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फीफा विश्व कप 2026: मिकेल मेरीनो के जादुई गोल से स्पेन क्वार्टर फाइनल में, पुर्तगाल की हार के साथ रोनाल्डो का सपना टूटा; अब मेस्सी और सालाह में टक्कर

नासिर आज़मी का एक बेहतरीन शेर है जो मेरे दिल के बेहद करीब है।

दाएम आबाद रहेगी दुनिया

हम न होंगे कोई हम सा होगा।

नासिर साहब की यह बात सही तो है परन्तु हर किसी के जीवन में कुछ लोग ऐसे जरूर होते हैं जिनके जाने के बाद उनकी कमी कभी भी पूरी नहीं हो पाती। खेल की दुनिया में भी ऐसे कुछ खिलाड़ी हुए हैं जो खेलप्रेमियों की स्मृतियों में हमेशा के लिए जिंदा रहते हैं। फुटबॉल प्रेमियों के लिए आज भी पेले, माराडोना, योहान क्रुएफ, प्लातीनी आदि खिलाड़ी दिलों में बसते हैं। ऐसे ही कई सितारा खिलाड़ियों को इस विश्व कप में हम सब एक अंतिम बार खेलते हुए देख रहे थे। लूका मॉद्रिच, नेमार, गुईलेर्मो ओचोआ आदि ऐसे ही खिलाड़ी हैं जो अब आगे कभी हमें फुटबॉल खेलते हुए नहीं दिखाई देंगे। यह विश्व कप इसलिए भी कई मायनों में खास है।

खैर, बात करते हैं बीती रात (6 जुलाई 2026) हुए मुकाबलों की।

बीती रात निर्धारित समय पर भारतीय समयानुसार साढ़े बारह बजे इस राउंड का सबसे ज्यादा चर्चा में रहा मुकाबला अनुभवी रेफरी एंथोनी टेलर की सीटी बजते ही डलास स्टेडियम में शुरू होता है। मौजूदा यूरो चैंपियन स्पेन का सामना युएफा नेशन्स लीग के फाइनल में पेनाल्टी शूटआउट में उन्हें हराकर ट्राफी जीतने वाली पुर्तगाल की टीम से था।

दोनों ही टीमें काफी दमदार खिलाड़ियों की खेप लेकर इस मैच में उतरी थीं। पुर्तगाल का मिडफील्ड तो खैर फिलहाल संपूर्ण जगत में सब से खास है ही। मिडफील्ड में ब्रुनो फर्नानदेज़ के संग मौजूद थे पीएसजी के साथ लगातार दो चैंपियन्स लीग खिताब जीत चुके विटिन्हा और चौबीस वर्षीय सनसनीखेज खिलाड़ी ज़ाओ नेवेज़। अटैक का दारोमदार था होआओ फेलिक्स, क्रिस्टियानो व पेड्रो नेटो पर। वहीं बेंच पर लियाओ, बर्नार्डो सिल्वा, कोंकेकाओ, दिओगो दालो, ट्रिंकाओ, नूनेस व नेवेज़ जैसे अनुभवी खिलाड़ी मौजूद थे, जो जीत के लिए भूखे हैं।

वहीं कोच लुई डे ला फुएन्ते ने 4-1-2-3 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान पर उतारा। मिडफील्ड में रोड्री के संग पेड्री व दानी ओल्मो मौजूद थे। आगे अटैकिंग लाइन में सेंट्रल फॉरवर्ड ओयारजाबाल का साथ देने के लिए विंगर्स के रूप में एलेक्स बाएना व लामीन यमाल को मैदान पर उतारा गया, जबकि नीको, फेराँ तोरे, गावी, मिकेल मेरीनो, विक्टर मुनोज़, फैबियान रुईज़ जैसे मजबूत खिलाड़ी बेंच पर मौजूद थे। हालाँकि चोट से उबर रहे नीको को मैदान में देखने की उम्मीदें कम ही थीं।

दोनों ही टीमें मैदान में आती हैं। पुर्तगाल की टीम अपनी गहरी लाल रंग की जर्सी में मैदान पर उतरी थी। वहीं स्पेनिश टीम ने अपनी क्रीम/सफेद रंग की बेहद प्यारी अवे जर्सी पहनी थी। रेफरी से इशारा मिलते ही मैच शुरू होता है।

शुरुआती क्षणों से ही स्पेनिश टीम पुर्तगाल पर शिकंजा कस देती है। तीसरे मिनट में ही मिकेल ओयारजाबाल पुर्तगाली गोलकीपर की परिक्षा लेते हैं। मगर गेंद निशाने से दूर रह जाती है। स्पेन का प्रयास था कि मैच के शुरुआती पलों से ही पुर्तगाली मिडफील्ड का दम घोंट दिया जाए जिसके चलते वह अपनी अटैकिंग लाइन के खिलाड़ियों तक गेंद पहुँचा ही न पाएँ। वह काफी हद तक इसमें सफल होते भी नजर आते हैं। मगर बारहवें मिनट में क्रिस्टियानो रोनाल्डो स्पेनिश पोस्ट पर एक जानदार किक लगाते हैं। मगर स्पेनिश गोलकीपर यह मजबूत शॉट रोक लेते हैं। जवाबी कार्रवाई करते हुए लामीन यमाल पुर्तगाली गोलपोस्ट पर एक हमला करते हैं, मगर स्कोर अब भी 0-0 ही रहता है।

पहले हाइड्रेशन ब्रेक तक स्कोर बराबरी पर ही रहता है। शुरुआती दबाव को बेहतरीन तरीके से झेलकर पुर्तगाल अब मैच में अपना खेल खेलने लगे थे। होआओ फेलिक्स व नूनो मेंडेस लगातार बाईं ओर से स्पेन पर हमले करने लगते हैं। यह दोनों ही खिलाड़ी मिलकर लामीन यमाल को बांध कर रख देते हैं। वह उन्हें अपने गोलपोस्ट की ओर बढ़ने ही नहीं दे रहे थे।

स्पेनिश लेफ्ट बैक पेड्रो पोर्रो गोल लगाने का एक जोरदार प्रयास करते हैं मगर उन्हें सफलता नहीं मिलती। एलेक्स बाएना मैदान की बांई फ्लैंक से स्पेन के लिए मौके बनाने के प्रयास जरूर कर रहे थे मगर अब पुर्तगाल स्पेनिश मिडफील्ड को बिल्कुल बाँध कर रखे हुए थी। इकतालीसवें मिनट में नूनो मेंडेस एकबार फिर एक बेहद शानदार किक लगा कर गोल स्कोर करने का प्रयास करते हैं मगर गेंद स्पेनिश डिफेंडर से छिटक कर मैदान से बाहर चली जाती है। हाफ टाइम की समाप्ति पर 0-0 के स्कोर पर दोनों टीमें डगआउट की दिशा में बढ़ती हैं।

उम्मीदों के विपरीत अब तक यह मैच बेहद नीरस रहा था। दोनों ही टीमें कोई खास मूव्स बनाने में सफलता हासिल नहीं कर सकी थीं। खैर, दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। दोनों टीमें मैदान में वापस उतरती हैं। रेफरी सीटी बजा कर खेल आगे बढ़ाते हैं। मैच के चौवनवें मिनट में कुछ ऐसा होता है जो आगे के मैच का रुख मोड़ सकता था। वर्तमान समय में विश्व के सबसे शानदार लैफ्ट बैक पुर्तगाल के नूनो मेंडेस दर्द से कराहते नजर आते हैं। उनको हैमस्ट्रिंग में खिंचाव के चलते मैदान से बाहर जाना पड़ा। नेल्सन सेमेडो चोटिल नूनो मेंडेस की जगह मैदान के भीतर लाए जाते हैं। खेल आगे बढ़ता है।

59वें मिनट में क्रिस्टियानो पुर्तगाल के लिए जबकि एक मिनट पश्चात ही स्पेन के लिए पेड्री विरोधी गोलपोस्ट पर एक शॉट लगाते हैं। दोनों ही खिलाड़ी गेंद को निशाने पर रखने में असफल रहते हैं। तुरंत ही लामीन यमाल भी एक शॉट लेते हैं, मगर यह प्रयास भी बचा लिया जाता है। कुछ ही देर में एलेक्स बाएना पुर्तगाली गोलपोस्ट पर एक शॉट लेते हैं, मगर वह गोल स्कोर नहीं कर पाते। खेल यूँ ही मंद गति से आगे बढ़ता रहता है। पुर्तगाल की तुलना में स्पेन ज्यादा अटैक करती नजर आ रही थी मगर टीम में एक अदद सेंट्रल फॉरवर्ड की कमी साफ खलती नजर आ रही थी। यह कैसा अजीब संयोग है कि स्पेन की माटी अब डेविड विया व फर्नान्दो तोरेस जैसे खिलाड़ी पैदा नहीं कर पा रही है।

