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गुजरात के जिस गाँव में मिशनरियाँ पसार रही थीं पाँव, वहाँ 20 ईसाई परिवारों की घर वापसी: 61 जनजातीय जोड़ों का सामूहिक विवाह भी

अग्निवीर की गुजरात टीम ने वलसाड जिले के धरमपुर तालुका के नड़गधरी गाँव में दिनाँक 25-26 फरवरी 2023 को सामूहिक विवाह का आयोजन किया। इस दौरान 61 जनजातीय जोड़े मंडप में बैठे और पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर परिणय सूत्र में बँधे। इस दौरान 20 क्रिश्चियन परिवारों ने घरवापसी भी की।

कार्यक्रम में मुख्य आयोजक व अग्निवीर अनुसूचित जनजाति के अध्यक्ष महेंद्र सिंह राजपुरोहित, अग्निवीर गुजरात टीम की अध्यक्ष नेहाबेन पटेल एवम सूरत, बिलीमोरा, वलसाड, वडोदरा, महाराष्ट्र की अग्निवीर की टीम के सदस्य तथा आसपास के गाँवों के 10,000 से अधिक लोग उपस्थित रहे।

यहाँ दो दिन, उत्सव जैसा माहौल रहा। सभी के लिए भोजन-पानी की व्यवस्था थी। दिनाँक 25 की रात को मनोरंजन के साथ, धर्म जागृति, नशा मुक्ति, महिला उत्थान, शिक्षा संबंधित विषयों पर भी रंगारंग कार्यक्रम थे। यहाँ जनजातीय संस्कृति के गीत एवम नृत्य भी देखने मिले।

दूसरे दिन वर-वधु को अग्निवीर द्वारा वस्त्र, मोजड़ी-चप्पल, मंगलसूत्र इत्यादि अर्पण किए गए तथा कन्यादान भी किया गया। आशीर्वचन हेतु कपिल स्वामीजी सलवाव, राम स्वामीजी सलवाव एवम गुरु योगी रविनाथजी उपस्थित रहे। समस्त जनजातीयों ने ‘जय श्री राम’ के नारों से वातावरण को सनातनमय कर दिया।

महेंद्र सिंह ने बताया कि यह विस्तार क्रिश्चियन मिशनरीज का गढ़ कहा जाता है। यहाँ जनजातीय आर्थिक रूप से सक्षम नही हैं। इसी का लाभ उठाकर मिशनरीज के लोग उनका धर्मांतरण करते हैं।

यहाँ के जनजातीय समाज में ‘फुलहार’ की प्रथा है। जिसमें लड़का-लड़की छोटी आयु में एक दूसरे को पसंद कर के फूल की माला एक दूसरे को पहनाकर साथ रहने लगते हैं। वे विवाह करना चाहते हैं किंतु आर्थिक तंगी में वे संतान प्राप्ति के बाद भी विवाह नहीं कर पाते। इस दौरान यदि दोनों में से किसी की भी मृत्यु हो जाए तो इसके अंतिम संस्कार के पहले मृत शरीर को वर अथवा वधु की तरह सजाया जाता है जोकि अत्यंत ही हृदयद्रावक दृश्य है।

पिछले कुछ वर्षों से फुलहार प्रथा की आड़ में क्रिश्चियन मिशनरीज के लोग भोले-भाले जनजातीयों को शादी करवाने का लालच दे रहे हैं। उसी बहाने वे उन्हें चर्च में ले जाते हैं और फिर उनका धर्मांतरण करवाते हैं। नड़गधरी में एक बहुत बड़ा चर्च बना दिया गया है और मिशनरीज के लोग तेजी से जनजातीयों को कन्वर्ट कर रहे हैं।

यह देखते हुए अग्निवीर की टीम ने जनजातीय क्षेत्र में ऐसे जितने भी अविवाहित जोड़े हैं उनका विवाह करवाने का जिम्मा अपने कंधो पर लिया है।

महेंद्र सिंह ने आगे बताया कि नड़गधरी के 61 जोड़ों के बाद अब इस गाँव में एक भी अविवाहित जोड़ा नहीं है। आने वाले 3 माह में हम सम्पूर्ण विस्तार के दूसरे गाँवों के भी सभी ऐसे जोड़ों का विवाह करवा देंगे।

उन्होंने सनातनियों से अपेक्षा की है कि वे अग्निवीर की टीम को अधिक से अधिक सपोर्ट करें।

गुजरात में घरवापसी
 महेंद्र भाई एवम नेहाबेन के साथ लेखक

तीस्ता सीतलवाड़, प्रतीक सिन्हा का बाप, राना अय्यूब… दंगों के बाद ‘धंधा’ कर लाशों पर बनाया करियर: गोधरा में ज़िंदा जलाए गए थे 59 रामभक्त

साल 2002 में गुजरात के गोधरा में दंगाई इस्लामवादियों की भीड़ ने साबरमती एक्सप्रेस में आग लगा दी थी। इससे अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि से लौट रहे 59 कारसेवक जिंदा जल गए थे। इस घटना के बाद पूरे गुजरात में दंगे भड़क उठे थे। कारसेवकों को जिंदा जलाए जाने के बाद भी हिंदुओं को देश की अदालत पर यह विश्वास था कि एक न एक दिन रामलला के पक्ष में फैसला जरूर आएगा।

बहरहाल, 27 फरवरी, 2002 की सुबह करीब 8 बजे मुस्लिमों ने पूरी प्लानिंग के तहत साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाई थी। इसके कुछ घण्टों बाद जले हुए डिब्बों को अलग कर दिया गया था और ट्रेन एक बार फिर आगे की ओर बढ़ चुकी थी। हालाँकि, इसके बाद दंगाई मुस्लिमों की एक और भीड़ ट्रेन में आग लगाने आई थी। लेकिन वह इस योजना में सफल नहीं हो सके। इसके कुछ घण्टों बाद जैसे ही कारसेवकों के साथ हुए इस हादसे की खबर फैली राज्य में दंगा भड़क उठे।

गोधरा कांड के बाद हुए दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए। हालात में काबू पाने के लिए सेना तक को बुलाना पड़ा था। ‘अहिंसा परमो धर्म:’ वाले राष्ट्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है। लोगों को कानून में विश्वास होना चाहिए था। इस्लामवादियों द्वारा हिंदुओं को जिंदा जलाने के बाद भड़के दंगे निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण थे। इस दंगे में मारे गए लोग भारतीय थे। वे हिंदू और मुस्लिम दोनों थे।

