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मंदिर से लौट रहे हिन्दू परिवार पर हमला, महिलाओं से छेड़छाड़: Pak में जहाँ हुई थी हिन्दू कारोबारी की हत्या, वहाँ अब भी नहीं थम रही कट्टरपंथी घटनाएँ

पाकिस्तान के सिंध के संघर में एक हिंदू परिवार पर रविवार (7 अगस्त, 2022) शाम को मीरपुर मथेलो पुलिस थाने के अंतर्गत लगभग एक दर्जन लोगों ने हमला बोल दिया। जिसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने पीड़ितों के लिए न्याय की माँग की। दरअसल, घोटकी के पास एक रेस्तरां में जिस परिवार पर हमला किया है जिस उसमें तीन महिलाएँ और दो बच्चे शामिल थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, परिवार को रोकने के बाद वीगो में पहुँचे दर्जनों हमलावरों ने कार को बुरी तरह तोड़ने के बाद कार में मौजूद अजय कुमार को घायल कर दिया और उसके अंदर बैठी महिलाओं से छेड़छाड़ किया।

वहीं इस मामले में जानकारी देते हुए पीटीआई के सीनियर वाईस प्रेसिडेंट ने ट्वीट किया, “तीर्थ यात्रा के लिए दाहेरजी जाने वाले सांघार जिले के हिंदू परिवार को पिताफी जनजाति के सरदार और उनके गिरोह ने बुरी तरह पीटा, कार के शीशे तोड़ दिए गए साथ ही पुरुष और महिलाओं को प्रताड़ित किया गया। जबकि मामला आइसक्रीम के रैपर का था जो उड़कर पिताफी सरदार की कार से टकरा गई थी। जो उसके गुस्से का कारण था।”

इस मामले में पीड़ित अजय कुमार के एक रिश्तेदार यह बताया जा रहा है, मुस्लिमों ने बिना वजह हिंदू परिवार पर हमला कर उन्हें घायल कर दिया। वहीं महिलाओं से छेड़छाड़ की बात भी सामने आई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा कि इलाके के एक मंदिर दाहेरजी साहिब से लौट रहे परिवार ने डॉ शमशेर पिताफी की गाड़ी को ओवरटेक करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बार-बार पास नहीं था। लेकिन जैसे ही परिवार आगे बढ़कर ओवरटेक किया, पिताफी ने उनका पीछा किया और बाद में विगो में आए लोगों की गाड़ी को रोककर उन पर हमला कर दिया।

हालाँकि, मौके पर जमा लोगों ने मामले को शांत करने की कोशिश की और परिवार को मारपीट से बचाया। वहीं पाकिस्तानी मीडिया द एक्सप्रेस ट्रिब्यून से बात करते हुए, पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (पीएमएल-एन) एमएनए खेल दास कोहिस्तानी ने बताया कि हमलावरों ने हिन्दू महिलाओं के साथ भी दुर्व्यवहार किया था। इस मामले में जहाँ एक तरफ पिताफी के गिरफ़्तारी की माँग उठ रही है वहीं पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने से बच रही है। क्योंकि, पिताफी को पशुधन और मत्स्य पालन मंत्री अब्दुल बारी पिताफी का चचेरा भाई बताया जा रहा है।

गौरतलब है कि इससे पहले घोटकी में ही हाल ही में हिंदू कारोबारी सतीश कुमार की हत्या कर दी गई थी। जिसके लिए ईशनिंदा के कथित आरोप लगाकर भीड़ को उकसाया गया था। इसके अलावा भी आए-दिन पाकिस्तान से हिन्दुओं के अपहरण और हिन्दू बच्चियों की जबरन इस्लाम कबूल करवाकर निकाह की खबरें आती रही हैं।

‘CM योगी को 3 दिन में बम से उड़ा देंगे’: व्हाट्सएप्प पर शाहिद खान के नाम से धमकी, लोकेशन ट्रेस करने में जुटी यूपी पुलिस

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) को तीन दिन के अंदर बम से उड़ाने की धमकी मिली है। धमकी देने वाले शख्स का नाम शाहिद खान बताया जा रहा है। पुलिस लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी थाने में केस दर्ज कर आरोपित की तलाश में जुट गई है। वहीं, मामले की जाँच-पड़ताल में पुलिस के साथ-साथ साइबर और सर्विलांस सेल की टीमें भी लगी हुई हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह धमकी यूपी 112 मुख्यालय के व्हाट्सएप नंबर पर दी गई है। प्रभारी निरीक्षक सुशांत गोल्फ सिटी शैलेंद्र गिरी के अनुसार, यूपी 112 मुख्यालय में ऑपरेशन कमांडर के पद पर तैनात सुभाष कुमार ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि व्हाट्सएप नंबर पर एक मैसेज आया है, जिसमें शाहिद खान नाम के युवक ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बम से उड़ाने की धमकी दी है। पुलिस ने शिकायत के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया है।

शैलेंद्र गिरी ने बताया कि ऑपरेशन कमांडर संतोष कुमार ने व्हाट्सएप पर दी गई धमकी का स्कीनशॉट उन्हें दे दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए सर्विलांस और साइबर सेल समेत पुलिस की कई टीमें नंबर के बारे में पता लगा रही हैं। नंबर की लोकेशन को भी ट्रेस करने का प्रयास किया जा रहा है। जल्द ही सीएम योगी को धमकी देने वाले को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

