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पंजाब फार्मेसी भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी, पेन से स्कैन कर बाहर भेजे गए पेपर: उम्मीदवारों से ₹35 लाख तक वसूले, दिल्ली में हंगामा कर रही AAP ने साधी चुप्पी; जानें- कैसे खुला पूरा खेल

आम आदमी पार्टी के नेता नीट पेपर लीक मामले को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को हाईजैक करने की कोशिश में लगे हैं। संसद मार्च के दौरान पूर्व सीएम आतिशी सिंह, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह समेत कई नेता पुलिस की बैरिकेटिंग फाँद कर आंदोलनकारियों को उकसाते नजर आए। उसी आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार की नाक के नीचे सरकारी फार्मा अधिकारी की नियुक्ति के लिए हुई परीक्षा में हाई टेक चीटिंग हुई है। ये परीक्षा 19 जुलाई 2026 को फरीदकोट, कोटकपुरा और फिरोजपुर में आयोजित की गई थी।

आम आदमी पार्टी की पूर्व नेता और राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने सीएम भगवंत मान और तथाकथित ‘सुपर सीएम’ अरविंद केजरीवाल को चीटिंग को लेकर जमकर लताड़ा है। उन्होंने कहा कि केजरीवाल भारत को नेपाल बनाने में बिजी हैं और जेन जी को दिल्ली में उकसा रहे हैं। सोशल मीडिया एक्स पर उन्होंने वीडियो भी शेयर किया है।

उन्होंने कहा कि पंजाब में फार्मेसी अधिकारी भर्ती परीक्षा में बड़ा घोटाला सामने आया है, हजारों छात्रों का भविष्य बर्बाद हो रहा है। कई छात्र पेन कैमरा और ब्लूट्रूथ का इस्तेमाल करते पकड़े गए। लाखों रुपए लेकर बच्चों को परीक्षा पास कराई जा रही है।

उन्होंने आगे कहा कि इन युवकों को हमारी आवाज की जरूरत है क्योंकि न तो भगवंत मान इसे सुन पा रहे हैं और न ही अरविंद केजरीवाल। उन्होने कहा कि शिक्षा में इतना बड़ा घोटाला हुआ है, लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं?

इस मामले में अब तक पैंतीस लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें सात मुख्य साजिशकर्ता और 28 उम्मीदवार शामिल हैं। आरोप है कि इनलोगों ने पगड़ी, मोजे और अंडरवेयर के अंदर छोटे ब्लूटूथ उपकरण छिपा कर रखे थे और उनका इस्तेमाल कर रहे थे।

दरअसल ये पेपर लीक पारंपरिक तरीके से नहीं बल्कि हाईटेक तरीके से किया गया था। उम्मीदवारों ने हिडन पेन कैमरे, ब्लूट्रूथ और माइक्रो ईयरपीस का इस्तेमाल किया। पुलिस ने नकल के लिए कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए 27 बैटरी से चलने वाले वायरलेस उपकरण भी उम्मीदवारों के पास से जब्त किए हैं।

पंजाब के फार्मेसी परीक्षा में संगठित नकल का मामला

यह परीक्षा पंजाब सरकार में फार्मासिस्ट और फार्मा अधिकारी की भर्ती के लिए आयोजित की गई थी। परीक्षा का आयोजन बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस यानी BFUHS ने किया था। परीक्षा के पेपर लीक में अंतरराज्यीय रैकेट के होने का पता चला है। पुलिस ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान से इस गिरोह के सात प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार किया है। गिरोह के बाकी सदस्यों को पकड़ने के लिए छापेमारी की जा रही है। राज्य सरकार ने अब तक इस परीक्षा को रद्द नहीं किया है।

ये परीक्षा 25 परीक्षा केंद्रों पर आयोजित की गई थी। ये केंद्र तीन शहरों- फरीदकोट, कोटकपुरा और फिरोजपुर में थे। फार्मेसी अधिकारी के 454 पदों के लिए कुल 7000 उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया था। यह परीक्षा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के कहने पर बीएफयूएचएस ने आयोजित किया था।

परीक्षा के दौरान विश्वविद्यालय ने फरीदकोट, कोटकापुरा और फिरोजपुर के 18 परीक्षा केंद्रों का निरीक्षण करने के लिए हवाई दस्ते तैनात किए। इन हवाई दस्तों ने ही इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का पता लगाया। कई उम्मीदवारों के पास एक जैसे उपकरण मिले। इससे अंदाज लगाया गया कि जरूर इसके पीछे संगठित धोखाधड़ी गिरोह संलिप्त है।पूरी परीक्षा 100 अंकों की है, जिसमे लिखित परीक्षा 90 और व्यावसायिक अनुभव के लिए 10 अंक निर्धारित हैं।

फिरोजपुर में पेन कैमरे से फोटो खींच व्हाट्सएप से भेजा भिवानी

जाँच में सामने आया है कि फिरोजपुर के एक सेंटर में परीक्षा दे रहे आयुष ने कथित तौर पर एक गुप्त पेन कैमरे से प्रश्न पत्र को स्कैन किया और व्हाट्सएप के जरिए हरियाणा के भिवानी में मौजूद अपने साथी साजन को भेजा। साजन ने कथित तौर पर प्रश्न के उत्तर तैयार करवाए और एक दूसरे सहयोगी दीपक को भेजा।

फरीदकोट के सोसाइटी नगर में गुरमीत सिंह के आवास को गिरोह ने अस्थाई नियंत्रण कक्ष बना रखा था, वहीं दीपक मौजूद था। वहाँ से मुख्य आरोपी मनजीत सिंह और दीपक ने कथित तौर पर वायरलेस के माध्यम से परीक्षा हॉल में मौजूद कई उम्मीदवारों को सारे सवालों के जवाब उपलब्ध कराए।

आरोप है कि यह गिरोह कॉरपोरेट स्तर की व्यवस्थाओं के साथ काम करता था और परीक्षा में सफलता की गारंटी देते हुए उम्मीदवारों से 35 लाख रुपए से लेकर 13 लाख रुपए तक की भारी रकम वसूलता था। कई उम्मीदवारों ने गिरोह के सदस्यों ने पोस्ट-डेटेड चेक ले रखा था।

पंजाब पुलिस ने अपने बयान में कहा है कि जाँच में प्रश्नपत्र लीक होने या किसी अधिकारी की संलिप्तता का कोई सबूत नहीं मिला है। बयान में कहा गया है, “परीक्षा शुरू होने के तुरंत बाद यह घटना घटी। प्रारंभिक जाँच में पता चला है कि इस धोखाधड़ी का मास्टरमाइंड फाजिल्का स्थित संत कबीर पॉलिटेक्निक कॉलेज का कर्मचारी गुरमीत सिंह था।”

बयान में आगे कहा गया है, “19 जुलाई को परीक्षा के दिन सुबह सुबह कई ऑपरेटिव फरीदकोट-कोटकापुरा रोड पर मौजूद एक होटल में जमा हुए और उन्होंने उम्मीदवारों को विशेष बैटरी से चलने वाले वायरलेस माइक्रो-डिवाइस दिए।”

फरीदकोट और फिरोजपुर में इन उपकरणों का इस्तेमाल करने के आरोप में कुल 28 उम्मीदवारों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 27 के पास से एक जैसे वायरलेस बरामद किए गए।

हालाँकि परीक्षा में संलिप्तता के आरोप में अब तक किसी अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं हुई है, लेकिन मामले पर आम आदमी पार्टी ने चुप्पी साध रखी है। इसका शिरोमणि अकील दल ने भी विरोध किया है। उन्होंने पंजाब अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षाओं में धाँधली का भी आरोप लगाया और कहा कि भगवंत मान सरकार पेपर लीक पर एक्शन लेने और नकल गिरोह की लगाम कसने में नाकाम रही है।

पंजाब एकमात्र राज्य है जहाँ आम आदमी पार्टी की सरकार है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी ने अपनी पूरी ताकत यहाँ झोंक दी है। ऐसे में राज्य में हुए इस भर्ती घोटाले पर साधी गई चुप्पी पर स्वाति मालीवाल ने टिप्पणी की है, क्योंकि अरविंद केजरीवाल समेत पूरी पार्टी दिल्ली में खोई हुई अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। यही वजह है कि पंजाब में पेपर लीक इन्हें दिखाई नहीं दे रहा है और नीट यूजी 2026 परीक्षा रद्द होने के बाद रिनीट होने और रिजल्ट आने के बाद भी ये छात्रों को उकसाने में लगे हुए हैं।

किसी को बेल मिली तो घर नहीं जा सका, कोई अब तक जेल में… संसद की सुरक्षा में सेंधमारी को सामान्य बनाना चाह रहे कॉकरोच, युवा समझें- भड़कावे में आने का क्या होता है अंजाम

किसी भी देश का भविष्य उसके युवाओं के कंधों पर टिका होता है। युवाओं की सोच, उनका जोश और उनकी वैचारिक शक्ति ही समाज को नई दिशा देती है। लेकिन जब इसी जोश को कुछ असमाजिक तत्व, अवसरवादी राजनीतिक दल और वामपंथी तंत्र अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं, तो नतीजा केवल तबाही होता है।

आज युवाओं के मन में असंतोष का जहर इस कदर घोला जा रहा है कि वे कानून तोड़ने, संस्थाओं पर हमला करने और उपद्रव मचाने को ‘क्रांति’ समझने की भूल कर बैठते हैं। युवाओं को यह समझने की सख्त जरूरत है कि सोशल मीडिया के जरिए या सड़कों पर जो लोग उन्हें व्यवस्था के खिलाफ उकसाते हैं, वे वास्तव में उनका इस्तेमाल केवल मोहरे की तरह करते हैं।

संसद की सुरक्षा में हुई सेंधमारी से लेकर हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के उग्र विरोध प्रदर्शनों तक, हर जगह यही पैटर्न देखने को मिल रहा है। जब तक युवा सड़कों पर नारा लगाते हैं, तब तक वे इन आकाओं के काम आते हैं। लेकिन जैसे ही उन पर पुलिस की लाठी गिरती है, जेल के दरवाजे खुलते हैं और भविष्य दांव पर लगता है, तब उकसाने वाले तमाम लोग गायब हो जाते हैं।

संसद की सुरक्षा में सेंध: एक साजिश जिसे सामान्य बनाने की हुई कोशिश

13 दिसंबर 2023 की तारीख देश के इतिहास में एक काले दिन की तरह दर्ज है। 2001 के संसद आतंकी हमले की 22वीं बरसी पर सागर शर्मा और मनोरंजन डी नाम के दो युवक मैसूर के सांसद से जारी पास के आधार पर लोकसभा की दर्शक दीर्घा में पहुँचे। दोपहर ठीक 1 बजकर 1 मिनट पर वे सदन के भीतर कूद गए। उन्होंने अपने जूतों में छिपाकर रखे स्मोक कनस्तर से पीला धुआँ फैलाया और नारेबाजी की। उसी समय संसद परिसर के बाहर नीलम आजाद और अमोल शिंदे ने भी रंगीन धुआँ छोड़कर उपद्रव किया।

जो युवा उकसावे में आकर यह सोचते हैं कि वे जेल जाकर रातों-रात हीरो बन जाएँगे, उन्हें अदालत की शर्तों और हकीकत को देखना चाहिए। जब दिल्ली हाई कोर्ट से नीलम आजाद को जमानत मिली, तो उस पर सख्त पाबंदियाँ लगाई गईं। कोर्ट का स्पष्ट आदेश था कि वह मीडिया या सोशल मीडिया पर कोई बयान नहीं दे सकती, जाँच एजेंसी के सामने नियमित पेश होगी और बिना अनुमति दिल्ली से बाहर नहीं जाएगी। 2 जुलाई 2025 को जाकर कोर्ट ने शर्तों में ढील दी और उसे अपने गृह जिले हरियाणा के जींद जाने की अनुमति मिली।

इस केस में उन पर गंभीर धाराएँ लगाईं गईं, UAPA सहित कई प्रावधानों के तहत मामला दर्ज हुआ, लंबी पूछताछ हुई, चार्जशीट दाखिल हुई और महीनों तक अदालतों में जमानत के लिए लड़ाई चलती रही। आज भी वह मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उस समय सोशल मीडिया पर क्रांति के गीत गाने वाले अधिकांश लोग अब उस बहस में दिखाई नहीं देते, लेकिन जिन युवाओं ने वह कदम उठाया, वे अब भी कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। यही लोकतंत्र की वास्तविकता है- नारे कुछ मिनट चलते हैं, मुकदमे कई वर्षों तक।

भाषण कोई देता है, भविष्य किसी और का बिगड़ता है

भारत में शायद ही कोई बड़ा आंदोलन ऐसा रहा हो जिसमें सबसे बड़ा कानूनी बोझ नेताओं ने उठाया हो। मंच से जोश भरे भाषण देने वाले नेता कैमरे बंद होने के बाद अपनी राजनीतिक यात्रा पर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन जिस छात्र ने बैरिकेड पार किया, जिसने पुलिस से धक्का-मुक्की की या जिसने भावनाओं में आकर कानून की सीमा लांघ दी, वही FIR में नामित होता है। वही अदालतों के चक्कर लगाता है, वही नौकरी के इंटरव्यू में अपने खिलाफ दर्ज मामलों का जवाब देता है, वही वर्षों तक जमानत और सुनवाई के बीच उलझा रहता है।

राजनीति में यह पैटर्न नया नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यह और खतरनाक हो गया है। अब किसी युवा को ‘क्रांतिकारी’ घोषित करने में कुछ मिनट लगते हैं, लेकिन जब वही युवा कानूनी संकट में फँसता है तो उसकी मदद के लिए न सोशल मीडिया की भीड़ आती है और न मंच से भाषण देने वाले नेता। अदालत में लाइक्स और रीट्वीट नहीं चलते, वहाँ केवल कानून चलता है।

लोकतंत्र विरोध की आजादी देता है, लेकिन संस्थाओं पर दबाव बनाने की छूट नहीं

सरकार की आलोचना लोकतंत्र का आधार है। शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक, भ्रष्टाचार या किसी भी सार्वजनिक मुद्दे पर आंदोलन करना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन संसद की ओर बढ़ना, प्रतिबंधित क्षेत्र को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच बना देना या यह संदेश देना कि संसद तक पहुँच जाना ही संघर्ष की अंतिम मंजिल है, लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। संसद केवल सांसदों की इमारत नहीं, बल्कि भारत की सर्वोच्च विधायी संस्था है।

2001 के आतंकी हमले के बाद इसकी सुरक्षा व्यवस्था इसलिए कठोर बनाई गई थी क्योंकि यह केवल एक भवन नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है। यदि आज किसी एक आंदोलन के लिए संसद की सुरक्षा को चुनौती देना सामान्य बना दिया जाएगा, तो कल दूसरा संगठन भी यही करेगा और परसों तीसरा भी। इसका परिणाम यह होगा कि हर प्रदर्शन को सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित खतरे की तरह देखेंगी और अंत में नुकसान शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों का ही होगा।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रोटेस्ट: वही पुराना मोहरा बनाने का खेल

संसद की सेंधमारी का मामला हो या फिर सड़कों पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा किए जा रहे उग्र प्रदर्शन, युवाओं का इस्तेमाल करने का तरीका एक जैसा ही है। CJP के हालिया प्रदर्शनों में देखा गया कि कैसे युवाओं के हाथों में झंडे, डंडे, पत्थर थमाकर उन्हें पुलिस और आम जनता के सामने खड़ा कर दिया जाता है। प्रदर्शन के दौरान हिंसा होती है, पुलिसकर्मियों पर हमले किए जाते हैं और सरेआम कानून-व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं।

CJP के नेता पीछे बैठकर अपना राजनीतिक एजेंडा सेट करते हैं और आगे की पंक्ति में साधारण परिवारों के युवाओं को धकेल दिया जाता है। जब पुलिस की तरफ हिंसा को रोकने के लिए वाटर कैनन और लाठियाँ चलती हैं, तो चोट इन युवाओं को लगती है। CJP या किसी भी उग्र संगठन के बड़े नेता कभी जेल की सलाखों के पीछे सड़ने नहीं जाते। आज कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की तस्वीरें सबके सामने है। युवाओं को भड़काने ये खेल कैसे चलता है, इसे भी आप आज (21 जुलाई 2026) के ही उदाहरण से समझिए।

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल CJP के प्रदर्शन में पहुँचे थे। उन्होंने इन आंदोलनकारी छात्रों से जिस तरह बात की वो बताता है कि नेता इन छात्रों को किसी भी हद तक जाने के लिए उकसा रहे हैं। उन्होंने कहा, “अब इस्तीफा धर्मेंद्र प्रधान का नहीं मोदी का इस्तीफा होना चाहिए। पुलिस ने प्रेस रिलीज दी है कि जो लोग आंदोलन में आए थे उन पर केस करेंगे, मैं मोदी को चैलेंज करता हूँ केस करके दिखा तेरे मैं दम है तो। आप लोग केस से मत डरना। बड़े से बड़ा वकील खड़ा कर देंगे। आप लोगों को छुड़ा के ले आएँगे। अपना डर निकाल दो। जिस दिन डर निकल गया उस दिन कोई आपको जीतने से नहीं रोक सकता।”

क्या आपको वाकई लगता है कि अगर यही छात्र कल संसद में घुस जाएँ, वहाँ वितंडा करें तो ये नेता उनके लिए खड़े होंगे? केस तो छोड़िए, दिपके से लेकर सौरव दास और विजेता दहिया तक या इस आंदोलन के सहारे युवाओं को भड़काने की कोशिश करने वाले कितने नेता आपको पुलिस से भिड़ते दिखे?

