जम्मू-कश्मीर के बडगाम में सुरक्षाबलों ने लश्कर-ए-तैयबा आतंकी लतीफ राठर सहित कुल तीन आतंकियों को मार गिराया। सुबह लगभग साढ़े पाँच बजे मुठभेड़ शुरू हुई थी। लतीफ कश्मीर में कई हत्याओं को अंजाम दे चुका है। इसमें कश्मीरी पंडित राहुल भट और आमरीन भट भी शामिल हैं। लतीफ राठर कश्मीर लश्कर-ए-तैयबा और इसके संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट का कमांडर था। उसे घाटी में कश्मीरी हिन्दुओं की हत्याओं के सरगना के रूप में जाना जाता है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस अधिकारियों ने बताया कि लश्कर कमांडर लतीफ राठर सहित आतंकवादी संगठन लश्कर (TRF) के 3 आतंकियों के छिपे होने की सूचना थी। रिपोर्ट के अनुसार, रात लगभग 12 बजे ऑपरेशन शुरू किया गया था। आतंकियों को चारों तरफ से घेर लिया गया था। पहले सरेंडर करने के लिए कहा गया था लेकिन इस दौरान आतंकियों ने फायरिंग शुरू कर दी थी।
Input was received that three terrorists of terror outfit LeT(TRF) including terrorist Lateef Rather who was involved in several civilian killings including Rahul Bhat and Amreen Bhat were hiding in Budgam district. All three terrorists have been killed: ADGP Kashmir Vijay Kumar pic.twitter.com/7xGuIxyTH7
कश्मीर एडीजीपी विजय कुमार ने बताया कि लतीफ राठर राहुल भट्ट और आमरीन भट्ट की हत्या समेत कई निर्दोष नागरिकों की हत्या में शामिल था। इनपुट मिला था कि लतीफ राठर समेत आतंकी संगठन लश्कर के तीन आतंकी बडगाम में छिपे हुए हैं। वहीं अब तीनों आतंकी मारे जा चुके हैं।
एडीजीपी कश्मीर विजय कुमार ने इस एनकाउंटर को बड़ी सफलता बताया है। उन्होंने कहा कि घटनास्थल से शव निकाले जा रहे हैं। हालाँकि, इनकी पहचान अभी नहीं हो पाई है। मौके से आपत्तिजनक सामग्री, हथियार और गोला-बारूद बरामद हुआ है। पुलिस ने बताया कि आतंकवादी लतीफ ए++ श्रेणी का आतंकवादी है और उस पर 10 लाख का इनाम है।
12 मई को हुई थी राहुल भट की हत्या
बता दें कि आतंकियों ने 12 मई, 2022 को पीएम पैकेज के तहत नियुक्त कश्मीरी पंडित कर्मचारी राहुल भट की चाडूरा तहसील कार्यालय में घुसकर हत्या कर दी थी। इसके बाद घाटी में कार्यरत हिन्दू कर्मचारियों ने कश्मीर से बाहर तैनाती की माँग शुरू कर दी। साथ ही ज्यादातर कर्मचारी जम्मू चले आए और अपनी सुरक्षित स्थान पर तैनाती की माँग को लेकर वे आंदोलन कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब वे घाटी नहीं जाएँगे क्योंकि वहाँ सुरक्षित माहौल नहीं है। वहीं कश्मीरी हिन्दू कर्मचारी की हत्या के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली में उच्च स्तरीय बैठक कर हिन्दुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की हिदायत दी थी।
राजस्थान के उदयपुर (Udaipur, Rajasthan) में जिस जगह पर इस्लाम के नाम पर कन्हैयालाल साहू (Kanhaiya Lal Sahu) की सरेआम गला काटकर हत्या कर दी गई थी, वहाँ मुहर्रम की जुलूस में आग लगने पर हिंदुओं ने अपना कर्तव्य निभाते हुए उसे बुझा दिया। एक हिंदू महिला ने तो अपनी साड़ी ही दे दी।
घटना मंगलवार (9 अगस्त 2022) की शाम की है। मोहर्रम का जुलूस शहर के मोचीवाड़ा की गलियों से निकल रहा था। इसी दौरान इसके गुंबद में आग लग गई। हिंदू मोहल्ले में हुई इस घटना को देखते हुए आसपास के परिवारों ने कुछ ही मिनटों में आग को बुझा दिया।
एक हिंदू महिला ने जली हुई ताजिया की गुंबद को ढँकने के लिए अपनी साड़ी दे दी। बता दें कि यह वही जगह है, जहाँ लगभग डेढ़ महीने पहले कन्हैया लाल की गला काटकर हत्या कर दी गई थी। जिस जगह पर ताजिया में आग लगी, उससे सिर्फ 300 मीटर की दूरी पर इस घटना को अंजाम दिया गया था।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, मोचीवाड़ा के रहने वाले श्याम सुंदर सोलंकी ने बताया कि उनके घर के सामने ही आग लगी थी। उनका घर चार मंजिला होने के कारण उन्होंने सबसे पहले इसे देखा। उनका कहना है कि उन्होंने बिना सोचे-समझे उस पर पानी डालना शुरू कर दिया।
श्याम सुंदर के अनुसार, मुस्लिमों ने ताजिया को ढँकने के लिए लोगों से लाल कपड़ा माँगा, लेकिन किसी के पास लाल कपड़ा नहीं था। इसके बाद उनकी भाभी रेखा ने अपनी लाल रंग की नई साड़ी दे दी।
इस घटना के बाद स्थानीय निकाय उपनिदेशक कौशल कोठारी ने कहा कि लोगों ने जिन लोगों ने सामाजिक सौहार्द्र का परिचय दिया है, उनके नाम नोट कर लिए गए हैं। उन्हें प्रशासन की ओर से सम्मानित किया जाएगा।
वहीं, पलटन मस्जिद कमेटी के सेक्रेटरी रियाज हुसैन ने बताया कहा, “जिन्होंने आग बुझाई हम उनको धन्यवाद देते हैं। उन्होंने बड़ा काम किया है।” प्रशासन का कहना है कि आग शॉर्ट सर्किट लगी या दीये से, यह कहना मुश्किल है।
इसी इलाके में कन्हैयालाल की हुई थी हत्या
बता दें कि 28 जून 2022 को पूर्व बीजेपी प्रवक्ता नूपुर शर्मा के समर्थन में सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वाले टेलर कन्हैयालाल की गला रेत कर निर्मम हत्या कर दी गई थी। हत्यारे उनकी दुकान पर कपड़े सिलवाने के बहाने आए और गर्दन काट दी थी। इतना ही नहीं हत्यारों ने इस जघन्य वारदात का वीडियो भी बनाया और उसे वायरल कर दिया था।
बिहार का एक जिला है सिवान, जहाँ 1990 से लेकर 2009 तक एक अपराधी का राजनीतिक वर्चस्व रहा। मोहम्मद शहाबुद्दीन नाम का ये अपराधी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन आम लोगों के बीच गुंडागर्दी और खौफ का जो आलम इसने पैदा किया, वो शायद ही कहीं और देखने को मिलता है। लालू यादव की शह पर इसने तीन दशक तक सिवान पर राज किया। न सिर्फ राज किया, बल्कि हत्या, रंगदारी और अपहरण का एक रिकॉर्ड बना डाला।
