Home Blog Page 1671

शरीयत में सुधार की बात करना चाहती थी मुस्लिम महिला, वामपंथियों ने गोष्ठी में बोलने से रोका: UCC के विरोध में की चर्चा, सुन्नी मुस्लिमों का रखा दबदबा

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी -मार्क्सवादी (CPIM) ने शनिवार (15 जुलाई 2023) को सीताराम येचुरी के नेतृत्व में समान नागरिक संहिता (UCC) के विरोध में केरल में एक संगोष्ठी का आयोजन किया है। इस कार्यक्रम में 28 वक्ता हैं। हालाँकि, इन वक्ताओं में एक भी मुस्लिम महिला नहीं है। इस तरह UCC को लेकर मुस्लिम महिलाओं की आवाज को दबा दिया गया है।

कोझिकोड में आयोजित वाली इस जन संगोष्ठी में शहर की मेयर डॉक्टर बीना फिलिप और केरल महिला आयोग की अध्यक्ष पी सतीदेवी को आमंत्रित किया गया है। वहीं, लेखिका डॉक्टर खदीजा मुम्थास ने कहा कि आयोजकों ने उनसे संपर्क किया था, लेकिन उन्हें औपचारिक निमंत्रण नहीं दिया, क्योंकि UCC पर उनके कुछ विचार CPM के विचारों के विपरीत थे।

डॉक्टर खदीजा ने कहा, “उन्होंने (आयोजकों ने) मुझसे कार्यक्रम से पहले एक बैठक के दौरान सेमिनार में बोलने की मेरी इच्छा के बारे में पूछा। उस समय जब मैंने अपने विचार के बारे में बताया तो उनकी प्रतिक्रिया सकारात्मक नहीं थी।” उन्होंने कहा कि मुस्लिम महिलाएँ ही मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) की कठिनाइयों का सामना कर रही हैं।

बताते चलें कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) का कहना है कि UCC शरीयत कानून को खतरे में डाल देगा। दरअसल, शरीयत में विवाह, तलाक और विरासत सहित अन्य मामलों में इसके नियम पुरुषों के लिए उदार हैं जबकि महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं। इसलिए सीपीएम भी इसका आयोजन सिर्फ अपने राजनीतिक फायदे के लिए ही करती दिख रही है।

‘फोरम फॉर मुस्लिम वीमेन्स जेंडर जस्टिस’ की अध्यक्ष डॉक्टर खदीजा कहती हैं, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूसीसी को लागू करने की बात कही है। उन्होंने कहा, मुस्लिम महिलाओं द्वारा सामना किए जाने वाले मुद्दे अभी भी एक वास्तविकता हैं। इस संदर्भ में, UCC पर चर्चा के लिए सेमिनार में मुस्लिम महिलाओं को वक्ता के रूप में शामिल किया जाना चाहिए।”

हालाँकि, डॉक्टर खदीजा समान नागरिक संहिता के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि उनका मानना है कि यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के एजेंडे को पूरा करता है। उनका कहना है, “मैं मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार के पक्ष में हूँ। नियमों में सुधार होना चाहिए। मैंने उनसे (सीपीएम सेमिनार आयोजकों से) कहा कि अगर मैं वक्ता रहूँगी तो मैं इस रुख को उठाऊँगी।”

मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार के लिए आंदोलन चलाने वालीं NISA के संस्थापक वीपी ज़ुहारा ने कहा, “वे मुस्लिम महिलाओं को मंच पर आमंत्रित नहीं कर सकते, क्योंकि वे समस्त (केरल जेम-इयाथुल उलमा) नेताओं को खुश करना चाहते हैं। वे विधायक कनाथिल जमीला जैसे नेताओं या अपने संगठनों के अन्य वक्ताओं को आमंत्रित कर सकते थे।”

ज़ुहारा ने कहा वह समान नागरिक संहिता लागू करने की माँग लंबे समय से करती आ रही थीं, लेकिन अब चिंतित हैं। उन्होंने कहा, “NISA समान नागरिक संहिता को लागू करने की माँग करता आ रहा था, लेकिन वर्तमान में हम केंद्र सरकार के एजेंडे को लेकर चिंतित हैं। अब हम मुस्लिमों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत शामिल करने की माँग करते हैं।”

ऑन मनोरमा से बात करते हुए केरल के लेखक और सामाजिक आलोचक डॉक्टर हमीद चेन्नामंगलूर ने हाल ही में एक साक्षात्कार में सीपीएम सेमिनार में मुस्लिम महिलाओं की अनुपस्थिति के बारे में बात की। उन्होंने कहा था कि यह समस्त (केरल जेम-इयाथुल उलमा) के नेताओं को नाराज़ करने से बचने के लिए है।” यह सेमिनार शनिवार को शाम 4 बजे होगा। इसके बाद केरल के हर जिले में इस तरह का आयोजन किया जाएगा।

केरल में सुन्नी मुस्लिमों का सबसे बड़ा संगठन Samastha (समस्त) है। इसके सदस्यों में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (Indian Union Muslim League- IUML) के प्रमुख नेता भी शामिल हैं। सेमिनार में ‘समस्त’ नेताओं के अलावा एपी सुन्नी गुट के नेता कंथापुरम एपी अबूबकर मुसलियार भी बोलेंगे। इसके अलावा, सेमिनार में केरल कॉन्ग्रेस (M) और जनता दल (सेक्युलर) सहित सभी प्रमुख वामपंथी सहयोगी दल भी भाग लेंगे।

वहीं, ‘समस्त’ से जुड़े The Samastha Kerala Sunni Mahallu Federation (SKSMF) के अध्यक्ष अब्दुसमंद पूकोतूर ने कहा कि सीपीएम पिछले रूख को देखते हुए इसके आयोजन पर शंका होती है। उन्होंने कहा कि सीपीएम पर्सनल लॉ में सुधार की हिमायती रही है और यह बात इस वामपंथी पार्टी के नंबुदरीपाद जैसे पूर्व नेताओं ने कही है।

पाकिस्तान को बहुत सपोर्ट करते हैं भारत के मुसलमान: वर्ल्ड कप को लेकर बोले PAK पूर्व गेंदबाज नावेद, सहवाग को आउट करने पर शेखी बघारी

पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज राना नावेद-उल-हसन ने आगामी वर्ल्ड कप मैच को लेकर एक भड़काऊ टिप्पणी की है। अपने बयान में राना नावेद-उल-हसन ने कहा है कि भारत के मुस्लिम मैच में पाकिस्तान को सपोर्ट करते हैं।

नावेद ने पाकिस्तानी यूट्यूबर नादिर अली के साथ चैट शो के वक्त अपना यह बयान दिया। उन्होंने नादिर के साथ पॉडकॉस्ट में सवाल का जवाब देते हुए ऐसी भड़काऊ टिप्पणी की।

दरअसल, नादिर अली ने पूछा था, “वर्ल्ड कप 2023 में पाकिस्तान इंडिया खेलने जाएगा तो पाकिस्तान को कितना वहाँ सपोर्ट होगा और कौन सी टीम वहाँ ज्यादा मजबूत होगी।”

इसके जवाब में राणा नावेद उल हसन ने कहा कि इंडिया में कोई भी मैच हो तो फेवरेट तो इंडिया ही होती है। मगर जब मैच भारत-पाकिस्तान के बीच होता है तो भारत के मुसलमान पाकिस्तान को बहुत ज्यादा सपोर्ट करते हैं। उन्होंने कहा- “मैंने दो मैच खेले वहाँ- अहमदाबाद और हैदराबाद में सब लोग सपोर्ट करते हैं।” नावेद ने बताया कि भारत के साथ खेलते हुए उनके लिए राहुल द्रविड को आउट करना बहुत मुश्किल होता था।

गौरतलब है कि वर्ल्ड कप 2023 में भारत-पाकिस्तान का मैच 15 अक्टूबर को होगा। यह मैच अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में खेला जाएगा। वहीं वर्ल्ड कप की शुरुआत 5 अक्टूबर से ही हो जाएगी। लोगों में टूर्नामेंट को लेकर उत्साह देखने को मिल रहा है। 50 ओवर के वर्ल्ड कप में पाकिस्तान कभी भी भारत को नहीं हरा सका है।

इसी पॉडकॉस्ट में नावेद ने सहवाग को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “एक मैच में हमारे खिलाफ सहवाग 85 रन बनाकर खेल रहे थे। वही सीरीज थी जिसमें शाहिद अफरीदी ने शतक जड़ा था। हम दो मैच हारकर पीछे चल रहे थे। तीसरे गेम में सहवाग हमें मार रहे थे। हर गेंदबाज की पिटाई हो रही थी। मैंने कप्तान इंजी भाई को एक ओवर के लिए कहा।”

नावेद उल हसन ने कहा, “मैंने पहली गेंद धीमी बाउंसर डाली, सहवाग इसे खेल नहीं पाए थे। इसके बाद मैंने उनको कहा कि आप नहीं खेल सकते हो, आप यह कर ही नहीं सकते। अगर पाकिस्तान में होते, तो मैं समझता हूँ कि टीम में भी शामिल नहीं होते। कुछ बातें उन्होंने भी कही लेकिन मैं उनको चुभने वाली बात कहने में सफल रहा। इसके बाद मैंने इंजी भाई को कहा कि अगली गेंद पर सहवाग आउट होंगे। मैंने बैक ऑफ़ लेंथ से धीमे गेंद डाली और सहवाग इसे मारने के प्रयास में आउट हो गए। यह विकेट अहम था और हम मैच जीत गए।”

मालूम हो कि एक ओर नावेद ने जहाँ पॉडकास्ट में इस मैच में अपनी जीत का दावा किया है वहीं हकीकत यह है कि भारतीय टीम ने पाकिस्तान को 58 रन से हरा दिया था। नावेद ने सहवाग को आउट जरूर किया था। मगर मैच टीम इंडिया ने जीता था।

‘नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह के कुकर्मों की कीमत आज भी चुका रहा देश’: BJP ने कॉन्ग्रेस को लताड़ा, बताया- 2014 के बाद भारत ने नहीं गवाई 1 इंच जमीन

कॉन्ग्रेस ने भाजपा पर जम्मू-कश्मीर का गलत नक्शा शेयर करने का आरोप लगाया है। इसके जवाब में BJP ने कॉन्ग्रेस ने आड़े हाथों लिया है और जम्मू-कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान और चीन के कब्जे के लिए उसे दोषी बताया है। भाजपा ने कहा कि यह पंडित जवाहरलाल नेहरू के कुकर्मों का परिणाम है।

दरअसल, कॉन्ग्रेस ने अपने ट्विटर हैंडल से एक वीडियो किया। उसमें उसने दावा किया कि भाजपा ने अपने एनिमेशन वीडियो में जम्मू-कश्मीर का गलत नक्शा दिखाया किया। कॉन्ग्रेस का कहना है कि जब उसने इस मुद्दे को उठाया तो उसने वीडियो एडिट कर दिया। कॉन्ग्रेस ने इस गलती के लिए भाजपा से माफी की माँग की है।

इस पर जवाब देते हुए भाजपा ने देश के पहले प्रधानमंत्री एवं कॉन्ग्रेस नेता पंडित नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक को को दोषी बताया। भाजपा न कहा कि पंडित नेहरू की भ्रमित विदेश नीति के परिणामस्वरूप कश्मीर के हिस्से खो गए। नेहरू ने राष्ट्रीय हित पर अपनी स्वयं की छवि को प्राथमिकता दी।

कश्मीर नीति को लेकर कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए भाजपा ने कहा, “पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में लगभग 78,000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर अवैध और जबरन कब्जा कर रखा है। चीन ने भारतीय केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर अवैध कब्जा जारी रखा है। इसके अलावा, 1963 के तथाकथित ‘चीन-पाकिस्तान सीमा समझौते’ के तहत, पाकिस्तान ने अवैध रूप से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में 5,180 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र चीन को सौंप दिया।”

भाजपा आगे बोली, “साल 2014 के बाद से भारत की एक इंच भी ज़मीन नहीं खोई है। अगर ऐसा है भी तो भारत ने पहली बार सीमा पर किसी भी आक्रामकता का इतनी उग्रता से जवाब दिया है, जो पहले कभी नहीं देखी गई।”

पंडित नेहरू पर हमला बोलते हुए भाजपा ने कहा, “जब हमारी क्षेत्रीय अखंडता से समझौता करने की बात हो तो कॉन्ग्रेस को जवाहरलाल नेहरू के कुकर्मों को स्वीकार करके शुरुआत करनी चाहिए। देश आज भी कॉन्ग्रेस के उन कुकर्मों की भयानक कीमत चुका रहा है, जो नेहरू से शुरू होकर मनमोहन सिंह तक जारी रहे।”

