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युद्ध के वक्त नूर खान एयरबेस का ईरान ने किया इस्तेमाल: रिपोर्ट से पाकिस्तान के ‘डबल गेम’ का खुलासा, सफाई में कहा- सीजफायर में आया था शिया मुल्क का फौजी विमान

पाकिस्तान का दोहरा चरित्र एक बार फिर दुनिया के सामने आ गया है। मीडिया रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने चुपके से ईरानी सैन्य विमानों को अपने अहम एयरबेस पर रुकने की इजाजत दी। हालाँकि पाकिस्तान ने इसे खारिज करते हुए खबर को ‘भ्रामक और सनसनीखेज’ बताया है और कहा है कि इस कहानी का मकसद क्षेत्रीय स्थिरता और शांति के प्रयासों को कमजोर करना है।

दरअसल पाकिस्तान ईरान के साथ चल रहे इजरायल-अमेरिका युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। उसे ईरान भी शक की नजर से देख रहा है क्योंकि ईरान मानता है कि आसिम मुनीर और शहबाज खान दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के इशारों पर काम कर रहे हैं।

अमेरिका को भी पाकिस्तान पर संदेह है, क्योंकि पाकिस्तान ने भी इस बात को दबे जुबान मान लिया था कि उसके पोर्ट पर ईरानी मिलिट्री एयरक्राफ्ट मौजूद थे। माना जा रहा है कि ऐसा करके पाकिस्तान ने उन ईरानी विमानों को अमेरिकी हमलों से बचाया। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका से भी अपने कूटनीतिक रिश्ते बनाए रखा।

अमेरिकी सीनेटर ने उठाए पाकिस्तान पर सवाल

पाकिस्तानी सफाई के बाद भी अमेरिका के कई अधिकारी उसे शक की नजर से देख रहे हैं। इनलोगों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी चेताया है। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका की समीक्षा करने की माँग की है। उन्होंने कहा कि ईरान का समर्थन किए जाने की रिपोर्ट पाकिस्तान की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

(साभार- एक्स)

अमेरिकी सीनेटर ग्राहम ने इजरायल के संबंध में पाकिस्तानी अधिकारियों के पहले दिए गए बयानों का भी जिक्र किया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर ये रिपोर्ट सही हैं, तो इससे उन्हें हैरानी नहीं होगी।

इस मामले ने ईरान और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत में इस्लामाबाद की भूमिका पर ‘शक’ और बढ़ा दी है। पाकिस्तान ने इन बैठकों में एक निष्पक्ष मध्यस्थ का चोला पहनने की कोशिश की, लेकिन खुद ईरानी जहाज को रुकने की इजाजत देने की स्वीकारोक्ति से फँस गया। अब अमेरिका में सवाल उठ रहे हैं कि युद्ध के दौरान क्या पाकिस्तान चुपके से ईरान का समर्थन कर रहा था।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की सफाई

मंगलवार को बयान जारी कर हालाँकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने उन रिपोर्टों को खारिज करने की कोशिश की, जिनमें दावा किया गया था कि ईरानी सैन्य विमानों को पाकिस्तानी हवाई अड्डों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई थी। हालाँकि, इन आरोपों को खारिज करने के दौरान भी मंत्रालय ने कहा कि युद्ध के वक्त नहीं बल्कि सीजफायर के दौरान ईरानी विमान पाकिस्तान में खड़े थे।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, “ईरानी विमान जो अभी पाकिस्तान में खड़े हैं, वे संघर्ष विराम के दौरान आए थे और उनका किसी भी सैन्य आपात स्थिति या सुरक्षा व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है।”

पाकिस्तान का यह स्पष्टीकरण सीबीएस न्यूज की उस रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान चुपके से ईरानी सैन्य विमानों को अपने हवाई अड्डों का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी थी, ताकि उन्हें संभावित अमेरिकी हमलों से बचाया जा सके।

सीबीएस न्यूज के मुताबिक, दो अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान ईरान का समर्थन किया, जबकि साथ में वह अमेरिका के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की भी कोशिश कर रहा था।

रिपोर्ट में आगे कहा गया कि अप्रैल की शुरुआत में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ सीजफायर की घोषणा की, उस दौरान कई ईरानी विमान पाकिस्तान के नूर खान एयर बेस पर लाए गए।

पाकिस्तान भेजे गए विमानों में कथित तौर पर ईरानी वायु सेना का एक RC-130 टोही विमान भी शामिल था, जो Lockheed C-130 Hercules का एक निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने वाला संस्करण है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन विमानों की मौजूदगी को शांति वार्ता की प्रक्रिया से जुड़े राजनयिक और लॉजिस्टिक समन्वय का हिस्सा बताने की कोशिश की।

मंत्रालय ने कहा, “बातचीत की प्रक्रिया से जुड़े राजनयिक, सुरक्षा टीमों और प्रशासनिक कर्मचारियों की आवाजाही के लिए ईरान और अमेरिका से कई विमान पाकिस्तान आए थे। कुछ विमान और बातचीत में शामिल प्रतिनिधि अगले दौर की उम्मीद में कुछ समय के लिए पाकिस्तान में ही रुके रहे।”

हालाँकि पाकिस्तान के बयान में इस बात पर कुछ नहीं कहा गया है कि यदि यह व्यवस्था केवल प्रशासनिक थी, तो सैन्य टोही विमान वहाँ क्या कर रहे थे। वह एक अत्यधिक सुरक्षित सैन्य ठिकाने पर कैसे मौजूद था।

इससे पहले ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता में कई कंफ्यूजन को लेकर भी कहा जा रहा था कि पाकिस्तान ने ईरान तक अमेरिकी रुख को सही तरह से पहुँचाया या नहीं। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि पाकिस्तान ने ईरान के रुख को जिस तरह से अमेरिका के सामने रखा, वह जमीनी हकीकत से दूर और ईरान के पक्ष में था। अब ईरान के शांति प्रस्ताव को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने खारिज कर दिया है, इसके बाद ये सवाल और भी सजीव हो गया है कि पाकिस्तान ने आखिर क्या समझाने की कोशिश अमेरिका को की।

अब पाकिस्तान को कई तरफ से कूटनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ईरान का अविश्वास पहले से था और अब अमेरिका भी सवाल उठा रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान एक निष्पक्ष मध्यस्थ बन पाया। जाहिर है नहीं।

पाकिस्तान का दोहरा चरित्र पहले भी उजागर हुआ

भारत ने पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को कई बार उजागर किया है या यूँ कहें कि कई बार झेला है।

पहलगाम में आतंकियों ने निर्दोष पर्यटकों की जब हत्या की तो आतंकियों का सीधा कनेक्शन पाकिस्तान से जुड़ा। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर कर पाकिस्तान को मजा चखाया। लेकिन, पाकिस्तान आज भी ‘भारत को हराने’ का दम भरता है। इसको लेकर पाकिस्तानी फौज के प्रमुख आसिम मुनीर का प्रमोशन भी कर दिया। लेकिन हकीकत दुनिया के सामने है। भारत ने पाकिस्तान में मौजूद 9 आतंकी ठिकानों को धूल में मिला था। इससे पाकिस्तान की आतंकियों को संरक्षण देने की कलई एक बार फिर खुली।

करगिल युद्ध के वक्त 1999 में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर बस यात्रा कर दोस्ती का हाथ बढ़ाया, लेकिन करगिल की ऊँची चोटियों पर घुसपैठियों की तरह घुस कर पाकिस्तानी फौज ने कब्जा करने की हिमाकत की, लेकिन पाकिस्तान ने इन्हें फौजी नहीं माना और कश्मीरी विद्रोही बताने का नाटक किया।

मुंबई में 26/11 हमले से पहले भारत और पाकिस्तान की वार्ता शुरू हुई थी। लेकिन बीच में ही आतंकियों को भेजकर नवंबर 2008 में मुंबई में हमला कराया। जाँच में पाकिस्तान से आए हमलावरों और उनके आईएसआई आकाओं का भी पता चला।

दरअसल भारत से अलग होने के बाद से ही पाकिस्तान का चाल चरित्र और चेहरा विवादित रहा है। कबालियों का रूपधारण कर 1948 में कश्मीर में घुसपैठ से लेकर अब तक उसका तरीका बदला है लेकिन काम आतंक फैलाना ही रहा है। ऐसा देश शांति समझौते की अहमियत को क्या समझेगा।

मुस्लिम प्रोफेसर ने मंदिर में की ‘घर वापसी’, धर्मांतरण कानून का भी किया पालन, पर हिंदू मानने को तैयार नहीं था ‘सिस्टम’: जानिए- कैसे हाईकोर्ट की रिमांड पर आए ADM

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम प्रोफेसर के सनातन धर्म में घर वापसी के आवेदन को खारिज करने को लेकर प्रयागराज के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) (ADM-प्रशासन) के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अनिल पंडित (पूर्व में मोहम्मद अहसान) ने अपनी मर्जी से सनातन में घर वापसी की थी और उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 के तहत इसकी औपचारिक मान्यता के लिए आवेदन किया था।

हालाँकि, ADM ने आवेदन पर फैसला लेने से पहले बार-बार पुलिस जाँच कराई और बाद में उसकी अर्जी खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि युवक के खिलाफ उसके ससुर ने आपराधिक मामला दर्ज कराया था। फिलहाल, हाईकोर्ट की जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने प्रयागराज के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) के आदेश पर रोक लगा दी है।

क्या था मामला?

