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कहीं खून से मिट्टी हुई लाल, कहीं निकले सैंकड़ों कंकाल… : पढ़ें 1971 के 10 हिंदू नरसंहार; जब बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजाद कराने में गई थी हजारों जान

16 दिसंबर 1971। शाम 4.35 बजे। ये वही पल था जब भारतीय सेना के पराक्रम का लोहा पूरी दुनिया ने माना। पाकिस्तान के लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने 93 हजार सैनिकों के साथ भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया और भारतीय सेना की बहादुरी की वजह से दुनिया में एक नए देश बांग्लादेश का जन्म हुआ। जनरल नियाजी ने लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। हालाँकि बांग्लादेश को पाकिस्तान से मिली यह मुक्ति इतनी सरल न थी। इससे पहले पाकिस्तानी सेना से खूनी खेल खेला और रूह कंपा देने वाले जुल्म किए। न सिर्फ बंगलादेशी बल्कि कई भारतीय भी बांग्लादेश को पाकिस्तान से मुक्ति दिलाने में अपना योगदान दे रहे थे जिसके चलते उन्हें भी पाकिस्तानी सेना के जुल्मों का शिकार होना पड़ा। ऐसी ही 10 दर्दनाक घटनाओं का जिक्र आज हम करने जा रहे हैं…

फरीदपुर नरसंहार : जब 10 हजार हिंदुओं को मारकर उनकी संपत्तियों पर लिख दिया ‘H’

इस नरसंहार के बारे में दुनिया को 4 जुलाई 1971 को पता चला था, जब न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस संबंध में रिपोर्ट छापी थी। फरीदपुर में अंजाम दिए गए इस नरसंहार में पाकिस्तानी फौज ने हिन्दुओं को विशेष तौर पर चिह्नित कर उनका कत्लेआम किया था। तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के केंद्र में स्थित फरीदपुर में हिंदुओं के दमन की एक व्यवस्थित मुहिम चलाई गई थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि पाकिस्तानी फौज ने हिंदुओं की पहचान करने के लिए उनकी संपत्तियों पर पीले रंग में बड़े अक्षरों में ‘H’ लिखा था। इस रिपोर्ट के मुताबिक फरीदपुर में 10,000 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया गया था।

हिंदुओं के खिलाफ पाकिस्तानी फौज के इस अभियान को ‘फरीदपुर कैम्पेन’ कहा जाता है। यह कैम्पेन 21 अप्रैल 1971 को शुरू हुआ था। पाकिस्तानी फौज ने जैसे ही फरीदपुर में प्रवेश किया उन्हें श्री आँगन आश्रम से भजन.कीर्तन की आवाज सुनाई दी। पाकिस्तानी फौज को देख कई साधु वहाँ से भाग निकले लेकिन 9 ब्रह्मचारी संतों ने भागना स्वीकार नहीं किया। सेना उन सभी 9 संतों को खींचकर बाहर लाई। वहाँ से बच निकले एक संत नबकुमार ब्रह्मचारी ने बताया था कि सभी संतों को एक लाइन में खड़ा करके पाकिस्तानी फौज ने एक-एक को 12 गोलियाँ मारी थी।

अटायकुला नरसंहार : 35 महिलाओं का रेप, 52 पुरुषों की हत्या

पाकिस्तानी सेना की बर्बरता की कहानी आज भी अटायकुला में जीवित है। जिन 35 महिलाओं का रेप किया गया था, उनमें नीवा पॉल एक थीं। बकौल नीवा, “बात 25 अप्रैल 1971 की है। पंजाबियों ने हमारे गाँव को घेर लिया था। मैं अपने पति के साथ थी। तीन लोगों ने दरवाजा तोड़कर मेरे पति को उठाया। उस समय मैं दो बच्चों की माँ थी। उन्होंने मुझे कस कर पकड़ा कि मैं भाग नहीं पाई। काश मैं वहाँ से निकल पाती। पाकिस्तानियों ने मेरे पति को मारा। मैं उस समय प्रेगनेंट थी। उन्होंने मेरे पेट पर मारा। जिसके बाद मुझे एक मृत बच्चे को जन्म देना पड़ा।”

स्थानीय लोग 1971 के उस दौर को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे अटायकुला में 6 नावों पर बैठकर 150 पाकिस्तानी नदी पार कर आए और जोगेंद्रनाथ पाल के आँगन में 60 पुरुषों को खड़ा किया। इसके बाद सारे पुरुषों को दो पंक्ति में बाँटा गया। एक जो अपना पैसा और सोना मर्जी से देने को तैयार हो गए और दूसरे वो जिन्होंने मना कर दिया। सेना ने पहले उन पर गोली चलाई जो पैसा नहीं दे पाए। 60 पुरुषों में से कुल 8 बचे।

6 जून 1971 : मारवाड़ियों के साथ विश्वासघात की रात

पाकिस्तानी सेना ने मारवाड़ियों के साथ 6 जून 1971 जो विश्वासघात किया था, जिन्हें शायद ही कभी मारवाड़ी भूल पाएँगे। पाकिस्तानी सेना ने मारवाड़ी समुदाय के लोगों को यह विश्वास दिलाया था कि उन्हें एक ट्रेन के माध्यम से भारत वापस भेज दिया जाएगा। ट्रेन को चिल्हाटी सीमा होते हुए पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी की तरफ जाना था। ट्रेन बमुश्किल 2 किलोमीटर चली और आधीरात को सुनसान स्थान पर रोक दिया गया। बकौल इंडिया टुडे, ट्रेन को बिहारी मुस्लिम और पाकिस्तानी सैनिकों ने घेर लिया और दरवाजे बाहर से बंद कर दिए। महिलाओं के साथ बलात्कार किया। ट्रेन में बंद पुरुषों को गोलियों से भून डाला गया और सुबह होते-होते ट्रेन एक कब्रगाह में तब्दील हो चुका था।

सोहागपुर : वह गाँव जिसे पाकिस्तानी सेना के कत्लेआम ने बनाया ‘विधवाओं का गाँव’

25 जुलाई 1971 की रात। बांग्लादेश का सोहागपुर गाँव। पाकिस्तानी सेना ने उस रात 164 पुरुषों की हत्या की और 57 महिलाओं का बलात्कार किया। यह सब बंगालियों का नामोनिशान मिटा देने की रणनीति का हिस्सा था। इस गाँव को आज भी ‘विधवाओ का गाँव’ कहा जाता है। पाकिस्तानी सेना ने यहाँ बड़े पैमाने पर पुरुषों का नरसंहार किया, जिससे कई महिलाओं को विधवा का जीवन गुजरना पड़ा। 2014 में अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण ने इन अपराधियों में से एक को मौत की सजा सुनाई। इसके बाद कुछ महिलाओं ने अपनी आपबीती बताई कि किस तरह से उनपर अत्याचार किया गया था।

20 मई 1971 : जब पाकिस्तानी सैनिकों ने 10,000 शरणार्थियों को मार डाला

पाकिस्तानी सैनिकों ने 25 मई 1971 को अपनी क्रूरता की कहानी लोगों के खून से लिखी थी। पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे बांग्लादेश के चुकनगर गाँव में पाकिस्तानी सैनिकों ने एक बहुत बड़े नरसंहार को अंजाम दिया था। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक इस नरसंहार में भारत आने की कोशिश करने वाले 10 हजार से ज्यादा शरणार्थियों को मौत के घाट उतार दिया गया था। बताया जाता है कि घटना में भद्र नदी हजारों मासूमों के रक्तों से लाल हो गई थी। यहाँ के दलदली इलाके से लेकर मंदिरों, खेल के मैदानों, स्कूल परिसर और नदियों तक, हर जगह बेजान लाशें बिखरी पड़ी थीं।

26 मई 1971 : पाकिस्तानी सैनिकों ने 94 हिंदुओं को गोली मारी, फिर जलाया

पाकिस्तानी सैनिक मुक्ति संग्राम को दौरान अपने कट्टर इस्लामवादी सोच के चलते हिंदुओं को चुन-चुन कर मारते थे। कई दफे मुस्लिमों को चुनकर अलग कर दिया जाता था और हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया जाता था। ऐसी ही एक घटना बांग्लादेश के सिलहट जिले में घटी, जहाँ बुरुंगा गाँव के बुरुंगा हाई स्कूल में न सिर्फ 94 हिंदुओं को मार डाला गया बल्कि मौत सुनिश्चित करने के लिए जला भी दिया गया। इन्हें मारने से पहले इनके हाथ बाँध दिए गए थे। दरअसल शांति समिति का पहचान पत्र के बहाने हिंदुओं और मुसलमानों को अलग-अलग कर दिया गया था। हिंदुओं को स्कूल के कार्यालय कक्ष में ले जाया गया, जबकि मुसलमानों को एक दूसरी क्लास में रखा गया। दोनों समूहों को कलमा सिखाया गया और पाकिस्तान का राष्ट्रगान गाने को कहा गया। इसके बाद मुसलमानों को जाने दिया गया, और हिंदुओं को मार डाला गया।

मीरपुर नरसंहार : पम्प हाउस से मिले सैकड़ों कंकाल

1971 में मीरपुर में हुए कत्लेआम का पता 1991 में तब चला, जब यहाँ पंप हाउस से 70 से अधिक कंकाल और 5,000 से अधिक हड्डियाँ बरामद हुई। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार इनकी हत्या पाकिस्तानी सेना और बिहार से बांग्लादेश आकर बसे मुस्लिमों ने की थी। पाकिस्तानी सेना ने यहाँ हजारों लोगों को इस दौरान मौत की नींद सुला दिया। इनमें से कइयों के सिर काट दिए गए और उनके शवों को पंप हाउस के पास स्थित कुएँ में फेंक दिया गया।

श्रीमंगल चाय बगान नरसंहार : जब खून से लाल हो गई थी मिट्टी

1 मई, 1971 को मौलवी बाजार के श्रीमंगल उपजिला की किराए के चाय बागान में इस नरसंहार को अंजाम दिया गया था। नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी भानु हाजरा ने बताया कि उस दिन बगान से गोली की लगातार आवाज आ रही थी। इस घटना से कुछ दिन पहले उसके पिता की पाकिस्तानी जवानों ने हत्या कर दी थी। हाजरा ने बताया कि जैसे ही वह दोबारा बगान गया तो वहाँ की मिटटी खून से लाल पड़ी थी और 47 मजदूर की मौत हो चुकी थी।

डकरा नरसंहार : जहाँ हिंदुओं को चुन-चुन कर मारी गई गोली

21 मई 1971 की रात इस नरसंहार को अंजाम दिया गया था। जगह रामपाल उपजिला के पेरीखली संघ के डकरा गाँव। यहाँ पाकिस्तानी सेना के सहयोगी रज्जाब अली फकीर की रजाकार बाहिनी सेना ने 600 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया था। चुन-चुन के हिंदुओं के घरों की तलाशी ली गई और उन्हें गोली मार दी गई। सैकड़ों हिंदू दरअसल वहाँ सुंदरबन के रास्ते भारत जाने के लिए मंगला नदी के समीप इकट्ठे हुए थे। वहाँ के मुस्लिम रजाकार ने हिन्दुओं को सुरक्षित रखने का भरोसा भी दिलाया, लेकिन यह भरोसा पीठ में खंजर घौपने जैसा था। रज्जाब अपनी सेना लेकर आया और 600 हिंदुओं की हत्या कर दी।

पाकिस्तानी सेना ने सैकड़ों बुद्धिजीवियों का अपहरण किया, प्रताड़ित कर हत्या की

पाकिस्तानी सेना ने उस दौरान कई बुद्धिजीवियों की हत्या की। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, कुल मिलाकर ऐसे 1,111 लोगों की हत्या की गई थी। उनमें से 991 शिक्षाविद, 13 पत्रकार, 49 डॉक्टर, 42 वकील और कलाकार और 16 इंजीनियर थे। एक ही दिन 14 दिसंबर 1971 को करीब 200 पढ़े-लिखे और विरोध करने वाले लोगों का अपहरण कर लिया गया और उन्हें विभिन्न यातनागृह में ले जाकर मार डाला गया। इनमे से कई के क्षत-विक्षत शव कई दिन बाद बरामद किए गए।

‘…इनको पीटें और देशभक्ति का पाठ पढ़ाएँ’: राहुल गाँधी के ‘सेना’ वाले विवादित बयान पर लोग भड़के, BJP नेता सिरसा बोले- मेरा तो खून खौल रहा है

अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीनी सैनिकों के साथ झड़प को लेकर कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) के बयान से विवाद पैदा हो गया है। राहुल गाँधी ने कहा था कि चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है और केंद्र की मोदी सरकार सो रही है। इतना ही नहीं, राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि चीन भारतीय जवानों के पीट रहा है और देश के 2,000 किलोमीटर वर्ग स्क्वॉयर पर कब्जा कर लिया है।

इस बयान पर भाजपा (BJP) के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा (Manjinder Singh Sirsa) ने राहुल गाँधी को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा कि भारतीय सेना को लेकर राहुल गाँधी का दिया गया बयान बेहद घटिया है। इसके घटिया बयान कुछ और नहीं हो सकता।

मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा, “राहुल गाँधी कह रहे हैं कि हमारे देश के बहादुर सैनिक चीनी सैनिकों के हाथों अरुणाचल प्रदेश में पिट रहे हैं। उनके इस बयान को सुनकर मेरा खून खौल रहा है। राजनीति में ये सबसे निचले स्तर की भाषा और स्टेटमेंट है।”

उन्होंने आगे कहा, “ऐसी देश विरोधी बातें करने के लिए सोनिया गाँधी और प्रियंका गाँधी को राहुल गाँधी की पिटाई करनी चाहिए, ताकि उनके परिवार के चश्मे-चिराग को कुछ अकल आए और देश के लिये थोड़ी वफ़ादारी आए।” उन्होंने कहा कि एक माँ-बहन का फर्ज होता है अपने बेटे और भाई को देशभक्ति का पाठ पढ़ाना।

भाजपा नेता प्रीति गाँधी ने भी राहुल गाँधी पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “पूरे देश ने भारतीय सैनिकों द्वारा चीनी सैनिकों की पिटाई के दृश्य देखे, लेकिन हमेशा की तरह राजनीतिक लाभ के लिए राहुल गाँधी काल्पनिक कहानियाँ गढ़ेंगे और हमारे जवानों की वीरता पर सवाल उठाएँगे। राहुल गाँधी, क्या आपको एहसास है कि भारतीय सेना के लिए आपके शब्द कितने निराशाजनक हैं?”

