यह मामला मार्च 2018 में 21 वर्षीय बीकॉम छात्र आयुष नौटियाल के अपहरण और हत्या से जुड़ा है। आयुष का लगभग डिकंपोज हो चुका शव दिल्ली के द्वारका सेक्टर-13 स्थित एक नाले में मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि आयुष की हत्या किसी हथौड़े जैसी वस्तु से की गई थी। आरोपित और पीड़ित एक-दूसरे को जानते थे। दोनों को आयुष के लापता होने से एक दिन पहले घटना स्थल के पास स्थित एक मैकडॉनल्ड्स आउटलेट में साथ घूमते हुए भी देखा गया था।
अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों, तथ्यों और दलीलों की जाँच के बाद अदालत ने कहा कि अभियोजन ने इश्तियाक अली के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोप साबित कर दिए हैं। अदालत ने माना कि अली ने आयुष का अपहरण किया था और उसके पिता से 50 लाख रुपए की फिरौती माँगी थी। इतना ही नहीं, आयुष की हत्या करने के बाद भी आरोपित उसके पिता को यह विश्वास दिलाता रहा कि उनका बेटा जिंदा है और फिरौती की रकम मिलने पर उसे छोड़ दिया जाएगा।
अदालत ने अपने फैसले में कहा, “घटनास्थल से लिए गए खून के नमूनों में मृतक का DNA मिला है। मृतक के लैपटॉप के जले हुए अवशेष आरोपित की निशानदेही पर बरामद किए गए। आरोपित के कपड़े भी उसकी निशानदेही पर बरामद हुए, जिनमें मृतक के DNA से मेल खाने वाला DNA पाया गया। यह तथ्य आरोपित के खिलाफ IPC की धारा 302 के तहत हत्या के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त है।”
अदालत ने आगे कहा, “मृतक की ऑल्टो कार (नंबर DL-2CAL-2553) से लिए गए खून के नमूनों में भी मृतक का DNA पाया गया। इसी कार का इस्तेमाल शव को ठिकाने लगाने के लिए किया गया था और यह भी आरोपित की निशानदेही पर बरामद की गई।”
ऑपइंडिया के पास मौजूद कोर्ट के 30 मई 2026 के फैसले के मुताबिक, “अभियोजन पक्ष ने साबित कर दिया है कि आरोपित ने वही अपराध किए हैं, जिनके लिए उस पर आरोप तय किए गए थे, यानी IPC की धारा 364A, 302 और 201।”
बचाव पक्ष ने अभियोजन के मामले का विरोध करते हुए पुलिस जाँच में खामियों का आरोप लगाया। हालाँकि, अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि अभियोजन द्वारा पेश किए गए सबूत आरोपी के दोष को साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।
अदालत ने कहा, “जाँच अधिकारियों के बेहतरीन प्रयासों के बाद कभी-कभी जाँच में कुछ छोटी-मोटी खामियाँ रह सकती हैं। लेकिन केवल जाँच में कुछ कमियों के आधार पर किसी आरोपित को कानून से बचने नहीं दिया जा सकता। यह स्थापित कानून है कि हर त्रुटिपूर्ण जाँच या सबूतों में कमी अपने आप में अभियोजन के पूरे मामले को खत्म नहीं कर देती यदि बाकी सबूत इन मजबूत हों। यदि जाँच में मामूली कमियाँ हों तब भी आरोपित को बरी करने का आधार नहीं बन सकतीं, जब उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत मौजूद हों।”
क्या है पूरा मामला
दिल्ली विश्वविद्यालय के राम लाल आनंद कॉलेज में पढ़ने वाला आयुष नौटियाल 22 मार्च 2018 को अपने घर से निकला था लेकिन फिर कभी वापस नहीं लौटा। उसने अपने परिवार को बताया था कि वह कॉलेज के एक फेस्ट में शामिल होने जा रहा है और देर से घर लौटेगा। घर से निकलते समय वह अपने साथ एक बैग लेकर गया था जिसमें उसका लैपटॉप था।
शाम करीब 7:45 बजे आयुष नौटियाल के पिता दिनेश चंद्र को उनके बेटे के फोन से एक SMS मिला जिसमें उन्हें वॉट्सऐप चेक करने के लिए कहा गया था। जब उन्होंने वॉट्सऐप खोला तो उन्होंने एक तस्वीर देखी जिसमें उनके बेटे आयुष की आँखों पर पट्टी बँधी हुई थी और उसके हाथ-पैर बँधे हुए थे। तस्वीर के साथ 50 लाख रुपए की फिरौती माँगी गई थी और चेतावनी दी गई थी कि इस बारे में किसी रिश्तेदार या पुलिस को कुछ न बताया जाए।
संदेश मिलने के बाद पीड़ित के पिता ने तुरंत पुलिस को सूचना दी और शिकायत दर्ज कराई। उनकी शिकायत के आधार पर पालम विलेज थाने में FIR दर्ज की गई। पुलिस तुरंत हरकत में आई और पीड़ित के मोबाइल फोन को सर्विलांस पर लगाया गया। साथ ही उसके फोन नंबर की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) भी निकलवाई गई।
जब पुलिस पीड़ित की लोकेशन का पता लगाने की कोशिश कर रही थी उसी दौरान 24 मार्च 2018 को उसके पिता को एक और संदेश मिला जिसमें पूछा गया कि क्या उन्होंने फिरौती की रकम का इंतजाम कर लिया है। इस पर पिता ने जवाब दिया कि वह केवल 10 लाख रुपए का इंतजाम कर सकते हैं। इसके बाद सामने वाले व्यक्ति ने 50 लाख रुपए की माँग दोहराई और 26 मार्च 2018 तक की समयसीमा दी। हालाँकि, 24 मार्च 2018 को बातचीत के दौरान पिता ने फिरौती की रकम घटाकर 12 लाख रुपए तक तय करवा ली।
इसके बाद पीड़ित के पिता आरोपित द्वारा तय की गई जगह पर फिरौती की रकम पहुँचाने के लिए गए। शुरुआत में आरोपी ने उन्हें उत्तम नगर स्थित नजफगढ़ नाले के पास पैसे छोड़ने को कहा था। बाद में उसने जगह बदलते हुए दिल्ली के वसंत विहार स्थित मुनिरका में अनुपम रेस्टोरेंट के पास एक कूड़ेदान में रकम रखने को कहा। पुलिस ने दोनों जगहों पर छापेमारी टीम तैनात कर दी लेकिन किसी भी जगह पर पैसे लेने कोई नहीं आया।
28 मार्च 2018 को द्वारका सेक्टर-13 स्थित मेट्रो व्यू अपार्टमेंट्स के पीछे एक नाले पॉलीथिन में लिपटा एक युवक का अत्यधिक सड़ा-गला शव बरामद हुआ। पीड़ित के पिता ने शव की पहचान अपने बेटे आयुष नौटियाल के रूप में की। शव के पास पड़े चश्मे को भी उन्होंने अपने बेटे का बताया।
आसपास के इलाकों के CCTV फुटेज की जाँच में पता चला कि पीड़ित को द्वारका सेक्टर-14 स्थित एक मैकडॉनल्ड्स आउटलेट में एक दाढ़ी वाले व्यक्ति के साथ देखा गया था। पुलिस इसके बाद पीड़ित के जीमेल और फेसबुक अकाउंट्स तक पहुँची और तस्वीरों का विश्लेषण किया। जाँच के बाद पुलिस ने पाया कि मैकडॉनल्ड्स में आयुष के साथ दिख रहा दाढ़ी वाला व्यक्ति दिल्ली के उत्तम नगर निवासी इश्तियाक अली था।
पुलिस पूछताछ के दौरान इश्तियाक अली ने आयुष नौटियाल की हत्या करने और उसका लैपटॉप जलाने की बात कबूल की। उसने बताया कि उसकी मुलाकात आयुष से टिंडर ऐप के जरिए हुई थी। पुलिस ने अली की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया हथौड़ा समेत कई अहम सबूत बरामद किए। पुलिस को अली के घर के बाहर खड़ी उसकी ऑल्टो कार भी मिली जिसका इस्तेमाल उसने आयुष के शव को ठिकाने लगाने में किया था। आयुष के अपहरण और हत्या के मामले में अली पर मुकदमा चलाया गया और अदालत ने उसे दोषी करार दिया।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
उत्तर प्रदेश के संभल में हिंदुओं को मिटाने का दौर अब खत्म होने जा रहा है। राज्य की योगी सरकार इन हिंदुओं को दोबारा ‘अपने घर’ बसाने की तैयारी कर रही है। इसी कड़ी में योगी सरकार 1978 के सांप्रदायिक दंगों में मारे गए रामशरण दास रस्तोगी के परिवार को जमीन देने जा रही है। प्रशासन ने आलम सराय में तीन बीघा सरकारी जमीन पर बने कब्रिस्तान पर बुलडोजर चलाकर कब्जामुक्त कराई गई थी, अब उसमें से 100 गज जमीन को पीड़ित परिवार को लीज (पट्टे) पर दिया जा रहा है।
03 जून 2026 को संभल के डीएम अंकित खंडेलवाल और एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई की मौजूदगी में आलम सराय गाँव की इस 100 गज जमीन का पट्टा पीड़ित परिवार को सौंपेंगे। जहाँ पीड़ित परिवार दोबारा अपना घर बसा सकेगा। इसके लिए पीड़ित रस्तोगी परिवार ने योगी सरकार और प्रशासन से गुहार लगाई थी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी पिछले दिनों मथुरा के एक कार्यक्रम में 1978 के संभल दंगों में सैंकड़ों हिंदुओं की हत्या का जिक्र करते हुए पीड़ित रस्तोगी परिवार से मिलने की बात कही थी। सीएम ने बताया था कि रस्तोगी परिवार ने उनसे मिलकर अपनी संपत्ति लूटे जाने का दर्द सुनाया था। तब सीएम ने परिवार को जमीन वापस देने का आश्वासन दिया था।
कैसे प्रशासन और सरकार ने मिलकर रस्तोगी परिवार को लौटाई जमीन
पिछले साल रामशरण रस्तोगी के पौत्र कपिल रस्तोगी ने अपनी बुजुर्ग माँ के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात कर न्याय और पुनर्वास की माँग की थी। संज्ञान लेते हुए पीड़ित परिवार को वापस लौटाने के लिए प्रशासन और सरकार ने मिलकर काम किया।
योगी सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संभल प्रशासन से मामले की जाँच कराई। जाँच में पता लगा कि रस्तोगी परिवार मूलरूप से संभल का निवासी था और दंगों में परिवार के मुखिया रामशरण रस्तोगी की हत्या के बाद पलायन को मजबूर हुआ था। फिर स्थानीय तहसीलदार धीरेंद्र कुमार सिंह ने पैमाइश पर पीड़ित परिवार के लिए जमीन तैयार की।
संभल के कोतवाली कस्बा क्षेत्र के आलम सराय देहात में स्थित तीन बीघा सरकारी जमीन का 100 गज पीड़ित परिवार को देने का फैसला किया गया। इस सरकारी जमीन पर अतिक्रमण कर कब्रिस्तान बना लिया गया था, जो ‘टीले वाली मस्जिद’ के नाम से जाना जाता था। लेकिन प्रशासन ने उस सरकारी जमीन को कब्जा मुक्त करवाया और जमीन पर बने कब्रिस्तान को बुलडोजर से ध्वस्त किया। अब इसमें से 100 गज जमीन पीड़ित रस्तोगी परिवार को सौंपी जा रहा है।
1978 में रामशरण रस्तोगी को दी थी दर्दनाक मौत
आज जिन रस्तोगी परिवार को जमीन दी जा रही है, उसका जख्म काफी गहरा है। योगी सरकार अब उन्हें जमीन देकर उनके जख्म पर मरहम लगाने का काम कर रही है। परिवार के मुखिया रामशरण रस्तोगी को 29 मार्च 1978 में भड़के सांप्रदायिक दंगों में बेरहमी से मार डाला था। रामशरण रस्तोगी की संभल कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला ठेर में परचूने की दुकान थी। यह दुकान पुलिस चौकी से महज 50 मीटर ही दूर थी। दंगाइयों ने उन्हें दुकान से उठा लिया और टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
इतना ही नहीं दंगाइयों ने रामशरण के शव को दुकान कुआं मोहल्ला महमूद खान सराय कुएँ में तराजू-बाट से बाँधकर फेंक दिया था। रामशरण की दुकान भी दंगाइयों ने लूट ली थी और उसे आग के हवाले कर दिया था। बाद में जब तीन दिन बाद रामशरण का शव मिला, तो उस पर चाकू और कुल्हाड़ी के गहरे घाव थे।
तब रामशरण रस्तोगी के बेटे स्वर्गीय सुभाष चंद्र रस्तोगी ने हत्या और सबूत मिटाने की धाराओं में अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR भी दर्ज कराई थी। लेकिन परिवार का कहना है कि मामले में जाँच आगे नहीं बढ़ी और न्याय की उम्मीद अधूरी रह गई। इस खौफनाक मंजर से डरकर पूरा परिवार संभल से विस्थापित होकर दिल्ली में बस गया।
इसी दंगे में मारे गए तुलसीराम को भी योगी सरकार ने दी जमीन
इससे पहले योगी सरकार इसी 1978 के संभल दंगों में अपनी जमीन से बेदखल हुए तुलसीराम के परिवार को भी जमीन वापस दिला चुकी है। पीड़ित परिवार को 46 साल बाद न्याय मिला। जब संभल प्रशासन ने 14 जनवरी 2025 को तुलसीराम के परिवार को 10,000 वर्गफुट जमीन का कब्जा दिलाया।
माली समाज के तुलसीराम की 1978 के दंगों में हत्या कर दी गई थी और उनके तीन बेटे और परिवार को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा था। इस जमीन पर मौजूदा समय में जन्नत निशा नाम का स्कूल चलाया जा रहा था। हालाँकि अब ये जमीन तुलसीराम के वंशजों को मिल गई है। यह कार्रवाई राजस्व विभाग और पुलिस प्रशासन की देखरेख में हुई, जिसमें भारी सुरक्षा बल तैनात किया गया था।
जब बनवारी लाल को दंगाई ‘भाइयों’ ने मौत के घाट सुलाया
रामशरण की हत्या इकलौती दर्दनाक कहानी नहीं है। इसी 1978 में हुए संभल दंगों में कई खौफनाक कहानियाँ सामने आई। एक कहानी है बनवारी लाल की। संभल के जाने माने कारोबारी बनवारी लाल गोयल की तड़पा-तड़पाकर हत्या की गई थी। ऑपइंडिया के पास मौजूद इंटरनल रिपोर्ट बताती है कि दंगे भड़कने की सूचना मिलने पर बनवारी लाल गोयल प्रभावित इलाके में उनकी पत्नी और बेटे के रोके जाने के बावजूद यह कहते हुए चले गए, “सारे मुस्लिम मेरे मित्र और भाई जैसे हैं। सब मेरे साथ काम करते हैं। मुझे कुछ नहीं होगा।”
लेकिन बनवारी लाल गोयल को मुस्लिम दंगाइयों ने पकड़ लिया। उनसे कहा कि तुम इन पैरों से पैसे लेने आए हो और उनके पैर काट दिए। फिर कहा कि तुम इन हाथों से पैसे लेने आए हो और हाथ भी काट दिए। इसके बाद गर्दन काट कर उनकी हत्या कर दी गई। इस दौरान मुस्लिम दंगाइयों के सामने बनवारी लाल गिड़गिड़ाते रहे कि मुझे काटो मत, गोली मार दो। पर किसी ने नहीं सुनी।
इरफान, वाजिद, जाहिद, मंजर, शाहिद, कामिल, अच्छन जैसे नाम आरोपित थे। लेकिन 2010 में यह केस बंद करना पड़ा, क्योंकि गवाह ही हाजिर नहीं हुए। जज ने यह टिप्पणी करते हुए केस बंद किया कि मैं सोच भी नहीं सकता कि इनलोगों (आरोपितों) को फाँसी नहीं हो रही है। इंटरनल रिपोर्ट के अनुसार बनवारी लाल के परिवार पर डॉक्टर शफीकुर रहमान बर्क की ओर से भी दबाव डाला गया था।
