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न भूतो, न शायद भविष्यति: गुजरात में BJP की यह जीत बेमिसाल, 5 साल की सत्ता में ही आ जाता है ढलान-ये 24 साल बाद दे रहे ‘बेस्ट’

गुजरात के विधानसभा चुनाव (Gujarat Assembly Election 2022) में भाजपा को मिली लैंडस्लाइड विक्ट्री ने सारे राजनीतिक विश्लेषकों को अचंभे में डाल दिया है। प्रदेश में इस बार भाजपा ना सिर्फ 7वीं बार सरकार बना रही है, बल्कि गुजरात राज्य के गठन से लेकर आज तक इतिहास में सबसे प्रचंड बहुमत प्राप्त करने का भी रिकॉर्ड बनाया है।

इससे पहले माधव सिंह सोलंकी (Madahv Singh Solanki) के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ने साल 1985 में 149 सीटें जीती थीं। गुजरात के गोधरा में हुए नरसंहार और उसके बाद दंगों के बाद हुए साल 2002 के चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 127 सीटें जीती थीं। इस बार भाजपा ने 156 सीटें जीती हैं।

यह प्रचंड बहुमत इसलिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह उस पार्टी को मिला है, जो पिछले 24 सालों लगातार राज्य की सत्ता में है। आमतौर पर लगातार दो टर्म के बाद किसी भी पार्टी को सत्ता विरोधी लहर के कारण अपनी सीट बचाना मुश्किल होता है। हालाँकि, भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे अपवाद भी हैं, जो लगातार तीन या चार टर्म तक सत्ता पर काबिज रहे, लेकिन अंतत: उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा।

भाजपा के मामले में जनता का भरोसा घटे के बजाय में सरकार में बढ़ा ही है। यह अलग बहस का मुद्दा हो सकता है कि इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा और उनकी कार्यकुशलता सबसे बड़ा बड़ा फैक्टर रही है। हालाँकि, कुछ अन्य कारकों ने भी इसमें सहयोग दिया है, जिसके कारण भाजपा की सीटों में बढ़ोत्तरी हुई है।

जैसे कि सरकार विरोधी लहर को खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री सहित पूरी कैबिनेट को बदल देना, बुजुर्ग नेताओं की जगह युवकों को पार्टी में आगे करना, हार्दिक पटेल एवं अल्पेश ठाकोर जैसे उभरते चेहरों को भाजपा में शामिल करना, विरोधी गुटों को भाजपा में मिला लेना, भाजपा सरकार में विश्वास सहित कई अन्य फैक्टर हैं, लेकिन ये सभी सीधे पीएम मोदी से जुड़े हैं और उन्हीं के नेतृत्व में इसे क्रियान्वित किया गया।

ऐंटी इनकम्बेंसी को दूर कर राज्य की आधी आबादी का वोट हासिल करना अपने आपमें एक बड़ा मिसाल है। 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 52 प्रतिशत वोट मिले हैं, जो वहाँ की सरकार और नरेंद्र मोदी में विश्वास को दिखाता है। यह विश्वास कानून-व्यवस्था से लेकर विकास का विश्वास है। भारतीय संस्कृति के गौरवगान से लेकर गुजराती संस्कृति की अस्मिता की पहचान का विश्वास है।

बिहार में लालू प्रसाद यादव लगातार 15 सालों तक सत्ता में रहे। इस दौरान उन पर कई तरह के आरोप लगे। अगड़ों-पिछड़ों के बीच खाई को चौड़ी करने से लेकर बिहार में नरसंहार तक दौर, अपहरण का कुटीर उद्योग के रूप में विकसित हो जाना आदि की ऐसे कारक रहे, जो लालू सरकार को वैश्विक स्तर पर बदनाम कर दिया। बिहार में लालू का शासनकाल जंगलराज कहलाने लगा और जातिवादी की राजनीति करने के बावजूद उन्हें सत्ता से बेखल होना पड़ा था।

ऐसा ही हाल पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार का रहा था। पश्चिम बंगाल में सीपीएम (CPI-M) ने लगातार 34 वर्षों तक शासन किया और अंतत: सरकार गिर गई। गुजरात में एक पिछले सात चुनावों के आँकड़ें देखे तो स्पष्ट हो जाएगा कि राज्य की जनता का भाजपा में विश्वास बढ़ता गया है। वहीं बंगाल में 1977 लो शासन करने वाली CPM के वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी और फिर गिरावट देखने को मिली और 2011 में अंतत: सत्ता से बाहर हो गई। गुजरात में भाजपा की स्थिति और नरेंद्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व को उनके विरोधी भी स्वीकार करते हैं। उन्हीं विरोधियों में एक पत्रकार राजदीप सरदेसाई भी हैं, जिन्होंने अंतत: इस करिश्मे को स्वीकार किया है।

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ऐसी कुछ हालात CPI के हाथ से TMC की ममता बनर्जी के हाथ में सत्ता को लेकर भी है। ममता बनर्जी 2011 में पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं। इन 11 सालों में उनके खिलाफ जनता में लगातार आक्रोश बढ़ रहा है, लेकिन सांप्रदायिकता एवं ध्रुवीकरण की राजनीति के कारण वह सत्ता में बनी हुई हैं। प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति, आतंकवाद में बढ़ोत्तरी जैसे कारणों से जनता परेशान है और बदलाव की संभावना तलाश रही है। ऐसा पिछले विधानसभा चुनावों के परिणामों से सामने आ चुका है।

ओडिशा में भी बीजू जनता दल के नवीन पटनायक सन 2000 से सरकार चला रहे हैं। इन 22 सालों में उनके खिलाफ भी सत्ता विरोधी लहर चली और सीटें भी कम हुई, लेकिन इस तरह की मिसाल नहीं पेश कर पाए। हालाँकि, ओडिशा में इसके पीछे कई कारक हैं। ओडिशा वनवासी प्रधान राज्य है और वहाँ के वनवासियों में अभी अपने अधिकारियों को लेकर उतनी जागरूकता नहीं आई है। उनमें शिक्षा का अभाव है। ऐसे में धर्मांतरण और कानून व्यवस्था के बुरे हालात होने के बावजूद सरकार कायम है। हालाँकि, जिस तरह के बदलाव अब दिखने शुरू हुए हैं, उससे अब बहुत लंबे समय की उम्मीद नहीं की जा सकती।