हालाँकि, यह देश का दुर्भाग्य ही है कि सैकड़ों भारतीयों की मौत को लेकर आज तक न बाहरी बल्कि देश की रोटी खाने पर तथाकथित कार्यकर्ताओं ने इन मौतों को अपना ‘धंधा’ बना लिया। लोगों के लिए भारतीयों की लाशें और पीड़ितों के आँसू पैसा और प्रसिद्धि कमाने तथा सत्ता परिवर्तन करने के उपक्रम बन गए।

वैज्ञानिक से वकील और तथाकथित कार्यकर्ता से राजनेता बने मुकुल सिन्हा और उनकी पत्नी ने अपना पूरा राजनीतिक करियर गुजरात दंगों में मारे गए लोगों की लाशों पर बनाया है। वह मुकुल सिन्हा ही थे जिन्होंने ट्रेन में अचानक आग लगने की बात को पुरजोर समर्थन देते हुए इसी सिद्धान्त पर जाँच आगे बढ़ाने की वकालत की थी। यही नहीं, सिन्हा और उनके लोगों ने मुस्लिमों को बचाने के लिए भी कई प्रयास किए थे। हालाँकि, जाँच समिति ने ऐसी तमाम साजिशों को नकार दिया था।

मुकुल सिन्हा का बेटा प्रतीक सिन्हा अब मोहम्मद जुबैर के साथ इस्लामिक प्रचार वेबसाइट ‘ऑल्ट न्यूज’ चलाता है। इस वेबसाइट ने हाल ही में भाजपा नेता नूपुर शर्मा के खिलाफ ईशनिंदा का आरोप लगाते हुए मामला उछाला था। ‘ऑल्ट न्यूज’ की करतूत के बाद ही इस्लामिक कट्टरपंथी नूपुर शर्मा के खून के प्यासे की तरह दिखाई दे रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि पिता मुकुल सिन्हा ने जो आग लगाई थी उसे बेटा प्रतीक सेना आगे बढ़ाने का काम कर रहा है।

लाशों पर महल बनाने वालों में तीस्ता सीतलवाड़ भी पीछे नहीं रहीं। सीतलवाड़ ने भी अपना पूरा करियर गुजरात दंगों पर बनाया है। दरअसल, तीस्ता सीतलवाड़ पर दंगा पीड़ितों के नाम पर इकट्ठा किए गए चंदे को गबन करने का आरोप लगा है। यही नहीं, उन पर मोदी सरकार को फँसाने के लिए लोगों को बरगलाने का भी आरोप है।

दरअसल, तीस्ता सीतलवाड़ ने 2002 के दंगा पीड़ितों के लिए कथित तौर पर धन एकत्र किया था। लेकिन ऐसा आरोप है कि उन्होंने इस धन का उपयोग ‘ऐश उड़ाने’ में किया। यही नहीं, उन पर गुजरात दंगों को लेकर फर्जी गवाहों का उपयोग कर तथा चश्मदीदों को बरगलाकर निर्दोषों को फँसाने का भी आरोप है।

इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि गुप्त षड्यंत्रों तथा अपने बदले के लिए तीस्ता सीतलवाड़ जाकिया अहसान जाफरी की भावनाओं का दुरुपयोग कर रहीं थीं। यही नहीं, सीतलवाड़ ने फर्जी गवाहों और झूठे दस्तावेजों का उपयोग कर इस पूरे मामले में जाँच एजेंसियों को गुमराह करने की कोशिश की।

गुजरात दंगों के मामले में तीस्ता ने संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCR) को भी दो पत्र लिखे थे। अदालत ने उनकी इस हरकत को ‘दुस्साहस’ करार दिया। साथ ही ऐसा दोबारा न करने की हिदायत देते हुए हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा था। अदालत ने माना था कि तीस्ता की इस हरकत ने न केवल एसआईटी जाँच पर सवालिया निशान की तरह थे। बल्कि देश की अदालतों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करने के लिए काफी था।

इसी तरह, हर्ष मंदर जैसे लोगों ने भी गुजरात दंगों में अपना करियर बनाया। हर्ष ने अपनी सिविल सेवा की नौकरी छोड़ दी थी। इसके बाद वह दंगा पीड़ितों के शिविरों में जा-जाकर ‘कार्यकर्ता’ बन गए। गुजरात दंगों को अपना करियर बनाने का मौका देखने वाला हर ‘कार्यकर्ता’ यह जानता था कि मोदी विरोध उसे आगे बढ़ने में मददगार साबित हो सकता है। हर्ष मंदर इनमें से एक है। वह लगातार एक्टिव रहे और साल 2020 में हुए दिल्ली दंगों में भी सक्रियता दिखाते हुए भीड़ को उकसाते हुए पाए गए। हर्ष मंदर के कुख्यात वामपंथी और भारत विरोधी अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस से करीबी संबंध रहे हैं।

दिल्ली में आयोजित हुई एक सभा में बोलते हुए, हर्ष मंदर को विदेशी फंडिंग के बल पर जुटाई गई भीड़ को उकसाते हुए देखा गया था। उन्होंने लोगों से शक्ति प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतरने का आह्वान किया था। मंदर ने दावा किया था कि अब समय आ गया है कि लोग सड़कों पर उतरें क्योंकि सुप्रीम कोर्ट और संसद दोनों ने ही उन्हें असफल कर दिया है। यह कहना गलत नहीं है कि साल 2020 के दंगों की जड़ें 2002 के दंगों में भी थीं। साथ ही, इन दोनों दंगों की जड़ें साल 1992 में हुए बाबरी विध्वंस से जुड़ी हुईं थीं।

वाशिंगटन पोस्ट की कॉलमिस्ट राना अय्यूब ने पर मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप है। ईडी उनकी 1.7 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त कर चुकी है। अय्यूब ने ऐसे लोगों के तथाकथित स्टिंग ऑपरेशनों पर आधारित एक पूरी ‘किताब’ लिखी, जिन्होंने यह दावा किया था कि दंगों के दौरान उन्हें कानून-व्यवस्था की पूरी जानकारी थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर और भारतीय ‘वामपंथी’ लॉबी ने उनकी इस ‘किताब’ को ‘खोजी पत्रकारिता’ बताते हुए जमकर तारीफ की है। हालाँकि, देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया क्योंकि न तो इसमें कुछ सच्चाई थी और न ही दावों में किसी प्रकार का दम।

