचीत होगी।

नीतीश कुमार ने खुद को सभी को साथ लेकर चलने वाला नेता बताया। वह गुरुवार (2 नवंबर 2023) को सीपीआई और वामदलों द्वारा पटना में आयोजित एक रैली में शामिल हुए। इस दौरान मंच से उन्होंने कॉन्ग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया। नीतीश कुमार ने कहा है कि अभी कॉन्ग्रेस पार्टी गठबंधन पर कोई ध्यान नहीं दे रही है। उसका ध्यान सिर्फ 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव पर है।

नीतीश कुमार का ये बयान कुछ-कुछ अखिलेश यादव के बयान से मिलता जुलता है कि अभी तक इस गठबंधन को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है। अखिलेश यादव ने एमपी विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस से मिली दुत्कार के बाद कहा था कि उन्हें अगर पता होता कि ये गठबंधन एमपी चुनाव के लिए नहीं है तो वो यहाँ बैठक के लिए आते ही नहीं। अब नीतीश कुमार ने भी कुछ ऐसी ही बात कही है।

कॉन्ग्रेस पर हमला बोलते हुए नीतीश कुमार ने इंडी गठबंधन से निकलने की बात तो नहीं कही, हाँ ये जरूर कह दिया कि वो सभी को लेकर चलना चाहते हैं। तभी सभी को एकजुट कर रहे हैं। उन्होंने खुद को सोशलिस्ट बताते हुए कहा कि सीपीआई से पुराना रिश्ता है। कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट को एक होकर आगे चलना है। अब एक बार पाँचों राज्यों के विधानसभा चुनाव खत्म हो जाए, उसके बाद इस गठबंधन के भविष्य पर चर्चा होगी।

नीतीश कुमार के रोल को हाईजैक कर रहे राहुल गाँधी?

भाजपा के खिलाफ गठबंधन खड़ा करने में नीतीश कुमार का सबसे बड़ा रोल रहा, लेकिन मौका मिलते ही कॉन्ग्रेस ने उन्हें किनारे कर दिया। राहुल गाँधी ने पूरा गठबंधन हाईजैक कर लिया है। यहाँ तक कि इस गठबंधन को खड़ा करने वाले नीतीश कुमार से पूछे बिना ही गठबंधन का नामकरण I.N.D.I. Alliance कर दिया था। इस बात से नीतीश कुमार काफी नाराज हुए थे और गठबंधन की ओर से आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लिए बगैर ही लौट आए थे।

हालाँकि, उन्होंने नाराजगी की बातों को नकार दिया था, लेकिन उसके बाद से नीतीश कुमार के बयान बताते हैं कि उन्हें ही इस गठबंधन में कोई भाव नहीं दिया जा रहा है, जबकि उनके दम पर ही ये खड़ा हुआ। वहीं, अखिलेश यादव को साफ कह चुके हैं कि एमपी में उनके 40 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं, जब लोकसभा चुनाव आएगा तब देखा जाएगा।

गौरतलब है कि नीतीश कुमार ने भाजपा के खिलाफ सभी दलों को इकट्टा करने के लिए पूरा जोर लगा दिया था। उनकी मेजबानी में इस गठबंधन की घोषणा से पहले ही पटना में एक बैठक आयोजित की गई थी। इसके बाद बैठक मुंबई और फिर बेंगलुरु में हुई। इसी बैठक के दौरान उनकी मर्जी पूछे बगैर राहुल गाँधी ने गठबंधन के नाम की घोषणा कर दी थी, जिसके बाद गठबंधन की ओर से साझा बयान जारी किया गया था।

इस बयान में भी नीतीश कुमार को किनारे करने की झलक दिखी थी, जब उनके द्वारा एजेंडा के तौर पर शामिल कराई गई जातीय जनगणना की माँग पर सभी दल सहमत नहीं हो सके थे। बाद में साझे बयान के दौरान इस मुद्दे को ही गायब कर दिया गया। इसके बाद राहुल गाँधी ने गठबंधन की तरह ही जातीय जनगणना की माँग को भी हाईजैक करने की कोशिश की है और वो लगातार जातीय जनगणना पर मुखर होकर बयानबाजी कर रहे हैं।

इंडी गठबंधन के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह!

