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मानसिक तनाव से लेकर कम नंबर आने तक: आत्महत्या करने वाले उन छात्रों की कहानियाँ, जिनकी तस्वीरें दिखा राहुल गाँधी ने NEET पेपर लीक पर की राजनीति

उत्तराखंड के देहरादून में शुक्रवार (17 जुलाई 2026) को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने पेपर लीक पर भ्रम फैलाकर वोट बैंक को साधने की भरपूर कोशिश की। राहुल गाँधी के ‘छात्रों की गूँज’ को एक संवेदनशील राजनीतिक कार्यक्रम की जगह एक इवेंट की तरह से ऑर्गेनाइज किया गया था। कॉन्ग्रेस की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाइए कि जिस स्थल पर कार्यक्रम से ठीक पहले पार्टी के एक कार्यकर्ता की जान चली गई हो वहाँ पर हो रहे कार्यक्रम में रैपर गा रहे थे और कार्यकर्ता डाँस कर रहे थे।

हम सब यह मानते हैं कि आत्महत्या जैसे संवेदनशील विषय का इस्तेमाल राजनीतिक हितों को साधने के लिए नहीं होना चाहिए। ऐसे में जब छात्रों की आत्महत्याओं को एक चुनावी मुद्दे की तरह उठाया जाता है और उसके बहाने लोगों को बरगलाने की कोशिश की जाती है तो सवाल तो उठते ही हैं।

राहुल गाँधी जब मंच से ‘NEET पेपर लीक सिंड्रोम’ की वजह से छात्रों की आत्महत्या की बात कर रहे थे तो उनकी प्रेजेंटेशन में ऐसे 25 छात्र/छात्राओं का जिक्र था जिन्होंने पिछले कुछ समय में आत्महत्या कर ली थी। राहुल गाँधी ने दावा किया इन छात्रों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया गया। यानी यह संदेश देने की साफ कोशिश की गई कि पेपर लीक के तनाव की वजह से छात्रों ने आत्महत्या की है।

राहुल गाँधी के कार्यक्रम की प्रेजेंटेशन (साभार: YouTube/INC India)

राहुल गाँधी ने जिन छात्रों की तस्वीरें अपनी प्रेजेंटेशन में दिखाई वो NEET के अभ्यर्थी थे इसमें कोई दो मत नहीं है लेकिन क्या उन्होंने केवल NEET पेपर लीक के चलते ही अपनी जान दे दी, जैसे कि राहुल गाँधी और विपक्ष के द्वारा माहौल बनाए जाने की कोशिश हो रही है। ये इन छात्रों में से ही कुछ के उदाहरण द्वारा समझने की कोशिश करते हैं।

राहुल गाँधी की इस प्रेजेंटेशन में तीसरा नाम रितिक मिश्रा का है। लखीमपुर खीरी के 22 साल के NEET अभ्यर्थी रितिक मिश्रा ने 14 मई 2026 को आत्महत्या कर ली थी। राहुल गाँधी ने तब भी इसे हत्या बताया था। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि पुलिस जाँच में सामने आया कि जान देने से पहले छात्र ने 2 मोबाइल नंबरों पर लंबी बात की थी और इसमें परीक्षा के तनाव जैसी कोई बात सामने नहीं आई थी। एसडीएम अश्विनी सिंह और सिटी मजिस्ट्रेट विवेक तिवारी ने लोगों से यह अपील तक कर दी थी कि इसे लेकर भ्रामक खबर ना फैलाई जाए।

आत्महत्या जाहिर तौर पर दुखद है और किसी के चले जाने से बड़ा दुख शायद की कोई दूसरा होता हो लेकिन जब राजनीतिक मंचों पर इस तरह तस्वीरें लगाकर उसका राजनीतिक इस्तेमाल किया जाता है तो फिर यह देखना भी हमारी ही जिम्मेदारी बनती है कि क्या इन आत्महत्याओं की आड़ में कोई अपने लिए राजनीतिक मंच तो नहीं तैयार कर रहा है। इस लिस्ट में रितिक मिश्रा का नाम ऐसा इकलौता नाम नहीं है।

राहुल गाँधी की लिस्ट में कर्नाटक की भाग्यश्री का भी नाम था। NEET परीक्षा देने वाली भाग्यश्री कुछ दिनों बाद ही फंदे से लटकी मिली था। खबर यही चली की NEET पेपर लीक के तनाव के चलते आत्महत्या कर ली है लेकिन यह खबर अधूरी थी। दरअसल, भाग्यश्री ने अपने परिवार से झूठ बोला था कि उसके 12वीं कक्षा में 92% नंबर आए थे।

असल में भाग्यश्री 12वीं क्लास में वो फेल हो गई थी। फिजिक्स में भाग्यश्री को 45 मार्क्स मिले थे जिसमें 30 इंटरनल मार्क्स थे। मैथ्स में उसे कुल 24 मार्क्स मिले थे जिसमें 20 इंटरनल मार्क्स थे। पुलिस को इस मामले में कोई सुसाइड नोट तक नहीं मिला था। अब भाग्यश्री के नाम का इस्तेमाल पेपर लीक से जोड़कर हो रहा है।

राहुल गाँधी के मंच पर एक तस्वीर तमिलनाडु की 19 वर्षीय छात्रा आर रोशनी की थी। रोशनी NEET की तैयारी कर रही थी और री एग्जाम के ठीक पहले उसने आत्महत्या कर ली। New Indian Express की रिपोर्ट में बताया गया है। NEET के दबाव में आत्महत्या किए जाने की खबरों पर पुलिस ने कहा, “हम अभी यह कन्फर्म नहीं कर सकते कि उसकी मौत एग्जाम के प्रेशर की वजह से हुई या नहीं। यह सच है कि उसे धर्मपुरी के एक सेंटर पर NEET की परीक्षा देनी थी। हम जांच कर रहे हैं।”

ऐसी ही कहानी काहन पटेल की भी है। राहुल गाँधी के मंच पर लगी तस्वीरों में एक नाम काहन का भी था। काहन NEET की तैयारी कर रेह थे और इन 17 साल के युवक ने गुजरात के अहमदाबाद में एक रेजिडेंशियल अपार्टमेंट की छठी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। घटनास्थल पर कोई सुसाइड नोट नहीं मिला और आज तक पुलिस नहीं पता कर पाई है कि उसकी मौत क्यों हुई। ऑपइंडिया ने जब साबरमती पुलिस स्टेशन से इस मामले की जानकारी चाही तो पुलिस आज भी जाँच कर रही है कि काहन ने जान क्यों दी।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में 22 साल के छात्र जतिन कुमार ने 18 जून 2026 की रात आत्महत्या कर ली थी। जतिन ने NEET का एग्जाम दिया था और यह उसकी पाँचवी कोशिश थी। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, छात्र के मोबाइल फोन से करीब एक मिनट का एक वीडियो मिला। इस वीडियो में जतिन ने कहा कि वह यह कदम किसी के दबाव में नहीं उठा रहा है बल्कि अपनी मर्जी से ऐसा कर रहा है। वीडियो में जतिन ने यह भी कहा कि उसका सभी चीजों से मोह खत्म हो गया है। जाहिर है कि वो केवल NEET की तैयारी कर रहा था और इसके कारण उसका नाम भी इस राजनीति में घसीट लिया गया।

तमिलनाडु की गोपिका और हैदराबाद की शेख सना की बात करें तो उन्होंने भी पिछले दिनों आत्महत्या कर ली है। दोनों NEET की अभ्यर्थी थीं लेकिन लंबे वक्त से तनाव से गुजर रही थीं और इसी तनाव को वे सहन नहीं कर पाईं। शेख सना को लेकर इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट बताती है, “पुलिस को शक है कि पढ़ाई का दबाव, परिवार की उम्मीदें और पिछली नाकामियों की वजह से हुई बेचैनी उसके तनाव का कारण हो सकती हैं।” वहीं, गोपिका को लेकर एक New Indian Express की रिपोर्ट कहती है, “गोपिका ने पहले अपने पिता को बताया था कि परीक्षा की तैयारी में बढ़ती कठिनाई के कारण वह काफी तनाव में थी।”

तमिलनाडु के कृष्णागिरी में 20 जून 2026 को NEET के री-एग्जाम से एक दिन पहले 20 वर्ष के वेत्रियानंथम ने अपनी जान दे दी। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि वेत्रियानंथम लगातार तीन साल से NEET परीक्षा की तैयारी कर रहा था। पिछली कोशिशों में मिली नाकामियों की वजह से वह भारी दबाव में था और उसे डर था कि आज होने वाली परीक्षा में भी वह फेल हो जाएगा।

उसके पास से पुलिस को एक सुसाइड नोट भी मिला। उसमें लिखा था, “NEET परीक्षा के डर से मैं पिछले एक महीने से ठीक से सो नहीं पाया हूँ। इस डर से कि मैं इस बार भी फेल हो जाऊँगा, मैं यह बड़ा कदम उठा रहा हूँ। अम्मा, अप्पा, अन्ना… मुझे माफ कर देना।”

राहुल की लिस्ट में एक नाम गोवा के छात्र सिद्धार्थ हेगड़े का भी था। 17 साल के सिद्धार्थ ने आत्महत्या कर ली थी और उसके पास से एक सुसाइड नोट भी मिला था। वन इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है, “वह पिछले दो साल से लगातार पढ़ाई और भविष्य को लेकर तनाव में था।”

इस रिपोर्ट में आगे लिखा गया है, “छात्र ने नोट में लिखा कि वह पिछले दो साल से पढ़ाई के दबाव से जूझ रहा था। उसने यह भी बताया कि पढ़ाई और हॉकी के बीच संतुलन बनाना उसके लिए मुश्किल होता जा रहा था। सिद्धार्थ हॉकी को गंभीरता से खेलता था और साथ ही मेडिकल परीक्षा की तैयारी भी कर रहा था। नोट में उसने कथित तौर पर यह भी लिखा कि अब वह किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में शामिल नहीं होना चाहता।”

राहुल गाँधी की प्रेजेंटेशन में आखिरी नाम दान्विता का था। हरियाणा के फरीदाबाद में 18 साल की NEET कैंडिडेट दान्विता ने गुरुवार (16 जुलाई 2026) को रेजिडेंशियल सोसाइटी की 16वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली है। मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि दान्विता ने NTA द्वारा जारी की गई आंसर-की से अपने संभावित स्कोर का पता लगाया था। पुलिस के मुताबिक, जब दानविता ने आंसर-की से अपने संभावित स्कोर का पता लगाया तो वह परेशान हो गई क्योंकि उसे जो स्कोर मिला वह उसकी उम्मीदों से कम था।

पेपर लीक का समाधान राजनीतिक नहीं हो सकता

जब हम एक समाज के तौर पर, व्यवस्था के तौर पर पिछड़ जाते हैं तो छात्र की आत्महत्या जैसे केस सामने आते हैं। जब कोई युवा अपने सपनों, संघर्षों और उम्मीदों के बीच हार मान लेता है तो यह हम सभी के लिए आत्ममंथन का विषय होता है।

यह भी सच है कि परीक्षाओं में पेपर लीक के मामलों ने लाखों युवाओं के तनाव को बढ़ाया होगा। पेपर लीक जैसी घटनाएँ छात्रों के मानसिक दबाव को बढ़ाती हैं और इस समस्या को हल्के में नहीं लिया जा सकता। लेकिन एक दूसरा पक्ष भी उतना ही गंभीर है। इसे राजनीतिक तौर पर इस्तेमाल करना किसी भी तरह से उचित नहीं है।

इसका इस्तेमाल केवल सरकार को घेरने या राजनीतिक लाभ लेने के लिए किया जाए तो इससे वास्तविक समस्या का समाधान नहीं निकलता है। इससे समाज में भावनाएँ तो भड़क सकती हैं लेकिन व्यवस्था में सुधार नहीं आ पाता है, जो सबसे अधिक जरूरी है। हो सकता है कि इस मुद्दे के जरिए राहुल गाँधी जनता की भावनाओं को ही भड़काने की कोशिश कर रहे हों।

पेपर लीक कोई नई समस्या नहीं है और न ही यह किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित रही है। विभिन्न राज्यों में अलग-अलग सरकारों के दौरान ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। राजस्थान में अशोक गहलोत के कार्यकाल में कॉन्ग्रेस की सरकार भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक के लिए किस कदर बदनाम थी यह किसी से छिपा नहीं है। अन्य राज्यों में भी चाहे BJP की सरकार हो, कॉन्ग्रेस की हो या अन्य दलों की भी हों, पेपर लीक के मामले सामने आते ही रहे हैं।

पेपर लीक की समस्या का समाधान निकालना ही होगा लेकिन उसका समाधान राजनीति नहीं हो सकता। यह समस्या किसी एक सरकार या किसी एक दल की नहीं है, इसलिए इसका हल भी आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकलेगा। हर बार कोई घटना होने पर सिर्फ राजनीतिक बयान देने से छात्रों का भविष्य सुरक्षित नहीं होगा।

जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दल ऐसी व्यवस्था बनाएँ, जहाँ पेपर लीक होना लगभग असंभव हो जाए। दोषियों को सख्त सजा मिले, परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी बने और मेहनत करने वाले छात्रों का भरोसा वापस लौटे। क्योंकि छात्रों का भविष्य किसी भी राजनीति से बड़ा है और इस मुद्दे पर राजनीति नहीं बल्कि स्थायी समाधान सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। ये आरोप लगाकर, छात्रों के नाम पर वोट लेकर तो इन मसलों का स्थाई हल निकले से रहा।

देश के वीर सपूत को श्रद्धांजलि, कठुआ रेलवे स्टेशन का नामकरण बलिदानी कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के नाम पर: जानें नया कोड

जम्मू-कश्मीर के कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम अब आधिकारिक तौर पर बदल दिया गया है। अब इस स्टेशन का नया नाम ‘शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी रेलवे स्टेशन, कठुआ’ होगा।

रेल मंत्रालय ने इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी है और स्टेशन का नया कोड MSKT तय किया गया है। केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसकी जानकारी देते हुए कहा कि यह फैसला जनता और बलिदानी अफसर के परिवार की लंबे समय से चली आ रही माँग के बाद लिया गया है।

लंबे समय से उठ रही थी नाम बदलने की माँग

स्थानीय लोग और कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के परिजन काफी समय से कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम उनके नाम पर रखने की माँग कर रहे थे। लोगों का कहना था कि जिस तरह उधमपुर रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर बलिदानी कैप्टन तुषार महाजन के नाम पर रखा गया, उसी तरह कठुआ स्टेशन का नाम भी कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के नाम पर होना चाहिए।

उनका मानना था कि जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति को इस वीर सपूत का नाम याद रहना चाहिए। अब सरकार ने इस माँग को स्वीकार करते हुए स्टेशन का नाम बदल दिया है।

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने दी जानकारी

केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने X पर पोस्ट करते हुए बताया कि जनता की माँग पर कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी रेलवे स्टेशन, कठुआ’ कर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि कैप्टन सुनील ने देश की रक्षा करते हुए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था और उनके सम्मान में यह फैसला लिया गया है। रेल मंत्रालय ने भी इस बदलाव की अधिसूचना जारी कर दी है।

कौन थे कैप्टन सुनील कुमार चौधरी?

कैप्टन सुनील कुमार चौधरी का जन्म 22 जून 1980 को जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले के गोविंदसर गाँव में हुआ था। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल पी एल चौधरी भारतीय सेना में अधिकारी थे, इसलिए बचपन से ही उन्हें अनुशासन और देशसेवा का माहौल मिला।

वे तीन भाइयों में सबसे बड़े थे। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय से की। इसके बाद पुणे के गरवारे कॉलेज ऑफ कॉमर्स से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और फिर सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय से MBA की पढ़ाई शुरू की।

कैप्टन मनोज पांडेय से मिली सेना में जाने की प्रेरणा

MBA की पढ़ाई के दौरान उनके छोटे भाई अंकुर चौधरी का चयन नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) में हुआ। भाई से मिलने के दौरान सुनील चौधरी ने परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज कुमार पांडेय की वीरता की कहानी जानी।

कैप्टन मनोज भी 11 गोरखा राइफल्स से जुड़े थे। उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर सुनील ने एमबीए बीच में छोड़ दिया और 1 जुलाई 2003 को इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) में दाखिला ले लिया।

बाद में 10 दिसंबर 2004 को उन्हें 11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की 7/11 गोरखा राइफल्स बटालियन में कमीशन मिला। उनकी पहली पोस्टिंग कोलकाता के फोर्ट विलियम में हुई।

असम में आतंकियों के खिलाफ कई बड़े अभियान

फरवरी 2005 में गोरखा राइफल्स में शामिल होने के बाद मई 2006 में उनकी तैनाती असम के तिनसुकिया जिले में ULFA आतंकियों के खिलाफ चल रहे काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन में हुई।

इस दौरान उन्होंने कई सफल अभियानों का नेतृत्व किया और दो ULFA कमांडरों को मार गिराया। उनकी बहादुरी और नेतृत्व क्षमता के लिए उन्हें 26 जनवरी 2008 को सेना मेडल से सम्मानित किया गया।

सम्मान मिलने के 24 घंटे बाद हो गए शहीद

सेना मेडल मिलने के अगले ही दिन यानी 27 जनवरी 2008 को कैप्टन सुनील कुमार चौधरी को रंगागढ़ गाँव में 7 से 9 ULFA आतंकियों के छिपे होने की सूचना मिली।

वह लेफ्टिनेंट वरुण राठौर और जवानों की टीम के साथ तुरंत ऑपरेशन के लिए निकल पड़े। ऑपरेशन के दौरान उन्होंने आतंकियों की घेराबंदी की और खुद आगे बढ़कर मोर्चा संभाला।

मुठभेड़ में उनकी छाती में गोली लगी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने पीछे हटने से इनकार कर दिया। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी उन्होंने लगातार लड़ाई जारी रखी और दो आतंकियों को मार गिराया।

इसके बाद जंगल की ओर भाग रहे एक अन्य आतंकी का पीछा कर उसे भी ढेर कर दिया। हालाँकि इस दौरान लगी गंभीर चोटों के कारण उन्होंने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

कीर्ति चक्र और सेना मेडल से किया गया सम्मानित

कैप्टन सुनील कुमार चौधरी की अदम्य वीरता और साहस को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।

इससे पहले उन्हें सेना मेडल भी मिल चुका था। सेना में करीब तीन साल की सेवा के दौरान उन्होंने अपने साहस, नेतृत्व और देशभक्ति से एक ऐसी मिसाल कायम की, जिसे आज भी याद किया जाता है।

फीफा विश्वकप फाइनल में अर्जेंटीना Vs स्पेन की जंग, जादूगर मेस्सी का हो सकता है आखिरी मुकाबला: पढ़ें फुटबॉल के जादूगरों ने कैसे बिखेरी पूरी दुनिया में मुस्कान

मेरठ कैंट में अपना बचपन बिताने वाले हमारे एक पाठक ने जो दफ्तर में मेरे सीनियर भी हैं, गुरुवार की सुबह अपने बचपन से जुड़ा एक वाकया साझा किया।

उन्होंने पहले तो साथ बैठ विश्व कप के चल रहे मैचों से जुड़ी चर्चाएँ की। रोनाल्डो बनाम मेस्सी की डिबेट भी हुई। फिर आगे बातें की होसे मोरीनियो व पेप गार्दियोला के दिनों होने वाले ‘एल क्लासिको’ के मैचों की। जैसे क्रिकेट प्रधान इस देश में भारत बनाम पाकिस्तान की एक प्रतिद्वंद्विता है, वैसे ही स्पेनिश लीग के दो सबसे बड़े फुटबॉल क्लबों के मध्य भी एक प्रतिद्वंद्विता है जिसे ‘एल क्लासिको’ कहा जाता है। जब भी इन दोनों क्लबों का मैच होता है, सारी ही दुनिया दो धड़ों में बँट जाती है। बार्सिलोना बनाम रियाल मैड्रिड। इस मैच में फुटबॉल नहीं महासंग्राम होता है मैदान पर।

आगे उन्होंने बताया कि उन्हें काका, ज़िदान व माल्दीनी का खेल कितना ज्यादा पसंद था और अब भी वो अक्सर ही यूट्यूब पर जाकर काका, ज़िदान व माल्दीनी की क्लिप्स देख लेते हैं। क्रिस्टियानो रोनाल्डो व लियोनेल मेस्सी के बीच बँटी दुनिया में जब किसी ने काका, ज़िदान व माल्दीनी का नाम लिया तो मन को बेहद सुकून मिला था। क्रिस्टियानो रोनाल्डो व मेस्सी से आगे भी फुटबॉल है। जिसने काका व ज़िदान को मैदान पर जादू बिखेरते नहीं देखा उसने भला क्या देखा। जिसने नेस्ता व माल्दीनी को मैच के अंतिम क्षणों तक जी जान लगा देते नहीं देखा उसने भला क्या देखा।

हम पेले, माराडोना, रॉबर्टो बाज़ियो, योहान क्रुएफ आदि को खेलते तो न देख सके परन्तु हमारी पीढ़ी को कई बेहतरीन फुटबॉलरों को विश्वभर के हरे मैदानों पर जादूगरी करते देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हमारे लिए अटैक का मतलब होता है ब्राजीली रोनाल्डो व एलेसान्द्रो देल पियरो। फिर बातीस्तुता, ड्रोग्बा, हरनन क्रेस्पो व फर्नान्दो तोरेस आदि हुआ करते थे। मिडफील्ड में हमने केविन डि ब्रुएना, टोनी क्रूस व मोद्रिच आदि से सालों पूर्व उनसे बेहतर कारीगरी पेश करते हुए चावी, इनिएस्ता, ज़िदान, काका, रोनाल्डिन्हो, डेविड बैकहम, फ्रैंक लैंपार्ड, जेरार्ड, चेक फैब्रेगास आदि को देखा था। पिछले ही दशक में डेविड सिल्वा व मोद्रिच जैसे बेहतरीन खिलाड़ी भी हुए। रक्षापंक्ति में हमने नेस्ता व माल्दीनी की जोड़ी देखी। फैबियो कैनावारो रहे। मैदान में किसी शेर की भांति खेलते हुए कार्लेस पुयोल को देखा। नेमांजा विदिच़, जॉन टेरी आदि भी शानदार खिलाड़ी रहे।

गोलकीपरों की भी एक पूरी फ़ौज थी। ओलिवर कॉन, गियानलुइगी बुफॉन, जेंस लेहमन, एडविन वेन डर सर, पीटर क्राउच व दीदा आदि के अपनी टीम के हित हेतु सब कुछ झोंकते दृश्यों को कोई कैसे भुला सकता है भला। फुदबैक्स की बात करूँ तो रॉबर्टो कार्लोस, दानी आल्वेस व काफू जैसा खेल खेलते मैंने तो फिर कभी किसी को भी नहीं देखा। अगर आप फुटबॉल की खुबसूरती देखने की मंशा रखते हैं तो आपको दानी आल्वेस व मेस्सी का तालमेल देखना चाहिए।

उन्होंने आगे बताया कि कैसे वह बचपन के दिनों में मेरठ कैंट के लंबे हरे मैदानों में स्कूल से लौटने पर फुटबॉल खेला करते थे। इस देश में जहाँ हम सभी क्रिकेट को जुनून की हद तक चाहते हैं, फुटबॉल उन्हें सुकून दिया करता था। वह लगातार गेंद के पीछे भागते रहा करते। यह करना उन्हें सुख देता था।

मुझे स्वयँ आज भी जनवरी की वो सर्द सुबहें याद हैं, जब माँ के हाथों से बुना स्वैटर पहन कर हम गेंद-मेले जाया करते थे। माँ की बुनी स्वैटर जैसी गर्माहट ये महँगी जैकेटें नहीं दे पाती।

मेरे बचपन का एक वाकया मुझे अब भी अक्सर रह रह के याद आता है। मुझे फुटबॉल का खेल बेहद प्रिय है और क्लब स्तर पर स्पैनिश लीग का इक बड़ा क्लब ‘ F.C. बार्सिलोना’ मेरा सबसे पसंदीदा क्लब है। बार्सिलोना दरअसल यूरोपीय महाद्वीप में बसे एक देश स्पेन के तटीय क्षेत्र में स्थित एक बेहद ही खूबसूरत प्रान्त है। यहाँ विश्वभर से सैलानी साल भर आते हैं सिर्फ इस शहर की खूबसूरती को देखने।

जानते हो, वूडी एलेन जैसे नामी गिरामी फिल्म-रचियता ने तो इस शहर की खूबसूरती को दरसाती ‘विक्की- क्रिस्टीना बार्सिलोना’ नामक एक पूरी फिल्म ही बना डाली थी। यह शहर न सिर्फ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती बल्कि कला और अटूट वास्तुकला के लिए भी जाना जाता है। यहाँ का सबसे बड़ा फुटबॉल क्लब है ‘ फुटबॉल क्लब दे बार्सिलोना’।

तब डेको, थुर्रम, पूयोल, ज़ावी, युवा सनसनी मेस्सी, इनिएस्ता, जैम्ब्रोटा, वाल्देस, राफेल मार्खेज़, सैम्युएल इटो और स्वयं फुटबॉल के जादूगर रोनाल्डिन्हो जैसे एक से एक विश्व-स्तरीय खिलाड़ी बार्सिलोना की टीम में खेला करते थे। ऐसे ही तमाम बड़े बड़े सूरमा बार्सिलोना के प्रतिद्वंद्वी रियाल मैड्रिड के लिए भी खेला करते थे।

