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चालीस बरस का पहरेदार: एक आदमी की जिद के आगे लाल तूफान बेअसर, वोज़िन्हा के चमत्कार से काबो वर्दे ने स्पेन को ड्रॉ पर रोका

एक चालीस वर्षीय खिलाड़ी सोमवार (15 जून 2026) की रात अपने वतन का नायक बन गया। गुजरी रात वैश्विक फुटबॉल की सबसे बड़ी टीमों में गिने जाने वाली स्पेन को विश्व कप में अपने अभियान की शुरुआत करनी थी। मुकाबला था विश्व कप में पहली दफा उतरने जा रही काबो वर्दे से। काबो वर्दे, जो कि फीफा की वैश्विक रैंकिंग में 67वें स्थान पर है।

कुराकाओ को जिस अंदाज में जर्मनी ने रौंदा था, उससे सभी को यही उम्मीद थी कि कुछ ही ऐसा अटलांटा में होने जा रहे स्पेन बनाम काबो-वर्दे के ग्रुप एच के मुकाबले में भी दर्शकों को देखने को मिलेगा। परन्तु सोमवार रात जिस जुझारू अंदाज में स्पेन के विरुद्ध नब्बे मिनटों तक काबो-वर्दे के खिलाड़ियों ने खेला, यह निश्चित रूप से ही फीफा विश्व कप के इतिहास में इक लोककथा सा अंकित हो गया।

बीती रात अटलांटा के मर्सिडीज-बेंज स्टेडियम में खेले गए मुकाबले में अपनी पारंपरिक लाल जर्सी पहने ‘ला रोज़ा’ की टीम एक ही मकसद के संग मैदान में उतरी; कैसे भी यह मुकाबला जीतकर एक जीत से टूर्नामेंट में शुरुआत करनी चाहिए। मगर अपनी सफेद जर्सियाँ पहने मैदान पर मौजूद काबो-वर्दे के खिलाड़ियों ने कल एक इतनी बड़ी टीम के खिलाफ न सिर्फ शानदार प्रदर्शन किया बल्कि आने वाले मैचों के लिए स्पेन के तमाम विरोधियों को उनकी कमियाँ भी बता दी।

कोच लुई डे ला फुएन्ते ने 4-1-2-3 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान पर उतारा। मिडफील्ड में रोड्री के संग पेड्री और फैबियान रुईज़ मौजूद थे। मगर कोच ने शायद अपनी अटैकिंग लाइन में खिलाड़ियों का ग़लत चुनाव किया। सेंट्रल फॉरवर्ड ओयारजाबाल का साथ देने के लिए विंगर्स के रूप में फेराँ तोरे और गावी को मैदान पर उतारा गया, जबकि नीको, यमाल, विक्टर मुनोज़ जैसे खिलाड़ी बेंच पर मौजूद थे। शायद कोच ने एहतीयातन भी ऐसा कदम उठाया क्योंकि यमाल भीषण रूप से चोटिल होने के चलते कुछ माह से खेल से दूर थे। क्योंकि वह वापसी कर रहे हैं, सीधे उनको मैदान पर उतारना एक बड़ी ग़लती हो सकती थी।

खैर, दोनों राष्ट्रों के राष्ट्रीय-गान के पश्चात रेफरी ने व्हिस्ल बजाई। मैच शुरू हुआ। मैच के शुरुआती क्षणों से ही नन्हें अफ्रीकी देश काबो-वर्दे के खिलाड़ी एक सुगठित यूनिट के तौर पर डिफेंड कर रहे थे। उनका मकसद बस कैसे भी स्पेन को गोल स्कोर करने से रोकना था। और, वो इसमें सफल भी रहे। काबो-वर्दे ने क्या कमाल का डिफेंसिव फुटबॉल खेला। आपको जानकर अचरज होगा कि स्पेन ने पूरे मैच में गोल पर कुल तेईस हमले किए जिसमें से मात्र आठ निशाने पर रहे। उन आठ के आठ हमलों को गोलकीपर वोज़िन्हा ने गोल में बदलने से रोक दिया। चालीस वर्षीय वोज़िन्हा स्पेन और जीत के मध्य के दीवार की भांति खड़े हो गए थे।

स्पेनिश जहाज़ी बेड़ा लगातार आक्रमण करता रहा मगर अंत में स्कोर 0-0 ही रहा। वह वोज़िन्हा के गोलपोस्ट को भेदने में नाकाम रहे। हालाँकि इसमें बड़ी भूमिका ओयारजाबाल, फेराँ तोरे और फाबिएन रुईज की खराब फिनिशिंग की भी रही, जिन्होंने गोल करने के कई आसान मौके गँवाए। यही एक औसत और बेहतरीन खिलाड़ी के मध्य अंतर पैदा करता है। एक बड़ा खिलाड़ी कठिन से कठिन मौकों को भी भुनाने में माहिर होते हैं। याद कीजिए पिछले संस्करण के फाइनल में कीलिएन एमबाप्पे का प्रदर्शन। स्पेनिश टीम आज वोज़िन्हा के शानदार प्रदर्शन के साथ साथ अपनी खराब फिनिशिंग के चलते मैच जीतने से वंचित रह गई।

वोज़िन्हा, जिन्होंने कल रात चालीस की उम्र में विश्व कप में पर्दापण किया, अपने खेल के बूते संपूर्ण फुटबॉल जगत की आँखों के तारे बन गए। मैच पश्चात उन्होंने कहा,”मैं मैच के बाद इसलिए रो पड़ा क्योंकि मैंने ज्यादातर जीवन अपने दादा-दादी के संग बिताया और आज वो ही यहाँ नहीं हैं। कुछ वर्ष पहले मैंने उन्हें खो दिया। मेरी माँ वीजा की अड़चनों और उसमें लगने वाले पैसों के चलते मुझे खेलता देखने नहीं आ सकी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं जीवन में कुछ ऐसा भी कर सकूँगा।”

वहीं ओमार मारमूश व मोहम्मद सालाह की इजिप्ट ने ग्रुप ज़ी के मैच में केविन डि ब्रुएना की बेल्जियम को 1-1 से रोक कर अंक बाँटने के लिए मजबूर कर दिया। यह एक बराबरी का मुकाबला रहा।

इसके बाद लॉस एंजिलिस में खेले गए ग्रुप ज़ी के अगले मैच में ईरान और न्यूज़ीलैंड ने 2-2 का ड्रॉ खेलकर अंक बाँटे। देखने वाली बात यह रही कि ईरान की टीम ने, जिसके खिलाड़ियों ने अमेरिकी हमलों के चलते गुजरे फरवरी से कोई क्लब फुटबॉल नहीं खेली थी, दो दफा मैच में पिछड़ कर भी वापसी की। शुरुआत में जरूर स्टेडियम के भीतर और बाहर सरकार विरोधी नारे लगे परन्तु ईरानी समर्थकों ने मैच शुरू होते ही खेल और राजनीति को अलग रखा। जब जब ईरान के खिलाड़ियों ने गोल स्कोर किए, स्टेडियम ‘ईरान-ईरान’ के नारों से गुंजायमान हो उठा।

गौरतलब है कि अमेरिकी नागरिकों ने भी मैच की पूर्व संध्या पर खुलकर ईरानी समर्थकों का स्वागत करा था व कहा था कि उन्हें हम अपने देश में कोई समस्या नहीं होने देंगे। खेल इस सब से बहुत बड़ा है। इस मैच के ड्रॉ रहने के चलते अब ग्रुप ज़ी में हर टीम ने एक-एक अंक जुटा लिया है।

वहीं पिछली दफा अर्जेंटीना को टूर्नामेंट में अपने शुरुआती मैच में 2-1 से हरा कर सनसनी फैलाने वाली सऊदी अरब की टीम ने फिर इस दफा एक उलटफेर कर दिया है। सऊदी अरब ने मियामी में खेले गए ग्रुप एच के मुकाबले में मार्सेलो बिएल्सा की उरुग्वे को 1-1 की बराबरी पर रोक अपने ग्रुप में एक जरूरी अंक जुटा लिया।

अब आगे मंगलवार (16 जून 2026) के दिन कुल पाँच मैच खेले जाने हैं। भारतीय समयानुसार आज रात साढ़े बारह बजे सितारों से सजी फ्रांस की टीम सेनेगल के विरुद्ध मैदान में उतरेगी। ज्ञात रहे कि दोनों ही राष्ट्रों के मध्य मैदान में एक इतिहास जुड़ा हुआ है। सन् 1998 की विश्व कप विजेता फ्रांस को सन् 2002 में सेनेगल ने ग्रुप स्टेज में हरा कर घर का टिकट कटाने पर मजबूर कर दिया था। हालाँकि इस मुकाबले में भी सेनेगल को कमजोर नहीं आँका जा सकता परन्तु फ्रेंच लड़ाके जरूर हिसाब चुकता करने की भावना से प्रेरित होकर मैदान में उतरेंगे।

इराक अपने से मजबूत नॉर्वे के विरुद्ध मैदान में उतरेगी तो वहीं ऑस्ट्रिया का सामना होगा जॉर्डन से।

फिर होंगे दो बहुप्रतीक्षित मुकाबले। अपना अंतिम विश्व कप खेलने जा रहे हमारी पीढ़ी के दो सितारे क्रिश्चियानो रोनाल्डो और लिओनेल मेस्सी आज टूर्नामेंट में अपना पहला मैच खेलेंगे। रोनाल्डो की पुर्तगाल एक फेवरेट के तौर पर कॉन्गो के विरुद्ध मैदान में उतरेगी। वहीं कोच स्कालोनी की अर्जेंटीनी टीम कन्सास सिटी स्टेडियम में अल्जीरिया का सामना करेगी।

राजा मेहदी अली खान ने 1964 में आई फिल्म ‘वो कौन थी’ के लिए एक गीत लिखा था, जिसे संगीत दिया था मदन-मोहन ने। भारत रत्न लता मंगेशकर जी की जादुई आवाज की चाशनी में डूबे, दिल को चीर कर रख देने वाले, उस गीत में चंद पंक्तियां इस प्रकार हैं, ‘लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो, शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो। हमको मिली हैं आज ये घड़ियाँ नसीब से, जी भर के देख लीजिये हमको क़रीब से। फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो, फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो।’

मेस्सी और रोनाल्डो वह खिलाड़ी हैं जिन्हें देखते हुए ब्राजील की तंग सड़कों से लेकर देहरादून के नेहरू ग्राम तक नन्हें बच्चों ने खेल को अपनाने का ख्वाब देखा। क्या यूरोप, क्या दक्षिण अमेरिका, क्या एशियाई महाद्वीप; बेहद छोटे कस्बों से निकले इन दोनों ही खिलाड़ियों ने पिछले दो दशकों में संपूर्ण विश्व पर राज़ किया और अपने खेल से करोड़ों लोगों के दिल जीते।

एक खूबसूरत परीकथा समाप्त होने जा रही है। एक हसीं ख्वाब टूटने जा रहा है। इस विश्व कप के बाद मेस्सी-रोनाल्डो की प्रतिद्वंद्विता सदैव के लिए थम जाएगी। उससे पहले हमें जरूर इन दोनों ही जादूगरों को एक अंतिम दफा खेलते हुए देख लेना चाहिए। कौन जाने, इस जन्म में फिर मुलाकात हो न हो।

वेस्टर्न सूट आउट, ‘बंदी जैकेट’ इन… अंग्रेजों की विरासत को पीछे छोड़ भारतीय परंपरा की ओर बढ़ी सेना, जानें- नई यूनिफॉर्म पॉलिसी में क्या-क्या हुए बदलाव?

भारतीय सेना ने अंग्रेजों के जमाने की सभी पहचान को पीछे छोड़ते हुए अब भारतीय परंपराओं के अनुरूप वर्दी को अपनाने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। भारतीय सेना ने 174 पेज वाली ‘आर्मी यूनिफॉर्म 2026’ मैनुअल जारी किया है, जिसका उद्देश्य औपनिवेशिक परंपराओं को कम से कम करना, भारतीय पहचान को बढ़ावा देना और सैनिकों के लिए अधिक व्यावहारिक और आधुनिक ड्रेस नियम बनाना है।

नए नियम के तहत औपचारिक कार्यक्रम में बंदी जैकेट को शामिल किया गया है। चमकीली पाउच बेल्ट हटाई गई हैं, साथ ही मूँछ, टैटू, मेकअप को लेकर सख्त मानक तय किए गए हैं। सेना के अधिकारियों का मानना है कि ये बदलाव सेना को अपनी पहचान मजबूत करने के साथ- साथ उसकी रेजिमेंटल विरासत और पेशेवर मूल्यों को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएगी।

पुराना ड्रेस कोड और नए ड्रेस कोड में अंतर

पहले आधिकारिक सिविल कार्यक्रमों में सैन्य अधिकारियों को पश्चिमी लाउंज सूट (Western Lounge Suit) और टाई पहनना जरूरी था, लेकिन अब वेस्टर्न सूट की जगह भारतीय संस्कृति से जुड़ी ‘बंदी जैकेट’ पहनने की आधिकारिक अनुमति दी गई है।

सर्दियों में सभी रैंक के सैनिक पारंपरिक ऊनी वी-नेक स्वेटर और जर्सी (legacy ड्रेस पैटर्न 3A) पहनते थे। ये दूसरे विश्वयुद्ध के वक्त लागू किए गए थे, जिसे अब हटा दिया गया है और उसकी जगह ड्रेस 3बी के तहत आधुनिक ‘बैटल जैकेट’ और अंगोला शर्ट के साथ-साथ सिर पर ‘बेरे कैप’ को शामिल किया गया है। इस बदलाव को जून 2029 तक पूरी तरह लागू कर दिया जाएगा।

विंटर जैकेट और वर्दी पीस स्टेशनों यानी शांति वाले सैन्य क्षेत्रों और मुख्यालयों में तैनात सैनिकों के लिए खास तौर पर लागू किए गए हैं। युद्ध क्षेत्रों या फील्ड में तैनात सैनिक अपनी तय कॉम्बैट (लड़ाकू) यूनिफॉर्म ही पहनेंगे। कॉम्बेट यूनिफॉर्म में भी 7A नाम से नया ड्रेस कोड जोड़ा गया है। इसमें टी-शर्ट शामिल है। 7B यूनिफॉर्म सर्दियों का कॉम्बेट जैकेट है। विंटर सेरिमोनियल में अधिकारियों के लिए 1C नाम से नई ड्रेस जोड़ी गई है। अब तक 1C ड्रेस जवानों और जेसीओ पहनते थे, लेकिन अब इसे अधिकारी भी पहनेंगे।