70वें मिनट में पुर्तगाल के कोच दो परिवर्तन करते हुए मैदान में नवीन ऊर्जा का प्रवाह करने का प्रयास करते हैं।

पांच मिनट बाद ही स्पेनिश कोच लुई डे ला फुएन्ते भी एलेक्स बाएना की जगह फेराँ तोरेस को मैदान में उतारते हैं।

80 मिनट की समाप्ति पर भी दोनों ही टीमें गोल दागने में असफल रही थीं। अब यह मैच एक्स्ट्रा-टाइम की ओर बढ़ता दिख रहा था। पुर्तगाल के कोच रॉबर्टो मार्टीनेज़ कोंकेकाओ व बर्नार्डो सिल्वा को मैदान में उतारते हैं। कोंकेकाओ इस पूरे टूर्नामेंट में हमेशा बेंच से मैदान में आकर काफी असरकारी नजर आए थे। आज फिर एक बार तमाम समर्थकों को उनसे उम्मीद थी कि वह टीम के लिए एक घातक मौका बनाएं।

85वें मिनट तक भी जब स्कोर 0-0 पर ही अटका था और मैच एक्स्ट्रा टाइम की ओर बढ़ रहा था तो स्पेन के कोच पेड्री व दानी ओल्मो को बाहर बुलाकर फैबियान रुईज़ व मिकेल मेरीनो रुपी दो अनुभवी मिडफील्डरों को मैदान के भीतर लाते हैं। उनका यह कदम एक बेहद शानदार सामरिक चातुर्य की अनुभूति कराता है।

90+1 मिनट में फेराँ तोरेस एक मेस्सीस्क्यू ( मेस्सी की भाँति) अंदाज में तीन-चार पुर्तगाली डिफेंडरों को चकमा देते हुए गेंद को साथी खिलाड़ी मिकेल मेरीनो की ओर बढ़ाते हैं। मिकेल गेंद को बिना कोई ग़लती किए बेहतरीन तरीके से जाल के भीतर पहुँचा देते हैं। अंतिम क्षणों में स्पेन उनके इस गोल के दम पर करो या मरो वाले इस मैच में अहम बढ़त ले लेती है। कुछ ही पलों में मैच समाप्त हो जाता है। स्पेन क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेती है। क्रिस्टियानो रोनाल्डो का विश्व कप जीतने का ख्वाब टूट जाता है। पूरा स्टेडियम लाल रंग के लहराते झंडों से पट जाता है। एस्पाना-एस्पाना के नारे लगाते स्पेनिश समर्थकों की खुशी में सारा स्टेडियम डूब गया था। मिकेल मेरीनो द्वारा अंतिम क्षणों में दागा गया यह गोल इस विश्व कप के मैचों में किसी टीम द्वारा अंतिम घड़ी में दागा गया दसवाँ गोल था।

एक मिडफील्डर होने के बावजूद मिकेल मेरीनो ने यूरो कप व यूएफा नेशन्स लीग के सेमीफाइनल मुकाबलों में भी स्पेन के लिए गोल स्कोर किए थे। और आज तो उनके इस ख़ास गोल के चलते ही ला रोजा आज पुर्तगाल व क्रिस्टियानो रोनाल्डो को घर की राह दिखा कर क्वार्टर फाइनल में अपनी जगह पक्की कर चुकी थी। वह हमेशा ही एक बेहद क्लच खिलाड़ी रहे हैं जो बेंच से आकर भी स्पेन के लिए मैच बदल देते हैं।

इसके पश्चात अगला मैच आज सुबह साढ़े पाँच बजे सिएटल स्टेडियम में बेहतरीन फॉर्म में चल रही मेजबान अमेरिकी टीम बनाम बेल्जियम का था। यह भी एक रोचक मुकाबला होगा। इस मैच से पहले इस बात की चर्चा चल रही थी कि आखिर क्यों डोनाल्ड ट्रम्प के कहने पर फीफा ने पिछले मैच में रेड कार्ड पाने वाले अमेरिकी सेंट्रल फॉरवर्ड फोलारिन बालोगन का बैन हटा दिया था। बेल्जियम पिछले मैच में बेहद शानदार तरीके से लड़ते हुए अंतिम क्षणों में स्कोर किए गोलों की बदौलत यहाँ पहुँची थी। अमेरिका का अबतक का सफर बेहद शानदार रहा था। उन्हें अपने घरेलू समर्थकों का साथ भी मिलने जा रहा था। हजारों दर्शक आज अपनी टीम का हौसला बढ़ाने हेतु सीएटल स्टेडियम में मौजूद थे। खैर दोनों ही टीमें मैदान में उतरती हैं और खेल शुरू होता है।

यह मैच बेहद एकतरफा रहता है। बेल्जियम की टीम ने अपने अनुभव के दम पर अमेरिकी टीम को मैदान में कुछ करने ही नहीं दिया। बेल्जियम मैच के शुरुआती पलों से ही विरोधी गोलपोस्ट पर हमले करती रहती है। कुल पन्द्रह शॉट लगाए जाते हैं जिसमें से सात निशाने पर रहे। इसके चलते चार्ल्स डि किटिलीरी के दो व वानाकेन और लुकाकू के एक एक गोल के बदौलत बेल्जियम ने शानदार अंदाज में 4-1 से यह मैच जीत लिया और अब क्वार्टर फाइनल में उनका सामना होगा स्पेन की टीम से।

और आगे आज रात फीफा विश्व कप के गत विजेता अटलांटा स्टेडियम में अपने राउंड ऑफ 16 मुकाबले में मिस्र का सामना करने उतरेंगे। गौरतलब है कि मिस्र की ओर से विपक्षी दल को उकसाने हेतु कुछ दिनों से बयानबाजी भी चल रही है। हाल ही में प्रेस-वार्ता में उनके असिस्टेंट कोच ने बयान दिया था कि क्या हुआ अगर उनके पास मेस्सी है। हमारे पास मोहम्मद सालाह है। हम मेस्सी को नहीं देखते। हम तो अपने खिलाड़ियों को निर्देश देते हैं कि वो मैदान में जाएँ और बिन यह देखें कि उनके सम्मुख कौन खड़ा हे, अपना खेल खेलें। और हमारे पास कुल छब्बीस खिलाड़ी हैं, जो सभी हमारी नज़रों में हमारे लिए मेस्सी हैं।

ऐसे ही मेस्सी को लेकर कई और बयान भी किये गए। इसके चलते इस मैच से पूर्व माहौल गरमा गया है। अर्जेंटीना की टीम अपने पिछले मुकाबले में काबो वर्दे के खिलाड़ियों के सामने संघर्ष करती नजर आई थी। काबो वर्दे ने अपनी जिद से सारी दुनिया को बतला दिया था कि इस टीम की भी कई कमियाँ हैं और इस टीम को भी हराया जा सकता है। कहते हैं वीर भोग्य वसुंधरा।

आज रात एक दफा फिर जंगल के राजा को फिर साबित करना होगा कि आखिर क्यों वो इस जंगल का राजा है। आज एक बार फिर लियोनेल मेस्सी का जादू हमें देखने को मिलेगा। इससे पहले कि वो सदैव के लिए इस खेल को अलविदा कह दें, हमें उनको खेलते हुए देखने का कोई भी मौका हाथों से जाने नहीं देना चाहिए। मगर मिस्र भी निश्चित ही बुलंद हौसलों के संग मैदान में उतरेगी।

मोहम्मद सालाह आज रात मैदान में बेहतरीन प्रदर्शन कर निश्चित ही अपने देश को खुशियाँ देना चाहेंगे। अर्जेंटीना का किसी भी उलटफेर का शिकार होने से बचने हेतु यह जरूरी है कि अबतक खामोश रहे उसके दो स्टार फॉर्वर्ड लाउतारो मार्टिनेज व हूलियन अल्वारेज़ जल्द से जल्द फॉर्म में लौटें और फॉरवर्ड लाइन में लियोनेल मेस्सी का अच्छा साथ निभाएं।

