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’10-15 मिनट में छत पर नहीं इकट्ठा किए जा सकते पत्थर, मामला गंभीर’: बंगाल में रामनवमी हिंसा पर हाईकोर्ट सख्त, NIA जाँच की माँग पर सुरक्षित रखा फैसला

रामनवमी शोभायात्रा के दौरान पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा को लेकर कोलकाता हाईकोर्ट ने माना है कि 10-15 मिनट में पत्थरों को छत पर नहीं ले जाया जा सकता। इसलिए, हिंसा के लिए पहले से तैयारी की गई थी। इसके अलावा कोर्ट ने इस हिंसा की जाँच एनआईए से कराने को लेकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

दरअसल, भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) ने कोलकाता हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इस याचिका में उन्होंने रामनवमी के दौरान बंगाल में हुई हिंसा की जाँच NIA से कराने की माँग की थी। इस मामले में, सोमवार (10 अप्रैल, 2023) को सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगनानम और न्यायाधीश हिरणमय भट्टाचार्य की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा है कि हिंसा के लिए पहले से प्लानिंग की गई थी। लेकिन इसे रोका नहीं जा सका। जाहिर है कि यह खुफिया तंत्र की विफलता के कारण हुआ।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात के संकेत दिए हैं कि बंगाल हिंसा की जाँच एनआईए को सौंपी जा सकती है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि कोर्ट ने कहा है कि यह मामला गंभीर लग रहा है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि हिंसा के लिए पहले से तैयारियाँ की गई थीं। इसलिए केंद्रीय जाँच एजेंसी इस मामले की बेहतर तरीके से जाँच कर सकती है।

कोर्ट ने यह भी कहा है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को पेलेट गन और आँसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा। इसको देखकर ऐसा लगता है कि मामला गंभीर था। हिंसा में तलवारें, बोतलें, टूटे शीशे और तेजाब का इस्तेमाल किया गया और इंटरनेट पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इससे पता चलता है कि हिंसा और बड़े पैमाने पर हुई।

कोर्ट ने यह भी कहा है, “रिपोर्टों से पता चलता है कि हिंसा के लिए पहले से तैयारी की गई थी। आरोप है कि छतों से पत्थर फेंके थे। जाहिर है कि पत्थर 10-15 मिनट में छत पर नहीं ले जाया जा सकता। यह खुफिया तंत्र की विफलता है। यहाँ समस्या दो समस्याएँ हैं। पहली यह है कि हिंसा दो समूहों के बीच हुई है। दूसरी समस्या यह है कि एक तीसरा समूह इस हिंसा का लाभ उठा सकता है। ऐसी स्थिति में इसकी जाँच केंद्रीय जाँच एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए। यदि राज्य पुलिस इस मामले की जाँच करती है तो उसके लिए यह पता लगाना मुश्किल होगा कि इस हिंसा से किसको लाभ हो रहा।”

जज ने यह भी कहा है, “बीते 4-5 महीनों ने हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 8 आदेश भेजे हैं। ये सभी मामले धार्मिक आयोजनों के दौरान हुई हिंसा से संबंधित हैं। क्या यह कुछ और नहीं दर्शाता है? मैं बीते 14 सालों से न्यायाधीश हूँ। लेकिन अपने पूरे करियर में ऐसा कभी नहीं देखा।”

‘ब्रिटिश मीडिया ने फैलाया झूठ’: अडानी ने जारी किया 4 सालों का पूरा हिसाब-किताब, राहुल गाँधी के ‘₹20000 करोड़ कहाँ से आए’ वाले प्रोपेगंडा की खोली पोल

20 हजार करोड़ रुपए के निवेश को लेकर छिड़े विवाद के बीच अडानी समूह ने बीते 4 सालों का पूरा हिसाब सार्वजनिक किया है। अडानी समूह द्वारा जारी इन आँकड़ों को राहुल गाँधी को जवाब के रूप में देखा जा रहा है। यही नहीं, अडानी समूह ने ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की उस रिपोर्ट को भी झूठा करार दिया है, जिसमें विदेशी निवेश (FDI) को लेकर उस पर आरोप लगाए गए थे।

दरअसल, कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी अडानी समूह की आय को लेकर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। इसको लेकर वह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार भी हमलावर रहे हैं। लेकिन अब अडानी समूह ने रविवार (10 अप्रैल, 2023) को साल 2019 से लेकर अब तक का पूरा हिसाब-किताब जारी किया है। अडानी समूह की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि साल 2019 से अब तक समूह की कंपनियों ने अपनी हिस्सेदारी बेचकर 2.87 बिलियन डॉलर, यानी 23525 करोड़ रुपए जुटाए हैं। इसमें से 2.55 बिलियन डॉलर, यानी 20902 करोड़ रुपयों को फिर से बिजनेस में लगाया गया।

अडानी समूह के बयान को विस्तार से देखें तो इसमें कहा गया है कि अबु धाबी स्थित ग्लोबल स्ट्रैटेजिक इनवेस्टमेंट कंपनी और इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी जैसे निवेशकों ने अडानी समूह की कंपनियों में 2.593 बिलियन डॉलर यानी 21255 करोड़ रुपए का निवेश किया। यह निवेश अडाणी इंटरप्राइजेस लिमिटेड और अडाणी एनर्जी लिमिटेड में किया गया। कंपनी के प्रमोटर्स ने अडानी टोटल गैस लिमिटेड और अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड की हिस्सेदारी बेचकर 2.783 अरब डॉलर यानी करीब 22812 करोड़ रुपए जुटाए।

अडानी समूह ने आगे कहा है कि इन पैसों को अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड, अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक जोन लिमिटेड, अडानी ट्रांसमिशन लिमिटेड और अडानी पावर लिमिटेड जैसी पोर्टफोलियो कंपनियों में लगाया गया है।

फाइनेंशियल टाइम्स ने फैलाया झूठ: अडानी

ब्रिटेन के मीडिया संस्थान ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ ने अडानी समूह को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि अडानी समूह को जो विदेश निवेश (FDI) मिला है, इसमें से अधिकांश गौतम अडानी के परिवार से जुड़ी विदेशी कंपनियों से आए हैं। विदेशी कंपनियों ने अडानी समूह की कंपनियों में साल 2017 से 2022 के दौरान कम से कम 2.6 बिलियन डॉलर यानी करीब 21334 करोड़ रुपए का इन्वेस्ट किया। यह रकम अडानी समूह को मिले कुल 5.7 बिलियन डॉलर के FDI का 45.4% है।

