भारत की अर्थव्यवस्था, उद्योग और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर पिछले एक दशक में जिन बदलावों की सबसे ज्यादा चर्चा हुई है, उनमें रिन्यूएबल एनर्जी अब एक केंद्रीय विषय बन चुकी है। दुनिया भर में तेल और गैस पर आधारित अर्थव्यवस्थाएँ अब धीरे-धीरे स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) की ओर बढ़ रही हैं। जलवायु परिवर्तन, कार्बन उत्सर्जन, भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आयात पर बढ़ती निर्भरता ने लगभग हर बड़े देश को इस बात पर सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था आखिर किस ऊर्जा पर टिकेगी। भारत भी इसी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। इस राष्ट्रीय परिवर्तन के भीतर अगर किसी एक राज्य ने खुद को सबसे आक्रामक और सबसे रणनीतिक तरीके से स्थापित किया है, तो वह गुजरात है।
आज गुजरात देश में रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता के मामले में पहले स्थान पर पहुँच चुका है। राज्य की कुल रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता करीब 47,178 मेगावाट तक पहुँच गई है। इसमें लगभग 29,303 मेगावाट सोलर एनर्जी, 15,642 मेगावाट विंड एनर्जी, 2103 मेगावाट हाइड्रो एनर्जी और 130 मेगावाट बायो एनर्जी शामिल है। इतना ही नहीं, रूफटॉप सोलर क्षमता में भी गुजरात देश में नंबर एक बन चुका है और राज्य में 6,881 मेगावाट से अधिक रूफटॉप सोलर क्षमता स्थापित की जा चुकी है।
ये केवल आँकड़े नहीं हैं। इनके पीछे एक लंबी नीति, भूगोल, मजबूत औद्योगिक ढाँचा, बंदरगाहों का नेटवर्क, बड़े निवेश, आधुनिक ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर और भविष्य की अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर की गई व्यापक तैयारी छिपी हुई है।
गुजरात का यह मॉडल केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। राज्य वास्तव में एक ऐसे ग्रीन एनर्जी इकोसिस्टम की ओर बढ़ रहा है, जिसमें बिजली उत्पादन से लेकर उद्योग, निर्यात, ग्रीन हाइड्रोजन, बैटरी, सेमीकंडक्टर और भविष्य के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तक सब कुछ एक-दूसरे से जुड़ा हुआ हो। यही वजह है कि ‘खावड़ा से धोलेरा तक’ की लाइन अब सिर्फ एक भौगोलिक संदर्भ नहीं रह गई है बल्कि यह भारत के उभरते हुए ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर की वास्तविक तस्वीर बन चुकी है।
जब गुजरात ने ऊर्जा को भविष्य की अर्थव्यवस्था की तरह देखना शुरू किया
भारत में लंबे समय तक ऊर्जा नीति का मतलब मुख्य रूप से कोयला, थर्मल प्लांट और पारंपरिक बिजली उत्पादन ही रहा। रिन्यूएबल एनर्जी को कई वर्षों तक केवल एक पूरक स्रोत के रूप में देखा जाता था। लेकिन गुजरात उन शुरुआती राज्यों में शामिल रहा, जिसने सोलर और विंड एनर्जी को सिर्फ पर्यावरणीय मुद्दा नहीं बल्कि एक बड़े आर्थिक अवसर के रूप में देखना शुरू किया। यही सोच आगे चलकर राज्य को देश के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी हब में बदलने की वजह बनी।