बता दें कि 11 दिसंबर, 2020 को भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पुलिस सेवा डॉयल 112 के व्हाट्सअप पर जान से मारने की धमकी मिली थी। इस धमकी भरे संदेश में आपत्तिजनक भाषा और गलियों का प्रयोग भी किया गया था। इससे पहले सीएम योगी को 22 नवंबर 2020 की शाम को पुलिस के डायल 112 के व्हाट्सएप नंबर पर धमकी दी गई थी। साइबर सेल को फोन नंबर की जाँच में लोकेशन आगरा की मिली थी। इसके बाद सुशांत गोल्फ सिटी थाना प्रभारी सचिन सिंह के साथ टीम ने ग्राम अकोला थाना मांगरोल आगरा से आरोपित नाबालिग को गिरफ्तार किया था।

ड्रग्स का ओवरडोज, प्राइवेट पार्ट में ब्लीडिंग, खून से सने कपड़े… रजाक मियाँ (बदला हुआ नाम) ने किया फुफेरी बहन का बलात्कार, मरी हुई छोड़ कर हो गया फरार

राजस्थान के जोधपुर में एक व्यक्ति ने ड्रग्स देकर अपनी ही फुफेरी बहन का बलात्कार किया और उसे मृत छोड़ कर फरार हो गया। ये भी सामने आया है कि उसने पीड़िता को अपनी प्रेमिका बना रखा था। लेकिन, घर वालों ने आपस में रिश्ता होने के कारण उनकी शादी से इनकार कर दिया था। फिर वो छिप-छिप कर मिलने लगे। रजाक मियाँ (बदला हुआ नाम) ने अपने जन्मदिन की पार्टी के बहाने पीड़िता को होटल में बुलाया और उसे एमडी ड्रग्स की ओवरडोज दे दी।

कुछ ही देर में युवती की हालत खराब होने लगी और फिर उसकी मौत हो गई। वो अपनी फुफेरी बहन की लाश और खून से सने कपड़े होटल के ही कमरे में छोड़ कर फरार हो गया। राजस्थान पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है, जिसके बाद आरोपित ने अपना गुनाह भी कबूल कर लिया है। पुलिस ने बताया कि एमडी ड्रग्स और गाँजा देकर युवती का रेप किया गया था। आरोपित ने इसके बाद उसकी छोटी बहन को फोन कॉल कर के बुलाया।

इसके बाद वो फरार हो गया। इससे पहले कि जयपुर भागने की उसकी साजिश कामयाब हो पाती, वो GRP की मदद से मकराना से पकड़ा गया। पिछले 5 वर्षों से आरोपित ने अपनी फुफेरी बहन को प्रेमिका बना रखा था और अक्सर होटल में मिलने के लिए बुलाया करता था। शनिवार (6 अगस्त, 2022) को भी उसने ऐसा ही किया। युवती की बहन ने पीड़िता को नजदीकी पावटा अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया।

हालाँकि, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में डॉक्टर मौत का कारण स्पष्ट नहीं बता पाए। इससे पुलिस भी उलझन में पड़ गई थी। रेप की पुष्टि हुई, लेकिन स्पष्ट ये नहीं पता चला कि मौत की वजह यही थी। प्राइवेर पार्ट में ब्लीडिंग काफी हुई थी, लेकिन बाकी के शरीर पर चोट के निशान नहीं थे। अब आगे की मेडिकल प्रक्रिया के बाद मौत का कारण स्पष्ट होगा। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपित की पहचान और फिर गिरफ़्तारी हुई। मृतका की बहन भी आरोपित को लेकर पुलिस को गुमराह कर रही थी।

‘हमारी फिल्म का बॉयकॉट करो’: अनुराग कश्यप और तापसी पन्नू ने हिन्दुओं का उड़ाया मजाक, ‘शाबाश मिट्ठू’ फ्लॉप होने के बाद भी नहीं गई अकड़

बॉलीवुड अभिनेत्री तापसी पन्नू ने अपनी अपकमिंग फिल्म ‘दोबारा’ को लेकर सुर्खियों में हैं। अनुराग कश्यप के निर्देशन में बनी ये फिल्म 19 अगस्त को रिलीज होने वाली है, तापसी फिलहाल फिल्म के प्रोमोशन में बिजी हैं। इन दिनों जहाँ ट्विटर पर लगातार आमिर खान की फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’, अक्षय कुमार की ‘रक्षा बंधन’ को बायकॉट करने की माँग उठ रही है। वहीं, लगातार हिन्दुओं का मजाक उड़ाने वाली तापसी पन्नू की भी अकड़ गई नहीं है। वह चाहती हैं कि उनकी फिल्म ‘दोबारा’ भी बायकॉट ट्रेंड का शिकार हो। फिल्म ‘दोबारा’ के निर्देशक अनुराग कश्यप और अभिनेत्री तापसी पन्नू ने हाल ही में एक इंटरव्यू में अपनी इच्छा का खुलासा किया है।

दरअसल, हाल ही में सिद्धार्थ कन्नन को दिए इंटरव्यू में जब तापसी पन्नू से पूछा गया, “सोशल मीडिया पर आमिर खान की ‘लाल सिंह चड्ढा’ और अक्षय कुमार की ‘रक्षाबंन’ का बायकॉट हो रहा है। दोनों की फिल्मों के बायकॉट से जुडे हैशटैग इंटरनेट पर ट्रेंड कर रहे हैं। क्या इससे आपको अपनी फिल्म को लेकर चिंता होती है? क्या उन्हें डर नहीं लगता?”

