Home Blog Page 2044

रिश्ते की कद्र नहीं, किसी को नहीं आने देते करीब… अमिताभ बच्चन के लिए कई सुपरहिट फ़िल्में लिखने वाले सलीम खान का खुलासा

बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान के अब्बा सलीम खान (Salim Khan) ने बॉलीवुड के शहंशाह कहलाने वाले अमिताभ बच्चन (Amitabh Bachchan) के साथ अपने रिश्ते को लेकर बड़ी बात कही है। सलीम खान ने कहा कि अमिताभ बच्चन ने उनके रिश्तों को महत्व नहीं दिया। वो किसी को अपने करीब नहीं आने देेते।

अमिताभ बच्चन को सफलता की बुलंदियों पर पहुँचाने वाली फिल्म जंजीर को सलीम खान ने सन 1973 में बनाया था। इसमें सलीम खान के साथ जावेद अख्तर थे। यह जोड़ी सलीम-जावेद के नाम से जानी जाती थी।

सलीम खान ने जंजीर फिल्म को लेकर कहा कि यह अमिताभ बच्चन की नियति थी कि उन्हें उस फिल्म में कास्ट किया गया। उन्होंने कहा कि जंजीर फिल्म के लिए वे धर्मेंद्र, देवानंद और दिलीप कुमार के पास भी गए थे। इन तीनों ने इसे करने से मना कर दिया था।

उन्होंने यह भी कहा कि इस फिल्म में कोई हिरोइन काम करना नहीं चाहती थी। तब उन्होंने जया भादुड़ी (अब जया बच्चन) से इसमें काम करने के लिए कहा। तब जया ने कहा कि इस फिल्म में उनके लिए तो कोई रोल ही नहीं है। तब सलीम खान ने कहा था कि भले ही उनके लिए इसमें कोई खास जगह नहीं है, लेकिन यह फिल्म अमिताभ का करियर बदल देगी।

सलीम खान ने अपने बेटे अरबाज खान के साथ एक इंटरव्यू में बताया कि उन्हें अमिताभ बच्चन की एक्टिंग पर बहुत भरोसा था। इसके साथ वे अमिताभ के प्रोफेशनलिज्म को भी पसंद करते थे। उन्होंने बताया कि वे हर मोड़ पर उनके नाम को आगे बढ़ाते रहें, लेकिन अलग होने के बाद दोनों एक-दूसरे के संपर्क में नहीं रहे।

सलीम खान ने कहा कि दोनों के बीच रिश्ते को बनाए रखने की जिम्मेदारी अमिताभ बच्चन पर थी। उन्होंने कहा, “जब आप बड़े स्टार हो जाते हैं तो आपकी जिम्मेदारी बन जाती है कि मिलना-जुलना होता रहे। रिश्ता रखना आपका फर्ज बनता है। अमिताभ बच्चन ने शायद किसी वजह से इसे नहीं निभाया।”

जंजीर फिल्म की अपार सफलता के बाद सलीम खान ने 1989 में आई फिल्म तूफान में अमिताभ के साथ एक फिर काम किया। हालाँकि, वह सिर्फ व्यावसायिक मसला था। वे कभी दोस्त के रूप में नहीं मिले। सलीम ने कहा, “मैंने कभी दावा नहीं किया कि हम बहुत करीबी दोस्त हैं। ये सिर्फ हमारे साथ ही ऐसा नहीं था, अमिताभ बच्चन का स्वभाव हर किसी के साथ ऐसा ही था। वे कभी किसी को अपने करीब नहीं आने देते थे।”

इस्लाम क़बूलो, वरना पति को मार डालूँगा… दूध बेचने वाले अब्दुल ने ‘मुन्ना यादव’ बन दलित लड़की को फाँसा, शादी के बाद ससुराल वाले घर में घुस कर किया रेप

उत्तर प्रदेश के रायबरेली में ‘लव जिहाद’ का मामला सामने आया है। यहाँ अब्दुल खालिद ने खुद को ‘मुन्ना यादव’ बताते हुए दलित लड़की को प्रेम जाल में फँसाया था। जब पीड़ित लड़की को उसकी सच्चाई पता चली तो उसने दूरी बना ली। लड़की की शादी होने के बाद अब आरोपित अब्दुल उसे और उसके घरवालों को जान से मारने की धमकी दे रहा था। साथ ही, इस्लाम कबूलने और निकाह करने का दबाव बनाया। पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामला रायबरेली के सलोन थाना क्षेत्र अंतर्गत फटहा रसूलपुर गाँव का है। यहाँ दूध बेचने वाले अब्दुल खालिद ने खुद को ‘मुन्ना यादव’ बताते हुए दलित लड़की से दोस्ती की थी। इसके बाद जब अब्दुल पीड़िता को एक बार अपने घर ले गया, तब उसे पता चला कि वह ‘मुन्ना यादव’ नहीं बल्कि मुस्लिम है।

आरोपित की सच्चाई सामने आने के बाद पीड़िता ने उससे दूरी बना ली। इस पर अब्दुल खालिद उसे धर्म परिवर्तन करने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन देने लगा। मना करने पर जान से मारने की धमकी देने लगा। इसकी जानकारी पीड़िता के घरवालों को हुई तो उन्होंने उसकी शादी कहीं और करा दी। लेकिन इसके बाद भी आरोपित अब्दुल ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। वह उसके ससुराल पहुँच गया।

पुलिस को दी शिकायत में पीड़िता ने कहा है कि अब्दुल खालिद ने उसके ससुराल पहुँचकर उसके सिर में बंदूक रख दी। साथ ही गालियाँ देते हुए कहा कि उसे इस्लाम कबूलना पड़ेगा। यदि उसने ऐसा नहीं किया तो वह उसे, उसके पति और सास को जान से मार डालेगा। यही नहीं, अब्दुल ने उसके घर में घुसकर जबरन दुष्कर्म भी किया।