मुझे बार्सिलोना की फुटबॉल-जर्सी बेहद पसंद थी। हमारे कस्बे के मुख्य बाजार में जो कि हमारे गाँव से यही कोई 10-12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, खेल के सामान की जो सबसे बड़ी ‘स्टार-स्पोर्टस’ नामक दुकान थी, वहाँ वो जर्सी सजी रहती थी। तब इतनी गाड़ियाँ नहीं होती थीं। लोग बाजार बहुत कम ही जाया करते थे। बाजार जाना भी इक उत्साह समान ही हुआ करता था उन दिनों। यदा कदा जब भी बाजार जाना हो पाता, ‘स्टार-स्पोर्टस’ के बाहर सजी वो जर्सी देख मेरी आँखों में एक अजीब सी चमक आ जाती। लेकिन फिर एकाएक मैं अक्सर मायूस हो जाया करता था। मुझे आज भी याद है, उस वक्त, मेरी जेब में वो जर्सी खरीद पाने लायक पैसे नहीं थे।

मेरे गुल्लक में भी मैं कभी इतने पैसे नहीं जोड़ पाता था कि वो जर्सी खरीद पाऊँ। हर बार गेंद मेले से दो महीने पहले यही सोचकर गुल्लक फोड़ता कि मेले पर माँ/ नानाजी से मिलने वाले पैसों और गुल्लक से निकली रकम मिलाकर जमा किए पैसों से भले मेले में जलेबी और समोसे नहीं खाऊँगा, पर इस बार तो अपनी पसंदीदा जर्सी ले ही लूँगा। परन्तु ‘स्टार-स्पोर्टस’ के बाहर सजी वो प्यारी सी जर्सी लेने का मेरा ख्वाब भी हर बार मेरे गुल्लक की तरह ही चकनाचूर हो जाया करता था।

माँ तो माँ ही होती है ना। माँ यह जानती थी। सो इक रोज़ माँ झटपट गयी बाजार और झंडा- चौक से कुछ ही दूरी पर पुरी-भाई की दुकान से कोई दस कदम आगे हनुमान मंदिर से लग कर जो सरदार जी की ऊन की दुकान है, माँ वहाँ से लाल-नीली फैदर वाली ऊन के दो गोले ले आई। माँ रात-दिन बुनाई में लगी रहती और माँ ने गेंद के मेले से पहले मुझे मेरी वो स्वैटर बुनकर भी दे दी। लाल-नीली पट्टियों वाली मेरी वो स्वैटर। मेरी चमचमाती बार्सीलोना वाली स्वैटर।

उस साल मैं मेले में वही स्वैटर पहन कर गया था। लाल-नीली पट्टियों वाली मेरी वो स्वैटर। मेरी चमचमाती बार्सीलोना वाली स्वैटर। पता है, मेरी सब मौसियों, गाँव की औरतों ने मुझे घेर लिया था मेले में। कोई मुझे इधर खींचता तो कोई उधर। सब बुनाई के फंदे गिनने में लगे पढ़े थे। उस स्वैटर में कुछ तो जादू था। उसको पहनते ही मैं सेलिब्रिटी बन गया था। मेरे दोस्त भी बार बार मुझसे एकबार पहनने को वो स्वैटर माँगते फिरते। ना जाने कब और कैसे, उस स्वैटर के आते ही मैं अचानक ही गाँव का हीरो हो गया था।

जब माँ ने वो स्वैटर बुना था, मैं यही कोई 12-13 साल का था। पर मैंने वो स्वैटर कॉलेज तक पहनना नहीं छोड़ा। पता जब मैं कॉलेज जाने लगा, तो माँ ने उसके कॉलरों को बढ़ाकर इक टोपी की शक्ल दे दी थी। अब मेरी बार्सिलोना वाली वो स्वैटर और भी मस्त हो गई थी।

पर मैं अब वो स्वैटर नहीं पहन पाता। अब मैं बड़ा जो हो गया हूँ। वो बेहद छोटी हो गई है मुझपे अब। पर आज भी वो लाल-नीली स्वैटर माँ ने दीवान में संभाल कर रखी है। वक्त के तूफानों के तीखे थपेड़े छू भी न सके माँ की बुनी स्वैटर को। वो आज भी बेहद मुलायम, बिल्कुल नई सी ही लगती है। मानो उसे आजतक किसी ने कभी पहना ही न हो। उसके बाद मैंने लगभग हर फुटबॉल-सीज़न में अपने पसंदीदा क्लब की जर्सी खरीदी, पर जाने क्यों उन सभी जर्सीयों में वो बात नहीं थी जो माँ के हाथों की बनी उस स्वैटर में थी।

खैर, ये सब तो गुजरे सालों की बातें हैं। काफी वक्त बीत गया। अब काम के सिलसिले में मैं मुंबई आ गया हूँ। अब तो फुटबॉल भी कहीं पीछे ही छूट गया है। मैं यहीं एक छोटे से कमरे में रहता हूँ। यहाँ मेरे पहाड़ नहीं हैं। यहाँ बिल्कुल ठंड नहीं पड़ती। यहाँ कोई माँ के हाथों से बुना स्वैटर भी नहीं पहनता।

पर मैं जानबूझ कर कुछ वर्ष पूर्व बार जब घर गया था तो माँ से इक मफलर की जिद कर बैठा था। फिर क्या था; माँ झटपट बाजार गई और झंडा-चौक से कुछ ही दूरी पर, पुरी-भाई की दुकान से कोई दस कदम आगे हनुमान मंदिर से लग कर जो सरदार जी की ऊन की दुकान है, माँ वहाँ से लाल-नीली ऊन के दो गोले ले आई। अब माँ की आँखों में वो चमक, वो तेजी नहीं रही। फिर भी माँ ने झटपट झटपट मात्र चार दिन में ही मेरा मफलर बुन दिया। लाल-नीली पट्टियों वाला मेरा मफलर। मेरा चमचमाता बार्सीलोना वाला मफ़लर।

दूर हजारों किलोमीटर दूर पहाड़ों के उस पार मेरे गाँव में कड़ाके की ठंड पड़ती है। गाँव के सभी बच्चे-बूढ़े अलाव किनारे साथ बैठकर मूँगफली लिए आग तापते हैं। सूरज अक्सर देर से निकलता है। स्कूलों में छुट्टियाँ पड़ जाती हैं। बच्चे गेंद और बसंत-पंचमी के मेलों को लेकर उत्सुक होते हैं। बच्चे जरुर माँ के हाथों के बने स्वैटर पहन मेले जाते हैं। और मैं? मैं यहाँ मुंबई की तपती दुपहरी में गले में अपना लाल-नीला मफलर डाले बैठा अपने हिस्से की सर्दियाँ जी रहा होता हूँ।

ये लाल-नीला मफलर मुझे याद दिलाता है दूर, हजारों किलोमीटर दूर, पहाड़ों के उस पार बसे मेरे गाँव की, गाँव में पड़ती सर्दियों की और सर्दी के अलसाए दिनों में भी झटपट सारा काम निपटा कर चश्मा लगाए एक स्वैटर बुनती मेरी माँ की।

फीफा विश्व कप अब एक सुखांत की ओर बढ़ चला है। सर्वप्रथम आज देर रात भारतीय समयानुसार ढाई बजे तीसरे स्थान के लिए मियामी में फ्रांस बनाम इंग्लैंड का मुकाबला खेला जाएगा। तत्पश्चात रविवार की देर रात भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे खेला जाएगा, विश्व कप का फाइनल मुकाबला गत विजेता अर्जेंटीना व यूरोपीयन चैंपियन स्पेन के बीच।

अर्जेंटीना आज से ठीक दो दिन बाद स्पेन के खिलाफ न्यूजर्सी स्टेडियम में विश्व कप का फाइनल मुकाबला खेलने उतरेगी। स्पेन यूरोपीयन चैंपियन है तो अर्जेंटीना विश्व विजेता। यहाँ एक अप्रेंटिस का सामना अपने माएस्ट्रो से होगा। वैश्विक फुटबॉल के अगले बड़े स्टार 19 वर्षीय लामीन यमाल का सामना खुद फुटबॉल के भगवान से होगा। स्पेन का काव्यात्मक शैली का खेल अर्जेंटीना के कठोर दक्षिण अमेरिकी फुटबॉल से टकराएगा। स्पेनिश टुकड़ी अर्जेंटीनी बेड़े को रोकने के लिए पूरी जान लगा देगी। जिस बार्सिलोना की जड़ों को कभी लियोनेल मेस्सी ने अपूर्व प्रेम से अपनी मेहनत से सींचा, उसके आठ खिलाड़ी स्पेन का हिस्सा हैं। यह फाइनल कहीं न कहीं ‘ला मासिया’ में पला पोसा है। विश्व विजेता व यूरोपीयन चैंपियन का यह ‘फिनालिस्मा’ एक जबरदस्त टक्कर होगी। यह टकराव ऐतिहासिक होगा।

मुंबई में तो कई कैफे, पबों आदि के साथ ही साथ लगभग दस-पंद्रह सिनेमा हॉल दो-दो/ चार-चार स्क्रीन पर इस मुकाबले का लाइव प्रसारण करने जा रहे हैं। खेलप्रेमियों में इस मैच को लेकर जबरदस्त माहौल बन चुका है।

इस मैच में हारे जीते कोई भी, जीत अंततः फुटबॉल की होगी।

यह मैच फुटबॉल जगत के सबसे ज्यादा जगमगाते सितारे का आखिरी मैच भी हो सकता है। आज से सालों पहले जब इस सितारे ने बार्सिलोना की तीस नंबरी गहरी मरून व नीली धारियों वाली फुल बाजू की जर्सी पहने खेलना शुरू किया था तो पहली दफा यकीन हुआ था कि हाँ, सचमुच में इस दुनिया में जादू होता है।

जब जब भी वह मैदान में उतरता स्टेडियम में मौजूद दर्शक खुशी से झूमने लगते। विपक्षी भी उसे एकटक निहारते रह जाते। वह खुशियों का पर्यायवाची शब्द हो गया था। वह जब भी खेलने मैदान पर उतरता, सब अपने अपने काम छोड़ बस उसे ही खेलते हुए देखते रहते। जाने वो कैसा जादू था उसके खेल में। जब जब गेंद उसके कदमों को चूमती है, तो मानो कुछ जादुई घटित हो रहा होता है। उसे खेलते हुए देख कर हम, कुछ पलों के लिए ही सही, अपने तमाम दुख-दर्द भूल जाते थे।

उसने हमारी हथेलियों पर खुशियाँ रख दी थीं।

उसने हमें सिखलाया – अंतिम क्षणों तक लड़ना।

वो था तो इस खेल में जादू था। वह चला जाएगा तो शायद उसके साथ ही इस खेल का जादू भी चला जाएगा।

हमने इस विश्व कप में क्रिस्टियानो रोनाल्डो (शायद), नेमार, लुका मॉद्रिच, गुइलेर्मो ओचोआ आदि को एक अंतिम दफा खेलते देखा।

हम खेत खलिहानों में बिना फुटबॉल बूट्स और बिना जर्सी पहने बारिशों में फुटबॉल खेलने वाले लड़कों ने वैश्विक मंच पर जिस जमात के खिलाड़ियों को खेलते देख इस खेल से इश्क किया था, उस जमात के अंतिम खिलाड़ी के संभवतः इस आखिरी मुकाबले को हमें तमाम मनमुटाव मिटा कर देखना चाहिए। हमारी खुशियों का सौदागर हमेशा के लिए शहर छोड़ कर जा रहा है। उसके जाने के साथ ही तमाम रोशनियाँ भी धूमिल हो उठेंगी।

हमें इस मैच को रोसारियो के उस नन्हें लड़के के एक अंतिम जश्न के तौर पर देखना चाहिए जो तमाम दुख दर्द के समंदर के मध्य हमारी खुशियों का लाइट हाउस था।

रोसारियो का वह नन्हा लड़का जिसने दुनिया भर के लाखों नन्हें लड़कों की आँखों को जगमगाते ख्वाब दिए थे।

सोनम वांगचुक अस्पताल में भर्ती, CJP ने ‘अपहरण’ और अज्ञात स्थान पर ले जाने का किया दावा, अभिजीत दिपके ने हिरासत को लेकर लगाए आरोप: जानिए अब तक क्या हुआ

दिल्ली पुलिस ने ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को शनिवार (18 जुलाई 2026) की सुबह जंतर-मंतर से हटाकर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल पहुँचाया। यह घटनाक्रम उनके उस ‘अनिश्चितकालीन’ भूख हड़ताल के 20 दिन पूरे होने के बाद सामने आया। इस बीच, अभिजीत दिपके ने पहले तो खुद की पिटाई का आरोप लगाया और फिर खुद भूख हड़ताल पर बैठ गए।

दिल्ली पुलिस की यह कार्रवाई दिल्ली हाई कोर्ट के उस निर्देश के बाद हुई, जिसमें वांगचुक की रोजाना मेडिकल निगरानी करने और जरूरत पड़ने पर आवश्यक चिकित्सीय हस्तक्षेप सुनिश्चित करने को कहा गया था।