जिसने युवाओं को भड़काया, आंदोलन के ना पर उकसाया और अपनी माँगों को पूरा करने के लिए जोश भरा, वो ही इस प्रदर्शन में कहीं दिखने को नहीं मिला। पुलिस से हाथापाई करते, हिंसा का शिकार होते और अपने भविष्य को बर्बाद करते केवल और केवल युवा ही दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें ये भी मालूम नहीं है कि ये साजिश रचने वाले आराम से कुर्सी पर बैठकर, हाथ में चाय का गिलास लेते हुए आपकी इस दशा को देखकर ठहाके मारकर हँस रहे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि युवा इन्हें नहीं समझ रहे हैं। जो छात्र या युवा इन तिलचट्टों के समर्थन के लिए जंतर-मंतर पहुँचे थे, उन्होंने इनके तौर-तरीकों को देखकर इन्हें जमकर खरी खोटी भी सुनाई है। इस युवा प्रदर्शनकारी को देखिए। ये इस बात से बेहद खफा है कि कुछ लोगों ने इस आंदोलन को VIP बना दिया है। एक युवती इनके VIP रवैया से नाराज होकर पूछ रही है, “किसने लाठियाँ खाई हैं, यहाँ पर इतने लोगों को लाठियाँ पड़ी हैं। वहाँ पर इतने लोगों को मार पड़ी है। लेकिन वो सब किसने किया है।”

युवाओं के लिए सबसे बड़ा सबक: आंदोलन खत्म हो जाते हैं, लेकिन केस साथ चलता है

हर पीढ़ी में ऐसे युवा होते हैं जो व्यवस्था बदलना चाहते हैं। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। लेकिन उतना ही जरूरी यह समझना भी है कि व्यवस्था बदलने और कानून तोड़ने में अंतर होता है। यदि कोई नेता आपको यह विश्वास दिला रहा है कि संसद की ओर बढ़ना ही लोकतांत्रिक संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक है, तो पहले उससे यह भी पूछिए कि यदि आपके खिलाफ FIR हुई, यदि आपकी पढ़ाई प्रभावित हुई, यदि सरकारी नौकरी का सपना खतरे में पड़ा या वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो क्या वह आपके साथ खड़ा रहेगा? भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि अधिकांश मामलों में इसका उत्तर ‘नहीं’ होता है।

आंदोलन नए आ जाते हैं, मुद्दे बदल जाते हैं, नेता नए भाषण देने लगते है लेकिन मुकदमे में फँसा युवा वहीं रह जाता है। इसलिए लोकतंत्र में सबसे बड़ा साहस बैरिकेड तोड़ना नहीं, बल्कि भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय लेना है। विरोध कीजिए, सवाल पूछिए, सरकार को कठघरे में खड़ा कीजिए, लेकिन किसी भी राजनीतिक रणनीति का मोहरा बनने से पहले यह जरूर सोचिए कि जब भीड़ छँट जाएगी और कैमरे चले जाएँगे, तब आपके साथ कौन खड़ा होगा। यही सवाल आज हर उस युवा को खुद से पूछना चाहिए, जिसे किसी भी मंच से संसद की ओर बढ़ने का आह्वान सुनाई देता है।

PM की हत्या की साजिश, संसद में घुसने का प्रयास और पुलिस पर पथराव: Insta रील से इतर समझें ‘कॉकरोचों’ का एजेंडा, कैसे ठगे गए असली छात्र

20 जुलाई 2026 का दिन दिल्ली के लिए सिर्फ एक और प्रदर्शन का दिन नहीं था, यह एक ऐसी लड़ाई थी जो एकतरफा पेश की गई। एक तरफ इंस्टाग्राम की रील्स और कुछ तथाकथित पत्रकारों के दावे थे, जो कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन को पूरी तरह पुलिस के खिलाफ और प्रदर्शनकारियों को क्लीनचिट देने के प्रयास से गढ़े गए थे। दूसरी तरफ, प्रदर्शन में जो पत्थरबाजी, गाली-गलौज, तोड़फोड़, हिंसक नारेबाजी के पीछे की साजिश थी, उस पर बात करने को कोई तैयार ही नहीं है।

यह प्रदर्शन जितना सड़कों पर व्यापक था हुआ, उतना ही सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर भी लड़ा जा रहा था, जहाँ नैरेटिव गढ़े जा रहे थे और सच्चाई को दबाने की कोशिश हो रही थी। इसी दूसरे मोर्चे को समझने के लिए एक छोटा-सा प्रयोग ही काफी है।

20 जुलाई 2026 यानी ‘संसद मार्च’ की रात करीब तीन से चार घंटे तक सोशल मीडिया पर रील स्क्रॉल करने पर जब मेरे सामने सिर्फ एकरफा नैरेटिव का कंटेन्ट सामने आता रहा, तो मुझे भी हैरानी हुई। पुलिस की कार्रवाई दिखाई गई, छात्रों के चेहरे में छिपे ‘हिंसक भीड़’ को विक्टिम घोषित कर दिया गया और यहाँ तक कि मौके पर मची अफरा-तफरी का सारा ठीकरा सरकार पर फोड़ दिया गया। यह सिर्फ मेरी टाइमलाइन नहीं थी, मेरे दोस्तों के एल्गोरिदम का भी यही हाल था जहाँ हर कोई इस एकतरफा नैरेटिव को आगे शेयर करता जा रहा था।

लेकिन इसमें जो मिसिंग था, वो घायल पुलिसकर्मियों की तस्वीर, हिंसक भीड़ द्वारा तोड़ी गई पुलिस वैन और आम गाड़िया या मंदिर जैसे पवित्र स्थिल पर हुए पथराव, इनमें से कुछ भी उस एल्गोरिदम के कंटेन्ट में जगह नहीं बना पाया। यही वह पल था जब समझ आया कि देश के GenZ (जेन जी) को किस तरह एकतरफा कंटेन्ट परोसकर ब्रेनवॉश किया जा रहा था।

इसीलिए मेरी यह रिपोर्ट जरूरी हो जाती है, ताकि दोनों पहलू सामने आएँ और वह हकीकत भी सामने आए जो रील्स के एल्गोरिदम में जगह नहीं बना पाई।

पुलिस पर हमला नहीं होने का झूठा दावा, देखें भयानक तस्वीरें

सोशल मीडिया पर वैसे तो ऐसे कई तथाकथित पत्रकार और सोशल मीडिया अकाउंट्स थे, जो एकतरफा नैरेटिव चला रहे थे। लेकिन इन नैरेटिव को गढ़ने की PhD कर चुके लोग अब नए युवाओं को भी इस नैरेटिव का हिस्सा बनाने की साजिश में थे। इसी में पुराना नाम है, आल्ट न्यूज के ‘फैक्टचेकर’ मोहम्मद जुबैर का। जुबैर ने प्रदर्शन में पुलिस पर हिंसा होने से ही साफ इनकार कर डाला, यह कहते हुए कि इसके कोई सबूत नहीं हैं।

लेकिन बिना ज्यादा छानबीन किए जुबैर ने दिल्ली पुलिस की जानकारी को भी अनदेखा कर दिया, जिसमें शुरुआत में पहले 50 पुलिसकर्मी के घायल होने और बाद में सही आँकड़ा बताते हुए 118 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात कही गई। खुद दिल्ली के पुलिस कमिश्वर अनुराग कुमार इन घायल जवानों का हाल जानने अस्पताल पहुँचे थे।

इस जानकारी की पुष्टि मौके से सामने आए तस्वीरों और वीडियो से भी हो जाती है, जिन्हें देख तथाकथित पत्रकारों ने आँखों पर पट्टी बाँध ली और ‘मेटा’ के एल्गोरिदम ने इसे बेहतर कंटेन्ट का हिस्सा ही नहीं माना। इन वीडियो में किसी का सिर फटा हुआ दिख रहा है, किसी की आँख तो किसी की नाक फोड़ दी गई है, कईय़ों के सिर पर पट्टी बँधी नजर आई, तो किसी की हालत इतनी बुरी थी कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया।

ANI की तस्वीर में दिल्ली पुलिस का एक सब-इंस्पेकटर CATS एंबुलेंस के पास खड़ाई दिखाई दे रहा है और अपनी घायल आँख पर कपड़ा दबाए हुआ खून रोकने की कोशिश कर रहा है। न्यूज एजेंसी ने ही दो तस्वीरें और पोस्ट की, जिसमें नाक और सिर पर पट्टी बाँधे दो पुलिस कॉन्सटेबल अपनी ड्यूटी कर रहे हैं।

IANS की एक और तस्वीर में सुरक्षाकर्मी और मेडिकल स्टाफ़ दिल्ली पुलिस के एक घायल अधिकारी को इलाज के लिए गाड़ी में ले जाते हुए दिख रहे हैं, जिससे झड़प के दौरान लगी चोटों की गंभीरता का पता चलता है।

ANI की एक और तस्वीर में दिल्ली पुलिस का एक अधिकारी विरोध-प्रदर्शन वाली जगह पर चलता हुआ दिख रहा है, जिसकी यूनिफॉर्म की शर्ट के सामने वाले हिस्से पर खून के साफ़ धब्बे लगे हैं। यह उन दावों को और गलत साबित करता है कि कोई भी पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ था।

(साभार: X- Akshit Singh)

एक वीडियो ऐसी भी सामने आई, जिसमें सैंकड़ों प्रदर्शनकारियों की भीड़ एक पुलिसकर्मी को खदेड़ते हुए जमीन पर गिराकर बेरहमी से पीटते हुए दिखी, जिससे भीड़ की हिंसा का सीधा सबूत मिलता है। वीडियो में हिंसक भीड़ को पुलिसकर्मी पर कुचले देखा जा सकता है। भीड़ में जितना जिसको मौका मिल रहा है, वह उस अकेले पुलिसकर्मी को मार रहा है।

इतना ही नहीं हिंसक भीड़ ने पुलिस की गाड़ियों में जमकर तोड़फोड़ की, कुछ प्रदर्शनकारी पुलिस वैन पर चढ़कर फोटो खिंचवाते और व्लॉग बनाते दिखे। सिर्फ पुलिस वैन ही नहीं, आम नागरिकों की गाड़ियों को भी निशाना बनाया गया।

ये ऐसे कुछ चुनिंदा वीडियोज हैं जो लोगों ने रिकॉर्ड किए हैं। लेकिन मौके पर जो बर्बरता पुलिस के साथ की गई, उसके बारे में खुलकर कोई नहीं बात कर रहा है। चिंता की बात यह है कि खुद इन पीड़ित पुलिसकर्मी ने अपने ऊपर बीती को किसी मीडिया के सामने शेयर नहीं किया, न ही सोशल मीडिया पर आपबीती के वीडियो शेयर किए, जबकि दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों के समर्थन में कई पाकिस्तानी अकाउंट्स लगातार पोस्ट किए जा रहे थे।

(साभार: X-Newspinch)

दिल्ली पुलिस ने शुरुआती जाँच में ही खुलासा किया कि सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी अकाउंट्स से प्रदर्शन को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही थी। इनमें झूठा दावा किया जा रहा था कि सात प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई, जबकि 391 घायल और 250 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अब इन विदेशी सोशल मीडिया अकाउंट्स की जाँच करेगी। वहीं पुलिस ने 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर मंचित हिंसा

CJP के लीडर कहे जाने वाले अभिजीत दिपके के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर 20 जून 2026 से प्रदर्शन शुरू किया गया था, और शुरू से ही यह दावा किया गया कि यह काफी ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन है और केवल ‘छात्रों के हित’ के लिए है। लेकिन एक महीने में सामने आईं इस प्रदर्शन की तस्वीरों में न तो कुछ ‘छात्रों के हित’ की कोई बात हुई, और ‘शांतिपूर्ण’ वाला टैग भी 20 जुलाई को मिट्टी में मिल गया।

‘संसद चलो’ मार्च में प्रदर्शनकारी हाथ में ईंट लेते चले तो कोई दीवार फाँदते दिखा, कोई पीएम मोदी को गाली दे रहा था, कोई झुंड में ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रहा था। और इसी एजेंडे के साथ ‘नेपाल जैसे हालात‘ का नैरेटिव वायरल कर डराने की कोशिश की गई।

प्रदर्शन में शामिल हुए एक पत्रकारिता के छात्र ने मौके का मंजर बताया कि पत्थरबाजी सबसे पहले प्रदर्शनकारियों की तरफ से शुरू हुई और ‘असल छात्रों’ को भी पथराव करने के लिए उकसाया गया, हिंसक प्रदर्शनकारियों ने उनसे कहा- “हम हैं पीछे तुम पत्थर फेंको।” न्यूज पिंच की इस वीडियो में पत्रकार अभिनव पांडे भी बता रहे हैं कि पथराव प्रदर्शनकारियों की तरफ से हुआ और उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।

प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली के कनॉट प्लेस (CP) स्थित हनुमान मंदिर पर भी पथराव किया। इस वीडियो में मुँह पर रुमाल बाँधे भीड़ का झुँड आगे बढ़ रहा है और बैरिकेट पर चढ़कर उत्पात मचाता रहा है।

केवल यही नहीं, सामने आए वीडियो में संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारी हाथों में ईंट लिए चल रहे थे। चंड़ीगढ़ के एक फन्नी खान नाम के लड़का भी इस प्रदर्शन में शामिल होने पहुँचा था, उसने वीडियो में हाथ में ईंट लेकर धमकी दे रहा था कि अगर उसे संसद में घुसने से रोका गया तो वह उसी ईंट से हमला करेगा।

वीडियो में उसकी आवाज लड़खड़ा रही थी, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह नशे में था। नशे के बात करें, तो ऐसे और भी वीडियोज सामने आए जिसमें कई प्रदर्शनकारी नशे में गुस्सा दिखाते और धमकी देते दिखे। ऑपइंडिया के पत्रकार आशीष नौटियाल ने भी खुद इसे अनुभव किया, वह 20 जुलाई की पूरी रात जंतर-मंतर पर थे, उन्होंने बताया कि मौके पर 100 में से 90 प्रतिशत लोगों ने नशा कर रखा था, और वहाँ शराब की बुरी गँध आ रही थी।

और अगर बात ‘अहिंसक प्रदर्शनकारियों’ की करें, तो वे छात्रों के इस प्रदर्शन में ‘मोदी मुर्दाबाद’ और ‘केजरीवाल जिंदाबाद’, ‘उमर खालिद-शरजील इमाम जिंदाबाद’, ‘असम देश से अलग हो जाना चाहिए’ जैसी नारेबाजी करने में व्यस्त थे। जो ‘अहिंसा’ की कैटेगरी में हिंसा भड़काने का काम कहलाता है।

वहीं प्रदर्शन में मौजूद असली छात्र इस सुनियोजित हिंसा को समझ नहीं पा रहे थे। उनका सवाल था कि प्रदर्शन तो शिक्षा व्यवस्था ठीक करने को लेकर सरकार से जवाबदेही माँगना था, जो अब हिंसा में तब्दील हो चुका था। राजस्थान से आए एक युवा ने कहा, “हम NEET पेपर लीक पर अपनी आवाज उठाए थे, लेकिन यहाँ सब उल्टा है… चारों ओर विपक्षी दल के छात्र संगठन दिख रहे हैं… कोई BJP को गाली दे रहे है, कोई हिंदुओं को गाली दे रहा है… असली छात्र जो आ रहा है वह ठगा जा रहा है।”

वायरल व्हाट्सऐप चैट्स से खुली पोल

और यह कोई अचानक भड़की हिंसा नहीं थी, यह एक रात पहले से रची गई पूरी पटकथा का नतीजा थी। 20 जुलाई से एक रात पहले ही व्हाट्सऐप ग्रुप्स पर प्रदर्शन की बकायदा योजना बनाई जा चुकी थी और असली छात्रों को इसी योजना के जरिए सोशल मीडिया को हथियार बनाकर उकसाया गया। उन्हें कदम दर कदम बताया गया कि करना क्या, अगर पुलिस रोकने की कोशिश करे तो क्या करना है, अगर बैरिकेडिंग लगा दे तो क्या करना है, संसद का गेट बंद कर दे तो क्या करना है और अपने साथ क्या पहनना है से लेकर क्या चीजें लेकर आनी है, सबकुछ।

(साभार: X-vijaygajeraO)

सोशल मीडिया पर कुछ संदिग्ध अकाउंट्स तो लोगों को जंतर-मंतर आने का खर्चा तक देने को तैयार थे। और सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन्हीं चैट्स में छात्रों को यह कहकर उकसाया गया कि ‘मरने-मारने को भी तैयार रहना’ यानी जिन छात्रों को NEET पेपर लीक जैसे वाजिब मुद्दे के नाम पर बुलाया गया था, उन्हें ही हिंसा के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा था।

(फोटो साभार: Instagram-chalo_sansad)

