Home Blog Page 19

राजस्थान के ST समाज पर तमिलनाडु से इटली तक के मिशनरियों की नजर, युद्धस्तर पर ईसाई बनाने में जुटे: इन 10 मामलों से समझें- अवैध धर्मांतरण पर लगाम के लिए क्यों है SIT की जरूरत

राजस्थान में अब वही कहानी सामने आ रही है जो छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में देखने को मिलती है। यहाँ ईसाई मिशनरी जनजातीय (ST) समाज के वंचित गाँवों के लोगों को मुफ्त राशन, मुफ्त नौकरी, और मुफ्त पढ़ाई जैसी जरूरी चीजों का लालच देकर उन्हें धर्म बदलने के लिए मजबूर कर रही हैं। इनसे कहा जाता है कि ईसाई बनने से उनकी सारी परेशानियाँ दूर हो जाएँगी, लेकिन इनका नतीजा यह निकलता है कि लोग अपनी संस्कृति और समाज से कटते चले जाते हैं। ये वही मकसद है जिसके लिए मिशनरियाँ देश के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय हैं।

इसी मामले पर चिंता जताते हुए अब राजस्थान के उदयपुर से सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने आवाज उठाई है। उन्होंने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चिट्ठी लिखकर पूरे मामले की जानकारी दी है।

अपने पत्र में सासंद ने लिखा है कि उदयपुर, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जैसे इलाकों में मिशनरियों की अवैध धर्मांतरण गतिविधियों खासतौर पर बढ़ी हैं। उनका कहना है कि यहाँ संगठित तरीके से गिरोह बनाकर जनजातीय समाज को निशाना बनाया जा रहा है और शिक्षा व रोजगार के नाम पर बच्चों को राज्य से बाहर ले जाया जा रहा है।

उदयपुर सांसद ने पत्र लिखकर धर्मांतरण गतिविधियों में NIA-CBI-IB की जाँच की रखी माँग

पत्र के मुताबिक हाल ही में उदयपुर जिले दो लड़कियाँ और पाँच लड़के समेत सात बच्चों को तमिलनाडु के एक स्कूल में दाखिला दिलाने के बहाने राज्य से बाहर ले जाया जा रहा था। सांसद के अनुसार इन बच्चों को गोवा में स्थानीय पुलिस और बाल कल्याण समिति ने रोका, जिसके बाद राजस्थान पुलिस ने कार्रवाई करते हुए बच्चों को रेस्क्यू करने की प्रक्रिया शुरू की। पत्र में यह भी कहा गया है कि पहले भी इसी तरह बच्चों को राज्य से बाहर ले जाया जा चुका है।

सांसद मन्नालाल रावत द्वारा लिखे पत्र की कॉपी (साभार: NDTV)

सांसद ने अपने पत्र में यह आशंका भी जताई है कि इस पूरे नेटवर्क के तार पंजाब, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के अलावा पाकिस्तान और नेपाल तक फैले हो सकते हैं।

मामलों की गंभीरता को देखते हुए सांसद ने माँग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए एक विशेष जाँच दल (SIT) बनाई जाए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर CBI, NIA और IB जैसी केंद्रीय एजेंसियों से भी जाँच करवाई जा सकती है, ताकि इन धर्मांतरण नेटवर्क से जुड़े संगठनों और मिशनरियों की फंडिंग की सच्चाई सामने आ सके।

उदयपुर सांसद का यह पत्र सचमुच राजस्थान में चल रहे धर्मांतरण रैकेट को बेनकाब करता है। क्योंकि पिछले कई वर्षों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें संगठित तरीके से मिशनरियों ने जनजातीय क्षेत्रों में पैठ जमाकर अवैध धर्मांतरण का खेल खेला है। राजस्थान में धर्मांतरण रैकेट के ऐसे 10 मामले इस रिपोर्ट में मैं आपको बताने जा रही हूँ।

1.उदयपुर से 7 बच्चों को मुफ्त शिक्षा के लिए गोवा लेकर गए मिशनरी

बीते दिन रविवार (19 जुलाई 2026) को ही मामला सामने आया, जहाँ मुफ्त सिक्षा का झाँसा देकर 7 से 12 साल के सात बच्चों को राजस्थान से गोवा ले जाया गया। बच्चों के साथ मिशनरी के 3 लोग भी थे, जिन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया। यहाँ से बच्चों को तमिलनाडु ले जाने की प्लानिंग थी।

पूछताछ में इसका खुलासा हुआ है कि बच्चे उदयपुर में भी चर्च जाया करते थे। पुलिस इस मामले की धर्मांतरण एंगल से भी जाँच कर रही है। पुलिस की जानकारी में आया है कि पहले भी उदयपुर से ही कम से कम 15 बच्चों को तमिलनाडु भेजा गया था।

2.खेतों में कुआँ और ट्यूबवेल खुदवाने का लालच देकर 200+ जनजातियों को ईसाई बनाने की कोशिश

उदयपुर जिले के ऋषभदेव थाना क्षेत्र के कानूवाड़ा बिलखाई गाँव में प्रार्थना सभा आयोजित कर 20 से ज्यादा गाँवों के 200 जनजातीय लोगों को धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश की गई। सभा में लोगों को खेतों में कुआँ और ट्यूबवेल खुदवाने का लालच दिया गया और इसके बदले ईसाई बनने को कहा गया।

सभा में यह भी कहा गया कि हिंदू धर्म छोड़ दो, सारी बीमारियाँ दूर हो जाएँगी और हर तरीके से आर्थिक लाभ भी मिलेगा। पुलिस ने कार्यक्रम स्थल में पहुँचकर झारखंड और छत्तीसगढ़ के 3 पादरियों समेत 11 लोगों को हिरासत में लिया था।

3.पिछले 10 साल से 50+ गाँवों में सक्रिय ईसाई धर्मांतरण रैकेट

उदयपुर के ऋषभदेव क्षेत्र में धर्मांतऱण का मामला सामने आने के बाद दैनिक भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि खेरवाड़ा क्षेत्र के 50 से अधिक गाँवों इनकी चपेट में हैं, जहाँ मिशनरियाँ पिछले 10 सालों से जनजातीय परिवारों का लालच देकर धर्मांतरण करवा रही हैं।

रिपोर्ट में सामने आया कि गाँव वालों के धर्मांतरण के लिए मिशनरी ग्रुप ने हर गाँव में 3 से 4 ऐसे स्थानीय समाज के नेताओं को प्रभारी बना रखा था। कई ग्रामीणों और महिलाओं ने आरोप लगाया कि धर्मांतरण का विरोध करने वालों पर ऐसे प्रभावशाली लोगों के जरिए उन पर दबाव बनाया जाता था।

4.पादरी ने 450 लोगों को बनाया ईसाई

श्रीगंगानगर जिले में फ्रेंडस मिशनरी प्रेयर बैंड नाम की ईसाई मिशनरी के पादरी पोलुस बरजो को पुलिस ने गिरफ्तार किया। पूछताछ में पता लगा कि उसने पिछले 11 वर्षों में 450 से अधिक लोगों को ईसाई बनाया है। पुलिस ने उसके पास से एक रजिस्टर समेत कई दस्तावेज भी बरामद किए, जिनमें धर्मांतरण करने वाले लोगों का रिकॉर्ड था।

वह खुद एक हिंदू हुआ करता था और बाद में उसने धर्मांतरण कर लिया। उसने यह भी बताया कि पादरी के तौर पर उसे 9 हजार रुपए सैलरी दी जाती है और जिस संस्था के लिए वह काम करता है उसका काम ही हिंदुओं को लालच देकर धर्म परिवर्तन करना है। पोलस ने बताया कि उसे हर महीने 20 लोगों को ईसाई बनाने का टारगेट मिला है।

5.हिंदू देवी-देवताओं का विसर्जन करवा 250 लोगों को ईसाई बनाने का प्रयास

जयपुर के वाटिका थाना क्षेत्र में भी साल 2022 में ईसाई धर्मांतरण के बड़े मामले का खुलासा हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि करीब 250 लोगों पर हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया गया। मामले की जानकारी सामने आने के बाद हिंदू संगठनों ने विरोध जताया और आरोप लगाया कि लोगों को लालच और ईसाइयत की प्रार्थना सभाओं के जरिए धर्मांतरण के लिए प्रेरित किया जा रहा था।

शिकायत में यह भी कहा गया था कि हिंदुओं से हिंदू देवताओं की पूजा बंद करवाकर मूर्तियों का विसर्जन करवा दिया गया और बीमारी ठीक करने और पैसों का लालच दिया जा रहा था।

6.बाप-बेटे घर पर चर्च बनाकर चलाते थे धर्मांतरण का खेल

श्रीगंगानगर में बाप बग्गूसिंह और बेटा अमनदीप सिंह मिलकर जनजातीय समाज को ईसाई धर्मांतरण करवाया। बाप और बेटे ने अपने घर में चर्च बनाया, जहाँ प्रार्थना सभा में गरीब लोगों को बीमारी ठीक करने का लालच देकर ईसाई बनाते थे। पुलिस ने बाप-बेटों के खिलाफ कार्रवाई की।

मामले कि शिकायतकर्ता ने बताया कि खुद को पादरी बताने वाला बग्गू सिंह अपने घर पर पानी पिलाता, कुछ मंत्र पढ़ता औऱ सिर पर हाथ रखकर कहता, “अब तुम ईसाई हो गए हो, प्रभु यीशु तुम्हारी सारी बीमारी ठीक करेंगे।” वहीं दूसरी ओर बग्गू सिंह हिंदू धर्मों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करता था। पुलिस की जाँच में सामने आया था कि वह अब तक 25 परिवारों को ईसाई बना चुका था।

7.‘राजस्थान में शैतान का राज है, यहाँ यीशू राज होगा’: राजस्थान में मिशनरियों का मकसद

पिछले साल ईसाई धर्मांतरण का एक और गंभीर मामला सामने आया था जब कोटा के बोरेकहेड़ा थानाक्षेत्र की एक चर्च में ईसाई मिशनरियों ने तीन दिवसीय प्रार्थना सभा आयोजित की और अपना मकसद बताया। सभा से एक वीडियो वायरल हुई, जिसमें कहा गया था, “राजस्थान में शैतान का राज है, यहाँ यीशू राज होगा।”

इस मामले में ‘राजस्थान अवैध धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2025’ के तहत राज्य में पहला मुकदमा दर्ज हुआ था। शिकायत कुछ हिंदू संगठनों के स्वयंसेवकों द्वारा बोरेकहेड़ा थाने में वीडियो क्लिप और सोशल मीडिया लाइवस्ट्रीम के आधार पर दी गई थी।

8.छत पर बने कमरे में ईसाइयत की सभा में धर्म परिवर्तन का खेल

लगभग 10 महीने पहले राजस्थान में धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून लागू होते ही जयपुर के प्रताप नगर क्षेत्र में एक मामला सामने आया, जहाँ छत पर बने कमरे में ईसाइयत की सभा आयोजित की जाती थी और लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाया जाता था। मौके पर मिशनरी के 5 लोग मिल थे, जिसके बाद स्थानीय लोगों ने विरोध किया तो मारपीट शुरू कर दी।

9.बीकानेर और उदयपुर में ईसाई धर्मांतरण के गंभीर मामले

इसी साल फरवरी में उदयपुर और जयपुर, दो जिलों में एक साथ ईसाई धर्मांतरण का खुलासा हुआ, जिसमें एक सांसद मन्नालाल रावत और दूसरा हिंदू संगठन ने किया। उदयपुर वाले मामले में छगनलाल नाम के व्यक्ति पर प्रार्थना सभा आयोजित कर धर्मांतरण का पाठ पढ़ाया जा रहा था।

वहीं बीकानेर में भी ईसाई धर्मांतरण गतिविधियाँ आयोजित की जा रही थीं हिंदू संगठन ने विरोध किया तो उनसे मारपीट की गई। हिंदू संगठन ने पुलिस से इस मामले में शिकायत दर्ज कराई थी।

9.दिल्ली से अलवर आकर पादरी राजकुमार लोगों को बनाता ईसाई

हाल ही में एक और पादरी राजकुमार को पुलिस ने गिरफ्तार किया। जो अलवर जिले के अखेपुरा थाना क्षेत्र में ईसाइयत की सभा की आड़ में बीमारियाँ दूर करने का लालच देकर धर्मांतरण के लिए उकसा रहा था। हिंदु संगठन ने शिकायत में बताया था कि मौके पर ईसाइयत की किताबें और मोबाइल में ईसाई धर्मांतरण गतिविधि का खुलासा हुआ है।