गुजरात के पास कई ऐसे प्राकृतिक और औद्योगिक फायदे पहले से मौजूद थे जिन्हें बाद में ग्रीन एनर्जी मॉडल में बदला गया। राज्य के पास लंबी समुद्री तटरेखा है, कच्छ और सौराष्ट्र जैसे विशाल खुले क्षेत्र हैं, तेज हवाएँ हैं, उच्च सोलर रेडिएशन वाला भूभाग है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ पहले से मजबूत औद्योगिक आधार मौजूद था। जहाँ देश के कई हिस्सों में रिन्यूएबल एनर्जी केवल बिजली उत्पादन तक सीमित रही तो वहीं गुजरात ने इसे उद्योगों, निर्यात और भविष्य की मैन्युफैक्चरिंग से जोड़कर देखना शुरू किया।
यही कारण है कि आज गुजरात में रिन्यूएबल एनर्जी सिर्फ खेतों के बीच लगे कुछ सोलर पैनलों तक सीमित नहीं है। यहाँ विशाल सोलर पार्क, विंड कॉरिडोर, हाइब्रिड एनर्जी प्रोजेक्ट्स, ग्रीन हाइड्रोजन योजनाएँ, आधुनिक ट्रांसमिशन नेटवर्क और इंडस्ट्रियल स्मार्ट सिटीज एक-दूसरे से जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। यही व्यापक तस्वीर गुजरात को बाकी राज्यों से अलग पहचान देती है।
खावड़ा: जहाँ रेगिस्तान के बीच तैयार हो रहा है भारत का सबसे बड़ा ग्रीन पावर हब
अगर गुजरात के ग्रीन एनर्जी मॉडल का सबसे बड़ा प्रतीक खोजा जाए तो वह कच्छ का खावड़ा क्षेत्र है। पाकिस्तान सीमा के पास स्थित यह इलाका कभी मुख्य रूप से बंजर जमीन, रेगिस्तानी क्षेत्र और सीमावर्ती भूभाग के रूप में जाना जाता था। लेकिन आज यही क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स में से एक के रूप में उभर रहा है।
खावड़ा में विकसित किया जा रहा हाइब्रिड रिन्यूएबल एनर्जी पार्क केवल एक सामान्य सोलर प्रोजेक्ट नहीं है। यह सोलर और विंड एनर्जी दोनों को जोड़कर तैयार किया जा रहा विशाल ऊर्जा केंद्र है। इस क्षेत्र की सबसे बड़ी ताकत इसका भूगोल है। यहाँ विशाल खाली जमीन उपलब्ध है, साल के अधिकांश समय तेज धूप रहती है और मजबूत हवा का प्रवाह भी मौजूद हैं।
यह परियोजना अभी पूरी तरह शुरू नहीं हुई है लेकिन इसके बड़े हिस्से ऑपरेशनल हो चुके हैं और हजारों मेगावाट क्षमता पहले ही बिजली उत्पादन शुरू कर चुकी है। आने वाले वर्षों में इसकी क्षमता को और बढ़ाया जाना है। कई रिपोर्ट्स में इसे दुनिया के सबसे बड़े रिन्यूएबल एनर्जी पार्क्स में शामिल बताया जा रहा है।
खावड़ा का महत्व केवल उसके आकार में नहीं है। इसका असली महत्व इस बात में है कि यह भारत की भविष्य की ऊर्जा रणनीति का परीक्षण क्षेत्र बनता जा रहा है। यहाँ सिर्फ बिजली उत्पादन नहीं हो रहा बल्कि बड़े पैमाने पर ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार किया जा रहा है ताकि यह ऊर्जा देश के दूसरे हिस्सों और औद्योगिक क्लस्टर्स तक पहुँच सके। यहीं से ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर की वास्तविक तस्वीर सामने आती है। क्योंकि गुजरात केवल उत्पादन नहीं कर रहा बल्कि उत्पादन से लेकर उपभोग तक की पूरी सीरीज तैयार कर रहा है।
खावड़ा से धोलेरा तक: बिजली उत्पादन से भविष्य की औद्योगिक व्यवस्था तक