अब्दुल खालिद की हरकतों से परेशान होकर पीड़िता दलित लड़की ने उसके खिलाफ सलोन थाने में एफआईआर दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने मामले की जाँच करते हुए आरोपित को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

गाड़ी से उतरे ही नहीं, हमें मिलने तक नहीं दिया… नीतीश कुमार की ‘समाधान यात्रा’ में बवाल-आगजनी, ग्रामीणों ने जलाए CM और तेजस्वी के पोस्टर

बिहार के कटिहार जिले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘समाधान यात्रा’ के दौरान ग्रामीणों ने आगजनी और नारेबाजी की है। इस घटना का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें लोगों को सड़क पर प्रदर्शन करते हुए देखा जा सकता है। लोगों का कहना है कि सीएम नीतीश कुमार से उन्हें नहीं मिलने दिया गया। बवाल का कारण इसे ही बताया जा रहा है। इससे पहले उन्हें सारण में भी काले झंडे दिखाए जा चुके हैं। काफिले के सामने युवक ने ऐसा किया था, जिसके बाद उसे तुरंत हिरासत में ले लिया गया था।

अब कटिहार में नाराज़ ग्रामीणों ने हंगामा किया है। वीडियो में देखा जा सकता है कि नेताओं-अधिकारियों से घिरे सीएम नीतीश चल रहे हैं और ग्रामीण आसपास खड़े हैं। वहीं एक अन्य फुटेज में लोग सड़क पर लकड़ियाँ-कपड़े जला कर आगजनी कर रहे हैं। इसमें अधिकतर युवा थे। उन्होंने मुर्दाबाद के नारे भी लगाए। युवकों ने कहा कि ‘समाधान यात्रा’ में कोई समाधान नहीं हो रहा है, वो गाड़ी से भी नहीं उतरे और किसी से उनकी मुलाकात नहीं हुई।

ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें मुख्यमंत्री से मिलने तक नहीं दिया गया। इतना ही नहीं, लोगों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ-साथ बिहार के उप-मुख्यमंत्री व राजद नेता तेजस्वी यादव के पोस्टरों को भी आग के हवाले कर दिया। ये घटना कटिहार के कोढ़ा प्रखंड स्थित दिघरि पंचायत की है। कई घंटों तक लोगों का विरोध प्रदर्शन जारी रहा। ऐसा लग रहा है कि पूरे राज्य में नीतीश कुमार के कामकाज से लोग खुश नहीं है, तभी उनके खिलाफ जनता में इतना गुस्सा है।

हाल ही में चुनावी रणनीतिकार और ‘सुराज यात्रा’ निकाल रहे प्रशांत किशोर ने भी कहा है कि नीतीश कुमार ने तीन-तीन बार लोगों को ठगा है। कभी महागठबंधन के रणनीतिकार रहे पीके ने खुलासा किया कि नीतीश कुमार ने कहा था कि वो थोड़े दिन बाद भाजपा छोड़ेंगे, क्योंकि मोदी की हवा अभी कुछ दिन और रहेगी। उन्होंने कहा कि CAA-NRC के विरोध की योजना बनी थी, लेकिन नीतीश ने संसद में जदयू से इसके पक्ष में वोटिंग करा दी।

4 और 6 साल के भाई-बहन, 2 महीने से यौन शोषण कर रहा था अरबी-उर्दू का शिक्षक: घर में आता था पढ़ाने, बच्चों के प्राइवेट पार्ट में दर्द के बाद खुलासा

मुंबई पुलिस ने दो मासूम बच्चों का यौन शोषण करने के आरोप में एक शिक्षक को गिरफ्तार किया। आरोपित शिक्षक पीड़ित बच्चों को उर्दू और अरबी पढ़ाता था। आरोप है कि वह बीते 2 महीने से यौन शोषण कर रहा है। मामले का खुलासा गुरुवार (2 फरवरी, 2023) को हुआ।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों पीड़ित बच्चे भाई-बहन हैं। इनमें लड़की की उम्र 6 साल है। वहीं लड़के के उम्र 4 साल बताई जा रही है। आरोपित 25 वर्षीय शिक्षक उर्दू और अरबी पढ़ाने के लिए पीड़ित बच्चों के घर आता था। इस दौरान बच्चे जब भी अकेले होते थे या फिर उनके माता-पिता घर पर नहीं होते थे, वह उनका यौन शोषण करता था।

बच्चों के साथ हो रही इस घटना की जानकारी माता-पिता को तब हुई, जब एक बच्चे ने प्राइवेट पार्ट्स में दर्द की शिकायत की। साथ ही उन्होंने उर्दू और अरबी पढ़ाने के लिए घर आने वाले शिक्षक की हरकत के बारे में बताया। इस पर, माता-पिता बच्चों को लेकर स्थानीय कूपर हॉस्पिटल पहुँचे। जहाँ, डॉक्टर्स ने जाँच कर प्रथम दृष्टया यौन शोषण की पुष्टि की।

बच्चों के साथ हुई इस घटना से माता-पिता हैरान रह गए। साथ ही उन्होंने शुक्रवार (3 फरवरी, 2023) को एफआईआर दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने मामले की जाँच करते हुए आरोपित शिक्षक को उसके घर से गिरफ्तार कर लिया।