हालाँकि अडानी समूह ने कहा है कि फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में जिस निवेशों के बारे में बताया है उनको लेकर 28 जनवरी 2021 और 23 जनवरी 2021 को जानकारी सार्वजनिक की जा चुकी है। यही नहीं अडानी समूह ने फाइनेंशियल टाइम्स को एक पत्र लिखते हुए रिपोर्ट डिलीट करने के लिए कहा है।

इस पत्र में कहा गया है, “अडानी समूह के खिलाफ नकारात्मक नैरिटव गढ़ा जा रहा है। जिस तरह की रिपोर्ट प्रकाशित की गई है उससे अडानी समूह की इमेज को काफी ठेस पहुँची है और यह एक राजनीतिक मुद्दा बन गया। इस रिपोर्ट को तुरंत हटाया जाए। हमें लगता है कि अडानी को बर्बाद करने का कॉम्पिटिशन अच्छा हो सकता है। लेकिन हम नियमों का पूरी तरह से पालन करते हैं। हम कंपनी के मालिकों व इसमें आ रहे निवेश को लेकर कोई भी बात अंधेरे में नहीं रखना चाहते।”

रहमत अली ने की घर वापसी, बने रितिक: शुद्धिकरण के बाद महादेव का किया अभिषेक, बजरंगबली से आशीर्वाद ले बोले- बचपन से ही हिंदू धर्म पसंद था

उत्तर प्रदेश के कानपुर के एक मंदिर में 25 साल के रहमत अली ने घर वापसी की। अब वे रितिक नाम से जाने जाएँगे। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच सोमवार (10 अप्रैल 2023) को उन्होंने हिंदू धर्म अपनाया। शुद्धिकरण के बाद उन्होंने महादेव का अभिषेक किया। बजरंगबली का अशीर्वाद लिया। बताया कि बचपन से ही उन्हें हिंदू धर्म पसंद था। उनके फैसले पर घर वालों को आपत्ति नहीं है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रहमत अली मूल रूप से हरदोई के पसेनी गाँव के रहने वाले हैं। काम की तलाश में वे 3 महीने पहले कानपुर आए थे। यहाँ के बाबूपुरवा में उनकी नानी रहती हैं। फिलहाल वे अपनी नानी के पास ही रह रहे हैं। रहमत के मुताबिक बचपन से ही उनका हिंदू धर्म के प्रति झुकाव था। रामलीला देखना, गणेश उत्सव में हिस्सा लेना और काँवड़ ले जाना उन्हें हमेशा से पसंद रहा है। कानपुर में भी रहने के दौरान रहमत बाकरगंज के माँ दुर्गा मंदिर में दर्शन के लिए जाया करते थे।

रहमत ने बताया है कि एक बार दुर्गा मंदिर में उन्हें बजरंग दल कार्यकर्ता पंकज यादव मिले। उनसे हिन्दू बनने की इच्छा जताई। इसके बाद उनकी घर वापसी कानपुर के साउथ सिटी इलाके में मौजूद एक मंदिर में करवाई गई। इस दौरान रहमत ने वेदमंत्रों के बीच तमाम वैदिक विधि-विधान पूरे किए। रहमत ने अपनी शुद्धिकरण के लिए हुई पूजा-अर्चना के दौरान सिर मुंडवा कर तिलक लगा रखा था।

मंदिर में महादेव को जल चढ़ाने के बाद रहमत ने बताया कि उनके ज्यादातर दोस्त हिंदू ही हैं। बताया जा रहा है कि रहमत के परिवार वालों को भी उनके फैसले से कोई आपत्ति नहीं है। अब रहमत के कागजात पर नाम बदलवाने की कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई है। इसके लिए एक वकील की मदद ले रहे हैं। कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करने के लिए रहमत के परिवार वालों को भी बुलाया गया है।

मस्जिद में चल रही थी रमजान की नमाज, चाकू निकाला और इमाम को घोंप दिया: अमेरिका की घटना, तुर्की का हमलावर

अमेरिका में रमजान की नमाज पढ़ रहे एक इमाम को चाकू घोंप दिया गया। घटना न्यूजर्सी के पेटरसन स्थित उमर मस्जिद की है। हमला रविवार (9 अप्रैल 2023) की सुबह किया गया। 65 साल के इमाम पर जब हमला हुआ, उस वक्त नमाज के लिए मस्जिद में करीब 200 लोग जमा थे। हमलावर की पहचान 32 साल के सेरिफ जोरबा के तौर पर हुई है। वह मूल रूप से तुर्की का रहने वाला है।

हमले में इमाम सैयद एल्नाकिब घायल हो गए। उनका इलाज चल रहा है। मस्जिद में मौजूद लोगों ने हमलावर को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया। पूछताछ में उसने इमाम पर इस्लाम के नाम पर पैसे वसूलने का आरोप लगाया। यह बात भी सामने आई है कि हमलावर पहले भी इस मस्जिद में कई बार आ चुका है।

मीडिया रिपोर्ट्स के उमर मस्जिद जिस इलाके में है, वह अमेरिका में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले क्षेत्रों में एक है। रविवार को इमाम सैयद एल्नाकिब सुबह के करीब 5:30 बजे पर मस्जिद में 200 लोगों के साथ नमाज पढ़ रहे थे। इसी बीच सेरिफ जोरबा ने उन्हें 2 बार चाकू घोंप दिया। हमले के बाद आसपास के नमाजियों ने उसे पकड़ लिया।

इमाम को नजदीकी अस्पताल सेंट जोसेफ मेडिकल सेंटर में भर्ती करवाया गया है, जहाँ उनकी हालत स्थिर बताई जा रही है। चाकू लगने से इमाम के फेफड़े में छेद हो गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार हमलावर मूल रूप से तुर्की का है। उसने पूछताछ में हमले की बात कबूली है। बताया है कि वह एक रात पहले ही इमाम को उनके घर में घुस कर मारना चाहता था। उसका कहना है कि इमाम इस्लाम का अपमान कर रहा था।