इस गठबंधन का हिस्सा डीएमके पार्टी ने सनातन पर हमले किए, तब भी इंडी गठबंधन की ओर से उनका न तो समर्थन किया गया और न ही विरोध। ये जरूर हुआ कि उदयनिधि स्टालिन के बयान के बाद इंडी गठबंधन की भोपाल में जो रैली होने वाली थी, वो चुनावों की वजह से कॉन्ग्रेस के दबाव में रद्द कर दी गई। वहीं, आरजेडी के नेताओं की सनातन और हिंदू विरोधी बयानबाजी पर भी नीतीश कुमार समेत सभी दल खामोश रहे हैं।

इसके बाद अखिलेश यादव ने खुलेआम इस गठबंधन के खिलाफ बयान दिए तो अब नीतीश कुमार के तेवर भी सामने आ गए। इस बीच, अखिलेश यादव ने भी साफ कर दिया है कि वो इंडी गठबंधन में होकर भी उत्तर प्रदेश की 80 में से 65 लोकसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेंगे। उन्हें किसी दल के साथ की जरूरत नहीं।

इसी तरह पंजाब से लेकर दिल्ली तक आम आदमी पार्टी और कॉन्ग्रेस की खींचतान सामने आ ही चुकी है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में वामदलों के साथ काम करने को इच्छुक नहीं हैं। ऐसे में बहुत कम जगहें ऐसे बची हैं, जहाँ ये इंडी गठबंधन बिना विवादों के हों। ऐसे में ये कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा को रोकने के लिए बना इंडी गठबंधन शायद ही कोई कमाल कर पाए।

सड़क पर खून से लथपथ तड़प रहा था फिल्ममेकर, लोग बनाते रहे Video, चुरा लिया सामान: 2 घंटे बाद मिला इलाज, अस्पताल में मौत

दिलवालों की दिल्ली की बेदर्दी का नमूना शनिवार (28 अक्टूबर,2023) को देखने को मिला। यहाँ सड़क पर हादसे का शिकार हुए एक युवा फिल्म मेकर पीयूष पाल बाइक हादसे में घायल होकर काफी देर सड़क पर तड़पते रहे, लेकिन कोई उन्हें अस्पताल नहीं लेकर गया।

दो घंटे बाद जाकर उन्हें ट्रीटमेंट मिला। मगर, तब तक देर हो गई थी। गंभीर चोटों की वजह से वो दुनिया को अलविदा कह गए। अगर घटना के वक्त वहाँ खड़े लोग थोड़ी इंसानियत दिखाकर वीडियो- फोटो छोड़ उनकी मदद करने आगे आते तो शायद आज वो जिंदा होते।

कुछ लोग तो इस कदर बेदर्द निकले कि वो हादसे के शिकार युवक को खून से लथपथ देखकर भी उनका सारा सामान लूट कर ले गए।

पोस्टमार्टम के बाद कल बुधवार (1 नवंबर, 2023) देर शाम निगमबोध घाट पर पीयूष का अंतिम संस्कार हुआ, लेकिन पीयूष का इस तरह जाना हमारे इंसान होने पर कई सवाल छोड़ गया।

ये वाकया साउथ दिल्ली की बिजी रोड का है। शनिवार की रात 9.45 बजे 30 साल के फिल्म मेकर पीयूष पाल अपनी नई बाइक पर कालका जी जा रहे थे। पुलिस के मुताबिक,उनकी बाइक की पंचशील एनक्लेव के पास एक दूसरी बाइक से टक्कर हो गई।

पाल इस हादसे के बाद आधे घंटे तक खून से लथपथ सड़क पर पड़े रहे, मगर दिल्ली वालों को दिल नहीं पसीजा। पीयूष की साँसे पल-पल उखड़ रही थीं, पर वहाँ से गुजरने और वहाँ खड़े लोग इंसानियत को दरकिनार कर इस हादसे का वीडियो बनाने और सेल्फी लेने में मशगूल रहे।

इस युवा फिल्म मेकर के चेहरे और सिर में गंभीर चोटें आई थीं। उन्हें तुरंत मदद की जरूरत थी, लेकिन लोगों को इससे क्या लेना-देना था। उन्हें तो बस हादसे को सोशल मीडिया पर पोस्ट करके व्यूज और लाइक बढ़ाने की जल्दी थी। जब-तक पीयूष को मदद पहुँचती बहुत देर हो चुकी थी। सड़क हादसे के दो घंटे बाद उसे अस्पताल ले जाया गया। जहाँ उसने दम तोड़ दिया।