वायरल व्हाट्सऐप चैट्स में लिखा गया था, “भाई किसी की मौत होती है तो सरकार पर ज्यादा प्रेशर आएगा।” यही वह सोची समझी साजिश थी जिसके चलते प्रदर्शन के दौरान 7 मौतों की झूठी खबरें फैलाई गई थीं, हालाँकि दिल्ली पुलिस ने बाद में इस दावे का खंडन कर इस साजिश को नाकाम कर दिया था।

वहीं जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के वामपंथी छात्र संगठनों के व्हाट्सऐप ग्रुप्स में तो योजना बनाई गई कि अगर इंटरनेट जैम लगाया गया तो Briar और Bitchat जैसे ब्लूटुथ ऐप्स का इस्तेमाल किया जाएगा। छात्रों को बताया गया कि सुबह पुलिस यूनिवर्सिटी के गेट बंद कर सकती है, इसलिए रात दो-तीन बजे ही जंतर-मंतर पहुँचना होगा।

(साभार: X-vijaygajeraO)

पत्रकारों पर हमले और गोदी मीडिया का शोर

प्रदर्शन के दौरान एक पैटर्न यह भी सामने आया कि प्रदर्शनकारी सिर्फ उन्हीं पत्रकारों से बात कर रहे थे जो एक तयशुदा नैरेटिव के साथ ‘पत्रकारिता’ करते हैं। जो भी पत्रकार प्रदर्शनकारी से उनकी मर्जी के अलावा सवाल पूछ रहा था, तो उन्हें वह या तो अपनी हिंसा का शिकार बना रहे थे या फिर ‘गोदी मीडिया’ की नारेजाबी कर प्रताड़ित किया जा रहा था।

एबीपी न्यूज के रिपोर्टर वरुण भसीन भी हिंसक भीड़ के हमले का निशाना बने। भसीन को प्रदर्शनकारियों के झुंड ने घेर लिया और ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगाए। भसीन ने आपबीती सुनाते हुए कहा कि प्रदर्शन कवर करने के दौरान उन्हें भीड़ में ऐसे कई युवा दिखे जो लगातार मीडिया की गाड़ियों पर हमला कर रहे थे, कैमरे तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, और मीडिया पर पत्थर तक फेंके गए।

इन्हीं प्रदर्शनकारियों ने ऑपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा को भी निशाना बनाया था, जब वह कवरेज करने जंतर-मंतर पहुँचे थे। प्रदर्शनकारियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारेबाजी कर गाली-गलौज तक की।

अब यहीं से समझ लीजिए कि यह प्रदर्शन महिला के लिए कितना सुरक्षित रह जाएगा, और इस पर सवाल भी उठे जब PEEKTV की रिपोर्टर प्रियांशी के साथ भी यही हुआ, जब उन्होंने प्रदर्शनकारियों से लीडरशिप और आगे की रणनीति के बारे में सवाल पूछा तो भीड़ भड़क गई और उन पर मुद्दे से भटकाने का आरोप लगाते हुए वही ‘गोदी मीडिया’ की नारेबाजी करने लगी।

इन घटनाओं से यह भी साफ हो जाता है कि ऐसे माहौल में सिर्फ पुरुष ही नहीं महिला पत्रकारों के लिए प्रदर्शन की कवरेज करना कितना असुरक्षित हो चला था।

CJP के प्रदर्शन में AISF के झंडे, ‘जय भीम’ ने किया कब्जा

‘संसद चलो’ मार्च से एक दिन पहले ही ‘आंदोलनजीवी’ योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर CJP के मंच से ‘पंचशील‘ जारी किए थे। इनमें सबसे पहला था कि मार्च में सिर्फ तिरंगा झंडा लेकर आना है, लेकिन ग्राउंड पर इससे उलट देखा गया। ऑपइंडिया जब ग्राउंड पर पहुँचा तो प्रदर्शन में AISA, SFI और अन्य कम्युनिस्ट छात्र संगठनों के झंडे लहराए जा रहे थे।

इनमें भी सबसे ज्यादा जो झंडे फहराए जा रहे थे, वो चंद्रशेखर आजाद की ‘भीम आर्मी’ राजनीतिक दल के झंडे थे। ऑपइंडिया ने भी रिपोर्ट किया कि इस प्रदर्शन पर भीमा आर्मी के समर्थकों की भारी संख्या में भीड़ जुटी थी। वीडियोज भी सामने आए थे जिनमें चंद्रशेखर आजाद प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते दिखाई दे रहे थे।

यही नहीं प्रदर्शनकारियों में गैंगस्टर भी घुसे हुए थे। नॉर्थ ईस्ट दिल्ली का गैंगस्ट हाफी अफजल भी अपने साथ भारी संख्या में लोगों को लेकर प्रदर्शन में पहुँचा था और मौके पर ‘बीजेपी मुर्दाबाद’, ‘मोदी मुर्दाबाद’ और ‘जब-जब मोदी डरता है पुलिस को आगे करता है’ जैसे भड़काऊ नारे लगा रहा था।

निष्कर्ष

तो देखिए इस पूरे प्रदर्शन का निष्कर्ष क्या निकलकर आया है। 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम रील्स के जरिए जो एकतरफा तस्वीर गढ़ी गई, वह जमीनी हकीकत से मीलों दूर थी। इससे यह पता लगता है कि इस्टाग्राम कैसे युवाओं का ब्रेनवॉश कर रहा है। असली छात्र जो NEET पेपर लीक के मुद्दों पर आवाज उठाने पहुँचे थे, वे इस भीड़ में कहीं गुम हो गए, जबकि राजनीतिक दलों, वामपंथी छात्र संगठनों और उपद्रवियों ने प्रदर्शन को एक बिल्कुल अलग दिशा दे दी।

वहीं पुलिस पर हमले, मंदिर पर पथराव, पत्रकारों से बदसलूकी और हिंसा फैलाने की सुनियोजित साजिश के सबूत सामने आने के बावजूद एक बड़ा तबका इन तथ्यों को जानबूझकर नजरअंदाज करता रहा। यही वजह है कि दोनों पहलुओं को खुलकर सामने रखना जरूरी हो जाता है, ताकि जनता खुद तय कर सके कि उस दिन जंतर-मंतर की सड़कों पर हकीकत क्या थी।

वहीं प्रदर्शन का असली नेतृत्व की बात करें, तो वह मौके से ही गायब रहा। न तो अभिजीत दिपके की लीडरशिप दिखी, न सौरव दास, न आशुतोष रांका और न ही CJP के वॉलंटियर्स नजर आए। वहीं प्रदर्शन के वक्त प्रवक्ता विजेता दहिया को मेट्रो स्टेशन पर बर्गर खाते पकड़ा गया।

नतीजा यही निकलकर सामने आया कि महीने भर से ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन के नाम पर सिर्फ एक ढोंग चल रहा था, जब मौका मिला तो ‘कॉकरोचों’ के नाम पर हिंसकर भीड़ ने अपना असली रूप दिखा दिया। अब इसी भीड़ में एक-एक आदमी की पहचान दिल्ली पुलिस FRI तकनीक से करेगी।

और अपडेट यह है कि CJP अब भी जंतर-मंतर पर डेरा जमाए बैठी है। सरकार की तरफ से आश्वासन दिए जाने के बावजूद प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर खाली करने को तैयार नहीं है। वहीं दूसरी ओर CJP के भीतर दरार भी अब खुलकर सामने आने लगी है। अभिजीत दिपके के नेतृत्व को लेकर कुछ लोग पहले से ही नाराज थे और अब प्रदर्शन छोड़कर बर्गर खाने वाले विजेता दहिया को भी प्रवक्ता के पद से हटा दिया गया।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि इस पूरे प्रदर्शन में सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ जो शुरू से ईमानदारी के साथ CJP को सपोर्ट कर रहे थे।

मुंबई में उद्धव ठाकरे, कोलकाता में ममता बनर्जी, दिल्ली में राहुल-अखिलेश और चंद्रशेखर: जानिए जगह-जगह कैसे राजनीतिक तमाशे में बदला कॉकरोचों का प्रोटेस्ट

देश में छात्रों और बेरोजगार युवाओं के नाम पर शुरू हुआ ‘कॉकरोच आंदोलन’ अब अपने मूल उद्देश्यों से भटकता दिख रहा है। जिन युवाओं ने रोजगार, निष्पक्ष परीक्षाओं और शिक्षा सुधारों को लेकर आवाज उठाई थी, उनके मंच पर अब राजनीतिक दलों का कब्जा, वैचारिक जंग और आपत्तिजनक नारों का बोलबाला हो चुका है।

देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों (खासकर सीजेआई) की टिप्पणियों के विरोध में युवाओं ने सांकेतिक रूप से ‘कॉकरोच’ (कीड़ा) शब्द को अपने आत्मसम्मान से जोड़कर एक डिजिटल अभियान शुरू किया, तो देखते ही देखते इसने पूरे देश में तूल पकड़ लिया। सड़कों पर छात्र कॉकरोच के मास्क पहनकर और हाथ में अपनी डिग्रियाँ लेकर उतरे। उनका कहना था कि यदि रोजगार माँगने वाले युवाओं को व्यवस्था ‘कीड़ा-मकोड़ा’ समझती है, तो वे इसी पहचान के साथ सरकार से जवाब माँगेंगे।

इनकी शुरुआती माँगें थी-

  • NEET-UG और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई धाँधली व पर्चा लीक मामलों पर सख्त कार्रवाई
  • केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही और सुधार के साथ धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
  • पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और युवाओं के लिए गारंटीकृत रोजगार के अवसर

लेकिन जैसे-जैसे यह आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर से निकलकर राज्यों की राजधानियों और प्रमुख शहरों तक फैला, इसकी दिशा पूरी तरह बदल गई। सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल पीछे छूट गई और सड़कों पर सियासी दलों के कार्यकर्ताओं ने जमकर सियासी रोटियाँ सेंकी। जो आज भी जारी है।

कॉकरोचों के नाम पर राजनीतिक दलों ने सेंकी सियासी रोटियाँ

महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, केरल और मध्य प्रदेश के अलग-अलग शहरों में हुए इन प्रदर्शनों में छात्रों की उपस्थिति कम होती गई और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बैनर ज्यादा दिखाई देने लगे।

महाराष्ट्र में मुंबई से लेकर पुणे, नागपुर और संभाजीनगर तक प्रदर्शन

महाराष्ट्र में आंदोलन की तीव्रता सबसे अधिक देखी गई, जहाँ छात्र संगठनों के साथ-साथ राजनीतिक दलों के कैडर भी सड़कों पर उतर आए। महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे, छत्रपति संभाजीनगर, नागपुर जैसे शहरों में महाविकास आघाड़ी दल में शामिल एनसीपी-एसपी, शिवसेना-UBT के साथ ही वामपंथी छात्र संगठन, किसान संगठन भी इसमें शामिल हो गए।

मुंबई में राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) और युवा सेना (UBT) के कार्यकर्ताओं ने मुंबई विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर विरोध-प्रदर्शन किया। पुलिस ने परिसर की सुरक्षा बढ़ा दी और प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए हल्का बल प्रयोग किया।

खुद शिवसेना-यूबीटी के नेता उद्धव ठाकरे मैदान में उतरे और उन्होंने मंच से प्रदर्शन की कमान संभाली। पार्टी ने सार्वजनिक तौर पर सीजेपी का समर्थन किया है।

यहाँ शिवसेना-यूबीटी के कार्यकर्ताओं ने जमकर हंगामा किया और तोड़फोड़ की, जिसके बाद मुंबई पुलिस ने कार्रवाई भी की। इस हंगामे के दौरान 70 से अधिक लोगों को डिटेन भी किया गया था, जिसमें अधिकाँश छात्र बताए गए, हालाँकि शिवसेना-यूबीटी के नेताओं ने उन्हें पुलिस की हिरासत से छुड़ा लिया। वहीं, पार्टी ने दावा किया कि 150+ लोगों को डिटेन किया गया था।

मुंबई और महाराष्ट्र में एनसीपी-शरद पवार की पार्टी ने भी जमकर हंगामा किया।

एनसीपी-शरद पवार ने खुलकर सीजेपी का समर्थन भी किया।

छत्रपति संभाजीनगर के क्रांति चौक पर छात्रों, स्थानीय वकीलों और विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग को लेकर रास्ता जाम (चक्का जाम) कर दिया। यहाँ पुलिस के साथ धक्का-मुक्की हुई और यातायात घंटों बाधित रहा।

इसके अलावा नागपुर में जिला कलेक्टरेट कार्यालय का घेराव करने की कोशिश की गई, जबकि लातूर में छात्रों ने सांकेतिक रूप से डिग्रियाँ जलाकर अपना विरोध दर्ज कराया।

FTII पुणे में भी प्रदर्शन

पुणे में फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (FTII) के छात्र संघ ने कैंपस के भीतर और बाहर मार्च निकाला और सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल व CJP की माँगों का समर्थन किया।

गुजरात में भी खूब हुई सियासत

गुजरात के अहमदाबाद, बड़ौदा में आम आदमी पार्टी (AAP) युवा मोर्चा, स्थानीय नेताओं ने सरकार विरोधी हाई-वोल्टेज ड्रामा करते हुए गिरफ्तारियाँ दी हैं।

अहमदाबाद में लॉ गार्डन और एलिस ब्रिज के पास ‘संसद चलो’ मार्च और सोनम वांगचुक के समर्थन में विरोध प्रदर्शन कर रहे 150 से अधिक छात्रों और कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया था। पुलिस के अनुसार, यह कार्रवाई बिना अनुमति के इकट्ठा होने और धारा 1 के तहत निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने के कारण की गई थी।

दिल्ली में कॉन्ग्रेस और AAP में श्रेय लेने की होड़

दिल्ली में राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के साथ ही मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रदर्शन की कमान संभाली और पीएम आवास तक मार्च किया। हालाँकि इसका आम आदमी पार्टी ने तीखा विरोध किया।

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद और नेता संजय सिंह ने राहुल गाँधी पर सरकार का एजेंट होने का आरोप लगा दिया। उन्होंने कहा कि सरकार के कहने पर राहुल गाँधी इस तरह के प्रदर्शन में शामिल हुए हैं।

आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर और उनके समर्थकों ने मचाया हंगामा

दिल्ली में CJP के प्रदर्शन के दौरान हिंसा के मामले में सांसद चंद्रशेखर आजाद पर बड़े आरोप लगे हैं। चंद्रशेखर के साथ 8000 से 10000 लोग जय सिंह रोड पर इकट्ठा होकर संसद जाने की कोशिश कर रहे थे। पब्लिक के लिए रास्ता ब्लॉक कर दिया था। चंद्रशेखर के समर्थकों ने कॉपरेटिव सोसाइटी की टाइल पत्थर तोड़कर हमला किया, काँच की बोतलों से हमला किया, जूतों से हमला किया, पत्थर मारे।

जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के साथ ही AISA ने भी ताना था टेंट

जंतर-मंतर पर लंबे समय से कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले लोगों को बुलाया जा रहा था, तो दूसरी तरफ उस प्रोटेस्ट को संभालने की जिम्मेदारी AISA जैसे वामपंथी स्टूडेंट यूनियन ने उठा रखी थी। ताकि CJP के प्रदर्शन में राजनीति भी जमकर की जा सके और प्रदर्शन को गैर-राजनीतिक भी साबित किया जा सके। हालाँकि वांगचुक के साथ ही आईसा के भी 3 मेंबर्स भूख हड़ताल पर बैठे थे, लेकिन सोनाम के मोर्च से हटने के बाद वो सामने आए। अभी तक वो अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल तरीके से पूरे प्रदर्शन को मैनेज करने वाले रोल में रहे। ये अलग बात है कि ‘डफली गैंग’ के एक्सपोज होने के साथ ही दोनों का कनेक्शन भी एक्सपोज हो गया था।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का CJP को खुला समर्थन, प्रदर्शन में शामिल होने का ऐलान

पश्चिम बंगाल के कोलकाता, जादवपुर में तृणमूल छात्र परिषद (TMCP), CPIM समर्थित संगठनोंने केंद्रीय एजेंसियों के खिलाफ नारेबाजी और राजनीतिक बयानबाजी करते हुए प्रदर्शन किए।

वहीं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी (TMC) प्रमुख ममता बनर्जी ने दिल्ली में CJP (कॉकरोच जनता पार्टी) के विरोध प्रदर्शन और संसद मार्च को अपना खुला समर्थन दिया है। उन्होंने कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम में स्पष्ट कहा कि उनकी पार्टी इस आंदोलन के साथ मजबूती से खड़ी है और जरूरत पड़ने पर वे खुद भी प्रदर्शन में शामिल होंगी।

कर्नाटक में भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस से झड़प

बेंगलुरु में वामपंथी छात्र संगठनों और CJP समर्थकों ने फ्रीडम पार्क में रैली निकाली। प्रदर्शनकारियों की पुलिस के साथ बहस हुई जब उन्होंने राजभवन की ओर मार्च करने का प्रयास किया। कॉन्ग्रेस शासित पुलिस ने इन प्रदर्शनों को बेरहमी से कुचला और तुरंत इन्हें तितर-बितर करने में देरी नहीं लगाई।