स्थानीय लोगों के मुताबिक सेरिफ जोरबा मस्जिद का सदस्य नहीं है। हालाँकि उसके द्वारा इस मस्जिद में पहले भी नमाज़ पढ़े जाने की बात सामने आ रही है। इस घटनाक्रम के 2 वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हैं। पहले वीडियो में आरोपित नमाज़ के ही दौरान इमाम पर हमला करते दिखाई दे रहा है। हमले के बाद वह भागने का प्रयास करता है। दूसरे वीडियो में नमाज़ी पकड़कर उसकी पिटाई करते दिखाई दे रहे है।

रमज़ान के महीने में मस्जिद में इमाम पर हुए इस हमले पर वहाँ के स्थानीय पार्षद अल अब्देल-अजीज ने चिंता जताते हुए मुस्लिमों से एकजुटता की अपील की है। घटना के बाद पुलिस ने एहतियात के तौर पर आसपास के इबादतगाहों की सुरक्षा बढ़ा दी है।

राजस्थान में अपनी ही सरकार के खिलाफ सचिन पायलट का अनशन, कॉन्ग्रेस ने ‘पार्टी विरोधी’ कदम बता चेताया

राजस्थान में अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) के नेतृत्व में काॅन्ग्रेस की सरकार है। इसी सरकार के खिलाफ आज (11 अप्रैल 2023) काॅन्ग्रेस नेता सचिन पायलट (Sachin Pilot) अनशन करने वाले हैं। उससे पहले पार्टी ने उन्हें इस कदम पर चेताया है। अनशन को पार्टी हितों के खिलाफ और पार्टी विरोधी गतिविधि बताया है। राजस्थान में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। गहलोत और कभी उनकी सरकार में डिप्टी सीएम रहे पायलट के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही है।

पायलट का कहना है कि गहलोत सरकार ने भ्रष्टाचार के उन मुद्दों पर कोई कार्रवाई नहीं की जिनको उठाकर काॅन्ग्रेस प्रदेश की सत्ता में आई थी। इसको लेकर वे जयपुर के शहीद स्मारक पर अनशन पर बैठेंगे। इसमें शामिल होने के लिए उन्होंने औपचारिक तौर पर काॅन्ग्रेस नेताओं को न्योता नहीं भेजा है। लेकिन माना जा रहा है कि उनके समर्थक इसमें शिरकत करेंगे। लिहाजा काॅन्ग्रेस डैमेज कंट्रोल की कोशिशों में लगी है।

इसी कड़ी में कॉन्ग्रेस के राजस्थान प्रभारी सुखजिंदर रंधावा ने सोमवार (10 अप्रैल 2023) रात एक बयान जारी किया। इस बयान में उन्होंने कहा है कि सचिन पायलट को इस मुद्दे पर पार्टी में बात करनी चाहिए थी। उनका इस तरह से अनशन करना पार्टी हितों के खिलाफ है।

रंधावा ने कहा है, “सचिन पायलट कल (मंगलवार) दिन भर का अनशन करने वाले हैं। उनका यह अनशन पार्टी हितों के खिलाफ है। पार्टी विरोधी गतिविधि है। अगर अपनी ही सरकार के साथ उनकी कोई समस्या है तो मीडिया और जनता के बजाय पार्टी के प्लेटफॉर्म पर चर्चा की जा सकती है। मैं 5 महीने से राजस्थान कॉन्ग्रेस का प्रभारी हूँ। लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर मुझसे कभी चर्चा नहीं की। मैं उनके संपर्क में हूँ और अभी भी उनसे बातचीत की अपील करता हूँ। वह निर्विवाद रूप से कॉन्ग्रेस पार्टी के एक मजबूत स्तंभ हैं।”

वहीं एक अन्य बयान में रंधावा ने कहा है कि उन्होंने पायलट से फोन पर बात की है। साथ ही इस तरह के सार्वजनिक प्रदर्शन करने की जगह पार्टी के मंचों पर मामलों को उठाने के लिए कहा है। वसुंधरा राजे सरकार में हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर सचिन पायलट जिन दो पत्रों की बात कर रहे हैं, उनके बारे में कभी जिक्र ही नहीं किया गया।

दरअसल, सचिन पायलट ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि भ्रष्टाचार के जिन मुद्दों के बल पर अशोक गहलोत सरकार बनी थी, उनके खिलाफ बीते साढ़े चार सालों में कोई कार्रवाई नहीं हुई। यही नहीं उन्होंने वसुंधरा राजे सरकार के समय सामने आए घोटालों को लेकर भी गहलोत सरकार की नीयत पर सवाल उठाए थे। उल्लेखनीय है कि 2018 के विधानसभा चुनावों में काॅन्ग्रेस की जीत के समय पायलट प्रदेश अध्यक्ष थे। उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी माना जा रहा था, लेकिन काॅन्ग्रेस आलाकमान ने उनकी जगह गहलोत को वरीयता दी थी।

पिछड़ा वर्ग का अपमान, कोर्ट पर दबाव, अपने लिए अलग कानून… सिंधिया ने राहुल गाँधी से पूछे 3 करारे सवाल, अनिल एंटनी भी बता चुके हैं ‘ट्रॉल’

अनिल एंटनी के बाद अब केंद्रीय उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) ने भी राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) को ट्रोल करार दिया है। राहुल गाँधी ने वर्ड प्ले पजल के जरिए गुलाम नबी आजाद, सिंधिया समेत कई नेताओं पर निशाना साधा था। इसको लेकर अब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राहुल गाँधी पर बड़ा हमला बोला है।

दरअसल, केंद्रीय उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ट्विटर के जरिए राहुल गाँधी से 3 सवाल पूछे हैं। इसमें उन्होंने पिछड़ा वर्ग के अपमान से लेकर कोर्ट पर दबाव बनाने और राहुल गाँधी के लिए अलग कानून की माँग को लेकर सवाल किया है। सिंधिया ने अपने ट्वीट में लिखा है, “स्पष्ट है कि अब आप एक ट्रोल तक सीमित हो चुके हैं। मुझ पर बेबुनियाद आरोप लगाने, और मुख्य मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाने की बजाए, इन तीन प्रश्नों का जवाब क्यों नहीं देते?”