यह मामला मोहम्मद अहसान द्वारा घर वापसी किए जान से जुड़ा था। मोहम्मद अहसान ने 2022 में आर्य समाज मंदिर में सनातन अपना लिया था और उनका नाम अनिल पंडित रखा गया था। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि स्कूल के दिनों से ही उनका झुकाव सनातन धर्म/हिंदू संस्कृति और परंपराओं की ओर था। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में कभी नमाज पढ़ने की परंपरा नहीं थी।

उन्होंने कहा कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में पीएचडी करते समय उनकी मुलाकात अपर्णा बाजपेयी से हुई और दोनों के बाद में प्रेम विवाह कर लिया था। अपर्णा बाजपेयी ने अदालत को बताया कि उन्होंने अपनी इच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार श्री अनिल पंडित से विवाह किया लेकिन उनके पिता इस विवाह के खिलाफ थे। फिलहाल वह 7 माह की गर्भवती हैं।

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि अनिल पंडित ने 12 जनवरी 2022 को जिला मजिस्ट्रेट के सामने यह घोषणा की थी कि वह अपनी इच्छा से सनातन धर्म अपनाना चाहते हैं। इसके बाद 14 मार्च 2022 को आर्य समाज मंदिर में विधि-विधान के साथ उनका धर्म परिवर्तन कराया गया। यह प्रक्रिया पुजारी सत्य प्रकाश ने पूरी कराई और धर्म परिवर्तन के बाद उनका नया नाम ‘अनिल पंडित’ रखा गया। पुजारी ने कानून के अनुसार धर्म परिवर्तन की सूचना भी जिला मजिस्ट्रेट को दे दी थी।

अदालत को यह भी बताया गया कि ADM प्रयागराज ने मामले की जाँच के लिए पुलिस रिपोर्ट मँगाई थी। जांँच के बाद पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी दबाव या लालच के अपनी मर्जी से घर वापसी की है। इसके बाद अपर्णा के पिता ने अनिल के खिलाफ FIR करा दी। इसके बाद इस मामले में पुलिस ने 23 अक्टूबर 2023 को एक और रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ता पर धर्म परिवर्तन के लिए किसी तरह का दबाव नहीं डाला गया था और न ही उसे किसी अनुचित तरीके से प्रभावित कर सनातन धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया है।

कोर्ट के आदेश में 2023 की रिपोर्ट का जिक्र

2 रिपोर्ट के बाद ADM ने 11 जुलाई 2024 को एक और जाँच का आदेश दिया और पुलिस ने 23 जुलाई 2024 को नई रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट के आधार पर ADM ने आदेश दिया और कहा गया कि याचिकाकर्ता ने अपर्णा बाजपेयी को बहला-फुसलाकर शादी की है। अप्रैल 2021 में याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए 1 लाख रुपए को भी घर वापसी को अवैध साबित करने के लिए सबूत माना गया। हालाँकि, अपर्णा ने कोर्ट को बताया कि माँ की बीमारी के चलते एक दोस्त के रूप में उनकी मदद की गई थी। हालाँकि, ADM ने 9 अगस्त 2024 को इस आदेश को रद्द कर दिया था।

याचिकाकर्ता ने क्या कहा?

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि पहले की दो पुलिस रिपोर्टें विरोधाभासी नहीं थीं फिर भी ADM बार-बार नई रिपोर्ट मँगवा रही थीं। उन्होंने याचिकाकर्ता से बुलाकर पूछताछ भी नहीं की और पहले की दो रिपोर्टों को बिना उचित कारण के नजरअंदाज कर दिया गया। वकील ने कहा कि अनिल की पत्नी गर्भवती हैं और बच्चे के जन्म के बाद जन्म प्रमाण पत्र में माता-पिता की पहचान दर्ज कराने में समस्या आ सकती है। उन्होंने अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द करने की माँग की।

कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट याचिकाकर्ता के पक्ष में थी तो फिर केवल लड़की के पिता द्वारा FIR दर्ज कराने के बाद अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट बार-बार जाँच क्यों करवा रही थीं जबकि घर वापसी के समय लड़की और उसके पिता की कोई भूमिका नहीं थी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने धर्म परिवर्तन से 60 दिन पहले आवेदन देकर उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन कानून की धारा 8(1) का पालन किया था। इसके बाद हुआ धर्म परिवर्तन कानूनी रूप से वैध माना जाएगा।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिपोर्ट पक्ष में होने के बाद भी ADM ने FIR को आधार बनाकर इस पर विचार किया और पुलिस ने इस मामले को ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट माँगी। कोर्ट ने ADM के व्यवहार की आलोचना करते हुए कहा कि आपराधिक जाँच से इसका संबंध नहीं था। उन्होंने पुलिस को बार-बार रिपोर्ट देने के लिए मजबूर किया। साथ ही, हाईकोर्ट ने कहा कि ADM ने अपने अधिकारों से बाहर जाकर शक्ति का इस्तेमाल किया है। FIR में लगाए गए आरोपों से ADM का कोई लेना-देना नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि धर्म परिवर्तन किसी दबाव, लालच या गलत मंशा से कराया गया था। कोर्ट ने माना कि ADM FIR और चार्जशीट से जरूरत से ज्यादा प्रभावित हो गईं और उसी आधार पर धर्म परिवर्तन को अवैध मान लिया। अदालत ने कहा कि दोस्तों के बीच पैसों के लेन-देन को आधार बनाकर यह नहीं माना जा सकता कि याचिकाकर्ता ने उन पर गलत प्रभाव डाला था।

कोर्ट ने कहा कि विवाह का पंजीकरण सिर्फ इसलिए रुका हुआ है क्योंकि धर्म परिवर्तन से जुड़ा मामला अभी लंबित है। कोर्ट ने माना कि ADM को शुरुआती दो जाँच रिपोर्टों के आधार पर फैसला लेना चाहिए था। अदालत ने साफ कहा कि केवल चार्जशीट दाखिल हो जाने से कोई व्यक्ति अपराधी साबित नहीं हो जाता।

कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े एक संस्थान में सहायक प्रोफेसर हैं जबकि उनकी पत्नी बलिया के एक इंटर कॉलेज में अंग्रेजी की प्रवक्ता हैं। कोर्ट ने ADM को निर्देश दिया कि वे मामले को से दोबारा देखें और शुरुआती दो जाँच रिपोर्टों तथा कोर्ट द्वारा दोनों से हुई बातचीत को ध्यान में रखते हुए नया आदेश पारित करें। अदालत ने यह आदेश 26 मई 2026 तक देने को कहा है। तब तक 9 अगस्त 2024 का विवादित आदेश स्थगित रहेगा। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 मई 2026 को होगी।

हर घंटे करीब 80 kg सोना खरीदता है भारत, जानिए PM मोदी ने क्यों की 1 साल गोल्ड नहीं खरीदने की अपील: इससे व्यापार घाटा, विदेशी मुद्रा भंडार पर क्या पड़ेगा असर

प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है। दरअसल मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध का असर भारत पर भी पड़ा है। भारत पर विदेशी मुद्रा का दबाव बढ़ रहा है। इसलिए विदेशी मुद्रा बचाने के लिए पीएम मोदी ने जनता से एक साल तक सोना नहीं खरीदने और खाने में तेल कम इस्तेमाल करने की अपील की।

क्या कहा पीएम मोदी ने

तेलंगाना के सिकंदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए पीएम मोदी ने लोगों से विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की। इसके लिए उन्होंने कई रास्ते भी बताए।

पीएम मोदी ने सप्लाई चेन का हवाला देते हुए कहा कि सप्लाई चेन पर लगातार संकट बना हुआ है। इसलिए देश को सर्वोपरि रखते हुए हमें एकजुट होना होगा । देश के लिए जीना और देश के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करना भी देशभक्ति है।

उन्होंने कहा कि सोने की खरीद में विदेशी मुद्रा काफी खर्च होता है। एक समय था जब देश पर संकट आता था, तो लोग सोना दान कर देते थे। आज दान की जरूरत नहीं है, लेकिन देशहित में इसकी खरीद को सालभर रोक सकते हैं। उन्होंने कहा कि सालभर में अगर घर में कोई कार्यक्रम हो, तो सोने के गहने नहीं खरीदें। सोना नहीं खरीदने का फैसला देशहित में है, क्योंकि हमें विदेशी मुद्रा बचानी है। यह भी एक तरह से देशभक्ति है।

दरअसल पीएम मोदी का आह्वान सिर्फ एक भावनात्मक अपील नहीं है, बल्कि आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयात करने वाले देशों में एक है। भारत अपनी सोने की जरूरत के लिए पूरी तरह विदेश पर निर्भर है। देश का करोड़ों डॉलर विदेशों से सोना खरीदने में जाता है।

जितना ज्यादा सोना आयात होगा, उतना ज्यादा डॉलर बाहर जाएगा और इससे रुपए पर दबाव बढ़ेगा।

अभी पश्चिम एशिया में तनाव की स्थिति, महँगे कच्चे तेल और वैश्विक अनिश्चितता के कारण आयात किए जाने वाले सामानों की कीमत काफी बढ़ गई है। इससे विदेशी मुद्रा काफी तेजी से खर्च हो रहा है।

कच्चे तेल की कीमत आसमान छू रही हैं। यह 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं। इससे भारत को तेल खरीदने में करीब 30 फीसदी ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करना पड़ रहा है। ऐसे में सोने के भारी आयात से देश को अर्थव्यवस्था पर ‘दोहरी मार’ पड़ रही है।

पीएम मोदी ने इसे ही कंट्रोल करने के लिए देशवासियों से पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल करने, जहाँ तक हो सके वर्क फ्रॉम होम करने, विदेश यात्रा टालने और सोना खरीदने से बचने की अपील की है।

भारत में कितना है विदेशी मुद्रा भंडार

प्रधानमंत्री की अपील का असर देश में पहले भी दिखा है। कोरोना काल में थाली बजाने से लेकर कोरोना वॉरियर्स के सम्मान में तालियाँ बजाने की बात देश ने मानी है। अब भावनात्मक रूप से खासकर महिलाओं से जुड़ा ‘सोना’ की खरीद को एक साल के लिए रोकने की अपील पीएम मोदी ने की है।

अगर लोग बड़े पैमाने पर सोना खरीदना कम कर दें, तो भारत को कई आर्थिक फायदे हो सकते हैं। सबसे पहले तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा। भारत को हर साल सोने के लिए अरबों डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। अगर लोग कम खरीदेंगे तो डॉलर की बचत होगी।

विदेशी मुद्रा भंडार में मजबूती से देश का रुपया भी मजबूत होगा, क्योंकि कम डॉलर खर्च होने से रुपए पर दबाव कम होगा। इससे रुपया तेजी से गिरने से बच सकता है। इससे व्यापार घाटा कम हो सकता है। भारत तेल और सोना दोनों भारी मात्रा में आयात करता है यानी ये दो चीजें भारत सबसे ज्यादा विदेशों से मँगाता है।

सोने की खपत में कमी से सरकार को संकट से निपटने में मदद मिलेगी। पश्चिम एशिया में जारी संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। कई जानकार वैश्विक मंदी की आशंका जता चुके हैं। ऐसे में अगर वैश्विक संकट और बढ़ता है, तो सरकार के पास ज्यादा फोरेक्स बफर रहेगा। इससे संकट से निपटने में आसानी होगी।

भारत में आरबीआई के आँकड़े के मुताबिक फरवरी में फॉरेक्स रिजर्व 728 बिलियन डॉलर है, वहीं ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के आँकड़ों के मुताबिक, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 691 बिलियन डॉलर के आसपास है। दूसरी ओर आईएमएफ के मुताबिक, 2026 में भारत का चालू खाता घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) बढ़कर 84.5 बिलियन डॉलर हो सकता है। यह पूरे जीडीपी का करीब 2 फीसदी है। करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने का मतलब है ज्यादा डॉलर का देश से बाहर जाना।

