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BJP की सहयोगी पार्टी ‘अपना दल’ के प्रत्याशी ने जमाया आजम खान के गढ़ में कब्जा: अब्दुल्ला आजम की विधायकी जाने के बाद खाली हुई थी सीट

उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले में स्वार विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भजापा गठंबंधन को जीत मिली है। भाजपा के सहयोगी अपना दल सोनेलाल के शफीक अंसारी ने इस सीट पर समाजवादी पार्टी की अनुराधा चौधरी को शिकस्त दी है। कभी इस सीट पर आजम खान का खासा प्रभाव माना जाता था।

इस सीट से आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम 2 बार विधायक रहे हैं। अब्दुल्ला की विधायकी निरस्त होने के बाद इस सीट पर उपचुनाव हुआ था जिसे बरकरार रखने के लिए सपा ने पूरी ताकत झोंक दी थी। हालाँकि बाजी अपना दल के शफीक अंसारी ने मारी। वह अब यूपी में एनडीए सरकार के पहले मुस्लिम विधायक होंगे।

वहीं एक अन्य विधानसभा सीट छानबे को भी भाजपा के सहयोगी अपना दल सोनेलाल गुट की प्रत्याशी रिंकी कोल ने जीत लिया है। रिंकी ने समाजवादी पार्टी की कीर्ति को 9589 वोटों से हराया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक स्वार विधानसभा सीट से अपना दल सोनेलाल गुट के प्रत्याशी शफीक अहमद अंसारी ने विजय पाई। शफीक को कुल 68630 वोट मिले। शफीक के खिलाफ समाजवादी पार्टी ने अनुराधा चौधरी को चुनाव लड़ाया था। अनुराधा को कुल 59906 मत हासिल हुए। इस सीट पर तीसरे नंबर पर पीस पार्टी की डॉ नाजिया सिद्दीकी रहीं। उन्हें 4688 वोट मिल पाए। यहाँ चौथे नंबर पर NOTA रहा। 3 अन्य प्रत्याशी हजार वोटों के आंकड़ों को नहीं छू पाए।

बतातें चले कि फरवरी 2023 में एक पुराने मामले में सजा मिलने के बाद अब्दुल्ला आजम की विधायकी चली गई थी। तब से यह सीट खाली चल रही थी जिस पर अब उपचुनाव में भाजपा के होगी अपना दल सोनेलाल ने परचम लहराया है।

छानबे विधानसभा में भी अपना दल की जीत

मिर्जापुर की छानबे विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी भाजपा के सहयोगी अपना दल सोनेलाल पार्टी को जीत हासिल हुई है। यहाँ पर रिंकी कोल ने समाजवादी पार्टी की कीर्ति को 9589 वोटों से हरा दिया है। रिंकी कोल दिवंगत विधायक राहुल प्रकाश कोल की पत्नी हैं।

राहुल प्रकाश कोल के निधन से यह सीट खाली हुई थी। रिंकी को कुल 76176 वोट मिले जबकि उनकी निकटतम प्रतिद्वंदी कीर्ति को 66587 वोट मिल पाए। 2538 वोट पा कर कॉन्ग्रेस प्रत्याशी अजय कुमार यहाँ तीसरे नंबर पर रहे। रिंकी कोल की जीत पर भाजपा समर्थकों ने जय श्री राम के नारे लगाए हैं।

कर्नाटक के पुत्तूर में BJP को बगावत का नुकसान: 36% वोट पा कर बागी संघ नेता ने बदल दिया गणित, कॉन्ग्रेस को मिल गई जीत

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में पुत्तूर की सीट इस बार कई कारणों से चर्चा में है। इस जगह से एक ओर SDPI ने BJYM नेता की हत्या के आरोपित शफी बेल्लारे को खड़ा किया था। वहीं दूसरी ओर संघ नेता अरुण कुमार पुथिला भी निर्दलीय खड़े थे। नतीजों में जहाँ बेल्लारे को करारी हार का मुँह देखना पड़ा तो संघ नेता को अच्छा वोट शेयर हासिल हुआ।

