उत्तर प्रदेश के कानपुर (Kanpur, Uttar Pradesh) में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिक रिजवान मोहम्मद ने पूछताछ में कई बड़े खुलासे किए हैं। पुलिस की पूछताछ में रिजवान ने हवाला का कारोबार करने और पाकिस्तान में कई लोगों से संबंध होने की बात कबूल की है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रिजवान मोहम्मद से पूछताछ के लिए पुलिस को 9 घण्टों की रिमांड मिली थी। इस पूछताछ में उसने कहा है कि वह कमाई के लिए हवाला का काम करता था, लेकिन वह देशद्रोही नहीं है। उसने यह भी बताया कि हवाला के काम के लिए वह पाकिस्तान समेत कुछ अन्य देशों की यात्रा कर चुका है। इन सभी देशों में जाने के लिए वह बांग्लादेशी पासपोर्ट का इस्तेमाल करता था।
हालाँकि, कुछ महत्वपूर्ण सवालों पर रिजवान ने चुप्पी साध रखी थी। जब पुलिस ने सख्ती दिखाई और घूमा-फिराकर सवाल पूछने शुरू किए तो उसने बताया कि वह बांग्लादेश में एक होटल चलाता था। शादी करने के बाद अब कानपुर के आर्यनगर स्थित एक फ्लैट में रह रहा है।
पुलिस ने रिजवान मोहम्मद की निशानदेही पर उसके घर की दोबारा तलाशी ली है। इस तलाशी में पुलिस को उसके घर से बांग्लादेश में निर्मित 111 नशीली गोलियाँ और पलंग के नीचे छिपाकर रखे गए 1.50 लाख रुपए नकद बरामद हुए हैं। उस मादक पदार्थ का भी मुकदमा दर्ज किया गया है।
इसके अलावा, तलाशी के दौरान जूते की अलमारी में फर्जी जन्म प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र और स्कूल के कुछ फर्जी दस्तावेज भी मिले हैं। पुलिस को रिजवान ने यह भी बताया है कि वह साल 2016 में कोलकाता में एक मेडिकल एनजीओ में मेडिकल अफसर था। इसके बाद उसने नौकरी नहीं की।
अपने हवाला कारोबार को लेकर रिजवान ने पुलिस को बताया है कि इस बारे में उसकी पत्नी हिना खालिद और ससुर खालिद माजिद को पता था। पुलिस ने उसके बैंक खातों से जुड़ी डिटेल को लेकर भी पूछताछ की है। हालाँकि, रिजवान ने अपने बैंक खातों में आ रहे पैसों को लेकर क्या बताया है, यह सामने नहीं आ सका है।
ऐसा कहा जा रहा है कि रिजवान मोहम्मद से हुई पूछताछ में सामने आए तथ्यों के आधार पर पुलिस अब उसकी 14 दिन की और रिमांड माँगेगी। साथ ही, रिजवान के साथ गिरफ्तार हुए 4 अन्य लोगों से भी पूछताछ व क्रॉस वेरीफिकेशन की कोशिश करेगी।
बता दें कि पुलिस ने विगत रविवार (11 दिसंबर 2022) को रिजवान मोहम्मद, उसकी पत्नी हिना खालिद, ससुर ख़ालिद माज़िद और रुखसार को गिरफ्तार किया था। वहीं, एक अन्य नाबालिग भी पुलिस हिरासत में है, जो इसी परिवार का सदस्य है।
पुलिस ने आरोपितों के घर की तलाशी ली थी। तलाशी में घर से बांग्लादेशी पासपोर्ट, फर्जी आधार कार्ड, 1,001 डॉलर विदेशी मुद्रा, सोने के आभूषण और करीब 14 लाख रुपए बरामद किए थे। आरोपितों ने शुरुआती पूछताछ में स्वीकार किया था कि वे साल 2016 से भारत में रह रहे हैं।
पकड़े गए आरोपितों के कागजात कानपुर से समाजवादी पार्टी के विधायक हाजी इरफ़ान सोलंकी ने वेरीफाई किए थे। विधायक इरफ़ान ने न सिर्फ पकड़े गए आरोपितों को अपने आधिकारिक लेटर हेड पर भारतीय होने पुष्टि की थी, बल्कि उनके कागजातों को लगातार सत्यापित भी किया था। हाजी इरफ़ान के अलावा सपा पार्षद मन्नू रहमान ने साल 2019 में इन बांग्लादेशियों के भारतीय होने का प्रमाण पत्र जारी किया था।
‘किसान आंदोलन’ – अगर कोई किसान कहे कि ये हमें बदनाम करने के लिए हुआ था, तो आप क्या सोचेंगे? लेकिन, आंदोलनजीवियों के देश भारत में कुछ ऐसा ही हुआ है। ‘किसान गर्जना रैली’ में आए देश भर के किसानों ने जाति-भाषा-क्षेत्र से ऊपर उठ कर एक सवाल से कहा कि राकेश टिकैत हमारे नेता नहीं हैं। ‘किसान आंदोलन’ किसानों को बदनाम करने के लिए था, किसानों ये यही कहा। फिर राकेश टिकैत को ‘किसान नेता’ बनाने वाले कौन लोग थे?