भारत के घरों में हजारों टन सोना है

भारत दुनिया के सबसे बड़े ‘गोल्ड होल्डिंग’ देशों में माना जाता है। अनुमान के मुताबिक, भारतीय परिवारों, मंदिरों और संस्थानों के पास कुल मिला कर लगभग 25000 से 30 000 टन सोना मौजूद है। यह दुनिया के कई देशों के रिजर्व से भी ज्यादा है। दरअसल भारतीय घरों में सोना सिर्फ निवेश नहीं है, बल्कि शादी-ब्याह का अहम हिस्सा है। भारतीय परंपरा से सोना जुड़ा हुआ है और सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ इमरजेंसी में इस्तेमाल की जाने वाली संपत्ति है।

सोने को बाहर निकाल कर ‘काम’ पर लगाने के लिए सरकार ने कई गोल्ड प्लान भी लॉन्च किए। इनमें सेवेरॉन गोल्ड बॉन्ड, गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम से लेकर कई डिजिटल स्कीम शामिल हैं।

दरअसल सोने को आमतौर पर एक ‘सुरक्षित संपत्ति’ माना जाता है। इसलिए अनिश्चितता की स्थिति में निवेशक इसे खरीदने के लिए उमड़ पड़ते हैं। हालाँकि, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें दुनिया भर में लंबे समय तक चलने वाली महँगाई और आसमान छूती ब्याज दरों को लेकर भी चिंताएँ बढ़ा रही हैं। इसलिए यह मामला और भी ज्यादा मुश्किल हो गया है।

पश्चिम एशिया में युद्ध पूरी तरह नहीं रुका है। ईरान और अमेरिका के बीच गतिरोध बना हुआ है। ईरान ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शांति प्रस्तावों को ठुकरा दिया है। होर्मुज स्ट्रेट में रुकावटों की चिंताएँ बढ़ने से तेल की कीमतें फिर से बढ़ गई हैं। तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से वैश्विक महँगाई का जोखिम भी बढ़ गया है। US फेडरल रिजर्व जैसे केंद्रीय बैंकों ने लंबे समय से ब्याज दरें ऊँची बनाए रखी है। इसका सोने की कीमत पर बुरा असर पड़ा है, क्योंकि इससे कोई यील्ड या ब्याज नहीं मिलता।

भारत को एक साल में कितनी बचत होगी?

हाल के वर्षों में भारत हर साल करीब 700 से 900 टन सोने की खपत है। इसमें से करीब 90 फीसदी आयात किया जाता है। हर दिन के लिहाज से सोचें तो यह करीब 1920 किलो बैठता है यानी हर घंटे भारत में 80 किलो सोना खरीदा जाता है। इस पर देश का खर्च 50 से 70 अरब डॉलर होता है यानी 4.76 से 6.66 लाख करोड़ रुपए खर्च होता है। कच्चे तेल के बाद सोना मँगवाने में भारत सबसे ज्यादा डॉलर खर्च करता है। हर दिन भारत में

अगर देश ने पीएम मोदी की अपील को मानते हुए सोना खरीदने में कमी कर दी तो करोड़ो डॉलर का बचत होगा। पीएम मोदी की अपील पर अगर देशवासी पूरी तरह एक साल तक सोना खरीदने पर रोक लगा दे, तो 70 अरब डॉलर यानी करीब 6.84 लाख करोड़ रुपए का विदेशी मुद्रा हम बचा पाएँगे।

अगर 50 फीसदी सोने की खरीद में कमी हो जाए, और देश को 35 अरब डॉलर यानी 3.42 लाख करोड़ रुपए की बचत होगी।

पीएम मोदी की अपील पर अगर देशवासियों ने 25 फीसदी सोना खरीद में कमी कर दी, तो देश को 1.71 लाख करोड़ रुपए की बचत हो जाएगी।

पीएम मोदी की अपील में देशहित के साथ-साथ ‘आर्थिक देशभक्ति’ का संदेश भी छिपा है। उन्होंने अपनी बात पर जोर देने के लिए इसलिए कहा कि पहले युद्ध के समय लोग देश के लिए सोना दान करते थे, लेकिन अभी जरूरत सिर्फ सोने की खरीद को टालने की है अर्थात जनता विदेशी खर्च को कम करने के लिए संयम बरते। इससे घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

1 राज्य में मिली सत्ता, पर CM ही तय नहीं कर पा रही कॉन्ग्रेस: जानिए केरल कॉन्ग्रेस में क्यों छिड़ा है संग्राम

केरल की राजनीति में एक कहावत मशहूर है कि यहाँ की जनता हर पाँच साल में ‘चाबी’ बदल देती है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में केरल की जनता ने न सिर्फ चाबी बदली, बल्कि यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के हाथों में सत्ता का ऐसा मज़बूत संदूक थमा दिया जिसकी उम्मीद शायद खुद कॉन्ग्रेस को भी नहीं थी। 140 सीटों वाली विधानसभा में 102 सीटें जीतना किसी चमत्कार से कम नहीं है, खासकर तब जब सामने पिनाराई विजयन जैसा कद्दावर वामपंथी चेहरा हो।

लेकिन राजनीति की विडंबना देखिए। जहाँ इस प्रचंड जीत के बाद केरल की सड़कों पर जश्न का सैलाब होना चाहिए था, वहाँ तिरुवनंतपुरम से लेकर दिल्ली तक कॉन्ग्रेस के गलियारों में सन्नाटा और ‘सस्पेंस’ पसरा हुआ है। चुनाव नतीजे आए छह दिन बीत चुके हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस अब तक यह तय नहीं कर पाई है कि इस ऐतिहासिक जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी एक है और दावेदार तीन और इसी त्रिकोणीय मुकाबले ने हाईकमान की रातों की नींद उड़ा दी है।

पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस को सिर्फ एक ही राज्य में सत्ता मिली, लेकिन वहाँ भी मुख्यमंत्री का चेहरा तय नहीं हो पाया। भारी बहुमत के बावजूद पार्टी के अंदर गुटीय कलह, खींचतान और लॉबिंग ने सारा माहौल बिगाड़ दिया है। चुनाव के छह दिन बाद भी (11 मई 2026 तक) सस्पेंस बरकरार है। यह स्थिति न सिर्फ केरल की जनता को परेशान कर रही है, बल्कि पूरे देश में कॉन्ग्रेस की छवि पर सवाल उठा रही है।

ऐतिहासिक जीत मिली लेकर असमंजस भी अभूतपूर्व

बता दें कि 10 साल के लंबे वनवास के बाद कॉन्ग्रेस गठबंधन (UDF) ने केरल में वापसी की है। 102 सीटों का आँकड़ा यह बताता है कि जनता ने वामपंथी सरकार के खिलाफ बदलाव की लहर पैदा की थी। लेकिन जीत के तुरंत बाद जो स्थिति बनी, उसने ‘ओवरकॉन्फिडेंस’ और ‘आंतरिक कलह’ की पुरानी बीमारी को फिर से उजागर कर दिया है।

इस बीच, जो विपक्षी दल इस फिराक में थे कि कॉन्ग्रेस कमजोर पड़ेगी और वे सीट बँटवारे में दबाव बनाएँगे, जनता के फैसले ने उनकी रणनीतियों पर पानी फेर दिया। अब वही लोग सोशल मीडिया पर तंज़ और बेचैनी के ज़रिए अपना दर्द बयाँ कर रहे हैं। लेकिन असली दर्द तो खुद कॉन्ग्रेस के भीतर है, जहाँ मुख्यमंत्री पद को लेकर म्यान से तलवारें निकल चुकी हैं।

मुख्यमंत्री पद की रेस में आँकड़ों का गणित और गुटीय समीकरण

केरल कॉन्ग्रेस में इस समय शक्ति प्रदर्शन का दौर चल रहा है। सूत्रों के अनुसार, विधायकों का समर्थन तीन गुटों में बँटा हुआ है। इसमें पहला गुट है केसी वेणुगोपाल का, जो अलाप्पुझा से लोकसभा सांसद होने के साथ ही कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। बताया जा रहा है कि इनके समर्थन में 43 विधायक हैं।

दूसरा गुट है वीडी सतीसन का, जो अभी तक नेता प्रतिपक्ष के पद पर थे। उनके समर्थन में 35 विधायक बताए जा रहे हैं। इसके अलावा केरल में कॉन्ग्रेस का तीसरा गुट भी है, जिसकी अगुवाई रमेश चेन्नीथला कर रहे हैं। वो 2021 तक नेता प्रतिपक्ष थे। वरिष्ठता क्रम के आधार पर वो अपना दावा ठोंक रहे हैं। उसके साथ 22 विधायक बताए जा रहे हैं।

केसी वेणुगोपाल हैं हाईकमान की पहली पसंद

केसी वेणुगोपाल फिलहाल अलाप्पुझा से सांसद हैं और राहुल गाँधी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में गिने जाते हैं। राहुल गाँधी चाहते हैं कि वेणुगोपाल केरल की कमान संभालें ताकि राज्य में संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल रहे। संगठन पर उनकी पकड़ और दिल्ली में उनके रसूख ने उन्हें रेस में सबसे आगे कर दिया है। लेकिन पेच यह है कि वे विधायक नहीं हैं, और राज्य के स्थानीय नेताओं का एक धड़ा उन्हें ‘दिल्ली का थोपा हुआ नेता’ मान रहा है।

जमीनी संघर्ष का चेहरा हैं वीडी सतीसन

वीडी सतीसन ने विपक्ष के नेता के तौर पर पिछले पाँच सालों में सदन के भीतर और बाहर सरकार को घेरा है। कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता काफी अधिक है। सतीसन का तर्क सीधा है कि जब हमने ज़मीन पर लड़ाई लड़ी, तो फल भी हमें ही मिलना चाहिए। उन्होंने वेणुगोपाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और उन पर ‘विधायकों को डराने’ और ‘गुटबाजी को बढ़ावा देने’ के गंभीर आरोप लगाए हैं

राजनीति के मँझे खिलाड़ी हैं रमेश चेन्नीथला

वैसे ये भी कह सकते हैं कि रमेश चेन्नीथला कॉन्ग्रेस के पुराने चावल हैं। 2021 की हार के बाद उन्हें किनारे कर दिया गया था, लेकिन इस बार उनके पास भी 22 विधायकों का समर्थन है। वे एक ‘डार्क हॉर्स’ की तरह इंतजार कर रहे हैं कि अगर वेणुगोपाल और सतीसन की लड़ाई में डेडलॉक (गतिरोध) होता है, तो समझौता उम्मीदवार के रूप में उनका नाम सामने आ जाए।