आधुनिक विंटर जैकेट इंडियन एयरफोर्स और इंडियन नेवी पहले से ही इस्तेमाल कर रही हैं। अब इंडियन आर्मी ने भी इसे अपना लिया है। इससे सेना के तीनों अंगों के नियमों में एकरूपता आ जाएगी।

नए ‘आर्मी यूनिफॉर्म्स-2026’ के तहत औपचारिक अवसरों पर बंद-गले वाली ‘बंदी जैकेट’ पहनना है, वहीं सेरेमोनियल पाउच बेल्ट को हटाया गया है और परेड के दौरान रिव्यूइंग अधिकारियों के लिए तलवार साथ रखना वैकल्पिक होगा। अगर तलवार न रखना चाहें, तो न रखें।

महिलाओं के यूनिफॉर्म में बदलाव

महिला अधिकारियों को सफेद रंगों की साड़ी पहनना है अथवा सफेद दुपट्टे के साथ कुर्ता-सलवार पहन सकते हैं या टखनों तक की लंबाई वाली स्ट्रेट पैंट पहनने की अनुमति होगी। हालाँकि बिना आस्तीन वाले कुर्ते, पलाजो या दूसरे कैज़ुअल लोअर पहनने पर साफ तौर पर मनाही है।

महिला सैनिकों और अधिकारियों को कॉस्मेटिक्स से जुड़े कड़े नियमों का पालन करना होता है। इसे और कड़ा करते हुए
लिपस्टिक, रंगीन नेल पॉलिश, बिंदी और नोज पिन पहनने पर भी रोक लगा दी गई है। उन्हें सिंदूर लगाने की छूट होगी, लेकिन कैप पहनने पर वह दिखाई न दे।

टैटू पर रोक और मूँछों की लंबाई तय

नए नियमों के अनुसार, टैटू और शरीर पर पियर्सिंग की अनुमति नहीं होगी। यूनिफॉर्म में सैनिक किसी भी तरह का ब्रेसलेट नहीं पहन सकेंगे। किसी भी तरह का धार्मिक प्रतीक पहनने पर रोक है, हालाँकि कलावा बाँधने यानी रक्षा सूत्र के साथ साथ सिखों की धार्मिक पहचान वाली चीजों को लेकर छूट दी गई है।

नए नियम में मूँछों की लंबाई तय कर दी गई है। यह 12 सेंटीमीटर से अधिक नहीं हो सकती। सभी सैन्य अधिकारी या जवान यूनिफॉर्म में रहते हुए डिओडोरेंट और परफ्यूम का इस्तेमाल नहीं कर सकते, हालाँकि आफ्टर-शेव लोशन इस्तेमाल करने की इजाजत है।

‘रॉयल’ शब्द हटाया गया

सेना ने अपनी आधिकारिक शब्दावली से ‘रॉयल’ जैसे ब्रिटिश दौर के कई पुराने शब्दों को भी हटा दिया है। सेना में स्वदेशीकरण की मुहिम को पाँच साल पहले नई गति तब मिली थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘कंबाइंड कमांडर्स कॉन्फ्रेंस’ को संबोधित किया था। उन्होंने सशस्त्र बलों को निर्देश दिया था कि वे ब्रिटिश रीति-रिवाजों को समाप्त करें तथा अपने सिद्धांतों, प्रक्रियाओं और परंपराओं में भारतीय मूल्यों को आधिकारिक तौर पर स्थान दें।

कब-कब ड्रेस कोड में हुआ बदलाव

आजादी से पहले अंग्रेजों के जमाने में भारतीय सैनिक लाल रंग की ड्रेस पहना करते थे। इसे बाद में बदलकर खाकी कर दिया गया। आजादी के बाद और देश के बंटवारे को देखते हुए भारतीय सैनिकों को पाकिस्तानी फौजियों से अलग पहचान देना जरूरी था। इसे देखते हुए ‘ऑलिव ग्रीन’ रंग की ड्रेस कोड लागू की गई।

साल 2005-06 में फ्रांसीसी वुडलैंड डिजाइन से प्रेरित होकर भारतीय सैनिकों के लिए कैमोफ्लाज पैटर्न अपनाया गया। सैनिकों के कॉम्बैट यूनिफॉर्म में बड़ा बदलाव 2022 में आया। उस वक्त खास पिक्सल पैटर्न वाली नई डिजिटल कैमोफ्लाज कॉम्बैट यूनिफॉर्म अपनाई गई। इसके तहत नया पैटर्न और बेहतर फैब्रिक आया।

इसका मकसद यूनिफॉर्म को युद्ध क्षेत्रों और फील्ड के सैनिकों की जरूरत को पूरा करना और आरामदायक बनाना था। 2022 की डिजिटल कॉम्बैट यूनिफॉर्म से आगे बढ़कर ‘आर्मी यूनिफॉर्म 2026’ सेना की पूरी ड्रेस संस्कृति को बदलने वाला सबसे बड़ा सुधार माना जा रहा है।

ड्रेस कोड में क्यों किया गया बदलाव

भारतीय सेना के ड्रेस कोड में लगातार बदलाव किए जा रहे हैं। ब्रिटिश औपनिवेशिक विरासत से सेना को मुक्त कराना बहुत जरूरी है। देश की सदियों पुरानी संस्कृति और पहचान को बढ़ावा देने के लिए सरहद पर तैनात सैनिकों की वर्दी को उसके अनुरूप बनाना भी उतना ही जरूरी है।

भारत के विकास और आधुनिकरण की छाप हमारे सैनिकों की वर्दी से भी दिखेगी, जब वह मौसम और सैन्य जरूरतों के मुताबिक अपने ड्रेस पहनेंगी। अब जब पैंट में ज्यादा पॉकेट होंगे तो सामानों को रखने में आसानी होगी। मौसम की मार का भी असर सैनिकों पर नहीं पड़ेगा। इस सबके बीच सेना के तीनों अंगों के सैनिकों के ड्रेस में एकरूपता देश की आन-बान और शान को बढ़ाएगा।

FIFA World Cup 2026: जर्मनी की जीत खबर थी, कुराकाओ का जश्न ‘कहानी’

कभी-कभी खेल हमें वह उम्मीद लौटा देते हैं, जिसकी तलाश हम दुनिया की बड़ी-बड़ी खबरों में करते फिरते हैं।

बीते कुछ साल में दुनिया ने युद्ध देखे, राजनीतिक उथल-पुथल देखी, आर्थिक अनिश्चितताएँ देखीं और समाजों के भीतर बढ़ती बेचैनियाँ भी देखीं। ऐसे दौर में जब बहुत से लोगों को लग रहा था कि फीफा विश्व कप-2026 शायद पिछले संस्करणों जैसी ऊर्जा और उत्साह नहीं जगा पाएगा, तब इस प्रतियोगिता ने धीरे-धीरे अपनी असली ताकत दिखानी शुरू कर दी है।

यह फीफा विश्व कप अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन मैदान पर जो कहानियाँ जन्म ले रही हैं, वे बता रही हैं कि फुटबॉल सिर्फ़ एक खेल नहीं है। यह उम्मीद का उत्सव है। यह उन राष्ट्रों का मंच है जो अपने सपनों के साथ यहाँ पहुँचे हैं। और यह उन करोड़ों लोगों का साझा अनुभव है जो नब्बे मिनट के भीतर हार, जीत, साहस और चमत्कार, सब कुछ एक साथ देख लेते हैं।

इसी क्रम में ग्रुप ई में चार बार की विश्व विजेता जर्मनी ने विश्व कप पदार्पण कर रहे कुराकाओ के विरुद्ध अपने अभियान की शुरुआत की…

शुरू के तीस मिनट तक मैच बेहद ही रोमांचक रहा। मैच के छठे मिनट में ही पच्चीस वर्षीय मिडफील्डर फेलिक्स न्मेचा ने गोल दाग जर्मनी को जरूरी बढ़त दिला दी थी। जर्मन खेमा मैदान के दोनों छोरों से लगातार विरोधी गोलपोस्ट पर हमले किये जा रहा था। परन्तु कुराकाओ की टीम बेहतरीन तरीके से अपने गोलपोस्ट की रक्षा कर रही थी। मजा तो तब आ गया जब कुराकाओ के लिए उनके अटैकिंग मिडफील्डर कोमेनेन्सिया ने मैच के इक्कीसवें मिनट में एक मौका मिलते ही गेंद को गोलपोस्ट के भीतर सरका दिया। हालाँकि तभी हाइड्रेशन ब्रेक हो गया और इस ब्रेक ने कुराकाओ की लय तोड़ दी। डिफेंस लाइन के खिलाड़ी श्लौटरबैक ने बेहतरीन हेडर लगा जर्मनी को पुनः बढ़त दिला दी और स्कोर 2-1 हो गया।

फिर तो जर्मन टीम ने ताबड़तोड़ हमलों की बरसात कर दी। इन हमलों का कुराकाओ की टीम के पास कोई जवाब न था। जर्मन खिलाड़ी थोड़ी-थोड़ी देर बाद लगातार गोल स्कोर करते रहे। मैच का फाइनल स्कोर रहा 7-1। जर्मनी ने इस विश्व कप में एक शानदार जीत से शुरुआत की।

ग्रुप स्टेज के सबसे बेहतरीन मैचों में से एक बीती रात जापान और हॉलेंड के मध्य खेला गया। टेक्सास प्रांत के डल्लास के किसी विशालकाय पॉलिहाऊस से दिखने वाले स्टेडियम में एक ओर गहरी नीली जर्सी पहने जापान की टीम खड़ी थी, जिनका सामना था अपने पारंपरिक गहरी नारंगी रंग की जर्सी में मैदान में उतरी ‘रोनाल्ड कोमान’ की नीदरलैंड्स से। रोनाल्ड कोमान की नीदरलैंड्स कई अहम खिलाड़ियों के चोटिल होने के चलते अपेक्षाकृत एक कमजोर खेमे के संग विश्व कप में पहुँची है। डीप लाइंग मिडफील्डर की भूमिका में अपने जादूगर फ्रैंकी डी यांग को रख कोमान ने 4-1-2-3 की फॉर्मेशन के संग टीम को मैदान में उतारा। नीदरलैंड्स शुरू से ही गेंद को अपने कब्जे में रख रही थी। जापान ने पिछले विश्व कप की ही भांति यहाँ भी शुरुआती व्हिस्ल बजते ही अपना दमखम दिखाया और नीदरलैंड्स को अपने हमलों को गोल में तब्दील नहीं करने दिया। पहले हाफ की समाप्ति तक स्कोर 0-0 था।

कप्तान विरज़िल लॉन जिक ने मैच के पचासवें मिनट पर गोल लगा कर अपनी टीम को काँटे की टक्कर वाले इस मुकाबले में अहम बढ़त दिलाई। परन्तु विरज़िल लॉन ज़िक के इस गोल के ठीक छह मिनट बाद ही नाकामुरा ने मैदान की बाई छोर से मूव बनाकर एक बेहद शानदार गोल स्कोर कर अपनी टीम की इस मैच में वापसी करा दी। परन्तु ऐसे ही थोड़ी ग्रुप स्टेज के इस मैच की सभी को प्रतिक्षा थी। फिर सात मिनट बाद ही ग्रेवनबर्च ने गेंद को सौमरविल की ओर बढ़ाया जिन्होंने गोल स्कोर कर वापस मैच में नीदरलैंड्स को बढ़त दिला दी। किसी नारंगी समंदर सी प्रतीत होती नीदरलैंड्स के समर्थकों की भीड़ झूमने लगी।

मैच आगे बढ़ रहा था। अब कभी भी रेफरी अंतिम व्हिस्ल बजा सकते थे। तभी अचानक ही जापान की आक्रामक पंक्ति तेज गति से सधे हुए तरीके से विरोधी गोलपोस्ट की ओर बढ़ी। उनके अटैक के चलते जापान को एक कॉर्नर किक मिली। और मैच के अंतिम क्षणों में दाईची कमाडा ने खूबसूरत हेडर लगा जापान के लिए गोल दाग स्कोर बराबर कर दिया। दाईची कमाडा का अंतिम क्षणों में दागा गया यह गोल किसी कटार की भांति था। इस गोल के चलते ग्रुप एफ के इस मैच में रैंकिंग में अपने से काफी बेहतर विरोधी के विरुद्ध जापान ने एक जरूरी अंक जुटा लिया। नीदरलैंड्स ने जहाँ गोल पर ग्यारह शॉट लगाए पर निशाने पर मात्र सात शॉट रहे। उसमें भी वह दो ही शॉट पर गोल स्कोर कर सके। वहीं जापान ने गोलपोस्ट पर कुल तीन ही शॉट लगाए और उनमें से भी दो शॉट को सफलतापूर्वक गोल में तब्दील किया। इसका ही नतीजा रहा कि नीदरलैंड्स जीत से वंचित रह गया।

उधर फिलाडेल्फिया में खेले गए ग्रुप ई के एक मुकाबले में आइवरी कोस्ट ने 1-0 से इक्वाडोर को मात दे ग्रुप में अपनी स्थिति मजबूत की। वहीं ग्रुप एफ के एक और मुकाबले में स्वीडन का सामना ट्यूनीशिया से था। स्वीडन की अटैकिंग लाइन में विक्टर ग्योकेरेज़ व एलेक्सैंडर आइसैक जैसे तेजतर्रार खिलाड़ी मौजूद हैं। लुकास बर्गवाल व एंथोनी इलांगा सरीखे होनहार खिलाड़ी बेंच पर थे। स्वीडन ने 5-1 से ट्यूनीशिया को इस मुकाबले में रौंद डाला।

ग्रुप एफ में जापान व नीदरलैंड्स के मैच के ड्रॉ रहने के चलते, इस जीत ने इस ग्रुप में स्वीडन को अच्छी बढ़त दिला दी है।

अब आने वाली रात यूरोपीयन फुटबॉल के महाकाव्य का रचयिता स्पेन अपने अभियान की शुरुआत करेगा। रात जब आसमान में तारे टिमटिमाने लगेंगे, भारतीय समयानुसार रात साढ़े नौ बजे स्पेन अटलांटा के मर्सिडीज-बेंज स्टेडियम में क्षेत्रफल व जनसंख्या के आधार पर विश्व कप के संपूर्ण इतिहास में मुख्य ड्रॉ के लिए क्वालीफाई करने वाले दूसरे सबसे छोटे राष्ट्र काबो-वर्दे के खिलाफ मैदान में उतरेगी। ग्रुप एच के इस मुकाबले पर आपकी नजर जरूर होनी चाहिए।

आगे भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे केविन डि ब्रुएना की बेल्जियम का मुकाबला होगा मोहम्मद सालाह की इजिप्ट से तो वहीं रात साढ़े तीन बजे उरुग्वे सऊदी अरब के खिलाफ अपने सफर की शुरुआत करेगा।