बर्क संभल से समाजवादी पार्टी से सांसद रहे हैं। फिलहाल उनके पोते जियाउर्रहमान बर्क इस सीट से सपा के सांसद हैं। जामा मस्जिद में सर्वे के दौरान हुई हिंसा में जियाउर्रहमान बर्क के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया। इसके बाद 1995 के आसपास बनवारी लाल गोयल के परिवार ने संभल ही छोड़ दिया। 2024 में संभल हिंसा के बाद बनवारी लाल के बेटे विनीत गोयल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिले थे। तब मुख्यमंत्री ने उनसे कहा था कि अब आप वापस संभल आकर बसिएगा, क्योंकि माहौल सुरक्षित हो गया। परिवार नेभी वापस लौटने पर विचार किया था।
गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगाकर 24 हिंदुओं को जलाया
दंगे भड़कने के बाद बनवारी लाल गोयल ने कई हिंदू दुकानदारों को अपने साले मुरारी लाल की कोठी में छिप जाने को कहा था। मुस्लिम आढ़तियों ने इसकी सूचना दंगाइयों को दी। इसके बाद मुस्लिम दंगाइयों की भीड़ ने ट्रैक्टर लगाकर मुरारी लाल की कोठी का गेट तोड़ दिया।
यहाँ 24 हिंदुओं की हत्या कर उन्हें गन्ने की खोई और टायर का ढेर लगाकर मुस्लिम दंगाइयों ने जला दिया। हालात इतने बदतर थे कि अधिकतर हिंदुओं ने कपड़ों के पुतले बनाकर बृजघाट पर अपनों का अंतिम संस्कार किया था। दैनिक भास्कर ने संभल के इतिहास के जानकार 58 साल के संजय शंखधर के हवाले से भी इस घटना के बारे में बताया है।
इसी दंगे के दौरान एक हिंदू शिक्षक की बेटी और पत्नी को मंजर शफी ने उठा लिया था। इस दंगे को भड़काने के पीछे भी शफी की बड़ी भूमिका थी। हिंदू शिक्षक की बेटी को बलात्कार के बाद छोड़ा गया। उनकी पत्नी को हिंदुओं ने बचा लिया था। आज न तो इस शिक्षक और न ही बनवारी लाल गोयल का परिवार संभल में रहता है।
वहीं बनवारी लाल की हत्या को हरद्वारी लाल शर्मा और सुभाष चंद्र रस्तोगी ने अपनी आँखों से देखा था। इस कत्लेआम के दौरान दोनों ने एक ड्रम में छिपकर अपनी जान बचाई थी। हाई स्कूल में पढ़ने वाले हरद्वारी लाल के सगे भाई को भी मुस्लिम दंगाइयों ने चाकू से गोदकर इसी दौरान मार डाला था। शर्मा और रस्तोगी भी इस बनवारी लाल के कत्लेआम के गवाह थे।
1978 का संभल दंगा और तत्कालीन सपा सरकार का अँधापन
संभल के इतिहास में काले पन्नों में दर्ज दंगा भयानक था। 29 मार्च 1978 को उत्तर प्रदेश के संभल जिले में एक भयानक सांप्रदायिक दंगा हुआ, जो कई दिनों तक चला और जिसमें 184 लोगों की मौत हुई थी। दंगे के बाद दो महीने तक कर्फ्यू लगा रहा और पुलिस-प्रशासन मूकदर्शक बना रहा।
दंगे की शुरुआत मंजर अली नाम के व्यक्ति ने की, जो डिग्री कॉलेज की प्रबंधन समिति में सदस्यता नहीं मिलने पर नाखुश था। उसने 28 मार्च को मुस्लिम छात्राओं के साथ मिलकर बाजार में उत्तेजक नारेबाजी शुरू की और जबरन दुकानें बंद करवाईं। जब कुछ दुकानदारों ने विरोध किया, तो लूटपाट, आगजनी और हत्या का सिलसिला शुरू हो गया ।
अफवाहें फैलाई गईं कि ‘मस्जिद में पूजा‘ की जा रही है और इमाम को मार दिया गया, जिससे इस्लामी भीड़ और अधिक आक्रोशित हो गया। दंगे के दौरान खग्गूसराय, सर्राफा बाजार और गंज क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। मुरारीलाल नाम के व्यक्ति की दुकान में आग लगाई गई, जिसकी फड़ पर 24 हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया था। लोगों को चाकुओं से गोदा गया, सिर कटे गए, हाथ-पैर अलग किए गए। किसी के पिता को जिंदा जलाया गया और शवों को टायर से जलाया गया।
इन दंगों में कुल 169 मुकदमे दर्ज हुए थे, जिनमें 3 पुलिस की तरफ से और बाकी दोनों पक्षों की तरफ से लगाए गए। दंगों में पुलिस और प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। पूरे संभल में दो महीने तक कर्फ्यू लगा रहा।
दंगे के बाद हिंदू परिवारों पर पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ा। आँकड़ों के मुताबिक, 40 हिंदू परिवार विस्थापित हुए। इन परिवारों को जान बचाने के लिए मंदिरों की तालाबंदी करनी पड़ी और अपना घर-बार और कारोबार छोड़कर जाना पड़ा। इसके बाद संभल में हिंदू आबादी 45 प्रतिशत से घटकर 15 प्रतिशत रह गई।
तत्कालीन सपा सरकार ने भी दंगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। NDTV को मिली एक फाइल के अनुसार, 23 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने 8 मुकदमे वापस लेने का फैसला किया था। उत्तर प्रदेश सरकार के न्याय विभाग के विशेष सचिव ने जिला मजिस्ट्रेट को लिखा था कि 8 मुकदमों को वापस लिया जाए। वहीं दंगों 10 केस की फाइल खंगालने से पता चला कि हत्या जैसे संगीन मामलों को भी तत्कालीन सपा सरकार ने ठीक से हैंडल नहीं किया था। सभी 48 आरोपितों को बरी कर दिया गया था।
इससे पहले 1978 में हुए संभल दंगों को तब याद किया गया जब उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के पहले दिन (15 दिसंबर 2024) CM योगी आदित्यनाथ ने बड़ा बयान दिया। उन्होंने बताया कि संभल मे 1947 से अब तक 209 हिंदुओं की हत्या हुई। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष ने हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर अंधापन दिखाया।
महाराष्ट्र के नासिक में स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) की यूनिट से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया था, जहाँ हिंदू महिला-पुरुष कर्मचारियों के साथ यौन उत्पीड़न और जबरन धर्मांतरण की कोशिश के आरोप लगे थे। इस हाई-प्रोफाइल मामले की जाँच कर रही स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने अब कोर्ट में अपनी चार्जशीट दाखिल की है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा ‘कॉर्पोरेट जिहाद’ और ‘लव जिहाद’ करार दिए गए इस मामले में 1500 से अधिक पन्नों की चार्जशीट पेश होते ही कई बड़े खुलासे हुए हैं, जिसने पूरे राज्य की राजनीति और सामाजिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है।
पहली चार्जशीट में क्या है और कौन-कौन हैं आरोपित?
SIT ने TCS नासिक कांड में अपनी पहली चार्जशीट नासिक की कोर्ट में दाखिल की, जो करीब 1500 पन्नों की है। यह चार्जशीट देवलाली कैंप पुलिस स्टेशन में दर्ज पहली FIR के आधार पर तैयार की गई है। इस पहली चार्जशीट में मुख्य रूप से चार लोगों को आरोपित बनाया गया है। इनके नाम दानिश एजाज शेख, तौसीफ बिलाल अत्तर, निदा एजाज खान और AIMIM के कॉर्पोरेट मतीन मजीद पटेल हैं।
इन आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की सख्त धाराओं जैसे- आपराधिक साजिश, बलात्कार, धोखे से शारीरिक संबंध बनाना, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचना और आरोपितों को शरण देना जैसी धाराएँ लगाई गई है। इसके अलावा, मामले में अनुसूचित जाति/जनजाति अधिनियम यानि SC/ST एक्ट भी जोड़ा गया है।
पूर्व सांसद इम्तियाज जलील का नाम क्यों आया?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस 1500 पन्नों की चार्जशीट में AIMIM के पूर्व सांसद इम्तियाज जलील का नाम सामने आया। चार्जशीट में यह जिक्र उस समय का है जब पुलिस इस मामले की मुख्य महिला आरोपित निदा खान की तलाश कर रही थी और वह फरार चल रही थी। पुलिस ने जब निदा खान को छुपाने के आरोप में AIMIM का कॉर्पोरेटर मतीन पटेल को हिरासत में लेकर पूछताछ की, तो मतीन ने बार-बार पुलिस के सामने एक ही बात दोहराई और कहा, “इम्तियाज जलील साहब को पूछना पड़ेगा।”
मतीन के इस बयान को पुलिस ने अपनी चार्जशीट का हिस्सा बनाया है, जिसके बाद से ही पूर्व सांसद इम्तियाज जलील का नाम इस पूरे विवाद से सीधे जुड़ गया है। इम्तियाज जलील AIMIM का एक कद्दावर नेता हैं और छत्रपति संभाजीनगर से पूर्व सांसद रह चुका है। मतीन पटेल जो कि इस पार्टी का कॉर्पोरेटर हैं, वो इम्तियाज जलील को अपना राजनीतिक बॉस मानता हैं।
चार्जशीट के मुताबिक, जब निदा खान की अग्रिम जमानत याचिका नासिक कोर्ट ने खारिज की थी, तब मतीन पटेल ने जानते-बूझते हुए भी निदा और उसके पूरे परिवार (अम्मी-अब्बू, भाई-चाची) को छत्रपति संभाजीनगर के नरेगाँव-कौसर सिडको इलाके में छिपाकर रखा था। कड़ी पूछताछ के बाद जब मतीन ने पुलिस को उस जगह का पता बताया, तो पुलिस ने छापेमारी कर निदा खान को गिरफ्तार किया। इसके बाद प्रशासन ने मतीन पटेल की उस अवैध संपत्ति को भी बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया जहाँ मतीन पटेल ने निदा खान को छुपाया था। बता दें कि इम्तियाज जलील ने अपने समर्थकों से एक वादा किया था कि AIMIM उसी स्थान पर मतीन पटेल को एक बेहतर और बड़ा स्थान बनाएगी, जहाँ ध्वस्त हुआ।
बातचीत में इम्तियाज जलील ने क्या बताया?
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पूरे मामले और चार्जशीट में नाम आने को लेकर इम्तियाज जलील से बातचीत की गई। इम्तियाज जलील उस समय सऊदी अरब में हज यात्रा पर था। उसने फोन पर बातचीत में कहा कि उसे चार्जशीट में अपना नाम शामिल होने की कोई जानकारी नहीं है। इम्तियाज जलील ने कहा, “मैं किसी भी तरह की जाँच का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार हूँ। मैंने पहले भी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया था कि मैं लड़की (निदा) के परिवार से मिला था और जो मुझे सही लगता है, मैं उसके लिए अपनी लड़ाई जारी रखूँगा।”
इम्तियाज जलील ने निदा के परिवार से मुलाकात की बात भी बताई और मतीन पटेल के घर पर चले बुलडोजर के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व भी किया था। वहीं, मतीन पटेल के वकील अभयसिंह भोसले का कहना है कि मतीन ने इस मुख्य विवाद से कोई लेना-देना नहीं है और इस पर सिर्फ राजनीति की जा रही है।
चार्जशीट का विस्तार: WhatsApp चैट, Email और डराने-धमकाने का खेल
SIT की इस चार्जशीट में आरोपितों के खिलाफ तकनीकी और डिजिटल सबूतों की भरमार है। पुलिस ने पीड़ितों और आरोपितों के मोबाइल फोन से महत्वपूर्ण WhatsApp चैट के स्क्रीनशॉट और Email ट्रेल बरामद किए हैं। पहली FIR की पीड़िता ने आरोप लगाया है कि मुख्य आरोपित दानिश शेख ने साल 2022 से ही उसका शोषण शुरू कर दिया था। उसने शादी का झांसा देकर हिंदू पीड़िता के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए। इसके साथ ही उसने पीड़िता का आर्थिक शोषण भी किया।
आरोपित दानिश ने पीड़िता के पैसों पर ऐश किया
आरोपित दानिश ने पीड़िता के पैसों पर खूब ऐश किया। पीड़िता का आरोप है कि दानिश अपने घूमने-फिरने, होटल और कैफे जाने से लेकर घर के राशन तक का पूरा खर्च उसी से कराता था और उसने दानिश को महँगे बैग और घड़ियाँ भी गिफ्ट की थीं। इतना ही नहीं, दानिश ने कभी घर के नाम पर 10 हजार, कभी ट्रिप के लिए 5 हजार, तो कभी सेविंग्स स्कीम के बहाने हर महीने 5 हजार रुपए उससे ऐंठे। पीड़िता के अनुसार, इस रिश्ते के दौरान उसने दानिश पर कुल मिलाकर 2.2 लाख रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए थे।
यह लव जिहाद और कॉर्पोरेट जिहाद है- देवेंद्र फडणवीस
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस मामले पर बेहद आक्रामक रुख अपनाया। एक मीडिया मंच पर बोलते हुए CM फडणवीस ने स्पष्ट किया कि पुलिस जाँच में इस बात के पुख्ता सबूत मिले हैं कि TCS नासिक कांड यूनिट में जबरन धर्मांतरण कराने की सुनियोजित कोशिशें की जा रही थीं। CM फडणवीस ने कहा, “हमें अंतरधार्मिक विवाह से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन जब किसी खास मकसद के तहत एक तय पैटर्न बनाकर हिंदू महिलाओं को निशाना बनाया जाता है, तो यह साफ तौर पर ‘लव जिहाद’ का मामला बनता हैं।” CM फडणवीस ने इसे ‘कॉर्पोरेट जिहाद’ की संज्ञा भी दी और चेतावनी दी कि महाराष्ट्र सरकार के पास ऐसे कृत्य से निपटने के लिए बेहद सख्त कानून मौजूद है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
निदा खान की भूमिका और ‘जहन्नुम’ का डर
चार्जशीट के अनुसार, निदा खान का काम पीड़ित हिंदू महिला को इस्लामिक रीति-रिवाजों की तरफ धकेलना था। निदा ने पीड़िता के फोन में ‘मुस्लिम प्रो’ नाम का ऐप डाउनलोड करवाया, उसे सोशल मीडिया पर इस्लाम से जुड़े Video भेजे और जबरन ‘अल-फातिहा’ और ‘कलमा’ पढ़वाया। निदा ने पीड़िता को धमकी दी थी कि अगर उसने इस्लाम नहीं कबूला तो ‘अल्लाह तुम्हारे परिवार को जहन्नुम (नरक) में भेज देगा।’
हिंदू पीड़िता को जहन्नुम भेजने की धमकी
जून 2025 से जनवरी 2026 के बीच, निदा खान अक्सर हिंदू पीड़िता को ऑफिस के बाद अपने घर ले जाती थी, जहाँ उसे बुर्का और हिजाब पहनना सिखाया जाता था और नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता था। निदा खान का परिवार भी इसमें शामिल था और उसकी अम्मी हिंदू पीड़िता को किसी मदरसे में भेजने की योजना बना रही थी।
क्या है TCS नासिक कांड?