बिहार के नीतीश कुमार ने भी बिहार में 22 सालों से मुख्यमंत्री हैं। साल 2000 में उन्होंने भाजपा की मदद से सरकार बनाई। प्रदेश में सब ठीक चला, लेकिन उनकी राजनैतिक महत्वकांक्षा ने बिहार के हालात को बदतर करने शुरू कर दिए। बाद में वे विरोधी राजद के संग जाकर सीएम बने रहे। फिर भाजपा के साथ और फिर राजद के साथ जा मिले। इस तरह वे 22 सालों से मुख्यमंत्री हैं। लेकिन ये कहना है कि उनकी या उनके पार्टी की लोकप्रियता के कारण वे सत्ता में हैं तो यह सही नहीं होगा। नीतीश कुमार सिर्फ पक्ष और विपक्ष के बीच नंबर गेम को लेकर और दल-बदल की नीति के कारण सत्ता में बने हुए हैं। उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता में बढ़ोत्तरी के बजाये गिरावट ही नजर आ रही है।

गुजरात विधानसभा चुनाव में इस बार प्रदेश की जनता ने जो मिसाल पेश की है, वह भारतीय राजनीति में संभवत: सिर्फ एक बार देखने को मिली थी और वह थी इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सहानुभूति की लहर पर कॉन्ग्रेस को लोकसभा चुनावों में रिकॉर्ड बहुमत देना। 1984 के लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस ने 414 सीटें जीतकर रिकॉर्ड कायम किया था, जो आज तक बरकरार है। हालाँकि, राजीव गाँधी की उस जीत और गुजरात के इस जीत में जमीन-आसमान का अंतर है और भारतीय राजनीति में बिना शुचिता एवं निष्ठा वाली शायद ही कोई पार्टी इसे दोहरा सकेगी।

चेहरा, स्तन, नितंब, गुप्तांग… ईरान में हिजाब विरोधी महिलाओं को खास जगहों पर टारगेट कर फौजी मार रहे गोली: डॉक्टर-नर्सों के हवाले से दावा

इस्लामिक देश ईरान में हिजाब विरोधी प्रदर्शन जारी हैं। इस बीच कुछ रिपोर्टों में बताया गया है कि महिला प्रदर्शनकारियों के विशेष जगह को टागरेट कर फौज निशाना बना रही है। घायल महिला प्रदर्शनकारियों का इलाज करने वाले डॉक्टर-नर्सों के हवाले से यह जानकारी दी गई है। बताया गया है कि फौजी महिलाओं के चेहरे, स्तन और गुप्तांगों को निशाना बनाकर शॉटगन पैलेट्स (एक प्रकार की गोली या छर्रे) दाग रही है।

द गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ईरान में कई डॉक्टर और नर्स हिजाब विरोधी प्रदर्शन में घायल हुए लोगों का इलाज कर रहे हैं। गिरफ्तारी से बचने के लिए ये लोग गुप्त रूप से इलाज कर रहे हैं। घायलों का इलाज कर रहे डॉक्टर्स का कहना है कि उन्होंने नोटिस किया है कि ईरानी फौज महिलाओं के गुप्तांगों को निशाना बना रही है।

रिपोर्ट में डॉक्टर्स के हवाले से कहा गया है कि उपचार के लिए आने वाली औरतों के पैर, नितंब, पीठ, स्तन और गुप्तांगों पर घाव देखे जा रहे हैं। ईरान के इस्फ़हान प्रांत के एक डॉक्टर ने कहा है, “ईरानी सेना के सुरक्षा अधिकारी पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग तरीकों से टारगेट कर रहे हैं। वे महिलाओं की सुंदरता को नष्ट करना चाहते हैं।”

डॉक्टर ने यह भी कहा है, “करीब 20 साल की एक महिला का मैंने इलाज किया था। उसके जननांगों में दो पैलेट्स मारे गए थे, जबकि भीतरी जाँघ में दस पैलेट्स लगे थे। इन 10 पैलेट्स को मैंने आसानी से हटा दिया गया था, लेकिन वे दो पैलेट्स सबसे बड़ी समस्या बन हुए थे। दरअसल, ये पैलेट्स उसके मूत्रमार्ग और वजाइना के बीच में फँसे हुए थे।”

द गार्जियन से हुई बातचीत में डॉक्टर ने यह भी कहा, “उस महिला को वजाइनल इंफेक्शन होने का खतरा था, इसलिए मैंने उसे एक विश्वसनीय स्त्री रोग विशेषज्ञ के पास जाने के लिए कहा। घायल हुए महिला ने मुझे बताया था कि जब वह विरोध कर रही थी, तब करीब 10 सुरक्षा अधिकारियों ने उसे घेर लिया था। इसके बाद, उसकी जाँघों और वजाइना में पैलेट्स मारे थे।”

ईरानी सेना की ‘क्रूरता’ में घायल प्रदर्शनकारी (फोटो: द गार्जियन)

ईरान की कट्टरपंथी सरकार की क्रूरता की कुछ फोटोज भी सामने आईं हैं। इन फोटोज में महिलाओं के शरीर पर पैलेट्स की बौछार साफ-साफ देखी जा सकती है। कहा जा रहा है कि इन पर ये पैलेट्स काफी करीब से मारे गए थे।

बता दें कि ईरान में इसी साल 13 सितंबर को महसा अमिनी नाम की एक ईरानी महिला को हिजाब न पहनने के कारण गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद, 16 सितंबर को पुलिस कस्टडी में उसकी मौत गई थी। महसा अमीनी की मौत के बाद से ईरान गृह युद्ध की स्थिति में है। वहाँ, लगातार हिजाब विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं।