शायद फुटबॉल का सबसे बड़ा जादू यही है कि यह हमें केवल गोल और परिणाम नहीं देता, बल्कि इंसानी जज़्बे की ऐसी कहानियाँ भी देता है जो स्कोरबोर्ड से कहीं बड़ी होती हैं।

कुछ ही दिन पहले ऑस्ट्रेलिया ने अपने से कहीं अधिक मजबूत मानी जा रही तुर्की की टीम को 2-0 से हराकर पूरे टूर्नामेंट को चौंका दिया था। और बीती रात जर्मनी से 7-1 की करारी हार झेलने के बावजूद कुराकाओ के समर्थक मैच खत्म होने के बाद भी अपनी टीम के लिए तालियाँ बजाते रहे। उनके लिए हार से बड़ा तथ्य यह था कि उनका छोटा-सा द्वीपीय राष्ट्र पहली बार विश्व कप के मंच पर खड़ा था।
मैच के बाद एक समर्थक ने कहा, “आज हमारा छोटा-सा देश दुनिया के सबसे बड़े फुटबॉल मंच का हिस्सा है। क्या खुश होने के लिए इतना काफी नहीं? वी हैव अराइव्ड, एंड वी शैल रीजॉइस दिस मोमेंट।”

यही विश्व कप की खूबसूरती है।

यह केवल ट्रॉफी जीतने वालों की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की भी कहानी है जो यहाँ तक पहुँचने भर को अपनी सबसे बड़ी जीत मानते हैं।
टूर्नामेंट अभी लंबा है। कई दिग्गज अपनी यात्रा शुरू करने वाले हैं, कई नए नायक जन्म लेंगे, कई सपने टूटेंगे और कई उम्मीदें परवान चढ़ेंगी।
फिलहाल तो यह बस शुरुआत है।

और अगर शुरुआती दिनों ने कुछ साबित किया है, तो वह यह कि आने वाले दिनों में यह विश्व कप हमें और भी यादगार कहानियाँ देने वाला है।

बने रहिए साथ, क्योंकि फुटबॉल का यह महाकाव्य अभी अपने शुरुआती अध्यायों में ही है।

ED की शिकायत के बाद ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ पर कसा शिकंजा, जानिए FIR की डिटेल: विदेशी फंडिंग से चल रहा था ईसाई धर्मांतरण, बनाए जा रहे थे नक्सली

अमेरिका का ईसाइयत का प्रचार करने वाला संगठन टिमोथी इनिशिएटिव यानी टीटीआई से जुड़ा एक अहम खुलासा हुआ है।ईडी की शिकायत पर टीटीआई और छह अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। मामला विदेशी डेबिट कार्डों के माध्यम से भारत में 92.55 करोड़ रुपए की विदेशी रकम के हस्तांतरण से संबंधित है। Opindia को एफआईआर की कॉपी मिली है। इसके अनुसार, ईडी ने अपनी शिकायत में कहा है कि टीटीआई के प्रशिक्षण और गरीब लोगों के ब्रेनवॉशिंग के कारण वामपंथी उग्रवाद को बढ़ावा मिला।

बेंगलुरु के कोथनूर थाने में इस संबंध में भारतीय न्याय संहिता और गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम की धारा 13, 17 और 18 के तहत एफआईआर दर्ज किया गया है। ईडी के अनुसार, जाँच में पता चला है कि नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच करीब 92.55 करोड़ रुपए का इस्तेमाल नियमों का उल्लंघन करते हुए किया गया। एजेंसी का कहना है कि यह धन विदेशी डेबिट कार्डों के माध्यम से निकाला गया और अलग अलग जगहों पर खर्च किया गया।

(साभार- बेंगलुरु पुलिस)

गौरतलब है कि आयकर अधिनियम की धारा 132 और विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA) की धारा 37 के तहत 18 और 19 अप्रैल 2026 को ईडी ने तलाशी अभियान चलाया था।

एफआईआर में नामजद आरोपी

एफआईआर में जिन आरोपितों के नाम दर्ज हैं, उनमें जोनाथन एस राजन, मीका मार्क, अजीत वर्गीज मथाई, वर्गीज चाको, बबलू कुर्मी, सुप्रीम जॉय और द टिमोथी इनिशिएटिव यूएसए और अन्य शामिल हैं।

एफआईआर के अनुसार, आरोपितों और अमेरिका स्थित ईसाई प्रचारक संगठन ने अमेरिका के एक बैंक द्वारा जारी डेबिट कार्डों के माध्यम से विदेशी फंडिंग को भारत में लाने के लिए आपराधिक साजिश रची। एफआईआर में कहा गया है कि यह रकम देशभर के एटीएम से निकाली गई और टीटीआई से संबंधित गतिविधियों में इस्तेमाल की गई।

विदेशी डेबिट कार्ड और 92.55 करोड़ रुपए का घोटाला

शिकायतकर्ता के अनुसार, FEMA अधिनियम और विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) का उल्लंघन करते हुए नवंबर 2025 और अप्रैल 2026 के बीच करीब 92.55 करोड़ रुपए या 9995240 अमेरिकी डॉलर का इस्तेमाल किया गया। संगठन ने इस अवधि में खुल कर कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया।

एफआईआर में कहा गया है कि जनवरी 2024 और मार्च 2026 के बीच कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और असम सहित कई राज्यों में विदेशी डेबिट कार्ड का उपयोग करके लगभग 44 करोड़ रुपए निकाले गए।

बेंगलुरु हवाई अड्डे पर माइका मार्क को रोका गया

एफआईआर का एक अहम हिस्सा है 18 अप्रैल 2026 को बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मीका मार्क की गिरफ्तारी। एफआईआर के अनुसार, जब ईडी ने उसे रोका तो उसके पास से 24 विदेशी डेबिट कार्ड बरामद हुए।

जाँच के दौरान, एजेंसी को पता चला कि मीका मार्क कई बार विदेश यात्रा कर चुका था और विदेशी डेबिट कार्ड भारत लेकर आया था। एफआईआर के अनुसार, वह भारत में टीटीआई के वित्तीय कार्यों को संभालने वाला अहम व्यक्ति था।

एफआईआर में कहा गया है कि अधिकांश विदेशी डेबिट कार्ड ‘संतोष कुमार’ के नाम पर छपे थे। चूँकि कार्डों पर एक ही नाम था, इसलिए उन्हें आंतरिक रूप से NE-1, NE-2 और दक्षिणी क्षेत्र-1 जैसे क्षेत्रीय लेबलों का उपयोग करके पहचाना गया। ऐसा कानून प्रवर्तन एजेंसी (LEA) और केवाईसी जाँच के दौरान संदेह से बचने और मूल रिकॉर्ड को छिपाने के लिए किया गया था। पिछले कुछ वर्षों में भारत में लगभग 1000 ऐसे डेबिट कार्ड वितरित किए गए थे।

डिजिटल साक्ष्य नष्ट कर दिए गए

शिकायतकर्ता ने एफआईआर डिजिटल साक्ष्यों को नष्ट करने की बात कही है। एफआईआर के अनुसार, ईडी ने जब तलाशी अभियान शुरू किया, तो टीटीआई ग्लोबल पोर्टल भारतीय यूजर्स के लिए मौजूद नहीं रहा यानी भारतीय यूजर्स इसका इस्तेमाल अब नहीं कर सकते थे। इसमें आगे कहा गया है कि अमेरिका में टीटीआई ने अपने सर्वरों तक में रिमोट एक्सेस के माध्यम से क्लाउड में जमा डेटा को मिटा दिया।

पूछताछ के दौरान मीका मार्क ने स्वीकार किया कि उसका खाता अब मौजूद नहीं है। घटना की रिपोर्ट और वीडियो रिकॉर्डिंग शिकायतकर्ता ने पुलिस को उपलब्ध कराई थी।

LWE से प्रभावित क्षेत्रों में संदिग्ध निकासी

जाँच में सबसे चौकानेवाला पहलू वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों में संदिग्ध लेन-देने था। नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के धमतरी और बस्तर में इन विदेशी डेबिट कार्डों के माध्यम से संदिग्ध रकम की लेन-देने की गई थी। इन क्षेत्रों में लगभग 6.34 करोड़ रुपए निकाले गए। एफआईआर में आगे कहा गया है कि बड़ी मात्रा में नकदी निकालने के लिए डेबिट कार्डों का सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल किया गया था, जो एक संगठित नेटवर्क की संलिप्तता का संकेत है।

एफआईआर में कहा गया है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नकदी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल भारत की सुरक्षा और अखंडता के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है। ऐसी गैरकानूनी गतिविधियों से अवैध रूप से धन का हस्तांतरण होता है। इसमें बताया गया है कि 10000 रुपए के बदले 3200 रुपए का लेन-देन कर लगभग 3.2 करोड़ रुपए निकाले गए।

एफआईआर में विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि यह राशि छत्तीसगढ़ के धमतरी में बस्तर रोड पर विजय प्लाजा में एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक एटीएम से निकाला गया। इसके लिए दो डेबिट कार्डों का उपयोग किया गया। इसमें कहा गया है कि निकासी फील्ड-लेवल वर्कर वर्गीस चाको की देखरेख में की गई थी।

विदेशी धन की आवाजाही को लेकर UAPA लागू किया गया

एफआईआर में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ के वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद प्रभावित जिलों में इकाइयों और फील्ड कार्यकर्ताओं के माध्यम से जो पैसे निकाले गए उसका एक पैटर्न था। इस पैटर्न में अमेरिका के टिमोथी इनिशिएटिव का धन भी शामिल था।

इसमें आगे कहा गया है कि यह प्रथम दृष्टया गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की धारा 2 के तहत ‘गैरकानूनी गतिविधि’ है। एफआईआर में यह भी कहा गया है कि विदेशी धन को नक्सली प्रभाव वाले क्षेत्रों में ले जाने का इरादा था।

इसी वजह से एफआईआर में कहा गया है कि विदेशी संस्था टीटीआई से छत्तीसगढ़ के एलडब्ल्यूई और नक्सल प्रभावित जिलों में धन ट्रांसफर पर यूएपीए के प्रावधान लागू होते हैं।

अजीत वर्गीस मथाई और जोनाथन एस राजन की भूमिका

एफआईआर के अनुसार, अजीत वर्गीस मथाई टीटीआई का भारत में वित्त प्रमुख थे। इसमें कहा गया है कि धन हस्तांतरण बेंगलुरु में पंजीकृत अलग-अलग फर्जी संस्थाओं के माध्यम से किए गए थे। इसके अलावा मथाई के कार्यालय से विदेशी डेबिट कार्डों का उपयोग करके निकाली गई 37 लाख रुपये की नकदी जब्त की गई।

एफआईआर में यह भी कहा गया है कि जोनाथन एस राजन भारत में टीटीआई प्रमुख था। उसने अजीत वर्गीज मथाई के साथ मिलकर पूरे भारत में टीटीआई की गतिविधियों के लिए एटीएम से पैसे निकालने की साजिश रची थी।

एफआईआर में बताया गया है कि इस पैसे का इस्तेमाल प्रशिक्षण, धार्मिक उपदेश और गरीब लोगों का वामपंथी उग्रवाद की ओर ले जाने वाले तरीके से ब्रेनवॉश करने जैसी गतिविधियों के लिए किया गया था। इसमें यह भी कहा गया है कि जोनाथन राजन ऐसे प्रशिक्षण आयोजित करने वाले व्यक्तियों के चयन और ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन स्थलों की पहचान का काम देखता था।

(साभार- बेंगलुरु पुलिस)

क्षेत्रीय स्तर के कार्यकर्ता और टीटीआई का खर्च

एफआईआर में आगे कहा गया है कि वर्गीस चाको, सुप्रीम जॉय और बबलू कुर्मी फील्ड स्तर के कार्यकर्ता थे। इनलोगों ने दूसरों के साथ मिलकर साजिश रचते हुए विदेशी डेबिट कार्डों का उपयोग करके कई एटीएम से पैसे निकाले और उनका इस्तेमाल टीटीआई के उद्देश्यों के लिए किया।

एफआईआर में आगे कहा गया है कि सबूतों से पता चला है कि टीटीआई ने भारत में 95 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए थे। इसमें टीटीआई के अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर quickbook.com के स्क्रीनशॉट को भी शामिल किया गया और बताया गया है कि मीका मार्क से पिछले छह महीनों के दौरान विभिन्न फील्ड कोऑर्डिनेटरों द्वारा एकत्र किए गए व्यय बिलों के बारे में पूछताछ की गई थी। एफआईआर के अनुसार, उन्होंने बताया कि ये बिल टीटीआई द्वारा नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच भुगतान किए गए थे।

विदेशी फंडिंग नेटवर्क को लेकर जाँच

TTI के खिलाफ दर्ज FIR में विदेशी फंडिंग नेटवर्क को हाल ही में जाँच में शामिल किया गया है। यह प्रवर्तन निदेशालय (ED) की निगरानी में है। OpIndia ने पिछले कुछ महीनों में TTI पर कई रिपोर्ट प्रकाशित की हैं। हमारी जाँच के दौरान ये खुलासा हुआ था कि TTI ने भारत में अपना नेटवर्क कैसे बनाया, विदेशी चर्च ने इसकी गतिविधियों का समर्थन कैसे किया और FCRA की मंजूरी न होने के बावजूद विदेशों से भारत में धन कैसे लाया गया। ईडी इसकी भी जाँच कर रहा है।

जैसा कि इस श्रृंखला में पहले बताया गया है, टीटीआई की शुरुआत 2009 में ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ के रूप में हुई थी और बाद में 2009 में इसका नाम बदलकर टीटीआई कर दिया गया। इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स थे। पहली बार 1992 में वे भारत आए थे। संगठन ने बाद में भारत और अन्य देशों में ‘चर्च-स्थापना मॉडल’ विकसित किया।

टीटीआई का मॉडल स्थानीय स्तर पर ईसाइयत के प्रचार पर आधारित था। इसके लिए पॉल, टिमोथी और टाइटस की नियुक्ति होती थी । इस मॉडल में कम खर्च पर किसी स्थानीय व्यक्ति के घर पर प्रार्थना की जाती थी। इसमें कुछ सौ डॉलर में सारा काम हो जाता था।