भाजपा के प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा, “राहुल गाँधी को एक बार फिर हमारे सशस्त्र बलों की बहादुरी पर संदेह है! सर्जिकल स्ट्राइक के लिए खून की दलाली और फ़र्ज़िकल स्ट्राइक कहने के बाद अब गलवान और तवांग में शौर्य पर संदेह। राहुल कहते हैं ‘पिट के आ गए अरुणाचल प्रदेश में’। CCP = कॉन्ग्रेस का चीन प्रोपेगेंडा! यह समझौता और धन प्रभाव है।”

भाजपा नेता अमित मालवीय ने कहा, “बिलावल भुट्टो जरदारी और राहुल गाँधी में जबरदस्त समानता है। दोनों ही वंशवादी, अक्खड़ और बदमिजाज हैं। एक जैसी भाषा बोलते हैं। पीएम मोदी को निशाना बनाने के लिए एक जैसे शब्दों और मुहावरों का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें आपस में क्या जोड़ता है? शायद भारत के लिए उनकी नफरत, जो लगातार बढ़ रही है।”

AAP नहीं होती तो कॉन्ग्रेस BJP को हरा देती: गुजरात चुनाव पर राहुल गाँधी का बयान; चीन विवाद पर भी बोलकर फँसे, भाजपा नेता ने दिलाई ‘नाना’ की याद

भारत जोड़ो यात्रा पर निकले कॉन्ग्रेस (Congress) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने कहा कि अगर आम आदमी पार्टी (AAP) मैदान में नहीं होती तो भाजपा (BJP) चुनाव हार जाती है। इतना ही नहीं, उन्होंने केंद्र सरकार पर चीन से संबंधित तथ्यों को छिपाने का भी आरोप लगाया।

हाल ही में संपन्न हुए गुजरात विधानसभा चुनावों को लेकर राहुल गाँधी ने कहा कि अगर गुजरात में AAP नहीं होती तो कॉन्ग्रेस BJP को हराने की स्थिति में होती। बता दें कि इस बार के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने 182 सीटों में से 17 सीटें हासिल की हैं। गुजरात में कॉन्ग्रेस के इतिहास की यह सब कम सीटें हैं।

AAP को भाजपा का ‘टीम’ बताते हुए राहुल गाँधी ने उस पर BJP से साँठ-गाँठ का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि दोनों दलों ने मिलकर राज्य में कॉन्ग्रेस की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुँचाया है। हालाँकि, AAP ने राहुल गाँधी के इन आरोपों से इनकार किया है।

उधर अरुणाचल प्रदेश के तवांग में चीनी सैनिकों के साथ झड़प को लेकर राहुल गाँधी ने केंद्र पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “चीन पर सरकार चीजों को छिपाने की कोशिश कर रही है, लेकिन इसे छिपाया नहीं जा सकता। हिंदुस्तान की सरकार सोई हुई है। चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है। हमारे विदेश मंत्री को अपनी समझ गहरी करनी चाहिए।”

राहुल गाँधी ने कहा, अगर चीन के वैपन का पैटर्न देखें तो पता चलेगा कि वो युद्ध की तैयारी कर रहे हैं। हमारी सरकार इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही है। भारत सरकार स्ट्रैटिजिकली काम नहीं कर रही है। मैंने 3-4 बोला है कि सावधान रहना चाहिए, जो हो रहा है उसे समझना चाहिए।

इस बयान को लेकर पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने राहुल गाँधी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा, “राहुल गाँधी के नाना जी सो रहे थे और सोते-सोते उन्होंने भारत का 37,000 स्क्वॉयर किलोमीटर क्षेत्र गँवा दिया। उसके बाद राहुल गाँधी को लगा कि चीन से मित्रता करनी चाहिए और अब मित्रता इतनी गहरी है कि चीन क्या करने वाला है, ये उन्हें पता है।”

‘हिन्दू नेता को मारने की पहले से थी साजिश, सुरक्षा माँगने पर भी नहीं मिली’: कमलदेव गिरी हत्याकांड में झामुमो MLA पर आरोप, पुलिस बोली- सबूत दो

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में शनिवार (12 नवम्बर, 2022) को हिन्दू नेता कमलदेव गिरी की बोतल बम फेंक कर हत्या कर दी गई थी। उनके परिवार ने जाँच कर रही झारखंड पुलिस पर अविश्वास जताया है। दिवंगत कमलदेव के परिजन हत्याकांड में सत्ताधारी झारखंड मुक्ति मोर्चा विधायक सुखरमा उराँव को मुख्य साजिशकर्ता के तौर पर बता रहे हैं। वहीं पलिस ने अपनी तरफ से निष्पक्ष कार्रवाई किए जाने की जानकारी दी है।

पहले ही चेताया था प्रशासन को

दिवंगत कमलदेव के भाई फूलनदेव गिरी ने ऑपइंडिया से बात की। उन्होंने बताया कि उनके भाई कमलदेव ने अपनी हत्या से कुछ समय पहले ही स्थानीय प्रशासन को अपने खिलाफ चल रही साजिश की जानकारी दी थी। फूलनदेव के मुताबिक लिखित शिकायत में उन्होंने जिन लोगों के नाम डलवाए थे वो स्थानीय झामुमो विधायक के ही करीबी थे। फूलनदेव के मुताबिक अपने ऊपर हमले की आशंका को देखते हुए उनके भाई ने प्रशासन से शस्त्र लाईसेंस और सुरक्षा की माँग की थी लेकिन इन दोनों माँगों पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया। बकौल फूलनदेव उनके भाई की शिकायत पर प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया और यही अनदेखी उनके भाई की हत्या की वजह बनी।

बढ़ते कद से जलन थी झामुमो विधायक को

फूलनदेव गिरी ने अपने भाई की हत्या का मुख्य साजिशकर्ता खुले तौर पर स्थानीय झामुमो विधायक सुखराम उराँव को बताया। उन्होंने बताया कि कमलदेव गिरी का बढ़ रहा कद और समाज में सम्मान सुखराम को पंसद नहीं था। हमसे बातचीत के दौरान फूलनदेव ने अपने मृतक भाई कमलदेव को विधायक सुखराव उराँव के विपत्ति का साथी बताया। फूलनदेव के मुताबिक जब सुखराम विधायक नहीं थे तब उनके भाई कमलदेव उनके साथ रहा करते थे और कई बार खुद को संकट में डाल कर उन्होंने सुखराम की रक्षा की थी। हमें बताया गया कि कई मौकों पर कमलदेव ने विधायक सुखराम की हिन्दू विरोधी नीतियों का विरोध किया था जो उन्हें पसंद नहीं आया था।

अनशन पर है परिवार

कमलदेव के भाई फूलनदेव का कहना है कि अनशन में उनके परिवार और रिश्तेदार मिला कर 1 दर्जन लोग लगातार और समर्थक आदि मिला कर लगभग 50 से 100 लोगों की संख्या अक्सर रहती है जो कम-ज्यादा होती रहती है। 16 दिसंबर 2022 को हमें अनशन का 14 वाँ दिन बताया गया।

इसलिए चाहिए CBI जाँच

CBI जाँच की जरूरत पर जब हमारे द्वारा सवाल किया गया तब कलमदेव के भाई ने बताया कि हत्या की तैयारी सुनियोजित थी। जिस DIG अजय लिंडा के अधीनस्थ उनके जिले का पुलिस प्रशासन है उन पर भी फूलनदेव गिरी ने सवाल खड़े किए। फूलनदेव ने कहा कि DIG अजय लिंडा वर्तमान बिशुनपुर से झामुमो विधायक चमरा लिंडा के भाई हैं और पश्चिम सिंहभूम जिले के लगभग 4 साल पहले SP भी रह चुके हैं। DIG अजय लिंडा पर सवाल उठाते हुए फूलनदेव ने कहा कि उनके SP रहते कमलदेव गिरी को कोरोना उललंघन का नोटिस देने 60 पुलिसकर्मी भेजे गए थे।

फूलनदेव ने कहा कि पिछले साल काशी विश्वनाथ मामले में उनके जिले में 3 मुस्लिमों ने शिवलिंग पर गंदी टिप्पणी की थी जिसमें स्थानीय पुलिस मामले को दबाने की बहुत कोशिश की थी। बकौल फूलनदेव तब उनके भाई कमलदव ने आंदोलन की चेतावनी दी थी जिसके बाद सभी आरोपितों को पकड़ा गया था। फूलनदेव का आरोप है कि तब पुलिस वाले लगातार कमलदेव पर मामले में कम्प्रोमाइज करने का दबाव बना रहे थे।

नज्जू अंसारी के खिलाफ धमकी देने की शिकायत

फूलनदेव गिरी के मुताबिक उनके साथ धरने में शामिल एक समर्थक को विधायक सुखराम उराँव के सहयोगी नज्जू अंसारी द्वारा दी गई धमकी के मामले में स्थानीय SHO को जानकारी दे दी गई है। हमें बताया गया कि नज्जू अंसारी विधायक के संरक्षण में तमाम गैर कानूनी काम करता है। फूलनदेव के मुताबिक उन्होंने जिले के DC को अज्ञात नाम से शिकायत दी थी।

पुलिस कर रही निष्पक्ष कार्रवाई

कमलदेव गिरी के भाई के तमाम आरोपों पर ऑपइंडिया से बात करते हुए जिले के एडिशनल SP कपिल चौधरी ने बताया कि पुलिस पर कोई भी दबाव नहीं है और कलमदेव हत्याकांड की जाँच निष्पक्ष और एकदम सही दिश्य में चल रही है। ASP चौधरी के मुताबिक मामले में गिरफ्तारियाँ पक्के सबूतों के आधार पर हो रही हैं और जिसके भी खिलाफ प्रमाण मिलेंगे उसे पकड़ा जाएगा। परिजनों द्वारा विधायक की संलिप्तता के आरोपों पर कपिल चौधरी ने कहा कि इन आरोपों के समर्थन में अब तक एक भी सबूत नहीं मिला है। इसी के साथ उन्होंने आगे कहा कि यदि पीड़ित परिवार के पास विधायक की संलिप्तता के कोई ठोस सबूत हों तो हमें सौंपे जिस पर हम जाँच के बाद कार्रवाई करेंगे।

विधायक सुखराम ने नहीं उठाया फोन

ऑपइंडिया ने कमलदेव के परिजनों के आरोपों पर जवाब माँगने के लिए स्थानीय झामुमो विधायक सुखराम उराँव को कई बार सम्पर्क किया लेकीन फोन उठा नहीं। विधायक सुखराम का बयान आने के बाद इस खबर में अपडेट किया जाएगा।

नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर काटा गया था उमेश कोल्हे का गला, अब NIA ने दाखिल की चार्जशीट: अब्दुल, शोएब, यूसुफ समेत 11 का नाम

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने शुक्रवार (16 दिसंबर 2022) को महाराष्ट्र स्थित अमरावती के केमिस्ट उमेश कोल्हे (Umesh Kolhe) हत्याकांड में चार्जशीट दायर कर दी। इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद विवाद में कट्टरपंथियों ने उमेश कोल्हे की हत्या कर दी थी। इस मामले में 11 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। इनके खिलाफ मुंबई के NIA कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई है।

जानकारी के मुताबिक, एनआईए ने जिन आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट फाइल की है उनमें मुबशिर अहमद, शाहरुख खान, अब्दुल तौसीफ शेख, मोहम्मद शोएब, आतिब राशिद, यूसुफ खान, इरफान खान, अब्दुल अरबाज, मुस्फीक अहमद, शेख शकील और शाहिम अहमद के नाम शामिल हैं।

आपको बता दें कि उमेश कोल्हे हत्याकांड के संबंध में महाराष्ट्र के अमरावती जिले के सिटी कोतवाली पुलिस स्टेशन में 22 जून 2022 को मामला दर्ज किया गया था। जब मामले की जाँच NIA को सौंपी गई तब इस संबंध में 2 जुलाई 2022 को एनआईए ने फिर से मामला दर्ज किया गया था।

अमरावती में 22 जून 2022 को मुस्लिम हमलावरों ने उमेश कोल्हे की गला काटकर मौत के घाट उतार दिया था। उमेश ‘अमित मेडिकल’ के नाम से फार्मेसी चलाते थे। घटना की रात वे अपने बेटे संकेत और बहू वैष्णवी के साथ अलग-अलग बाइक से घर जा रहे थे, तभी हमलावरों ने कोल्हे की गर्दन पर पीछे से चाकू से हमला कर दिया था।