गुजरात की रणनीति को समझने के लिए खावड़ा और धोलेरा को एक साथ देखना जरूरी है। अगर खावड़ा ऊर्जा उत्पादन का केंद्र बन रहा है, तो धोलेरा उस ऊर्जा पर आधारित भविष्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था का प्रतीक बनता दिखाई देता है। धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन, जिसे भारत का सबसे महत्वाकांक्षी स्मार्ट इंडस्ट्रियल सिटी प्रोजेक्ट माना जाता है, केवल रियल एस्टेट या शहरीकरण की परियोजना नहीं है। इसे भविष्य की औद्योगिक व्यवस्था को ध्यान में रखकर विकसित किया जा रहा है। यहाँ सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक व्हीकल इकोसिस्टम, बैटरी स्टोरेज, ग्रीन हाइड्रोजन और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया जा रहा है।
यहीं पर गुजरात का मॉडल सामान्य रिन्यूएबल एनर्जी मॉडल से अलग नजर आता है। राज्य केवल बिजली उत्पादन नहीं करना चाहता बल्कि वह बिजली के इर्द-गिर्द भविष्य की औद्योगिक अर्थव्यवस्था भी खड़ी करना चाहता है। इसका मतलब यह है कि कच्छ के खावड़ा जैसे क्षेत्रों में पैदा होने वाली रिन्यूएबल एनर्जी आगे चलकर धोलेरा जैसे इंडस्ट्रियल हब्स को ऊर्जा उपलब्ध करा सकेगी। यानी एक तरफ विशाल सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स होंगे, तो दूसरी तरफ उन्हीं के आधार पर सेमीकंडक्टर यूनिट्स, ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट्स, बैटरी इकोसिस्टम और निर्यात-उन्मुख मैन्युफैक्चरिंग विकसित की जाएगी। यह केवल ऊर्जा परिवर्तन नहीं बल्कि एक बड़े औद्योगिक परिवर्तन की भी शुरुआत है।
सरकार की भूमिका
गुजरात का रिन्यूएबल एनर्जी मॉडल केवल प्राकृतिक संसाधनों की वजह से सफल नहीं हुआ है। इसके पीछे लंबे समय से चल रही नीतिगत तैयारी भी शामिल है। राज्य सरकार ने कई स्तरों पर काम किया, जिसने रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया। सबसे पहले बड़े पैमाने पर जमीन उपलब्ध कराई गई। रिन्यूएबल एनर्जी परियोजनाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती भूमि अधिग्रहण की होती है लेकिन कच्छ जैसे क्षेत्रों में विशाल भूमि उपलब्ध होने के कारण बड़े सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स संभव हो सके। इसके साथ ही ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर में भी निवेश किया गया ताकि उत्पादित बिजली को आसानी से ग्रिड से जोड़ा जा सके।
गुजरात ने हाइब्रिड रिन्यूएबल प्रोजेक्ट्स पर भी विशेष जोर दिया। इसका मतलब यह है कि सोलर और विंड दोनों को एक साथ विकसित किया जाए ताकि ऊर्जा उत्पादन अधिक स्थिर और प्रभावी बन सके। इसके साथ राज्य ने निजी निवेश को भी बड़े स्तर पर आकर्षित किया। यही वजह है कि अडानी ग्रुप, टाटा ग्रुप और रिलायंस इंडस्ट्री जैसी बड़ी कंपनियाँ गुजरात में ग्रीन एनर्जी सेक्टर में भारी निवेश कर रही हैं।
रूफटॉप सोलर के मामले में भी गुजरात का मॉडल अलग दिखाई देता है। राज्य में रूफटॉप सोलर को बड़े पैमाने पर अपनाया गया है। इसकी एक बड़ी वजह नीति समर्थन और अपेक्षाकृत तेज अमल को भी माना जाता है। इसके अलावा गुजरात के बंदरगाहों और इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स ने भी रिन्यूएबल एनर्जी मॉडल को मजबूती दी है। बंदरगाहों की उपलब्धता का अर्थ यह है कि भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन, अमोनिया और अन्य ऊर्जा उत्पादों के निर्यात की संभावनाएँ भी लगातार बढ़ेंगी। यही कारण है कि गुजरात को केवल बिजली उत्पादन के केंद्र के रूप में नहीं बल्कि संभावित ग्रीन एक्सपोर्ट हब के तौर पर भी देखा जा रहा है।
