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‘ब्राह्मण की बेटी से शादी या संबंध बनने तक आरक्षण’: IAS संतोष वर्मा का नफरती बयान Viral, जानें- फर्जीवाड़े में जेल जा चुका ये जातिवादी विक्षिप्त आखिर है कौन?

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के अंबेडकर मैदान में रविवार (23 नवंबर 2025) को एक ऐसा आयोजन हुआ, जो सामाजिक सद्भाव की बजाय नफरत की आग भड़काने वाला साबित हो गया। अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी-कर्मचारी संघ (अजाक्स) के नवनिर्वाचित प्रांताध्यक्ष और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा ने आरक्षण के मुद्दे पर एक ऐसा बयान दिया, जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया। संतोष वर्मा ने कहा, “जब तक कोई ब्राह्मण अपनी बेटी को मेरे बेटे को दान नहीं कर दे या उसके साथ संबंध नहीं बना ले, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए।”

यह बयान न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि यह समाज के मूल्यों को खोखला करने की एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा लगता है। एक तरफ जहाँ आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बहस होनी चाहिए, वहीं इस तरह की टिप्पणियाँ जातिगत खाई को और गहरा करने का काम करती हैं।

क्या यह महज एक अधिकारी की व्यक्तिगत कुंठा है या फिर समाज को कमजोर करने की बड़ी चाल का हिस्सा? इस रिपोर्ट में हम पूरी घटना की गहराई से पड़ताल करेंगे और यह समझने की कोशिश करेंगे कि ऐसे बयान कैसे हमारे समाज को अंदर से खा रहे हैं।

संतोष वर्मा ने कहाँ दिया विवादित बयान?

अजाक्स का प्रांतीय अधिवेशन तुलसीनगर के सेकंड स्टॉप स्थित अंबेडकर मैदान में आयोजित हुआ था। यह संगठन एससी-एसटी वर्ग के सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के हितों की रक्षा के लिए काम करता है। इस संगठन के प्रदेश अध्यक्ष बने संतोष वर्मा मंच से आर्थिक आधार पर आरक्षण की बहस छेड़ी। लेकिन उनकी बातें जल्द ही विवादास्पद हो गईं।

वायरल वीडियो में वे स्पष्ट कहते दिख रहे हैं कि आरक्षण का अंत तभी होना चाहिए, जब सवर्ण समाज (खासकर ब्राह्मण) अपने बच्चों के रिश्तों में एससी वर्ग को शामिल करना शुरू कर दे। संतोष वर्मा ने कहा, “आरक्षण तब तक जारी रहना चाहिए जब तक मेरे बेटे को कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान में नहीं देता या उससे संबंध नहीं बनता।”

संतोष ने बेटी को ‘दान’ देने जैसी पुरानी प्रथा का जिक्र किया, जो आज के आधुनिक समाज में पूरी तरह अप्रासंगिक और अपमानजनक है। यह बयान न केवल महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुँचाता है, बल्कि यह संदेश देता है कि आरक्षण को जातिगत बदले की भावना से जोड़ा जाए। क्या डॉ. बी.आर. आंबेडकर के संघर्ष के प्रतीक आरक्षण को इस तरह की निजी और संकीर्ण सोच से जोड़ना उचित है? यह सवाल हर संवेदनशील नागरिक के मन में उठ रहा है।

संतोष वर्मा के ब्राह्मण विरोधी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया

बयान के तुरंत बाद तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आई। अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज के प्रदेश अध्यक्ष पुष्पेंद्र मिश्रा ने इसे ‘घोर निंदनीय’ बताते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से तत्काल कार्रवाई की माँग की। उन्होंने कहा कि संतोष वर्मा को न केवल पद से हटाया जाए, बल्कि उनके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हो। मिश्रा ने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो ब्राह्मण समाज पूरे प्रदेश में आंदोलन करेगा।

ब्राह्मण सभा मध्य प्रदेश के अध्यक्ष डॉ. शैलेंद्र व्यास ने इसे ‘तुच्छ सोच’ करार दिया। उन्होंने कहा, “ऐसी मानसिकता वाले लोगों पर सरकार को तुरंत एक्शन लेना चाहिए। वरना परशुराम जी के वंशज ब्राह्मण समाज के लोग दंड देने से नहीं चूकेंगे।” यह बयान समाज में तनाव पैदा करने वाला था, लेकिन व्यास का जवाब भी उसी तेवर का था, जो दिखाता है कि कैसे एक गलत टिप्पणी पूरे समुदाय को भड़का सकती है।

कर्मचारी संगठनों ने भी संतोष वर्मा की कड़ी निंदा की। मंत्रालय सेवा अधिकारी-कर्मचारी संघ के अध्यक्ष इंजीनियर सुधीर नायक ने कहा कि यह बयान न केवल आपत्तिजनक है, बल्कि पूरे सवर्ण समुदाय का अपमान है। उन्होंने जोर देकर कहा, “शादी-विवाह निजी जिंदगी का मामला है। हर वयस्क व्यक्ति अपनी पसंद से जीवनसाथी चुन सकता है। बेटी कोई वस्तु नहीं है जो दान की जाए।”

नायक ने उदाहरण देते हुए बताया कि समाज बदल चुका है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सविता अंबेडकर (ब्राह्मण परिवार से) से विवाह किया था, जबकि रामविलास पासवान ने रीना शर्मा से शादी की। तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के महामंत्री उमाशंकर तिवारी ने कहा, “कर्मचारी संगठन के मंच पर ऐसी बयानबाजी से बचना चाहिए। सभी जाति-धर्म के लोग मिलकर काम करते हैं। ऐसे बयान मतभेद बढ़ाते हैं।”

इन प्रतिक्रियाओं से साफ है कि संतोष वर्मा का बयान न केवल व्यक्तिगत स्तर पर गलत था, बल्कि यह कार्यस्थलों पर सद्भाव को भी खतरे में डाल रहा है। जहाँ एक तरफ अधिकारी और कर्मचारी एक ही छत के नीचे काम करते हैं, वहाँ जातिगत टिप्पणियां विश्वास की दीवारें तोड़ सकती हैं।

बेहद विवादित रहा है संतोष वर्मा का अतीत, जा चुके हैं जेल

संतोष वर्मा का अतीत इस घटनाक्रम को और गंभीर बनाता है। साल 2021 में वे फर्जीवाड़े के आरोप में जेल जा चुके हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इंदौर में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। मामला एक महिला के खिलाफ ‘क्रिमिनल इंटिमिडेशन’ (धमकी) का था, जिसमें वर्मा पर जानबूझकर चोट पहुँचाने, अश्लील सामग्री फैलाने जैसे आरोप थे। लेकिन विवाद तब बढ़ा जब उन्होंने प्रमोशन के लिए मध्य प्रदेश कोर्ट के फर्जी आदेश पेश किए।

संतोष वर्मा ने राज्य कैडर से आईएएस कैडर में प्रमोट होने के लिए दो नकली कोर्ट ऑर्डर बनवाए- एक सेटलमेंट ऑर्डर और दूसरा एक्विटल ऑर्डर। ये दस्तावेज 6 अक्टूबर 2020 के थे, लेकिन उस दिन जज छुट्टी पर थे। विभाग ने जाँच की तो फर्जीवाड़ा पकड़ा गया। जिला अभियोजन कार्यालय ने पुष्टि की कि केवल एक ही ऑर्डर था, जबकि वर्मा ने दो पेश किए।

महिला ने चीफ सेक्रेटरी को शिकायत की, जिससे केस खुला। पुलिस ने 12 घंटे की पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार किया। जज दिलीप परमार ने उन्हें पुलिस कस्टडी में भेज दिया। वर्मा ने आरोप लगाया कि महिला ने ही फर्जी दस्तावेज दिए, लेकिन जाँच में यह झूठ साबित हुआ।

यही नहीं, संतोष वर्मा का चरित्र भी रसिया किस्म का रहा है, उसके कई महिलाओं से संबंध रहे हैं और इस बारे में कई केस भी हो चुके हैं। कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि ये जहाँ भी तैनात रहा, शादीशुदा होते हुए भी दूसरी महिलाओं से संबंध बनाता रहा। इसकी कई शादियों के चर्चे आम हैं।

जब नेता ही ऐसा हो, तो समाज कैसे संगठित होगा?

यह घटना संतोष वर्मा के चरित्र पर सवाल उठाती है। समाज के कमजोर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का दावा एक आईएएस अधिकारी खुद फर्जीवाड़े से अपनी कुर्सी हासिल करने की कोशिश करता है। महिला के शीलभंग का मामला भी उनके ऊपर था, जो दिखाता है कि उनकी मानसिकता में महिलाओं के प्रति सम्मान की कमी रही है। अब जब वे अजाक्स जैसे संगठन के अध्यक्ष हैं, तो उनका यह बयान और भी खतरनाक लगता है।

अगर नेता ही फर्जी और घटिया सोच वाला हो, तो उसके पीछे खड़े होने वाले लोग क्या सीखेंगे? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अजाक्स एससी-एसटी कर्मचारियों की आवाज है। लेकिन वर्मा जैसे व्यक्ति के नेतृत्व में यह संगठन विभाजनकारी बन सकता है।

समाज को खोखला करने की साजिश

संतोष वर्मा का बयान समाज को खोखला करने की साजिश क्यों लगता है? देखिए, भारत एक विविधतापूर्ण देश है, जहाँ जाति, धर्म और वर्ग की जटिलताएँ हैं। स्वतंत्रता के बाद डॉ. आंबेडकर ने संविधान में आरक्षण दिया ताकि सदियों की असमानता दूर हो। लेकिन इसका उद्देश्य था एकता… न कि विभाजन। संतोष वर्मा का बयान आरक्षण को बदले की भावना से जोड़ता है- जैसे सवर्णों को दंडित किया जाए।

यह सोच समाज को तोड़ने वाली है। कल्पना कीजिए, एक सरकारी कार्यालय में जहाँ ब्राह्मण, दलित, ओबीसी सब मिलकर काम करते हैं, वहाँ अगर अध्यक्ष ऐसा बोल दे, तो अधीनस्थों में डर और नफरत फैलेगी। सवर्ण अधिकारी अपने दलित सहकर्मियों को शक की नजर से देखेंगे और दलित वर्ग को लगेगा कि उनका संघर्ष अब निजी रिश्तों पर टिका है। यह खाई गहरी होगी और समाज का मूल – परिवार, विवाह, विश्वास खोखला हो जाएगा।

यह साजिश इसलिए लगती है क्योंकि ऐसे बयान अक्सर सुनियोजित होते हैं। राजनीतिक पार्टियाँ या संगठन वोट बैंक के लिए जातिवाद भड़काते हैं। अजाक्स का यह अधिवेशन चुनावी माहौल में हुआ, जहाँ आरक्षण पर बहस चल रही है। वर्मा का बयान आरक्षण के पक्ष में तर्कों की कमी को छिपाने का प्रयास लगता है। लेकिन असली खतरा यह है कि यह साजिश समाज के हर स्तर को प्रभावित करेगी। स्कूलों में बच्चे जाति के नाम पर लड़ेंगे, कार्यालयों में भेदभाव बढ़ेगा और अंततः राष्ट्र की एकता कमजोर होगी।

संतोष वर्मा के अतीत को जोड़कर देखें, तो साजिश का चेहरा साफ होता है। फर्जी प्रमोशन के लिए कोर्ट को ठगना, महिला को धमकाना और अब सवर्ण बेटियों पर टिप्पणी… यह एक पैटर्न है। एक व्यक्ति जो कानून तोड़ता है, वह समाज को बाँटकर अपनी पहचान बनाता है। अजाक्स के पिछले अध्यक्षों ने कभी ऐसी बातें नहीं कीं, जो दिखाता है कि वर्मा की सोच व्यक्तिगत है, लेकिन इसका असर सामूहिक है।

वामपंथी संगठन ‘The Himkhand’ का उतरा मुखौटा, ‘प्रदूषण’ के बहाने नक्सलियों को बढ़ावा और हिंसा भड़काने की कोशिश: अर्बन नक्सल ‘क्रांति’ की भूमिका पर बड़ा खुलासा