मोहम्मद शहाबुद्दीन 1990 में पहली बार जीरादेई विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय जीत कर विधायक बना। 1995 में उसने ‘जनता दल’ के टिकट पर मैदान में उतर कर फिर से जीत दर्ज की। इसके एक साल बाद ही वो सिवान से सांसद बन गया। उसने 1996, 1998, 1999 और 2004 में लगातार 4 बार इस सीट से जीत दर्ज की। अगर आपको लगता है कि जीत का ‘छक्का’ लगाने वाला ये व्यक्ति उस क्षेत्र के लोगों का चहेता था या जननेता था, तो आप बिलकुल गलत हैं।
मोहम्मद शहाबुद्दीन बिहार के उन अपराधियों में से था, जिसका 80 के दशक में उदय हुआ। गरीब बिहार में कुछ सरकारी योजनाएँ आनी शुरू हुई थीं, अतः उसके लिए टेंडर वगैरह जारी किए जाते थे। यही कारण है कि 80 के दशक में अपराधी ठेकेदार बनने लगे और फिर अपने कारनामों को सफ़ेद जामा पहनाने के लिए नेता। मीडिया में ‘बाहुबली’ और अपने समर्थकों में ‘साहेब’ नाम से जाना जाने वाला मोहम्मद शहाबुद्दीन उनमें से ही एक था।
उसी पर आधारित है ZEE5 की 6 एपिसोड वाली वेब सीरीज ‘रंगबाज: डर की राजनीति’। इसमें न सिर्फ मोहम्मद शहाबुद्दीन (सीरीज में हरुल शाह अली) का जम कर महिमामंडन किया गया है, बल्कि उन ‘चंदा बाबू’ को विलेन बना कर पेश कर दिया गया है जिनके 3 बेटों की उसने बेरहमी से हत्या करवा दी थी। इतना ही नहीं, वामपंथी गिरोह की ‘Hindu Goons’ वाली नैरेटिव में ये जम कर फिट होता है। क्लाइमैक्स को वास्तविकता से दूर कर के शहाबुद्दीन को ‘जननेता’ बताने की कोशिश की गई है और उसके हर एक अपराध पर पर्दा डालने के लिए ‘वाजिब कारण’ खोजने की कोशिश की गई है।
वैसे बॉलीवुड में अपराधियों का महिमामंडन कोई नई बात नहीं है। अंडरवर्ल्ड के सरगना दाऊद इब्राहिम को तो कई फिल्मों में नायक बना कर पेश किया जा चुका है। हाजी मस्तान को भी मसीहा बना कर पेश किया गया। दाऊद की बहन तक पर फिल्म बनी। ‘रईस’ में शाहरुख़ खान ने आतंकी अब्दुल लतीफ के किरदार को ‘देवता’ बना कर पेश किया। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। ‘रंगबाज: डर की राजनीति’ बॉलीवुड की इसी श्रृंखला को आगे बढ़ाता है।
हिन्दू-मुस्लिम दंगों का मतलब मुस्लिमों को खदेड़ते हिन्दू गुंडे, मुस्लिम ही पीड़ित
फिल्म में मोहम्मद शहाबुद्दीन को बचपन में एक हिन्दू-मुस्लिम दंगों में घिरते हुए दिखाया गया है। बॉलीवुड के लिए हिन्दू-मुस्लिम दंगों का अर्थ हुआ ‘पीड़ित’ मुस्लिमों का पीछे करते हिन्दू गुंडे। मुस्लिम महिलाओं और बच्चों की जान के प्यासे भगवाधारी गुंडे। इस वेब सीरीज में दिखाया गया है कि बच्चा शहाबुद्दीन जब अपने हिन्दू दोस्त के साथ स्कूल से लौट रहा होता है, तब मुस्लिम इलाकों में हिन्दू गुंडे तबाही मचा रहे होते हैं।
फिर वो उसके पीछे पड़ जाते हैं, लेकिन उसके हिन्दू दोस्त की माँ उन दोनों को अपने घर में पनाह देकर बचा लेती हैं। और हाँ, भले ही दिल्ली दंगों से लेकर कई ऐसे मामलों में हिन्दुओं की दुकानें चुन-चुन कर जलाए जाने की घटनाएँ सामने आती हों, लेकिन इस वेब सीरीज में शहाबुद्दीन के अब्बा की दुकान हिन्दू गुंडे जला डालते हैं। ऊपर से पुलिस भी मुस्लिमों का मजाक बनाती है। ‘हिन्दुओं द्वारा मुस्लिमों के कत्लेआम’ का डर दिखाती है, तंज कसती है।
अब भला इस तरह के तंज से कोई शहाबुद्दीन गुंडा क्यों न बने? यही है नैरेटिव। एक अन्य दृश्य में जब शहाबुद्दीन को उसके भाई की तरह बाहर जाने और नौकरी या व्यापार करने को बोला जाता है तो वो अपने अब्बा से पूछता है कि वहाँ किसी ने मेरी दुकान जला दी तो? इसी कारण वो अपराधी बन जाता है। ये सब देखने में काफी बचकाना लगता है। नैरेटिव ये फैलाने की कोशिश की गई है कि हिन्दू गुंडों की वजह से मुस्लिम अपराधी बनते हैं। कई फिल्मों में हम दंगों की वजह से मुस्लिमों को अपराधी बनते देख चुके हैं।
ज़मींदारों ने शहाबुद्दीन को खड़ा किया, बाद में उन्हें हराने के लिए ही राजनीति में आया गैंगस्टर
इस वेब सीरीज में इतिहास का ज्ञान बघारते हुए बताया गया है कि जो पहले जमींदार हुआ करते थे, वही बाद में नेता बन गए। क्या लालू यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान या सुशील मोदी जमींदारों के परिवार से सम्बन्ध रखते हैं? नहीं। बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह या फिर उप-मुख्यमंत्री अनुग्रह नारायण सिन्हा दलितों पर अत्याचार करने वाले जमींदार थे? जमीदारों के बहाने सवर्णों और फिर हिन्दुओं को अत्याचारी साबित करने की कोशिश नई नहीं है।
याद कीजिए, कैसे केरल में मोपला मुस्लिमों द्वारा किए गए हिन्दुओं के घोर नरसंहार को ‘किसान विद्रोह’ बता कर हमें पढ़ाया जाता रहा। बताया गया कि जमींदारों की क्रूरता से तंग आकर किसानों ने बगावत कर दी। जबकि ये एक जिहाद था, हिन्दुओं के खिलाफ। उसी तरह यहाँ भी ‘दशरथ सिंह’ नाम का एक किरदार गढ़ा गया है ‘क्रूर जमींदारों’ का प्रतिनिधित्व करने के लिए। दिखाया गया है कि दशरथ सिंह ही शहाबुद्दीन को अपराध की दुनिया में लेकर आता है और उससे अपने काम करवाता है, अपनी जमीन की सुरक्षा करवाता है।