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अगले ट्वीट में पहला सवाल करते हुए कहा है, “पिछड़े वर्ग को लेकर अपने अपमानजनक बयान के लिए माफी क्यों नहीं माँगते? उल्टा कहते हैं कि आप सावरकर जी नहीं हैं, माफ़ी नहीं माँगेंगे। देश सेवक का अपमान और इतना अहंकार।” राहुल से दूसरा सवाल पूछते हुए सिंधिया ने लिखा है, “जिस न्यायालय पर कॉन्ग्रेस ने सदैव उँगली उठाई, आज अपने स्वार्थ हेतु उस पर दबाव क्यों बना रहे हैं?”

वहीं एक अन्य ट्वीट में केंद्रीय मंत्री सिंधिया ने कहा है, “आपके लिए नियम अलग क्यों हों? अपने आप को क्या आप फर्स्ट क्लास नागरिक मानते हैं? आप अहंकार में इस कदर ग्रस्त हैं कि शायद इन सवालों की महत्ता भी आपकी समझ से परे है।”

बता दें कि राहुल गाँधी ने शनिवार (8 अप्रैल 2023) को वर्ड प्ले पजल ट्वीट किया था। इस ट्वीट के जरिए उन्होंने गुलाम नबी आजाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया, एन किरण कुमार रेड्डी, हिमंता बिस्वा शर्मा और अनिल एंटनी पर निशाना साधा था। इस ट्वीट में राहुल ने लिखा था, “सच्चाई छुपाते हैं, इसलिए रोज भटकाते हैं। सवाल वही है कि अडानी की कंपनियों में 20 हजार करोड़ बेनामी पैसे किसके हैं?”

अनिल एंटनी भी बता चुके हैं ट्रोल…

इस ट्वीट को लेकर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री एके एंटनी के बेटे अनिल एंटनी भी राहुल गाँधी को ट्रोल बता चुके हैं। उन्होंने ट्वीट कर कहा था, “राहुल गाँधी एक राष्ट्रीय पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और कांग्रेस के तथाकथित पीएम उम्मीदवार को देखकर दुःख होता है कि वे एक ऑनलाइन/सोशल मीडिया सेल ट्रोल की तरह बोल रहे हैं न कि एक राष्ट्रीय नेता की तरह। राष्ट्र निर्माण के काम में दशकों तक योगदान देने वाले बड़े दिग्गजों के साथ अपना नया नाम देखकर बहुत खुशी हुई, उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी थी क्योंकि वे भारत और हमारे लोगों के लिए काम करना पसंद करते थे न कि एक परिवार के लिए।” अनिल एंटनी गुरुवार (6 अप्रैल 2023) को कॉन्ग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे।

कोर्ट में मिलेंगे- हिमंता

यही नहीं, राहुल गाँधी के इस ट्वीट को लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने भी राहुल गाँधी को जवाब दिया था। उन्होंने ट्वीट कर कहा था, “‘यह हमारी शालीनता थी कि हमने आपसे कभी नहीं पूछा कि आपने बोफोर्स और नेशनल हेराल्ड घोटालों की कमाई को कहाँ छुपाया है। आपने कैसे कई बार ओतावियो क्वात्रोची को भारतीय कानून के शिकंजे से बचने दिया। अब हम कोर्ट में ही मिलेंगे।”

‘भारत की सूई की नोक भर भी जमीन कोई नहीं ले सकता, वो जमाना गया’: LAC से 1 km दूर गाँव में रात बिताएँगे अमित शाह, अरुणाचल में चीन को चेताया

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर हैं। यहाँ पर कई योजनाओं का आरंभ करते हुए गृहमंत्री शाह ने कहा कि अब भारत की सूई की नोंक के बराबर भी कोई जमीन नहीं ले सकता है। उन्होंने चीन को चेतावनी देते हुए कहा कि भारत की जमीन हथियाने का जमाना चला गया। अब ये नया भारत है।

दरअसल, अरुणाचल प्रदेश का दौरान करते हुए चीन ने इस पर आपत्ति जताते हुए बयान दिया था। चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का हिस्सा बताता है और उस पर अपना दावा करता है। हाल ही में उसने अरुणाचल प्रदेश के 11 इलाकों का नामकरण करने का भी दुस्साहस किया था। उसने अरुणाचल प्रदेश का जैगनां (Zangnan) नाम दिया है।

अमित शाह अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर हैं और उन्होंने चीन सीमा से सटे एक गाँव किबितू का दौरा किया। यहाँ उन्होंने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को भी लॉन्च किया। इसके बाद चीन गीदड़ भभकी देने लगा कि इस यात्रा से इलाके की शांति भंग हो सकती है। अरुणाचल को उसने अपना हिस्सा बताते हुए कहा कि यह यात्रा उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है।

उन्होंने कहा कि अब वो जमाना चला गया जब भारत की जमीन पर कोई भी कब्जा कर लेता था। आज सूई की नोंक बराबर भी जमीन पर कोई कब्जा नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि ITBP और सेना के जवानों के शौर्य के कारण कोई भी भारती की सीमा की ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता।

अमित शाह ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश के लोगों में भारत के प्रति कूट-कूटकर प्यार और देशभक्ति भरी हुई है उन्होंने कहा कि यहाँ के लोगों से मिलने पर वे नमस्ते नहीं करते हैं, वे जय हिंद बोलते हैं। यहाँ कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता और इसकी वजह यहाँ के लोगों की देशभक्ति है।

अमित शाह ने LAC से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित किबिथू गाँव को देश का आखिरी गाँव के बजाय पहला गाँव बताया। उन्होंने कहा कि विपक्षी दलों की अब तक की 12 सरकारों ने जो नहीं, उसे नरेन्द्र मोदी की सरकार ने सिर्फ दो कार्यकाल में ही कर दिया। बता दें कि इस गाँव को महत्व देने के लिए अमित शाह चीन की आपत्ति को दरकिनार करते हुए रात में भी इसी गाँव में रुकने फ़ैसला किया है।

अमित शाह ने कहा कि आते हुए उन्होंने राज्य में सैंकड़ों झरने देखे। इसके बाद उन्होंने अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू का जिक्र करते हुए कहा, “मैंने पेमा खांडू को कहा कि एक घर ले लीजिए, ताकि जब मैं वृद्ध हो जाऊँ तो यहाँ रहने आऊँ। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हर बच्चा अरुणाचल को सूर्यदेव की पहली किरण की धरती के नाम से जानता है। अरुणाचल भारत माता के मुकुट का एक दिव्य मणि है।”