स्पष्ट है, विपक्ष में बैठे दलों ने उन्हें ‘किसान नेता’ बनाया, जो उनके आंदोलन में बढ़-चढ़ कर शामिल थे। बदले में इन ‘किसान नेताओं’ ने पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भाजपा के विरुद्ध चुनाव प्रचार किया। उन्हें ‘किसान नेता’ बनाया मीडिया ने, जिसके सामने वो भड़काऊ बयान देते रहते थे और प्रेस वालों को मसाला मिलता रहता था। उन्हें ‘किसान नेता’ बनाया पंजाब के खालिस्तानियों और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जातिवादी ठेकेदारों ने, जो अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने में लगे रहते थे।
जरा याद कीजिए उस ‘किसान आंदोलन’ को, जिसने एक साल तक दिल्ली की सीमाओं को ऐसा घेर रखा था कि NCR के लाखों कामकाजी लोगों को प्रतिदिन परेशानी होती थी और वो कुछ कर भी नहीं सकते थे। AAP की सरकार इन प्रदर्शनकारियों को राशन-पानी मुहैया कराती थी। केंद्र सरकार ने भीड़तंत्र के विरुद्ध कड़ा रुख नहीं अपनाया और अंततः तीनों कृषि कानूनों को रद्द किए जाने के साथ ही कृषि सुधार की योजना अटक गई।
ये भला कैसा ‘किसान आंदोलन’ था, जहाँ हत्याएँ और बलात्कार हुए। ये कैसा ‘किसान आंदोलन’ था, जहाँ स्थानीय ग्रामीणों की लड़कियों के साथ छेड़छाड़ होती थी। ये कैसा ‘किसान आंदोलन’ था, जिसकी भीड़ ने लाल किले पर चढ़ कर तिरंगे झंडे का अपमान किया। ये कैसा ‘किसान आंदोलन’ था, जहाँ प्रदर्शनकारियों के सामने बेबस पुलिसकर्मी जान की भीख माँगते नज़र आए। ये कैसा ‘किसान आंदोलन’ था, जिसके जरिए पाकिस्तान भारत में अशांति फैलाने की कोशिश में लग गया था।
राकेश टिकैत वाले 'किसान आंदोलन' से हत्या, जिंदा जलाने और बलात्कार की घटनाएँ सामने आती थीं, जबकि #किसान_गर्जना_रैली में विभिन्न प्रांत की महिलाएँ अपनी पारंपरिक वेशभूषा में अपनी संस्कृति का प्रदर्शन करती दिखीं।
जब मैं सोमवार (19 दिसंबर, 2022) को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित ‘भारतीय किसान संघ’ की ‘किसान गर्जना रैली’ को कवर करने पहुँचा, तो वहाँ 50,000 किसानों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को देख कर मन में सवाल उठा कि क्या राकेश टिकैत, दर्शन पाल, हन्नान मोल्लाह और योगेंद्र यादव जैसों के नेतृत्व में जो हुआ क्या उसे सचमुच में ‘आंदोलन’ कह सकते हैं? ‘किसान गर्जना रैली’ में देश भर के किसान जुटे थे और उनका कहना था:
कृषि कानूनों के विरोध में हुआ ‘किसान आंदोलन’ राजनीति से प्रेरित था।
राकेश टिकैत हमारे नेता नहीं हैं।
‘किसान आंदोलन’ को राजनीतिक फंडिंग थी।
‘किसान आंदोलन’ किसानों को बदनाम करने के लिए हुआ था।
‘किसान आंदोलन’ की माँगें प्रांतीय थीं और दुर्भावना से पूर्ण थीं।
असल में ‘किसान गर्जना रैली‘ में किसान उसी दिन सुबह को या एकाध दिन पहले दिल्ली पहुँचे और उनमें से अधिकतर उस दिन शाम को रैली संपन्न होने के साथ ही वहाँ से निकल गए। मध्य दिसंबर के बाद की ठंड में राष्ट्रीय राजधानी में जुटे इन किसानों को खेती-बारी भी देखनी होती है और अभी गेहूँ सहित अन्य रबी फसलों के मौसम में उन्हें खेत में समय देना होता है। फिर सोचिए, ‘किसान आंदोलन’ में वो कौन लोग थे जो एक साल से भी अधिक समय तक बैठे रहे और खेती-बारी किए बिना ही उनका घर चलता रहा?
‘किसान गर्जना रैली’ में कई महिलाएँ भी थीं। रैली खत्म होने के बाद ये लोग छोटे-मोटे फल या घर से लाए हुए भोजन को खाते दिखे। हालाँकि, संगठन ने वहाँ भोजन की व्यवस्था की थी। यहाँ कोई लक्जरी वाले टेंट नहीं थे, जो था सब सामने दिख रहा था। टेंटों में एसी सहित अन्य सुविधाएँ हम राकेश टिकैत वाले ‘किसान आंदोलन’ में देख चुके हैं। लेकिन, यहाँ किसान एक आम किसान की तरह थे – अपने प्रांत के परिधान में, अपनी स्थानीय संस्कृति का प्रदर्शन करते हुए, शांतिपूर्ण ढंग से मीडिया के सामने अपनी बातें रखते हुए।
‘किसान आंदोलन’ से बलात्कार की खबरें आती थीं, ‘किसान गर्जना रैली’ में दिखी महिलाओं की सहभागिता
‘किसान गर्जना रैली’ को लेकर मीडिया में खबरें आईं। ‘किसानों का प्रदर्शन’ – ये शब्द सुनते ही जनता की प्रतिक्रिया काफी कटु रही। किसी ने पूछा कि अब वो और क्या मुफ्त में माँगने आए हैं तो किसी ने कहा कि केंद्र सरकार ने झुकते हुए कृषि कानूनों को रद्द कर दिया, फिर ये क्यों निकले हैं? किसानों और उनके प्रदर्शनों को लेकर इस तरह की धरना बनने के कारण वही 1 साल तक चला ‘किसान आंदोलन’ है, जो सिंघु और टिकरी जैसी दिल्ली की सीमाओं पर बैठा हुआ था।
राकेश टिकैत कहते थे कि उनके पास 700 माँगों की सूची है? क्या उनके ‘बक्कल उतारने’ जैसे बयानों से लगता भी था कि वो सचमुच किसानों की समस्याओं के समाधान के प्रति सकारात्मक हैं? केंद्र सरकार के मंत्रियों ने कई राउंड की वार्ताएँ की, सब विफल। ‘कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT)’ ने बताया कि ‘किसान आंदोलन’ के कारण देश को 60,000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। आवश्यक वस्तुओं की आवाजाही में दिक्कतें आईं।
जबकि, ‘किसान गर्जना रैली’ में दृश्य इसके उलट था। वहाँ तैनात पुलिसकर्मी और पैरा-मिलिट्री के लोग निश्चिंत थे। कानून के साथ हर व्यक्ति सहयोग कर रहा था। चाँदनी चौक और आसपास के इलाकों में ठेले लगाने वाले छोटे-मोटे सामान लेकर वहाँ पहुँच गए थे, ताकि कुछ सामान बिक जाए। बाहर से आए ऊनी कपड़ों और सस्ती चीजों की लोग खरीददारी भी कर रहे थे। कहीं कोई भगदड़ नहीं मची। बुजुर्ग से लेकर युवा और महिलाओं तक की उपस्थिति रही।
बैग्स में ज़रूरी कपड़े व सामान लेकर आए थे किसान, फिर इन्हें लाद कर रेलगाड़ी से लौट गए
‘किसान गर्जना रैली’ में हमने किसानों को अपने सामान और झोलों को रख कर उनकी सुरक्षा करते देखा। ये लोग ज़रूरत के कपड़े व अन्य सामान अपने साथ लेकर आए थे, जिन्हें वो ले गए। कोई रेलवे स्टेशन का पता पूछ रहा था तो कोई अपने परिचितों को फोन कॉल कर उनसे मिलने जा रहा था। इस आंदोलन में आम लोग थे, फैंसी जमात नहीं। हाँ, AAP सरकार ने इनके -पानी उपलब्ध नहीं कराया था, क्योंकि ये उपद्रवी नहीं थे।