इसपर अनुराग कश्यप ने कहा, ‘मैं चाहता हूँ कि ट्विटर पर बायकॉट कश्यप (#BoycottKashyap) ट्रेंड हो।” वहीं तापसी ने भी इसपर प्रतिक्रिया देते हुए लोगों से अपील की है कि, “प्लीज सब लोग हमारी फिल्म दोबारा को बायकॉट कीजिए।”

तापसी पन्नू ने कहा, “हमारी फिल्म ‘दोबारा’ (Dobaaraa) का बायकॉट होना चाहिए। और सभी से वो अपील करती हैं कि उनकी फिल्म का बहिष्कार करें। जब आमिर खान और अक्षय कुमार का बायकॉट हो सकता है, तो मैं भी उस लीग में शामिल होना चाहूँगी।” तापसी ने सिद्धार्थ कन्नन से कहा, “यह सब क्या है? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि नेटिज़न्स फिल्म देखते हैं, लेकिन उन्हें फिल्म का बहिष्कार करना चाहिए।”

हालाँकि, अपनी पिछली फिल्म ‘शाबाश मिट्ठू’ के बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो जाने के बाद अभिनेत्री तापसी पन्नू किसी भी तरह का कोई रिस्क नहीं लेना चाहती होंगी लेकिन अब ऐसा लगता है कि कहीं उनकी अपील उन पर भारी न पड़ जाए।

गौरतलब है कि कुछ समय पहले ही तापसी पन्नू की फिल्म ‘दोबारा’ का ट्रेलर रिलीज हुआ है, जो मिस्ट्री, सस्पेंस, टाइम ट्रैवलिंग और थ्रिलिंग से भरपूर है जिसे देखने के बाद जहाँ फिल्म से काफी उम्मीदें लगाई जा रही हैं वहीं अनुराग कश्यप की हरकतों के कारण एक बड़ा वर्ग फिल्म के बहिष्कार का भी मूड बना चुका है। अब देखना यह होगा कि क्या फिल्म अच्छा बिजनेस कर पाती है या बहिष्कार ट्रेंड का शिकार होकर फ्लॉप होती है।

बता दें कि 11 अगस्त को रिलीज होने वाली फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ और ‘रक्षाबंधन’ के बहिष्कार की तैयारी बड़े पैमाने पर लोगों ने की है। लोग आमिर खान के पुराने बयान वायरल करते हुए फिल्म को न देखने की डिमांड कर रहे हैं। वहीं रक्षाबंधन को पाकिस्तानी स्टोरी की कॉपी बताकर ट्रोल किया जा रहा है।

सिंधु-मनप्रीत से शुरुआत, निखत-अचंता से समापन: 61 मेडल के साथ भारत ने खत्म किया कॉमनवेल्थ 2022 का सफर, इनमें 22 स्वर्ण पदक

कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 का आज 11वाँ और अंतिम दिन है। खेल खत्म होने के तुरंत बाद समापन समारोह होगा। स्टार टेबल टेनिस खिलाड़ी अचंता शरत कमल (Achanta Sharath Kamal) और विश्व चैंपियन मुक्केबाज निखत जरीन (Nikhat Zareen) राष्ट्रमंडल खेलों के समापन समारोह में भारत के ध्वजवाहक होंगे।

भारत के दिग्गज खिलाड़ी अचंता शरत कमल ने टेबल टेनिस के पुरुष एकल फाइनल में आज गोल्ड मेडल हासिल किया है। फाइनल मुकाबले में अचंता ने इंग्लैंड के लियाम पिचफोर्ड को मात दी। इससे पहले शरत ने युवा खिलाड़ी श्रीजा अकुला के साथ मिलकर मिक्स्ड डबल्स का फाइनल जीतकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया। वहीं जरीन ने महिलाओं के 50 किग्रा भार वर्ग में गोल्ड मेडल जीता है। पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा ले रही निखत ने रविवार (7 अगस्त 2022) को नॉर्दर्न आयरलैंड की कार्ली एमसी नाउल को 5-0 से गोल्ड पर कब्जा किया था।

इन गेम्स में भारत ने अब तक 61 मेडल अपने नाम कर लिए हैं। इनमें 22 गोल्ड, 16 सिल्वर और 23 ब्रॉन्ज मेडल शामिल हैं। वहीं पीवी सिंधु के गोल्ड जीतने के साथ भारत पदक तालिका में न्यूजीलैंड को पछाड़ते हुए चौथे स्थान पर पहुँच गया है।

40 वर्षीय की उम्र में अचंता शरत ने अपना 7वाँ राष्ट्रमंडल गोल्ड मेडल जीता। मेलबर्न में जीतने के 16 साल बाद, उन्होंने बर्मिंघम में चल रहे कॉमनवेल्थ गेम्स में इंग्लैंड के लियाम पिचफोर्ड को हराकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया। उन्होंने (अचंता शरत) 2006 कॉमनवेल्थ गेम्स में 2 पदक, 2010 में 7 पदक, 2014 में 2 पदक, 2018 में 6 पदक और 2022 में 5 पदक अपने नाम किए हैं।

बता दें कि ओलंपिक में दो बार की पदक विजेता पीवी सिंधू और पुरुष हॉकी टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 के उद्घाटन समारोह में भारत के ध्वजवाहक थे। इसकी क्लोजिंग सेरेमनी आप टीवी पर सोनी सिक्स, सोनी टेन 2, सोनी टेन 3 और सोनी टेन 4 पर देख सकते हैं। इसके साथ ही इसकी लाइव स्ट्रीमिंग सोनी लाइव ऐप पर होगी। क्लोजिंग सेरेमनी की शुरुआत बर्मिंघम के एलेक्जेंडर स्टेडियम में भारतीय समयानुसार रात 12.30 बजे से होगी।