जानकारी के मुताबिक, ये हादसा आउटर रिंग रोड पर आईआईटी क्रॉसिंग से नेहरू प्लेस को जाने वाले रास्ते पर रात करीबन 9.45 बजे हुआ। ये खुलासा पंचशील एंक्लेव के पेट्रोल पंप पर लगे एक सीसीटीवी की फुटेज से हुआ। इस सड़क पर सारा दिन वाहनों का ताँता लगा रहता है।

इस हादसे के 30 मिनट बाद वहाँ से गुजर रहे पंकज जैन और कुछ लोग वहाँ हंगामा होता देख रुके। जैन ने टीओआई को बताया कि लोग वहाँ खड़े थे जिन्होंने बताया कि पीयूष लगभग आधे घंटे से यहाँ पड़ा है और इसका बहुत खून बह चुका है।

जैन ने बताया,”मैंने दो-तीन लोगों से उसको उठाने में मदद माँगी। हम उसे ऑटोरिक्शा में नजदीक के क्लीनिक में ले गए थे, लेकिन वो इस केस को हैंडल नहीं कर पाया।” उन्होंने आगे बताया कि इसके बाद घायल पीयूष को वहाँ से हेवी ट्रैफिक के बीच चार किलोमीटर दूर प्रेस एंक्लेव मार्ग के PSRI म्यूनिसिपलिटी अस्पताल ले गए। रात के करीब 11 बजे पीयूष को मेडिकल ट्रीटमेंट मिल पाया।

उधर पुलिस के मुताबिक उन्हें इस हादसे की सूचना पीसीआर कॉल पर रात के 10.11 बजे मिली। कॉल करने वाले ने कहा कि दो लोग घायल हैं। लेकिन पुलिस जब तक मौके पर पहुँची तब तक उन्हें अस्पताल ले जाया जा चुका था।

हादसे को लेकर डीसीपी साउथ चंदन चौधरी का कहना है कि मौका-ए-वारदात पर कोई भी आई विटनेस नहीं मिला। घायलों में से एक को PSRI अस्पताल तो दूसरे को AIIMS के ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया।

उन्होंने आगे कहा की सीसीटीवी फुटेज में मृतक पाल की बाइक 26 साल के बंटी की बाइक को हिट करते दिखी। हालाँकि इसे लेकर पाल के दोस्तों ने ऐतराज जताया है। जहाँ हादसे में मारे गए पाल गुरुग्राम में फ्रीलांसर फोटोग्राफर का काम करते थे तो बंटी ड्राईवर हैं और गुरुग्राम रहते हैं।

मृतक पाल के दोस्त स्वर्णेंदु बोस दिल्ली वालों की बेरहमी पर गुस्सा है। वो कहते हैं कि हादसे के बाद कोई भी देर तक उनके दोस्त की मदद को आगे नहीं आया। वो आगे कहते हैं कि इससे भी शर्म की बात है कि उसका मोबाइल फोन और लैपटॉप लोग ले गए।

उसके पेरेंट्स मोबाइल फोन करते रहे, लेकिन पाल का मोबाइल लेकर गया शख्स फोन काटता रहा और बाद में उसने फोन स्विच ऑफ कर दिया। बोस आगे कहते हैं कि किसी ने उसके पेरेंट्स की कॉल उठा ली होती शायद जो हुआ वो नहीं होता।

बोस ने बताया कि उनके दोस्त पाल ने नई हीरो एक्स पल्स बाइक खरीदी थी और शायद वो आरके पुरम के फिटनेस सेंटर से लौट रहे थे। सड़क हादसे में घायल होने से पहले पाल अपने घर से कुछ ही किलोमीटर दूर थे। मृतक के परिवार की चितरंजन पार्क में पूजा सामग्री की दुकान है।

PSRI अस्पताल के न्यूरो इंटरवेंशन चीफ और न्यूरो सर्जरी के सीनियर कंसल्टेंट्स डॉ सुमित गोयल के मुताबिक, लगभग रात 11 बजे पीयूष को गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था। उसके सिर और चेहरे पर गंभीर चोटें थीं। उसे तुंरत वेंटिलेटर पर रखा गया, लेकिन गंभीर चोटों की वजह से उनकी जान नहीं बचाई जा सकी और मंगलवार (31,अक्टूबर,2023) सुबह उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