यहाँ हमको शहाबुद्दीन के अपराधी बनने का दूसरा कारण मिल जाता है। पहले हिन्दू गुंडे, दूसरी जमींदारी। दशरथ सिंह से जब शहाबुद्दीन चुनाव लड़ने की अनुमति माँगता है तो वो अपने गुर्गों के साथ उसका मजाक बनाता है, इसके बाद वो उसे ही हरा देता है। अब हम आपको बताते हैं कि दशरथ सिंह का किरदार किनसे प्रेरित है। उन शख्स का नाम है त्रिभुवन नारायण सिंह, कैप्टन डॉक्टर त्रिभुवन नारायण सिंह। सिवान के सबसे इज्जतदार नामों में से एक।
वो 1985 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर विधायक बने थे। मई 2022 में ही 80 साल की उम्र में उनका निधन हुआ था। ये वो व्यक्ति हैं, जो न सिर्फ एक दशक सेना में रहे थे बल्कि 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी देश की सेवा की थी। शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में जिले में उनका योगदान लोग आज भी याद करते हैं। हरेराम कॉलेज की नींव रखने में मुख्य भूमिका निभाने वाले कैप्टन डॉ त्रिभुवन नारायण सिंह इस कॉलेज की समिति के सचिव थे।
सिवान के जीरादेई के पूर्व विधायक कैप्टन डॉ त्रिभुवन नारायण सिंह
उन्होंने ‘राजेंद्र सेवाश्रम’ में बतौर चिकित्सक कार्य किया और इसके जीर्णोद्धार के लिए वो अपने निधन से कुछ दिन पहले तक लगातार प्रयासरत थे। मैड़वा के कोरवा और नौतन में प्राथमिक चिकित्सा केंद्र की स्थापना में उनकी भूमिका थी। देश के लोकप्रिय डर्मेटोलॉजिस्ट टीएन कई हथियार को चलाने में माहिर थे। उन्होंने ये कह कर शहाबुद्दीन की पैरवी करने से इनकार कर दिया था कि वो अपराधियों का साथ नहीं देंगे। फिर शहाबुद्दीन ने भी राजनीति में उतरने की ठानी और 1990 के चुनाव में उसने अपराध की सारी सीमाएँ पार कर के उन्हें हरा दिया। ऐसे व्यक्ति को अपराधियों का पनाहगार दिखाया गया है।
रंगदारी = रक्षा, अगर अपराधी मुस्लिम हो
इस वेब सीरीज में दिखाया गया है कि शहाबुद्दीन या उसने गुंडे व्यापारियों से हफ्ता माँगने नहीं जाते हैं, बल्कि सारे व्यापारी खुद आकर उससे कहते हैं कि हमसे हफ्ता लो और हमारी रक्षा करो। अर्थात, रंगदारी ‘रक्षा’ बन जाता है, जब उसे वसूलने वाला कोई मुस्लिम अपराधी हो। सिवान के व्यापारी अपनी दुकानों में ‘साहेब’ की फोटो रखते हैं, उससे डरते नहीं बल्कि इज्जत करते हैं। व्यापारियों में उसका कोई डर नहीं है, सभी स्वेच्छा से उसके साथ हैं।
जबकि सच्चाई ये थी कि अगर किसी दुकानदार ने शहाबुद्दीन के विपक्षी उम्मीदवार का पोस्टर-बैनर गलती से भी लगा लिया तो उसकी शामत आ जाती थी। 2004 का लोकसभा चुनाव शहाबुद्दीन ने जेल से ही जीता था। जेल में रहते उसने अस्पताल में रहने का इंतजाम कर लिया था। एक फ्लोर पूरा उसके लिए बुक था और वहाँ से वो राजनीतिक बैठकें करता था। चुनाव में उसकी जीत हुई और उसके बाद कई जदयू कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हुईं, क्योंकि जदयू के ओमप्रकाश यादव ने उसे कड़ी टक्कर दी थी।
1997 में राजद के गठन के बाद लालू यादव के हाथ में सत्ता पूरी तरह से आ गई और फिर शहाबुद्दीन सिवान में कानून का पर्याय बन गया। जिस व्यक्ति से पुलिस तक काँपती थी, व्यापारियों और कारोबारियों में उसके खौफ का आप अंदाज़ा लगा लीजिए। अगर शहाबुद्दीन की जनता के बीच उतनी ही लोकप्रियता रहती तो उसकी बीवी हिना शहाब लगातार तीन बार (2009, 2014, 2019) लोकसभा का चुनाव नहीं हारती। कॉलेज के जमाने से ही अपराध की दुनिया में आगे बढ़ने वाले शहाबुद्दीन को लेकर लोगों में इज्जत नहीं, डर था।
चंदा बाबू को ही बना दिया ‘अपराधी’, एक पीड़ित बुजुर्ग को दिखाया ‘विकास में बाधक’
ZEE5 पर आए वेब सीरीज ‘रंगबाज: डर की राजनीति’ की मानें तो चंदा बाबू विकास में बाधक बन रहे थे। एक वर्ल्ड क्लास अस्पताल बनवाने के लिए सभी व्यापारियों ने अपनी जमीनें दे दी, लेकिन वो दोगुनी कीमत मिलने के बावजूद अपनी दुकान नहीं दे रहे थे। उनके बेटों ने तेजाब से शहाबुद्दीन के लोगों पर हमला किया, इसीलिए शहाबुद्दीन ने उनके दो बेटों को तेजाब से नहला कर मार डाला। इसके बाद टुकड़े-टुकड़े कर के उनके शव फेंक दिए गए थे, ये नहीं दिखाया गया है।
तीसरा भाई बाद में गवाही देने आता है, लेकिन उसे भी मार डाला जाता है। सीरीज के अंत में जेल में रह रहे चंदा बाबू ही शहाबुद्दीन से माफ़ी माँगने के बहाने उसके पास आते हैं और उसे मार डालते हैं। चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ़ चंदा बाबू का दिसंबर 2020 में हार्ट अटैक से निधन हो गया था। तीन जवान बेटों की अर्थी को कंधा देने वाला ये व्यक्ति अंत समय तक अपने बेटों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ता रहा। उन्हें इस वेब सीरीज में सिवान के विकास में रोड अटकाने वाला बताया गया है।
असली बात ये है कि चंदा बाबू की दुकान पर आए शहाबुद्दीन के गुंडों ने ढाई लाख रुपए लूट लिए थे। उनके बेटे सतीश 40,000 रुपए तक देने को तैयार भी हो गए थे, लेकिन गुंडे उन्हें पीटने लगे। भाई राजीव ने उन्हें बचाने के लिए बाथरूम में रखा एसिड गुंडों की तरफ फेंका, जिसकी कुछ छींटें उन पर पड़ गईं। फिर शहाबुद्दीन के आदेश के बाद भाई गिरीश और सतीश को राजीव के सामने दोनों को तेजाब से नहला कर मार डाला गया और शव टुकड़े-टुकड़े कर बोरियों में नमक के साथ रख कर फेंक दिया गया।
फिर चंदा बाबू की दुकान भी लूटपाट के बाद जला डाली गई। वेब सीरीज में बचपन में शहाबुद्दीन की दुकान जलती हुई दिखाई गई है। सिवान से लेकर पटना और दिल्ली तक चंदा बाबू धक्के खाते रहे, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। गवाही देने आया तीसरा बेटा राजीव भी मारा गया। चंदा बाबू और उनकी पत्नी कलावती ने हिम्मत नहीं हारी। विकलांग बेटे और पत्नी की देखरेख भी उनके जिम्मे थी। वो कहते थे, “या तो भगवान मार दें, या शहाबुद्दीन।”