9 राज्यों में हिन्दुओं को मिलेंगे अल्पसंख्यकों वाले फायदे? सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा – राज्य स्तर पर हो निर्धारण, अगली सुनवाई सितंबर में

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यकों का निर्धारण जिला स्तर पर नहीं किया जा सकता, ये राज्य स्तर पर होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पहले भी ये कहा जा चुका है कि अल्पसंख्यकों का निर्धारण राज्य स्तर पर किया जाना चाहिए। देवकीनंदन ठाकुर की याचिका पर जस्टिस यूयू ललित और रवींद्र भट्ट की पीठ ने सुनवाई की। इस याचिका में राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यकों के निर्धारण को चुनौती दी गई थी। अब सितंबर के पहले सप्ताह में इस पर सुनवाई होगी।

1993 की एक अधिसूचना में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम, सिख, जैन और बौद्ध और पारसी समाज को अल्पसंख्यक घोषित किया था। याचिका में इसे जिला स्तर पर तय किए जाने की माँग की गई थी। इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट जिला एवं प्रखंड स्तर पर अल्पसंख्यकों के निर्धारण की माँग को ख़ारिज करते हुए इसे राज्य स्तर पर करने को कह चुका है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से सबूत लेकर आने को कहा था, जिससे पता चले कि किन राज्यों में जनसंख्या कम होने के बावजूद हिन्दुओं को अल्पसंख्यकों के अधिकार से वंचित रखा जा रहा है।

एक अन्य याचिका में अश्विनी उपाध्याय ने भी 9 राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा और इसके तहत फायदे देने की माँग की है। हालाँकि, अदालत ने ये भी कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर या किसी स्तर पर अल्पसंख्यकों का निर्धारण करना कोर्ट का काम नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आप सीधे कह रहे हैं कि हिन्दुओं को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया जाए, हम ऐसी घोषणा नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसका कारण है कि उसके पास सभी क्षेत्रों के इस तरह के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।

अश्विनी उपाध्याय की सहमति के बाद इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले के साथ लिस्ट कर दिया। हालाँकि, जिला स्तर पर अल्पसंख्यकों के निर्धारण को सुप्रीम कोर्ट ने 11 जजों की पीठ द्वारा दिए गए एक पुराने फैसले के खिलाफ बताया। याचिकाकर्ता ने बताया कि लद्दाख में जहाँ 1% हिन्दू हैं, मिजोरम में 2.75%, लक्षद्वीप में 2.77%, कश्मीर में 4%, नागालैंड में 8.74%, मेघालय में 11.52%, अरुणाचल प्रदेश में 29%, पंजाब में 38.49% और मणिपुर में 41.29% हिन्दू हैं।

पसमांदा से ही मुस्लिम ‘वोट बैंक’, मजहबी भीड़ भी इनसे ही: चाहिए दलितों का कोटा, पर वोट उनको जिधर मदरसे-मौलवी

हाल ही में हैदराबाद में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी। इसे संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पसमांदा मुस्लिमों के उत्थान पर ध्यान केंद्रित करने की बात कही। देश के एक वंचित तबके के विकास की बात से किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। एक प्रधानमंत्री का भी ऐसे तबके के विकास पर ध्यान देने की बात कहना आश्चर्यजनक नहीं है।

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इस समय भारतीय राजनीति के सबसे बड़े ट्रेंड सेटर हैं। ऐसे में उनके कहे हर बात का राजनीतिक अर्थ निकाला जाना तय है। इसलिए पसमांदा मुस्लिमों की स्थिति और उनसे जुड़ा राजनीतिक गणित मीडिया की चर्चाओं में हैं। खासकर 2024 के आम चुनावों को ध्यान में रखकर नए-नए समीकरण पेश किए जा रहे हैं।

हालाँकि इन समीकरणों के साथ जो दलीलें (खासकर आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव के नतीजे) दी जा रही हैं, वह जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। यह भी नहीं है कि पसमांदा राजनीति पर पहली बार बीजेपी की करीबी नजर है। बिहार में उसके साझीदार नीतीश कुमार इस फॉर्मूले पर काम कर चुके हैं। लेकिन इससे मिलना वाला राजनीतिक लाभ स्थायी साबित नहीं हुआ था।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या बीजेपी सच में किसी पसमांदा मिशन (जैसा कि मीडिया बता रही) को लेकर गंभीर है? क्या 2024 का आम चुनाव जीतने के लिए मोदी को एक नए वोट बैंक की जरूरत है? क्या 2024 का आम चुनाव मुस्लिम वोट बैंक और मजहबी उन्माद की राजनीति को खत्म कर देगा, क्योंकि पसमांदा के अलग होने पर मुस्लिमों की चुनाव को प्रभावित करने की क्षमता ही समाप्त हो जाएगी?

इन सवालों के जवाब तक पहुँचने से पहले सिलसिलेवार तरीके से पसमांदा, मुस्लिमों के बीच उनकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हैसियत को समझते हैं। साथ ही जानते हैं कि मदरसे-मुल्लों की कट्टरपंथी दुकान चलते रहने के लिए पसमांदा कितने जरूरी हैं।

कौन हैं पसमांदा मुस्लिम?