इसके बाद अगला मैच देर रात भारतीय समयानुसार रात डेढ़ बजे वैंकूवर में खेला जाना है। इस मैच में स्विट्जरलैंड का सामना कोलंबिया की टीम से होगा। यह दोनों ही टीमें अलग विचारधारा के साथ फुटबॉल खेलती नजर आती हैं लेकिन दोनों ही टीमों ने अबतक इस विश्व कप में अच्छा प्रदर्शन कर अपने समर्थकों का दिल जीता है। यहाँ कोई भी एक टीम फेवरेट नहीं होगी, जो कल रात नब्ज़ पर काबू रखते हुए अच्छा खेल जाएगा, वह क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेगा।

कल हमने नेमार को फुटबॉल की दुनिया को अलविदा कहते देखा। हमारी पीढ़ी के जो लोग फुटबॉल को लेकर पागलपन दिलों में लिए फिरते हैं, उनका 1998 या 2002 विश्व कप के दौरान फुटबॉल से पहला राब्ता हुआ था। 2002 के विश्व विजेता ब्राजीली टीम को जिसने अपने चिर-परिचित अंदाज में खेलते देखा था वह फिर किसी और टीम से दिल लगा ही नहीं सकता था। उनका खेल बेहद खूबसूरत हुआ करता था। उसमें लातिनी जादू और स्ट्रीट स्टाइल फुटबॉल की महक हुआ करती थी। नेमार उस अंदाज में खेलने वाले अंतिम खिलाड़ी थे।

वैश्विक फुटबॉल ने जब बाजारवाद के आगे झुक कर यूरोपीयन चेहरे को अपना लिया, तब ही से ब्राजीली टीमें भी अपना सांबा भूल बैठीं। अफसोस अब सांतोस के हरे मैदानों से कोई नेमार निकल कर नहीं आएगा। वह अपनी तरीके के आखिरी खिलाड़ी थे। उनके साथ फुटबॉल का लातिनी जादू भी अब फिर कभी देखने के लिए नहीं मिलेगा।

कौन जाने क्या पता बीती रात स्पेन के हाथों मिली हार के पश्चात टूर्नामेंट से बाहर हो गई पुर्तगाल के इकतालीस वर्षीय स्टार खिलाड़ी क्रिस्टियानो रोनाल्डो भी जल्द फुटबॉल को अलविदा कह दें। शायद कल हमने उनका अंतिम नृत्य देखा हो।

Cherish them, while they are there. Football will never be this beautiful.

भारत और इंडोनेशिया मिलकर बदलेंगे समंदर का नक्शा, जानिए साबांग और ग्रेट निकोबार के नए गठजोड़ से क्यों परेशान है चीन

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया की आधिकारिक यात्रा पूर्वी हिंद महासागर और वैश्विक समुद्री व्यापार के इतिहास में एक नया अध्याय लिखने जा रही है। जकार्ता के मर्देका पैलेस में राष्ट्रपति प्रबोवो के साथ हुई द्विपक्षीय वार्ता में रक्षा, खाद्य सुरक्षा और डिजिटल भुगतान पर सहमति के साथ-साथ इंडोनेशिया के साबांग बंदरगाह को भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के पूरक हब के रूप में विकसित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया गया।

इस यात्रा के दौरान रक्षा, खाद्य सुरक्षा, डिजिटल भुगतान प्रणालियों के एकीकरण और क्रिटिकल मिनरल्स पर व्यापक सहमति बनी है। लेकिन जिस एक दूरगामी और रणनीतिक फैसले ने पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का ध्यान सबसे ज्यादा अपनी ओर खींचा है, वह है इंडोनेशिया के रणनीतिक साबांग बंदरगाह को भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना के साथ एक पूरक समुद्री हब के रूप में विकसित करना।

दोनों देशों के राष्ट्रध्यक्षों ने इस बात पर पूर्ण सहमति जताई है कि साबांग बंदरगाह और भारत के अंडमान-निकोबार द्वीप समूह को जोड़ने वाले पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर पूर्वी हिंद महासागर में न केवल व्यापारिक कनेक्टिविटी को अभूतपूर्व बढ़ावा देंगे, बल्कि दोनों देशों को एक अटूट रणनीतिक सुरक्षा कवच भी प्रदान करेंगे।

भौगोलिक संयोग से भारत-इंडोनेशिया कंट्रोल करेंगे मलक्का स्ट्रेट का एंट्री प्वॉइंट

वैश्विक समुद्री व्यापार के नक्शे पर साबांग और ग्रेट निकोबार की भौगोलिक स्थिति किसी प्राकृतिक वरदान से कम नहीं है। इंडोनेशिया के सुमात्रा प्रांत के उत्तरी छोर पर वेह द्वीप पर स्थित साबांग और भारत का सबसे दक्षिणी बिंदु ग्रेट निकोबार एक-दूसरे से महज सौ समुद्री मील से भी कम दूरी पर आमने-सामने स्थित हैं। यह पूरा क्षेत्र मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी मुहाने पर बैठता है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त और संवेदनशील समुद्री गलियारों में से एक माना जाता है। हर साल इस संकरे समुद्री रास्ते से अस्सी हजार से अधिक विशाल व्यापारिक और ऊर्जा जहाज गुजरते हैं, जो पूरे एशिया को यूरोप, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका से जोड़ते हैं।

दुनिया का लगभग एक-चौथाई समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति (80,000 से अधिक विशाल व्यापारिक और ऊर्जा जहाज) इसी संकरे जलमार्ग के रास्ते से होती है। ऐसे में साबांग और ग्रेट निकोबार को एक साथ एक साथ पूरक हब के रूप में विकसित करने की भारत-इंडोनेशिया की साझा योजना का मतलब है कि इस महा-जलमार्ग के प्रवेश द्वार पर दो सबसे भरोसेमंद लोकतांत्रिक देशों की सीधी आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति होगी।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर भारत का नौ अरब डॉलर का मास्टरस्ट्रोक

भारत सरकार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार में लगभग नौ अरब डॉलर की भारी-भरकम लागत से एक विशाल और बहु-आयामी बुनियादी ढाँचा परियोजना विकसित कर रही है। नीति आयोग की देखरेख में चल रही इस ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना का मुख्य आधार गलाथिया बे इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल है। यह एक अत्याधुनिक डीप-वॉटर पोर्ट है जिसकी कंटेनर कार्गो क्षमता बेहद विशाल रखी गई है।

वर्तमान में भारत के पास इस क्षेत्र में गहरे पानी के बर्थ न होने के कारण देश का अधिकांश कंटेनर कार्गो कोलंबो, सिंगापुर या मलेशिया के पोर्ट क्लैंग के रास्ते रूट होता है, जिससे भारत को हर साल भारी वित्तीय और राजस्व का नुकसान उठाना पड़ता है। गलाथिया बे में बीस मीटर से अधिक की प्राकृतिक गहराई है, जो दुनिया के सबसे विशालकाय जहाजों को आसानी से संभालने की क्षमता रखती है।

इसके साथ ही इस मेगा-प्रोजेक्ट के तहत एक नया ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी बनाया जा रहा है, जो सालाना लाखों यात्रियों और कार्गो को संभालने में सक्षम होगा। इस पूरे हब को ऊर्जा देने के लिए एक आधुनिक गैस और सौर-आधारित बिजली घर और एक आधुनिक ग्रीनफील्ड टाउनशिप का निर्माण भी किया जा रहा है, जो आने वाले समय में वाणिज्य, पर्यटन और वैश्विक लॉजिस्टिक्स का एक बहुत बड़ा केंद्र बनकर उभरेगा।

साबांग और ग्रेट निकोबार का आर्थिक जुड़ाव अहम

इंडोनेशिया के रणनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चिंता रही थी कि भारत की ग्रेट निकोबार परियोजना उनके अपने साबांग मुक्त व्यापार क्षेत्र (Free Trade Zone) के लिए एक आर्थिक खतरा बन सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा ने इस नैरेटिव को पूरी तरह बदल दिया है।

सफल और टिकाऊ समुद्री अर्थव्यवस्थाएँ कभी भी अकेले या अलग-थलग रहकर काम नहीं करतीं, बल्कि वे हमेशा इंटर-कनेक्टेड नेटवर्कों के माध्यम से ही फलती-फूलती हैं। साबांग को साल 2000 में ही इंडोनेशिया सरकार ने फ्री ट्रेड एरिया और फ्री पोर्ट घोषित किया था, लेकिन विदेशी पूँजी निवेश की कमी और कमजोर लॉजिस्टिक्स के कारण यह क्षेत्र सुमात्रा द्वीप के पाँच करोड़ लोगों के लिए वह आर्थिक प्रवेश द्वार नहीं बन पाया, जिसकी कल्पना की गई थी।