13 मई को आए नतीजों में निर्दलीय प्रत्याशी और संघ नेता अरुण कुमार को पुत्तूर विधानसभा में 36.15 फीसदी वोट शेयर मिला। उन्हें लगभग 61628 वोट ईवीएम से वोट मिले और 830 पोस्टल बैलट से। कुल मिलाकर उनके हिस्से 62458 आए। वहीं भाजपा की आशा थिंपा को 37558 वोट मिले और उनका 21.74 फीसदी रहा जबकि कॉन्ग्रेस प्रत्याशी ने यहाँ 66607 वोट पाकर जीत हासिल की। उनके हिस्से 38.55 फीसदी वोट आए।

आँकड़ों से अंदाजा लगा सकते हैं कि इन चुनावों में पुथिला के खड़े होने का यदि किसी को नुकसान हुआ तो वह भाजपा प्रत्याशी को हुआ। बताया जा रहा है कि अरुण कुमार पुथिला को पहले भारतीय जनता पार्टी से टिकट चाहिए था लेकिन पार्टी ने उनकी जगह आशा को चुना। ऐसे में उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।

दक्षिण कन्नड़ के पुत्तूर जिले पर संघ हमेशा से अच्छा प्रभाव रहा है। ऐसे में कुछ रिपोर्ट्स बता रही हैं कि संघ के लोग भी दक्षिण कन्नड़ जिला पंचायत अध्यक्ष आशा को सीट मिलने से खुश नहीं थे। भाजपा और संघ परिवार के लोगों ने बहुत कोशिश की थी कि पुथिला से नॉमिनेशन वापस ले लें। हालाँकि ऐसा नहीं हो सका।

नतीजे आए तो यह साफ हो गया कि आखिर भाजपा के वोट कहाँ कटे जबकि कॉन्ग्रेस को जेडीएस के वोट शेयर कम होने का सीधा फायदा हुआ।

मालूम हो कि साल 2018 में गौड़ा समुदाय से आने वाले बीजेपी नेता संजीव मातनदूर को यहाँ से 90,073 वोट हासिल हुए थे और कॉन्ग्रेस की शकुंतला टी शेट्टी को 70,596 वोट मिले थे। अगर इन चुनावों में वोटों का बँटवारा नहीं होता तो बीजेपी ने प्रचंड जीत दर्ज की होती।

क्लासरूम में हिजाब, ‘बजरंग दल’ पर बैन, मुस्लिम आरक्षण की बहाली, PFI पर पहले जैसी नरमी… क्या ऐसा होगा कॉन्ग्रेस राज का कर्नाटक?

कर्नाटक की सत्ता में कॉन्ग्रेस पार्टी की वापसी हुई है। 224 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी के 136 विधायक होंगे, यानी नई राज्य सरकार अपनी नीतियों के हिसाब से फैसले ले सकती है। ऐसे में क्या अब कॉन्ग्रेस पार्टी कई ऐसे मामलों में वोट बैंक के लिए राजनीतिक रुख अख्तियार करेगी, जो सीधे-सीधे इस्लामी कट्टरपंथ से जुड़े हैं? PFI पर नरमी होगी? शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर क्या रुख रहेगा? ‘बजरंग दल’ बैन लगेगा? मुस्लिम आरक्षण फिर से बहाल कर दिया जाएगा?

सबसे पहले बात करते हैं PFI की। वो कॉन्ग्रेस सरकार ही थी, जिसने 1600 दंगाइयों पर से केस वापस ले लिए थे, जो पीएफआई से जुड़े हुए थे। बिना किसी जाँच के ऐलान कर दिया गया कि इनका हिंसा में कोई हाथ नहीं। सितंबर 2022 में जब केंद्र सरकार ने PFI पर बैन लगाया, तब कर्नाटक में इसके 50 से भी अधिक आतंकी पकड़े गए थे। NIA की छापेमारी में संगठन के कई अड्डे कर्नाटक में मिले। कर्नाटक में हवाला नेटवर्क के जरिए फंडिंग हो रही थी।