हालात यह हैं कि ईरान के लगभग हर शहर में महिलाएँ हिजाब कानून के खिलाफ सड़कों पर उतरी हुई हैं। ईरान में महिलाएँ सरकार के लिए मुश्किल का सबसे बड़ा सबब बन गई हैं। न तो वो हिजाब पहनने को तैयार हैं और न ही बाल ढंकने को तैयार हैं। शुरुआत में इस प्रदर्शन में सिर्फ महिलाएँ शामिल थीं। लेकिन, धीरे-धीरे पुरुषों का एक बड़ा वर्ग भी शामिल हो गया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वह अंतिम सांस तक अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहेंगे। प्रदर्शन अब ईरान के सभी 31 प्रांतों के 164 शहरों में फैल चुका है। 

हिजाब विरोधी प्रदर्शन से ईरान में अब तक सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। प्रदर्शनों से घबराई हुई इब्राहिम रईसी सरकार दमन पर उतारू है। कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा वाली सरकार ने वहाँ इंटरनेट सर्विस भी बंद कर दी थी। यही कारण है कि वहाँ से काफी कम जानकारी सामने आ रही है।

तिलक, कलश, भगवान की मूर्ति: आमिर खान की ‘आरती’ पर दोतरफा धुलाई, कट्टरपंथियों ने बताया काफिर; नेटिजन्स ने बताया बायकॉट से बचने का ड्रामा

बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान (Aamir Khan) ने हाल ही में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार कलश पूजा की। आमिर खान प्रोडक्शन हाउस के नए ऑफिस में हुई इस पूजा के दौरान उनकी एक्स वाइफ किरण राव (Kiran Rao) भी मौजूद रहीं। आमिर और किरण ने पूजा के बाद एक साथ आरती की। ‘लाल सिंह चड्ढा’ के निर्देशक अद्वैत चंदन (Advait Chandan) ने गुरुवार (8 दिसंबर 2022) को अपने इंस्टाग्राम पर आमिर खान की पूजा और आरती करते हुए कुछ तस्वीरें साझा की हैं। इन तस्वीरों में पूजा में ​हिस्सा लेने वाले अन्य स्टाफ मेंबर्स भी दिखाई दे रहे हैं।

ऑफिस में पूजा के मौके पर आमिर एक स्वेटशर्ट और डेनिम के साथ गले में गमछा पहने हुए नजर आए। इसके साथ ही उन्होंने मराठी टोपी और माथे पर तिलक लगाया हुआ था, उनके सामने भगवान की तस्वीर थी जिसकी वो पूजा कर रहे थे।

सोशल मीडिया पर आमिर और किरण की पूजा करते हुए फोटो वायरल होने के बाद कुछ लोग जहाँ उनकी तारीफ कर रहे हैं, वहीं उससे ज्यादा उनके इस लुक पर सवाल उठा रहे हैं। कुछ का कहना है कि लगातार फिल्में बॉयकॉट होने के बाद पूजा-पाठ करके दिखाना केवल ड्रामा है। वहीं कुछ उनसे उनका असली मजहब पूछ रहे हैं।

(फोटो साभार: अद्वैत चंदन इंस्टाग्राम)

मुस्लिम यूजर्स उन्हें ट्रोल कर रहे हैं। उन्हें काफिर कह रहे हैं। पठान लिखता है, “अरे, कलश पूजा क्यों। सर आप बता क्यों नहीं देते अपना असली मजहब। क्या आप हिंदू हैं, तब क्या जरूरत है मुस्लिमों को आपको गलत सलत कमेंट करने की।”

(फोटो साभार: अद्वैत चंदन इंस्टाग्राम)

आतिक शेख ने इन तस्वीरों पर कमेंट किया है कि ये काफिर है।

(फोटो साभार: अद्वैत चंदन इंस्टाग्राम)

आमिर खान के पूजा करने से आक्रोशित मुस्लिमों को कुछ हिंदू यूजर्स ने करारा जवाब देते हुए लिखा, “अपनी फैमिली की तीन जनरेशन पीछे जाएगा तो तुम्हारे बड़े भी काफिर ही मिलेंगे। एक मुल्ले के कहने पर अपने से बड़ों का अपमान मत करो।” इसके बाद आतिक शेख आमिर खान का बचाव करने वालों को गालियाँ देता है।

(फोटो साभार: अद्वैत चंदन इंस्टाग्राम)

आमिर खान-किरण राव का तलाक

बता दें कि कुछ साल पहले आमिर खान ने बताया था कि उनकी पत्नी भारत में सुरक्षित महसूस नहीं करतीं और देश छोड़ने को बोलती हैं। उनके इस बयान के बाद लोग उन पर और उनकी पत्नी पर खासा नाराज हुए थे। लोगों ने सलाह भी दी थी कि अगर ऐसा है तो उन्हें देश छोड़ देना चाहिए, यहाँ काम नहीं ढूँढना चाहिए।

आमिर का यह बयान साल 2015 में आया था। इसके बाद समय-समय पर लोगों ने इसे आधार बनाकर उन्हें हिंदूविरोधी, भारत विरोधी बताया। उनकी फिल्मों का बहिष्कार भी हुआ। हालाँकि कुछ साल बाद खबर आई कि दोनों पति-पत्नी अलग हो रहे हैं।

किरण राव और आमिर खान ने पिछले वर्ष जुलाई में संयुक्त बयान जारी कर तलाक लेने की जानकारी साझा की थी। संयुक्त बयान में दोनों ने कहा था कि ये 15 वर्ष इतने अच्छे बीते कि हमने इस दौरान आजीवन साथ रहने वाले अनुभव एक-दूसरे के साथ साझा किया। उन्होंने कहा था, “हम साथ में खुश रहे, हँसे। हमारा रिश्ता विश्वास, प्यार और सम्मान के मामले में लगातार बढ़ता ही रहा। अब हमने निर्णय लिया है कि अब हम जीवन के नए अध्याय की शुरुआत करेंगे, लेकिन पति-पत्नी के रूप में नहीं, ये बेटे आज़ाद के अभिभावक के रूप में होगा, एक परिवार के रूप में होगा।”