ऑपइंडिया की जाँच से पता चला कि टीटीआई का भारत केंद्रित कार्य कोई स्वतंत्र गतिविधि नहीं थी। यह विदेशी चर्चों और ईसाई नेटवर्कों के एक व्यापक तंत्र से जुड़ा हुआ था , जिनमें से अधिकांश अमेरिका और कनाडा के थे। हमारी जाँच के दौरान सामने आए नामों में केंसिंग्टन चर्च, मिशन ग्रोव चर्च, नॉर्थवेस्ट बैपटिस्ट चर्च, वुडडेल चर्च, राइज सिटी चर्च, मिशन हिल्स चर्च, फर्स्ट प्रेस्बिटेरियन चर्च ऑफ हैनफोर्ड, स्प्रिंगब्रुक कम्युनिटी चर्च, बैपटिस्ट जनरल कॉन्फ्रेंस ऑफ कनाडा, लिबर्टी चर्च नेटवर्क, ऑल एक्सेस इंटरनेशनल, साल्टबॉक्स चर्च और वुडसाइड बाइबल चर्च शामिल थे।

इनमें से कई विदेशी चर्चों ने भारत में टीटीआई के साथ अपने काम की जानकारी दी है। स्थानीय स्तर पर चर्च की स्थापना, पादरियों का प्रशिक्षण, जमीनी दौरे और धन जुटाना इनका काम था। केंसिंग्टन चर्च उत्तर भारत के हजारों स्थानीय चर्च से जुड़ा था। मिशन ग्रोव चर्च ने उत्तरी भारत और नेपाल में हजारों चर्चों और भारत और बांग्लादेश में चर्च की स्थापना से संबंधित धन जुटाने की बात कही। वुडडेल चर्च भारत, नेपाल और बांग्लादेश में टीटीआई के प्रशिक्षण दौरों से जुड़ा था, साथ ही हजारों नेताओं और चर्चों का भी जिक्र किया गया।

इसके अलावा यह भी पाया गया कि टीटीआई की अपनी प्रशिक्षण और परिचालन सामग्री से पता चलता है कि संगठन ने स्थानीय कार्यकर्ताओं को हिंदू-बहुल गाँवों में प्रवेश करने, हिंदुओं से संपर्क करने, संदेह से बचने, स्थानीय सामाजिक संरचनाओं का उपयोग करने और संपर्क स्थापित करने के लिए जातिगत नेताओं की पहचान करने का प्रशिक्षण कैसे दिया। संगठन का मॉडल केवल बाहर से प्रचार करने तक सीमित नहीं था। यह स्थानीय स्तर के कार्यकर्ताओं, गाँव स्तर तक पहुँच और एक सुनियोजित योजना पर निर्भर था।

एफसीआरए और फेमा के उल्लंघनों से शुरू हुआ यह मामला अब राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में आ गया है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

युद्ध की विभीषिका, भू-राजनीतिक समीकरण और होर्मुज की खाड़ी पर सिमटा कूटनीतिक सफर: US-ईरान में शांति समझौता, समझें इस जंग में किसे मिली ‘फतह’

मिडिल-ईस्ट में महीनों से जारी विनाशकारी जंग के बाद मेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक शांति समझौता (MOU) हो गया है, जिसने दुनिया को लगभग तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने से बचा लिया है। कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता से हुए इस समझौते के तहत आगामी 19 जून 2026 को जेनेवा में औपचारिक हस्ताक्षर किए जाएँगे। शुरुआत में दोनों देशों के बीच 60 दिनों के युद्धविराम (सीजफायर) पर सहमति बनी है, जिससे फिलहाल सैन्य कार्रवाइयाँ रुक गई हैं।

इस स्पेशल रिपोर्ट के माध्यम से हम ये समझते हैं कि दोनों पक्षों के बीच किन मुख्य शर्तों पर सहमति बनी है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बड़े-बड़े दावों के विपरीत क्या वाकई यह समझौता सिर्फ होर्मुज की खाड़ी को खोलने तक ही सिमट कर रह गया है? आखिर इस भयंकर लड़ाई का असली विजेता कौन है?

शांति समझौते का ऐतिहासिक आगाज और विनाशकारी युद्ध की पृष्ठभूमि

मिडिल-ईस्ट के आधुनिक इतिहास में 28 फरवरी 2026 का दिन एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हुआ था, जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ सीधे और पूर्ण सैन्य मोर्चे की घोषणा कर दी थी। दशकों से चला आ रहा छद्म युद्ध (Proxy War) और राजनयिक गतिरोध अचानक एक ऐसे सीधे सैन्य टकराव में बदल गया, जिसने पूरे वैश्विक परिदृश्य को हिलाकर रख दिया। महीनों तक चली इस भीषण और विनाशकारी जंग में दोनों पक्षों को जान-माल का अभूतपूर्व नुकसान उठाना पड़ा।

इस युद्ध की विभीषिका का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सहित देश के दर्जनों शीर्ष सैन्य और असैन्य अधिकारी मारे गए। इस अभूतपूर्व नेतृत्व संकट के बीच ईरान की कमान अली खामेनेई के बेटे मोजताबा खामेनेई ने संभाली और युद्ध को जारी रखा। इस संघर्ष में हजारों निर्दोष नागरिकों और सैनिकों की जान गई, लाखों लोग विस्थापित हुए और कई ऐतिहासिक शहर मलबे के ढेर में तब्दील हो गए।

वैश्विक स्तर पर इस युद्ध ने अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों को धराशायी कर दिया और कच्चे तेल की कीमतों को रिकॉर्ड स्तर पर पहुँचाकर वैश्विक अर्थव्यवस्था को मंदी के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया।

इस विनाशकारी गतिरोध को तोड़ने और दुनिया को एक संभावित तीसरे विश्व युद्ध की आग से बचाने के लिए परदे के पीछे से कूटनीतिक प्रयास शुरू हुए। कतर और पाकिस्तान जैसे देशों ने इस बेहद जटिल और संवेदनशील परिस्थिति में मध्यस्थ की भूमिका निभाई।

महीनों तक चली लंबी, थकाऊ और अत्यंत कठिन वार्ताओं के बाद आखिरकार दोनों देशों के रणनीतिकार एक शुरुआती शांति समझौते यानी समझौता ज्ञापन (MOU) के मसौदे पर सहमत होने में सफल रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस सौदे के पूरा होने की आधिकारिक घोषणा करते हुए इसे अपनी एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी के रूप में पेश किया।

दूसरी ओर ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने भी एक आधिकारिक बयान जारी कर इस बात की पुष्टि की कि दोनों देशों ने महीनों की कठिन वार्ता के बाद एक साझा रूपरेखा तैयार कर ली है। इस समझौते के लागू होते ही सभी मोर्चों पर तात्कालिक रूप से सैन्य कार्रवाइयाँ रोक दी गईं, जिससे इस क्षेत्र में फिलहाल एक बड़ी मानवीय और आर्थिक तबाही पर विराम लग गया है।

इस ऐतिहासिक और बहुप्रतीक्षित शांति समझौते पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर करने की तिथि और स्थान भी सुनिश्चित कर लिया गया है। आने वाले शुक्रवार (19 जून 2026) को स्विटजरलैंड के कूटनीतिक केंद्र जेनेवा में एक भव्य और औपचारिक अंतरराष्ट्रीय समारोह का आयोजन किया जाएगा।

मध्यस्थ देश पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और ईरानी विदेश मंत्रालय ने इस बात की पुष्टि की है कि इस समारोह में दोनों देशों के उच्चायुक्त और अंतरराष्ट्रीय गवाहों की मौजूदगी में इस मसौदे पर आधिकारिक मुहर लगाई जाएगी। इस समझौते के तहत शुरुआती चरण में 60 दिनों के युद्धविराम (Cease-fire) की घोषणा की गई है।

यह 60 दिन का समय दोनों देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इसी दौरान दोनों पक्षों के राजनयिक और रणनीतिकार युद्ध को पूरी तरह से समाप्त करने, स्थायी शांति स्थापित करने और भविष्य के संबंधों की दिशा तय करने के लिए जेनेवा और अन्य कूटनीतिक मंचों पर गहन और विस्तृत वार्ता के अगले दौर की शुरुआत करेंगे।

डोनाल्ड ट्रंप के दावों और हकीकत में दिखा अंतर

इस समझौते के सामने आने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उन पुराने बयानों की याद ताजा हो गई है, जो उन्होंने युद्ध की शुरुआत और उसके दौरान दिए थे। राष्ट्रपति ट्रंप और उनके कट्टरपंथी रणनीतिकारों का रुख ईरान को लेकर हमेशा से बेहद आक्रामक और सख्त रहा था। युद्ध के शुरुआती हफ्तों में ट्रंप ने कई सार्वजनिक रैलियों, प्रेस वार्ताओं और सोशल मीडिया पोस्ट्स के जरिए यह दावा किया था कि वे ईरान को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर देंगे।

ट्रंप ने अमेरिकी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करते हुए चेतावनी दी थी कि यदि ईरान ने आत्मसमर्पण नहीं किया, तो उसके सभी महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, आर्थिक केंद्रों और सांस्कृतिक धरोहरों को निशाना बनाया जाएगा। ट्रंप का स्पष्ट विजन था कि इस युद्ध के जरिए ईरान के इस्लामी शासन को उखाड़ फेंका जाए और वहाँ एक ऐसी व्यवस्था लाई जाए जो वाशिंगटन के हितों के अनुकूल हो, जिसे कूटनीतिक भाषा में ‘सत्ता परिवर्तन’ (Regime Change) कहा जाता है।

ट्रंप के दावों का एक बड़ा हिस्सा ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी संप्रभुता से जुड़ा हुआ था। उन्होंने बार-बार यह रेखांकित किया था कि ईरान के पास परमाणु तकनीक विकसित करने या यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) करने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। ट्रंप प्रशासन का मानना था कि साल 2015 में पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान हुआ परमाणु समझौता (JCPOA), जिससे ट्रंप ने 2018 में अमेरिका को अलग कर लिया था, एक ‘बेहद खराब और कमजोर सौदा’ था।

ट्रंप ने दावा किया था कि वे इस युद्ध के माध्यम से ईरान को एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करेंगे, जो ओबामा के समझौते से सौ गुना अधिक सख्त होगा। इस प्रस्तावित कड़े रुख के तहत ईरान को अपने सभी परमाणु रिएक्टरों को हमेशा के लिए बंद करना पड़ता, अपने मिसाइल कार्यक्रम को पूरी तरह समाप्त करना पड़ता और अपने क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों को असीमित पहुँच देनी पड़ती।

अमेरिकी प्रशासन ने ईरान को पूरी तरह से आर्थिक रूप से पंगु बनाने के लिए एक वैश्विक नौसैनिक नाकाबंदी लागू की थी, ताकि ईरान की जीवनरेखा माना जाने वाला तेल व्यापार पूरी तरह ठप हो जाए। ट्रंप का मानना था कि इस भीषण सैन्य और आर्थिक दबाव के आगे ईरान के नए नेतृत्व के पास घुटने टेकने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। उन्होंने बार-बार दोहराया था कि जब तक ईरान उनकी सभी ‘अधिकतम माँगों’ (Maximalist Demands) को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर लेता, तब तक अमेरिका अपनी सैन्य कार्रवाई और प्रतिबंधों को वापस नहीं लेगा।

ट्रंप के ये बयान अमेरिकी जनता और उनके सहयोगियों को यह विश्वास दिलाने के लिए थे कि अमेरिका इस युद्ध में एक पूर्ण और निर्णायक जीत हासिल करने जा रहा है, जहाँ शर्तों को सिर्फ और सिर्फ वाशिंगटन ही तय करेगा, लेकिन यहाँ मामला उल्टा दिख रहा है।

होर्मुज की खाड़ी तक सिमटता दिख रहा समझौता

अब जबकि इस समझौते की वास्तविक रूपरेखा सामने आई है, तो यह साफ दिख रहा है कि ट्रंप के बड़े-बड़े दावे और उद्देश्य इस समझौते में कहीं पीछे छूट गए हैं। यह पूरा समझौता मुख्य रूप से ‘होर्मुज की खाड़ी’ (Strait of Hormuz) को दोबारा खोलने और वहाँ से व्यापार बहाल करने तक ही सिमट कर रह गया है।

इस समझौते का सबसे बड़ा और तत्काल हासिल यह है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए तुरंत खोल देगा और इसके बदले में अमेरिका ईरानी बंदरगाहों पर लगाई गई अपनी नौसैनिक नाकाबंदी (Naval Blockade) को पूरी तरह हटा लेगा।

ट्रंप जिन मुख्य मुद्दों पर अड़े थे जैसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना, उसके समृद्ध यूरेनियम (Enriched Uranium) के भंडार को नष्ट करना और ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना वे सभी बातें इस शुरुआती समझौते से पूरी तरह नदारद हैं।

अमेरिका में ट्रंप के विरोधी और विशेषज्ञ इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि जो होर्मुज की खाड़ी युद्ध शुरू होने से पहले भी खुली हुई थी, उसे ही दोबारा खुलवाने के लिए अमेरिका ने अरबों डॉलर पानी की तरह बहा दिए और कई अमेरिकी सैनिकों की जान जोखिम में डाल दी। जिन बुनियादी विवादों के कारण युद्ध शुरू हुआ था, उन्हें सुलझाने के बजाय अगले 60 दिनों की भविष्य की वार्ताओं पर टाल दिया गया है।

संघर्ष विराम के 14 अहम बिंदु, जिनपर टिका है समझौते का भविष्य

अमेरिका और ईरान के बीच हुए इस ऐतिहासिक संघर्ष विराम और अस्थाई शांति के पीछे 14 बिंदुओं (14 Points) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विस्तृत मसौदा है। इन 14 बिंदुओं को दोनों देशों के राजनयिकों ने कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता में तैयार किया है, ताकि युद्ध की लपटों को तुरंत शांत किया जा सके और एक दीर्घकालिक स्थायी समझौते के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार की जा सके। यह 14 सूत्रीय एजेंडा वर्तमान में दोनों देशों के बीच सैन्य गतिरोध को पूरी तरह समाप्त करने का एकमात्र कानूनी और कूटनीतिक आधार है।

  1. सैन्य कार्रवाइयों की तत्काल समाप्ति: अमेरिका और ईरान सभी मोर्चों पर अपनी सभी प्रकार की सैन्य कार्रवाइयों, हवाई हमलों, और नौसैनिक झड़पों को तुरंत प्रभाव से पूरी तरह बंद कर देंगे।
  2. क्षेत्रीय मोर्चों पर युद्धविराम: इस युद्धविराम के दायरे में लेबनान का मोर्चा भी शामिल होगा, जहाँ इजरायल और ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के बीच भीषण जंग जारी है, ताकि क्षेत्रीय तनाव को कम किया जा सके।

होर्मुज की खाड़ी को खोलना: ईरान बिना किसी देरी के होर्मुज जलडमरूमध्य को सभी अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक और तेल टैंकर जहाजों के आवागमन के लिए पूरी तरह सुरक्षित और खुला घोषित करेगा।