IMF से लोन पाकर बौराया पाकिस्तान… 40 करोड़ रुपए खर्च करके फहराएगा मुल्क में ‘सबसे बड़ा’ झंडा: कर्ज न चुकाने पर सऊदी अरब से मिली थी चेतावनी

पाकिस्तान के कर्ज में डूबने के चर्चा विश्व भर में हैं। ऐसे में हाल में खबर आई कि आईएमएफ ने उन्हें राहत देते हुए 3 अरब डॉलर कर्ज देने की मंजूरी दी है। यह कर्ज वैसे तो पाकिस्तान की जनता के लिए है। मगर सरकार इसे अपनी वाह-वाही में लुटाने के लिए फिर तैयार हो गई है।

बताया जा रहा है कि पाकिस्तान की पंजाब सरकार इस बार अपने 76वें आजादी के कार्यक्रम में मुल्क में 500 फीट के स्तंभ पर झंडा फहराएगी जिसकी लागत 40 करोड़ पाकिस्तानी रुपए आने वाली है।

दिलचस्प बात ये है कि ऐसा निर्णय तब लिया जा रहा है जब अगले दो साल के भीतर पाकिस्तान को 2000 करोड़ रुपए ब्याज के साथ चुकाने हैं। वहीं इनकी एयरलाइन्स इतना कर्जे में डूब गई है कि सऊदी अरब इन्हें धमकियाँ दे रहा है, मलेशिया इनके विमान जब्त कर रही है, और चीन का दबाव लगातार इन पर बढ़ रहा है… इन सबके बावजूद पाकिस्तान ने निर्णय लिया है कि वो इस बार लाहौर से लिबर्टी चौक पर यह झंडा फहराएँगे।

इससे पहले 2017 में पाकिस्तान ने अपनी शान दिखाने के लिए अटारी वाघा सीमा पर 400 फीट का ऊँचा झंडा फहराया था। यह दक्षिण एशिया में सबसे ऊँचा झंडा है जिसका आकार 120×80 फीट है।

उल्लेखनीय है कि IMF पाकिस्तान को 3 अरब डॉलर का लोन 9 महीने मेंदेने वाला है। उनसे पूर्व पाकिस्तान ने विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के लिए यूएई से 1 अरब डॉलर का लोन लिया था। वहीं सऊदी अरब ने देश के केंद्रीय बैंक को 2 अरब डॉलर उधार दिए थे। इन्हीं कर्जों के चलते पाकिस्तान की स्थिति बीते कुछ समय में बद्तर होती दिखी। यहाँ फैक्ट्रियाँ बर्बाद होने लगीं। अब इन्हें IMF ने फिर से अरबों डॉलर देकर थोड़ी राहत दी है। लेकिन ऐसे में पाकिस्तान के सबसे बड़ा झंडा फहराने के पाकिस्तान के स्थानीय ही अपनी सरकार का विरोध कर रहे हैं।

UCC के खिलाफ मस्जिदों के बाहर लगे Bar Code, स्कैन करो-विरोध दर्ज कराओ: AIMPLB ने धमकी देकर कहा- कभी लागू नहीं होने देंगे समान नागरिक संहिता

देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने को लेकर कुछ मुस्लिम संगठन विरोध कर रहे हैं। इसका विरोध करने के लिए अब तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। बरेली में मस्जिद के बाहर Bar Code लगाया गया है। इसे स्कैन करके UCC के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया जा सकता है। दो दिन पहले मुंबई से भी ऐसी ही खबर आई थी।

उत्तर प्रदेश के बरेली में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के कार्यकर्ताओं ने मस्जिद के बाहर QR कोड लगाया है। इसे लगाने का उद्देश्य है कि मस्जिद में नमाज अता करने आने वाले मुस्लिम इसे मोबाइल से स्कैन कर UCC पर अपना विरोध दर्ज करा सकें। जमीयत ने कहा है कि UCC शरीयत के खिलाफ है। इसलिए मुस्लिम इसका विरोध करते हैं।

समान नागरिक संहिता का सिर्फ जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने ही विरोध नहीं कर रहा है, बल्कि अधिकांश इस्लामी संगठन इसके खिलाफ हैं। मुस्लिमों के संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board- AIMPLB) ने को धमकी देते हुए यहाँ तक कहा है कि वह देश में UCC को लागू नहीं होने देगा।

बरेली की मस्जिद में नमाज पढ़ने आए मुस्लिमों ने बताया कि समान नागरिक संहिता इस्लामी कानून शरीयत के खिलाफ है। मुस्लिम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे, क्योंकि आजादी से पहले ही मुस्लिमों को कुछ नियम-कानून मिले हुए हैं। मुस्लिम उन्हीं नियमों का पालन करते हैं।

एक नमाजी ने कहा कि UCC से मुस्लिम ही नहीं, बल्कि बहुत-सी जातियाँ प्रभावित होंगी। यह गलत है। हिंदू कानून अलग है। जैन कानून अलग है। इसी तरीके से मुस्लिम भी अपने नियमों का पालन करते हैं। समान नागरिक संहिता को कोई भी मुस्लिम बर्दाश्त नहीं करेगा।

गौरतलब है कि इससे पहले लखनऊ और मुंबई में समान नागरिक संहिता के खिलाफ मस्जिदों के बाहर बार कोड लगाए गए थे। मुंबई शहर के मलाड इलाके के पठानवाड़ी में स्थित नूरानी मस्जिद में UCC का विरोध करने के लिए बार कोड लगाया गया है।

इसकी सूचना मिलते ही इलाके की पुलिस नूरानी मस्जिद पहुँची थी और मस्जिद से जुड़े लोगों को थाने बुलाया था। थाने में उनसे पूछताछ की गई थी। इस क्रम में पूर्व नगर सेवक अहमद जमाल ने बताया कि मुस्लिमों को समान नागरिक संहिता मंजूर नहीं है।