50 साल का असलम खान बन गया पुलिस अधिकारी संजय, नाबालिग हिंदू लड़की से कर रहा था शादी; वरमाला के बाद पोल खुली तो भागा

झारखंड के बोकारो से लव जिहाद (Bokaro Love Jihad) का मामला सामने आया है। आरोपित असलम खान पहचान बदलकर एक नाबालिग हिंदू लड़की से शादी कर रहा था। वरमाला के बाद पोल खुलते ही वह फरार हो गया। पीड़ित परिवार ने बताया है कि खुद को संजय कसेरा बताने वाले असलम ने झाँसे में लेकर उन्हें बंधक बना रखा था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक असलम उर्फ फिरोज धनबाद के भूली का रहने वाला है। वह पीड़ित हिन्दू परिवार के करीब संजय बनकर आया था। जानकारी के मुताबिक लड़की के घरवाले कुछ महीने पहले लोन के लिए बैंक गए थे। यहीं असलम उन्हें मिला था। उसने अपना नाम संजय कसेरा बताया। पीड़ित परिवार भी कसेरा है। उसने खुद को बैंक अधिकारी बताते हुए लोन दिलाने का भरोसा दिलाया।

इसके बाद वह लोन के बहाने पीड़ित परिवार के घर आने जाने लगा। उनसे करीबी बढ़ाई। कुछ दिन बाद वह पुलिस की वर्दी में आने लगा और कहा कि अब वह पुलिस अधिकारी बन गया। घर दिलाने की बात कहकर पीड़ित परिवार को एक मकान में ले गया और कथित तौर पर बंधक बना लिया। उनकी नाबालिग बेटी से शादी की इच्छा जाहिर की। गरीबी की वजह से परिवार एक अधेड़ से अपनी बेटी की शादी करने को तैयार हो गया।

पीड़ित परिवार ने बताया कि आरोपित ने शादी का पूरा खर्च स्वयं उठाने की बात भी कही थी। बुधवार (7 दिसंबर, 2022) को असलम बारात लेकर नाबालिग हिंदू लड़की से शादी करने पहुँचा। लेकिन वरमाला के बाद पंडाल बनाने वाले एक मजदूर ने उसे पहचान लिया। उसने बताया कि यह असलम है और कुछ साल पहले उसके साथ जेल में बंद था। इसी दौरान किसी ने पुलिस को सूचना दे दी। पुलिस को देखते ही असलम फरार हो गया।

मौके पर पहुँची पुलिस ने जब अधेड़ दूल्हे की तस्वीर देखी तो सच्चाई सबके सामने आ गई। पुलिस ने जानकारी दी कि यह शख्स संजय कसेरा[ बल्कि असलम है। पुलिस ने असलम की अल्टो कार को जब्त किया है। इसमें से पुलिस की नकली वर्दी, चिड़ीमार बंदूक सहित अन्य सामान बरामद किए गए हैं।

पुलिस के मुताबिक आरोपित असलम पहले भी चास थाना क्षेत्र के एक मामले में जेल की हवा खा चुका है। वह इसी तरह झाँसा देकर गरीब हिन्दू परिवार की लड़कियों को फँसाने का काम करता है। पुलिस आरोपित की तलाश कर रही है। लड़की के नाबालिग होने के कारण उसके घरवालों से भी पूछताछ की जा रही है।

‘गैर-मुस्लिमों को शिक्षा दो, मजहबी शिक्षा नहीं’: NCPCR ने राज्यों को दिए मदरसों की विस्तृत जाँच और मैपिंग के आदेश, 30 दिन में देनी होगी रिपोर्ट

राष्ट्रीय बाल अधिकार संक्षरण आयोग (NCPCR) ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर गैर-मुस्लिम बच्चों को दाखिला देने वाले मदरसों की विस्तृत जाँच करने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही मुख्य सचिवों को सभी मदरसाें की मैपिंग के भी निर्देश दिए गए हैं।

एनसीपीसीआर के चेयरमैन प्रियांक कानूनगो ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को पत्र लिख कर निर्देश जारी किए हैं। एनसीपीसीआर प्रमुख ने अपने निर्देशों में कहा कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संक्षरण आयोग सभी सरकारी वित्त पोषित/ मान्यता प्राप्त मदरसों की विस्तृत जाँच करने की सिफारिश करता है जो गैर-मुस्लिम बच्चों को प्रवेश दे रहे हैं।

एनसीपीसीआर ने पत्र में कहा कि उसे कई शिकायतें मिली हैं कि गैर-मुस्लिम समुदायों के बच्चों को सरकार द्वारा वित्तपोषित मदरसों में प्रवेश दिया जा रहा है और उन्हें छात्रवृत्ति भी प्रदान की जा रही है। पत्र के अनुसार, ”यह संविधान के अनुच्छेद 28 (3) का स्पष्ट उल्लंघन है, जो शैक्षणिक संस्थानों को माता-पिता की सहमति के बिना बच्चों को मजहबी शिक्षा में भाग लेने के लिए बाध्य करने से रोकता है।”

एनसीपीसीआर के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने यह भी कहा कि हालाँकि मदरसे मुख्य रूप से मजहबी शिक्षा प्रदान करने के लिए जिम्मेदार हैं। वहीं जो सरकार द्वारा वित्त पोषित हैं, वे बच्चों को मजहबी और कुछ हद तक औपचारिक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि राज्य को बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बच्चे शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 6 के अनुसार औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूलों में जाएँ। इसलिए, एनसीपीसीआर ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सरकार द्वारा वित्तपोषित मदरसों की विस्तृत जाँच करने के लिए कहा है जो गैर-मुस्लिम छात्रों को प्रवेश दे रहे हैं।