अपराधी नहीं, ‘विकास पुरुष’ शहाबुद्दीन: महिला अधिकारों की करता है बात
आपने अक्सर कई मामलों में देखा है जहाँ अपराधी के मुस्लिम होने पर उसे पागल कह दिया जाता है। गोरखपुर मंदिर के हमलावर को पागल कह दिया गया। परिवार ने कहा उन्हें कुछ पता ही नहीं है। जबकि कमलेश तिवारी मामले में हम देख चुके हैं कैसे परिवार भी जिहाद में उनका साथ देता है। लेकिन, फिल्मों में मुस्लिम अपराधियों के परिवार वाले बड़े ही उसूल वाले होते हैं। शहाबुद्दीन के अब्बा उससे बातें नहीं करते, अपराध से नफरत करते हैं और उसके बनाए घर में नहीं रहते, न ही उसका दिया कोई सामान लेते हैं।
शहाबुद्दीन की बीवी उसे अपराध करने से मना करती है, डाँटती है। जबकि सच्चाई ये है कि पूरा का पूरा परिवार जिहाद में साथ होता है। MLC चुनाव के दौरान निर्दलीय प्रत्याशी रईस खान पर AK-47 से अंधाधुन गोलीबारी हुई थी। इस मामले में शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को नामजद किया गया था। ये इसी साल अप्रैल की घटना है, शहाबुद्दीन के मरने के 1 साल बाद की। हिना शाहब ने रोते हुए पलायन की धमकी दे डाली और बेटे को निर्दोष बताया। असल जीवन में परिवार ने शहाबुद्दीन के अपराधों का बचाव ही किया।
शहाबुद्दीन इस वेब सीरीज में ‘विकास पुरुष’ है। जेल में एक कॉन्स्टेबल बताता है कि कैसे उसकी बेटियाँ उसी के खोले कॉलेज में पढ़ पाई हैं। वो अपनी बीवी को बताता है कि कैसे उसने संसद में महिला शिक्षा पर भाषण दिया। फिर समझाता है कि इन मुद्दों पर बोलने के लिए उसे संसद पहुँचना होगा और वहाँ तक जाने के लिए ये सब करना पड़ता है। फिल्म में वामपंथी नेता चंद्रशेखर सिंह को शहाबुद्दीन का बचपन का दोस्त बताया गया है, जबकि दोनों साथ नहीं पढ़े थे और दोस्त नहीं थे। चंद्रशेखर सिंह की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी।
प्रतापपुर मुठभेड़ को भी इसमें शहाबुद्दीन द्वारा ‘आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई’ साबित करने का प्रयास किया गया था। असल में उसने एक एसपी को पीटा था और उसके आदमियों ने कई पुलिसकर्मियों की पिटाई की थी, जिसके बाद कई थानों की पुलिस उसके घर पहुँची थी। इस मुठभेड़ में 13 लाशें गिरी थीं। ISI, पाकिस्तान और अंडरवर्ल्ड से कनेक्शन रखने वाले शहाबुद्दीन के खौफ से निजात के लिए सेना की टुकड़ी को सिवान में तैनात करना पड़ा था। मुठभेड़ के बाद पुलिस को ही क्रूर बताते हुए लालू यादव की सरकार ने शहाबुद्दीन का साथ दिया।
भारत की शीर्ष अदालत ने 11 साल पहले एक 25 वर्षीय आदिवासी महिला को, जिसे महाराष्ट्र में नंगा करके परेड कराया था, न्याय दिया था। हालाँकि जब भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी, 2011 को एक महिला सहित कुल चार आरोपितों को एक साल की जेल की सजा सुनाई तब इस मामले में 16 साल बाद न्याय पाने वाली महिला 40 साल की हो गई थी। अदालत ने या फैसला सुनते हुए अपनी टिप्पणी में कहा था, “भारत के आदिवासियों के साथ किया गया अन्याय हमारे देश के इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय है। वे आम तौर पर गैर-आदिवासियों से चरित्र में श्रेष्ठ हैं।”
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़ित महिला भील समुदाय की थी और महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक गाँव में रहती थी। उसे चार लोगों ने नंगा घुमाया था, जिनमें से एक महिला भी थी। घटना के वक्त पीड़ित महिला 25 साल की थी। कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि गाँव की सड़क पर दिन के उजाले में एक आदिवासी महिला की परेड शर्मनाक, चौंकाने वाली और अपमानजनक है।
तब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने महाभारत के उदाहरण का हवाला देते हुए टिप्पणी की थी कि आरोपितों ने गुरु द्रोणाचार्य की तरह ही भील महिला का अनादर किया था, जिसने एकलव्य का अपमान किया था क्योंकि वह आदिवासी समुदाय से था। उन्होंने गुरु द्रोणाचार्य के कृत्य को गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य के दाहिने अँगूठे की माँग को शर्मनाक बताया और पूछा, “गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को सिखाया भी नहीं था, तो उन्हें गुरु दक्षिणा माँगने का क्या अधिकार था।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य पर अपने शिष्य अर्जुन का पक्ष लिया और जानबूझकर दाहिने हाथ के अँगूठे की माँग की ताकि वह कभी भी सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर न बन सके।” पीठ ने दोहराया, “यह गुरु द्रोणाचार्य की ओर से एक शर्मनाक कार्य था।”
उस समय न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ ने यह भी कहा था कि आदिवासी समुदाय सम्मान का पात्र है क्योंकि वे भारत के ‘मूल निवासी’ हैं। इसमें कहा गया था, “देश में आदिवासियों के प्रति लोगों की मानसिकता बदलनी चाहिए और उन्हें भारत के मूल निवासियों के रूप में वह सम्मान दिया जाना चाहिए जिसके वे हकदार हैं।” अदालत ने न्याय देते हुए इतिहास से ऐसे कई उदाहरण दिए हैं जो बताते हैं कि गैर-आदिवासी समुदाय हमेशा भारत में आदिवासी समुदाय के प्रति कठोर रहा है।
गुरु द्रोणाचार्य की गुरुदक्षिणा