रिन्यूएबल एनर्जी के पीछे छुपा बड़ा भू-राजनीतिक और आर्थिक खेल
गुजरात का ग्रीन एनर्जी मॉडल केवल राज्य के विकास तक सीमित नहीं है। इसके पीछे भारत की बड़ी रणनीतिक जरूरतें भी जुड़ी हुई हैं। भारत आज भी अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित तेल और गैस के जरिए पूरा करता है। मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने पर ऊर्जा की कीमतों में उछाल आता है जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में रिन्यूएबल एनर्जी अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गई है बल्कि यह ऊर्जा सुरक्षा का भी बड़ा प्रश्न बन चुकी है।
इसी संदर्भ में गुजरात की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर बड़े पैमाने पर सोलर, विंड और ग्रीन हाइड्रोजन इकोसिस्टम विकसित होता है तो भारत धीरे-धीरे आयातित ईंधन पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। इसके साथ ही दुनिया की बड़ी कंपनियाँ अब ऐसी सप्लाई चेन की तलाश में हैं जो ‘क्लीन एनर्जी’ पर आधारित हो। यही वजह है कि भविष्य की मैन्युफैक्चरिंग अर्थव्यवस्था में ग्रीन पावर एक बड़े प्रतिस्पर्धात्मक लाभ के रूप में उभर रही है।
इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में केवल यह मायने नहीं रखेगा कि कौन सा राज्य ज्यादा उद्योग स्थापित कर रहा है बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि वे उद्योग किस प्रकार की ऊर्जा पर चल रहे हैं। यही वह जगह है, जहाँ गुजरात खुद को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करता दिखाई दे रहा है।
केवल बिजली नहीं, रोजगार, उद्योग और निवेश का नया मॉडल
रिन्यूएबल एनर्जी को लेकर अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि यह केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा है। लेकिन गुजरात का मॉडल दिखाता है कि इसे औद्योगिक विकास, निवेश और रोजगार से भी जोड़ा जा सकता है। जब किसी राज्य में बड़े पैमाने पर सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स आते हैं, तो उनके साथ ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर, मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स, लॉजिस्टिक्स, मेंटेनेंस इकोसिस्टम और कुशल कर्मचारियों की जरूरत भी होती है। अगर उसी ऊर्जा के आधार पर सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक व्हीकल और बैटरी उद्योग विकसित होते हैं तो उसका प्रभाव और भी व्यापक हो जाता है।
धोलेरा जैसे क्षेत्रों को इसी दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। अगर भविष्य में ग्रीन एनर्जी आधारित मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम विकसित होता है, तो गुजरात भारत के औद्योगिक मानचित्र पर और अधिक मजबूत स्थिति में पहुँच सकता है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ अब कार्बन न्यूट्रल या लो-कार्बन सप्लाई चेन की ओर बढ़ रही हैं। ऐसी स्थिति में वही कंपनियाँ और देश ज्यादा आकर्षक माने जाएँगे, जो स्वच्छ ऊर्जा पर आधारित उत्पादन करने में सक्षम होंगे। गुजरात खुद को इसी वैश्विक बदलाव के अनुरूप तैयार करता दिखाई दे रहा है।
भारत का पहला ग्रीन इंडस्ट्रियल स्टेट बन रहा गुजरात!