वह दिल्ली से अलवर आकर यहाँ छोटे-छोटे गाँवों के लोगों को बहला-फुसलाकर ईसाई बनाने का काम करता था, ऐसा वो पिछले 4-5 साल से कर रहा था। उसके यह कारनामे देखकर हिंदू संगठन के कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों ने उसे सड़क पर घसीटकर पीटा जिसमें उसके कपड़े भी फट गए।

10.भरतपुर में धर्मांतरण गतिविधियाँ के तार इटली से जुड़े, बजिंदर ने 20 हजार लोगों को बनाया ईसाई

साल 2024 में भरतपुर जिले में ईसाई धर्मांतरण रैकेट का खुलासा हुआ था, तब जाँच के दौरान सामने आया था कि पूरे नेटवर्क के तार एक इटली की संस्था ‘लभाना मिनिस्ट्री’ से जुड़ रहे हैं। भरतपुर में ईसाई बने लोगों को इसी संस्था का धर्मांतरण सर्टिफिकेट दिया गया था।

यह संस्था ईसाइयों की संख्या को बढ़ाने के पीछे लगी है, जिसमें मूल काम लोगों को तमाम तरह के प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना होता है। इसके अलावा भरतपुर के मालों में फंडिंग की जाँच में एलएमएन कंपनी का नाम सामने आया था, जो लोगों को बाइबिल भी गिफ्ट करती थी।

इस मामले में पादरी बजिंदर को गिरफ्तार किया गया था, जिसका ‘यीशु-यीशु’ गाने के साथ वीडियो भी वायरल है। वह अपने साथी के साथ मिलकर भरतपुर में 20 हजार से ज्यादा लोगों का धर्मांतरण करा चुका था।

निष्कर्ष: राजस्थान में धर्मांतरण पर कब लगेगी लगाम, सरकार के सख्त कानून का कितना असर

राजस्थान में पिछले कुछ वर्षों में सामने आए ईसाई धर्मांतरण के मामलों से यह सवाल लगातार उठ रहा है कि राज्य में 10 महीने पहले लागू हुआ सख्त कानून के बावजूद ऐसी घटनाएँ क्यों नहीं रुक रही हैं। उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, श्रीगंगानगर, जयपुर, कोटा, अलवर और बीकानेर जैसे कई जिलों में अलग-अलग समय पर धर्मांतरण से जुड़े मामले सामने आए हैं। इन मामलों में कहीं जनजातीय समाज को आर्थिक मदद, इलाज, शिक्षा और रोजगार का लालच दिया गया, तो कहीं बच्चों को दूसरे राज्यों में ले जाकर पढ़ाई के नाम पर धर्मांतरण कराने की आशंका जताई गई।

इससे यह साफ है कि पुलिस जिन मामलों की जाँच कर रही है, वे केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं हो सकते, बल्कि इनके पीछे संगठित नेटवर्क होने की संभावना है।

इसी पृष्ठभूमि में उदयपुर सांसद डॉ. मन्नालाल रावत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पूरे मामले की जाँच NIA, CBI और IB जैसी केंद्रीय एजेंसियों से कराने की माँग की है। सांसद का तर्क है कि अगर बच्चों को राज्य से बाहर ले जाने, दूसरे राज्यों के मिशनरियों की भूमिका और विदेशी फंडिंग जैसे पहलुओं की निष्पक्ष जाँच करनी है, तो केवल स्थानीय पुलिस की जाँच पर्याप्त नहीं होगी। उनका कहना है कि यदि वास्तव में कोई अंतरराज्यीय या अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क सक्रिय है, तो उसकी परतें केंद्रीय एजेंसियां ही प्रभावी ढंग से खोल सकती हैं।

‘द वायर’ वाली आरफा हो या ‘द हिंदू’ वाली विजेता… CJP प्रदर्शन में पत्रकारों के साथ बदसलूकी से लेफ्ट-लिबरल जमात को मिला ‘चरमसुख’

लेफ्ट-लिबरल जमात खुद को ‘बुद्धिजीवी’, ‘सहिष्णु’, ‘असहमति का सम्मान करने वाला’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा रक्षक’ बताता है। पर हल्की से भी आलोचना इनसे बर्दाश्त नहीं होती। जैसे ही ये आलोचना के दायरे में आते हैं, अपने वैचारिक विरोधियों के विरुद्ध भीड़ की हिंसा का भी समर्थन करने लगते हैं।

सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर पर ABP न्यूज के रिपोर्टर के साथ धक्का-मुक्की और अभद्र व्यवहार करते प्रदर्शनकारी दिख रहे हैं। लेकिन इस घटना की निंदा करने की जगह वामपंथी जमात सोशल मीडिया पर हमले का समर्थन करते दिख रहा है।

वैसे यह वीडियो जून 2026 की शुरुआत का है। लेकिन 19-20 जुलाई को नीट (NEET) पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर CJP का प्रदर्शन तेज होने के बाद यह फिर से वायरल है।

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि प्रदर्शन को कवर कर रहे एबीपी न्यूज के रिपोर्टर को प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने चारों ओर से घेर रखा है। भीड़ ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रही है। रिपोर्टर के साथ धक्का-मुक्की कर रही है। हूटिंग कर लगातार रिपोर्टिंग में बाधा डाल रही। रिपोर्टर को डराने-धमकाने पर उतारू यह ‘भीड़’ मॉब लिंचिंग जैसी स्थिति पैदा करने को आतुर दिख रही है।

सीजेपी (CJP) प्रदर्शनकारियों की इस गुंडई के फिर से वायरल होने के बाद लेफ्ट-लिबरल और बीजेपी विरोधी समूह ने इसे सही ठहराने की कोशिश की। 19 जुलाई को इस वीडियो को साझा करते हुए ‘द वायर’ की इस्लामी पत्रकार अरफा खानम शेरवानी ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, “दुख हो रहा रिपोर्टरों की ये हालत देखकर। जब स्टार एंकर दिन-रात स्टूडियो में नफरत और मोदी का प्रोपेगेंडा फैलाएँगे तो फील्ड में कीमत जूनियर रिपोर्टर को चुकानी पड़ेगी।”

आरफा की यह टिप्पणी पीड़ित पत्रकार के प्रति उनकी सहानुभूति नहीं है। वह अपरोक्ष रूप से रिपोर्टर के साथ भीड़ की बदसलूकी को उचित ठहराने का प्रयास कर रही है। उस भीड़ को जो ‘फासीवादी सरकार’ के विरोध में प्रदर्शन करने का दावा कर रही है।

पत्रकार को टारगेट कर रहे सीजेपी प्रदर्शनकारी के एक अन्य वीडियो को लेकर ‘द हिंदू’ की डिप्टी एडिटर विजेता सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा, “नफरत फैलाने वाले टीवी एंकर/प्रजेंटर/वरिष्ठ पत्रकारों और टीवी रिपोर्टरों के बीच अंतर किया जाना चाहिए, क्योंकि इनमें अधिकतर बेहद परिश्रमी होते हैं।”

विजेता सिंह की यह टिप्पणी उन पत्रकारों के खिलाफ भीड़ की कार्रवाई को वैध ठहराने जैसी है, जिन्हें वह और उनके वैचारिक सहयोगी ‘नफरत फैलाने वाला’ मानते हैं। यह ‘भीड़ के न्याय’ का खुला महिमामंडन है, जबकि यही इस्लामी-वामपंथी समूह उस समय ऐसी घटनाओं की तीखी आलोचना करता है, जब भीड़ वैचारिक तौर पर उनसे सहमत नहीं होती।

आरफा खानम शेरवानी और विजेता सिंह की सोशल मीडिया पोस्ट पत्रकारों पर हमले या उन गंभीर खतरों के प्रति चिंता नहीं है, जिससे गैर-वामपंथी पत्रकार घिरे हैं। उनका मकसद शाब्दिक चतुराई के साथ भीड़ के हमले को जायज ठहराने का प्रयास है।

हालाँकि विजेता सिंह की टिप्पणी की आलोचना शेखर गुप्ता जैसों ने भी की है। उन्होंने एक्स पर लिखा है, “विजेता, हम यह फैसला भीड़ पर नहीं छोड़ सकते कि वह किस पत्रकार से प्यार करे और किससे नफरत। हर पत्रकार, चाहे वह वरिष्ठ हो या जूनियर, अपना काम करते समय पूरी तरह सुरक्षित महसूस करे। एक भीड़ के लिए जो ‘अच्छा’ है, वही दूसरी भीड़ के लिए ‘बुरा’ हो सकता है। यह प्रवृत्ति अन्ना आंदोलन के दौरान शुरू हुई थी। उस समय भी कई लोगों ने इसका समर्थन किया था। लेकिन यह उस समय भी गलत था और आज भी गलत है।”

6 जून को जब एबीपी न्यूज रिपोर्टर के साथ हुइ घटना का वीडियो पहली बार वायरल हुआ था, तब कॉन्ग्रेस समर्थक एक सोशल मीडिया अकाउंट को सीजेपी प्रदर्शनकारियों की इस हरकत से ‘चरम सुख’ प्राप्त हुआ था।

एक अन्य पत्रकार सचिन गुप्ता ने भी इस घटना को अपरोक्ष रूप से सही ठहराने की कोशिश की। उन्होंने लिखा, “इसके जिम्मेदार अंजना, रूबिका, चित्रा, सुधीर जैसे लोग हैं। भुगतना फील्ड रिपोर्टर को पड़ता है। इस बहादुर रिपोर्टर की सहनशीलता को नमन है, जिन्होने सारी आवाजों को इग्नोर कर अपने काम पर फोकस रखा।”

परीक्षाओं में कथित अनियमितता और पेपर लीक के मुद्दे पर केंद्र सरकार, विशेषकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री के खिलाफ प्रदर्शन का दावा सीजेपी करती है। लेकिन इस प्रदर्शन के दौरान ‘आजादी-आजादी’ के नारे लगे हैं। हिंदू घृणा से सने कथित कॉमेडियन कुणाल कामरा जैसे इस प्रदर्शन को समर्थन के बहाने हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कर चुके हैं।

इस प्रदर्शन को कवर करने के दौरान ऑपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा भी इसी तरह के अनुभव से गुजर चुके हैं। जब वह सीजेपी समर्थकों से उनकी माँगों को लेकर बात कर रहे थे तो उन्हें घेरकर प्रदर्शनकारियों ने ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाने शुरू कर दिए थे।

अनुराग मिश्रा ने प्रदर्शनकारियों से केवल इतना पूछा था कि जब सीजेपी के सोशल मीडिया पर लाखों समर्थक होने का दावा किया जाता है, तो प्रदर्शन स्थल पर लोगों की संख्या इतनी कम क्यों है। इस सवाल से प्रदर्शनकारी नाराज हो गए और उन्होंने डराने-धमकाने की नीयत से नारेबाजी शुरू कर दी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी का प्रदर्शन शुरू होने के बाद से कई पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की और बदसलूकी की घटना हो चुकी है। कई बार पुलिस को बीच-बचाव कर पत्रकारों को भीड़ से सुरक्षित निकालना पड़ा है। इन घटनाओं में एक समान पैटर्न देखने को मिला है। ‘गोदी मीडिया’ के नारे, पत्रकारों के सख्त सवालों पर गुस्सा, उन्हें घेर लेना और उनके साथ धक्का-मुक्की करना। ऐसे कई मामलों की रिपोर्ट ऑपइंडिया ने प्रकाशित की है। हालाँकि प्रदर्शन स्थल पर पुलिस बल की भारी मौजूदगी के कारण अब तक गंभीर हिंसा की स्थिति पैदा नहीं हुई है।

वामपंथी जमात ‘गोदी मीडिया’ का लेबल लगाकर उन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को बदनाम करता है जो उनके भाजपा-हिंदू विरोधी नैरेटिव का समर्थन नहीं करते। इनका मानना है कि कोई पत्रकार तभी निर्भीक, पेशेवर और लोकतंत्र का पहरेदार माना जाएगा, जब वह वामपंथी वैचारिक लाइन का अनुसरण करें। ऐसा नहीं होने पर यदि उनकी सुरक्षा और गरिमा पर हमला होता है तो इसे वे ‘जनता का गुस्सा’, ‘वे इसके हकदार थे’ जैसी टिप्पणियों के जरिए जायज ठहराते हैं।