दरअसल, केंद्र की मोदी सरकार ने वित्तीय वर्ष 2022 से 2026 के लिए सीमावर्ती गाँवों को सड़क के माध्यम से देश से जोड़ने के लिए 2500 करोड़ रुपए सहित 4800 करोड़ रुपए की मंजूरी दी है। इसे ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ नाम दिया गया है। इसके तहत गाँवों में विकास के जरिए उन्हें स्वावलंबी बनाने के साथ-साथ युवाओं के विस्थापन भी रोकना शामिल है।

‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ के तहत अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, उत्तराखंड हिमाचल प्रदेश और लद्दाख के 2967 सीमावर्ती गाँवों को जोड़ने के साथ-साथ स्वावलंबी बनाया जाएगा। पहले चरण में 662 गाँवों को चुना गया है, जिनमें 455 गाँव अरुणाचल प्रदेश के हैं।

गृहमंत्री ने अरुणाचल प्रदेश में 9 माइक्रो पनबिजली परियोजनाओं का उद्घाटन किया। 10 मेगावाट से लेकर 100 मेगावाट तक की ये छोटी पनबिजली परियोजनाओं के जरिए सीमावर्ती गाँवों तक बिजली पहुँचाई जाएगी। इन 9 परियोजनाओं से 25 गाँवों में रहने वाले 5,000 से अधिक लोगों तक बिजली की निर्बाध आपूर्ति होगी। 

ममता बनर्जी की TMC और शरद पवार की NCP अब नहीं रही राष्ट्रीय पार्टी, वामपंथी CPI से भी छिना दर्जा, AAP की एंट्री: ECI का फैसला

चुनाव आयोग ने टीएमसी, एनसीपी और सीपीआई से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा छीन लिया है। यही नहीं, आरएलडी (यूपी) और बीआरएस (आंध्र) से भी क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा वापस ले लिया है। वहीं, आम आदमी पार्टी अब राष्ट्रीय पार्टी कहलाएगी। कुछ दलों को उनके प्रदर्शन के आधार पर क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा भी दिया गया है।

चुनाव आयोग के अपने बयान में कहा है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस, राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिया गया था। लेकिन वह इस दर्जे को बरकरार रखने लायक वोट प्रतिशत प्राप्त नहीं कर पाए। ऐसे में यह दर्जा वापस लिया जा रहा है। चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि इन पार्टियों को 2 संसदीय चुनावों और 21 राज्यों के विधानसभा चुनावों में पर्याप्त मौके दिए गए थे। अब नियमों के अनुसार ये पार्टियाँ राष्ट्रीय पार्टियाँ नहीं रहेंगी। लेकिन ये पार्टियाँ आगामी चुनावों में आवश्यक वोट प्रतिशत हासिल कर राष्ट्रीय पार्टी के दर्जे को एक बार फिर हासिल कर सकती हैं।

इसके अलावा, उत्तर प्रदेश में आरएलडी, आंध्र प्रदेश में बीआरएस, मणिपुर में पीडीए, पुडुचेरी में पीएमके, पश्चिम बंगाल में आरएसपी और मिजोरम में एमपीसी का क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा रद्द कर दिया गया है। हालाँकि ये पार्टियाँ अब भी गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के रूप में बनी रहेगीं। इसके अलावा, नगालैंड में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), मेघालय में वॉयस ऑफ द पीपल्स पार्टी और त्रिपुरा में तिपरा मोथा को क्षेत्रीय का दर्जा दिया गया है। यही नहीं, दिल्ली, गोवा, पंजाब और गुजरात में पार्टी के प्रदर्शन के आधार पर अब आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्ज दिया गया है।

क्या है नियम…

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए किसी भी पार्टी को तीन नियमों को पूरा करना होता है। पहला यह है कि पार्टी को कम से कम चार राज्यों में 6 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए हों। दूसरा नियम यह है कि लोकसभा चुनाव की सभी सीटों में कम से कम 3 राज्यों में 2 प्रतिशत सीटें हासिल हुई हों। या फिर पार्टी को कम से कम चार राज्यों में क्षेत्रीय पार्टी का दर्जा मिला हो।

‘बिहारशरीफ हिंसा की दोषी ही कर रहे जाँच, हिंदुओं को बदनाम करना मकसद’: जिन्होंने रखी राम मंदिर की पहली ईंट, उन्होंने बिहार पुलिस की थ्योरी पर उठाए सवाल

बिहार के नालंदा जिले के बिहारशरीफ (Bihar Sharif Violence) में रामनवमी जुलूस पर हमला हुआ। इसके बाद भड़की हिंसा (Ram Navami Violence) के लिए अब बिहार पुलिस हिंदुवादी संगठनों को जिम्मेदार बता रही है। पुलिस का दावा है कि एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर दंगों की साजिश रची गई। बजरंग दल के स्थानीय संयोजक कुंदन कुमार को पुलिस इसका मास्टरमाइंड बता रही है। लेकिन विश्व हिंदू परिषद (दक्षिण बिहार) के प्रांतीय अध्यक्ष कामेश्वर चौपाल (Kameshwar Choupal) ने हिंसा को सुनियोजित साजिश और प्रशासनिक विफलता बताया है। उन्होंने कहा है कि राज्य सरकार के इशारे पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), विश्व हिंदू परिषद (VHP) और बजरंग दल जैसे हिंदुवादी संगठनों को बदनाम करने की नीयत से पुलिस मनगढ़ंत थ्योरी पेश कर रही है।

चौपाल श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य भी हैं। वे बिहार विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं। उन्होंने ही अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के नींव की पहली ईंट 9 नवंबर 1989 को रखी थी। चौपाल ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “हमलोगों को इसकी आशंका पहले ही हो चुकी थी। आज जो पुलिस कह रही है वही बात हिंसा के बाद बिना किसी जाँच के नीतीश कुमार से लेकर राबड़ी देवी तक ने कही थी।” उन्होंने बिहार सरकार की नीयत और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि मामले की जाँच किसी केंद्रीय एजेंसी अथवा न्यायिक आयोग से करवाई जाए। सोमवार (10 अप्रैल 2023) को विहिप के एक प्रतिनिधिमंडल ने इस संबंध में बिहार के राज्यपाल से भी भेंट की। उनसे रोहतास, नालंदा, भागलपुर, गया सहित राज्य के अन्य जिलों में रामनवमी पर हुई हिंसा की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जाँच का आदेश देने की माँग की गई है।