यह सवाल अब धीरे-धीरे स्वाभाविक होता जा रहा है। क्योंकि गुजरात में जो तस्वीर उभर रही है वह केवल रिन्यूएबल क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यहाँ बिजली उत्पादन, ट्रांसमिशन, स्टोरेज, उद्योग, निर्यात और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर को एक साथ जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है।
खावड़ा में विशाल रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादन, सौराष्ट्र और कच्छ में विंड कॉरिडोर्स, तेजी से बढ़ता रूफटॉप सोलर नेटवर्क, धोलेरा जैसे स्मार्ट इंडस्ट्रियल क्षेत्र, ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएँ और बंदरगाहों पर आधारित निर्यात इंफ्रास्ट्रक्चर आदि इन सभी को एक साथ देखें तो साफ हो जाता है कि गुजरात केवल बिजली उत्पादक राज्य बनना नहीं चाहता। राज्य खुद को भविष्य की ग्रीन अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
संभव है कि आने वाले वर्षों में भारत के दूसरे राज्य भी इसी दिशा में बड़े कदम उठाएँ। लेकिन फिलहाल गुजरात ने जिस आधार, गति और रणनीतिक दृष्टि के साथ रिन्यूएबल एनर्जी को औद्योगिक विकास से जोड़ने की कोशिश की है, उसने उसे एक अलग पहचान दी है।
गुजरात की बदलती भूमिका
अगर पिछले दो दशकों के गुजरात मॉडल को ध्यान से देखा जाए तो साफ दिखाई देता है कि राज्य ने हर दौर में खुद को भारत की अगली आर्थिक दिशा के साथ जोड़ने की कोशिश की है। एक समय गुजरात को मुख्य रूप से बंदरगाहों, पेट्रोकेमिकल्स और मैन्युफैक्चरिंग के लिए जाना जाता था। इसके बाद राज्य ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरिंग, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स और निर्यात इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से चर्चा में आया। अब तस्वीर उससे कहीं आगे जाती दिखाई दे रही है। अब गुजरात खुद को भविष्य की ऊर्जा अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
इस बदलाव को केवल सरकारी दावों या राजनीतिक भाषणों के आधार पर नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे जो वास्तविक परिवर्तन हो रहा है, वह जमीन पर साफ दिखाई देता है। कच्छ के विशाल रेगिस्तानी इलाकों में फैले सोलर पैनल, समुद्री हवाओं के बीच लगाए गए विंड टर्बाइन्स, नए ट्रांसमिशन नेटवर्क, ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएँ और स्मार्ट इंडस्ट्रियल क्षेत्र ये सभी मिलकर एक नई औद्योगिक संरचना तैयार कर रहे हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात रिन्यूएबल एनर्जी को केवल बिजली उत्पादन के रूप में नहीं देख रहा। राज्य इसे एक पूरे आर्थिक इकोसिस्टम में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यही वजह है कि यहाँ केवल सोलर पार्क नहीं बनाए जा रहे बल्कि इन परियोजनाओं को बंदरगाहों, मैन्युफैक्चरिंग ज़ोन्स, स्मार्ट सिटीज और निर्यात नेटवर्क्स से भी जोड़ा जा रहा है।
खावड़ा और धोलेरा का महत्व
कच्छ का इलाका लंबे समय तक मुख्य रूप से सीमावर्ती क्षेत्र, सूखा रेगिस्तानी भूभाग और कम आबादी वाले इलाके के रूप में देखा जाता था। लेकिन आज वही क्षेत्र भारत के सबसे बड़े ऊर्जा परिवर्तन का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं बल्कि प्रतीकात्मक भी है। जहाँ कभी रेगिस्तान और बंजर जमीन दिखाई देती थी, वहाँ अब हजारों मेगावाट क्षमता वाले सोलर और विंड प्रोजेक्ट्स स्थापित किए जा रहे हैं। विशाल ट्रांसमिशन टावर और रिन्यूएबल इंफ्रास्ट्रक्चर इस बात का संकेत देते हैं कि भारत की भविष्य की ऊर्जा कहानी अब केवल महानगरों में नहीं बल्कि सीमावर्ती इलाकों में भी लिखी जा रही है।