सीजेपी प्रदर्शनकारियों की भीड़ उन इस्लामी भीड़ से अलग नहीं है जो अतीत में पत्रकारों पर हमले में शामिल रही है। चाहे वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध में प्रदर्शन हो, अवैध बूचड़खानों या गोहत्या पर सवाल उठाने का मामला हो, या ‘मुस्लिम विक्टिम’ नैरेटिव के विपरीत सवाल पूछने का मामला हो, पत्रकारों पर हमले हुए हैं।

वैसे कथित ‘गोदी मीडिया’ पत्रकारों के निशाना बनने पर लेफ्ट-लिबरल जमात की खुशी चौंकाती नहीं है। सीजेपी के इस प्रदर्शन में हम उमर खालिद जैसे लोगों के प्रति समर्थन भी देख चुके हैं जो 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों की साजिश रचने के आरोपित हैं। सनद रहे कि इस दंगे की शुरुआत भी कथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शन’ से ही हुई थी।

इस्लामी-वामपंथी समूह का सिद्धांत सरल है- हमारी भीड़ अच्छी, आपकी भीड़ बुरी। जब उनकी भीड़ हिंसा करे तो वह ‘न्याय’ है और उनसे सहमति न रखने वालों की हिंसा ‘नफरत और असहिष्णुता’ है।

संदेश स्पष्ट है- हमारे सुर में सुर मिलाओ या चुप रहो। ऐसा नहीं करने पर ‘हमारी भीड़’ चुप करा देगी।

बहुविवाह, हलाला और तीन तलाक पर लगेगा पूर्ण विराम: MP में UCC विधेयक को मोहन यादव कैबिनेट की हरी झंडी, जानिए बिल में है क्या-क्या प्रावधान

मध्य प्रदेश सरकार ने 19 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई विशेष कैबिनेट बैठक में ‘समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक, 2026’ को मंजूरी दे दी। विधानसभा से पारित होने और अधिसूचना के बाद ये लागू होगा।

इस पर मोहन सरकार का कहना है कि इस बिल का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और पारिवारिक मामलों में समान नागरिक कानून लागू करना है। दिसंबर 2024 में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने UCC लागू करने की घोषणा की थी।

विधेयक में क्या-क्या प्रावधान है

इसके प्रमुख प्रावधानों में बहुविवाह पर प्रतिबंध, तलाक के लिए समान कानूनी प्रक्रिया, पुरुषों-महिलाओं में संपत्ति का समान अधिकार, उत्तराधिकार, विवाह का पंजीकरण गाँव के स्तर पर कराने और लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण शामिल है। हालाँकि राज्य की जनजातीय आबादी को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।

वैवाहिक व्यवस्था- सभी धर्मों और समुदायों में विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है, जिसे ग्राम स्तर तक लागू किया जाएगा। यूसीसी विधेयक में साफ कहा गया है कि किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा, लेकिन विवाह व्यवस्था पर पूरा जोर है।

बहुविवाह पर रोक लगाई गई है, हालाँकि इसमें राज्य के जनजातीय लोगों को इस कानून में अपवाद रखा गया है। उनपर यह कानून लागू नहीं होगा। इसके अलावा कोई भी पुरुष या महिला एक से अधिक विवाह तभी कर सकता है, जब तलाक हो गया हो या पार्टनर की मौत हो गई हो।

लिव-इन रिलेशनशिप- विधेयक में लिव-इन रिलेशनशिप में सख्ती बरती गई है। लिव-इन में रहने वाले जोड़ों को अपना रजिस्ट्रेशन अनिवार्य रूप से कराना होगा। रजिस्ट्रेशन के बिना साथ रहने पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। रजिस्ट्रेशन कराने के लिए एक महीने तक का वक्त दिया गया है। ऐसे संबंधों से जन्मे बच्चों को वैध माना जाएगा। साथ ही महिला और बच्चों के भरण-पोषण के अधिकारों को स्पष्ट किया किया गया है।

महिला-पुरुष समान अधिकार- प्रावधान में महिलाओं के अधिकारों को साफ किया गया है। संपत्ति में महिलाओं और पुरुषों को समान अधिकार देने की बात कही गई है। यहाँ तक कि उत्तराधिकार के मामले में भी उन्हें समान माना गया है। यानी बेटा और बेटी दोनों को समान अधिकार हैं, वहीं पति-पत्नी को भी बराबरी का अधिकार है।

तीन तलाक और हलाला निकाह पर रोक- इन प्रथाओं को पूरी तरह से गैरकानूनी और दंडनीय अपराध बनाया गया है। सिर्फ ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कह देने से तलाक वैध नहीं होगा। तलाक के लिए कानूनी प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य होगा। इसी तरह निकाह हलाला पर ड्राफ्ट में रोक लगाई गई है। ड्राफ्ट में निकाह हलाला को अपराध की श्रेणी में रखने का प्रस्ताव है।

किन-किन लोगों ने मिलकर मसौदा तैयार किया

विधेयक का मसौदा तैयार करने से पहले सर्वोच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अगुवाई में समिति का गठन किया गया। इसके 6 सदस्य थे। समिति में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह, कानूनी विशेषज्ञ अनूप नायर, शिक्षाविद गोपाल शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता बुद्धपाल सिंह शामिल थे। इसके अलावा सामान्य प्रशासन विभाग के अपर सचिव अजय कटेसरिया समिति के सचिव थे।

समिति ने उत्तराखंड और गुजरात जैसे राज्यों के यूसीसी मॉडल की गहराई से अध्ययन किया। इसके बाद मध्य प्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए पूरा ड्राफ्ट बनाया। समिति को 60 दिनों के अंदर ड्राफ्ट बिल के साथ अपनी रिपोर्ट जमा करना था।

समिति ने जिला स्तर तक जनता से सुझाव लिया। समिति को करीब 9.58 लाख सुझाव मिले। सभी धर्मों से जुड़े सामाजिक संगठनों और राज्य के राजनीतिक दलों से बातचीत की, फिर विधेयक का मसौदा तैयार किया। मसौदे को मुस्लिम समाज का भी पूरा समर्थन मिला है। करीब 80 फीसदी मुस्लिम महिलाओं और 40 फीसदी मुस्लिम पुरुषों ने यूसीसी कानून लागू करने का समर्थन किया। अब मानसून सत्र में विधानसभा में इस विधेयक को पेश किया जा रहा है।

किन-किन राज्यों में यूसीसी लागू

गोवा देश का पहला राज्य है, जहाँ 1962 से ही पुर्तगाली नागरिक संहिता के रूप में यूसीसी लागू है। स्वतंत्र भारत में उत्तराखंड ऐसा पहला राज्य है जहाँ यूसीसी लागू किया गया। यहाँ 2024 में प्रस्ताव आया और जनवरी 2025 में यूसीसी को पूरी तरह लागू कर दिया गया। इसके बाद गुजरात विधानसभा ने मार्च 2026 में यूसीसी विधेयक पारित किया। असम भी यूसीसी विधेयक को लेकर चर्चा में रहा। यहाँ मई 2026 में असम विधानसभा ने यूसीसी विधेयक को मंजूरी दी।

इन सभी राज्यों के यूसीसी ड्राफ्ट में विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों के लिए सभी धर्मों के लिए एक समान नियम बनाए गए हैं। सभी राज्यों में लिव-इन रिलेशनशिप का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। साथ ही उनके जन्में बच्चों को मान्यता दी गई है।

पुरुष और महिला को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देते हुए बेटे-बेटियों को उत्तराधिकार के रूप में समान हक दिया गया है। इसके अलावा यूसीसी लागू करने वाले सभी राज्यों ने स्थानीय अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों को इस कानून से छूट दी है।

इसका असर सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में देखा जाएगा, क्योंकि यहाँ कि कुल आबादी का पाँचवाँ हिस्सा जनजातीय समुदाय का है। वहीं उत्तराखंड में जनजातीय आबादी काफी कम है, फिर भी उनकी संस्कृति की रक्षा करने के लिए संरक्षण दिया गया है।

असम और गुजरात में भी वहाँ के डेमोग्राफिक्स और स्थानीय स्थिति के अनुसार जनजातीय समुदाय को संरक्षण दिया गया है। उत्तराखंड स्वतंत्र भारत का पहला राज्य है जहाँ यह पूर्ण रूप से लागू हो चुका है। यहाँ यूसीसी नियमावली और ऑनलाइन पोर्टल भी शुरू हो चुका है।

गुजरात, असम और मध्यप्रदेश में इसे विधानसभा से पारित करने या लागू करने की प्रक्रिया चल रही है। कार्यान्वयन शुरू हो चुका है। सभी राज्यों में लिव-इन रजिस्ट्रेशन और विवाह रजिस्ट्रेशन न करने पर जुर्माना लगाया गया है। लेकिन रजिस्ट्रेशन की अवधि और जुर्माना राज्यों के हिसाब से अलग- अलग है। असम में बहुविवाह को अपराधिक काम माना गया है, वहीं उत्तराखंड और गुजरात में इसे केवल सिविल अपराध हैं। उत्तराखंड में लिव-इन का 30 दिन में रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है, जबकि गुजरात में यह समय-सीमा 60 दिन है। सभी राज्यों में यूसीसी से अनुसूचित जनजातियों को बाहर रखा गया है।

‘हिंदुओं के देवी-देवता खाते थे मांस और पीते थे शराब’: ध्रुव राठी की कंटेंट पर केंद्र सरकार सख्त, यूट्यूब से वीडियो हटाने के दिए निर्देश

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले शिकायत अपील समिति (जीएसी) ने यूट्यूबर ध्रुव राठी को हिन्दू देवी-देवताओं पर किए गए विवादित वीडियो पर रोक लगा दी है और यूट्यूब को 24 घंटे के अंदर हटाने का निर्देश दिया है। समिति का मानना ​​है कि इस वीडियो से हिन्दू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचा है। समिति ने यूट्यूब को लिखित आदेश प्राप्त होने के 24 घंटों के भीतर वीडियो हटाने के लिए कहा है।

यूट्यूबर ध्रुव राठी की ‘क्या हिंदू गोमांस खा सकते हैं?/ केरल स्टोरी 2 का पर्दाफाश’ शीर्षक वाला 21 मिनट का वीडियो 21 मार्च, 2026 को राठी की आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया गया था। इसे लाखों बार देखा जा चुका है और चार लाख से अधिक लाइक मिल चुके हैं।

फिल्म ‘द केरल स्टोरी 2’ पर टिप्पणी करते हुए इस वीडियो में राठी ने हिंदुओं के खान-पान की बात की। गोमाँस के सेवन से जुड़ी संवेदनशीलता को दरकिनार करते हुए सांस्कृतिक विविधता और भारत में सामाजिक धारणाओं की चर्चा की। प्राचीन ग्रंथों, शास्त्रों और आधुनिक सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए राठी ने दावा किया कि रामायण और महाभारत के पात्र अपने वनवास के दौरान हिरण के माँस सहित माँस और शराब का सेवन करते थे। इस दौरान उसने भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण और पांडवों का नाम लिया।

इस वीडियो के खिलाफ वकील अमित सचदेवा ने 22 मार्च 2026 को नई दिल्ली स्थित साइबर क्राइम सेल में शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद 23 मार्च को यूट्यूब के रेजिडेंट ग्रीवेंस अधिकारी के समक्ष औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।

शिकायत में सचदेवा ने तर्क दिया कि ध्रुव राठी ने रामायण और महाभारत के चुनिंदा संदर्भों का उपयोग करते हुए मनगढंत तरीके से दावा किया कि श्री राम, श्री कृष्ण और पांडवों ने अपने वनवास के दौरान हिरण के माँस सहित दूसरे माँस और शराब का सेवन किया था। उन्होंने इन देवताओं के लिए सात्विक भोजन करने का मजाक उड़ाया और माँ सीता की कथित ‘प्रतिज्ञा’ का उल्लेख किया।