DCP (नई दिल्ली) के आधिकारिक एक्स हैंडल पर जारी बयान में कहा गया, “माननीय हाई कोर्ट के आदेशों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह के अनुसार, श्री सोनम वांगचुक की बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें आवश्यक चिकित्सीय देखभाल के लिए अस्पताल स्थानांतरित किया गया है।”

बयान में आगे कहा गया, “माननीय हाई कोर्ट के आदेशों का पालन करते समय प्रदर्शनकारियों ने बाधा उत्पन्न करने की कोशिश की, जिसके कारण हल्की अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हुई। हालाँकि पुलिस ने संयम बरता और पूरी कार्रवाई सुरक्षित तरीके से संपन्न कराई। हम जंतर-मंतर पर मौजूद प्रदर्शनकारियों से अनुरोध करते हैं कि वे जल्द से जल्द शांतिपूर्वक वहाँ से हट जाएँ।”

संयोग से भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के वरिष्ठ और सम्मानित अधिकारी अनुराग शर्मा, जो पहले भारत के इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में भी सेवाएँ दे चुके हैं, उनको शुक्रवार (17 जुलाई 2026) को दिल्ली का नया पुलिस आयुक्त (कमिश्नर) नियुक्त किया गया।

कॉकरोच जनता पार्टी ने सोनम वांगचुक के बारे में गलत जानकारी फैलाई

दिल्ली पुलिस द्वारा सोनम वांगचुक को अस्पताल ले जाने के तुरंत बाद, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सदस्यों ने लोगों को भड़काने के उद्देश्य से भ्रामक जानकारी फैलानी शुरू कर दी।

CJP के विवादित प्रवक्ता आशुतोष रांका ने दावा किया कि पुलिस ने सोनम वांगचुक को ‘गिरफ्तार’ कर लिया है।

एक वीडियो में रांका कहते सुनाई दिए, “सोनम वांगचुक को जबरन हिरासत में लेकर गिरफ्तार कर लिया गया है। जंतर-मंतर जाने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए गए हैं… दिल्ली पुलिस ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है। अब चुप रहने का समय नहीं है।”

इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आधिकारिक एक्स हैंडल ने भी दावा किया कि दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक का ‘अपहरण’ कर लिया है।

जनता के बीच व्यापक दहशत फैलाने के कथित उद्देश्य से, CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने आरोप लगाया कि ‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस किसी ‘अज्ञात स्थान’ पर ले गई है।

सौरव दास के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

अभिजीत दिपके ने विक्टिम कार्ड खेला

आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व सदस्य और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने भी इस मौके का इस्तेमाल कर झूठा पीड़ित होने का नैरेटिव फैलाने के लिए किया।

सबसे पहले उन्होंने दावा किया कि जंतर-मंतर पर लोगों के साथ मारपीट की जा रही है और सोनम वांगचुक को जबरन वहाँ से ले जाया जा रहा है।

हिरासत में लिए जाने का दावा करने वाले CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने बाद में मीडिया से भी बातचीत की। उन्होंने आरोप लगाया, “सुबह 7 बजे जब मैं फ्रेश होने के लिए बाहर निकला, तभी पुलिस के गुंडे यहाँ आ गए। उन्होंने सोनम सर को गालियाँ देते हुए जबरन वहाँ से घसीटकर ले गए।”

उन्होंने आगे दावा किया, “हमें बिल्कुल नहीं पता कि उन्हें कहाँ ले जाया गया है।” इसके साथ ही अभिजीत दिपके ने बिना किसी पुष्टि वाले अपने इस आरोप को भी दोहराया कि उनके साथ मारपीट की गई थी और उन्होंने दिल्ली पुलिसकर्मियों को ‘RSS के गुंडे’ बताया।

उन्होंने आगे कहा, “जब मुझे इसकी जानकारी मिली और मैं अपने एक दोस्त के घर से जंतर-मंतर जा रहा था, तब पुलिस ने मेरे साथ भी मारपीट की… ये पुलिस अधिकारी नहीं हैं, बल्कि RSS के गुंडे हैं। मैं विदेश से अपने देश वापस आया हूँ, क्या मैं कोई अपराधी हूँ? ये गुंडे हैं, पुलिस नहीं, बल्कि RSS के गुंडे…”

पूरे घटनाक्रम से एक और बात भी स्पष्ट हुई कि अभिजीत दिपके रात के समय सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर पर छोड़कर चले जाते थे। इससे पहले भी सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों को लेकर उनकी आलोचना हुई थी, जिनमें वह भूख हड़ताल पर बैठे वांगचुक के बगल में बैठकर भोजन करते दिखाई दिए थे। अब यह भी सामने आया है कि दिपके रात में जंतर-मंतर पर रुकते भी नहीं थे।

खुद अभिजीत दिपके के इस बयान कि वह अपने दोस्त के घर पर थे और CJP प्रवक्ता सौरव दास की पोस्ट से यह साफ होता है कि दिपके प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर से दूर किसी अन्य स्थान पर ठहरे हुए थे।

CJP की नई माँग- मोदी इस्तीफा दें

जंतर-मंतर पर शुरू हुआ यह प्रदर्शन शुरुआत में नीट (NEET) पेपर लीक के विरोध में था, लेकिन बाद में इसका स्वरूप बदल गया और इसमें ‘मेरी लिंग, मेरी मर्जी’ जैसे नारे सहित अन्य माँगें भी शामिल हो गईं।

‘एक्टिविस्ट’ सोनम वांगचुक पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर हैं और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग कर रहे हैं। लेख के अनुसार, यह माँग अब तक पूरी नहीं हुई है और अब यह मामला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की माँग तक पहुँच गया है।

लेख के अनुसार, अभिजीत दिपके, जो इन दिनों भोजन करते हुए भी देखे गए थे, अब उन्होंने ‘अनिश्चितकालीन’ भूख हड़ताल पर बैठने की घोषणा की है।

संसद तक मार्च और हिंसा की धमकियाँ

इस बीच, कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने घोषणा की है कि वह अपनी पहले से घोषित 20 जुलाई को संसद भवन तक मार्च निकालने की योजना पर कायम रहेगी, जिसके बारे में लेख में दावा किया गया है कि उसके दौरान अव्यवस्था और तनाव की आशंका है।

पार्टी का दावा है कि इस विरोध मार्च में शामिल होने के लिए 1.5 लाख से अधिक छात्र और समर्थक मिस्ड कॉल और ऑनलाइन अभियानों के जरिए पहले ही पंजीकरण करा चुके हैं।

लेख में आगे कहा गया है कि सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बाद CJP के प्रवक्ताओं, समर्थकों और उनके वित्तपोषकों को लोगों को कथित तौर पर भड़काने का नया मुद्दा मिल गया है। लेख के अनुसार, उनकी भाषा शांतिपूर्ण मार्च की अपील से बदलकर सीधे शारीरिक टकराव की बातों तक पहुँच गई है।

‘वंदे मातरम’ का अपमान किया तो होगी 3 साल की जेल… मुस्लिमों के दबाव में नेहरू ने जिस राष्ट्रीय गीत का किया ‘अपमान’, उसे मोदी सरकार ने दिया सम्मान: अब नया बिल बदलेगा इतिहास

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर एक बहुत बड़ा कदम उठाने जा रही है। सरकार 20 जुलाई, 2026 से शुरू होने वाले संसद के मानसून सत्र में एक नया और कड़ा कानून पेश करने वाली है। इस कानून का नाम है- ‘राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम (संशोधन) विधेयक, 2026’। देश की केंद्रीय कैबिनेट ने इस नए बिल को पहले ही मंजूरी दे दी है।

इस नए बिल को लाने का सीधा मकसद यह है कि जो लोग भी हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का अपमान करते हैं, या इसे गाने के दौरान जानबूझकर कोई रुकावट डालते हैं, उन्हें सख्त सजा दी जा सके। ऐसे लोगों को अब सीधे जेल की हवा खानी पड़ेगी।

आसान शब्दों में समझें तो इस कानून के पास होने के बाद ‘वंदे मातरम’ को भी कानूनी तौर पर वही इज्जत और सुरक्षा मिल जाएगी, जो आज हमारे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को मिली हुई है। अब तक राष्ट्रीय गीत का अपमान करने पर इस तरह की सीधे जेल भेजने वाली कड़ी कानूनी कार्रवाई का कोई नियम नहीं था।

लेकिन अब मोदी सरकार इस कमी को पूरी तरह दूर करने जा रही है। खास बात यह है कि सरकार यह ऐतिहासिक कदम ऐसे समय पर उठा रही है, जब पूरा देश इस गौरवशाली गीत की 150वीं सालगिरह (वर्षगाँठ) मना रहा है।

वंदे मातरम का अपमान किया तो क्या होगी सजा?

केंद्र सरकार जो नया कानून ला रही है, वह बहुत कड़ा है। इसके तहत अगर कोई भी व्यक्ति सबके सामने या जानबूझकर हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का अपमान करता है, तो उसे 3 साल तक की जेल हो सकती है। कोर्ट चाहे तो उस पर भारी जुर्माना भी लगा सकता है।

इसके अलावा, अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोषी को जेल और जुर्माना दोनों की सजा एक साथ भी भुगतनी पड़ सकती है। अब सवाल उठता है कि यह कानून किस तरह काम करेगा? इस नए कानून में साफ कहा गया है कि सजा केवल ‘जानबूझकर’ किए गए अपमान या गड़बड़ी पर ही मिलेगी। इसका मतलब है कि अगर किसी व्यक्ति से अनजाने में या गलती से कोई चूक हो जाती है, तो उसे मुजरिम नहीं माना जाएगा।

लेकिन, अगर कोई शख्स बुरी नीयत से ‘वंदे मातरम’ के गायन को बीच में रोकता है, इसे गाने वाली भीड़ या सभा में हंगामा खड़ा करता है, या फिर सबके सामने इसका मजाक उड़ाता है, तो पुलिस उसे बिल्कुल नहीं बख्शेगी। ऐसे लोगों के खिलाफ इस नए कानून के तहत तुरंत और सख्त आपराधिक कार्रवाई की जाएगी।

पुराना नियम: पहले किन चीजों के अपमान पर होती थी जेल?

हमारे देश में राष्ट्रीय प्रतीकों (देश की पहचान से जुड़ी चीजों) की इज्जत के लिए पहले से एक कानून बना हुआ है। इसे ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971‘ कहते हैं। अब तक इस पुराने कानून के तहत केवल तीन ही चीजों को सुरक्षा मिली हुई थी- हमारा तिरंगा झंडा, देश का संविधान और हमारा राष्ट्रगान ‘जन गण मन’।

पुराने नियम के हिसाब से, सिर्फ इन तीनों का अपमान करना ही कानूनी तौर पर अपराध माना जाता था। उदाहरण के लिए, अगर कोई राष्ट्रगान गाने से रोकता था या तिरंगे को फाड़ता-जलाता था, तो उसे 3 साल तक की जेल या जुर्माना होता था। लेकिन, इस 55 साल पुराने कानून में हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का कहीं कोई जिक्र नहीं था।

अब मोदी सरकार साल 2026 के इस नए बिल के जरिए पुराना नियम बदलने जा रही है। इस नए बदलाव के बाद ‘वंदे मातरम’ को भी उसी लिस्ट में जोड़ दिया जाएगा जिसमें तिरंगा और राष्ट्रगान शामिल हैं। यानी अब राष्ट्रीय गीत का मजाक उड़ाने या इसे रोकने पर भी वही धाराएँ लगेंगी और सीधे 3 साल की जेल होगी।

इस कानून में एक और बहुत जरूरी और कड़ा नियम है। अगर कोई इंसान एक बार राष्ट्रीय गीत या राष्ट्रगान का अपमान करने का दोषी पाया जाता है, और जेल से छूटने के बाद वही गलती दोबारा दोहराता है, तो कानून उसे बिल्कुल नहीं बख्शेगा। दूसरी बार पकड़े जाने पर उसे कम से कम 1 साल की जेल अनिवार्य रूप से काटनी ही पड़ेगी।

अचानक नहीं आया बिल, गृह मंत्रालय की थी पूरी तैयारी

वंदे मातरम को लेकर आ रहा यह नया बिल अचानक से नहीं टपक पड़ा है। इसके पीछे देश के केंद्रीय गृह मंत्रालय का एक बड़ा और सोचा-समझा प्लान है। असल में, पिछले कुछ महीनों से सरकार देश के राष्ट्रीय प्रतीकों को और ज्यादा सम्मान देने के लिए लगातार नए नियम बना रही थी। इसी सिलसिले में इस साल फरवरी में गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को एक कड़ा आदेश भेजा था।

इस आदेश में साफ-साफ कहा गया था कि देश में जितने भी आधिकारिक या सरकारी प्रोग्राम होते हैं, जहाँ राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ बजाया या गाया जाता है, वहाँ अब से ‘वंदे मातरम’ को भी बजाना और गाना एकदम जरूरी (अनिवार्य) होगा। कोई भी सरकारी कार्यक्रम अब इसके बिना नहीं होगा।