दिल्ली में बैठकों का दौर और राहुल गाँधी की चुनौती

मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर बैठकों का सिलसिला थमा नहीं है। राहुल गाँधी व्यक्तिगत रूप से इस मामले को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। 11 मई तक की जानकारी के मुताबिक, राहुल गाँधी ने वीडी सतीसन से सीधी बात की है। सूत्रों का कहना है कि जब सतीसन से उनके खिलाफ लगे पोस्टरों और वेणुगोपाल के विरोध पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने दो टूक शब्दों में कह दिया कि वे वेणुगोपाल के नाम पर सहमत नहीं हैं।

सतीसन का आरोप है कि वेणुगोपाल ने महासचिव पद का दुरुपयोग करते हुए विधायकों पर एक खास गुट में शामिल होने का दबाव बनाया। यह विवाद इतना बढ़ गया है कि पार्टी अब अगले दो दिनों तक कार्यकर्ताओं और असंतुष्ट विधायकों को ‘मनाने’ की रणनीति पर काम कर रही है।

दरअसल, कॉन्ग्रेस की समस्या यह है कि वह जीत को संभाल नहीं पाती। जहाँ भाजपा जैसी पार्टियाँ चुनाव नतीजे आने के 24 घंटे के भीतर मुख्यमंत्री तय कर देती हैं, वहीं कॉन्ग्रेस में लोकतंत्र के नाम पर होने वाली गुटबाजी अक्सर सरकार की शुरुआत को ही कमजोर कर देती है।

बीजेपी का तंज और ‘मजेदार’ पॉलिटिक्स

कॉन्ग्रेस की इस सिरफुटौवल पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) मज़े लेने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में तंज कसते हुए कहा, “अरे भाई, केरलम में पूर्ण बहुमत है, वहाँ तो सरकार बना लो। ये लोग नेता तय नहीं कर पा रहे। शायद ये लोग ढाई-ढाई साल के लिए सरकार चलाएँगे या एक-एक साल के लिए पाँच मुख्यमंत्री बनाएँगे।”

प्रधानमंत्री का यह बयान कॉन्ग्रेस की उस कमजोरी पर चोट करता है जहाँ राजस्थान, छत्तीसगढ़ और अब कर्नाटक जैसे राज्यों में ‘सत्ता के बँटवारे’ के फॉर्मूले ने पार्टी को नुकसान पहुँचाया है।

वहीं केरल बीजेपी अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट के जरिए चुटकी ली। उन्होंने एक व्यंग्य का जवाब देते हुए संकेत दिया कि दिल्ली की बीजेपी चाहती है कि वेणुगोपाल दिल्ली में रहें (क्योंकि वहाँ वे कोई खतरा नहीं हैं), जबकि केरल बीजेपी चाहती है कि वे केरल आ जाएँ (ताकि कॉन्ग्रेस की गुटबाजी और बढ़े)। चंद्रशेखर का ‘जिपर-माउथ’ इमोजी वाला जवाब यह बताने के लिए काफी है कि विपक्षी खेमा कॉन्ग्रेस की इस आंतरिक कलह का आनंद ले रहा है। हालाँकि बाद में उन्होंने ये ट्वीट डिलीट कर दिया।

राजीव चंद्रशेखर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

पोस्टर वॉर और सोशल मीडिया पर जंग

केरल की सड़कों पर इस समय फ्लेक्स और पोस्टरों की बाढ़ आई हुई है। सतीसन के समर्थकों ने ऐसे पोस्टर लगाए हैं जिनमें वेणुगोपाल का मजाक उड़ाया गया है। जवाब में वेणुगोपाल के समर्थकों ने उनकी ‘दिल्ली वाली ताकत’ का प्रदर्शन किया है। सोशल मीडिया पर दोनों नेताओं की ‘आईटी सेनाएँ’ आपस में भिड़ी हुई हैं। यह स्थिति उस जनता के लिए निराशाजनक है जिसने ‘स्थिर सरकार’ की उम्मीद में कॉन्ग्रेस को वोट दिया था।

कॉन्ग्रेस के सामने अब तीन ही रास्ते बचे हैं-

  • वेणुगोपाल को कमान: राहुल गाँधी अपनी जिद पर अड़े रहें और वेणुगोपाल को सीएम बना दें, लेकिन इससे सतीसन का गुट बगावत कर सकता है।
  • सतीसन की ताजपोशी: स्थानीय भावनाओं का सम्मान करते हुए सतीसन को मुख्यमंत्री बनाया जाए, लेकिन इससे वेणुगोपाल और हाईकमान के दबदबे को ठेस पहुँचेगी।
  • रोटेशन फॉर्मूला: ढाई साल सतीसन और ढाई साल वेणुगोपाल। लेकिन इतिहास गवाह है कि यह फॉर्मूला कॉन्ग्रेस के लिए हमेशा आत्मघाती साबित हुआ है।

कॉन्ग्रेस ने खुद बनाई है ये स्थिति, उसी पर पड़ेगी भारी

केरल में कॉन्ग्रेस की यह स्थिति ‘गरीबी में आटा गीला’ जैसी नहीं, बल्कि ‘अमीरी में रास्ता भूलने’ जैसी है। 102 सीटों का प्रचंड बहुमत होने के बावजूद नेता तय न कर पाना पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी को दर्शाता है। 11 मई 2026 की तारीख तक केरल की जनता अभी भी अपने मुख्यमंत्री का चेहरा देखने का इंतज़ार कर रही है।

यदि कॉन्ग्रेस ने अगले 48 घंटों में कोई ठोस फैसला नहीं लिया, तो यह ऐतिहासिक जीत उसके लिए गले की फाँस बन सकती है। जनता जब जवाब देती है, तो वह बड़े-बड़े राजनीतिक गणित बिगाड़ देती है। केरल की जनता ने अपना काम कर दिया है, अब बारी कॉन्ग्रेस हाईकमान की है कि वह ‘कन्फ्यूजन’ को खत्म करे या फिर ‘कलह’ को अपनी नियति मान ले।

धधकती आग, भस्म और मंत्रों के बीच श्मशान में शिव साधना कर रही रूसी महिला कौन, जानिए- पुष्कर में चल रहे ‘9 धूणी अग्नि तप’ का रहस्य

राजस्थान की भीषण गर्मी में जहाँ बाहर निकलकर कुछ मिनट खड़ा रहना भी मुश्किल हो जाता है, वहीं अजमेर जिले की तीर्थ नगरी पुष्कर में इन दिनों चारों ओर धधकती आग के बीच शिव की साधना चल रही है। नाथ परंपरा का मार्ग अपनाने वालीं रूसी मूल की योगिनी अन्नपूर्णा नाथ छोटी बस्ती स्थित श्मशान स्थल में अघोरी सीताराम बाबा के आश्रम पर नाथ संप्रदाय की प्राचीन ‘9 धूणी अग्नि तपस्या’ कर रही हैं।

शरीर पर भस्म लगाए वे रोजाना 9 धूणियों के बीच बैठकर करीब सवा तीन घंटे तक शिव साधना और गुरु बीज मंत्र का जाप कर रही हैं। उनके साथ उनके गुरु बाल योगी दीपक नाथ भी तप में लीन हैं। यह साधना 3 मई से शुरू हुई है और 25 मई तक चलेगी। अंतिम दिन पूर्णाहुति, हवन और संत भंडारे का आयोजन किया जाएगा।

पुष्कर के इस श्मशान स्थल में रोज दोपहर 11 बजे से लेकर 2 बजकर 15 मिनट तक अग्नि तपस्या का क्रम चलता है। उस समय राजस्थान की तेज धूप और धूणियों की गर्मी मिलकर ऐसा ताप पैदा करती है जिसे हम-आप जैसे आम लोग तो सहन ही ना कर पाएँ लेकिन साधक के लिए यही साधना है, वे इस भीषण ताप के बीच शांत भाव से योग मुद्रा में बैठ साधना में लीन रहते हैं।

क्या होता है ‘9 धूणी अग्नि तप’?

नाथ संप्रदाय में ‘धूणी अग्नि तपस्या’ को बहुत कठिन और विशेष साधना माना जाता है। इस तपस्या में साधक अपने चारों तरफ आग जलाकर उसके बीच बैठते हैं और भगवान शिव का ध्यान करते हुए मंत्रों का जाप करते हैं। माना जाता है कि इस साधना से मन, शरीर और आत्मा पर नियंत्रण मजबूत होता है।

‘9 धूणी तपस्या’ में साधक के चारों ओर कुल नौ धूणियाँ यानी अग्नि के स्थान बनाए जाते हैं। इन धूणियों में लगातार आग जलती रहती है और साधक बीच में बैठकर ध्यान लगाता है। धूणियों के बीच केवल 3 से 4 फीट की दूरी होती है, इसलिए गर्मी बहुत ज्यादा महसूस होती है। अन्नपूर्णा नाथ के तप में एक खास बात यह भी है कि यह तपस्या राजस्थान की तेज गर्मी और धूप में की जा रही है जिससे इसकी कठिनाई और बढ़ जाती है।

इन धूणियों को जलाने के लिए गोबर के कंडों का इस्तेमाल किया जाता है। शुरुआत में कम कंडों से आग जलाई जाती है लेकिन हर दिन उनकी संख्या बढ़ाई जाती है। इस साधना की शुरुआत 21 कंडों से हुई थी और आखिरी दिन 108 कंडों से धूणियाँ जलाई जाएँगी। अभी हर धूणी में करीब 40 कंडे डाले जा रहे हैं।

तपस्या करने वाले साधक अपने शरीर पर गाय के गोबर से बनी भस्म लगाते हैं। माना जाता है कि यह भस्म शरीर को तेज गर्मी से कुछ राहत देती है और साधना के दौरान ध्यान केंद्रित रखने में मदद करती है। आग की तेज लपटों और धुएं के बीच साधक लगातार शिव मंत्रों और गुरु बीज मंत्र का जाप करते रहते हैं।

गुरु बाल योगी दीपक नाथ के अनुसार यह साधना सिर्फ शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं होती, बल्कि आत्मशक्ति बढ़ाने, मन को नियंत्रित करने और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का माध्यम मानी जाती है। नाथ संप्रदाय में संत और योगी सदियों से इस तरह की तपस्या करते आ रहे हैं। वो बताते हैं कि कुछ साधु 21 धूणी, कुछ 108 धूणी और कुछ तो 1100 धूणियों तक की तपस्या भी करते हैं।

उनका कहना है कि यह परंपरा यज्ञ की तरह मानी जाती है। जैसे पंडित मंत्रों के साथ यज्ञ करते हैं वैसे ही संत धूणी तपस्या के जरिए साधना करते हैं। इस तपस्या का उद्देश्य केवल अपनी सिद्धि पाना नहीं बल्कि समाज, लोगों और पूरे विश्व के कल्याण की कामना करना भी माना जाता है।

रूस से पुष्कर तक की आध्यात्मिक यात्रा: कौन हैं योगिनी अन्नपूर्णा नाथ?