अर्बन नक्सल्स ने बीते रविवार (23 नवंबर 2025) को ‘प्रदूषण विरोध’ के नाम पर इंडिया गेट को घेर लिया। ‘प्रदूषण’ की बात करते हुए इन कथित प्रदर्शनकारियों ने मारे गए नक्सली कमांडर माड़वी हिड़मा के समर्थन में नारे लगाए और पुलिस पर मिर्च स्प्रे से हमला भी किया।

इस सोची-समझी प्रदर्शन की कमान दो कट्टर वामपंथी संगठनों के हाथ में थी। इसका मकसद ‘प्रदूषण’ के नाम पर लाल आतंक की विचारधारा का प्रचार करना और लोगों का समर्थन हासिल करना था। इन संगठनों में भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) और ‘द हिमखंड’ शामिल थे।

भारत में अर्बन नक्सल अब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण आंदोलन को हथियार बनाकर वामपंथी चरमपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं और देश की संप्रभुता और अखंडता को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

‘द हिमखंड’ इंस्टाग्राम पर दो अकाउंट चलाता है- एक ‘thehimkhand‘ नाम से और दूसरा ‘the.himkhand‘ के नाम से। इनके पोस्ट देखने से पता चलता है कि यह वामपंथी समूह मई 2024 से सक्रिय है।

शुरुआत में यह ग्रुप खुद को ‘क्लाइमेट चेंज’ और ‘पर्यावरणीय असंतुलन’ के खिलाफ लड़ने वाला संगठन बताता था लेकिन जल्द ही इसने क्षेत्रीय राजनीति और सरकार-विरोधी नैरेटिव को भी अपने एजेंडे में शामिल कर लिया।

लद्दाख प्रशासन द्वारा सोनम वांगचुक की संस्था Himalayan Institute of Alternative Learning (HIAL) का जमीन आवंटन उसमें भारी गड़बड़ियों के चलते रद्द कर दिया गया था। इसके कुछ दिनों बाद, वांगचुक ने लद्दाख को ‘राज्य का दर्जा’ दिए जाने का मुद्दा उठाकर अराजकता और तनाव पैदा करने की कोशिश की और लोगों को भड़काया।

इसी दौरान यानी इस साल अक्टूबर में ‘द हिमखंड’ भी ‘लद्दाख आंदोलन’ का समर्थन कर रहा था। इतना ही नहीं, यह समूह हिंसा को सही ठहराने की कोशिश भी कर रहा था।

5 अक्टूबर को डाले गए एक पोस्ट में लिखा था, “प्रदर्शनकारियों द्वारा बीजेपी ऑफिस में आग लगाना, पार्टी के हिमालय-विरोधी विकास मॉडल को खारिज करना है। लद्दाख के लोगों ने अपना फैसला सुना दिया है।”

The Himkhand की इंस्टा पोस्ट का स्क्रीनग्रैब

एक दूसरे पोस्ट में, इस वामपंथी समूह ने हिंसा को सही ठहराने की कोशिश की और इसे सिर्फ ऐसी धारणा बताया, जिन्हें कथित तौर पर ‘शासक वर्ग लोगों की कार्रवाई पर रोक लगाने के लिए बनाता है।’

‘The Himkhand’ ने 2020 में दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों को उकसाने वाले प्रशांत भूषण को ‘वायू प्रदूषण’ के खिलाफ अपने एक इवेंट में स्पीकर बताया था।

ऑपइंडिया ने पता लगाया कि इस कट्टर वामपंथी ग्रुप को आगे बढ़ाने वालों में से एक एक्टिविस्ट का नाम ‘क्रांति’ है।

उसे भगत सिंह छात्र एकता मंच (bsCEM) के ‘कार्यकर्ता’ रवजोत के साथ देखा गया था, जिसने ‘कॉमरेड हिड़मा अमर रहे’ जैसा भड़काऊ नारा लगाया था।

यह साफ दिखाई देता है कि bsCEM और ‘The Himkhand’ मिलकर हिंसा भड़काने और जलवायु आंदोलन की आड़ में लाल आतंक को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं।

The Himkhand की इंस्टा पोस्ट का स्क्रीनग्रैब

यहाँ यह बताना भी जरूरी है कि ‘द हिमखंड’ लगातार चार धाम रेलवे प्रोजेक्ट जैसे विकास कार्यों का विरोध करता रहा है और इसे वह ‘पर्यावरण संरक्षण’ के नाम पर रोकने की कोशिश करता रहा है।

अब जबकि ‘ऑपरेशन कगार’ अपने अंतिम चरण में है और ‘लाल आतंक’ का खात्मा हो रहा है, ऐसे में अर्बन नक्सल और उनसे जुड़े संगठन अब लोगों को भ्रमित और कट्टरपंथी बनाने के लिए अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को हथियार की तरह उपयोग कर रहे हैं।

दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के पीछे ‘अर्बन नक्सलियों’ का हाथ, bsCEM मानता है ‘नक्सलबाड़ी ही एकमात्र रास्ता’: जाने कौन है हिडमा और नक्सलियों की समर्थक रवजोत कौर

दिल्ली में रविवार (23 नवंबर 2025) को एक प्रदूषण के खिलाफ एक प्रदर्शन हुआ लेकिन इसमें पुलिस पर हिंसा हुई, चिली स्प्रे तक इस्तेमाल किया गया। इस मामले में FIR दर्ज हुई और 15 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

ये प्रदर्शन साफ हवा के लिए था लेकिन जल्द ही सामने आ गया कि ये bsCEM (भगत सिंह छात्र एकता मंच) का लेफ्टिस्ट एजेंडा था। इसके लीडर जैसे रवजोत कौर और द हिमखंड ने कुछ दिनों पहले मारे गए नक्सली कमांडर माड़वी हिड़मा की तारीफ की थी।

इस पूरे प्रदर्शन में भी इसकी छाप दिखी और प्रदर्शनकारियों ने उसके पोस्टर लगाए और ‘कॉमरेड हिड़मा अमर रहे’ जैसे नारे लगाए। प्रदर्शन में सिर्फ नक्सलियों की तारीफ नहीं हुई बल्कि उनके टेरर ग्रुप्स को ‘लोगों की सरकार’ कहा गया।

ट्राइबल इलाकों में धमकियों, डर और हिंसा से अपनी बात मनवाने की कोशिश करने वाले नक्सलियों को देश की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार का विकल्प बताया गया। इनके समर्थक ‘अर्बन नक्सलियों’ ने उस विचारधारा के समर्थकों द्वारा फैलाए गए आतंक को ‘अधिकारों और कल्याण’ की आड़ में बढ़ावा दिया है।

मजेदार बात ये है कि bsCEM और द हिमखंड ने 14 नवंबर को ‘साफ हवा के आंदोलन पर प्रेस कॉन्फ्रेंस’ नाम का इवेंट किया था। इसमें प्रशांत भूषण स्पीकर थे। ये प्रोग्राम दिल्ली यूनिवर्सिटी की AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) और ‘साइंटिस्ट्स फॉर सोसाइटी’ ने होस्ट किया था।

रवजोत, दिल्ली प्रदर्शन और ‘कॉमरेड हिड़मा अमर रहे’

bsCEM की रवजोत इस इवेंट के पोस्टर में थी। वही रवजोत कल दिल्ली प्रदर्शन में आतंकी हिड़मा की तारीफ करती दिखी, भारतीय सरकार को बुरा भला कहा और ट्राइबल इलाकों में नक्सलों की हुकूमत को ‘आदर्श’ बताया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, रवजोत गुरु गोबिंद सिंह इंदिरा प्रस्थ विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट है और bsCEM की एक्टिव मेंबर है। वो दिल्ली में रेगुलर ‘आंदोलनजीवी’ है, और रविवार (23 नवंबर 2025) को उसे चिली स्प्रे लेकर पुलिस पर हमले का आरोपित बनाया गया।

4 पुलिसवाले आँखों से घायल हुए और RML हॉस्पिटल में भर्ती हैं। इधर, इन रैडिकल ग्रुप्स का ओवरव्यू देखें तो पता चलता है कि वो रेड टेरर की खुली तारीफ करते हैं। हर बंदूकधारी नक्सली, जो देश के खिलाफ जंग लड़ता है, उनके लिए या तो ट्राइबल हक का फाइटर है या बेकसूर।

‘चुनावों का बहिष्कार करो और देश के खिलाफ हिंसा करो’

पिछले साल लोकसभा चुनावों से पहले bsCEM ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की दीवारों पर ग्राफिटी लिखी, जिसमें लोगों से वोट न डालने को कहा। उन्होंने लिखा, एक ही रास्ता नक्सलबाड़ी (नक्सलबाड़ी ही एकमात्र रास्ता है), वो जगह जहाँ भारत में रेड टेरर की शुरुआत हुई।

दूसरे नारे जैसे चुनावों का बहिष्कार करो, न्यू डेमोक्रेसी जॉइन करो लिखे और इलेक्शन कमीशन पर हमला बोला। फिर डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (नॉर्थ) सागर सिंह कलसी ने कहा, “डिफेसमेंट एक्ट के तहत दो FIR दर्ज हुई हैं और जाँच चल रही है।” ये 23 मई को हुआ, जब bsCEM ने यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस पर मैसेज पेंट किए।

जब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने शिकायत की, तो आरोपित पकड़े गए। ग्रुप ने दावा किया कि नारे लिखना “देश के स्टूडेंट मूवमेंट्स की हिस्ट्री में हमेशा डेमोक्रेटिक तरीका रहा है।”

bsCEM की मेंबर गुरकीरत ने कहा, “1947 के बाद भारत में इम्पीरियलिस्ट एक्सप्लॉइटेशन जारी रहा, जब देश कॉलोनियल से सेमी-कॉलोनियल हो गया। हम सोचते हैं चुनाव धोखा हैं, कोई असली बदलाव नहीं होगा। आदिवासी हर पार्टी के हाथों पीड़ित रहेंगे।”

उन्होंने आरोप लगाया, “भारत की डेमोक्रेसी सिर्फ स्टेटस क्वो (मौजूदा स्थिति) बनाए रखने के लिए है। असली स्ट्रगल के लिए कोई जगह नहीं, इसलिए हमारे खिलाफ इतनी तेज कार्रवाई हुई।” ये विशुद्ध हिपोक्रिसी है। ये लोग भारत की डेमोक्रेटिक सिस्टम को यूज करके उसे नक्सलवाद से बदलना चाहते हैं और बेशर्मी से अपना हक बताते हैं। डेमोक्रेसी में खामियाँ हैं लेकिन वो लोगों की इच्छा दिखाती है।

हर कम्युनिटी, ट्राइबल्स, माइनॉरिटीज सब संविधान के मुताबिक अपना गवर्नमेंट चुन सकती हैं। लेकिन ये लोग हिंसा और खूनखराबे की आइडियोलॉजी को रोमांटिक बनाते हैं, जहाँ बंदूक की धमकी से लोगों की आवाज दब जाती है और वे इसे चुनावों से बेहतर बताते हैं।

ब्राह्मणिकल हिंदुत्व की बकवास और माओइस्टों को हीरो बनाना

जैसा उम्मीद थी, bsCEM ने पुलिस की कार्रवाई को ‘ब्राह्मणिकल हिंदुत्व फासीस्ट RSS-BJP (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी)’ का बताया और पुलिस पर हमले जैसी अपनी गलतियों को ढकने की कोशिश की है।

उन्होंने अपने ‘कॉमरेड्स’ और आइडियोलॉजी शेयर करने वालों को बड़ी तादाद में इकट्ठा होने का सिग्नल दिया, साफ तौर पर और बवाल भड़काने का इरादा। ये प्रदर्शन 2020 के दिल्ली के एंटी-हिंदू दंगों की शुरुआत जैसा था लेकिन इसे रेगुलर आंदोलन बताया गया, न कि नक्सलिजम को मेनस्ट्रीम करने और भारत के दुश्मनों को सेलिब्रेट करने का प्रोग्राम।

ग्रुप ने हिड़मा के मारे जाने को फेक एनकाउंटर कहा और भारतीय सरकार पर सेंट्रल इंडिया के मिनरल रिच इलाकों को ‘अपने बेटे-बेटियों के खून से रंगने’ का आरोप लगाया। जो नक्सली सुरक्षाबलों पर लगातार हमले करते हैं, लोकतंत्र को निशाना बनाते हैं और लोगों को स्थानीय या समानांतर सरकार के नाम पर बरगलाते हैं, उन्होंने हीरो दिखाने की कोशिश की गई है।