केरल में पुलिस कार्रवाई और वॉटर कैनन का प्रयोग

केरल के तिरुवनंतपुरम और कोच्चि में CPM-समर्थित छात्र संगठनों (SFI और DYFI) ने प्रदर्शन को अपने वैचारिक एजेंडे की दिशा में मोड़ने का प्रयास किया। प्रदर्शनकारियों ने जब सचिवालय की ओर बढ़ने की कोशिश की और सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़े, तो स्थिति हिंसक हो गई।

केरल की कॉन्ग्रेस सरकार ने इन प्रदर्शनों को बेदर्दी से कुचलने में कोई देरी नहीं की। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर वॉटर कैनन (जल बौछार) और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया, जिससे कई कार्यकर्ता घायल हुए।

गोवा में NGO लॉबी ने निकाला कैंडल लाइट मार्च

गोवा में गैर-सरकारी संगठन (NGO) ‘उजवाड’ के बैनर तले राजधानी पणजी में एक कैंडललाइट मार्च निकाला गया। मार्च में शामिल लोगों ने शिक्षा क्षेत्र में फैली कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मामलों पर सरकार की खिंचाई की।

MP में भी CJP के नाम पर सरकार विरोधी प्रदर्शन

देश के कई अन्य राज्यों की तरह ही मध्य प्रदेश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। कहीं राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता छात्र बनकर प्रदर्शन करते नजर आए, तो कहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने व्यवस्था सुधार के नाम पर मोर्चा संभाला। मध्य प्रदेश में राजधानी भोपाल से लेकर खरगोन जिले तक ये प्रदर्शन हुए।

दरअसल, आगामी स्थानीय और राज्यस्तरीय चुनावों को देखते हुए विपक्षी दलों को छात्रों का यह गुस्सा एक तैयार वोट बैंक की तरह दिखा। NSUI, समाजवादी छात्र सभा और SFI जैसे संगठनों ने आंदोलन के मंचों पर कब्जा कर लिया, जिससे आम और गैर-राजनीतिक छात्र धीरे-धीरे किनारे होते चले गए।

जो आंदोलन कभी देश भर के करोड़ों बेरोजगार और प्रताड़ित छात्रों की बुलंद आवाज बनकर उभरा था, वह आज राजनीतिक रैलियों और टीवी बहसों का महज एक मसाला बनकर रह गया है। नेताओं ने इस मंच का इस्तेमाल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए तो खूब किया, लेकिन नतीजा यह रहा कि छात्र आज भी वहीं खड़े हैं हाथ में अपनी डिग्रियाँ लिए, अगली परीक्षा की तारीख और एक पारदर्शी तंत्र के इंतजार में।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत में छात्र आंदोलनों का भटकना कोई नई बात नहीं है। जब भी युवाओं का कोई स्वतःस्फूर्त आंदोलन खड़ा होता है, राजनीतिक पार्टियां उसमें अपना फायदा ढूँढने लगती हैं। ‘कॉकरोच आंदोलन’ भी उसी सियासत का शिकार हो गया।

किसान संगठनों को सच में है ‘अन्नदाताओं’ की चिंता या महापंचायत के नाम पर सिर्फ उठा रहे मौके का फायदा?

भारत-अमेरिका के बीच प्रस्तावित ट्रेड डील के विरोध में दिल्ली के किसान घाट पर 21 जुलाई 2026 (मंगलवार) को ‘देश बचाओ मोर्चा’ ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किया है।

आयोजकों का कहना है कि देशभर से लगभग 550 किसान संगठनों और सामाजिक समूहों के प्रतिनिधि इस किसान महापंचायत में शामिल होंगे।

वहीं सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर पुलिस ने शंभू बॉर्डर को सील कर दिया है और घग्गर नदी के पुल पर बैरिकेड्स लगा दिए हैं, साथ ही सीमेंट से ब्लॉक भी बनाए गए हैं। किसी भी स्थिति को संभालने के लिए मौके पर पुलिस बल तैनात है।

किसान नेताओं के आरोप

किसान नेताओं का आरोप है कि पंजाब और हरियाणा, दोनों सरकारें उन्हें दिल्ली जाने से रोक रही हैं। उनका कहना है कि हरियाणा पुलिस ने पंजाब की सीमा में घुसकर रास्ते बंद कर दिए और पंजाब सरकार ने भी इसे नहीं रोका। पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से किसानों को दिल्ली लाने के लिए बसों का इंतजाम किया गया था।

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि 16 जुलाई (गुरुवार) की सुबह लगभग 1000 किसानों को लेकर एक काफिला गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब से रवाना हुआ था, जो जीटी रोड से होकर शंभू बॉर्डर की ओर बढ़ा, लेकिन वहाँ पहले से ही भारी पुलिस बल तैनात था और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी।

इससे पहले, भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढ़ूनी को कुरुक्षेत्र में पुलिस ने दिल्ली जाते समय हिरासत में लिया था। वहीं संगठन के प्रवक्ता प्रिंस वरैच ने बताया था कि उनके कई कार्यकर्ताओं को पकड़ा जा रहा है ताकि वे इस प्रदर्शन में शामिल न हो सकें।

हरियाणा के अंबाला और कुरुक्षेत्र जैसे इलाकों से भी किसान दिल्ली के लिए निकले। किसान मजदूर संघर्ष कमेटी (KMSC) के नेता सरवन सिंह पंधेर ने बताया कि उनके संगठन के अलावा किसान मजदूर मोर्चा, आजाद किसान मोर्चा और भारतीय किसान मोर्चा (BKU), एकता संघर्ष के लोग भी पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से दिल्ली कूच कर रहे हैं।

पंधेर का कहना है कि सरकार इस समझौते को बिना किसानों, कृषि संगठनों से चर्चा किए गुप्त रूप से आगे बढ़ा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस विषय पर कोई आधिकारिक जानकारी साझा नहीं कर रही है और उन्हें समझौते से जुड़ी जानकारी केवल अमेरिका की प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से मिल रही है। उन्होंने कहा कि किसान दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस समझौते पर स्पष्ट जवाब माँगेंगे।

उनके अनुसार हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित कई राज्यों से किसान और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि एक दिवसीय रैली में भाग लेने के लिए दिल्ली पहुँच रहे हैं।

पंधेर ने बताया कि फरवरी में जारी एक बयान में दोनों देशों ने सहमति जताई थी कि वे जल्द ही एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। ऐसे में उन्हें डर है कि इसमें खेती, डेयरी, डिजिटल ट्रेड, ई-कॉमर्स और सरकारी खरीद जैसे संवेदनशील सेक्टर भी शामिल हो सकते हैं।

उन्होंने अमेरिकी रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिका लंबे समय से भारत के डेयरी और कृषि बाजार में अपनी पहुँच बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। वह सोयाबीन, मक्का, कपास, सेब, बादाम, डेयरी और पोल्ट्री उत्पादों पर भारत के लगाए जाने वाले आयात शुल्क (टैरिफ) को कम करवाना चाहता है।

इसी तरह किसान मजदूर संघर्ष कमेटी के नेता जर्मनजीत सिंह बंदाला ने दावा किया कि इस समझौते से देश के मजदूरों, छोटे दुकानदारों और किसानों को भारी नुकसान होगा। उन्होंने कहा कि यह समझौता भारतीय किसानों के बजाय अमेरिकी कंपनियों और बड़े किसानों को फायदा पहुँचाएगा।

बंदाला ने तर्क दिया कि अमेरिका में खेती हजारों एकड़ के बड़े फार्म्स में होती है और वहाँ की सरकार किसानों को भारी सब्सिडी देती है। इसके विपरीत, भारत के ज्यादातर किसानों के पास सिर्फ दो-ढाई एकड़ जमीन है और उन्हें बहुत कम सरकारी मदद मिलती है। अगर अमेरिका से सस्ता सामान भारत के बाजारों में आने लगा, तो भारतीय किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएँगे और उनकी आमदनी गिर जाएगी।

उन्होंने आरोप लगाया कि भारत सरकार अमेरिकी दबाव में यह समझौता कर रही है, जबकि पिछली सरकारों ने भारतीय कृषि क्षेत्र को विदेशी प्रभाव से बचाकर रखा था। किसान नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने उनकी माँगें नहीं मानीं, तो वे इस आंदोलन को और तेज करेंगे।

क्या है दावों की असलियत

मालूम हो कि भले ही इस ट्रेड डील को कुछ किसान संगठन, बेहद खतरनाक दिखाकर हंगामा और विरोध कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अभी तक तय नहीं हुआ है और इसकी वजह यही है कि ये मोदी सरकार किसानों के हितों को ताक पर रखकर किसी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं है।

अब ऐसी स्थिति में तो साफ लगता है कि जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे तथ्यों पर कम और सिर्फ आशंकाओं और अफवाहों पर ज्यादा आधारित हैं। दरअसल, हकीकत यह है कि केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और शिवराज सिंह चौहान बार-बार साफ कर चुके हैं कि बातचीत जारी है और भारत अपने किसानों या डेयरी सेक्टर के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा। ऐसा कोई फैसला नहीं लिया जाएगा जिससे घरेलू बाजार को नुकसान पहुँचे।

इसके अलावा फरवरी में दोनों देशों द्वारा जारी बयान के अनुसार, जिन चीजों पर टैक्स घटाने की बात चल रही है (जैसे जानवरों का दाना, मेवे, वाइन, सोयाबीन तेल आदि), वे ऐसी चीजें हैं जिन्हें भारत अपनी जरूरत पूरी करने के लिए पहले से आयात करता रहा है। इस समझौते में चावल, गेहूँ या मक्के जैसी मुख्य खाद्य फसलों का कोई जिक्र नहीं है। यह छूट सिर्फ उन चीजों के लिए है जिनका भारतीय किसानों की मुख्य फसलों से कोई सीधा मुकाबला नहीं है।

अब यदि किसानों के हितों की चिंता करने वालों को केंद्रीय मंत्री के बयान पर भी भरोसा नहीं है तो उन्हें अमेरिकी कॉमर्स सेक्रेट्री हॉवर्ड लुटनिक का बयान भी सुनना चाहिए, जो उन्होंने एक समय में गुस्से में दिया था। उन्होंने पिछले साल कहा था, “भारत के पास 1.4 अरब लोग हैं, फिर भी वे हमसे एक बोरा मक्का तक नहीं खरीदते। वे अपनी हर चीज हमें बेचते हैं, लेकिन हमारे सामान पर भारी टैक्स लगा देते हैं।”

अमेरिकी मंत्री का यह बयान खुद साबित करता है कि वह भारतीय बाजार में पैठ बनाने के लिए आतुर हैं, लेकिन भारत सरकार किसी दबाव में नहीं झुक रही है और उनके लिए किसान हित सर्वोपरि है।

पीएम मोदी ने तो खुद दोहराया है, “हमारे लिए किसानों का हित सबसे ऊपर है। भारत अपने किसानों, पशुपालकों और मछुआरों के हितों से कभी समझौता नहीं करेगा, चाहे इसकी जो भी कीमत चुकानी पड़े।”

किसान हित या स्वार्थ का खेल?

अब ये समझने की जरूरत है कि कैसे किसानों का नाम लेकर बनाए गए ये संगठन अक्सर कृषि सुधारों के रास्ते और किसानों के विकास में सबसे बड़ी रुकावट बनकर सामने आते हैं। यही स्थिति तीनों कृषि कानूनों के समय भी देखी गई थी।

वे ऐसे कानून थे, जो किसानों को यह आजादी देते थे कि वे सरकारी मंडियों (APMC) के बिचौलियों से बचकर अपनी फसल सीधे कंपनियों या प्राइवेट खरीदारों को अच्छे दामों पर बेच सकें। लेकिन फर्जी प्रचार फैलाकर आंदोलन खड़ा किया गया कि सरकार किसानों की जमीन छीन लेगी, और अंततः हिंसा व दबाव के कारण उन प्रगतिशील कानूनों को वापस लेना पड़ा।

अब जब भारत एक बड़े व्यापारिक समझौते के जरिए अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की ओर बढ़ रहा है, तो ये संगठन एक बार फिर बिना पूरी बात समझे सड़कों पर उतर आए हैं।

अगर इनका मकसद सच में किसानों की भलाई होता, तो वे सरकार के साथ बैठकर बातचीत का रास्ता चुनते, न कि बार-बार रास्ते जाम करके आम जनता और यात्रियों के लिए मुसीबत खड़ी करते।

इनका उद्देश्य, कृषि कानून को नकारने से लेकर ट्रेड डील का विरोध करने तक साफ है कि ये लोग मौके का फायदा उठाकर केवल अपने राजनीतिक और आर्थिक स्वार्थ पूरे करने का प्रयास करते हैं।

(नोट: मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में रुकमा राठौड़ ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

UK में धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन स्वाभाविक नहीं, ये पूरी तरह प्रायोजित: जानिए The Wire के दावों की हकीकत, कैसे SFI ने पहले से बुलाया था भीड़ का जुटान

वामपंथी प्रचार पोर्टल ‘द वायर’ ने दावा किया कि भारत में छात्रों का विरोध प्रदर्शन ‘लंदन तक पहुँच गया है’ और दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के नेतृत्व वाले प्रदर्शन पर पुलिस कार्रवाई की खबरों के बाद भारतीय उच्चायोग के बाहर जमा हुए लोगों की तस्वीरें साझा करते हुए कहा है कि यह स्वतःस्फूर्त था।

गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस ने सीजेपी समर्थकों को संसद मार्च की अनुमति नहीं दी थी। इसके बावजूद इन लोगों ने बेहद संवेदनशील इस जगह पर मार्च निकाला और संसद तक जाने की कोशिश की। कई जगहों पर प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई। इस दौरान 5 आईपीएस अधिकारी समेत कई पुलिस वाले घायल हुए। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में कई प्रदर्शनकारी भी घायल हुए हैं।

‘द वायर’ ने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट में कहा, “युवाओं का विरोध प्रदर्शन लंदन तक पहुँचा, प्रदर्शनकारी भारतीय उच्चायोग के बाहर जमा हुए।” उसने दावा किया कि दिल्ली और दूसरे शहरों में पुलिसिया कार्रवाई की खबर मिलने के बाद ‘बड़ी संख्या में’ लोग उच्चायोग के बाहर इकट्ठा हुए।

पोर्टल ने इस जमावड़े को ब्रिटेन में रहने वाले भारतीयों की स्वतःस्फूर्त प्रतिक्रिया बताया और इस तथ्य को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया कि स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) की यूके शाखा ने पहले ही तय समय पर लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर विरोध प्रदर्शन का आह्वान कर रखा था।

एसएफआई यूके ने विरोध प्रदर्शन की घोषणा पहले ही कर दी थी और इसकी विस्तृत जानकारी उसके सोशल मीडिया पर शेयर किया था। संगठन ने स्थान और समय पहले ही बता दिया था, पोस्टर चिपकाए थे और अपनी माँगों की फेहरिस्त बता कर समर्थकों से इसमें भाग लेने का आह्वान किया था। एसएफआई से जुड़ी शाखा पिछले कई हफ्तों से यूके के दूसरे जगहों मसनल लीड्स और एडिनबर्ग में विरोध प्रदर्शन कर रही हैं।

मैनचेस्टर में हुए विरोध प्रदर्शन में भाग लेने वाले एक सोशल मीडिया यूजर ने बाद में पुष्टि की कि वहाँ का प्रदर्शन भी एसएफआई यूके ने ही आयोजित किया था।

द वायर ने एसएफआई के विरोध प्रदर्शन को प्रवासी भारतीयों के प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। दरअसल यह लोगों को गुमराह करने का तरीका है। द वायर ने दिल्ली में सीजेपी समर्थकों के साथ हुई पुलिसिया झड़प का लंदन में भारतीय दूतावास के सामने ‘जवाब के रूप में’ प्रस्तुत किया। जबकि इस विरोध प्रदर्शन का ऐलान दिल्ली में हुए घटना से एक दिन पहले यानी 19 जुलाई को ही कर दी गई थी।

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पोस्टर पर ‘लंदन के कॉकरोच एकजुट हों’ का आह्वान किया गया था और लोगों से 20 जुलाई को शाम 6 बजे लंदन के इंडिया हाउस के बाहर ‘विरोध प्रदर्शन’ करने का आग्रह किया गया था। पोस्टर में तीन बातें थी। इसमें समर्थकों से भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों के साथ खड़े होने, सोनम वांगचुक का समर्थन करने और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की गई थी।

सबसे नीचे स्पष्ट रूप से लिखा था कि लंदन में आयोजित यह सभा ‘दिल्ली में संसद तक 20 जुलाई को हुए मार्च के समर्थन में’ आयोजित की जा रही है। लेकिन जैसा कि द वायर ने बताया है उस तरह से लोग विरोध प्रदर्शन के लिए जमा नहीं हुआ थे, बल्कि पहले से विरोध प्रदर्शन के लिए बुलाए जाने पर ये जमा हुआ थे। ये स्वत: स्फूर्त तो कतई नहीं था, जैसा द वायर बताने की कोशिश कर रहा है।