इस तपस्या को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा योगिनी अन्नपूर्णा नाथ की हो रही है। उनका जन्म तत्कालीन सोवियत संघ में हुआ था और उनका पालन-पोषण कजाकिस्तान में हुआ। करीब 17 साल पहले वे भारत आई थीं। भारतीय संस्कृति, योग और सनातन परंपरा से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह बदल लिया।

करीब 10 साल पहले उन्होंने नाथ संप्रदाय के योगियों से दीक्षा ली और सांसारिक जीवन त्यागकर साधना का मार्ग अपना लिया। अब उनका जीवन पूरी तरह शिव भक्ति, योग और सेवा को समर्पित है। फिलहाल उनके पास रूसी नागरिकता है और वे टूरिस्ट वीजा पर भारत में रहती हैं। वीजा अवधि पूरी होने पर वे दूसरे देश जाकर दोबारा भारत लौट आती हैं।

पहले भी कठिन तपस्या से चर्चा में रही हैं अन्नपूर्णा

योगिनी अन्नपूर्णा नाथ पहले भी अपनी कठिन साधनाओं को लेकर चर्चा में रह चुकी हैं। चैत्र नवरात्रि के दौरान उन्होंने पुष्कर के जयपुर घाट पर लगातार 9 दिनों तक खड़े रहकर ‘खड़ेश्वरी तपस्या’ की थी। उस तपस्या ने भी लोगों को हैरान कर दिया था। अब ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में वे 9 धूणी अग्नि तपस्या कर रही हैं।

तब पूरे दिन मंत्र जाप, ध्यान और पूजा-पाठ में लीन रहने वाली योगिनी दिन में सिर्फ एक बार फलाहार करती थीं। लगातार चल रही इस कठिन तपस्या के कारण उनके पैरों में सूजन भी आ गई थी।

उन्होंने हाल ही में नेपाल के प्रसिद्ध पशुपति नाथ मंदिर में दर्शन भी किए थे। इसके अलावा वे इस समय 52 शक्तिपीठों की यात्रा पर हैं और अब तक 35 शक्तिपीठों के दर्शन कर चुकी हैं। हालाँकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में स्थित कुछ शक्तिपीठों तक वे अभी नहीं पहुँच सकी हैं।

योगिनी अन्नपूर्णा नाथ का कहना है कि तपस्या केवल खुद के लिए नहीं होती। उनके अनुसार संतों की साधना समाज, नगर और पूरे विश्व के कल्याण के लिए भी होती है। वे मानती हैं कि सिद्धि तपस्या का परिणाम है और सच्ची साधना इंसान को भीतर से बदल देती है।

दिव्यता के पुनरुद्धार से दिव्य ऊर्जा के संचार तक, सोमनाथ मंदिर का हुआ कुंभाभिषेक: समझें कितना अहम है ये वैदिक अनुष्ठान, शास्त्रों में कहाँ है जिक्र

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं है। यह भारत की संस्कृति, आस्था, आध्यात्मिकता और निरंतर पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक है। कई आक्रमणों, विनाश और पुनर्निर्माण का साक्षी रहा यह ज्योतिर्लिंग सदियों से सनातन संस्कृति की अडिगता को दर्शाता आया है। लेकिन ‘सोमनाथ अमृतपर्व-2026’ के दौरान जो हुआ, उसे केवल एक धार्मिक अनुष्ठान कहना पर्याप्त नहीं होगा।

पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के इतिहास में पहली बार मंदिर के शिखर पर वैदिक परंपरा के अनुसार कुंभाभिषेक किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में संपन्न हुई इस वैदिक परंपरा ने सोमनाथ के आध्यात्मिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।

11 तीर्थस्थलों से लाए गए पवित्र जल से मंदिर के शिखर का अभिषेक किया गया, वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विशेष कुंभ को शिखर तक पहुँचाया गया और केवल तीन मिनट में पूरे मंदिर पर पवित्र जल का अभिषेक हुआ। आइए जानते हैं कि यह कुंभाभिषेक क्या होता है? इसे क्यों किया जाता है और शास्त्रों में इसका क्या महत्व बताया गया है।

‘कुंभ’ और ‘अभिषेक’ के पीछे का वैदिक अर्थ

‘कुंभाभिषेक’ शब्द संस्कृत के 2 शब्दों ‘कुंभ’ और ‘अभिषेक’ से मिलकर बना है। कुंभ यानी जल से भरा पवित्र कलश और अभिषेक यानी पवित्र स्नान या देवता पर पवित्र जल चढ़ाने की प्रक्रिया। वैदिक परंपरा में कुंभ को केवल एक पात्र नहीं माना जाता, बल्कि इसे सृष्टि, जीवन, ऊर्जा और देवत्व का प्रतीक माना गया है।

वैदिक मान्यताओं में जल को शुद्धि और जीवनशक्ति का सबसे महत्वपूर्ण तत्व बताया गया है। ऋग्वेद में जल को ‘अमृत’ के समान माना गया है और कई यज्ञों एवं वैदिक अनुष्ठानों में कलश स्थापना को देवशक्ति के आह्वान से जोड़ा गया है। आगम शास्त्रों विशेष रूप से शैव आगमों में मंदिर के शिखर पर पवित्र जल के माध्यम से देवशक्ति की पुनः स्थापना की परंपरा का विस्तार से वर्णन मिलता है।

कुंभाभिषेक: अनुष्ठान से बढ़कर मंदिर की जीवंतता और दिव्यता का पुनरुद्धार

दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों में कुंभाभिषेक को अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक प्रक्रिया माना जाता है। मान्यता है कि मंदिर केवल पत्थरों और शिल्पों से बना ढाँचा नहीं होता, बल्कि उसमें देवत्व की प्राणशक्ति स्थापित होती है। समय के साथ इस आध्यात्मिक ऊर्जा के पुनर्जागरण के लिए विशेष वैदिक अनुष्ठान किए जाते हैं, जिन्हें कुंभाभिषेक कहा जाता है।

मंदिर में स्थापित दैवी ऊर्जा को वैदिक विधियों के माध्यम से फिर से सक्रिय और पवित्र किया जाता है, जिसके अंतर्गत मंदिर के शिखर और गर्भगृह पर पवित्र जल से अभिषेक किया जाता है। इसी कारण दक्षिण भारत के कई मंदिरों में हर 10 से 12 वर्ष में कुंभाभिषेक किया जाता है।

मंदिर के जीर्णोद्धार, पुनर्निर्माण, विस्तार या लंबे समय बाद उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा को पुनः स्थापित करने के लिए यह विधि संपन्न की जाती है।

आगम परंपरा के अनुसार, वैदिक मंत्रोच्चार के माध्यम से कलश में स्थापित देवशक्ति को मंदिर के शिखर तक पहुँचाया जाता है और फिर शिखर से पूरे मंदिर पर उस पवित्र जल का अभिषेक किया जाता है। इसे मंदिर की आध्यात्मिक चेतना के पुनर्जीवन से जोड़कर देखा जाता है।

सोमनाथ के लिए यह अनुष्ठान ऐतिहासिक क्यों?

सोमनाथ मंदिर के इतिहास में इस विधि का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह पहली बार आयोजित हुई, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि सोमनाथ भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक रहा है। कई बार तोड़े गए इस मंदिर का स्वतंत्रता के बाद पुनर्निर्माण हुआ और इसे राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा गया।

अब पहली बार मंदिर के शिखर पर कुंभाभिषेक होने से सोमनाथ की परंपरा में एक नया वैदिक आयाम जुड़ गया है। विधि के दौरान 11 तीर्थस्थलों के जल का उपयोग भी प्रतीकात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना गया। हिंदू परंपरा में अलग-अलग तीर्थों के जल को आध्यात्मिक शक्ति और पवित्रता के संगम के रूप में देखा जाता है।

एक तरह से यह अभिषेक केवल सोमनाथ मंदिर का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय तीर्थ परंपरा की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन गया।

प्राचीन परंपरा और आधुनिक तकनीक का संगम

इस विधि का एक रोचक पहलू यह भी था कि इसमें परंपरा के साथ आधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया। लगभग 8 फीट ऊँचा और 760 किलो वजनी विशाल कुंभ तैयार किया गया था, जिसमें 1100 लीटर पवित्र जल रखा गया। क्रेन की मदद से उसे मंदिर के शिखर तक पहुँचाया गया और बाद में सेंसर आधारित तकनीक के जरिए केवल तीन मिनट में पूरा अभिषेक संपन्न किया गया।

यह दृश्य केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि हजारों वर्ष पुरानी वैदिक परंपरा और आधुनिक भारत के अद्भुत संगम का प्रतीक भी था। एक ओर वैदिक मंत्रोच्चार गूँज रहे थे तो दूसरी ओर आधुनिक तकनीक के माध्यम से इस भव्य विधि का संचालन किया जा रहा था।

सोमनाथ में संपन्न हुआ यह कुंभाभिषेक याद दिलाता है कि हिंदू मंदिर परंपरा केवल इतिहास या आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह एक निरंतर जीवित और विकसित होती संस्कृति है। शायद यही कारण है कि सदियों के संघर्षों के बाद भी सोमनाथ न केवल अस्तित्व में बना रहा, बल्कि नई ऊर्जा और नए वैभव के साथ बार-बार पुनर्जीवित हुआ है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

गुजरात में स्थापित होगी भारत की पहली मिनी-माइक्रो LED डिस्प्ले यूनिट, इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन को मिलेगी मजबूती: जानें इस तकनीक के बारे में सब कुछ

भारत पिछले कुछ वर्षों से केवल एक मैन्युफैक्चरिंग हब बनने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह दुनिया के एडवांस टेक्नोलॉजी मैप पर अपनी मजबूत पहचान बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सेमीकंडक्टर से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग तक दुनिया भर में चल रही टेक्नोलॉजी की दौड़ में अब भारत भी तेजी से अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है और इसमें गुजरात अहम भूमिका निभा रहा है।

अब इसी दिशा में गुजरात के धोलेरा में देश की पहली मिनी/माइक्रो LED डिस्प्ले फैब यूनिट स्थापित होने जा रही है। केंद्र सरकार ने इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन के तहत इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। इस प्रोजेक्ट के तहत क्रिस्टल मैट्रिक्स लिमिटेड धोलेरा में लगभग 3068 करोड़ के निवेश से गैलियम नाइट्राइड (GaN) आधारित मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले फैब्रिकेशन फैसिलिटी स्थापित करेगी।

अब तक भारत में इस तरह की एडवांस डिस्प्ले टेक्नोलॉजी का निर्माण नहीं होता था और देश को इसके लिए मुख्य रूप से आयात पर निर्भर रहना पड़ता था। खासकर चीन, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देश इस क्षेत्र में आगे रहे हैं। अब भारत पहली बार स्थानीय स्तर पर ऐसी तकनीक विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

क्या है मिनी-माइक्रो LED टेक्नोलॉजी?