दूसरी तरफ, एडमिनिस्ट्रेशन और अथॉरिटीज़, जो इन अत्याचारों को खत्म करने और गरीब इलाकों को डेवलपमेंट के लिए भारत से जोड़ने की कोशिश करते हैं, उन्हें विलेन बनाकर बेवकूफ जनता को धोखा देने और सहानुभूति बटोरने की कोशिश की गई।

इसी तरह, बार-बार सरकार पर ट्राइबल कम्युनिटीज के हक के लिए लड़ने वालों की मौत का आरोप लगाने के बाद, bsCEM ने नक्सली कमांडर मल्लौजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू के सरेंडर को बड़ी कंपनियों को खुश करने वाला बताया है।

फिर सरकार से जिनेवा कन्वेंशन का पालन करने को कहा, जो नॉन-इंटरनेशनल आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट के लिए है। साथ ही कई डिमांड्स रखीं, जैसे ऑपरेशन कागार बंद करना, जो नक्सलियों के खिलाफ है।

ऑपरेशन कागार का जिक्र साफ बताता है कि ये कितना सफल रहा है माओइस्ट थ्रेट को खत्म करने में। इसी तरह, ब्राह्मणिकल हिंदुत्व फासीस्ट RSS-BJP पर पहले हिड़मा की टॉर्चर और किलिंग का आरोप लगाया गया, जिसे साधारण आदिवासी बताया है।

हिंसा से चलने वाले नक्सलियों को निरस्त्र क्रांतिकारी कहा और सरकार के खिलाफ हथियार उठाने को डेमोक्रेटिक डिसेंट बताया। माओवाद को आम लोगों के दमन और शोषण का हल बताया गया। बैन कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) को लोगों की वैध आवाज कहा।

सभी पोस्ट्स सिर्फ नक्सलियों के लिए सहानुभूति और याद करने के लिए, बिना एक शब्द उनके टारगेट्स के, जिसमें ट्राइबल पॉपुलेशन शामिल है। ये दिखाता है कि bsCEM और ऐसे ग्रुप्स लोकल पॉपुलेशन को कितना महत्व देते हैं। उनकी लॉयल्टी सिर्फ खूनखराबे वाली आइडियोलॉजी की तरफ है, अनगिनत बेकसूर जिंदगियों की कीमत पर।

भारतीय राज्य का डेमोनाइजेशन, और फिलिस्तीन का सपोर्ट

bsCEM ने भारतीय राज्य को ‘अपने बच्चों को मारने वाली रिपब्लिक’ कहा, ये भूलकर कि माओवादी न बच्चों को मानते हैं, न भारत को अपना देश। इसलिए वे हथियार उठाते हैं। इसीलिए ‘ऑपरेशन कागार’ बंद करने की पोस्ट्स ग्रुप शेयर करता रहता है।

इसके अलावा, कई पोस्ट्स दिल्ली यूनिवर्सिटी के पूर्व इंग्लिश प्रोफेसर GN साईंबाबा को समर्पित है, जिन्हें माओवादियों से रिश्तों के चलते उम्रकैद की सजा मिली थी। बाद में उन्हें बरी कर दिया गया और इस फैसले के जिम्मेदार बॉम्बे हाईकोर्ट के जज रोहित बी डियो ने 2023 में व्यक्तिगत कारणों से रिजाइन कर दिया था।

साईंबाबा की मौत पिछले साल 12 अक्टूबर को हुई। उनकी डेथ एनिवर्सरी को bsCEM ने उनके शहादत का मेमोरियल मीट के रूप में मनाया, जिसमें मौजूदा सरकार के खिलाफ बकवास दोहराई है।

ग्रुप ने मुंबई पुलिस द्वारा TISS (टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज) के कम से कम 10 स्टूडेंट्स के खिलाफ FIR पर गुस्सा जताया, जो साई बाबा की ‘डेथ एनिवर्सरी’ मना रहे थे। महत्वपूर्ण ये कि इन छात्रों ने इंस्टीट्यूशन या अथॉरिटीज से परमिशन नहीं ली थी और प्रोग्राम में दिल्ली दंगों के आरोपित उमर खालिद और शरजील इमाम के पक्ष में नारे लगाए।

जैसे bsCEM ने भारत में माओवादी हिंसा को रेवोल्यूशनरी बताया, वैसे ही प्रो-हमास प्रोपगैंडा फैलाया और फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन आयोजित किए। सिर्फ bsCEM और देश में ऐसे एलिमेंट्स के एंटी-इंडिया और कट्टरपंथी मानसिकता की एक झलक है, जो संविधान और देश की आजादी का फायदा उठाकर सरकार हथियाना चाहते हैं और क्रांति व आइडियोलॉजी के नाम पर बड़े पैमाने पर खूनखराबा फैलाना चाहते हैं।

लाल किले पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस पर हमला इसका साफ सबूत है। ये लोग अपने खतरनाक एजेंडा के लिए हर भारतीय संस्था को कमजोर करने की कोशिश करते हैं और जब रोका जाता है तो विक्टिम बन जाते हैं।

इथियोपिया में 12000 साल बाद फटा ज्वालामुखी, दिल्ली तक पहुँची ‘काँच वाली’ राख: फ्लाइट्स के लिए बनी संकट, जानें इसे क्यों माना जा रहा ‘साइलेंट किलर’ ?

अफ्रीका के इथियोपिया में एक बड़ा ज्वालामुखी फटा है। इस ज्वालामुखी का नाम है हायली गुब्बी। यह ज्वालामुखी करीब 10 से 12 हजार साल बाद फटा है। विस्फोट के बाद राख का एक बड़ा बादल उठा। यह राख लगभग 4000 किलोमीटर दूर भारत तक आ गया है।

राख का यह बादल 130 किलोमीटर प्रति घंटे की बहुत तेज रफ्तार से आया। यह लाल सागर और अरब सागर को पार करते हुए आया। सोमवार (24 नवंबर 2025) रात करीब 11 बजे यह राख दिल्ली पहुँचा। सबसे पहले यह पश्चिमी राजस्थान के जोधपुर और जैसलमेर के ऊपर देखी गई। इसके बाद यह दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के बड़े हिस्सों में फैल गई।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह राख जमीन से 25,000 से 45,000 फीट की बहुत ऊँचाई पर है। इसलिए, अभी लोगों की सेहत को खास खतरा नहीं है। लेकिन इस राख से हवाई उड़ानों पर असर पड़ा है। अकासा एयर, इंडिगो और KLM जैसी कई एयरलाइंस ने अपनी उड़ानें रद्द कर दी हैं या उनके रास्ते बदल दिए हैं। भारत सरकार के विमानन नियामक DGCA ने सभी एयरलाइंस को चेतावनी दी है। उन्हें राख वाले खतरनाक इलाकों से दूर रहने को कहा गया है।

इथियोपिया में ज्वालामुखी कैसे फटा और राख इतनी दूर कैसे पहुँची?

राख बादल ने सबसे पहले राजस्थान के जोधपुर और जैसलमेर के आसमान को ढका, फिर धीरे-धीरे दिल्ली, हरियाणा और पंजाब की ओर बढ़ गया। क्योंकि यह राख जमीन से लगभग 25,000 से 45,000 फीट की ऊँचाई पर थी, इसलिए लोगों को यह सीधे दिखाई नहीं दी, लेकिन इसके असर ने हवा को भारी और जहरीली बना दिया।

दिल्ली के आनंद विहार में AQI 400 के ऊपर चला गया और यह ‘सीवियर’ श्रेणी में पहुँच गया। एम्स और सफदरजंग के आसपास भी घना जहरीला स्मॉग दिखाई दिया। हवा में चुभन, सांस लेने में भारीपन और आँखों में जलन महसूस होने लगी। यह स्थिति स्थानीय प्रदूषण और ज्वालामुखी राख के ऊपरी परत में मिलने से बनी।

सुबह का सूरज सामान्य से ज्यादा लाल और चमकीला दिखा क्योंकि राख के सूक्ष्म कण रोशनी को अलग तरह से मोड़ते हैं। इस तरह का दृश्य बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों के बाद आम होता है।

उड़ानों पर असर क्यों पड़ा और क्या खतरा है?

ज्वालामुखी राख विमान के लिए बेहद खतरनाक मानी जाती है। राख दिखती भले धूल जैसी हो, लेकिन असल में यह बारीक कांच और जली चट्टानों के कण होते हैं। ये गर्म इंजन में जाते ही पिघलकर कांच जैसी परत बना देते हैं, जिससे इंजन बंद हो सकता है। इसके अलावा राख विंडशील्ड को धुंधला कर देती है, सेंसर खराब कर सकती है और पंखों की सतह पर चिपककर विमान की लिफ्ट भी प्रभावित कर सकती है।

1982 में ब्रिटिश एयरवेज की एक फ्लाइट ऐसे ही राख के कारण चारों इंजन फेल होने के बाद 25,000 फीट नीचे गिर गई थी, हालांकि बाद में पायलट इंजन को दोबारा स्टार्ट करने में कामयाब रहे थे।

यही कारण है कि अकासा एयर, इंडिगो, KLM और कई एयरलाइंस को उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। कुछ उड़ानों को बीच में डायवर्ट किया गया। DGCA ने तत्काल एडवाइजरी जारी करके एयरलाइंस को राख वाले क्षेत्रों से बचकर उड़ान भरने और पोस्ट-फ्लाइट इंजन जाँच अनिवार्य करने को कहा। एयर इंडिया और इंडिगो ने भी यात्रियों को सतर्क करते हुए कहा कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

क्या राख भारत में जमीन पर गिरेगी और सेहत को कितना खतरा है?

अच्छी बात यह है कि राख अभी ऊपरी वायुमंडल में है। जमीन पर यह भारी मात्रा में गिरने की संभावना बहुत कम है। मौसम विभाग ने कहा है कि कुछ इलाकों में हल्की परत दिख सकती है, लेकिन फिलहाल इसका सीधा खतरा मामूली है। हालाँकि, हवा की गुणवत्ता पहले से खराब होने के कारण दिल्ली-NCR में स्मॉग और भारी हो गया है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, जिन लोगों को अस्थमा, सीओपीडी, दिल की बीमारी या एलर्जी की समस्या है, उन्हें ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए। आँखों में जलन, गले में खराश, सांस फूलना और सिरदर्द जैसे लक्षण बढ़ सकते हैं।

क्या आगे भी खतरा हो सकता है?

यह पूरा राख का गुबार हवा के साथ पूर्व की ओर खिसकता रहेगा और धीरे-धीरे बंटकर खत्म हो जाएगा। अगर ज्वालामुखी में दूसरा बड़ा विस्फोट होता है या राख की ऊँचाई और बढ़ती है, तो उड़ानों पर असर लंबे समय तक रह सकता है। मौसम विभाग और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियाँ लगातार इसकी निगरानी कर रही हैं।

राख का वैज्ञानिक असर: आखिर यह हवा और मौसम को कैसे बदलती है?

ज्वालामुखी राख सूर्य की रोशनी को रोकती है, इसलिए जिस क्षेत्र में यह पहुँचती है, वहाँ अस्थायी रूप से धुंध जैसा माहौल बन जाता है। बड़े विस्फोटों में तापमान तक गिर सकता है, हालाँकि इस बार ऐसा असर नहीं दिखेगा क्योंकि राख की मात्रा बहुत बड़ी वैश्विक स्तर की नहीं है।

राख में मौजूद सल्फर डाइऑक्साइड गैस बाद में सल्फेट एयरोसोल बनाती है, जो हवा की गुणवत्ता खराब कर सकते हैं। UP के तराई इलाके और नेपाल के ऊपर इन गैसों का असर थोड़ा बढ़ सकता है क्योंकि राख वाले बादल हिमालय से टकराकर दिशा बदलेंगे।

कैसे करें बचाव और क्या है लोगों के लिए जरूरी सलाह?