‘किसान आंदोलन’ में खालिस्तानियों की सक्रियता भी छिपी नहीं थी। प्रतिबंधित संगठन SFJ का पन्नू लगातार वीडियो जारी कर सिख युवाओं को भड़काता रहा। ट्रैक्टर को हथियार बनाने से लेकर लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने तक की बातें हुईं। ISI के लोग इस ‘आंदोलन’ में घुस गए। निहंगों द्वारा लखबीर सिंह नामक दलित की बेअदबी के आरोप में हत्या हो या शराबियों द्वारा मुकेश को ज़िंदा जलाना – ‘किसान आंदोलन’ नशा और कट्टरवाद का अड्डा बना हुआ था। 26 जनवरी, 2021 को ट्रैक्टर से स्टंट के कारण एक किसान की मौत भी हुई, जिस पर राजदीप सरदेसाई जैसों ने फेक न्यूज़ फैलाया।
सामान की सुरक्षा के साथ-साथ फल खाती किसान महिलाएँ
जबकि, ‘किसान गर्जना रैली’ में पर्यावरण और स्वास्थ्य की सुरक्षा की बातें की जा रही थीं, प्रकृति की बात हो रही थी। आक्रोश यहाँ भी था, केंद्र सरकार का विरोध यहाँ भी हो रहा था – लेकिन, किसी खास पार्टी के प्रति दुर्भावना नहीं थी। टिकरी बॉर्डर बंगाल की युवती से गैंगरेप हुआ और इस खबर को दबाने की भी भरसक कोशिश हुई। महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी हुई। वहीं ‘किसान गर्जना रैली’ में हर उम्र की महिलाएँ विरोध प्रदर्शन में शामिल नज़र आईं और स्वच्छंद होकर अपनी परंपरा का प्रदर्शन करती भी दिखीं।
एक वो ‘किसान’ थे जिन्होंने गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में घुस कर 300 पुलिरकमियों को घायल कर दिया था और राम मंदिर की झाँकी को नुकसान पहुँचाया था। एक ये किसान हैं, जो आए, सरकार के सामने अपनी माँगें रखी, प्रदर्शन कर के आक्रोश जताया और फिर लौट गए। अहिंसा, लोकतंत्र और शांति की बात की। एक वो ‘किसान’ थे, जिन्होंने सड़क और सार्वजनिक स्थानों पर कब्ज़ा किया था। जिन्होंने ‘किसान’ शब्द को गाली बनाने के लिए हर वो चीज की जो एक किसान नहीं करता।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय (University Of Allahabad) में छात्रों और सुरक्षा गार्डों के बीच जमकर बवाल हुआ है। इस झड़प में पूर्व छात्र नेता को चोट लगी है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, फ़ीस बढ़ोतरी और छात्र संघ चुनाव को लेकर कैंपस का माहौल पहले से ही तनावपूर्ण था। ऐसे में हल्की नोकझोंक ने हिंसक झड़प का रूप ले लिया।
Uttar Pradesh | Protest over fee hike in Allahabad University premises in Prayagraj; motorbike torched, car damaged by protesters; police present at the spot pic.twitter.com/KJ37pgdtK7
रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व छात्र नेता विवेकानंद पाठक ने सोमवार (19 दिसंबर 2022) को विश्वविद्यालय में अपने साथियों के साथ घुसने की कोशिश की तो गार्ड्स ने रोक दिया। छात्र नेता का कहना था कि उसे बैंक में केवाईसी के लिए जाना था, लेकिन गार्ड नहीं मानें।
इसको लेकर विवाद बढ़ा तो छात्रों ने पथराव शुरू कर दिया। इसमें पूर्व सके बाद गार्डों ने हालात को काबू करने के लिए फायरिंग की और पुलिस बुला लिया। इससे छात्र और ज्यादा भड़क गए। इसमें पूर्व छात्र नेता का सिर फट गया है।
Trigger warning: Injury, blood
Former student leader Vivekanand Pathak who was allegedly attacked and fired upon by security guard at Allahabad University campus after an altercation at the bank in the premises. He spoke to the local media in Prayagraj. pic.twitter.com/1kyYJeQ3kf
घटना से आक्रोशित छात्रों ने चीफ प्रॉक्टर के कार्यालय का घेराव किया। इस दौरान ने प्रॉक्टर कार्यालय छात्रों के गमले और कुर्सियाँ तोड़ दीं। रिपोर्ट के अनुसार, छात्रों ने दो बाइकों में भी आग लगा दी और दर्जनों कार के शीशे तोड़ दिए।
प्रयागराज के पुलिस कमिश्नर रमित शर्मा ने कहा कि स्थिति अब नियंत्रण में है। उन्होंने बताया कि छात्रों और गार्ड के बीच झड़प हुई है। घटना के बाद स्थिति को पूरी तरह से नियंत्रित कर लिया गया है। छात्र अब शांत होकर बैठ गए हैं। छात्रों की बात समझने की कोशिश की जा रही है।
Prayagraj police commissioner Ramit Sharma on the clash, violence in Allahabad University. pic.twitter.com/lLoLBL1b8e
वहीं पत्रकार पीयूष राय के चार छोटे वीडियो क्लिप से घटना के समय की स्थिति को समझा जा सकता है। एक वीडियो में देखा जा सकता है कि पुलिस छात्रों का पीछा का रही है। दूसरे और तीसरे वीडियो में मोटरसाइकिल जलती हुई दिख रही है। चौथे वीडियो में विश्वविद्यालय के प्रोफेसर की कार दिखती है, जिसके शीशे तोड़ दिए गए हैं।
Brawl between students and security personnel at Allahabad University led to violence, arson and vandalism in the varsity campus. The violent confrontation sparked after a student leader was allegedly attacked by the security guards. pic.twitter.com/HKgUFDCnC3
आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व छात्र नेता विवेकानंद पाठक ने अपनी कार से विश्वविद्यालय में प्रवेश करने की कोशिश की थी, लेकिन गार्ड ने उन्हें रोक लिया। पुलिस के अनुसार, विवेकानंद ने गार्ड को थप्पड़ मारा। इसके बाद वहाँ मौजूद गार्ड ने पूर्व छात्र नेता को पीट दिया। इस दौरान उसका सिर फट गया।
दिल्ली में सोमवार (19 दिसंबर, 2022) को ‘भारतीय किसान संघ’ के बैनर तले किसानों ने दिल्ली स्थित रामलीला मैदान में अपनी 3 प्रमुख माँगों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया – कृषि यंत्रों को GST से दूर रखा जाए, ‘किसान सम्मान निधि’ की राशि बढ़ाई जाए और लागत के हिसाब से उत्पाद का मूल्य तय किया जाए। हमने इस दौरान विभिन्न किसानों से बात की, जो ‘भारत माता की जय’ और ‘जय बलराम’ का नारा लगाते हुए राष्ट्रीय राजधानी में जुटे थे।