इसके बाद इसी जुलाई के महीने में गृह मंत्रालय ने नियमों को और ज्यादा साफ करते हुए राज्यों के बड़े अफसरों (मुख्य सचिवों) को एक और चिट्ठी भेजी। इस नए नियम के मुताबिक, अगर किसी भी सरकारी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान दोनों होने हैं, तो सबसे पहले ‘वंदे मातरम’ गाया जाएगा और उसके बाद ही ‘जन गण मन’ की बारी आएगी।

इतना ही नहीं, मंत्रालय ने इस बार यह भी बिल्कुल साफ कर दिया है कि वंदे मातरम के केवल शुरुआती हिस्से नहीं, बल्कि उसके सभी 6 अंतरे (पूरा पैराग्राफ) गाए जाने चाहिए। गृह मंत्रालय के इन्हीं सब नियमों को कानूनी तौर पर और ज्यादा मजबूत और पक्का करने के लिए अब सरकार संसद में यह नया बिल पास कराने जा रही है।

सिर्फ एक गीत नहीं, भारत की आत्मा है ‘वंदे मातरम’

‘वंदे मातरम’ केवल कुछ शब्दों को मिलाकर लिखी गई कविता नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की आत्मा, संस्कृति और शान का प्रतीक है। इस शानदार गीत को महान लेखक बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने साल 1870 के आस-पास लिखा था। इसके बाद उन्होंने साल 1882 में आए अपने मशहूर उपन्यास ‘आनंदमठ’ में भी इसे जगह दी थी।

अगर इसका बिल्कुल आसान मतलब समझें तो ‘वंदे मातरम’ का अर्थ होता है- “माँ, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ।” इस खूबसूरत गीत में हमारी भारत भूमि (देश) को एक बहुत ही समृद्ध, हरी-भरी और प्यार लुटाने वाली माँ या देवी के रूप में दिखाया गया है, जो अपने बच्चों का पेट पालती है।

जब हमारा देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद होने के लिए लड़ रहा था, तब यह गीत देशभक्तों के दिलों में जोश भरने का सबसे बड़ा जरिया बना था। साल 1905 में जब अंग्रेजों ने चाल चलते हुए बंगाल को दो टुकड़ों में बांट दिया (बंग-भंग), तो उसके खिलाफ देश में एक बड़ा आंदोलन छिड़ गया। उस दौर में ‘वंदे मातरम’ पूरे देश को एकजुट करने वाला सबसे बड़ा नारा बन गया था।

देश को आजाद कराने का जज्बा ऐसा था कि हमारे वीर क्रांतिकारी हँसते-हँसते फाँसी के फँदे पर झूलते समय भी ‘वंदे मातरम’ का नारा बुलंद करते थे। इस गीत के इसी ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए 24 जनवरी 1950 को हमारी संविधान सभा ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने ‘जन गण मन’ को देश का राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को भारत का ‘राष्ट्रीय गीत’ घोषित किया। तब संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद ने साफ-साफ कहा था कि वंदे मातरम को भी राष्ट्रगान के बराबर ही पूरा सम्मान और दर्जा मिलेगा।

क्या है 2 और 6 अंतरों का चक्कर? मुस्लिमों के दबाव में आकर नेहरू ने देश के गीत को बांटा

इस नए बिल के आने के बाद देश में एक बार फिर पुराना और ऐतिहासिक विवाद गर्मा गया है। पूरा मामला इस गीत के अंतरों (पैराग्राफ) को लेकर है। दरअसल, साल 1937 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ने फैसला लिया था। तय हुआ था कि किसी भी सरकारी या सार्वजनिक प्रोग्राम में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएँगे

उस दौर में मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं और संगठनों ने इसके बाद वाले अंतरों पर ऐतराज जताया था। उनका कहना था कि बाद के हिस्सों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र आता है, जिससे उनकी मजहबी भावनाओं को ठेस पहुँचती है। बस, तभी से यह गीत आधा गाने की परंपरा चल पड़ी थी, जिसे अब मोदी सरकार बदलने जा रही है।

अब सरकार ने जब से पूरा गीत (सभी 6 अंतरे) गाने का नियम बनाया है, तब से बीजेपी और विपक्ष की पार्टियों के बीच बहस-बाजी चल रही है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सीधा आरोप लगाया है कि कॉन्ग्रेस और उससे जुड़े लोग हमेशा से ही वंदे मातरम से नफरत करते रहे हैं। उनका कहना है कि नेहरू जी ने मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए (तुष्टिकरण के दबाव में) हमारे इतने बड़े राष्ट्रीय गीत को दो हिस्सों में काट दिया था।

खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस को घेरा था। PM मोदी ने कहा था कि अपनी वोट बैंक की राजनीति के लिए कॉन्ग्रेस ने वंदे मातरम के गौरव को कम किया। गीत के अंतरों को हटाना देश को बांटने वाली सोच को बढ़ावा देने जैसा था।

वंदे मातरम ही नहीं, मानसून सत्र में आ रहे हैं ये बड़े बिल

20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के इस मानसून सत्र में सरकार सिर्फ वंदे मातरम से जुड़ा बिल ही नहीं ला रही है। लोकसभा सचिवालय की लिस्ट के मुताबिक, इस बार मोदी सरकार कई और बड़े और जरूरी कानून बनाने की तैयारी में है, जो सीधे तौर पर आम जनता और देश की व्यवस्था से जुड़े हैं। आइए जानते हैं कि इस बार संसद की टेबल पर कौन-कौन से बड़े बिल आने वाले हैं।

जन्म-मृत्यु का रजिस्ट्रेशन: सरकार ‘जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026’ लाने जा रही है। इसका सीधा मतलब यह है कि अब जन्म या मौत का सर्टिफिकेट (प्रमाण पत्र) बनवाना पहले से ज्यादा कड़ा हो जाएगा। अगर कोई व्यक्ति बच्चे के जन्म या परिवार में किसी की मृत्यु के 2 साल बाद तक उसका रजिस्ट्रेशन नहीं कराता है, तो उसका सर्टिफिकेट अब आसानी से नहीं बनेगा। इसके लिए अब सीधे प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट (जज) से ऑर्डर लेना जरूरी हो जाएगा। सरकार का मानना है कि इस कड़े नियम से देश में फर्जी कागज (दस्तावेज) बनाने के खेल पर पूरी तरह से ताला लग जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में बढ़ेंगे जज: अदालतों में सालों-साल लंबित रहने वाले मुकदमों की समस्या को दूर करने के लिए सरकार ‘सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक’ ला रही है। इस नए कानून के पास होने के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी जाएगी। जजों की संख्या बढ़ने से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि कोर्ट में सालों से लटके पड़े मुकदमों की सुनवाई बहुत तेजी से हो सकेगी और लोगों को समय पर इंसाफ मिल पाएगा।

विदेशी चंदे (NGO) पर कसेगा शिकंजा: सरकार एक और बड़ा बिल ला रही है, जिसका नाम ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ (FCRA) है। यह बिल पहले पास नहीं हो पाया था, लेकिन इस बार सरकार इसे हर हाल में पास कराना चाहती है। इसके जरिए देश में काम करने वाले एनजीओ (NGO) को विदेशों से मिलने वाले चंदे (फंड) पर कड़ी नजर रखी जाएगी, ताकि कोई भी पैसे का गलत इस्तेमाल देश के खिलाफ न कर सके।

इसके साथ ही, आम जनता और नौकरीपेशा लोगों के लिए राहत की बात यह है कि सरकार ‘आयकर (संशोधन) विधेयक, 2026’ भी ला रही है। इसका मकसद इनकम टैक्स से जुड़े पेचीदा नियमों को बिल्कुल आसान और साफ-सुथरा बनाना है, ताकि लोगों को टैक्स भरने में कोई परेशानी न हो।

राष्ट्र के सम्मान के लिए जरूरी है यह कदम

इस पूरे मामले पर केंद्र सरकार का स्टैंड बिल्कुल साफ है। सरकार का कहना है कि इस नए बिल का सिर्फ एक ही मकसद है- हमारे राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ को वह कानूनी सुरक्षा और हक दिलाना, जिसका वह हकदार है। सरकार का तर्क है कि जिस गीत ने हमें आजादी की लड़ाई में एकजुट किया, उसे भी तिरंगे और राष्ट्रगान की तरह ही पूरा कानूनी कवच मिलना चाहिए। सरकार के मुताबिक, उनका इरादा किसी पुराने विवाद को दोबारा खड़ा करना बिल्कुल नहीं है, बल्कि देश के गौरव और सम्मान को सबसे ऊपर रखना है।

युवाओं का सपना, मोदी सरकार के सुधार: जानें कैसे ‘विक्रम-1’ ने रच दिया भारत के स्पेस सेक्टर का नया इतिहास

एक तरफ दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले एक महीने से युवाओं का एक धड़ा ‘क्रांति की राजनीति’ के जरिए व्यवस्था बदलने की बात कर रहा है। वहीं, युवाओं के दूसरे धड़े ने बिना शोर-शराबे के देश के इतिहास में ऐसा कीर्तिमान दर्ज कर दिया, जिसकी गूँज सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के स्पेस सेक्टर में सुनाई दे रही है। हैदराबाद के कुछ युवा इंजीनियरों ने नौकरी के सुरक्षित रास्ते छोड़कर जोखिम चुना, भारत में ही कंपनी बनाई और आखिरकार भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा तक पहुँचा दिया।

यह सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च नहीं, बल्कि उस नए भारत की कहानी है, जहाँ युवा अब दुनिया के लिए तकनीक बनाने के बजाय उसका नेतृत्व करने का सपना देख रहे हैं।

क्यों ऐतिहासिक है विक्रम-1 की सफलता?

18 जुलाई 2026 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से स्काईरूट एयरोस्पेस का विक्रम-1 सफलतापूर्वक लॉन्च हुआ। यह भारत का पहला ऐसा ऑर्बिटल रॉकेट है, जिसे किसी निजी भारतीय कंपनी ने डिजाइन, विकसित और लॉन्च किया। मिशन ‘आगमन’ के तहत रॉकेट के कई तकनीकी पेलोड को लो-अर्थ ऑर्बिट तक पहुँचाया। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया, जहाँ निजी कंपनियाँ भी ऑर्बिटल लॉन्च करने में सक्षम हैं।

करीब 22 मीटर ऊँचा विक्रम-1 छोटे सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने के लिए बनाया गया है। इसकी क्षमता 350 किलोग्राम तक के पेलोड को लो-अर्थ ऑर्बिट में पहुँचाने की है। इसमें कार्बन-कम्पोजिट संरचना और 3D-प्रिंटेड इंजन जैसी अत्याधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है।

कैसे दो युवाओं ने स्काईरूट की शुरुआत की?

स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत 2018 में दो युवा पूर्व ISRO वैज्ञानिकों पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने रखी थी। दोनों के सामने सुरक्षित नौकरी, बेहतर वेतन और विदेश में करियर बनाने जैसे कई विकल्प थे, लेकिन उन्होंने आसान रास्ता चुनने के बजाय भारत में ही ग्लोबल लेवल स्पेस-टेक कंपनी खड़ी करने का जोखिम उठाया।
उस समय निजी क्षेत्र के लिए रॉकेट बनाना और उसे अंतरिक्ष की कक्षा तक पहुँचा लगभग असंभव माना जाता था।

इसके बावजूद दोनों ने देश के प्रतिभाशाली युवा इंजीनियरों को साथ जोड़ना शुरू किया और देखते ही देखते एक ऐसी टीम तैयार कर दी, जिसने भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट बनाने का सपना साकार कर दिखाया। ‘विक्रम-1’ की सफल लॉन्चिंग सिर्फ स्काईरूट की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन सैंकड़ों युवा भारतीय इंजीनियरों की मेहनत, नवाचार और आत्मविश्वास का नतीजा है, जिन्होंने साबित कर दिया कि भारत के युवा अब वैश्विक तकनीक का केवल हिस्सा नहीं, बल्कि उसका नेतृत्व करने की क्षमता भी रखते हैं।

कैसे मोदी सरकार के फैसलों से सपना हुआ साकार?

अगर 2020 के बाद भारत में स्पेस सेक्टर के लिए बडे़ सुधार नहीं हुए होते, तो शायद स्काईरूट जैसी कंपनियों का यह सपना इतनी जल्दी पूरा नहीं हो पाता। केंद्र की मोदी सरकार ने 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोलने का फैसला लिया। इसके बाद IN-SPACe (Indian National Space Promotion and Authorization Centre) की स्थापना हुई, जिसने निजी कंपनियों को ISRO की परीक्षण सुविधाएँ, लॉन्च पैड और तकनीक सहयोग उपलब्ध कराया।

इसके साथ ही Newspace India Limited (NSIL) के जरिए व्यावसायिक अवसर भी बढ़ाए गए। इन सुधारों ने भारतीय स्टार्टअप्स के लिए वह रास्ता खोला, जिस पर चलकर स्काईरूट जैसी कंपनियाँ ग्लोबल स्पेस मार्केट में उतर सकीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विक्रम-1 मिशन को भारत के अंतरिक्ष इतिहास का नया अध्याय बताया। लॉन्च से पहले उन्होंने कहा कि यह मिशन भारत के युवाओं की प्रतिभा, नवाचार और उद्यमशीलता का प्रतीक है तथा स्पेस सेक्टर में किए गए सुधारों का प्रत्यक्ष परिणाम है।

क्यों कहा जा रहा ‘मील का पत्थर’?