हिंदुओं को नीचा दिखाने/जाति के नाम पर लड़ाने के लिए अक्सर मुस्लिमों के बीच भेदभाव/जाति नहीं होने की दलील दी जाती है। यह पूरी तरह झूठ है। मुस्लिमों की कुछ जातियों पर गौर करिए। कुंजरे (राइन), जुलाहा (अंसारी), धुनिया (मंसूरी), कसाई (कुरैशी), हज्जाम (सलमानी), बढ़ई (सैफी), मनिहार (सिद्दीकी), दर्जी (इदरीसी)… मुस्लिमों की इन सारी जातियों में जो बात कॉमन है, वह है इनका पसमांदा होना।

पसमांदा, फारसी का शब्द है। इसका मोटे तौर पर अर्थ होता है पिछड़े वंचित लोग। इस श्रेणी में आने वाले ज्यादातर लोग दलित से बने मुस्लिम हैं। कुछ अन्य पिछड़ी जातियों से धर्मांतरित हुए हैं। पसमांदा के तहत आने वाले मुस्लिमों को अफजाल और अरजाल भी कहा जाता है। सीधे शब्दों में कहें तो ये वे लोग हैं जिनके पूर्वज इस्लामी आक्रांताओं के आने के बाद हिंदू से मुस्लिम बने। विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन इनकी घर वापसी का अभियान भी चला रहे हैं।

अशरफ बनाम पसमांदा

अशरफ मुस्लिमों की ऊँची जातियों से आते हैं। मसलन, शेख, सैय्यद, मिर्जा, खान… इन जातियों के लोग या तो हिंदुओं की उच्च जाति से धर्मांतरित होकर मुस्लिम बने हैं या फिर मध्य एशिया से इनके पूर्वज आए थे। भारत में मुस्लिमों की कुल आबादी में 15-20 प्रतिशत ही अशरफ माने जाते हैं। शेष पसमांदा हैं। लेकिन मुस्लिमों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक हैसियत अशरफ वर्ग से आने वालों की ही है। पसमांदा का वे अक्सर इस्तेमाल अपनी महज मजहबी और उन्मादी राजनीति के लिए करते हैं। सड़कों पर उतरने वाली इस्लामी भीड़ पसमांदा की होती है, लेकिन कमान अशरफ के हाथ होती है।

सत्ता से क्या चाहते हैं पसमांदा

मस्जिद, मदरसे, मौलवियों के फतवों से नियंत्रित होने वाली मुस्लिम आबादी का यह बड़ा तबका (पसमांदा) एससी आरक्षण में अपनी हिस्सेदारी चाहता है। ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज ने हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर करीब दर्जनभर जातियों को एससी वर्ग में शिफ्ट करने की माँग की है। यह माँग काफी पुरानी है। वैसे ये जातियाँ फिलहाल ओबीसी के तहत आती हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे बताता है कि करीब 45 प्रतिशत मुस्लिमों को ओबीसी लाभ मिलता है। पूरे वर्ग तक फायदा पहुँचे इसके लिए वे ओबीसी के साथ-साथ एससी वर्ग में भी शिफ्ट होना चाहते हैं। इस बीच बीजेपी ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लक्ष्मण ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया और जामिया हमदर्द जैसे मुस्लिम संस्थानों में पसमांदा मुस्लिमों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की माँग की है।

क्या BJP को मिशन पसमांदा की वाकई जरूरत है?

जब से मोदी के मुख से पसमांदा निकला है, मेनस्ट्रीम मीडिया में क्या है बीजेपी का पसमांदा मिशन, क्या बीजेपी के लिए पसमांदा का समर्थन पाना है आसान, पसमांदा को लुभाने की बीजेपी की राह में क्या हैं रोड़े… जैसी हेडलाइन रोजमर्रा की बात हो गई है। बताया जाता है कि आजमगढ़ और रामपुर उपचुनाव में बीजेपी को जीत पसमांदा मुस्लिमों के कारण ही मिली है। इन दोनों सीटों पर बीजेपी ने काफी कम अंतर से जीत हासिल की है। पसमांदा का झुकाव होने पर मार्जिन कहीं ज्यादा होना चाहिए था। इसी तरह इन सीटों पर मुकाबले के त्रिकोणीय होने का फायदा भी बीजेपी को हुआ था।

यह सच है कि मुस्लिमों के छिटपुट वोट बीजेपी को मिलते रहे हैं। शिया, दाऊदी बोहरा के बीच पार्टी की कुछ इलाकों में पैठ भी मानी जाती है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान देवबंद जैसी जगहों पर ऑपइंडिया ने पाया था कि मुस्लिम योगी सरकार से मिले लाभ को लेकर मुखर थे। इसके आधार पर वे बीजेपी को बोट देने की बात भी कह रहे थे। लेकिन विधानसभा चुनाव के अंतिम आँकड़ों पर गौर करेंगे तो पाएँगे कि मुस्लिमों ने वोट बैंक के तौर पर ही मतदान किया और उनका झुकाव सपा की तरफ था। यहाँ ध्यान रखने योग्य बात यह है कि उत्तर प्रदेश में 3.5 करोड़ से अधिक मुस्लिम पसमांदा ही हैं।