बताते चलें कि AIMPLB और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अलावा, इत्तेहाद मिल्लत काउंसिल (IMC) के प्रमुख मौलाना तौकीर रजा और ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन ने भी UCC का विरोध किया है। रजा ने कहा कि UCC ड्राफ्ट आने के बाद आगे की रणनीति बनाई जाएगी। UCC से केवल मुस्लिम ही नहीं, 220 जनजातियाँ भी प्रभावित होंगी।

‘UCC से एक धर्म के रीति-रिवाज दूसरे पर थोपे जाएँगे’: मेघालय के कैथोलिक चर्च ने चिट्ठी लिख जताई आपत्ति, मुस्लिम संगठन भी कर रहे विरोध

देश में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code- UCC) को लेकर जारी बहस के बीच नॉर्थ-ईस्ट के एक प्रभावशाली चर्च ने इसका विरोध किया है। मेघालय की राजधानी शिलॉन्ग स्थित कैथोलिक चर्च ने विधि आयोग (Law Commission) को चिट्ठी लिखकर UCC पर गंभीर आपत्ति जाहिर की है।

कैथोलिक चर्च, शिलांग ने भी विधि आयोग को लिखी चिट्ठी में आशंका जताई है कि समान नागरिक संहिता उन विशेष अधिकारों एवं प्रावधानों को खत्म कर देगी, जो जनजातीय समुदायों को सशक्त बनाते हैं। चर्च ने सवाल किया, “केंद्र सरकार को UCC लागू करने की क्या जल्दी है?”

देश में समान नागरिक संहिता लागू नहीं करने का आग्रह करते हुए चर्च ने लिखा, “हम संबंधित विभाग और भारत सरकार को दृढ़ता से अनुशंसा करते हैं कि वे हमारे विविधतापूर्ण देश में यूसीसी को लागू न करें।”

कैथोलिक चर्च द्वारा लिखी गई चिट्ठी (साभार: NENow)

उन्होंने कहा कि राज्य के लोग अपने रीति-रिवाजों, परंपराओं और मान्यताओं का अत्यंत सम्मान करते हैं। समान नागरिक संहिता के जरिए उन्हें विकृत करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। चर्च ने यह भी कहा कि एक धर्म के रीति-रिवाजों को लागू करना संविधान के अनुच्छेद 25 के खिलाफ है, जो देश के सभी धार्मिक समूहों को अपने मामलों का प्रबंधन करने की अनुमति देता है।

पत्र में यह भी कहा गया है कि अनुच्छेद 341 और 342 के साथ-साथ भारत के संविधान की छठी अनुसूची देश के जनजातीय समुदाय को विशेष अधिकार प्रदान करती है। समान नागरिक संहिता जनजातीय समुदायों के सदस्यों को दिए गए विशेष अधिकारों को खत्म कर देगा।

बताते चलें कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पहले नागालैंड सरकार को आश्वासन दिया था कि केंद्र ईसाई समुदाय और कुछ जनजातीय क्षेत्रों को समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर करने पर विचार कर रहा है। नागालैंड की सरकार ने भी इसकी घोषणा भी की।

नागालैंड सरकार के प्रवक्ता और मंत्री केजी केन्ये ने पिछले महीने कहा था, “अमित शाह ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि केंद्र 22वें विधि आयोग के दायरे से ईसाइयों और कुछ जनजातीय क्षेत्रों को छूट देने पर विचार कर रहा है।” UCC का सबसे कड़ा विरोध मेघालय, मिजोरम और नागालैंड से हुआ है। ये राज्य ईसाई बहुल हैं।

समान नागरिक संहिता का ईसाई संगठन ही नहीं, बल्कि मुस्लिम संगठन भी खुलकर कर रह हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने तो यहाँ तक कहा है कि भारत में समान नागरिक संहिता की ज़रूरत नहीं है। विधि आयोग की कार्रवाई देश के संसाधनों की बर्बादी है।

AIMPLB ने जनजातीय समाज के अधिकारों को ढाल बनाते हुए कहा कि इससे उन्हें मिले विशेष अधिकार खत्म हो जाएँगे। बोर्ड ने यह भी कहा कि मुस्लिमों के कानून कुरान से लिए गए हैं, जिसे काटने की इजाजत किसी मुस्लिम को भी नहीं है तो सरकार कैसे इसमें हस्तक्षेप कर सकती है। बोर्ड ने इस मामले को लेकर देश में दंगा भड़कने की भी धमकी दे दी।

भगवान सूर्य से जुड़े मंदिर में 3000 साल पुरानी सुरंग: पेरू की चाविन संस्कृति उन्नत कला के लिए प्रसिद्ध, यूनेस्को की सूची में शामिल

दक्षिण अमेरिकी देश पेरू के पुरातत्वविदों ने एक प्राचीन मंदिर में करीब 3000 साल पुरानी सुरंग की खोज की है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि यह सुरंग प्राचीन चाविन संस्कृति से जुड़े मंदिर के अन्य कमरों की ओर जाती है। इस सुरंग में 17 किलोग्राम का सिरेमिक का एक टुकड़ा मिला है। इस टुकड़े में कोंडोर पक्षी का सिर और पंख बना हुआ है। इसलिए इसे ‘कॉन्डर्स पैसेजवे’ कहा जा रहा है।

चाविन संस्कृति से जुड़ी सुरंग मंदिर के दक्षिणी हिस्से में मिली है। पुरातत्वविदों का कहना है कि यह सुरंग काफी कमजोर है। इसलिए इसे बंद कर दिया गया था। इस सुरंग में चाविन संस्कृति के शुरुआती दिनों की झलक दिखाई देती है।

यह सुरंग पेरू में हुआरी प्रांत के चाविन जिले में स्थित चाविन डी हुआनतार इलाके में मिली है। यह इलाका प्राचीन चाविन संस्कृति के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक है। यही कारण है कि चाविन डी हुआनतार को यूनेस्को ने साल 1985 में पुरातात्विक स्थलों की सूची में शामिल किया था।

पुरातत्वविदों का मानना है कि इस इलाके का निर्माण 1500 से 500 ईसा पूर्व में हुआ था। चाविन संस्कृति अपनी उन्नत कला के लिए जानी जाती है। इस संस्कृति से जुड़े प्राप्त अवशेषों में आम तौर पर पक्षियों और बिल्लों के चित्र बने होते हैं।

