Home Blog Page 1714

PM मोदी को मिला मिस्र का सर्वोच्च राजकीय सम्मान: राष्ट्रपति अब्देल फतह ने ‘ऑर्डर ऑफ द नील’ से किया सम्मानित, जानें क्या है इसकी खासियत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मिस्र के सर्वोच्च राजकीय सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द नील’ से सम्मानित किया गया। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी ने उन्हें इस सम्मान से नवाजा। इससे पहले पीएम मोदी ने राजधानी काहिरा में बनी हजार साल पुरानी अल-हकीम मस्जिद का दौरा किया था।

क्या है ‘ऑर्डर ऑफ द नील’

‘ऑर्डर ऑफ द नील’ सम्मान की स्थापना साल 1915 में मिस्र के सुल्तान हुसैन कामेल ने की थी। यह सम्मान मिस्र के लिए उपयोगी सेवा प्रदान करने वाले व्यक्तियों को दिया जाता है। साल 1953 में राजशाही समाप्त होने से पहले भी यह सम्मान सबसे बड़े सम्मानों में से एक था। इसके बाद साल 1953 में मिस्र के गणतंत्र बनने के बाद ‘ऑर्डर ऑफ द नील’ को मिस्र के सर्वोच्च राजकीय सम्मान के रूप में दिया जाने लगा।

‘ऑर्डर ऑफ द नील’ शुद्ध सोने से बना एक हेक्सागोनल पेंडेंट होता है। इसमें सोने के तीन वर्गाकार ग्रुप होते हैं। इन ग्रुप्स पर फैरोनिक के प्रतीक गढ़े होते हैं। पहले ग्रुप में बुराइयों के खिलाफ राज्य की रक्षा करने का संदेश होता है। दूसरा ग्रुप नील नदी द्वारा लाई गई समृद्धि और खुशी का संदेश देता है। वहीं तीसरा ग्रुप धनार्जन और शांति का संदेश देता है। इस पेंडेंट को फैरोनिक शैली के फूलों तथा फ़िरोज़ा और रूबी रत्नों से सजाया जाता है। पेंडेंट के बीच में, नील नदी को दर्शाने वाला एक उभरा हुआ प्रतीक बना होता है।

मिस्र की दो दिवसीय यात्रा पर गए प्रधानमंत्री जब अल-हकीम मस्जिद गए तो वहाँ बोहरा समुदाय के लोग पहले से ही उपस्थित है। बोहरा समुदाय के लोग इस मस्जिद का जीर्णोद्धार करा रहे हैं और इसके साथ ही इसके रख-रखाव का जिम्मा भी इन्हीं लोगों पर है। भारत से भी इस मस्जिद के लिए बहुत मदद मिलती है।

11वीं सदी में बने अल-हकीम मस्जिद में लोगों के साथ बातचीत और गले मिलते हुए पीएम मोदी का वीडियो सामने आया है। इसमें प्रधानमंत्री मुस्कुराते नजर आ रहे हैं। इस दौरान बोहरा समुदाय के लोगों ने उन्हें मस्जिद की तस्वीर भी उपहार में दिया।

काहिरा स्थित इस ऐतिहासिक मस्जिद का नाम 16वें फातिमिद खलीफा अल-हकीम (985-1021) के नाम पर रखा गया है। मस्जिद का निर्माण मूल रूप से अल-हकीम के पिता खलीफा अल-अजीज ने 10वीं शताब्दी के अंत में शुरू कराया था, जिसे 1013 में पूरा किया गया था।

हेलियोपोलिस वॉर मेमोरियल

पीएम नरेंद्र मोदी हेलियोपोलिस वॉर मेमोरियल जाकर वीरगति प्राप्त किए लगभग 4000 भारती जवानों को श्रद्धांजलि दी। हेलियोपोलिस कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव सीमेटरी (पोर्ट ट्वेफिक) उन भारतीय जवानों की याद में बनाया गया है, जिन्होंने पहले विश्व युद्ध के दौरान मिस्र और फिलिस्तीन में मित्र देशों की सेनाओं की तरफ से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

बताते चलें कि 1914 से 1919 से चले प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने 11 लाख भारतीय जवानों को लड़ने के लिए भेजा था। इनमें से 74,000 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इन भारतीय जवानों को फ्रांस, ग्रीस, उत्तरी अफ्रिका, मिस्र, फिलिस्तीन और ईराक में दफना दिया गया था। इसके अलावा 70,000 भारतीय जवान अपाहिज होकर वापस लौटे थे।

इस युद्ध में भारतीय जवानों को 9,200 से अधिक वीरता पुरस्कार मिले थे, जिनमें ब्रिटिश सेना का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस भी शामिल थे। इस युद्ध ने उत्कृष्ट पराक्रम दिखाने के लिए 11 भारतीयों को विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया था। इन जवानों को ब्रिटिश सेना की तरफ से महज 15 रुपए महीना वेतन मिलता था।

‘वो सिख था, इसीलिए हमने मार डाला’: पाकिस्तान में कारोबारी की हत्या, 2 दिनों में सिख समुदाय पर दूसरा ऐसा हमला

पाकिस्तान के पेशावर के रशीदगढ़ी बाजार में एक सिख व्यापारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। घटना रविवार (24 जून 2023) की है। मृतक की पहचान 35 वर्षीय मनमोहन सिंह के तौर पर हुई है। पुलिस मामले में अपनी जाँच कर रही है। प्रारंभिक पड़ताल में सामने आया है कि ये एक टारगेट किलिंग है।