एनसीपीसीआर ने इसके साथ ही ऐसे मदरसों में जाने वाले बच्चों का फिजिकल वेरिफिकेशन करने के लिए भी कहा है। पत्र के अनुसार, अधिकारियों से जाँच के बाद ऐसे सभी बच्चों को औपचारिक स्कूलों में प्रवेश दिलाने के लिए कहा गया है।

एनसीपीसीआर ने गुरुवार (8 दिसंबर 2022) को जारी नोटिस में यह भी कहा है कि राज्य सभी मदरसों की मैपिंग करेंगे और 30 दिनों के भीतर रिपोर्ट जमा करेंगे। इससे पहले नवंबर में केंद्र सरकार ने कक्षा 1 से 8 तक के मदरसा छात्रों को छात्रवृत्ति देना बंद कर दिया है। कक्षा 1 से 5 तक के मदरसा बच्चों को 1,000 रुपए की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती थी, जबकि कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों को छात्रवृत्ति उनके पाठ्यक्रमों के आधार पर मिलती थी।

1% से भी कम वोट से हिमाचल ने रिवाज कायम रखा, CM बनने को लड़ कॉन्ग्रेसी भी निभा रहे परंपरा: वीरभद्र सिंह का कुनबा सबसे आगे

हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव (Himachal Pradesh Assembly Election) ने कॉन्ग्रेस (Congress) की डूबती नैया को सहारा दे दिया है। यह सहारा मृतप्राय पार्टी के लिए संजीवनी का काम किया है। कॉन्ग्रेस राज्य की कुल 68 सीटों में से 40 सीटें जीतकर सरकार बनाने जा रही है। हालाँकि, जीत के बाद भी पार्टी के सामने मुश्किलों की कमी नहीं है।

हिमाचल प्रदेश की राजनीति में राजा साहब के नाम से विख्यात पूर्व मुख्यमंत्री एवं कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता वीरभद्र सिंह (Virbhadra Singh) की पत्नी प्रतिभा सिंह (Pratibha Singh) ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में खूब मेहनत की और परिणाम भी सामने है। प्रदेश की सत्ताधारी भाजपा (BJP) 25 सीट तक सिमट कर रह गई। प्रतिभा सिंह को यह जिम्मेदारी सिर्फ छह महीने पहले ही मिली है। इसके बाद अपने विधायक बेटे विक्रमादित्य सिंह (Vikramaditya Singh) के साथ मिलकर वह प्रदेश का कोना-कोना छान मारी।

एक कहावत है कि जीत एक से हो या 100 से, उस जीत की अनुभूति सुखदायक ही होती है। कॉन्ग्रेस भी इस सुख का आनंद ले रही है और हिमाचल प्रदेश की जनता हर पाँच साल पर सत्ता को बदलने का सुख ले रही है। कॉन्ग्रेस और जनता दोनों खुश हैं। लेकिन, इन सबसे अलग हटकर देखा जाए तो भाजपा पर कॉन्ग्रेस की यह जीत मामूली दिखाई देती है, क्योंकि भाजपा ने कुछ दुस्साहसिक गलतियाँ नहीं की होती तो उत्तराखंड की तरह हिमाचल प्रदेश में सत्ता में लगातार वापसी के अभिशाप को धो सकती थी।

चुनावों से पहले देश भर में क्षत्रिय महापुरुषों को लेकर विवाद को उठना और उसमें भाजपा की एंट्री ने पार्टी को निशाने पर ला दिया और सोशल मीडिया में इतिहासचोर भाजपा जैसे ट्रेंड चलने लगे। भाजपा के खिलाफ आवाज उठने लगी। हिमाचल प्रदेश चुनाव के संदर्भ में भले ही मुख्यधारा की मीडिया किसी विशेष उद्देश्य की वजह से इन कारकों की चर्चा ना करे, लेकिन लगभग 40 प्रतिशत क्षत्रिय वोट वाले राज्य हिमाचल प्रदेश में इसका सीधा असर दिखा।

रही-सही कसर पार्टी के बागियों एवं पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता प्रेम कुमार धूमल का टिकट काट कर पूरा कर दिया गया। जिन विधायकों का टिकट काटा गया, उनमें अधिकांश धूमल के समर्थक थे। इस तरह लोगों के बीच भी एक गलत संदेश भेजा गया। मंच पर केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर द्वारा अपने पिता प्रेम कुमार धूमल की राजनीति को याद कर भावुक हो जाना, जैसे आग में घी का काम कर दिया और भाजपा के प्रति लोगों की नाराजगी को और बढ़ा दिया।

इस चुनाव में भाजपा के 21 बागियों ने चुनावी मैदान में ताल ठोंका, जिनमें से तीन तो निर्दलीय जीतने में कामयाब रहे, लेकिन बागियों की वजह से कॉन्ग्रेस को अप्रत्यक्ष लाभ हुआ। परिणाम यह हुआ कि अधिकांश सीटों पर भाजपा कुछ सौ वोटों के अंतर से हार गई।

कुछ सीटें तो ऐसी भी रही, जहाँ हार-जीत का अंतर 100 से भी कम था। भोरंज सीट पर तो कॉन्ग्रेस के सुरेश कुमार ने भाजपा के अनिल धीमन को सिर्फ 60 वोटों से हराया। इस तरह 1000 वोटों से कम अंतर से हारने वाले सीटों की संख्या लगभग 10 है। अगर इन सीटों को सँभालने में भाजपा कामयाब रहती तो भाजपा बहुमत के आँकड़े 35 को आसानी से पार कर लेती।

भाजपा (BJP) के लिए यह जीत हासिल करना कोई बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि अगर वोट शेयर की बात करें तो भाजपा और कॉन्ग्रेस को लगभग समान वोट मिले हैं। लेकिन भाजपा से 0.90 यानी एक प्रतिशत से कम वोटों की अधिकता ने कॉन्ग्रेस के राजनीतिक द्वार खोल दिए। इस चुनाव में भाजपा को कुल 43.00 प्रतिशत वोट मिले हैं। वहीं, कॉन्ग्रेस को 43.90 प्रतिशत वोट मिले हैं।