अब भारत के ग्रेट निकोबार में हो रहे भारी निवेश के समानांतर जब साबांग को विकसित किया जाएगा, तो दोनों बंदरगाह एक-दूसरे के विरोधी बनने के बजाय पूरक साथी के रूप में काम करेंगे।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में चल रहे विशाल निर्माण कार्यों के लिए मुख्य भूमि भारत से संसाधन मंगाना बहुत महँगा पड़ता है, क्योंकि चेन्नई वहाँ से लगभग बारह सौ किलोमीटर दूर है। इसके विपरीत साबांग वहां से बेहद करीब है और कैंपबेल बे से इसकी दूरी महज 166 किलोमीटर है। ऐसे में इंडोनेशिया का सुमात्रा प्रांत सीमेंट, निर्माण सामग्री और कुशल श्रमशक्ति को बेहद कम लागत पर ग्रेट निकोबार भेज सकता है।

इसके अलावा दोनों बंदरगाह मिलकर आने-जाने वाले कार्गो जहाजों को रिफ्यूलिंग, मेंटेनेंस, वेयरहाउसिंग और ट्रांसशिपमेंट की संयुक्त सुविधाएँ दे सकते हैं। यदि भविष्य में किसी एक बंदरगाह पर ट्रैफिक का अत्यधिक दबाव बढ़ता है, तो दूसरा बंदरगाह एक बेहतरीन बैकअप के रूप में काम कर सकेगा, जिससे पूरे क्षेत्र की लॉजिस्टिक्स दक्षता कई गुना बढ़ जाएगी।

साबांग के विकास का इतिहास और भारत-इंडोनेशिया के ज्वॉइंड वर्किंग फोर्स की भूमिका अहम

भारत और इंडोनेशिया के बीच साबांग बंदरगाह को लेकर आधिकारिक और रणनीतिक बातचीत कोई नई बात नहीं है। इसकी वास्तविक शुरुआत मई 2018 में प्रधानमंत्री मोदी की पहली आधिकारिक इंडोनेशिया यात्रा के दौरान हुई थी, जब इंडोनेशिया के तत्कालीन समुद्री मामलों के समन्वय मंत्री लुहुत पंडजाइतन ने नई दिल्ली को साबांग के बुनियादी ढाँचे को विकसित करने के लिए औपचारिक रूप से आमंत्रित किया था। उसी समय दोनों देशों ने इंडो-पैसिफिक में समुद्री सहयोग पर एक ऐतिहासिक साझा दृष्टिकोण पत्र जारी किया था।

इसके तहत दोनों देशों ने एक ‘संयुक्त कार्य बल’ (Joint Task Force) का गठन किया। इस टास्क फोर्स की पहली बैठक 2019 में बांदा आचे (Aceh) में और दूसरी बैठक 2022 में पोर्ट ब्लेयर में हुई थी। भारत की सरकारी इंजीनियरिंग और कंसल्टेंसी कंपनी ‘राइट्स’ (RITES) ने साबांग बंदरगाह के बुनियादी ढाँचा विकास पर अपनी प्री-फिजिबिलिटी स्टडी भी पूरी कर ली है।

अब 2026 में पीएम मोदी और राष्ट्रपति प्रबोवो के बीच हुई बैठक ने इस संयुक्त परियोजना को कागजों से निकालकर जमीन पर उतारने के लिए नए फंड और समय-सीमा को निर्धारित कर दिया है।

चीन का मुद्दा और साबांग को BRI से बाहर रखने की इंडोनेशियाई रणनीति

इस मेगा प्रोजेक्ट के भू-राजनीतिक निहितार्थों को समझने के लिए ‘चीन के कोण’ (China Angle) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दक्षिण-पूर्वी एशिया और हिंद महासागर में चीन अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (String of Pearls) नीति के तहत बंदरगाहों का जाल बिछा रहा है। इंडोनेशिया में भी चीन ने अरबों डॉलर का निवेश किया है, जिसमें जकार्ता-बांडुंग हाई-स्पीड ट्रेन और 23 अरब डॉलर के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) के तहत चार प्रमुख आर्थिक कॉरिडोर (उत्तरी सुमात्रा, उत्तरी कालीमंतन, उत्तरी सुलावेसी और बाली) शामिल हैं।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और ध्यान देने योग्य बात यह है कि इंडोनेशिया ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत साबांग बंदरगाह को चीन के बीआरआई प्रोजेक्ट्स से पूरी तरह बाहर रखा। हालाँकि एक समय चीन ने साबांग में भारी दिलचस्पी दिखाई थी, लेकिन इंडोनेशिया की सरकार ने इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए चीनी प्रस्तावों को आगे नहीं बढ़ाया और साबांग के विकास के लिए चीन के बजाय भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे लोकतांत्रिक देशों को प्राथमिकता दी।

इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि साबांग इंडोनेशिया की राष्ट्रीय अस्मिता और संप्रभुता का एक अमूल्य प्रतीक माना जाता है। इंडोनेशिया की राष्ट्रीय एकता को दर्शाने के लिए वहाँ के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में ‘साबांग से मेरुके तक’ का नारा लगाया जाता है, जो ठीक वैसा ही है जैसे भारत में हम ‘कश्मीर से कन्याकुमारी तक’ कहते हैं।

चूँकि साबांग इंडोनेशिया का सबसे पश्चिमी छोर है और इसके पास ही रोंडो और बेंगगाला जैसे संवेदनशील बाहरी द्वीप स्थित हैं, इसलिए इंडोनेशिया कभी नहीं चाहता कि यहाँ चीन जैसी किसी ऐसी विस्तारवादी ताकत का नियंत्रण या प्रभाव स्थापित हो जो भविष्य में उसकी संप्रभुता और सुरक्षा के लिए कोई गंभीर खतरा पैदा कर सके।

सैन्य अड्डा नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता का माध्यम

भारत के रणनीतिक हलकों में अक्सर यह भ्रम फैल जाता है कि साबांग में विकास की अनुमति मिलने का मतलब है कि भारत को वहाँ ‘सैन्य अड्डा’ (Military Base) मिल रहा है। इंडोनेशिया की प्रसिद्ध रणनीतिक विशेषज्ञ देवी फॉर्च्यून अनवर और इंडोनेशियाई राजनयिकों ने हमेशा यह स्पष्ट किया है कि इंडोनेशिया की विदेश नीति ‘स्वतंत्र और सक्रिय’ (Bebas dan Aktif) के सिद्धांत पर चलती है, जो किसी भी विदेशी ताकत को अपनी धरती पर सैन्य अड्डा बनाने की अनुमति नहीं देती।

इसलिए भारत की साबांग में एंट्री कोई सैन्य विस्तार नहीं है, बल्कि यह ‘स्टेटस-सिग्नलिंग’ (Status Signalling) और आर्थिक सुरक्षा का पुल है। साबांग परियोजना का सफल कार्यान्वयन भारत को चीन, जापान और दक्षिण कोरिया की तरह दक्षिण-पूर्वी एशिया में एक बड़े बुनियादी ढाँचा डेवलपर और आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेगा। यह भारत के एक्ट ईस्ट’ (Act East Policy) और महासागर विजन’ (MAHASAGAR Vision) को वास्तविक ताकत प्रदान करता है।

इस प्रोजेक्ट के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ, हालाँकि भारत-इंडोनेशियान निकाल लेंगे हल

इस शानदार और महत्वाकांक्षी साझा समुद्री सपने के सामने कुछ वास्तविक और व्यावहारिक चुनौतियाँ भी खड़ी हैं जिनसे दोनों देशों को मिलकर निपटना होगा। सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने की है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड इस मामले में बहुत अच्छा नहीं रहा है और म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी कई परियोजनाएं काफी देरी से चल रही हैं।

साबांग के मामले में भारत को अपनी इस प्रशासनिक सुस्ती वाली छवि को पूरी तरह से बदलना होगा और कार्य की गति को तेज बनाए रखना होगा। इसके अलावा आचे और अंडमान के बीच पर्यटन, क्रूज जहाजों और नौकायन को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों को अपने आव्रजन, सीमा शुल्क और वीजा नियमों को बेहद सरल, सुलभ और डिजिटल रूप से आधुनिक बनाना होगा ताकि व्यापारियों और पर्यटकों को कोई असुविधा न हो।

एक और बड़ी चुनौती पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की है, क्योंकि ग्रेट निकोबार एक बेहद संवेदनशील जैव विविधता क्षेत्र और बायोस्फीयर रिजर्व है। भारत सरकार को यह पूरी तरह सुनिश्चित करना होगा कि बंदरगाह और बुनियादी ढाँचे के विकास के साथ-साथ वहां की मूल जनजातियों के अधिकारों और प्राचीन वर्षावनों का संरक्षण पूरी कड़ाई के साथ किया जाए।

दो समुद्री सभ्यताओं का मिलन साबित हो सकता है ये मेगा प्रोजेक्ट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह इंडोनेशिया यात्रा साबांग और ग्रेट निकोबार को वैश्विक समुद्री व्यापार के नए जुड़वाँ स्तंभों के रूप में स्थापित करने की एक मजबूत और ऐतिहासिक नींव रख चुकी है। यह केवल दो बंदरगाहों का भौतिक विकास नहीं है, बल्कि दो महान समुद्री सभ्यताओं का एक ऐसा आधुनिक पुनर्मिलन है जो आने वाले कई दशकों तक पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की शांति, स्थिरता, आर्थिक प्रगति और सुरक्षा की दिशा और दशा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा।

इराक क्यों ले जाया जा रहा है ईरान के अयातुल्लाह खामेनेई का जनाजा?