इस मामले में एक पुलिस अधिकारी ने कहा है, “इस बात की जानकारी सामने आई है कि आरोपित शिक्षक ने 4 दिसंबर, 2022 से लेकर 2 फरवरी, 2023 तक बच्चों का कई बार यौन शोषण किया। बच्चे जब घर में अकेले होते थे या उनके पास कोई नहीं होता था, तब मौके का फायदा उठाकर वह इन हरकतों को अंजाम देता था।” फिलहाल आरोपित शिक्षक पुलिस की गिरफ्त में है। उस पर ‘भारतीय दंड संहिता (IPC)’ की धाराओं और ‘यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (POCSO)’ के तहत मामला दर्ज किया गया है।

बुलाया फेसबुक वाली गर्लफ्रेंड को, साथ में आए उसके घर वाले भी… बिहार में लड़के से जबरन डलवाया माँग में सिंदूर, कोर्ट परिसर में हंगामा

बिहार के नालंदा जिले में जबरन शादी कराने का मामला सामने आया। दरअसल, लड़के ने अपनी प्रेमिका को मिलने के लिए बुलाया था। लड़की के घरवालों में दोनों को मिलते देख लिया। इसके बाद उनकी शादी करा दी। हालाँकि, लड़के का कहना है कि वह शादी नहीं करना चाहता था। इसको लेकर लड़के के घरवालों ने भी हंगामा किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नालंदा जिले के अस्थावाँ थाना क्षेत्र के मोहनी गाँव में रहने वाला ज्ञानी कुमार अपनी बहन को परीक्षा दिलाने के लिए बिहारशरीफ लाया था। यहीं उसने अपनी प्रेमिका गुड़िया को मिलने के लिए बुलाया था। इसकी भनक लगते ही लड़की के घरवाले भी मौके पर पहुँच गए। लड़का और लड़की को साथ देख उन लोगों ने माँग में सिंदूर डलवा कर उनकी शादी करा दी।

लड़की के घरवाले दोनों की कानूनी रूप से शादी कराने के लिए बिहारशरीफ कोर्ट पहुँच गए थे। इसकी जानकारी लगते ही लड़के के घरवाले भी मौके पर पहुँच गए और कोर्ट परिसर में हँगामा करने लगे। इससे कोर्ट मैरिज नहीं हो सकी। हंगामा बढ़ता देख लड़का फरार हो गया।

जबरन शादी के इस मामले में पीड़ित लड़के ज्ञानी कुमार का कहना है कि वह अपनी बहन को परीक्षा दिलाने के लिए बिहारशरीफ आया था। यहीं से लड़की के घरवालों ने उसे बाइक पर बैठाकर कोर्ट ले आए। वह शादी नहीं करना चाहता था। लेकिन, लड़की के घरवालों ने माँग में सिंदूर डलवाकर जबरन शादी करा दी।

वहीं लड़की, गुड़िया का कहना है कि 6 महीने पहले फेसबुक के जरिए दोनों की दोस्ती हुई थी। इसके बाद दोनों में प्यार हो गया। ज्ञानी कुमार ने फोन कर उसे मिलने के लिए बुलाया था। लड़की ने यह भी कहा है कि ज्ञानी कुमार काम करने के लिए बाहर जाने वाला था। इसलिए, उसने शादी करने के लिए कहा था। बकौल लड़की, इस पर ज्ञानी कुमार शादी के लिए तैयार हो गया था। दोनों ने आपसी रजामंदी से शादी की है।

वहीं, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर जब थानाध्यक्ष वीरेंद्र यादव से बात की गई तो उन्होंने इसकी जानकारी होने से इनकार कर दिया। साथ ही उन्होंने कहा कि इस बारे में कोई शिकायत दर्ज नहीं हुई है। साथ ही उन्होंने शिकायत होने पर पुलिस द्वारा आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया।

‘मुस्लिम माँ की संपत्ति में हिंदू बच्चों का कोई अधिकार नहीं’: गुजरात कोर्ट का फैसला, माँ ने अपना लिया था इस्लाम

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) की अनुपस्थिति में बेटियों के अधिकारों का किस तरह क्षरण होता है, यह गुजरात (Gujarat Court) के एक अदालती फैसले से झलकता है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मुस्लिम माँ की संपत्ति में हिंदू बेटियों का कोई अधिकार नहीं होता है। कोर्ट ने बेटियों की अर्जी को खारिज कर दिया।

तीन हिंदू बेटियों ने कोर्ट में याचिका दायर कर अपनी मुस्लिम माँ की संपत्ति पर अधिकार माँगा था। उनकी याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ‘क्योंकि महिला ने इस्लाम कबूल कर लिया था, इसलिए मुस्लिम कानून के तहत उनके बच्चे उत्तराधिकारी नहीं हो सकते।’ अदालत ने महिला के मुस्लिम बेटे को संपत्ति का उत्तराधिकारी बनाया है। 

दरअसल, रंजन त्रिपाठी नाम की महिला एक मुस्लिम के साथ रहने लगी थी। उसने इस्लाम अपनाकर अपना नाम रेहाना मलिक कर लिया था। बाद में मुस्लिम शख्स से पैदा हुए बेटे को उसने अपना उत्तराधिकारी बनाया था। इस बात को लेकर उसकी तीन बेटियों ने कोर्ट में याचिका दायर की थी।

बात 1979 की है। रंजन त्रिपाठी नाम की महिला की दो बेटियाँ थीं। साल 1979 में उसके पति का निधन हो गया। उस वक्त वह गर्भवती थी। उसके पति भारत संचार निगम (BSNL) में नौकरी करते थे। इस आधार पर रंजन को अनुकंपा के आधार पर BSNL में ही क्लर्क की नौकरी मिल गई। नौकरी मिलने के कुछ दिन बाद उसकी तीसरी बेटी का भी जन्म हो गया।