बिहार में जब 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में बीजेपी-जेडीयू की सरकार बनी तो उस समय भी पसमांदा मुस्लिमों को रिझाने का प्रयोग हुआ था। बिहार में भी 1.5 करोड़ से अधिक पसमांदा मुस्लिम माने जाते हैं। अली अनवर जैसे पसमांदा समाज के नेताओं को जेडीयू ने राज्यसभा में इसी रणनीति के तहत भेजा था। योगी की वर्तमान सरकार में दानिश अंसारी के मंत्री बनने को भी कई रणनीतिकार इसी चश्मे से देख रहे हैं। लेकिन नीतीश कुमार के इस फॉर्मूले का असर केवल 2010 के विधानसभा चुनाव में ही दिखा था। पसमांदा वोटों में बिखराव की वजह से जेडीयू उन सीटों पर भी उस चुनाव में बेहतरीन प्रदर्शन करने में कामयाब रही थी, जहाँ मुस्लिम निर्णायक थे। माई समीकरण में इसी टूट के कारण लालू प्रसाद यादव की राजद की उन चुनावों में दुर्गति हो गई थी। लेकिन, उस चुनाव में भी पसमांदा ने उन सीटों पर विपक्ष के उम्मीदवार को वोट किए थे, जहाँ बीजेपी ने प्रत्याशी उतारे थे। 2015 का चुनाव नीतीश और लालू ने मिलकर लड़ा और मुस्लिम पूरी तरह से इनके पीछे थे। यानी एनडीए सरकार से मिले जिन लाभों के कारण पसमांदा का एक वर्ग नीतीश के साथ आया था, वह उसी सरकार की साझेदार रही बीजेपी के साथ कभी नहीं गया। 2017 में जब राजद से नीतीश ने संबंध तोड़ लिए तो अली अनवर जैसे पसमांदा नेता भी मुस्लिमों के नाम पर उनका साथ छोड़ गए। 2020 के चुनाव में भी यह वर्ग राजद के साथ ही था। यानी नीतीश कुमार को मिला राजनीतिक लाभ भी स्थायी नहीं था। जब सरकारी योजनाओं लाभ ताजा-ताजा था उन्होंने ‘पसमांदा’ बनकर वोट किया। बाद के चुनावों में वे फिर से ‘मुस्लिम’ बनकर वोटिंग करने लगे। ये कुछ इसी तरह है जैसे योगी सरकार से मिले लाभों की वजह से देवबंद जैसी सीटों पर कुछ मुस्लिम वोट भी बीजेपी को मिले हैं।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने 2014 और 2019 के आम चुनावों में प्रचंड जीत हासिल की थी। 2024 की रेस में भी वह काफी आगे दिखती है। आज की तारीख में ऐसा कोई कारण नहीं दिखता, जिसके आधार पर यह दावा किया जा सके कि बीजेपी के उस वोट बैंक में बिखराव हुआ है, जिसके दम पर उसने पिछले दो लोकसभा चुनाव जीते हैं। हालिया सर्वेक्षण भी बताते हैं कि बीजेपी काफी आगे है और लोकप्रियता के मामले में प्रधानमंत्री मोदी के सामने आज भी कोई दूसरा नेता नहीं टिकता है। विपक्ष पहले की तरह जीर्ण-शीर्ण और बिखरा हुआ है। ऐसे में राजनीति की सामान्य समझ भी यही कहती है कि बीजेपी को ‘पसमांदा लुभाओ’ जैसे किसी चुनावी प्लान की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इससे उसके जिताऊ समीकरण में टूट का खतरा भी दिखता है।

मोटे तौर पर प्रधानमंत्री द्वारा पसमांदा के विकास पर ध्यान देने के लिए कहा जाना, ‘सबका साथ-सबका विकास’ वाली रणनीति का ही विस्तार लगता है। बीजेपी भी जानती है कि इस नारे का उसको कोई स्थायी राजनीतिक लाभ न तो मिला है और न मिलने की उम्मीद है।

दरअसल ‘प्लान पसमांदा’ बीजेपी के लिए राजनीतिक से ज्यादा सशक्त भारत के उसके संकल्प के लिए जरूरी है। जब तक देश का कोई भी तबका वंचित रहेगा, तब तक एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण संभव नहीं है। देवबंद जैसी जगहों के मुस्लिम बीजेपी सरकारों से जिस तरह का फायदा मिलने की बातें करते हैं, वह भी इसी बड़े संकल्प की पूर्ति के लिए ही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जिनको सड़क पर उतरकर हिंदुओं को डराने की आदत हो क्या उनके लिए विकास कोई पैमाना है/भविष्य में होगा?

‘धर्मांतरण हमारी संस्कृति पर खतरा’: छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरियों के खिलाफ सड़क पर उतरे सैकड़ों ग्रामीण, उग्र आंदोलन की चेतावनी

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में धर्मान्तरण के विरोध में सैकड़ों ग्रामीणों ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया है। उन्होंने अपने घर परिवार के लोगों के ईसाई बन जाने का आरोप लगाया है। ग्रमीणों ने इसे अपनी संस्कृति पर खतरा बताया है और ये सब न रुकने पर उग्र आंदोलन की चेतावनी भी दी है। हालाँकि, मौके पर पुलिस ने पहुँच कर हालात को संभाला। घटना रविवार (7 अगस्त 2022) की है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक मामला राजिम के गाँव कौंदकेरा का है जहाँ हर रविवार को ईसाइयों की प्रार्थना सभा होती है। इस बार प्रार्थना सभा आयोजित होते ही वहाँ ग्रामीणों ने विरोध करना शुरू कर दिया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उस प्रार्थना में कुछ बाहरी लोग भी आते है। वो हमें ईसाई बनाने के लिए तरह-तरह के लालच देते हैं। हालत ऐसे हो चुके हैं कि एक ही माता-पिता के अलग-अलग बच्चे अब अलग-अलग मजहब में हैं।”