एसएफआई यूके ने विरोध प्रदर्शन के बाद लिखा कि लंदन में हजारों भारतीयों ने ‘हमारे आह्वान’ का जवाब दिया। उसने कहा कि यह प्रदर्शन भारतीय छात्र आंदोलन के समर्थन में आयोजित किया गया था और भारत में अपने ‘साथियों’ के संघर्ष को सलाम करता है। हालाँकि एसएफआई यूके ने दावा किया कि ‘हजारों’ लोग इकट्ठा हुए थे, लेकिन उसने जो वीडियो शेयर किया, उसमें कुछ लोग एक छोटी सी जगह में ठसाठस भरे हुए दिखाई दिए।

ब्रिटेन में हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल लोग एसएफआई के सदस्य थे या नहीं यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन आह्वान, प्रचार, आयोजन स्थल, संदेश और भाषण सभी एसएफआई यूके की ओर से ही किए गए थे। द वायर ने इन सभी संदर्भों को हटाकर एसएफआई द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को भारतीय प्रवासी समुदाय के ‘स्वाभाविक समर्थन’ के रूप में प्रस्तुत किया।

एसएफआई यूके कई हफ्तों से समर्थकों को जुटाने में जुटा था

जंतर-मंतर पर हुई झड़प के बाद लंदन में हुआ प्रदर्शन कोई अचानक नहीं था। एसएफआई यूके कम से कम जून की शुरुआत से ही केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग करते हुए अभियान चला रहा था।

संगठन ने 4 जून को SFI लीड्स समिति के विरोध प्रदर्शन की तस्वीरें पोस्ट कीं, जिसमें राष्ट्रीय परीक्षाओं, जिनमें NEET, CUET, UGC NET और CBSE परीक्षाएं शामिल हैं, के कुप्रबंधन का विरोध किया गया। संगठन ने कहा कि यह प्रदर्शन भारतीय शिक्षा प्रणाली को लेकर युवाओं के गुस्से और निराशा को दर्शाता है।

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उसी दिन की एक अन्य पोस्ट में कहा गया कि एसएफआई यूके की सचिव सोमिहा समेत दूसरे सदस्यों ने धर्मेंद्र प्रधान के तत्काल इस्तीफे की माँग की है। संगठन ने वादा किया कि जब तक उनकी माँगें पूरी नहीं हो जातीं, तब तक वे अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखेंगे।

एसएफआई के केंद्रीय नेतृत्व ने राष्ट्रव्यापी अल्टीमेटम जारी किया था

विदेशों में चल रही यह मुहिम भारत में एसएफआई के केंद्रीय संगठन के अभियान के साथ-साथ चल रही थी। 9 जून को एसएफआई की केंद्रीय कार्यकारी समिति ने केंद्र सरकार को दस दिन का अल्टीमेटम दिया। इसकी माँगों में धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, एनटीए को समाप्त करना और परीक्षाओं का विकेंद्रीकरण शामिल था।

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इसमें सीबीएसई परीक्षाओं में ओएसएम मूल्यांकन प्रणाली को रद्द करने और नीट और सीबीएसई परीक्षा विवादों की स्वतंत्र न्यायिक जाँच कराने की भी माँग की गई थी।

संगठन ने ‘सड़कों पर मिलते है’ कहा

एसएफआई ने 14 जून को दावा किया कि 22 राज्यों में 623 केंद्रों पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। संगठन के मुताबिक, 753 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 16 लोगों को जेल भेजा गया। एसएफआई यूके ने इस संदेश को दोबारा साझा करते हुए घोषणा की कि संगठन का ‘साहस’ अभी भी बना हुआ है।

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ये पोस्ट लगातार चल रहे एसएफआई के संगठनात्मक अभियान का हिस्सा था। ब्रिटेन में हुए विरोध प्रदर्शन उस व्यापक लामबंदी का हिस्सा था, न कि खुद ब खुद मोदी सरकार के विरोध में आए प्रवासी भारतीयों का प्रदर्शन था।

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लीड्स और एडिनबर्ग समितियों ने अलग-अलग प्रदर्शनों का आयोजन किया

एसएफआई यूके की सोशल मीडिया गतिविधि से यह भी पता चलता है कि कैसे इसकी स्थानीय समितियाँ एक ही माँगों को लेकर एकजुट हुईं। 14 जुलाई को इसकी लीड्स समिति ने पार्किंसंस बिल्डिंग के बाहर विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया। पोस्टर पर हैशटैग ‘प्रधान गोबैक’ लिखा था और घोषणा की गई थी, ‘पार्किंसंस लीड्स में तिलचट्टे जमा हो रहे हैं।’ प्रचार सामग्री में प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें, एसएफआई के प्रतीक चिन्ह और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग शामिल थी।

एसएफआई यूके ने 18 जुलाई को कहा कि उसकी एडिनबर्ग समिति ने जंतर-मंतर भूख हड़ताल और भारत में छात्र आंदोलन के समर्थन में एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। संगठन ने अपने एडिनबर्ग अध्यक्ष को वक्ता के रूप में नामित किया और सभा में सामूहिक और संगठित आंदोलनों की आवश्यकता पर बल दिया।

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उसी दिन लीड्स समिति ने लीड्स विश्वविद्यालय में एक और प्रदर्शन आयोजित किया। एसएफआई यूके ने कहा कि प्रदर्शनकारियों ने सरकार से जवाबदेही और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की।

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इसमें सचिव सोमिहा और लीड्स सचिव गायत्री ने भी अपनी बात रखी। संगठन ने कहा कि माँगें पूरी होने तक एकजुटता जारी रहेगी। ये दिल्ली में हुई घटनाओं की खबर सुनकर स्वतंत्र रूप से एकत्रित हुई भीड़ नहीं थी। ये समिति के नेतृत्व में किए गए प्रदर्शन थे जिनमें नामित पदाधिकारी, एक जैसे बैनर और बार-बार दोहराई जाने वाली राजनीतिक माँगें शामिल थीं।

मैनचेस्टर के प्रदर्शनकारी ने पुष्टि की कि एसएफआई यूके ने ही इस सभा का आयोजन किया था। कमल नाम के एक सोशल मीडिया यूजर ने मैनचेस्टर में हुए प्रदर्शन का फुटेज भी पोस्ट किया और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की।

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जब एक अन्य यूजर ने पूछा कि क्या बर्मिंघम में भी इसी तरह का विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जा सकता है, तो कमल ने जवाब दिया कि मैनचेस्टर में आयोजित कार्यक्रम एसएफआई यूके द्वारा आयोजित किया गया था और आगे की जानकारी के लिए उनके इंस्टाग्राम अकाउंट को फॉलो करने का सुझाव दिया।

इससे इस बात की और पुष्टि होती है कि एसएफआई अपने नेटवर्क का इस्तेमाल कई ब्रिटिश शहरों में प्रदर्शन आयोजित करने के लिए कर रहा था।

एसएफआई यूके दिल्ली विरोध प्रदर्शन के बाद गठित अनौपचारिक ग्रुप नहीं है

एसएफआई यूके खुद को स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की पहली अंतरराष्ट्रीय समिति बताती है। इसकी वेबसाइट का दावा है कि ब्रिटेन में इसके 600 से अधिक सदस्य और दस से अधिक उपसमितियां हैं। यह ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में सक्रिय इकाइयाँ संचालित करने का दावा करती है और कहती है कि यह नियमित रूप से अभियान, सांस्कृतिक कार्यक्रम, धन जुटाने की गतिविधियाँ और छात्र कल्याणकारी कार्यक्रम आयोजित करती है।

इसके संविधान में कहा गया है कि एसएफआई का उद्देश्य भारत में छात्रों के साथ-साथ विदेशों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों को एक मंच पर लाना है। यह एक ‘लोकतांत्रिक और समाजवादी समाज’ के निर्माण को लेकर कटिबद्ध है। छात्रों को श्रमिकों, किसानों और अन्य ‘प्रगतिशील शक्तियों’ के साथ संगठित करने और विश्व भर में समाजवादी आंदोलनों के प्रति एकजुटता दिखाने का आह्वान करता है।

सीपीएम का छात्र संगठन एसएफआई है। सीपीआई(एम) के पूर्व महासचिव सीताराम येचुरी सहित कई वरिष्ठ नेता इसी संगठन से उभरे और पार्टी नेतृत्व में शामिल होने से पहले एसएफआई में वरिष्ठ पदों पर रहे।

इसलिए एसएफआई यूके जंतर-मंतर आंदोलन के दौरान उभरे छात्रों का कोई अनौपचारिक व्हाट्सएप समूह नहीं है। यह सदस्यों, समितियों, पदाधिकारियों और एक वैचारिक कार्यक्रम के साथ एक स्थापित वामपंथी राजनीतिक नेटवर्क का हिस्सा है।

बीबीसी और अल जजीरा ने इस आंदोलन को GEN Z के विद्रोह के रूप में पेश किया

जहाँ एक ओर ‘द वायर’ ने लंदन प्रदर्शन से एसएफआई को हटा दिया, वहीं अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों ने कहा कि दिल्ली में हुआ आंदोलन भारत में जेनरेशन जेड का विद्रोह है।

बीबीसी ने ‘जंतर मंतर: दिल्ली में जनरेशन Z का CJP विरोध प्रदर्शन किस बारे में है?’ शीर्षक से एक वीडियो विश्लेषण प्रसारित किया। साथ ही सोशल मीडिया पर पोस्ट कर पूछा कि राजधानी में हजारों लोग विरोध प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं।

एक दूसरे रिपोर्ट में, बीबीसी ने सीजेपी को शिक्षा और रोजगार सुधारों की माँग करने वाला युवाओं के नेतृत्व वाला विरोध आंदोलन बताया। इसने इस आंदोलन को हाल के वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सार्वजनिक तौर पर ‘सबसे बड़ा असंतोष’ बताया।

अल जजीरा ने सनसनीखेज शीर्षक का इस्तेमाल किया , ‘अभी या कभी नहीं : छात्रों ने भारत की संसद की ओर मार्च करने के लिए दिल्ली के लॉकडाउन को तोड़ा’

इस रिपोर्ट में सीजेपी को मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बताया गया और दावा किया गया कि हजारों लोगों ने संगठन के आह्वान पर अपनी भागीदारी दी है। रिपोर्ट में पुलिस कार्रवाई पर पूरा जोर दिखा, प्रदर्शनकारियों के बयान शामिल किए गए और मोदी विरोधी खेमे के मशहूर चेहरे की टिप्पणी का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि यह आंदोलन शिक्षा, रोजगार, महँगाई और गरीबी को लेकर असंतोष का परिणाम है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच ने दमनकारी कार्रवाई की मनगढ़ंत कहानी बताई

अमेरिका की एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी भारत में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के दमन का आरोप लगाया । अपने बयान में उसने जंतर-मंतर के ‘तस्वीरों और रिपोर्टों’ का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली पुलिस ने ‘बेवजह और अत्यधिक बल’ का प्रयोग किया। रिपोर्ट में पुलिसिया लाठीचार्ज, आँसू गैस के गोले छोड़े जाने और पत्थरबाजी से आरोपों की जाँच की माँग की।

एमनेस्टी ने सीजेपी को नेतृत्वकर्ता माना और परीक्षा में अनियमितताओं, मुआवजे और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से संबंधित माँगों को दोहराया।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने भी इस आंदोलन को हाल के वर्षों के सबसे बड़े सरकार विरोधी प्रदर्शनों में से एक बताया । उसने अधिकारियों से संयम बरतने, प्रदर्शन स्थल के पास मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बहाल करने और लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने की व्यवस्था करने का आग्रह किया।

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एमनेस्टी और एचआरडब्ल्यू के रिपोर्टों में ये बताने की कोशिश की गई कि मोदी सरकार के खिलाफ युवा सड़कों पर हैं और उनका दमन किया जा रहा है।

भारतीय सरकार के खिलाफ एक सुनियोजित साजिश

एसएफआई यूके, लेफ्ट लिबरल गैंग, अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटलेट्स और एमनेस्टी इंटरनेशनल और ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे गैर-सरकारी संगठनों ने विरोध प्रदर्शनों को जिस तरह से बताने का प्रयास किया है, उससे लगता है कि भारत सरकार छात्रों के कल्याण के खिलाफ है। इस बात को मानने से पहले यह जानना आवश्यक है कि इन विरोध प्रदर्शनों को कैसे आयोजित किया गया और कैसे प्रस्तुत किया गया।

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जंतर-मंतर पर मौजूद सभी छात्र दुष्प्रचार का हिस्सा नहीं थे, लेकिन गैरकानूनी प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण निर्दोष छात्रों को भी लाठीचार्ज और कानूनी मुकदमों को झेलना पड़ रहा है। अभिजीत दिपके, सौरभ दास और अन्य तथाकथित नेता या तो लाठियों और आँसू गैस से दूर खड़े थे या विरोध स्थलों पर मौजूद ही नहीं थे।

इन सबके बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रचारित-प्रसारित की जा रही विरोध प्रदर्शन के कहानी की गहन जाँच-पड़ताल की आवश्यकता है और उसके पीछे मंशा को सामने लाने की जरूरत है।

प्रोपेगेंडा के खेल में The News Minutes ने छिपाए फैक्ट्स, एजेंडा था- ONGC के CSR फंड से ₹670 करोड़ का दान ‘RSS से जुड़े संगठनों’ को: पढ़ें- पड़ताल में कैसे खुल गई पोल

‘द न्यूज मिनट’ ने सरकारी स्वामित्व वाली तेल कंपनी ओएनजीसी के बारे में एक रिपोर्ट 19 जुलाई 2026 को प्रकाशित किया । रिपोर्ट में कहा गया है कि ओएनजीसी ने आरएसएस से जुड़े 20 संगठनों को 670.97 करोड़ रुपए दिए। 2013 में सबसे पहले पैसे दिए गए। हालाँकि इसका अधिकांश हिस्सा पिछले 10 वर्षों में यानी 2015 और 2025 के बीच दिए गए, जो 668.01 करोड़ रुपए था।

इसी अवधि में, ONGC ने CSR पर कुल ₹4531 करोड़ खर्च किए। पूरे सीएसआर फंड 2000 से अधिक संगठनों के बीच बांटा गया यानी कुल फंड का केवल 14.7% हिस्सा ही इन 20 संस्थाओं को गया।

(द न्यूज मिनट रिपोर्ट)

न्यूज मिनट ने 20 संगठनों को तीन समूहों में विभाजित किया। नौ संगठन सीधे आरएसएस से जुड़े हैं। जबकि नौ दूसरे संगठनों की स्थापना आरएसएस से जुड़े लोगों ने की है या उनका संचालन आरएसएस के कार्यकर्ता कर रहे हैं। दो ने अतीत में आरएसएस के साथ काम किया है।

जिन दो संगठनों को सबसे अधिक धनराशि प्राप्त हुई, वे थे बीएवीपी (डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर वैद्यकीय प्रतिष्ठान) और डीएटीएसएएस (डॉ. आबाजी थाट्टे सेवा और अनुसंधान संस्था)। बीएवीपी को असम के शिवसागर में 300 बिस्तरों वाला अस्पताल बनाने के लिए लगभग 434 करोड़ रुपए मिले, वहीं डीएटीएसएएस को नागपुर में कैंसर अस्पताल के लिए लगभग 140 करोड़ रुपए मिले।

ये आँकड़े सीधे ओएनजीसी की सीएसआर वार्षिक रिपोर्ट से लिए गए हैं। ये आँकड़े ओएनजीसी की वेबसाइट पर उपलब्ध है। ये तथ्य है और इसे समझना बेहद जरूरी है।

बाकी करीब 85% हिस्सा किन संगठनों को मिला

आरएसएस से जुड़े संगठनों को 14.7% ही मिला, बाकि 85% से थोड़ा अधिक हिस्सा यानी 4531 करोड़ रुपए के CSR खर्च में से लगभग 3863 करोड़ रुपए उन संगठनों को दिए गए, जिनका RSS से कोई संबंध नहीं है। इनकी संख्या 1980 से अधिक है।

अगर हम ONGC की वार्षिक CSR रिपोर्टों को देखें, तो ये पता चलता है कि ये खर्च कितना ज्यादा है। ये रिपोर्ट 2018-19 से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। अकेले वित्तीय वर्ष 2024-25 में ONGC ने असम के एसएम देव सिविल अस्पताल और करीमगंज सिविल अस्पताल के लिए चिकित्सा उपकरण उपलब्ध कराए। इनमें एनेस्थीसिया वर्कस्टेशन, आईसीयू वेंटिलेटर और डिजिटल रेडियोग्राफी सिस्टम शामिल हैं।

कंपनी ने इसके साथ-साथ हरिद्वार के एक नर्सिंग कॉलेज के लिए सभागार बनवाया। कोयंबटूर में बाल विकास सेवाओं के लिए सात आंगनवाड़ी भवन बनवाए। गुरुग्राम में ब्रह्मा कुमारिस के रिट्रीट सेंटर के लिए एक सौर ऊर्जा संयंत्र और ठाणे की एक झील से कचरा साफ करने में मदद करने वाली एक AI-सक्षम मशीन के लिए रकम उपलब्ध कराया। इनमें से किसी भी संगठन का RSS से कोई संबंध नहीं है। इनमें सरकारी सिविल अस्पतालों से लेकर पश्चिम बंगाल में एम्बुलेंस सेवा चलाने वाले एक सिख धर्मार्थ ट्रस्ट तक का नाम है।