यह पूरा विवाद महाराष्ट्र के नासिक के अशोका मार्ग में TCS के BPO यूनिट से शुरू हुआ था। इस यूनिट में काम करने वाली कई हिंदू महिला कर्मचारियों ने अपने ही मुस्लिम सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। हिंदू महिलाओं का कहना था कि वहाँ काम करने वाले कुछ मुस्लिम पुरुष कर्मचारियों ने उनका मानसिक और शारीरिक शोषण किया।
आरोपितों ने दफ्तर के भीतर ही एक WhatsApp ग्रुप बना रखा था, जिसके जरिए हिंदू महिला कर्मचारियों पर निशाना साधा जाता था। उन पर मुस्लिम मजहबी प्रथाओं को अपनाने, नमाज पढ़ने, हिजाब पहनने और जबरन मांस खाने का दबाव बनाया जाता था। जब हिंदू पीड़ित महिलाओं ने हिम्मत दिखाकर आवाज उठाई, तब जाकर पुलिस ने अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में कुल 9 FIR दर्ज कीं और मामले की गंभीरता को देखते हुए SIT का गठन किया गया।
TCS की कार्रवाई और मामले की वर्तमान स्थिति
इस मामले के उजागर होने के बाद, देश की दिग्गज IT कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने तुरंत एक्शन लिया। कंपनी ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि उनकी कार्यस्थल पर उत्पीड़न और प्रताड़ना को लेकर ‘जीरो-टोलरेंस’ की नीति है। कंपनी ने आंतरिक जाँच के बाद मामले में संलिप्त पाए गए सभी 8 मुस्लिम कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से नौकरी से सस्पेंड कर दिया है।
वर्तमान में, 8 आरोपित गिरफ्तार है। मुंबई नाका पुलिस स्टेशन में दर्ज अन्य 8 FIR के सिलसिले में भी एक दूसरी बड़ी चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की जा चुकी है, जिसमें रजा मेमन, शाहरुख कुरैशी और अश्विनी चैनानी जैसे अन्य आरोपितों के नाम शामिल हैं। पुलिस अब आरोपितों के वॉयस सैंपल इकट्ठा कर रही है और उनके कॉल रिकॉर्ड्स की गहन जाँच कर रही है ताकि यह साफ हो सके कि फरार रहने के दौरान वे राजनीतिक रूप से किन-किन लोगों के संपर्क में थे।
पाकिस्तान ने जापान में मस्जिद का उद्घाटन किया। इसे जापान ने गैर-कानूनी कहा और ध्वस्त करने का आदेश दिया। जापान में बढ़ रही मुस्लिम आबादी, डेमोग्राफी में बदलाव, सार्वजनिक नमाज और कब्रिस्तान की बढ़ती माँग, जन्मदर में कमी और मस्जिदों की बढ़ती संख्या के बीच इस मुद्दे ने इसलिए ध्यान खींचा है, क्योंकि जापान में पाकिस्तान के राजदूत अब्दुल हमीद इस साल की शुरुआत में मस्जिद के उद्घाटन में शामिल हुए थे।
क्या है कोवागो विवाद
कावागो में गैरकानूनी तरीके से मस्जिद बनाई गई थी, जिसके खिलाफ स्थानीय लोगों ने आवाज भी बुलंद की थी। ‘जापान जामे मस्जिद रमजान’ नाम की यह मस्जिद 4500 स्क्वेयर मीटर के प्लॉट पर बनी है, जिसे पहाड़ पर मौजूद ‘वनभूमि’ माना जाता है। यह साइट अर्बनाइजेशन कंट्रोल एरिया में आती है, जहाँ लोकल अधिकारियों से इजाजत लिए बिना कंस्ट्रक्शन पर आम तौर पर रोक होती है।
द असाही शिंबुन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, प्रॉपर्टी रिकॉर्ड से पता चलता है कि मार्च 2025 में जमीन का मालिकाना हक बदला गया। पहले यह फुजीमी की एक रियल एस्टेट कंपनी की थी, जिसे कावागो पर रजिस्टर्ड एक फर्म को दे दी गई। कावागो शहर के अधिकारियों ने कहा कि मस्जिद जरूरी मंजूरी के बिना बनाई गई थी। यहाँ 2000 में एक फैक्ट्री बनी थी, 2007 में इसका मालिकाना हक बदल गया था और रियल एस्ट्रेट कॉर्पोरेशन बन गया। इसके बाद 2025 में स्थिति में बदलाव आया, लेकिन मस्जिद बनाने की अनुमति यहाँ नहीं थी।
जापान में सिटी प्लानिंग एक्ट के तहत बिल्डिंग बनाने पर सख्त पाबंदियाँ हैं। हालाँकि, जैसा कि दुनिया भर के इस्लामिस्टों के साथ होता है, इस्लामी विस्तार और कब्जे के मामलों में उनके लिए स्थानीय कानूनों का कोई मतलब नहीं होता है। मस्जिद को एक पाकिस्तानी कंपनी की जमीन पर गैर-कानूनी तरीके से बनाया गया था। जापानी मीडिया की रिपोर्ट है कि रियल एस्टेट रजिस्ट्री ने उस जमीन को ‘वन भूमि’ बताया है।
अक्टूबर 2024 में स्थानीय निवासियों ने लगभग पूरी हो चुकी मस्जिद के ढाँचे का विरोध किया। शहर के प्रशासनिक अधिकारियों ने कई बार काम रोकने के आदेश जारी किए। लेकिन, मुस्लिम समुदाय ने बात नहीं मानी और कंस्ट्रक्शन का काम जारी रखा। शुरुआत में कहा जाता है कि मजदूरों ने कहा कि वे जापानी भाषा नहीं समझ सकते, इसलिए काम नहीं रोका। चाहे जो भी हो मस्जिद बनकर तैयार भी हो गई और इस मस्जिद के उद्घाटन में पाकिस्तान के राजदूत भी शामिल हुए, जिसके बाद मामला और अधिक चर्चित हो गया। बाद में पाकिस्तान दूतावास को सार्वजनिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा।
पाकिस्तान दूतावास ने जापानी कानून मानने की सलाह दी
जापान स्थित पाकिस्तान दूतावास ने बयान जारी कर कहा कि जापान में रहने वाले सभी पाकिस्तानियों को जापानी कानूनों का पूरी तरह पालन करना चाहिए। मस्जिद या मदरसे का निर्माण स्थानीय प्रशासन से आवश्यक अनुमति लेने के बाद ही किया जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि पाकिस्तानी दूतावास का उन परियोजनाओं से कोई संबंध नहीं है, जो स्थानीय कानूनों का पालन नहीं करती।
इसमें कहा गया है कि कावागो की मस्जिद के उद्घाटन में राजदूत इसलिए गए थे, क्योंकि उन्हें बताया गया था कि कानून के मुताबिक जरूरी अनुमति ले ली गई है। इसमें कहा गया कि पाकिस्तानी समुदाय को स्थानीय निवासियों और प्रशासन के साथ पारदर्शिता रखनी चाहिए और अधिकारियों के साथ सहयोग करना चाहिए।
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पाकिस्तानी एम्बेसी ने कहा, “ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए कानूनी नियमों के पालन से जुड़ी जानकारी जापान में रहने वाले सभी पाकिस्तानियों और आस-पास के लोगों के साथ ट्रांसपेरेंट तरीके से शेयर की जानी चाहिए। इसके अलावा, प्लानिंग के दौरान और उसके बाद भी, हर हाल में जापानी कानूनों और नियमों का पालन किया जाना चाहिए।”
(साभार-एक्स)
कावागो जापान का पहला मामला नहीं है। इससे पहले मई 2026 में फुजिसावा शहर में एक मस्जिद बनाने को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ। 440000 लोगों वाले इस शहर में मुस्लिम आबादी में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है। जिस मस्जिद की बात हो रही है, उसे एक श्रीलंकाई बिजनेसमैन मोहम्मद खलील ने बनाया था। उसका कहना था कि वह एक मस्जिद बनाना चाहते हैं, क्योंकि 20 किलोमीटर दूर एबिना मस्जिद फुजिसावा में बढ़ती मुस्लिम आबादी के लिए काफी नहीं है।
खास बात यह है कि खलील भी 2021 में फुजिसावा के उत्तरी बाहरी इलाके में एक बंद पड़ी फैक्ट्री की 980-स्क्वायर मीटर की जगह पर ही बस गए थे। उन्होंने फटाफट फुजिसावा मस्जिद NPO बनाया। पैसे जमा किए और जमीन खरीदी और मस्जिद बनाने के लिए मंजूरी ले ली।
ये इतनी तेजी से हुआ कि 4 साल के अंदर ही एक मस्जिद बना दी। जापानी भी इससे परेशान हैं कि कैसे मुस्लिम इमिग्रेंट्स पूरे जापान में अपनी धार्मिक पहचान बढ़ा रहे हैं। ये बता रहे हैं कि जानबूझकर साजिश के तहत ये किया जा रहा है। एक तरफ तो बड़ी संख्या में प्रवासी मुस्लिम यहाँ आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय लोगों का ब्रेनवॉश करके उन्हें इस्लाम कबूल करवाया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर भी जापानियों ने अपनी बात रखी है। इनका कहना है कि तब्लीगी जमात से संबंध रखने वाले इस अवैध मस्जिद के उद्घाटन में पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल हमीद का शामिल होना ये बताता है कि इसे पाकिस्तानी शासन का समर्थन है।
सोशल मीडिया पर जापानियों का विरोध
सोशल मीडिया पर कई जापानी लोगों ने इस्लामी संगठन तब्लीगी जमात से कथित संबंध वाले मस्जिद के उद्घाटन समारोह में शामिल होने वाले पाकिस्तानी राजदूत अब्दुल हमीद पर गुस्सा हुए।
एक्स पर उन्होंने लिखा, “जापानी भाषा के बयान के 12 घंटे बाद उर्दू में एक बयान पोस्ट किया गया। भले ही राजदूत इस बात से अनजान थे कि यह अवैध है। बात यह है कि उन्होंने इस मस्जिद के उद्घाटन समारोह में भाग लिया, जहाँ सऊदी अरब जैसे देशों द्वारा प्रतिबंधित कट्टरपंथी संगठन ‘तबलीगी जमात’ से जुड़े लोग भी आते-जाते हैं। राजदूत को तो सतर्क रहना ही चाहिए था, इतना बिजी रहने के बावजूद भी वो इसमें क्यों शामिल हुए? क्या वह केवल इस बात से खुश थे कि जापान में मस्जिदें बढ़ रही हैं? क्या वह जापान के मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाला इसे मान रहे थे?”
एक और जापानी यूजर ने लिखा कि हो सकता है इस मस्जिद को पाकिस्तानी मदद मिल रही हो। इसे जापान के बारे में जानकारी इक्ट्ठा कर चीन को देने के मिशन पर लगाया गया हो। मीडिया में इस एंगल से रिपोर्टिंग क्यों नहीं हो रही है
जापानी X यूजर ने लिखा, “साइतामा प्रीफेक्चर, कावागो सिटी, ओजा शिमोशिमोआकासाका, जहाँ कावागो सिटी में एक गैर-कानूनी तरीके से बनी मस्जिद है। ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि यह मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस के इन्फॉर्मेशन हेडक्वार्टर ओई रेडियो स्टेशन के पास है। स्पेशल ऑब्जर्वेशन जोन को ‘इम्पॉर्टेंट लैंड सर्वे एक्ट’ के तहत बनाया गया है, ताकि जरूरी सिक्योरिटी सुविधाओं के काम में रुकावट डालने वालों को रोका सके।”
पाकिस्तानी फर्जी फुटबॉल टीम भी पहुँच गई थी जापान
पाकिस्तानी अवैध तरीके से जापान जाने के लिए भी जाने जाते हैं। हाल ही में पाकिस्तान की फर्जी फुटबॉल टीम जापान पहुँच गई थी। इसके लिए बाकायदा फर्जी फुटबॉल क्लब बनाया गया, जिसे पाकिस्तानी फुटबॉल एसोसिएशन से संबद्ध दिखाया गया। जापान पहुँचे पाकिस्तानियों से 40-40 लाख लिए गए थे।
जापान पहुँचने पर एयरपोर्ट पर इनका फर्जीवाड़ा सामने आ गया और पाकिस्तानी दूतावास से बात कर इनलोगों को वापस भेजा गया। इसी तरह 2024 में 17 पाकिस्तानियों को जापानी क्लब बोविस्टा एफसी के फर्जी आमंत्रण पत्र के जरिए जापान भेजा गया था। 15 दिनों का वीजा था, लेकिन ये लोग जापान जाकर आज तक वापस नहीं लौटे।
15 सालों में 4 गुणा बढ़ी मुस्लिम आबादी, 149 बने मस्जिद
ये सिर्फ एक शहर की बात नहीं है जापान में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है। जापान के 47 प्रांतों में 2.3 लाख से 4.2 लाख आबादी इस्लाम को मानने वालों की है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक, जापान में मुस्लिम आबादी करीब 1.30 लाख थी। इनमें से 1.20 लाख विदेशी मुस्लिम और 10 हजार जापानी मुस्लिम रहते थे। लेकिन अब इस्लाम को माननेवालों की संख्या तेजी से बढ़ी है।
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुस्लिमों की कुल आबादी जापान की आबादी का 0.33 फीसदी है, जो साल-दर-साल बढ़ रही हैं। हाल ही में कब्रिस्तान को बनाने के लिए जगह देने को लेकर जापानी संसद में सवाल पूछे गए। इसके बाद मुस्लिम आबादी का मामला सुर्खियों में आ गया।
मुस्लिमों की बढ़ी आबादी मजदूरी करती है। इसके अलावा बिजनेस, तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ लोग योगदान दे रहे हैं। जापान में मुसलमानों पर स्टडी करने वाले वासेदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस हिरोफुमी तनाडा के एक सर्वे में सामने आया कि देश में इनकी जनसंख्या 200000 से ज्यादा है।
मार्च 2021 तक यहाँ 113 मस्जिद बन चुके थे, जो 1999 में मात्र 15 थे। 2024 की बात करें तो यहाँ मस्जिदों की संख्या 149 हो गई थी, जो एक साल बाद यानी 2025 में 164 हो गई। इनमें से कई मस्जिदें बहुमंजिला हैं।
2024 के आखिर तक, जापानी मीडिया और रिसर्चर्स ने अंदाजा लगाया कि देश में विदेशी मुसलमानों की संख्या 360000 थी, जबकि मुसलमानों की कुल संख्या लगभग 420000 थी। इनमें करीब 55000 जापानी लोगों ने इस्लाम कबूला था। 2010-2020 के बीच ऐसे इस्लामी जापानियों की संख्या 110000 से बढ़कर 230000 हो गई। आसान शब्दों में कहें तो, जापान में मुस्लिम आबादी सिर्फ 15 से 20 सालों में चार गुना बढ़ गई है।
जापान में घटती आबादी और बढ़ता ‘इस्लाम’
जापान इन दिनों आबादी में कमी की समस्या से जूझ रहा है। यहाँ दुनिया में सबसे कम फर्टिलिटी रेट है और जन्म दर में रिकॉर्ड-कमी आई है। जापान का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) 2024 में घटकर 1:15 हो गया, जो लगातार नौवें साल गिरावट का संकेत है। 2023 में यह 1.0 से नीचे चला गया था।
जापानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकारी डेटा का हवाला देते हुए, जापान में 2025 में 705,809 जन्म दर्ज किए गए, जो 2024 में लगभग 721000 से कम है। कुल मिलाकर जापान दशकों से कम जन्मदर की वजह से ‘बूढा’ होता जा रहा है।
इस संकट की वजह से मजदूरों की हर क्षेत्र में कमी हो गई है, जिसका असर इकोनॉमिक ग्रोथ और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी पड़ रहा है।
गाँवों से आबादी कम होने, स्कूल बंद होने और यहाँ तक कि ‘घोस्ट टाउन’ या ‘मरते हुए गाँव’ बनने की भी खबरें आई हैं। इन इलाकों में बूढ़ी होती आबादी की वजह से वीरान होते जा रहे हैं। कई इंडस्ट्रियल हब पूरी तरह बर्बाद हो गए हैं।
जापानी सरकार कई फाइनेंशियल इंसेंटिव स्कीम देकर नौजवानों को बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। वर्क-लाइफ रिफॉर्म किया जा रहा है, लेकिन देर से शादियाँ, बच्चों को पालने का बढ़ता खर्च और आर्थिक अनिश्चितताओं की वजह से उत्साहजनकर परिणाम नहीं आए हैं।
साफ है, जापान की घटती आबादी इस्लामिक माइग्रेंट्स के लिए काफी फायदेमंद है। मजदूरों को पाकिस्तान, बांग्लादेश और इंडोनेशिया जैसे देशों से लाया जा रहा है। इनमें से ज्यादातर मुस्लिम हैं। बहुत सारे मुस्लिम जापान की इमिग्रेशन पॉलिसी का फायदा उठाकर वहीं बसते जा रहे हैं।
ऐसी खबरें आई हैं कि मुस्लिम माइग्रेंट वर्कर इस्लाम का प्रचार कर रहे हैं, जापानी लोकल लोगों का धर्म बदल रहे हैं, स्थानीय लोगों से निकाह कर रहे हैं, ताकि इस्लाम को फैला सके और अपनी आबादी बढ़ा सकें।
जापानियों को ‘लुभाने’ की मस्जिदों से होती है कोशिश
आम लोगों को लुभाने के लिए मस्जिदों में कई तरह की इस्लामी गतिविधियाँ चलाई जाती है। एक खास तरह की आवाज लगा कर लोगों को मस्जिद के सामने जमा किया जाता है और नमाज का समय बताया जाता है। यहाँ तक कहा जाता है कि “मस्जिद घर जैसी है। अल्लाहु अकबर।” इतना ही नहीं यूनिवर्सिटी में भी मस्जिद बनाने की खबरें सामने आयी हैं।
टोक्यो के वासेदा विश्वविद्यालय के टोकोरोजावा परिसर में ऐसी ही एक इमारत को मस्जिद में तब्दील कर दिया गया। यहाँ इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए भी इस्लामिक देशों से लोग आते रहते हैं। 90 के दशक से ऐसे कार्यक्रम बढ़े हैं, जहाँ बाहरी मालवी आकर इस्लाम को लेकर बढ़े बढ़े दावे करते हैं और स्थानीय जनता को आकर्षित करते हैं।
जापान में मुस्लिम की बढ़ती आबादी का मुद्दा काफी संवेदनशील बन गया है। जापानी मीडिया और स्थानीय लोग के बीच यह बहस केवल एक मस्जिद की वैधता को लेकर नहीं है। बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, ईरान, इराक जैसे देशों से लोगों का बेहिसाब आना और मस्जिदों, कब्रिस्तानों का निर्माण बड़ी समस्या बन गई है। जन्मदर की कमी से ‘बूढ़ा हो रहे जापान’ में मजदूरों की भारी कमी हो गई है। इनलोगों यहाँ काम मिल जाता है। धीरे धीरे ये लोग सुविधाओं की माँग करते हैं, मस्जिद और मदरसे बनने लगते हैं। इससे जापान त्रस्त हो गया है।
दुनिया में कहीं भी मस्जिद से जुड़ा विवाद हो, मुस्लिम दावा करते हैं कि वहाँ पहले से ही मस्जिद थी। इसके बाद जोड़ते हैं कि कयामत तक मस्जिद रहेगी। एक तरह से वे गैर-कानूनी तरीके से कब्जा कर मस्जिदें बनाते हैं और स्थानीय प्रशासन को चुनौती देते हैं कि अगर टूट गई, तो देख लेना क्या होगा।
कावागो जामे मस्जिद मामले में भी जमीन के मालिकों ने कथित तौर पर दावा किया था कि यह गैर-कानूनी मस्जिद ‘हमेशा से वहां थी।’ स्थानीय जापानी अधिकारियों ने इन दावों को खारिज कर दिया, क्योंकि रिकॉर्ड में मस्जिद तो दूर, पहले का आर्किटेक्चर भी मौजूद था। कई जापानी लोगों ने उसी जगह की पुरानी तस्वीरें भी दिखाई हैं, जहाँ अब गैर-कानूनी मस्जिद है।
इससे पता चलता है कि जमीन के पाकिस्तानी मुस्लिम मालिक गैर-कानूनी तरीके से बनाए गए मस्जिद को भी पुरानी बताने की कोशिश कर रहे हैं।तब जबकि यहाँ का पूरा इतिहास जापानियों को पता है। इसलिए अधिकारियों ने गैर-कानूनी मस्जिद को गिराने का आदेश दिया है, जिसकी वजह से पाकिस्तानी दूतावास को अपनी नसीहत प्रवासियों को देनी पड़ी और खुद को अलग करने की कोशिश करनी पड़ी।
दुनिया के कई देश जूझ रहे हैं इस्लामी संकट से
मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा मानता है कि इस्लाम का फैलाव और काफिरों या गैर-इस्लामिक लोगों का धर्मांतरण करना उनका ‘इस्लामी फर्ज’ है। पहले युद्ध के जरिए जीत कर इस्लाम को बढ़ाया करते थे, अब बहलाकर, फुसलाकर, लालच देकर या धमकी देकर ये काम करते हैं। इसके लिए दूसरे देशों में बसना भी पड़े तो इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इनका ‘मिशन’ चलता रहता है।
एक धर्मनिरपेक्ष देश जापान में शिंटो-बौद्ध परंपराएँ मानने वाले लोग सबसे ज्यादा हैं। यहाँ दाह संस्कार की परंपरा है। शवों को दफनाने और कब्रिस्तान को लेकर यहाँ हंगामा भी हुआ है, क्योंकि इस्लामिक परंपरा लोकल जापानियों की परंपरा से मेल नहीं खाती है। लेकिन, मुस्लिम कट्टरपंथियों को लोकल कल्चर को अपनाना और उसका सम्मान तो कभी आया ही नहीं।
इस्लामी कट्टरपंथियों का एक पैटर्न है, पहले कुछ मुस्लिम आबादी को बसाओ, आसपास वैध-अवैध तरीके से मस्जिद बनाओ और फिर आबादी बढ़ा बढ़ा कर सार्वजनिक स्थानों पर नमाज अदा करने लगो और स्थानीय लोगों पर अपना दबदबा बनाने लगो और धर्मांतरण के लिए सारे साम-दाम- दंड-भेद अपनाओ।
इनलोगों को लोकल कानूनों को तोड़ने और इस्लामी दबदबा बनाने के लिए नियम कानून तोड़ने में कोई हिचक नहीं होती। यही काम इनलोगों ने यूरोप में भी किया है। यूरोप के विकसित सहिष्णु देशों के कानून का फायदा उठाकर वहाँ पहुँचे और धीरे-धीरे अपना दावा करने लगे।
यूरोप में अपराध काफी बढ़ गए हैं। अपने रीति-रिवाज और परंपरा को ये लोग उनपर थोप रहे हैं और लगातार खूनखराब, आतंकवाद की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यहाँ डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। यही वजह है कि अनुमान लगाया गया है कि अगले 200 सालों में 6 यूरोपीय देशों- फ्रांस, बेल्जियम, बुल्गारिया,साइप्रस,स्वीडन और ब्रिटेन इस्लाम बहुल देश हो जाएगा।
उत्तर प्रदेश के झाँसी में दहेज हत्या का मामला सामने आया है। यहाँ कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के प्रदेश उपाध्यक्ष भरत व्यास की पत्नी प्रिया मिश्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में फाँसी के फंदे पर लाश लटकी मिली। प्रिया के परिवार ने NSUI नेता पर दहेज उत्पीड़न और हत्या का मामले में FIR दर्ज की है।
दिनांक 01.06.2026 को थाना समथर पर सूचना प्राप्त हुई कि एक 25 वर्षीय महिला द्वारा फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली गयी है। सूचना पर थाना समथर पुलिस द्वारा तत्काल मौके पर पहुँचकर महिला के शव को कब्जे में लेकर साक्ष्य संकलन की कार्यवाही कर शव का पंचायतनामा भरकर पोस्टमॉर्टम हेतु भिजवाया… pic.twitter.com/rLEZJNjajc
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, घटना 31 मई 2026 की रात की है। प्रिया ने रात 12 बजे अपने पिता विनोद मिश्रा को फोन भी किया था लेकिन देररात होने के चलते वह फोन नहीं उठा सके। इसके बाद सुबह जब प्रिया के ससुराल से कॉल आया तो बेटी की मौत की खबर सुनने को मिली।
प्रिया मिश्रा के परिवार का आरोप
प्रिया के परिवार ने बेटी की मौत को खुदकुशी मानने से इनकार किया है। प्रिया के परिवार ने बताया कि शुरुआत में सबकुछ ठीक था, लेकिन कुछ समय बाद भरत व्यास और उसके घरवाले ज्यादा दहेज की डिमांड करने लगे। परिवार का कहना है कि कई बाद नकदी और ऑनलाइन माध्यम से पैसे भी दिए गएं, इसके बावजूद प्रिया को परेशान किया जाता रहा है।
परिजनों ने भरत व्यास और उसके घरवालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और हत्या का मुकदमा भी दर्ज करवाया है। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। पुलिस का कहना है कि हर पहलुओं से जाँच जारी है।
कॉन्ग्रेस की राजनीति में सक्रिय हैं भरत व्यास
NSUI नेता भरत व्यास और प्रिया की शादी 14 फरवरी 2025 को हुई थी। भरत व्यास राजनीति में काफी सक्रिय है। उसके कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी सहित पार्टी के तमाम नेताओं के साथ तस्वीर भी है। फेसबुक पर भी वे काफी एक्टिव हैं और आए दिन कॉन्ग्रेस समर्थित पोस्ट शेयर करते रहते हैं। भरत ने कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थन में भी पोस्ट किया हुआ है।
कॉन्ग्रेस नेता के कांड, नंबर वन पर नैना साहनी हत्याकांड
यह पहली बार नहीं है कॉन्ग्रेस के किसी युवा नेता का अपराध में नाम सामने आय़ा है। चर्चित नैना साहनी हत्याकांड, जिसे तंदूर कांड भी कहा जाता है, उसमें भी यूथ कॉन्ग्रेस का नेता ही शामिल था। यह कांड 1995 में दिल्ली में हुआ था।
इस मामले में मुख्य आरोपित सुशील शर्मा था, जो उस समय दिल्ली युवा कॉन्ग्रेस का बड़ा नेता माना जाता था। हत्या कर नैना को तंदूर की भट्ठी में झोंकने वाला उसका ही प्रेमी सुशील शर्मा था। दोनों लिव इन में रहते थे। कई लोगों का दावा है कि चुपचाप दोनों ने शादी भी कर रखी थ। सुशील यूथ कॉन्ग्रेस का उस समय उभरता हुआ नेता था। बताते हैं कि सीधे हाईकमान तक पहुॅंच थी उसकी।
सुशील के इस कारनामे की दुनिया को भनक भी नहीं लगती यदि 2 जुलाई 1995 की उस रात दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल अब्दुल नज़ीर कुंजू और होमगार्ड चंदर पाल गश्त पर ना होते। रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। होटल अशोक यात्री निवास में स्थित बगिया रेस्टोरेंट से दोनों ने आग और धुआँ निकलता देखा। मौके पर पहुॅंचे तो बताया गया कि कॉन्ग्रेस पार्टी के पुराने बैनर पोस्टर जलाए जा रहे हैं। पर वे नहीं माने। पुलिस बुलाई। फायर ब्रिगेड को बुलाया गया और पता चला कि तंदूर में एक महिला की लाश जल रही है।
उस महिला की पहचान नैना साहनी के तौर पर हुई। नैना को घर में गोली मारने के बाद सुशील शर्मा जलाने के लिए लाया था। मामला खुलने के बाद सुशील ने पुलिस से बचे रहने के लिए अपने राजनीतिक संपर्कों का भरपूर इस्तेमाल किया। लेकिन, जनआक्रोश की वजह से उसे सरेंडर करना पड़ा और बाद में सजा भी हुई।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आज अगर कोई चेहरा सबसे ज्यादा जनाक्रोश का प्रतीक बन चुका है, तो वह अभिषेक बनर्जी हैं। विधानसभा चुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की करारी हार के बाद जिस तरह पार्टी के कार्यकर्ता, नेता और आम लोग खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, उसका सबसे बड़ा निशाना ममता बनर्जी नहीं बल्कि उनके भतीजे और राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी बने हैं।
हाल ही में उनके आवास के बाहर हुआ प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन और फिर सोनारपुर में उन पर अंडे-पत्थर फेंके जाने की घटना इस बात का संकेत है कि बंगाल में जनता का गुस्सा अब सीधे अभिषेक बनर्जी की ओर मुड़ चुका है।
गौरतलब है कि 2026 विधानसभा चुनाव में TMC को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। 15 साल तक सत्ता में रहने वाली पार्टी 294 में से सिर्फ 80 सीटों पर सिमट गई, जबकि भाजपा ने 208 सीटें जीतकर सरकार बना ली। चुनावी हार के बाद पार्टी में इस्तीफों की झड़ी लग गई और कई नेता खुलकर नेतृत्व पर सवाल उठाने लगे।
अंडे, पत्थर और ‘चोर-चोर’ के नारे
तृणमूल कॉन्ग्रेस की हार के बाद अभिषेक बनर्जी के खिलाफ जनता के गुस्से की सबसे चर्चित तस्वीर तब सामने आई जब वह बंगाल के सोनारपुर में एक TMC कार्यकर्ता के परिवार से मिलने पहुँचे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अभिषेक बनर्जी चुनाव बाद हुई हिंसा में घायल हुए TMC कार्यकर्ताओं और प्रभावित परिवारों से मिलने सोनारपुर पहुँचे थे।
उनके वहाँ पहुँचते ही लोगों ने उन्हें घेर लिया और चोर-चोर की जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी। इस दौरान स्थिति तनावपूर्ण हो गई और उनके साथ धक्का-मुक्की की गई। उनके ऊपर अंडे फेंके गए और उनकी शर्ट भी फट गई। हालात बिगड़ते देख सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें हेलमेट पहनाकर वहाँ से सुरक्षित निकाला।
TMC ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भाजपा समर्थकों का हाथ बताया, लेकिन विरोध कर रहे लोगों का कहना था कि यह वर्षों से जमा नाराजगी का परिणाम है।
चुनावी हार के बाद पहली बार अभिषेक बनर्जी को इस तरह के सार्वजनिक विरोध का सामना करना पड़ा, जिसने साफ संकेत दिया कि BJP के सत्ता में आने के बाद TMC के भ्रष्ट नेताओ के प्रति जनता का रवैया बदल रहा है और वो खुलकर उनका विरोध कर रहे हैं।
दिलचस्प बात यह भी रही कि सोशल मीडिया पर अभिषेक बनर्जी के पुराने बयान वायरल होने लगे। जब 2021 में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला हुआ था, तब अभिषेक ने इसे जनता के गुस्से से जोड़कर देखा था। अब उनके विरोधी कह रहे हैं कि जो तर्क उस समय दिया गया था, वही आज उनके खिलाफ भी लागू हो रहा है।
In Bengal, there was an attack on the then BJP president J.P. Nadda by TMC goons.
At that time, 'Abhishek Banerjee' had said about it:
अपने ही नेताओं ने अभिषेक पर लगाए परिवारवाद के आरोप
महज कुछ महीने पहले तक अभिषेक बनर्जी TMC में निर्विवाद रूप से नंबर दो नेता थे। राजनीति के क्षेत्र में कम अनुभव होने के बावजूद, उनकी चाची ने उन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में शामिल कर दिया था। अभिषेक 2011 के बाद सक्रिय राजनीति में आए और बहुत कम समय में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और युवा संगठन के प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पदों तक पहुँच गए।
हालाँकि 2026 में हालात अलग हैं। TMC की करारी हार के बाद अभिषेक को पार्टी की संगठनात्मक विफलताओं, वंशवादी अतिचार, आक्रामक चुनाव प्रचार और गुटबाजी जैसी सत्ता के स्पष्ट सूत्रधार के रूप में देखा जा रहा है, जिसके चलते उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
TMC के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यही परिवारवाद पार्टी में असंतोष की सबसे बड़ी वजह बना। कई पुराने नेताओं को किनारे कर दिया गया और संगठन पर अभिषेक समर्थक नए चेहरे हावी होते गए। TMC के एक विधायक ने डेक्कन क्रॉनिकल को बताया कि अभिषेक के ‘सत्ता के अहंकार’ और ‘खुलेआम भाई-भतीजावाद’ ने पार्टी को बर्बाद कर दिया है।
पुराने नेताओं से टकराव ने बढ़ाया विरोध
TMC के भीतर अभिषेक बनर्जी के खिलाफ नाराजगी नई नहीं है। पार्टी के कई पुराने नेताओं का मानना है कि उनके उभार ने संगठन को दो हिस्सों में बाँट दिया। एक तरफ पुराने जमीनी नेता और दूसरी तरफ अभिषेक का नया समूह। मुकुल रॉय जैसे संगठन के मजबूत रणनीतिकार धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए।
मुकुल रॉय को कभी ममता बनर्जी के साथ पार्टी का प्रमुख संगठनात्मक रणनीतिकार माना जाता था। रॉय को दरकिनार किए जाने से पुराने नेताओं में असंतोष पैदा हुआ। बाद में वे भाजपा में चले गए। नवंबर 2020 में सुवेंदु अधिकारी ने परिवहन मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके अगले महीने उन्होंने विधायक पद भी छोड़ दिया और भाजपा में शामिल हो गए।
फालता में ढहा अभिषेक का ‘डायमंड हार्बर मॉडल’
हर बड़े नेता का एक राजनीतिक गढ़ होता है और अभिषेक बनर्जी के लिए यह गढ़ डायमंड हार्बर रहा है। अभिषेक के करीबी सहयोगी जहाँगीर खान को इस इलाके में उनकी राजनीतिक ताकत का अहम आधार माना जाता था। अभिषेक समर्थक जिस व्यवस्था को ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ बताते थे, उसे विकास और कल्याणकारी योजनाओं का सफल मॉडल कहा जाता रहा।
हालाँकि विरोधियों का आरोप था कि यह मॉडल राजनीतिक दबाव और विरोधियों को नियंत्रित रखने की रणनीति पर टिका हुआ था। विधानसभा चुनाव से पहले अभिषेक को भरोसा था कि फालता सीट पर TMC अपनी पकड़ बनाए रखेगी, लेकिन नतीजे इसके बिल्कुल उलट निकले।
मतदान के दौरान मतदाताओं को डराने और EVM से छेड़छाड़ के आरोपों के बाद चुनाव आयोग ने सभी 285 बूथों पर दोबारा मतदान कराने का फैसला किया। इसके बाद TMC उम्मीदवार जाहांगीर खान चुनावी मुकाबले से पीछे हट गए। पुनर्मतदान के नतीजों में भाजपा उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने बड़ी जीत दर्ज की।
राजनीतिक हलकों में इस हार को केवल एक सीट की हार नहीं बल्कि अभिषेक बनर्जी के बहुचर्चित ‘डायमंड हार्बर मॉडल’ की असफलता के रूप में देखा गया। इस हार का असर तुरंत दिखाई दिया। फलता के नतीजे आने के 24 घंटे के भीतर डायमंड हार्बर नगरपालिका के नौ पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया।
रिपोर्टों के अनुसार, इस्तीफा देने वाले पार्षदों ने आरोप लगाया कि जिस मॉडल को सफलता की मिसाल बताया जाता था, उसने भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया और असहमति की आवाजों को दबाने का काम किया। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि अभिषेक ने 26 लाख नौकरियाँ चुरा ली हैं।
"Abhishek Banerjee has stolen 26 lakh jobs. He has hidden everything" – LOCALS pic.twitter.com/dNTM1epNlg
2019 के लोकसभा चुनाव में TMC के खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी में राजनीतिक सलाहकार संस्था I-PAC को लाया गया था। लेकिन समय के साथ यह फैसला पार्टी के भीतर नाराजगी का बड़ा कारण बन गया। कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि अभिषेक बनर्जी ने I-PAC पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया, जिससे संगठन को नुकसान हुआ।
नेताओं का आरोप है कि चुनाव के दौरान I-PAC ने पार्टी के पुराने और अनुभवी नेताओं को किनारे कर दिया और जमीनी राजनीति की जगह कॉरपोरेट शैली की रणनीति लागू की, जिससे कार्यकर्ताओं और जनता के बीच की दूरी बढ़ गई। TMC सांसद कल्याण बनर्जी ने आरोप लगाया कि I-PAC ने पार्टी संगठन को अपने कब्जे में लेकर उसे कमजोर कर दिया।
उनके मुताबिक, टिकट के दावेदारों के बीच जानबूझकर विवाद पैदा किए गए, जिससे कई नेता नाराज हो गए। उन्होंने कहा कि जिन्हें टिकट नहीं मिला, उनमें से कई लोगों ने गुस्से में भाजपा की मदद की। कल्याण बनर्जी का यह भी कहना था कि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने कभी I-PAC को स्वीकार नहीं किया।
I-PAC को लेकर एक और बड़ा विवाद टिकट वितरण को लेकर सामने आया। आलोचकों का दावा है कि उसके सुझाव पर पार्टी ने 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए थे। बाद में इनमें से 51 सीटों पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, जिसके बाद यह मुद्दा TMC के भीतर और ज्यादा विवाद का कारण बन गया।
घोटालों और जाँचों ने बढ़ाई मुश्किलें
15 साल के शासन के दौरान भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं के आरोपों ने पार्टी की साख को गंभीर नुकसान पहुँचाया। चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर भी इस बात पर खुलकर चर्चा होने लगी कि जनता का भरोसा कमजोर पड़ने के पीछे भ्रष्टाचार से जुड़े विवाद बड़ी वजह रहे।
इसी दौरान अभिषेक बनर्जी का नाम भी कई चर्चित मामलों में राजनीतिक बहस का विषय बना रहा। पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग भर्ती घोटाले की जाँच के दौरान केंद्रीय एजेंसियों ने उनसे कई बार पूछताछ की। जाँच के दौरान उनकी एक पुरानी कंपनी से जुड़े पहलुओं की भी पड़ताल की गई।
इसके अलावा 2025 में दाखिल एक पूरक आरोपपत्र में 2017 की एक ऑडियो रिकॉर्डिंग का भी जिक्र हुआ, जिसमें ‘अभिषेक बनर्जी’ नाम के व्यक्ति का उल्लेख था। कोयला तस्करी मामले में भी अभिषेक बनर्जी और उनके परिवार का नाम राजनीतिक विवादों में घिरा रहा।
जाँच एजेंसियों का आरोप था कि अवैध कोयला कारोबार से बड़ी रकम पैदा हुई और उसके वित्तीय लेनदेन की जाँच की गई। इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी रुजिरा बनर्जी से भी पूछताछ की थी।
कट मनी, सिंडिकेट राज और ‘भाइपो टैक्स’ की छवि
पश्चिम बंगाल में TMC के दौरान ‘कट मनी’ और सिंडिकेट राज के आरोप लगातार राजनीतिक बहस का हिस्सा बने रहे। विपक्ष का आरोप था कि आम लोगों और कारोबारियों को विभिन्न कामों के लिए अतिरिक्त रकम देनी पड़ती थी और स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली लोगों का एक नेटवर्क इससे फायदा उठाता था।
हाल ही में बीजेपी नेता अमित मालवीय ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि काकद्वीप के बाद अब साउथ 24 परगना जिले के नमखाना क्षेत्र का मामला चर्चा में है। यहाँ एक स्थानीय TMC नेता को लोगों को नकद पैसे लौटाते हुए देखा गया। आरोप है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर दिलाने के नाम पर 45 लोगों से प्रति व्यक्ति 5,000 रुपए लिए गए थे।
In an extraordinary spectacle from West Bengal, money collected as Cut Money by those associated with TMC is being returned to villagers in open fields.