ओडिशा और मध्य प्रदेश के अलावा हमने उत्तर प्रदेश से ‘किसान गर्जना रैली’ में आए किसानों से भी बातचीत की, जिन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशंसा की। किसानों ने कहा कि MSP लागत के हिसाब से मिलना चाहिए। उन्होंने बताया कि कई कृषि उपकरणों पर 9% जीएसटी देनी होती है। यूपी के किसानों ने ‘किसान सम्मान निधि’ को बढ़ा कर 12,000 रुपए सलाना करने की माँग की। उन्होंने कहा कि किसानों को राजनीति के घेरे में न लाते हुए उन्हें छोटे-बड़े में न बाँटा जाए और सभी को लाभ मिले।
वाराणसी के इन किसानों ने कहा कि राकेश टिकैत जैसों के नेतृत्व में तीनों कृषि कानूनों (अब रद्द) के विरोध में 1 साल तक दिल्ली की सीमाओं को घेर कर हुए आंदोलन में वो शामिल नहीं थे। ”किसान गर्जना रैली में शामिल किसानों ने कहा कि हमारा संगठन अलग है और पूर्णतः गैर-राजनीतिक है। वाराणसी से आए इन किसानों ने कहा कि राकेश टिकैत वाला आंदोलन यूनियन का था और यूनियन कंपनियों में होता है या किसी क्षेत्र में।
उन्होंने उस आंदोलन में शामिल किसानों को सीमित क्षेत्र का और प्रांतीय बताते हुए कहा कि हमारा आंदोलन ‘भारतीय किसान संघ’ का है, जहाँ सभी प्रदेशों से अलग-अलग भाषा और परिवेश में लोक-नृत्य करते हुए उपस्थित हुए थे, जो असली किसान हैं, गाँव के किसान हैं, और भारत की आत्मा गाँवों में ही बसती है। यूपी के इन किसानों ने कहा कि खेती आजकल घाटे का सौदा हो गया है और अन्न फैक्ट्री में पैदा नहीं होता, इसीलिए किसानों की बात करने वाले नेताओं को किसानों की माँगें माननी चाहिए।
उन्होंने कहा कि ‘भारतीय किसान संघ’ एक राष्ट्रीय संगठन है और हर एक राज्य में इसकी उपस्थिति है। उन्होंने कहा कि किसानों की माँगों पर ध्यान नहीं दिया गया था तो सरकार किसानों की आत्महत्याएँ रोकने में विफल रही है, उसके और बढ़ जाने की आशंका होगी। 26 जनवरी, 2021 को लाल किले पर हिंसा करने वाले किसानों के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि वो राजनीति से प्रेरित थे, उनकी माँगें क्षेत्रीय थी। जबकि ‘भारतीय किसान संघ’ की माँगें सार्वभौमिक हैं और बृहत्तर भारत की हैं।
एक बुजुर्ग किसान ने कहा कि भारत के हर किसान को दुर्घटना बीमा का लाभ दिया जाना चाहिए। असल में इनके कहने का अर्थ ये था कि हर एक किसान को ‘आयुष्मान कार्ड’ बना कर दिया जाना चाहिए। किसानों की सुरक्षा के लिए इसे आवश्यक बताते हुए उन्होंने कहा कि सभी सरकारी कर्मचारियों को ‘आयुष्मान कार्ड’ मिला हुआ है, जबकि लघु एवं सीमांत किसानों को इससे दूर रखा गया है। हालाँकि, इस दौरान आक्रोशित बुजुर्ग किसान ने ये भी कहा कि हमारी माँगें नहीं 2024 में पता चल जाएगा कि हम क्या कर सकते हैं।
क्या इससे उनका आशय हिंसक प्रदर्शन से है? इस सवाल के जवाब में किसानों ने कहा कि वो शांतिपूर्ण और अहिंसक ढंग से विरोध प्रदर्शन करेंगे और उनकी माँगें गैर-राजनीतिक हैं। किसानों ने कहा कि हम सरकार के साथ मिल कर काम करना चाहते हैं, ताकि देश का अन्न भण्डार भरा रहे। ‘किसान गर्जना रैली’ के मंच पर भगवान बलराम की तस्वीर और रैली में गूँजते ‘जय बलराम’ के नारों पर भी यूपी के किसानों ने अपनी बात रखी।
उन्होंने कहा, “भगवान बलराम का अस्त्र हल था। किसान भी हल से ही कार्य करते हैं। इसीलिए, ‘भारतीय किसान संघ’ के लोग भगवान बलराम को अपना नायक मानते हैं।” वहाँ मौजूद अन्य किसानों ने भी इसकी पुष्टि की। उन्होंने कहा कि भगवान बलराम का चरित्र निष्पक्ष रहा है (उन्होंने महाभारत युद्ध से दूरी बनाते हुए न कौरवों का साथ दिया, न पांडवों का), उनकी तरह ही ये संगठन भी गाँव-गाँव में फैला हुआ है और निष्पक्ष है। उनका कहना है कि उनकी माँगें पर्यावरण, प्रकृति, स्वास्थ्य और सेहत के लिए हैं।
भारत को कृषि प्रधान देश बताते हुए इन किसानों ने कहा कि गोवंश आधारित प्राकृतिक खेती शुरू हो गई है और सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र की बातें सरकार को सुनने की आवश्यकता है। उन्होंने आक्रोश जताते हुए ये भी कहा कि ‘भारतीय किसान संघ’ ने अगर करवट ले लिया तो जो किसानों की माँगें नहीं मानेगा, वो 2024 में दिल्ली की गद्दी पर नहीं बैठ पाएगा। इसके बाद हमारा सवाल था कि दिल्ली तो ठीक है, जरा लखनऊ के बारे में भी बता दीजिए।
उत्तर प्रदेश से आए किसानों ने एक स्वर में कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन में यूपी में राम राज्य है और हर तरफ अमन-चैन है। इन्हें CM योगी से कोई शिकायत नहीं।
किसानों ने कहा – भगवान बलराम हमारे नायक, क्योंकि हल ही उनका हथियार है और सबसे बड़े युद्ध में भी वो निष्पक्ष रहे। pic.twitter.com/wXnE7rz7il
लखनऊ से सरकार कैसी चल रही है, जिसके जवाब में किसानों ने कहा कि वहाँ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राम-राज्य है। एक अन्य बुजुर्ग किसान ने कहा कि उत्तर प्रदेश में योगी जी के शासन में सब कोई अमन-चैन से है और किसी को कोई समस्या नहीं है। उन्होंने कहा कि उन्हें योगी आदित्यनाथ से कोई शिकायत नहीं है। एक अन्य बुजुर्ग किसान ने भी कहा कि योगी सरकार अच्छा कार्य कर रही है, लेकिन एक मामले पर वो उनसे खफा हैं।
असल में मुद्दा ये है कि योगी आदित्यनाथ ने किसानों का ऋण माफ़ करने का वादा किया था। इनका कहना है कि ब्याज भरने वाले शरीफ किसानों का ऋण माफ़ नहीं किया गया, जबकि बयान न चुकाने वाले डिफॉल्टर किसानों के ऋण माफ़ कर दिया गया। उन्होंने कहा कि इस कारण अच्छे किसान भी डिफॉल्टर बन जाते हैं। उन्होंने बताया कि गोवंश आधारित प्राकृतिक खेती के मामले में भी उत्तर प्रदेश तेज़ी से कार्य कर रहा है।
कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी (Congress Leader Rahul Gandhi) ने भारतीय सेना को लेकर विवादित बयान दिया था, जिसकी भाजपा ने निंदा की थी। अब विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने राहुल को लोकसभा में करारा जवाब दिया है। जयशंकर ने कहा है कि राजनीतिक आलोचनाओं का हमेशा स्वागत है, लेकिन अपने जवानों का अपमान नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सेना के लिए ‘पिटाई’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना ठीक नहीं है।
विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा, “हमें प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपने जवानों की आलोचना नहीं करनी चाहिए। हमारे जवान यांग्त्से में 13 हजार फीट की ऊँचाई पर खड़े होकर हमारी सीमा की रखवाली कर रहे हैं। उनका सम्मान और उनकी सराहना की जानी चाहिए।”
We should not criticise our jawans directly or indirectly. Our soldiers are standing at a height of 13,000 feet in Yangtse and guarding our border. They should be respected and appreciated: External Affairs Minister Dr S Jaishankar
उन्होंने आगे कहा, “मैंने सुना है कि विदेश मंत्री के तौर पर मुझे अपनी समझ को और विकसित करने की जरूरत है। जो नेता मुझे यह सलाह दे रहे हैं, उस नेता के सम्मान में मैं नतमस्तक ही हो सकता हूँ।” दरअसल, जयशंकर राहुल गाँधी के ‘सेना की पिटाई’ वाले बयान पर जवाब दे रहे थे।
अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीनी सैनिकों के साथ झड़प के बाद राहुल गाँधी ने कहा था कि चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है और केंद्र की मोदी सरकार सो रही है। उन्होंने आगे कहा था कि चीन भारतीय जवानों के पीट रहा है और देश के 2,000 किलोमीटर वर्ग स्क्वायर पर कब्जा कर लिया है।
राहुल गाँधी को जवाब देते हुए जयशंकर ने कहा, “अगर हम चीन के प्रति उदासीन थे तो भारतीय सेना को सीमा पर किसने भेजा? अगर हम चीन के प्रति उदासीन थे तो आज हम चीन पर डी-एस्केलेशन और डिसइंगेजमेंट के लिए दबाव क्यों बना रहे हैं? हम सार्वजनिक रूप से क्यों कह रहे हैं कि हमारे संबंध सामान्य नहीं हैं।”
If we were indifferent to China then who sent the Indian Army to the border. If we were indifferent to China then why are we pressurising China for de-escalation and disengagement today? Why are we saying publicly that our relations are not normal?: EAM Dr S Jaishankar pic.twitter.com/5rAqfQweR4
इसके साथ ही जयशंकर ने जोर देकर कहा है कि सेना के लिए पिटाई जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना ठीक नहीं है। वे इस प्रकार की भाषा के हकदार नहीं हैं। उनके लिए इस शब्द का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि राहुल गाँधी ने यह बयान ऐसे समय दिया था जब चीनी सैनिकों को भारतीय जवानों द्वारा पीटने का वीडियो वायरल हुआ था। हालाँकि इस बात की पुष्टि नहीं हुई कि यह वीडियो तवांग का है या नहीं, लेकिन वीडियो में साफ़ देखा जा सकता है कि भारतीय सेना ही चीनियों की दनादन पिटाई कर रही है।
झटका और हलाल (Jhatka & Halal Controversy) प्रोडक्ट लंबे समय से बहस का विषय रहे हैं। इस बीच कर्नाटक की भाजपा सरकार ने हलाल मांस को प्रतिबंधित करने के लिए विधानसभा में बिल लाने का फैसला किया है। विधानसभा में यह बिल पास होने के बाद कर्नाटक भारत का पहला राज्य बन जाएगा, जो हलाल मीट पर प्रतिबंध लगाएगा। इस बिल को लेकर कॉन्ग्रेस ने अभी से विरोध करना शुरू कर दिया गया है।
भाजपा विधान परिषद सदस्य एन रविकुमार ने इस बिल को सदन में लाने की पहल की है। इसमें भारतीय खाद्य सुरक्षा और सुरक्षा संघ (FSSAI) के अलावा किसी अन्य संस्था के खाद्य प्रमाणन पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। रविकुमार ने इसे निजी विधेयक के रूप में पेश की का विचार किया था, लेकिन अब वह इसे सरकारी विधेयक के रूप में पेश कर सकते हैं।
कर्नाटक का हलाल मांस विवाद…
कर्नाटक में हलाल मांस को लेकर विवाद की शुरुआत इसी साल मार्च में हुई थी। तब, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव सीटी रविकु ने हलाल मांस बेचने को आर्थिक जिहाद करार दिया था। उन्होंने कहा था कि हलाल मांस को जिहाद के लिए इस्तेमाल किया जाता है, ताकि मुस्लिम दूसरों के साथ व्यापार न करें। इसके बाद कुछ अन्य हिंदू संगठनों ने भी हलाल मांस का विरोध किया था। हालाँकि, मुस्लिम संगठन व कॉन्ग्रेस समेत अन्य राजनीतिक दलों ने हलाल मांस का समर्थन किया था।
क्या होता है हलाल माँस…?
इस्लाम के मजहबी किताब कुरान और हदीस में मुस्लिमों के खाने के दो प्रकार बताए गए हैं, हलाल और हराम। किसी मांसाहारी प्रोडक्ट के हलाल होने का मतलब यह होता है कि जानवर को मुस्लिम द्वारा ही काटा जाना चाहिए। काटने की यह प्रक्रिया भी निर्धारित है। यदि जानवर किसी और संप्रदाय के व्यक्ति द्वारा काटा जाता है तो इसे मुस्लिम गैर-हलाल यानी हराम बताते हैं।
हलाल, ‘खून की अशुद्धता’ और कुरान के प्रतिबंध
जानकारों का कहना है कि मुस्लिमों को सभी चीजें इस्लामी कानून (शरिया) के अनुसार करनी होती है। इसमें खाना-पीना भी शामिल है। साथ ही, हराम चीजों से बचने के लिए कहा गया है। इस्लाम में सुअर के साथ ही अल्लाह का नाम लिए बिना जिबह (काटे) गए जानवर भी हराम कहे गए हैं। इसके अलावा, कुरान की कई ऐसी आयतें हैं, जिनमें कहा गया है कि मुस्लिमों को खून के सेवन से किसी भी कीमत पर बचना चाहिए। यानी, खून को इस्लाम में हराम माना गया है।
हलाल तरीके से जानवरों की जिबह
इस्लाम में कहा गया है कि जानवरों को जिबह (काटने) से पहले उसे अच्छी तरह से खाना-पानी दिया जाना चाहिए। इसके बाद ही जानवर को काटना चाहिए। यही नहीं, इस्लाम कहता है कि हलाल केवल एक समझदार, वयस्क मुस्लिम व्यक्ति द्वारा किया जाना चाहिए, जो इस्लामी रीति-रिवाजों से परिचित हो। यदि जानवर को अल्लाह का नाम लिए बिना काटा जाता है तो यह हराम है। साथ ही, किसी गैर-मुस्लिम द्वारा जानवर को काटा जाना भी हराम कहलाता है।
क्या है झटका मांस…?