एक बार द्रोणाचार्य अपने शिष्यों कौरवों और पांडवों के साथ जंगल में गए थे। अर्जुन, जो उस समय केवल एक बच्चा था, ने एक कुत्ते को देखा जिसके जबड़े खुले हुए थे और मुँह के अंदर तीर फँस गए थे। भले ही कुत्ते के जबड़े के अंदर तीर फँस गए हों, लेकिन अर्जुन को चोट के कोई निशान नहीं दिख रहे थे। फिर उन्होंने यह आश्चर्यजनक दृश्य अपने गुरु के ध्यान में लाया, जिन्होंने सोचा कि ऐसा कौन कर सकता है।
बाद में गुरु द्रोणाचार्य को पता चला कि एकलव्य नाम के एक आदिवासी बालक ने श्वान को निशाना बनाया था। उन्होंने एकलव्य से अपनी और अपने गुरु की पहचान प्रकट करने को कहा। एकलव्य ने कहा कि वह निषाद आदिवासी कबीले के हिरण्यधनुस का पुत्र था जो मगध साम्राज्य के प्रति वफादार थे और कहा कि उसने आपसे ही तीरंदाजी की शिक्षा ली है। उन्होंने उन्हें द्रोणाचार्य की एक मिट्टी की मूर्ति भी दिखाई और समझाया कि उन्होंने मूर्ति की अनुमति ली थी और उनके मूर्ति के सानिध्य में बैठकर ही तीरंदाजी का हुनर सीखा था।
कहते हैं कि यह सुनकर, गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य से उन्हें गुरु दक्षिणा देने के लिए कहा था क्योंकि उन्होंने उनसे सबक सीखा था। उन्होंने गुरुदक्षिणा में एकलव्य उसका अँगूठा माँग लिया था। एकलव्य ने अपने गुरु को अपना अंगूठा देने में संकोच नहीं किया था।
द्रोणाचार्य को केवल कुरु वंश परिवार के बच्चों को ही प्रशिक्षित करने के लिए एक शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। उस समय कुरु परिवार के सदस्यों के अलावा किसी और को शिक्षित करना भी राज्य के नियम के विरुद्ध था। इसके अलावा, एकलव्य ने द्रोणाचार्य की अनुमति के बिना सबक सीखा था। और यह सीखने के सिद्धांतों के विपरीत था। इसलिए द्रोणाचार्य ने कुरु वंश के प्रति अपनी प्रतिज्ञा का मान रखते हुए एकलव्य के अँगूठे को गुरुदक्षिणा के रूप में माँग लिया था, जिसके बिना धनुर्विद्या का अभ्यास करना असंभव होगा। दूसरी ओर, गुरु द्रोणाचार्य ने कहा कि उन्होंने एकलव्य को दंडित किया अब चाहे वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय हो।
साथ ही, गुरु द्रोणाचार्य जानते थे कि एकलव्य हमेशा मगध के राजा के प्रति वफादार रहेगा जो कुरु वंश हस्तिनापुर का दुश्मन था। इसलिए, वह नहीं चाहते थे कि उसके शत्रु राज्य में एकलव्य के समान धनुर्धर हो।
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2011 के फैसले में भी राज्य सरकार को दोषियों की बढ़ी हुई सजा के लिए अपील नहीं करने के लिए फटकार लगाई थी। उच्च न्यायालय ने पहले कठोर अनुसूचित मामले और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत आरोपितों की दोषसिद्धि को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि पीड़ित महिला अपना जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं थी।
पुराने मामले में महिला के साथ हुए अन्याय से व्यथित, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “हमारे देश से प्यार करने वाले सभी लोगों का यह कर्तव्य है कि वे देखें कि अनुसूचित जनजातियों को कोई नुकसान न हो और उन्हें हर संभव मदद दी जाए। उन्हें उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में लाने के लिए क्योंकि वे हजारों वर्षों से भयानक उत्पीड़न और अत्याचारों के शिकार हैं।”
बिहार में सरकार बदलते ही ‘जंगलराज’ के लक्षण की झलक मिल गई है। इधर जदयू सुप्रीमो नीतीश कुमार (Nitish Kumar) और राजद सुप्रीमो लालू यादव (Lalu Yadav) के बेटे तेजस्वी (Tejashwi Yadav) मिलकर सरकार बना रहे थे, उधर बिहार में एक पत्रकार की दिनदहाड़े हत्या हो रही थी।
घटना बिहार के जमुई जिले के सिमुलतला थाने के गोपालामारण गाँव के पास की है। यहाँ अपराधियों ने दैनिक प्रभात खबर के पत्रकार को दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी। अपराधियों ने पाँच गोलियाँ मारीं, जो पत्रकार के सीने और सिर में लगीं और मौके पर ही दम तोड़ दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, बाइक सवार अपराधियों ने जिस पत्रकार को गोली मारी है, उसका नाम गोकुल यादव है। गोकुल यादव की उम्र 35 साल है और वह सिमुलतला इलाके के लीलावरण गाँव का रहने वाले थे।
बताया जा रहा है कि गोकुल लगभग 11 बजे फसल में डालने के लिए दवा लाने के लिए सिमुलतला के लिए घर से निकले थे। इसी दौरान घर से लगभग एक किलोमीटर दूर दो बाइक पर सवार पाँच अपराधियों ने ताबड़तोड़ गोली चलानी शुरू कर दी। पहले से ही घात लगाकर बैठे अपराधियों के इस हमले में पत्रकार की मौके पर ही मौत हो गई।
हत्या के पीछे पंचायत चुनाव को लेकर रंजिश बताई जा रही है। गोकुल यादव की पत्नी इस बार पंचायत चुनाव में खुरंडा पंचायत से मुखिया पद के लिए चुनाव लड़ी थी, लेकिन जीत नहीं पाई। कहा जा रहा है कि चुनाव लड़ने के कारण गाँव के कुछ लोगों ने हाल ही में यादव के साथ मारपीट भी की थी। थाने में दोनों तरफ से केस भी दर्ज कराया गया था।
मृतक के पिता नागेंद्र यादव के अनुसार, पंचायत चुनाव के कारण ही इस हत्या को अंजाम दिया गया है। जिन लोगों ने पूर्व में इसके साथ मारपीट की थी, उन्हीं लोगों ने इसकी हत्या की है। परिजनों से मिली शिकायत के आधार पर पुलिस ने दर्ज कर लिया है और मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है।
पिछले राजद-जदयू सरकार में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या
पिछली बार भी जब राजद के साथ मिलकर नीतीश कुमार ने सरकार बनाई थी, तब सिवान के पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या हुई थी। इस हत्याकांड में सिवान से राजद के बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन का नाम सामने आया था।