उमेश कोल्हे की हत्या निलंबित भाजपा नेता नूपुर शर्मा का समर्थन करने की वजह से इस्लामिक कट्टरपंथियों ने की थी। कहा जाता है कि उमेश कोल्हे ने नूपुर शर्मा के समर्थन में कोई पोस्ट सोशल मीडिया पर शेयर कर दी थी। इसके बाद से इस्लामिक कट्टरपंथी उनके पीछे पड़े हुए थे।

उमेश की हत्या मामले में मुख्य साजिशकर्ता यूसुफ नाम का एक डॉक्टर है, जो उमेश और उनके परिवार का दशकों पुराना जानकार है। उमेश से उसकी दोस्ती भी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उमेश उसे 2006-07 से जानते थे। यूसुफ ने ही कोल्हे की पोस्ट संदिग्ध व्हॉट्सग्रुप में शेयर कर कट्टरपंथियों को हत्या के लिए उकसाया था। इसके बाद हत्या की प्लानिंग की थी।

‘रात में आती है चीखने की आवाज, कुछ को अपना घर भी नहीं याद’: 1971 युद्ध के बाद जो नहीं लौटे, Missing-54 के पाकिस्तानी जेलों में होने के कई सबूत

51 साल पहले, 16 दिसंबर, 1971 को भारतीय सेना ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध जीता था। पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के आगे अपनी हार स्वीकारते हुए बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बाद ही बांग्लादेश का जन्म हुआ था। इससे पहले इसे पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना जाता था। कोई भी भारतीय पाकिस्तानी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल आमिर अब्दुल्ला खान नियाजी (Lt-Gen AAK Niazi) के ढाका में आत्मसमर्पण पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए प्रसिद्ध तस्वीर को नहीं भूल सकता।

लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, वाइस एडमिरल एन कृष्णन, एयर मार्शल एचसी दीवान, लेफ्टिनेंट जनरल सगत सिंह, मेजर जनरल जेएफआर जैकब और एफएलटी लेफ्टिनेंट कृष्णमूर्ति इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने थे। इन सभी ने भारत की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय भारतीय सेना ने पाकिस्तान के 93,007 लोगों को युद्धबंदी बनाया था, जिनमें से 72,795 पाकिस्तानी सैनिक थे। बाद में उन सभी को शिमला समझौते के अनुसार और युद्धबंदियों पर जिनेवा कन्वेंशन के प्रावधानों के तहत वापस पाकिस्तान भेज दिया गया था।

भारत ने एक महान देश के रूप में अपना कर्तव्य पूरा किया, जबकि पाकिस्तान ने इसके ठीक विपरीत किया। पिछले 51 वर्षों से, भारत अपने 54 सैनिकों, अधिकारियों और लड़ाकू पायलटों के ठिकाने की जानकारी मिलने का इंतजार कर रहा है। 54 भारतीय सैनिक पाकिस्तान की जेलों में कैद हैं। भारत सरकार ने उन्हें ‘मिसिंग इन एक्शन’ के रूप में चिह्नित किया है। अफसोस की बात है कि पाकिस्तानी सरकार ने देश में 54 युद्धबंदियों के होने से बार-बार इनकार किया है।

उल्लेखनीय है कि 1989 में पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के वकील को सूचित किया गया था कि जिस जेल में भुट्टो लाहौर में बंद थी, उसी जेल में युद्धबंदी हैं। इस घटना का उल्लेख एक किताब में मिलता है, लेकिन बाद में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने किसी भी युद्धबंदी के वहाँ होने की बात को सिरे से खारिज कर दिया था।

तब से मिसिंग 54 को भारत वापस लाने की कोशिश जारी है। मिसिंग 54 को लेकर कई प्रश्न उठे हैं। इनमें से एक यह है कि पाकिस्तान कैसे भारतीय युद्धबंदियों को कथिततौर पर अवैध हिरासत में रखने में कामयाब रहा। ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) हरवंत सिंह ने इंडिया टुडे को बताया कि 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तान के अधिकारियों ने दोषपूर्ण विवरण के साथ दस्तावेजीकरण किया था, जब भारतीय सैनिकों को युद्धबंदी बनाया गया। उन्होंने कहा, “हमने इस मुद्दे को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री के सामने उठाया था, जिन्होंने परवेज मुशर्रफ से बात की थी, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। उचित दस्तावेजों का अभाव उन्हें हिरासत में लिए जाने के लिए जिम्मेदार था। अगर पाकिस्तान के अधिकारियों ने उनका दस्तावेजीकरण ठीक से किया होता, तो उनका पता लगाया जा सकता था और उनके परिवारों को दशकों तक दुखी नहीं होना पड़ता।”

मिसिंग 54 और उनके परिवारों के बारे में अनगिनत कहानियाँ बताई जानी चाहिए। बीबीसी के सौतिक बिस्वास द्वारा 2020 में लिखी गई एक रिपोर्ट के अनुसार, एक वरिष्ठ भारतीय पत्रकार चंदर सुता डोगरा ने मिसिंग 54 की कुछ कहानियों का पता लगाया। डोगरा ने उल्लेख किया कि 1990 के दशक में निचली अदालत में एक याचिका के जवाब में भारत सरकार ने जिक्र किया कि मिसिंग 54 सैनिकों में से 15 की मृत्यु की पुष्टि हुई थी। हालाँकि, आज सरकार का कहना है कि सभी 54 अभी भी लापता हैं।

पाकिस्तानी जेलों में भारतीय युद्धबंदियों की कई रिपोर्ट्स आई हैं। बीबीसी ने नोट किया 1965 के युद्ध में लापता हुए एक वायरलेस ऑपरेटर के परिवार को भारतीय सेना ने बताया था कि उसकी ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो गई थी। हालाँकि, 1974 और 1980 के दशक की शुरुआत में, सरकार और परिवार को तीन भारतीय कैदियों द्वारा सूचित किया गया था कि वह अभी भी जीवित हैं। हालाँकि, भारतीय सैनिकों को जहाँ रखा गया है, उस जगह की जानकारी कभी नहीं मिली।

परिवारों ने 1983 में पाकिस्तानी जेलों का दौरा करने का मौका गँवाया

1983 में छह लोग और 2007 में 14 लोग मिसिंग 54 के बारे में पता लगाने के लिए पाकिस्तान गए थे। इन लोगों ने आरोप लगाया कि पाकिस्तानी सरकार ने उनका सहयोग नहीं किया और उन पर पत्थरबाजी की गई। जबकि परिवार वाले यह कहते रहे कि उनके पास पाकिस्तानी जेलों में बंद युद्धबंदियों के सबूत हैं। पाकिस्तान सरकार इससे बार-बार इनकार करती रही। 1982 में पाकिस्तानी तानाशाह जनरल जिया उल हक की भारत यात्रा के बाद लापता सैनिकों के परिवार वालों के बीच कुछ उम्मीद जगी थी और वे गलत नहीं थे। उस वक्त पाकिस्तान ने परिवारों को मिलने के लिए आमंत्रित किया था। तत्कालीन विदेश मंत्री नरसिम्हा राव ने सैनिकों के परिवार वालों को भरोसा दिलाया था कि वे इस यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए अपनी हरसंभव कोशिश करेंगे। विशेष रूप से 1972 में, भारत ने कुछ पाकिस्तानी परिवारों को जेलों में बंद कैदियों से मिलने की अनुमति दी थी, जिसे एक बड़ा कारण माना गया था कि पाकिस्तान भी भारतीय परिवारों को पाकिस्तानी जेलों में जाने की अनुमति देने के लिए सहमत हो सकता था।

इंडिया टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि मीडिया में सन्नाटा था। यह एक गोपनीय दौरा था और परिवारों से कहा गया था कि वे इस बारे में प्रेस से कुछ भी साझा न करें। ऐसी संभावना थी कि सरकारों के बीच कुछ डील हो रही थी। रिपोर्टों के अनुसार, परिवारों को कहा गया था, “पुरुषों को वापस लाओ। हो सकता है कि उनका स्वास्थ्य अच्छा न हों, लेकिन आप उनकी देखभाल करके उन्हें फिर से स्वस्थ कर सकते हैं।”

12 सितंबर, 1983 को परिवार वाले लाहौर के लिए रवाना हुए। बाद में उन्हें सूचित किया गया कि मुल्तान जेल जाने के लिए विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी उनके साथ शामिल होंगे। ऐसा माना जाता है कि अधिकांश भारतीय कैदियों को यहाँ ही रखा जाता है। फिर वे 14 सितंबर को मुल्तान पहुँचे।

यह वह समय था, जब चीजें कहीं और मुड़ गई थीं। राजनीति परिवारों और जेलों में बंद भारतीय सैनिकों के बीच एक बाधा बन गई। रिपोर्टों के अनुसार, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी हक की काफी आलोचनात्मक थीं और नियमित रूप से अब्दुल गफ्फार खान और एमक्यूएम आंदोलन के पक्ष में बयान देती थीं। यह भी एक बड़ा कारण था कि भारतीय परिवारों को उस वक्त युद्धबंदियों से मिलने की अनुमति नहीं दी गई थी। एक और बात यह है कि भारत को 14 सितंबर को पटियाला जेल में बंद 25 पाकिस्तानी कैदियों से पाक अधिकारियों को मिलने की इजाजत देनी थी, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। पाकिस्तानी मीडिया ने बताया, “भारत अपने वादे से पीछे हट गया।”

मुल्तान पहुँचने के बावजूद परिजनों को युद्धबंदियों से मिलने नहीं दिया गया। परिवार के सदस्य अपने लोगों से मिलने के लिए लंबे समय तक बैठे रहे, लेकिन उन्हें जाने के लिए कह दिया गया। जेल अधिकारियों ने उन्हें बताया कि केवल जिया उल हक ही उनकी मदद कर सकते थे। जब पाकिस्तान सरकार ने विंग कमांडर अभिनंदन को रिहा किया गया, उस समय पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एक बार फिर पाकिस्तानी जेलों में बंद 1971 के युद्धबंदियों को रिहा करने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था, “भारत सरकार को इस्लामाबाद के साथ 1971 के युद्ध के पीओडब्ल्यू के मुद्दे को उठाना चाहिए।”

2007 में पाकिस्तानी जेलों का दौरा

2007 में, परिवार वालों की उम्मीदें फिर से जग गईं, जब पाकिस्तानी सरकार द्वारा एक प्रतिनिधिमंडल को अनुमति दी गई। 14 परिवार वालों ने पाकिस्तान की जेलों का दौरा किया, लेकिन कुछ भी कन्फर्म नहीं कर सके। मिशन विक्ट्री इंडिया के लिए लिखे गए एक लेख में लेफ्टिनेंट कर्नल एमके गुप्तराय ने कहा, “भले ही वे जीवित थे और पाक जेल में कहीं रखे गए थे, लेकिन पाकिस्तान के लिए उन्हें विजिटर्स से छिपाना बहुत आसान था।”

कई रिपोर्टों ने पाकिस्तानी जेलों में भारतीय युद्धबंदियों के होने का इशारा किया

27 दिसंबर, 1971 को टाइम मैगजीन ने पाकिस्तानी जेल में बंद लापता सैनिकों में से एक मेजर एके घोष की तस्वीर प्रकाशित की थी। उनके परिवार के सदस्यों का मानना ​​था कि वह मर चुके हैं, लेकिन तस्वीर देखते ही उन्हें तुरंत पहचान लिया। उसी वर्ष, एक स्थानीय समाचार पत्र ने एक और युद्धबंदी की तस्वीर प्रकाशित की, जिसके बारे में माना जाता था कि वह भारतीय सैनिक था।

70 साल की दमयंती तांबे की शादी को सिर्फ 18 महीने ही हुए थे, तभी 1971 का युद्ध छिड़ गया। उनके पति फ्लाइट लेफ्टिनेंट विजय वसंत तांबे मिसिंग 54 में से एक हैं। उन्होंने भारत सरकार पर पाकिस्तानी जेलों में बंद सैनिकों को वापस लाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “हम सरकार के लिए सिर्फ ‘फाइल नंबर’ हैं। हमने उन्हें सबूत दिए हैं, लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया है।” तांबे उन याचिकाकर्ताओं में से एक थीं, जिन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और 2013 में मिसिंग 54 को खोजने के लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का आदेश प्राप्त किया था। हालाँकि, भारत की तत्कालीन सरकार को सुप्रीम कोर्ट से स्टे मिल गया था। उन्होंने कहा, “दुख होता है कि सरकार कुलभूषण जाधव (जासूस होने के आरोप में पाकिस्तान द्वारा गिरफ्तार किया गया) का बचाव करने के लिए कानूनी दिग्गज भेज सकती है, लेकिन मेरे पति जैसे लोगों के लिए जिन्होंने देश के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, उनके पास समय नहीं है।”

फरीदकोट के तेहना गाँव के बीएसएफ कांस्टेबल सुरजीत सिंह जम्मू-कश्मीर के पुंछ सेक्टर में तैनात थे। उनकी पत्नी अंगरेज कौर और बेटे अमरीक सिंह का मानना है कि सुरजीत फिलहाल पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद है। अमरीक ने कहा, “मैं बहुत छोटा था, जब चार दिसंबर 1971 को मेरे पिता को पाकिस्तान रेंजर्स ने बंधक बना लिया था।” 2017 में, कौर ने आईसीजे से संपर्क करने के लिए सरकार से निर्देश लेने के लिए पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। उनकी याचिका पाकिस्तान के पूर्व मंत्री अंसार बर्नी के एक बयान पर आधारित थी, जिन्होंने 28 अप्रैल, 2011 को जंग समाचार को बताया था कि सुरजीत पाकिस्तानी जेल में है। इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि पाकिस्तान की जेल में बंद एक भारतीय खुशी मोहम्मद ने 2004 में भारत वापस लौटने के बाद बताया था कि सुरजीत जीवित है।