आज स्मार्टफोन, स्मार्टवॉच, प्रीमियम टेलीविजन, EV और AR/VR डिवाइसेज की दुनिया में डिस्प्ले टेक्नोलॉजी बेहद महत्वपूर्ण बन चुकी है। स्क्रीन जितनी ज्यादा चमकदार, ऊर्जा-कुशल और पतली होगी, यूजर एक्सपीरियंस उतना ही बेहतर माना जाता है। मिनी और माइक्रो LED टेक्नोलॉजी को डिस्प्ले तकनीक की अगली पीढ़ी माना जा रहा है।

फिलहाल दुनिया के अधिकांश डिवाइसेज में LCD या OLED स्क्रीन का इस्तेमाल होता है, लेकिन मिनी/माइक्रो LED डिस्प्ले इनके मुकाबले ज्यादा ब्राइटनेस, बेहतर कॉन्ट्रास्ट, कम बिजली खपत और लंबी लाइफ-साइकिल प्रदान करते हैं।

खासकर माइक्रो-LED टेक्नोलॉजी को भविष्य के डिवाइसेज के लिए बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह फोल्डेबल डिस्प्ले, ऑटोमोटिव डैशबोर्ड, ऑगमेंटेड रियलिटी ग्लासेस और अल्ट्रा-प्रीमियम टीवी के लिए आदर्श मानी जाती है।

अगर इसे आसान भाषा में समझें तो अब तक भारत ऐसी स्क्रीन खरीदने वाला देश था, लेकिन धोलेरा में बनने वाली यह फैसिलिटी भारत को ‘उपभोक्ता’ से ‘निर्माता’ बनाने की दिशा में एक बड़ी कड़ी साबित हो सकती है।

गैलियम नाइट्राइड (GaN) क्या है और इसका महत्व क्यों बढ़ रहा है?

इस पूरे प्रोजेक्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गैलियम नाइट्राइड (GaN) टेक्नोलॉजी है। आमतौर पर सेमीकंडक्टर निर्माण में सिलिकॉन आधारित तकनीक का उपयोग किया जाता है, लेकिन GaN को अगली पीढ़ी का हाई-परफॉर्मेंस सेमीकंडक्टर मटेरियल माना जा रहा है। GaN तेज गति से पावर ट्रांसफर कर सकता है, कम गर्मी पैदा करता है और ज्यादा ऊर्जा-कुशल होता है।

इसलिए इसका उपयोग केवल डिस्प्ले टेक्नोलॉजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक्स, 5G इंफ्रास्ट्रक्चर और एडवांस कम्युनिकेशन सिस्टम्स में भी तेजी से बढ़ रहा है। यानी धोलेरा का यह प्रोजेक्ट केवल स्क्रीन निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत को कंपाउंड सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में प्रवेश दिलाने वाला कदम भी माना जा रहा है।

PIB के अनुसार, यह फैसिलिटी मिनी/माइक्रो-LED डिस्प्ले मॉड्यूल्स के साथ-साथ GaN फाउंड्री सर्विसेज भी उपलब्ध कराएगी और यहाँ 6-इंच वेफर्स पर एपिटैक्सी जैसी एडवांस प्रक्रियाएँ भी की जाएँगी।

चीन-ताइवान पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन के महत्व को करीब से देखा है। कोरोना महामारी, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध और ताइवान को लेकर बढ़ते जियोपॉलिटिकल तनाव के बाद दुनिया के कई देशों को यह समझ आया कि चिप्स और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए कुछ गिने-चुने देशों पर अत्यधिक निर्भरता जोखिम भरी हो सकती है।

भारत के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती रही है। क्योंकि स्मार्टफोन से लेकर ऑटोमोबाइल और डिफेंस सिस्टम्स तक लगभग हर क्षेत्र में सेमीकंडक्टर और एडवांस डिस्प्ले कंपोनेंट्स की जरूरत पड़ती है। ऐसे में देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करना केवल आर्थिक जरूरत नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी बन गया है।

धोलेरा में बनने वाला यह मिनी/माइक्रो LED फैब यूनिट इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत अब केवल इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबल करने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि भविष्य की तकनीकों के मूलभूत कंपोनेंट्स भी देश में ही तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

आम लोगों की जिंदगी से इसका क्या संबंध है?

सेमीकंडक्टर या डिस्प्ले फैब्रिकेशन जैसे शब्द आम लोगों को अक्सर काफी तकनीकी लगते हैं, लेकिन वास्तव में इन तकनीकों का सीधा संबंध रोजमर्रा की जिंदगी से है। आने वाले समय में स्मार्टफोन, स्मार्ट टीवी, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, वियरेबल डिवाइसेज और AR/VR प्रोडक्ट्स में जो एडवांस डिस्प्ले देखने को मिलेंगे, वही तकनीक अब भारत में बनाने की तैयारी की जा रही है।

सरकार द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, धोलेरा की यह फैसिलिटी हर साल 72,000 स्क्वेयर मीटर मिनी/माइक्रो LED डिस्प्ले पैनल्स और 24,000 सेट RGB वेफर्स का उत्पादन कर सकेगी। यानी यह सिर्फ एक फैक्ट्री नहीं, बल्कि ऐसी औद्योगिक क्षमता है जो अगले दशक की कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स इकोनॉमी में भारत को और मजबूत स्थिति दिला सकती है।

इसके साथ ही हजारों हाई-टेक नौकरियाँ पैदा होंगी और स्थानीय युवाओं को मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नए अवसर मिलेंगे।

‘आत्मनिर्भर भारत’ को मिलेगी रफ्तार

पिछले कुछ वर्षों में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे शब्द लगातार चर्चा में हैं, लेकिन धोलेरा का यह प्रोजेक्ट दिखाता है कि यह विजन अब जमीन पर भी दिखाई देने लगा है। क्योंकि आत्मनिर्भरता केवल आयातित उत्पादों को असेंबल करने से नहीं आती, बल्कि तब आती है जब कोई देश कोर टेक्नोलॉजी में अपनी खुद की निर्माण क्षमता विकसित करता है।

धोलेरा का यह मिनी/माइक्रो LED फैब यूनिट उसी दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह प्रोजेक्ट भारत को भविष्य की डिस्प्ले टेक्नोलॉजी, कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में नई पहचान दिला सकता है।

एक समय था जब ऐसी अत्याधुनिक तकनीक केवल अमेरिका, ताइवान, दक्षिण कोरिया और चीन जैसे देशों तक सीमित मानी जाती थी। अब भारत भी उसी वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी मजबूत जगह बनाने की कोशिश कर रहा है और धोलेरा में बनने वाली यह फैसिलिटी शायद उस बदलाव का सबसे बड़ा प्रतीक बन सकती है।

(यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

घर से करें काम, खाने का तेल कम यूज करें, कार पूल करें… देशवासियों से PM मोदी की 7 अपील: जानिए क्यों कहा- पेट्रोल-डीजल बचाएँ, एक साल तक न खरीदें सोना

दुनिया में युद्धों को लेकर फैले संकट के बीच भारत को आत्मनिर्भर और मजबूत अर्थव्यवस्था बनाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से कुछ खास अपील की हैं। पीएम मोदी ने आम लोगों से जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव अपनाकर देशहित में योगदान देने की बात कही गई है। प्रधानमंत्री मोदी रविवार (11 मई 2026) को तेलंगाना के दौरे पर थे और वहाँ सिकंदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने लोगों से ये अपील की हैं। पीएम मोदी ने लोगों से विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की और इसके लिए उन्होंने कई रास्ते भी बताए हैं।

उन्होंने कहा, “भारत तेजी से विकसित होने के लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ रहा है। लेकिन कई विराट चुनौतियों का मुकाबला भी कर रहा है। कोरोना काल के दौरान ही दुनिया सप्लाई चेन के बहुत बड़े संकट से गिर गई थी। कोविड के बाद यूक्रेन में युद्ध शुरू हो गया। उसने दुनिया की परेशानियाँ और बढ़ा दी। फूड, फ्यूल, फर्टिलाइजर इन तीनों चीजों पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।”

उन्होंने कहा कि पिछले 2 महीने से हमारे पड़ोस में युद्ध चल रहा है और इसका भारत पर गंभीर असर हुआ है। उन्होंने कहा, “युद्ध की वजह से पूरी दुनिया में पेट्रोल, डीजल, गैस और फर्टिलाइजर के दाम आसमान को भी पार कर गए हैं। जब सप्लाई चेन पर संकट लगातार बना रहे तो हम कितने भी उपाय कर ले मुश्किलें बढ़ती ही जाती है।”

पीएम मोदी ने कहा, “अब देश को सर्वोपरि रखते हुए, माँ भारती को सर्वोपरि रखते हुए, हमें एकजुट होकर के लड़ना होगा। हमें याद रखना है देश के लिए मरना ही सिर्फ देशभक्ति नहीं होती है। देश के लिए जीना और देश के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाना भी देशभक्ति होती है।”

पेट्रोल-डीजल की खपत घटाने पर जोर

PM मोदी ने कहा कि हमें कुछ संकल्प लेने होंगे, जैसे एक बड़ा संकल्प है पेट्रोल-डीजल का संयम से इस्तेमाल करना। उन्होंने कहा, “हमें पेट्रोल डीजल का उपयोग कम करना होगा। शहरों में जहाँ मेट्रो है, वहाँ हम तय करें कि हम मेट्रो का ही उपयोग करेंगे। ज्यादा से ज्यादा मेट्रो में ही जाएँगे। अगर कार में ही जाना जरूरी है तो फिर कार पुल करने का प्रयास करें।”

उन्होंने कहा, “अगर सामान भेजना हो तो रेलवे गुड्स के जो ट्रेन होती है रेलवे की सर्विज से भेजें ताकि इलेक्ट्रिक रेलवे होने के कारण पेट्रोल-डीजल की जरूरत ना पड़ती है। इलेक्ट्रिक व्हीकल का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करें।”

वर्क फ्रॉम होम को प्राथमिकता देने की अपील

पीएम मोदी ने लोगों से घर से काम करने की अपील की है। उन्होंने कहा, “हमने कोरोना के समय में वर्क फ्रॉम होम की व्यवस्था विकसित की और हमें आदत भी हो गई थी। आज उन व्यवस्थाओं को हम फिर से शुरू करें तो वह देश हित में होगा। वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन कॉन्फ्रेंसेस, वर्चुअल मीटिंग्स, इनको हमें फिर से प्राथमिकता देनी है।”