लंबे इंतजार के बाद ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा है। अब यह जनाजा सिर्फ एक मजहबी रस्म नहीं है बल्कि यह ईरान के साथ-साथ इराक, शिया राजनीति और पश्चिम एशिया की बदलती ताकतों से जुड़ा बड़ा संदेश भी बनने जा रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका जनाजा तेहरान और कोम से होते हुए 8 जुलाई को इराक के नजफ और करबला ले जाया जाएगा फिर ईरान के मशहद में गुरुवार (9 जुलाई 2026) को दफनाया जाएगा। इस जनाजे को इराक ले जाने के पीछे कई वजह हैं जिन्हें इस लेख में खोजने की कोशिश करेंगे।

नजफ और करबला की मजहबी अहमियत

शिया मुसलमानों के लिए इराक के नजफ और करबला शहर बेहद मुकद्दस माने जाते हैं। नजफ में हजरत अली की दरगाह है, जिन्हें शिया मुसलमान पहला इमाम मानते हैं। करबला में इमाम हुसैन और हजरत अब्बास की दरगाहें हैं। करबला की घटना शिया इतिहास में सब्र, कुर्बानी और जुल्म के खिलाफ खड़े होने की सबसे बड़ी निशानी मानी जाती है।

इसी वजह से खामेनेई का जनाजा इन शहरों में ले जाना उनके समर्थकों के लिए सिर्फ रस्म नहीं है बल्कि यह उन्हें अहले-बैत की विरासत और शहादत की परंपरा से जोड़ने की कोशिश है। ईरान में खामेनेई को लंबे समय तक इस्लामी क्रांति, शिया नेतृत्व और अमेरिका-इजरायल विरोधी रुख के चेहरे के रूप में देखा गया। अब उनके जनाजे को नजफ और करबला ले जाकर यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि उनका रिश्ता सिर्फ ईरानी सत्ता से नहीं बल्कि पूरी शिया उम्मत की मजहबी भावना से था।

खामेनेई के जनाजे को इन मुकद्दस शहरों में ले जाने का मतलब है कि ईरान उन्हें शिया इतिहास की उसी बड़ी कहानी में रखना चाहता है, जिसमें जुल्म के खिलाफ खड़े होने, बाहरी दबाव का मुकाबला करने और मजहबी पहचान बचाने की बात की जाती है। यही वजह है कि उनके समर्थक इस अंतिम यात्रा को सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि मुकद्दस सफर के रूप में पेश कर रहे हैं।

अंतिम यात्रा के जरिए ईरान का ‘ताकत’ का संदेश

खामेनेई के जनाजे को इराक ले जाना इसी संदेश का हिस्सा है। ईरान दिखाना चाहता है कि उसके सबसे बड़े नेता की मौत के बाद भी उसका असर खत्म नहीं हुआ है। जनाजा जब ईरान की सीमा से बाहर निकलकर इराक के मुकद्दस शहरों तक जाएगा, तो यह एक तरह से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन भी होगा। संदेश साफ है कि खामेनेई का असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं था बल्कि नजफ, करबला और उन शिया समूहों तक भी था जो ईरान को अपना राजनीतिक और धार्मिक सहारा मानते हैं।

इराक के लिए यह जनाजा अकीदत भी है और सियासी इम्तिहान भी

इराक के लिए यह मामला बहुत संवेदनशील है। एक तरफ इराक में बड़ी शिया आबादी है, जिसके लिए नजफ और करबला में किसी बड़े शिया नेता के जनाजे का आना अकीदत का मामला है। दूसरी तरफ इराक एक स्वतंत्र देश है, जिसे अपने रिश्ते ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संभालने हैं। यह पूरा कार्यक्रम इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की संभावित अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हो रहा है। इसी वजह से इसे और अधिक राजनीतिक माना जा रहा है।

इराकी सरकार नहीं चाहती कि दुनिया को यह संदेश जाए कि बगदाद पूरी तरह तेहरान के प्रभाव में है। खासकर ऐसे समय में जब इराक अमेरिका से भी आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है। अगर इराक सरकार जनाजे में ज्यादा सक्रिय दिखती है तो अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत मिल सकता है कि इराक अब भी ईरान की लाइन पर चल रहा है। अगर सरकार दूरी बनाती है तो ईरान समर्थक शिया गुट नाराज हो सकते हैं।

यही वजह है कि खामेनेई का जनाजा इराकी सरकार के लिए एक तरह का सियासी इम्तिहान बन गया है। उसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी करना है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि भी बचानी है।

इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMU) और शिया कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क से जुड़े गुट इस जनाजे को इराक में आयोजित कराने के पक्ष में हैं। ईरानी पक्ष का दावा है कि इराकी नेताओं और समूहों ने यह अनुरोध किया था। वहीं, कुछ इराकी सूत्रों के मुताबिक यह माँग सीधे सरकार से नहीं बल्कि शिया राजनीतिक गुटों से आई। इसका मतलब यह है कि इराक के भीतर भी इस आयोजन को लेकर एकराय नहीं है।

सुलेमानी, रईसी और अब खामेनेई

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कासिम सुलेमानी का जनाजा ईरान की सैन्य और क्षेत्रीय ताकत का प्रतीक था। इब्राहिम रईसी का जनाजा राज्य की निरंतरता दिखाने वाला आयोजन था। खामेनेई का जनाजा इन दोनों से बड़ा राजनीतिक अर्थ रखता है। यह ईरान की वैचारिक वैधता, शिया नेतृत्व की दावेदारी और क्षेत्रीय प्रभाव की परीक्षा है। इसलिए इराक की पवित्र धरती को इस यात्रा में शामिल करना ईरान के लिए बेहद सोचा-समझा कदम दिखता है।

खामेनेई का जनाजा इराक ले जाने के पीछे धार्मिक श्रद्धा, शिया प्रतीकवाद, ईरान की क्षेत्रीय राजनीति, इराकी सत्ता संतुलन और अमेरिका-ईरान तनाव, सब जुड़े हुए हैं। नजफ और करबला की यात्रा से ईरान यह दिखाना चाहता है कि खामेनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे बल्कि पूरे शिया राजनीतिक संसार में असर रखने वाली शख्सियत थे।

वहीं, इराक के लिए यह आयोजन सम्मान, दबाव और जोखिम तीनों का मिला-जुला मामला है। यही वजह है कि यह जनाजा एक अंतिम यात्रा से कहीं ज्यादा, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति का बड़ा संकेत बन गया है।

70 मिनट में एक के बाद एक फटे 21 IED, 57 की मौत और सैकड़ों घायल: पढ़ें- अहमदाबाद ब्लास्ट की कहानी, केरल के जंगलों में ट्रेनिंग कर आए थे SIMI और इंडियन मुजाहिदीन के आतंकी

अहमदाबाद ब्लास्ट केस में 18 साल बाद गुजरात हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए 49 दोषियों में से 11 को उम्रकैद और 38 को फाँसी की सजा दी है। इस मामले में 28 लोगों को पहले ही बरी कर दिया गया था, जबकि एक आरोपित सरकारी गवाह बन गया था।

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में एक के बाद एक 21 बम धमाके हुए थे, जिसमें 56 लोगों की जान चली गई थी और 240 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। कोर्ट ने राज्य सरकार को पीड़ितों को मुआवजा देने का भी निर्देश दिया है। इसके तहत मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपए और घायलों को 1 लाख रुपए देने को कहा है।