कॉन्ग्रेस की जीत के बाद कर्नाटक में फिर से मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति तय लग रही है, ऐसे में राज्य सरकार के ढुलमुल रवैये से क्या इस प्रतिबंधित संगठन को फिर से फलने-फूलने का मौका मिलेगा? मुस्लिम आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। 25 जुलाई, 2023 को इस मामले की अगली सुनवाई होनी है। सर्वोच्च न्यायालय की 3 सदस्यीय पीठ इस मामले को सुन रही है। भाजपा सरकार ने मुस्लिम आरक्षण को हटाने के बाद कोर्ट में इस फैसले का बचाव किया, लेकिन अब लगता नहीं कि नई राज्य सरकार का रुख यही रहेगा।

इसी तरह, हिजाब को लेकर राज्य में उपद्रव किया गया। इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिजाब-बुर्का के समर्थन में अभियान चलाया। इनकी माँग थी कि शैक्षिक संस्थानों में यूनिफॉर्म के नियमों को धता बता कर मुस्लिम छात्राओं को बुर्का पहनने की इजाजत मिले। इस मामले की भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। ये सुनवाई भी सुप्रीम कोर्ट में चल ही रही है। कर्नाटक सरकार ने साफ़ कर दिया था कि स्कूल-कॉलेजों में हिजाब की अनुमति नहीं है, हाईकोर्ट ने इस फैसले को सही भी ठहराया था।

एक और मुद्दा है ‘बजरंग दल’ को बैन करने का, जिसका वादा कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपनी घोषणापत्र में किया था। ‘बजरंग दल’ हिन्दू हित में काम करता है और हिन्दू पीड़ितों की आवाज उठाता है। इसकी तुलना कॉन्ग्रेस ने PFI से कर दी। क्या ऐसा कर के उसने ‘बजरंग दल’ के खिलाफ हिंसा के लिए नहीं भड़काया? अगर संगठन के कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जाता है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? हिन्दू युवा नेता प्रवीण नेट्टारू की कर्नाटक में कुल्हाड़ी से हत्या कर दी गई थी। इस मामले में पकड़े गए हत्यारों के खिलाफ कार्रवाई में भी क्या कॉन्ग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण के हिसाब से ही फैसला लेगी?

कर्नाटक चुनाव में खाता खोलने को भी तरस गई AAP, वामपंथी दलों के भी ऐसा ही बुरा हाल: जमानत भी नहीं बचा पाए अधिकतर प्रत्याशी

कर्नाटक विधानसभा चुनाव (Karnataka Assembly Election 2023) में कॉन्ग्रेस (Congress) ने भाजपा (BJP) को सत्ता से बेदखल कर दिया है। हालाँकि, दक्षिण के द्वार कहे जाने वाले कर्नाटक में दिल्ली और पंजाब में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (AAP) भी किस्मत अजमा रही थी। वहीं, वामपंथी दल भी अपनी जमीन तलाश रहे थे।

निर्वाचन आयोग के आँकड़ों के अनुसार, कर्नाटक विधानसभा में कॉन्ग्रेस के बाद भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी बनी है। वहीं, जनता दल सेक्युलर (JDS) तीसरे नंबर पर है। 2 सीट जीतकर चौथे नंबर पर निर्दलीय उम्मीदवार हैं। वहीं, 1-1 सीट के साथ कल्याण राज्य प्रगति पक्ष और सर्वोदय कर्नाटक पक्ष पाँचवें नंबर पर हैं।

कभी पूरे भारत में अपनी पकड़ रखने वाले विभिन्न वामपंथी दलों के एक भी प्रत्याशी इस चुनाव में कमाल नहीं दिखा पाए। वहीं, हाल ही में राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने वाली AAP भी दक्षिण के इस चक्रव्यूह को भेदने में नाकाम रही। हालाँकि, अधिकांश अपनी जमानत बचाने में नाकाम रहे हैं।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, आम आदमी पार्टी को अब तक 0.58% वोट शेयर मिला है। अगर वोटों के लिहाज से बात करें तो उसे अब तक लगभग 45500 वोट मिले हैं। राज्य की कुल 224 सीटों में से 209 सीटों पर पार्टी ने अपने उम्मीदवारों उतारे थे। इनमें से 15 सीटों पर पार्टी ने मुकाबले में होने की उम्मीद जताई थी।