एक साल तक सोना खरीदने से बचने की सलाह

प्रधानमंत्री ने एक वर्ष तक लोगों से सोना ना खरीदने की अपील की है। पीएम मोदी ने कहा कि सोना खरीदने में बहुत अधिक विदेशी मुद्रा खर्च होती है। उन्होंने कहा, “एक जमाना था जब संकट आता था, कोई युद्ध होता था तो लोग देश हित में सोना दान दे देते थे। आज दान की जरूरत नहीं है लेकिन देश हित में हमको यह तय करना पड़ेगा कि साल भर तक घर में कोई भी फंक्शन हो, कोई भी कार्यक्रम हो, हम सोने के गहने नहीं खरीदेंगे। सोना नहीं खरीदेंगे। विदेशी मुद्रा बचाने के लिए हमारी देशभक्ति हमें चुनौती दे रही है और हमें इस चुनौती को स्वीकार करते हुए विदेशी मुद्रा को बचाना होगा।”

खाने के तेल के इस्तेमाल में कटौती की बात

पीएम मोदी ने खाने के तेल के कम इस्तेमाल करने की भी बात कही है। उन्होंने कहा, “खाने के तेल के आयात के लिए भी बहुत बड़ी मात्रा में हमें विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। हर परिवार अगर खाने के तेल में खाने का तेल का जो उपयोग करता है अगर वह कुछ कमी करें मैंने बार-बार कहा है 10% कम करो। अगर हम तेल खाना कम करें ना तो भी वह देशभक्ति का बहुत बड़ा काम है। इससे देश सेवा भी होगी और देह सेवा भी होगी। इससे देश के खजाने का स्वास्थ्य भी सुधरेगा और परिवार के हर सदस्य का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा।”

प्राकृतिक खेती अपनाने का आह्वान

किसानों से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाकर प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ने की अपील की गई है। पीएम मोदी ने कहा, “हम बहुत बड़ी मात्रा में बाहर से केमिकल फर्टिलाइजर इंपोर्ट करते हैं। केमिकल फर्टिलाइजर खेती के कारण हमारी धरती माँ को बहुत पीड़ा हो रही है। हमारे खेत बर्बाद हो रहे हैं। अगर आज हम अपने खेत को नहीं बचाएँगे तो भविष्य में फसलों पर भी खतरा आ जाएगा। इसलिए बहुत जरूरी है कि हम केमिकल फर्टिलाइजर की खपत 25%, 30%, 40%, 50% उसको घटाए आधी कर दें और हम इस उसके साथ-साथ नेचुरल फार्मिंग की तरफ बढ़े।”

पीएम मोदी ने कहा, “हम फर्टिलाइजर का उपयोग कम करके विदेशी मुद्रा भी बचा सकते हैं और साथ-साथ अपने खेत को बचा सकते हैं। हमारी ये धरती माँ को बचा सकते हैं और यह हमें करना ही होगा। आज वैश्विक संकटों से जो चुनौतियाँ आई है, हमें उन चुनौतियों को पार करना ही होगा।”

स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील

पीएम मोदी ने एक बार फिर ‘वोकल फॉर लोकल’ के मंत्र को अपनाने का आग्रह किया है। पीएम मोदी ने कहा, “हम मेड इन इंडिया चीजें खरीद कर भी विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं। हमारे देश में स्थानीय उत्पादन की कोई कमी नहीं है। चाहे जूते हो, पर्स हो, बैग हो, हमें स्वदेशी पर बल देना चाहिए। मेरा आग्रह है कि नए विदेशी प्रोडक्ट हमें नहीं खरीदने चाहिए। और वाकई हमें कई बार अंदाजा तक नहीं होता कि रोजमर्रा की कितनी सारी चीजें विदेशी है जो हम ऐसे ही यूज कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “जब मैं बात स्वदेशी की करता हूँ तो लोगों को लगता है कि दिवाली के दिए खरीदो मतलब स्वदेशी हो गया। यह तो भ्रम फैलाने वाली बातें हैं। इससे सफलता नहीं मिलती है। हमें घर के उपयोग में आने वाले सामान की लिस्ट बनानी है। देखना चाहिए कितनी विदेशी चीजें घुस गई है। फिर इस लिस्ट से हमें हो सके उतना जल्दी स्वदेशी में बदलना चाहिए।”

एक साल तक विदेश यात्रा टालने का सुझाव

पीएम मोदी द्वारा देशवासियों से गैर-जरूरी विदेशी यात्राओं से बचने की भी अपील की गई है। उन्होंने कहा, “आजकल जो विदेशों में घूमने का, विदेशों में वैकेशन पर जाने का मिडिल क्लास में कल्चर बढ़ता जा रहा है। हमें तय करना होगा कि जब यह संकट का काल है और हमारी देशभक्ति हमें ललकार रही है तो कम से कम एक साल के लिए हमें विदेशों में जाने की बातों को टालना चाहिए। भारत में बहुत सारी जगह है। वहाँ हम जा सकते हैं।”

5 भाषाओं की जानकार, स्टालिन की राजनीतिक सलाहकार और अब बनीं ‘विजय सरकार’ की सबसे युवा मंत्री: जानें- कौन हैं 29 साल की एस कीर्तना

तमिलनाडु में सी जोसेफ विजय के नेतृत्व में TVK सरकार का गठन (10 मई 2026) हो गया । 9 मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा सबसे कम उम्र की मंत्री कीर्तना की हो रही है। वह मंत्रिमंडल का एकमात्र महिला चेहरा भी हैं।

सिवाकासी विधानसभा क्षेत्र के इतिहास में 70 साल में पहली बार एक महिला चुनाव जीती है। इस लिहाज से भी 29 साल की कीर्तना का विधायक बनना ऐतिहासिक है। तमिलनाडु जैसे हिन्दी विरोधी राज्य में कीर्तना का फर्राटेदार हिन्दी बोलना सबको आकर्षित कर रहा है।

मंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने कहा कि यह यकीन नहीं होता, क्योंकि किसी दूसरे राज्य में ऐसा कैबिनेट मंत्री नहीं होगा, कोई हमें ऐसा मौका भी नहीं देगा… हम दुनिया को दिखाने जा रहे हैं कि हम सरकार कितनी अच्छी तरह चला सकते हैं।

2026 में पहली बार उन्होंने चुनावी राजनीति में कदम रखा। टीवीके ने उन्हें उस सीट से उतारा, जहाँ 7 दशकों में कभी भी कोई महिला चुनाव नहीं जीत सकी। इसके बावजूद कीर्तना ने पूरी जी-जान से चुनाव प्रचार किया और अपने नेता फिल्मों से राजनीति में आए सी विजय जोसेफ को सीएम बनाने के लिए उन्हें वोट देने की अपील की।

कीर्तना को 68709 वोट मिले। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी डीएमके उम्मीदवार अशोकन जी को 11670 वोटों के अंतर से हराया। कीर्तना का कहना है कि देश के हर नागरिक को राजनीति में शामिल होना चाहिए। आगे आइए और समाज के लिए काम करिए।

तमिल, अंग्रेजी, हिन्दी समेत 5 भाषाओं की जानकार कीर्तना का कहना है कि पार्टी की ऐतिहासिक जीत और वह भी गठन के मात्र दो साल बाद खुद में करिश्माई है।


वह लोगों को यह बताना चाहती है कि कैसे उनकी पार्टी मात्र 2 सालों में सत्ता तक का सफर पूरा किया। वह अपने नेता का संदेश पूरे देश में पहुँचाना चाहती हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उनकी बातों को समझ सके, इसलिए हिन्दी बोल रही हैं।

कौन है एस कीर्तना

टीवीके की विधायक एस कीर्तना अब तमिलनाडु की मंत्री हैं। उन्होंने राजनीतिक सलाहकार के रूप में पूर्व सीएम एमके स्टालिन समेत कई नेताओं के लिए काम किया है। उनके विधानसभा क्षेत्र सिवाकासी में पटाखा फैक्ट्री काफी हैं, इसलिए इसे भारत का पटाखा राजधानी भी कहा जाता है।

कीर्तना का जन्म तमिलनाडु के विरुधुनगर में 1996 मे हुआ था। उनके पिता संपथ वहाँ टीचर थे। कीर्तना ने मदुरै यूनिवर्सिटी से गणित में बीएससी किया और फिर पुडुचेरी सेंट्रल यूनिवर्सिटी से स्टैटिस्टिक में एमएससी की डिग्री हासिल की। उनकी शुरुआती पढ़ाई तमिल में हुई फिर अंग्रेजी में हायर एजुकेशन प्राप्त किया।

तमिलनाडु में हिन्दी विरोधी माहौल के बावजूद कीर्तना ने हिन्दी सीखी और उनकी भाषा पर पकड़ काफी अच्छी है। कीर्तना का मानना है कि हिन्दी भाषा देशभर में संवाद और पहचान बनाने में मदद करती है। उनका बहुभाषी व्यक्तित्व उन्हें तमिलनाडु के दूसरे राजनीतिक चेहरों से अलग करता है। चुनाव प्रचार के दौरान कीर्तना के कई इंटरव्यू हिन्दी में आए, तो लोगों को उनके ‘हिन्दी प्रेम’ का पता चला। शपथ ग्रहण के बाद कीर्तना ने कहा कि तमिलनाडु और यहाँ की जनता के लिए आज बहुत बड़ा दिन है, इस पल का सबको बेसब्री से इंतजार था।

टीवीके ने विधानसभा चनाव में 108 सीटें हासिल की थीं. उन्हें 118 का जादुई आँकड़ा पार करना था। ऐसे में कॉन्ग्रेस-लेफ्ट और वीएसके का समर्थन हासिल कर पार्टी ने 120 का आँकड़ा पा लिया।

पहले MV होंडियस पर ‘हंतावायरस’, अब कैरिबियन प्रिंसेस पर मिला ‘नोरोवायरस’: जानें- कैसे संक्रमण हब बन रहे लग्जरी क्रूज और क्यों Norovirus है सबसे बड़ा सिरदर्द

समंदर में तैरते लग्जरी क्रूज लंबे समय से लोगों के लिए शाही छुट्टियों का प्रतीक रहे हैं। आलीशान कमरे, फाइव स्टार होटल जैसी सुविधाएँ, दुनियाभर के व्यंजन, कसीनो, थिएटर और कई देशों की यात्रा का अनुभव इन्हें खास बनाता है। अब यही लग्जरी क्रूज जहाज एक नई चिंता की वजह बन रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई क्रूज जहाजों पर संक्रामक बीमारियों के मामले तेजी से बढ़े हैं जिसके चलते इन्हें संक्रमण फैलने के बड़े केंद्रों के रूप में देखा जाने लगा है।

कोविड-19 महामारी के दौरान डायमंड प्रिंसेस की भयावह तस्वीरों ने दुनिया को पहली बार दिखाया था कि अगर किसी वायरस ने जहाज में एंट्री कर ली, तो हजारों लोगों के बीच उसे रोकना कितना मुश्किल हो जाता है। अब एक बार फिर दुनिया की नजरें क्रूज शिप पर फैले नोरोवायरस और हंतावायरस के मामलों पर टिक गई हैं। कुछ दिनों पहले ‘MV होंडियस‘ नाम के एक आलीशान जहाज पर हंतावायरस के मामले सामने आए थे।

अब कैरिबियन प्रिंसेस जहाज पर 100 से ज्यादा यात्री और क्रू मेंबर नोरोवायरस से बीमार पड़ गए। उल्टी, दस्त और तेज पेट दर्द जैसी शिकायतों ने पूरे जहाज को प्रभावित कर दिया। इससे पहले भी कई क्रूज जहाजों पर इसी वायरस ने सैकड़ों लोगों को संक्रमित किया है।

सवाल यह है कि आखिर नोरोवायरस इतना खतरनाक क्यों माना जाता है? और क्यों दुनिया की सबसे महँगी और हाईटेक क्रूज इंडस्ट्री भी इसे पूरी तरह रोक नहीं पा रही?