सीधे शब्दों में कहें तो झटका, जैसा कि शब्द से पता चलता है, का अर्थ है “तेज”। वध की झटका विधि में पशु को बिना किसी कष्ट के तुरंत मार दिया जाता है। झटका में जानवर का सिर तुरंत काट दिया जाता है। हलाल और झटका के बीच एक और महत्वपूर्ण अंतर यह है कि झटका कोई धार्मिक प्रक्रिया नहीं है। झटका का मूल विचार जानवर को कम से कम यातना देकर मारना है। वहीं, हलाल में उसे तड़प-तड़प कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है।
सिखों में वर्जित है हलाल…
हलाल को बढ़ावा गैर-मुस्लिमों पर इस्लामी सिद्धांतों को लागू करने की एक प्रक्रिया भी है। एक गैर-मुस्लिम यानी हिंदू या सिख आदि को अल्लाह के नाम पर कुर्बान किए गए मांस को खाने के लिए मजबूर किया जाता है। सिख अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण हलाल मांस का सेवन नहीं करते हैं।
सिख हलाल प्रक्रिया को “कुट्टा” (Kuttha) कहते हैं, जिसका अर्थ है धीमी, दर्दनाक प्रक्रिया में जानवर को मारने के बाद प्राप्त मांस। सिख इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार, सिखों के अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में खालसा के आदेश का जिक्र करते हुए कुट्टा या हलाल भोजन करने से परहेज करने का आदेश दिया था।
गैर-मुस्लिम दे रहे हैं अपनी सुपारी: Dr. झटका
‘Dr. झटका’ और ‘King of झटका revolution’ कहे जाने वाले रवि रंजन सिंह ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा था कि भोज्य पदार्थ, चाहे वे आलू के चिप्स क्यों न हों, को ‘हलाल’ तभी माना जा सकता है जब उसकी कमाई में से एक हिस्सा ‘ज़कात’ में जाए। इस जकात को वे जिहादी आतंकवाद को पैसा देने के बराबर मानते हैं। जब कोई गैर-मुस्लिम हलाल वाला भोजन खरीदता है तो वह उसका एक हिस्सा अपने ही खिलाफ होने जा रहे जिहाद को आर्थिक सहायता देने में खर्च करता है। इसे वह ‘हलालो-नॉमिक्स’ यानी हलाल का अर्थशास्त्र कहते हैं। “हलालो-नॉमिक्स का अर्थ है आप अपनी सुपारी खुद दे रहे हैं।”
इसमें भी बड़ी बात यह है कि किसी मांसाहारी प्रोडक्ट के हलाल होने का मतलब यह होता है कि जानवर को मुस्लिम द्वारा ही काटा जाना चाहिए। यदि किसी और के द्वारा काटा जाता है तो इसे मुस्लिम गैर-हलाल बताते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हलाल और गैर-हलाल मांस के चलते लगभग सभी बूचड़खानों में केवल मुस्लिमों को ही नौकरी में रखा जाता है। इसका कारण यह है कि कोई भी हलाल और गैर-हलाल के लिए अलग-अलग बूचड़खाने खोलना अपेक्षाकृत महंगा साबित होगा।
मांस उद्योग कोई छोटा-मोटा उद्योग नहीं है। वास्तव में यह 28 अरब डॉलर से अधिक की आय वाला उद्योग है, जहाँ सिर्फ हलाल मांस के लिए मुस्लिमों को काम पर रखा जाता है। इसी हलाल के चलते ऐसे लाखों लोग, खासतौर से दलित वर्ग के लोग जो परंपरागत रूप से इस काम लगे थे, वे बेरोजगार हो चुके हैं।
दिल्ली के रामलीला मैदान में सोमवार (19 दिसंबर, 2022) को लगभग 50,000 की संख्या में किसानों का जुटान हुआ। ‘भारतीय किसान संघ’ के बैनर तले इन किसानों ने केंद्र सरकार के समक्ष अपनी विभिन्न माँगें रखी और फिर शाम होते-होते लौट गए। इस रैली में देश भी के किसान जुटे। मंच पर भारत माता और भगवान बलराम की तस्वीर लगी थी। आंदोलन एकदम शांतिपूर्ण रहा और दिल्ली पुलिस के अलावा पैरा-मिलिट्री बलों की भी अच्छी-खासी तैनाती रही।
इस दौरान हमने आंदोलन में शामिल कई किसानों से बातचीत की और उनकी माँगों को समझा। आखिर क्या कारण है कि दिल्ली की सीमाओं को एक साल तक घेर कर रखने वाले तथाकथित किसानों के आंदोलन में जम कर हिंसा हुई थी, जबकि ये आंदोलन शांतिपूर्ण है? इस सवाल के जवाब में मध्य प्रदेश के सीहोर से आए सूरज सिंह ठाकुर कहते हैं कि हमारे आंदोलन को किसी राजनीतिक पार्टी की फंडिंग नहीं है, शायद इसीलिए।
उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि तीनों कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली में उत्पात मचाने वाे तथाकथित किसानों को राजनीतिक फंडिंग थी। किसानों ने कहा कि हम अपना अधिकारी माँगने आए हैं, जबकि वो लोग किसानों को बदनाम करने के लिए आए थे। उनका ये भी कहना है कि हमलोग अपने अधिकार माँगने आए हैं, कोई भीख नहीं। इन किसानों ने ये भी बताया कि वो पिछले वाले ‘किसान आंदोलन’ का हिस्सा नहीं थे। वहीं कुछ का कहना है कि सिर्फ शुरुआत में ही वो उस आंदोलन के साथ थे।
‘किसान गर्जना रैली’ में जुटे किसानों का स्पष्ट कहना था कि वो लोग किसी को भी परेशान नहीं करना चाहते, लेकिन अपना काम करवाना चाहते हैं। उनकी केंद्र सरकार से मुख्य तीन माँगें हैं, जो इस रैली का आधार है। मध्य प्रदेश के जिन किसानों से हमारी बात हुई, उनका कहना है कि प्रत्येक वर्ष मिलने वाली ‘किसान सम्मान निधि’ को 6000 रुपए से बढ़ा कर 20,000 रुपए किया जाए। वहीं कृषि यंत्रों पर लगने वाली GST को भी खत्म किया जाना उनकी माँग है।
उनकी सबसे बड़ी माँग ये है कि लागत के आधार पर फसल को बेचने का मूल्य तय किया जाए। किसानों ने तंज कसते हुए कहा कि जिन नेताओं को ये तक पता नहीं है कि आलू जमीन के अंदर उगता है या बाहर, वो हमारे लिए मूल्य तय करने बैठे हुए हैं। प्राइवेट कंपनियों से उन्हें कोई दिक्कत है? इसके जवाब में किसानों ने कहा कि कृषि कानूनों के वो समर्थन में हैं, बस कुछ त्रुटियों को सुधार दिया जाए। इन किसानों का कहना है कि वो राष्ट्रवादी हैं और तीनों कृषि कानूनों (अब रद्द) से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है।