यूट्यूब ने वीडियो को लेकर और जानकारी माँगी और समीक्षा के बाद 25 मार्च को अनुरोध को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि कंटेंट स्थानीय कानूनों या उसके सामुदायिक दिशानिर्देशों का उल्लंघन नहीं करती है। प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कम प्रचलित विचारों को व्यक्त करने के अधिकार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता पर जोर दिया, साथ ही शिकायतकर्ता को सलाह दी कि यदि उसे लगता है कि वीडियो भारतीय कानून का उल्लंघन करता है तो वह उसे ब्लॉक कर दे या कोर्ट की शरण में जाए।

इसके बाद सचदेवा ने 27 मार्च 2026 को जीएसी के समक्ष अपील दायर की। दो महीने से अधिक समय तक अपील लंबित रहा। इसके बाद उन्होंने रिट याचिका के माध्यम से दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया। 3 जुलाई 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने अपीलीय प्राधिकारी को मामले का शीघ्र निपटारा करने का निर्देश दिया, साथ ही आदेश की कॉपी 15 दिनों के भीतर कोर्ट में जमा करने का निर्देश दिया।

जीएसी ने धार्मिक भावनाओं से जुड़े मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तर्क को खारिज करते हुए यूट्यूब को अपना कंटेंट हटाने को कहा। समिति का कहना है कि इस वीडियो की जाँच से पता चलता है कि इससे एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँच सकता है। यह पूरे समाज के लिए भी अच्छा संकेत नहीं है।

इसमें इस बात पर जोर दिया गया कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(क) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(2) के तहत कुछ नियमों के अधीन है। जीएसी ने आगे बताया कि सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) अधिनियम 2021 के नियम 3(1)(घ) के तहत मध्यस्थों को सावधानी बरतने के लिए कहा गया है। समिति ने अदालत के आदेश के बिना प्लेटफॉर्म के कंटेंट नहीं हटाने पर आश्चर्य जताया।

जीएसी ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के कारण यूट्यूब को निर्देश दिया कि वह विवादित वीडियो को आदेश मिलने के 24 घंटों के भीतर हटा दें। राठी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के लिए सचदेवा ने साकेत की मजिस्ट्रेट अदालत में पहल की है, जो अभी तक लंबित है। इसकी अगली सुनवाई 10 सितंबर 2026 को होगी। जीएसी के निर्देश के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि मजिस्ट्रेट कोर्ट में राठी पर केस दर्ज हो सकता है।

सचदेवा ने सोशल मीडिया पर इस आदेश को साझा करते हुए इसे इस दिशा में उठाया गया कदम बताया। उन्होंने कहा, “कंटेंट क्रिएशन की आड़ में आस्था का मजाक नहीं उड़ाया जा सकता। न्याय चरणबद्ध तरीके से दिया जा रहा है।” दरअसल ऐसे मामले त्वरित निपटाया जाना चाहिए, क्योंकि जब तक इस पर बहस होती है, तब तक इसे लाखों लोग देख चुके होते हैं और यही कंटेंट क्रिएटर की चाह होती है। विवादित वीडियो बनाओ और अधिक से अधिक व्यूज पाओ।

सहाबुद्दीन मंडल का गैंग कराता था बंगाल में घुसपैठ, फिर दिल्ली-मुंबई-चेन्नई-बेंगलुरु तक फैल जाते बांग्लादेशी: जानिए- NIA कैसे तोड़ रहा इस सिंडिकेट की कमर

भारत और बांग्लादेश की सीमा पर सुरक्षा और अवैध घुसपैठ हमेशा से ही एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दा रहा है। हाल ही में इस दिशा में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं।

NIA ने एक बड़े अंतरराष्ट्रीय मानव तस्करी सिंडिकेट के खिलाफ मामला दर्ज कर एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया है। इस सिंडिकेट द्वारा भारत-बांग्लादेश सीमा के कमजोर और बिना बाड़ वाले इलाकों का फायदा उठाकर बांग्लादेशी नागरिकों की अवैध रूप से भारत में एंट्री कराई जा रही थी।

इस मामले के सामने आने के बाद भारत-बांग्लादेश सीमा पर जल्द से जल्द पूरी तरह से बाड़ लगाने की माँग और भी ज्यादा तेज हो गई है। NIA की इस कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि यह केवल अवैध घुसपैठ का मामला नहीं है, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा को सेंध लगाने की एक बड़ी और सोची-समझी साजिश है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR की मुख्य बातें

इस पूरे मामले की शुरुआत बंगाल पुलिस की कार्रवाई से हुई थी। 27 मई 2026 को पश्चिम बंगाल पुलिस ने उत्तर 24 परगना जिले के बनगाँव थाने में एक FIR दर्ज की थी। यह मामला बनगाँव थाने के सब-इंस्पेक्टर बिल्टू मित्रा की शिकायत पर स्वतः संज्ञान लेते हुए दर्ज किया गया था।

पुलिस की शुरुआती जाँच के बाद, मामले की गंभीरता, इसके अंतर-राज्यीय फैलाव और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसे एक बेहद गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा माना। इसके बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के CTCR डिवीजन ने 1 जुलाई 2026 को आदेश के तहत इस केस की जाँच NIA को सौंप दी।

गृह मंत्रालय के अंडर सेक्रेटरी विमल कुमार शुक्ला के निर्देश पर कार्रवाई करते हुए NIA ने 3 जुलाई 2026 को नई दिल्ली में इस केस को री रजिस्टर किया। इस मामले की मुख्य जाँच अधिकारी के रूप में कोलकाता की DSP प्रियंका शर्मा को नियुक्त किया गया है।

इस मामले में आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 143(1), 143(3), 144(2) और 61(2) के साथ-साथ इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025 की धारा 24 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

सिंडिकेट का मास्टरमाइंड और उसके सहयोगी

NIA की FIR में इस पूरे अवैध मानव तस्करी रैकेट के मास्टरमाइंड और उसके करीबियों को नामजद किया गया है। इस सिंडिकेट का मुख्य आरोपित सहाबुद्दीन मंडल है, सहाबुद्दीन मंडल एक शातिर अपराधी है, जिसे पुलिस ने इस FIR से कुछ दिन पहले 13 मई 2026 को एक अन्य मामले में BNS की धारा और आर्म्स एक्ट के तहत गिरफ्तार किया था और वह पुलिस रिमांड पर था।

सहाबुद्दीन मंडल के साथ इस रैकेट में उसके कई स्थानीय सहयोगी भी शामिल हैं, जो सीमा से लेकर रेलवे स्टेशन तक अलग-अलग भूमिकाएँ निभाते थे। इस मामले में मुख्य आरोपित सहाबुद्दीन मंडल के अलावा भीरा के दुखे उर्फ हारुन रशीद को नामजद किया गया है, जिसका काम घुसपैठियों को गाड़ी से हावड़ा स्टेशन पहुँचाना था।

वहीं हावड़ा रेलवे स्टेशन क्षेत्र से राजू को आरोपित बनाया गया है, जो घुसपैठियों के लिए आगे के सफर के लिए ट्रेन टिकटों की व्यवस्था करता था। सीमा पर घुसपैठ कराने और अवैध रूप से सीमा पार कराने की जिम्मेदारी बागदा पुलिस स्टेशन के अंतर्गत रॉन्गहाट/रौनाघाट निवासी राणा, खैरुल और अजारुल की थी, जबकि धनताला पुलिस स्टेशन के अंतर्गत कुलगाछी के रहने वाले राशेद को भी सीमा पार कराने में सहयोग करने के आरोप में नामजद किया गया है।

कैसे काम करता था घुसपैठ और तस्करी का रूट मैप?

जाँचकर्ताओं और स्थानीय पुलिस की पूछताछ में इस सिंडिकेट के काम करने के बेहद व्यवस्थित और संगठित तरीके का पता चला है, जो पिछले कुछ वर्षों से लगातार सक्रिय था और उसने एक मजबूत ट्रांजिट रूट तैयार कर लिया था।

इस नेटवर्क के तहत सबसे पहले राणा, खैरुल, अजारुल और राशेद जैसे आरोपित भारत-बांग्लादेश सीमा के बनगाँव और बागदा पुलिस स्टेशन क्षेत्रों में स्थित उन हिस्सों की पहचान करते थे जहाँ बाड़ नहीं लगी है।

इन असुरक्षित और अनगार्डेड रास्तों, जैसे भीरा और उसके आस-पास के इलाकों से बांग्लादेशी नागरिकों  को भारतीय सीमा में प्रवेश कराया जाता था और इसके बदले में सिंडिकेट इन लोगों से भारी-भरकम रकम वसूलता था। सीमा पार कराने के तुरंत बाद, इन बांग्लादेशी नागरिकों को आगे की यात्रा के लिए मुख्य सरगना सहाबुद्दीन मंडल को सौंप दिया जाता था।

इसके बाद सहाबुद्दीन का एक और साथी, दुखे उर्फ हारुन रशीद, स्थानीय स्तर पर किराए की कारों की व्यवस्था करता था और इन गाड़ियों में छिपाकर इन अवैध घुसपैठियों को सड़क मार्ग के जरिए बनगाँव से सीधे हावड़ा रेलवे स्टेशन भेजा जाता था।

हावड़ा स्टेशन पर मौजूद उनका सहयोगी राजू इन लोगों को रिसीव करता था और देश के अलग-अलग बड़े शहरों के लिए रेलवे टिकटों का इंतजाम करता था, जिससे ट्रेन टिकट मिलते ही इन घुसपैठियों को बेहद तेजी से भारत के अलग-अलग कोनों में भेज दिया जाता था ताकि वे सुरक्षा एजेंसियों की नजरों में न आएँ।

महानगरों में अवैध नेटवर्क: कहाँ भेजे जा रहे थे घुसपैठिए?

NIA की जाँच के अनुसार, यह नेटवर्क केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं था, बल्कि इसके तार देश के लगभग सभी बड़े आर्थिक और प्रशासनिक केंद्रों से जुड़े हुए थे। हावड़ा रेलवे स्टेशन से ट्रेन टिकट बुक कराकर इन बांग्लादेशी नागरिकों को दिल्ली, मुंबई, पुणे, सूरत, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे देश के प्रमुख महानगरों में भेजा जा रहा था।

जाँच एजेंसियों का कहना है कि इन शहरों में ले जाकर इन लोगों को अवैध श्रम और अनैतिक गतिविधियों सहित कई तरह के गैर-कानूनी कामों में धकेला जा रहा था। इतने बड़े शहरों में इतनी तेजी से घुसपैठियों का घुल-मिल जाना सुरक्षा के लिहाज से बड़ा खतरा है।

राष्ट्रीय सुरक्षा पर मंडराता खतरा और अंतरराष्ट्रीय साजिश की आशंका

NIA ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है और इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती बताया है। जिस आसानी से यह सिंडिकेट बिना बाड़ वाले इलाकों से देश के भीतर लोगों को ला रहा था और उन्हें देश के अलग-अलग महानगरों में फैला रहा था, वह सीमा सुरक्षा में मौजूद बड़ी कमियों को उजागर करता है।

अधिकारियों को संदेह है कि यह गिरोह केवल कुछ लोगों का एक स्थानीय ग्रुप नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश काम कर रही है। इस बात की पूरी आशंका है कि सीमा के दोनों तरफ  कई बड़े प्रभावशाली लोग और पैसे से मदद करने वाले  इस रैकेट को हवा दे रहे हैं।

NIA अब इस नेटवर्क के वित्तीय लेन-देन, हवाला नेटवर्क और विदेशी संपर्कों की गहराई से जाँच कर रही है ताकि इस पूरे इकोसिस्टम को समूल नष्ट किया जा सके।

सीमा पर बाड़ लगाने की माँग और राजनीतिक हलचल

इस मामले के सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल में सीमा सुरक्षा और बुनियादी ढाँचे को लेकर एक बार फिर से राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी बहस तेज हो गई है। सुरक्षा एजेंसियाँ लंबे समय से यह माँग करती रही हैं कि घुसपैठ, तस्करी और मानव व्यापार को रोकने का एकमात्र पुख्ता जरिया पूरी सीमा पर अभेद्य बाड़ लगाना ही है।

पश्चिम बंगाल में इस दिशा में प्रशासनिक कदम भी उठाए गए हैं। राज्य प्राधिकारियों के अनुसार, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से अब तक सीमा सुरक्षा बल (BSF) को बाड़ लगाने के काम में तेजी लाने के लिए लगभग 1025 एकड़ भूमि सौंप दी है।