अगर साल 2017 के विधानसभा चुनावों की बात करें तो उसमें भाजपा को 49.53 प्रतिशत मत हासिल कर 44 सीटें और कॉन्ग्रेस को 42.32 प्रतिशत मत हासिल कर 21 सीटें जीती थीं। निर्दलीय एवं अन्य दलों ने 6.34 फीसदी मत प्राप्त किए थे, जिसमें माकपा को एक तथा निर्दलीय प्रत्याशियों को दो सीटें मिली थीं। इस तरह साल 2022 में भाजपा को 6.53 प्रतिशत मत का नुकसान हुआ है, जबकि कॉन्ग्रेस को 1.58 प्रतिशत वोट का लाभ हुआ है। वहीं, अन्य को लगभग 12 प्रतिशत वोट मिले हैं।

राज्य में कॉन्ग्रेस जीत गई, लेकिन पार्टी हाईकमान को डर अभी भी सता रहा है कि कहीं उनके विधायक पाला ना बदल लें। इसलिए पार्टी मतगणना के दिन ही उन्हें चंडीगढ़ पहुँचने का फरमान जारी करने की खबर आई थी। कहा जा रहा था कि नवनिर्वाचित विधायकों को वहाँ से छत्तीसगढ़ या राजस्थान पहुँचाया जाएगा। हालाँकि, आज शाम शिमला में ही सीएम पद को लेकर बैठक होने वाली है। उधर पार्टी में मुख्यमंत्री पद को लेकर कॉन्ग्रेसी रिवाज की तरह खींचतान जारी है।

मुख्यमंत्री की रेस में राज्य की कॉन्ग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह और उनके 33 वर्षीय विधायक बेटे विक्रमादित्य सिंह हैं। इसमें सबसे अधिक विक्रमादित्य सिंह का पलड़ा भारी नजर आ रहा है। हालाँकि, विक्रमादित्य सिंह कह चुके हैं कि वे अपनी माँ को ही सीएम बनते देखना चाहते हैं। बात यही खत्म नहीं होती है। इन माँ-बेटे के अलावा पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू, ठाकुर कौन सिंह और आशा कुमारी भी मुख्यमंत्री की रेस में शामिल बताए जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री पद पर मंथन को लेकर राजधानी शिमला में आज कॉन्ग्रेस पार्टी का मंथन होना है। इस मंथन में हिमाचल प्रदेश कॉन्ग्रेस के प्रभारी राजीव शुक्ला और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा शामिल होंगे। देखना ये ही हिमाचल में सर्वसम्मति से इस पद के लिए किसे चुना जाता है या फिर अन्य कॉन्ग्रेस शासित राज्यों की तरह हिमाचल भी गुटबाजी का शिकार बनकर जनता के लिए एक बुरे सपने की तरह बन जाएगा।

‘लड़कियाँ स्कूल जा नहीं सकती, पर मर्द 2-3 निकाह करेंगे’: बोले असम CM इसको बदलना होगा, कहा- हम चाहते हैं वे स्कूल-कॉलेजों में पढ़ें

अपने बेबाक बयानों से चर्चा में रहने वाले असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बार फिर से मुस्लिमों को लेकर बड़ा बयान दिया है। हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है, “हम उस व्यवस्था के खिलाफ हैं जहाँ मुस्लिम लड़कियाँ स्कूल में नहीं पढ़ सकती हैं और मुस्लिम पुरुष 2-3 महिलाओं से निकाह करते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की व्यवस्था को बदलना होगा।

असम के सीएम ने गुरुवार (8 दिसंबर, 2022) को मोरीगाँव की एक सभा में कहा कि उनकी पार्टी मुस्लिमों की उस व्यवस्था के खिलाफ है, जिसमें कई बीवियाँ रखने का चलन है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वो उस व्यवस्था के खिलाफ हैं जहाँ मुस्लिम लड़कियाँ स्कूल में नहीं पढ़ सकती हैं और मुस्लिम पुरुष 2-3 महिलाओं से निकाह करते हैं।

असम के सीएम ने आगे कहा कि वह ‘सबका साथ सबका विकास’ को आगे लाने की कोशिश कर रहे हैं। सीएम ने कहा कि आजाद भारत में रहने वाले मर्दों को तीन-चार स्त्रियों से (बिना पूर्व शौहर को तलाक दिए) विवाह करने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। हमें मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए काम करना होगा।

हिमंत बिस्वा सरमा ने आगे कहा कि अगर असमिया हिंदू परिवारों से डॉक्टर हैं तो फिर मुस्लिम परिवारों से भी डॉक्टर होने चाहिए। उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते कि ‘पोमुवा’ मुस्लिम छात्र मदरसों में पढ़कर जुनाब, इमाम बनें। वह चाहते हैं कि वे स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ें। उन्होंने कहा कि कई विधायक ऐसी सलाह इसलिए नहीं देते क्योंकि उन्हें ‘पोमुवा’ मुसलमानों के वोट चाहिए। बांग्लादेश से आने वाले बंगाली भाषी मुसलमानों को असम में ‘पोमुवा मुस्लिम’ कहा जाता है।

असम के सीएम सरमा का निशाना एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल पर था। पिछले दिनों उन्होंने हिंदुओं के विवाह को लेकर तथ्यहीन व आपत्तिजनक बयान दिया था। जिसकी वजह से उन्हें माफी भी माँगनी पड़ी थी। असम के सीएम ने बदरुद्दीन अजमल के बयान पर पलटवार करते हुए कहा कि एआईयूडीएफ प्रमुख की सलाह के अनुसार महिलाएँ 20-25 बच्चे पैदा कर सकती हैं लेकिन उनके भविष्य में भोजन, कपड़े और शिक्षा पर होने वाला सारा खर्चों को विपक्ष (बदरुद्दीन) को वहन करना होगा।