इस बीच रंजन त्रिपाठी एक मुस्लिम के संपर्क में आई और उसके साथ जाकर रहने लगी। उसने अपनी तीनों बेटियों को अपने ससुराल में छोड़ दिया। इन बेटियों की परवरिश उसके ससुराल वालों ने किया और वे हिंदू बनी रहीं। इसके बाद बेटियों ने अपनी माँ पर रखरखाव देने के लिए मुकदमा दर्ज किया और वह केस जीत लिया।

उधर रंजन त्रिपाठी ने साल 1995 में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम अपना लिया और उस मुस्लिम शख्स से निकाह कर लिया। उसने अपना नाम भी बदल लिया। इस दौरान उसे एक बेटा हुआ। मुस्लिम बनी रंजन ने अपनी संपत्ति का वारिस अपने मुस्लिम बेटे को बनाया।

साल 2009 में उसकी तीनों बेटियों ने उसकी संपत्ति पर अपना हक जताया। इसको लेकर उन्होंने कोर्ट में याचिका दी। हालाँकि, सिटी सिविल कोर्ट ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह महिला मुस्लिम बन गई थी और मुस्लिम कानून के तहत वे उत्तराधिकारी नहीं हो सकते।

इसके लिए सिविल कोर्ट ने नयना फिरोज खान पठान बनाम नसीम फिरोज खान पठान मामले में गुजरात हाईकोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय का संदर्भ दिया। हाईकोर्ट ने कहा था, “सभी मुसलमान मुस्लिम कानून द्वारा शासित होते हैं, भले ही वे इस्लाम में परिवर्तित हो गए हों। उनके पिछले धार्मिक और व्यक्तिगत कानून को इस्लाम द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया। मुस्लिम कानून के तहत एक हिंदू किसी मुस्लिम की संपत्ति का वारिस नहीं हो सकता।”

कोर्ट ने यह भी तर्क दिया कि हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत भी हिंदू बेटी अपनी मुस्लिम माँ की संपत्ति की वारिस नहीं बन सकती है। कोर्ट ने कहा कि मृतक मुस्लिम थी और उसका क्लास 1 उत्तराधिकारी कोई हिंदू नहीं हो सकता।

परवेज मुशर्रफ की मौत: क्यों शेयर कर रहे लोग Meme… क्योंकि पाखंडी नहीं है हिंदुस्तानी जनता

पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह और इस्लाम मुल्क के राष्ट्रपति व फ़ौज के मुखिया रहे परवेज मुशर्रफ का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। वो 2016 से मुल्क के बाहर रह रहे थे। अब सोशल मीडिया पर उनकी मौत को लेकर मीम्स की बौछार हो गई है। एक सोशल मीडिया यूजर ने तो प्रोपेगंडा पत्रकार राना अय्यूब, सबा नकवी और अभिनेत्री स्वरा भास्कर का एडिटेड वीडियो शेयर किया, जिसमें तीनों बैठ कर रोती हुई दिख रही हैं।

वहीं अधिकतर यूजर्स ने एक पुलिस वाले का वो वीडियो शेयर किया, जो कई बार वायरल हो चुका है। इसमें उक्त बुजुर्ग पुलिसकर्मी ‘इक दिन मर जाएगा कुत्ते की मौत, जग में सब कहेंगे – मर गया माधर&%’ गाता हुआ सुनाई दे रहा है। कइयों ने वीडियो तो कुछ ने उसकी तस्वीर शेयर कर के लिखा कि अभी ये काफी प्रासंगिक लग रहा है। ये गाना राज कपूर की फिल्म ‘धरम करम (1975)’ के गाने का अपभ्रंश कर के बनाया है – ‘इक दिन बिक जाएगा मिट्टी के मोल, जग में रह जाएँगे प्यारे तेरे बोल।’

याद हो कि वामपंथी पत्रकार विनोद दुआ ने कहा था कि मौत के बाद व्यक्ति को महापुरुष बना देने का चलन है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद ऐसा कहा था। विनोद दुआ की जब मौत हुई, तब लोगों ने उनका ये बयान खूब शेयर किया था। उन्होंने मरने के बाद लोगों की बुराइयों पर भी बात करने की वकालत करते हुए गोधरा दंगे और आज़ादी के आंदोलन में वाजपेयी की भूमिका पर बातें की थीं। उन्होंने मृत्यु के बाद व्यक्ति की तारीफ़ को पाखंड करार दिया था।

एक अन्य यूजर ने लिखा, “26/11 मुंबई के मास्टरमाइंड आतंकी हाफ़िज़ सईद का समर्थक परवेज मुशर्रफ अंततोगत्वा निपट लिया। प्रभु उसे उसके कर्मों अनुसार सद्गति-दुर्गति प्रदान करें। कोई सहानुभूति नहीं ऐसे कुकर्मी के लिए। एक ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हँसती हुई तस्वीर शेयर करते हुए कैप्शन लगाया, “अत्यंत पीड़ा हुई जान कर।” हालाँकि, इसी बीच लोगों ने बरखा दत्त और महबूबा मुफ़्ती को भी ढाँढस बंधाने वाले ट्वीट्स किए।

परेज मुशर्रफ की मौत के बाद लोगों द्वारा शेयर किए जा रहे कुछ और मीम्स भी देखिए:

ज्ञात हो कि उन्होंने 2010 में ‘ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग (APML)’ नाम से एक पार्टी भी बनाई थी। पार्टी ने 2018 में ही बयान जारी कर बताया था कि परवेज मुशर्रफ Amyloidosis नामक दुर्लभ बीमारी से जूझ रहे हैं, जिसमें शरीर के सभी अंग (दिल, किडनी, फेंफड़े, पाचन तंत्र और लिवर और नर्वस सिस्टम) के कामकाज में गड़बड़ी होने लगती है। इस बीमारी में शरीर में Amyloid नाम का खतरनाक प्रोटीन बनने लगता है, जो टिशूज को काम करने से रोकता है।