Why in the open? Because public anger is boiling over and the fear of arrest is real.
स्थानीय लोगों के अनुसार, योजना का लाभ दिलाने के बदले पैसे वसूले गए थे। अब जाँच की आशंका और बढ़ती कार्रवाई के बीच संबंधित नेता लोगों को रकम वापस करते नजर आए।
निर्माण कार्यों से लेकर स्थानीय कारोबार तक, कई क्षेत्रों में ऐसे आरोप सामने आते रहे। अभिषेक बनर्जी को विपक्ष लंबे समय से तथाकथित ‘भाइपो टैक्स’ से जोड़ता रहा है। भाजपा नेताओं ने कई मौकों पर इस शब्द का इस्तेमाल करते हुए आरोप लगाया कि राज्य के कुछ इलाकों में अवैध वसूली का एक समानांतर तंत्र काम करता था।
आलोचकों का दावा था कि हाईवे और सीमा क्षेत्रों में चलने वाले वाहनों से भी अवैध वसूली की जाती थी और स्थानीय दबंगों के जरिए इस व्यवस्था को संचालित किया जाता था।
पार्टी के पुराने नेताओं का एक वर्ग मानता है कि संगठन का कमजोर होना, राजनीतिक सलाहकारों पर अत्यधिक निर्भरता, विवादों का बढ़ता बोझ और भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों ने मिलकर TMC को नुकसान पहुँचाया। इन सबके बीच अभिषेक बनर्जी पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं।
कभी पार्टी का सबसे शक्तिशाली और अछूता माना जाने वाला चेहरा आज आलोचनाओं के घेरे में है और यही वजह है कि चुनावी हार के बाद जनता और पार्टी, दोनों के भीतर सबसे ज्यादा नाराजगी उन्हीं के खिलाफ दिखाई दे रही है।
उत्तर प्रदेश का आजमगढ़ जिला खासतौर पर इसका संजरपुर और सरायमीर इलाका दशकों से सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर रहा है। अभी उत्तर प्रदेश आतंकवाद निरोधक दस्ते (UP-ATS) द्वारा खुदादादपुर (संजरपुर) से 22 वर्षीय संदिग्ध आतंकी मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी ने एक बार फिर इस शांत दिख रहे इलाके के नीचे सुलग रही खतरनाक साजिशों को सतह पर ला दिया है।
मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी महज एक अपराधी की धरपकड़ नहीं है, बल्कि यह उस खूंखार आतंकी सिंडीकेट के पुनर्जीवित होने का संकेत है जो सीमा पार बैठी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) और अंतरराष्ट्रीय गैंगस्टरों के इशारे पर भारत को दहलाने की फिराक में है।
इस स्पेशल रिपोर्ट में हम आजमगढ़ के संजरपुर के आतंकी इतिहास, इसके सियासी कनेक्शन, स्लीपिंग मॉड्यूल्स की कार्यप्रणाली और राजनीतिक बदलावों के साथ इसके उतार-चढ़ाव के हर पहलू के बारे में बता रहे हैं
मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी से बड़ी आतंकी साजिश का पर्दाफाश
उत्तर प्रदेश एटीएस को खुफिया तंत्र से लगातार इनपुट मिल रहे थे कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और सीमा पार बैठे भारत विरोधी तत्व सोशल मीडिया के जरिए देश के युवाओं को कट्टरपंथी बनाने की मुहिम चला रहे हैं। इसी निगरानी के दौरान एटीएस ने आजमगढ़ के सरायमीर थाना क्षेत्र के संजरपुर के पास स्थित खुदादादपुर गाँव में रहने वाले मोहम्मद शेख पुत्र रेहान अहमद को दबोचा। करीब 22 साल का यह युवक पहली नजर में एक सामान्य ग्रामीण लग सकता है, लेकिन इसके मोबाइल और डिजिटल फुटप्रिंट्स ने सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए।
मोहम्मद शेख के पास से एक अत्याधुनिक 9 एमएम की पिस्टल और चार जिंदा कारतूस बरामद किए गए। जाँच में सामने आया कि शेख पूरी तरह से जिहादी मानसिकता की गिरफ्त में आ चुका था। वह व्हाट्सएप और अन्य सुरक्षित मैसेंजर ऐप्स के जरिए पाकिस्तान और दुबई के कई संदिग्ध नंबरों के संपर्क में था। यह नंबर किसी और के नहीं, बल्कि कुख्यात पाकिस्तानी गैंगस्टर शहजाद भट्टी और उसके गुर्गों अजमल गुर्जर और रजा पाकिस्तानी के थे।
मोहम्मद शेख को पाकिस्तानी आकाओं द्वारा भारतीय जनता पार्टी (BJP) की एक प्रमुख महिला नेता की रेकी करने, उन्हें धमकाने और अंततः उनकी हत्या करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस टारगेट किलिंग को अंजाम देने के बाद शेख को पाकिस्तान या दुबई सुरक्षित निकालने और उसे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी मिशन में शामिल करने का वादा किया गया था।
मोहम्मद शेख स्थानीय स्तर पर अन्य युवाओं को भी मोटी रकम का लालच देकर और मजहबी भावनाएँ भड़काकर इस नेटवर्क से जोड़ने का प्रयास कर रहा था। समय रहते हुई इस गिरफ्तारी ने उत्तर प्रदेश को एक बड़े सांप्रदायिक तनाव और राजनीतिक हत्या की आग में झुलसने से बचा लिया।
संजरपुर क्यों कहा जाता है ‘आतंक की नर्सरी’?
आजमगढ़ का संजरपुर गाँव कोई पहली बार चर्चा में नहीं आया है। देश में जब भी कोई बड़ा बम धमाका या आतंकी गतिविधि हुई, सुरक्षा एजेंसियों के कदम घूम-फिरकर संजरपुर की गलियों में ही पहुँचे। इस गाँव को ‘आतंक की नर्सरी’ का तमगा मिलने के पीछे एक लंबा और खौफनाक इतिहास है। संजरपुर और उसके आसपास के इलाकों का नाम देश के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन ‘इंडियन मुजाहिद्दीन’ (IM) के जन्म और उसके विस्तार से गहराई से जुड़ा हुआ है।
बात चाहे साल 2007 के उत्तर प्रदेश की अदालतों में हुए धमाकों की हो, या 2008 के जयपुर, अहमदाबाद और दिल्ली के सिलसिलेवार बम ब्लास्ट की, इन सभी के मास्टरमाइंड और शूटर इसी संजरपुर और सरायमीर इलाके से निकले थे। इंडियन मुजाहिद्दीन का सह-संस्थापक यासीन भटकल जब देश में नेटवर्क खड़ा कर रहा था, तब उसे सबसे सुरक्षित पनाहगाह और सबसे मुफीद लड़ाके इसी संजरपुर से मिले थे।
इस गाँव के युवाओं का ब्रेनवॉश इस कदर किया गया था कि वे देश के भीतर ही देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने को तैयार हो गए। संजरपुर की इसी कड़वी हकीकत के कारण राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और उत्तर प्रदेश एटीएस को इस इलाके पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखनी पड़ती है। यहाँ के कई परिवार ऐसे हैं जिनके बेटे या तो देश की विभिन्न जेलों में आतंकी गतिविधियों के आरोप में बंद हैं या फिर वे फरार होकर पाकिस्तान, दुबई और सीरिया जैसे देशों में बैठकर भारत के खिलाफ साजिशें रच रहे हैं।
बटला हाउस एनकाउंटर और संजरपुर के मोस्ट वांटेड आतंकी
संजरपुर का नाम वैश्विक पटल पर सबसे ज्यादा तब गूँजा जब 19 सितंबर 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में कुख्यात ‘बटला हाउस एनकाउंटर‘ हुआ। दिल्ली सीरियल ब्लास्ट के बाद जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने आतंकियों के ठिकाने पर छापा मारा, तो वहाँ मौजूद आतंकियों का संबंध सीधे आजमगढ़ के संजरपुर से निकला।
इस मुठभेड़ में संजरपुर का रहने वाला आतंकी आतिफ अमीन और साजिद मारे गए थे, जबकि मोहम्मद सैफ नाम का आतंकी मौके से पकड़ा गया था। इस एनकाउंटर में दिल्ली पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर मोहन चंद्र शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए थे।
बटला हाउस एनकाउंटर के बाद संजरपुर के कई अन्य आतंकी देश छोड़कर फरार हो गए। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने इस इलाके के छह सबसे खतरनाक फरार आतंकियों पर 10-10 लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा है। इन आतंकियों की प्रोफाइल भी जानना जरूरी है-
डॉक्टर शाहनवाज: संजरपुर का रहने वाला यह आतंकी पेशे से डॉक्टर था, लेकिन इसका दिमाग बम बनाने और युवाओं को कट्टरपंथी बनाने में चलता था। यह देश के कई शहरों में हुए धमाकों का मुख्य साजिशकर्ता रहा है।
शादाब उर्फ बड़ा साजिद उर्फ जुनैद चिकना: बटला हाउस एनकाउंटर के दौरान यह मौके से भागने में सफल रहा था। बाद में इसके पाकिस्तान और वहां से सीरिया जाकर वैश्विक आतंकी संगठन आईएसआईएस (ISIS) में शामिल होने की पुष्टि हुई।
अबू राशिद: इंडियन मुजाहिद्दीन का यह खतरनाक कमांडर भी बटला हाउस के बाद से फरार है और इसके भी आईएसआईएस के साथ जुड़कर इंटरनेट के जरिए भारतीय युवाओं को भर्ती करने के इनपुट मिले हैं।
राशिद उर्फ सुल्तान, आसिफ और आफताब: ये तीनों भी संजरपुर और सरायमीर इलाके के रहने वाले हैं और देश के विभिन्न हिस्सों में हुए धमाकों में शामिल रहे हैं।
लंबे समय तक स्थानीय पुलिस के पास इन आतंकियों के पुख्ता डोजियर या तस्वीरें नहीं थीं, जिसका फायदा उठाकर इनके नेटवर्क चोरी-छिपे काम करते रहे। साल 2018 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक बड़ा कदम उठाते हुए सरायमीर थाने में इन सभी छह फरार आतंकियों की हिस्ट्रीशीट खोली।
डॉक्टर शाहनवाज (46ए), बड़ा साजिद (37ए), अबू राशिद (70ए), राशिद (26ए), आसिफ (20ए) और आफताब (11ए) की हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद स्थानीय स्तर पर इनके रिश्तेदारों और मददगारों पर कानूनी शिकंजा कसा गया, जिससे इनका घरेलू सपोर्ट सिस्टम ध्वस्त हो गया था।
आईएसआईएस (ISIS) के वीडियो से सामने आया आजमगढ़ का वैश्विक कनेक्शन
आजमगढ़ के आतंकियों के तार केवल भारत या पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि इन्होंने वैश्विक जिहाद में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। वर्ष 2016 में दुनिया के सबसे बर्बर आतंकी संगठन आईएसआईएस (ISIS) ने एक प्रोपेगैंडा वीडियो जारी किया था, जिसने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को हिलाकर रख दिया था। इस वीडियो में सीरिया और इराक के युद्धक्षेत्र में कुछ भारतीय आतंकी हथियार लहराते हुए भारत के खिलाफ जंग का एलान कर रहे थे और बाबरी मस्जिद, मुजफ्फरनगर दंगों तथा गोधरा का बदला लेने की बात कह रहे थे।
इस वीडियो में दिख रहे आतंकियों में से दो प्रमुख चेहरों की पहचान आजमगढ़ के संजरपुर निवासी बड़ा साजिद और अबू राशिद के रूप में हुई। वीडियो सामने आने के बाद संजरपुर में हड़कंप मच गया था। हालाँकि उनके परिजनों ने हमेशा की तरह यह दावा किया कि 2008 के बाद से उनका अपने बेटों से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन खुफिया एजेंसियों के पास इस बात के पक्के सबूत थे कि ये फरार आतंकी इंटरनेट और डार्क वेब के जरिए संजरपुर और आजमगढ़ के स्थानीय स्लीपर सेल्स के संपर्क में बने हुए थे और वहाँ से नई भर्तियाँ करने की कोशिश कर रहे थे।
लश्कर का ‘शेख अब्दुल नईम’ कनेक्शन और पूर्वांचल में स्लीपिंग मॉड्यूल्स
आजमगढ़ का यह आतंकी सिंडीकेट कितना गहरा है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) भी इस नर्सरी का इस्तेमाल करता रहा है। साल 2017 में लखनऊ से लश्कर के एक बड़े आतंकी शेख अब्दुल नईम को गिरफ्तार किया गया था। नईम साल 2014 में मुंबई पुलिस की हिरासत से फरार हो गया था और वह हैदराबाद बम धमाकों का मुख्य आरोपित था।
गिरफ्तारी से पहले नईम ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र, विशेष रूप से आजमगढ़, जौनपुर और वाराणसी का सघन दौरा किया था। जाँच में सामने आया कि नईम आजमगढ़ के ही तीन फरार आतंकियों का बेहद करीबी था। उन्हीं पुराने संपर्कों का इस्तेमाल करके नईम आजमगढ़ और बनारस के निष्क्रिय हो चुके स्लीपिंग मॉड्यूल्स को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश कर रहा था।
नईम ने वाराणसी के प्रसिद्ध अस्सी घाट और दशाश्वमेध घाट के पास स्थित होटलों और धर्मशालाओं में हिंदू नाम और फर्जी पहचान पत्रों के आधार पर हफ्तों तक पनाह ली थी। उसने उन क्षेत्रों की टोह ली थी जहां इजरायली और अमेरिकी पर्यटक बड़ी संख्या में आते हैं। उसने गोरखपुर के रास्ते नेपाल सीमा तक जाकर पूरे रूट की वीडियो और तस्वीरें अपने पाकिस्तानी आकाओं को भेजी थीं। इस पूरी साजिश का केंद्र बिंदु भी आजमगढ़ का वही आतंकी नेटवर्क था, जो नईम को स्थानीय स्तर पर रसद, छिपने की जगह और पहचान पत्र मुहैया करा रहा था।
अंडरवर्ल्ड और आतंकवाद का कॉकटेल, अबू सलेम की विरासत
आजमगढ़ का इतिहास केवल वैचारिक आतंकवाद से ही नहीं, बल्कि अंडरवर्ल्ड के उस खूंखार नेटवर्क से भी जुड़ा है जिसने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को लहूलुहान किया था। मुंबई बम धमाकों का मुख्य आरोपित और अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम भी इसी आजमगढ़ के सरायमीर का रहने वाला है। अबू सलेम ने सरायमीर से निकलकर मुंबई के डी-कंपनी (D-Company) में अपनी पैठ बनाई और जबरन वसूली, हत्याओं तथा हथियारों की तस्करी का एक बड़ा साम्राज्य खड़ा किया।
साल 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट में हथियारों को मँगाने और उन्हें ठिकाने लगाने में अबू सलेम की मुख्य भूमिका थी। सलेम ने आजमगढ़ के अपने पुराने संपर्कों का इस्तेमाल करके कई स्थानीय युवकों को मुंबई और खाड़ी देशों में काम दिलाया और धीरे-धीरे उन्हें जरायम की दुनिया में धकेल दिया। आजमगढ़ में अपराध और आतंकवाद का यह कॉकटेल दशकों पुराना है, जहाँ अंडरवर्ल्ड के शूटर और हथियारों के तस्कर आसानी से वैचारिक आतंकवादियों के स्लीपर सेल में तब्दील हो जाते हैं।
क्या जब-जब सपा मजबूत हुई, तब-तब पनपा सिंडीकेट?