राना अय्यूब का यह लेख इतना खराब था कि ‘तहलका’ पत्रिका में उनके अपने संपादकों ने भी उनके काम को घटिया करार दिया। वास्तव में यह पत्रकारिता की नैतिकता की अवहेलना करने वाले निम्न स्तर के स्टिंग ऑपरेशन के अलावा कुछ भी नहीं था। हालाँकि, अय्यूब ने यहाँ भी खुद को पीड़ित बताते हुए दावा किया कि मोदी इसे पब्लिश नहीं होना देना चाहते। जबकि सच्चाई यह है कि उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी। राना अय्यूब के स्टिंग ऑपरेशन के समय ‘तहलका’ की प्रधान संपादक रहीं शोमा चौधरी ने कहा था कि राना को उनके ‘खुलासे’ में खामियों के बारे में पता चला। उन्होंने जोर देकर कहा था कि ऐसा नहीं था कि किसी राजनीतिक दबाव के कारण उनके लेख प्रकाशित नहीं किए गए क्योंकि उसके बाद भी उन्होंने मोदी विरोधी लेख प्रकाशित किए थे।

गुजरात दंगों पर अपना करियर आगे बढ़ाने वाली राना अय्यूब आज भी लोगों को दंगों के लिए डराती रहतीं हैं। मुकुल सिन्हा, तीस्ता सीतलवाड़, हर्ष मंदर, राणा अय्यूब समेत ऐसे और भी बहुत से कार्यकर्ता, ‘पत्रकार’ और यहाँ तक कि मीडिया घराने भी हैं जो 2002 के दंगों को लेकर मोदी से नफरत फैलाने पर ही फलते-फूलते हैं।

हाल ही में, 2002 के दंगों पर आधारित बीबीसी के प्रोपेगैंडा डॉक्यूमेंट्री के मुद्दे को उछालकर कॉन्ग्रेस ने अपनी सुसुप्तावस्था में पड़ी राजनीति को जगाने की कोशिश की। हालाँकि जब उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि इससे काम चलने वाला नहीं है तो उन्होंने अडानी और ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के नाम पर हो-हल्ला करना शुरू कर दिया।

हालाँकि इतना सब करने के बाद भी जब इन विदूषकों ने देखा कि मोदी में विरोध उन्हें वह सफलता नहीं मिल पा रही है जिसका उन्होंने प्रयास किया था तो फंडिंग देने वाले जॉर्ज सोरोस ने खुद ही मामले को अपने हाथ में लेने का फैसला किया। सोरोस के बयानों पर कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर तालियाँ पीटीं। ऐसा लगता है जैसे कि इन लोगों के लिए राष्ट्रहित सर्वोपरि नहीं बल्कि मोदी विरोध ही सर्वोपरि है। मोदी विरोध में ये लोग देश की अस्मिता से खिलवाड़ करने में भी बाज नहीं आ रहे हैं। इन लोगों ने भारतीयों के शवों पर अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया है। दुःखद यह है कि इतना सब होने के बाद भी उन्हें कोई पछतावा नहीं है।

इटली नाव दुर्घटना में 59 की चली गई जान, मरने वाले भारत-पाकिस्तान-अफगानिस्तान के प्रवासी: इस रास्ते पर अब तक 17000 की हो चुकी है मौत

इटली (Italy Boat Wreck) में ​रविवार (26 फरवरी, 2023) को प्रवासियों से भरी एक नाव पलटने से नवजात समेत 59 लोगों की मौत हो गई। यह हादसा इटली के तटीय क्षेत्र कालब्रिया तट के पास समुद्री तूफान में नाव के चट्टान से टकराने के कारण हुआ। इस नाव में भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के लोग सवार थे। इस दुर्घटना में 80 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है। इनमें से ज्यादातर तैरकर किनारे आ गए थे। वहीं, कई लोगों के लापता होने की आशंका जताई जा रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस नाव पर 150 से 200 लोग सवार थे। मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है। भूमध्य सागर के उस हिस्से में खराब मौसम के कारण बचावकर्मियों को लोगों को बचाने में काफी दिक्कतें आ रही हैं। दरअसल, यह नाव तुर्की से रवाना हुई थी और भारत, पाकिस्तान अफगानिस्तान, ईरान व कई अन्य देशों से लोगों को ले जा रही थी। इस जहाज को सुबह कालब्रिया के पूर्वी तट पर समुंद्र के किनारे स्थित स्टैकाटो डि कट्रो के पास पहुँचना था। बताया जा रहा है कि पहले तीन शव स्थानीय समयानुसार रविवार सुबह करीब 4:40 बजे दक्षिणी इटली में स्टैकाटो डि कट्रो के पास समुंद्र तट पर मिले।

इटली की फायर बिग्रेड टीम ने सीएनएन को बताया कि नाव से करीब 80 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है। बचाए गए लोग ईरान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से हैं। इटली के प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने हादसे पर शो​क व्यक्त करते हुए मानव तस्करों को इसके लिए दोषी ठहराया। उन्होंने कहा, “खराब मौसम में लोगों की जान जोखिम में डालना सही नहीं था। 200 लोगों को एक साथ सिर्फ 20 मीटर लंबी नाव में बिठाना अपराध है। सुरक्षित यात्रा का झूठा वादा कर पैसों के लिए पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का जीवन खतरा में डालना अमानवीय है।”

आंतरिक मंत्री माटेओ पियानटेडोसी (Matteo Piantedosi) ने कहा कि इस तरह की खतरनाक यात्राओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाया जाना चाहिए। वहीं, पोप फ्रांसिस ने कहा कि इस तबाही में फँसे सभी लोगों के लिए वे प्रार्थना कर रहे हैं। इनके अलावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी इटली में प्रवासियों से भरी नाव के पलटने पर दुख जताया है। इसमें मरने वाले 59 लोगों में से 24 से अधिक पाकिस्तानी थे। शरीफ ने कहा कि इटली में नाव दुर्घटना में दो दर्जन से अधिक पाकिस्तानियों की मौत की खबर बेहद चिंताजनक और दुखद है।