किसानों ने कहा कि हम अपना कार्य अहिंसक पद्धति से निकालने आए हैं और तीनों ‘कृषि कानून’ में त्रुटियाँ दूर होने के बाद वो उनका स्वागत करते। ये किसान ‘भारत माता की जय’ और ‘जय बलराम’ के नारे भी लगा रहे थे। इन किसानों का कहना है कि वो सड़क जाम करने की बजाए वोट की ताकत में विश्वास रखते हैं। इन किसानों ने स्पष्ट कहा कि राकेश टिकैत उनके नेता नहीं हैं। उन्होंने कहा कि राकेश टिकैत जैसे लोग किसानों को फुसला रहे हैं।
‘किसान गर्जना रैली’ में माहौल काफी सांस्कृतिक था। स्थानीय नाच-गान और संगीत के माध्यम से किसान विरोध प्रदर्शन करते नज़र आए। ढोल और झाल बजाते हुए किसान भी वहाँ मौजूद थे। शाम होने के बाद कई किसान वापस रेलवे स्टेशन के लिए निकलते नज़र आए, क्योंकि अभी गेहूँ का मौसम है और और उन्हें खेतों में काम भी रहता है। सबसे बड़ी बात ये कि ‘किसान गर्जना रैली’ में महिलाओं की एक बड़ी उपस्थिति दिखी।
कई ऐसे किसान थे जो अपना सामान लेकर यहाँ आए थे और समूह में पहुँचे थे। ऐसे में यहाँ भोजन-पानी कर के वो अपने सामान की सुरक्षा भी करते दिख और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के बाद वापस लौट गए। हमारी मुलाकात ओडिशा के कुछ किसानों से हुई। इनमें से एक प्रदीप महंता ने लाभकारी मूल्य, कृषि उपकरणों से GST हटाने और ‘किसान सम्मान निधि’ को बढ़ाने को अपनी प्रमुख माँग बताया। उनका कहना है कि कम से कम 5000 रुपए के तीन किश्त हर साल मिलनी चाहिए।
इन किसानों ने भी स्पष्ट किया कि कृषि कानूनों के विरोध में हुए ‘किसान आंदोलन’ में वो सिर्फ शुरुआत में ही शामिल रहे, उसके बाद हट गए। राकेश टिकैत आपलोगों के नेता हैं या नहीं? इसके जवाब में किसानों ने एक सुर में कहा – नहीं, हर एक किसान हमारा नेता है। ओडिशा के किसानों ने भी लाल किले पर हुई हिंसा की याद दिलाने पर कहा कि हम शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन में यकीन रखते हैं। उनका कहना है कि वो सरकार के विरोधी नहीं है, बस अपना हक़ माँगने आए हैं।
मध्य प्रदेश के बाद अब ओडिशा के किसानों को सुनिए।#किसान_गर्जना_रैली की 3 प्रमुख माँगें हैं: लागत के आधार पर उत्पाद का मूल्य तय किया जाए, कृषि यंत्रों पर से GST हटाया जाए और 'किसान सम्मान निधि' में बढ़ोतरी की जाए।
ओडिशा के इन किसानों ने बताया कि कृषि कानूनों में कुछ संशोधन हो जाता तो हम उसका स्वागत करने के लिए तैयार थे। ओडिशा के किसानों ने एक और खास बात बताई कि भगवान बलराम को भगवान जगन्नाथ का बड़ा भाई माना जाता है, इसीलिए वहाँ के किसानों की आस्था उनमें बहुत है। वहाँ भगवान बलराम के कई मंदिर भी हैं। इसीलिए, ‘किसान गर्जना रैली’ में ‘जय बलराम’ का नारा खूब गूँजा। इस दौरान ‘जो हमसे टकराएगा, हमसे ही मिल जाएगा’ जैसे नारे भी लगे।
‘पिएँगे क्या – रस, खाएँगे क्या – रसगुल्ले’ – एक रोचक नारा ये भी लगा। “देश के हम भंडार भरेंगे लेकिन कीमत पूरी लेंगे।” – ये ‘भारतीय किसान संघ’ का मुख्य नारा रहा है। ‘किसान गर्जना रैली’ में खाद्यान की सुरक्षा के अलावा किसानों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की माँग भी की गई। कृषि आदानों से GST को खत्म करवाना इनका लक्ष्य है। किसानों ने बताया कि GST से पहले भी इन पर टैक्स लगता आ रहा है, ये समस्याएँ काफी पहले से हैं और किसानों की हालत जस की तस है।
दिल्ली की एक मुस्लिम लड़की ने आरोप लगाया है कि उसके परिजनों ने 15 साल की उम्र में उसका जबरन निकाह करवा दिया और ससुराल वालों ने मारपीट कर घर से निकाल दिया। लड़की का कहना है कि जहाँ उसकी निकाह हुई है, वहाँ अक्सर उसके साथ मारपीट की जाती है और क्रूरतापर्वक प्रताड़ित किया जाता है। दिल्ली महिला आयोग ने लड़की की शिकायत मिलने के बाद दिल्ली पुलिस को नोटिस भेजा है।
दिल्ली के दरियागंज की रहने वाली पीड़ित लड़की ने दिल्ली महिला आयोग में शिकायत देकर कहा कि उसकी निकाह फरवरी 2022 में उत्तर प्रदेश बदायूँ में की गई थी। उस समय उसकी उम्र 15 साल थी। निकाह के बाद वह गर्भवती हो गई, लेकिन ससुराल वालों ने उसकी गर्भपात कराने की असफल कोशिश की।
पीड़िता ने कहा कि ससुराल में उसका शौहर और अन्य लोग उसके साथ मारपीट करते हैं। उसका शौहर उसे गर्म तवे से दागता है और बिजली का करंट लगाता था। इतना ही नहीं, वह बिजली की तारों और पेंचकस से भी कई बार उसे मारा। इसके बाद उसके शौहर ने उसे घर से निकाल दिया, जिसके बाद से वह दिल्ली में अपने अम्मी-अब्बू के पास रही है।
शिकायत मिलने के बाद दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने दिल्ली पुलिस से इस संबंध में की गई एफआईआर की कॉपी के साथ आरोपितों की गिरफ्तारी की जानकारी माँगी है।
उन्होंने कहा, “मैं जानती हूँ कि मुस्लिम पर्सनल लॉ 15 साल और इससे ऊपर की लड़कियों की शादी की अनुमति देता है, लेकिन मेरा मानना है कि यह पुरातन, मध्ययुगीन और बर्बर है। ऐसे मामलों में देश का कानून यानी पॉक्सो लागू होना चाहिए। हमने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। मामले में एफआईआर दर्ज की जानी चाहिए और आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए।”
साल 1987 की बात है। घनी अंधेरी रात थी। बारिश भी घनघोर हो रही थी। जोगेंद्र मिश्रा की धर्मपत्नी शैली को तभी प्रसव पीड़ा का अनुभव हुआ। कैसे ले जाएँ, कहाँ ले जाएँ, कौन डॉक्टर रात में आएगा… इसी सोच में जोगेंद्र बाबू डरे जा रहे थे लेकिन इतिहास कमजोरों का नहीं, योद्धाओं का लिखा जाता है। शैली ने बिना किसी डॉक्टर, बिना किसी दाई की मदद के उस रात एक योद्धा जना। योद्धा ऐसा जिसने अपने बाप को गोद लेते वक्त ही किक मार कर अपने इरादे जता दिए थे!