खावड़ा परियोजना इसी परिवर्तन का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह केवल एक बिजली परियोजना नहीं है। यह उस सोच का प्रतीक है, जिसमें भूगोल और प्राकृतिक चुनौतियों को आर्थिक अवसर में बदला गया है। कच्छ की कठोर जलवायु, तेज हवाएँ और विशाल खाली जमीन जिन्हें कभी विकास की बाधा माना जाता था, आज रिन्यूएबल एनर्जी की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी हैं। यही वजह है कि खावड़ा का जिक्र अब केवल तकनीकी या औद्योगिक संदर्भ में नहीं होता बल्कि यह भारत की ऊर्जा महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक बन चुका है।
अगर खावड़ा ऊर्जा उत्पादन का केंद्र है, तो धोलेरा उस ऊर्जा पर आधारित भविष्य की अर्थव्यवस्था का प्रतीक बनता दिखाई देता है। अक्सर स्मार्ट सिटी शब्द का इस्तेमाल केवल चौड़ी सड़कों, डिजिटल नेटवर्क या शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए किया जाता है लेकिन धोलेरा का महत्व इससे कहीं अधिक व्यापक है। जिस तरह से धोलेरा को विकसित किया जा रहा है, उससे साफ दिखाई देता है कि यहाँ भविष्य के उन उद्योगों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जो आने वाले दशकों की वैश्विक अर्थव्यवस्था को तय कर सकते हैं। सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक व्हीकल इकोसिस्टम, बैटरी स्टोरेज, ग्रीन हाइड्रोजन और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों को ध्यान में रखकर इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जा रहा है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा मॉडल रिन्यूएबल एनर्जी से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। अगर भविष्य की फैक्ट्रियाँ साफ ऊर्जा पर चलेंगी, अगर निर्यात की और तेजी से बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग को लो-कार्बन वाली ऊर्जा मिलेगी और अगर ग्रीन हाइड्रोजन आधारित औद्योगिक सिस्टम विकसित होंगे तो धोलेरा जैसे क्षेत्र भारत की औद्योगिक संरचना को पूरी तरह बदल सकते हैं। यानी गुजरात की मौजूदा रणनीति केवल ‘ज्यादा बिजली उत्पादन’ तक सीमित नहीं है बल्कि उस बिजली के इर्द-गिर्द भविष्य की अर्थव्यवस्था का ढाँचा तैयार करना भी उसका हिस्सा है।
भविष्य की अर्थव्यवस्था तैयार कर रहा है गुजरात
आज जब दुनिया ऊर्जा परिवर्तन के दौर से गुजर रही है तब गुजरात ने खुद को केवल एक औद्योगिक राज्य तक सीमित नहीं रखा है। राज्य जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह इस बात का संकेत देता है कि आने वाले समय में ऊर्जा, उद्योग और रणनीतिक आर्थिक शक्ति, तीनों एक-दूसरे से अलग नहीं रहेंगे।
खावड़ा में रिन्यूएबल एनर्जी उत्पादन, कच्छ और सौराष्ट्र में विंड कॉरिडोर्स, पूरे राज्य में तेजी से बढ़ता रूफटॉप सोलर नेटवर्क, धोलेरा में भविष्य की औद्योगिक संरचना, ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएँ, सेमीकंडक्टर और ईवी इकोसिस्टम की तैयारियाँ अगर इन सभी को एक साथ देखें तो एक व्यापक तस्वीर उभरकर सामने आती है। यह तस्वीर केवल ‘रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता’ की नहीं है बल्कि उस भविष्य की है जिसमें स्वच्छ ऊर्जा और औद्योगिक विकास साथ-साथ आगे बढ़ेंगे।
गुजरात का मौजूदा मॉडल यही दिखाता है कि अगर किसी राज्य के पास भूगोल, नीति, उद्योग, निवेश और दूरदृष्टि एक साथ मौजूद हों तो वह केवल बिजली उत्पादन में अग्रणी नहीं बनता बल्कि पूरे आर्थिक परिवर्तन का केंद्र भी बन सकता है। संभव है कि आने वाले वर्षों में भारत की ऊर्जा राजनीति, औद्योगिक नीति और निर्यात संरचना में बड़े बदलाव देखने को मिलें। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखें तो इतना स्पष्ट है कि गुजरात खुद को उस भविष्य के लिए पहले से तैयार करने की कोशिश कर रहा है।
(यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है जिस इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)