70 मिनट में 21 जगहों पर बम धमाके

26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में शाम करीब 6:45 बजे से 8:00 बजे के बीच करीब 70 मिनट के अंतराल में 21 अलग-अलग जगहों पर सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। इन आतंकवादी हमलों में 56 लोग मारे गए और 240 से अधिक लोग घायल हो गए। पूरा शहर दहल चुका था। अस्पतालों में भारी अफरा-तफरी मच गई थी। घायलों को अस्पताल लाया गया था।

धमाकों को अंजाम देने से ठीक पहले, इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादियों ने कई मीडिया घरानों को ईमेल भेजा था और हमलों की चेतावनी दी थी। उस वक्त इंडियन मुजाहिदीन का नाम आतंकी लिस्ट में नहीं था। उसे 2010 की पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट की जिम्मेदारी लेने के बाद प्रतिबंधित किया गया था। उस हमले में 17 लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई लोग घायल हुए थे।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि कुछ धमाके उन अस्पतालों के बाहर हुए जहाँ पहले विस्फोटों के घायलों को इलाज के लिए लाया जा रहा था। इससे अधिक से अधिक जान-माल का नुकसान करने की कोशिश की गई थी। यह हमले शहर के बेहद भीड़-भाड़ वाले और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाकर किए गए थे। इनमें सिविल अस्पताल और एल.जी. अस्पताल मणिनगर, बापूनगर, और नरोडा इलाके के सार्वजनिक बसों, साइकिलों और बाजारों में ब्लास्ट कैसे किए गए।

साइकिल में टिफिन बम में हुआ ब्लास्ट

आतंकवादियों ने साइकिलों पर टिफिन में आईईडी छिपा कर ज्यादातर जगहों पर रखा था और उन्हें टाइमर के जरिए विस्फोट किया। कई जगहों पर दूसरे वाहनों का भी इस्तेमाल किया गया। 21 जगहों को इस तरह चुना गया, जहाँ काफी भीड़ भाड़ होती थी। धमाकों के दो दिन बाद गुजरात पुलिस और आतंकवाद निरोधी दस्ते ने सूरत के अलग-अलग इलाकों से 29 जिंदा बम बरामद किए थे, जो सही सर्किट या डेटोनेटर नहीं जुड़ने के कारण फटे नहीं थे। इन्हें सुरक्षा एजेंसियों ने इनएक्टिव किया।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, आतंकियों ने ईमेल में लिखा था कि यह 2002 के गोधरा के बाद गुजरात हिंसा का बदला लेने के लिए किया गया है।

तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में शांति की अपील की और घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही थी।

78 पर चला केस, 49 को मिली सजा

इस मामले में एक आरोपित अयाज सैयद सरकारी गवाह बन गया था। केस के दौरान ट्रायल कोर्ट में करीब 1163 गवाहों ने अपने बयान दर्ज कराए। कोर्ट में रोजाना 491 दिनों तक हर दिन केस पर सुनवाई हुई और 100 से ज्यादा वकील इसमें शामिल हुए। इस मामले को देश के सबसे बड़े धमाकों में गिना जाता है। अदालत ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस माना।

अहमदाबाद की विशेष अदालत ने स्पेशल जज एआर पटेल ने अपने फैसले में 28 आरोपितों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। जबकि मृतकों के परिजनों को 1-1 लाख रुपए का मुआवजा देने का भी आदेश दिया।

जाँच के दौरान कई ऐसी घटनाएँ भी घटी, जिसकी चर्चा हुई। 2013 में जेल में बंद कुछ आरोपितों ने सुरंग बनाकर फरार होने की साजिश रची थी, लेकिन सुरक्षाबलों ने नाकाम कर दिया।

अहमदाबाद की विशेष अदालत ने मामले में 49 लोगों को दोषी ठहराया था। गुजरात हाईकोर्ट ने इन सभी 38 दोषियों की फाँसी की सजा और 11 अन्य दोषियों की उम्रकैद की सजा दी थी, जिसे गुजरात हाईकोर्ट ने बरकरार रखा है। इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और घायलों को 1 लाख से 5 लाख रुपये तक का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।

सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन ने रची थी साजिश

2008 के अहमदाबाद बम धमाकों की साजिश बहुत गहरी थी, जिसका ताना-बाना देश के अलग-अलग राज्यों में बुना गया था। पुलिस जाँच और अदालती कार्यवाही में इसके मास्टरमाइंड और आतंकियों की ट्रेनिंग से जुड़ी अहम जानकारी सामने आई थी।

प्रतिबंधित संगठन सिमी (SIMI) और इंडियन मुजाहिदीन (IM) के शीर्ष नेताओं की तिकड़ी ने मिलकर इसकी पूरी साजिश रची थी। मुफ्ती अबू बशर को पूरे ब्लास्ट का मुख्य मास्टरमाइंड और वैचारिक मार्गदर्शक माना गया। उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले इस मौलवी ने युवाओं को भड़काने और हमले के लिए उनका ‘ब्रेनवॉश’ करने का काम किया था। सिमी के पूरे धमाकों की योजना को अंतिम रूप दिया।

हैदराबाद ब्लास्ट मामले में दोषी पाया गया यासीन भटकल इस मामले मं भी शामिल था। भटकल बंधु यानी रियाज और यासीन इंडियन मुजाहिदीन के खूंखार आतंकियों में शुमार थे, जो बमों को बनाने, विस्फोटक जुटाने और उन्हें सही समय पर प्लांट करने का तकनीकी काम संभाल रहे थे। सुरक्षा एजेंसियों की जाँच के मुताबिक, धमाकों को अंजाम देने से पहले आतंकियों के लिए घने जंगलों में गुप्त ट्रेनिंग कैंप आयोजित किए गए थे।

केरल के वागामोन जंगल में दिसंबर 2007 में सिमी का एक बेहद गुप्त और बड़ा ट्रेनिंग कैंप आयोजित हुआ था। सफदर नागौरी की देखरेख में आयोजित इस कैंप में देश के करीब आधा दर्जन राज्यों (जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश आदि) से आए 50 से अधिक कट्टरपंथी युवाओं ने हिस्सा लिया था।

इस कैंप में आतंकियों को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने के अलावा हथियार चलाने, कमांडो कॉम्बैट, रस्सी पर चढ़ने और आईईडी और टाइमर बम बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी। इसके बाद गुजरात के स्थानीय युवकों जैसे- अयाज सैयद का इस्तेमाल अहमदाबाद में साइकिलों और बसों में बम रखने के लिए किया गया। फिर एक के बाद एक 21 जगहों पर 70 मिनट में धमाके किए गए।

कहाँ है बलिराजगढ़, जो ASI की खुदाई में उगल रहा मिथिला की प्राचीन सभ्यता और वैभव के अवशेष; राजा बलि से लेकर विदेह तक से है कनेक्शन

बिहार के मधुबनी जिले में स्थित ऐतिहासिक बलिराजगढ़ इन दिनों पुरातात्विक दुनिया में कौतूहल और गौरव का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में इस प्राचीन स्थल से मिले असाधारण पुरातात्विक साक्ष्यों ने न केवल इतिहासकारों को चौंकाया है, बल्कि मिथिलांचल के गौरवशाली अतीत को एक नया आयाम भी दिया है।

जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष और संसदीय समिति के अध्यक्ष संजय कुमार झा के अनुसार, यहाँ चल रही वैज्ञानिक खुदाई में एक अत्यंत समृद्ध और उन्नत सभ्यता के अवशेष प्राप्त हुए हैं। केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस स्थल की महत्ता को देखते हुए यहाँ अगले 10 वर्षों तक खुदाई जारी रखने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है।

इसके साथ ही इस सुदूर इलाके में ASI का एक नया दफ्तर खोलने और एक बड़ा संग्रहालय (म्यूजियम) बनाने की तैयारी भी चल रही है। रामायण काल से इसका जुड़ाव, राजा बलि से जुड़ी पुरानी लोककथाएँ और मौर्य व शुंग साम्राज्य की मजबूत दीवारें बलिराजगढ़ को भारत की प्राचीन सभ्यता का एक सबसे अनोखा केंद्र बनाती है।

(फोटो साभार: The Print)

पुरातत्वविदों का कहना है कि स्थल पर मौजूद टीम एक ऐसी सभ्यता की खोज कर रही है, जो लौह युग के विदेह साम्राज्य की समझ को पूरी तरह से बदल सकती है, जिसका संबंध राजा जनक और रामायण से है। यह नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा भारत की प्राचीन जड़ों की गहराई में जाकर रामायण और महाभारत काल के ठोस प्रमाण खोजने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है।