बिहार में हुई हिंसा को लेकर चौपाल जो सवाल उठा रहे हैं, वही सवाल सोशल मीडिया में भी पूछे जा रहे हैं। लोगों को यह समझ नहीं आ रहा है कि जिस हिंसा में हिंदुओं के त्योहार (रामनवमी जुलूस) को निशाना बनाया गया। हिंदू की मौत हुई। हिंदुओं की संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया। उसकी साजिश हिंदू ही क्यों रचेंगे? यह दिलचस्प है कि जो पुलिस-प्रशासन हिंसा को तत्काल रोकने में असफल साबित हुई, जिसकी भूमिका को लेकर पीड़ित सवाल उठा रहे हैं, उसकी जाँच के निष्कर्ष वैसे ही हैं, जिस सुर में हिंसा के बाद से सत्ता पक्ष बोलता रहा है। आइए सिलसिलेवार तरीके से बिहारशरीफ में हुए घटनाक्रम को समझते हैं;

बिहारशरीफ में रामनवमी पर हिंसा

बिहारशरीफ में 31 मार्च 2023 को रामनवमी शोभा यात्रा निकाली गई। जब शोभा यात्रा दीवानगंज इलाके की एक मस्जिद के पास पहुँची, तब इस पर पथराव हुआ। आगजनी और फायरिंग भी हुई। 17 साल का गुलशन कुमार दंगाइयों की गोली का शिकार हो गया। 

बिहारशरीफ हिंसा के पीड़ितों के दावे

  • हिंसा में मारे गए गुलशन के भाई विकास ने एक मीडिया संस्थान को बताया था कि वे दोनों भाई राशन और दवाई लेने निकले थे। घर लौट रहे थे तो मस्जिद के पास से फायरिंग हुई। गुलशन को गोली लग गई और वह वहीं गिर गया। आसपास के लोगों ने उसे अस्पताल पहुँचाया, लेकिन उसकी जान नहीं बची। इसके बाद पोस्टमार्टम के नाम पर उसे बिहार पुलिस देर रात तक घुमाती रही। विकास के अनुसार बिहार पुलिस ने उसके साथ गाली-गलौज की। उसने पुलिस की करतूत कैमरे में कैद करने की कोशिश की तो मोबाइल छीन लिया। घर वालों से संपर्क नहीं करने दिया।
  • बिहारशरीफ के सोगरा कॉलेज के ठीक पीछे हुई कई हिंदुओं की दुकानों में आगजनी हुई। पीड़ितों ने एक मीडिया संस्थान को बताया कि पेट्रोल बम से लैस 50-60 लोगों की भीड़ ने इसे अंजाम दिया। दुकानों में घुसकर लूटपाट की। अधिकारियों से बार-बार मिन्नत करने के बावजूद फायर ब्रिगेड घंटों बाद पहुँचा, तब तक सब कुछ जलकर राख हो चुका था। पीड़ितों का यह भी दावा है कि बिहारशरीफ में जिस वक्त यह सब हो रहा था, उस वक्त पुलिस-प्रशासन मौके से नदारद था। वे मदद माँगने थाने भी गए, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।
  • एक मीडिया संस्थान से बातचीत में महिलाओं ने हिंदुओं के गायब होने का दावा किया था। हालाँकि बिहार पुलिस ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि उसे कोई शिकायत नहीं मिली है। इन महिलाओं ने दावा किया था कि हिंसा के बाद पुलिस उनके घरों में घुसकर पुरुषों को ले गई। महिलाएँ अपनी सुरक्षा को लेकर भी सशंकित थीं। पुलिस पर हिंदुओं को प्रताड़ित करने, गंदी-गंदी गालियाँ देने और थाने से भगाने का आरोप लगाया था।

ये कुछ चुनिंदा दावे हैं। पीड़ितों के कैमरों पर ऐसे दावे करने के कई वीडियो वायरल हैं। ये तमाम दावे न केवल पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाते हैं, बल्कि इससे यह भी स्पष्ट है कि रामनवमी शोभा यात्रा पर हमला मुस्लिम बहुल इलाके में हुआ था।

बिहारशरीफ हिंसा पर बिहार पुलिस का दावा

बिहार पुलिस के एडीजी (हेडक्वार्टर) जितेंद्र सिंह गंगवार ने रविवार (9 अप्रैल 2023) बताया है कि बिहारशरीफ की हिंसा सुनियोजित थी। रामनवमी से पहले 457 लोगों का एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया था। इसके जरिए आपत्तिजनक संदेश फैलाकर लोगों की भावनाओं को भड़काया गया। उन्होंने बजरंग दल के स्थानीय संयोजक कुंदन कुमार को इसका मास्टरमाइंड बताया है। गंगवार ने बताया कि आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने इस संबंध में अलग से केस दर्ज किया है। इसके अलावा 140 लोगों की गिरफ्तारी होने की जानकारी दी थी।

बिहार पुलिस ने एक बयान जारी कर कहा है कि इस मामले में EOU ने सबूतों के आधार पर 15 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। कहा है कि सोची-समझी साजिश के तहत एक ‘विशेष संप्रदाय’ को लेकर भ्रामक संदेश प्रसारित किए गए। मनीष कुमार, तुषार कुमार, धर्मेंद्र मेहता, भूपेंद्र सिंह राणा और निरंजन पांडे को गिरफ्तार करने की जानकारी दी है। साथ ही बताया है कि इनके पास से 5 मोबाइल फ़ोन जब्त किए गए हैं, जिनका इस्तेमाल कंटेंट अपलोड करने को लेकर किया गया।

बिहार पुलिस द्वारा प्रेस को जारी किया गया बयान

बिहार पुलिस के दावों पर सवाल क्यों?