लेडीज टेलर इब्राहिम महिलाओं के कपड़े सिलते-सिलते उत्तेजित हो जाता था… फिर नंगे होकर लड़कियों को करता था कॉल, सूरत पुलिस ने दबोचा

गुजरात की सूरत पुलिस ने शुक्रवार (3 फरवरी 2023) को इब्राहिम ताई नाम के एक दर्जी को इंस्टाग्राम पर महिलाओं की फर्जी प्रोफाइल बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया है। इब्राहिम पर इन प्रोफाइलों से अश्लील गतिविधियों को चलाने का आरोप है। आरोपित की गिरफ्तारी एक पीड़िता की शिकायत पर हुई है। पूछताछ में आरोपित ने अपना गुनाह कबूल करते हुए सिलाई के दौरान उत्तेजित हो जाने की जानकारी भी दी। इब्राहिम महिलाओं के कपड़े सिलता है।

इब्राहिम की गिरफ्तारी सूरत पुलिस के साइबर सेल ने की है। मामला सूरत के वराछा इलाके का है। रिपोर्ट के मुताबिक यहाँ की रहने वाली एक महिला ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। इस शिकायत में उन्होंने बताया कि नवंबर 2022 में उसे इंस्टाग्राम पर अपनी एक फर्जी प्रोफ़ाइल का पता चला था। इस प्रोफ़ाइल में उनकी तस्वीर प्रयोग हो रही थी। पीड़िता ने उस प्रोफ़ाइल को मैसेज डाल कर उसका परिचय पूछा। जवाब में दूसरी तरफ से वीडियो कॉल आई। पीड़िता ने कॉल उठाई तो सामने बिना कपड़ों के एक व्यक्ति दिखाई दिया। लड़की ने फोन काट दिया और इसकी जानकारी अपने घर वालों को दी।

पीड़िता के परिजनों ने इसके बाद मामले की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई। पुलिस ने केस को IT एक्ट की धाराओं में दर्ज किया और जाँच शुरू कर दी। आखिरकार पुलिस ने इब्राहिम ताई को दबोच लिया। पूछताछ में इब्राहिम ताई ने अपना गुनाह कबूल कर लिया। उसने बताया कि वह कम से कम 20 महिलाओं की फर्जी ID बना चुका है। इस हरकत की वजह पूछने पर इब्राहिम ने बताया कि वो महिलाओं के कपड़ों की सिलाई के दौरान अक्सर उत्तेजित हो जाया करता था। इसके बाद उसने महिलाओं की ही फर्जी ID बनानी शुरू कर दी।

इब्राहिम ने यह भी माना कि वह महिलाओं की ID से दूसरी महिलाओं को अश्लील संदेश भेजा करता था। इस मामले में पुलिस इब्राहिम से और पूछताछ कर रही है।

बिहार में 2 किलोमीटर रेलवे पटरी चोरी: इससे पहले रेल इंजन, पुल, मोबाइल टॉवर और सड़क भी गायब कर चुके हैं चोर

बिहार के समस्तीपुर जिले में रेलवे लाइन चोरी होने का मामला सामने आया है। चोरी हुई पटरी की लम्बाई लगभग 2 किलोमीटर है। इस मामले में रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के 2 स्टाफ सस्पेंड कर दिए गए हैं। आरोपितों पर विभागीय जाँच बिठाई गई है जिसमें दोषी पाए जाने पर FIR भी दर्ज की जाएगी। घटना का खुलासा 24 जनवरी 2023 को हुआ था। इस घटना को स्क्रैप घोटाला कहा जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला समस्तीपुर रेल मंडल का है। यहाँ पर काफी समय से लोहट चीनी मिल बंद पड़ी थी। इस मिल में माल ढुलाई के लिए रेलवे लाइन बनाई गई थी। यह लाइन पंडौल रेलवे स्टेशन से मिल को कनेक्ट करती थी। फिलहाल ये रेल लाइन भी बंद चल रही थी। मिल बंद होने के बाद यहाँ मौजूद सामान को टेंडर निकाल कर स्क्रैप के तौर पर नीलाम होना था। इसी स्क्रैप में रेलवे लाइन भी थी। अधिकारियों को खबर मिली कि विभाग के ही कुछ लोगों की मिलीभगत से लगभग 2 किलोमीटर लम्बी रेल लाइन को बिना टेंडर निकाले ही बेच दिया गया है। कुछ रिपोर्ट्स में चोरी हुई पटरियों की लम्बाई आधे किलोमीटर बताई गई हैं।

रेल अधिकारियों ने जब इन आरोपों की जाँच करवाई तो बात सच निकली। इस मामले का केस भी दरभंगा RPF पोस्ट में दर्ज करवाया गया। शुरुआती जाँच में झंझारपुर आउटपोस्ट के प्रभारी श्रीनिवास के अलावा मधुबनी के जमादार मुकेश कुमार सिंह के नाम सामने आए। इन दोनों पर बिना टेंडर के ही रेल लाइन कुछ कारोबारियों को बेच देने का आरोप है। इस पूरे मामले की विभागीय जाँच करवाई जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक जाँच में दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ FIR दर्ज करवा कर कार्रवाई की जाएगी।