पेशावर के स्थानीय पुलिस अधिकारी ने बताया सिंह को गोली तब मारी गई जब वो घर लौट रहे थे। कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना को अंजाम इस्लामिक स्टेट समूह द्वारा दिया गया है। ISKP (इस्लामिक स्टेट खोरासन प्रांत) ने मनमोहन सिंह की हत्या को लेकर कहा कि वो बहुदेववादी सिख संप्रदाय का अनुयायी था इसलिए उसे मारा गया।

बताया जा रहा है कि इस घटना से पहले पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी शहर में भी एक सिख को मारा गया है। उनका नाम तरलोक सिंह है। उन्हें भी गोली मारी गई थी और हमलावर तुरंत वहाँ से फरार हो गए थे।

बता दें कि पाकिस्तान में इस साल ये तीसरे सिख की हत्या का मामला सामने आया है। इससे पहले पिछले महीने लाहौर में सरदार सिंह को गोली मारी गई थी। उससे पहले अप्रैल में पेशावर में ही दयाल सिंह को मौत के घाट उतारा गया था। और ये केवल इस वर्ष की बातें नहीं है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का काम काफी समय से हो रहा है। इनमें हिंदू, ईसाई, सिख सब आते हैं।

यही कारण है कि ज्यादातर अल्पसंख्यक अपने घरों को छोड़ पाकिस्तान से भाग रहे हैं। आए दिन वहाँ से रेप, हत्या, अपहरण, धर्मांतरण, जबरन निकाह की खबरें आती हैं। कोई अल्पसंख्यक समुदाय ऐसा नहीं है जिसे पाकिस्तान में कट्टरपंथी निशाना न बनाते हो। कुछ समय पहले वहाँ एक ईसाई लड़के को ईशनिंदा का इल्जाम लगाकर सजा दे दी गई थी।

‘कोई भारतीय नहीं दिख रहा’: ‘The Archies’ की आलोचना होने पर भड़कते हुए बोली ज़ोया अख्तर – ये नस्लवाद है: SRK की बेटी, अमिताभ के नाती और श्रीदेवी की बेटी को कर रही लॉन्च

डायरेक्टर जोया अख्तर (Zoya Akhtar की फिल्म ‘द आर्चीज’ (The Archies) लगातार सुर्खियों में है। हाल ही में फिल्म का टीजर भी रिलीज किया गया। टीजर सामने आने के बाद नेटिजन्स का कहना है कि फिल्म के किरदार वे भारतीय नहीं लग रहे हैं। इसलिए लोग फिल्म को ट्रोल भी कर रहे हैं। हालाँकि अब जोया अख्तर ने ट्रोलर्स की मानसिकता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।

दरअसल, अपनी आगामी फिल्म ‘द आर्चीज’ को लेकर जोया अख्तर ने मिड-डे को एक इंटरव्यू दिया है। इस इंटरव्यू में उनसे फिल्म की ट्रोलिंग को लेकर सवाल किया गया। इसके जवाब में उन्होंने कहा है, “मुझे नहीं पता कि लोग मेरी फ़िल्म को ट्रोल कर रहे हैं। हालाँकि, अब तो लगभग सभी फिल्मों को ट्रोल किया जाता है। कोई भी ट्रोल हो जाता है।” इसके बाद उनसे एक ट्वीट के बारे में सवाल किया गया। (नीचे लगे वीडियो में यह बातचीत 7 मिनट के बाद से सुनी जा सकती है।)

इस ट्वीट में यूजर ने फिल्म को ट्रोल करते हुए लिखा था, “जोया अख्तर ने आखिरकार कुछ ऐसा बनाया है जो हम हमेशा से ही बनना चाहते थे। गोरे लोग।” इस ट्वीट को लेकर जोया अख्तर ने ट्रोलर्स की मानसिकता पर सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा है, “उन्हें ऐसा क्यों लगता है? वे सभी भारतीय हैं। इस तरह के सवाल उठना नस्लवाद है। आप कैसे कह सकते हैं कि गोरे लोग भारतीय नहीं होते हैं।”

जोया ने आगे कहा है, “कोई भी यह कैसे बता सकता है कि भारतीय कैसे दिखते हैं? एक भारतीय ऋतिक रोशन हो सकता है, मिस्टर रजनीकांत हो सकता है, दिलजीत दोसांझ हो सकता है, मैरी कॉम भी हो सकती हैं। यही भारत की खूबसूरती है। बहुत सारे भारतीय ऐसे हैं जो गोरे हैं।”

स्टार किड्स से भरी फिल्म ‘द आर्चीज’ में श्रीदेवी की बेटी खुशी कपूर, अमिताभ बच्चन का नाती अगस्त्य नंदा और शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान लीड रोल में नजर आएँगीं।

बता दें कि ‘द आर्चीज’ एक कॉमिक पर आधारित फिल्म है। यह फिल्म दर्शकों को 1960 के दौर में ले जाएगी। फिल्म की कहानी दोस्तों के एक ग्रुप की है। इसमें जवान दोस्तों के बीच लव लाइफ़ से लेकर हार्टब्रेक और उनके जीवन से जुड़ी कुछ बेहतरीन घटनाओं को दिखाया गया है। फिल्म का टीजर देखने के बाद ही फिल्म काफी हद तक लोगों को समझ आ जाएगी। 

हजार वर्ष पुरानी मस्जिद में PM मोदी का हुआ भव्य स्वागत: इसके पुनर्निर्माण में भारत का भी रहा है योगदान, इजिप्ट में भारतीय जवानों को भी दी श्रद्धांजलि