आजमगढ़ में आतंकवाद और संगठित अपराध के इस कदर फलने-फूलने के पीछे सबसे बड़ा कारण इस क्षेत्र को मिला राजनीतिक संरक्षण और तुष्टिकरण की राजनीति रही है। यदि अतीत के पन्नों को पलटकर तथ्यों का विश्लेषण किया जाए, तो यह साफ दिखाई देता है कि जब-जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) सत्ता में रही या राजनीतिक रूप से मजबूत हुई, तब-तब इस इलाके के गैंगस्टरों और संदिग्ध आतंकियों के हौसले बुलंद हुए।
इसके कई ठोस और ऐतिहासिक तथ्य मौजूद हैं-
बटला हाउस के बाद राजनीतिक हमदर्दी: जब 2008 में बटला हाउस एनकाउंटर हुआ, तो समाजवादी पार्टी और कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेताओं ने वोट बैंक की राजनीति के चलते इस एनकाउंटर पर ही सवाल खड़े कर दिए थे। संजरपुर के मारे गए और पकड़े गए आतंकियों को ‘मासूम छात्र’ बताकर पेश किया गया। नेताओं का एक पूरा हुजूम संजरपुर के उन परिवारों से मिलने पहुँचा जिनके तार आतंकियों से जुड़े थे, जिससे स्थानीय स्तर पर कानून व्यवस्था और सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल कमजोर हुआ।
आतंकी मुकदमों की वापसी का प्रयास: साल 2012 में जब उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तो सरकार के एजेंडे में सबसे ऊपर देश के विभिन्न बम धमाकों में पकड़े गए आजमगढ़ और अन्य जिलों के संदिग्ध आतंकियों के मुकदमों को वापस लेने का फैसला शामिल था। हालाँकि बाद में माननीय उच्च न्यायालय ने इस असंवैधानिक कदम पर रोक लगा दी, लेकिन इस राजनीतिक प्रयास ने यह संदेश दे दिया था कि सत्ता में बैठे लोग इन तत्वों के प्रति नरम रुख रखते हैं।
गैंगस्टरों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाना: आजमगढ़ और आसपास के जिलों में मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण देना और उन्हें माननीय बनाना इसी राजनीति का हिस्सा रहा। जब सत्ता का हाथ इन अपराधियों के सिर पर होता था, तो स्थानीय पुलिस और खुफिया इकाइयाँ संजरपुर जैसे संवेदनशील इलाकों में हाथ डालने से कतराती थीं, जिसके कारण स्लीपर सेल बिना किसी डर के अपनी जड़ें मजबूत करते रहे।
सत्ता परिवर्तन और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का असर
साल 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता में बड़ा बदलाव हुआ। नई सरकार के आते ही अपराधियों और आतंकवादियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति लागू की गई। पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को पूरी छूट दी गई कि वे बिना किसी राजनीतिक दबाव के राष्ट्रविरोधी तत्वों पर कार्रवाई करें।
इस नीति का असर आजमगढ़ पर भी साफ तौर पर देखने को मिला-
आतंकी नेटवर्क का ध्वस्त होना: एटीएस और एनआईए ने संजरपुर, सरायमीर और खुदादादपुर जैसे इलाकों में लगातार छापेमारी करके फंडिंग के रास्तों को ब्लॉक कर दिया। पुराने स्लीपर सेल्स के मददगारों को जेल भेजा गया।
हिस्ट्रीशीट और कुर्की की कार्रवाई: जैसा कि पहले बताया गया, 2018 में छह बड़े इनामी आतंकियों की हिस्ट्रीशीट खोलकर बीट स्तर पर निगरानी शुरू की गई। माफियाओं और आतंकियों की संपत्तियों को कुर्क किया गया और उन पर बुलडोजर चलाए गए।
भय का माहौल खत्म होना: राजनीतिक संरक्षण खत्म होने से अपराधियों में खौफ पैदा हुआ और आजमगढ़ का यह आतंकी सिंडीकेट पूरी तरह से कमजोर, पंगु और भूमिगत हो गया था। कई सालों तक इस इलाके से किसी बड़ी राष्ट्रविरोधी गतिविधि की खबर सामने नहीं आई।
साल 2024 का राजनीतिक मोड़ और संजरपुर में जिहादी मानसिकता का पुनरुत्थान
सुरक्षा बलों की लगातार सख्ती के बावजूद, यह मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी, बल्कि केवल एक अनुकूल राजनीतिक अवसर के इंतजार में शांत बैठी थी। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ संसदीय सीट पर एक बार फिर बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी धर्मेंद्र यादव ने जीत हासिल की और आजमगढ़ की सीट पर फिर से सपाई परचम लहराया।
राजनीतिक विश्लेषकों और खुफिया इनपुट्स के अनुसार, इस चुनावी नतीजे के बाद से ही संजरपुर और उसके आसपास के इलाकों में सक्रिय रेडिकल तत्वों और जिहादी मानसिकता के लोगों को यह लगने लगा है कि उनके पुराने दिन और पुराना राजनीतिक संरक्षण वापस लौट सकता है। धर्मेंद्र यादव की इस जीत के बाद से ही इस इलाके के स्लीपिंग मॉड्यूल्स के भीतर एक नई हलचल देखी गई। सोशल मीडिया पर भारत विरोधी प्रोपेगैंडा अचानक तेज हो गया और युवाओं को दोबारा लामबंद करने की कोशिशें शुरू हो गईं।
मोहम्मद शेख की हालिया गिरफ्तारी इसी राजनीतिक बदलाव और उसके बाद पैदा हुई जिहादी मानसिकता के पुनरुत्थान का सीधा परिणाम है। सीमा पार बैठे पाकिस्तानी आकाओं और गैंगस्टर शहजाद भट्टी ने भाँप लिया था कि आजमगढ़ में राजनीतिक माहौल बदलते ही स्लीपर सेल्स को फिर से सक्रिय किया जा सकता है। इसी का फायदा उठाकर उसने मोहम्मद शेख जैसे 22 साल के युवक को हथियार मुहैया कराए और उसे भाजपा की महिला नेता की हत्या जैसे सनसनीखेज मिशन पर लगा दिया, ताकि राज्य में एक बार फिर से अशांति और सांप्रदायिक तनाव फैलाया जा सके।
सुरक्षा एजेंसियों के सामने बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश एटीएस की इस मुस्तैद और त्वरित कार्रवाई ने यह साबित कर दिया है कि भले ही आजमगढ़ में आतंकी नर्सरी को जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हों, लेकिन देश की सुरक्षा एजेंसियाँ पूरी तरह अलर्ट पर हैं। मोहम्मद शेख की गिरफ्तारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद का खतरा कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता; यह केवल रूप बदलता है और अनुकूल राजनीतिक व सामाजिक माहौल मिलते ही दोबारा फन उठाने लगता है।
आजमगढ़ और संजरपुर के इस पूरे बैकग्राउंड से यह साफ है कि जब तक इस इलाके के रेडिकल तत्वों को राजनीतिक और सामाजिक रूप से अलग-थलग नहीं किया जाएगा, तब तक सीमा पार बैठे आईएसआई जैसे संगठन यहाँ के युवाओं का इस्तेमाल स्लीपर सेल के रूप में करते रहेंगे।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती मोहम्मद शेख के पूरे डिजिटल नेटवर्क को खंगालना, उसके अन्य स्थानीय सहयोगियों की पहचान करना और संजरपुर की इस ‘आतंकी नर्सरी’ को जड़ से उखाड़ फेंकना है, ताकि देश की अखंडता और सुरक्षा पर आँच न आने पाए।
भारतीय मीडिया में खुद को सेक्युलर और निष्पक्ष कहने वाले पत्रकारों का पाखंड किसी ना किसी रूप में सामने आ ही जाता है। ‘The Hindu’ और ‘स्पोर्ट्सस्टारवेब’ की डिप्टी टीम लीड लावण्या नारायण ने खेल में धर्म को लेकर ऐसा दोहरा मापदंड दिखाया है कि सोशल मीडिया पर लोग उन्हें जमकर लताड़ रहे हैं।
एक तरफ जहाँ IPL के फाइनल मैच में शिव तांडव स्तोत्रम बजने पर लावण्या को खेल में धर्म नजर आने लगता है, वहीं दूसरी तरफ विदेशी मुस्लिम खिलाड़ियों के मैदान पर नमाज पढ़ने और रोजा खोलने पर उनका ‘माशाल्लाह’ प्रेम हिलोरे मारने लगता है।
IPL फाइनल में जागा ‘सेक्युलर’ ज्ञान
रविवार (31 मई 2026) को संपन्न हुए IPL के फाइनल मुकाबले में मशहूर गायक कैलाश खेर ने अपनी दमदार आवाज में भगवान शिव का भजन और शिव तांडव स्तोत्रम गाया। पूरा स्टेडियम भक्ति और उत्साह के माहौल में झूम उठा। लेकिन यह नजारा ‘The Hindu’ की पत्रकार लावण्या नारायण को हजम नहीं हुआ।
लावण्या नारायण ने तुरंत सोशल मीडिया पर अपना सेक्युलर ज्ञान बाँटते हुए लिख दिया कि खेलों से धर्म को दूर रखा जाना चाहिए। लावण्या के मुताबिक एक हिंदू बहुल देश के सबसे बड़े क्रिकेट त्योहार में हिंदू संस्कृति की झलक दिखना खेल की भावना के खिलाफ है। उनके इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर नेटीजन्स का गुस्सा भड़क गया।
तुर्की और पाकिस्तान के खिलाड़ियों पर ‘माशाल्लाह’ की बौछार
लावण्या नारायण के इस ज्ञान के बाद जब जागरूक सोशल मीडिया नेटीजन्स ने उनके पुराने ट्वीट्स खंगालने शुरू किए, तो उनके दोगलेपन की ऐसी परतें खुलीं कि लोग हैरान रह गए। लावण्या का एक पुराना ट्वीट सामने आया है, जो उन्होंने 17 अप्रैल 2021 को किया था। इस ट्वीट में उन्होंने तुर्की की एक फुटबॉल टीम का Video शेयर करते हुए बड़े चाव से ‘माशाल्लाह’ लिखा था।
Mashallah for Turkish players practising Islam on ground..Eid Mubarak to Pakistanis… Keep religion out of spots because a Hindu song was played in IPL FINAL
उस मैच के बीच में मुस्लिम खिलाड़ी अपना रोजा खोल रहे थे। खेल के बीच में इस्लाम के इस प्रदर्शन पर लावण्या को असीम आनंद मिल रहा था और तब उन्हें खेल के बीच में मजहब के घुसने से कोई दिक्कत नहीं थी।
पाकिस्तानी क्रिकेटरों के लिए उमड़ा ‘भाईचारा’
इतना ही नहीं, लावण्या का पाकिस्तानी प्रेम भी उनके सोशल मीडिया हैंडल पर साफ दिखाई देता है। वे पाकिस्तानी क्रिकेटरों और वहाँ के एंकरों को बेहद चाव से ईद की मुबारकबाद देती हैं। उनके एक ट्वीट में वे तारिक लस्कर को टैग करते हुए जैनब अब्बास, इमाम-उल-हक, डायना बेग और आलिया रियाज जैसे पाकिस्तानी चेहरों के साथ ईद का जश्न मनाती दिखती हैं।
इसके अलावा वे न्यूयॉर्क के ब्रोंक्स में हिंदू विरोधी बयानबाजी करने वाला मेयर जोहरान ममदानी जब ब्रॉन्क्स के मैकॉम्स डैम पार्क में ईद-अल-अजहा की नमाज के लिए पहुँचता है, तो मैडम लावण्या उस Video को बड़े उत्साह के साथ रीट्वीट करती हैं।
यानी जब बात इस्लाम और मुस्लिम खिलाड़ियों की हो, तो लावण्या के लिए वह खेल की खूबसूरती बन जाता है, लेकिन जैसे ही भारत के मैदान पर शिव का नाम गूंजता है, तो उनका सेक्युलरिज्म खतरे में आ जाता है।
सोशल मीडिया पर जमकर हो रही थू-थू
लावण्या नारायण के इस खुले पाखंड के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर नेटीजन्स उन्हें ‘दक्षिण दिल्ली की फर्जी बुद्धिजीवी’ बताकर ट्रोल कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि यह महिला खुद हिंदू नाम रखती है, भारत के प्रतिष्ठित अखबार में काम करती है, लेकिन इसकी नफरत सिर्फ सनातन धर्म के लिए है।
We all heard enough about fake South Delhi Lavanya.
Now meet the real Lavanya, Deputy Team Lead at SportsStarWeb & The Hindu.
She loves sending Eid Mubarak to Pakistani cricketers for "bhaichara".
She once felt full orgasm when Turkish Muslim team broke Roza mid-match.
नेटीजन्स लिख रहे हैं कि अपनी रोजी-रोटी भारत में हिंदू नाम से कमाने वाले ये लोग असल में मानसिक रूप से गुलाम हैं। नेटीजन्स लावण्या की प्रोफाइल शेयर करके लिख रहे हैं कि खुद को इस ग्रह का सबसे चालाक इंसान समझने वाले ये लोग असल में वैचारिक रूप से गटर के कीड़े जैसी सोच रखते हैं, जिन्हें बहुसंख्यक समाज की आस्था से चिढ़ है।
यह सेक्युलरिज्म नहीं, मानसिक दिवालियापन है
लावण्या नारायण का यह रवैया कोई इकलौता मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे देश के एक खास तबके की पुरानी बीमारी है। खेल में धर्म को दूर रखने की वकालत सिर्फ तब क्यों याद आती है जब सामने हिंदू प्रतीक होते हैं? जब मोहम्मद रिजवान बीच मैदान पर नमाज पढ़ते हैं या तुर्की के खिलाड़ी खेल रोककर रोजा खोलते हैं, तब लावण्या जैसी कथित बुद्धिजीवियों को उसमें ‘खूबसूरती’ नजर आती है। लेकिन भारत के ही एक टूर्नामेंट में जब भगवान शिव की स्तुति होती है, तो इन्हें मिर्ची लग जाती है।
यह सीधे तौर पर सनातन धर्म के प्रति हीनभावना और विदेशी एजेंडे के सामने घुटने टेकने की मानसिकता है। खुद को सबसे समझदार समझने वाले इन एजेंडाधारियों को यह समझ लेना चाहिए कि अब देश का युवा जाग चुका है। वह आपके इस सिलेक्टिव सेक्युलरिज्म और दोगलेपन को न सिर्फ पहचानता है, बल्कि बीच चौराहे पर आपको बेनकाब करना भी जानता है। लावण्या नारायण जी, खेल से धर्म को दूर रखने की सलाह देने से पहले जरा अपने ‘माशाल्लाह’ वाले चश्मे को साफ कर लीजिए, क्योंकि आपका दोहरा चेहरा अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।
एक किस्सा सुनाती हूँ। एक गाँव में अलग-अलग मोहल्ले की दो सहेलियाँ मिलती हैं। एक आरफा खानुम शेरवानी और दूसरी निवेदिता मेनन। दोनों कैमरे के सामने बैठकर चुगली करने लगती हैं। इनमें से एक आरफा, अपनी दोस्त निवेदिता मेनन से बातें उगलवा रही है, जबकि दूसरी निवेदिता ठीक वही बातें उगल रही हैं जो आरफा सुनना और कहलवाना चाहती हैं। चुगली करने का यही सही तरीका भी है। उन्हें यह भी मालूम है कि उनकी यह चुगली गाँव भर तक पहुँच जाएगी। और हुआ भी कुछ ऐसा ही, क्योंकि चुगली का टॉपिक ही ऐसा चुना गया था- लव जिहाद और हिंदू-विरोधी बातें।
दोनों सखियों की यह चुगली तीन महीने बाद सोशल मीडिया पर वायरल कंटेन्ट बनी। ‘एक्स’ से लेकर फेसबुक और यूट्यूब के कानों तक इनकी बातें पहुँची। और हर जगह इनकी चुगली करने की आदत पर भद्द पिटी। तो वो चुगली है कुछ ऐसी ही कि सुनना भी जरूरी है। तो चुगली के 2.50 मिनट में हुई तीखी बातें आप भी सुनिए:
“Hindu ladkiyon ko Muslim ladke hi kyun pasand aate hain?”