क्या है नोरोवायरस और क्यों माना जाता है इतना खतरनाक?

नोरोवायरस एक बेहद संक्रामक वायरस है जो पेट और आंतों को संक्रमित करता है। इसे आम भाषा में ‘स्टमक फ्लू’ या ‘वॉमिटिंग वायरस’ भी कहा जाता है, हालाँकि यह फ्लू वायरस नहीं होता। यह वायरस इंसान के पाचन तंत्र पर हमला करता है और कुछ ही घंटों में व्यक्ति को गंभीर रूप से बीमार बना सकता है।

संक्रमित व्यक्ति को अचानक उल्टी, पानी जैसे दस्त, पेट में ऐंठन, मतली, बुखार, कमजोरी और शरीर में दर्द जैसी समस्याएँ शुरू हो जाती हैं। कई मामलों में शरीर में पानी की भारी कमी यानी डिहाइड्रेशन भी हो जाता है, जो बुजुर्गों, बच्चों और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।

नोरोवायरस की सबसे बड़ी खतरनाक बात इसकी संक्रमण फैलाने की क्षमता है। मेडिकल एक्सपर्ट्स के मुताबिक किसी व्यक्ति को बीमार करने के लिए वायरस के बहुत कम कण ही काफी होते हैं। यानी अगर किसी संक्रमित व्यक्ति ने किसी सतह को छू लिया और दूसरे व्यक्ति ने वही सतह छूकर खाना खा लिया तो संक्रमण फैल सकता है।

वायरस का केंद्र कैसे बन रहे क्रूज शिप?

पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स क्रूज शिप को ‘सेमी-एनक्लोज्ड इकोसिस्टम’ कहते हैं। मतलब हजारों लोग लंबे समय तक एक सीमित जगह में एक साथ रहते हैं। आधुनिक मेगा क्रूज जहाजों पर 6 हजार से ज्यादा यात्री और करीब 2 हजार क्रू मेंबर मौजूद होते हैं। यह तैरते हुए छोटे शहर जैसा होता है लेकिन फर्क इतना है कि यहाँ सोशल डिस्टेंसिंग लगभग नामुमकिन होती है।

यात्री एक ही लिफ्ट, डाइनिंग हॉल, थिएटर, स्विमिंग पूल, कसीनो और रेलिंग का इस्तेमाल करते हैं। बार-बार छुई जाने वाली सतहें वायरस फैलाने का सबसे बड़ा जरिया बन जाती हैं। नोरोवायरस कई दिनों तक सतहों पर जिंदा रह सकता है। ऐसे में अगर एक भी संक्रमित व्यक्ति जहाज पर मौजूद हो, तो कुछ ही घंटों में वायरस सैकड़ों लोगों तक पहुँच सकता है।

क्रूज जहाजों का डाइनिंग सिस्टम भी संक्रमण फैलाने में बड़ी भूमिका निभाता है। बुफे सिस्टम में एक ही सर्विंग स्पून और ड्रिंक स्टेशन का इस्तेमाल सैकड़ों लोग करते हैं। अगर कोई संक्रमित व्यक्ति खाने के आसपास पहुँच जाए, तो वायरस तेजी से फैल सकता है। यही वजह है कि क्रूज शिप पर फैलने वाले ज्यादातर संक्रमण खाने और साझा सतहों से जुड़े होते हैं।

नोरोवायरस कैसे फैलता है और इसे रोकना इतना मुश्किल क्यों?

नोरोवायरस मुख्य रूप से संक्रमित भोजन, पानी, सतहों और व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क के जरिए फैलता है। यह वायरस इतना जिद्दी होता है कि सामान्य सफाई से भी कई बार पूरी तरह खत्म नहीं होता। कई कीटाणुनाशक उत्पाद भी इस पर उतना असर नहीं दिखाते जितना दूसरे वायरस पर दिखता है।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि संक्रमित व्यक्ति लक्षण दिखने से पहले ही वायरस फैलाना शुरू कर देता है। यानी कोई यात्री खुद को पूरी तरह स्वस्थ महसूस करते हुए जहाज पर चढ़ सकता है और अगले 24 घंटे में सैकड़ों लोगों के संपर्क में आ सकता है। यही वजह है कि बोर्डिंग के समय की हेल्थ स्क्रीनिंग अक्सर बेअसर साबित होती है।

क्रू मेंबर्स का रोल भी बेहद अहम होता है। जहाज के कर्मचारी छोटे और भीड़भाड़ वाले कमरों में रहते हैं और दिनभर यात्रियों के संपर्क में रहते हैं। कोई कर्मचारी बीमार होने के बावजूद काम करता रहे, तो वह सुपर-स्प्रेडर बन सकता है। कई बार नौकरी खोने या आइसोलेशन के डर से कर्मचारी तुरंत बीमारी रिपोर्ट नहीं करते, जिससे संक्रमण और तेजी से फैलता है।

क्रूज इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द क्यों बन चुका है नोरोवायरस?

अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी CDC के मुताबिक, हर साल हजारों लोग क्रूज जहाजों पर नोरोवायरस से संक्रमित होते हैं। पिछले साल 18 अलग-अलग क्रूज आउटब्रेक में 2200 से ज्यादा लोग बीमार पड़े थे। इस साल भी कई बड़े जहाज इसकी चपेट में आ चुके हैं। हाल ही में कैरिबियन प्रिंसेस जहाज पर 102 यात्री और 13 क्रू मेंबर संक्रमित पाए गए।

इससे पहले स्टार प्रिंसेस जहाज पर भी करीब 200 लोग बीमार पड़े थे। हर बार कंपनियाँ जहाज को सैनिटाइज करने और सफाई बढ़ाने का दावा करती हैं, लेकिन इसके बावजूद वायरस लौट आता है। इसके पीछे एक बड़ा कारण ‘टर्नओवर टाइम’ है। एक क्रूज खत्म होने और दूसरे के शुरू होने के बीच सिर्फ कुछ घंटों का अंतर होता है।

इतने कम समय में हजारों यात्रियों को उतारना, पूरे जहाज की डीप क्लीनिंग करना मुश्किल है। कहीं थोड़ी भी लापरवाही रह जाए, तो वायरस अगले सफर में फिर सक्रिय हो सकता है।

कोविड-19 के बाद क्या बदला और फिर भी खतरा क्यों बना हुआ है?

कोविड महामारी ने क्रूज इंडस्ट्री को पूरी तरह हिला दिया था। डायमंड प्रिंसेस जहाज पर 700 से ज्यादा लोगों का संक्रमित होना दुनिया के लिए चेतावनी बन गया। इसके बाद एयर फिल्ट्रेशन सिस्टम, मेडिकल प्रोटोकॉल और सैनिटाइजेशन प्रक्रियाओं में बड़े बदलाव किए गए।

अब कई जहाजों में HEPA फिल्टर लगाए गए हैं, मेडिकल टीम को मजबूत किया गया है और सफाई के नियम सख्त किए गए हैं। CDC का वेसल सेनिटेशन प्रोग्राम (Vessel Sanitation Program) जहाजों का नियमित निरीक्षण भी करता है। लेकिन इसके बावजूद वायरस का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।

एक कारण यह भी है कि जहाज की मूल बनावट को बदलना आसान नहीं है। हजारों लोगों के लिए बने बंद गलियारे, साझा वेंटिलेशन और कॉमन एरिया अब भी संक्रमण फैलाने के लिए अनुकूल माहौल तैयार करते हैं। यही वजह है कि हेल्थ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि क्रूज शिप पर संक्रमण का खतरा पूरी तरह खत्म करना लगभग असंभव है।

यात्रियों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि अब यात्रियों को सिर्फ क्रूज कंपनियों के भरोसे नहीं रहना चाहिए। खुद की सावधानी सबसे बड़ा बचाव है। सफर के दौरान बार-बार हाथ धोना, सैनिटाइजर का इस्तेमाल करना और बिना हाथ साफ किए खाना खाने से बचना बेहद जरूरी है। जहाज पर किसी व्यक्ति में इसके लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत मेडिकल टीम को जानकारी देनी चाहिए।

बुफे सिस्टम में इस्तेमाल होने वाले साझा बर्तनों को छूने के बाद हाथ साफ करना भी जरूरी है। कमजोर इम्यूनिटी वाले लोगों, बुजुर्गों और छोटे बच्चों को क्रूज यात्रा से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। अंटार्कटिका जैसे दूरदराज इलाकों की यात्रा करने वालों के लिए खतरा और भी ज्यादा होता है, क्योंकि वहाँ आसपास बड़े अस्पताल मौजूद नहीं होते।

क्या भविष्य में और बढ़ेगा खतरा?

क्रूज टूरिज्म तेजी से बढ़ रहा है। खासकर अंटार्कटिका और दूरदराज के इलाकों की यात्राओं का ट्रेंड पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ा है। लाखों लोग हर साल इन जहाजों पर सफर कर रहे हैं। लेकिन जितनी तेजी से यह इंडस्ट्री बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से संक्रमण का खतरा भी बढ़ता जा रहा है।

हेल्थ एक्सपर्ट्स का मानना है कि भविष्य में सिर्फ नोरोवायरस ही नहीं बल्कि खसरा, लीजियोनेयर्स रोग, ई कोलाई और दूसरे संक्रामक रोग भी क्रूज इंडस्ट्री के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। ऐसे में कंपनियों को सिर्फ लग्जरी और मनोरंजन पर नहीं, बल्कि हेल्थ सिक्योरिटी और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी भारी निवेश करना होगा।