बता दें कि भूमध्य सागर मार्ग को दुनिया के सबसे खतरनाक मार्गों में से एक माना जाता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2014 से अब तक इस रास्ते का इस्तेमाल करने वाले 17,000 लोग या तो जान गँवा चुके हैं या लापता हो गए हैं।

और इस तरह एक बार फिर काल के गाल को प्राप्त हुआ अश्वस्थामा… चंद्रशेखर आज़ाद की मूँछ वाली तस्वीर के पीछे की कहानी, अज्ञातवास में ‘मास्टर जी’ के यहाँ रुके थे

काकोरी कांड में फ़रार मुजरिम होने के कारण पुलिस चंद्रशेखर आज़ाद की जान के पीछे हाथ धो कर पड़ी थी। क्रांतिकारियों की दुनिया के अब वे एक जांबाज सिपाही थे, जिनकी दिलेरी के किस्से अब हर शहर में गूँज रहे थे। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महान क्रांतिकारियों के साथ अब उनका नाम लिया जाने लगा था। आज़ाद साहब अब महज एक चंचल युवक ‘क्विक सिल्वर’ नहीं रह गए थे और भगत सिंह, सुखदेव, राज गरु, अशफाकुल्लाह, बिस्मिल आदि के साथ हर एक एक गंभीर बैठक में शामिल हुआ करते थे।

अंग्रेज़ों के विरुद्ध किए जाने वाले हर एक्शन से पहले संगठन की बैठक में उनकी मौजूदगी ज़रूरी होती थी। संगठन के भेद को बनाए रखने के लिए हर शख्स को हिदायत थी कि अपने घर का पता दूसरे सदस्य को ना बताएँ और तस्वीर तो खिंचवाने का मतलब ही नहीं था। यही एक कारण है कि उन महान क्रांतिकारियों की बहुत ज़्यादा तस्वीरें आज भी हमारे पास नहीं हैं। आज 27 फ़रवरी जो कि आज़ाद साहब का बलिदान दिवस है, पर बात करते हैं एक ऐसी तस्वीर की, जिसके बारे में इंटरनेट पर तरह-तरह की भ्रामक सूचनाएँ हैं।

यह बात उन दिनों की है जब आज़ाद साहब अपने अज्ञातवास में अपने मित्र और गुरु मास्टर रुद्रनारायण के घर पर रह रहे थे। आज़ाद साहब उस दिन आँगन में व्यायाम पश्चात स्नान आदि कर चुके थे। श्वेत धोती कमर पर लुंगी की तरह लपेटे हुए थे और कंधे पर जनेऊ था ही। आज़ाद जब अच्छे मूड में होते थे तो बाल काढ़ते हुए कुछ भी गुनगुना रहे होते थे। उस रोज़ भी गुनगुना ही रहे थे। मास्टर जी दूर बैठे उनको देख रहे थे। मास्टर जी को अचानक जाने क्या सूझा, उन्होंने अपना कैमरा उठाया और बोले, “पंडितजी, आज आप कुछ अलग ही रहे हैं, एक तस्वीर खींच लूँ?”

“अरे नहीं मास्टर जी, आपको तो पता ही है कि संगठन में इसकी मनाही है।” आज़ाद की किसी तरह की कोई भी तस्वीर उस रोज़ तक किसी के पास नहीं थी। वे नहीं चाहते थे कि किसी तरह कोई तस्वीर ब्रिटिश पुलिस तक पहुँच ,जाए और उनकी पहचान हो सके। आज़ाद को भी यह पता था कि अंग्रेज़ों ने उनके पीछे गुप्तचर लगाये हुए हैं, इसलिए वो नहीं चाहते थे कि उनकी तस्वीर खींची जाए। “वो तो नये सदस्यों के साथ है पंडित जी। तुम और मैं नये हैं क्या?” – मास्टर जी ने पूछा।

“फिर भी..” आज़ाद उलझन में थे। मास्टर जी आज़ाद के नजदीक आए और कंधे पर हाथ रख कर बोले, “आज़ाद, तुम्हारी तस्वीर की इसीलिए और भी ज़रूरत है कि आने वाली पीढ़ी यह देख और समझ सके कि आज़ाद उन्हीं की तरह आम शक्ल सूरत का एक नौजवान था मगर स्वतंत्रता, क्रांति की भावना और साहस ने उसे भारत का एक महान क्रांतिकारी बना दिया।” आज़ाद चुप थे। “मैं वादा करता हूँ कि इस तस्वीर के बारे में किसी को पता नहीं चलेगा और पूर्ण रूप से सुरक्षित रहेगी। मैं अपने लिए ही ले रहा हूँ। घबराओ मत, भरोसा है ना मुझपर?” – मास्टर जी खड़े हो गए।

“क्या बात कर दी मास्टर जी आपने, जान से ज़्यादा भरोसा है आप पर।” – आज़ाद ने कहा। आखिरकार मास्टर जी ने आज़ाद को मना ही लिया तस्वीर के लिए। लेकिन आज़ाद ने हलके से एक बार और टालने की कोशिश की, “लेकिन ऐसे उघारे बदन, अच्छा नहीं लगेगा, मैं अंदर से कुर्ता पहनकर आता हूँ?” मास्टर जी मौके को गँवाना नहीं चाहते थे। आज़ाद के मूड का पता नहीं, कहीं बदल गया तो फिर वो राजी नहीं होने वाले थे। मास्टर जी बोले, “दाऊ, कुर्ता रेन दो।”

“अरे मूँछ तो ठीक कर लूँ, नहाने से बिगड़ गयी हैं।” कहते हुए आज़ाद ने अपनी मूँछ उमेठना शुरू की।
“क्लिक!”
“अरे मास्टर जी आप भी ना..” आज़ाद कहते ही रह गए।
तस्वीर ली जा चुकी थी।