चाविन संस्कृति एक ऐसी संस्कृति थी, जिसके लोग एक स्थान पर रह कर खेती करते हुए जीवन-यापन करते थे। ऐसा माना जाता है कि पेरू में इंका साम्राज्य के सत्ता में आने से 2000 साल से कहीं अधिक पहले चाविन लोग यहाँ रहते थे।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के पुरातत्वविद जॉन रिक ने रॉयटर्स से हुई बातचीत में कहा है कि मई 2022 में इस सुरंग का दरवाजा खोला गया था। उस दौरान यहाँ करीब 17 किलोग्राम का सिरेमिक का बड़ा टुकड़ा मिला था। इस सिरेमिक टुकड़े पर कोंडोर पक्षी का सिर और पंख बना हुआ है। इस सुरंग में एक सिरामिल के कटोरे के साथ यह सब मिला था।

ऐसा माना जाता है कि कोंडोर दुनिया के सबसे बड़े पक्षियों में से एक है। प्राचीन एंडियन संस्कृतियों से जुड़े लोग इस पक्षी को शक्ति और समृद्धि का प्रतीक मानते थे। यही नहीं, कोंडोर को भगवान सूर्य से जुड़ा और ऊपरी दुनिया का राजा भी माना जाता था।

पुरातत्वविद जॉन रिक और उनकी टीम ने ही इस सुरंग की खोज की है। रिक ने यह भी कहा है कि इस मंदिर परिसर के अधिकांश भागों की खुदाई अब तक बाकी है। सुरंग मिलने के बाद यह पाया गया था कि यह बेहद जर्जर अवस्था में है। ऐसे में रोबोटिक कैमरों का इस्तेमाल कर इसकी जाँच की गई।

रणजीत सिंह मुस्लिम परिवार के संपर्क में आने पर बना ‘हिजबुल मुजाहिदीन सद्दाम’, मकसद – लोगों को ट्रक से कुचलना, तिरंगे में अशोक चक्र की जगह इस्लाम का चिह्न

उत्तर प्रदेश के आतंकवाद निरोधी दस्ते (UP ATS) द्वारा 2 जुलाई 2023 को गिरफ्तार किए संदिग्ध सद्दाम शेख और रिजवान से पूछताछ कर रही है। इस बीच सद्दाम शेख को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। सद्दाम का उसका असली नाम रणजीत सिंह है। 20 साल पहले पिता ने पीटा तो रणजीत भागकर मुंबई चला गया और धर्मांतरण कर सद्दाम शेख बन गया।

सद्दाम उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के तरबगंज का रहने वाला है। चोरी करने के कारण 20 साल पहले उसके पिता ने उसकी पिटाई कर दी थी। इसके बाद परिवार से गुस्सा होकर रणजीत मुंबई भाग गया था। वहाँ वह एक मुस्लिम परिवार के संपर्क में आया। मुस्लिम परिवार ने उसका ब्रेनवॉश करने के बाद एक मौलाना से धर्म परिवर्तन कराकर उसे सद्दाम शेख नाम दे दिया।

सद्दाम शेख बनने के बाद रणजीत बेंगलुरु की एक कंपनी में ट्रक ड्राइवर के रूप में काम करने लगा। इस बीच वह कट्टरपंथियों के संपर्क में आकर खुद कट्टरपंथी बन गया और साल 2020 में वह आतंकी संगठन अल कायदा से जुड़ गया। इस बीच उसे पता चला कि उसकी बीवी का अवैध संबंध हैं तो उसने पत्नी के प्रेमी और उसके परिवार की हत्या करने की सोची।

उधर, सद्दाम की बीवी रुबीना ने 3 जुलाई को कहा था कि सद्दाम गोंडा का रहने वाला नहीं है। उसे साल 2005 में गुजरात के लालापुरवा में रहने वाला राकेश लेकर आया था। उसे गाँव में जमीन दिलाई थी और फिर इसके बाद 2010 में गांव के पूर्व प्रधान के रेशम फार्म में काम करने वाले खान ने उसका निकाह करा दिया था। 

रुबीना ने कहा कहा था, “हमने कई बार ये जानने की कोशिश की वो कहाँ का रहने वाला है। इस पर सद्दाम हर बार यही कहता था कि हमारा कोई नहीं है। हमारे माँ-बाप मर चुके हैं। वो हमें बचपन में ही छोड़कर चले गए थे।” रुबीना ने कहा था कि सद्दाम गाँव में बहुत शांत रहता था।

सद्दाम शेख ने एक कॉलिंग ऐप पर अपना नाम हिजबुल मुजाहिदीन सद्दाम रखा था। वह पाकिस्तान और कश्मीर के कई आतंकियों के सीधे संपर्क में भी था। वह फ्रांस-जर्मनी में साल 2016 में हुई आतंकी घटनाओं की तर्ज पर बेंगलुरु में भी लोगों को ट्रकों से कुचल कर मारना चाहता था। सद्दाम ट्रक को किसी धार्मिक आयोजन में घुसाना चाहता था। इसके लिए वह वीडियो देखा करता था।

सद्दाम किस हद तक कट्टरपंथी बन चुका था, इसका अंदाजा उसकी सोशल मीडिया पोस्ट से पता चलता है। उसने अपनी पोस्ट में लिखा था, “संविधान में बदलाव को लेकर मुस्लिमों को जागना होगा। जिहाद हमारे खून में है। कुर्बानी से नहीं डरेंगे। सरकार मुस्लिमों पर ज्यादती करती है। बाबरी मस्जिद के फैसले से नाराज हूँ। बदले की चाहत है। ओसामा बिन लादेन और बुरहान वानी मेरे आदर्श हैं।”

सद्दाम तिरंगे में स्थित अशोक चक्र की जगह पर इस्लाम का चिह्न लगाना चाहता था। वह लगातार आपत्तिजनक पोस्ट करता था। इसको लेकर फेसबुक तीन बार उसका अकाउंट बंद कर चुका था। वह ओसामा बिन लादेन, जाकिर मूसा, बुरहान वानी जैसा बनना चाहता था। इतना ही नहीं, वह आतंकी संगठनों से हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी लेना चाहता था।

दूसरा संदिग्ध रिजवान जम्मू के पुंछ का रहने वाला है। वह खुद ही कट्टरपंथी रास्ते पर चल पड़ा और खतरनाक मंसूबों के साथ सोशल मीडिया पर सक्रिय था। उसने सोशल मीडिया पर कई भड़काऊ पोस्ट डाली थी। इसके साथ ही उसने AK-47, जेहाद, शरिया लागू करने से जुड़ी कई पोस्ट की थी।