कामेश्वर चैपाल ने ऑपइंडिया को बताया, “रामनवमी, हनुमान जनमोत्सव, दुर्गापूजा पर जुलूस निकालने की परंपरा रही है। इसके लिए विधिवत प्रशासन से अनुमति भी ली जाती है। बिहारशरीफ के मामले में भी ऐसा हुआ था। डीएम, एसपी, एसडीएम के साथ बैठकें हुई थी। थानाध्यक्षों ने भी इसको लेकर बैठक की थी। शांति समितियों की बैठक हुई थी। बैठक के दौरान यह भी बताया गया था कि रूट में कौन-कौन सी जगह संवेदनशील है। जिस जगह हमला हुआ, वह भी संवेदनशील है। बैठक के दौरान प्रशासन ने जिस तरह की तैयारियों का भरोसा दिलाया था, वह शोभा यात्रा के दिन नहीं थी। कुछ महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती थी। हमला होने के बाद उन्होंने खुद बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के पीछे छिपकर अपनी जान बचाई। यदि यात्रा उस इलाके में गली से गुजर रही होती तो जिस तरीके से हमला किया गया आप कल्पना नहीं कर सकते कि कितने लोगों की उस दिन हत्या कर दी जाती।”

इन दावों पर यकीन किया जाए तो स्पष्ट है कि रामनवमी पर बिहार में हुई हिंसा पूरी तरह से पुलिस-प्रशासन की विफलता थी। लेकिन हिंसा के बाद ही सरकार की तरफ से दोष हिंदुओं पर मढ़ने और तुष्टिकरण की राजनीति को हवा देने की कोशिश शुरू हो गई। उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने 2 अप्रैल को ट्वीट कर इसके लिए संघ को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “बिहार में सद्भाव बिगाड़ने की संघी कोशिश पर बिहार सरकार की पैनी नजर है। जिन राज्यों में बीजेपी कमजोर है, वहाँ बौखलाई हुई है। एक-एक उपद्रवी को चिन्हित कर कठोरतम कारवाई की जा रही है। भाईचारे को तोड़ने के किसी भी भाजपाई ‘प्रयोग’ का हमने हमेशा माकूल जवाब दिया है और देते रहेंगे।” इसी तरह उनकी माँ और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने कहा, “भारतीय जनता पार्टी के लोग दंगा करवाते हैं। वे चाहते हैं कि दंगा हो। सरकार जाँच कराएगी, जिसके बाद सच सामने आएगा। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।” इसी तरह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हिंसा को ‘षड्यंत्र’ बताते हुए इसके लिए बीजेपी और असदुद्दीन ओवैसी को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की थी। ध्यान रहे कि प्रशासनिक नाकामी को छिपाने और दोष मढ़ने का यह सिलसिला बिना किसी जाँच के नतीजों के आने के बगैर ही शुरू हो गया था और अब बिहार पुलिस की जाँच भी उसी लाइन पर बढ़ती दिख रही है।

चौपाल जिस तुष्टिकरण की राजनीति के तहत हिंदुओं को फँसाने का आरोप लगा रहे हैं, उसकी शुरुआत फुलवारीशरीफ में लाल किले की बैकग्राउंड वाली इफ्तार पार्टी में नीतीश कुमार के शिरकत करने से हुई। हिंसा के बीच इस आयोजन को लेकर आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने इसके बाद अपने आधिकारिक आवास पर इफ्तार पार्टी रखी। इसके बाद उनके गठबंधन सहयोगी राजद की ओर से इफ्तार का आयोजन हुआ। दूसरी ओर हिंसा को लेकर विधानसभा में सवाल करने पर पूर्व मंत्री और बीजेपी विधायक जीवेश मिश्रा को मार्शलों की मदद से सदन से बाहर फिंकवा दिया गया। मिश्रा ने बताया कि बिहार में दंगों, हिन्दुओं पर अत्याचार, रामनवमी जुलूस पर पत्थरबाजी को लेकर जब उन्होंने सीएम नीतीश कुमार से सदन में आकर जवाब देने को कहा तो उनके साथ यह बर्ताव किया गया।

क्या हिंदुओं को फँसा रही है बिहार पुलिस

ऑपइंडिया ने जब कामेश्वर चौपाल से पूछा कि हिंसा भड़काने को लेकर पुलिस हिंदुओं के खिलाफ साक्ष्य होने की बात कह रही है तो उनका जवाब था, “पुलिस बिहार सरकार के अधीन ही है। जब बिना जाँच के सरकार ने हिंदुओं को दोषी घोषित कर दिया तो पुलिस उससे अलग बात कैसे कहेगी। पुलिस चाहे तो किसी को फँसा सकती है। खुद हथियार रखकर, आर्म्स एक्ट का केस कर सकती है।” बिहार पुलिस की क्षमता और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि रामनवमी पर पूरे राज्य में हुई हिंसा की केंद्रीय एजेंसी अथवा हाई कोर्ट जज की अध्यक्षता में जाँच होनी चाहिए। रामनवमी शोभा यात्रा पर हमले पुलिस की नाकामी है। उसी पुलिस से जाँच करवाना तो दोषी से ही मामले की जाँच करवाने जैसा है।

चौपाल ने कहा, “देश भर में हुए आतंकी हमलों में बिहार से गिरफ्तारियाँ हुई हैं। 2013 में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से पहले पटना में धमाके हुए थे। लेकिन बिहार पुलिस को राज्य में मौजूद आतंकियों की कभी भनक नहीं लगती। पर बिहारशरीफ में उसे झटके में साजिशकर्ता और सबूत मिल गए? फुलवारशरीफ और बिहारशरीफ के नाम में भले ‘शरीफ’ हो पर सबको पता है कि ये जगह इस्लामी कट्टरपंथ के हेडक्वार्टर हैं। फुलवारीशरीफ में पीएफआई की राष्ट्रविरोधी साजिश के खुलासे के बाद भी कट्टरपंथी इन जगहों पर सक्रिय हैं। क्या यह महज संयोग है कि इस खुलासे के बाद बिहार में सरकार बदल गई और अब हिंदुओं के त्योहारों पर हमले हुए हैं।”