किन्तु इस तस्वीर के लेने के कुछ दिन बाद ही आज़ाद को महसूस होने लगा कि यह काम ठीक नहीं हुआ है। उस रोज़ वो विश्वनाथ वैशम्पायन के पास थे, जब अचानक से उनके मन में पता नहीं क्या सूझा और विश्वनाथ से बोले, “एक काम करोगे मेरा?”
“कैसी बात कर रहे आप दाऊ? पूछने की क्या बात है? आप आदेश कीजिए।”
“तुम ज़रा मास्टर जी के पास जाओ और उनसे कहो कि वो जो तस्वीर उन्होंने मेरी ली है, उस तस्वीर को तुरंत नष्ट कर दिया जाना चाहिए।”
“कौन सी तस्वीर दाऊ? वैशम्पायन चौंक गए।
“अरे वो मास्टर जी ने बहला-फुसला कर मेरी एक तस्वीर उतार ली है जबकि तुमको पता है कि यह संगठन के क़ानून के खिलाफ़ है।”
“अब ले ली है तो जान दो दाऊ।”
“नहीं विश्वनाथ! जो गलत है वो गलत है। कोई भी उसका दुरुपयोग कर सकता है।”
विश्वनाथ तुरंत मास्टर जी के पास पहुँचे और मास्टर जी को आज़ाद का संदेसा सुनाया।
“हम्म्म्म!”
“क्या हुआ मास्टर जी?” विश्वनाथ अब चिंतित थे।
“मुझे आज़ाद के डर के बारे में पता है और यह भी पता है कि भारत की स्वंत्रतता में अभी आज़ाद की कितनी ज़रूरत है।”
“जी मास्टर जी।”
“देखो बच्चन, आज नहीं तो कल देश को आज़ाद होना ही है। तुम यह बताओ कि भारत के आज़ाद हो जाने पर लोग इस महान क्रांतिकारी को किस तरह याद रखेंगे? मास्टर जी ने वैशम्पायन को समझाया।
“मैं मानता हूँ इस बात को।”
“तुम निश्चिंत रहो विश्वनाथ, आज़ाद के जीते जी यह तस्वीर कभी आम जनता के सामने नहीं आएगी। तुमको यह भी पता है कि जिस रास्ते पर आज़ाद चल रहे हैं उसका अंजाम क्या है। यह जान लो कि यह एक अकेली तस्वीर है जिससे उनकी स्मृति सुरक्षित रहेगी और लोग इस जाँबाज़ आज़ाद को कभी भूल नहीं पायेंगे।” मास्टर जी वैशम्पायन को यह समझाने में सफल होगए थे।
“मैं ऐसा करता हूँ कि इसके निगेटिव की प्लेट को दीवार में चुनवा देता हूँ और इसके प्रिंट को नष्ट कर देता हूँ। तुम लौट कर आज़ाद को यह बता देना कि उनकी तस्वीर नष्ट कर दी गई है।”
“हम दाऊ से झूठ ना बोल पाएँगे मास्टर जी।” वैशम्पायन के लिए आज़ाद साहब से झूठ बोलना बेहद मुश्किल था।
मास्टर जी मुस्कुराए और बोले, “अश्वथामा मारा गया!” याद है ना?
वैशम्पायन ने मास्टर जी की ओर देखा, “तुम आज़ाद साहब से वही कहोगे जो तुम देखने वाले हो।”
मास्टर जी ने वैशम्पायन के सामने आज़ाद साहब की वो तस्वीर और कुछ दूसरे नेगेटिव नष्ट कर दिये।
“अब तुम आज़ाद को बोलना कि आपकी तस्वीर और नेगेटिव नष्ट कर दिए हैं मास्टर जी ने। ठीक है ना विश्वनाथ?” मास्टर जी विश्वनाथ के कंधे पर हाथ रखा।
विश्वनाथ लौटे और आज़ाद के पास पहुँचे।
“कहाँ हैं तस्वीर?” आज़ाद चिंतित थे।
“आपकी तस्वीर और नेगेटिव नष्ट कर दिए हैं मास्टर जी ने।” विश्वनाथ धीमे से बोले।
“खाओ हमाई सौं विश्वनाथ।”
“आपकी सौं दाऊ।”

अश्वथामा एक बार फिर काल के गाल को प्राप्त हुआ था। जब आज़ाद बलिदान हो गए तब यह तस्वीर मास्टर जी ने दीवार से निगेटिव निकलवा कर बनवाई और इस तरह देश के सामने आई उस महान क्रांतिकारी की एकमात्र जीवंत छवि, जो आज तक देश के तमाम वासियों के मन में बसी है। अब आते हैं उस तस्वीर पर जिसमें आज़ाद एक महिला और दो बच्चों के साथ बैठे हुए हैं। यह वही तस्वीर है जिसके सहारे भारत सरकार ने आज़ाद साहब के ऊपर डाक टिकट जारी किया था, जो आज भी उनकी अमिट पहचान है।

27 फ़रवरी 1988 में भारत सरकार द्वारा आज़ाद साहब के ऊपर जो साथ पैसे का टिकट जारी किया गया था, उस पर भी इसी तस्वीर का हिस्सा है।

बहुत दिनों तक इंटरनेट पर यह खबर उड़ती रही कि यह आज़ाद साहब की धर्मपत्नी और उनके बच्चों की हैं। आपको बताता चलूँ कि इस तस्वीर में आज़ाद साहब मास्टर जी के घर में, यानी मेरे नाना श्री मास्टर रुद्रनारायण जी की धर्मपत्नी श्रीमती मुन्नीदेवी (मेरी नानी) और उनकी दो बिटियों सावित्री जी और लक्ष्मी जी के साथ बैठे हैं। इस तस्वीर लेने का कारण यह था कि लोगों को यह लगे कि आज़ाद मास्टर जी के परिवार के ही सदस्य हैं। मैं आभारी हूँ मास्टर रुद्रनारायण जी की पौत्री श्रीमती गीता राय और प्रपौत्र श्री अभिनव श्रीवास्तव जी का, जो समय-समय पर मेरी जानकारियों में बढ़ोतरी करते रहते हैं।

27 फ़रवरी, 1988 को भारत सरकार द्वारा आज़ाद साहब के ऊपर जो साथ पैसे का टिकट जारी किया गया था, उस पर भी इसी तस्वीर का हिस्सा है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम एक ऐसे ही कुछ गुमनाम क्रांतिकारियों की गाथाएँ आप क्रांतिदूत शृंखला में पढ़ सकते हैं जो डॉ. मनीष श्रीवास्तव द्वारा लिखी गई हैं।

‘अब फट गई न…?’ : दिल्ली पुलिस ने अखबार में दिया विज्ञापन – ‘फट गई या फट गया’ को क्लियर करने फिर से छापना पड़ गया

टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार में हाल में दिल्ली पुलिस ने एक विज्ञापन प्रकाशित करवाया। इस विज्ञापन में ‘लावारिस वस्तुओं को न छूने और उसकी जानकारी पुलिस को देने’ के लिए अलर्ट था। कार्टून 24 जनवरी को प्रकाशित किया गया था। इस कार्टून में उन्होंने दिखाया कि कैसे दिल्ली पुलिस हमेशा समझाती है कि सार्वजनिक स्थलों पर पड़ी अंजान चीजों को कभी न छुएँ, लेकिन फिर भी लोग छूते हैं और दुर्घटना का शिकार होते हैं। इसी विज्ञापन में शब्द का प्रयोग हुआ ‘फट गई न’… जिस पर अब स्पष्टीकरण आया है।

इस कार्टून में साफ दिख रहा है कि दिल्ली पुलिस ‘सतर्क दिल्ली सेफ दिल्ली’ वाला संदेश दे रही है। एक व्यक्ति है जिसने सड़क पर पड़ी चीज को छुआ है और फिर उसमें विस्फोट के कारण घायल पड़ा है। लोग आकर उसे बता रहे हैं- दिल्ली पुलिस चिल्ला चिल्ला कर बोलती है, लावारिस चीजों को न छुएँ। अब फट गई न??

“इस संदेश के बाद दिल्ली पुलिस के लोगो के साथ फिर कहा जाता है कि किसी भी लावारिज वस्तु की जानकारी पुलिस को दें। ये जीवन और मौत का मामला हो सकता है। हमारे आँख, कान बनें और अपराध व आतंकवाद से लड़ने में हमारी मदद करें। कोई भी संदिग्ध वस्तु मिलने पर फौरन 1090 पर कॉल करें या मदद के लिए 112 नंबर मिलाएँ।“

अब समस्या पूरे संदेश में कहीं नहीं है। बस माफी जो माँगी गई है वो एक मात्रा की गलती की वजह से है। जहाँ ‘फट गया’ प्रयोग होना था वहाँ ‘फट गई’ लिख गया। इस पर शुद्धिपत्र जारी करते हुए माफी माँगी गई। शुद्धिपत्र में कहा गया कि 24 जनवरी को प्रकाशित किए गए दिल्ली पुलिस के विज्ञापन में ‘फट गई’ शब्द लिख गया था। वो उसके लिए माफी माँगते हैं।

बता दें कि छोटी सी गलती के लिए माफी माँगे जाने के बाद नेटीजन्स इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। कोई हँसते हुए कह रहा है कि माफी माँगने की क्या जरूरत तो कोई कह रहा है कि विज्ञापन का पैसा कम होगा तभी ऐसी गलती हुई।

उल्टी, बदन दर्द, तेज बुखार…: ईरान में लड़कियाँ न जा पाएँ स्कूल इसलिए उन्हें दिया गया जहर, 4 महीने में 50+ छात्राएँ बीमार

ईरान में स्कूल जाने वाली कई लड़कियों को जहर देकर मार डालने की साजिश का खुलासा हुआ है। यह करतूत किसकी है इस बात का पता फ़िलहाल नहीं चल पाया है। इस मामले में अभी तक किसी गिरफ्तारी की पुष्टि भी नहीं हुई है। बताया जा रहा है कि इस हरकत के पीछे कुछ कट्टरपंथी हैं जो ईरान के स्कूलों को बंद करवाना चाह रहे हैं। अभी तक सभी बीमार छात्र सुरक्षित बताए जा रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कोम शहर में इस बात का खुलासा तब हुआ जब स्कूल जाने वाली लड़कियाँ एक के बाद एक बीमार होने लगीं। कुछ ही समय बाद इन लड़कियों की सँख्या 50 पहुँच गई। पहली घटना नवम्बर 2022 की बताई जा रही। तब कोम शहर के ही एक स्कूल में एक साथ लगभग 18 लड़कियों के बीमार होने की घटना सामने आई। तब उन्हें अस्पताल ले जाया गया था। यहाँ उन सभी लड़कियों को उलटी, पेट दर्द, हाथों-पैरों में तेज दर्ज के साथ साँस लेने में दिक्कत महसूस हुई थी।

अंतिम घटना 22 फरवरी 2023 (बुधवार) को कोम शहर के एक स्कूल में दर्ज की गई थी। यहाँ एक ही स्कूल की 15 लड़कियों की तबियत अचानक बिगड़ गई थी। सभी में एक जैसी बीमारी के लक्षण पाए गए थे। पहली और अंतिम घटना के बीच कई अन्य स्कूलों में इसी प्रकार की वारदात हुई। लगभग हर वारदात में पीड़ित छात्रों ने एक जैसी परेशानी महसूस की। हालाँकि बीमार होने वाले छात्रों में कुछ लड़के भी थे लेकिन लड़कियों की तादाद अधिक थी।

इन घटनाओं के बाद कुछ अभिभावकों ने लड़कियों को जहर दिए जाने की आशंका जताई। इस शक पर अधिकारियों ने जाँच शुरू की। शुरुआती जाँच में स्थानीय अधिकारियों द्वारा किसी प्रकार का जहर न मिलने की जानकारी दी गई। लड़कियों के माता-पिता इस जाँच से संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजना ही बंद कर दिया। हालाँकि गनीमत से अभी तक इस हरकत से किसी छात्रा की मौत नहीं हुई लेकिन लोगों में काफी नाराजगी फ़ैल गई। लोगों की नाराजगी देखते हुए ईरान सरकार ने इस मामले की बड़े स्तर पर जाँच करवाई।

इस जाँच के बाद ईरान के उप शिक्षा मंत्री युनेस पनाही ने जानकारी देते हुए बताया कि कुछ लोगों द्वारा छात्रों को केमिकल के माध्यम से जहर दिया जा रहा था। उन्होने आगे बताया कि छात्रों को परेशान होने की जरूरत नहीं है क्योकि घटना में प्रयोग हुआ केमिकल बहुत हानिकारक नहीं है। अभी तक किसी आरोपित की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

भारत-बांग्लादेश सीमा पर घुसपैठ रोक रहे थे 2 BSF जवान, 100 बांग्लादेशियों ने कर दिया हमला: हथियार लूटकर भागे, FIR दर्ज