ओएनजीसी के वित्त वर्ष 2018-19 के रिकॉर्ड भी इसी तरह के पैटर्न को दर्शाते हैं। हेल्पएज इंडिया को देशभर में बुजुर्ग नागरिकों की सेवा करने वाली मोबाइल मेडिकल यूनिटों के लिए 7 करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी गई। अक्षय पात्र फाउंडेशन को राजस्थान और झारखंड में स्कूली बच्चों को भोजन पहुँचाने के लिए वाहनों की फंडिंग की गई।

केरल में आई बाढ़ के दौरान, ओएनजीसी ने हैबिटेट फॉर ह्यूमैनिटी के माध्यम से राहत कार्यों के लिए फंडिंग की और तमिलनाडु में चक्रवात गाजा जब तबाही मचा रहा था तो उस वक्त स्थानीय रिलीफ संगठनों के माध्यम से इमरजेंसी भोजन और लाइट के लिए फंडिंग की।

उसी वर्ष हजारों छोटे अनुदान बिहार, गुजरात और उत्तर प्रदेश के गाँवों में शौचालय बनाने, दूरदराज के क्षेत्रों में हैंडपंप और सौर स्ट्रीट लाइट लगाने और राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रीय विद्यालय स्कूलों को सहायता प्रदान करने के लिए दिए गए। इनमें से अकेले केंद्रीय विद्यालय को एक वर्ष में 53 करोड़ रुपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई।

इस कार्य में विचारधारा कभी आड़े नहीं आता। संरक्षण कार्यों के लिए वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया और वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी इंडिया, प्रशिक्षण और अभियानों के लिए इंडियन माउंटेनियरिंग फाउंडेशन, कई राज्यों में स्वच्छता परियोजनाओं के लिए सुलभ इंटरनेशनल और विकलांगों के संगठनों को मदद की। कंपनी ने भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति को भी मदद की थी, जो कम कीमत पर या फ्री में कृत्रिम अंग बाँटती हैं।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि ओएनजीसी का सीएसआर खर्च वास्तव में बड़ा है। कंपनी इसके माध्यम से स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, आपदा राहत, स्वच्छता, वन्यजीव संरक्षण और हाशिए पर पड़े समुदायों को मदद करती है। यह राष्ट्रीय गैर सरकारी संगठनों से लेकर स्थानीय ग्राम पंचायतों तक को मदद करती है। न्यूज़ मिनट ने अपनी रिपोर्ट में ₹668 करोड़ आरएसएस से जुड़े 20 संगठनों को देने की बात कही है वह सही है, लेकिन यह एक बहुत बड़े सीएसआर बजट का एक छोटा सा हिस्सा है।

न्यूज मिनट ने अधूरी जानकारी दी

यह देखना महत्वपूर्ण है कि 668 करोड़ रुपये की राशि वास्तव में 20 संगठनों के बीच कैसे वितरित की गई है। ₹668 करोड़ में से 574 करोड़ रुपए यानी लगभग 86% केवल दो संगठनों BAVP और DATSAS को दी गई। बाकी 18 संगठनों को करीब 94 करोड़ रुपए मिले। इस दौरान किसी संगठन को 1 करोड़ भी मिले तो किसी को 15.53 करोड़ रुपये भी दिए गए।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अस्पताल और कैंसर संस्थान बनाना महँगा पड़ता है। एक बड़ी स्वास्थ्य परियोजना पर आसानी से सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च हो सकते हैं, जबकि स्कूल, छात्रावास और आपदा राहत जैसे दूसरे सामाजिक सेवा संबंध (सीएसआर) कार्यों में काफी कम खर्च आता है। यही वजह है कि आरएसएस से जुड़े कुल दान का बड़ा हिस्सा दो अस्पताल से जुड़े परियोजनाओं पर खर्च किया गया। इसलिए 14.7% का आँकड़ा इस वजह से नहीं है कि ये आरएसएस से जुड़े हुए संगठन थे, बल्कि दो अहम परियोजनाओं को इसका बड़ा हिस्सा दिया गया। न्यूज मिनट की रिपोर्ट में इस जानकारी को छिपाने की कोशिश की गई।

मेडिकल सेवा से जुड़ा बीएवीपी-डीएटीएसएएस

बीएवीपी की स्थापना 1989 में हुई थी और यह कई कार्यरत अस्पतालों का संचालन करता है। इनमें औरंगाबाद स्थित डॉ. हेडगेवार अस्पताल और असम में स्थित नया अस्पताल शामिल है। असम में 300 बिस्तरों वाला अस्पताल है, जिसमें 21 विशेषज्ञ मौजूद हैं और यह सरकार की आयुष्मान भारत स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत सूचीबद्ध है। यह कम खर्च पर आम जनता को चिकित्सा सेवा प्रदान करता है, जिसमें गरीबी रेखा से नीचे के रोगियों के लिए खास छूट भी शामिल है। डीएटीएसएएस ने नागपुर में राष्ट्रीय कैंसर संस्थान का निर्माण किया है, जो 470 बिस्तरों वाला अस्पताल है और 2023 में खोला गया था।

दोनों संगठन पंजीकृत हैं और चिकित्सा क्षेत्र में उनके काम जगजाहिर हैं। न्यूज मिनट ने रिपोर्ट किया कि दोनों संगठनों का आरएसएस से संबंध रहा है, लेकिन इन तथ्यों के साथ यह समझना भी जरूरी है कि ये कार्यरत संस्थाएँ हैं, जो मेडिकल सेवा कर रही हैं। आरएसएस से उनके पुराने संबंध भी हैं, तो इसमें दिक्कत क्या है।

संगठनों ने दी जानकारी

राष्ट्रीय सेवा भारती के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख उदय कुंतल का कहना है कि उन्हें द न्यूज मिनट की रिपोर्ट की विशिष्टताओं की पूरी जानकारी नहीं है और तथ्यों को देखे बिना वे इसके निष्कर्षों की पुष्टि करने की स्थिति में नहीं हैं।

उन्होंने इस बात का खंडन किया कि आरएसएस स्वयं जिला स्तर पर कार्यरत एक पंजीकृत संस्था नहीं है, बल्कि इससे संबद्ध संगठन जिनमें राष्ट्रीय सेवा भारती भी शामिल है, अलग-अलग पंजीकृत हैं। इन संगठनों की जानकारी इनकी वेबसाइटों पर उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी संगठनों को केवल इसलिए निशाना बनाना आसान हो जाता है, क्योंकि उन्हें ऐसा कहा जाता है। जबकि वास्तविकता में वे देश के लिए काम कर रहे होते हैं।

कुंतल ने कहा कि यह कहना भ्रामक है कि सीएसआर फंड आरएसएस से जुड़े संगठनों को सिर्फ इसलिए दिए गए थे क्योंकि वे आरएसएस से जुड़े हुए थे। उनके अनुसार, उनके जैसे संगठन अस्पताल और राहत कार्य जैसे क्षेत्रों में काम करते हैं। सीएसआर डेटा उनके द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं को दर्शाता है, न कि किसी विचारधारा के आधार पर किए गए आवंटन को। उन्होंने कहा कि इसे जानबूझकर आरएसएस को पैसा भेजने के रूप में पेश करना गलत और भ्रामक है।

उन्होंने यह भी बताया कि उनका संगठन भारत भर में पहली बार सामाजिक कार्यों के लिए सीएसआर फंडिंग का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के तरीके पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाता है। उन्होंने कहा कि कई बड़ी संस्थाओं ने पहले अपनी सीएसआर की फंडिंग नहीं भी की है और उनके आवेदन को अस्वीकार कर दिया।

दोनों बातें सच हैं। ONGC ने एक दशक के CSR खर्च का 14.7% यानी 668 करोड़ रुपये उन संगठनों को दिए, जिनके RSS से जुड़े होने के दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं। यह कोई गलती या तकनीकी खामी नहीं है। यह एक बड़ी रकम है, और अकेले दो संगठनों- BAVP और DATSAS ने ही इसका अधिकांश हिस्सा खर्च किया। न्यूज मिनट के आँकड़े जाँच में खरे उतरते हैं, और किसी भी तरह से संदर्भ बदलकर इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

लेकिन, इसका दूसरा पहलू भी देखने की जरूरत है। दो अस्पताल निर्माण परियोजनाओं के लिए दिए गए ₹574 करोड़ की राशि का अलग महत्व है। भले ही बाकी 18 संगठनों को 92 करोड़ रुपए ही दिए गए। दोनों डोनेशन को एक साथ मिलाना पाठकों को वास्तविक स्थिति से गुमराह करता है। अस्पताल का इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े परियोजनाओं की लागत सैकड़ों करोड़ रुपए होती है। यह तथ्य है। वहीं कुल सीएसआर खर्च का 85 फीसदी हिस्सा यानी ₹3863 करोड़ की विशाल धनराशि स्वच्छता, स्कूलों, आपदा राहत और दिव्यांग कल्याण से जुड़े 1980 से अधिक ऐसे संगठनों को डोनेट किया गया, जिनका आरएसएस से कोई संबंध नहीं है।

दोनों में से कोई भी तथ्य दूसरे का खंडन नहीं करता। जो पाठक TNM की हेडलाइन और अपने पूर्वाग्रह के कारण केवल ‘ONGC ने RSS को पैसा दिया’ जैसे निष्कर्ष निकालते हैं, वे इसकी बारीकियों को नजरअंदाज करते हैं या समझने की कोशिश ही नहीं करते।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

चंदन गुप्ता याद हैं? जिन्हें ‘भारत माता की जय’ बोलने पर मुस्लिमों की भीड़ ने उतारा मौत के घाट: समझें वंदे मातरम बिल की जरूरत, क्यों इस्लामी कट्टरपंथियों को राष्ट्रीय प्रतीकों से है नफरत

केंद्र की मोदी सरकार राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 (Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026) लाने जा रही है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को कानूनी सुरक्षा देना है। प्रस्तावित संशोधन के तहत राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 की धारा 3 में बदलाव किया जाएगा। अभी इस धारा के तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रीय गान को गाने से रोकता है या उस दौरान सभा में बाधा डालता है, तो उसे सजा दी जा सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अब इस धारा में ‘राष्ट्रीय गान’ के साथ ‘राष्ट्रीय गीत’ शब्द भी जोड़ा जाएगा।

इसका मतलब है कि संसद से यह संशोधन पारित होने के बाद अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् को गाने से रोकता है या इसे गाने वाली सभा में बाधा डालता है, तो उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। अगर कोई व्यक्ति इस कानून के तहत दोबारा दोषी पाया जाता है, तो उसे कम से कम एक साल की जेल की सजा अनिवार्य रूप से होगी। यह विधेयक 20 जुलाई 2026 से शुरू हुए मॉनसून सत्र के दौरान राज्यसभा में पेश किए जाने के लिए सूचीबद्ध किया गया है।

यह संशोधन ऐसे समय लाया गया है, जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने निर्देश जारी किए कि राज्य सरकारों के कार्यक्रमों और नागरिक सम्मान समारोहों में वंदे मातरम् का पूरा संस्करण गाया जाए। हालाँकि, प्रस्तावित विधेयक में दी गई सजा का प्रावधान केवल उन लोगों पर लागू होगा जो जानबूझकर वंदे मातरम् को गाने से रोकेंगे या गायन के दौरान सभा में बाधा डालेंगे। इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि केवल चुप रहने या वंदे मातरम् न गाने पर किसी व्यक्ति को जेल भेजा जाएगा।

विधेयक के उद्देश्य और कारण में 24 जनवरी 1950 को हुई संविधान सभा की बैठक का भी उल्लेख किया गया है। उस बैठक में संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि वंदे मातरम्, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई, उसे जन गण मन के समान सम्मान दिया जाएगा और उसका दर्जा भी बराबर माना जाएगा।

हालाँकि, इस घोषणा के बावजूद राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को अब तक वह कानूनी सुरक्षा नहीं मिली थी, जो राष्ट्रीय गान, राष्ट्रीय ध्वज, और संविधान को प्राप्त है। मौजूदा कानून की धारा 3 में केवल राष्ट्रीय गान गाने को जानबूझकर रोकने या उस दौरान सभा में बाधा डालने को ही अपराध माना गया है।

इस्लामी संगठनों और वामपंथियों ने वंदे मातरम् पर सरकार के फैसले का किया विरोध

संसद में संशोधन विधेयक पेश होने से पहले ही कई इस्लामी संगठनों, वामपंथी दलों और विपक्ष के कुछ नेताओं ने सरकार के उस फैसले का विरोध शुरू कर दिया, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों और स्कूलों में वंदे मातरम् के सभी 6 अंतरे गाने का निर्देश दिया गया है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने इस निर्देश को संविधान के खिलाफ, धार्मिक स्वतंत्रता के विपरीत और मुस्लिमों के लिए अस्वीकार्य बताया। बोर्ड ने कहा कि वह सरकार के इस फैसले को अदालत में चुनौती देगा।

AIMPLB के महासचिव मोहम्मद फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि वंदे मातरम् के बाद के अंतरों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, जबकि इस्लाम में अल्लाह के अलावा किसी और को भगवान को न मानने की दीन जाती है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के दोनों गुटों ने भी सरकार के इस फैसले का विरोध किया। मौलाना अरशद मदनी ने इसे पक्षपातपूर्ण बताया और कहा कि यह मुस्लिमों से मजहबी आजादी छीनने की साजिश है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार दबाव बनाकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करना चाहती है।

CPI-M ने भी इस आदेश को वापस लेने की माँग की। पार्टी का कहना था कि सरकार राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर बेवजह विवाद खड़ा कर रही है। वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राज्यसभा सांसद संतोष कुमार पी ने आरोप लगाया कि सरकार संस्कृति का इस्तेमाल ‘राजनीतिक हथियार’ के रूप में कर रही है। तृणमूल कॉन्ग्रेस ने भी कहा कि केंद्र सरकार वंदे मातरम् के इतिहास और इसके शब्दों को गलत तरीके से पेश कर रही है।

कॉन्ग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने भी मध्य प्रदेश में वंदे मातरम् के सभी अंतरे गाने के फैसले पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इसे अनिवार्य बनाने से लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

इन तर्कों के आधार पर इस बात पर बहस हो सकती है कि सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् का कौन-सा रूप या कितना हिस्सा गाया जाना चाहिए। लेकिन इन तर्कों से यह साबित नहीं होता कि किसी को दूसरे लोगों को वंदे मातरम् गाने से जबरन रोकने, सभा में बाधा डालने, राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करने या देशभक्ति से जुड़े किसी जुलूस में हिंसा करने का अधिकार मिल जाता है।

प्रस्तावित प्रावधान किसी व्यक्ति के धार्मिक आधार पर शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से अपने आपत्ति जताने को अपराध नहीं मानता। यह केवल उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान करता है, जो जानबूझकर दूसरों को वंदे मातरम् गाने से रोकते हैं या उनके इस अधिकार में बाधा डालते हैं।

याद कीजिए चंदन गुप्ता के साथ क्या हुआ था?