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार (25 जून 2023) को मिस्र की राजधानी काहिरा (Cairo, Egypt) के अल-हकीम मस्जिद का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने वहां मौजूद बोहरा मुस्लिम समुदाय के लोगों से बातचीत की और उनके गले भी मिले। इसके बाद उन्होंने हेलियोपोलिस वॉर मेमोरियल का भी दौरा किया।

मिस्र की दो दिवसीय यात्रा पर गए प्रधानमंत्री जब अल-हकीम मस्जिद गए तो वहाँ बोहरा समुदाय के लोग पहले से ही उपस्थित है। बोहरा समुदाय के लोग इस मस्जिद का जिर्णोद्धार करा रहे हैं और इसके साथ ही इसके रख-रखाव का जिम्मा भी इन्हीं लोगों पर है। भारत से भी इस मस्जिद के लिए बहुत मदद मिलती है।

11वीं सदी में बने अल-हकीम मस्जिद में लोगों के साथ बातचीत और गले मिलते हुए पीएम मोदी का वीडियो सामने आया है। इसमें प्रधानमंत्री मुस्कुराते नजर आ रहे हैं। इस दौरान बोहरा समुदाय के लोगों ने उन्हें मस्जिद की तस्वीर भी उपहार में दिया।

काहिरा स्थित इस ऐतिहासिक मस्जिद का नाम 16वें फातिमिद खलीफा अल-हकीम (985-1021) के नाम पर रखा गया है। मस्जिद का निर्माण मूल रूप से अल-हकीम के पिता खलीफा अल-अजीज ने 10वीं शताब्दी के अंत में शुरू कराया था, जिसे 1013 में पूरा किया गया था।

काहिरा के बीचों बीच स्थित अल-हकीम मस्जिद शहर की दूसरी सबसे बड़ी और चौथी सबसे पुरानी मस्जिद है। 13,560 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैली इस मस्जिद में चार बड़े हॉल हैं। जहाँ नमाज अता की जाती है, वह सबसे बड़ा हॉल है। यह करीब 4,000 वर्ग मीटर जितना बड़ा है। प्रधानमंत्री मोदी अल-हकीम मस्जिद में लगभग आधा घंटा बिताएँगे और बोहरा समुदाय के लोगों से मुलाकात करेंगे।

दरअसल, इस्लाम मानने वाले 72 फिरकों में बँटे हैं। इनमें से एक बोहरा समुदाय भी है। दाऊदी बोहरा समुदाय शिया मुस्लिम के सदस्य हैं। ये लोग फातिमी इस्लामी तैय्यबी विचारधारा को मानते हैं। बोहरा मुस्लिम की शुरुआत मिस्र में हुई और फिर यमन होते हुए 11वीं सदी में इस समुदाय के कुछ लोग भारत आकर बस गए। गुजरात और महाराष्ट्र में ज्यादा है। बाद में बोहरा मुस्लिमों ने अपने संप्रदाय की गद्दी को यमन से गुजरात के पाटन जिले में मौजूद सिद्धपुर में स्थानांतरित कर दिया।

इस संप्रदाय का एक धर्मगुरु होता है। पिछले करीब 400 सालों से भारत से ही इसका धर्मगुरु चुना जा रहा है। वर्तमान में इस समुदाय के 53वें धर्मगुरु डॉ. सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन हैं। दाऊदी बोहरा समुदाय मुख्य रूप से इमामों के प्रति अपना अकीदा रखता है। दाऊदी बोहरा समुदाय के 21वें और अंतिम इमाम तैयब अबुल कासिम थे। इनके बाद 1132 से आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा शुरू हो गई, जो दाई अल मुतलक सैयदना कहलाते हैं।

हेलियोपोलिस वॉर मेमोरियल

पीएम नरेंद्र मोदी हेलियोपोलिस वॉर मेमोरियल जाकर वीरगति प्राप्त किए लगभग 4000 भारती जवानों को श्रद्धांजलि दी। हेलियोपोलिस कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव सीमेटरी (पोर्ट ट्वेफिक) उन भारतीय जवानों की याद में बनाया गया है, जिन्होंने पहले विश्व युद्ध के दौरान मिस्र और फिलिस्तीन में मित्र देशों की सेनाओं की तरफ से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे।

बताते चलें कि 1914 से 1919 से चले प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने 11 लाख भारतीय जवानों को लड़ने के लिए भेजा था। इनमें से 74,000 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। इन भारतीय जवानों को फ्रांस, ग्रीस, उत्तरी अफ्रिका, मिस्र, फिलिस्तीन और ईराक में दफना दिया गया था। इसके अलावा 70,000 भारतीय जवान अपाहिज होकर वापस लौटे थे।

इस युद्ध में भारतीय जवानों को 9,200 से अधिक वीरता पुरस्कार मिले थे, जिनमें ब्रिटिश सेना का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार विक्टोरिया क्रॉस भी शामिल थे। इस युद्ध ने उत्कृष्ट पराक्रम दिखाने के लिए 11 भारतीयों को विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित किया गया था। इन जवानों को ब्रिटिश सेना की तरफ से महज 15 रुपए महीना वेतन मिलता था।

‘गौरक्षकों’ को लात मारकर जेल में डालो: बकरीद से पहले कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के मंत्री बेटे का कर्नाटक पुलिस को आदेश