पश्चिम बंगाल से सटी भारत बांग्लादेश सीमा में भारतीय जवानों पर हमले की खबर सामने आई। आरोप है कि बांग्लादेशी घुसपैठिए अपने मवेशियों को चराने के लिए भारतीय सीमा में घुसपैठ कर रहे थे। इसे देखते हुए पेट्रोलिंग कर रहे 2 जवानों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इस पर 100 से अधिक लोगों ने उन पर हमला कर दिया और उनके हथियार छीन कर भाग गए। हमले में जवानों को गंभीर चोटें आईं हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना मुर्शिदाबाद जिले के रानीताला थाना क्षेत्र अंतर्गत निर्मलचर सीमा चौकी की है। यहाँ सीमा पर, 35वीं बटालियन के 2 जवान पेट्रोलिंग कर रहे थे। जवानों ने देखा कि बांग्लादेशी घुसपैठिए अपने जानवरों को भारतीय किसानों के खेतों में चराने के लिए घुसपैठ कर रहे हैं। इस पर जवानों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। इस दौरान 100 से अधिक बांगलादेशी घुसपैठियों ने जवानों पर डंडों और घातक हथियारों से हमला कर दिया।

इस हमले में दोनों जवान बुरी तरह से जख्मी हो गए। फिर बांगलादेशी घुसपैठिए जवानों के हथियार छीनकर फरार हो गए। घटना की जानकारी मिलने पर बीएसएफ के अधिकारी मौके पर पहुँचे। दोनों घायलों को नजदीकी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है।

इस हमले को लेकर बीएसएफ ने बयान जारी कर कहा है कि घटना के बारे में बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश (BGB) को सूचित किया गया। साथ ही जवानों के हथियार बरामद करने व भविष्य में ऐसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए एक फ्लैग मीटिंग की माँग की गई है। बयान में यह भी कहा गया है कि भारतीय किसान बांग्लादेशियों द्वारा उनकी फसल चोरी किए जाने की शिकायत करते रहे हैं।

कहा जा रहा है कि भारतीय किसानों की फसल नष्ट करने के लिए बांग्लादेशी घुसपैठिए पहले भी जानवर चराने तथा फसल चोरी करने जैसी हरकतों को अंजाम देते रहे हैं। इन घटनाओं के बारे में बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश (BGB) को सूचित किया गया था। हालाँकि इन घटनाओं पर रोक लगाने के लिए बीजीबी की ओर से अब तक कोई भी ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इस पूरे मामले में बीएसएफ ने अज्ञात बांगलादेशी घुसपैठियों के खिलाफ हमला करने और हथियार चुराने के आरोप में रानीताला थाने में FIR दर्ज कराई है।

सीनियर डॉक्टर सैफ करता था तंग… जूनियर प्रीति ने एनिस्थीसिया का इंजेक्शन लगाकर कर ली आत्महत्या: आरोपित बोला- ‘मैं उसे सुधार रहा था’

तेलंगना के वारंगल जिले में आत्महत्या का प्रयास करने वालीं काकतीय मेडिकल कॉलेज की दलित छात्रा डॉ प्रीति की इलाज के दौरान मौत हो गई है। प्रीति के सीनियर डॉ सैफ पर उन्हें रैंगिंग के नाम पर प्रताड़ित करने का आरोप है। डॉ प्रीति की मृत्यु की पुष्टि रविवार (26 फरवरी 2023) को निज़ाम इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस द्वारा की गई है। बुधवार (22 फरवरी 2023) को पीड़िता ने एनेस्थीसिया की दवा का इंजेक्शन लगाकर आत्महत्या की कोशिश की थी। तब से उनका इलाज चल रहा था।

इस मामले में आरोपित डॉ सैफ को पुलिस ने शुक्रवार (24 फरवरी 2023) को गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस सैफ के खिलाफ सबूत जुटा रही है। पुलिस ने प्रीति का फोन चेक करने के बाद पाया कि उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था। सैफ पर SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है। वहीं निज़ाम इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेस के सुपरिंटेंडेंट ने प्रीति की मौत की खबर की पुष्टि अपने आधिकारिक लेटर हेड पर की है। उन्होंने बताया कि तमाम कोशिशों के बाद भी हम डॉ प्रीति को नहीं बचा पाए। पीड़िता ने रात 9 बज कर 10 मिनट पर अंतिम सांस ली।

जानकारी के मुताबिक डॉ प्रीति के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। घटना के बाद से मृतका की हालत लगातर गंभीर बनी हुई थी। इस दौरान कई डॉक्टरों ने प्रीति के लिए चिंता जरूर प्रकट की लेकिन उन्होंने सैफ के साथ अपना समर्थन खुल कर दिखाया था। खुद आरोपित सैफ का मानना था कि वो प्रीति के कामों में सुधार कर रहे थे जिसे प्रीति खुद के लिए परेशानी मानती थी। तेलंगाना जूनियर्स डॉक्टर एसोशिएशन ने भी सैफ के समर्थन में आवाज उठाते हुए उनके खिलाफ दर्ज केस बंद करने की माँग की।

जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का मानना है कि जिसे पुलिस रैंगिंग बता रही है वह सीनियर और जूनियर के बीच सामान्य बातचीत है। इसी मामले ट्राइबल यूनियन ने गुरुवार (23 फरवरी 2023) को प्रीति के समर्थन और सैफ के विरोध में अस्पताल के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकरियों ने पुलिस पर सैफ के खिलाफ कार्रवाई में हीलाहवाली का आरोप लगाया था।

नमाज की तैयारी के वक्त मदरसे में हुआ धमाका, करंट लगने से 4 बच्चे झुलसे: राजस्थान की घटना, पुलिस जाँच में जुटी

राजस्थान के कोटा में स्थित एक मदरसे में बिजली की हाईटेंशन तार से हुए धमाके और करंट लगने से 4 बच्चे घायल गए। इसमें से 3 की हालत गंभीर बताई जा रही है। हादसा उस वक्त हुआ जब लोग नमाज की तैयारी कर रहे थे। फिलहाल हादसे का कारण स्पष्ट नहीं है। हादसा रविवार (26 फरवरी 2023) शाम हुआ।