नौसैनिक नाकाबंदी हटाना: इसके जवाब में संयुक्त राज्य अमेरिका ईरानी बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों पर लगाई गई अपनी नौसैनिक घेराबंदी (Naval Blockade) को अगले 30 दिनों के भीतर चरणबद्ध तरीके से पूरी तरह हटा लेगा।

परमाणु कार्यक्रम को फ्रीज करना: ईरान इस बात पर सहमत हुआ है कि अगले 60 दिनों की विस्तृत वार्ता के दौरान वह अपने परमाणु कार्यक्रम को मौजूदा स्तर पर ही स्थिर (Freeze) रखेगा, यानी वह यूरेनियम का और अधिक उच्च-स्तरीय संवर्धन नहीं करेगा।

परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता: ईरान इस मसौदे के तहत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह लिखित आश्वासन देगा कि वह परमाणु हथियारों के निर्माण या उन्हें हासिल करने का प्रयास नहीं कर रहा है।

नए प्रतिबंधों पर रोक: बातचीत की अवधि के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका ईरान की अर्थव्यवस्था, तेल व्यापार या बैंकिंग क्षेत्र पर कोई भी नया आर्थिक प्रतिबंध लागू नहीं करेगा।

तेल निर्यात में अस्थाई छूट: ईरान को अपने आर्थिक ढाँचे को संभालने के लिए सीमित मात्रा में तेल निर्यात करने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में वैध तरीके से व्यापार करने की अस्थायी छूट प्रदान की जाएगी।

फंसी हुई संपत्तियों की मुक्ति: विभिन्न अंतरराष्ट्रीय बैंकों और अमेरिकी नियंत्रण में फंसी ईरान की लगभग 25 अरब डॉलर की संपत्तियों को मुक्त करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।

वित्तीय चैनलों की बहाली: इस मुक्त की गई संपत्ति को सीधे बैंक हस्तांतरण, वित्तीय क्रेडिट लाइनों और कतर जैसे क्षेत्रीय मध्यस्थ देशों के बैंकिंग तंत्र के जरिए ईरान तक सुरक्षित पहुंचाया जाएगा।

क्षेत्रीय पुनर्निर्माण योजना: अमेरिका, ईरान और उनके क्षेत्रीय साझेदार मिलकर युद्ध से प्रभावित क्षेत्रों, बंदरगाहों और बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए एक साझा आर्थिक योजना की रूपरेखा तैयार करेंगे।

60 दिनों की कूटनीतिक समयसीमा: दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए हैं कि स्थायी शांति, यूरेनियम के भंडार के निपटारे और प्रतिबंधों को स्थायी रूप से हटाने जैसे जटिल मुद्दों पर अगले 60 दिनों के भीतर गहन बातचीत पूरी की जाएगी।

गारंटी तंत्र की स्थापना: भविष्य में होने वाले किसी भी अंतिम समझौते में एक स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय गारंटी तंत्र शामिल किया जाएगा, ताकि कोई भी पक्ष अपनी प्रतिबद्धताओं से एकतरफा पीछे न हट सके।

अंतरराष्ट्रीय निगरानी: इस 60 दिनों के युद्धविराम की शर्तों के पालन की निगरानी के लिए एक संयुक्त कूटनीतिक कार्यबल (Joint Task Force) का गठन किया जाएगा, जिसमें मध्यस्थ देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।

युद्ध में कूटनीतिक जीत या रणनीतिक विफलता?

अमेरिका-ईरान युद्ध की समाप्ति और समझौते के इस मोड़ पर आने के बाद अब वैश्विक भू-राजनीतिक विश्लेषकों के सामने यह सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न है कि आखिर इस खूनी और खर्चीले संघर्ष से किसे क्या हासिल हुआ? क्या इसे ईरानी कूटनीति और उसकी रणनीतिक जिद की एक बड़ी और ऐतिहासिक जीत माना जाए या फिर इसे अमेरिकी सैन्य और रणनीतिक योजनाकारों की एक बहुत बड़ी और गंभीर विफलता के रूप में देखा जाए? सतह पर देखने पर दोनों ही देशों का शीर्ष नेतृत्व अपने-अपने घरेलू राजनीतिक हितों को साधने के लिए इस समझौते को अपनी-अपनी महान विजय के रूप में प्रचारित कर रहा है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहाँ इसे अपनी ‘डीलमकेकर’ छवि की एक और मिसाल बता रहे हैं और अमेरिकी जनता को यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने बिना किसी बड़े अमेरिकी नुकसान के क्षेत्र में शांति स्थापित कर दी है और वैश्विक तेल संकट को टाल दिया है, वहीं ईरान का नया नेतृत्व इसे इस रूप में मना रहा है कि उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य महाशक्ति के सामने न तो घुटने टेके, न अपनी संप्रभुता का सौदा किया और न ही अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह सरेंडर किया।

वैसे, अगर इस पूरे घटनाक्रम का एक निष्पक्ष, व्यावहारिक और गहराई से विश्लेषण किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कूटनीतिक रूप से जीत कर भी वास्तव में हार गए हैं। अमेरिका के भीतर ही इस बात को लेकर गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं कि इस युद्ध के जो घोषित उद्देश्य थे जैसे ईरान में सत्ता परिवर्तन, उसके परमाणु कार्यक्रम का पूर्ण खात्मा और उसकी मिसाइल क्षमता को पंगु बनाना, उनमें से एक भी उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सका।

अमेरिका ने इस युद्ध में अपने अरबों डॉलर के टैक्सपेयर्स का पैसा पानी की तरह बहा दिया, अपने सैनिकों की बलि चढ़ाई और वैश्विक स्तर पर अपनी साख को दाँव पर लगाया, लेकिन अंत में उसे उसी ईरान के साथ टेबल पर बैठना पड़ा जिसे वे दुनिया के नक्शे से मिटाने की धमकी दे रहे थे। इसके अलावा, युद्ध के कारण ईरान का कट्टरपंथी शासन कमजोर होने के बजाय घरेलू स्तर पर राष्ट्रवाद की लहर के सहारे और अधिक मजबूत और एकजुट होकर उभरा है। अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद भी वहां की व्यवस्था में कोई बिखराव नहीं आया, जो अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की एक बड़ी नाकामी को दर्शाता है।

दूसरी ओर इस समझौते को ईरानी जिद की एक रणनीतिक जीत के रूप में देखा जा सकता है। ईरान ने अमेरिकी प्रतिबंधों और हवाई हमलों के भीषण दबाव के बावजूद अपने परमाणु संवर्धन के अधिकार को पूरी तरह नहीं छोड़ा और न ही अपनी सैन्य संपदा का आत्मसमर्पण किया। उसने चतुराई से होर्मुज की खाड़ी के अपने भौगोलिक नियंत्रण का इस्तेमाल एक हथियार के रूप में किया और अंततः अमेरिका को अपनी 25 अरब डॉलर की फंसी हुई संपत्ति जारी करने और प्रतिबंधों में ढील देने के वादे पर सहमत होने के लिए मजबूर कर दिया।

विश्लेषकों की मानना है कि यह समझौता वास्तव में वाशिंगटन द्वारा तेहरान के सामने किया गया एक कूटनीतिक आत्मसमर्पण है, क्योंकि युद्ध के बाद भी स्थितियाँ लगभग वैसी ही हैं जैसी युद्ध से पहले थीं, बस फर्क यह है कि इस दौरान हजारों जिंदगियाँ खत्म हो गईं और अरबों डॉलर नष्ट हो गए।

इसलिए यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि ट्रंप प्रशासन की यह रणनीति पूरी तरह से विफल रही, जिसने अमेरिका को एक ऐसे अनिर्णायक और महँगे युद्ध में झोंक दिया, जिसका अंत एक ऐसे समझौते से हुआ जो ईरान को उसकी पुरानी स्थिति और ताकत के साथ वापस स्थापित करता है।

भविष्य की राह और क्षेत्रीय अस्थिरता के अनसुलझे सवाल

जेनेवा में 19 जून 2026 को होने वाले आधिकारिक हस्ताक्षर भले ही इस युद्ध पर तात्कालिक रूप से विराम लगा दें, लेकिन यह शांति कितनी टिकाऊ होगी, इस पर अभी भी अनिश्चितता के काले बादल मंडरा रहे हैं।

इस शांति समझौते का सबसे संवेदनशील और कमजोर पहलू यह है कि इसमें इजरायल को सीधे तौर पर शामिल नहीं किया गया है। इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्विर ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि उनका देश इस अमेरिकी-ईरानी समझौते से किसी भी तरह बाध्य नहीं है और वे हिजबुल्लाह और ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई को तब तक जारी रखेंगे जब तक कि उनका पूर्ण उन्मूलन नहीं हो जाता।

इजरायल का यह कड़ा रुख इस समझौते की सफलता के आगे एक बहुत बड़ा रोड़ा है, क्योंकि यदि इजरायल लेबनान या सीरिया में अपने हमले जारी रखता है, तो ईरान समर्थित समूह भी जवाबी कार्रवाई करेंगे, जिससे यह 60 दिनों का नाजुक युद्धविराम किसी भी समय टूट सकता है।

इसके अलावा अगले 60 दिनों में होने वाली वार्ताओं का एजेंडा इतना जटिल है कि उस पर दोनों देशों के बीच किसी आम सहमति पर पहुँचना लगभग असंभव प्रतीत होता है। ईरान अपने समृद्ध यूरेनियम के भंडार को पूरी तरह नष्ट करने के पक्ष में नहीं है, जबकि अमेरिका और इजरायल इसके बिना किसी भी स्थाई समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे।

राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले ही संकेत दे दिए हैं कि अगर इन 60 दिनों के भीतर उनके मनमुताबिक परमाणु समझौता नहीं होता है, तो वे अगस्त 2026 में ईरान पर दोबारा और इससे भी अधिक भीषण सैन्य हमले शुरू कर सकते हैं।

ट्रंप का यह बयान दर्शाता है कि यह समझौता स्थायी शांति का दस्तावेज नहीं, बल्कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले घरेलू मोर्चे पर अपनी गिरती लोकप्रियता को संभालने और अर्थव्यवस्था को तात्कालिक राहत देने की एक रणनीतिक चाल मात्र हो सकता है। ऐसे में पश्चिम एशिया की वास्तविक शांति अभी भी कूटनीतिक दाँव-पेंचों, अधूरी शर्तों और क्षेत्रीय शक्तियों के आपसी अविश्वास के चक्रव्यूह में फंसी हुई दिखाई देती है।

न कोई बड़ा नाम, न कोई पहचान … फिर भी लोकसभा की 5वीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई NCPI, उस दल के बारे में जानिए सब कुछ जिसमें मिले हैं TMC के 20 सांसद

बंगाल की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। यहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी के लगभग 20 सांसदों के एक बागी गुट ने नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की घोषणा कर दी है। यह संख्या लोकसभा में टीएमसी के कुल सांसदों के दो-तिहाई से अधिक बताई जा रही है, जिसके कारण यह गुट दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से बचने की कानूनी सुरक्षा प्राप्त कर सकता है।

बागी नेताओं में सुदीप बंद्योपाध्याय, काकोली घोष दस्तिदार, सताब्दी रॉय, सायोनी घोष और अरूप चक्रवर्ती जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर स्वयं को एनसीपीआई का सदस्य मान्यता देने और संसद में अलग बैठने की व्यवस्था की माँग की है। साथ ही, इस गुट ने NDA का समर्थन करने का भी ऐलान किया है।

अचानक कैसे अस्तित्व में आई NCPI?

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिस NCPI में विलय किया गया है, वह देश की एक बेहद छोटी और लगभग अज्ञात राजनीतिक पार्टी है। नेशनलिस्ट सिटिज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, जिसे चुनाव आयोग ने 2022-23 में पंजीकृत किया था। 14 जून से पहले इस पार्टी की सार्वजनिक या मीडिया उपस्थिति लगभग न के बराबर थी। न इसकी कोई पहचान थी और न ही चुनाव चिह्न का किसी को पता था। फेसबुक पर भी इस पार्टी का आखिरी पोस्ट 2023 में ही हुआ था।

कई रिपोर्टों में इसे त्रिपुरा आधारित पार्टी बताया जा रहा है। हालाँकि निर्वाचन आयोग के दस्तावेजों के अनुसार, इसका मुख्यालय जागो बिस्वा, होल्डिंग नंबर 4719, ग्राम हाटगाछा, डाकघर बनिपुर, थाना सांकरैल, जिला हावड़ा, पश्चिम बंगाल – 711304 में स्थित है। इसलिए, कई रिपोर्टों में किए जा रहे दावों के विपरीत, यह पार्टी वास्तव में पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में आधारित है।

लोकसभा में भी बनी बड़ी पार्टी

इस पार्टी की राजनीतिक मौजूदगी अब तक बहुत छोटी रही है। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इसके सिर्फ दो उम्मीदवार मैदान में उतरे थे। दोनों को बहुत कम वोट मिले। पूरी पार्टी को कुल मिलाकर सिर्फ 822 वोट मिले थे। यही वजह है कि इस पार्टी का नाम कभी राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा में नहीं आया। लेकिन अब लोकसभा में 19-20 सांसदों के साथ एनसीपीआई अचानक पाँचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। इससे वह एनडीए के भीतर भी एक महत्वपूर्ण सहयोगी बनकर उभरी है और सांसदों की संख्या के आधार पर तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) से आगे निकल गई है।

ये भी माना जा रहा है कि टीएमसी के बागी सांसदों ने सोच-समझकर यह रास्ता चुना है। भारत के दल-बदल कानून के अनुसार यदि किसी पार्टी के दो-तिहाई या उससे अधिक सांसद या विधायक किसी दूसरी पार्टी में एक साथ विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए इन नेताओं ने नई पार्टी बनाने या अलग-अलग किसी दूसरी पार्टी में जाने के बजाय एक मौजूदा पार्टी में सामूहिक रूप से शामिल होने का फैसला किया।

इसके अलावा एनसीपीआई को चुनने का एक और कारण यह माना जा रहा है कि यह पार्टी बहुत छोटी और लगभग निष्क्रिय थी। ऐसे में टीएमसी से आए नेता इस पार्टी पर पूरी तरह नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं और इसे अपनी राजनीतिक जरूरतों के अनुसार आगे बढ़ा सकते हैं। अगर वे सीधे भाजपा या किसी बड़े एनडीए दल में शामिल होते, तो उन्हें वहाँ के पुराने नेताओं और संगठन के अधीन काम करना पड़ता। इस विलय के बाद लोकसभा में एनसीपीआई की ताकत अचानक बढ़ गई है। करीब 20 सांसदों के साथ यह लोकसभा की पाँचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। साथ ही एनडीए के भीतर भी इसका महत्व काफी बढ़ गया है।

TMC नेताओं में अब भी असंतोष

गौरतलब है टीएमसी नेताओं में असंतोष की खबरें केवल संसद तक सीमित नहीं हैं। बताया जा रहा है कि 60 से अधिक विधायक पार्टी नेतृत्व के कुछ फैसलों से नाराज हैं। अगर भविष्य में इनमें से बड़ी संख्या में विधायक भी एनसीपीआई में शामिल हो जाते हैं, तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। इससे टीएमसी की ताकत काफी घट सकती है, जबकि एनडीए को एक नया और मजबूत सहयोगी मिल सकता है।

नोट: यह रिपोर्ट अंग्रेजी में राजू दास द्वारा लिखे गए लेख पर आधारित है। आप मूल रिपोर्ट को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं

स्टैंडअप शो में बढ़ती अभद्र भाषा पर बहस तेज, प्रणित मोरे और मधुर विर्ली के वीडियो वायरल: क्या खुद दर्शक ही दे रहे ऐसे कंटेंट को बढ़ावा?