खास खाइयों से मिले अनोखे सबूत: खुदाई में मिलीं पत्थर की गेंदें, दुर्लभ सिक्के और मिट्टी के खिलौने

बलिराजगढ़ में इस समय जो खुदाई चल रही है, उसमें पुरानी गलतियों से सीखकर बिल्कुल नए और आधुनिक वैज्ञानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। पहले की खुदाइयों में जो सबसे बड़ी दिक्कत पानी भरने और मैपिंग की आती थी, उसे इस बार सैटेलाइट इमेजिंग, आधुनिक वैज्ञानिक ट्रेंचिंग और जीपीएस मैपिंग जैसी तकनीकों के जरिए दूर कर लिया गया है।

इस समय वैज्ञानिकों की टीम पूरी तरह से छह विशेष खाइयों (यानी ट्रेंच) पर काम कर रही है। इन्हें बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से दो मुख्य हिस्सों में बाँटा गया है-एक है किले की मुख्य दीवार का क्षेत्र (Fortification Area) और दूसरा है आम नागरिकों के रहन-सहन वाला दक्षिणी क्षेत्र (Southern Area)।

अगर हम इन खाइयों से मिली चीजों को देखें, तो किले वाले हिस्से की खाइयों (जैसे YC-30, YC-31 और YD-31) की खुदाई पूरी हो चुकी है, जहाँ से प्राचीन सुरक्षा दीवारें और दुश्मनों को रोकने के लिए इस्तेमाल होने वाली पत्थर की भारी गेंदें मिली हैं। वहीं दूसरी तरफ इसका दक्षिणी हिस्सा प्राचीन लोगों के रोजमर्रा के जीवन के सबसे बड़े राज खोल रहा है।

यहाँ की एक खाई (YD-12) की गहराई तो 5.40 मीटर तक नीचे चली गई है, जहाँ से 13 परतों वाला मिट्टी के छल्लों से बना एक शानदार कुआँ (रिंग-वेल) मिला है। जानकारों का कहना है कि इसका इस्तेमाल पानी या फिर अनाज को सुरक्षित रखने के लिए किया जाता होगा।

इसी तरह एक और खाई (ZD-16) से पानी निकालने की आधुनिक नाली और सोख्ता गड्डा मिला है, जबकि खाई YL-14 से सात परतों वाली ईंटों का एक बहुत बड़ा ढाँचा सामने आया है। यह गहरी खुदाई हमें वक्त के पहिए में सदियों पीछे ले जा रही है।

प्राचीन नगर नियोजन और मिट्टी से निकला पुरावशेषों का खजाना

बलिराजगढ़ की मिट्टी से इस समय जो भी ढाँचे और पुरानी वस्तुएँ बाहर आ रही हैं, वे उस जमाने के एक बेहद उन्नत और योजनाबद्ध शहर की कहानी सुनाती हैं। खुदाई में मिलीं सात परतों वाली ईंटों की दीवारें, घरों के आँगन और पक्के फर्श यह साबित करते हैं कि यहाँ के लोग मकान बनाने की कला (इंजीनियरिंग) में बहुत माहिर थे।

उनके घरों का लेआउट दिखाता है कि यह शहर अचानक या बेतरतीब नहीं बसा था, बल्कि इसे पूरी प्लानिंग के साथ बनाया गया था। गंदे पानी को निकालने के लिए बनाई गई नालियों की व्यवस्था और सोख्ता गड्ढे यह साफ करते हैं कि उस दौर के लोग साफ-सफाई और सेहत को लेकर कितने जागरूक थे।

इसके अलावा यहाँ की मिट्टी से रोजमर्रा की जिंदगी, खेल-कूद और व्यापार से जुड़ी ढेरों प्राचीन वस्तुएँ मिली हैं। खुदाई में उस दौर के सबसे कीमती और शाही माने जाने वाले ‘उत्तरी काली पॉलिश वाले बर्तन’ (NBPW) के टुकड़े मिले हैं, जो आमतौर पर मौर्य और शुंग काल के अमीर और संपन्न परिवारों की पहचान होते थे।

इनके साथ ही लाल, काले और धूसर (ग्रे) रंग के चमकीले बर्तनों की मौजूदगी यह बताती है कि यहाँ मिट्टी के बर्तन बनाने की तकनीक कितनी लाजवाब थी।

बच्चों के खेलने के लिए मिट्टी की छोटी-छोटी खिलौना गाड़ियाँ, पासे, सुंदर मनके (बीट्स) और शिकार या सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाली पत्थर की छोटी गेंदें यह साबित करती हैं कि यहाँ का सामाजिक जीवन बहुत खुशहाल और आर्थिक रूप से मजबूत था।

पुरानी खुदाइयों का इतिहासः 1962 से शुरू हुई खोज

बलिराजगढ़ की अहमियत को बेहतर तरीके से समझने के लिए हमें इसके पुराने इतिहास और पहले हुई खुदाइयों पर एक नजर डालनी होगी। यह पहली बार नहीं है जब यहाँ जमीन को खोदा जा रहा है, बल्कि मौजूदा खुदाई इस जगह को समझने का चौथा बड़ा वैज्ञानिक प्रयास है।

इस टीले के नीचे छिपे इतिहास को सबसे पहले साल 1962-63 में पहचाना गया था, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने यहाँ पहली बार शुरुआती खुदाई का काम शुरू किया था। उस समय मिले चंद अवशेषों ने ही यह इशारा कर दिया था कि इसके नीचे कुछ बहुत बड़ा और ऐतिहासिक छिपा हुआ है।

इसके बाद, साल 1972-75 के दौरान यहाँ दूसरे दौर की और ज्यादा व्यवस्थित खुदाई की गई, जिसने यहाँ की ऐतिहासिक कड़ियों को और मजबूत किया।

फिर तीसरे दौर की खुदाई वर्ष 1998-99 के आसपास हुई। इन शुरुआती तीनों खुदाइयों में पुरातत्वविदों को मौर्य साम्राज्य (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) और शुंग राजवंश के समय की विशाल ईंटों से बनी सुरक्षा दीवारें, दुर्लभ मुहरें, पुराने सिक्के और खास तरह के मिट्टी के बर्तन मिले थे।

हालाँकि उस समय तकनीकी कमियों, संसाधनों की किल्लत और सबसे बढ़कर बारिश के दिनों में जमीन के नीचे का पानी (भूजल स्तर) अचानक ऊपर आ जाने की वजह से काम को बीच में ही रोकना पड़ा था। लेकिन आज आधुनिक तकनीकों के साथ यहाँ चौथे दौर की सबसे बड़ी खुदाई शुरू की गई है, ताकि अधूरे रह गए इतिहास को पूरा किया जा सके।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बारिश की वजह से काम को फिलहाल के लिए रोक दिया गया है। बारिश थमने के बाद दोबारा खुदाई शुरू होने की संभावना है।

राजा बलि की कहानी और इस जगह के नाम का पुराना रहस्य

बलिराजगढ़ के नाम और इसकी पहचान के पीछे सदियों पुरानी लोककथाएँ और मान्यताएँ छिपी हुई हैं। यहाँ के स्थानीय लोग और बुजुर्ग हमेशा से यह मानते आए हैं कि इस विशाल मिट्टी के टीले और ऊँची दीवारों का संबंध पौराणिक काल के महाप्रतापी और दानी राजा बलि से है।

लोक-परंपराओं में कहा जाता है कि यह स्थान कभी राजा बलि की राजधानी या उनका ऐसा किला था जिसे कोई जीत नहीं सकता था। यह कहानी यहाँ के लोगों के दिलों में इस कदर रची-बसी है कि जब भी इस टीले के पास खुदाई की बात होती है, तो लोगों के मन में सबसे पहला कौतूहल राजा बलि के उसी प्राचीन महल और नगरी को देखने का जाग उठता है।

राजा बलि वही राजा हैं, जिनका जिक्र हिंदू पुराणों में भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा में आता है। हालाँकि आज के पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के लिए यह जगह किसी एक राजा की कहानी से कहीं आगे बढ़कर, समय की कई परतों को अपने अंदर समेटे हुए एक प्राचीन शहरी सभ्यता का जीता-जागता सबूत है।