इसके अलावा सीमा सुरक्षा की समीक्षा करने और बाड़ लगाने के काम की प्रगति का जायजा लेने के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का भी पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्रों का दौरा प्रस्तावित है।

जब सोनम वांगचुक को उठाकर ले गई दिल्ली पुलिस, तब ‘समलैंगिक’ प्रवक्ता के घर थे अभिजीत दिपके: जानें कौन हैं अनीश गावंडे, शरद पवार की पार्टी से क्या है कनेक्शन

एनसीपी (शरदचंद्र पवार) के प्रवक्ता अनीश गावंडे ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को हटाने की दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की निंदा की है। 18 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के धरना स्थल से हटाया था। वह करीब 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे थे। गावंडे ने लोगों से बड़ी संख्या में प्रदर्शन में शामिल होने की अपील भी की।

गावंडे ने दावा किया कि प्रदर्शन स्थल से सोनम वांगचुक को हटाना दरअसल उनकी ‘गिरफ्तारी’ थी। उनका आरोप था कि पुलिस ने बिना कोई कारण बताए और बिना किसी लिखित आदेश के यह कार्रवाई की। हालाँकि, दिल्ली पुलिस ने वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटाकर उनकी बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया था।

इसके बाद गावंडे ने यह भी दावा किया कि पुलिस की यह कार्रवाई वांगचुक की सेहत की चिंता की वजह से नहीं की गई बल्कि इसका मकसद चल रहे प्रदर्शन को बाधित करना था।

अनीश गावंडे को किसी राजनीतिक दल का पहला खुले तौर पर समलैंगिक (ओपनली गे) प्रवक्ता बनाए जाने के कारण भी पहचान मिली थी। उन्होंने खुलकर CJP के प्रदर्शन का समर्थन किया है और उससे जुड़े रहे हैं। जब पुलिस सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से हटा रही थी, उसी दौरान CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके कपड़े बदलने के लिए गावंडे के घर गए हुए थे। इसी दौरान पुलिस ने दिपके को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया था।

गावंडे ने आरोप लगाया कि जब अभिजीत दिपके उनके घर की सीढ़ियों पर थे, तभी पुलिसकर्मियों ने उन्हें हिरासत में लिया और उनके साथ मारपीट की। उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिस की पिटाई के चलते दिपके जोर-जोर से चिल्ला रहे थे।

कौन है अनीश गावंडे?

मीडिया रिपोर्ट्स में मौजूद जानकारी के अनुसार, अनीश गावंडे स्वतंत्रता सेनानी, वकील और प्रसिद्ध शिक्षाविद टी. के. टोपे के परिवार से आते हैं। उनका पालन-पोषण मुंबई में हुआ। उन्होंने वर्ली के ग्रीनलॉन्स स्कूल और फोर्ट स्थित कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल से पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से तुलनात्मक साहित्य (Comparative Literature) की पढ़ाई की। बाद में रोड्स स्कॉलर (Rhodes Scholar) के रूप में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से बौद्धिक इतिहास (Intellectual History) और लोक नीति (Public Policy) में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की।

राजनीति में आने से पहले अनीश गावंडे LGBTQ+ अधिकारों के कार्यकर्ता और लेखक रहे हैं। उन्होंने पिंक लिस्ट इंडिया की भी स्थापना की जो LGBTQ+ अधिकारों का समर्थन करने वाले नेताओं का एक डेटाबेस है।

अपनी समलैंगिक (गे) पहचान सार्वजनिक करने के बाद गावंडे ने फ्रैंकोफोन पश्चिम अफ्रीका और सेनेगल की भाषाई राजनीति पर अध्ययन किया। उनका इरादा अकादमिक क्षेत्र में प्रोफेसर बनने का था। हालाँकि, 2018 में उन्हें भारत में एक चुनावी अभियान से जुड़ने का अवसर मिला, जिसके बाद उन्होंने राजनीति की ओर रुख किया। अगस्त 2024 में उन्हें एनसीपी (शरदचंद्र पवार) का राष्ट्रीय प्रवक्ता नियुक्त किया गया।

गावंडे क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) के समर्थक हैं। उनका मानना है कि जाति आधारित आरक्षण के साथ-साथ खेल कोटा, महिलाओं और दिव्यांगों जैसी श्रेणियों के लिए भी क्षैतिज आरक्षण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। उनका यह भी मानना है कि देश में भेदभाव की समस्या को दूर करने के लिए एक व्यापक भेदभाव-विरोधी कानून बनाया जाना चाहिए।

हाल ही में अनीश गावंडे ने खालिस्तानी प्रोपेगेंडा फिल्म ‘सतलुज’ का समर्थन किया था। यह फिल्म रिलीज के तुरंत बाद Zee5 ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटा दी गई थी।

फिल्म के समर्थन में इंस्टाग्राम पर लिखी एक पोस्ट में गावंडे ने कहा था, “दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ जिसमें उन्होंने मानवाधिकार जांचकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है, भारतीय स्क्रीन पर केवल 48 घंटे ही रह सकी और फिर उसे ‘अगली सूचना तक’ चुपचाप हटा दिया गया। जिन लोगों को गायब कर दिया गया, उन पर बनी एक फिल्म भी गायब कर दी गई।”

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ से परेशान हुआ US, अमेरिकियों को मिल रहा घटिया क्वालिटी का सामान: जानिए IMF रिसर्च ने और क्या बताया

डोनाल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षी टैरिफ (टैक्स) नीति खुद अमेरिकी अर्थव्यवस्था और वहाँ के आम नागरिकों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अर्थशास्त्रियों की एक नई रिपोर्ट ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, इन भारी-भरकम शुल्कों से विदेशी निर्यातकों पर कोई असर नहीं पड़ा, बल्कि अमेरिकी खरीदारों को अब महँगे दामों पर घटिया क्वॉलिटी का सामान खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

दरअसल, जब साल 2025 में ये टैक्स लगाए गए थे, तब दावा किया गया था कि विदेशी कंपनियाँ अमेरिकी बाजार में टिके रहने के लिए अपने दाम कम कर देंगी और इससे अमेरिका में रोजगार बढ़ेंगे। लेकिन आईएमएफ (IMF) के अर्थशास्त्रियों जेबीन आन, लोरेंजो रोटुनो और मिशेल रूटा ने जब अमेरिकी सीमा शुल्क और सेंसस ब्यूरो के आँकड़ों की बारीकी से जाँच की, तो सच कुछ और ही निकला। इस रिसर्च ने यह साबित कर दिया है कि ट्रंप की हाई रेसिप्रोकल टैरिफ नीति अपने उद्देश्यों में न केवल विफल रही है, बल्कि उसने अमेरिकी बाजार को सस्ते और निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड बनाने की शुरुआत कर दी है।

IMF पेपर का स्क्रीनशॉट

विदेशी निर्यातकों ने कीमतें घटाने से साफ इनकार

आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार, जब कोई बड़ा देश किसी आयातित वस्तु पर भारी शुल्क लगाता है, तो अगर उस देश की बाजार में धाक (मोनोप्सोनी पावर) हो, तो विदेशी निर्यातक अपनी वस्तुओं की मूल कीमतों में कटौती कर लेते हैं ताकि वे प्रतिस्पर्धी बने रह सकें। इसे अर्थशास्त्र में ‘टैरिफ एब्जॉर्प्शन’ या निर्यातकों द्वारा लागत का बोझ उठाना कहा जाता है। ट्रंप प्रशासन को भी यही उम्मीद थी कि चीन, मैक्सिको, कनाडा और यूरोपीय संघ जैसे बड़े हिस्सेदार अमेरिकी बाजार में टिके रहने के लिए अपने उत्पादों के दाम घटाएंगे।

लेकिन आईएमएफ के बारीक प्रॉडक्ट-लेवल डेटा विश्लेषण से जो बात सामने आई है, वह इसके बिल्कुल विपरीत है। विदेशी निर्यातकों ने अमेरिकी टैरिफ के जवाब में अपनी कीमतों में कोई कटौती नहीं की। यदि उत्पाद के स्तर पर सबसे सूक्ष्म ‘वेरायटी’ (यानी किसी खास देश से आने वाला विशिष्ट उत्पाद) की जाँच की जाए, तो शुल्क हटाने के बाद की कीमतें (Duty-Exclusive Prices) लगभग वैसी ही बनी रहीं जैसी टैरिफ लागू होने से पहले थीं।

IMF द्वारा जारी किया गया चार्ट

इसका सीधा और साफ मतलब यह है कि ट्रंप द्वारा लगाए गए टैक्स का पूरा का पूरा बोझ अमेरिकी आयातकों (Importers) और अंततः वहाँ के आम उपभोक्ताओं की जेब पर ट्रांसफर हो गया।

इस रिसर्च पेपर के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर गीता गोपीनाथ ने सोशल मीडिया पर बयान जारी करते हुए लिखा, “टैरिफ से अभी भी कोई अच्छी खबर नहीं है। नए शोध से पता चलता है कि टैरिफ के कारण अमेरिका द्वारा आयात किए जाने वाले उत्पादों की गुणवत्ता में भारी गिरावट आई है। सीधे शब्दों में कहें तो, टैरिफ ने निर्यात की कीमतों को कम करने में बहुत कम काम किया और इसके बजाय हम सस्ते, कम गुणवत्ता वाले आयात की ओर मुड़ गए। उच्च कीमतों का भुगतान करने के अलावा सामान की गुणवत्ता भी घट गई है।”

महँगे लेकिन अच्छे सप्लायर्स OUT, सस्ते और घटिया सप्लायरों की एंट्री

अब सवाल यह उठता है कि यदि व्यक्तिगत स्तर पर वस्तुओं की कीमतें नहीं घटीं, तो फिर अमेरिका के कुल आयात मूल्य (Import Bill) में जो थोड़ी-बहुत गिरावट या बदलाव दिखाई दे रहा है, उसकी असली वजह क्या है? आईएमएफ के शोधकर्ताओं ने इसके पीछे एक बेहद जटिल और महत्वपूर्ण आर्थिक प्रक्रिया को उजागर किया है, जिसे ‘इंपोर्ट रीएलोकेशन’ (आयात का पुनर्वितरण) कहा जाता है।

जब अमेरिका ने कुछ खास देशों या उत्पादों पर भारी शुल्क लगाया, तो उन देशों से आने वाले बेहतरीन और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद अमेरिकी आयातकों के लिए बहुत महँगे हो गए। परिणामस्वरूप अमेरिकी कंपनियों ने उन स्थापित, ब्रांडेड और उच्च कीमत वाले सप्लायर्स से नाता तोड़ना या कम करना शुरू कर दिया। उनके स्थान पर आयातकों ने ऐसे नए देशों और सप्लायर्स की खोज की जिन पर टैरिफ की मार कम थी या जिनके उत्पाद बुनियादी रूप से बहुत सस्ते थे।

इस शोध के आँकड़े बताते हैं कि अध्ययन की अवधि के दौरान अमेरिका की औसत प्रभावी टैरिफ दरें लगभग 8 प्रतिशत बढ़ गईं। इस बढ़ोतरी के कारण कुल आयात मात्रा में करीब 3.6% की गिरावट दर्ज की गई। लेकिन सबसे बड़ा खेल प्रॉडक्ट बास्केट के भीतर हुआ। टैरिफ बढ़ने के बाद अधिक कीमत और उच्च गुणवत्ता वाले सप्लायर्स के अमेरिकी बाजार छोड़ने की संभावना नाटकीय रूप से बढ़ गई, जबकि कम कीमत वाले नए सप्लायर्स ने बड़ी तेजी से अमेरिकी बाजार में एंट्री मारी। आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कीमतों में जो भी थोड़ी-बहुत गिरावट या स्थिरता ऊपरी तौर पर दिखाई दे रही है, उसमें से लगभग 65% की वजह सप्लायर्स बदलने का यही पैटर्न था।