अगर हवा में चुभन या भारीपन महसूस हो तो सुबह बाहर निकलने से बचें। N-95 मास्क मददगार है क्योंकि यह सूक्ष्म कणों को फिल्टर करता है। आँखों में जलन हो तो साफ पानी से धोएँ और बच्चों या बुजुर्गों को अनावश्यक यात्रा से बचाएँ। हवाई यात्रा करने वाले लोग उड़ानों की स्थिति लगातार चेक करते रहें क्योंकि रूट बदलने या देरी होने की संभावना बनी रहेगी।

ज्वालामुखी दूर, असर पास तक आया

इथियोपिया के ज्वालामुखी में हुआ विस्फोट भले अफ्रीका में हुआ हो, लेकिन उसकी राख भारत के आसमान तक पहुँचकर यह दिखा चुकी है कि प्रकृति की घटनाएँ सीमाओं की मोहताज नहीं होतीं। दिल्ली-NCR में स्मॉग बढ़ा, कई उड़ानें बाधित हुईं और मौसम का रंग बदल गया। फिलहाल खतरा गंभीर नहीं है, लेकिन निगरानी और सावधानी जरूरी है, क्योंकि ऐसी राख हवा और उड़ानों पर बड़ा असर डाल सकती है।

अयोध्या में श्री राम मंदिर के 161 फीट ऊँचे शिखर पर लहराया भगवा ध्वज: जानें इस धर्म ध्वज पर अंकित ‘ॐ, सूर्य देव और कोविदार वृक्ष’ का महत्व

अयोध्या नगरी आज फिर इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर के 161 फीट ऊँचे शिखर पर केसरिया धर्म ध्वज फहराया। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सैकड़ों वर्षों की प्रतीक्षा के बाद आया क्षण है।

प्रभु राम के मंदिर के शिखर पर फहराया जाने वाला यह केसरिया ध्वज अपनी पवित्रता और विशिष्टता के लिए जाना जाता है। इसमें ॐ (ओम), सूर्य देव और कोविदार वृक्ष जैसे तीन महत्वपूर्ण प्रतीकों का चित्रण किया गया है। इन सभी प्रतीकों का सनातन धर्म में अलग-अलग आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व माना जाता है। चलिए, जानते हैं कि इन चिह्नों का क्या संदेश और अर्थ है।

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ओम के प्रतीक का अर्थ

राम मंदिर के ध्वज पर अंकित ॐ का चिह्न सनातन धर्म में अत्यधिक पवित्र माना जाता है। यह ऐसा स्वर है जिससे सम्पूर्ण सृष्टि के मूल कंपन की अनुभूति होती है। हिंदू धर्म में प्रत्येक पूजा और मंत्र की शुरुआत ओम से होती है, क्योंकि इसे दिव्यता और शुभता का स्रोत माना गया है।

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ओम को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों शक्तियों का संयुक्त रूप भी कहा गया है, जो संसार के सृजन, पालन और संहार का प्रतीक है। ओम की उपस्थिति वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाती है, इसलिए इसे ध्वज पर प्रमुखता से दर्शाया गया है।

सूर्य के चिन्ह का महत्व

ध्वज पर बनाया गया सूर्य का चिह्न भगवान श्रीराम की सूर्यवंशी परंपरा को दर्शाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, सूर्यदेव के वंशज वैवस्वत मनु से यही वंश आगे बढ़ा और इसमें श्रीराम अवतरित हुए। कथा यह भी कहती है कि राम के जन्म के समय सूर्य का रथ थम गया था, जिससे एक माह तक रात्रि नहीं हुई।

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भगवान राम सूर्यदेव के उपासक थे और रावण से युद्ध के समय भी उन्होंने सूर्यदेव की आराधना कर शक्ति प्राप्त की। इसी कारण ध्वज पर सूर्य प्रतीक श्रीराम के तेज, शक्ति और वंश गौरव का द्योतक है।

कोविदार वृक्ष की पौराणिक महत्ता

कोविदार वृक्ष अयोध्या की प्राचीन पहचान और पवित्रता का द्योतक है। कोविदार वृक्ष मंदार और पारिजात वृक्षों से मिलकर बना एक हाइब्रिड वृक्ष है, जिसे ऋषि कश्यप ने बनाया था। यह प्राचीन वनस्पति हाइब्रिड का भी प्रतीक माना जाता है।

कोविदार वृक्ष को आयुर्वेद में उपयोगी माना जाता है। कहा जाता है कि इसके फूल, पत्तियाँ और छाल कई रोगों में औषधि के रूप में प्रयुक्त होती हैं। माना जाता है कि यह वृक्ष देवताओं का प्रिय है और इसके आसपास सकारात्मक शक्ति बनी रहती है।

प्राचीन काल में अयोध्या के ध्वजों पर यही वृक्ष अंकित किया जाता था। रामायण में प्रसंग आता है कि जब भरत सेना सहित वन में भगवान राम को लौटने के लिए मनाने गए, तब सेना की ध्वनि सुनकर राम और लक्ष्मण सतर्क हुए।

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लक्ष्मण ने उत्तर दिशा से आती सेना के ध्वज पर कोविदार का चिन्ह देखकर ही पहचाना था कि यह अयोध्यावासियों की सेना है। तभी से कोविदार वृक्ष को अयोध्या की राज-परंपरा का प्रतीक माना गया है। इसी कारण इसे राम मंदिर के ध्वज पर स्थान मिला है।

ध्वज का स्वरूप और ध्वजारोहण का शुभ मुहूर्त

राम मंदिर पर फहराया गया ध्वज केसरिया रंग का है, जिसकी लंबाई 22 फीट और चौड़ाई 11 फीट रखी गई है। ध्वजदंड 42 फीट ऊँचा होगा और इसे मंदिर के 161 फीट ऊँचे शिखर पर स्थापित किया गया।

खास बात यह है कि केवल एक नहीं बल्कि परकोटे में स्थित छह अन्य मंदिरों पर भी इसी प्रकार के ध्वज फहरा गए। सभी ध्वज विशेष रूप से अहमदाबाद में तैयार कराए गए हैं। ध्वजारोहण अभिजीत मुहूर्त में किया गया। माना जाता है कि इसी मुहूर्त में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। आज मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी भी है जिस दिन माता सीता और भगवान राम का विवाह हुआ था। इसे विवाह पंचमी भी कहा जाता है।

ध्वज: मंदिर में देव उपस्थिति और संरक्षण का प्रतीक

गरुड़ पुराण में कहा गया है कि मंदिर के शिखर पर लहराता ध्वज देवता की उपस्थिति, महिमा और संरक्षण का संकेत देता है। जिस दिशा में ध्वज लहराता है, वह क्षेत्र पवित्र माना जाता है। इसलिए यह पावन ध्वज अयोध्या में लहराकर दुनिया को बता रहा है कि यहाँ प्रभु श्रीराम की छत्रछाया और दिव्य आशीर्वाद सदा कायम रहेगा।

नक्सलियों की कमर तोड़ने में मोदी सरकार ने दिए ₹3507cr, मुआवजे-पुनर्वास में लगी बड़ी रकम: RTI, लाल आतंकियों से लड़ने वाले केंद्रीय बलों पर ₹1217cr खर्च

वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अपने अंतिम चरण में है। नक्सली सरेंडर करने के लिए 3 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिख कर समय देने की गुहार रहे हैं। नक्सलियों के खात्मे से जुड़ी मुहिम को लेकर ऑपइंडिया ने RTI के माध्यम केंद्र सरकार से कुछ सवाल पूछे थे, जिनके जवाब आ चुके हैं।

आरटीआई के माध्यम से पूछे गए सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय के लेफ्ट विंग एक्स्ट्रीमिज्म डिवीजन ने बताया कि पीएम नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से वामपंथी आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जंग लड़ी जा रही है, जिस पर भारी रकम भी खर्च की गई है। मोदी सरकार ने नक्सलियों के खात्मे और उनका असर खत्म करने के लिए मोटी रकम खर्च की है।

गृह मंत्रालय ने बताया है कि साल 2014-15 से अब तक SRE स्कीम के तहत राज्यों को कुल 3,507.86 करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। ये रकम हथियार छोड़कर मुख्य धारा में आए नक्सलियों के पुनर्वास से लेकर नक्सलियों से खात्मे में जुटे सुरक्षा बलों पर खर्च की गई है।

मोदी सरकार द्वारा SRE के तहत जारी किया गया साल-वार फंड (सोर्स: मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स, LWE डिवीजन)

ताजा आँकड़ों से साफ होता है कि केंद्र सरकार नक्सल प्रभावित जिलों में राज्य पुलिस की ताकत बढ़ाने, खुफिया तंत्र मजबूत करने और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के पुनर्वास पर लगातार बड़ा खर्च कर रही है।

पहले मिले RTI जवाबों में ऑपइंडिया को नक्सलियों के सरेंडर या मारे जाने के आँकड़े, नक्सल ऑपरेशनों में शहीद हुए जवानों की संख्या, बरामद हथियार और नक्सल क्षेत्रों में पुलिस के आधुनिकीकरण पर हुए खर्च जैसी जानकारी मिल चुकी है। यह इस श्रृंखला की तीसरी रिपोर्ट है।

इन तीनों RTI जवाबों को मिलाकर देखा जाए तो मोदी सरकार की एंटी-नक्सल रणनीति एक व्यापक ढाँचा बनाती है, जिसमें लगातार फंडिंग, योजनाबद्ध बल कार्रवाई, इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास और लंबे समय की स्थिरता सुनिश्चित करने के कदम शामिल हैं।

वित्त वर्ष 2014-15 से राज्यवार सुरक्षा संबंधी व्यय

ऑपइंडिया को मिली जानकारी के अनुसार, SRE स्कीम के तहत सबसे ज्यादा पैसा छत्तीसगढ़ को मिला है, कुल 1,219.28 करोड़ रुपए। इसके बाद झारखंड को 917.32 करोड़ रुपए दिए गए।

इसी बीच में ओडिशा को 453.62 करोड़, महाराष्ट्र को 262.53 करोड़, आंध्र प्रदेश को 182.21 करोड़, बिहार को 175.25 करोड़, तेलंगाना को 107.52 करोड़, पश्चिम बंगाल को 108.83 करोड़, मध्य प्रदेश को 38.61 करोड़, उत्तर प्रदेश को 36.37 करोड़ और केरल को 6.32 करोड़ रुपए मिले।

ये आंकड़े पहले मिले RTI जवाबों से भी मेल खाते हैं, जिनमें बताया गया था कि नक्सलवाद (LWE) से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ और झारखंड ही हैं।

SRE के तहत राज्यवार जारी फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)

शीर्ष पाँच लाभार्थी राज्य

शीर्ष पाँच राज्यों में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद हर साल कितनी धनराशि मिली, इसका साल-दर-साल विवरण सामने आया है।

छत्तीसगढ़ को देश में सबसे ज्यादा SRE फंड मिला है, कुल 1,219.28 करोड़ रुपए (2014-15 से अब तक)। सालाना आंकड़ों में साफ दिखता है कि जिस साल बस्तर और आस-पास के इलाकों में अभियान तेज हुए, उस साल फंड भी सबसे अधिक जारी किया गया। खासकर वित्त वर्ष 2024-25 में, जब राज्य को एक ही साल में सबसे ज्यादा राशि मिली।

छत्तीसगढ़ के लिए SRE के तहत साल-दर-साल जारी फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)

झारखंड को SRE के तहत 917.32 करोड़ मिले हैं, जिससे यह दूसरा सबसे बड़ा बेनिफिशियरी बन गया है।

SRE के तहत झारखंड के लिए साल-दर-साल जारी फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)

ओडिशा का कुल SRE सपोर्ट 453.62 करोड़ है।

ओडिशा के लिए SRE के तहत साल-दर-साल जारी किए गए फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)

महाराष्ट्र को SRE के तहत 262.53 करोड़ मिले हैं।

महाराष्ट्र के लिए SRE के तहत साल-दर-साल जारी फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)

आंध्र प्रदेश को कुल 182.21 करोड़ मिले हैं।

आंध्र प्रदेश के लिए SRE के तहत साल-दर-साल जारी किए गए फंड (सोर्स: गृह मंत्रालय, LWE डिवीजन)

SRE स्कीम में क्या-क्या शामिल है

गृह मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, सिक्योरिटी रिलेटेड एक्सपेंडिचर (SRE) योजना नक्सल प्रभावित राज्यों को रीइम्बर्समेंट के आधार पर मदद देती है। इस फंड का मकसद राज्यों को नक्सल समस्या का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने की क्षमता मजबूत करना है।