बॉम्बे सैपर्स के सिपाही जुगराज सिंह की बेटी परमजीत एक साल की भी नहीं थी, जब उसके पिता को शहीद घोषित किया गया था। परमजीत ने कहा, “दशकों के बाद, हमारी उम्मीदें तब जगीं, जब एक पड़ोसी गाँव की मंजीत कौर नाम की एक महिला ने हमें बताया कि उसने 2004 में रेडियो पर पाकिस्तान में कैदियों की सूची में जीदा गाँव के जुगराज सिंह का नाम सुना।”

अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक 1975 में कराची से एक पोस्टकार्ड आया था, जिसमें 20 भारतीयों के पाकिस्तान में जिंदा होने की जानकारी थी। विशेष रूप से, पाकिस्तानी रेडियो और अखबारों में भारतीय युद्धबंदियों के पाकिस्तानी जेलों में बंद होने की खबरें थीं।

दिसंबर 2006 में, ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि मेजर अशोक सूरी, जिन्हें कार्रवाई में मारे गए घोषित किया गया था, उनके पिता डॉ आरएस सूरी को 7 दिसंबर, 1974 को एक हाथ से लिखा पत्र मिला। यह उनके बेटे द्वारा भेजा गया था। इसमें लिखा था, “मैं यहाँ ठीक हूँ।” इसके साथ एक कवर नोट था, जिसमें लिखा था, “साहब, वलैकुमसलाम, मैं आपसे व्यक्तिगत रूप से नहीं मिल सकता। आपका बेटा जिंदा है और वह पाकिस्तान में है। मैं केवल उसका पत्र ला सका, जो मैं आपको भेज रहा हूँ। अब वापस पाक जा रहा हूँ।” इस पर एम अब्दुल हामिद नाम के व्यक्ति ने हस्ताक्षर किए थे और पोस्टमार्क 31 दिसंबर, 1974 का था।

उन्हें अगस्त 1975 में एक और पत्र मिला। पत्र में लिखा था, “डियर डैडी, अशोक की तरफ से चरणस्पर्श। मैं यहाँ बिलकुल ठीक हूँ। कृपया हमारे बारे में भारतीय सेना या भारत सरकार से संपर्क करने का प्रयास करें। हम यहाँ 20 अधिकारी हैं। मेरी चिंता मत करो। घर में सभी को मेरा प्रणाम, खासतौर पर मम्मी और दादा भारत सरकार, हमारी आजादी के लिए पाकिस्तान सरकार से संपर्क कर सकते हैं। जाँच करने पर पता चला कि हैंडराइटिंग मेजर अशोक से मैच कर रही है। तत्कालीन रक्षा सचिव ने तब अपनी स्थिति को ‘किल्ड इन एक्शन’ से ‘मिसिंग इन एक्शन’ में बदल दिया। डॉ सूरी, जो 1983 में पाकिस्तान गए प्रतिनिधिमंडल के साथ थे, अपने बेटे के लिए लड़ते रहे और उम्मीद करते रहे कि भारत सरकार उन्हें वापस लाएगी। हालाँकि, उन्होंने 1999 में अपने बेटे को फिर से देखने की उम्मीद में इस दुनिया को छोड़ दिया। उनके अंतिम शब्द कथित तौर पर थे, “शायद मुझे अंत में श्मशान में शांति मिलेगी।”

मेजर एसपीएस वरैच और मेजर कंवलजीत सिंह को पाकिस्तानी सेना ने अचानक किए गए हमले के बाद पकड़ लिया था। पंजाब ने 53 लोगों और दो अधिकारियों को खो दिया। रिपोर्टों के अनुसार, 35 लोगों को कैदी बनाया गया था। बाद में म्यूनिख ओलिंपिक में जनरल रियाज ने डीआईजी पंजाब पुलिस अश्विनी कुमार को बताया कि वरैच दरगई जेल में है। 1 सितंबर, 2015 को मिसिंग 54 से संबंधित एक मामले की सुनवाई के दौरान, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने देश की सरकार से पूछा कि क्या वे अभी भी जीवित हैं। विदेश और रक्षा मंत्रालयों की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने कहा, “हमें नहीं पता।” उन्होंने कहा, “हम मानते हैं कि वे मर चुके हैं क्योंकि पाकिस्तान अपनी जेलों में उनके होने से इनकार करता रहा है।”

संसद और अदालतों में मिसिंग 54 का उल्लेख

54 सैनिक, अधिकारी और लड़ाकू पायलट कार्रवाई में लापता हो गए थे। संसद में बहस के दौरान और अदालतों में उनका कई बार उल्लेख किया गया है। कई बार सांसदों ने संसद में उनके ठिकाने को लेकर सवाल भी उठाए।

लोकसभा प्रश्न 3575, 12 दिसंबर, 1978

15 दिसंबर, 1978 को अतारांकित प्रश्न संख्या 3575 में, अहमद पटेल और अमरसिंह राठवा ने विदेश मंत्रालय से पाकिस्तान में हिरासत में लिए गए भारतीयों और इससे जुड़े सवाल पूछे। इसके अलावा, उन्होंने पूछा कि ऐसे कितने बंदियों को पाकिस्तान और भारत ने रिहा किया है। उन्होंने दोनों देशों की सरकारों द्वारा आपसी सहमति से बंदियों को रिहा करने के लिए उठाए जा रहे कदमों के बारे में भी पूछा।

1978 में, विदेश मंत्रालय ने एक सवाल का जवाब दिया और बताया कि पाकिस्तानी जेलों में 250 भारतीय बंद हैं। (फोटो साभार: eparlib.nic.in)

तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री, समरेंद्र कुंडू ने अपने जवाब में कहा कि पाकिस्तान सरकार और अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, 31 दिसंबर, 1977 तक पाकिस्तान में 300 भारतीय नागरिक हिरासत में थे। इसी तरह, 430 पाकिस्तानी भारत में निवारक हिरासत (Preventive Detention) में थे। उन्होंने आगे कहा कि 1978 में पाकिस्तान और भारत द्वारा क्रमश: 115 भारतीयों और 460 पाकिस्तानियों को रिहा किया गया था, लेकिन अभी भी पाकिस्तानी जेलों में 250 भारतीय बंद हैं।

कुंडू ने यह भी कहा कि पाकिस्तानी सरकार द्वारा प्राप्त जानकारी के आधार पर सत्यापन प्रक्रिया में तेजी लाई गई और भारत सरकार ने उन लोगों को रिहा करने के लिए संपर्क किया, जिनकी पहचान पहले से ही सत्यापित थी। हालाँकि, 1978 में मुहैया कराई गई जानकारी में 54 सैनिकों के मिशन का उल्लेख नहीं था। 1979 में इसी तरह का एक और महत्वपूर्ण प्रश्न लोकसभा में उठाया गया था, जो विशेष रूप से पाकिस्तानी जेलों में बंद युद्धबंदियों के बारे में था। इसके जवाब में 1978 के सवाल 3575 के जवाब का जिक्र मिला।

लोकसभा प्रश्न 6803, 12 अप्रैल, 1979

12 अप्रैल, 1979 को एक अतारांकित प्रश्न संख्या 6803 में अमरसिंह राठवा ने विदेश मंत्रालय से 1978 के प्रश्न 3575 पर और जानकारी माँगी। उन्होंने पाकिस्तान में रखे गए व्यक्तियों के नाम और उन्हें किस आरोप में हिरासत में लिया गया था, के बारे में जानकारी माँगी। इसके अलावा, उन्होंने पूछा कि क्या सरकार पिछले 5-6 वर्षों से बिना किसी आरोप के मुल्तान जेल में बंद व्यक्तियों के बारे में जानती है। उन्होंने पूछा कि क्या मंत्रालय इस मामले को देख रहा है और उन्होंने मंत्री से भारतीयों को वापस लाने के लिए इसे व्यक्तिगत रूप से देखने का अनुरोध किया।

1979 में, विदेश मंत्रालय ने एक प्रश्न का उत्तर दिया और बताया कि पाकिस्तानी जेलों में 250 भारतीय बंद हैं और व्यक्तियों के नामों की एक सूची भी प्रदान की है। (फोटो साभार: eparlib.nic.in)

जवाब में तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री समरेंद्र कुंडू ने पिछली बार दिए गए उत्तर का उल्लेख किया और कहा कि जानकारी के अनुसार, 250 भारतीय अभी भी पाकिस्तानी जेलों में हैं। उन्होंने आगे कहा कि भारत सरकार को कुछ और लोगों के बारे में भी जानकारी मिली है। उस वक्त मंत्रालय उन लोगों की राष्ट्रीयता की पुष्टि कर रहा था, जिनकी जानकारी पाकिस्तानी सरकार ने दी थी। कुछ बंदियों की सटीक जानकारी सरकार के पास उपलब्ध नहीं थी, क्योंकि उन्हें उनके बारे में उनके रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों के माध्यम से पता चला था। भारत सरकार ने पाकिस्तानी सरकार को सूचना दी और उसी के बारे में जानकारी माँगी। मंत्री ने कहा कि भारत सरकार इस मामले को जल्द से जल्द सुलझाने के लिए पाकिस्तानी सरकार के साथ लगातार संपर्क में है। जवाब में, मंत्री ने यह भी उल्लेख किया कि लापता व्यक्तियों की जानकारी एक पुस्तकालय दस्तावेज संख्यांक एलटी-4293/79 में उपलब्ध थी। ऑपइंडिया उस दस्तावेज़ तक पहुँचने की कोशिश कर रहा है।

राज्यसभा प्रश्न 4285, 15 मई, 1997

15 मई, 1997 को, राजनाथ सिंह के अतारांकित प्रश्न 4285 का जवाब देते हुए, तत्कालीन केंद्रीय मंत्री रमाकांत डी खलप ने सदन को सूचित किया कि भारत सरकार के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 54 सैनिक थे। 1965 और 1971 से लापता सैनिकों को पाकिस्तान में हिरासत में रखा गया था। हालाँकि, पाकिस्तान किसी भी युद्धबंदी के होने से इनकार करता रहा है। यह मुद्दा 9 अप्रैल, 1997 को पाकिस्तान के विदेश मंत्री के सामने उठाया गया था। वह पाकिस्तानी सरकार के आधिकारिक बयान पर कायम थे, लेकिन पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने इस विषय पर उपलब्ध सभी सबूतों को पेश करने को कहा और इसे पाकिस्तान भेजा जाना था।

राज्यसभा प्रश्न 4174, 4 मई, 2000

4 मई, 2000 को, अबनी रॉय के अतारांकित प्रश्न 4174 का जवाब देते हुए, तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री अजीत कुमार पांजा (Ajit Kumar Panja) ने सदन को सूचित किया कि भारत सरकार के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पाकिस्तानी जेलों में 54 भारतीय युद्धबंदी थे, लेकिन पाकिस्तान ने युद्धबंदियों के होने से इनकार किया। उन्होंने आगे कहा कि भारत सरकार ने 20-21 फरवरी, 1999 को प्रधानमंत्री की पाकिस्तान यात्रा के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ इस मुद्दे को फिर से उठाया। भारत और पाकिस्तान ने इस मुद्दे की जाँच के लिए मंत्री स्तर पर 2 सदस्यीय समिति गठित की। 5-6 मार्च, 1999 को आधिकारिक स्तर की चर्चा में यह मामला फिर से उठाया गया। पाकिस्तान ने फिर कहा कि उसके पास कोई भारतीय युद्धबंदी हिरासत में नहीं है, लेकिन वह इस मामले की नए सिरे से जाँच करने पर सहमत हुआ।

लोकसभा प्रश्न 8016, 17 मई, 2000

17 मई 2000 को लोकसभा में नरेश कुमार पुगलिया के अतारांकित प्रश्न 8016 का उत्तर देते हुए तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री अजीत कुमार पांजा ने कहा था कि 1971 के युद्ध के दौरान 532 भारतीय सैनिकों को पाकिस्तान ने हिरासत में लेकर पाकिस्तानी जेलों बंद कर दिया था। इन सभी सैनिकों को भारत वापस भेज दिया गया था। इसके बाद, भारत सरकार को 54 सैनिकों के बारे में सूचित किया गया और मामले को पाकिस्तान सरकार के साथ उठाया गया। हालाँकि, पाकिस्तान ने लगातार कहा कि उनकी हिरासत में कोई भारतीय युद्धबंदी नहीं है।

राज्यसभा प्रश्न 2640, 16 अगस्त, 2001

16 अगस्त, 2001 को, राजीव शुक्ला के अतारांकित प्रश्न 2640 का उत्तर देते हुए, तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री उमर अब्दुल्ला ने सूचित किया कि पाकिस्तान अपनी जेलों में किसी भी युद्धबंदी की उपस्थिति से लगातार इनकार करता रहा है। हालाँकि, उच्च सदन को सूचित किया गया कि पाकिस्तान ने जानकारी दी है कि भारत के 72 बंदियों ने अपनी सजा पूरी कर ली है। भारत सरकार उन बंदियों की राष्ट्रीय स्थिति का सत्यापन कर रही है।