गुणवत्ता में गिरावट की कड़वी सच्चाई का ‘अपील स्कोर’ में हुआ खुलासा

ट्रंप प्रशासन इस बात की पीठ थपथपा सकता था कि सप्लायर्स बदलने से अमेरिका को कम कीमत पर सामान मिल रहा है, लेकिन आईएमएफ की रिसर्च ने इस भ्रामक खुशी को भी एक बड़े झटके में बदल दिया है। रिसर्चर्स का स्पष्ट तर्क है कि कम कीमत का मतलब हमेशा बेहतर मूल्य या बचत नहीं होता। यह बचत केवल इसलिए दिख रही है क्योंकि अमेरिका अब घटिया उत्पाद खरीद रहा है।

शोधकर्ताओं ने साल 2023 और 2024 के बेसलाइन डेटा का उपयोग करके विभिन्न देशों के उत्पादों का एक ‘अपील स्कोर’ (Product Appeal Score) तैयार किया था। उपभोक्ता माँग के सिद्धांतों के तहत जो उत्पाद ऊँची कीमत के बावजूद बाजार में अपनी मजबूत हिस्सेदारी बनाए रखते हैं, उनका अपील स्कोर अधिक माना जाता है क्योंकि उपभोक्ता उनकी गुणवत्ता, टिकाऊपन और ब्रांड वैल्यू को पसंद करते हैं। जब आईएमएफ ने 2025 के टैरिफ के बाद आए नए सप्लायर्स के उत्पादों के अपील स्कोर की जाँच की तो पाया कि अमेरिकी आयातकों को आकर्षित करने वाले इन नए सप्लायर्स का स्कोर बेहद खराब था।

जब इन गुणवत्ता संबंधी अंतरों को सांख्यिकीय मॉडलों में शामिल किया गया, तो कीमतों में दिखने वाला सारा का सारा फायदा हवा हो गया। आईएमएफ के अध्ययन का अनुमान है कि 2025 के टैरिफ के बाद कीमतों में देखी गई तथाकथित गिरावट का लगभग आधा हिस्सा (तकरीबन 50%) असल में कुछ और नहीं, बल्कि उच्च गुणवत्ता से निम्न गुणवत्ता यानी कम-क्वालिटी वाले सप्लायर्स की ओर मजबूरन किया गया झुकाव था।

साल 2024-25 और 2017-19 के टैरिफ एपिसोड के दौरान विभिन्न उत्पादों के भीतर शुल्क दरों में आए उतार-चढ़ाव का विश्लेषण, फोटो साभार: IMF Report

दिलचस्प बात यह है कि इंपोर्ट का यह पैटर्न पहली बार नहीं देखा जा रहा है। आईएमएफ के अर्थशास्त्रियों ने अपने शोध में साल 2018-19 के दौरान हुए प्रसिद्ध अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध (US-China Tariff Tension) के डेटा की भी दोबारा पड़ताल की। उस दौरान भी ट्रंप ने चीन पर भारी टैरिफ लगाए थे। तब भी यह देखा गया था कि चीन के निर्यातकों ने अपनी कीमतें कम नहीं की थीं, बल्कि अमेरिकी खरीदार वियतनाम, ताइवान और अन्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की ओर स्थानांतरित हो गए थे।

साल 2018-19 और 2025 के इन दोनों आर्थिक झटकों की तुलना करने पर यह साफ हो जाता है कि टैरिफ का असर निर्यातकों की जेब पर पड़ने के बजाय हमेशा आयात बास्केट की संरचना को बिगाड़ने में होता है। 2018-19 में जहाँ केवल चीन को निशाना बनाया गया था, इसलिए रीएलोकेशन का दायरा थोड़ा सीमित था, वहीं 2025 के टैरिफ अधिक व्यापक और अनिश्चितता से भरे थे। इसके बावजूद, बुनियादी आर्थिक व्यवहार नहीं बदला, बल्कि दोनों ही बार अमेरिकी आयातकों को अंततः निम्न गुणवत्ता वाले इनपुट और उत्पादों की शरण में जाना पड़ा।

अमेरिका पर ही मंडरा रहा लंबे समय का खतरा

यह स्थिति सिर्फ आम उपभोक्ताओं द्वारा रोजमर्रा के इस्तेमाल में लाए जाने वाले कपड़ों, जूतों या इलेक्ट्रॉनिक्स की घटिया क्वॉलिटी तक सीमित नहीं है। इसका एक अधिक खतरनाक पहलू अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र की उत्पादकता (Productivity) से जुड़ा है। अमेरिका में आयात होने वाले सामान का एक बहुत बड़ा हिस्सा कच्चा माल, मध्यवर्ती वस्तुएँ (Intermediate Goods) और पूँजीगत उपकरण (Capital Goods) होते हैं, जिनका उपयोग अमेरिकी फैक्ट्रियाँ अपने अंतिम उत्पाद बनाने के लिए करती हैं।

जब अमेरिकी फैक्ट्रियाँ टैरिफ के डर से उच्च गुणवत्ता वाले पुराने सप्लायर्स को छोड़कर सस्ते और कम अपील स्कोर वाले नए सप्लायर्स से मशीनरी या पुर्जे आयात करती हैं, तो उनकी खुद की उत्पादन क्षमता और उत्पाद की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। औद्योगिक सर्वेक्षणों के अनुसार, विनिर्माण क्षेत्र के अधिकांश गुणवत्ता प्रबंधकों (Quality Leaders) ने स्वीकार किया है कि टैरिफ और व्यापारिक बाधाओं के कारण उनके लिए अपने अंतिम उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखना बेहद कठिन हो गया है।

उदाहरण के लिए, कपड़ा और परिधान उद्योग में स्थापित सप्लायर्स से हटकर नए देशों में ट्रांसफर की गई सप्लाई चेन के कारण शिपमेंट में डिफेक्ट (खामियों) की दरें तेजी से बढ़ी हैं। इसका सीधा नुकसान अमेरिकी कंपनियों को उठाना पड़ रहा है, क्योंकि उनके उत्पाद वैश्विक बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता खो रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों में संरक्षणवाद की नीतिगत विफलता का सबक

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की इस रिपोर्ट ने साफ कर दिया है कि डोनाल्ड ट्रंप की यह नीति खुद अमेरिका के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसी साबित हुई है। ऐसे में ट्रंप की टैरिफ नीति ‘अँधेरे में तीर चलाने’ जैसी साबित हुई है, जिसका निशाना दुश्मन पर नहीं बल्कि खुद के पैरों पर लगा है। बाहरी देशों को सबक सिखाने के चक्कर में इस नीति ने खुद अमेरिका के बाजार को बिगाड़ दिया है। सस्ते और घटिया सामानों पर निर्भरता भले ही कागजों पर आयात का खर्च थोड़ा कम दिखा दे, लेकिन लंबे समय में यह देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रही है।

आईएमएफ का यह वर्किंग पेपर दुनिया भर के नीति निर्माताओं के लिए एक कड़ा सबक है कि संरक्षणवाद की दीवारें अक्सर बाहर के दुश्मनों को रोकने के बजाय, भीतर की आर्थिक खुशहाली और उत्पाद की गुणवत्ता का दम घोंट देती हैं। ट्रंप के टैरिफ ने अमेरिका को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय, अनजाने में एक ऐसे चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ महँगाई और घटियापन एक साथ उसकी अर्थव्यवस्था का स्वागत कर रहे हैं। यह पूरी दुनिया के लिए सबक है कि संरक्षणवाद (अपने बाजार को बंद करने) की दीवारें अक्सर फायदे के बजाय खुद का ही दम घोंट देती हैं।

वांगचुक OUT, वामपंथी IN… ‘एक्टिविस्ट’ के जाते ही CJP के मंच पर डफली गैंग का कब्जा, जानें- कौन है व्हीलचेयर वाली AISA की नेहा बोरा और उसके साथी

शिक्षा व्यवस्था में सुधारों और परीक्षाओं में गड़बड़ी के खिलाफ शुरू हुआ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का आंदोलन अब एक नया मोड़ ले चुका है। 20 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस द्वारा सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराए जाने के बाद, जंतर-मंतर पर चल रहे इस प्रदर्शन की कमान पूरी तरह से ‘डफलीबाज गैंग’ यानी वामपंथी छात्र संगठनों (AISA और SFI) के हाथों में आती दिख रही है।

एक तरफ जहाँ गैर-राजनीतिक होने का दावा करने वाले इस आंदोलन को फ्रंट से लीड करने के लिए वामपंथी नेता आगे आ गए हैं, वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया और प्रदर्शन स्थल पर इन लीडर्स के ‘फर्जी अनशन’ और ‘पर्दे के पीछे के ड्रामे’ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

सोनम वांगचुक के जाते ही फ्रंट पर आए AISA के चेहरे

अब तक इस आंदोलन को गैर-राजनीतिक बनाए रखने की कोशिश की जा रही थी, लेकिन जैसे ही शनिवार (18 जुलाई 2026) सुबह को सोनम वांगचुक को खराब स्वास्थ्य के कारण दिल्ली हाई कोर्ट के आदेशानुसार सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया, इतने ही पर्दे के पीछे सक्रिय वामपंथी संगठनों ने मंच पर कब्जा जमा लिया।

विशेष रूप से ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) के तीन बड़े चेहरे नेहा बोरा, अमीन अमितोज और मनीष कुमार जो जेएनयू (JNU), आंबेडकर यूनिवर्सिटी दिल्ली (AUD) और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के PhD स्कॉलर्स हैं, अब खुद को आंदोलन का मुख्य चेहरा साबित करने में जुटे हैं।

इनका दावा है कि वे सोनम वांगचुक के साथ ही पिछले 21 दिनों से अनशन पर बैठे हैं। लेकिन प्रदर्शन स्थल पर मौजूद लोग और सोशल मीडिया पर आ रही जानकारियाँ कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहे हैं।

अनशन या महज राजनीतिक प्रोपेगेंडा?

जब से AISA की नेहा बोरा की अनशन पर सवाल उठे हैं और उनके बेनकाब होने की बातें सामने आई हैं, तब से प्रदर्शन स्थल पर एक नया ड्रामा देखने को मिल रहा है। खुद को सचमुच 21 दिनों से भूखा दिखाने के लिए अब वह व्हीलचेयर का सहारा ले रही हैं, ताकि यह प्रदर्शित किया जा सके कि वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हैं।

गंभीर विरोधाभास तब सामने आया जब सरकारी डॉक्टरों की टीम इन AISA सदस्यों का मेडिकल चेक-अप करने पहुँची। 21 दिनों से अनशन का दावा करने वाले इन छात्र नेताओं ने सरकारी डॉक्टरों से इलाज कराने से साफ इनकार कर दिया। इस इनकार ने आंदोलन की साख पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।

रात में मटन बिरयानी और सीख कबाब का गुप्त मेन्यू

प्रदर्शन स्थल के आस-पास से सामने आए वीडियोज के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि इन वामपंथियों का अनशन महज दिन के उजाले और कैमरों के सामने तक ही सीमित है। कई ऐसे वीडियो सामने आए है जिनमें ये तथाकथित अनशनकारी रात के अंधेरे में अपनी अनशन तोड़ते हुए मटन बिरयानी और सीख कबाब का लुत्फ उठाते देखे गए हैं।

यही वजह है कि दिल्ली पुलिस ने इन्हें अस्पताल ले जाने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई, क्योंकि इनका स्वास्थ्य सोनम वांगचुक की तरह वास्तव में गंभीर नहीं था। यहाँ तक कि खुद को आंदोलन का कर्ता-धर्ता बताने वाले इन लीडर्स को लेकर प्रदर्शनकारियों के बीच ही फूट पड़ गई है।

अनशन पर बैठे 3 AISA लीडर्स: कौन हैं ये चेहरे और क्या हैं इनके दावे?