हम एक अजीब समय में जी रहे हैं जहाँ कॉमेडी और विवाद का रिश्ता हिंसक हो गया है। इन दिनों स्टैंड-अप कॉमेडी सर्किट में ऐसी घटनाएँ आम हो गई हैं जहाँ ‘मजाक’ के नाम पर सीमाएँ तोड़ी जाती हैं, अपमान किया जाता है और फिर हल्के-फुल्के अंदाज में माफी माँग ली जाती है।

प्रणित मोरे का 370 रुपए की बिरयानी वाला विवाद इसी का ताजा उदाहरण है। प्रणीत मोरे के शो में गुरुग्राम के युवक हिमांशु जांगरा ने महिलाओं पर अश्लील टिप्पणी की थी। जब इस पर आलोचना हुई, तो मोरे ने माफी माँगी और कहा कि इंस्टाग्राम सस्पेंड होने से वह बात नहीं कर सके।

पूरी घटना ये थी कि प्रणीत मोरे के शो में गुरुग्राम के युवक हिमांशु जांगरा ने महिलाओं पर अश्लील टिप्पणी की थी। शो में सामने आई क्लिप में हिमांशु जांगरा ने अपनी से बड़ी महिला के साथ डेटिंग का एक किस्सा सुनाया।

हिमांशु ने कहा कि वह उसे डेट पर ले गया और ₹370 की बिरयानी खिलाई और जब वह लड़की जाने लगी तो हिमांशु ने सोचा कि बिरयानी के ₹370 तो वसूले ही नहीं। वसूलने से हिमांशु का मतलब यहाँ लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाना था।

इसके बाद प्रणीत मोरे के शो से जुड़ा एक और विवाद सामने आया। शो में एक सेजल पवार नाम की डॉक्टर को मृत पुरुषों के गुप्तांग का मजाक बना रही थी। शो में सेजल पवार कहती है कि वह मुंबई के KEM अस्पताल में काम करती है, यहाँ अस्पताल में वे और उनकी साथी मृत पुरुषों के शवों का गुप्तांग का साइज की तुलना कर मजाक उड़ाती हैं।

ऐसे ही मधुर विरली के एक पुराने स्टैंड-अप क्लिप में रेप और मर्डर को लेकर जोक दिखा, जहाँ वह बताते हैं कि कैसे एक आदमी रेप के बाद किसी को चाकू मार देता है क्योंकि महिला क्डल (Cuddle) करना चाहती है। इसके बाद सोशल मीडिया पर सेलिब्रिटीज ने इस जोक को अपमानजनक बताया और विरली ने अपना इंस्टाग्राम अकाउंट डिएक्टिवेट कर दिया।

अगर आप को याद हो तो इस से भी बड़ा और गंभीर विवाद रहा रणवीर अल्लाहबादिया का समय रैना के शो ‘इंडिया गॉट लेटेंट’ पर की गई अपमानजनक टिप्पणी। महिला कंटेस्टेंट से उन्होंने एक ऐसा सवाल किया जो अभद्र, अपमानजनक और संवेदनशील था। इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में हस्तक्षेप किया, कई FIR दर्ज हुईं और सेलिब्रिटीज ने उनका साथ छोड़ दिया।

वह चक्र जो दोहराया जा रहा है

यह दिलचस्प है कि हर बार एक ही पैटर्न दिखता है, विवादास्पद कंटेंट, वायरल क्लिप, सोशल मीडिया आउटरेज, आधिकारिक माफी और फिर क्या होता है? टिकट की कीमत बढ़ जाती है। शो की डिमांड बढ़ जाती है। कॉमेडियन फेमस हो जाता है।

समाज को यह भुलाने में कितना समय लगता है? कुछ महीने। और फिर क्या होता है? इन्हीं विवादों को लेकर अलग-अलग डेडिकेटेड शो बना दिए जाते हैं। यूट्यूब पर क्लिप दिखाई जाते हैं, विचार-विमर्श वाले शो बनते हैं। विचार आता है – यह कितना गलत था, देखो, क्या बोल गया। और इसी बहाने से दर्शक फिर से लौट आता है।

समाज का सहयोग: हम ही विलेन

यहीं आता है सबसे महत्वपूर्ण सवाल – क्या हम इन कॉमेडियन्स को इसी तरह फेमस बनाने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं? जब हम इनके शो में जाते हैं, टिकट खरीदते हैं, उनके यूट्यूब वीडियो देखते हैं, सोशल मीडिया पर शेयर करते हैं, तो क्या हम उन्हें वैलिडेशन नहीं दे रहे हैं? एक विवाद होता है, कुछ दिनों के लिए भीड़ भड़क जाती है, आलोचना होती है। लेकिन क्या उस चर्चा में कॉमेडियन के शो की और भी ज्यादा चर्चा नहीं हो जाती?

यह ‘सच्चाई’ और ‘सोशल कमेंट्री’ के नाम पर किया जाता है। लेकिन अगर सोशल कमेंट्री है, तो क्या महिलाओं का अपमान करना या बलात्कार जैसे गंभीर विषय पर जोक बनाना उपयुक्त है?

दिलचस्प बात यह है कि यह समस्या केवल पुरुष कॉमेडियन्स तक सीमित नहीं है। महिला स्टैंड-अप कॉमेडियन्स भी बॉडी शेमिंग, सेक्सुअल कंटेंट और आक्रामक जोक्स के लिए जानी जाती हैं। कुछ इंफ्लूएंसर्स और एक्ट्रेसेस भी इसी ट्रेंड में शामिल हैं। यह साबित करता है कि समस्या ‘कॉमेडी’ की सीमा निर्धारण की है, चाहे वह किसी भी लिंग का व्यक्ति कर रहा हो।

असली सवाल

क्या यह सब केवल विचारों को चुनौती देने वाली कॉमेडी है? या फिर यह सिर्फ व्यूज पाने का खेल है जहाँ ‘कंट्रोवर्सी ही प्रमोशन’ है? अगर यही कॉमेडी है, तो क्या महिलाओं को हीन साबित करने वाले जोक्स या ट्रॉमा को हल्के में लेने वाली बातें ‘बोल्ड’ कहलाती हैं?

यह समझ में नहीं आता कि क्यों किसी के दर्द को मजाक बनाना ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ माना जाता है। और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब कोई इसका विरोध करता है, तो उसे ‘सेंसर शिप’, ‘प्रतिबंध’ आदि कहा जाता है।

अगर एक आम इंसान की नजर से देखें, तो आज हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ विवाद भी कमाई और लोकप्रियता का जरिया बन गया है। कई बार लोगों को पता होता है कि उनकी बातों पर विवाद होगा, आलोचना होगी, फिर भी वही किया जाता है क्योंकि उससे चर्चा मिलती है।

जब कोई कॉमेडियन बार-बार सीमाएँ पार करता है, लोगों की भावनाएँ आहत करता है, फिर माफी माँगकर वापस आ जाता है, तो अक्सर लोग उसे समर्थन देते हैं। क्योंकि हमें वह ‘बहादुरी’ या ‘सच बोलना’ लगने लगता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या सच बोलने का मतलब हमेशा किसी दूसरे को नीचा दिखाना, चोट पहुँचाना या उसके दर्द को मजाक बनाना होना चाहिए? क्या हँसी सिर्फ तब ही पैदा हो सकती है जब किसी के सम्मान, अधिकार या उसके व्यक्तिगत अनुभवों को दाँव पर लगाया जाए?

‘कॉन्ग्रेस ने भगवा आतंकवाद बोलने को कहा’: UPA सरकार में मंत्री रहे सुशील शिंदे ने खोल दी पार्टी की असलियत, पुराना वीडियो Viral होते ही भड़के आम लोग

केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार में 2012 से 2014 तक गृह मंत्री रहे सुशील कुमार शिंदे का एक वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ को लेकर बड़ा बयान दे रहे हैं। उन्होंने माना कि यह शब्द इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था और इसके पीछे पार्टी का हाथ बताया। अब सच्चाई सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोग कॉन्ग्रेस को खूब लताड़ लगा रहे हैं।

वीडियो में सुशील कुमार शिंदे से जब पूछा गया कि ‘भगवा आतंकवाद‘ टर्म सही था या नहीं तब वह कहते हैं, “पार्टी (कॉन्ग्रेस) ने बताया था कि भगवा आतंकवाद बोलना है, मैंने वही किया। गलत तो था। मैं यह शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता था। ऐसा नहीं होना चाहिए था। ये उस पार्टी की विचारधारा होती है। ये चाहे भगवा हो या रेड हो या सफेद हो। ऐसा कोई आतंकवाद नहीं होता है।”

हालाँकि, सुशील शिंदे का यह बयान डेढ़ साल पुराना है। जब यूट्यूबर और पत्रकार शुभांकर मिश्रा ने सुशील कुमार शिंदे के साथ पॉडकास्ट किया था। तब भी ऑपइंडिया ने उस समय भी इस मामले को उठाया था। अब इस वीडियो के एक अंश वायरल हो रहा है, जिसमें शिंदे ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे भद्दे प्रोपेगेंडा को गलत बताकर अपना कबूलनामा सौंप रहे हैं।

सोशल मीडिया पर लोगों ने कॉन्ग्रेस पर साधा निशाना

अब डेढ़ साल बाद सोशल मीडिया पर शिंदे के इस बयान का वीडियो वायरल होने के बाद बवाल मच गया है। लोग इसे कॉन्ग्रेस की ‘झूठों’ से पर्दा उठाने और कॉन्ग्रेस की हिंदू-घृणा जैसी बातें कह रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का कबूलनामा बताया है। बीजेपी ने सवाल उठाया कि क्या यह सनातन संस्कृति को बदनाम करने की कांग्रेस की एक सोची-समझी साजिश थी?

बीजेपी नेता डॉ. निखिल आनंद कहते हैं कि सुशील कुमार शिंदे का बयान कॉन्ग्रेस की वैचारिक सोच को उजागर करता है। उनके मुताबिक कॉन्ग्रेस और उससे जुड़ी विचारधारा ने हमेशा भारतीय संस्कृति, परंपराओं और सनातन आस्था को निशाना बनाया है तथा राजनीतिक हितों के लिए कट्टरपंथी ताकतों के साथ समझौता किया है। उन्होंने लोगों से ऐसे तत्वों के प्रति सतर्क रहने और लोकतांत्रिक तरीके से उनका जवाब देने की बात कही।

कपिल बिश्नोई कहते हैं, “कॉन्ग्रेस पार्टी की हिंदुओं और भगवा रंग से नफरत किसी से ढकी छिपी नहीं है। रह रह कर ये नफरत किसी न किसी रूप में बाहर आ ही जाती है।”

एक्स हैंडल ‘जनार्दन मिश्रा’ ने कॉन्ग्रेस को घेरते हुए कहा, “अब तो पूर्व कॉन्ग्रेसी भी सच बोलने लगे लेकिन चमचे फिर भी नहीं मानेगे…!!”

‘भगवा आतंकवाद’ पर शिंदे ने क्या कहा था?

बता दें कि भारत के गृहमंत्री रहते हुए सुशील कुमार शिंदे ने साल जनवरी 2013 में कहा था कि भाजपा और आरएसएस के कैंपों में ‘हिंदू आंतकवादियों’ को प्रशिक्षण दिया जाता है। इस बयान को लेकर उनकी खूब आलोचना हुई थी। हालाँकि, इन आलोचनाओं के बाद भी वे अपने बयान पर कायम थे।

तब गृहमंत्री शिंदे ने कहा था, “ये सब इतनी बार अख़बार में आ गया है। ये कोई नई चीज़ नहीं है जो मैंने आज कही है। ये भगवा आतंकवाद की ही बात मैंने की है, कोई दूसरी बात नहीं कही है।” दरअसल, 20 जनवरी 2013 को जयपुर में आयोजित कॉन्ग्रेस के चिंतन शिविर के दौरान शिंदे ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर आरोप लगाया था।

अपने बयान के पीछे शिंदे ने एक कथित रिपोर्ट का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था, “हमारे पास रिपोर्ट आ गई है। जाँच में भाजपा हो या आरएसएस के ट्रेनिंग कैंप, हिंदू आतंकवाद बढ़ाने का काम देख रहे हैं।समझौता एक्सप्रेस रेलगाड़ी का धमाका हो, मक्का मस्जिद ब्लास्ट हो या फिर मालेगाँव, हिंदू चरमपंथियों ने वहाँ जाकर बम धमाके करवाए और फिर कह दिया कि ये धमाके अल्पसंख्यकों ने करवाए।”

सुशील कुमार शिंदे ने कहा था कि ऐसी कोशिशों से देश को सतर्क रहना चाहिए। शिंदे के इस बयान पर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने उन्हें मुबारकवाद दी थी। इससे पहले गृहमंत्री रहते हुए कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने साल 2010 में सबसे पहले भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था।

भगवा आतंकवाद पर केंद्रीय गृहमंत्री के रूप में 25 अगस्त 2010 को डीजीपी और आईजी के वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए चिदंबरम ने कहा था, “मैं आपको सावधान करना चाहता हूँ कि भारत में युवा पुरुषों एवं महिलाओं को कट्टरपंथी बनाने के प्रयासों में कोई कमी नहीं आयी है। इसके अलावा हाल में ‘भगवा आतंकवाद’ सामने आया है, जो अतीत में कई बम विस्फोटों में पाया गया है..।”

कष्टभंजनदेव हनुमानजी के स्वरूप, ‘किंग ऑफ सालंगपुर’ और कॉपीराइट विवाद: जानें क्या है पूरा मामला, क्यों हो रहा है विरोध?