इस मामले में अब तक पुलिस ने पिता-पुत्र अनिल यादव और राहुल कुमार नाम के 2 आरोपितों को गिरफ्तार भी किया है। राहुल कुमार चीनी मिल में स्क्रैप कटिंग कर रही कम्पनी में मुंशी का काम करता था। स्क्रैप निकालने का काम बियाडा नाम की कम्पनी को मिला है जो नवंबर 2022 से स्क्रैप निकाल रही है। शुरुआत में उसका गाँव में विरोध हुआ था। अब बियाडा कम्पनी चोरी हुए सामान मामले में हाईकोर्ट जाने की तैयारी में बताई जा रही है।

वहीं सुरक्षा बल अब चोरी हुई पटरियों को बरामद करने का प्रयास कर रहे हैं। इस छापेमारी के दौरान कुछ पटरियाँ लोहट मिल के बगल स्थित बेलाही गाँव में एक व्यक्ति के घर से बरामद हुई हैं। गौरतलब है कि इस घटना से पहले भी बिहार में रेल इंजन, पुल, सड़क और मोबाइल टॉवर चोरी होने के मामले सामने आ चुके हैं।

माहवारी शुरू होते निकाह, व्यभिचारी मर्दों को छूट, बेटियों के अधिकार में भेदभाव… मजहबी आधार पर पर्सनल लॉ देश के लिए खतरा

भारत में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) को लेकर बहस जारी है। लोगों का कहना है कि देश के सभी वर्गों और समुदायों के लिए एक समान नियम और कानून होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय पर्सनल लॉ को लेकर किस तरह की परेेशानियाँ आती हैं, उसके बारे में बता रहे हैं।

  1. 1. मुस्लिम पर्सनल लॉ में बहु-विवाह करने की छूट है, लेकिन अन्य धर्मों में ‘एक पति-एक पत्नी’ का नियम बहुत कड़ाई से लागू है। बांझपन या नपुंसकता जैसा उचित और व्यावहारिक कारण होने पर भी हिंदू ,ईसाई और पारसी के लिए दूसरा विवाह करना एक गंभीर अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 494 में बहुविवाह के लिए 7 वर्ष की सजा का प्रावधान है। इसीलिए कई लोग दूसरा विवाह करने के लिए मुस्लिम धर्म अपना लेते हैं। भारत जैसे सेक्युलर देश में मौज-मस्ती के लिए भी चार निकाह जायज है, जबकि इस्लामिक देश पाकिस्तान में पहली बीवी की इजाजत के बिना शौहर दूसरा निकाह नहीं कर सकता। मानव इतिहास में ‘एक पति – एक पत्नी’ का नियम सर्वप्रथम भगवान श्रीराम ने लागू किया था। यह किसी भी प्रकार से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू डिग्निटी’ का मामला है। इसलिए यह जेंडर न्यूट्रल और रिलीजन न्यूट्रल होना चाहिए।

2. कहने को तो भारत में संविधान अर्थात समान विधान है, लेकिन विवाह की न्यूनतम उम्र भी सबके लिए समान नहीं है। मुस्लिम लड़कियों की वयस्कता की उम्र निर्धारित नहीं है और माहवारी शुरू होने पर लड़की को निकाह योग्य मान लिया जाता है। इसलिए 9 वर्ष की उम्र में मुस्लिम लड़कियों का निकाह कर दिया जाता है। वहीं, अन्य धर्मों में लड़कियों की विवाह की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और लड़कों की विवाह की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष है। विश्व स्वास्थ्य संगठन कई बार कह चुका है कि 20 वर्ष से पहले लड़की शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होती है। 20 वर्ष से पहले गर्भधारण करना जच्चा-बच्चा दोनों के लिए अत्यधिक हानिकारक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, लड़का हो या लड़की, 21 वर्ष से पहले दोनों ही मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होते हैं। 21 वर्ष से पहले तो बच्चे ग्रेजुएशन भी नहीं कर पाते हैं और आर्थिक रूप से माता-पिता पर निर्भर होते हैं। इसलिए विवाह की न्यूनतम उम्र सबके लिए एक समान ’21 वर्ष’ करना नितांत आवश्यक है। ‘विवाह की न्यूनतम उम्र’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू हेल्थ’ का मामला है। इसलिए यह जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और 21 वर्ष होना चाहिए।

3. तीन तलाक अवैध घोषित होने के बावजूद अन्य प्रकार के मौखिक तलाक (तलाक-ए-हसन एवं तलाक-ए-अहसन) आज भी मान्य है। इसमें भी तलाक का आधार बताने की बाध्यता नहीं है और केवल 3 महीने तक प्रतीक्षा करना है। वहीं, अन्य धर्मों में केवल न्यायालय के माध्यम से ही विवाह-विच्छेद हो सकता है। हिंदू, ईसाई, पारसी दंपति आपसी सहमति से भी मौखिक विवाह-विच्छेद की सुविधा से वंचित हैं। मुसलमानों में प्रचलित मौखिक तलाक का न्यायपालिका के प्रति जवाबदेही नहीं होने के कारण मुस्लिम बेटियों और उनके माता-पिता, भाई-बहन और बच्चों को हमेशा भय के वातावरण में रहना पड़ता है। तुर्की जैसे मुस्लिम बाहुल्य देश में भी अब किसी तरह का मौखिक तलाक मान्य नहीं है। इसलिए तलाक लेने का तरीका जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफार्म होना चाहिए।

4. मुस्लिम कानून में मौखिक वसीयत एवं दान मान्य है, लेकिन अन्य धर्मों में केवल पंजीकृत वसीयत एवं दान ही मान्य है। मुस्लिम कानून में एक-तिहाई से अधिक संपत्ति का वसीयत नहीं किया जा सकता है, जबकि अन्य धर्मों में शत-प्रतिशत संपत्ति का वसीयत किया जा सकता है। वसीयत और दान किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लिबर्टी’ का मामला है। इसलिए यह जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए।