इस मामले में नीतीश कुमार की खूब किरकिरी हुई थी। राजदेव रंजन की पत्नी आशा ने नीतीश कुमार की पुलिस पर अविश्वास जताते हुए सीबीआई जाँच की माँग की थी। इसके बाद नीतीश कुमार अपनी गर्दन छुड़ाते हुए इस केस को सीबीआई को सौंप दिया था। यह मामला अभी न्यायालय के विचाराधीन है।
बता दें कि हिंदी दैनिक ‘हिंदुस्तान’ के पत्रकार राजदेव रंजन की सीवान में 13 मई 2016 को घर जाते समय पाँच बाइक सवार बदमाशों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसमें से एक आरोपित कैफ को शहाबुद्दीन के काफिले में देखा गया था। इसके साथ ही उसकी तस्वीर राजद नेता तेज प्रताप यादव से साथ भी वायरल हुई थी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार (10 अगस्त, 2022) को पानीपत में रिफाइनरी के इंडियन ऑयल के द्वितीय जनरेशन (2G) इथेनॉल संयंत्र का वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उद्घाटन कर राष्ट्र को समर्पित किया। इस अवसर पर PM मोदी ने कॉन्ग्रेस पर बड़ा हमला करते हुए कहा कि हमारे देश में भी कुछ लोग हैं जो नकारात्मकता के भँवर में फँसे हुए हैं, निराशा में डूबे हुए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के खिलाफ झूठ पर झूठ बोलने के बाद भी जब जनता जनार्दन ऐसे लोगों पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं तो ऐसी हताशा में ये लोग भी अब काले जादू की तरफ मुड़ते नजर आ रहे हैं।
But, these people are unaware that no matter how much ever they do black magic & believe in superstitions, people will never trust them back: PM Modi pic.twitter.com/5LAiGrcdVU
उद्घाटन के बाद अपने संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने कहा, “अभी हमने 5 अगस्त को देखा है कि कैसे काले जादू को फैलाने का प्रयास किया गया। ये लोग सोचते हैं कि काले कपड़े पहनकर, उनकी निराशा-हताशा का काल समाप्त हो जाएगा। लेकिन उन्हें पता नहीं है कि वो कितनी ही झाड़-फूँक कर लें, कितना ही काला जादू कर लें, अंधविश्वास कर लें, जनता का विश्वास अब उन पर दोबारा कभी नहीं बन पाएगा।”
प्रधानमंत्री मोदी ने अमृत महोत्सव का जिक्र करते हुए कहा, ”अमृत महोत्सव में आज जब देश तिरंगे के रंग में रंगा हुआ है तब कुछ ऐसा भी हुआ है जिसकी तरफ मैं देश का ध्यान दिलाना चाहता हूँ। हमारे वीर स्वतंत्रता सेनानियों को अपमानित करने का, इस पवित्र अवसर को अपवित्र करने का प्रयास किया गया है। ऐसे लोगों की मानसिकता देश को भी समझना जरूरी है।”
बता दें कि कॉन्ग्रेस ने 5 अगस्त को महंगाई के नाम पर प्रदर्शन किया था। इस दौरान राहुल और प्रियंका गाँधी सहित कॉन्ग्रेस नेताओं ने काले कपड़े पहने थे। हालाँकि, दिल्ली में संसद के पास प्रदर्शन कर रहे कॉन्ग्रेस नेताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। लेकिन बाद में 6 घंटे बाद उन्हें छोड़ दिया गया था।
प्रधानमंत्री मोदी ने उद्घाटन के बाद कहा, “आज का कार्यक्रम पानीपत, हरियाणा समेत पूरे देश के किसानों के लिए बहुत अहम है। आज पानीपत में जो एथेनॉल संयंत्र लगा है वो तो एक शुरूआत मात्र है। इस प्लांट की वजह से दिल्ली, NCR और हरियाणा में प्रदूषण कम करने में भी मदद मिलेगी।”
प्रकृति की पूजा करने वाले हमारे देश में जैविक ईंधन, प्रकृति की रक्षा का ही एक पर्याय है। हमारे किसान भाई-बहन तो इसे और अच्छे से समझते हैं। किसान भाई-बहन तो सदियों से इतने जागरूक हैं कि बीज बोने से लेकर फसल उगाने और उसे बाजार में पहुंचाने तक किसी भी चीज को बर्बाद नहीं करते: PM pic.twitter.com/zCdmjJTWjc
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने जहाँ इस अवसर पर कॉन्ग्रेस के काले जादू पर हमला किया वहीं जैविक ईंधन पर बात करते हुए कहा, “प्रकृति की पूजा करने वाले हमारे देश में जैविक ईंधन, प्रकृति की रक्षा का ही एक पर्याय है। हमारे किसान भाई-बहन तो इसे और अच्छे से समझते हैं। किसान भाई-बहन तो सदियों से इतने जागरूक हैं कि बीज बोने से लेकर फसल उगाने और उसे बाजार में पहुँचाने तक किसी भी चीज को बर्बाद नहीं करते।”
कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में जैवलिन थ्रो (Javelin Throw) में कांस्य पदक जीतने वाली अन्नू रानी (Annu Rani) किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वह भारत की सर्वश्रेष्ठ भाला फेंकने वाली महिला खिलाड़ी हैं। उन्होंने वर्ष 2014 में हुए एशियाई गेम्स में कांस्य, 2015 की एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक और 2017 एशियन चैंपियनशिप में रजत पदक अपने नाम किया है। यही नहीं, वह वर्ल्ड चैंपियनशिप के फाइनल में अपनी जगह पक्की करने वाली भारतीय भी हैं, जो देश को गौरवान्वित करता है।
उत्तर प्रदेश के मेरठ के बहादुरपुर गाँव से ताल्लुक रखने वाली अन्नू के परिवार का गन्ने और भाला से एक अनोखा नाता है। बहादुरपुर गाँव में 400 परिवार रहते हैं। गाँव तक पहुँचने के लिए गन्ने के खेतों से होकर गुजरना पड़ता है। इन्हीं में से एक खेत में अन्नू रानी ने पहली बार भाले की जगह गन्ना फेंका था। अन्नू के बड़े भाई उपेंद्र कहते हैं, “मैं खुद एक धावक था, लेकिन मेरी रुचि हमेशा से भाला फेंक में थी। मैं जब भी स्थानीय सभाओं में जाता था, भाला फेंक पर आयोजित इवेंट देखता था। अन्नू हमारे साथ क्रिकेट खेलती थी, उसके हाथ बहुत मजबूत थे। इसलिए मैंने उसे भाला फेंकने की प्रैक्टिस करने के लिए कहा।”