सोनम वांगचुक के हटने के बाद, आंदोलन के केंद्र में आए वामपंथी छात्र संगठन AISA के तीनों मुख्य लीडर्स देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़े छात्र हैं, जो पिछले 21 दिनों से इस अनशन का मुख्य चेहरा होने का दावा कर रहे हैं।

नेहा बोरा जेएनयू से PhD की छात्रा है और AISA की एक सक्रिय सदस्य है। आंदोलन के शुरुआती दिनों से ही वह मंच के आस-पास सक्रिय थी। हाल ही में सोशल मीडिया पर उनके फर्जी अनशन के खुलासे के बाद वे भारी विवादों में घिर गई हैं।

आलोचकों का दावा है कि अपनी अनशन को सच साबित करने और सहानुभूति बँटोरने के लिए वे अब व्हीलचेयर का इस्तेमाल कर रही हैं, जबकि डॉक्टरों की जाँच से वे लगातार बच रही हैं।

अंबेडकर यूनिवर्सिटी का PhD स्कॉलर अमीन अमितोज भी नेहा के साथ 21 दिनों से अनशन पर बैठने का दावा कर रहा है। प्रदर्शन स्थल पर मौजूद वॉलंटियर डॉक्टरों के मुताबिक, लंबे समय तक भूखे रहने के दावों के बीच अमीन के मसूड़ों से खून आने की शिकायत सामने आई है, जिसे डॉक्टर विटामिन-C और प्रोटीन की भारी कमी या लीवर को हो रहे नुकसान का संकेत मान रहे हैं। हालाँकि सरकारी मेडिकल टीम के सामने इसने भी स्वास्थ्य परीक्षण कराने से इनकार कर दिया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ताल्लुक रखने वाला PhD स्कॉलर मनीष कुमार इस तिकड़ी का तीसरा सदस्य है। दिल्ली पुलिस की कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए मनीष ने कहा था, “जब पुलिस ने सोनम वांगचुक को उठाया, तो उन्होंने हमें भी पकड़ने की कोशिश की, लेकिन भीड़ ने हमें घेर लिया।” मनीष की स्थिति भी अमीन की तरह ही बताई जा रही है, जहाँ शरीर में पोषक तत्वों की भारी कमी के लक्षण दिख रहे हैं।

हालाँकि एक तरफ प्राइवेट डॉक्टरों द्वारा इन्हें गंभीर रूप से बीमार बताया जाना और दूसरी तरफ सरकारी डॉक्टरों को चेक-अप न करने देना, रात में बिरयानी और कबाब खाकर अनशन तोड़ने के वीडियो सामने आने की बातें, इन तीनों लीडर्स को संदेह के घेरे में खड़ा करती हैं।

क्या था असली आंदोलन और कैसे बदला इसका स्वरूप?

दरअसल यह पूरा आंदोलन मई के महीने में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम से एक ऑनलाइन व्यंग्यात्मक मुहिम के रूप में शुरू हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य देश की शीर्ष प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे NEET में हुए पेपर लीक और प्रशासनिक अनियमितताओं का विरोध करना था।

सोशल मीडिया पर युवाओं और छात्रों के थोड़े से समर्थन के बाद यह आंदोलन जंतर-मंतर पर जमीनी धरने में बदल गया, जहाँ प्रदर्शनकारी खुद को ‘कॉकरोच’ कहकर संबोधित करते हैं।

इनकी मुख्य माँग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा है। शिक्षा मंत्री ने इस आंदोलन को पहले ही माहौल खराब करने वाला करार देकर खारिज कर दिया था। आंदोलन को तब बड़ी ताकत मिली जब सोनम वांगचुक इसमें शामिल हुए और सिर्फ नमक-पानी पर रहकर 20 दिनों तक उपवास किया, जिसके कारण उनका वजन 9 किलोग्राम से अधिक घट गया।

दिल्ली पुलिस की कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

शनिवार (18 जुलाई 2026) की सुबह करीब 07:30 बजे भारी पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने जंतर-मंतर पर पहुँचकर सोनम वांगचुक को चादरों के घेरे में लिया और एम्बुलेंस के जरिए सफदरजंग अस्पताल पहुँचाया। अस्पताल की मेडिकल सुपरिटेंडेंट डॉ चारू बांबा के अनुसार, वांगचुक स्थिर और सचेत हैं, हालाँकि लंबे अनशन के कारण उन्हें कमजोरी और डिहाइड्रेशन है।

पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश के तहत की गई है जिसमें सरकार को नियमित रूप से वांगचुक के स्वास्थ्य की निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर तुरंत इलाज मुहैया कराने का निर्देश दिया गया था।

सोनम वांगचुक की अनुपस्थिति में अब CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि 20 जुलाई 2026 को संसद मार्च हर हाल में आयोजित किया जाएगा। वांगचुक के हटाए जाने के बाद अब CJP ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की माँग शुरू कर दी है।

हालाँकि AISA और वामपंथियों द्वारा आंदोलन को हाई जैक करने और सुबह अनशन का दिखावा कर रात में बिरयानी खाने जैसी चर्चाओं ने इस पूरे मोर्चे की साख को भारी नुकसान पहुँचाया है।

मॉनसून सत्र से ठीक पहले कॉन्ग्रेस का नया दाँव, राहुल गाँधी-खरगे ने PM मोदी को लिखा ‘चंदा चोरी’ पर पत्र: छात्रों का मुद्दा नहीं चला तो अब राम मंदिर पर करेंगे राजनीति?

पेपर लीक मामले में छात्रों के नाम पर महीनों तक सियासत चमकाने और अंततः वहाँ पूरी तरह फेल रहने के बाद कॉन्ग्रेस ने अब संसद के मॉनसून सत्र से पहले अपनी राजनीति को जीवित रखने के लिए एक नया तमाशा खड़ा करने की कोशिश शुरू कर दी है। अयोध्या के राम मंदिर चंदा चोरी केस को लेकर अब कॉन्ग्रेस की नींद टूटी है, जब उस मामले पर जाँच अपने अंतिम दौर में पहुँच चुकी है।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप की माँग की है। ध्यान देने वाली बात है कि इन्होंने मॉनसून सत्र से ठीक पहले ये चिट्ठी लिखी है, ताकि इस सत्र में भी देश के बाकी मुद्दों को साइड कर इस संवेदनशील मुद्दे पर हंगामा खड़ा कर सकें।

राजनीतिक लाभ के लिए करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर चोट

यह कोई पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस ने राम मंदिर से जुड़े मुद्दों पर राजनीति करने का प्रयास किया हो, लेकिन इस बार उसने सीधे तौर पर करोड़ों राम भक्तों की श्रद्धा को अपने सियासी एजेंडे का मोहरा बना लिया है। पीएम मोदी को लिखे गए पत्र में राहुल गाँधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा, “आप राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में हजारों करोड़ रुपए की चोरी से वाकिफ हैं। जिन लाखों श्रद्धालुओं ने अपनी गाढ़ी कमाई, श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के साथ दान की थी, वो इस चोरी से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।”

पेपर लीक मामले में सरकार को घेरने में नाकाम रहने के बाद जनता का ध्यान भटकाने और देश का सियासी पारा गरमाने के लिए कॉन्ग्रेस ने जानबूझकर इस संवेदनशील विषय को चुना है। चिट्ठी के जरिए कॉन्ग्रेस ने न केवल सरकार पर हमला बोला है बल्कि हमेशा की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और विश्व हिंदू परिषद (VHP) को भी लपेटे में ले लिया है।

पत्र में विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी से कहा कि उन्होंने खुद सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर संसद में इस ट्रस्ट के गठन की घोषणा की थी लेकिन इसके सदस्यों की नियुक्ति में पक्षपात किया गया। राहुल और खरगे ने पत्र में साफ तौर पर लिखा है, “ये सार्वजनिक रूप से सभी को पता है कि ट्रस्ट के सदस्य RSS, VHP और उनसे जुड़े संगठनों से जुड़े हैं। इसके कलंकित पूर्व महासचिव भी आपके करीबी सहयोगी रहे हैं।”

इस तरह के बयानों से यह साफ झलकता है कि कॉन्ग्रेस का वास्तविक मकसद किसी जाँच से ज्यादा वैचारिक रूप से जुड़े संगठनों की छवि को धूमिल करना है।

क्या है कॉन्ग्रेस की बेवजह की 3 मुख्य माँगे? सीएम योगी पहले गठित कर चुके हैं SIT

अपनी राजनीति को धार देने के लिए कॉन्ग्रेस ने इस मामले में तीन बड़ी माँगें सामने रखी हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी ‘चुप्पी’ तोड़ने को कहा है। पत्र में लिखा गया है, “इतने बड़े अपराध के सामने आपकी मौजूदा चुप्पी बर्दाश्त से बाहर है। जवाबदेही और नुकसान की भरपाई तय करना आपका फर्ज है।”

इसके साथ ही दोनों नेताओं ने सीधे तौर पर माँग उठाई है कि वे तुरंत ट्रस्ट के वित्तीय मामलों की स्वतंत्र और व्यापक जाँच का आदेश दें जिसमें नकद, सोना और चाँदी सहित सभी चढ़ावों का प्रबंधन भी शामिल होना चाहिए। इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस नेताओं ने कहा है कि इस जाँच के नतीजे और ट्रस्ट के खाते पूरी तरह सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

ऐसा इसलिए ताकि हर श्रद्धालु को यह पता चल सके कि उनके चढ़ावे का इस्तेमाल कैसे किया गया है और इस पूरे मामले में जो भी लोग जिम्मेदार पाए जाएँ, उनके पद या प्रभाव की परवाह किए बिना उन्हें सख्त रूप से जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। बता दें कि मामला संज्ञान में आने के बाद यूपी की योगी सरकार ने 13 जून 2026 को ही SIT का गठन किया था।

इस टीम की अध्यक्षता लखनऊ मंडल के आयुक्त विजय विश्वास पंत (IAS) को दी गई थी। उनके साथ पुलिस स्तर पर जाँच की जिम्मेदारी आईजी रेंज किरन एस (IPS) को सौंपी गई थी, जो मामले के आपराधिक पहलू और सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों की भी जाँच कर रहे थे।

वहीं, वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन को दान राशि, ऑडिट और सभी वित्तीय प्रक्रियाओं की तकनीकी जाँच की जिम्मेदारी दी गई थी। 

आपकी सरकार की विश्वसनीयता अब आपकी कार्रवाई पर निर्भर: राहुल गाँधी

प्रधानमंत्री को आधिकारिक पत्र भेजने के साथ ही राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी इस मुद्दे को लेकर एक पोस्ट लिखी। उन्होंने लिखा, “प्रधानमंत्री जी, श्री राम मंदिर में करोड़ों श्रद्धालुओं ने आस्था के साथ अपनी कमाई अर्पित की – वहाँ हुई चंदा चोरी अब किसी से छुपी नहीं है। ट्रस्ट के हर सदस्य को आपकी सरकार ने चुना था।”

उन्होंने लिखा, “इस चंदा चोरी पर आपकी चुप्पी अस्वीकार्य है। तत्काल स्वतंत्र जाँच कराइए, पूरा हिसाब सार्वजनिक कीजिए और दोषियों को कानून के कटघरे में लाइए। आपकी सरकार की विश्वसनीयता अब आपकी कार्रवाई पर निर्भर है।”

हालाँकि कॉन्ग्रेस इस मामले में जिस प्रकार का तमाशा खड़ा करने की कोशिश कर रही है, उसकी हवा पहले ही निकल चुकी है क्योंकि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इस अनियमितता की भनक लगते ही बेहद मुस्तैदी दिखाई थी। यूपी सरकार ने पिछले महीने 13 जून को ही इस पूरे मामले की निष्पक्ष जाँच के लिए SIT का गठन कर दिया था।

सोशल मीडिया पर उड़ीं अफवाहों का सच आ चुका है सामने

अपनी जाँच के दौरान SIT ने सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों पर चल रही उन खबरों का भी बारीकी से संज्ञान लिया था, जिनमें करोड़ों के चढ़ावे और बहुमूल्य वस्तुओं के गायब होने के आरोप सीधे ट्रस्ट पर लग रहे थे। इसमें मुख्य रूप से तीन बड़ी खबरें थीं।

पहली खबर इंडियन बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के उत्तर भारत के प्रमुख अनुराग रस्तोगी और सराफा एसोसिएशन द्वारा 38kg और 22 Kg से ज्यादा की चाँदी की ईंटें दान करने और उनके गायब होने से जुड़ी थी। दूसरी खबर विश्व सिंधी सेवा समाज के अध्यक्ष राजू मंडवानी द्वारा बिना रसीद के 200Kg चाँदी की ईंटें भेंट करने के दावे की थी।

तीसरी खबर मुंबई के व्यवसायी अनिल विश्वकर्मा के चाँदी के हार और चरण पादुकाओं को लेकर थी। ऑपइंडिया के पास मौजूद SIT रिपोर्ट के अनुसार, जब ट्रस्ट के बही-खातों और रिकॉर्ड का मिलान किया तो पाया कि सराफा संगठनों की चाँदी को तय प्रक्रिया के तहत गलाकर बैंक लॉकर में सुरक्षित रखा गया है।