5. मुस्लिम कानून में ‘उत्तराधिकार’ की व्यवस्था अत्यधिक जटिल है। पैतृक संपत्ति में पुत्र एवं पुत्रियों के अधिकार में अत्यधिक भेदभाव है। अन्य धर्मों में भी विवाहोपरान्त अर्जित संपत्ति में पत्नी के अधिकार अपरिभाषित हैं और उत्तराधिकार के कानून बहुत जटिल है। विवाह के बाद पुत्रियों के पैतृक संपत्ति में अधिकार सुरक्षित रखने की व्यवस्था नहीं है। विवाहोपरान्त अर्जित संपत्ति में पत्नी के अधिकार अपरिभाषित हैं। ‘उत्तराधिकार’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए।

6. विवाह विच्छेद (तलाक) का आधार भी सबके लिए एक समान नहीं हैं। व्यभिचार के आधार पर मुस्लिम शौहर अपनी बीवी को तलाक दे सकता है, लेकिन बीवी अपने शौहर को तलाक नहीं दे सकती है। हिंदू, पारसी और ईसाई धर्म में तो व्यभिचार तलाक का ग्राउंड ही नहीं है। कोढ़ जैसी संक्रामक बीमारी के आधार पर हिंदू और ईसाई धर्म में तलाक हो सकता है, लेकिन पारसी और मुस्लिम धर्म में नहीं। कम उम्र में विवाह के आधार पर हिंदू धर्म में विवाह विच्छेद हो सकता है, लेकिन पारसी, ईसाई और मुस्लिम में यह संभव नहीं है। ‘विवाह विच्छेद’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए।

7. गोद लेने और भरण-पोषण करने का नियम भी हिंदू, मुस्लिम, पारसी और ईसाई के लिए अलग-अलग हैं। मुस्लिम महिला गोद नहीं ले सकती है और अन्य धर्मों में भी पुरुष प्रधानता के साथ गोद लेने की व्यवस्था लागू है। ‘गोद लेने का अधिकार’ किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए।

8. विवाह-विच्छेद के बाद हिंदू बेटियों को तो गुजारा-भत्ता मिलता है, लेकिन तलाक के बाद मुस्लिम बेटियों को गुजारा भत्ता नहीं मिलता है। गुजारा-भत्ता किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं है, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए। ‘भारतीय दंड संहिता’ की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होने से विवाह विच्छेद के बाद सभी बहन-बेटियों को गुजारा भत्ता मिलेगा, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई। इससे धर्म, जाति, क्षेत्र, लिंग आधारित विसंगति समाप्त होगी।

9. पैतृक संपत्ति में पुत्र-पुत्री तथा बेटा-बहू को समान अधिकार प्राप्त नहीं है और धर्म, क्षेत्र और लिंग आधारित बहुत सी विसंगतियाँ हैं। विरासत, वसीयत और संपत्ति का अधिकार किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए। भारतीय दंड संहिता की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से धर्म, क्षेत्र, लिंग आधारित विसंगतियाँ समाप्त होंगी और विरासत, वसीयत तथा संपत्ति का अधिकार सबके लिए एक समान होगा, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई।

10. अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होने के कारण विवाह-विच्छेद की स्थिति में विवाहोपरांत अर्जित संपत्ति में पति-पत्नी को समान अधिकार नहीं है। यह किसी भी तरह से धार्मिक या मजहबी विषय नहीं, बल्कि ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ का मामला है। इसलिए यह भी पूर्णतः जेंडर न्यूट्रल, रिलीजन न्यूट्रल और सबके लिए यूनिफॉर्म होना चाहिए। भारतीय दंड संहिता की तर्ज पर सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से धर्म, क्षेत्र, लिंग आधारित विसंगतियाँ समाप्त होंगी और विवाहोपरांत अर्जित संपत्ति का अधिकार सबके लिए एक समान होगा। चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई।

11. अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होने के कारण मुकदमों की सुनवाई में अत्यधिक समय लगता है। भारतीय दंड संहिता की तरह सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र समावेशी एवं एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से न्यायालय का बहुमूल्य समय बचेगा और नागरिकों को त्वरित न्याय मिलेगा।

12. अलग-अलग संप्रदाय के लिए लागू अलग-अलग ब्रिटिश कानूनों से नागरिकों के मन में गुलामी की हीन भावना व्याप्त है। भारतीय दंड संहिता की तर्ज पर देश के सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से समाज को सैकड़ों जटिल, बेकार और पुराने कानूनों से मुक्ति ही नहीं, बल्कि गुलामी की हीनभावना से भी मुक्ति मिलेगी।

13. अलग-अलग पर्सनल लॉ लागू होने के कारण अलगाववादी और कट्टरपंथी मानसिकता बढ़ रही है और हम एक अखण्ड राष्ट्र के निर्माण की दिशा में त्वरित गति से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। भारतीय दंड संहिता की तरह सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र, समावेशी एवं एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का सपना साकार होगा।

14. हिंदू मैरिज एक्ट में तो महिला-पुरुष को लगभग एक समान अधिकार प्राप्त है, लेकिन मुस्लिम और पारसी पर्सनल लॉ में बेटियों के अधिकारों में अत्यधिक भेदभाव है। भारतीय दंड संहिता की तरह सभी नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक समग्र, समावेशी एवं एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता का सबसे ज्यादा फायदा मुस्लिम और पारसी बेटियों को मिलेगा, क्योंकि उन्हें पुरुषों के बराबर नहीं माना जाता है।