आपको बता दें कि असम के करीमगंज में सांसद बदरुद्दीन ने कहा था कि एआईयूडीएफ प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने हिंदुओं को नसीहत दी कि उन्हें मुस्लिमों की तरह अपनी लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र में कर देनी चाहिए। बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि मुस्लिम लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र में हो जाती है, लेकिन हिंदू लड़कियों की शादी 40 साल की उम्र में भी नहीं होती। हिंदू 40 साल की उम्र तक अवैध पार्टनर रखते हैं। बच्चे नहीं पैदा करते और पैसे बचाते हैं। उन्होंने सलाह दिया कि हिंदुओं को मुस्लिम फॉर्मूले को स्वीकार करना चाहिए और अपने बच्चों की शादी 20-22 साल की उम्र में कर देनी चाहिए। उनके अनुसार 18-20 साल की उम्र में लड़कियों की शादी करा दो और फिर देखो कितने बच्चे पैदा होते हैं। बदरुद्दीन ने आगे कहा कि जब आप उपजाऊ जमीन में बीज बोएँगे, तभी खेती अच्छी होगी। उसके बाद तरक्की ही तरक्की होगी।

हालाँकि इस बयान पर बवाल मचने के बाद उन्होंने माफी माँगी थी। अजमल ने कहा था, “अगर मेरे शब्दों से किसी की भावना को ठेस पहुँची है तो मैं अपने शब्द वापस लेता हूँ।”

बिहार के जिस IPS अफसर पर बनी वेब सीरिज ‘खाकी’, वे करप्शन में सस्पेंड: विजिलेंस ने अमित लोढ़ा पर दर्ज किया केस

बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी अमित लोढ़ा को भ्रष्टाचार के मामले में सस्पेंड कर दिया गया है। उन पर बनी वेब सीरिज ‘खाकी- द बिहार चैप्टर’ हाल में चर्चा में रही है। नेटफ्लिक्स पर प्रसारित इसी सीरिज को लेकर ही वे विवादों में भी आए हैं।

लोढ़ा के खिलाफ विशेष निगरानी इकाई (special vigilance unit) ने जाँच के बाद भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज किया है। लोढ़ा ने ‘बिहार डायरीज’ नाम से एक किताब भी लिखी है। इसी पर आधारित वेब सीरीज 25 नवंबर 2022 को नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई थी। Netflix और फ्राइडे स्टोरी टेलर ने मिलकर यह सीरीज बनाई है।

रिपोर्ट्स के अनुसार लोढ़ा पर लोकसेवा अधिनियम के उल्लंघन का आरोप है। उन्होंने किताब लेखन और वेब सीरीज निर्माण को लेकर पुलिस मुख्यालय या राज्य सरकार से अनुमति नहीं ली थी। इसके अलावा वेब सीरीज के फाइनेंस और शूटिंग से जुड़े मुद्दे को लेकर भी वह कठघरे में हैं। वेब सीरीज निर्माण में लगने वाली राशि का इंतजाम करने में उनकी भूमिका की बात कही जा रही है।

विशेष निगरानी इकाई के अनुसार लोढ़ा ने नेटफ्लिक्स तथा फ्राइडे स्टोरी टेलर के साथ व्यावसायिक करार किया था। आरोप लगने के बाद मामले की जाँच हुई और रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय को सौंपी गई। इसी रिपोर्ट और सरकार के निर्देश के तहत निगरानी इकाई ने लोढ़ा और उनके सहयोगियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है। प्राथमिकी में पीसी एक्ट और आइपीसी की धाराएँ लगाई गई हैं। इस मामले की जाँच पुलिस उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी करेंगे।

अमित लोढ़ा साल 1998 बैच के आईपीएस अधिकारी हैं। उन्होंने बिहार पोस्टिंग के बाद अपराधियों का ताबड़तोड़ सफाया किया। अमित लोढ़ा पहली बार तब चर्चा में आए, जब उन्होंने शेखपुरा के ‘गब्बर सिंह’ कहे जाने वाले अशोक महतो और उसके साथी पिंटू महतो को सलाखों के पीछे पहुँचाया था। अमित लोढ़ा को राष्ट्रपति पुलिस पदक, पुलिस पदक और आंतरिक सुरक्षा पदक से भी सम्मानित किया जा चुका है।

दोबारा सेक्स से रुखसार ने किया इनकार, शौहर अनवर ने गला घोंट मार डाला: लाश बोरी में डाल फेंका, सास से कहा- आपकी बेटी कहीं चली गई

उत्तर प्रदेश के अमरोहा से चौंकाने वाला मामला सामने आया है। दोबारा सेक्स से इनकार करने पर अनवर ने अपनी बीवी रुखसाना की हत्या कर दी। लाश को भाई के साथ मिलकर ठिकाने लगाया। फिर सास से कहा कि उसकी बेटी कहीं चली गई है।

दामाद की सूचना पर रुखसार की अम्मी ने बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसी बीच एक लाश मुरादाबाद के ठाकुरद्वारा थाना क्षेत्र में रतूपुरा की झाड़ियों से बरामद हुआ। यह जगह अनवर के घर से करीब 50 किलोमीटर दूर है।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से हत्या गला घोंटकर करने की बात सामने आई। पुलिस को यह भी जानकारी मिली कि बीवी के साथ अनवर के रिश्ते अच्छे नहीं थे। इसके बाद पुलिस पूछताछ में वह टूट गया और अपना गुनाह कबूल लिया। अनवर के साथ उसके भाई दानिश को भी गिरफ्तार किया गया है। उस पर लाश ठिकाने में अनवर की मदद का आरोप है।

अनवर की अमरोहा जनपद के कोतवाली के मोहल्ला सराय कोहना में बेकरी है। उसने बताया है कि सोमवार (5 दिसंबर 2022) की सुबह करीब 4 बजे उसने बीवी रुखसार के साथ संबंध बनाए। थोड़ी देर बाद उसने दोबारा सेक्स को कहा। लेकिन रुखसार ने इनकार कर दिया। इससे नाराज होकर उसने गला दबाकर उसकी हत्या कर दी।