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खड़गे ने बकरीद से पहले गौरक्षकों और बजरंग दल के सदस्यों को जेल में डालने की बात कही है। प्रियांक खड़गे ने कहा है कि जो लोग कानून अपने हाथ में लेते हैं और कहते हैं कि वे इस दल से हैं, उन्हें लात मारकर जेल में डाल देना चाहिए।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रियांक खड़गे ने कर्नाटक के कलबुर्गी जिले में पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक की। इस बैठक के दौरान उन्होंने बजरंग दल का नाम लिए बिना धमकी देते हुए कहा है, “जो लोग शॉल ओढ़कर कानून अपने हाथ में लेते हैं और कहते हैं कि वे इन दलों से हैं उन्हें लात मारकर सलाखों के पीछे डाल दीजिए। अगर कोई स्वघोषित नेता है और सांप्रदायिक मुद्दों के नाम पर जहर उगलता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। मैं अनावश्यक सांप्रदायिक दंगे नहीं चाहता।”

प्रियांक खड़गे ने आगे कहा है, “जानवरों को लाने और ले जाने को लेकर कानून बहुत स्पष्ट है। अगर किसी के पास पर्याप्त दस्तावेज हैं तो उसे परेशान नहीं किया जाए। चाहे फिर वह ग्रामीण क्षेत्रों में हो या शहर की सीमा के भीतर।”

पशुपालन मंत्री कर चुके हैं गाय काटने की वकालत..

बता दें कि कर्नाटक के पशुपालन मंत्री के वेंकटेश ने इसी महीने 4 जून को कहा था कि भाजपा सरकार एक विधेयक लाई थी, जिसमें उसने भैंस और भैंसा का वध करने की अनुमति दी थी, लेकिन कहा था कि गोहत्या नहीं होनी चाहिए। भाजपा ने सरकार ने इसकी सजा को भी कड़ा कर दिया था।

उन्होंने आगे कहा था “जब भैंस और भैंसा का वध किया जा सकता है तो गायों का क्यों नहीं? यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है। हम चर्चा करेंगे और फैसला लेंगे। इस सिलसिले में अब तक कोई चर्चा नहीं हुई है।”

वेंकटेश ने कहा कि बूढ़ी गायों की देखभाल करने और उनकी मौत होने पर उन्हें दफनाने में किसानों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने अपना उदाहरण देते हुए कहा कि हाल में उनके फार्म हाउस में एक गाय की मौत हो गई। उस मृत गाय को दफनाने के लिए उन्हें जेसीबी की मदद लेनी पड़ी थी।

मणिपुर में 12 दंगाइयों को करना पड़ा रिहा! 1500 महिलाओं ने जवानों को घेरा, बोली भारतीय सेना – महिलाओं की भीड़ पर नहीं किया गया कोई बल प्रयोग

हिंसाग्रस्त मणिपुर की राजधानी इम्फाल में सेना द्वारा 12 उपद्रवियों को रिहा किए जाने की खबर है। इन उपद्रवियों को शनिवार (24 जून, 2023) हिरासत में लिया गया था। बताया जा रहा है कि उपद्रवियों की रिहाई के लिए 1200 से 1500 प्रदर्शनकारियों की भीड़ सड़कों पर उतर आई थी। इन भीड़ का नेतृत्व महिलाएँ कर रहीं थीं। रिहा किए गए सभी उपद्रवी KYKL (यावोल कन्ना लुप) के सदस्य थे। हालाँकि उपदव्रियों के हथियारों को जब्त कर लिया गया है। सेना ने आधिकारिक रूप से यह जानकारी शुक्रवार (24 जून, 2023) को दी है।

अपने आधिकारिक बयान में सेना ने बताया कि ख़ुफ़िया जानकारी के आधार पर 24 जून की सुबह सैन्य बल पूर्वी इंफाल के गाँव इथम पहुँचे थे। यह जगह एंड्रो से 6 किलोमीटर दूर है। इस दौरान सैनिकों ने सघन तलाशी अभियान छेड़ा। इस अभियान के फलस्वरूप KYKL संगठन के 12 सदस्यों को हथियार और गोला बारूद के साथ पकड़ा गया था। इन 1 दर्जन संदिग्धों में स्वयंभू लेफ्टिनेंट कर्नल मोइरांगथेम तम्बा उर्फ उत्तम भी शामिल था जो साल में 2015 में सेना के काफिले पर हुए हमले का मास्टरमाइंड है।

सेना ने आगे बताया कि जैसे ही हिरासत में लिए गए 1 दर्ज उपद्रवियों को ले कर सैन्य बल आगे बढ़ा वैसे ही 1200-1500 की भीड़ ने जवानों को घेर लिया। इस भीड़ में महिलाओं की तादाद अधिक थी। भीड़ किसी भी हालत में इस बात पर तैयार नहीं थी कि पकड़े गए उपद्रवियों को सेना अपने साथ ले जाए। सुरक्षा बलों ने लगातार महिलाओं से हटने की अपील की लेकिन वो बेअसर रही। सेना का कहना है कि इस दौरान महिलाओं के खिलाफ बल प्रयोग नहीं किया गया।

सेना द्वारा जारी बयान में आगे बताया गया है कि महिलाओं की यह भीड़ काफी नाराज थी। ऐसे में भीड़ पर बल प्रयोग करने से मामले की संवेदनशीलता बढ़ जाती। आखिरकार पकड़े गए सभी 12 उपद्रवियों को एक स्थानीय नेता को सौंपने पर सहमति बन गई। सभी उपद्रवियों को एक स्थानीय नेता के हवाले कर दिया गया। हालाँकि, इनके पास से बरामद हथियारों को जब्त कर लिया गया। इसमें से कुछ हथियार विदेशी भी थे। सेना ने इस कदम को अभियान का संचालन करने वाले सैन्य अधिकारी की परिपक्वता और मानवीयता बताया है। साथ ही इस पूरी घटना का CCTV फुटेज भी साझा किया है।

हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में तिरुपति मंदिर: बिहार और जम्मू से लेकर छत्तीसगढ़ और गुजरात तक, देश भर में विराजेंगे विष्णु अवतार वेंकटेश

तिरुमति मंदिर (Tirupati Temple) को संचालित करने वाला विश्व का सबसे धनी मंदिर ट्रस्ट तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) अब हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में एक तिरुपति मंदिर को स्थापित करेगा। आंध्र प्रदेश के तिरुमाला में स्थित तिरुपति मंदिर भगवान वेंकेटेश्वर स्वामी को समर्पित है। वेंकटेश्वर को भगवान विष्णु का रूप माना जाता है। यह मंदिर तिरुपति बालाजी के नाम से प्रसिद्ध है।

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर के जम्मू क्षेत्र में तिरुपति मंदिर का निर्माण किया है। इसका उद्घाटन भी हो गया है। हालाँकि, संपूर्ण मंदिर को बनाने का काम अभी पूरा नहीं हुआ है। निर्माण कार्य लगातार जारी है। इसके अलावा, महाराष्ट्र के नवी मुंबई, गुजरात और छत्तीसगढ़ में भी तिरुपति मंदिर का निर्माण का काम चल रहा है।

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम की स्थापना सन 1933 में हुई थी। उस समय यह ट्रस्ट सिर्फ तीन मंदिरों का प्रबंधन देखता था, जिनमें तिरुमाला का तिरुपति बालाजी मंदिर, तिरुचिनूर का श्री पद्मावती अम्मावरी मंदिर और तिरुपति का श्री गोविंदराजा मंदिर शामिल थे। हालाँकि, अब पूरे देश में भगवान तिरुपति के 58 मंदिर हैं और उनका प्रबंधन यही मंदिर देखता है। इनमें से ज्यादातर मंदिर आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और तेलंगाना में स्थित हैं।

TTD ने सबसे पहले आंध्र प्रदेश में मंदिरों का निर्माण और अधिग्रहण शुरू किया था। उसने अपने प्रबंधन में क्षेत्र के बाहर का जो पहला मंदिर था, वह था उत्तराखंड का बालाजी मंदिर। इस मंदिर का प्रबंधन TTD ने सन 1969 में अपने हाथ में लिया था। इसके बाद सन 2019 में कन्याकुमारी में भगवान वेंकटेश्वर मंदिर की स्थापना की।

यह ट्रस्ट अभी तीन और मंदिरों के निर्माण पर विचार कर रहा है। इनमें से एक गुजरात के गाँधीनगर, दूसरा छत्तसीगढ़ के रायपुर में और तीसरा बिहार में। बिहार में किस जगह पर बालाजी का मंदिर बनेगा, यह अभी तय नहीं हुआ है। इसको लेकर नीतीश कुमार की सरकार से पहले चरण की चर्चा चल रही है।

TTD ने हाल ही में नवी मुंबई में तिरुपति बालाजी मंदिर का शिलान्यास किया है। इसके लिए महाराष्ट्र सरकार ने लगभग 600 करोड़ रुपए की मूल्य की 10 एकड़ जमीन शहर के प्रमुख एरिया में आवंटित किया है। इसके निर्माण पर TTD लगभग 70 करोड़ रुपए खर्च करेगा।

अभी 8 जून 2023 को जम्मू में एक मंदिर का उद्घाटन किया गया है। यह मंदिर 62 एकड़ भूमि पर बनाया गया है और इसे बनाने में लगभग 25 करोड़ रुपए की लागत आई है। मंदिर की मूर्तियों का निर्माण ग्रेनाइट से किया गया है। ये मूर्तियाँ आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर से लाई गई हैं। यह मंदिर श्रद्धालुओं के खोल दिया गया है।

जम्मू में बना यह मंदिर आंध्र प्रदेश से बाहर देश का छठा बालाजी मंदिर है। इससे पहले तिरुपति तिरुमाला देवस्थानम हैदराबाद, चेन्नई, कन्याकुमारी, दिल्ली और भुवनेश्वर में बालाजी मंदिर बनवा चुका है। इस मंदिर में वही रीति-रिवाज अपनाए जाएँगे, जैसे तिरुमाला के बालाजी मंदिर में अपनाए जाते हैं।

1 लाख+ लोग गिरफ्तार, 24 घंटों में 6 हजार नसबंदी: आपातकाल का वो ‘काला दौर’ जब लोकतंत्र से हुआ खिलवाड़, कुचली गई हर अभिव्यक्ति

जब हम भारत के स्वातन्त्र्योत्तर इतिहास का अवलोकन करते हैं तो उसमें सर्वसत्तावादी शासन का एक काला अध्याय भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है और इस प्रकार के भावी खतरों के प्रति सचेत करता है। दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी द्वारा 25 जून, 1975 से 21 मार्च, 1977 तक लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र का ‘ब्लैक होल’ है।

यह युग लोकतंत्र के निलंबन, नागरिक स्वतंत्रता के ह्रास और आम लोगों पर अकल्पनीय अत्याचारों के लिए जाना जाता है। आज, हम आपातकाल के दौरान राज्यसत्ता द्वारा किए गए दमन और उत्पीड़न के बरक्स भारतीय जनता द्वारा किए गए प्रतिरोध और संघर्ष को याद करके लोकतंत्र में अपनी आस्था का प्रकटीकरण कर सकते हैं।

आपातकाल का भारत के राजनीतिक संस्थानों पर गहरा दुष्प्रभाव पड़ा क्योंकि इसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ विधायिका और न्यायपालिका के अधिकारों का अतिक्रमण कर लिया था। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक नियंत्रण और संतुलन के संवैधानिक प्रावधानों और संस्थाओं को पंगु बना दिया था।