राज्यसभा प्रश्न 2649, 16 अगस्त, 2001

उसी दिन, सतीश प्रधान के अतारांकित प्रश्न 2649 का उत्तर देते हुए, उमर अब्दुल्ला ने कहा कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1971 से पाकिस्तान में 54 भारतीय युद्धबंदी थे, लेकिन पाकिस्तान सरकार ने उनकी जेलों में उनकी उपस्थिति से लगातार इनकार किया है। यह मामला 15 जुलाई, 2001 को आगरा में राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ एक शिखर बैठक के दौरान उठाया गया था, जहाँ प्रधानमंत्री ने उनसे परिवारों की पीड़ा को समझते हुए इन युद्धबंदियों की जल्द से जल्द रिहाई और प्रत्यावर्तन के लिए तत्काल हरसंभव कोशिश करने का आग्रह किया था।

राज्यसभा प्रश्न 646, 6 मार्च, 2002

6 मार्च, 2002 को, एस अग्निराज के तारांकित प्रश्न 646 का उत्तर देते हुए, तत्कालीन विदेश मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस ने कहा था कि माना जाता है कि पाकिस्तानी जेलों में 54 युद्धबंदी थे। हालाँकि, पाकिस्तान इससे इनकार करता रहा। 15 जुलाई, 2001 को आगरा समिट के दौरान यह मामला फिर से उठा और पाकिस्तान ने कथित तौर पर अपनी जेलों की फिर तलाशी ली। हालाँकि, पाकिस्तान ने दावा किया कि उसे वहाँ कोई युद्धबंदी नहीं मिला।

राज्यसभा प्रश्न 1088, 13 मार्च, 2002

13 मार्च, 2002 को एके पटेल के अतारांकित प्रश्न 1088 का जवाब देते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस ने कहा था, “1971 के युद्ध के दौरान, 532 भारतीय सैनिकों को पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदी बना लिया गया था। इन सभी जवानों को भारत वापस भेज दिया गया है। इसके बाद, सरकार को 54 लापता भारतीय सैनिकों के बारे में सूचित किया गया, जिनके बारे में माना जाता है कि वे पाकिस्तानी जेलों में हैं। सरकार ने सभी स्तरों पर पाकिस्तान सरकार के साथ उनकी रिहाई और प्रत्यावर्तन के मुद्दे को लगातार उठाया है। 15 जुलाई, 2001 को आगरा शिखर सम्मेलन के दौरान, प्रधानमंत्री ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति से इन युद्धबंदियों को रिहा करने की दिशा में तत्काल और उद्देश्यपूर्ण कार्रवाई करने का भी आग्रह किया।”

राज्यसभा प्रश्न 3246, 24 अप्रैल, 2002

24 अप्रैल, 2002 को, नाना देशमुख के अतारांकित प्रश्न 3246 का उत्तर देते हुए, तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस ने कहा था कि भारत सरकार पाकिस्तानी जेलों में 1971 के युद्ध से बंद युद्धबंदियों का पता लगाने के लिए हर संभव कदम उठा रही थी, लेकिन पाकिस्तान सरकार यही राग अलाप रही थी कि उन्होंने भारतीय युद्धबंदियों को नहीं रखा है।

राज्यसभा प्रश्न 2119, 11 नवंबर 2002

11 नवंबर 2022 को राजीव शुक्ला के सवाल 2119 का जवाब देते हुए रक्षा मंत्री जॉर्ड फर्नांडिस ने कहा कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने युद्ध में कैदी बनाए गए सैनिकों का मुद्दा पाकिस्तान के सामने आगरा बैठक के दौरान सितंबर 2001 में उठाया था। तब उनकी सरकार ने कहा था कि वो लोग बड़ी शिद्दत से खोजबीन कर रहे हैं, जेल रिकॉर्ड देख रहे हैं कि कहीं 1971 का कोई युद्ध बंदी तो पाकिस्तानी जेल में नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान ने दावा किया था कि ऐसा कोई शख्स उनके रिकॉर्ड में नहीं आया। उन्होंने युद्धबंदियों के परिवारों को भी मिलने का आग्रह किया था, जिस पर बाद में विचार हुआ।

राज्यसभा प्रश्न 953, 22 जुलाई 2004

22 जुलाई 2003 को आरके आनंद के सवाल 953 का जवाब देते हुए राज्य विदेश मंत्री ई अहमद ने कहा था कि भारतीय सरकार की जानकारी के अनुसार, पाकिस्तान की जेल में 54 युद्धबंदी थे, लेकिन पाकिस्तान फिर भी उनके होने की बात नकारता रहा। ये मामला बाद में विदेश सचिवों के स्तर पर हुई हुई बातचीत में 27-28 जून 2004 को भी उठाया गया था।

राज्यसभा प्रश्न 157, 8 मार्च 2007

8 मार्च 2009 को हरीश रावत के सवाल 157 के जवाब में विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि 2007 में पाकिस्तान दौरे के वक्त उन्होंने माँग की थी कि युद्धबंदिय़ों को उनके परिजनों से मिलने की अनुमति तो दी जाए। इस पर राष्ट्रपति मुशर्रफ मान गए।

राज्य सभा प्रश्न 1065, 8 मार्च 2007

8 मार्च 2007 को विनय कटियार के सवाल 1065 के जवाब में तत्कालीन विदेश मंत्री ने कहा कि वहाँ पाकिस्तानी जेल में 74 युद्धबंदी थे। उनके रिश्तेदारों को उनसे मिलवाने के लिए अप्रैल 2007 का समय प्रस्तावित किया गया, इस पर पाकिस्तान ने भी हाँ भरी।

राज्य सभा प्रश्न 1067, 8 मार्च 2007

मार्च 8 2007, में दारा सिंह के 1067 सवाल के जवाब में प्रणब मुखर्जी ने यही जवाब दिया कि पाकिस्तानी जेल में 74 युद्धबंदी थे। उनके रिश्तेदारों को उनसे मिलवाने के लिए अप्रैल 2007 का समय प्रस्तावित किया गया, इस पर पाकिस्तान ने भी हाँ भरी। उन्होंने बताया कि विदेश मंत्री के दौरे के दौरान भारत-पाकिस्तान एक कमेटी बनाने पर सहमत हुए जिसमें रिटायर जज होते, जो दोनों देशों की जेल का दौरा करते और कैदियों के साथ मानवीय बर्ताव और उन्हें सजा पूरी होने पर जेल से रिहाई करने के चरण पर अपना प्रस्ताव देते।

राज्यसभा प्रश्न 3086, 3 मई 2007

एनआर गोविंदराजर के सवाल 3086 का जवाब देते हुए प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि ऐसी जानकारियाँ हैं कि 74 युद्धबंदी पाकिस्तान की जेल में 1971-72 से बंद हैं लेकिन पाकिस्तान इससे मना करती है। सरकार लगातार मामला उठाती रही, 2007 में जाकर पाकिस्तान ने इस बात के लिए माना कि वो युद्ध बंदियों के परिजनों को उनसे मिलने देगा।

राज्यसभा प्रश्न 4634, 5 मई 2007

5 मई 2007 को दत्ता मेघ के 4634 सवाल पर प्रणब मुखर्जी ने कहा कि जनवरी 2007 में उनके दौरे के दौरान उन्होंने पाकिस्तानी सरकार के सामने युद्धबंदियों का मुद्दा उठाया था। उन्होंने इस बात को स्वीकारा भी था कि वो युद्धबंदियों को उनके परिवारों से मिलने देंगे। लेकिन दस्तावेजों में ये जिक्र नहीं था कि वो युद्धबंदी 1971 के युद्ध के थे।

राज्यसभा 3860, 10 मई 2007

10 मई 2007 को एकनाथ के ठाकुर के सवाल 3860 का जवाब देते हुए प्रणब मुखर्जी ने बताया कि ऐसी जानकारियाँ हैं कि 74 युद्धबंदी पाकिस्तान की जेल में 1971-72 से बंद हैं लेकिन पाकिस्तान इससे मना करती है। सरकार लगातार मामला उठाती रही, 2007 में जाकर पाकिस्तान ने इस बात के लिए माना कि वो युद्ध बंदियों के परिजनों को उनसे मिलने देगा।

राज्यसभा प्रश्न 166, 23 अगस्त 2007

23 अगस्त 2007 को जया बच्चन के सवाल 166 के जवाब में तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने बताया था कि लापता रक्षाकर्मियों के परिवार का समूह 1 से 14 जून 2007 तक पाकिस्तान के 10 जेलों में गया। उन्हें वहाँ कोई लापता रक्षाकर्मी नहीं मिला। उन्होंने कहा, “जबकि ये बात कन्फर्म है कि एक लापता रक्षाकर्मी को कार्रवाई के दौरान मारा गया उसे युद्ध बंदी के तौर पर नहीं रखा गया।”

गुजरात हाईकोर्ट का 2011 का फैसला

गुजरात हाईकोर्ट में यह केस साल 1999 में दायर हुआ था। जिसमें नतीजे तक पहुँचने में कोर्ट को लगभग एक दशक लगे। 2012 में आए कोर्ट के निर्देशों के बाद 15 दिन में उसे अमल करना था, तभी भारतीय सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और उन आदेशों पर स्टे लगा दिया गया जिसमें यह निर्देश थे कि इस मामले में इंटरनेश्नल कोर्ट ऑफ जस्टिस को संपर्क किया जाए। फैसले में याचिकाकर्ताओं के विभिन्न बिंदुओं का जिक्र था। इनमें से कुछ जिनका संबंध भारत पाकिस्तान युद्ध (3 दिसंबर 1971 से 16 दिसंबर 1971 तक) से था, उनका भी उल्लेख था। ये उनमें से कुछ बिंदु हैं:

  • युद्ध के वक्त कश्मीर फ्रंट के 2238 सैनिक और सैन्य अधिकारी लापता हुए जिनमें किसी की कोई बॉडी नहीं मिली और न ही इस बात के सबूत मिले कि उन्हें कार्रवाई के दौरान मारा गया। आरोप थे कि भारतीय सरकार ने इन सैनिकों को ढूँढने के कोई प्रयास नहीं किए। कुछ समय बाद रक्षा मंत्रालय द्वारा इन्हें मृत बता दिया गया।
  • 7 दिसंबर 1971 को ‘संडे पाकिस्तान ऑब्जर्वर’ ने एक रिपोर्ट छापी जिसमें दावा था कि वसंत वी तांबे को मिलाकर 5 भारतीय पॉयलट जिंदा पकड़े गए हैं।
  • फैसले में उन पत्रों का जिक्र था जो डॉ आर एस सूरी को अपने बेटे मेजर अशोक सूरी से मिले। बाद में मेजर सूरी का नाम लाहौर रेडियो के पंजाब दरबाद प्रोग्राम में भी 6 जून 1972 को लिया गया। 1976 में डॉ सूरी को बताया गया कि मेजर सूरी को युद्ध से एक दिन पहले 2 दिसंबर को पकड़ा गया था। उनके साथ भारतीय जासूस की तरह बर्ताव किया गया। 15 जनवरी 1988 को पाकिस्तान ने एक भारतीय कैदी  मुख्तयार सिंह को छोड़ा। उसने भारतीय प्रशासन को बताया कि उसने मेजर सूरी को कोट-लखपथ जेल में देखा था।
  • 1968 में फिरोजपुर के भारतीय नागरक मोहनलाल भास्कर को पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ब्यूरो द्वारा गिरफ्तार किया गया। उन्होंने FIC-596 में सालों बिताएँ।
  • लाहौर सेंट्रल जेल, कोट लखपथस लाहौर, शाही किला, लाहौर…इनका जिक्र भी फैसले में था।
  • FIC रावलपिंडी, मियांवली और मुल्तान में रह वह 9 दिसंबर, 1974 को भारत लौटे। उन्होंने भारत सरकार को 1965 युद्ध के कैदियों के बारे में बताया। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि कैसे पाकिस्तान की जेल में उनके साथ अमानवीय व्यवहार होता है। भास्कर ने सरकार को बताया कि दो पाकिस्तानी अधिकारी, करनल आसिफ शफी और मेजर अयाज अहमद सिपरा भी पाकिस्तानी सरकार के विरोध करने पर गिरफ्तार हुए थे और उन्होंने उनके संग भी समय बिताया। उन्होंने जानकारी दी कि शाही किले में 45 युद्ध के बंदी हैं जिसमें विंग कमांडर जीएस गिल भी हैं।
  • एक अन्य भारतीय कैदी को पाकिस्तान ने 24 मार्च 1988 को छोड़ा। उसका नाम दलजीत सिंह था। उसने भी बताया कि उसने फरवरी 1978 में वीवी तांबे को देखा था।
  • फ्लाइट लेफ्टिनेंट हरविंदर सिंह का नाम इंडियन डिफेंस पर्सनल द्वारा पाकिस्तानी रेडियों पर 5 दिसंबर 1971 को अनाउंस किया गया था।
  • मेजर नवलजीत सिंह संधू को भी एक भारतीय कैदी ने देखा था। इसका जिक्र उसने अपनी रिहाई के बाद किया। उसने बताया कि मेजर संधू अपना एक हाथ खो चुके हैं। उन्हें 14 साल की जेल की सजा दी गई है। वहीं अन्य भारतीय इकबाल हुसैन ने पाकिस्तानियों से छूटने के बाद कहा था कि उसने मेजर संधू को कोट लखपत जेल में देखा।
  • 5 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी रेडियों पर फ्लाइट ऑफिसर सुधीर त्यागी का नाम अनाउंस किया गया था। 24 मार्ट 1988 को छूटे भारतीय कैदी गुलाम हुसैन ने कहा था कि उसने 1973 में त्याही को शाही किले में देखा।
  • 24 दिसंबर 1971 को मेजर एके घोष की फोटो टाइम्स मैग्जीन में भारतीय कैदी के नाम से छापी गई ती।
  • कप्तान रविंदर कौरा का नाम लाहौर रेडियो पर 6 दिसंबर 1971 को सुनाई पड़ा था। उनकी पाकिस्तान जेल में बंद तस्वीर अंबाला के अखबार में 1972 में छपी थी। भारतीय कैदी मुख्तयार सिंह ने भी कहा था कि उन्होंने मुल्तान जेल में कैप्टन रवींद्र कौर को देखा था।
  • विंग कमांडर एसएस गिल का नाम पाकिस्तान की कैद में रहे भारतीय मोहनलाल भास्कर ने लिया था जिन्हें उनके साथ जेल हुई थी।
  • फ्लाइट लेफ्टिनेंट सुधीर के गोस्वामी को पकड़ने के बाद उनका नाम पाकिस्तान के रेडियो पर  5 दिसंबर 1971 को लिया गया था।
  • मेजर एसपीएस वड़ाइच के बारे में भारतीय कैदी मोहिंदर सिंह ने खुलासा किया था जिन्हें 24 मार्च को 1988 को रिहाई मिलाई थी। उन्होंने बताया था कि मेजर को उन्होंने पहली दफा 1983 में देखा था  और बाद में वो उन्हें 1988 में नजर आए थे।
  • कप्तान कल्याण सिंह को नाथ राम नाम के भारतीय कैदी ने 24 मार्च  1988 को 1983 में देखा था। उन्हें मुख्तयार सिंह भी कोट लखपत जेल में देखा था।
  • कप्तान गिरिराज को मुख्तयार सिंह ने कोट लखपत जेल में देखा था और मोहन लाल भास्कर ने 1973 में अटोक जेल में
  • मुख्तयार ने कप्तान बख्शी को 1983 में मुल्तान में देखा था।
  • मुख्तयार सिंह ने फ्लैग ऑफिसर कृष्णन लकीमाज मल्कानी को मुल्तान जेल में 1983 में देखा था।
  • मुख्तयार सिंह ने फ्लाइड लेफ्टिनेंट गुरुदेव सिंह राय को कोट रखपत जेल में देखा था।
  • सिपाई मदन मोहन को भारतीय कैदी सूरम सिंह ने देखा था। 24 मार्च 1988 को जेल से रिहा हुए मोहन ने उन्हें मुल्तान जेल में 1978-79 के बीच देखा था।
  • फ्लाइट लेफ्टिनेंट टीएस दंदास को एक अन्य अधिकारी के साथ पाकिस्तान ने पकड़ा था। वो अधिकारी तो लौट आया लेकिन दंदास कभी वापस नहीं आए।
  • 1979 में लोकसभा में दी गई लिस्ट का भी जजमेंट में जिक्र था।
  • भुट्टो एक्जिक्यूशन एंड ट्रायल बाय विक्टोरिया शॉफील्ड किताब के अंशों को भी फैसले में जगह दी गई जिसमें उन भारतीय सैनिकों का जिक्र था जिन्हें युद्ध के दौरान कैदी बनाया गया।
  • फैसले की एक बात जिस पर गौर किया जाना चाहिए। जब भारत से पाकिस्तान के 93000 युद्धबंदी छोड़े गए उस समय युद्ध के दौरान बंदी बनाए गए भारतीयों को छोड़ने की भी उम्मीद थी। लेकिन वहाँ से केवल दो ट्रेन भारत आई।  तीसरी ट्रेन जिसमें सैनिक थे वो कभी भारत आई ही नहीं। कोर्ट के दस्तावेजों में लिखा गया, “भारत सरकार ने पाकिस्तान में भारतीय युद्धबंदियों की सूची को ठीक से सत्यापित किए बिना जल्दबाजी में सभी 93000 युद्ध बंदियों को पाकिस्तान को लौटा दिया था। इंडियन आर्मी इंटेलिजेंस उस समय इतना लापरवाह था कि पीड़ित सेना के अधिकारियों के परिवार वालों के पास खुफिया विभाग से ज्यादा जानकारी थी।
  • फ्लाइट एलटी तांबे की पत्नी दमयंती तांबे को एक बांग्लादेशी नौसेना अधिकारी टी यूसुफ ने बताया था कि वह लायलपुर जेल में तांबे के साथ ते। एक भारतीय कैदी दलजीत सिंह, जिसे 24 मार्च, 1988 को पाकिस्तान द्वारा रिहा किया गया था, उसने भी कहा था कि उसने 1978 में पूछताछ केंद्र में लाहौर में वीवी ताम्बे को देखा था।
  • अदालत के दस्तावेज़ में आगे लिखा गया, “यह स्पष्ट है कि युद्ध के कैदियों के आदान-प्रदान के समय भारत सरकार और उनके अधिकारियों की घोर लापरवाही के कारण युद्ध के भारतीय कैदियों को पाकिस्तान की जेलों में बंद कर दिया गया है। पीड़ित परिवारों ने विभिन्न स्रोतों से अधिक साक्ष्य एकत्र किए हैं जिन्हें सरकार को राष्ट्र के व्यापक हित में एकत्र करना चाहिए था।”
  • कोर्ट में दाखिल हलफनामे में भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ हुई बैठकों का जिक्र किया था जहाँ उन्होंने उनसे इस मुद्दे पर बात की। भारतीय सरकार ने कहा था, “अपने लापता रक्षा सैनिकों को बचाने के लिए भारत सरकार ने गंभीर, जरूरी और लगातार कोशिशें की।” सरकार ने आगे कहा था कि लापता 54 रक्षा कर्मियों के ठिकाने का पता लगाने के प्रयास अभी भी जारी हैं। भारत सरकार ने ये भी बताया था कि मारे गए सैनिकों के रिश्तेदारों को क्या सुविधाएँ दी गईं।

राज्यसभा प्रश्न 1907, 29 अगस्त 2012

राजीव चंद्रशेखर के सवाल 1907 का जवाब देते हुए 29 अगस्त 2012 को रक्षा मंत्री एके एंटनी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के 2 मई 2012 को दिए गए निर्देशों पर रोक लगा दी है जिसमें उन्होंने का था 1971 के युद्धबंदियों के मामले में इंटरनेश्नल कोर्ट ऑफ जस्टिस के पास जाएँ। इसके बाद सरकार ने लापता सैनिकों के परिवारों को लाभ देने के लिए जरूरी कदम उठाएँ जैसा कि फैसले में कहा गया था।

लोकसभा प्रश्न 4463, 19 दिसंबर 2014 को

पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने 19 दिसंबर 2014 को लक्ष्मण गिलुवा और चंद्रकांत खैरे के 4463 सवाल के लिखित जवाब में 54 लापता रक्षा सैनिकों का नाम दिया जो 1965 से 1971 के बीच गायब हुए थे और जिन्हें लेकर अनुमान था कि वो पाकिस्तानी जेल में हो सकते हैं। ये नाम-

  1. मेजर एसपीएस वड़ाइच
  2. मेजर कंवलजीत सिंह
  3. मेजर जसकिरण सिंह मलिक
  4.  कप्तान कल्याण सिंह राठौड़
  5. कप्तान गिरिराज सिंह
  6. 2/लेफ्टिनेंट सुधीर मोहन सभरवाल
  7. कैप्टन कमल बख्शी
  8. 2/लेफ्टिनेंट पारस राम शर्मा
  9. मेजर एस.सी. गुलारी
  10. मेजर ए.के. घोष
  11. मेजर ए.के. सूरी
  12. लीडर मोहिंदर कुमार जैन
  13. फ्लाइट लेफ्टिनेंट सुधीर कुमार गोस्वामी
  14. लेफ्टिनेंट कमांडर अशोक रॉय
  15. फ्लाइट लेफ्टिनेंट हरविंदर सिंह
  16. एफजी अधिकारी सुधीर त्यागी
  17. फ्लाइट लेफ्टिनेंट विजय वसंत तांबे
  18. फ्लाइट लेफ्टिनेंट इलू मोसेस सैसून
  19. फ्लाइट लेफ्टिनेंट राम मेथाराम आडवाणी
  20. फ्लाइट लेफ्टिनेंट नागास्वामी शंकर
  21. फ्लाइट लेफ्टिनेंट सुरेश चंदर संदल
  22. फ्लाइट लेफ्टिनेंट कुशलपाल सिंह नंदा
  23. विंग। कमांडर हॉर्सन सिंह गिल
  24. फ्लाइट लेफ्टिनेंट तन्मय सिंह दंडास
  25. कप्तान रवींद्र कौरा
  26. Sq Ldr जल मिनिक्षा मिस्त्री
  27. फ्लाइट लेफ्टिनेंट रमेश गुलाबराव कदम
  28. फ्लैग अधिकारी कृष्ण लकीमा जे मलकानी
  29. फ्लाइट लेफ्टिनेंट बाबुल गुहा
  30. एल/नाइक हजूरा सिंह
  31. Sq Ldr जतिंदर दास कुमार
  32. फ्लाइट लेफ्टिनेंट गुरदेव सिंह राय
  33. फ्लाइट लेफ्टिनेंट अशोक बलवंत धवले
  34. फ्लाइट लेफ्टिनेंट श्रीकांत चंद्रकांत महाजन
  35. फ्लाइट लेफ्टिनेंट कोट्टीजाथ पुथियावेत्तिल मुरलीधरन
  36. कप्तान वशिष्ठ नाथ
  37. एल/एनके जगदीश राज
  38. सिपाही मदन मोहन
  39. सिपाही पाल सिंह
  40. सिपाही दलेर सिंह
  41. लेफ्टिनेंट विजय कुमार आजाद
  42. सुजान सिंह
  43. गनर श्याम सिंह
  44. सिपाही ज्ञान चंद
  45. सिपाही जगीर सिंह
  46. सूबेदार काली दास
  47. फ्लाइट लेफ्टिनेंट मनोहर पुरोहित
  48. पायलट ऑफिसर तेजिंदर सिंह सेठी
  49. एल/नाइक बलबीर सिंह
  50. स्क्वाड्रन लीडर देवप्रसाद चटर्जी
  51. एल/हवलदार कृष्ण लाल शर्मा
  52. सूबेदार अस्सा सिंह
  53. कैप्टन ओपी दलाल
  54. एसबीएस चौहान

लोकसभा प्रश्न 856, तारीख 24 जुलाई 2015

24 जुलाई, 2015 को, चरणजीत सिंह रोधी और के अशोक कुमार द्वारा पूछे गए प्रश्न 856 का जवाब देते हुए, तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर ने कहा कि ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तानी जेलों में 54 युद्धबंदी थे। भारत सरकार ने कई मौकों पर पाकिस्तानी सरकार के साथ इस मामले को उठाया। 1-14 जून 2007 के बीच युद्धबंदियों के परिवारों ने 10 पाकिस्तानी जेलों का दौरा किया लेकिन उनकी मौजूदगी की पुष्टि नहीं हो सकी। उन्होंने आगे बताया कि लापता 54 रक्षा कर्मियों के परिवारों को पेंशन, पुनर्वास और अन्य लाभ प्रदान किए गए। 23 दिसंबर, 2011 को आए गुजरात उच्च न्यायालय के निर्देशों पर 54 में से 38 रक्षा सैनिकों की अपने परिजनों को सेवानिवृत्ति का लाभ भी प्रदान किया गया। 13 लापता रक्षा कर्मियों के मामले में, करीबी परिजन नहीं मिले जिसके बारे में गुजरात हाईकोर्ट में संबंधित जानकारियाँ दी गईं। अदालत को आगे तीन रक्षा कर्मियों के बारे में ‘जानकारी की कमी’ के बारे में सूचित किया गया।

लोकसभा प्रश्न 2776, तारीख 10 जुलाई 2019

10 जुलाई 2019 को गोपाल चिन्नाया के सवाल 2776 पर तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री वी मुरलीधरन ने कहा कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार,  पाकिस्तान की हिरासत में युद्धबंदियों सहित 83 लापता भारतीय रक्षाकर्मी थे। उन्होंने जानकारी दी कि भारत सरकार ने राजनयिक चैनल के माध्यम से पाकिस्तान के साथ लगातार मामले को उठाया लेकिन, पड़ोसी देश ने अपनी हिरासत में युद्ध बंदियों की उपस्थिति को स्वीकार नहीं किया।

इसके अलावा, सदन को सूचित किया गया कि अक्टूबर 2017 में, भारत ने पाकिस्तान के उच्चायुक्त को एक दूसरे की हिरासत में रखे गए बुजुर्गों, महिलाओं और मानसिक रूप से अस्वस्थ कैदियों से संबंधित मानवीय मुद्दों को हल करने और उनकी जल्द रिहाई और प्रत्यावर्तन पर विचार करने का सुझाव दिया था। ज्वाइंड ज्यूडिशियल कमेटी के तंत्र को पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव रखा गया था और यह भी कहा गया था कि भारतीय चिकित्सा विशेषज्ञों की एक टीम को अनुमति दी जाए कि उन्हें वह मानसिक रूप से अस्वस्थ कैदियों से मिलने देंगे।

7 मार्च 2018 को पाकिस्तान इस बात पर मान गया। इसके बाद भारत ने उन्हें अपनी मेडिकल एक्सपर्ट्स की डिटेल्स भेजीं और ज्वाइंड ज्यूडिशियल कमेटी पाकिस्तान के साथ मिलकर दोबारा बनाई गई ताकि मेडिकल टीम कैदियों से मिले। उसके बाद से पाकिस्तान का कोई जवाब नहीं आया। बता दें कि ये चर्चा बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि जुल्फिकार अली भुट्टो के बारे में विक्टोरिया शॉफील्ड की किताब में एक उल्लेख था कि एक वकील को सूचित किया गया था कि पाकिस्तानी जेल में मानसिक रूप से अस्वस्थ कैदी थे जो स्पष्ट रूप से 1971 के युद्ध के दौरान बंदी बनाए गए थे। उनकी दिमागी हालात ऐसी हो गई थी कि वह अपना मूल स्थान याद नहीं कर पा रहे थे और भारत ने उन्हें स्वीकार तक नहीं किया था।