इसके बाद उसने दानिश की मदद से शव के हाथ-पैर बाँधे। एक बोरी में लाश डालकर उसे सिल दिया। फिर बाइक से रतूपुरा में सड़क किनारे जंगलों में फेंक आया। इसके बाद घर लौटकर अनवर ने सास को फोन किया। उनसे कहा कि रुखसार घर छोड़कर कहीं चली गई है।

सड़क किनारे शव देखकर ग्रामीणों ने मुरादाबाद पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने मौके पर पहुँचकर मृतक महिला के शव की शिनाख्त के लिए कई जनपदों में शव के फोटो भेजे थे। इसी क्रम में अमरोहा कोतवाली में रुखसार की गुमशुदगी दर्ज होने की बात सामने आई। तस्वीरों का मिलान कराया गया तो बोरे में बंद शव रुखसार का निकला। क्षेत्राधिकारी नगर, विजय कुमार राणा ने बताया कि घटना में प्रयुक्त मोटर साइकिल भी बरामद कर ली गई है।

जमानत के कुछ ही घंटों बाद TMC नेता साकेत गोखले दोबारा गिरफ्तार, मोरबी पर RTI से लेकर गुजरात समाचार का न्यूज तक गढ़ दिया था

तृणमूल कॉन्‍ग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय प्रवक्ता साकेत गोखले (Saket Gokhle) को फिर से गिरफ्तार किया गया है। अहमदाबाद की एक अदालत से जमानत मिलने के कुछ ही घंटों बाद उसकी दोबारा गिरफ्तारी हुई। उस पर मोरबी पुल हादसे को लेकर झूठा ट्वीट करने का आरोप है।

मिली जानकारी के मुताबिक अहमदाबाद की एक अदालत ने मोरबी पुल हादसे को लेकर फेक न्यूज फैलाने के मामले में गुरुवार (8 दिसंबर 2022) को गोखले को जमानत दे दी थी। लेकिन मोरबी पुलिस ने दर्ज किए गए एक अन्य मामले में उसे गिरफ्तार कर लिया।

इस संबंध में ट्वीट करते हुए टीएमसी के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने गुजरात पुलिस पर गोखले को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। उन्होंने लिखा है, “8 दिसंबर को रात 8.45 बजे उसे (साकेत गोखले) फिर से गिरफ्तार कर लिया है। वह अहमदाबाद में साइबर पुलिस थाने से निकल रहा था। पुलिस की टीम ने बिना नोटिस/वारंट के उसे गिरफ्तार किया और किसी अज्ञात स्थान पर ले गई। यह निंदनीय है।”

साकेत गोखले को दोबारा गिरफ्तार किए जाने का एक वीडियो भी सामने आया है। इसमें वह पुलिस से थाना परिसर में बहस करते दिख रहा है। वीडियो उसकी दोबारा गिरफ्तारी से कुछ समय पहले का बताया जा रहा है।

गोखले को 5 दिसंबर 2022 को पहली बार गुजरात पुलिस ने गिरफ्तार किया था। इसके बाद उसे अदालत ने दो दिन की पुलिस कस्टडी में भेज दिया था। उस समय डेरेक ओ ब्रायन ने बताया था कि गोखले नई दिल्ली से फ्लाइट लेकर जयपुर पहुँचे थे। वहाँ गुजरात पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए पहले से मौजूद थी। गिरफ्तारी के बाद उसे अहमदाबाद ले जाया गया था।

आपको बता दें कि गोखले एक पूर्व आरटीआई एक्टिविस्ट हैं और वर्तमान में तृणमूल कॉन्‍ग्रेस के प्रवक्ता हैं। उन्होंने एक मनगढ़ंत समाचार रिपोर्ट साझा की थी। गुजराती समाचार पत्र की कथित क्लिपिंग साझा करते हुए दावा किया था कि पीएम मोदी की मोरबी यात्रा पर 30 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। जो क्लिपिंग साझा की थी, वह कथित तौर पर ‘गुजरात समाचार’ का था। भाजपा ने इसे मनगढ़ंत बताते हुए कहा था कि ऐसी कोई रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई है। साथ ही बताया था कि ऐसा कोई आरटीआई जवाब भी नहीं है। ‘गुजरात समाचार’ ने भी कहा था कि उन्होंने ऐसी कोई रिपोर्ट प्रकाशित ही नहीं की है।

तथाकथित रिपोर्ट का हवाला देते हुए, गोखले ने दावा किया था कि 5.5 करोड़ रुपए विशुद्ध रूप से ‘स्वागत, कार्यक्रम प्रबंधन और फोटोग्राफी’ के लिए खर्च हुए थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि मोदी के इवेंट मैनेजमेंट और पीआर की लागत 135 लोगों के जीवन से अधिक है। गोखले ने कहा कि आपदा में मारे गए 135 पीड़ितों के परिवारों को 4-4 लाख रुपए की अनुग्रह राशि दी गई, जो कुल मिलाकर 5 करोड़ रुपए होती है। हालाँकि गोखले ने जैसा दावा किया है, ऐसी कोई आरटीआई और ऐसी कोई मीडिया रिपोर्ट नहीं है।

सरकार की फैक्ट चेक यूनिट ने भी 1 दिसंबर 2022 को गोखले के उस ट्वीट को पिनपॉइंट किया था, जिसमें उन्होंने न्यूजपेपर के कुछ कटआउट्स को शेयर कर फर्जी न्यूज फैलाई थी। PIB ने गोखले के ट्वीट का स्क्रीनशॉट शेयर कर बताया था कि ट्वीट में किया गया दावा फर्जी है। गोखले ने 1 दिसंबर 2022 को सुबह करीब साढ़े 8 बजे फर्जी ट्वीट किया था और उसी दिन शाम साढ़े सात बजे के आसपास PIB ने इसे फर्जी करार दिया था।