गृह मंत्रालय की वेबसाइट के अनुसार, SRE स्कीम में सुरक्षा बलों की ट्रेनिंग और ऑपरेशन से जुड़ी जरूरतें, नक्सली हिंसा में मारे गए या घायल नागरिकों और जवानों के परिवारों को मुआवज़ा, आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों का पुनर्वास, कम्युनिटी पुलिसिंग, गाँव रक्षा समिति और जागरूकता सामग्री जैसी चीजें शामिल होती हैं।

सालाना बजट में काफी बढ़ोतरी की गई है और नई मदें भी जोड़ी गई हैं, जैसे नक्सल ऑपरेशन के दौरान अपंग हुए जवानों को मुआवज़ा और संपत्ति के नुकसान पर मुआवजा। यह योजना राज्यों को मैदान में चल रहे एंटी-नक्सल अभियान की लागत वापस देकर रीइम्बर्समेंट एक तरह की ऑपरेशनल बैकबोन का काम करती है।

ANM और ACALWEM के तहत केंद्रीय एजेंसियों को दिए गए फंड

राज्यों को मदद देने के अलावा, गृह मंत्रालय (MHA) नक्सल विरोधी अभियान में लगी केंद्रीय एजेंसियों को भी फंड देता है। इसके लिए दो योजनाएँ चलती हैं, ‘असिस्टेंस टू नक्सल मैनेजमेंट’ (ANM) और ‘असिस्टेंस टू सेंट्रल एजेंसीज़ फॉर LWE मैनेजमेंट’ (ACALWEM)। गृह मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, इन दोनों योजनाओं के तहत अब तक कुल 1,217.16 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं।

ANM और ACALWEM स्कीम के तहत सेंट्रल एजेंसियों के लिए जारी फंड। (सोर्स: मिनिस्ट्री ऑफ़ होम अफेयर्स, LWE डिवीजन)

ये नतीजे क्यों मायने रखते हैं

इन सभी आंकड़ों से यह साफ होता है कि 2014 से मोदी सरकार ने नक्सल समस्या से निपटने के लिए एक बेहद व्यापक और बहु-स्तरीय रणनीति अपनाई है। SRE और SIS जैसे फंड राज्यों को मजबूती देते हैं, जबकि ANM और ACALWEM के जरिए केंद्र सरकार सीधे तौर पर बड़ी एजेंसियों को सहायता देती है। राज्यों के ऑपरेशन, बड़े पैमाने पर सरेंडर और कई नक्सलियों के खात्मे ये सब मिलकर दिखाते हैं कि सरकार की नीति में बल-प्रयोग, स्थिरता और पुनर्वास तीनों पर बराबर जोर है।

गृहमंत्री अमित शाह पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म कर दिया जाएगा। वह कई बार सार्वजनिक रूप से यह समयसीमा दोहरा चुके हैं।

सरकार के लगातार दबाव और समयसीमा के प्रभाव से नक्सलियों की मानसिकता पर भी असर पड़ा है। हाल ही में प्रतिबंधित CPI की महाराष्ट्र–मध्य प्रदेश–छत्तीसगढ़ स्पेशल जोनल कमेटी ने तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर अपने दो वरिष्ठ सदस्यों सोनू और सतीश के आत्मसमर्पण के फैसले का समर्थन किया और कुछ समय के लिए हिंसा रोकने की इच्छा जताई।

मोस्ट वॉन्टेड नक्सलियों में से एक माड़वी हिड़मा की मौत ने तो नक्सलियों के मनोबल को ही तोड़ कर रख दिया है। हालाँकि नक्सलियों ने पहले भी कई बार बातचीत जैसी माँगें की हैं, लेकिन गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि कोई बातचीत नहीं होगी, नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए आत्मसमर्पण ही करना होगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

कौन है मोहम्मद सलीम, जिसने रखी संजौली के अवैध मस्जिद की नींव: डेमोग्राफी बदलने की भी साजिश, पढ़ें- पीड़ित हिन्दुओं की आपबीती

शिमला का संजौली सुर्खियों में हैं। वजह है एक पाँच मंजिला मस्जिद। इसका इतिहास करीब 30 साल पुराना है। अपने अस्तित्व में आने के साथ ही ये विवादित हो गया, क्योंकि ये अवैध तरीके से बनाया गया। यहाँ आसपास हिन्दू आबादी है। इनके बीच बहुमंजिला मस्जिद और यहाँ आने वाले बाहरी मुस्लिम, जो नमाज अदा करने के लिए खास तौर पर यहाँ आते हैं।

यहाँ की पूरी आबादी हिन्दू है। राजनीतिक लाभ के लिए कॉन्ग्रेस ने मस्जिद निर्माण को नजरअंदाज किया। पहले एक कमरा बनाया गया, फिर दूसरा बना और फिर धीरे-धीरे पाँच मंजिला मस्जिद तैयार हो गया। नगर निगम के कागजों में ये अवैध रहा। सरकारी आदेशों में उसे तोड़ने का फरमान जारी हुआ, लेकिन जैसे ही तोड़ने की बात आती है, आदेश पर स्टे लग जाता है।

शिमला और संजौली की हिन्दू आबादी स्टे और दूसरी कानून प्रक्रिया से परेशान हो चुकी है। हिन्दू संघर्ष समिति अब मस्जिद के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहा है। समिति ने मस्जिद की बिजली पानी काट कर सील करने की माँग रखी थी। इसमें बिजली-पानी काटने की बात माँगी गई है। नगर निगम की ओर से कहा गया है कि बिजली-पानी काट दिया जाएगा । लेकिन अब तक उस पर अमल नहीं हुआ है।

विरोध प्रदर्शन कर रहे हिन्दू संगठनों का मंच संजौली पुलिस स्टेशन के पास में है। दिन तो धूप के साथ खुशनुमा रहता है, लेकिन रात में तापमान 3 से 4 डिग्री तक पहुँच जाता है। इसके बावजूद लोग टस से मस होने के लिए तैयार नहीं हैं। हिमाचल की कॉन्ग्रेस सरकार और लोकल प्रशासन के रवैये से लोग खासे नाराज हैं।

ऑपइंडिया ने विरोध प्रदर्शन कर रहे हिन्दू समाज के लोगों से खास बातचीत की और उनकी समस्याओं को जाना। समिति से जुड़े कमल गौतम के मुताबिक, ये मामला दुनिया के सामने तब आया, जब 30 अगस्त 2024 को एक स्थानीय युवक के साथ 5-6 प्रवासी मुस्लिमों के समूह ने मारपीट की और सिर फोड़ दिया। आरोपित को मस्जिद ने पनाह दिया। इसी मस्जिद से उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था।

हिन्दुओं के सब्र का बाँध टूट गया। हमेशा शांत रहने वाला पहाड़ इन दिनों बाहरी मुस्लिम आबादी के बढ़ते अपराध से त्रस्त हो गया है। अवैध मस्जिद इन अपराधियों के छिपने का ठिकाना बन गयी है।

डेमोग्राफी बदलने की साजिश

ऑपइंडिया ने जब स्थानीय व्यक्ति और विरोध प्रदर्शन में बढ़चढ़ कर भाग लेने वाले विजय शर्मा से बात की। उनका कहना है कि हिमाचल प्रदेश में बाहर से आने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। उनकी गतिविधियाँ संदिग्ध नजर आती है। हर दिन नए नए चेहरे देखने को मिल रहे हैं। हमारी माताओं बहनों की सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।

विजय शर्मा के मुताबिक, पहले 3 फीसदी स्थानीय मुस्लिम थे, अब तो बढ़ गई है। बाहर से आने वाले घुसपैठिए चाहे वे अवैध बांग्लादेशी, रोहिग्या हों या दूसरे राज्यों से आए मुस्लिम भीड़। इनकी संख्या काफी तेजी से बढ़ी है।

उन्होंने कहा, “डेमोग्राफी बदल रही है पूरा साजिश के तहत। हिन्दुओं को दबाने के लिए सुनियोजित षडयंत्र हो रहा है। शिमला कोई बड़ा शहर नहीं है और संजौली तो छोटा-सा कस्बा है। शिमला से दूर संजौली जैसे छोटे इलाके में जाकर बसना कोई छोटी बात नहीं है। यहाँ पर मुस्लिम आबादी नहीं है इसलिए यहाँ धीरे धीरे भीड़ जमा होने लगी, ताकि डेमोग्राफी बदला जा सके। फल वाला भी सस्ते दाम में फल देने लगता है। अब हालात ये हो गए हैं कि स्थानीय लोगों से मारपीट शुरू हो गयी है। हमें तो भविष्य की चिंता है। आगे आने वाली पीढ़ी नमाज पढ़ने लगेगी, ऐसा मुझे लगता है।

मस्जिद बनाने वाला मोहम्मद सलीम सबसे बड़ा साजिशकर्ता

विजय शर्मा के मुताबिक, स्थानीय युवक का सिर फोड़े जाने के बाद लोगों का गुस्सा फूट गया। 5 सितंबर 2024 और 11 सितंबर 2024 को जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ। ये वर्षों से दबी चिंगारी थी।

उनका कहना है कि 1990 में मोहम्मद सलीम संजौली पहुँचा। वह दर्जी था, उसने स्कूल के शिफ्ट होने के बाद सरकारी जमीन पर कब्जा कर एक ढाँचा बना लिया। एक मंजिल का ये ढाँचा धीरे धीरे दूसरी मंजिल तक पहुँच गया। इसे मस्जिद के रूप में विकसित करने लगा। राजनीतिक फायदे के लिए वक्फ बोर्ड से मस्जिद को NOC दिलवाया गया।

मस्जिद को पैसे मिले और धीरे धीरे उसका फ्लो बढ़ने लगा। जैसे जैसे मंजिल बढ़ी, यहाँ आने वाले नमाजियों की जमात भी बढ़ने लगी। 5 मंजिल का ये ढाँचा पूरी तरह मस्जिद की तरह इस्तेमाल होने लगा। यहाँ बड़ी संख्या में लोग नमाज अदा करने के लिए आने लगे। गौरतलब है कि यहाँ आसपास मुस्लिम बस्तियाँ नहीं है। बहुत मुश्किल से एकाध व्यक्ति नजर आता है। ऐसे में भीड़ बाहरी मुस्लिम की है, जो यहाँ पहुँच कर नमाज अदा करते हैं।

सबसे बड़ी बात है कि इतनी बड़ी मस्जिद में ग्राउंड पर सिर्फ दो टॉयलेट है। जब नमाज पढ़ने आते हैं तो बड़ी संख्या में नमाजी होते हैं। नमाज से पहले वजू करने के लिए दो टॉयलेट कम पड़ जाते है। ऐसे में ये लोग खुले में वजू करते हैं।

आसपास हिन्दू आबादी। दोपहर में महिलाएँ अपने बच्चों को लेकर स्कूल से आती हैं या दिनचर्चा के काम के लिए बाहर निकलती हैं। इन महिलाओँ को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। महिलाओं ने शुरुआत में खुले में वजू करने पर एतराज जताया, तो उन्हें गंदे कमेंट सुनने पड़े। हालाँकि महिलाओं ने पुलिस को इसकी शिकायत नहीं की। क्योंकि पहाड़ों पर आम प्रचलन है कि आपसी बातों में जल्दी पुलिस को शामिल नहीं करते हैं।

अमृता चौहान के मुताबिक, हमारी बहनें बच्चों को स्कूल से आती हैं, तो उन्हें नमाज के वक्त रोक दिया जाता है, जब तक कि नमाजी वहाँ से चले नहीं जाते। यहाँ तक कि मुस्लिमों की ठेले और रेडी की दुकानें बड़ी संख्या में लगने लगी है। महिलाओं के सामान खरीदने जाने पर भी गंदे कमेंट सुनने को मिलते हैं।

असिस्टेंट टाउन प्लानर बनते ही महबूब शेख ने मारी पलटी

अवैध मस्जिद की नींव रखने वाला मोहम्मद सलीम का कार्यकलाप संदिग्ध था। 1990 से 2024 के दौर में मुस्लिम भीड़ के जुटने और अवैध मस्जिद निर्माण को लेकर नगर निगम ने भी कहा था कि मोहम्मद सलीम के खिलाफ कार्रवाई की जाए। उस वक्त जेई महबूब शेख ने मोहम्मद सलीम को जाँच में दोषी ठहराया था लेकिन बाद में पलट गया।

ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि असिस्टेंट टाउन प्लानर बनते ही महबूब शेख ने अपनी रिपोर्ट में मोहम्मद सलीम को क्लीनचिट दे दी। उन्होंने कहा कि मोहम्मद सलीम का इससे कोई सरोकार नहीं है। उसने वक्फ बोर्ड को ‘पार्टी’ बनाने की बात कही।

स्थानीय नागरिक का कहना है कि मस्जिद को बड़ा बनाने में पैसों के इंतजाम में असिस्टेंट टाउन प्लानर महबूब शेख का बड़ा हाथ था। विजय शर्मा के मुताबिक, लोग माँग करते रह गए कि महबूब शेख के खिलाफ जाँच की जाए। उसकी संपत्तियों की जाँच की जाए, लेकिन किसी भी सरकार ने लोगों की नहीं सुनी।

हिन्दू विरोधी नैरेटिव सेट करने की कोशिश

कॉन्ग्रेस के शासन काल में हिन्दू विरोधी नैरेटिव सेट करने की कोशिश की गई। हाल ही में नामी गिरामी कॉन्वेंट स्कूल में छोटे छोटे बच्चों को मैसेज भेजा गया। ईद के दिन सफेद कुर्ता-पैजामा, जालीदार टोपी पहन कर, लंच में सेवईयाँ लेकर आने के लिए कहा गया।

अधिकांश बच्चों के पैरेंट्स बिफर गए। कमलेश मेहता के मुताबिक, खानपान में सेवइयाँ कोई ट्रेडिंशन नहीं है पहाड़ों की, लेकिन हमने पूछा कि क्या महावीर जयंती मनाई, दुर्गापूजा मनाई, जन्माष्टमी मनाई, अगर नहीं मनाई तो ईद क्यों मनाने के लिए बोल रहे हो। अंत में पैरेंट्स के दबाव में स्कूल ने निर्णय बदल दिया।

कमलेश का कहना है कि सनातन समाज अपने बच्चों और उनके भविष्य की चिंता कर रहा है। आगे आने वाली पीढ़ी की चिंता है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस विधायक का वीडियो वायरल हो गया है जिसमें उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मुस्लिम पक्ष से कह रहे थे कि मुझे धन्यवाद करना। दरअसल जब सीएम ने कहा कि हम 98 फीसदी हिन्दू विचारधारा को हरा कर सत्ता में आए हैं, तो हम क्या इनसे उम्मीद करें।

दिल्ली हिंदू-विरोधी दंगा केस में SC ने देखे सबूत, शरजील के भाषण, प्लानिंग-सत्ता परिवर्तन की साजिश: सरकार ने बताया अंतरराष्ट्रीय साजिश

दिल्ली के फरवरी 2020 एंटी-हिंदू दंगों से जुड़े UAPA केस (FIR 59/2020) में सुप्रीम कोर्ट में जमानत सुनवाई तेज हो गई। उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा समेत सात आरोपित जमानत माँग रहे हैं, लेकिन ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट जमानत याचिका कई बार खारिज कर चुकी हैं।

पुलिस का आरोप है कि ये दंगे अचानक नहीं हुए, बल्कि CAA विरोध प्रदर्शनों की आड़ में संगठित ढंग से प्लान किए गए थे। ताकि ट्रंप की विजिट के दौरान भारत की छवि खराब हो। ASG एस वी राजू ने कहा, “ये अचानक हिंसा नहीं, बल्कि रेजीम चेंज ऑपरेशन था।”

यह केस UAPA के तहत दर्ज FIR 59/2020 से शुरू हुआ था, जिसे बड़ी साजिश का मामला माना गया। आरोपितों पर आरोप है कि इन्होंने CAA-NRC के विरोध प्रदर्शनों को एक कवर की तरह इस्तेमाल करके हिंसा की प्लानिंग की। उसे भड़काया और फंडिंग करवाया।

पुलिस के अनुसार, इस पूरी योजना का उद्देश्य दंगों को इस तरीके से अंजाम देना था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब हो और यह सब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान हुआ।

ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2022 में उमर खालिद को जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि चार्जशीट के शुरुआती अध्ययन से ही यह लगता है कि दंगे अचानक हुए हादसे नहीं थे, बल्कि एक सोची-समझी साजिश के तहत की गई थी, जिसमें उमर की अहम भूमिका है।

इसके बाद अक्टूबर 2022 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के हिसाब से आरोप इतने गंभीर हैं और शुरुआती जाँच में सही लगे हैं कि जमानत नहीं दी जा सकती।

2 सितंबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट की एक और डिवीजन बेंच ने उमर खालिद, शरजील इमाम और बाकी आरोपितों की जमानत याचिकाएँ खारिज करते हुए कहा कि यह हिंसा किसी सामान्य झड़प का नतीजा नहीं था, बल्कि एक योजनाबद्ध प्रक्रिया का हिस्सा था। हाई कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष की थ्योरी एक संगठित नेटवर्क और समयबद्ध प्लानिंग की ओर इशारा करती है।

अब सुप्रीम कोर्ट में आरोपित यह दलील दे रहे हैं कि उनके खिलाफ हिंसा में शामिल होने का कोई सबूत नहीं है। उनका कहना है कि कुछ लोग दंगों के समय नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में मौजूद भी नहीं थे।

वे यह भी कहते हैं कि केस ज्यादातर व्हाट्सअप ग्रुप की चैट, देर से मिले प्रोटेक्टेड गवाहों के बयान और उन भाषणों पर टिका है जो उनके अनुसार सिर्फ CAA-NRC के खिलाफ राजनीतिक विरोध और सरकार की आलोचना थे, जिन्हें अपराध नहीं माना जा सकता।

इसके मुकाबले दिल्ली पुलिस का कहना है कि मामला सिर्फ नारेबाजी या अव्यवस्थित प्रदर्शन का नहीं है, बल्कि एक गहरी और पहले से तय की गई साजिश का है। पुलिस के अनुसार, CAA विरोध प्रदर्शनों को हिंसा फैलाने के लिए एक सॉफ्ट कवर बनाया गया, जिसमें पूरी प्लानिंग, समन्वय और फंडिंग शामिल थी। उनकी दलील है कि यह सब देश की संप्रभुता और राज्य की शक्ति को चुनौती देने वाली गंभीर मंशा के साथ किया गया।

सरकार बदलने का ऑपरेशन चला रहे थे आरोपित

सुप्रीम कोर्ट में अब तक अभियोजन पक्ष ने साफ तौर पर यह कहा है कि फरवरी 2020 की हिंसा कोई अचानक भड़की भीड़ नहीं थी, बल्कि पहले से की गई साजिश का नतीजा थी। राज्य की तरफ से पेश हो रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस वी राजू ने कोर्ट में दो बातें जोर देकर रखीं।

पहली यह कि आरोपितों को निर्दोष एक्टिविस्ट या बौद्धिक वर्ग के लोग बताने वाली कहानी गलत है और दूसरी यह कि आरोपितों के भाषणों, व्हाट्सऐप चैट और पूरी टाइमलाइन से साफ दिखता है कि दिल्ली को ठप करने, ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अशांति दिखाने और यहाँ तक कि रेजीम चेंज ऑपरेशन जैसी कोशिशों की एक बड़ी प्लानिंग थी।

20 नवंबर 2025 को हुई सुनवाई में शरजील इमाम के भाषण और इस पूरी साजिश की वैचारिक सोच मुख्य चर्चा का विषय रहे। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच के सामने ASG राजू ने कई वीडियो क्लिप चलाए।

इन क्लिप्स में शरजील इमाम देशभर में चक्का जाम कराने, दिल्ली को घुटनों पर लाने और सिलिगुड़ी कॉरिडोर जिसे चिकन नेक भी कहा जाता है, उसको निशाना बनाने की बात करते सुनाई देते हैं। यह कॉरिडोर उत्तर-पूर्व को बाकी भारत से जोड़ने वाला बेहद रणनीतिक रास्ता है।

जो वीडियो सुप्रीम कोर्ट में अभियोजन पक्ष ने चलाया, वही वीडियो सबसे पहले ऑपइंडियाने एक्सक्लूसिव रूप से जारी किया था।

प्रोफेशन छोड़कर राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। राज्य का कहना है कि ऐसे शिक्षित लोग, जिन्हें सरकारी खर्च पर पढ़ाया गया, जब अपनी क्षमता और पहुँच का इस्तेमाल अवैध कामों के लिए करते हैं, तो वे उन लोगों से कहीं अधिक खतरनाक हैं जो सिर्फ पत्थर फेंकते हैं या सड़क पर छोटे स्तर पर हिंसा करते हैं।

अभियोजन पक्ष का मुख्य तर्क यह है कि प्रताड़ित बुद्धिजीवी वाली कहानी हकीकत नहीं है। रिकॉर्ड बताता है कि यह जानबूझकर की गई उकसाहट, जरूरी सप्लाई रोकने की कोशिश और प्रदर्शन स्थलों को बड़े नेटवर्क के नोड की तरह इस्तेमाल करने की योजना थी।

व्हाट्सऐप चैट का सबूत भी इस मामले में बड़ा हिस्सा निभा रहा है। ASG राजू ने कोर्ट को कई ग्रुप्स की बातचीत दिखाई जैसे दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप (DPSG), मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑफ JNU (MSJ), जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (JCC) और अन्य।

राज्य के मुताबिक ये सिर्फ अनौपचारिक स्टूडेंट फोरम नहीं थे, बल्कि समन्वय केंद्र थे, जहाँ पैसों की व्यवस्था, प्रदर्शन स्थलों की मरम्मत, चक्का जाम प्लान करना और मीडिया नैरेटिव प्रभावित करने जैसी चर्चाएँ होती थीं।

ASG के अनुसार, इन चैट्स को भाषणों और जमीन पर हुई घटनाओं के साथ मिलाकर देखें तो यह साफ होता है कि आरोपित आयोजक और प्लानर थे, न कि भीड़ में खड़े सामान्य लोग। उन्होंने बंद कमरे वाली, एन्क्रिप्टेड चैट्स के माध्यम से ऐसी योजना बनाई जो तब के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की दिल्ली यात्रा के दौरान देशभर में तनाव बढ़ाने की कोशिश थी।

राज्य का कहना है कि दिल्ली पुलिस के हलफनामे में आया शब्द रेजीम चेंज ऑपरेशन ठीक उसी मंशा को दिखाता है, जो इन बातचीतों, भाषणों और प्लानिंग से सामने आती है, यानी चुनी हुई सरकार को कमजोर दिखाना, राजधानी को अराजक बनाना और दुनिया के सामने भारत को आग में झुलसता हुआ दिखाना।

ऑपइंडिया ने DPSG व्हाट्सऐप ग्रुप का वह मैसेज भी एक्सक्लूसिव रूप से सामने लाया था, जिसमें दंगों और प्रदर्शन को एक बड़े रेजीम चेंज ऑपरेशन की तैयारी बताया गया था और इस ग्रुप में सभी कथित सह-साजिशकर्ता मौजूद थे।

यह मैसेज राहुल रॉय ने 20 जनवरी 2020 को भेजा था, यानी दिल्ली के हिन्दू विरोधी  दंगों से पूरे एक महीना पहले। इस मैसेज में राहुल रॉय ने साफ लिखा था कि चल रहे प्रदर्शन दरअसल एक बड़े रेजीम चेंज ऑपरेशन की शुरुआत हैं और इस पूरी योजना को जामिया कोऑर्डिनेशन कमिटी (JCC) आगे बढ़ा रही है।

सुनवाई के दौरान बेंच ने ASG एस वी राजू से पूछा कि क्या जमानत सुनवाई में पुरी जानकारी देखना जरूरी है। इस पर राजू ने शांत और साफ जवाब दिया। उन्होंने कहा कि बचाव पक्ष (डिफेंस) कोशिश कर रहा है कि बहस में देरी हो, ताकि यह तस्वीर बनाई जा सके कि ये लोग निर्दोष आंदोलनकारी हैं जो बिना वजह जेल में पड़े हैं।

लेकिन अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी यह दिखाना है कि पहली नजर में यह एक गंभीर और बड़ी साजिश थी। UAPA की धारा 43D(5) के अनुसार, अगर अदालत को यह मानने के लिए उचित आधार मिल जाए कि आरोप सही हो सकते हैं, तो जमानत नहीं दी जा सकती।