अगर साल 2018 की बात करें तो AAP ने कर्नाटक विधानसभा चुनावों में 28 सीटों पर अपने प्रत्याशियों को उतारा था। उस दौरान पार्टी को सिर्फ 0.06% वोट शेयर मिला था। हालाँकि, इस बार AAP के वोट शेयर में 0.52 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

वामपंथी दलों की तो और भी बुरी हालत है। कर्नाटक चुनाव में उतरे तीनों प्रमुख वामपंथी दल- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (CPI-M) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (CPI-ML) के अधिकांश उम्मीदवार भी अपनी जमानत नहीं बचा पाए हैं। वामपंथी दलों का कुल वोट शेयर 0.08 प्रतिशत है। जहाँ CPI को 0.02 प्रतिशत और CPI-M को 0.08 प्रतिशत वोट शेयर मिला है।

कर्नाटक में जीत के बाद कॉन्ग्रेस नेता ने किया यूपी-बिहार का अपमान, कहा – टैक्स देने के मामले में हम तीसरे नंबर पर

कर्नाटक विधानसभा चुनावों में जीत से उत्साहित कॉन्ग्रेस नेता बीजेपी पर हमलावर हैं। कर्नाटक कॉन्ग्रेस के सीनियर लीडर बीके हरिप्रसाद ने पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह समेत भाजपा के कई नेताओं पर जमकर निशाना साधा। इस दौरान उन्होंने उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को नीचा दिखाने की भी कोशिश की।

न्यूज एजेंसी एएनआई से बात करते हुए बीके हरिप्रसाद ने कहा कि भाजपा अपने राष्ट्रीय नेताओं के भरोसे चुनावी मैदान में थी। चुनावी कैंपेनिंग में राज्य के नेताओं को प्रोजेक्ट नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि अमित शाह कौन होते हैं यह कहने वाले कि यदि कर्नाटक के लोगों ने पीएम मोदी को वोट नहीं दिया तो उन्हें आशीर्वाद प्राप्त नहीं होगा। क्या भगवान हैं नरेंद्र मोदी? हरिप्रसाद ने जेपी नड्डा पर भी आरोप लगाए।

बीके हरिप्रसाद ने कहा कि जेपी नड्डा कह रहे थे कि यदि राज्य में भाजपा की सरकार नहीं बनी तो लोगों को केंद्र सरकार की योजनाओं का फायदा नहीं मिलेगा। कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि केंद्रीय योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए हम टैक्स देते हैं। टैक्स देने के मामले में कर्नाटक तीसरे स्थान पर है, हम यूपी-बिहार नहीं हैं।

बता दें कि राज्य में 10 मई को संपन्न विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिल चुका है। पार्टी 224 विधानसभा सीटों में से 130 से अधिक पर जीत हासिल करती नजर आ रही है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस जीत को जनता जनार्दन की जीत करार दी है। उन्होंने कहा है कि कॉन्ग्रेस के सभी विजयी विधायकों से आज शाम तक बेंगलुरु पहुँचने के लिए कहा गया है, ताकि सरकार की गठन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सके।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि विधायकों से सीएम के नाम पर राय माँगी जाएगी। इसके बाद विधायकों का फैसला कॉन्ग्रेस आला कमान तक पहुँचाया जाएगा। आला कमान सीएम पद पर अंतिम फैसला लेगी। बता दें कॉन्ग्रेस में सीएम पद को लेकर घमसान मचता नजर आ रहा है। कॉन्ग्रेस के दो बड़े नेता सीएम पद के दावेदार माने जा रहे हैं। पहले हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे सिद्धारमैया और दूसरे हैं कर्नाटक कॉन्ग्रेस अध्यक्ष डीके शिव कुमार। कॉन्ग्रेस के दोनों धड़ों के लोग अब अपने-अपने नेता के समर्थन में खुलकर आ रहे हैं।

शिक्षिका को भारी पड़ा क्लासरूम में बच्चों के साथ डांस करना, स्कूल ने नौकरी से निकाला: TikTok पर वायरल हुआ वीडियो, इंस्टा पर हैं 12 लाख फॉलोवर