मिली जानकारी के मुताबिक यह सभा कांकेर के संतोष कुमार मरकाम के घर पर होती है। हालाँकि, ग्रामीणों के गुस्से को देख कर उन्होंने भी अपने कदम पींछे खींच लिए हैं। उन्होंने दुबारा किसी को बाहर से न बुलाने की हामी भरी है। आक्रोश की सूचना पर मौके पर पहुँचे SDM अविनाश को भी ग्रामीणों ने सख्त अंदाज़ में चेतावनी देते हुए कहा कि यदि धर्मान्तरण न रुका तो वो सब उग्र आंदोलन करेंगे। इस दौरान ग्रामीणों ने SDM से ये भी कहा कि धर्मान्तरण सिर्फ उनके ही नहीं बल्कि अन्य कई गाँवों में भी हो रहा है।

बताया जा रहा है कि गाँव वालों ने सोशल मीडिया से भी ईसाई धर्मान्तरण के विरोध की अपनी इस मुहिम को हवा दी है। अपने विरोध प्रदर्शन के दौरान गाँव वालों ने न सिर्फ गाँव में दोबारा इसे धर्मान्तरण न करने देने का संकल्प लिया बल्कि धर्मांतरित हो चुके लोगों की घर वापसी का भी ऐलान किया। उन्होंने कहा, “जो लोग भी अपना मूल धर्म बदल चुके हैं उन्हें एक बार फिर से वापस लाने का प्रयास किया जाएगा। इसके लिए उनके हाथ में नारियल पकड़ाया जाएगा। जो भी व्यक्ति वापस आता है वही उनका अपना होगा। जो वापस नहीं आता उसे विदेशी माना जाएगा।”

वहीं छत्तीसगढ़ के जशपुर के साजबहार गाँव से भी एक मामला सामने आया है। यहाँ सरपंच सोनम लकड़ा के घर चंगाई सभा में ईसाई धर्मान्तरण का आरोप लगाया है। जिसमें भाजयुमो ने हंगामा कर दिया। बता दें कि यहाँ हिन्दू युवा नेता विजय सिंह जूदेव सरपंच सोनम लकड़ा के घर पहुँचे थे। उनके मुताबिक यहाँ चंगाई सभा कर रहे थे। उनका आरोप है कि यहाँ चंगाई सभा की आड़ में लोगों को ईसाई बनाने का काम हो रहा था। लेकिन हमने उनकी करतूत पर पानी फेर दिया। उनके मुताबिक प्रार्थना सभा में हिन्दू समुदाय के 4 लोग शामिल थे। जिसके बाद भाजयुमो के कार्यकर्ता भड़क गए और सरपंच को बर्खास्त करने की माँग करने लगे।

हालाँकि, यहाँ पुलिस ने उल्टे हिन्दू संगठनों के कार्यकर्ताओं को ही गिरफ्तार कर लिया है। और ईसाई धर्मान्तरण से इनकार कर दिया है।

गौरतलब है कि मई 2022 में छत्तीसगढ़ के जशपुर में ग्रामीणों की शिकायत पर 2 पादरी धर्मान्तरण करवाते हुए गिरफ्तार किए गए थे। इसी के साथ अक्टूबर 2021 में भी दुर्ग जिले में ग्रामीणों ने धर्मान्तरण के आरोप में 45 ईसाइयों को बंधक बना लिया था। बता दें कि ईसाई धर्मान्तरण को रोकने के लिए दिसम्बर 2021 में जशपुर में आयोजित एक सम्मेलन में जनजातीय सुरक्षा मंच ने राज्य सरकार से अवैध धर्मान्तरण पर तत्काल रोक लगाने को कहा था।

‘खुद के निकाह में शामिल नहीं हो सकती, तो मस्जिद के अंदर समारोह का क्या मतलब?’: दलीला की दो टूक, भड़की केरल की मुस्लिम संस्था

केरल के कोझिकोड (Kozhikode, Kerala) में मस्जिद में निकाह करनी वाली और उसके अंदर ढेरों फोटो क्लिक करवाने वाली बहजा दलीला (Bahja Dalil) सुर्खियों में हैं। उनके इस कदम को कुछ लोग प्रगतिशील बता रहे हैं, जबकि कुछ मुस्लिम विद्वानों सहित अन्य लोगों ने इसकी निंदा की है। इस पर बहजा दलीला ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा, “अगर मैं खुद के निकाह में शामिल नहीं हो सकती, तो निकाह के नाम पर मस्जिद के अंदर होने वाले समारोह का क्या मतलब है?”

अपने रिश्तेदारों की मौजूदगी में फहद कासिम से निकाह करने वाली बहजा ने कहा, “इन कथित आलिमों को यह एहसास होना चाहिए कि इस समय दुनिया कितनी तेजी से बदल रही है।” उन्होंने यह भी कहा, “मेरे अब्बू की उपस्थिति में यह निकाह सम्पन्न हुआ है। हमारे परिवार में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। यह मेरे लिए सबसे यादगार दिन है। इस समारोह को 30 जुलाई को परक्कडवु महल समिति की अनुमति से आयोजित किया गया था।”

हाल ही में कोझिकोड के परक्कडवु जुमा मस्जिद ने कुट्टयदी के रहने वाले केएस उमर को मस्जिद परिसर में अपनी बेटी के निकाह की अनुमति दी थी। उमर की बेटी का नाम बहजा दलीला है, उन्होंने 30 जुलाई 2022 को फहद कासिम के साथ निकाह किया था। इसके बाद केरल के मुस्लिमों की संस्था पलेरी-परक्कडवु महल समिति ने कहा था कि निकाह के लिए महिला का मस्जिद में प्रवेश अस्वीकार्य है। समिति ने हाल ही में एक बयान जारी कर कहा कि वह भविष्य में इस तरह निकाह की अनुमति नहीं देगी। उन्होंने इसके लिए समिति के अधिकारी को भी माफी माँगने का आदेश दिया था, जिन्होंने समारोह की अनुमति दी थी।