जमानत के दौरान अदालत का काम सिर्फ यह देखना होता है कि क्या सबूत इस शुरुआती कसौटी को पूरा करते हैं, ना कि हर सबूत की गहराई से जाँच वैसे ही करना जैसे ट्रायल में किया जाता है। इसी वजह से, ASG राजू ने कहा कि वीडियो चलाना और बातचीत दिखाना जरूरी है, ताकि यह साबित हो सके कि मामला सिर्फ राजनीतिक विरोध या कमजोर सबूतों पर नहीं टिकता, बल्कि सामग्री गंभीर है।

अपनी दलील को मजबूत करने के लिए ASG राजू ने एक और वीडियो दिखाया, जिसमें यह दिखाई देता है कि प्रदर्शनकारियों की भीड़ कैसे संगठित तरीके से इकट्ठी हुई और कैसे इसी माहौल में कांस्टेबल रतन लाल की हत्या हुई।

उन्होंने CCTV फुटेज दिखाकर बताया कि कैसे दंगाइयों ने पहले से योजना बनाकर कैमरों को ढका, जो कैमरे ऊँचाई पर थे उन्हें तोड़ दिया या नुकसान पहुँचाया और उसके बाद कैमरों के बंद हो जाने पर हिंसा शुरू कर दी। इस वीडियो को ऑपइंडिया ने चार्जशीट के आधार पर दोबारा तैयार किया था और वही वीडियो कोर्ट को दिखाया गया।

सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान ASG एस वी राजू ने उस दलील का भी जवाब दिया जिसमें कहा जा रहा था कि आरोपित करीब पाँच साल से जेल में हैं, इसलिए उन्हें जमानत मिलनी चाहिए।

ASG राजू ने ट्रायल कोर्ट के आदेशों का हवाला देकर बताया कि मामले में हुई देरी का बड़ा कारण खुद आरोपितों की तरफ से लिए गए बार-बार के स्थगन (कार्यवाही को रोकने) और लंबी-लंबी दलीलें हैं, न कि पुलिस या अभियोजन की धीमी कामगिरी।

उन्होंने कहा कि कई बार ट्रायल कोर्ट ने रिकॉर्ड में लिखा है कि बचाव पक्ष के वकील हफ्तों तक समय माँगते रहे। इसी संदर्भ में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सलीम खान फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि गंभीर अपराधों में साढ़े पाँच साल की कैद भी जमानत का स्वचालित आधार नहीं है।

अगले दिन ASG राजू ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच के सामने अपनी दलीलें जारी रखीं। उन्होंने तथ्य और UAPA की कानूनी धाराओं को जोड़कर बताया कि UAPA की धारा 43D(5) में जो कठोर जमानत मानदंड हैं, वे इस मामले पर पूरी तरह लागू होते हैं।

उन्होंने फिर याद दिलाया कि फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में कैसी हिंसा हुई पेट्रोल बम, एसिड जैसी चीजें, पत्थर, डंडे और पुलिस व आम लोगों पर हमले। 53 लोगों की मौत हुई और 530 से ज्यादा लोग घायल हुए।

CCTV कैमरों को पहले से प्लानिंग करके तोड़ा गया, पुलिस पर निशाना साधा गया और स्थान ऐसे चुने गए जहाँ से शहर को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया जा सके। उन्होंने साफ कहा यह कोई अचानक हुई भिड़ंत नहीं थी, बल्कि सोच-समझकर रची गई योजना थी।

इसके बाद उन्होंने UAPA की धारा 16(1)(a) (जिसमें आतंकी गतिविधि की परिभाषा है) और धारा 43D(5) का हवाला देकर इस सारे घटनाक्रम को आतंकी गतिविधि से जोड़ा। उन्होंने कहा कि कोर्ट पहले ही चार्जशीट स्वीकार कर चुका है, जिसमें UAPA सेक्शन 16 लगाया गया है और आरोपितों ने उस आदेश को कभी चुनौती भी नहीं दी।

इसलिए, उन्होंने कहा, “जब एक कोर्ट पहले ही कह चुकी है कि UAPA का अपराध बनता है, तो जमानत देने का सवाल ही नहीं उठता।” फिर ASG ने साजिश के खास पहलुओं पर बात की।

उनका कहना था कि आरोपित जान-बूझकर दिल्ली की सप्लाई दूध, पानी, सब्ज़ी आदि बंद करवाना चाहते थे, ताकि शहर ठप हो जाए और राज्य की क्षमता पर सवाल उठे। राज्य की तरफ से यह भी कहा गया कि दंगों में बम, पेट्रोल बम और हथियारों का इस्तेमाल हुआ, जो ‘आतंकी गतिविधि’ की श्रेणी में आता है।

उन्होंने सिलिगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) का भी उल्लेख किया और कहा कि सबूतों के अनुसार उत्तर-पूर्व भारत को देश से काटने की योजना भी बातचीत में दिखाई देती है। ASG ने बताया कि यह सामग्री चार्जशीट के साथ दी गई पेन ड्राइव में है और आरोपितों ने इसे कभी चुनौती नहीं दी, इसलिए उनकी कोई सबूत नहीं है वाली दलील कमजोर पड़ जाती है।

इसके बाद उन्होंने आरोपितों की व्यक्तिगत भूमिका समझाई। उन्होंने पूरक आरोप पत्र पढ़कर बताया कि अभियोजन के मुताबिक उमर खालिद सिर्फ एक प्रदर्शनकारी नहीं थे, बल्कि चक्का जाम की योजना बनाने वालों में आगे थे।

ASG के अनुसार, उमर खालिद ने शरजील इमाम और आसिफ इकबाल तन्हा को समझाया था कि साधारण धरने और चक्का जाम में क्या फर्क है और उन्हें अलग-अलग इलाकों में चक्का जाम शुरू करने की जिम्मेदारी दी थी। राज्य का दावा है कि चक्का जाम शांतिपूर्ण विरोध नहीं, बल्कि शहर को ठप करने की हिंसक रणनीति थी।

ASG राजू ने 164 CrPC के तहत दर्ज प्रोटेक्टेड विटनेस के बयानों का भी हवाला दिया, जिसमें पैसे के लेन-देन और प्लानिंग का जिक्र है। उन्होंने कहा कि एक बयान में बताया गया कि आरोपित मीरान हैदर ने दंगों के लिए 2.86 लाख रुपए खर्च किए। उन्होंने यह भी कहा कि ED की जाँच में और भी बातें सामने आई हैं, लेकिन वे अभी सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड पर ही निर्भर हैं।

साजिश से जुड़े कानूनी सिद्धांतों को समझाते हुए ASG ने साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) की धारा 10 का जिक्र किया। इस धारणा के अनुसार, एक बार अगर साजिश होने की पर्याप्त संभावना दिख जाए, तो साजिश के दौरान किसी एक आरोपित की कही या की गई बात बाकी आरोपितों के खिलाफ भी पढ़ी जा सकती है।

इसका मतलब यह हुआ कि किसी आरोपित का हर दंगे की जगह पर मौजूद होना जरूरी नहीं अगर उसने प्लानिंग, फंडिंग या विचार देने में भूमिका निभाई, तो वह उतना ही जिम्मेदार है।

डिजिटल सबूतों की तरफ बढ़ते हुए ASG ने व्हाट्सऐप चैट्स का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि चैट्स से साफ दिखता है कि शांतिपूर्ण विरोध चाहने वालों और हिंसक रास्ता चाहने वालों में फूट थी और याचिकाकर्ता उस गुट में थे जो टकराव और हिंसा चाहता था।

ASG ने राज्य का केस समेटते हुए कहा कि यह एक ऐसी साजिश थी जिसमें हत्या, आतंकी गतिविधियाँ और रेजीम चेंज जैसे दंगे शामिल थे, कुछ वैसा जैसा बांग्लादेश या नेपाल में हुआ था।

इसके बाद उन्होंने ‘parity’ और ‘delay’ पर भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि अन्य आरोपितों को मिली जमानत का लाभ ये आरोपित नहीं उठा सकते, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुका है कि वे आदेश मिसाल नहीं हैं। देरी पर उन्होंने कहा कि ट्रायल में ज्यादा समय रक्षा पक्ष की वजह से लगा है और अगर आरोपित सहयोग करें तो वह दो साल में मुकदमा पूरा करवा सकते हैं।

बेंच ने भी कुछ स्पष्टीकरण माँगे। जब पूछा गया कि कितने गवाहों के 164 बयान दर्ज हैं, ASG ने बताया 47 में से 38 गवाहों ने बयान दिया है, जो साजिश के पक्ष में मजबूत गवाही मानी जा सकती है।

जब बचाव पक्ष ने अगली तारीख आज यानि सोमवार (24 नवंबर 2025) को सुने जाने का अनुरोध किया, ASG ने कहा कि वे मेरिट्स पर बहस नहीं कर सकते, क्योंकि पहले उन्होंने खुद कहा था कि वे मेरिट्स पर बहस नहीं करेंगे।

लेकिन बेंच ने साफ किया कि वे बचाव पक्ष को बहस से रोका नहीं जा सकता और चाहें ASG मौजूद हों या नहीं डिफेंस की बहस सुनी जाएगी। आज जो अगली सुनवाई 24 नवंबर 2025 को होनी है, उसमें बचाव पक्ष अपनी दलीलें पेश करेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में दिव्यांश तिवारी ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

संजौली मस्जिद में स्थानीय से ज्यादा होते हैं बाहरी नमाजी, टीले से शुरू होकर अवैध तरीके से बनी बहुमंजिला इमारत: ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में जानें- लोग क्यों कर रहे विरोध

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से सटे संजौली में बने अवैध मस्जिद को हटाने के लिए स्थानीय हिन्दू आंदोलन कर रहे हैं। हिन्दू संघर्ष समिति का कहना है कि शिमला नगर निगम और सेशंस कोर्ट के आदेश के बावजूद हिमाचल की कॉन्ग्रेस सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। दरअसल सेशंस कोर्ट ने मस्जिद को अवैध घोषित कर ध्वस्तीकरण का आदेश दे चुका है। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद यहाँ नमाज पढ़ने की इजाजत किसी को नहीं दी जा रही है।

ऑपइंडिया की टीम शिमला के अवैध मस्जिद स्थल पर पहुँची और स्थानीय लोगों से बातचीत कर उनका पक्ष जानने की कोशिश की।

स्थानीय लोगों का कहना है कि मस्जिद जानेवाले नमाजी राह चलती हिन्दू बहन-बेटियों को छेड़ते हैं। मस्जिद जाने का एकमात्र रास्ता हिन्दू आबादी वाले इलाके से होकर जाता है। ऐसे में नमाज अदा करने आने वाले नमाजी मस्जिद के आस-पास रहनेवाले हिन्दू घरों में ताक झाँक करते हैं। घर से बाहर निकल रही बहन-बेटियों को कमेंट करते हैं। उनका निकलना दुश्वार हो जाता है, खासकर शुक्रवार को जम्मू की नमाज के वक्त।

ऑपइंडिया ने मस्जिद जाकर इमाम से भी बातचीत करने और अपना पक्ष रखने को कहा। काफी मेहनत के बावजूद न तो मस्जिद कमेटी का कोई सदस्य बोलने को तैयार हुआ और न ही इमाम।

मस्जिद के बगल से एक और सीढ़ी थी, जिससे होकर ऊपर पहुँचने पर एक व्यक्ति से बात हुई। उन्होंने पत्रकार का नाम लेते ही बात करने से मना कर दिया। उन्होंने एक नंबर दिया, जिससे बात करने की कोशिश कई बार की गई, लेकिन उन्होंने कॉल काटा और कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया।

यहाँ जो आरोप लग रहा है, तो आप इस पर क्या कहेंगे। इस पर कॉल कट कर दिया गया।

ऑपइंडिया से बात करते हुए स्थानीय निवासी राजकुमार शर्मा ने कहा कि ये मस्जिद बहुत धीरे-धीरे बनाया गया है। पहले यहाँ प्राइमरी स्कूल होता था। उन्होंने कहा कि इस स्कूल में उन्होंने भी पढ़ाई की थी। बाद में स्कूल को धर्मशाला शिफ्ट कर दिया गया। कुछ दिनों बाद इस जगह पर छोटे-छोटे टीले बने। समय के साथ यहाँ छोटी-सी मस्जिद बनाई गई और धीरे-धीरे इसे बड़ा किया गया।