विक्रम-1 की सफलता स्काईरूट की मंजिल नहीं, बल्कि शुरुआत है। कंपनी पहले ही अधिक पेलोड क्षमता वाले विक्रम-2 जैसे अगले लॉन्च व्हीकल पर काम कर रही है। लक्ष्य है अंतरिक्ष तक पहुँच को सस्ता, तेज और नियमित बनाना ताकि भारत वैश्विक लॉन्च मार्केट में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर सके।

भारत ने पहले ही अंतरिक्ष विज्ञान में चंद्रयान और मंगलयान जैसी ऐतिहासिक सफलताएँ हासिल की हैं, लेकिन वे सरकारी एजेंसियों के नेतृत्व में थीं। विक्रम-1 ने पहली बार यह साबित किया है कि भारतीय निजी क्षेत्र भी ऑर्बिटल रॉकेट बनाकर उसे सफलतापूर्वक अंतरिक्ष तक पहुँचाने की क्षमता रखता है।

यही वजह है कि इस लॉन्च को सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत के स्पेस सेक्टर के नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है। आने वाले वर्षों में यदि भारत ग्लोबल स्पेस इकोनॉमी का बड़ा केंद्र बनता है, तो इतिहास में 18 जुलाई 2026 और विक्रम-1 के इस मिशन को उसी शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा।

सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में दिल्ली पुलिस ने कराया भर्ती, क्या इरोम शर्मिला की तरह ही होगा इस खेल का अंत?

जंतर-मंतर पर भूख-हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है। दिल्ली पुलिस ने कहा कि उसने हाई कोर्ट के आदेश पर ऐसा किया। हालाँकि सोनम वांगचुक की पत्नी ने दिल्ली पुलिस द्वारा उन्हें अस्पताल में न सिर्फ भर्ती कराने का विरोध किया, बल्कि उनकी अनुमति के बिना किसी तरह की दवाई-भोजन देने का भी विरोध किया।

यहाँ ये बताना अहम है कि जंतर-मंतर पर पिछले काफी दिनों से एक राजनीतिक तमाशा चल रहा है, जिसे युवाओं के विरोध प्रदर्शन के नाम पर पेश किया जा रहा है। अभिजीत दीपके द्वारा स्थापित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) इस प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही है। दावा किया जा रहा है कि यह आंदोलन भारतीय छात्रों के भविष्य की रक्षा करने और पेपर लीक सहित शिक्षा व्यवस्था में हुई कई चूकों को लेकर केंद्र सरकार से जवाबदेही तय कराने के लिए किया जा रहा है।

हालाँकि इस पूरे प्रदर्शन का केंद्र मुख्य रूप से सोनम वांगचुक हैं, जो उपरोक्त माँगों के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठे। वह 28 जून से केवल पानी पीकर अनशन कर रहे थे, हालाँकि शनिवार (18 जुलाई 2026) को दिल्ली पुलिस हाई कोर्ट के निर्देश के बाद उन्हें जबरन अस्पताल ले गई।

इसलिए आमतौर पर इस तरह के मुद्दों पर सक्रिय रहने वाले समूहों में शामिल CJP, जिसे आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़ा बताया जाता है, अन्य विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके सामने मोदी सरकार को खलनायक के रूप में दिखाया जा सके।

हालाँकि इन सभी ने जानबूझकर एक अहम सवाल को नजरअंदाज किया है। वह कौन-से रचनात्मक समाधान, वैकल्पिक प्रस्ताव या व्यवहारिक आलोचना पेश कर रहे हैं? यह सच है कि सरकार की कमियों, खासकर देश के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर, उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। लेकिन ये चुनौतियाँ न तो नई हैं और न ही अभूतपूर्व।

यह एक व्यवस्थागत समस्या है, जिसके लिए गहन और सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसमें राजनीतिक नाटकबाजी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और छात्रों पर बिना किसी स्वार्थ या छिपे उद्देश्य के वास्तविक ध्यान दिया जाना चाहिए। हालाँकि यह बात वांगचुक पर लागू होती हुई नहीं दिखती, क्योंकि उनका अतीत भी काफी विवादास्पद रहा है।

छात्रों की समस्याओं से निपटने के लिए उनकी कार्ययोजना क्या है या वे वास्तव में उनके समाधान में क्या योगदान दे सकते हैं, इस पर स्पष्टता माँगने के बजाय उनकी झूठी महिमा गढ़ने का एक सुनियोजित प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

दिवंगत कॉन्ग्रेस विधायक के पुत्र वांगचुक को हाल ही में राजकुमार हिरानी की फिल्म 3 इडियट्स के किरदार फुंसुख वांगडू का वास्तविक जीवन का रूप बताया गया, जबकि स्वयं उन्होंने पहले इस दावे से इनकार किया था। इसके अलावा फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी और आमिर खान, जिन्होंने फिल्म में यह भूमिका निभाई थी, दोनों ने भी स्पष्ट किया था कि उनकी फिल्म सोनम वांगचुक के जीवन से प्रेरित नहीं थी।

जब वांगचुक की भूख हड़ताल के बीच जल उठा लेह

छात्रों से जुड़ी गंभीर समस्याओं को मजाक, राजनीतिक दिखावे और एक स्पष्ट प्रहसन तक सीमित कर दिया गया है। हालाँकि यह वांगचुक के मामले में कोई नई बात नहीं लगती, क्योंकि वह पहले भी इसी तरह के तरीके अपना चुके हैं। पिछले साल सितंबर में उन्होंने लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और उसे भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की माँग को लेकर लेह में भूख हड़ताल शुरू की थी।

हालाँकि इसके बाद भड़के हिंसक प्रदर्शनों के दौरान स्थानीय भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यालय में आग लगा दी गई, चार लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत गिरफ्तार करना पड़ा।

उस समय लद्दाख के पुलिस महानिदेशक (DGP) रहे एसडी सिंह जमवाल ने कहा था, “हाल ही में हमने पाकिस्तान के एक पाकिस्तान इंटेलिजेंस ऑपरेटिव को गिरफ्तार किया था, जो पाकिस्तान को सूचनाएँ भेज रहा था। इसका रिकॉर्ड हमारे पास है। वांगचुक पाकिस्तान में डॉन के एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वह बांग्लादेश भी गए थे। इसलिए उन पर एक बड़ा सवालिया निशान है। मामले की जाँच की जा रही है।”

उन्होंने कहा कि वांगचुक के विरोध मंच ने ऐसा माहौल बनाया, जिसने हिंसा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कीं और यह सब पहले से योजनाबद्ध तथा समन्वित था। उन्होंने आगे कहा, “वांगचुक का लोगों को भड़काने का इतिहास रहा है। उन्होंने अरब स्प्रिंग, नेपाल और बांग्लादेश का उल्लेख किया है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के उल्लंघन को लेकर उनकी फंडिंग की जांच चल रही है।”

लेह के जिला मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था, “हिरासत के आधारों में उल्लेखित अनुसार वांगचुक राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और समुदाय के लिए आवश्यक सेवाओं के प्रतिकूल गतिविधियों में शामिल थे। मैं उनकी हिरासत से संतुष्ट था और अब भी संतुष्ट हूँ।”

गृह मंत्रालय ने भी कहा था कि साथी नेताओं की ओर से बार-बार अपील किए जाने के बावजूद वांगचुक ने अपना अनशन जारी रखा, जैसा कि वह इस समय भी कर रहे हैं। मंत्रालय के अनुसार, उन्होंने “अरब स्प्रिंग और नेपाल में जनरेशन Z के प्रदर्शनों जैसे भड़काऊ संदर्भ देकर जनता को गुमराह किया।”

आखिरकार मार्च में वांगचुक को 170 दिन बाद जोधपुर जेल से रिहा कर दिया गया। उनकी ये गतिविधियाँ उनके एजेंडे की स्पष्ट झलक पेश करती हैं और यह भी संकेत देती हैं कि आगे क्या हो सकता है।

सोनम वांगचुक से पहले थीं इरोम शर्मिला

जहाँ सोनम वांगचुक के समर्थक उन्हें गलती से फिल्मों के काल्पनिक किरदारों और यहाँ तक कि अन्ना हजारे के अनशन से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं भारत में एक ऐसी शख्सियत पहले भी रही है जिसने नई दिल्ली पर दबाव बनाने के लिए 16 वर्षों तक इसी तरह का तरीका अपनाया था। उनका नाम इरोम शर्मिला चानू है और वह मणिपुर से हैं।

5 नवंबर 2000 को मलोम में असम राइफल्स ने एक बस स्टॉप पर 10 नागरिकों को गोली मार दी थी। इससे पहले हमलावरों ने पास से गुजर रहे अर्धसैनिक बल के काफिले पर बम हमला किया था। इस घटना के बाद इरोम शर्मिला ने इसे आधार बनाकर एक ऐसा आंदोलन शुरू किया, जो 16 वर्षों तक चला।

उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया और सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) के विरोध में भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह कानून उस संवेदनशील राज्य में लागू था, जो दशकों से हिंसक उग्रवाद से जूझ रहा था और जिसका असर आम नागरिकों के साथ-साथ सुरक्षा बलों पर भी पड़ा था।

उनका उद्देश्य केंद्र सरकार पर इस कानून को वापस लेने का दबाव बनाना था, जबकि ऐसे क्षेत्रों में सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए इस कानून को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालाँकि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) – दोनों सरकारों ने उनकी इस रणनीति को स्वीकार नहीं किया।

उनका मानना था कि ऐसा करने से क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता पर खतरा पैदा हो सकता था, साथ ही सीमा पार आतंकवाद और जातीय तनाव बढ़ने की आशंका भी थी। बेशक कोई भी व्यक्ति लंबे समय तक बिना भोजन के जीवित नहीं रह सकता। इसलिए इरोम शर्मिला को भोजन देने के लिए उनकी नाक में नासोगैस्ट्रिक ट्यूब डाली गई।

दिलचस्प बात यह है कि इस ट्यूब को व्यक्ति स्वयं भी निकाल सकता है, लेकिन यह कहानी बनाई गई कि सरकार उन्हें ‘जबरन खाना खिला रही है’, ताकि उनके आंदोलन को अधिक महत्व दिया जा सके। बेशक मामला इतना आगे नहीं बढ़ता, लेकिन इरोम ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे का इस्तेमाल अपनी सार्वजनिक छवि बनाने के लिए किया।

बाद में उन्होंने इसी छवि के आधार पर राजनीति में कदम रखा, हालाँकि उनका राजनीतिक सफर सफल नहीं रहा। इस दौरान भारत विरोधी वैश्विक ताकतों को भी भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने का अवसर मिला। यह उल्लेखनीय है कि विशेष कानून और प्रावधान किसी क्षेत्र की परिस्थितियों को देखते हुए लागू किए जाते हैं।

समय के साथ जब हालात बदले, तो मोदी सरकार के दौरान इन विशेष कानूनों को भी धीरे-धीरे हटाया गया। बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और उग्रवाद की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आने के कारण पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में AFSPA का दायरा काफी घटाया गया।

त्रिपुरा और मेघालय से इसे पूरी तरह हटा दिया गया, जबकि असम, नागालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में इसे केवल कुछ जिलों और पुलिस थाना क्षेत्रों तक सीमित कर दिया गया। हालाँकि तथ्यों से काफी दूर इरोम शर्मिला का यह प्रदर्शनकारी आंदोलन जारी रहा और वह लगातार भारतीय राज्य पर अपनी माँगें मानने का दबाव बनाती रहीं।

लेकिन हर दिखावा एक न एक दिन खत्म होता है और उनके मामले में भी ऐसा ही हुआ, जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया। 9 अगस्त 2016 को उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया और राजनीति में कदम रखा।

उन्होंने ‘पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस’ (PRJA) नामक पार्टी बनाई और 2017 के मणिपुर विधानसभा चुनाव में थौबल सीट से चुनाव लड़ा, जहाँ उनका मुकाबला पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह से था। ‘आयरन लेडी ऑफ मणिपुर’ के नाम से प्रसिद्ध 54 वर्षीय इरोम शर्मिला को चुनाव में केवल 90 वोट मिले।

मार्च 2017 में विधायक बनने का उनका सपना बुरी तरह टूट गया। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि यदि वह सफल नहीं हुईं तो 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगी, लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि वह ‘इस राजनीतिक व्यवस्था से तंग आ चुकी हैं’ और सक्रिय राजनीति छोड़ दी।

वर्तमान में उनकी शादी एक ब्रिटिश नागरिक से हो चुकी है और वह अपने पति और जुड़वा बेटियों के साथ बेंगलुरु में शांत जीवन बिता रही हैं।

क्या सोनम वांगचुक का अनशन भी इरोम शर्मिला की राह पर?