जैसा OIC का प्रलाप, वैसे ही पुलिस के दावे

मुस्लिम देशों के संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी OIC ने भी बिहारशरीफ की हिंसा का ठीकरा हिंदुओं पर फोड़ा था। उसने एक बयान में कहा था, “OIC सचिवालय रामनवमी शोभा यात्रा के दौरान भारत के कई राज्यों में मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने वाली हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाओं से चिंतित है। कट्टरपंथी हिंदुओं की भीड़ ने 31 मार्च को बिहारशरीफ में मदरसे और लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया।” इस बयान पर भारत सरकार ने OIC को लताड़ लगाते हुए उसके बयान को मजहबी सोच और भारत विरोधी एजेंडे का नमूना बताया था। अब बिहार पुलिस जो दावे कर रही है, वह भी हिंदुओं को ‘कट्टरपंथी’ और मुस्लिमों को ‘विक्टिम’ बताने जैसा ही है।

यह भी अजीब संयोग है कि पश्चिम बंगाल में भी रामनवमी पर हिंसा के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हिंदुओं पर ही दोष मढ़ा था। अब पूर्व HC जज वाली एक फैक्ट फाइंडिंग टीम ने हिंसा को सुनियोजित बताते हुए इसके लिए पुलिस को दोषी बताया है। साथ ही हिंसा की NIA जाँच को जरूरी बताया है। दोनों राज्यों में यह भी समानता देखने को मिलती है कि हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में जाने से विपक्षी नेताओं को रोका जा रहा है। चौपाल की माने तो ऐसा जानबूझकर 2024 के लोकसभा चुनावों के पहले मुस्लिम वोट बैंक का भरोसा जीतने और हिंदुओं को बाँटने की नीयत से किया जा रहा है।

‘पाखंडी साधु, अंधभक्तों का महाकाल’: कॉन्ग्रेस समर्थक ने प्रेमानंद जी महाराज की बीमारी पर झूठ फैला कर बनाया मजाक, मुस्लिमों ने फटकारते हुए कहा – वो अच्छे साधु

भारत में एक चलन है, जिसके तहत हिन्दू साधु-संतों को निशाना बनाया जाता है। कभी खुद को दलितों का ठेकेदार बताने वाले ऐसा करते हैं तो कभी कट्टर इस्लामी एजेंडा चलाने वाले इन करतूतों में आनंद लेते हैं। रही बात कॉन्ग्रेस समर्थकों की, तो वो इसमें हमेशा आगे रहते हैं। अब वृंदावन के प्रेमानंद जी महाराज को निशाना बनाया गया है। प्रेमानंद जी महाराज के वीडियोज सोशल मीडिया पर लोग काफी पसंद करते हैं और उनके प्रवचन व अनुभव से प्रेरणा लेते हैं।

खुद को कॉन्ग्रेस समर्थक और सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाले अनिल पटेल ने प्रेमानंद जी महाराज की एक तस्वीर शेयर की, जिसमें वो एक बिस्तर पर लेटे दिख रहे हैं और उनका इलाज हो रहा है। बता दें कि प्रेमानंद जी महाराज खुद कई बार अपनी बीमारी के बारे में बता चुके हैं। उन्होंने बताया था कि उनकी दोनों किडनी फेल है और प्रतिदिन डायलिसिस की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। उन्होंने कहा था कि इतना कष्ट होता है, जो उसे भुगतने वाला ही समझ सकता है।

तस्वीर को शेयर करते हुए अनिल पटेल ने लिखा, “ये है भक्त है, अंधभक्तों का महाकाल। ये वही पाखंडी साधु संत है, जो गाय के गोबर को कोहिनूर हीरे से भी महँगा बताते हैं, और गोमूत्र को सुपर एंटीबायोटिक दवा घोषित करते हैं। आज बीमार हुए तो विज्ञान का सहारा लेकर हॉस्पिटल में भर्ती है, गोमूत्र गाय का गोबर सिर्फ OBC-SC-ST को ही सूट करता है। ये सब देख कर भी अंधभक्तों की दिमाग की बत्ती नहीं जली तो कोई क्या करेगा?”

यहाँ अनिल पटेल ने सरासर झूठ बोला कि प्रेमानंद जी महाराज अब बीमार हुए हैं तो अस्पताल में भर्ती हैं। वो अपनी बीमारी के बारे में पहले भी कई बार बता चुके हैं। उन्होंने कहा था कि बड़े से बड़े कष्ट में भी प्रभु का नाम लेने से आनंद आता है। उनसे एक बार एक व्यक्ति ने पूछा था कि क्या वो संकल्प कर के खुद को ठीक नहीं कर सकते? इस पर उन्होंने कहा था कि संकल्प काम नहीं करेगा, क्योंकि उनका शरीर से अपनापन नहीं रह गया है, उन्होंने अपना सब कुछ अपने आराध्य देव को सौंप दिया है।

प्रेमानंद जी महाराज ने बताया था कि जिस पर हमारा अधिकार नहीं है, उसके लिए अधिकार के लिए चेष्टा क्यों करे। उन्होंने कहा था कि उनका तन स्वामिनी (राधा) जी का है, इसीलिए अब वो वही करेंगी जो सही होगा। उन्होंने कहा था कि सेवक को अपने लिए सुख नहीं माँगना चाहिए, ये व्याभिचर है। उन्होंने अपनी बीमारी की चर्चा करते हुए कहा था कि इस जगत में न कोई अपना है और न ही दूसरा, क्योंकि अब कोई ‘मैं’ ही नहीं रह गया है।

अनिल पटेल के ट्वीट पर मुस्लिमों ने ही किया प्रेमानंद जी महाराज का समर्थन

खास बात ये है कि अनिल पटेल की इस ट्वीट पर कई मुस्लिमों ने ही उसकी आलोचना की। शाहबाज अल्तमश खान ने लिखा, “ये सही इंसान हैं। इनकी बातें ठीक रहती हैं। कृपया इन्हें बदनाम न करें।” मोहम्मद यासीन सिद्दीकी ने पूछा, “देखो भाई, सभी बाबाओं की बात एक तरफ लेकिन आपने जो लिखा है ये बात इन्होंने कब कही है? दिखाओ तो मान जाऊँ।” तंसीम हैदर ने लिखा, “उनसे सुनना काफी अच्छा होता है। वो एक अच्छे संत हैं।” अबू सैयद दिलावर सिद्दीकी ने लिखा, “ये प्रेम और शांति की बातें करते हैं।” शेख मोहम्मद सलीम ने भी उन्हें अच्छा साधु बताता हुए कहा कि उनके बारे में अनाप-शनाप न बकें।