ब्राजील में एक महिला टीचर को छात्रों के साथ डांस करना भारी पड़ गया। दरअसल, सिबेली फरेरा नामक टीचर ने स्कूल के छात्रों के साथ क्लासरूम में डांस किया था। इसके बाद अपना वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया। वीडियो वायरल होने के बाद वह लोकप्रिय तो हो गईं, लेकिन अब उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सिबेली फरेरा अंग्रेजी भाषा की टीचर हैं और वह एक लैंग्वेज स्कूल में पढ़ाती थीं। स्कूल में वह छात्रों से बातचीत कर रहीं थीं। इसी दौरान छात्रों ने उन्हें डांस करने के लिए कहा। इस पर उन्होंने क्लासरूम में ही छात्रों के साथ डांस किया। इसके बाद यह वीडियो टिकटॉक पर अपलोड कर दिया।

सिबेली फरेरा का कहना है, “स्कूल के एक छात्र ने उन्हें डांस करने के लिए कहा था। इसके बाद ही उन्होंने डांस किया। इस डांस पर पूरी क्लास खुश थी। छात्र काफी उत्साहित नजर आ रहे थे। मुझे पता है कि सोशल मीडिया और टेक्नोलॉजी के इस दौर में बच्चों को क्लास में फोकस्ड रखना कितना मुश्किल है। ऐसे में मैं उनकी पसंद को ध्यान में रखते हुए उन्हें पढ़ाई से जोड़ने की कोशिश कर रही थी।”

छात्रों के साथ डांस का वीडियो टिकटॉक से लेकर सोशल मीडिया के अन्य प्लेटफॉर्म पर वायरल हो गया। हालाँकि, नेटीजेन्स ने उनकी आलोचना की है। सोशल मीडिया यूजर्स का कहना है कि महिला टीचर को अपने पद की मर्यादा रखनी चाहिए थी। वहीं, स्थानीय लोगों का दावा है कि महिला टीचर के डांस का वीडियो सामने आने के बाद स्कूल ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया।

सिबेली फरेरा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर कई फोटोज और वीडियो अपलोड किए हैं। जिस वीडियो के चलते उन्हें अपनी नौकरी खोनी पड़ी उस वीडियो पर अब तक 66000 से अधिक लाइक्स मिल चुके हैं। वहीं, इंस्टाग्राम पर अपलोड कुछ अन्य वीडियो में वह स्विम सूट समेत अन्य ड्रेस में डांस करते नजर आ रहीं हैं।

रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि सिबेली फरेरा बीते कुछ समय समय से क्लास में छात्रों के साथ बातचीत के वीडियो व स्कूल की अन्य गतिविधियों के वीडियो अपलोड कर रहीं हैं। यही कारण है कि टिकटॉक पर उनके 9.7 मिलियन और इंस्टाग्राम पर 1.2 मिलियन फॉलोअर्स हैं। नौकरी जाने के बाद सिबेली फरेरा के फैंस का कहना है कि अब उन्हें स्कूल में पढ़ाने की जगह पूरा टाइम सोशल मीडिया पर देना चाहिए। हालाँकि फरेरा का कहना है कि स्कूल उन्हें अधिक सुरक्षित लगता है। ये अलग बात है कि वह सोशल मीडिया के जरिए स्कूल से अधिक कमाई कर रहीं हैं।

सिर पर इस्लामी टोपी, कंधे पर हरा गमछा… तबीयत में सुधार होते ही लालू प्रसाद यादव घर से निकलकर सीधे पहुँचे मजार, दुआ पढ़ने का वीडियो वायरल