“Hindu mardon se nahi hota, Muslim mard attractive hote hain.”
This is what Arfa Khanum and JNU’s Nivedita are discussing.
Forget addressing the conspiracy by Islamists to target Hindu girls. These Urban Nasals are… pic.twitter.com/SIcs4ZW3gb
शुरुआत आरफा करती हैं क्योंकि अपने नैरेटिव की बातें उगलवानी उन्हीं को हैं। आरफा पूछती हैं- लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?
बस… यही सवाल चुगलीखोर दोस्त निवेदिता पुछवाने का इंतजार भी कर रही थी। उसने अपना जवाब एक सुर में खिलखिलाते हुए दिया, “पता नहीं… इनको (हिंदुओं) कहते शर्म नहीं आती। हिंदू मर्द जाकर ले आएँ मुस्लिम औरतों को हमारे समुदाय में। ले आए बहू बनाकर, क्यों नहीं होता है आपसे? ये कहने में उन्हें शम महसूस नहीं होती? कि हमसे नहीं होता वो करते हैं, वो हमारी लड़कियों को छीनते हैं। हमेशा लगता है कि ‘लव जिहाद’ एक बेबसी प्रकट करने जैसा है कि हमसे नहीं होता और ये लोग कर रहे हैं। होंगे फिर मुस्लिम मर्द इतने हसीन।”
इतने में आरफा उत्सुकता से पूछती हैं, “क्या मुस्लिम मर्द इतने आकर्षक होते हैं, क्या इतने हैंडसम होते हैं?”
अब निवेदिता बिल्कुल ‘नंगी मानसिकता’ के साथ बोलती हैं, “हाँ, होंगे। ‘हिंदू राष्ट्र’ तो हिंदुओं में डर पैदा करता है, तब जाकर हिंदू खतरे में है वाला नारा उठता है।”
हर जगह मोदी सरकार को घसीटने वाली आरफा फिर बोल पड़ती हैं, “फिर ये लोग(हिंदू) मोदी जी को वोट करते हैं?”
निवेदिता भी चुगली को एक कदम आगे ले जाते हुए कहती हैं, “मैं नहीं मानती कि वोट से कोई सरकार टिकी हुई है, और कई सालों से नहीं टिकी है।”
आगे आरफा अपनी खयाली दुनिया में पकाए गए पुलाव को परोसते हुए पूछती हैं, “मुस्लिम लड़के सुरमा लगाकर बाइक पर आता है और हिंदू लड़कियों का दिल चुराके ले जाता है। लेकिन हिंदू लड़के ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे हैं… क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि मुस्लिम लड़के धर्म परिवर्तन का एक नेटवर्क चलाते है, जो हिंदू लड़के नहीं कर रहे हैं।”
इस बार निवेदिता ने आरफा की मानसिकता को भी भाँप लिया है और उसी हिसाब से अपना ‘फेमिनिस्ट कार्ड’ बीच में घुसाकर पूरा जवाब देती हैं, “ये लोग सिर्फ मुस्लिमों से नफरत नहीं करते बल्कि महिलाओं से भी नफरत करते हैं, जो पितृसत्तात्मक समाज की माँ, बहने औऱ बीवियाँ नहीं बनना चाहतीं। आजाद खयाल वाली महिलाएँ। तो उनको लगता है कि जो औरतें इस लव जिहाद में फँसती हैं उनका कोई दिमाग नहीं है, वो बिल्कुल मुर्गी बनकर किसी के पीछे चली जाती हैं… मतलब कोई भी सुरमा लगाकर आया और आप उनके पीछे चली गईं..”
आगे कहती हैं, “मान लेते हैं कि लव जिहाद साजिश है धर्म परिवर्तन के लिए और मुस्लिम की तादाद बढ़ाने के लिए। लव जिहाद बोलने वालों की नजर में हिंदू महिलाएँ बुद्धु हैं जो वो ये कर रही हैं। तो आपके घर में ही कुछ समस्या है न। लव जिहाद से औरतों पर काबू रख रहे हैं।”
अब इस चुगली के पीछे का पूरा एजेंडा भी समझ लीजिए। यहाँ दोनों सहेलियाँ निवेदिता और आरफा खानुम ‘लव जिहाद’ पर चुगली कर रही हैं। यहाँ निवेदिता ‘लव जिहाद’ को हिंदुओं की बेबसी बताकर मुस्लिमों को हरी झंडी दे रही हैं और आरफा खानुम इस हरी झंडी का जश्न मनाते हुए अपने मुस्लिम भाई-बहनों की तारीफ में मग्न नजर आती हैं।
यह भी जान लेना चाहिए कि पहली सहेली आरफा खानुम शेरवानी, खुद को एक लिबरल-प्रोग्रेसिव महिला के तौर पर पेश करते हुए ‘एकतरफा’ मुस्लिमों के हक की लड़ाई लड़ती है। और दूसरी सहेली निवेदिता की पहचान ‘लाल सलाम’ वाली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की प्रोफेसर के तौर पर है और उसके देश-विरोधी किस्से इतने मशहूर हैं कि इन्हें फिल्मों में जगह देनी पड़ गई।
यहाँ बार-बार आरफा खानुम का यह पूछना कि ‘लड़कियों को मुस्लिम लड़के ही क्यों पसंद आते हैं?’ कोई साधारण सवाल नहीं है। इस सवाल से वे हिंदुओं को गलत ठहराने के लिए यह बताने की कोशिश कर रही हैं कि लव जिहाद की पीड़ित हिंदू महिलाएँ खुद मुस्लिम लड़कों की खूबसूरती देखकर उनके पास आती हैं। वहीं फेमिनिज्म के राग अलापने के लिए वह निवेदिता के मुँह से ‘आजाद खयाल’ वाली महिलाओं को हिंदुओं का विरोधी बताने वाली बात सुनना चाहती हैं।
लेकिन आरफा सिर्फ तब तक इन बेतुकी बातों पर टिकी रहती हैं जब तक इनकी हकीकत सामने नहीं आ जाती है। जब TCS नासिक में धर्मांतरण कांड जैसे मामले सामने आते हैं तो आरफा इन्हें मुस्लिमों के प्रति हमला बताती हैं और कहती हैं कि अब पढ़े-लिखे मुस्लिमों को ‘बहुसंख्यकों के सिस्टम’ ने निशाना बना लिया है। भूल जाती हैं वो अपने उन ‘आकर्षक’ और ‘हैंडसम’ भाइजानों की हिंसा, जो हर त्यौहार पर बन-ठनकर निकलते और हिंदुओं को चाकूबाजी और पत्थरबाजी का शिकार बनाते हैं।
यह भी याद नहीं रखती कि आतंकी हमले में इन ‘पढ़े-लिखे और खूबसूरत’ भाईजान के जब नाम सामने आते हैं, तो इनकी जिहादी मानसिकता भी सबके सामने आ जाती है। तब साफ हो जाता है कि कैसे मजहब के नाम पर ये आतंकी बने। तब आप आरफा ही हैं, जो आज ‘लव जिहाद’ को बेबसी बताने पर खिलखिला रही हैं, तब आपके भाईजानों पर सवाल किए जाते हैं तो आपके कान खराब हो जाते हैं।
बात अगर दूसरी सहेली निवेदिता की करें तो देश-विरोधी किस्सों के अलावा ‘प्रोफेसर’ के तौर पर उनके पास कोई अन्य उपलब्धियाँ नजर नहीं आती हैं। चाहे भारतीय सेना को बदनाम करने की बात हो तो निवेदिता आगे रहेंगी, जिनके लिए निवेदिता का कहना है कि ये सिर्फ ‘रोटी’ के लिए काम करते हैं और देश सेवा से इनका कोई मतलब नहीं है। जब अप्रैल 2010 में कम्युनिस्टों द्वारा 76 CRPF जवानों के बलिदान का जश्न JNU में मनाया गया था तब भी निवेदिता का नाम सबसे ऊपर था।
चलिए ‘देश सेवा’ में दिए निवेदिता के योगदान को भी जान लेते हैं। इन्होंने पाकिस्तान की राह पर चलते हुए मार्च 2016 में कहा कि भारत गैर-कानूनी ढंग से कश्मीर पर कब्जा कर रहा है और यह कभी भी भारत का अभिन्न अंग नहीं रहा। ‘देशप्रेम’ इतना भरा है कि निवेदिता भारत के नक्शे को ही नहीं मानती हैं, इसीलिए वह अपने आसपास उल्टा नक्शा देखना पसंद करती हैं। उनका तर्क यह है कि उन्हें इस नक्शे में भारत माता नहीं दिखता।
और JNU के छात्र-छात्राओं के आए दिन देश-विरोधी गतिविधियाँ सामने आने में भी इनकी भूमिका है। ये ‘द कश्मीर फाइल्स’ में राधिका मेनन के किरदार के रूप में दिखाई गईं निवेदिता मेनन को देखकर सभी जान गए हैं। यह भी किसी से नहीं छिपा कि JNU में निवेदिता जैसे प्रोफेसर ही यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं को शराब और पार्टियों का लालच देकर देश-विरोधी प्रोपेगेंडा आगे बढ़ाने का काम सौंपते हैं।
‘हैंडसम’ लव जिहादियों की मक्कारी
तो अब यह तो सामने आ ही गया है कि इन दो सहेलियों की चुगली करने के पीछे क्या मंशा है और कैसे यह पूरे गाँव में फैलाने के एजेंडे से की गई है? लेकिन जो यह कह रही हैं कि ‘हिंदुओं से नहीं होता है।’ यह बात सही है, हिंदू नहीं कर सकते जो मुस्लिम संगठित गिरोह बनाकर ‘लव जिहाद‘ में हिंदू लड़कियों को फँसाते हैं, हिंदू किसी भी अपना धर्म नहीं थोप सकते, न ही जबरन गोमांस खिला सकते और न खाओ तो रेप और शारीरिक शोषण जैसी हैवानियत नहीं कर सकते।
और जहाँ तक बात है कि हिंदू महिलाओं के ‘बुद्धु’ कहने और समाज में उन पर काबू करने की है तो यह कोई ‘फेमिनिज्म’ विचार नहीं है। किसी के भावनाओं से खेलने वाले आपके (मुस्लिम) मर्द इस गेम को ज्यादा सही तरीके से खेल पाते हैं, क्योंकि धर्म पर वार झूठ और मक्कारी से किसी की भावनाओं के साथ खेलना हिंदुओं से नहीं हो पाता है। तुम्हारे (मुस्लिम) ‘मर्द’ ‘हैंडसम’ और ‘खूबसूरती’ नहीं है आरफा और निवेदिता, वे महिलाओं को सुरमा लगाकर नहीं फँसाते बल्कि माथे पर टीका और हाथ में कलावा पहनकर आते हैं।
झारखंड में धर्मांतरण की वजह से डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है, खासकर सीमावर्ती इलाकों में। पूर्व सीएम चंपई सोरेन ने जनजातीय क्षेत्रों में ईसाइयत के फैलने और जनजातियों की संस्कृति, जीवन शैली नष्ट होने को लेकर चिंता जताई है। इसके बाद एक बार फिर जनजातीय परंपरा और उसपर ईसाई मिशनरी और घुसपैठियों के बढ़ते प्रभाव पर बहस हो रही है।
चंपई सोरेन का कहना है कि अगर सरकार ने जनजातियों के लिए आरक्षण जैसी सुविधाएँ दी हैं, तो ईसाई बनने वाले इसका लाभ कैसे उठा सकते हैं, क्योंकि धर्मांतरण के बाद ही वे अल्पसंख्यक बन जाते हैं। अल्पसंख्यकों के लिए अलग व्यवस्था और सुविधाएँ संविधान और सरकार ने दे रखी है। यही बात इस्लाम कबूलने वालों के साथ भी लागू है।
चंपई सोरेन ने अपनी बात को ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ देते हुए समझाया कि झारखंड में हजारों सालों से प्रकृति पूजक जनजातियों और सनातनियों के बीच एक बेहद गहरा, आत्मीय और सह-अस्तित्व का संबंध रहा है। दोनों समुदाय सदियों से एक ही गाँव, एक ही परिवेश में भाईचारे के साथ रहते आए हैं। उनके बीच कभी भी धर्म या पूजा पद्धति को लेकर कोई दीवार खड़ी नहीं हुई। सनातन धर्म ने कभी भी जनजातियों की पहचान को मिटाने की कोशिश नहीं की।
यही वजह है कि जनजातियों की मूल संस्कृति, पूजा पद्धति और बाकी खासियत बनी रही। अगर सनातनियों ने धर्मांतरण कराया होता तो जनजातीय समुदाय की संस्कृति कब का नष्ट हो जाती। इसी वजह से जनजातीय समाज को कभी भी हिंदू मंदिरों या सनातन परंपराओं से कोई आपत्ति या असुरक्षा की भावना नहीं हुई।
इस रिश्ते की खूबसूरती यह है कि सनातनी समाज के लोग जनजातीय लोगों के पवित्र स्थलों जैसे जाहेरस्थान, सरना स्थल, देशाउली और मांझी थान पर पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ जाते हैं और वहाँ के रीति-रिवाजों का सम्मान करते हैं। इसी तरह रांची के पास स्थित प्रसिद्ध दिउड़ी मंदिर और रंकिणी मंदिर जैसे अनगिनत ऐतिहासिक धार्मिक स्थल इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
इन मंदिरों में जनजातीय समाज के लोग न केवल सिर झुकाते हैं, बल्कि सबसे बड़ी बात यह है कि इन मंदिरों के मुख्य पुजारी भी स्वयं जनजातीय समुदाय यानी आदिवासी पाहन या मुंडा से ही आते हैं। दोनों समुदाय एक-दूसरे के पर्व-त्योहारों में खुलकर शामिल होते हैं। जब आदिवासी भाई करमा या सरहुल मनाते हैं, तो सनातनी समाज उनके साथ झूमता है और जब सनातनी कोई उत्सव मनाते हैं, तो जनजातीय समाज उसका सहर्ष हिस्सा बनता है।
झारखंड के आदिवासी इलाकों में चर्च की बढ़ती संख्या पर मेरे बयान से काफी हंगामा हुआ। अपना धर्म बदल चुके कई लोग इस बात से परेशान हैं कि मैने सिर्फ चर्च की बात की, मंदिरों की नहीं। चलिए, आज इस मुद्दे पर विस्तार से बात करते हैं।
झारखंड में डेमोग्राफी का संकट कोई काल्पनिक डर नहीं है, बल्कि सरकारी आँकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि राज्य में आदिवासियों का प्रतिशत लगातार घट रहा है, जबकि धर्मांतरित ईसाइयों और विशेषकर सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठियों की आबादी अप्रत्याशित रूप से बढ़ रही है। साल 2011 की जनगणना के मुताबिक झारखंड में जनजातियों की कुल संख्या लगभग 86.45 लाख है, जो राज्य की कुल आबादी का करीब 26.2% है।
वहीं पूरे देश की बात की जाए तो जनजातीय समुदाय की कुल जनसंख्या मात्र 10.45 करोड़ के आसपास है, जो देश की कुल आबादी का लगभग 8.6% है। झारखंड में कुल 32 जनजातियाँ हैं, जिनमें संथाल उरांव, मुंडा , कोल, माहली, हो प्रमुख हैं। संथाल यहाँ की सबसे बड़ी जनजाति हैं। संथाल परगना में इनकी आबादी सर्वाधिक है।
आजादी के समय और उसके बाद के दशकों के आँकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन करें, तो पता चलता है कि झारखंड के गठन के समय जनजातीय लोगों की आबादी का जो अनुपात था, वह अब घटकर मात्र 26 फीसदी के आसपास सिमट गया है। इसके विपरीत ईसाई और मुस्लिम आबादी के विकास की दर सामान्य से कहीं अधिक रही है। अगर धर्मांतरण और घुसपैठ की रफ्तार यही रही, तो आने वाले कुछ दशकों में जनजातीय समाज अपनी ही गृह-भूमि पर अल्पसंख्यक बन जाएगा।
धर्मांतरण करा कर नष्ट किया जा रहा जनजातीय जीवन शैली
जनजातीय लोगों की जन्म से लेकर विवाह और मृत्यु तक जीवनशैली खास तरह की होती है। जन्म, नामकरण, विवाह और दूसरे अहम पड़ावों पर सामाजिक प्रक्रियाएँ मांझी परगना, नायके, पाहन, मानकी, मुंडा, पड़हा राजा आदि पूरी करवाते हैं। इन मौकों पर जाहेरस्थान, सरना स्थल, देशाउली, मांझी थान जाकर मरांग बुरु, सिंगबोगा की पूजा की जाती है। हजारों सालों से ये चलता आ रहा है।
जब आदिवासी प्रकृति पूजक होते हैं तो झारखंड में 5,000+ चर्च क्यों बनाये गए हैं? वहां मरांग बुरु या सिंगबोंगा की पूजा होती है क्या? pic.twitter.com/4kzZfxmD6G