UP ATS को पता चला है कि आरोपित रिजवान जाकिर मूसा के आतंकी संगठन की शपथ लेकर उसमें शामिल हो चुका था। उसने ने सोशल मीडिया के एक पोस्ट में लिखा था, “जिहाद की राह में फिदा होने के लिए अपनी बारी का इंतजार है।”

‘बंगाल मतलब बाकी देश से अलग, इसे बचाने के लिए राष्ट्रवादी क्रांति जरूरी’: पंचायत चुनाव में हिंसा, समाज, सिस्टम, अर्थव्यवस्था पर स्वप्न दासगुप्ता

पश्चिम बंगाल में हाल ही में पंचायत चुनाव संपन्न हुए, जिसमें भाजपा ने 22.88% वोट शेयर हासिल किया और 10,000 से भी अधिक सीटें हासिल की। ये सब इसके बावजूद हुआ, जब चुनाव में राज्य भर में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। कहीं से बूथ लूटने की खबरें आईं तो कहीं-कहीं भाजपा प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं पर हमले किए गए। कहीं बैलेट बॉक्स को ही आग के हवाले कर दिया गया तो कहीं मतपेटी पर पानी उड़ेल दिया गया।

इन सबके बीच हमने स्वप्न दासगुप्ता से बात की, 2 बार राज्यसभा सांसद रह चुके हैं। शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में काम करने के लिए पद्म भूषण का पुरस्कार पा चुके 67 वर्षीय स्वप्न दासगुप्ता 1990 से ही भाजपा से जुड़े हुए हैं। वो ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी स्थित नफ़ील्ड कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट फेलो भी रहे हैं। उन्होंने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ और ‘इंडिया टुडे’ और ‘द स्टेट्समैन’ जैसे बड़े मीडिया संस्थानों में संपादकीय जिम्मेदारियाँ निभाई हैं।

सवाल: बंगाल में 40 से ज्यादा लोगों की हत्या पंचायत चुनाव में कर दी जाती है। तृणमूल से अलग जिन लोगों ने जीत दर्ज की, उनमें से कुछ डर के कारण असम चले गए। डर के इस माहौल में लोकतंत्र को आप कहाँ देखते हैं? क्या सिर्फ वोटिंग करवाना ही लोकतंत्र है?

जवाब: देखिए, इस बार जो पंचायत चुनाव हुआ है इसमें हिंसा सिर्फ मतदान के दौरान ही नहीं हुई है, बल्कि जिस दिन नामांकन की प्रक्रिया हुई उसी समय से ये शुरू हो गया और अब काउंटिंग के बाद तक भी ये चल रहा है। 50 लोगों की हत्या कर दी गई है। इनमें सभी पार्टियों के लोग हैं – TMC, भाजपा, लेफ्ट और ISF (इंडियन सेक्युलर फ्रंट)।

हिंसा अधिकतर मुस्लिमों के प्रभाव वाले इलाकों में हुई है। इसके पीछे कारण ये है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने मुस्लिमों के सारे वोटों पर कब्ज़ा कर लिया था, 90-95% वोट उन्हें गए थे। तब भाजपा की जो हार हुई, उसका एक प्रधान कारण था – शत-प्रतिशत मुस्लिम ध्रुवीकरण। लेकिन, इस बार मुस्लिम वोटों में एक विभाजन आ गया है, जिस कारण हिंसा की इतनी घटनाएँ हुई हैं।

मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में सबसे ज्यादा हिंसा हुई है। एक साइलेंट इंटिमीडेशन चल रहा है। ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ और ‘Winner Takes All’ वाला लोकतंत्र विरोधी कल्चर आ गया है, जिसे लेफ्ट ने शुरू किया था और TMC इसकी कार्बन कॉपी है।

मार्क्सवादियों और तृणमूल का संगठन अलग है, लेकिन दोनों समान हैं। बस एक फर्क है – CPM का भ्रष्टाचार सीमित था और ये पार्टी कंट्रोल्ड करप्शन था, लेकिन तृणमूल के मामले में ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है। ये राज्य सरकार से लेकर पंचायत स्तर तक, सब मिले हैं और सबका हिस्सा बँटा हुआ है।

असीमित भ्रष्टाटार के कारण केंद्र सरकार की जो योजनाएँ आती हैं और उनके फंड्स आते हैं (मनरेगा, आवास योजना, हर घर जल इत्यादि), इन सबमें चोरी हुई है। इस कारण पश्चिम बंगाल की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गई है और भ्रष्टाचार को ही आय का स्रोत बना दिया गया है। इसी कारण ये जीत के लिए इतने बेचैन रहते हैं, ताकि 5 वर्षों के लिए सब सेट हो जाएँ। इसी कारण, वहाँ भारी सुधार की आवश्यकता है।

सवाल: 2014 में 34 और 2019 में 22 लोकसभा सीट पर तृणमूल की जीत। अब 2024 से पहले पंचायत स्तर पर ऐसी हिंसा भाजपा या किसी भी विपक्ष को बंगाल से साफ करने की रणनीति तो नहीं?

जवाब: इस पंचायत चुनाव का जो परिणाम है, उसके साथ पब्लिक ओपिनियन का क्या संपर्क है – ये चिंतन का विषय है। इतनी लूट हुई है, इतना फ्रॉड हुआ है। ये चुनाव बैलेट बॉक्स से कराया गया था राज्य चुनाव आयोग के जरिए, इतने फर्जी वोट पड़े, हमले हुए हैं और लोग तनाव में थे। इसीलिए, अनुमान लगाना मुश्किल है। फिर भी, लोकसभा के चुनाव में इसका असर जरूर देखने को मिलने वाला है।

उस समय (लोकसभा के चुनाव में) TMC के भ्रष्टाचार का असर नहीं पड़ता, क्योंकि राज्य में सांसद की उतनी शक्ति नहीं होती और दिल्ली के लिए वोट दिए जाते हैं। ये फ्लेक्सिबल होता है, इसीलिए विधानसभा चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस वोट देने वाले भी लोकसभा चुनाव में भाजपा को देते हैं।

राज्य स्तर पर भाजपा की एक कमजोरी ये है कि अब तक संगठन मजबूत नहीं है। संगठन में बहुत कमजोरियाँ हैं। 3 महीने पहले अगर कॉन्फिडेंस बनाने के लिए केंद्रीय बलों को लाया जा सकता है और चुनाव आयोग 8-10 से लेकर जितने भी चरण में चुनाव कराए, हर पोलिंग बूथ पर सुरक्षाबल सुनिश्चित हो, तब आप देखेंगे कि पंचायत चुनाव से लोकसभा का चुनाव एकदम अलग होगा।

सवाल: ममता बनर्जी की राजनीति से अलग बंगाल के समाज पर आपकी राय क्या है? लंबे समय तक वामपंथी सत्ता के कारण हिंसा की राजनीति या “सत्ता बंदूक की नाल से निकलती है” जैसी बात आम समाज में भी घर कर गई है?