गुजरात के बोटाद जिले में स्थित प्रसिद्ध सालंगपुर धाम एक बार फिर धार्मिक और सामाजिक चर्चाओं का केंद्र बन गया है। कष्टभंजनदेव हनुमानजी महाराज मंदिर से जुड़े एक फैसले ने न केवल स्थानीय क्षेत्र बल्कि गुजरात के कई संतों, धार्मिक संगठनों और भक्तों के बीच भी बहस छेड़ दी है।

विवाद की शुरुआत तब हुई जब यह जानकारी सामने आई कि ‘किंग ऑफ सालंगपुर’ के नाम से प्रसिद्ध विशाल हनुमान प्रतिमा, कष्टभंजनदेव हनुमानजी के अलग-अलग दिव्य स्वरूपों, विशेष वाघा-श्रृंगार और अन्य रचनात्मक प्रस्तुतियों के लिए कॉपीराइट और ट्रेडमार्क सुरक्षा ली गई है।

मंदिर ट्रस्ट का कहना है कि यह कदम आध्यात्मिक विरासत को सुरक्षित रखने और डिजिटल दौर में बढ़ती धोखाधड़ी तथा गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए उठाया गया है। वहीं दूसरी ओर कई संत, ब्राह्मण, महामंडलेश्वर और हिंदू संगठन इसे भगवान के स्वरूपों से जुड़ी आस्था और परंपरा का विषय बता रहे हैं और इसका विरोध कर रहे हैं।

इसी कारण पिछले कुछ दिनों से सालंगपुर धाम कॉपीराइट, ट्रेडमार्क और धार्मिक अधिकारों को लेकर चर्चा में बना हुआ है। आखिर सालंगपुर धाम ने ऐसा क्या किया जिससे यह विवाद शुरू हुआ? मंदिर ट्रस्ट का पक्ष क्या है? विरोध करने वाले संतों और संगठनों की आपत्तियां क्या हैं? और इस पूरे मामले की सच्चाई क्या है? — पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

सालंगपुर धाम ने कौन सी ऐसी घोषणा की जिससे खड़ा हुआ विवाद?

विवाद की शुरुआत 12 जून 2026 को हुई। इस दिन सालंगपुर धाम की ओर से घोषणा की गई कि श्री कष्टभंजनदेव हनुमानजी महाराज के विभिन्न दिव्य स्वरूपों, ‘किंग ऑफ सालंगपुर’ के नाम से प्रसिद्ध विशाल प्रतिमा, विशेष वाघा-श्रृंगार और कुछ अन्य रचनात्मक प्रस्तुतियों के लिए कॉपीराइट और ट्रेडमार्क से जुड़े प्रमाणपत्र प्राप्त किए गए हैं।

इसके बाद इन प्रमाणपत्रों को हनुमानजी महाराज के पवित्र चरणों में समर्पित किया गया। मंदिर के कोठारी विवेकसागर स्वामी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को आधुनिक बौद्धिक संपदा कानूनों के माध्यम से सुरक्षित रखना समय की आवश्यकता बन गया है।

मंदिर प्रशासन के अनुसार, यह केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि भविष्य में मंदिर की अलग पहचान और उससे जुड़ी आध्यात्मिक संपत्ति के संरक्षण की दिशा में उठाया गया कदम है। घोषणा सामने आते ही सोशल मीडिया पर इस विषय को लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएँ शुरू हो गईं।

कई लोगों ने इसे मंदिर की विशेष पहचान को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी फैसला बताया, जबकि दूसरी ओर कुछ लोगों के बीच यह सवाल उठने लगा कि क्या अब भगवान के स्वरूपों पर भी कॉपीराइट या ट्रेडमार्क लिया जा सकता है? इसी सवाल ने पूरे विवाद को जन्म दिया।

मंदिर ट्रस्ट को यह कदम उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

सालंगपुर धाम के प्रशासन का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में मंदिर के नाम पर बड़ी संख्या में ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामले सामने आए थे। ट्रस्ट के अनुसार, कई फर्जी वेबसाइट, सोशल मीडिया पेज और अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए सालंगपुर के नाम पर नकली रूम बुकिंग, ऑनलाइन प्रसाद, दान और विभिन्न सेवाओं के नाम पर श्रद्धालुओं के साथ ठगी की जा रही थी।

मंदिर का कहना है कि ऐसे मामलों में केवल सामान्य शिकायतें काफी साबित नहीं हो रही थीं। कई बार धोखाधड़ी करने वाले लोग मंदिर की तस्वीरों, प्रतिमाओं, श्रृंगार और पहचान का इस्तेमाल करके श्रद्धालुओं को गुमराह कर रहे थे। ऐसी स्थिति में कानूनी कार्रवाई को अधिक प्रभावी बनाने और साइबर अपराधियों के खिलाफ तेजी से कदम उठाने के लिए कॉपीराइट और बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपी राइट्स) का कानूनी संरक्षण लेना जरूरी हो गया था।

मंदिर ट्रस्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि फिलहाल सालंगपुर धाम की ओर से कोई ऑनलाइन रूम बुकिंग सेवा या घर बैठे प्रसाद भेजने की व्यवस्था नहीं चलाई जा रही है। श्रद्धालुओं को केवल आधिकारिक माध्यमों पर ही भरोसा करना चाहिए और किसी भी संदिग्ध व्यक्ति या वेबसाइट को पैसे देने से पहले पूरी सावधानी बरतनी चाहिए।

विरोध प्रदर्शन की शुरुआत कहाँ से हुई?

घोषणा के बाद सबसे पहले विरोध की आवाज अलग-अलग संतों और सनातन संगठनों की ओर से उठी। सनातन संत समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज्योतिर्नाथ महाराज ने इस मुद्दे पर आपत्ति जताते हुए सवाल उठाया कि अगर आज हनुमानजी के स्वरूपों से कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जोड़ा जा सकता है, तो कल किसी अन्य देवी-देवता को लेकर भी इसी तरह के दावे किए जा सकते हैं।

उनके अनुसार, सनातन परंपरा में भगवान को इस तरह कानूनी स्वामित्व से जोड़ना उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म की परंपरा में भगवान सभी के हैं और उन्हें किसी कानूनी सीमा या अधिकार में बांधने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। ज्योतिर्नाथ महाराज ने इस मामले में जरूरत पड़ने पर कानूनी लड़ाई लड़ने की भी बात कही।

विरोध करने वालों में एक और प्रमुख नाम मेंदरडा के खाखीमढ़ी रामजी मंदिर के गादीपति सुखरामदास बापु का रहा। उन्होंने कहा कि भगवान कभी किसी के कॉपीराइट नहीं हो सकते। उनके अनुसार, भगवान पूरे समाज के हैं और उन्हें किसी एक संस्था या ट्रस्ट से विशेष रूप से जोड़ने की कोशिश दुखद है।

ब्राह्मण संगठन भी संघर्ष में हुए शामिल

विवाद केवल संतों तक सीमित नहीं रहा। वर्ल्ड ब्राह्मण ऑर्गेनाइजेशन और समस्त गुजरात ब्रह्म समाज सहित कई संगठनों ने भी इस मुद्दे पर विरोध दर्ज कराया। वर्ल्ड ब्राह्मण ऑर्गेनाइजेशन के चेयरमैन, जो कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता भी हैं, हेमांग रावल ने कहा कि भगवान पर हर भक्त का अधिकार है, किसी एक ट्रस्ट का नहीं।

उनके अनुसार, हनुमानजी, भगवान राम और गणपति जैसे देवी-देवता किसी एक संप्रदाय की कॉर्पोरेट संपत्ति नहीं बन सकते और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 और 25 नागरिकों को अपने धर्म और आस्था का पालन करने का अधिकार देते हैं। ऐसे में भगवान के नाम या स्वरूपों को कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जैसी व्यवस्थाओं से जोड़ना कई सवाल खड़े करता है।

उन्होंने कहा कि इस मामले को लेकर चैरिटी कमिश्नर के सामने प्रस्तुति देने के साथ जरूरत पड़ने पर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक भी जाया जा सकता है। ब्रह्म समाज के नेताओं अश्विन त्रिवेदी और हेमांग रावल ने यह भी तर्क दिया कि ‘सालंगपुर’ एक गाँव का नाम है और ‘कष्टभंजनदेव’ हनुमानजी के पारंपरिक नामों में से एक है। ऐसे में इन शब्दों और प्रतीकों के साथ ट्रेडमार्क जोड़ने का मुद्दा भी चर्चा का विषय बना हुआ है।

महामंडलेश्वर और अन्य संतों ने क्या कहा?

विवाद बढ़ने के साथ अन्य संत और महामंडलेश्वर भी इस मामले में शामिल हो गए। महामंडलेश्वर अखिलेश्वरदासजी महाराज ने कहा कि भगवान किसी एक संप्रदाय, ट्रस्ट या संस्था के नहीं होते, बल्कि पूरे समाज के होते हैं। कई अन्य धार्मिक नेताओं ने भी इसी तरह की भावना व्यक्त की।

उन्होंने भी कहा कि सनातन परंपरा में भगवान को सभी का माना जाता है और आस्था के केंद्रों पर किसी प्रकार का एकाधिकार नहीं होना चाहिए। हलाँकि सभी संतों, धार्मिक नेताओं और विरोध करने वालों के शब्द अलग-अलग थे, लेकिन उनका मुख्य तर्क एक ही था कि भगवान पर किसी का विशेष अधिकार नहीं हो सकता।

ट्रस्ट ने क्या स्पष्टीकरण दिया?

विवाद बढ़ने के बाद सालंगपुर धाम के प्रशासन ने इस मामले पर विस्तार से अपनी सफाई भी दी। ट्रस्ट ने कहा कि पूरे विवाद में सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि लोग इसे ऐसे देख रहे हैं जैसे मंदिर भगवान पर मालिकाना हक का दावा कर रहा हो। ट्रस्ट के अनुसार, उनका ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है और हनुमानजी महाराज पूरी सृष्टि के हैं और हमेशा सभी के रहेंगे।

ट्रस्ट का कहना है कि कॉपीराइट और ट्रेडमार्क का संबंध भगवान से नहीं, बल्कि मंदिर की अलग पहचान, विशेष प्रतिमाओं, रचनात्मक प्रस्तुतियों, वाघा-श्रृंगार और उनसे जुड़ी दृश्य अभिव्यक्तियों से है। इन कदमों का मुख्य उद्देश्य श्रद्धालुओं को धोखाधड़ी से बचाना और मंदिर की पहचान के गलत इस्तेमाल को रोकना है।

क्या है विवाद का केंद्र?

अगर इस पूरे विवाद को ध्यान से देखा जाए तो साफ समझ आता है कि यहाँ दो अलग-अलग दृष्टिकोण आमने-सामने हैं। एक तरफ मंदिर ट्रस्ट का मानना है कि आज के समय में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए कानूनी उपायों का इस्तेमाल जरूरी हो गया है।

वहीं दूसरी तरफ विरोध करने वालों का कहना है कि भगवान के स्वरूपों और धार्मिक प्रतीकों को कॉपीराइट और ट्रेडमार्क जैसी व्यवस्थाओं से जोड़ने पर आस्था और परंपरा से जुड़े सवाल खड़े होते हैं। फिलहाल इस विवाद का मुख्य मुद्दा यह नहीं है कि मंदिर ट्रस्ट भगवान पर मालिकाना हक का दावा कर रहा है या नहीं।

असली सवाल यह है कि कॉपीराइट और ट्रेडमार्क के दायरे में आने वाली बातों को लोग किस तरह समझते हैं और इसका उनकी धार्मिक भावनाओं पर क्या असर पड़ता है।

क्या है वर्तमान स्थिति?

फिलहाल इस विवाद को लेकर दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर कायम दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ अलग-अलग संत और संगठन विरोध दर्ज करा रहे हैं और कुछ मामलों में कानूनी लड़ाई तक जाने की चेतावनी भी दी जा रही है। वहीं दूसरी ओर सालंगपुर धाम का प्रशासन लगातार यह कह रहा है कि उनका उद्देश्य भगवान पर मालिकाना हक स्थापित करना नहीं है, बल्कि मंदिर की अलग पहचान और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को बनाए रखना है।

आने वाले दिनों में यह बहस केवल धार्मिक मंचों तक सीमित रहती है या फिर कानूनी स्तर तक पहुँचती है, इस पर सभी की नजर रहेगी। लेकिन एक बात तय है कि सालंगपुर धाम के इस फैसले ने कॉपीराइट, ट्रेडमार्क, आस्था और धार्मिक विरासत के संरक्षण को लेकर एक बड़ी चर्चा शुरू कर दी है, जिसके आगे और बढ़ने की संभावना बनी हुई है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


कहीं च्यूइंगम पर रोक तो कहीं बच्चों के नामों पर बंदिशें, कई शहरों में तो मरना भी गैरकानूनी: जानिए कुछ ऐसे देशों के बारे में जिनके अजब गजब हैं कानून

दुनिया भर में कानून उस समाज की जरूरतों के हिसाब से बनाए जाते हैं जहाँ वे लागू होते हैं। जहाँ कुछ कानून, जैसे चोरी या हत्या जैसे अपराधों से जुड़े कानून, आम तौर पर हर जगह एक जैसे होते हैं, वहीं कुछ कानून या स्थानीय नियम किसी खास समस्या से निपटने के लिए भी हो सकते हैं। ऐसे नियम या कानून स्थानीय लोगों को तो बिल्कुल सही लग सकते हैं, लेकिन बाहरी लोग, जिन्हें इन कानूनों के पीछे के सामाजिक, ऐतिहासिक या सांस्कृतिक संदर्भ की जानकारी नहीं होती, उन्हें ये अजीब लग सकते हैं।

दुनिया भर के सात ऐसे नियम- कानून काफी अजीबोगरीब माने जाते हैं और ये समझ से परे हैं। ये अलग अलग देशों में लागू हैं।

सिंगापुर में च्यूइंगम पर प्रतिबंध

च्यूइंग गम एक समय सिंगापुर में बड़ी समस्या बन गई थी। इस चिपचिपी चीज को शरारती तत्वों ने सबवे दरवाजों के सेंसर, लॉक सिलेंडर के अंदर, मेलबॉक्स, चाबी के छेदों, लिफ्ट के बटन और एलिवेटर के बटन जैसी जगहों पर चिपकाना शुरू कर दिया था। इससे रखरखाव और सफाई का खर्चा बढ़ गया। सिंगापुर में 1987 में मास रैपिड ट्रांजिट (MRT) लोकल रेलवे सिस्टम शुरू हुआ। ये उस वक्त का सबसे बड़ा सार्वजनिक प्रोजेक्ट था, लेकिन च्यूइंगम की समस्या MRT तक भी पहुँच गई। शरारती तत्वों ने MRT ट्रेनों के दरवाजों के सेंसर पर च्यूइंगम चिपकाना शुरू कर दिया, जिससे दरवाजे ठीक से काम नहीं कर पाते थे और ट्रेन सेवाओं में रुकावट आती थी।