अनेक राज्य सरकारों को भंग कर दिया गया, और स्थानीय चुनावों को देश भर में निलंबित कर दिया गया। केंद्र सरकार ने इन सबको अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में लेकर अपनी शक्ति को बढ़ाया और जमीनी स्तर पर लोगों की आवाज और प्रतिनिधित्व को समाप्तप्राय कर दिया।

शक्ति के इस संकेंद्रण ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को निष्प्रभावी कर दिया और विधायिका और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बाधित किया। आज्ञाकारी न्यायाधीशों की नियुक्ति, असुविधाजनक न्यायाधीशों के स्थानांतरण, और न्यायिक स्वायत्तता के दमन ने संवैधानिक अधिकारों के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका की भूमिका को अत्यंत सीमित और संदेहास्पद कर दिया।

न्यायपालिका को भय और प्रलोभन से प्रभावित करते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों को बरकरार रखने वाले कई ऐतिहासिक निर्णयों को या तो उलटवा दिया गया या कमजोर करवा दिया गया, जिससे न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास खत्म सा-हो गया।

आपातकाल के दौरान, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में राज्यसत्ता ने जनता पर असीम अत्याचार किए। 140,000 से अधिक व्यक्तियों, जिनमें राजनीतिक विरोधी, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार, लेखक और असहमति व्यक्त करने वाले आम नागरिक शामिल थे, को मनमाने ढंग से गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया गया। नियत प्रक्रिया का उल्लंघन और बंदी प्रत्यक्षीकरण से इनकार रोजनामचा हो गया। सरकार की नीतियों के विरोध को निर्ममता से कुचलने के लिए आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (MISA)  की आड़ में बिना मुकदमे के अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने का रास्ता निकाला गया।

आपातकाल के समय के हिरासत केंद्रों से यातना और दुर्व्यवहार के रौंगटे खड़े करने वाले किस्से सामने आए। शासन को चुनौती देने वालों को शारीरिक हिंसा, यौन उत्पीड़न और मनोवैज्ञानिक यातना झेलनी पड़ी। क्रूरता के इन कृत्यों का उद्देश्य डर पैदा करना और प्रतिरोध की भावना को कुचलना था।

मीडिया सेंसरशिप को आपातकाल के दौरान असंतोष को दबाने के लिए एक शक्तिशाली हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं को बंद होने या सेंसरशिप के लिए मजबूर किया गया। असंख्य पत्रकारों को उत्पीड़न, गिरफ्तारी और धमकी का सामना करना पड़ा। सेंसरशिप की सीमा इतनी ज्यादा थी कि उस अवधि के दौरान एक महत्वपूर्ण सूचना निर्वात पैदा करते हुए बुनियादी समाचार कवरेज भी प्रभावित हुआ।

सरकार ने प्रसारण मीडिया पर अपना नियंत्रण बढ़ाया, अखिल भारतीय रेडियो (AIR) और दूरदर्शन, राष्ट्रीय टेलीविजन नेटवर्क को अपने प्रत्यक्ष नियंत्रण में ले लिया, और अपने प्रोपेगैंडा का प्रसार करने और असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए माध्यम के रूप में उनका उपयोग किया गया।

इन प्लेटफार्मों पर प्रसारित होने वाली सामग्री को कड़ाई से नियंत्रित किया गया था, जिससे स्वतंत्र और आलोचनात्मक पत्रकारिता के लिए कोई जगह नहीं बची थी। लोकतंत्र की आधारशिला, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राज्य नियंत्रण से कुचल दी गई, जनता को निष्पक्ष जानकारी और वैकल्पिक दृष्टिकोण से वंचित कर दिया गया। इसके अलावा, इसने भारत में मीडिया की विश्वसनीयता के लिए लंबे समय तक चलने वाले परिणामों के साथ, सूचना के एक निष्पक्ष स्रोत के रूप में मीडिया में सार्वजनिक विश्वास को मिटा दिया।

आपातकाल में जबरन नसबंदी का एक राज्य प्रायोजित दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण कार्यक्रम भी शुरू किया गया। जनसंख्या नियंत्रण के लिए गरीब और हाशिए के समुदायों के स्त्री-पुरुषों की उनकी सहमति या उचित चिकित्सा देखभाल के बिना ही जबरदस्ती नसबंदी की गई। इस अमानवीय अभियान ने प्रजनन अधिकारों का घोर उल्लंघन किया। उत्तर प्रदेश राज्य में बड़े पैमाने पर जारी नसबंदी अभियान का एक कुख्यात मामला, जहाँ एक ही दिन में 6,000 से अधिक नसबंदी की गई, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शारीरिक अक्षुण्णता की अवहेलना का एक भयावह उदाहरण है। इस नीति ने भारत के सामाजिक ताने-बाने को क्षतिग्रस्त करते हुए जनता को गहरे घाव दिए।

आपातकाल लगाने का भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा। नागरिक स्वतंत्रता और मीडिया सेंसरशिप के दमन के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भारत की व्यापक आलोचना की गई, जिससे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की प्रतिष्ठा धूमिल हुई। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों, मीडिया माध्यमों और सरकारों ने आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों के क्षरण और मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता व्यक्त की।