जवाब: 2 चीजें हैं। पहला, राजनीतिक प्रभाव। वामपंथियों के संघर्ष में हिंसा की संस्कृति रही है। ये समाज में भी घुस जाता है। वामपंथी तकनीक से ही TMC ने वामपंथियों को हराया। ये प्रभाव समाज में रह गया।

पश्चिम बंगाल स्वाधीनता के समय नंबर एक या दो राज्य था, अब समय बीतते-बीतते 17-18 नंबर पर पहुँच गया और ओडिशा भी आगे निकल गया। असम भी कुछ दिनों में आगे निकल जाएगा। यहाँ कोई विकास नहीं हो रहा है, कोई रोजगार नहीं पैदा हो रहा। व्यवसायी लोग टोलबाजी से परेशान हैं, जिसे ‘Illegal Extraction’ कह लीजिए। पश्चिम बंगाल में भ्रष्टाचार का जो आलम है, नेताओं के बिस्तर से रुपए निकलने की घटनाएँ सामने आईं।

कहने का मतलब है कि अर्थव्यवस्था के बर्बाद हो जाने के कारण भ्रष्टाचार हावी है और जिसे जहाँ से मिल रहा है, वो लूट रहा है। इसके साथ हिंसा भी जुड़ गई है, इसका हिस्सा बन गई है। सामाजिक व्यवस्था ऐसी हो गई है कि जो पढ़े-लिखे और प्रतिभावान लोग हैं, वो वन-वे टिकट लेकर देश के महानगरों या विदेश में चले जाते हैं, यहाँ नहीं रुकते।

पलायन की समस्या के कारण कोलकाता में औसत उम्र बाकी नगरों से ज्यादा है। इसका कारण है कि जिनकी रियायरमेंट की उम्र हो गई है या जो रिटायर हो गए हैं, वहीं बंगाल में बचे हैं। जो प्रोडक्टिव जनरेशन है, युवा है, वो यहाँ नहीं ठहरते हैं। इसीलिए, पश्चिम बंगाल माइग्रेंट लेबर में आजकल नंबर वन हो गया है।

सवाल: बिहार ने कभी चुनावी हिंसा झेला, बहुत भयावह और बड़े स्तर पर। वहाँ जाति का समीकरण था, अगड़ा-पिछड़ा था, जमींदार-मजदूर था। फिर सब खत्म हो गया। बंगाल में चुनावी हिंसा के सामाजिक कारण क्या हैं? और यह खत्म क्यों नहीं हो रहे?

जवाब: पहले हिंसा होती थी तो लोग कहते थे कि बिहार की तरफ हो रहा है। बिहार देश की हर सड़ी हुई समस्या का प्रतीक बन गया था। यह हाल लगभग 15 साल पहले तक था। लेकिन आजकल बिहार में थोड़ी-बहुत हिंसा होती है, बड़े स्तर पर वैसा कुछ नहीं होता। पहले MCC और रणवीर सेना जैसे संगठनों की हिंसा की खबरें आती थीं।

बिहार में बदलाव हुआ है। बिहार आर्थिक रिकवरी की ओर बढ़ रहा है। बहुत बाकी है वहाँ करना-होना लेकिन थोड़ा-थोड़ा कर रहा है, जबकि पश्चिम बंगाल पीछे जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था बर्बाद हो गई है, जिसकी शुरुआत लेफ्ट ने ही की थी।

बंगाल के सामाजिक पतन के लिए एक और बड़ी वजह है। यहाँ प्रादेशिकता की मानसिकता आ गई है, जो बंगाल को बाकी देश से अलग समझते हैं। यानी, एक इमोशनल अलगाववाद की भावना घर कर गई है। इसी कारण अन्य राज्यों से आने वालों को ‘बाहरी’ कहा जाता है। पहले तो कई जगहों से लोग बंगाल में आते थे, यूपी-बिहार के लोग यहाँ जीवन का हिस्सा बन गए और इनमें से कई बंगाली बोलते हैं तो कई नहीं भी बोलते हैं।

बिहार से यहाँ हजारों मजदूर, काम करने वाले, छोटे-बड़े व्यवसायी आए थे। अब सब खत्म हो रहा है। पुराने संपर्क हैं, लेकिन बंगाल का एक प्रभाव जो झारखंड वगैरह में पूरा था, मधुपुर, देवघर या भागलपुर तक उसका असर था। अब कुछ है ही नहीं।

पश्चिम बंगाल के लोगों को इस वास्तविकता को स्वीकार करना पड़ेगा, जो पूरी तरह नीचे जा रहे हैं – सांस्कृतिक रूप से, राजनीतिक रूप से और आर्थिक रूप से। राजनातिक प्रभाव पश्चिम बंगाल का कुछ है ही नहीं। प्रणब मुखर्जी थे लेकिन उनकी बंगाल से ज्यादा दिल्ली में चलती थी। पश्चिम बंगाल ने खुद को लंबे समय से मुख्यधारा से अलग कर रखा है, जिसका अब असर दिख रहा है।

सवाल: समाज से अलग अब बात सिस्टम की, सरकारी तंत्र की, पुलिस की। बंगाल से लगभग हर हफ्ते, 2 हफ्ते पर – बम बनाते समय विस्फोट, झोले में मिला क्रूड बम – जैसी खबरें हम देखते हैं। अगर यह इतना आम हो गया है तो क्या वहाँ पुलिस रिफॉर्म्स की जरूरत नहीं?