लक्षेंद्र मिश्रा – संस्कृत के महाविद्वान जोगेंद्र बाबू ने अपने किकधारी बेटे का यही नाम रखा था। नाम के अनुरूप यह बालक हर लक्ष्य को भेद देता था। दिक्कत एक ही थी। पढ़ाई-लिखाई वाले मामले में इसे किताब-कॉपी दिखती ही नहीं थी। स्कूल के मैदान में लेकिन जब भी उतरता लक्षेंद्र, किक मार-मार कर छक्के छुड़ा देता था।
छोटे से कद-काठी का लक्षेंद्र मिश्रा अपने से बड़ी उम्र के लड़कों को मैदान पर ऐसे छकाता जैसे वो उनका मजाक उड़ा रहा हो। बड़े लड़के इसका बदला कभी पैर फँसा कर उसे गिरा कर लेते तो कभी केहुनी से मार कर। लक्षेंद्र योद्धा था, उसने कभी शिकायत नहीं की। मार खाकर भी खेलता और हरा कर मुस्कुरा भर देता।
बदला लेने के लिए बड़े लड़कों ने एक ग्रुप बना लिया। इनका सरगना था दिलीप मंडल। मंडल दिमाग से तेज था। उसने एक षड्यंत्र रचा – लक्षेंद्र और उसके पूरे परिवार के अस्तित्व पर सवाल खड़ा करने का। कहानी गढ़ी कि जोगेंद्र मिश्रा भारतीय ही नहीं हैं। इनके पुरखे यूरेशिया से असम आए थे। षड्यंत्र के तहत इस कहानी को फैलाया गया, प्रचारित-प्रसारित किया गया। बालक लक्षेंद्र का अटैक दिलीप मंडल के डिफेंस को इस बार ध्वस्त नहीं कर पाया। इस खेल में वो हार गया।
असम में बसा-बसाया आशियाना छोड़ पुत्र-मोह में जोगेंद्र मिश्रा अपनी धर्मपत्नी शैली के साथ पड़ोसी राज्य बंगाल की ओर चले। सुना था वहाँ के फुटबॉल दीवानों की बातें। सोचा होगा कि बेटे की प्रतिभा को पंख लगेंगे। ऐसा हो न सका। वो इसलिए क्योंकि दिलीप मंडल के पुरखे बंगाल में वामपंथ की पढ़ाई करने गए थे और अब वहीं से पूरी दुनिया में लाल सलाम को एक्सपोर्ट करते थे। मंडल और बंगाल ने लक्षेंद्र मिश्रा को उसके ही देश में विदेशी बना डाला।
लक्षेंद्र मिश्रा योद्धा था। हार उस पर हावी हो, यह उसने सीखा ही नहीं था। अंडल-मंडल के सारे षड्यंत्रों को किक मार वो चल दिया पूरे परिवार सहित अर्जेंटीना। नई पहचान के लिए जोगेंद्र बन गए जॉर्ज (Jorge Messi) और सिलिया (Celia Cuccittini) नाम रख लिया माता शैली ने।
फुटबॉल विश्व कप का 22वाँ संस्करण अर्जेंटीना ने जीता। कप्तानी लियोनेल मेसी (Lionel Messi) की। दुनिया भर की मीडिया मेसी के गुनगान कर रही है। उसके खेल की तारीफ की जा रही है। वो कितने पैसे कमाता है, इस पर लेख लिखे जा रहे… लेकिन कोई यह नहीं बता रहा कि लक्षेंद्र मिश्रा किन कठिनाइयों में लियोनेल मेसी बना, भारत और असम से कितना घना रिश्ता है उसका… मीडिया वाले ये भी छिपा ले रहे कि अगर दिलीप मंडल और वामपंथियों की नहीं चलती तो फुटबॉल विश्व कप आज भारत में होता!
Who said he is from assam!! He is from south india and his name is messi'ndra' Thalapathy. pic.twitter.com/TQy1Y3AlVx
पंजाब के बठिंडा जिले के मौर विधानसभा क्षेत्र से आम आदमी पार्टी के विधायक सुखवीर मैसर खाना (Sukhveer Maiser Khana) ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर कर खुद ही अपनी फजीहत करवा ली। दरअसल, शुक्रवार (16 दिसंबर 2022) को मैसर खाना को 9-10 घंटे तक कोई फोन नहीं आया, जिसके बाद उन्होंने खराब कनेक्शन को लेकर शिकायत की, लेकिन बाद में पता चला कि उन्होंने अपना फोन फ्लाइट मोड पर रखा हुआ था।
यही नहीं मैसर खाना ने अपनी आपबीती अपने फेसबुक पर भी साझा की। उन्होंने लिखा, “मुझे समझ नहीं आ रहा है कि पिछले 9-10 घंटों से मेरे फोन से कोई आवाज क्यों नहीं आ रही है और जा रही है। मैं बहुत परेशान हूँ। अन्य सभी साथियों के एयरटेल सिम ठीक से काम कर रहे हैं। मैंने इसे डीसी बठिंडा के संज्ञान में लाया है।” मैसर के इस पोस्ट पर भाजपा नेता तजिंदर बग्गा ने कमेंट किया और बोले कि इस बारे में राष्ट्रपति से भी शिकायत कर दो।
एयरटेल इंडिया ने समस्या के बारे में पूछताछ करने और इसे हल करने में विधायक की सहायता करने के लिए उनके पोस्ट पर तुरंत जवाब दिया। उन्होंने लिखा, “आपकी मदद के लिए हम हाजिर हैं। कृपया इनबॉक्स के माध्यम से अपनी समस्या बताएँ और अपना एयरटेल नंबर साझा करें, ताकि हम आपकी सहायता कर सकें।” हालाँकि, तब तक उनकी पोस्ट पर सैकड़ों लोग मजे ले चुके थे।
एयरटेल इंडिया ने विधायक की मदद करने के लिए उनके पोस्ट पर तुरंत जवाब दिया। (फोटो साभार: सुखवीर मैसर खाना)
द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, विधायक के फोन में कोई समस्या नहीं थी। उन्होंने फोन कॉल रिसीव करने से बचने के लिए उसे खुद ही फ्लाइट मोड पर रख दिया था। आम आदमी पार्टी के विधायक से जुड़ी यह मजेदार घटना सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद बीजेपी नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा भी मैसर खाना का मजाक उड़ाने से खुद को नहीं रोक पाए।
तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर लिखा, “आप विधायक ने डीसी से शिकायत की, क्योंकि उनके मोबाइल का नेटवर्क काम नहीं कर रहा था। बाद में उन्हें पता चला कि उनका फोन फ्लाइट मोड में है।”
AAP MLA filed a complaint to DC because his mobile network was not working. Later he got to know his phone was in flight mode pic.twitter.com/jyIEcjuE3v
बता दें कि आप विधायक सुखवीर मैसर खाना द्वारा अपने फोन की सेटिंग बदलने के बाद जल्द ही उनकी ‘समस्या’ हल हो गई थी। लेकिन विधायक अपनी कनेक्टिविटी समस्याओं के हल होने का उल्लेख किए बिना अपने पेज से अन्य अपडेट पोस्ट कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी के विधायकों को तकनीकी ज्ञान न होना अधिकारियों के लिए सिरदर्द बन गया है।