उस समय सिंगापुर सरकार सिंगापुर को एक ग्लोबल ट्रेडिंग हब बनाने के लिए प्रतिबद्ध थी। सफाई और सार्वजनिक स्वच्छता पर खास ध्यान दे रही थी। सरकार ने 1992 में च्यूइंग गम के आयात, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून पास किया। कानून के अनुसार, देश में च्यूइंग गम रखना गैर-कानूनी नहीं है, लेकिन च्यूइंगम बेचना, आयात करना या वितरित करना गैर-कानूनी है।

इसलिए, सिंगापुर जाने वाला कोई व्यक्ति अपने निजी इस्तेमाल के लिए थोड़ी मात्रा में च्यूइंगम देश में ला सकता है, लेकिन गलत जगह पर गम थूकना गैर-कानूनी है। सिंगापुर सरकार ने 2004 में कुछ खास वजहों जैसे दांतों की देखभाल और निकोटीन वाली च्यूइंगम के लिए कानून में छूट दी। इन्हें डॉक्टर या रजिस्टर्ड फार्मासिस्ट से खरीदा जा सकता है।

दुनिया के कुछ देशों में मरना गैर-कानूनी है, मौत को रोकने के लिए नियम तक बना दिेए गए हैं

सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन दुनिया में ऐसी जगहें हैं, जहाँ मरना मना है। मौत आम तौर पर हर जगह एक डरावनी और अनचाही घटना मानी जाती है, लेकिन कुछ इलाकों में तो मौत को रोकने के लिए नियम तक बना दिए गए हैं। ऐसे दुनिया के छह देश हैं, जहाँ कुछ खास शहरों में मरने के खिलाफ नियम हैं।

नॉर्वे का लॉन्गईयरब्येन शहर: स्वालबार्ड द्वीप समूह में बहुत सर्द और पर्माफ्रॉस्ट (हमेशा जमी रहने वाली जमीन) वाली जगह लॉन्गईयरब्येन है। ठंड की वजह से यहाँ लाशें सड़ती नहीं हैं। बीमारियों या संक्रमण के फैलने के खतरे को रोकने के लिए, स्वालबार्ड के गवर्नर ने अजीब नियम बना दिए हैं। नियम के अनुसार, जो लोग मर चुके हैं या लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हैं, उन्हें दफनाने या इलाज के लिए नॉर्वे के दूसरे शहरों में जाना पड़ेगा। हालाँकि, अगर किसी की मौत शहर में हो जाती है, तो उसका अंतिम संस्कार वहीं किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए लाइसेंस और बहुत सारे कागजी काम की जरूरत होती है जिसमें महीनों लग सकते हैं।

1998 में यह साबित हो गया कि लाशों से संक्रमण फैल सकता है। दरअसल वैज्ञानिकों ने 80 साल पहले बर्फ में दफनाए गए सात लोगों के शव निकाले। ये सातों लोग 1918 की बड़ी महामारी के दौरान स्पेनिश फ्लू से मरे थे। हैरानी की बात यह है कि वैज्ञानिक सातों शवों से वायरस के जीवित नमूने निकालने में कामयाब रहे। इससे यह पुष्टि हुई कि जानलेवा बीमारियाँ पर्माफ्रॉस्ट में दफनाई गई लाशों में जीवित रह सकती हैं।

स्पेन का लानजारोन शहर लानजारोन के मेयर जोस रुबियो ने 1999 में शहर में मरने पर रोक लगा दी थी। इस रोक की वजह यह थी कि स्थानीय कब्रिस्तान अपनी क्षमता की सीमा तक भर चुका था।

फ्रांस के तीन शहरों में रोक दक्षिणी फ्रांस के तीन शहरों – ले लावांडू, सारपुरेंक्स और कुग्नॉक्स, में भी ऐसी ही रोक लगाई गई थी। 2000 में ले लावांडू के मेयर ने स्थानीय कब्रिस्तान में दफनाने के लिए जगह की कमी के कारण मरने पर रोक लगा दी। सारपुरेंक्स और कुग्नॉक्स शहरों ने भी 2007 और 2008 में ऐसे ही वजहों को देखते हुए मौत पर रोक लगा दी।

इटली का सेलिया शहर इटली के मध्ययुगीन गाँव सेलिया के मेयर ने 2015 में एक आदेश पारित किया, जिसके तहत गाँव में बीमार पड़ना या मरना आधिकारिक तौर पर गैर-कानूनी हो गया। यह कदम गाँव की बूढ़ी होती आबादी को बचाने के लिए उठाया गया था। मेयर डेविड जिकिनेला ने एक आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कहा गया था कि निवासियों को बीमार पड़ने की मनाही है, और उन्हें अपनी सेहत को प्राथमिकता देनी चाहिए। यह सख्त कदम तब उठाया गया जब गाँव की आबादी 1960 में 1300 से घटकर 2015 में 537 रह गई थी। इसके अलावा बची हुई आबादी में से 60% लोग 65 साल से ज्यादा उम्र के थे।

ब्राजील का बिरिटिबा मिरिम: ब्राजील के बिरिटिबा मिरिम शहर के मेयर ने 2005 में एक सार्वजनिक बिल पेश किया, जिसमें निवासियों के लिए शहर में मरना गैर-कानूनी बना दिया गया, क्योंकि स्थानीय कब्रिस्तान भर चुका था। बिल में किसी सजा का प्रावधान नहीं था, लेकिन मेयर का मकसद मरने वाले लोगों के रिश्तेदारों पर जुर्माना लगाना और जरूरत पड़ने पर जेल भेजना था, ताकि कब्र के पत्थरों के लिए और जगह मिल सके।

जापान का इट्सुकुशिमा शहर: जापान का इट्सुकुशिमा शहर को मियाजिमा के नाम से भी जाना जाता है। शहर को काफी पवित्र माना जाता है, क्योंकि यहाँ कई धार्मिक स्थल और मंदिर हैं। इस जगह की पवित्रता बनाए रखने के लिए 19वीं सदी के आखिर में यहाँ बच्चे के जन्म और मृत्यु पर रोक लगा दी गई थी। इस द्वीप पर कोई कब्रिस्तान या अस्पताल नहीं है।

ऑस्ट्रेलिया में वोट न देना अपराध है

लोकतांत्रिक देशों में वोट देना नागरिकों का अधिकार माना जाता है, लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने एक कदम आगे बढ़कर वोट न देने को दंडनीय अपराध बना दिया। दूसरे शब्दों में, ऑस्ट्रेलिया में वोट देना सिर्फ़ एक अधिकार नहीं बल्कि एक कानूनी जिम्मेदारी है, जिसका उल्लंघन करने पर A$20 ($13, £10) तक का जुर्माना लग सकता है और कानूनी कार्रवाई भी हो सकती है। यह 1924 में कानून में संशोधन के जरिए किया गया था।

इस कानून के पास होने के बाद ऑस्ट्रेलिया सबसे ज्यादा वोटिंग प्रतिशत वाले देशों में से एक बन गया। भले ही यह सजा जैसा लगे, लेकिन इस कानून को लोगों का समर्थन मिला हुआ है। लोगों को वोट देने में आसानी हो, इसके लिए अधिकारियों ने कई उपाय अपनाए हैं। जैसे- देश में चुनाव शनिवार को होते हैं। इस दिन ज्यादातर लोगों की छुट्टियाँ होती है। इसके अलावा कंपनियों के लिए यह जरूरी है कि वे चुनाव के दिन कर्मचारियों को सवेतन छुट्टी दें ताकि लोगों के पास वोट देने के लिए पर्याप्त समय हो।

बच्चों के नामों को मंजूरी देती है सरकार

दुनिया भर के कई देशों में बच्चों के नाम रखने से जुड़े कुछ नियम और कानून हैं। जहाँ कुछ देशों में बच्चों के नामों के लिए सरकारी मंजूरी जरूरी माना जाता है, वहीं कुछ देश ऐसे हैं जहाँ सरकार चाहे तो बच्चों के नाम को अस्वीकार कर दे। कुछ देशों में खास नामों पर रोक है।

आइसलैंड: इस यूरोपीय देश में ‘नेशनल नेम एक्ट’ (1971, 2019 में संशोधित) के तहत लोगों का एक नेशनल रजिस्टर बना हुआ है। कानून के मुताबिक, बच्चों के नाम आइसलैंड की व्याकरण संबंधी परंपराओं के अनुसार होने चाहिए।

न्यूजीलैंड: इस देश में, ‘बर्थ्स, डेथ्स, मैरिजेज़ एंड रिलेशनशिप्स रजिस्ट्रेशन एक्ट 1995’ के तहत कुछ ऐसे नामों पर साफ तौर पर रोक है, जो अपमानजनक, शर्मनाक या बेवजह लंबे हों।

डेनमार्क: डेनमार्क में ‘पर्सनल नेम्स एक्ट’ (नेवनेलोवेन, 2003) के तहत नाम चुनने पर पाबंदियाँ लगी हुई हैं और करीब 7000 नामों को मंजूरी दी गई है, जिसमें से ही नाम रखा जा सकता है।

जर्मनी: जर्मनी का ‘सिविल स्टेटस एक्ट’ (पर्सनेंस्टैंड्सगेसेट्ज़) और ‘स्टैंडेसाम्ट’ (रजिस्ट्रार ऑफिस) के तहत नाम मंजूर करने के नियम कानूनी रूप से ज रूरी हैं। जर्मनी में बच्चों के नाम उस इलाके के ‘वाइटल स्टैटिस्टिक्स’ ऑफिस (स्टैंडेसाम्ट) से मंज़ूर होने चाहिए जहाँ बच्चे का जन्म हुआ हो। नाम से बच्चे के लिंग का पता चलना चाहिए, और नाम ऐसा नहीं होना चाहिए जो पारंपरिक रूप से सरनेम (उपनाम) के तौर पर इस्तेमाल होता हो।

फिनलैंड: ‘नेम्स एक्ट 1985’ के मुताबिक, फिनलैंड के सभी नागरिकों के फर्स्ट नाम ज्यादा से ज्यादा चार अक्षर वाले होने चाहिए। जिन लोगों का कोई ‘फर्स्ट नेम’ नहीं है, उन्हें फिनलैंड के नेशनल पॉपुलेशन डेटाबेस में नाम दर्ज कराते समय एक नाम रखना जरूरी है। इसके अलावा कानून के तहत नवजात बच्चों के माता-पिता के लिए जरूरी है कि वे अपने बच्चों का नाम रखें और जन्म के दो महीने के भीतर पॉपुलेशन रजिस्ट्री को इसकी जानकारी दें।

इस मामले में भारत माता-पिता को अपने बच्चों का नाम अपनी पसंद के अनुसार रखने की पूरी आजादी देता है। बच्चों के नाम पर पाबंदी लगाने वाला कानून भारतीयों के लिए तो कल्पना से परे है।

कबूतरों को दाना खिलाने पर रोक

किसी भी इलाके में कबूतरों की बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या हो सकती है, और वेनिस ने इसका समाधान ढूंढ लिया है। इटली के इस तैरते हुए शहर की सिटी काउंसिल ने कबूतरों की आबादी को तेजी से बढ़ने से रोकने के लिए उन्हें दाना खिलाने पर रोक लगाने वाला एक म्युनिसिपल नियम पास किया। शुरू में यह रोक ऐतिहासिक स्मारकों वाले इलाकों में लागू थी, लेकिन 2008 में इसे पूरे शहर में लागू कर दिया गया।

इस रोक से पहले सेंट मार्क्स स्क्वायर पर कबूतरों को दाना खिलाना पर्यटकों की एक आम गतिविधि हुआ करती थी। इस प्रतिबंध के पीछे कारण यह था कि कबूतरों की बीट से स्मारकों के संगमरमर को नुकसान पहुँचता था और इससे सफाई व सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ पैदा होती थीं। स्थानीय प्रशासन इस नियम को लागू करता है और इसका उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना लगाया जाता है।

महाराष्ट्र के मुंबई में भी हाई कोर्ट के आदेश के बाद बीएमसी ने ऐसा ही प्रतिबंध लगाया था। इस फैसले के कारण दादर कबूतरखाना बंद हो गया। यह करीब 100 साल पुराना था और मुंबई में कबूतरों को दाना खिलाने की एक प्रमुख जगह माना जाता था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिए गंभीर खतरा बताया था।

ग्रीस में हाई हील्स नहीं

जो यात्री आकर्षक स्मारकों या प्राचीन पुरातात्विक स्थलों के सामने हाई हील्स पहनकर पोज देना पसंद करते हैं, उनके लिए अपनी शानदार वास्तुकला के बावजूद ग्रीस सही जगह नहीं है। दरअसल यहाँ एक नियम है, जो ऐतिहासिक स्थलों पर हाई हील्स पहनने पर प्रतिबंध लगाता है।

2009 में ग्रीक सरकार ने एक सार्वजनिक निर्देश जारी किया, जिसमें पर्यटकों को ऐसे जूते पहनकर ऐतिहासिक स्थलों पर जाने से रोका गया, जिनसे प्राचीन संगमरमर को नुकसान पहुँच सकता है। यह प्रतिबंध तब लगाया गया जब विशेषज्ञों ने कहा कि नुकीली और पतली हील्स वाले जूते ऐतिहासिक स्थलों के फर्श को नुकसान पहुँचा सकते हैं। इन्हें आसानी से ठीक नहीं किया जा सकता। नियम तोड़ने वाले पर्यटकों के लिए €900 तक के भारी जुर्माने का प्रावधान किया गया था।

कई देशों में खास कपड़े पहनने पर प्रतिबंध

हालाँकि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में कैमोफ्लाज प्रिंट यानी सेना की तरह के कपड़े पहनना बिल्कुल सामान्य बात है, लेकिन कैरिबियन क्षेत्र यानी अफ्रीका, एशिया और मध्य पूर्व के कुछ देशों में आम नागरिकों के लिए कैमोफ्लाज प्रिंट वाले कपड़े पहनने पर प्रतिबंध है। दुनिया भर में दो दर्जन से ज्यादा ऐसे देश हैं, जहाँ इस तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं। एंटीगुआ और बारबुडा, बारबाडोस, बहामास, डोमिनिका, ग्रेनाडा, सऊदी अरब, घाना, नाइजीरिया और फिलीपींस में इससे जुड़ा कानून हैं, जो आम नागरिकों के लिए कैमोफ्लाज कपड़ों पर प्रतिबंध लगाते हैं।

इन कानूनों का उल्लंघन करने पर सामान जब्त किया जा सकता है, भारी जुर्माना लगाया जा सकता है या गिरफ्तारी भी हो सकती है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)