जवाब: पुलिस रिफॉर्म्स से पहले पुलिस रिक्रूटमेंट को सुधारना होगा। असली पुलिस से ज्यादा वहाँ सिविक पुलिस की भर्ती कर ली गई है। जिस तरह के प्रोफेशनल पुलिस की भर्ती की जानी थी, वो नहीं की गई। वो फंड्स की कमी को इसकी वजह बता रहे। हकीकत में पुलिस व्यवस्था का पूरा का पूरा राजनीतिकरण कर दिया गया है।

इस बार पंचायत चुनाव में जो बूथ लूटे गए हैं, इसमें पुलिस ने मदद की है। अदालतों में अधिकतर शिकायतें पुलिस के खिलाफ हैं। पुलिस ने हिंसा में हिस्सा लिया है। पुलिस रिफॉर्म से ज्यादा पश्चिम बंगाल में इन्हें (पूरे पुलिस विभाग को) रीकंस्ट्रक्ट करने की जरूरत है।

पहले अच्छी पुलिस फ़ोर्स थी, लेकिन पूरा बर्बाद कर दिया गया। आज भी कोलकाता की पुलिस बाकी बंगाल की पुलिस से अच्छी है। पश्चिम बंगाल की शासन व्यवस्था ध्वस्त हो गई है, शासन प्रणाली की संस्कृति बर्बाद हो गई है।

मुझे लगता है कि बंगाल को बचाने के लिए एक अलग प्रकार की क्रांति की ज़रूरत है – रेड रेवोलुशन या तृणमूल रेवोलुशन नहीं, राष्ट्रवादी क्रांति की जरूरत है। बंगाली संस्कृति का सभी सम्मान करते हैं, लेकिन वो भारत से अलग नहीं है बल्कि भारत को समृद्ध करता है। आप हर जगह जाकर ‘हमारा है, हमारा है’ कहेंगे तो कुछ नहीं होगा।

सवाल: आखिरी सवाल पार्टी के कार्यकर्ताओं को लेकर, चाहे वो किसी भी पार्टी के हों। क्योंकि चुनावी हिंसा का सबसे पहला और मारक असर इन्हीं पर पड़ता है। लंबे समय तक वामपंथी सत्ता और विचार का यह प्रभाव कि – “पार्टी ही सब कुछ, पार्टी के लिए मारना या मरना” – क्या यह दूसरी राजनीतिक पार्टियों में भी घर कर गई है? क्योंकि सत्ता परिवर्तन से बंगाल में चुनावी हिंसा के पैटर्न में कोई बदलाव नहीं दिख रहा।

जवाब: आप हिंदी बेल्ट में जाएँगे तो किसी पॉलिटिकल वर्कर के बारे में कहा जाता है कि वो ‘राजनीति’ करता है। जबकि, पश्चिम बंगाल में कहा जाता है कि ‘पार्टी कोर छी (वो पार्टी करता है)।’ पार्टी कौन सी? कोई सी भी लेकिन वहाँ महत्व पार्टी का ही है।

‘राजनीति’ से अलग ‘पार्टी’ वाले ट्रेंड को CPM ने शुरू किया था और TMC ने भी यही किया। हालत यह है कि आप जो भी करो, आपको पार्टी में आना पड़ेगा। हाल के दिनों में तृणमूल ने इस पार्टी कल्चर को भी बढ़ा दिया है।

पहले तृणमूल में सेंट्रलाइज्ड सिस्टम था, सिंगल विंडो क्लियरेंस था, लेकिन अब अलग-अलग स्तरों पर तृणमूल के भीतर कई समूह बन गए हैं। सब कुछ पार्टी ही बन गई है, पार्टी ही माई-बाप है। ये जो मानसिकता है, ये सभी पार्टियों में घर कर गई है।

स्वप्न दासगुप्ता के बारे में बता दें कि उन्होंने सन् 1975 में दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी। लंदन स्थित SOAS यूनिवर्सिटी से उन्होंने Ph.D की। उस जमाने में उन्होंने पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले में विभाजन और भेदभाव वाली राजनीति पर गहरा अध्ययन कर के थीसिस लिखी थी। वो JNU में विजिटिंग ऑनररी प्रोफेसर भी रहे हैं। उन्होंने ‘Awakening Bharat Mata: The Political Beliefs of the Indian Right’ नामक पुस्तक भी लिखी है।

PFI के जिन कट्टरपंथियों ने काटा था केरल में प्रोफेसर का हाथ, उन्हें 13 साल बाद मिली उम्रकैद की सजा: 3 दोषियों को सिर्फ 3 साल की जेल

केरल के एर्नाकुलम में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के ट्रायल कोर्ट ने साल 2010 में एक प्रोफेसर टीजे जोसेफ की हथेली काटकर हत्या के प्रयास के मामले में दोषी ठहराए गए छह पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के इस्लामी कट्टरपंथियों में से तीन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने गुरुवार (13 जुलाई 2023) को अपना फैसला सुनाते हुए सजील, नजीब और एमके नजर को उम्रकैद की सजा के साथ-साथ 50,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया।

केस में दोषी ठहराए गए अन्य तीन का नाम एमके नौशा, पीपी मोइदीनकुनु और पीएम अयूब हैं। उन्हें तीन वर्ष कारावास की सजा सुनाई गई। अदालत ने वसूल की गई जुर्माना राशि में से पीड़िता को 4,00,000 रुपए का मुआवजा देने का भी आदेश दिया।

इससे पहले कोर्ट ने सभी छह आरोपितो को भारतीय दंड संहिता, गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था। उन्हें मजहब के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और आतंकवादी कृत्यों को अंजाम देने का दोषी पाया गया था।

इनके अलावा राष्ट्रीय जाँच एजेंसी अभी भी चार्जशीट में उल्लेखित नाम सवाद की तलाश कर रही है। जो कि प्रोफेसर पर हुए बर्बर हमले में शामिल था और पीएफआई का सदस्य भी था।

बता दें कि टीजे जोसेफ के ऊपर हमला 4 जुलाई 2010 को दिनदहाड़े हुआ था। घटना में उनकी हथेली काट दी गई थी। कट्टरपंथियों ने ये हमला एक प्रश्न-पत्र में पूछे गए सवाल के बाद किया था। प्रोफेसर उस दिन चर्च से लौट रहे थे जब उनके ऊपर अटैक हुआ। साल 2011 में पुलिस ने 27 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी। बाद में 20 लोग गिरफ्तार हुए और 2015 में 13 लोगों को दोषी ठहराया गया।