चुनाव का बहाना बना केजरीवाल ने छोड़ी दिल्ली, खुद को बताया स्टार प्रचारक: ED से दिल्ली के CM ने पूछा- किस ‘हैसियत’ से मुझे बुलाया

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल (Delhi CM Arvind Kejriwal) ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) के समक्ष आज पेश होने से मना कर दिया है। उन्होंने इस मामले में ED को एक पत्र लिखकर बताया है कि जारी विधानसभा चुनावों में वे AAP के स्टार प्रचारक हैं और उनको कार्यकर्ताओं को सिखाना होता है। इसलिए वह पेश नहीं हो सकते। वह तीन दिन के दौरे पर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ निकल गए हैं।

ED ने 30 अक्टूबर 2023 को एक समन भेजकर CM केजरीवाल को शराब घोटाले में पूछताछ के लिए 2 नवम्बर 2023 को बुलाया था। इसको लेकर आम आदमी पार्टी ने नेताओं ने शोर मचाया था कि प्रवर्तन निदेशालय उन्हें 2 नवंबर को गिरफ्तार कर लेगी। अब केजरीवाल ने ED को दो पन्नों का एक पत्र भेजकर केंद्र सरकार पर ही आरोप लगा दिए हैं।

केजरीवाल ने कहा कि है उन्हें यह पता नहीं चल रहा है कि ED उन्हें इस मामले गवाह के तौर पर बुला रही है या फिर संदिग्ध के तौर पर बुला रही है। उन्हें अपने बुलाए जाने का कारण भी नहीं बताया गया है। केजरीवाल ने यह भी कहा कि उन्हें यह भी पता नहीं है कि उन्हें AAP के मुखिया या दिल्ली के मुख्यमंत्री या फिर एक सामान्य व्यक्ति के तौर पर बुलाया जा रहा है।

अरविंद केजरीवाल ने समन को प्रायोजित बताया। उन्होंने कहा कि जिस दिन समन जारी हुए उसी दिन मनोज तिवारी जैसे भाजपा के नेताओं ने कहना चालू किया कि ‘मैं गिरफ्तार किया जाऊँगा’। उन्होंने आरोप लगाया कि समन को भाजपा नेताओं को लीक किया गया था। केजरीवाल की गिरफ्तारी को आप सरकार में मंत्री आतिशी ने भी कहा था कि 2 नवम्बर को ED अरविन्द केजरीवाल को गिरफ्तार कर लेगी।

अरविंद केजरीवाल ने यह भी कहा कि वह दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया हैं, जिसकी दिल्ली और पंजाब में सरकार है। केजरीवाल ने दावा किया कि वह अपनी पार्टी के स्टार प्रचारक हैं और उनकी पार्टी पाँच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में भाग ले रही है। इसलिए उन्हें प्रचार के लिए जाना पड़ता है। ऐसे में वह ED के साथ पूछताछ में सहयोग नहीं कर सकते।

हालाँकि, वह बात अलग है कि आम आदमी पार्टी ने मध्य प्रदेश में एक तिहाई से भी कम सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। राजस्थान में उसने अभी 200 सीटों में से मात्र 60 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं और छत्तीसगढ़ में 57 प्रत्याशी उतारे हैं। उन्होंने अपने मुख्यमंत्री होने के चलते भी व्यस्तता का हवाला दिया है। इन सब कारणों को देते हुए केजरीवाल ने ED से अपने समन वापस लेने की माँग की है।

केजरीवाल के इस जवाब पर दिल्ली के भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “हर गुनाहगार की अंतरात्मा जानती है कि कानून की नजरों में आने पर वह बच नही पाएगा, परन्तु बौने दुर्योधन अरविन्द केजरीवाल जी विक्टिम कार्ड खेलकर गरीब और सीधे लोगों की सहानुभूति लूटने में माहिर हैं। वाह क्या बहाना है – चुनाव प्रचार से मुझे रोकना। कानून से कब तक भागोगे, जवाब तो देना पड़ेगा।”