इंडियन एक्प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, समिति पर सवाल उठाते हुए बाहजा ने उनसे पूछा, “इस खुशी के पल में मेरे मस्जिद में ना रहने का क्या मतलब है?” महल समिति ने बीते दिनों बाहजा के परिवार से मिलने का फैसला किया था, ताकि वे उन्हें घटना में उनकी चूक के बारे में बता सकें। समिति ने अपने बयान में लड़की के मस्जिद के अंदर फोटोशूट कराने को कथित रूप से दुर्व्यवहार बताया है।

बता दें कि दुल्हन के अब्बा एस उमर ने भी गैर-जरूरी परम्पराओं को त्यागने की अपील की है। उन्होंने कहा, “दोनों परिवार चाहते थे कि उनकी बेटी मस्जिद में अपनी निकाह की साक्षी बने। ऐसा हमारे इलाके में पहला कार्यक्रम था। मेरी बेटी सहित बाकी अन्य दुल्हनों को भी अपना निकाह देखने का हक है।” गौरतलब है कि इस्लाम में मस्जिदों के अंदर औरतों के प्रवेश की पाबंदी है।”

घरों में कैद रहती हैं अरब की औरतें, इसलिए मर्दों से ज्यादा दिखती हैं ‘थुलथुल’: द इकोनॉमिस्ट ने बताई मोटाई की वजह, लगी लताड़

विदेश के जाने-माने समाचार पत्र ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने हाल में अरब औरतों पर लिखे एक लेख में ‘मोटी’ शब्द का प्रयोग किया। इस लेख की शुरुआत जेनब नाम की महिला से हुई जिसका वजन 120 किलो है।

इस लेख का शीर्षक जहाँ दिया गया, “आखिर अरब जगत में औरतें जो हैं वो मर्दों से मोटी क्यों होती हैं।” वहीं इस लेख का निष्कर्ष यह दिखाया गया कि अरब में औरतें ज्यादातर घर में रहती हैं इसलिए वह मोटी होती हैं। इसके अनुसार औरतों को ज्यादा बाहर खेलने-कूदने का मौका नहीं मिलता जिससे वह मोटी हो जाती हैं जबकि जो मर्द हैं वो खेलते हैं, मजदूरी करते हैं, काम करते हैं और बाहर जाते रहते हैं।

जेनब का वर्णन करते हुए द इकोनॉमिस्ट ने बताया कि 60 साल की उम्र में ‘जेनब’ बगदाद के रेस्टोरेंट में काम करती है और उसका बॉस उसे वहाँ आखिरी में बचा तला-भुना खाना देता है। लेख के मुताबिक ऐसा खाना खा-खाकर जेनब 120 किलो की हो गई और उसकी बेटियों का वजन भी कुछ न करने के कारण आगे बढ़ता जाएगा।

द इकोनॉमिस्ट से नाराज हुए मुस्लिम

इस लेख और इसके शीर्षक को पढ़ने के बाद सोशल मीडिया यूजर्स गुस्से से आग बबूला हो गए हैं। कई यूजर्स ने इस लेख को घटिया बताते हुए इसे तथ्यों से परे बताया है।

वहीं अरब से जुड़े लोगों ने उनके पूछा है कि आखिर द इकोनॉमिस्ट को उनसे समस्या क्या है। क्यों एक के बाद एक घटिया लेख उनपे लिखे जाते हैं।

इस लेख में मोटी शब्द का प्रयोग देखने के बाद लोग उन स्टडीज का जिक्र कर रहे हैं जो बताती हैं कि इंग्लैंड और अमेरिका में मोटापे के चलते कितनी गंभीर बीमारियाँ हो रही हैं।

एक यूजर ने लिखा, “इस अखबार को अरब और इराक की महिलाओं से माफी माँगनी चाहिए। इन्होंने इस आर्टिकल से अरब महिलाओं की और उनके शरीर में होने वाले बदलावों की बेईज्जती की है जो बच्चे को जन्म देने के बाद होते हैं। ये बेहद शर्मनाक है।” यूजर ने कहा कि न केवल द इकोनॉमिस्ट को ये तस्वीर हटानी चाहिए बल्कि जिस महिला कलाकार की फोटो शेयर की है, उससे माफी भी माँगनी चाहिए।

इसी तरह भारत में दलितों के विरुद्ध झूठ फैलाने वाली इरेना अकबर भी इस लेख से आहत दिखीं। उन्होंने गुस्से में पूछा क्या ये घटिया अखबर ये भी बताएगा कि पश्चिम में औरतें, पुरुषों से मोटी क्यों हैं। उन्होंने इस अखबार को नारीविरोधी और इस्लामोबिक बताया।

बलसम मुस्तफा ने आर्टिकल में प्रयोग की गई महिला कलाकार की तस्वीर पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जो महिला तस्वीर में दिख रही है वो बहुत छोटेपन से हर टैबू को तोड़ती आई है। उसे तो सम्मान दिया जाना चाहिए, न कि उसे या किसी और अरब महिला को बॉडी शेम।

इसी तरह अन्य यूजर्स भी द इकोनॉमिस्ट पर गुस्सा उतारते हुए दिखे। कुछ ने इल्जाम लगाया कि ये विदेशी अखबर अरब वालों से चिढ़ता है क्योंकि वहाँ की औरतों के पास ज्यादा अधिकार हैं। अगर वहाँ उन्हें कोई परेशान करता है तो सीधे जेल में होगा।