कुछ अन्य दस्तावेज जो साबित करते हैं कि पाकिस्तान की जेल में युद्धबंदी हैं

ब्रिटिश इतिहासकार विक्टोरिया शॉफील्ड की किताब ‘भुट्टो- ट्रॉयल एंड एक्जिक्यूशन’ में लिखा गया कि पाकिस्तानी वकील ने बताया था कि 1971 में हुए युद्ध के दौरान पकड़े गए भारतीय सैनिक कोट लखपत जेल में हैं। ऐसे ही एक गवाह के मुताबिक उन बंदियों को दीवारों के पार चिल्लाते चीखते साफ सुना जा सकता था।

भुट्टो पर लिखी गई किताब के अंश

बुक में कहा गया कि भुट्टो की जेल बैरक एरिया से अलग थी जिसमें 10 फुट ऊँची दीवार थी। वह दूसरी तरफ से खौफनाक चीखें और चिल्लाने की आवाजें रात में सुन पाते थे। भुट्टो के एक वकील ने उन कैदियों के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह युद्ध में बंदी बनाए गए भारतीय थे। किताब में लिखा गया कि बंदियों की हालात ऐसी कर दी गई थी कि वो अपने मूल स्थान को भूल गए थे और भारत सरकार ने भी उन्हें स्वीकारने से मना कर दिया था। भुट्टो ने अपने जेल अधीक्षक को लिखा भी था कि ऐसे कैदियों को उनकी जेल से अलग ले जाया जाए। बाद में उनका अनुरोध मान लिया गया। किताब में लिखा गया, “प्रशासन को मानना पड़ा था कि उन चीखों से भुट्टो की नींद खराब होती है। मगर भुट्टो उन रातों को नहीं भूले जब उन्हें उन चीखों के कारण नीदें नहीं आईं। उन्होंने इस संबंध में शिकायत भी दी। पत्र में लिखा था- 50 पागल मेरी जेल से अगली जेल में रखे गए थे। उनकी जो चीखें और चिल्लाना रात में सुनाई पड़ते थे, वो ऐसी चीजें हैं जो मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा।”

युद्धबंदी जिन्हें मिसिंग 54 में जगह भी नहीं मिली

ऐसी कुछ रिपोर्ट्स हैं जो बताती हैं कि 1971 में हुए युद्ध के समय कुछ ऐसे भी सैनिक गायब हुए थे जिनका नाम उन मिसिंग 54 वाली ऑफिशियल लिस्ट में भी नहीं था। एक भारतीय कैदी हवलदार धर्मपाल सिंह भटिंडा के थे। जस्टिस अपहेल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, सिंह को पाकिस्तान की सिक्योरिटी फोर्स ने 1971 में पकड़ा था। 1974 में पाकिस्तान द्वारा 1974 के आसपास कैदी बनाए गए सतीष कुमार ने छूटने के बाद कहा था कि उनकी मुलाकात सिंह से हुई। कुमार को 1986 में जेल से रिहाई मिली थी। इसके बाद उन्होंने लिखित हलफनामे में सिंह के बारे में बताया।

स्रोत: justiceupheld.org.uk

कुमार ने अपने हलफनामे में कहा कि धर्मपाल 1971 में ढाका में सेवा करते हुए लापता हो गए थे। सेना ने उन्हें शहीद घोषित कर दिया। मगर उनकी मुलाकात सिंह से पाकिस्तान की कोट लखपत राय जेल में हुई थी। वह लाहौर के शाही किला में तब भी एक साथ थे जब एसएसपी को पूछताछ करनी थी। वे 19 जुलाई, 1974 से 1976 तक उसी जेल में बंद थे। कुमार के मुताबिक दूसरे जेल में उन्हें भेजे जाने के बाद वह कभी धर्मपाल से नहीं मिले। उस समय वह किला अटक, फ्रंटियर, पेशावर में थे। कुमार ने कहा कि उन्हें यकीन है कि धर्मपाल सिंह आज भी पाकिस्तानी जेल में होंगे।

सिंह की पत्नी पाल कौर ने यह मामला पंजाब और हरियाणा कोर्ट में उठाया। जिसके बाद कोर्ट को विदेश मंत्रालय ने जवाब दिया। अपने हलफनामे में उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद के भारतीय उच्चायोग ने पाकिस्तान की सरकार से दो बार पूछा कि हवलदार धर्म कहाँ हैं, लेकिन पाकिस्तानी सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया। कौर के वकील हरिचंद ने कोर्ट को बताया कि कुमार सिंह के बारे में और जानकारी दे सकते हैं।

कथिततौर पर एक भारतीय जासूस सुरजीत सिंह को पाकिस्तान ने 2012 में छोड़ा था जिनका दावा था कि उनकी भी मुलाकात धर्मपाल सिंह से हुई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए बयान में सिंह के बेटे अर्शिंदरपाल ने कहा था, “मै जानता हूँ मेरे पिता बुजुर्ग और कमजोर हो गए होंगे। लेकिन हमें पता तो होना चाहिए कि वो हैं कहाँ पर। मुझे मालूम है कि वो मरे नहीं हैं।”

काम कुछ नहीं, खर्चा हर महीना ₹2 लाख: कानपुर में छिपे बांग्लादेशी रिजवान और उसके परिवार के खातों में कौन डालता है लाखों रुपए

उत्तर प्रदेश के कानपुर (Kanpur, Uttar Pradesh) में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी रिजवान और उसके परिवार को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। जाँच में पता चला है कि रिजवान और उसका परिवार महीने के लाखों रुपए खर्च कर रहा था, जबकि उसके पास कमाई का कोई साधन नहीं है।

पुलिस ने जब रिजवान और उसके परिवार का बैंक डिटेल खंगाला तो पता चला कि परिवार के पास चार बैंक खाते हैं। रिजवान के बैंक खाते में नवंबर महीने में 8 लाख रुपए ट्रांसफर किए गए थे। रुपए किसने भेजे थे, इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। फिलहाल पुलिस उसके और उसके परिवार के अन्य लोगों के डिटेल खंगाल रही है।

वहीं, जाँच में यह भी पता चला है कि रिजवान का परिवार महीने के 2 लाख रुपए खर्च कर रहा था, जबकि परिवार के पास आमदनी का कोई जरिया नहीं है। उसने पुलिस को बताया था कि वह हवाला का कारोबार करता है। हालाँकि, वह यह नहीं बताया कि पैसे कहाँ लगाता (investment) है। पुलिस को सबूतों के बिना इसे साबित करना मुश्किल होता जा रहा है।

पुलिस को रिजवान के घर छापेमारी के दौरान लगभग 14 लाख रुपए नकद मिले थे। उसके अलावा उसके घर से विदेशी करेंसी और महँगे गहने भी मिले थे। जाँच में तो यह बात भी सामने आई है कि रिजवान ने बांग्लादेश में करोड़ों रुपए की संपत्ति बनाई है। ऐसे में सवाल है कि जब रिजवान कोई काम नहीं करता तो उसके पास इतना रुपया कहाँ से आया। उसके खाते में रुपए कहाँ से आ रहे थे और कौन भेज रहा था।

मामले की गंभीरता को देखते हुए कानपुर पुलिस ने पहले ही इंटेलिजेंस एजेंसियों को पत्र लिखा था। इंटेलिजेंस ने भी इस परिवार को देश की सुरक्षा के लिए खतरा माना है। उसके पास से फर्जी दस्तावेज और बांग्लादेश समेत भारतीय पासपोर्ट मिले हैं। रिजवान पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल भी जा चुका है। ऐसे में यह मामला देश-विरोधी गतिविधियों से भी जुड़ा हुआ है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह परिवार साल 2016 से अवैध तौर पर भारत में रह रहा है। उसने कानपुर में ही हिना नाम की लड़की से निकाह भी कर लिया, जिससे उसे एक बेटा और दो बेटियाँ हैं। पुलिस की तरफ से मिली जानकारी के मुताबिक, पकड़े गए आरोपितों के कागजात कानपुर से समाजवादी पार्टी के विधायक हाजी इरफ़ान सोलंकी ने वेरिफाई किए थे।

पुलिस ने बताया कि सपा विधायक इरफ़ान ने न सिर्फ पकड़े गए आरोपितों को अपने आधिकारिक लेटर हेड पर भारतीय होने का सर्टिफिकेट दिया था, बल्कि उनके कागजातों को लगातार सत्यापित भी किया था। इससे उसने सभी का आधार कार्ड बनवाया था। इसके अलावा सपा पार्षद मन्नू रहमान ने साल 2019 में इन बांग्लादेशियों के भारतीय होने का प्रमाण पत्र जारी किया था।

रिजवान ने पुलिस को बताया था कि वह मूल रूप से बांग्लादेश के खुलना जिले का निवासी है। उसके घर से गिरफ्तार किए गए संदिग्धों की पहचान 79 साल के ख़ालिद माज़िद, 53 साल के रिज़वान मोहम्मद, 45 साल की हिना खालिद और 21 साल की रुखसार के तौर पर हुई। एक अन्य नाबालिग भी पुलिस हिरासत में है जो इसी परिवार का है।

विजय दिवस का दिन, भारत की मिट्टी और भारत की सेना का अपमान: चीन का यह ‘एजेंट’ राष्ट्रद्रोही नहीं तो और क्या है

16 दिसंबर भारतीय सेना के शौर्य का वह पन्ना है, जिसमें उसने दुनिया का मानचित्र बदल दिया था। 1971 की इसी तारीख को 93000 पाकिस्तानी फौजियों ने भारत के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया था। बांग्लादेश नाम के एक नए राष्ट्र का जन्म हुआ था। 2022 की इसी तारीख को राहुल गाँधी ने भारतीय सेना के उस शौर्य को अपमानित करने का काम किया है।

उन्होंने कहा है कि ‘अरुणाचल प्रदेश में चीन भारत के जवानों को पीट रहा है’। वे ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान मीडिया से बात कर रहे थे। इस दौरान राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उनके बगलगीर थे। तवांग में हाल में भारत और चीन के बीच हुई हिंसक झड़प को लेकर बात करते हुए कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने यह टिप्पणी की।

तवांग में झड़प 9 दिसंबर 2022 को हुई थी। अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में चीनी फौजियों ने एलएसी को पार करने की कोशिश की थी। लेकिन 17000 फीट की ऊँचाई पर चीन के 300 से अधिक फौजियों को भारत के 50 सैनिकों ने ही रोक दिया था। भारतीय सेना की बैकअप टीम के पहुँचने के बाद वे अपने पोस्ट्स में लौटने को मजबूर हो गए थे।

भारतीय सेना ने अपने बयान में कहा था, “चीनी सेना के सैनिकों ने तवांग सेक्टर में एलएसी को पार करने की कोशिश की। भारतीय सैनिकों ने दृढ़ता और मजबूती के साथ इसका मुकाबला किया। आमने-सामने की इस लड़ाई में दोनों पक्षों के कुछ सैनिकों को मामूली चोटें आईं हैं। हालाँकि, अब दोनों पक्ष पीछे हट गए हैं।” रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद को बताया था कि चीनी फौज ने अतिक्रमण कर यथास्थिति को एकतरफा रूप से बदलने का प्रयास किया था। लेकिन भारतीय सेना ने पूरी दृढ़ता और बहादुरी से उन्हें पोस्ट्स में धकेल दिया था।

इस बीच एक वीडियो भी वायरल हुआ था। इसमें चीनी फौजियों पर भारतीय सैनिक दनादन लाठी बरसाते नजर आए थे। इसके बाद दुश्मन फौज भाग खड़ी हुई थी। यह वीडियो कब का और कहाँ का है, यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन यह तो स्पष्ट ही है कि चीनी फौजियों की पिटाई हो रही है। भारतीय जवान उन्हें पीट रहे हैं। जिस गलवान में चीन ने धोखे से वार किया था, वहाँ भी उसे भारतीय सैनिकों के शौर्य के कारण मुँह की खानी पड़ी थी। पीछे हटना पड़ा था।

वैसे तो राष्ट्रीय सुरक्षा वह विषय होता है, जिस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। लेकिन हम कॉन्ग्रेस से इसकी अपेक्षा नहीं कर सकते। चीन से सीक्रेट डील, गुपचुप मुलाकातें, राजीव गाँधी फाउंडेशन को चंदा ये सब जगजाहिर हैं। बावजूद इसके भारत की जमीन से किसी को भारतीय सेना को अपमानित करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। भले देश ने उसके परिवार के तीन व्यक्तियों को प्रधानमंत्री चुना हो। भले उसकी माँ को पर्दे के पीछे से 10 साल तक सत्ता चलाने का लाइसेंस दिया हो। भले उसे संसद में बैठने का जनमत वायनाड ने दिया हो। भले वह ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के नाम पर 100 दिन चलने के बाद सठिया गया हो।

‘अरुणाचल में चीन भारत के जवानों को पीट रहा है’, यह कहना राष्ट्रद्रोह है। ऐसा कहने वाले व्यक्ति के साथ राजनीतिक तरीके से नहीं, कानूनी तरीके से निपटा जाना चाहिए।