अन्नू भी इसके लिए मान गई। ये सब तो ठीक था, लेकिन इतनी जल्दी एक कोच और भाला खोजना सबसे बड़ी चुनौती था। इसलिए वह गाँव की चकरोड़ पर गन्ने का भाला बनाकर प्रैक्टिस करती थीं। गन्ने के बाद अन्नू ने बाँस से बने भाले को फेंकना शुरू किया। 16 वर्ष की अन्नू को उपेंद्र ने जैवलिन थ्रो की ट्रेनिंग दी। वह 2011 में उपेंद्र के मार्गदर्शन में अपना पहला राष्ट्रीय पदक जीतने में सफल रही। अन्नू के कहते हैं, “मैंने प्रतियोगिताओं में अन्य थ्रोअर्स को ही देखकर सीखा था। उस समय मैं खेल की बारीकियों को नहीं जानता था। मैं केवल इतना जानता था कि आपको दौड़ना है, अपनी बाँहों को फैलाना है और जहाँ तक हो सके भाला फेंकना है।”
किसी कोच के मार्गदर्शन के बिना ही अन्नू ने स्कूल के दिनों में में नियमित रूप से 45 मीटर से अधिक 600 ग्राम भाला फेंकना शुरू कर दिया। अन्नू के स्कूल के फिजिकल एजुकेशन के टीचर उसकी प्रतिभा से खासा प्रभावित थे। वह चाहते थे कि अन्नू जिला और राज्य स्तर के आयोजनों में भी में भाग ले। लेकिन यहाँ उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती उनके ओवर प्रोटेक्टिव भाई और पिता थे। वे नहीं चाहते थे कि वह प्रतियोगिताओं के लिए मेरठ से बाहर जाए।
उपेंद्र कहते हैं, “वह बहुत छोटी थी और हम उसे लेकर बहुत प्रोटेक्टिव थे। इसलिए हमने शिक्षक के समक्ष यह बात रखी कि वह मेरठ के बाहर केवल एक शर्त पर जा सकती है। वह शर्त यह है कि परिवार का कोई एक सदस्य उसके साथ जाएगा। इसके बाद अन्नू ने कभी भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।”
भाई के मुताबिक, “अब अन्नू जब भी कभी गाँव आती है, तो वह हमेशा गाँव में स्टेडियम बनाने के बारे में बात करती है, जो उसका सपना है। हमारे पास इस गाँव में बहुत सारे एथलीट हैं, लेकिन उनके पास कोई सुविधा नहीं है।”
बिहार में चल रही राजनीतिक उठापठक को कवर करने दिल्ली से पटना पहुँची आज तक की वरिष्ठ पत्रकार अंजना ओम कश्यप (Anjana Om Kashyap) को देखकर भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उनके खिलाफ नारे लगाए। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि जेडीयू (JDU) के नीतीश कुमार (Nitish Kumar) एक बार फिर से पलट गए और राजद-कॉन्ग्रेस के साथ महागठबंधन में शामिल हो गए।
अंजना ओम कश्यप राजनीतिक मुद्दों को कवर करती हैं। वह बिहार में चल रहे सियासी उठापटक, नीतीश के दल बदलने और फिर से महागठबंधन में शामिल होने की जमीनी हकीकत को दर्शकों तक पहुँचाने के लिए दिल्ली से पटना आई हुई थीं। अंजना ने जैसे ही रिपोर्टिंग शुरू की भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने उनके खिलाफ नारे लगाना शुरू कर दिया। उन लोगों ने उनका नाम लिया और उनके लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया। यह घटना कैमरे में कैद हो गई, जिसमें एक महिला पत्रकार के साथ असभ्य लोगों की भीड़ दिखाई दे रही है।
यह वीडियो देखते ही देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। कॉन्ग्रेस, राजद, विपक्षी पार्टी के समर्थकों-नेताओं, वामपंथी पत्रकारों और तथाकथित ‘फैक्ट चेकर महिला पत्रकार को परेशान किए जाने और उनके लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करने से काफी खुश नजर आए।
पत्रकार, कॉन्ग्रेस नेताओं ने भीड़ समर्थन
पत्रकार उत्कर्ष सिंह ने अपने ट्विटर हैंडल पर अंजना ओम कश्यप का यह वीडियो शेयर किया है, जिसमें भीड़ उनके खिलाफ नारे लगा रही है। उत्कर्ष सिंह लिखते हैं, “सरकार पलटने के बीच एक घटना ये भी हुई।” मालूम हो कि क्विंट के पत्रकार उत्कर्ष सिंह भी आज तक में काम कर चुके हैं। राजद-कॉन्ग्रेस के प्रति इनका झुकाव किसी से छिपा नहीं है।
हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में जेल गए मोहम्मद ज़ुबैर ने भी उत्कर्ष सिंह के ट्वीट को रीट्वीट किया है। खुद को फैक्ट चेकर बताने वाले ज़ुबैर इस बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचा कि कैसे भीड़ महिला पत्रकार को परेशान कर रही है। मोहम्मद ज़ुबैर भगवान राम, रामायण सब का अपमान कर चुका है।
फोटो साभार: ट्विटर
एक अन्य पत्रकार पुनीत कुमार सिंह ने भी इस वीडियो को साझा किया है। यही नहीं उन्होंने इशारों-इशारों में अंजना ओम कश्यप के खिलाफ हमले को उचित भी ठहराया है।
कॉन्ग्रेस नेताओं और उनके समर्थकों ने भी अंजना ओम कश्यप पर भीड़ के हमले का समर्थन किया है। जबकि कॉन्ग्रेस ने ही ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ का नारा दिया था, लेकिन आज ये सभी पत्रकार के साथ किए गए अभद्र व्यवहार को लेकर खुश नजर आए। राहुल गाँधी के करीबी कॉन्ग्रेस नेता श्रीनिवास बीवी ने हमले का वीडियो साझा किया है। उन्होंने लिखा, “सरकार के स्टार एंकरों के सड़कों पर उतरते ही ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हो रही है, ये बात चैनलों को अब विचार करने की जरूरत है…! लोकतंत्र के लिए ऐसी तस्वीरें शुभ नहीं हैं।”
सरकार के स्टार एंकरों के सड़कों पर उतरते ही ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हो रही है, ये बात चैनलों को अब विचार करने की जरूरत है…!
कई अन्य कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने ‘गोदी मीडिया पत्रकार अंजना ओम कश्यप’ का इस तरह से स्वागत करने के लिए बिहार के लोगों का आभार व्यक्त करते हुए वीडियो साझा किया।
This is How Godi Media journalist @anjanaomkashyap was welcomed by the people of Bihar.
सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस समर्थक भी पत्रकार को बदनाम करने और भीड़ को समर्थन देने में शामिल हो गए।
Even after getting so much respect, if the Godi media does not improve, then it will be in a very bad condition in the coming days because the public of India has come to know that it is completely rejected.#AnjanaOmKashyappic.twitter.com/5aIfpRFyJj
What happened with #AnjanaOmKashyap is wrong! There is no way that heckling of a woman can be justified. But people who have an argument that she was just doing her job, that is exactly my point why it happened to her… Anchors like them haven’t done their job for a while! pic.twitter.com/QNXCGPWJzZ
राहुल गाँधी के एक फैन ने लिखा, “बिहार में अंजना ओम कश्यप का भव्य स्वागत ‘गोदी मीडिया गो बैक’ और ‘गोदी मीडिया मुर्दाबाद’ के नारों से किया गया, जब ये स्टूडियों के गुलदस्ते फील्ड में जाते हैं, तब इनको इनकी असलियत दिखती है।”
वामपंथी उन्हें पसंद नहीं करते जो उनके आगे झुकते नहीं
यह ध्यान देने योग्य बात है कि अंजना ओम कश्यप के खिलाफ हमले का उन लोगों ने समर्थन किया है, जिन्होंने श्रीकांत त्यागी के एक महिला के साथ अभद्रता करने पर नाराजगी व्यक्त की थी। फैक्ट चेकर, वामपंथियों, कॉन्ग्रेस और विपक्षी नेताओं के उदार सिद्धांतों अब कहाँ गए, जब एक महिला पत्रकार अंजना ओम कश्यप के खिलाफ नारे लगाए गए।
वामपंथियों और उनके पदचिन्हों पर जो भी चलने से इनकार करता है और उनके इस्लामी प्रचार को बढ़ावा देने में उनकी मदद नहीं करता है। वह उनके निशाने पर आ जाता है।
आपको बता दें कि अंजना ओम कश्यप उन निष्पक्ष पत्रकारों में से एक हैं, जो न केवल वामपंथियों के आगे झुकने से इनकार करती हैं, बल्कि लोगों को धोखा देने के लिए बुने गए नकली राजनीतिक नैरेटिव को भी उजागर करने का दम रखती हैं।
उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सोनौली थाना क्षेत्र से एक शर्मसार करने वाली घटना सामने आई है। सोमवार (9 अगस्त, 2022) की सुबह बंद पड़े मदरसे में 55 वर्षीय अधेड़ मौलवी ने आठ वर्षीय मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया। मौलवी रेप के बाद बच्ची को खून से लथपथ छोड़कर फरार हो गया। इस मामले में पुलिस ने दुष्कर्म व पॉक्सो एक्ट में मुकदमा दर्ज किया है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, यह बात सामने आई है कि सोमवार की सुबह मासूम बच्ची घर से किराने की दुकान पर सामान खरीदने जा रह थी। तभी रास्ते में 55 वर्षीय अधेड़ शमसुल हक मिल गया। उसने मासूम बच्ची को बहला-फुसलाकर बगल में स्थित एक बंद पड़े पुराने मदरसे में ले गया। जहाँ उसके साथ रेप करने के बाद खून से लथपथ छोड़कर फरार हो गया। बताया जा रहा है कि खून से लथपथ बच्ची जब रोते हुए घर पहुँची तो उसकी हालत देख परिजन बदहवास हो गए।
जिसके बाद बच्ची को परिजनों ने अस्पताल में भर्ती करवाया और पुलिस को दुष्कर्म की घटना के बारे सूचना दी। सूचना के बाद मौके पर पहुँची पुलिस ने घटनास्थल को सील कर जाँच पड़ताल शुरू कर दी है। यह मामला सामने आने के बाद से मासूम को शिकार बनाने वाले मौलवी शमसुल हक को लेकर लोग भड़के हुए हैं। बता दें कि पीड़ित बच्ची और आरोपित दोनों एक ही समुदाय के हैं।
वहीं इस मामले में जानकारी देते हुए सीओ नौतनवा अनुज कुमार सिंह ने बताया कि पॉक्सो एक्ट के तहत आरोपित के विरुद्ध मुकदमा दर्ज का लिया गया है। उन्होंने बताया कि सीओ के नेतृत्व में थानाध्यक्ष सोनौली महेन्द्र यादव व परसामलिक थानाध्यक्ष गोरखनाथ सरोज ने आरोपित शमसुल हक़ को गिरफ्तार कर लिया है। वह परसामलिक क्षेत्र में छिपा हुआ था। थानाध्यक्ष ने बताया कि आरोपित के खिलाफ विधिक कार्रवाई की जा रही है।
एक पाकिस्तानी महिला सहित तीन संदिग्धों को नेपाल के रास्ते भारत में घुसने की कोशिश करते हुए हाल ही में बिहार में पकड़ा गया था। अब पंजाब के गुरुदासपुर में दो पाकिस्तानी नागरिकों को भारतीय सीमा में घुमते हुए गिरफ्तार किया है।
घटना पंजाब के गुरदासपुर सेक्टर के अंतर्गत आती BOP दबन की है। BSF के किसान गार्ड के जवान कंटीली तारों के पास गश्त पर थे। इसी दौरान उनकी नजर दो लोगों पर पड़ी, जो भारतीय सीमा में घूम रहे थे। BSF के जवानों ने उन्हें आवाज दी तो उन्होंने छिपने का प्रयास किया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
BSF ने गिरफ्तार करने के बाद दोनों संदिग्धों की तलाशी ली। उनके पास से दो पाकिस्तानी मोबाइल, 500 रुपए पाकिस्तानी रुपया और दो पहचान पत्र जब्त किया गया है। इसके अलावा इनके पास से तंबाकू का एक पैकेट भी मिला है। ये दोनों भारतीय सीमा के 10 मीटर अंदर घुम रहे थे।
दोनों पाकिस्तानी नागरिकों की पहचान पाकिस्तान के जिला नारोवाल के अंतर्गत आते गाँव भोला भाजवा के निवासी के रूप में हुई है। इनमें से एक नाम किशन मसीह है और उसकी आयु 26 साल है। वहीं, दूसरे शख्स की पहचान 18 साल के रबीज मसीह के तौर पर हुई है।
बिहार में पकड़ाई थी पाकिस्तानी युवती
नेपाल के रास्ते भारत में घुसने की कोशिश कर रहे तीन संदिग्धों को सीमा सुरक्षा बल (SSB) ने पकड़ा है। इनमें से एक पाकिस्तानी युवती है। बिहार के सीतामढ़ी जिले के भिट्ठामोड़ में एसएसबी चेकपोस्ट के पास इन्हें पकड़ा गया।
24 साल की पाकिस्तानी युवती के साथ जो दो लोग पकड़े गए हैं, उनमें एक नेपाल का नागरिक है। दूसरा युवक भारतीय मुस्लिम बताया जा रहा। गिरफ्तार युवती के पास से कॉलेज आईकार्ड, आधार कार्ड, ATM कार्ड, नेपाली और पाकिस्तानी मोबाइल सिम सहित अन्य दस्तावेज बरामद हुए हैं। इन दस्तावेजों के मुताबिक युवती का नाम खादीजा नूर है।
रिपोर्ट के मुताबिक, युवती पाकिस्तान के फैसलाबाद की रहने वाली है। पाकिस्तानी युवती और संदिग्धों के पकड़े जाने पर सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क हो गई हैं। घुसपैठ का यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। युवती के पास से पाकिस्तानी पासपोर्ट और नेपाल स्थित इस्लामाबाद दूतावास से जारी टूरिजस्ट वीजा मिला है।
बताया जा रहा है कि उसके वीजा पर वापसी की तारीख 4 सितंबर 2022 है। एसे में सवाल उठ रहा है कि कहीं वह स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) के मौके पर भारत में किसी साजिश को अंजाम देने या फिर किसी जगह की रेकी करने तो नहीं आ रही थी। रिपोर्ट के अनुसार युवती दुबई के रास्ते नेपाल आई थी।