वहीं सिंधी समाज और मुंबई के व्यवसायी का सारा सामान भी ट्रस्ट की सुरक्षित अभिरक्षा में मिला। इस तरह सोशल मीडिया के ट्रस्ट पर लगाए आरोप पूरी तरह झूठे साबित हुए, लेकिन SIT ने यह जरूर कहा कि भविष्य में ऐसी अफवाहों से बचने के लिए प्रबंधन व्यवस्था को और मजबूत तथा जवाबदेह बनाने की सख्त जरूरत है।

ऐसे में जब राज्य सरकार पहले ही कड़े कदम उठा चुकी है, तब कॉन्ग्रेस द्वारा पीएम मोदी की सीधी दखल की माँग करना और पत्र का आखिरी हिस्सा, “आपकी सरकार और ट्रस्ट की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि आप कितनी पारदर्शिता और तेजी से काम करते हैं” लिखना केवल अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने का जरिया मात्र दिखाई देता है।

एक्सपोज हुए कॉकरोच तो ‘आंदोलनजीवी’ रचने लगे ‘पंचशील’ का प्रपंच, जानिए- ‘जय भीम’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नाम पर कैसे हिंदुओं को किया जाता है गुमराह

जब साल 1954 में जवाहरलाल नेहरू ने भारत और चीन के बीच तिब्बत मामले को लेकर ‘पंचशील’ का सिद्धांत दुनिया के सामने रखा था, ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के नारों के बीच उस पंचशील का जो हश्र हुआ, वो आज पूरा देश जानता है- पीठ में छुरा घोंपा गया और नतीजा 1962 की शर्मनाक हार के रूप में सामने आया।

आज ‘पंचशील’ नाम का वही जहर जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शनों के बीच से निकलकर आया है। इसे जारी करने वाले हैं जाने-माने ‘आंदोलनजीवी’ योगेंद्र यादव, जो सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बाद से कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के मंच पर बैठने लगे हैं और इस पूरे प्रदर्शन को डायरेक्शन देने में जुट गए हैं।

CJP के मंच से योगेंद्र यादव के इस नए ‘पंचशील’ को देखें तो इसमें बड़ी-बड़ी बातें की गई हैं, जैसे मार्च में सिर्फ तिरंगा झंडा रखना, हाथ में संविधान या गाँधी-अंबेडकर-भगत सिंह की फोटो होना, जुबान पर ‘भारत माता की जय’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसे नारे होना, अनुशासन बनाए रखना और किसी भी हाल में हाथ न उठाना।

इनमें कुछ बातें स्वाभाविक हैं, जो शायद हर देशभक्त जानता है लेकिन पता नहीं योगेंद्र यादव को बताने की क्या जरूरत आन पड़ी? यह तो उनका पास्ट रिकॉर्ड ऐसा रहा है, जो उनको लोगों का भरोसा जीतने के लिए ‘जय हिंद’ बोलने की जरूरत पड़ रही है। क्योंकि हम सब जानते हैं कि योगेंद्र यादव को आंदोलन की कितनी भूख है, और अचानक से उनका इस प्रदर्शन की प्लानिंग में लगना हमें दिल्ली में CAA विरोधी प्रदर्शनों में उनकी वह तस्वीर याद दिलाता है, जिसमें वह शरजील इमाम, उमर खालिद के साथ बैठकें कर रहे थे और नतीजतन दंगे-फसाद भड़काने में आज वही लोग जेल में बंद हैं।

जब एजेंडा हुआ एक्सपोज, तो शुरू हुआ डैमेज कंट्रोल का स्वाँग

खैर, पिछले करीब एक महीने से NEET पेपर लीक के विरोध में जंतर-मंतर पर CJP के प्रदर्शन में भी कुछ ऐसी तस्वीरें नहीं आई हैं, जिन पर भरोसा किया जा सके। चाहे वह माता सीता का अपमान करते हिंदू विरोध का एजेंडा हो, ब्राह्मणवाद का विरोध हो और वहीं दूसरी ओर अल्लाह का नाम हो, स्वरा भास्कर जैसे पुराने चेहरे हों, या हो AISA-SFI जैसे वही लेफ्ट संगठनों से जुड़ा एजेंडा। यही नहीं, चाहे 18 जुलाई 2026 को अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को अस्पताल में शिफ्ट करने का विरोध करते हुए हिंसा का रवैया हो, इसमें ऑपइंडिया के पत्रकार को भी निशाना बनाया गया जब वह शांतिपूर्ण तरीके से सवाल पूछ रहे थे।

जब प्रदर्शन का यह चाल-चरित्र सोशल मीडिया औऱ मीडिया के जरिए देश के सामने आया, तो आम जनता ने इस प्रदर्शन से दूरी बना ली। भीड़ जुटनी बंद हो गई और हर तरफ सिर्फ बदनामी होने लगी। अभिजीत दिपके पर स्याही फेंकना भी इसी बदनामी का नतीजा था। और जब योगेंद्र यादव जैसे ‘प्रदर्शन के रणनीतिकारों’ ने देखा कि उनका एजेंडा और प्रोपेगेंडा पूरी तरह एक्सपोज होने लगा है, तो उन्हें अपनी डूबती नैया को बचाने के लिए ‘डैमेज कंट्रोल’ की याद आई।

आसान शब्दों में समझें तो यह पंचशील कोई मन का बदलाव या अचानक जागी देशभक्ति नहीं है। ‘भारत माता की जय’ और ‘तिरंगे’ का सहारा ये लोग अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि अपनी साख बचाने की मजबूरी में ले रहे हैं ताकि बहुसंख्यक समाज के गुस्से को शांत किया जा सके।

दरअसल, CJP ने 20 जुलाई 2026 को जंतर-मंतर से संसद की ओर मार्च करने का ऐलान किया है, यही दिन संसद के मॉनसून सत्र का पहला दिन भी है। इसी प्रदर्शन में भीड़ जुटाने के लिए संविधान और गाँधी की बात हो रही है। क्योंकि इस मार्च के लिए अपनी असलियत जानते हुए अभिजीत दिपके और उसकी गैंग के लिए भीड़ जुटाना मुश्किल होता जा रहा है। इसीलिए योगेंद्र यादव ने पुरानी गलतियों से सीख लेकर काफी सॉफ्ट ढंग से ‘देशभक्ति’ की बात कर दी है। बाकी डैमेज कंट्रोल का हिस्सा, सोनम वांगचुक के बाद खुद को ‘हीरो’ बतलाने वाले अभिजीत का ‘रोना’ तो हम सबने देखा ही।

‘जय भीम’ और ‘इंकलाब’ के नारों के पीछे का असली सच

इस नए पंचशील में जिन दो प्रमुख नारों को बहुत चालाकी से शामिल किया गया है- ‘जय भीम’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’, उसके बारे में आम जनता को जानना भी जरूरी है। क्योंकि ये नारे एक बहुत बड़े छद्म को छुपाने का जरिया बन रहे हैं।

जय भीम, भाईचारे के नाम पर हिंदुओं को ‘चारा’ बनाने का खेल

सीजेपी के प्रदर्शन में ‘जय भीम’ के नारे का इस्तेमाल दलित-मुस्लिम एकता (जिसे ‘जय भीम जय मीम’ का नारा भी कहा जाता है) के नैरेटिव को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है। लेकिन इतिहास के पन्ने पलटें तो यह प्रयोग कोई नया नहीं है। देश के विभाजन के समय जोगेंद्र नाथ मंडल इस भ्रामक भाइचारे के सबसे बड़े पैरोकार थे।

उन्होंने अनुसूचित जातियों को भरोसा दिलाया था कि मुस्लिम लीग के साथ उनका भविष्य पाकिस्तान में सुरक्षित रहेगा और जिन्ना ने उन्हें वहाँ का पहला श्रम मंत्री भी बनाया। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। लेकिन इसका हश्र क्या हुआ? पाकिस्तान में हिन्दुओं को कुचलना कभी रुका ही नहीं। बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना जोगेंद्र नाथ मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार-बार इन पर कार्रवाई के लिए चिट्ठियाँ लिखते रहे।

इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी। हिन्दुओं की हत्याएँ होती रहीं। जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रहीं। कुछ समय तो जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है। जिन्ना की मौत होते ही 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आए।

इस नेता का नाम किसी इतिहास की किताब में शामिल नहीं किया गया। बस समस्या है कि ना आपने खुद पढ़ने की कोशिश की और दल हित चिन्तक तो आपको सिर्फ एक वोट बनाना चाहते हैं! तो वो क्यों पढ़ने देते भला? अब भी यही हो रहा है। जागिए! इससे पहले देर हो जाए।

इंकलाब जिंदाबाद: भगत सिंह के नाम पर खिलाफत के इतिहास को छुपाना

आम जनमानस में आज भी यह एक गहरा भ्रम फैला हुआ है कि ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा मूल रूप से बलिदानी भगत सिंह ने ही दिया था। जबकि इतिहास के पन्ने खंगालें तो पता लगता है कि यह नारा 1921 में इस्लामी कट्टरपंथी और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार मौलाना हसरत मोहानी द्वारा गढ़ा गया था।

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जब 1929 में असेंबली में बम फेंका, तब उन्होंने इस नारे को बुलंद किया, जिससे यह देश के कोने-कोने में फैल गया। लेकिन, इस नारे की उत्पत्ति का मूल संबंध भारत की आजादी से नहीं, बल्कि खिलाफत आंदोलन और ‘उम्माह’ (वैश्विक इस्लामी सत्ता) की भावना से जुड़ा हुआ था। बता दें कि खिलाफत आंदोलन तुर्की के खलीफा की सत्ता को बहाल करने के लिए चलाया गया था, जिसका नेतृत्व मोहम्मद अली जौहर (जामिया मिली इस्लामिया के संस्थापकों में से एक) ने किया था।

और इस आंदोलन को महात्मा गाँधी ने भी अंध समर्थन किया था, जिसका खामियाजा खामियाजा भी कोहाट दंगों और मोपला नरसंहार के रूप में ‘हिंदुओं’ को ही भुगतना पड़ा था।

जब आज CJP जैसे प्रदर्शनों में इस नारे को गाँधी, अंबेडकर और भगत सिंह की तस्वीरों के साथ मिलाकर लगाया जाता है, तो यह केवल एक बौद्धिक छलावा होता है। इसका उद्देश्य वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा के मूल एजेंडे को देशभक्ति के रंग में रंगकर प्रस्तुत करना है।

निष्कर्ष: पंचशील सिर्फ दोगलेपन और पाखंड की पराकाष्ठा

योगेंद्र यादव का ‘पंचशील’, दरअसल उस दोगलेपन की पराकाष्ठा है, जहाँ मन में हिंसा और समाज को तोड़ने की प्लानिंग होती है, लेकिन मंच से शांति, संविधान और अनुशासन की दुहाई दी जाती है। अगर मन में वास्तव में अहिंसा का संकल्प होता, तो ऑपइंडिया के पत्रकार पर हमला करने वाले तत्वों को उसी समय मंच से बहिष्कार किया गया होता। अगर वास्तव में ‘भारत माता की जय’ पर अटूट विश्वास होता, तो इस मारने को लगाने के लिए किसी गाइडलाइन या ‘पंचशील’ नाम देने की जरूरत नहीं पड़ती।

नेहरू के पंचशील ने देश को एक बार धोखा दिया था, लेकिन देश की जनता अब इन नए ‘आंदोलनजीवियों’ और उनकी क्रोनोलॉजी को अच्छी तरह समझ चुकी है। 2020 के दिल्ली दंगों के जख्म अभी भरे नहीं हैं और यही कारण है कि जंतर-मंतर से लेकर संसद मार्च तक के इस नए ड्रामे को लेकर समाज में कोई सहानुभूति नहीं है। यह आंदोलन अपने ही अंतर्विरोधों, वैचारिक पाखंड और हिंसक प्रवृत्तियों के कारण जनता की नजरों में पूरी तरह गिर चुका है। अब तिरंगे और महापुरुषों की आड़ लेकर चाहे जितना भी डैमेज कंट्रोल कर लिया जाए, इस आंदोलन का असली सच देश के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।