दिल्ली से पटना लौटने के बाद राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव शुक्रवार (12 मई 2023) को पहली बार घर से बाहर निकले हैं। इस दौरान उन्होंने पटना हाईकोर्ट के पास मौजूद मजार पर जियारत की। इस दौरान लालू ने वहाँ चादर भी चढ़ाई। इस दौरान लालू यादव के बेटे तेज प्रताप ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि बजरंग बली भाजपा से नाराज हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लालू प्रसाद यादव ने जिस मजार पर दुआ पढ़ी है उसका नाम शहीद सफदर पीर मुराद शाह रहमतुल्ला अलैह है। बताया जा रहा है कि लालू ने यहाँ वतन की तरक्की और बिहार की बेहतरी की दुआ पढ़ी। इस दौरान लालू ने गंगा जमुनी तहजीब को मजबूत करने पर बल दिया। जियारत के दौरान लालू यादव ने बाकायदा सिर पर इस्लामी टोपी और कंधे पर हरे रंग का गमछा डाल रखा था। इस जियारत का वीडियो भी वायरल हो रहा है जिसमें लालू यादव के साथ मुस्लिम समाज के कुछ अन्य लोग दुआ पढ़ते दिखाई दे रहे हैं।

बताते चलें कि सिंगापुर से किडनी ट्रांसप्लांट करवाने के बाद लालू यादव लम्बे समय तक दिल्ली में रुके थे। यहाँ वो अपनी बड़ी बेटी राज्यसभा सांसद मीसा भारती के आवास पर रुके थे। 28 अप्रैल को लालू दिल्ली से बिहार में पटना स्थित अपने आवास पर पहुँचे थे। यहाँ थोड़ा तबियत ठीक होने के बाद अब लालू 12 मई को पटना स्थित मजार पर पहुँच गए। इस बीच लालू यादव के बेटे और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम पर अपनी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी से बजरंग बली नाराज हैं।

तेजस्वी के भाई तेज प्रताप यादव ने भी भाजपा को रावण बताया उन्होंने लिखा, “ये होना ही था। बजरंगबली ने रावण की लंका जला डाली। कर्नाटका में बीजेपी,आरएसएस नाम की गंदगी को साफ करने के लिए जनता को बधाई। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस मे है भाई भाई।”

सिद्धारमैया के बेटे ने CM कुर्सी पर ठोका पिता का दावा, उधर रो कर DK शिवकुमार ने भी चला इमोशनल कार्ड: कर्नाटक में जीत के बाद कॉन्ग्रेस की नई टेंशन

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम स्पष्ट हो चुके हैं। कॉन्ग्रेस ने अपने दम पर बहुमत के आँकड़े को पार कर लिया है। इसी के साथ कॉन्ग्रेस में सीएम पद को लेकर घमसान मचता नजर आ रहा है। कॉन्ग्रेस के दो बड़े नेता सीएम पद के दावेदार माने जा रहे हैं। पहले हैं कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे सिद्धारमैया और दूसरे हैं कर्नाटक कॉन्ग्रेस अध्यक्ष डीके शिव कुमार। कॉन्ग्रेस के दोनों धड़ों के लोग अब अपने-अपने नेता के समर्थन में खुलकर आ रहे हैं।

बहुमत मिलता देख सिद्धारमैया के बेटे यतींद्र ने पिता के लिए मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोक दिया। यतींद्र ने कहा कि राज्य के हित में मेरे पिता को मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। उन्होंने सिद्धारमैया के पिछले कार्यकाल का दम भरते हुए कहा कि यह राज्य के लोगों के हित में होगा। यतींद्र ने कहा कि सिद्धारमैया के दम पर ही कॉन्ग्रेस राज्य में सत्ता के करीब पहुँची है। समर्थक भी खुलकर सीएम पद के लिए सिद्धारमैया का समर्थन कर रहे हैं। मैसूर के एक समर्थक ने तो अपनी छाती पर सिद्धारमैया सीएम टैटू गुदवा लिया।

दूसरी तरफ कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की जीत देख प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने इमोशनल कार्ड चला। भावुक होते हुए उन्होंने कहा कि मैं इस जीत के लिए अपने कार्यकर्ताओं और अपनी पार्टी के नेताओं को श्रेय देता हूँ जिन्होंने बहुत मेहनत की। सिद्धारमैया ने कहा कि कॉन्ग्रेस कर्नाटक में 130 से ज्यादा सीटों के साथ सरकार बनाने जा रही है। उन्होंने कहा कि कर्नाटक के लोग बदलाव चाहते थे क्योंकि वे भाजपा सरकार से तंग आ चुके थे।