22 साल के चंदन गुप्ता की हत्या का मामला यह दिखाता है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति दुश्मनी को हर बार सिर्फ मतभेद, राजनीतिक बयानबाजी या व्यक्तिगत धार्मिक विश्वास का मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 26 जनवरी 2018 को गणतंत्र दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश के कासगंज में एक तिरंगा यात्रा निकाली गई थी। इस यात्रा में चंदन गुप्ता, उनके भाई विवेक और कई अन्य युवक शामिल हुए थे। सभी के हाथों में तिरंगा था, और वे ‘भारत माता की जय’ औरर ‘वंदे मातरम्’ जैसे नारे लगा रहे थे।

एफआईआर, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, जिन तक ऑपइंडिया को पहुँच मिली, सरकारी बालिका इंटर कॉलेज के पास हथियारों से लैस एक मुस्लिम भीड़ ने इस यात्रा को रोक लिया। भीड़ में शामिल लोगों ने तिरंगा छीनकर जमीन पर फेंक दिया। इसके बाद उन्होंने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ और ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। साथ ही उन्होंने यात्रा में शामिल लोगों से कहा कि आगे बढ़ना है तो पहले ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगाना होगा।

लेकिन चंदन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। इसके बाद भीड़ ने पत्थरबाजी और फायरिंग शुरू कर दी। सलीम नाम के व्यक्ति ने चंदन को गोली मारी, जो उनके फेफड़ों और दिल में लगी। गंभीर रूप से घायल चंदन को तुरंत जिला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।

यह हमला केवल दो समूहों के बीच रास्ते को लेकर हुए विवाद का मामला नहीं था, जैसा कि उस समय मीडिया के कुछ वर्गों ने दिखाने की कोशिश की थी। इस घटना में तिरंगा छीनकर उसका अपमान किया गया, तिरंगा यात्रा को जबरन रोक दिया गया और ‘वंदे मातरम्’ जैसे देशभक्ति के नारों के जवाब में ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए गए। इतना ही नहीं, तिरंगा लेकर चल रहे लोगों पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ बोलने का दबाव बनाया गया। जब चंदन गुप्ता ने इसका विरोध किया, तो उन्हें गोली मार दी गई।

02 जनवरी 2025 को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत ने चंदन गुप्ता हत्याकांड में 28 लोगों को दोषी ठहराया। इसके अगले दिन, 3 जनवरी को अदालत ने सभी 28 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भीड़ में शामिल लोग बंदूर, लोहे की रॉड और डंडों जैसे हथियारों से लैस थे और उन्होंने तिरंगा यात्रा में शामिल हिंदू लोगों पर सांप्रदायिक हिंसा की। अदालत ने यह भी कहा कि सांप्रदायिकता ऐसी सोच है, जिसमें धर्म के हितों को समाज और राष्ट्र के हितों से ऊपर रखा जाता है।

ट्रायल के दौरान चंदन गुप्ता के परिवार को भी डराने-धमकाने की कोशिशें हुईं। चंदन के पिता सुशील गुप्ता ने अदालत को बताया कि आरोपित मुनाजिर रफी के प्रभाव के चलते कासगंज में ऐसा माहौल बन गया था कि कई वरिष्ठ वकीलों ने उनके परिवार का पक्ष रखने से इनकार कर दिया। बाद में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने परिवार की आशंकाओं को सही माना और मुकदमे की सुनवाई कासगंज से बाहर ट्रांसफर करने का आदेश दिया।

मजहबी आपत्ति से लेकर कट्टरपंथी हिंसा तक

किसी गीत को अपनी व्यक्तिगत मजहबी मान्यता के चलते न गाने और उस गीत को गाने वाले लोगों पर हमला करने में बड़ा अंतर है। कोई भी नागरिक अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है, सरकार के दिशा-निर्देशों पर सवाल उठा सकता है, वंदे मातरम् के कुछ पदों को शामिल किए जाने का विरोध कर सकता है या फिर शांतिपूर्वक इसे गाने से इनकार कर सकता है। ऐसे सभी कदम संविधान और लोकतांत्रिक बहस के दायरे में आते हैं।

लेकिन कई मामलों में इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने अपनी मजहबी आपत्ति को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे दसरों पर भी थोपने की कोशिश की। बात केवल ‘मैं यह गीत नहीं गाऊँगा’ तक नहीं रहती, बल्कि ‘तुम भी यह गीत नहीं गाओगे’ तक पहुँच जाती है। कासगंज की घटना में इसका सबसे हिंसक रूप देखने को मिला, जहाँ हथियारबंद भीड़ ने तिरंगा यात्रा को रोक दिया, तिरंगे का अपमान किया, लोगों पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाने का दबाव बनाया और विरोध करने पर एक हिंदू की हत्या कर दी।

इसी वजह से चंदन गुप्ता का मामला यह समझने के लिए जरूरी माना जाता है कि ऐसे संशोधन की जरूरत क्यों महसूस की जा रही है। अगर किसी राष्ट्रीय प्रतीक को केवल कागजों पर ही संवैधानिक सम्मान मिले, जबकि संगठित समूह उसे गाने से लोगों को जबरन रोक सकें, कार्यक्रमों में बाधा डाल सकें या उसमें शामिल नागरिकों को धमका सकें, तो उस सम्मान का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

वंदे मातरम् के विरोध से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह है कि इस मामले में विरोध चुनिंदा तरीके से किया जाता है। जो संगठन और लोग धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देकर वंदे मातरम् का विरोध करते हैं, वे यह नहीं बताते कि दूसरे भारतीयों को राष्ट्रीय गीत गाने की आजादी आखिर उनकी मंजूरी पर क्यों निर्भर होनी चाहिए।

इसी तरह, वामपंथी और उदारवादी राजनीतिक दल भी यह स्पष्ट नहीं करते कि वंदे मातरम् को जानबूझकर बाधित करने या गाने से रोकने के खिलाफ कानूनी सुरक्षा देना धार्मिक विचारों को थोपना कैसे हो गया। राष्ट्रीय गान को ऐसी कानूनी सुरक्षा कई दशकों से मिली हुई है। ऐसे में संविधान सभा द्वारा समान सम्मान दिए गए राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को भी वही सुरक्षा देना न तो कोई नई बात है और न ही असामान्य। वास्तव में यह कदम भारत सरकार को कई दशक पहले ही उठा लेना चाहिए था।

धार्मिक मान्यताओं से परे: वंदे मातरम का इस्लामी विरोध किस तरह राष्ट्रीय प्रतीकों को पूरी तरह नकारने की गहरी सोच को दर्शाता है

अगर यह प्रस्तावित संशोधन कानून बन जाता है, तो भविष्य में ऐसी स्थिति नहीं आएगी कि किसी दूसरे चंदन गुप्ता की हत्या होने के बाद ही कानून उन लोगों से पैदा होने वाले खतरे को गंभीरता से समझे, जो अपनी मजहबी सोच के आधार पर दूसरों को राष्ट्रीय गीत का सम्मान करने से रोकने, उन्हें डराने-धमकाने या उन पर हमला करने का अधिकार अपने पास मानते हैं।

यह प्रस्तावित संशोधन केवल वंदे मातरम् को कानूनी सुरक्षा देने तक सीमित नहीं है। इसके साथ एक बड़ा वैचारिक सवाल भी जुड़ा है। इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों का विरोध सिर्फ वंदे मातरम् के कुछ शब्दों या मजहबी आपत्तियों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे ऐसी सोच काम करती है, जिसमें पूरी दुनिया के मुस्लिमों, यानी उम्माह, को राष्ट्र-राज्य से ऊपर माना जाता है।

इस सोच के कारण भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रवाद की अभिव्यक्तियों को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। यही वैचारिक सोच बार-बार वंदे मातरम्, तिरंगे और भारत माता की जय जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों और नारों के विरोध की मुख्य वजह बनती है, न कि केवल मजहबी आपत्ति।

पिछले कई दसकों में वंदे मातरम् को लेकर कई इस्लामी संगठनों का लगातार विरोध इसी सोच को दिखाता है। इस विरोध के पक्ष में दिए जाने वाले कई तर्क कानूनी और ऐतिहासिक रूप से मजबूत नहीं माने जाते। संविधान किसी भी नागरिक को राष्ट्रीय गीत के जरिए किसी विशेष धर्म में आस्था जताने के लिए मजबूर नहीं करता। इसी तरह, प्रस्तावित संशोधन भी किसी व्यक्ति को वंदे मातरम् न गाने पर अपराधी नहीं मानता।

इसका उद्देश्य केवल उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना है, जो जानबूझकर दूसरों को राष्ट्रीय गीत या उसका सम्मान करने से रोकते हैं। ऐसे में यह बहस अब केवल व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता की नहीं रह जाती, बल्कि इस सवाल की बन जाती है कि क्या संगठित समूह मजहबी आपत्ति का हवाला देकर दूसरे नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से देशभक्ति व्यक्त करने से रोक सकता है।

चंदन गुप्ता की हत्या इस बात की गंभीर याद दिलाती है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति वैचारिक दुश्मनी केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि कई बार हिंसा का रूप भी ले सकती है। जब देशभक्ति से जुड़े जुलूसों पर हमला होता है, तिरंगे का अपमान किया जाता है, वंदे मातरम् गाने वालों को डराया-धमकाया जाता है या लोगों पर किसी दूसरे देश के समर्थन में नारे लगाने का दबाव बनाया जाता, तब मामला केवल धार्मिक स्वतंत्रता का नहीं रह जाता। यह कानून-व्यवस्था और देश की एकता से जुड़ा मुद्दा बन जाता है। इसी संदर्भ में इस संशोधन के समर्थकों का कहना है कि वंदे मातरम् को कानूनी सुरक्षा देने का उद्देश्य किसी पर अपनी मान्यता थोपना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी नागरिक राष्ट्रीय गौरव व्यक्त करने के अपने कानूनी अधिकार का इस्तेमाल करते समय डर, बाधा या हिंसा का सामना न करे।

(मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)

जौहर यूनिवर्सिटी विवाद के बीच अल्पसंख्यक संस्थानों में आरक्षण पर बहस, AMU-JMI में भी कोटा सिस्टम लागू नहीं: समझें इस ‘दोहरी व्यवस्था’ पर क्यों है विचार की जरूरत

उत्तर प्रदेश में जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विवादों के फिर से बढ़ने के साथ ही अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी बहस छिड़ चुकी है। लोगों का कहना है कि अगर देश में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए संवैधानिक आरक्षण की व्यवस्था है, तो फिर अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शिक्षण संस्थानों में यह व्यवस्था क्यों लागू नहीं होती?

इस बहस के केंद्र में केवल रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय (जौहर यूनिवर्सिटी) ही नहीं है, बल्कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU), दिल्ली विश्वविद्यालय का खालसा कॉलेज और सेंट स्टीफंस कॉलेज जैसे कई प्रतिष्ठित संस्थान भी हैं। ये संस्थान अल्पसंख्यक छात्रों के लिए 50 प्रतिशत तक सीटें आरक्षित रखते हैं।

दरअसल, भारत में शिक्षा के क्षेत्र में अल्पसंख्यक संस्थानों का दर्जा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान है। संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार दिया गया है। सवाल यह है कि आखिर इन संस्थानों को ऐसी छूट क्यों मिली है और इसका संवैधानिक आधार क्या है।

यह विरोधाभास इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि कई मुस्लिम जातियाँ अन्य संस्थानों में ओबीसी आरक्षण का लाभ लेती हैं, लेकिन अपने संस्थानों में ऐसा नहीं होता। सिख और ईसाई संस्थान भी इसी तरह अपने समुदाय के लिए आरक्षण रखते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2018 में इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया था और समानता की वकालत की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार इस पर विचार किया है, लेकिन अभी भी कुछ मामले लंबित हैं। आइए इस पूरे मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।

अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा कैसे मिलता है?

किसी भी शैक्षणिक संस्थान को अल्पसंख्यक दर्जा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (एनसीएमईआई) या संबंधित राज्य आयोग से मिलता है। इसके लिए संस्थान को यह साबित करना होता है कि वह किसी खास धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा स्थापित किया गया था और उसका प्रशासन भी उसी समुदाय के हाथ में है।

अनुच्छेद 30(1) के तहत यह अधिकार मौलिक अधिकार माना गया है ताकि अल्पसंख्यक अपनी संस्कृति, भाषा और धर्म को संरक्षित रख सकें। हालाँकि यह अधिकार पूर्ण नहीं है। अगर संस्थान सरकारी सहायता लेता है तो कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। लेकिन आरक्षण के मामले में अदालतों ने स्पष्ट किया है कि अल्पसंख्यक संस्थान अनुच्छेद 30 के तहत अपनी प्रवेश नीति खुद तय कर सकते हैं।

विवाद की सबसे बड़ी वजह संविधान का अनुच्छेद 15(5) है। वर्ष 2005 के 93वें संविधान संशोधन यानी केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम 2006 के तहत केंद्रीय विश्वविद्यालयों में एससी के लिए 15 प्रतिशत, एसटी के लिए 7.5 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य है। लेकिन इसी प्रावधान में स्पष्ट रूप से कहा गया कि अनुच्छेद 30(1) के तहत संरक्षित अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर यह व्यवस्था लागू नहीं होगी।

यही वजह है कि जामिया, एएमयू जैसे संस्थान सामान्य आरक्षण लागू नहीं करते। ऐसे में इन संस्थानों में सामान्य SC, ST और OBC आरक्षण के दायरे में आने वाले छात्रों की हकमारी होती है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 50 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण

जामिया मिल्लिया इस्लामिया दिल्ली की एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। 2011 में एनसीएमईआई ने इसे अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किया। इसके बाद जामिया ने अपनी प्रवेश नीति बदल दी।

विश्वविद्यालय के नियमों के मुताबिक हर कोर्स में कुल सीटों का 30 प्रतिशत मुस्लिम छात्रों के लिए, 10 प्रतिशत मुस्लिम महिलाओं के लिए और 10 प्रतिशत मुस्लिम ओबीसी व एसटी छात्रों के लिए आरक्षित रखा जाता है। यानी कुल मिलाकर मुस्लिम समुदाय के लिए करीब 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित हो जाती हैं। बाकी सीटें सामान्य मेरिट पर भरी जाती हैं।

जामिया पहले सामान्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों की तरह एससी-एसटी-ओबीसी आरक्षण लागू करता था। लेकिन अल्पसंख्यक दर्जा मिलने के बाद यह व्यवस्था बदल गई। संसद में दिए गए जवाब में भी सरकार ने स्पष्ट किया है कि जामिया खुद को अल्पसंख्यक संस्थान मानते हुए एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण नहीं लागू करता।

हालाँकि मार्च 2025 में जामिया ने PhD कोर्स के लिए अपनी नीति में बदलाव किया और अनिवार्य 50% आरक्षण की जगह इसे ऐच्छिक घोषित कर दिया। इसका लेफ्ट विंग के स्टूडेंट्स पार्टियों (खासकर AISA) ने तीखा विरोध किया।

AMU का अल्पसंख्यक दर्जा सुप्रीम कोर्ट में लंबित

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का मामला और भी पेचीदा है। 1920 में यह संस्थान स्थापित हुआ था। 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने अजीज बाशा मामले में फैसला दिया था कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है क्योंकि इसे संसद के कानून से बनाया गया था।

लेकिन 8 नवंबर 2024 को सात जजों की संविधान पीठ ने 4:3 के बहुमत से 1967 के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी संस्थान को कानून से मान्यता मिलने भर से उसका अल्पसंख्यक चरित्र समाप्त नहीं होता। कोर्ट ने कुछ मापदंड तय किए कि अल्पसंख्यक संस्थान माने जाने के लिए क्या शर्तें पूरी होनी चाहिए। अब इस मामले को नियमित पीठ के पास भेज दिया गया है ताकि वह तय करे कि एएमयू इन मापदंडों पर खरा उतरता है या नहीं।

फिलहाल एएमयू में भी एससी-एसटी-ओबीसी का पूरा आरक्षण लागू नहीं होता। संस्थान खुद को अल्पसंख्यक मानते हुए मुस्लिम छात्रों को प्राथमिकता देता है। ये AMU से जुड़े स्कूल-कॉलेजों की आड़ में 50% आरक्षण (सामान्य) लागू करता है, जिसमें उसका कहना है कि एएमयू से जुड़े संस्थानों ने पढ़ने वाले सभी बच्चों (सिर्फ मुस्लिम नहीं) को 50% आरक्षण (अनौपचारिक) दिया जाता है, लेकिन पड़ताल में अक्सर से सामने आता है कि इन 50% छात्रों में बहुत कम संख्या जनरल क्लास की होती है। अधिकतर छात्र मुस्लिम ही होते हैं।

एएमयू में 50% आरक्षण को हटा दें तो बाकी सीटें अनारक्षित हैं, यानी ये मेरिट पर भरी जाती हैं। ऐसे में आरक्षण कानूनों का पालन (एससी-एसटी/ओबीसी के लिए) नहीं किया जाता। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ साल 2018 से यह मुद्दा उठा रहे हैं कि अगर इन संस्थानों का अल्पसंख्यक दर्जा अभी लागू नहीं है, तो क्यों यहाँ पर आरक्षण लागू नहीं किया जाता। चूँकि एएमयू सरकारी फंडिंग पर चलता है, इसलिए इसे सबके लिए खुला होना चाहिए।

जौहर यूनिवर्सिटी रामपुर का मामला भी ध्यान देने योग्य

उत्तर प्रदेश के रामपुर में मौजूद मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी भी अल्पसंख्यक संस्थान है। इसे 2013 में एनसीएमईआई ने अल्पसंख्यक दर्जा दिया था। यह यूनिवर्सिटी समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान से जुड़ी हुई है। इसे फाउंडिंग मेंबर्स में आजम खान का पूरा परिवार यानी उनकी बीवी तजीन फातमा, बेटे अदीब आजम खान और दूसरे बेटे अब्दुल्ला आजम खान भी हैं।

यूजीसी को सौंपे रजिस्ट्रेशन के प्रपत्र में ट्रस्ट में शामिल व्यक्तियों की लिस्ट

साल 2006 में स्थापित होने और 2013 में अल्पसंख्यक दर्जा मिलने के कारण यह भी सामान्य आरक्षण नीति से मुक्त है। यहाँ मुख्य रूप से मुस्लिम छात्रों को प्राथमिकता दी जाती है। इस यूनिवर्सिटी की 38 इमारतों को तोड़ने के नोटिस आए हैं, जिसे विपक्ष राजनीतिक बदला बता रहा है, लेकिन मूल मुद्दा इसकी बिल्डिंगों के अवैध निर्माण, जमीनों पर कब्जे का है।

सिख और ईसाई संस्थानों का भी यही मॉडल

दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कॉलेज जैसे सिख अल्पसंख्यक कॉलेजों में कुल सीटों का 50 प्रतिशत सिख छात्रों के लिए आरक्षित रखा जाता है। बाकी सामान्य मेरिट पर। इसी तरह सेंट स्टीफेंस कॉलेज ईसाई अल्पसंख्यक संस्थान है। वहाँ भी ईसाई छात्रों के लिए खास आरक्षण या प्राथमिकता की व्यवस्था है।