नतीजतन, एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत की छवि को इस घटना ने गहरा आघात पहुँचाया। इसके अलावा, आपातकाल द्वारा पैदा की गई अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेश में भी गिरावट आई और आर्थिक विकास धीमा हो गया। विदेशी निवेशक और व्यवसायी राजनीतिक स्थिरता और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को लेकर आशंकित हो गए। इससे विदेशी निवेश और व्यापार संबंध प्रभावित हुए। परिणामस्वरूप,  भारत के राजनयिक संबंध और अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी सिमट गए।

इस उथल-पुथल भरे दौर में संविधान और लोकतांत्रिक सिद्धांतों का गंभीर क्षरण हुआ, क्योंकि सत्ता का बेरहमी से दुरुपयोग किया जा रहा था। सत्ता की भूख ने हमारे लोकतंत्र को बनाए रखने वाले स्तंभों की घोर अवहेलना की। इसके अलावा, एक नई संस्कृति का उदय हुआ- जिसकी विशेषता चापलूसी और चाटुकारिता थी। “इंदिरा इज इंडिया” जैसे नारे लगवाए गए, जो दरबारी संस्कृति के प्रतीक और पोषक थे। यह दरबारी संस्कृति आपातकाल की अभूतपूर्व उपलब्धि थी। सत्ता में बैठे लोगों को खुश करने की इच्छा से प्रेरित इस संस्कृति में लोकतंत्र की आत्मा ‘असहमति और अभिव्यक्ति के अधिकार’ के लिए कोई स्थान नहीं होता।

आपातकाल के खिलाफ लड़ाई धार्मिक, क्षेत्रीय, सामाजिक और वैचारिक विभाजनों का अतिक्रमण करते हुए विविध समुदायों  और समूहों  को एक मंच पर लाई। इसने भारतीयों के बीच एकता और एकजुटता की भावना को बढ़ावा दिया, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता को साझा मूल्यों के रूप में संरक्षित करने के लिए संघर्ष को प्रेरित किया। इस व्यापक आधार वाले आंदोलन में सरकार के सर्वसत्तावादी शासन को चुनौती देने की ताकत थी।

मीडिया सेंसरशिप के बावजूद, साहसी पत्रकारों और भूमिगत प्रकाशनों ने सूचनाओं के प्रसार और निरंकुश शासन के खिलाफ जनमत जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन प्रकाशनों ने प्रतिबंधित साहित्य को गुप्त रूप से प्रसारित किया, सरकारी ज्यादतियों को उजागर किया और समाज को वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रदान किया। अपनी जान जोखिम में डालकर ये पत्रकार,लेखक और प्रकाशन प्रतिरोध की भावना को जीवित रखते हुए जनता की जीवन रेखा बन गए।

1977 में हुए आम चुनावों में निरंकुश शासन के खिलाफ लोगों के आक्रोश की अभिव्यक्ति हुई। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और जनता पार्टी गठबंधन सत्ता में आया। यह परिणाम भारतीयों के सामूहिक प्रतिरोध की शक्ति और लोकतंत्र के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का  प्रमाण-पत्र था। 

आपातकाल के दौरान आम लोगों द्वारा झेले गए अत्याचारों के साथ-साथ भारतीय जनता द्वारा प्रदर्शित किए गए अटूट प्रतिरोध ने राष्ट्र की सामूहिक स्मृति को गहराई से प्रभावित किया है। वर्तमान में, भारत एक जीवंत लोकतंत्र के रूप में खड़ा है। फिर भी, यह हमारी प्रमुख जिम्मेदारी है कि हम कड़ी मेहनत से प्राप्त की गई स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सदैव सतर्क और दृढ़ रहें। यह उन सभी लोगों के बलिदान का परिणाम है जिन्होंने आपातकाल का बहादुरी से विरोध किया था। अतीत से सीखे गए मूल्यवान पाठों को संरक्षित करें और यह सुनिश्चित करें कि ऐसे काले दिनों की छाया हमारे देश के भविष्य पर कभी न पड़े।

(लेखक दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में पढ़ाते हैं।)

जब तक सूरज-चाँद रहेगा, औरंगजेब तेरा नाम रहेगा… महाराष्ट्र में असदुद्दीन ओवैसी की सभा में लगे नारे, पुलिस के पास भी पहुँचा वीडियो

महाराष्ट्र में AIMIM अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी की एक रैली में ‘औरंगजेब अमर रहे’ के नारे लगे हैं। पुलिस ने वीडियो की जाँच भी शुरू कर दी है। जब ओवैसी बुलढाणा में लोगों को संबोधित कर रहे थे, उसी दौरान उनके समर्थकों ने औरंगजेब के समर्थन में नारेबाजी शुरू कर दी। हाल ही में महाराष्ट्र में जिस तरह से औरंगजेब के नाम पर जगह-जगह हिंसा हुई थी, उसके बाद एक बार फिर से ये जिन्न सामने आ गया है। कोल्हापुर में औरंगजेब के समर्थन में व्हाट्सएप्प स्टेटस लगाए जाने के बाद विवाद शुरू हुआ था।

जिस सभा में ‘औरंगजेब अमर रहें’ के नारे लगे हैं, वो बुलढाणा में शनिवार (24 जून, 2023) को आयोजित की गई थी। नारेबाजी करने वालों ने ‘जब तक सूरज-चाँद रहेगा, औरंगजेब तेरा नाम रहेगा’ भी चिल्लाया। स्थानीय पुलिस ने बताया है कि इस मामले को लेकर कुछ वीडियो उनके पास आए हैं, जिनकी जाँच की जा रही है। हालाँकि, अब तक किसी की तरफ से शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। पुलिस लीगल ओपिनियन भी ले रही है।