इरोम शर्मिला की प्रासंगिक बने रहने की कोशिश अंततः उनके असफल राजनीतिक करियर की कठोर सच्चाई पर जाकर समाप्त हुई। अब ऐसा प्रतीत होता है कि सोनम वांगचुक भी लगातार सुर्खियों में बने रहने की इसी राह पर चल रहे हैं।

यदि ऐसा नहीं होता, तो वह रचनात्मक संवाद शुरू करते या कम से कम छात्रों द्वारा उठाई गई समस्याओं के समाधान के लिए कोई सकारात्मक दिशा प्रस्तुत करते। लेकिन उन्होंने CJP का साथ चुना और छात्रों के मुद्दे को राजनीतिक रंग दे दिया, जिससे विवाद पैदा हुआ और वास्तव में प्रभावित छात्रों के मुद्दों से ध्यान हटकर उन पर केंद्रित हो गया।

वांगचुक की इस नाटकीय शैली ने उस मामले को और उलझा दिया है, जो सरकार और छात्रों के बीच बातचीत से बिना किसी राजनीतिक रंग के सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता था। लेकिन अब यह पूरा मुद्दा एक व्यक्ति और उसकी गतिविधियों तक सिमटकर रह गया है।

वहीं इस प्रदर्शन की गंभीरता पर भी सवाल उठे, जब CJP के नेता, जिनमें अभिजीत दीपके भी शामिल हैं, वांगचुक के अनशन के दौरान उनके साथ रहते हुए पकौड़े, कचौड़ी और अन्य नाश्ते का आनंद लेते हुए दिखाई दिए थे। हालाँकि सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा अस्पताल लिए जाने के बाद अभिजीत दीपके ने भूख हड़ताल शुरू करने की घोषणा की है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

पूजा पाल से लेकर रोली-ऋचा तक… जब-जब सपा के शीर्ष नेतृत्व पर उठाए सवाल, तब-तब अखिलेश के पाले गुंडों ने गैर-यादव महिला नेताओं के चरित्र पर किया वार

समाजवादी पार्टी (सपा) खुद को ‘लोहियावादी’ और ‘सामाजिक न्याय’ का पैरोकार कहती नहीं थकती। लेकिन जब बात महिलाओं के सम्मान और पार्टी के भीतर उनके आत्मसम्मान की आती है, तो इस दल का असली और बेहद खौफनाक चेहरा सामने आ जाता है। सपा का एक पुराना और ढर्रे वाला इतिहास रहा है, जहाँ महिलाओं को केवल एक राजनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

यदि कोई महिला नेता, चाहे वह पार्टी के भीतर हो या बाहर, सपा की नीतियों, उनके नेताओं की हरकतों या किसी खास वर्ग के वर्चस्व पर सवाल उठाने की जुर्रत कर दे, तो पार्टी का पूरा तंत्र और उनके पाले हुए गुंडे-मवाली उस महिला के चरित्र हनन पर उतारू हो जाते हैं।

चाहे वह पूजा पाल हों, रोली तिवारी मिश्रा हों या फिर ऋचा राजपूत (लोधी), इन सभी महिलाओं ने जब-जब सपा के शीर्ष नेतृत्व से तीखे सवाल किए, तब-तब इन्हें जवाब में गालियाँ, धमकियाँ और बेहद अभद्र ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा।

समाजवादी पार्टी के भीतर गैर-यादव समाज और महिलाओं के लिए भाषा का जो स्तर अपनाया जाता है, वह इतना ओछा और शर्मनाक है कि कोई भी सभ्य समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता। पार्टी छोड़ने के बाद या पार्टी में रहते हुए आवाज उठाने वाली महिलाओं को किस तरह गंदे ढंग से निशाना बनाया जाता है।

पूजा पाल का सीधा सवाल: ‘सपा में सिर्फ सैफई परिवार, अतीक-मुख्तार और आजम का ही भविष्य’

ताजा विवाद कौशांबी की चायल विधायक सीट से पूजा पाल के एक राजनीतिक सवाल के बाद शुरू हुआ, जिसने सपा के जातिवादी और संकीर्ण दायरे पर सीधी चोट की। पूजा पाल ने अखिलेश यादव को टैग करते हुए एक X पर पोस्ट किया, “श्री अखिलेश यादव जी, आप पूछ रहे थे कि मुझे क्या मिला? आज आपके प्रश्न का जवाब देती हूँ। अखिलेश जी, मुझे गर्व है कि मैं पाल समाज की बेटी हूँ और भाजपाई हूँ। मैं उस पार्टी में हूँ जहाँ चाय वाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है। ये मेरी क्षमता पर निर्भर करता है। अखिलेश जी, मैं उस पार्टी में हूँ, जहाँ पाल समाज का बेटा या बेटी विधायक, सांसद, मंत्री, उपमुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन सकता है। सपा में अतीक, मुख्तार, आजम और सैफई परिवार के अलावा किसी का कोई भविष्य न पहले कभी था और ना होगा।”

इस पोस्ट के बाद सपा के जातिवादी ट्रोल्स ने पूजा पाल के खिलाफ मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं। एक पिछड़े समाज की बेटी ने जब योग्यता और हिस्सेदारी पर बात की, तो सपा कुनबा उनके चरित्र और जाति पर हमला करने लगा। यह दिखाता है कि सपा में गैर-यादव समाज के नेताओं को सिर्फ एक सीमा तक ही बर्दाश्त किया जाता है।

रोली तिवारी मिश्रा: ‘सपा में राजनीति करनी है तो गालियाँ सुनने की आदत डाल लो’

सपा की पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ रोली तिवारी मिश्रा ने जब सनातन धर्म और श्रीरामचरितमानस के सम्मान में आवाज उठाई, तो उन्हें पार्टी के भीतर ही प्रताड़ित किया गया। रोली तिवारी को एक गुंडे ने मैसेज में बेहद अभद्र गालियाँ दीं, जिसकी डीपी पर अखिलेश यादव की तस्वीर लगी थी। इस पर रोली ने अखिलेश यादव को घेरते हुए लिखा था, “श्री अखिलेश यादव जी आपकी DP लगाकर किये गए इस गुंडे के मैसेज को ध्यान से पढ़ियेगा और सोंचियेगा ये मैसेज आपकी बेटियों टीना और अदिति को किया गया है फिर बताइयेगा कि आपको कैसा लग रहा है ?? अगर बुरा लगे तो अपनी पार्टी में पल रहे गुंडों पर अंकुश लगाइये। अगर आप की पार्टी के ये गुंडे नहीं सुधरे तो एक दिन आ0 योगी आदित्यनाथ जी इन गुंडों का खात्मा ही कर देंगे। क्या श्रीरामचरितमानस सम्मान यात्रा निकालना इतना बड़ा अपराध हो गया कि धमकी और गालियाँ मिल रही हैं ??”

यही नहीं, रोली तिवारी मिश्रा ने 17 जून के एक ट्वीट में सपा के अंदरूनी कचरे को साफ करते हुए लिखा था कि अखिलेश यादव का एक सलाहकार (जो जाति से ठाकुर है) ही 2016 की लड़ाई का सूत्रधार था। रोली ने बताया कि जब वह राष्ट्रीय प्रवक्ता थीं और उन्हें सपाई हिस्ट्रीशीटर मनुरोजन यादव ने गालियाँ दीं, तो रोली ने एफआईआर (FIR) करने की बात कही। इस पर उन्हें दोटूक और ओछा जवाब मिला था, “सपा में राजनीति करनी है तो अहीरों से र@#$ कहने की आदत डलवा लो पंडिताइन।” यह बयाँ करता है कि सपा के भीतर महिलाओं को किस मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है।

ऋचा राजपूत के खिलाफ सपा के ऑफिशियल हैंडल की अश्लीलता: ‘शूर्पनखा-पूतना’ जैसी अभद्र भाषा

महिला उत्पीड़न और ओछेपन की पराकाष्ठा तब भी देखने को मिली जब समाजवादी पार्टी के ‘आधिकारिक ट्विटर हैंडल’ से डॉ ऋचा राजपूत (लोधी) को खुलेआम अपमानित किया। जिस मनीष जगन अग्रवाल को बचाने के लिए खुद अखिलेश यादव DGP मुख्यालय से लेकर जेल के चक्कर काट रहे थे, उसके समर्थन में सपा के हैंडल से ऋचा राजपूत के खिलाफ बेहद शर्मनाक ट्वीट किए गए।

ऋचा राजपूत को समाजवादी पार्टी के ऑफिश्यिल हैंडल से लिखा, “पूतनाएँ और शूर्पनखाएँ ज्ञान ना दें, वे अपना राक्षसी काम करें जैसा वे करती हैं, अब चल निकल भाग, तुझे सम्मान इज्जत दी वो तुझे हजम नहीं हुई, तू जा, जाकर चिनमयानंद, राम रहीम, सेंगर की सेवा कर, तुझे वहीं सही लड्डू मिलेगा, वही प्रसाद लड्डू जो आश्रम सीरिज में बाबा निकाला खिलाता है।”

समाजवादी पार्टी के हैंडल का दूसरा ट्विट, “दीदी आप बस तो बस चोरी हुई टोंटी, टोंटा नल का जत्था हत्था जो भी हो उसके बारे में बताओ, बकायदा फिटिंग करके संतुष्टिजनक सर्विस मिलेगी, वैसे लगता है भाजपा नेता चिन्मयानंद और कुलदीप सेंगर की स्किल एंड सर्विस से आपकी काफी शिकायतें हैं?”

समाजवादी पार्टी के हैंडल से एक महिला डॉक्टर और नेता के खिलाफ ‘फिटिंग’, ‘संतुष्टिजनक सर्विस’ और ‘विशिष्ट सेवाएँ’ जैसे घिनौने और द्विअर्थी शब्दों का प्रयोग करना यह साफ करता है कि सपा में महिलाओं को लेकर किस कदर की विकृत सोच भरी हुई है।

‘लड़के हैं, गलती हो जाती है’ की विरासत ढोते अखिलेश यादव और उनका डिजिटल गुंडा तंत्र

मुलायम सिंह यादव का वह दौर तो सबने देखा था जब उन्होंने बलात्कारियों का यह कहकर बचाव किया था कि ‘लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है।’ आज उनके बेटे अखिलेश यादव ने उस सोच को डिजिटल रूप दे दिया है। जब रोली तिवारी को ‘रं@#$’ सुनने की सलाह दी जाती है, जब ऋचा राजपूत को ‘शूर्पनखा’ कहकर अश्लील तंज कसे जाते हैं, और जब पूजा पाल जैसी पिछड़ी जाति की मजबूत महिला नेता को अपमानित किया जाता है, तब अखिलेश यादव की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ इन गुंडों की पीठ थपथपाती है।

अखिलेश यादव सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुद को कितना भी आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने का ढोंग कर लें, लेकिन हकीकत यही है कि उनकी पार्टी आज भी अपराधियों, माफियाओं (अतीक-मुख्तार) और लंपट तत्वों के भरोसे ही सांस ले रही है। जब खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष एक महिला विरोधी ट्रोलर (मनीष जगन) को बचाने के लिए थाने-थाने दौड़ते हैं, तो नीचे के कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ना लाजिमी है।

मुलायम परिवार की आँखों में खटक रहा राम मंदिर, ससुर ने कारसेवकों का कराया नरसंहार-पति ने चंदाचोरी पर फैलाई नफरत: अब डिंपल यादव बोली- राम मंदिर में बुलडोजर क्यों नहीं चला?

समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा सुधार और नीट (NEET) पेपर लीक के मुद्दे को लेकर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के समर्थन में उतरी हुई हैं। जंतर-मंतर पहुँचकर डिंपल यादव ने वांगचुक का समर्थन तो किया, लेकिन इस दौरान मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले को लेकर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर तीखा हमला बोला। डिंपल यादव ने राम मंदिर और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर एक ऐसा विवादित बयान दे दिया है, जिसने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक की सियासत में भूचाल ला दिया है।

राम मंदिर पर डिंपल का ‘बुलडोजर’ राग और पुराना इतिहास

डिंपल यादव ने भाजपा सरकार को घेरते हुए कहा कि देश में इस समय ‘बुलडोजर सरकार’ चल रही है, जो छात्रों के भविष्य पर बुलडोजर चला रही है। उन्होंने मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले का जिक्र करते हुए सवाल उठाया। डिंपल ने कहा, “जब राम मंदिर में इतनी बड़ी चोरी हो गई तो वहाँ पर बुलडोजर थक गया है। तो आखिर बुलडोजर क्यों थम गया, सवाल इस बात का है।”

इस बयान के बाद अब डिंपल यादव खुद चौतरफा घिर गई हैं। आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि क्या एक कर्मचारी पर लगे कथित चोरी के आरोप के आधार पर पवित्र राम मंदिर की तुलना किसी अवैध निर्माण से करना जरा भी उचित है? इतिहास गवाह है कि मुलायम सिंह यादव के समय में अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई गई थीं, जिसे लोग नरसंहार तक कहते हैं।

इसके बाद अखिलेश यादव ने राम मंदिर के चंदे को लेकर बयानबाजी की थी। अब डिंपल यादव के इस बयान के बाद लोग पूछ रहे हैं कि क्या डिंपल भी राम मंदिर पर बुलडोजर चलवाकर वहाँ पुराना बाबरी ढांचा वापस देखना चाहती हैं? पूरा यादव परिवार ही राम विद्रोही बनकर सामने आ रहा है।

अखिलेश का पुराना बयान और पूरा परिवार घेरे में

अखिलेश यादव ने भी पहले राम मंदिर के संदर्भ में एक बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि हमें सांचा नहीं, बल्कि ‘ढांचा बदलना’ होगा। उनके इस पुराने बयान को डिंपल यादव के ताजा बयान से जोड़कर देखा जा रहा है। देश जानता है कि पूरा मुलायम परिवार शुरू से ही राम विरोधी रहा है और डिंपल का यह बयान उसी सोच को आगे बढ़ाता है। अब जंतर-मंतर के बहाने इनके अंदर की कड़वाहट भी बाहर आ रही है। मुद्दा पेपर लीक मामले का है, लेकिन निशाना राम मंदिर पर आकर रूक जाता है।

अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर का निर्माण होने के बाद से ही यह मंदिर मुलायम परिवार की आँखों में और ज्यादा खटकने लगा है। राम मंदिर में सुरक्षा और व्यवस्था से जुड़े एक कर्मचारी पर चोरी का आरोप क्या लगा, डिंपल यादव ने सीधे पूरे मंदिर परिसर पर बुलडोजर चलाने की माँग जैसी भाषा का इस्तेमाल कर दिया। जनता के बीच अब यह सवाल तेजी से गूँज रहा है कि क्या एक कथित चोरी के बहाने पूरे राम मंदिर को निशाना बनाना और वहाँ बुलडोजर की बात करना तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा नहीं है?

सपा सांसदों का जमावड़ा

इस पूरे सियासी घमासान की शुरुआत सोनम वांगचुक के धरने से जुड़ी हुई है। सोनम वांगचुक शिक्षा में बड़े सुधार, नीट पेपर लीक मामले में सख्त एक्शन और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर पिछले 21 दिनों से जंतर-मंतर पर कड़े धरने पर बैठे हैं। वे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले यह बड़ा आंदोलन चला रहे हैं। इतने दिनों से लगातार अनशन पर रहने के कारण वांगचुक की तबीयत काफी बिगड़ चुकी है और शनिवार (18 जुलाई) सुबह ही अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

सोनम वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच समाजवादी पार्टी के सांसदों का एक बड़ा दल लगातार जंतर-मंतर पहुँच रहा है। इससे पहले सपा सांसद प्रिया सरोज भी वांगचुक के अनशन स्थल पर पहुँची थीं और उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक उनके मुद्दों को उठाने का वादा किया था। खुद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सोनम वांगचुक से अपना अनशन समाप्त करने की अपील की थी। लेकिन अब इस आंदोलन के मंच का इस्तेमाल राजनीतिक बयानों के लिए होने लगा है।

‘अब कोई भी खुद को रिपोर्टर बताता है’: जिन पत्रकारों को मुस्लिम भीड़ ने पीटा, उन्हें ही दिल्ली HC देने लगा नसीहत; आबिद अली और फुरकान को दी जमानत

दिल्ली हाई कोर्ट ने 16 जुलाई 2026 को पिछले साल सीमापुरी में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की कवरेज के दौरान पत्रकारों पर हुए हमले के मामले में आरोपित आबिद अली और फुरकान को जमानत दे दी।

बता दें कि 04 जुलाई 2025 को रिपोर्टर सुप्रिया पाठक और उनके कैमरामैन श्याम पर उस समय बेरहमी से हमला किया गया था, जब वे सीमापुरी इलाके में सरकारी जमीन पर बने अवैध अतिक्रमण और झुग्गियों की रिपोर्टिंग कर रहे थे। यह इलाका सीमापुरी थाना क्षेत्र में आता है।

पीड़ितों के अनुसार, बुर्का पहने महिलाओं और नाबालिग लड़कों की भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। दोनों को बुरी तरह पीटा गया और उनके कैमरे सहित अन्य सामान, नकदी और निजी सामान भी छीन लिया गया। ऑपइंडिया से बातचीत में सुप्रिया पाठक और श्याम ने बताया था कि भीड़ ने उन्हें अलग-अलग घेरकर हमला किया। उन्होंने कहा कि उन पर पथराव किया गया और बेल्ट से भी मारा गया। हमले के दौरान दोनों अपनी जान बचाकर वहाँ से निकलने की कोशिश करते रहे।

इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस की सिंगल बेंच ने की। सुनवाई के दौरान आरोपित आबिद अली ने कोर्ट में कहा कि वह उस बस के अंदर नहीं गया था, जिसमें हमला होने के बाद दोनों पत्रकार अपनी जान बचाने के लिए छिपे थे। उसने अपने बचाव में यह भी दावा किया कि उसकी अम्मी ने उसे बस में चढ़ने से रोक दिया था।

दिलचस्प बात यह है कि आबिद अली के वकील ने यह भी दलील दी कि पीड़ित किसी ‘बड़े या स्थापित मीडिया संस्थान’ से नहीं जुड़े थे, बल्कि केवल एक ‘यूट्यूब चैनल के लिए फ्रीलांस रिपोर्टिंग’ कर रहे थे। वहीं दूसरे आरोपित फुरकान ने कोर्ट में दावा किया कि घटना के समय वह मौके पर मौजूद ही नहीं था। उसके वकील ने यह भी कहा कि दोनों पत्रकारों को केवल ‘मामूली चोटें’ आई थीं।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले के चार अन्य आरोपितों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। आबिद अली और फुरकान ही ऐसे आरोपित थे, जो 05 जुलाई 2025 से जेल में बंद थे।

सुनवाई के दौरान जाँच अधिकारी और सब इंस्पेक्टर वीरेंद्र कुमार कोर्ट में मौजूद नहीं थे। साथ ही चार्जशीट में भी कुछ ‘विसंगतियाँ’ थीं, जैसे फुरकान द्वारा पहनी गई शर्ट के रंग को लेकर अलग-अलग जानकारी दी गई थी। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जस्टिस गिरीश कठपालिया ने आबिद अली और फुरकान को ₹10 हजार के निजी मुचलके पर जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा, “किसी भी आरोपित को बिना वजह अनिश्चित समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता।”

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने कोर्ट से कहा कि आबिद अली और फुरकान को जमानत नहीं दी जानी चाहिए। उनका कहना था कि दोनों आरोपितों ने उस समय पत्रकारों पर हमला किया, जब वे भीड़ से बचकर वहाँ से निकलने की कोशिश कर रहे थे।

सुनवाई के दौरान जस्टिस गिरीश कठपालिया ने इस बात पर भी चर्चा की कि किसी व्यक्ति को ‘पत्रकार’ किस आधार पर माना जा सकता है। यह चर्चा ऐसे मामले में हुई, जिसमें दो रिपोर्टरों पर हिंसक भीड़ द्वारा हमला किए जाने का आरोप है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “मामला संवेदनशील था। इसके बावजूद शिकायतकर्ताओं ने रिपोर्टिंग शुरू करने से पहले स्थानीय पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी। हालाँकि, इससे उन पर हुए हमले को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन अभियोजन पक्ष ने यह तर्क दिया है कि यह हमला प्रेस की आजादी पर हमला था, इसलिए इस पहलू पर भी विचार करना जरूरी है।”

इसके बाद जस्टिस कठपालिया ने अपने फैसले में करीब तीन पन्नों तक भारतीय मीडिया की मौजूदा स्थिति पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी स्पष्ट नियम और संगठन के काम कर रहा है। उन्होंने अपने आदेश में लिखा, “आज के समय में मोबाइल फोन और माइक्रोफोन रखने वाला लगभग कोई भी व्यक्ति खुद को ‘रिपोर्टर’ बता सकता है।”

जस्टिस कठपालिया ने आगे कहा कि ‘खुद को पत्रकार’ बताने वाले कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो लोगों के सामने अचानक माइक्रफोन लेकर पहुँच जाते हैं। और अगर सामने वाला व्यक्ति उनके सवालों का जवाब नहीं देता, तो वे यह कहने लगते हैं कि ‘वह सवालों से बच’ रहा है। जस्टिस ने दावा किया कि इस तरह की रिपोर्टिंग से जनता के बीच ‘गुमराह करने वाली धारणा’ बनती है और लोगों पर ‘बेवजह दबाव’ पड़ता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में आगे कहा, “इतनी ही चिंता की बात यह भी है कि मीडिया का एक वर्ग चुनिंदा रिपोर्टिंग, सनसनी फैलाने वाली खबरों या बिना पुष्टि वाले आरोपों के जरिए किसी खास सामाजिक समूह को निशाना बनाता है या उसकी छवि खराब करता है।” कोर्ट ने कहा कि ऐसी रिपोर्टिंग से समाज में विभाजन बढ़ सकता है, सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है और कानून-व्यवस्था की स्थिति भी बिगड़ सकती है।

यह ध्यान देने वाली बात है कि यह मामला सीमापुरी में सरकारी जमीन पर हुए अवैध अतिक्रमण की रिपोर्टिंग से जुड़ा है। रिपोर्टर सुप्रिया पाठक और उनके कैमरामैन श्याम इसी विषय पर रिपोर्टिंग कर रहे थे, जब उन पर हमला हुआ था। अब, हमले का शिकार हुए इन पत्रकारों के मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ‘पत्रकारिता की नैतिकता’ और मीडिया की भूमिका पर भी टिप्पणी की, जबकि इसी मामले में हिंसा के आरोपितों को जमानत भी दे दी गई।

इस फैसले में कोर्ट का लहजा जरूरत से ज्यादा उपदेश देने वाला और संरक्षणवादी नजर आता है। ऐसा भी लगता है कि कहीं न कहीं पीड़ितों पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि कोर्ट ने इसी मामले के जरिए पत्रकारों के लिए नया नियामक ढाँचा बनाने की बात भी कही।

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा, “अब समय आ गया है कि संसद ऐसा कानून बनाने पर विचार करे, जिससे प्रेस की आजादी बनी रहे, लेकिन साथ ही पत्रकारों की जवाबदेही, पेशेवर नैतिकता, कानून का सम्मान, नागरिकों के अधिकार और जनहित भी सुरक्षित रहें।”

इस मामले में अब सभी आरोपित जमानत पर बाहर हैं। वहीं जिन पत्रकारों पर हमला हुआ था, उन्हें एक साल बाद कोर्ट में ‘यूट्यूब चैनल के लिए काम करने वाले फ्रीलांसर’ के रूप में पेश किया गया, जिससे उनकी पत्रकारिता की पहचान और भूमिका पर सवाल खड़े होने की बात कही गई है।

नूपुर शर्मा केस की याद दिलाता मामला

यह पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने हिंसा करने वालों की जिम्मेदारी तय करने के बजाय पीड़ित पक्ष पर ही सवाल उठाए हों। जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा को पैगंबर मोहम्मद पर की गई उनकी टिप्पणी को लेकर कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि उदयपुर में हुई नृशंस हत्या जैसी घटनाओं के लिए उनकी टिप्पणियाँ जिम्मेदार हैं और उन्हें ‘पूरे देश से माफी माँगनी चाहिए।’

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने कहा था, “जिस तरह इन्होंने पूरे देश में लोगों की भावनाएँ भड़काई हैं, उसके लिए यही अकेले जिम्मेदार हैं। देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए यही महिला जिम्मेदार है।”

नुपुर शर्मा को जिम्मेदार ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस्लामी कट्टरपंथियों की ओर से की गई हिंसा और नफरत को नजरअंदाज कर दिया था। जबकि नुपुर शर्मा ने केवल वही बातें कही थीं, जिनका उल्लेख इस्लामी हदीसों में मिलता है और जिन्हें दुनिया भर के कई इस्लामी स्कॉलर भी स्वीकार करते हैं।

एक धर्मनिर्पेक्ष और लोकतांत्रिक देश की सर्वोच्च अदालत, जिससे निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की उम्मीद की जाती है, उसने उस समय ऐसा रुख अपनाया जो मध्यकालीन चर्च के मुकदमों की याद दिलाता है। दिल्ली हाई कोर्ट का हालिया फैसला भी इस मामले से अलग नहीं है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)