सनातन धर्म ने कभी भी इसमें हस्तक्षेप नहीं किया। अगर ऐसा होता तो जनजातीय परंपरा मिट चुकी होती। उनकी संस्कृति उजड़ गई होती। लेकिन 18वीं शताब्दी में आए मिशनरियों ने इसे काफी हद तक बदल दिया। धर्मांतरण की वजह से इन स्थानों पर जनजातीय आस्था कम हो गई है। गाँवों में नए-नए चर्च उग आए हैं। इसमें प्रार्थना होती है और भोले भाले जनजातीय लोगों को वहाँ बहला-फूसला कर धर्मांतरण कराया जाता है। आज जिस रफ्तार से इन क्षेत्रों में धर्मातरण कराया जा रहा है। अगर ये नहीं रुकी तो जनजातीय संस्कृति खत्म हो जाएगी।
हजारों सालों से जनजातीय- सनातन का रिश्ता आपसी मदद सहयोग और सह-अस्तित्व का रहा है। सनातनियों ने कभी भी लालच देकर या साजिश कर जनजातीय लोगों को धर्मांतरण के लिए मजबूर नहीं किया। ये खुद को जनजातीय नहीं बताते हैं और न ही आरक्षण समेत दूसरे सरकारी लाभ छीनने की कोशिश करते हैं। इनलोगों ने कभी भी जनजातीय अधिकार नहीं छीने। जल-जंगल-जमीन पर जनजातीय लोगों का ही वर्चस्व रहा।
मिशनरियों ने आस्था पर पहुँचाई चोट
ईसाई और जनजातीय संस्कृति में कोई समानता नहीं है। 1845 में मिशनरियों ने जनजातीय क्षेत्रों में ईसाइयत का प्रचार शुरू किया। इन 180 सालों में इनलोगों ने इनकी परंपरा और धार्मिक आस्था पर चोट किया। इनके अस्तित्व को मिटाने की कोशिश की। यही वजह है कि झारखंड के कई हिस्सों में जाहेरस्थानों और सरना स्थलों पर ताला लग गया है। वहाँ धर्मांतरण की वजह से कोई पूजा करने नहीं जाता। यहाँ की जीवनशैली, रीति रिवाज, भाषा, संस्कृति जनजातीय पहचान सबकुछ बदल गया है।
कई अफ्रीकी देशों और लैटिन अमेरिकी देशों और आइलैंड में जनजातीय समुदाय की परंपरा और संस्कृति पूरी तरह बदल गई है। चाहे केन्या की संबुरु जनजाति हो या ब्राजील की वाई-वाई जनजाति, अयोरओ जनजाति सब अपनी सभ्यता-संस्कृति भूल चुके हैं और ईसाइयत के रंग में रंग गए हैं। मिशनरी भारत में भी यही करना चाहते हैं। धर्मांतरण कर पूरी जीवन शैली बदलना चाहते हैं।
ईसाईयों को अल्पसंख्यक का दर्जा भारत के संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत दिया गया है। उसके मुताबिक ये अपनी शिक्षण संस्थानों पर माइनॉरिटी संस्थान लिखते भी हैं। लेकिन जैसे ही फायदा लेने का वक्त आता है, ये खुद को जनजातीय कहने लगते हैं। जनजातीय आरक्षण का लाभ लेकर नौकरी खाते हैं। उनकी दूसरी सुविधाओं का सुख भोगते हैं।
सबसे बड़ी बात है कि जनजातीय आरक्षित सीटों पर चुनाव भी लड़ते हैं। इस पर रोक लगाना जरूरी है। अगर किसी ने अपनी इच्छा से धर्मांतरण किया है, तो उसके ये पता होना चाहिए कि वे अब जनजातीय सुविधाओं का लाभ नहीं उठा सकते। उनकी कटैगरी ‘अल्पसंख्यक’ की है।
चर्च और मस्जिदों के निर्माण के लिए जमीन कैसे मिली
धर्मांतरण समाज के अस्तित्व से जुड़ा एक सामाजिक मुद्दा है। इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन हकीकत है कि वोटबैंक की राजनीति करने वाली पार्टियाँ इन्हें ऐसे ही चश्मे से देखती हैं और धर्मांतरण का विरोध नहीं करती। झारखंड का जनजातीय समुदाय बिरसा मुंडा, सिद्धू कान्हू, पोटो हो, वीर टाना भगग और वीर तेलंगा खड़िया जैसे महापुरुषों के दिखाए गए राह पर चलते हुए अगर अपनी पहचान नहीं बचा पाता है तो उसका अस्तित्व भी मिट जाएगा।
झारखंड में हजारों चर्च और मस्जिद बन गए हैं। जनजातीय समुदाय से जुड़ी सीएनटी-एसपीटी एक्ट के तहत जनजातीय लोगों की जमीन किसी को भी ट्रांसफर नहीं किया सकता। ऐसे में इनके गाँवों में चर्च और मस्जिद कैसे बन गए? आखिर इन्हें जमीन किसने दिए।
चंपई सोरेन का यह सवाल सीधे तौर पर शासन और प्रशासन को कटघरे में खड़ा करता है कि जब कानूनन जमीन का ट्रांसफर हो ही नहीं सकता, तो झारखंड के आदिवासी गाँवों में हजारों की संख्या में भव्य चर्च और विशाल मस्जिदें कैसे बन गईं? आखिर इन अल्पसंख्यक मजदही स्थलों के निर्माण के लिए जमीन किसने उपलब्ध कराई? यह विशुद्ध रूप से अल्पसंख्यक संस्थान हैं, जिनका आदिवासियों की मूल संस्कृति से कोई लेना-देना नहीं है। ऐसे में जनजातीय समुदाय की सुरक्षित जमीन इन संस्थाओं के पास कैसे स्थानांतरित हो गई?
चंपई सोरेन ने माँग की है कि इस पूरे भू-घोटाले और जमीनों के अवैध हस्तांतरण की एक उच्च स्तरीय, निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए ताकि यह साफ हो सके कि इसके पीछे कौन सा बड़ा सिंडिकेट और प्रशासनिक मिलीभगत काम कर रही है।
1845 में झारखंड में आया ईसाई मिशनरी
झारखंड में ईसाई मिशनरियों का आगमन 1845 में हुआ था। रेवरेंड फादर गोस्नर के नेतृत्व में जर्मनी से चार मिशनरी रांची पहुँचे। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज-कल्याण का झाँसा देकर क्षेत्र में ईसाइयत का प्रचार-प्रसार शुरू किया। मुंडा, उरांव और दूसरे संथान जनजातियों को इनलोगों ने टारगेट किया।
इसके बाद एंग्लिकन SPG मिशनरी 1869 में छोटानागपुर में घुसा। इसके अलावा कैथोलिक (जेसुइट) मिशनरी 1868 में इन क्षेत्रों में आया। 1885 में फादर कॉन्स्टेंट लिवेन्स के आगमन के बाद धर्मांतरण में तेजी आई। 1873 में खुंटपानी में 6 मुंडा परिवारों के 28 लोगों का कोलकाता से आए आर्क बिशप स्टांइस ने बपतिस्मा कराया था। खुंटपानी झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिला का हिस्सा है।
यहाँ एक शिलापट्ट भी है, जिस पर उन लोगों के नाम दर्ज हैं जो पहली बार ईसाई बने। इसकी स्मृति में हर साल 8 नवंबर को यहाँ एक ‘तीर्थ मेला’ लगता है। इसमें झारखंड और आसपास के प्रदेशों के ईसाई धर्मांतरित लोगों का जमावड़ा ही नहीं लगता, बल्कि अच्छी-खासी संख्या में विदेशों से भी रोमन कैथोलिक धर्मावलंबी आते हैं।
झारखंड की तरह छत्तीसगढ़ भी बना धर्मांतरण का अड्डा
खुंटपानी की तरह ही मदकू द्वीप पर भी ईसाइयत का मेला लगता है। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले का यह द्वीप शिवनाथ नदी की जलधारा से घिरा है। इसी द्वीप पर माण्डूक्य ऋषि ने ‘मुण्डकोपनिषद्’ की रचना की जिससे ‘सत्यमेव जयते’ निकला। हर साल फरवरी में इस द्वीप पर सबसे बड़ा जमावड़ा लगता है। यह जमावड़ा सप्ताह भर चलने वाले ‘मसीही मेला’ को लेकर लगता है। यह मेला साल 1909 से लग रहा है।
छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के खड़कोना गाँव में भी एक शिलापट्ट लगी हुई है, जिस पर 56 लोगों के नाम हैं। 21 नवंबर 1906 को बपतिस्मा हुआ था। इस गाँव में धर्मांतरित लोगों का सालाना कार्यक्रम होता है। अब ये हाल है कि जिले का हर चौथा व्यक्ति ईसाई है। डेमोग्राफी काफी बदल चुका है। इस क्षेत्र में राजपरिवार दिलीप सिंह जूदेव के परिवार का काफी असर है इसके बावजूद धर्मांतरण काफी तेजी से हुआ है। राज परिवार के विरोध और घर-वापसी अभियानों के बावजूद मिशनरियों ने पैसे और रसूख के बल पर यहाँ की पूरी डेमोग्राफी बदल कर रख दी है।
आपदा में भी अवसर तलाश लेते हैं ईसाई मिशनरी
बाइबिल का हर भाषा में अनुवाद करने वाली अनफोल्डिंग वर्ल्ड नाम की मिशनरी के सीईओ डेविड रीव्स ने 2021 में कुछ चौंकाने वाले खुलासे किए थे। उन्होंने बताया था कि कोरोना काल में करीब 1 लाख लोगों को ईसाई बनाया गया। हर चर्च को 10 गाँवों में प्रार्थना आयोजित करने की जिम्मेदारी दी गई थी। महामारी के दौरान जब लोगों का मिलना-जुलना नहीं था तो फोन और व्हाट्सएप्प से उन तक प्रार्थनाएँ पहुँचाई गईं।
रीव्स के अनुसार भारत में 25 साल में जितने चर्च बने थे, उतने अकेले कोरोना काल में बनाए गए। भाजयुमो से जुड़े अभिषेक गुप्ता ने ऑपइंडिया को बताया था, “ईसाई मिशनरी इसी तरह लैंड जिहाद करती है। जहाँ खाली जगह दिखी ये क्रॉस गाड़ देते हैं। चर्च बना लेते हैं। कुछ समय बाद प्रशासनिक मिलीभगत से वहाँ जाने का रास्ता तैयार हो जाता है और फिर प्रार्थना होने लगती है। बाद में आप जितना विरोध कर लें प्रशासन कब्जा नहीं हटाता।”
अमेरिका का एक और संगठन जोशुआ प्रोजेक्ट की शुरुआत 1995 में हुई थी। एक रिपोर्ट के अनुसार यह संगठन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में जनजातीय लोगों को धर्मांतरित कर उनकी जमीन पर चर्च बना रहा है। 2011-12 में इन चारों राज्यों में लगभग 12,000 चर्च थे जो अब बढ़कर 25,000 को पार कर चुके हैं। यह सब उन इलाकों में हो रहा है जहाँ बाहरी व्यक्ति जमीन तक नहीं ले सकते, लेकिन मिशनरियाँ लगातार अपना प्रभाव बढ़ा रही हैं।
जोशुआ प्रोजेक्ट केवल जनजातीय समूह तक ही नहीं सिमटा हुआ है। भारत की अलग-अलग जातियों और जनजातीय समूहों के आँकड़े इकट्ठा किए हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट के पास देश की 2272 जातियों-जनजातियों के आँकड़े हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट बताता है कि वह इनमें से अभी 2041 जातियों तक नहीं पहुँच सका है। वहीं 103 जातियों में ईसाइयत का प्रभाव डालने में यह सफल रहा है। इनमें एक छोटी संख्या में लोग ईसाइयत को मानने लगे हैं। वहीं 128 जाति समूह ऐसे हैं, जिनमें बड़े पैमाने पर ईसाइयत की घुसपैठ हो गई है।
जोशुआ प्रोजेक्ट का डाटा बताता है कि उसने कई जातियों में 10%-100% तक ईसाइयत में धर्मांतरण करवाया है। जिन जातियों में बड़ी संख्या में ईसाइयत में धर्मांतरण हुआ है, उनको अलग नाम दे दिया गया है। तेलंगाना के मडिगा और माला समुदाय में 21000 की आबादी को ईसाइयत में बदल कर उसे ‘आदि क्रिश्चियन’ का नाम दिया गया है। बोडो समुदाय की 15.7 लाख आबादी में से लगभग 1.5 लाख आबादी को ईसाइयत में लाया गया गया है।
ईसाई मिशनरियाँ भारत के झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भी ठीक इसी भयावह पैटर्न को दोहराना चाहती हैं। धर्मांतरण के कारण आज झारखंड के कई गाँवों में सदियों पुराने जाहेरस्थानों और सरना स्थलों पर सन्नाटा पसर गया है, कई जगहों पर तो ताले लग चुके हैं क्योंकि वहाँ अब पूजा करने वाला कोई बचा ही नहीं है। जनजातीय लोगों की पारंपरिक जीवनशैली, उनकी अनूठी भाषा, लोकगीत, रीति-रिवाज और उनकी मूल पहचान को ईसाइयत के चर्च तंत्र ने पूरी तरह निगल लिया है।
पहले ईसाई धर्मांतरण, अब मुस्लिमों की घुसपैठ
ईसाई मिशनरियों के धर्मांतरण से सर्वाधिक प्रभावित इलाकों में झारखंड का संथाल परगना है। इतना प्रभावित कि इस क्षेत्र में ST से ईसाई बने लोगों का जन प्रतिनिधि चुना जाना सामान्य सी बात है।
संथाल परगना इस समय बांग्लादेशी-रोहिंग्या मुस्लिमों की घुसपैठ से डेमोग्राफी बदलाव को लेकर चर्चित है। इस क्षेत्र से सरना (जनजातीय समाज का धार्मिक स्थल) विलुप्त हो रहे हैं, मस्जिद-मजार उग रहे हैं। जनजातीय समाज अपनी जमीन-रोजगार से लेकर बेटी तक गँवा रहे हैं।
घुसपैठिए पहले गाँव में आते हैं। किसी तरह रहना शुरू करते हैं। किसी जनजातीय महिला को प्रेमजाल में फँसा कर निकाह करते हैं और फिर उसकी संपत्ति पर कब्जा कर लेते हैं। हर गाँव में इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है और बढ़ रहा है मस्जिदों-मदरसों की संख्या। ईसाइयत से प्रभावित झारखंड में अब इस्लाम का जनजातीय क्षेत्रों में भी तेजी से फैलाव हो रहा है।
केंद्र सरकार ने जनजातीय समुदाय की विशिष्ट संस्कृति, उनकी अनोखी परंपराओं और उनके व्यक्तिगत कानूनों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए उन्हें समान नागरिक संहिता (UCC) के दायरे से बाहर रखने का निर्णय लिया है। जब असम में इसे लागू किया गया, तो वहाँ भी जनजातीय समुदायों को विशेष छूट दी गई। सरकार का यह कदम यह दिखाता है कि देश के कानून निर्माता भी आदिवासियों की विशिष्ट जीवनशैली को संरक्षित करना चाहते हैं।
लेकिन चंपई सोरेन का कहना है कि एक तरफ तो सरकारें कानून बनाकर आदिवासियों को संरक्षित कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर पैठ बनाकर जिस तरह से मिशनरियों और घुसपैठियों द्वारा आदिवासियों का धड़ल्ले से धर्मांतरण कराया जा रहा है, उससे कानून का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो रहा है। अगर यह धर्मांतरण नहीं रुका, तो वह दिन दूर नहीं जब कागजों पर तो कानून रहेगा, लेकिन जमीन पर अपनी विशिष्टता बचाने वाला कोई मूल आदिवासी बचेगा ही नहीं।
झारखंडी अस्मिता का सबसे बड़ा सवाल
यह मुद्दा किसी दलगत राजनीति या वोटबैंक का नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर ‘झारखंडी अस्मिता’ और इस वीर भूमि के महान स्वतंत्रता सेनानियों भगवान बिरसा मुंडा, सिद्धू-कान्हू, पोटो हो, वीर टाना भगत और वीर तेलंगा खड़िया की विरासत को बचाने का है।
यदि आज का जनजातीय समाज इन महापुरुषों के दिखाए रास्ते पर चलते हुए अपनी मूल पहचान, अपनी सरना संस्कृति और अपनी प्रकृति पूजक जीवनशैली को नहीं बचा पाता है, तो आने वाले समय में झारखंड से आदिवासियों का नामोनिशान और उनका गौरवशाली अस्तित्व हमेशा के लिए मिट जाएगा। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने इसी संजीदगी और दूरदर्शिता के साथ इस मुद्दे को उठाकर पूरे देश का ध्यान झारखंड के इस गंभीर संकट की ओर खींचा है।