यही वजह है कि मस्जिद के नीचे फ्लोर पर प्लास्टर लगे हुए हैं और ऊपर के दो फ्लोर पर मस्जिद की दीवारें प्लास्टरविहीन हैं। दरअसल पहला फ्लोर पहले बन गया और दो फ्लोर धीरे धीरे बाद में बनाया गया है। नीचे के फ्लोर पर नमाज पढ़ा जाता है। ऊपर इमाम रहते हैं। मस्जिद में घुसते ही दो वॉशरूम है, जो बेहद गंदा है। वजू करने की व्यवस्था वाली जगह पर भी काफी गंदगी है।

राजकुमार के मुताबिक, आसपास हिन्दुओं की आबादी है। मस्जिद बनने के बाद मुस्लिम बस मस्जिद के पास हैं। इस मस्जिद में नमाज पढ़ने दूर दूर से लोग आते हैं। क्योंकि यहाँ तक जाने का रास्ता एक सीढीनुमा रास्ते से होकर गुजरता है। इस रास्ते को देख कर ही बताया जा सकता है कि ये रास्ता कुछ लोगों के आने-जाने के लिए बनाया गया है।

ऑपइंडिया की टीम जब थोड़ा आगे बढ़ी तो उसने कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की। मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े आरके सिंह का कहना है कि हिमाचल में बीजेपी और कॉन्ग्रेस की ही सरकार रहती है। उन्होंने सवाल किया कि जब मस्जिद बन रही थी, तो सरकार कहाँ सोई हुई थी।

उनका कहना है कि मस्जिद बन चुकी है, कोर्ट में मामला चल रहा है, अवैध निर्माण के लिए सरकार जिम्मेदार है। देश के सभी नागरिकों के लिए कानून बराबर है। कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए। यदि अवैध है तो इसे हटना चाहिए

वहीं थोड़ी दूर पर मिले सब्जी का व्यापार करने वाले रवि कुमार से बात की। इनका कहना है कि कुछ लोग यहाँ मस्जिद हटाने की माँग कर रहे हैं। वो 1990 से यहाँ रह रहे हैं। उस वक्त छोटी सी मस्जिद थी। यहाँ नमाज पढ़ने बाहरी लोग आते हैं। इनमें कश्मीरियों की संख्या काफी है। उनका कहना है कि संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर इस समस्या का समाधान होना चाहिए।

ऑपइंडिया की टीम जब पगडंडी जैसे रास्ते से होकर गुजर रही थी, तो उन्होंने देखा कि आसपास छोटे-छोटे घर थे। यहाँ वर्षो से हिन्दू रहते आए हैं। ये लोग विवाद को देखते हुए इस मुद्दे पर बात करने से कतराते नजर आए। कई लोगों ने नाम लेते ही दरवाजे बंद कर लिए। इससे पता चलता है कि आसपास के लोगों में कितनी दहशत है।

यहाँ मस्जिद का होना ही बड़ा सवाल है, क्योंकि मुस्लिम आबादी यहाँ नहीं रहती है। यहाँ के कल्चर से भी मस्जिद बिल्कुल मैच नहीं करता। पहले फ्लोर पर प्लास्टर है, लेकिन उसके दो फ्लोर पर प्लास्टर नहीं किया गया है। मस्जिद जाने के लिए सीढ़ियों से होकर गुजरना पड़ता है। रास्ते के दोनों ओर हिन्दुओं का घर है।

स्थानीय लोगों के मुताबिक, घरों में बनी खिड़कियों में नमाज अदा करने के लिए आते-जाते वक्त ये झाँकते हैं। आने-जाने वाली लड़कियों को छेड़ते हैं। इसलिए यहाँ के लोग मस्जिद को हर हाल में शिफ्ट कराना चाहते हैं।

हाथ में हिडमा के पोस्टर, जेब में चिली स्प्रे: दिल्ली में पर्यावरण के रखवाले नहीं, ‘अर्बन नक्सल’ उतरे प्रदर्शन पर, पुराने ‘वामपंथी पैटर्न’ पर बनाया पुलिस को निशाना

राजधानी दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण लगातार खतरनाक स्तर पर बना हुआ है। इसी गंभीर स्थिति का हवाला देते हुए कुछ युवाओं ने इंडिया गेट पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। शुरुआत में वे ये दिखा रहे थे कि वे हवा की खराब गुणवत्ता को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद उनका असली रंग सामने आ गया। वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हाल ही में मारे गए खूंखार नक्सली हिडमा के समर्थन में नारेबाजी शुरू कर दी और ‘कॉमरेड हिडमा अमर रहे’ के नारे लगाए।

इन वापपंथी प्रदर्शनकारियों की तैयारी देखकर साफ समझा जा सकता है कि प्रदूषण तो एक बहाना था, इनका मुद्दा कुछ और था, क्योंकि प्रदर्शनकारी अपने साथ हिडमा के नाम लिखी तख्तियाँ और पोस्टर ही नहीं बल्कि पेपर स्प्रे भी लेकर आए थे। पुलिस ने जब इनसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की माँग की तो इन्होंने पुलिसकर्मियों पर इसका इस्तेमाल किया।

पुलिस के अनुसार,रविवार (23 नवंबर 2025) को करीब 4:30 बजे ये प्रदर्शनकारी इंडिया गेट के सी-हेक्सागन क्षेत्र में जुटे। वहाँ मौजूद पुलिस ने उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से हटने को कहा, लेकिन वे लगातार हिडमा के पक्ष में नारे लगाते रहे और निर्देशों को नजरअंदाज करते रहे।

पुलिस पर किया पेपर स्प्रे, घायल सुरक्षाकर्मियों का अस्पताल में चल रहा इलाज

स्थिति तब बिगड़ गई जब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाना शुरू किया। इसी दौरान प्रदर्शन कर रहे  कुछ लोगों ने पुलिस पर पेपर स्प्रे कर दिया, जिससे मौके पर अफरा-तफरी मच गई। कई पुलिसकर्मियों की आँखों में तेज जलन हुई और तीन से चार कर्मियों को तुरंत आरएमएल अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनका इलाज जारी है।

नई दिल्ली के DCP देवेश कुमार ने बताया, “पहली बार, हमने पुलिसवालों पर मिर्च स्प्रे का इस्तेमाल होते देखा। हमारे कुछ अधिकारियों की आँखों में स्प्रे लग गया और अभी उनका RML हॉस्पिटल में इलाज चल रहा है। इस बारे में कानूनी कार्रवाई की जा रही है।”

मामले की जानकारी देते उन्होंने आगे कहा, “कुछ प्रदर्शनकारी C-हेक्सागन के अंदर जमा हो गए और फिर उस बैरिकेड को पार करने की कोशिश की जिसे हमने आने-जाने पर रोक लगाने के लिए लगाया था। हालाँकि, वे नहीं माने, उन्होंने बैरिकेड तोड़ दिया, सड़क पर आ गए, और वहीं बैठ गए। हमने उनसे हटने की रिक्वेस्ट की, क्योंकि उनके पीछे कई एम्बुलेंस और मेडिकल कर्मचारी इंतजार कर रहे थे और उन्हें इमरजेंसी एक्सेस की जरूरत थी…हमने ट्रैफिक में रुकावट से बचने के लिए उन्हें C-हेक्सागन से हटा दिया। हटाने के दौरान, कई प्रदर्शनकारियों की पुलिस से हाथापाई हुई, और हमारे कई कर्मचारी घायल हो गए।”

हंगामे के कारण ट्रैफिक व्यवस्था भी प्रभावित हुई। सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि कुल 15 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया है और उनके खिलाफ पुलिस पर हमला करने और हिंसक गतिविधियों में शामिल होने जैसी गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी।

वामपंथी प्रदर्शनकारियों ने हिडमा को लेकर क्या बयान दिया?

असल में इन्हें दिल्ली में बढ़ रहे प्रदूषण से तो कोई लेना-देना ही नहीं था। इनका टार्गेट ही अशांति पैदा करना था। एक वामपंथी ने इस पर बयान देते हुए तो भारत के सबसे खूँखार और मोस्ट वांटेड माओवादी कमांडरों में शुमार माड़वी हिड़मा के तारीफ के पुल ही बाँध दिए।

उसने कहा, “हिडमा एक जनजातीय है जिसने अपने हक के लिए हथियार उठाए। इसे गलत कह सकते हैं, लेकिन वे इसके पीछे के कारण को नकार नहीं सकते। कॉर्पोरेटाइजेशन के खिलाफ लड़ाई जनजातीयों की लड़ाई है, यह पानी, जंगल और जमीन की लड़ाई है। इस वजह से नारायण कान्हा को देशद्रोही नहीं कहा जा सकता। अपने हक की रक्षा करने वाले लोगों पर ऐसा दबाव नहीं डाला जा सकता।”

शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को हिंसक बनाने की वापपंथियों की ये हरकते नई नहीं

यह पहली बार नहीं जब ये वामपंथी गुट किसी भी अन्य मुद्दे को ढाल बनाकर सामने आया हो और बाद में असली रंग दिखाया हो। किसान आंदोलन के समय भी किसानों के साथ उनकी लड़ाई में शामिल होने को ढोंग कर के इन वामपंथियों ने एक शांत से धरने को दूसरा रंग दे दिया। उस समय किसानों के हितों की माँग का दावा करने वाले प्रदर्शनकारी अचानक उमर खालिद और शरजील इमाम की तख्तियाँ लेकर बैठ गए थे। इतना ही नहीं, उस समय भी पुलिस को टार्गेट करके हिंसा के प्रयास हुए थे।

इसके अलावा, साल 2019-20 का समय याद करें तो दिल्ली समेत जगह-जगह CAA-NRC के विरोध में सड़क पर आकर बैठे प्रदर्शनकारियों ने अपने प्रोटेस्ट का रंग बदल दिया था। उन्हीं प्रदर्शनों का नतीजा था कि दिल्ली को हिंदू विरोधी दंगे झेलने पड़े। 40-50 लोगों की निर्ममता से मौत हुई। पुलिस को निशाना बनाया गया। उनके ऊपर कहीं गर्म पानी फेंका गया था तो कीं हथियार लेकर उन्हें दौड़ाया गया था। उन्हें टारगेट करने के लिए दिल्ली दंगों में आरोपित गुलफिशा फातिमा जैसे लोगों ने उमर खालिद के कहने पर लाल मिर्च पाउडर, एसिड, बोतलें, डंडे तक जमा किए थे।

आज स्थिति दोबारा वैसी ही देखने को मिली है। जिसका मतलब साफ है कि पर्यावरण जैसा मुद्दा भी इन वामपंथियों के लिए सिर्फ अपना प्रोपेगेंडा फैलाने का एक साधन मात्र है। अंत में इनका असली चेहरा कभी नक्सल समर्थक, कभी आतंक समर्थक के तौर पर उभर कर आता है। इन्हें समस्या देश, देश की सरकार और देश के कानून से होती है और इनकी संवेदना देश विरोधी तत्वों से।

आज जिस हिडमा के लिए इन्होंने दिल्ली में पुलिस पर हमला किया है। क्या उसकी लड़ाई सच में अपनी जमीन और अधिकार की थी? क्योंकि अगर ऐसा होता तो उसके हाथ मासूमों की हत्या से लाल नहीं होते।

कौन था 26 बड़े हमलों का मास्टरमाइंड हिडमा?

हकीकत यही है कि हिडमा बस्तर में नक्सलियों का वह सबसे बड़ा कमांडर था और सेंट्रल टीम को सँभाल रहा था। माना जाता है कि कर्रेगुट्टा की पहाड़ियों पर जब नक्सलियों के खिलाफ अभियान चलाया गया था, तब माड़वी हिडमा भागने में कामयाब रहा था। लेकिन इस बार सुरक्षाबलों ने उसे खत्म कर दिया।

हिडमा 150 से अधिक जवानों की जान ले चुका था। साल 2004 से अब तक 26 से अधिक हमलों में वह शामिल था। इन हमलों में 2013 का झीरम अटैक और 2021 का बीजापुर अटैक शामिल है।

3 अप्रैल 2021 को सुरक्षाबलों ने माड़वी हिडमा को पकड़ने के लिए अभियान चलाया था। बीजापुर में नक्सलियों ने जवानों पर हमला बोल दिया और इस मुठभेड़ में 22 जवान बलिदान हो गए थे। दंतेवाड़ा हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की बलिदानी हुई थी, इसका नेतृत्व भी इसी ने किया था।