यह हादसा कोटा के दादाबाड़ी क्षेत्र के वक्फ नगर में स्थित मदीना फैजान मदरसे में हुआ। हादसे के वक्त मदरसे में मौजूद अरशद अंसारी का कहना है कि घटना शाम करीब 6:30 की है। मदरसे में नमाज की तैयारी हो रही थी। वहाँ करीब 50-60 लोग मौजूद थे। वहीं, मदरसे में पढ़ने वाले 4 बच्चे अली अंसारी, जरयान, अरमान और गाजी मदरसे के छज्जे में खड़े हुए थे।

इस दौरान मदरसे से करीब 4 फीट दूर से निकली हुई 33KV हाईटेंशन लाइन ने बच्चों को खींच लिया। साथ ही अचानक धमका जैसा हुआ। इस पूरी घटना की चपेट में आए चारों बच्चे झुलस गए। हादसे के बाद आनन में बच्चों को मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। हालाँकि बाद में बच्चों को एक प्राइवेट में भर्ती किया गया। यहाँ हुए प्राथमिक उपचार के बाद एक बच्चे गाजी को छुट्टी मिल गई। वहीं 3 अन्य अब भी हॉस्पिटल में भर्ती हैं।

इस हादसे में एक बच्चे अली को काफी चोट आई है। करंट की चपेट में आने से उसके सीने और पैर बुरी तरह से झुलस गए हैं। वहीं 2 अन्य बच्चों की हालत स्थिर बनी हुई है। घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस प्रशासन से लेकर कई संबंधित अधिकारी मदरसे में पहुँच गए। वहीं कुछ अधिकारी हालात का जायजा लेने हॉस्पिटल भी पहुँचे।

हादसे के कारण

अब तक इस हादसे को लेकर कई कारण बताए जा रहे हैं। एक ओर जहाँ यह कहा जा रहा है कि हाई टेंशन लाइन ने बच्चों को खींच लिया। इससे हादसा हुआ। वहीं यह भी कहा जा रहा है कि घायल हुए बच्चे वाइपर से काम कर रहे थे। इस दौरान ही वाइपर हाईटेंशन लाइन से टच हुआ। इससे हादसा हुआ। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि बच्चों के मोबाइल चार्ज में लगे हुए थे। इस दौरान हुए शार्ट सर्किट से यह हादसा हुआ।

पुलिस का कहना है कि इस हादसे के स्पष्ट कारण का पता अब तक नहीं चल सका है। घटना को लेकर कई कारण सामने आए हैं। जाँच में ही घटना के कारणों की पुष्टि हो सकेगी। बिजली कंपनी के सीओओ शांतनु भट्टाचार्य ने भी ऐसी ही बात दोहराई है। भट्टाचार्य का कहना है कि घटना की जानकारी सामने आने के बाद से अब तक कई तरह के कारण बताए जा रहे हैं। इसके बारे में टेक्निकल जाँच के बाद ही सब कुछ स्पष्ट हो सकेगा।

सवालों पर कर रहे थे टालमटोल, जाँच में पहले भी नहीं किया सहयोग: मनीष सिसोदिया की गिरफ़्तारी का कारण जानिए, आपराधिक साजिश-धोखाधड़ी का भी मामला

दिल्ली की शराब नीति को लेकर हुए घोटाला मामले में सीबीआई (CBI) ने मनीष सिसोदिया (Manish Sisodia) को गिरफ्तार कर लिया। गिरफ्तारी से पहले सीबीआई ने करीब 8 घण्टे तक उनसे पूछताछ की। इस गिरफ्तारी को लेकर AAP बीजेपी पर हमलावर है। हालाँकि, सीबीआई ने कहा है कि सिसोदिया जवाब देने में टाल-मटोल कर रहे थे। इसलिए उन्हें गिरफ्तार किया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सीबीआई ने मनीष सिसोदिया को IPC की धारा 120-B (आपराधिक साजिश रचने के आरोप में) तथा 477-A (धोखाधड़ी करने की कोशिश करने के आरोप में) व भ्रष्टाचार अधिनियम निवारण की धारा-7 के तहत गिरफ्तार किया है।

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी को लेकर सीबीआई ने बयान जारी कहा है कि जाँच के दौरान घोटाले को लेकर जुटाए सबूतों को लेकर उनसे पूछताछ की गई। लेकिन, सिसोदिया ने पहले की ही तरह एक बार फिर जवाब देने में टाल-मटोल कर रहे थे।

बयान में सीबीआई ने यह भी कहा है कि नई आबकारी नीति में कथित अनियमितताओं को लेकर सिसोदिया व अन्य 14 लोगों के FIR दर्ज की गई थी। इसमें मुंबई की एक निजी कंपनी के तत्कालीन सीईओ समेत 7 लोगों के खिलाफ 25 दिसंबर, 2022 को चार्जशीट दाखिल की गई।

जाँच में सहयोग करने के लिए सिसोदिया को 19 फरवरी को नोटिस जारी किया। लेकिन उन्होंने व्यस्तता का हवाला देते हुए एक सप्ताह का समय माँगा। उनके अनुरोध पर फिर नोटिस जारी किया गया। हालाँकि इसके बाद भी वह जवाब देने में टालमटोल करते रहे। इसलिए उनकी गिरफ्तारी हुई। ‘हिंदुस्तान’ ने अपनी रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा है कि मनीष सिसोदिया के जवाब जाँच एजेंसी को संतोषजनक नहीं लग रहे थे। जाँच अधिकारी उनसे दिनेश अरोड़ा समेत अन्य आरोपितों से संबंध को लेकर पूछताछ कर रहे थे। लेकिन, सिसोदिया ज्यादातर जवाबों को टालने की कोशिश कर रहे थे।

सूत्रों के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि जाँच अधिकारी यह जानना चाहते थे कि आबकारी नीति लागू होने से पहले ही इसकी प्रतियाँ शराब कारोबारियों तक कैसे पहुँची? लेकिन, सिसोदिया इन तमाम सवालों के जवाब नहीं दे सके। यही नहीं, सिसोदिया की गिरफ्तारी में दिनेश अरोड़ा के बयानों को सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

दरअसल, अरोड़ा सिसोदिया का सबसे खास आदमियों में से एक था। हालाँकि गिरफ्तारी और पूछताछ के बाद दिनेश आरोड़ा इस पूरे मामले में सरकारी गवाह बन गया। ऐसे में मनीष सिसोदिया समेत अन्य आरोपितों को लेकर उसके द्वारा किए गए खुलासे इस गिरफ्तारी में अहम माने जा रहे हैं।