दिल्ली में हमदर्द विश्वविद्यालय और जीसस एंड मैरी कॉलेज को भी अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्राप्त है। यहाँ भी आरक्षण लागू नहीं होता है। ये सभी संस्थान अनुच्छेद 30 का हवाला देते हुए कहते हैं कि उन्हें अपने समुदाय के छात्रों को प्राथमिकता देने का अधिकार है। यही वजह है कि यह विवाद सिर्फ मुस्लिम संस्थानों तक सीमित नहीं बल्कि सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान

वैसे आपको बता दें कि सिर्फ जामिया, AMU, गौहर यूनिवर्सिटी ही नहीं बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में कई अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान हैं, जिसमें सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए 50% आरक्षण लागू हैं। ऐसी ही एक यूनिवर्सिटी यूपी की राजधानी लखनऊ में भी है। लखनऊ के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय (KMCLU) को अल्पसंख्यक का दर्जा मिला है। पहले इसका नाम ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय (KMCUAFU) था, जिसे बाद में बदला गया। यह एक राज्य विश्वविद्यालय (स्टेट यूनिवर्सिटी) है।

इसी तरह से बिहार की राजधानी पटना में मौलाना मज़हरुल हक अरबी और फ़ारसी विश्वविद्यालय है तो राजस्थान के जोधपुर में मौलाना आजाद विश्वविद्यालय। हैदराबाद में उस्मानिया यूनिवर्सिटी है, जिसमें पढ़ाई ही उर्दू माध्यम से होती है, जिसमें अंग्रेजी दूसरी भाषा के तौर पर मान्य है। वहीं, हैदराबाद में ही मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी है, जिसकी स्थापना 1998 में हुई।

इसके अलावा देखें तो देश के सबसे पुराने आधुनिक शिक्षण संस्थानों में शामिल कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज भी अल्पसंख्यक संस्थान है, जिसकी स्थापना 1780 में अंग्रेजी हुकूमत के मुखिया वॉरेन हेस्टिंग्स ने की थी। इसे इस्लामिक कॉलेज ऑफ कलकत्ता, कलकत्ता मदरसा, कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज और मदरसा ए आलियाह के नाम से भी जाना जाता रहा है। हालाँकि वॉरेन हेस्टिंग्स इसे कलकत्ता मोहम्मडन कॉलेज ही कहते रहे। साल 2008 से इसे आलियाह विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है, जिसकी नई बिल्डिंग का शिलान्यास और उद्घाटन तत्कालीन CM ममता बनर्जी ने 2011 से 2014 तक किया था।

योगी आदित्यनाथ करते रहे हैं समानता की बात

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साल 2018 में कन्नौज में एक रैली में साफ कहा था कि अगर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में दलित और पिछड़े वर्गों को आरक्षण मिल सकता है, तो एएमयू और जामिया में क्यों नहीं? उन्होंने कहा था कि एएमयू सिर्फ मुसलमानों की नहीं, बल्कि पूरे देश की है।

योगी का तर्क था कि ये संस्थान सरकारी पैसे से चलते हैं, इसलिए इनमें एससी, एसटी और ओबीसी को भी आरक्षण मिलना चाहिए। उन्होंने इसे बड़ी गलती बताया था। 2024 में भी उन्होंने एएमयू के अल्पसंख्यक दर्जे पर सवाल उठाए और आरक्षण की माँग दोहराई।

कानूनी विरोधाभास कहाँ है?

इस पूरे विवाद में सबसे अधिक जिस तर्क का इस्तेमाल किया जा सकता है, वो ये है कि देश में कई मुस्लिम समुदाय केंद्र और राज्यों की OBC सूची में शामिल हैं। ऐसे समुदायों के लोग सरकारी नौकरियों और सामान्य विश्वविद्यालयों में OBC आरक्षण का लाभ लेते हैं। लेकिन जब बात अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की आती है, तो वहाँ वही संस्थान सामान्य OBC, SC और ST आरक्षण लागू नहीं करते।

हालाँकि अल्पसंख्यक संस्थानों का पक्ष है कि संविधान ने जानबूझकर उन्हें यह विशेष संरक्षण दिया है ताकि वे अपने समुदाय की शैक्षणिक और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रख सकें। उनके अनुसार यह विशेषाधिकार सामाजिक आरक्षण का विरोध नहीं बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त एक अलग अधिकार है।

वैसे, कानूनी तौर पर अल्पसंख्यक संस्थान बाध्य नहीं हैं कि वे एससी-एसटी-ओबीसी आरक्षण लागू करें। सुप्रीम कोर्ट ने TMA पाई फाउंडेशन मामले समेत कई फैसलों में कहा है कि अल्पसंख्यक संस्थान अपनी पसंद के छात्र भर्ती कर सकते हैं।

और ये वही ‘दोहरी व्यवस्था’ है, जिसका विरोध किया जाना चाहिए। दरअसल, अगर सामाजिक न्याय की व्यवस्था पूरे देश में लागू है, तो अल्पसंख्यक संस्थानों को इससे बाहर रखना समानता की भावना के सरासर विपरीत ही है।

क्या आगे निकल सकती है आरक्षण लागू करने की राह?

केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में SC, ST, OBC और EWS आरक्षण लागू किया जाता है, लेकिन अनुच्छेद 30 के तहत संरक्षित अल्पसंख्यक संस्थान इससे अलग हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि AMU और जामिया से जुड़े कई मुद्दे अभी न्यायालयों में विचाराधीन हैं।

जौहर यूनिवर्सिटी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, खालसा कॉलेज और सेंट स्टीफंस कॉलेज को लेकर चल रही बहस केवल आरक्षण की नहीं बल्कि संविधान की दो महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं के बीच संतुलन की बहस है। एक ओर सामाजिक न्याय के लिए SC, ST और OBC आरक्षण की व्यवस्था है, वहीं दूसरी ओर धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान संचालित करने का संवैधानिक अधिकार है।

यही कारण है कि अल्पसंख्यक संस्थानों में आरक्षण का मुद्दा केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे संविधान, न्यायपालिका और शिक्षा नीति से जुड़ा हुआ विषय है। आने वाले समय में विशेषकर AMU से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय का असर इस पूरे विमर्श पर पड़ सकता है। तब तक वर्तमान कानूनी व्यवस्था के अनुसार, वैध रूप से अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त शिक्षण संस्थानों को सामान्य SC, ST और OBC आरक्षण लागू करने के लिए बाध्य नहीं माना जाता।

वैसे, सामाजिक तौर पर देखा जाए तो अल्पसंख्यक संस्थानों में भी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों या पिछड़े वर्गों के लिए कुछ प्रतिशत आरक्षण रखा जाए, लेकिन धार्मिक आधार पर पूर्ण छूट न दी जाए। हालाँकि अल्पसंख्यक संगठन कहते हैं कि अनुच्छेद 30 का हनन नहीं होना चाहिए।

राष्ट्रगान के बराबर ही ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का जो दर्जा देना चाहते थे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, मोदी सरकार दे रही वही ‘सम्मान’: जानिए नेहरु-गाँधी और कॉन्ग्रेस को इस बात से क्या थी दिक्कत

संसद में मोदी सरकार राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026 ला रही है। इसे वंदे मातरम बिल भी कहा जा रहा है। इसका मकसद राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ यानी राष्ट्रगान के समान कानूनी और वैधानिक सुरक्षा देना है।

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा में अध्यक्ष डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने भी ये बात कही थी। लेकिन उनके सपने को कॉन्ग्रेस ने ही पूरा होने नहीं दिया और शुरुआती अंतरे को गाने की परंपरा चला दी। अब मोदी सरकार इसके पूरे अंतरे को गाने का नियम बनाया है और इसके सम्मान के लिए संसद में बिल लेकर आ रही है।

दरअसल प्रावधान में ये है कि यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम के गाने में रुकावट डालता हो या उसका अपमान करता हो, तो इसे दंडनीय अपराध माना जाएगा और इसके लिए 3 साल जेल का प्रावधान है। इतना ही नहीं, ऐसे व्यक्ति को जुर्माना या दोनों लग सकता है।

सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि अगर कोई ‘वंदे मातरम’ नहीं गाएगा तो उसे 3 साल की जेल होगी, लेकिन विधेयक में ऐसा कुछ नहीं है। सरकार जिस संशोधन को ला रही है, उसका उद्देश्य सिर्फ ‘वंदे मातरम’ के अपमान या उसके गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय बनाना है। केवल गीत न गाने को अपराध नहीं बताया गया है।

बिल में क्या संशोधन किए जा रहे हैं?

केंद्र सरकार Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 में संशोधन कर रही है। अभी इस कानून की धारा 3 केवल राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ के गायन में जानबूझकर बाधा डालने या उसका अपमान करने को दंडनीय अपराध माना जाता है।

संशोधन के बाद इसी धारा में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को भी शामिल किया जाएगा। इसके बाद यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर ‘वंदे मातरम’ के गायन को रोके, गायन के दौरान व्यवधान पैदा करे या कानून में बताए गए तरीके से उसका अपमान करे, तो उसे 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। यह वही दंड है जो अभी राष्ट्रीय गान के लिए लागू है।

सरकार का कहना है कि ‘वंदे मातरम’ भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक रहा है, लेकिन उसे अब तक वह वैधानिक संरक्षण नहीं मिला, जो ‘जन गण मन’ को मिला है। लेकिन कॉन्ग्रेस इसका विरोध कर रही है। दरअसल इसके पीछे कॉन्ग्रेस का वो काला इतिहास है, जिसने इसकी धर्मनिरपेक्षता’ को हिन्दू विरोध की तरफ लेकर गया।

1937 में कॉन्ग्रेस वर्किंग समिति के सामने मुस्लिम लीग सहित कुछ संगठनों ने ‘वंदे मातरम’ के बाद के अंतरों में देवी-देवताओं के उल्लेख और धार्मिक प्रतीकों पर आपत्ति जताई।

इसके बाद कॉन्ग्रेस ने फैसला लिया कि सार्वजनिक एवं सरकारी आयोजनों में केवल पहले दो अंतरे गाए जाएँ, जिसमें हिन्दू संस्कृति का जिक्र उस तरह से नहीं है। इसे मुस्लिम लीग ने भी स्वीकार किया और यही परंपरा आगे बढ़ी।

लेकिन अब जब केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गान के समान वैधानिक संरक्षण देने वाला संशोधन ला रही है, तब कॉन्ग्रेस विरोध कर रही है और इसे संविधान की मूल भावना के विपरीत बता रही है। कॉन्ग्रेस का कहना है कि संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत के बीच जानबूझकर अलग संवैधानिक स्थिति रखी थी।

दरअसल कॉन्ग्रेस पहले भी मुस्लिम लीग के दबाव में थी और अब भी मुस्लिम वोट बैंक ही उसके विरोध के केन्द्र में है। मुस्लिम लीग तो 1908 से ही वंदे मातरम का विरोध करना शुरू कर दिया था। अमृतसर अधिवेशन में सैयद अली इमाम ने कहा कि यह गीत इस्लाम विरोधी है, क्योंकि इसमें मातृभूमि की तुलना देवी-देवताओं से की गई है। बाद में खिलाफत आंदोलन के दौरान यह भावना और गहरी होती गई।

इस विरोध के बीच, 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति बनाई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। आजाद ने गीत का अध्ययन किया और निष्कर्ष दिया कि इसके शुरुआती दो पद केवल मातृभूमि की वंदना करते हैं और इनमें किसी मजहबी भावना का विरोध नहीं है। नतीजतन, कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया कि राष्ट्रगीत के रूप में केवल दो ही अंतरे को स्वीकार किए जाएँ।

नेहरू की अध्यक्षता में कॉन्ग्रेस ने दो अंतरे वाले ‘वंदे मातरम’ अपनाने का फैसला किया। कॉन्ग्रेस ने जानबूझकर माँ दुर्गा की स्तुति करने वाले छंद हटा दिए। कॉन्ग्रेस ने अपने एजेंडे के अनुरूप फैजपुर अधिवेशन में वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को अपनाया।

(कॉन्ग्रेस कार्यसमिति का फैसला)

जवाहर लाल नेहरू ने अली सरदार जाफरी को पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने कहा, “मैं समझता हूँ कि पूरा गाना किसी को ठेस पहुँचाने वाला नहीं है। लेकिन मैं ये भी सोचता हूँ कि ये गाना राष्ट्रगान के ‘लायक’ नहीं है। इसके कुछ शब्द लोगों को समझ में नहीं आएँगे, क्योंकि इसमें व्यक्त भावनाएँ आज के राष्ट्रवाद के अनुकूल नहीं है। हमें आसान शब्दों वाले दूसरे राष्ट्रगान की तलाश करनी चाहिए।”

( अली सरदार जाफरी को लिखा पत्र)

यही नहीं, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे नेहरू की 1937 की चिट्ठी में भी इस मुद्दे को लेकर सफाई दी गई। चिट्ठी में नेहरू ने कथित तौर पर कहा था कि वंदे मातरम के बैकग्राउंड से मुस्लिमों को नाराजगी हो सकती है। एक सितंबर 1937 को लिखी इस चिट्ठी में नेहरू ने कटुता से लिखा था कि ‘वंदे मातरम’ के शब्दों को किसी देवी से जोड़कर देखना बेतुका है। उन्होंने तंज कसते हुए यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रीय गान के रूप में उपयुक्त नहीं है। 20 अक्टूबर 1937 को भी नेहरू ने नेताजी को पत्र लिखकर दावा किया कि ‘वंदे मातरम’ की पृष्ठभूमि मुस्लिमों को नाराज कर सकती है।

(नहरु के पत्र में वंदे मातरम को लेकर उनके विचार)

मोहम्मद अली जिन्ना ने 1938 में The New Times of Lahore में वंदे मातरम् का विरोध करते हुए लिखा कि मुस्लिम किसी भी रूप में इस गीत को स्वीकार नहीं कर सकते। धीरे-धीरे इस ‘धार्मिक विरोध’ पर राजनीतिक का रंग चढ़ गया और देश का विभाजन हुआ।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में दिया था समान दर्जा

लेकिन कॉन्ग्रेस का एक धरा शुरू से वंदे मातरम को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा देने का हिमायती रहा। इसको लेकर संविधान सभा में बार-बार बहस हुई। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठकों में तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रीय गान पर अपना ऐतिहासिक वक्तव्य दिया। उन्होंने ‘वंदे मातरम’ को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा और राष्ट्रीय गीत का स्थान दिया।

उन्होंने कहा था “वंदे मातरम, जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, उसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिया जाएगा और उसका समान दर्जा होगा।” उनका यही वक्तव्य आज मोदी सरकार के प्रस्तावित संशोधन के प्रमुख आधारों में से एक है।

संविधान सभा में कई बार उठी माँग

1947 से 1950 के बीच वंदे मातरम को लेकर कई बार बहस हुई क्योंकि आजादी के बाद स्वतंत्रता संग्राम का गीत बन चुके वंदे मातरम को सम्मान दिलाने की बात थी। 31 जुलाई 1947 में ने सदन से आग्रह किया था कि वंदे मातरम को आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल किया जाए। आजादी की पूर्व संध्या पर 14 अगस्त 1947 में सुचेता कृपलानी ने आधिकारिक समारोह में वंदे मातरम का पहला अंतरा गाया था, जिसपर कुछ लोग बाहर चले गए। इस पर कामथ ने कहा था कि भले ही वंदे मातरम को राष्ट्रगान के रूप में शामिल नहीं किया गया, लेकिन यह हजारों देशवासियों के बलिदानी का प्रतीक है और पावन है।

संविधान शभा में जब 1948-49 में बहस के दौरान भी इस गीत के प्रति लोगों की आस्था का पता चला। सेठ गोविंद दास ने इसे देश की आजादी से जोड़ते हुए सच्चा राष्ट्रगान बताया। उन्होने जन गण मन को अंग्रेजी शासक जॉर्ज पंचम के सम्मान में गाए हुए गीत का तर्क देते हुए कहा कि वंदे मातरम ही राष्ट्रगीत होना चाहिए।

अक्टूबर 1949 में रोहिणी कुमार चौधरी ने सदन को याद दिलाया कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन वंदे मातरम से शुरू होता है। उन्होंने संपूर्ण गीत नहीं गाए जाने पर कहा कि ये देवी की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। सभी संप्रदाय के लोगों को समान मान्यता मिलनी चाहिए। उन्होंने भी जनगणमन के बजाए वंदे मातरम को तरजीह देने के लिए कहा।

इसी दौर में देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने अपने अंतिम प्रस्ताव में वंदे मातरम को देशभक्ति और सांस्कृतिक विविधता से जोड़ते हुए कहा कि इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका निभाई है इसलिए वंदे मातरम को जन गण मन के समान सम्मान दिया जाएगा और उसे समान दर्जा प्राप्त होगा। ये ऐतिहासिक घटनाएँ बताती हैं कि वंदे मातरम सिर्फ एक गान नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता संग्राम में प्रेरणा देनेवाला नारा है और इसमें समाज को जोड़ने की ताकत है।

आज फिर उस ताकत को पहचाने की कोशिश की जा रही है। हालाँकि बहाने बना कर समाजवाद के नाम पर इसे इस्लाम विरोधी करार दिया जा रहा है। ‘समाजवाद’ शब्द जिसे संविधान में संशोधन के बाद जोड़ा गया था, वह आजादी के इस प्रतीक का दुश्मन बना बैठा है।