भाजपा सांसद प्रवेश साहिब सिंह वर्मा ने केजरीवाल के ED की पूछताछ में ना जाने पर लिखा है, “अरविंद केजरीवाल जी अगर शराब घोटाला नहीं किया तो आप जाँच एजेंसियों के सवालों का जवाब क्यों नहीं दे रहे?” गौरतलब है कि दिल्ली शराब घोटाला मामले में दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और सांसद संजय सिंह को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है।

स्वच्छता भी, कमाई भी: सरकारी दफ्तरों का कबाड़ बेच 30 दिन में आए ₹500 करोड़, 154 लाख वर्ग फुट स्पेस खाली; 4.75 लाख पेडिंग केस भी निपटे

इस साल गाँधी जयंती यानी 2 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने कार्यालयों की सफाई के लिए विशेष अभियान शुरू किया था। 31 अक्टूबर 2023 तक चले इस अभियान के दौरान सरकारी दफ्तरों का कबाड़ बेचकर 500 करोड़ रुपए की कमाई हुई है। केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह जानकारी दी है।

सरकारी दफ्तरों में इस तरह का स्वच्छता अभियान लगातार तीसरे साल चलाया गया है। इससे पूर्व दो साल में रद्दी बेचने से करीब 1100 करोड़ रुपए आए थे। डॉ जितेंद्र सिंह ने कहा कि ये खास अभियान 3.0 स्वच्छता को संस्थागत बनाने और सरकारी दफ्तरों में लंबित मामलों को कम करने की दिशा में भारत का सबसे बड़ा अभियान था। इस दौरान कई बेहतरीन कार्यप्रणाली और उपलब्धियाँ भी हासिल हुई।

राज्य मंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्‍वच्‍छता के दृष्टिकोण से प्रेरणा लेते हुए देश भर के 2.53 लाख से अधिक दफ्तरों में यह अभियान चलाया गया था। बता दें कि पीएम मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 में महात्मा गाँधी की जयंती पर स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य साल 2019 में महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती पर स्वच्छ भारत बनाना था।

इस अभियान के पहले चरण में भारत में खुले में शौच की आदत को खत्म करना था। इसका दूसरा चरण साल 2020-21 से लेकर 2024-24 तक मिशन मोड में चलाया जा रहा है। स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के दूसरे चरण का उद्देश्य महज खुले में शौच की आदत को खत्म करना और गाँवों के लिए बुनियादी ढाँचे बनाना ही नहीं, बल्कि बेहतर सफाई और निजी साफ-सफाई की आदतों के लिए जनता के व्यवहार में बदलाव लाना भी है।

राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि हर गुजरते साल के साथ ये अभियान बढ़ता ही जा रहा है। गौरतलब है कि इस सफाई अभियान के जरिए केंद्र सरकार की अच्छी खासी कमाई भी हुई है। जहाँ 2021-23 तक सरकार के चलाए गए इस विशेष अभियान के तहत स्क्रैप के निपटारे से 1100 करोड़ रूपए कमाए गए। वहीं तीसरे सफाई अभियान के तहत महज 30 दिन में 500 करोड़ रुपए का राजस्व मिला है।

फोटो साभार: पीआईबी

इस स्वच्छता अभियान से सरकारी दफ्तरों में इस्तेमाल के लिए 154 लाख वर्ग फुट जगह खाली हुई। इस दौरान 46 लाख फाइलों की समीक्षा की गई। 4.75 लाख पेंडिंग केस का निपटारा किया गया।

इस खास अभियान 3.0 की समीक्षा भारत सरकार के कैबिनेट मंत्रियों, राज्य मंत्रियों, कैबिनेट सचिव और सचिवों ने की। उनके ही दिशा-निर्देशों और मार्गदर्शन में इस काम को अंजाम दिया गया है। इस अभियान पर पोर्टल (https://scdpm.nic.in) के जरिए लगातार निगरानी की गई। इसके लिए रोजाना बैठकें भी की गई।

इस अभियान के लिए सरकार के मंत्रालयों और विभागों ने 75,000 से अधिक सोशल मीडिया पोस्ट की। यही नहीं इसके लिए डीएआरपीजी हैंडल से 800 ट्वीट्स, SpecialCampaign3.0 पर 1100 इन्फोग्राफिक्स और पीआईबी ने 258 बयान जारी किए गए। यही वजह रही कि ये अभियान सोशल मीडिया पर खासा लोकप्रिय हुआ।