डीके शिवकुमार 8 बार विधायक रह चुके हैं और उनका सीएम बनने का सपना काफी पुराना है। डीके शिवकुमार ने शुक्रवार (12 मई) को एक ट्वीट किया। इसमें उन्होंने कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी तीन सालों की मेहनत का वीडियो शेयर किया। कहा जा रहा है कि इस तरह उन्होंने मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पेश कर दी है।

बता दें कर्नाटक में 224 विधानसभा सीटों के लिए 10 मई को चुनाव कराए गए थे। जिसमें 73.19 प्रतिशत लोगों ने वोट डाले थे। ताजा आँकड़ों के मुताबिक, कॉन्ग्रेस 135, भाजपा 65 और जेडीएस 22 सीटों पर आगे है।

मेयर चुनाव में सभी 17 सीटों पर सूपड़ा साफ़, फिर किस बात का जश्न मना रहे अखिलेश यादव? आज़म खान के गढ़ में भी मिली हार, नगपालिका-पंचायत में भी निराशा

उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में एक बार फिर भगवा लहराता दिख रहा है। अब तक सामने आए रुझान में बीजेपी सपा, बसपा और कॉन्ग्रेस को करारी शिकस्त देते हुए बड़ी जीत की कर बढ़ रही है। हालाँकि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव यूपी के निकाय चुनावों की हार का गम छिपाने के लिए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार का जश्न मनाते दिख रहे हैं।

दरअसल, कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम को लेके अखिलेश यादव ने एक ट्वीट किया है। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है,

“कर्नाटक का संदेश यह है कि भाजपा की नकारात्मक, सांप्रदायिक, भ्रष्टाचारी, अमीरोन्मुखी, महिला-युवा विरोधी, सामाजिक-बँटवारे, झूठे प्रचारवाली, व्यक्तिवादी राजनीति का ‘अंतकाल’ शुरू हो गया है। यह नए सकारात्मक भारत का महँगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार व वैमनस्य के खिलाफ सख्त जनादेश है।”

वास्तव में, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में बीजेपी बंपर जीत हासिल करती दिख रही है। मेयर चुनाव में तो विपक्ष का सूफड़ा साफ हो गया। मेयर के लिए हुए चुनाव में 17 में से 17 सीटें बीजेपी के पाले में जाती दिख रही है। वहीं, नगरपालिका अध्यक्ष के लिए 199 सीटों में हुए मतदान में से 96 सीटों में बीजेपी तो वहीं 35 में सपा, 19 में बसपा और 04 सीटों में कॉन्ग्रेस आगे चल रही है।

वहीं, नगर पंचायत अध्यक्ष की 544 सीटों में से 444 सीटों के रुझान सामने आए हैं। यहाँ भी भाजपा प्रचण्ड जीत की ओर जाती दिख रही है। बीजेपी 174, सपा 73, बसपा 35 और 04 सीटें कॉन्ग्रेस के खाते में जाती नजर आ रही हैं। यही हाल यूपी के उपचुनाव का भी है। सपा का गढ़ कहे जाने वाली स्वार सीट में सपा की हार हुई है। वहीं, छानबे में भी सपा उम्मीदवार पीछे चल रही हैं। दोनों ही सीटों पर ‘अपना दल’ जीतती दिख रही है।

उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में करारी हार के बाद भी अखिलेश यादव कर्नाटक में बीजेपी की हार पर जश्न मना रहे हैं। इसको लेकर सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें आड़े हाथों लेते हुए ट्रोल करना शुरू कर दिया। सुधीर मिश्रा नामक यूजर ने लिखा, “बेगानी शादी में ‘अब्दुल्ला’ दीवाना। यूपी नगर निकाय में सपा का बहुत बुरा हाल हुआ है। सपा तीसरे और चौथे नंबर पर है। यहाँ तक रामपुर से अब्दुल्ला आजम वाली सीट भी सपा हार गई है। लोकतंत्र में इसी को ‘बेशर्मी’ कहते हैं।”