15. अलग-अलग पर्सनल लॉ के कारण रूढ़िवाद, कट्टरवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद बढ़ रहा है। देश के सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत भारतीय नागरिक संहिताट लागू होने से रूढ़िवाद, कट्टरवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद ही समाप्त नहीं होगा, बल्कि वैज्ञानिक और तार्किक सोच भी विकसित होगी।

आर्टिकल 14 के अनुसार, देश के सभी नागरिक एक समान हैं। आर्टिकल 15 जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। आर्टिकल 16 सबको समान अवसर उपलब्ध कराता है। आर्टिकल 19 देश में कहीं पर भी जाकर पढ़ने, रहने, बसने और रोजगार करने का अधिकार देता। आर्टिकल 21 सबको सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार देता है।

आर्टिकल 25 धर्म पालन का अधिकार देता है, लेकिन अधर्म पालन का नहीं। रीतियों को पालन करने का अधिकार देता है, लेकिन कुरीतियों को नहीं। प्रथा को पालन करने का अधिकार देता है, लेकिन कुप्रथा को नहीं। देश के सभी नागरिकों के लिए एक समग्र, समावेशी और एकीकृत भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से आर्टिकल 25 के अंतर्गत प्राप्त मूलभूत धार्मिक अधिकार जैसे पूजा, नमाज या प्रार्थना करने, व्रत या रोजा रखने तथा मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा का प्रबंधन करने या धार्मिक स्कूल खोलने, धार्मिक शिक्षा का प्रचार प्रसार करने या विवाह-निकाह की कोई भी पद्धति अपनाने या मृत्यु पश्चात अंतिम संस्कार के लिए कोई भी तरीका अपनाने में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं होगा।

विवाह की न्यूनतम उम्र, विवाह विच्छेद (तलाक) का आधार, गुजारा भत्ता, गोद लेने का नियम, विरासत और वसीयत का नियम तथा संपत्ति का अधिकार सहित उपरोक्त सभी विषय ‘सिविल राइट, ह्यूमन राइट, जेंडर जस्टिस, जेंडर इक्वालिटी और राइट टू लाइफ’ से सम्बन्धित हैं। इनका न तो मजहब से किसी तरह का संबंध है और न तो इन्हें धार्मिक या मजहबी व्यवहार कहा जा सकता है, लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी धर्म या मजहब के नाम पर महिला-पुरुष में भेदभाव जारी है।

हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से ‘समान नागरिक संहिता’ की कल्पना किया था, ताकि सबको समान अधिकार और समान अवसर मिले और देश की एकता अखंडता मजबूत हो। लेकिन, वोट बैंक राजनीति के कारण आजतक ‘समान नागरिक संहिता या भारतीय नागरिक संहिता’ का एक ड्राफ्ट भी नहीं बनाया गया। जिस दिन ‘भारतीय नागरिक संहिता’ का एक ड्राफ्ट बनाकर सार्वजनिक कर दिया जाएगा और आम जनता विशेषकर बहन-बेटियों को इसके लाभ के बारे में पता चल जाएगा, उस दिन कोई भी इसका विरोध नहीं करेगा। सच तो यह है कि जो लोग समान नागरिक संहिता के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, वे ही इसका विरोध कर रहे हैं।

आर्टिकल 37 में स्पष्ट रूप से लिखा है कि नीति निर्देशक सिद्धांतों को लागू करना सरकार की फंडामेंटल ड्यूटी है। जिस प्रकार संविधान का पालन करना सभी नागरिकों की फंडामेंटल ड्यूटी है, उसी प्रकार संविधान को शत प्रतिशत लागू करना सरकार की फंडामेंटल ड्यूटी है। किसी भी सेक्युलर देश में धार्मिक आधार पर अलग-अलग कानून नहीं होता है, लेकिन हमारे यहाँ आज भी हिंदू मैरिज एक्ट, पारसी मैरिज एक्ट और ईसाई मैरिज एक्ट लागू है। जब तक भारतीय नागरिक संहिता लागू नहीं होगी, तब तक भारत को सेक्युलर कहना सेक्युलर शब्द को गाली देना है। यदि गोवा के सभी नागरिकों के लिए एक ‘समान नागरिक संहिता’ लागू हो सकती है तो देश के सभी नागरिकों के लिए एक ‘भारतीय नागरिक संहिता’ क्यों नहीं लागू हो सकती है?

जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और लिंग आधारित अलग-अलग कानून 1947 के विभाजन की बुझ चुकी आग में सुलगते हुए धुएँ की तरह है, जो विस्फोटक होकर देश की एकता को कभी भी खण्डित कर सकता है। इसलिए इन्हें समाप्त कर एक ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू करना न केवल धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए, बल्कि देश की एकता-अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भी अति आवश्यक है।

दुर्भाग्य से ‘भारतीय नागरिक संहिता’ को हमेशा तुष्टीकरण के चश्मे से देखा जाता रहा है। जब तक भारतीय नागरिक संहिता का ड्राफ्ट प्रकाशित नहीं होगा, तब तक केवल हवा में ही चर्चा होगी और समान नागरिक संहिता के बारे में सब लोग अपने अपने तरीके से व्याख्या करेंगे और भ्रम फैलाएँगे। इसलिए विकसित देशों में लागू ‘समान नागरिक संहिता’ और गोवा में लागू ‘गोवा नागरिक संहिता’ का अध्ययन करने और ‘भारतीय नागरिक संहिता’ का ड्राफ्ट बनाने के लिए तत्काल एक ज्यूडिशियल कमीशन या एक्सपर्ट कमेटी बनाना नितांत आवश्यक है।

(लेखक अश्विनी उपाध्याय सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं।)