बुलढाणा पुलिस ने कहा है कि शिकायत मिलने के बाद और लीगल ओपिनियन लेते हुए इस मामले पर कार्रवाई की जाएगी। हाल ही में महाराष्ट्र में ऐसे पोस्टर भी देखे गए थे, जिनमें शिवसेना (UTB) के मुखिया उद्धव ठाकरे और ‘बहुजन अघाड़ी’ प्रमुख प्रकाश आंबेडकर के साथ औरंगजेब की तस्वीर लगी हुई थी। बाबासाहब भीमराव आंबेडकर के पोते प्रकाश ने संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) में जाकर औरंगजेब की कब्र पर फूल भी चढ़ाए थे।

जब ये नारे लग रहे थे, तब मंच पर असदुद्दीन ओवैसी के पीछे खड़े नेता भी हँस रहे थे। साथ ही ओवैसी लोगों को शांत कराने के लिए ‘हाँ रहेगा, रहेगा’ कह रहे थे और हाथ के इशारे से उन्हें चुप होने के लिए कह रहे थे। मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा औरंगजेब के समर्थन के कारण कोल्हापुर के अलावा अहमदनगर में भी तनाव पैदा हो गया था। बड़ी संख्या में हिन्दू कार्यकर्ता सड़क पर उतरे थे। ओवैसी और महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बीच जुबानी जंग भी देखने को मिली थी।

गुड्डू मुस्लिम करता था अतीक की बीवी से एकतरफा प्यार: सौतेले बेटे का खुलासा, पुलिस से बोला- मैं अपने अब्बा की हत्या कर देता

उमेश पाल हत्याकांड के मुख्य आरोपित गुड्डू मुस्लिम के सौतेले बेटे आबिद ने नए खुलासे किए हैं। आबिद को पिछले सप्ताह पुलिस ने प्रयागराज में आधे दर्जन जिन्दा बम के साथ पकड़ा था। पूछताछ में आबिद ने बताया कि वह अपने अब्बा गुड्डू मुस्लिम की हत्या करने की फिराक में था। इस नाराजगी की वजह आबिद ने गुड्डू मुस्लिम द्वारा अतीक अहमद की बीवी शाइस्ता परवीन से की जाने वाली मोहब्ब्त को बताया है। आरोप है कि शाइस्ता के चलते गुड्डू मुस्लिम ने अपनी बीवी को धोखा दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस की पूछताछ में गुड्डू मुस्लिम के सौतेले बेटे आबिद ने बताया कि उसके अब्बा के अतीक अहमद के सम्पर्क में रहने की वजह शाइस्ता परवीन थी। बताया गया कि गुड्डू मुस्लिम काफी समय से शाइस्ता को पसंद करता था लेकिन यह मोहब्बत एकतरफा थी। हालाँकि अतीक अहमद के जीवित रहते गुड्डू मुस्लिम ने कभी अपनी चाहत को शाइस्ता के आगे जाहिर नहीं किया था। कुछ समय तक शाइस्ता की तरफ से कोई रिस्पॉस न मिलने पर गुड्डू मुस्लिम प्रयागराज छोड़ कर कहीं और चला गया था।

साल 2012 में गुड्डू फिर लौट कर प्रयागराज वापस आया। यहाँ वह चकिया इलाके में चाँदनी नाम की एक महिला के साथ रहने लगा। अतीक अहमद ने गुड्डू मुस्लिम के लिए चकिया इलाके में 3 मंजिला मकान भी बनवा दिया। गुड्डू ने चाँदनी के पहले पति से जन्मे बेटे आबिद के लिए चिकन शॉप खुलवाई थी जो उमेश पाल मर्डर के बाद बंद हो गई थी। इस बीच गुड्डू अतीक अहमद के लिए काम करता रहा। वर्ष 2017 में जब अतीक अहमद जेल गया तो गुड्डू मुस्लिम ने शाइस्ता के साथ मिल कर उसके आपराधिक साम्राज्य को संभाला। इस दौरान दोनों का मेल-जोल काफी बढ़ गया। यह नजदीकी गुड्डू की बीवी चाँदनी को रास नहीं आई। चाँदनी ने इस नजदीकी का विरोध शुरू किया।

बताया जा रहा है कि खुद को टोकने से नाराज गुड्डू मुस्लिम ने अपनी बीवी चाँदनी की कई बार पिटाई की। यह बात उसके सौतेले बेटे आबिद को अच्छी नहीं लगी। उसने कई बार बीच-बचाव किया और मन मसोस कर रह गया। कुछ समय बाद चाँदनी गुड्डू से अलग रहने लगी। इस वजह से आबिद के अंदर अपने सौतेले अब्बा गुड्डू के प्रति खुन्नस और बढ़ गई थी। इस बीच उमेश पाल हत्याकांड के बाद गुड्डू और शाइस्ता आरोपित किए गए। माना जा रहा है कि शाइस्ता ने पहले साबिर के साथ फरारी काटी फिर वह गुड्डू मुस्लिम के साथ रहने लगी। पुलिस को भी कई इनपुट इन दावों के समर्थन में मिले हैं।

पुलिस को इस बात का भी अंदेशा है कि कड़ी नाकाबंदी के चलते शाइस्ता और गुड्डू आर्थिक तंगी से भी जूझ रहे हैं। इधर गुड्डू के सौतेले बेटे आबिद का कहना है कि उनकी माँ को देखा दिया गया है। आबिद गुड्डू मुस्लिम को अपनी माँ को बेसहारा करने का गुनहगार मानता है। बताया जा रहा है कि आबिद ने पुलिस के आगे यह कबूल किया कि अगर उसे मौका मिलता तो वो गुड्डू मुस्लिम की बम मार कर हत्या कर देता।