नरेंद्र मोदी फैन नामक यूजर ने लिखा, “उत्तर प्रदेश में 17 में से 1 मेयर बना नही सपा का और ये संदेश स्पष्ट की बात कर रहा है।”

राजेन्द्र शुक्ला नामक यूजर ने ट्वीट कर कहा है, “उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव का संदेश यह है कि समाजवादी पार्टी की नकारात्मक, परिवारवादी भ्रष्टाचारी, जातिवादी, तुष्टीकरण की राजनीति, लड़के हैं गलती हो जाती है, मजहब विशेष से प्रेम करने वाली राजनीति का ‘अंतकाल’ शुरू हो गया है। अब ठीक है।”

योगेश गुप्ता नामक यूजर ने लिखा, “यूपी में समाजवादी पार्टी की हार पर एक ट्वीट तो कर दीजिए यादव जी। आप अपनी हार की कुंडली भी लिख दो।”

राणा सिंह राजपुरोहित नामक यूजर ने लिखा, “अपने प्रदेश के दोनों उपचुनाव में खुद की पार्टी हार गई। रामपुर तो एक समय सपा का गढ़ था, वहाँ भी हार गए। निकाय चुनाव में सुपड़ा साफ हो गया। लेकिन खुशी कॉन्ग्रेस के जीत में हो रही है। वाह राजनीति।”

कुंदन नामक यूजर ने लिखा, “खुद की हालत देख लो टोंटी भाई, कर्नाटक को भाजपा और कॉन्ग्रेस पर छोड़ दो।”

जितना JDS को नुकसान उतना ही कॉन्ग्रेस को फायदा, 1% भी नहीं घटा भाजपा का वोट शेयर: कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम का एक आँकड़ा यह भी

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम लगभग साफ़ हो गए हैं और कॉन्ग्रेस पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर के सत्ता में वापसी की है। भले ही अति-उत्साह में पार्टी के समर्थक ये दावा कर रहे हों कि 2024 के लोकसभा चुनाव पर इसका असर पड़ेगा, लेकिन इतिहास देख कर ऐसा लगता नहीं है। 2018 विधानसभा चुनाव में भी कॉन्ग्रेस मध्य प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसने सरकार बनाई थी।

लेकिन, 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बदतर ही रहा। 2023 विधानसभा चुनाव में कर्नाटक चुनाव परिणाम की बात करें तो जहाँ कॉन्ग्रेस को 135 सीटें मिलती हुई दिख रही है, वहीं भाजपा 65 और JDS 20 सीटें प्राप्त करती हुई दिख रही है। वोट प्रतिशत की बात करें तो कॉन्ग्रेस को 43.1%, वहीं भाजपा को 35.6% वोट मिले हैं। जेडीएस का वोट शेयर 13.3% है। आइए, 2018 विधानसभा चुनाव परिणाम से इसकी तुलना कर के देखते हैं।

उस चुनाव में भाजपा 104 सीटें पा कर सबसे बड़े दल में उभरी थी, वहीं दूसरे नंबर पर आई कॉन्ग्रेस को 80 सीटें मिली थीं। वहीं जेडीएस के 37 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। इस तरह से देखें तो इस बार भाजपा को 39 सीटों का और JDS को 17 सीटों का नुकसान हुआ है। वोट प्रतिशत की बात करें तो 5 साल पहले हुए चुनाव में भाजपा के खाते में जहाँ 36.22% वोट आए थे, वहीं कॉन्ग्रेस को 38.04% और जेडीएस को 18.3% वोट मिले थे।

अब आइए, देखते हैं कि कर्नाटक में किसे कितना नुकसान और फायदा हुआ है, मत प्रतिशत के मामले में। कॉन्ग्रेस का वोट प्रतिशत लगभग 5% बढ़ा है, वहीं जेडीएस को 5% वोटों का नुकसान झेलना पड़ा है। यानी, जेडीएस का जितना नुकसान हुआ है कॉन्ग्रेस को उतना ही फायदा मिला है। भाजपा के वोट शेयर में कोई ऐसी गिरावट नहीं दर्ज की गई है, जिससे इसे सत्ता विरोधी लहर कहा जा सके। भाजपा का वोट शेयर 1% भी नहीं घटा है।