हूरों के लिए मंदिर उड़ाना चाहता था मोहम्मद शरीक, ‘आतंकवादी’ कहने से भड़की कॉन्ग्रेस: इस्लामी आतंकियों के लिए फिर दिखी ‘ओसामा जी’ वाली मोहब्बतें

कर्नाटक कॉन्ग्रेस (Karnataka Congress) के अध्यक्ष डीके शिवकुमार (DK Shivkumar) ने मंगलुरु बम विस्फोट के आरोपित मोहम्मद शरीक को क्लिनचिट दे दी। शिवकुमार ब्लास्ट को वोट की राजनीति से जोड़ते हुए गुरुवार (15 दिसंबर 2022) को कहा कि यह विस्फोट एक गलती थी।

शिवकुमार ने आतंकी गतिविधियों के आरोपित शरीक का बचाव करते हुए कहा, “बिना जाँच के उन्होंने (सरकारी एजेंसियों ने) उसे आतंकवादी कैसे घोषित कर दिया? क्या यह मुंबई जैसा आतंकी हमला था? यह कुछ भी नहीं है। किसी ने इसे गलती से किया होगा।”

जाँच में मोहम्मद शरीक को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे हो चुके हैं। उसके कुख्यात आतंकी संगठन ISIS से संबंध सामने आ चुके हैं। इतना ही नहीं, हमले को अंजाम देने से पहले वह ऑटो में हिंदू नाम से बैठा था, ताकि किसी को कोई शक ना हो। ये सारी बातेें एजेंसियों की जाँच में सामने चुकी हैं।

पुलिस का कहना है कि गिरफ्तार आरोपित मोहम्मद शरीक मंदिर को निशाना बनाना चाहता था, लेकिन बम ऑटो में ही फट गया था। कर्नाटक के स्वास्थ्य मंत्री के सुधाकर ने कहा है कि मोहम्मद शरीक खुद को हिंदू बता रहा था।  इसके लिए उसने एक आधार कार्ड दिखाया था, जिस पर हिंदू नाम था। उसने यह आधार कार्ड रेलवे कर्मचारी से चुराया था।

आरोपित मोहम्मद शरीक के घर से भारी मात्रा में विस्फोटक सामग्री, एक मोबाइल फोन, दो फर्जी आधार कार्ड, एक पैन कार्ड, डेबिट कार्ड बरामद हुए हैं। विस्फोटक बनाने में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों में जिलेटिन पाउडर, सर्किट बोर्ड, छोटे बोल्ट, बैटरी, वुड पावर, एल्युमीनियम मल्टी मीटर, तार, मिक्सचर जार, प्रेशर कुकर आदि बरामद हो चुके हैं।

जाँच में यह बात भी सामने आ चुकी है कि शरीक इस्लामिक स्टेट (ISIS) के हैंडलर अराफात अली के संपर्क में था। अराफात पहले ही दो मामलों में आरोपित है और अल-हिंद मॉड्यूल मामले के आरोपी मुस्सविर हुसैन के संपर्क में था। यही नहीं, शरीक दो तीन अन्य संदिग्धों के भी संपर्क में था।

पुलिस के हवाले से कहा गया है कि मोहम्मद शरीक बिटकॉइन में ट्रेडिंग करता था और इससे कमाए हुए पैसे को क्रिप्टो करेंसी के द्वारा अपने सहयोगियों को भेजता था। इतना ही नहीं, वह मैसूर में जहाँ रहता था वहाँ खुद का नाम प्रेम राज बताता था। ISIS की मदद से देश में खलीफा का शासन लाने के प्रयास कर रहा था। उसने अपने जैसे 40 लोगों को ट्रेंड किया था।

मोहम्मद शरीक की मौसी ने बताया कि था शरीक घर की औरतों को हिंदुओं से बातें नहीं करने देता था। फरवरी 2020 में जो शिवमोगा की दीवारों पर लश्कर और ISIS के समर्थन में नारे लिखे गए थे, उसमें शरीक और उसके साथियों का हाथ था। वह हमेशा कहता, “मेरा तो सब कुछ अल्लाह है। कुछ ऐसा करूँगा कि जन्नत में 72 हूरें मिलेंगी, वही मेरी असली दुनिया है।”

मोहम्मद शरीक को लेकर इतनी जानकारी सार्वजनिक हो जाने के बावजूद शिवकुमार उसकी खुलेआम तरफदारी की है। हालाँकि, ऐसा करके कॉन्ग्रेस नेता शिवकुमार कुछ अलग नहीं किया है। कॉन्ग्रेस की राजनीति में ऐसा करने की एक पुरानी परंपरा है। देश में जब-जब इस तरह की आतंकी घटनाएँ होती हैं, कोई न कोई कॉन्ग्रेस नेता इस तरह बयान दे देता है, जो सुरक्षा एजेंसियों की मोरल को डाउन करने वाला होता है।

कॉन्ग्रेस में आतंकियों को जी कहने और एनकाउंटर में उनकी मौत पर होने पर आँखों से गंगा-जमुना की धारा भी बही हैं। इतना ही नहीं, इस्लामी आतंकवाद के प्रतिक्रिया में संतुलन स्थापित करने के लिए ‘हिंदू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंकवाद’ जैसे शब्द भी गढ़े गए।

पीएम मोदी और सीएम योगी के राजनीति से प्रेरित होकर राहुल गाँधी अब मंदिर-मंदिर घूम रह रहे हैं। जिस कॉन्ग्रेस में कभी नेता खुलेआम मंदिर में जाने की तस्वीर तो दूर, तिलक लगाए हुए तस्वीर तक शेयर नहीं करते थे, उसमें अब राहुल गाँधी अब त्रिपुण्ड लगाकर तस्वीरें साझा करते हैं। यह मोदी-योगी की राजनीति को काउंटर करने का बस राजनीतिक प्रयास है।

इस प्रयास में एक तरफ कॉन्ग्रेस हिंदुओं को साधने का प्रयास कर रही है तो दूसरी तरफ शिवकुमार जैसे नेता मुस्लिम जैसे सबसे बड़े अल्पसंख्यक वोट बैंक को अपने हाथ से निकलने देना नहीं चाहते हैं। मुस्लिम समुदाय एकमुश्त और एकतरफा वोट देने की रणनीति पर काम करता है। इसलिए इसके वोट आज भी कॉन्ग्रेस के लिए मायने रखते हैं।

कभी ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम (BDM) की राजनीति करने वाली कॉन्ग्रेस ब्राह्मण और दलित तो छिटक ही चुके हैं, जिन राज्यों में प्रभावशाली क्षेत्रीय दल हैं, वहाँ मुस्लिम भी साथ छोड़ चुके हैं। ऐसे में शिवकुमार जैसे नेता हिंदुओं और मुस्लिम के वोट के बीच संतुलन साधने की अभी भी कोशिश कर रहे हैं।

ये हुई राजनीति की बात, लेकिन क्या राजनीति देश की सुरक्षा है अहम है? कॉन्ग्रेस के लिए शायद यह अहम है। शायद करते हैं मालेगाँव ब्लास्ट कांड। कहा जाता है कि इसमें तत्कालीन कॉन्ग्रेस की सरकार ने मुख्य आरोपितों की जगह हिंदुओं की फँसाने की साजिश की और कर्नल पुरोहित, असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जैसे लोगों को फँसाया भी गया।

उस समय के तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने ‘हिंदू आतंकवाद’ और ‘हिंदू आतंकवाद’ का जुमला गढ़ा और अपने मुस्लिम वोटरों को लुभाने की कोशिश की। यह देश की सुरक्षा की कीमत पर देश में की जाने वाली कॉन्ग्रेस की राजनीति थी। ये वो दौर था जब देश में आतंकवादी संगठनों ने अपने पाँव जमा लिए थे।

तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी भगवा आतंक का नारा दिया था और संघ पर आतंकी कैंप चलाने का आरोप लगाया था। शिंदे के इस बयान का पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जमात-उद-दावा ने समर्थन किया था और शिंदे की तारीफ की थी।

इतना ही नहीं, कॉन्ग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने क्रूर आतंकी ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ और आतंकी हाफिज सईद को ‘हाफिज साहब’ कहा था। ये कॉन्ग्रेस की उसी सोच का नतीजा है, जिस सोच के तहत आज शिवकुमार मोहम्मद शरीक को क्लीनचिट दे रहे हैं।

इसी तरह 2008 में दिल्ली के जामिया नगर में हुए बाटला हाउस एनकाउंटर में दो आतंकियों के मारे जाने के बाद कॉन्ग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गाँधी की आँखों में आँसू आ गए थे। यह बात कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने खुद कही थी। खुर्शीद ने उस समय कहा था कि सोनिया जी को जब एनकाउंटर में 2 लोगों के मारे जाने का पता चला तो उनकी आँखों से आँसू आ गए थे।

तुष्टिकरण की राजनीति सिर्फ कॉन्ग्रेस के खून में है, ऐसा नहीं है। बाटला एनकाउंटर के दौरान पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी सवाल उठाया था। ममता बनर्जी ने जामिया नगर में एक कार्यक्रम किया था बाटला हाउस एनकाउंटर की न्यायिक जाँच की माँग की थी।

ममता बनर्जी ने कॉन्ग्रेस की ही भाषा बोलते हुए कहा था कि बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी है। उस समय ममता बनर्जी ने यह भी कहा था कि अगर इस एनकाउंटर को लेकर वह झूठा साबित होती हैं तो वे राजनीति छोड़ देंगी। हालाँकि, समय के साथ साबित हो चुका है कि बाटला हाउस एनकाउंटर फर्जी नहीं था।

इस तरह कॉन्ग्रेस में तुष्टिकरण की राजनीति की एक पूरी विधा है, जो पंडित जवाहरलाल नेहरू से होते हुए वर्तमान के शिवकुमार तक चल रही है। इस विधा में दंगों को लिए बहुमत वाली जनसंख्या को दोषी ठहराने से लेकर देश के संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला बताने तक की थ्योरी है। इसके साथ ही आतंकियों को जाँच के दौरान ही क्लीनचिट देना तो आम बता है।   

‘मेरी मौत पर कुरान मत पढ़ना… जश्न मनाना, संगीत बजाना’: हिजाब विरोधी 23 साल के युवक को ईरान में फाँसी, Video वायरल

ईरान में हिजाब विरोधी 23 साल के एक युवक को सोमवार (12 दिसंबर 2022) को फाँसी पर लटका दिया गया। उसका एक वीडियो वायरल है। बताया जा रहा है कि यह वीडियो उसको फाँसी पर लटकाए जाने से ठीक पहले का है। माजीदरेजा रेहनवर्द नाक के इस युवक को मशहद शहर में सरेआम फाँसी दी गई।

वीडियो में रेहनवर्द कह रहा है कि उसकी मौत का मातम नहीं मनाया जाना चाहिए। उसकी मौत के बाद कोई कुरान न पढ़े। वीडियो को ईरानी ह्यूमन राइट एनजीओ के डायरेक्टर महमूद अमीरी ने अपने ट्विटर हैंडल से शेयर किया है। वीडियो में रेहनवर्द की आँखों पर पट्टी बँधी है। दो नकाबपोश गार्डों ने उसे घेर रखा है।

वीडियो में वह स्थानीय भाषा में कह रहा है, “मैं नहीं चाहता है कि कोई मेरी मौत पर मातम मनाए। किसी भी तरह की दुआ न करे। मेरी कब्र पर मातम न मनाया जाए। मैं नहीं चाहता कि कोई कुरान या नमाज पढ़े। सभी लोग मेरी मौत का जश्न मनाएँ, संगीत बजाएँ, खुश रहें।”

दरअसल, रेहनवर्द पर प्रदर्शन के दौरान 2 पुलिस अफसरों को जान से मारने के इल्ज़ाम थे। इसलिए तेहरान की अदालत ने उसे मौत की सजा सुनाई थी। उस पर 4 अन्य अफसरों पर हमला करने का भी इल्ज़ाम था। 12 दिसंबर, 2022 को रेहनवर्द को फाँसी दी गई। उससे चार दिन पहले यानी 8 दिसंबर 2022 को 23 साल के मोहसिन शेखरी को भी फाँसी की सजा दी गई थी। उस पर भी एंटी हिजाब प्रदर्शनों के दौरान पुलिसवालों पर हमला करने का आरोप था।

प्रोटेस्ट मॉनिटर सोशल मीडिया हैंडल 1500tasvir ने एक ट्वीट कर जानकारी दी है कि फाँसी दिए जाने तक माजीदरेजा रेहनवर्द के परिवार को कोई जानकारी नहीं दी गई। ट्वीट में रेहनवर्द और उसकी माँ की तस्वीर भी शेयर की गई है। साथ ही लिखा गया है कि रेहनवर्द की माँ फाँसी से पहले उससे मिली थीं। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट थी। रेहनवर्द की माँ को बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि उसे मार दिया जाएगा।

आपको बता दें ईरान में महीनों से सरकार विरोधी प्रदर्शनों ने शासन को हिला कर रख दिया है। ईरान में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन 16 सितंबर को 22 साल की एक लड़की महसा अमिनी की मौत के बाद शुरू हुए थे। पुलिस ने महसा को हिजाब नहीं पहनने के लिए गिरफ्तार किया था। कस्टडी में उसकी जान चली गई थी। ईरान सरकार प्रदर्शनों को दबाने की पूरी कोशिश कर रही है। लोगों में डर पैदा करने के लिए विरोध में शामिल नौजवानों को सरेआम फाँसी दी जा रही है।