रामायण काल से सीधा जुड़ाव और मिथिला का पुराना गौरव

बलिराजगढ़ का नाता सिर्फ पौराणिक कहानियों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका बहुत गहरा और सीधा संबंध रामायण काल और माता सीता की जन्मस्थली मिथिला से है। अगर नक्शे के हिसाब से देखें, तो यह जगह प्राचीन मिथिलांचल के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित है।

यह वही महान भूमि है जो राजा जनक के ज्ञान, महर्षि याज्ञवल्क्य की विद्वता और भगवान राम-सीता के विवाह के इतिहास से महकती है। रामायण काल के रास्तों और जगहों पर शोध करने वाले जानकारों का मानना है कि प्राचीन समय में यह किला एक बहुत बड़ा प्रशासनिक या सुरक्षा केंद्र रहा होगा।

इस जगह की सबसे खास बात यह है कि यह माता सीता की जन्मस्थली पुनौराधाम (सीतामढ़ी) और नेपाल के जनकपुर के बीच एक बेहद मजबूत कल्पित सुरक्षा गढ़ या किले के रूप में दिखाई देता है। यही वजह है कि केंद्र सरकार की मौजूदा सांस्कृतिक योजनाओं में बलिराजगढ़ को ‘रामायण सर्किट’ का एक बेहद जरूरी हिस्सा माना जा रहा है।

मोदी सरकार की कोशिश है कि भगवान राम और माता सीता के जीवन से जुड़ी जितनी भी ऐतिहासिक जगहें हैं, उन्हें एक साथ जोड़कर विकसित किया जाए। बलिराजगढ़ की इस नई खुदाई से मिथिलांचल के उस दौर के पक्के भौतिक सबूत सामने आ रहे हैं, जो अब तक सिर्फ धार्मिक किताबों और कहानियों में सुने जाते थे।

इससे स्पष्ट है कि रामायण काल की मिथिला सिर्फ विचारों या ज्ञान की नगरी नहीं थी, बल्कि उसके पास एक बहुत ही मजबूत, सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप से बसाया गया शहर भी था।

केंद्र सरकार के प्रयास और इस खोज से भविष्य में होने वाले बड़े बदलाव

बलिराजगढ़ से मिल रहे इन अनमोल और ऐतिहासिक सबूतों को देखते हुए केंद्र सरकार ने इस पूरे इलाके की तस्वीर बदलने के लिए एक बहुत बड़ा और लंबा प्लान तैयार किया है। सरकार की तरफ से यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया है कि यहाँ अगले 10 सालों तक लगातार वैज्ञानिक खुदाई का काम जारी रहेगा।

इतने लंबे समय तक चलने वाली खुदाई से यह फायदा होगा कि इतिहास का कोई भी पन्ना अछूता नहीं रहेगा और इस प्राचीन सभ्यता की पूरी कहानी दुनिया के सामने आ सकेगी। इस बड़े अभियान को अच्छे से चलाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का एक परमानेंट दफ्तर इसी ग्रामीण इलाके में खोला जा रहा है।

खुदाई से निकलने वाली हर छोटी-बड़ी चीज जैसे मूर्तियों, सिक्कों और बर्तनों को सुरक्षित रखने के लिए यहाँ एक भव्य और आधुनिक म्यूजियम (संग्रहालय) बनाया जाएगा। यह म्यूजियम न केवल बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगा, बल्कि देश-विदेश के इतिहासकारों और शोध करने वाले छात्रों के लिए पढ़ाई का एक बहुत बड़ा जरिया बनेगा।

इस पूरी खोज और विकास का सबसे बड़ा और सीधा फायदा आने वाले समय में पूरे मिथिलांचल और उत्तर बिहार के लोगों को मिलने वाला है। जब यह जगह रामायण सर्किट से पूरी तरह जुड़ जाएगी और यहाँ एक बड़ा म्यूजियम बन जाएगा, तो यहाँ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी।

पर्यटन के इस विकास से इस सुदूर ग्रामीण इलाके में बेहतरीन सड़कें, होटल, गाड़ियाँ और संचार जैसी आधुनिक सुविधाएँ तेजी से पहुँचेंगी।

सबसे अच्छी बात यह होगी कि स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, होटल, हस्तशिल्प और छोटे-मोटे व्यापार के रूप में रोजगार के हजारों नए मौके पैदा होंगे, जिससे इलाके के लोगों का आर्थिक जीवन सुधरेगा। यह खोज आने वाली पीढ़ियों को उनकी समृद्ध विरासत और मिथिला के गौरवशाली अतीत से रूबरू कराएगी, जिससे हर किसी को अपनी संस्कृति पर गर्व होगा।

पाकिस्तान की Cream, भारत में महिलाओं को फैला रही किडनी की गंभीर बीमारी: जानें- क्या है महाराष्ट्र का ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ विवाद और किन देशों में लग चुका है बैन

हर कोई खूबसूरत और गोरा दिखना चाहता है। इसी चाहत में लोग अक्सर बिना सोचे-समझे बाजार में मिलने वाली कोई भी ब्यूटी क्रीम चेहरे पर लगाने लगते हैं। लेकिन कभी-कभी गोरा होने का यही शौक जिंदगी पर भारी पड़ जाता है। हाल ही में भारत में एक ऐसा ही हैरान करने वाला मामला सामने आया। पाकिस्तान में बनी एक मशहूर ब्यूटी क्रीम को लगाने से भारत की कई महिलाओं की सेहत पूरी तरह बिगड़ गई। इस क्रीम ने न सिर्फ महिलाओं के चेहरे को खराब किया, बल्कि सीधे उनकी किडनी पर इतना बुरा असर डाला कि वे गंभीर रूप से बीमार हो गईं।

इस पूरे हंगामे की वजह पाकिस्तान की ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (Goree Beauty Cream) है। इस क्रीम को लेकर दावा किया जाता था कि इसे लगाने से चेहरा तुरंत गोरा हो जाता है, लेकिन अब इसके पीछे का जहरीला सच सबके सामने आ चुका है। महाराष्ट्र के नागपुर में जब कई महिलाओं ने इस क्रीम को लगाया, तो उन्हें सेहत से जुड़ी गंभीर समस्याएँ होने लगीं। जब इसकी शिकायतें डॉक्टरों और सरकार तक पहुँचीं, तो जाँच टीमें तुरंत अलर्ट हो गईं। लैब में इस क्रीम की बारीकी से जाँच की गई, जिसमें खतरनाक केमिकल मिले। इसके बाद भारत सरकार और महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने सच का पता लगाकर इस क्रीम को भारत में पूरी तरह बैन कर दिया है।

नागपुर से हुई जहरीले सच की शुरुआत

यह मामला तब सामने आया जब महाराष्ट्र के नागपुर में कई महिलाओं की तबीयत अचानक खराब होने लगी। जब वे डॉक्टरों के पास पहुँचे, तो पता चला कि ये सभी महिलाएँ पिछले दो साल से गोरा होने के लिए एक ही ब्रांड की क्रीम लगा रही थीं। जाँच में सामने आया कि इस क्रीम की वजह से उनकी किडनी खराब हो चुकी थी और उनके शरीर में खतरनाक जहर फैल गया था।

डॉक्टरों ने जब गहराई से जाँच की, तो मालूम पड़ा कि ये सभी 18 महिलाएँ इंटरनेट और सोशल मीडिया से खरीदकर ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ (जो पाकिस्तान की है) इस्तेमाल कर रही थीं। यह बात पता चलते ही डॉक्टरों ने तुरंत इसकी जानकारी स्वास्थ्य अधिकारियों और प्रशासन को दी। इसके बाद सरकार ने कड़ा एक्शन लेते हुए बाजार से इस क्रीम को जब्त कर लिया और जांच के लिए लैब में भेज दिया ताकि पता चल सके कि इसमें कौन से खतरनाक केमिकल मिलाए गए हैं।

प्रयोगशाला की जाँच में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

जब महाराष्ट्र के सरकारी विभाग (FDA) ने इस ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ की लैब में जाँच की, तो नतीजे बहुत डराने वाले थे। जाँच में पता चला कि इस क्रीम में पारा (Mercury) और शीशा (Lead) जैसे बेहद खतरनाक और जहरीले केमिकल मिले हुए थे। सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि इसमें पारे (Mercury) की मात्रा तय कानूनी सीमा से 752 गुना ज्यादा थी।

डॉक्टरों और वैज्ञानिकों के मुताबिक, कंपनियाँ इस पारे का इस्तेमाल इसलिए करती हैं ताकि त्वचा का रंग बहुत जल्दी गोरा और साफ दिखने लगे। लेकिन यह गोरापन कोई असली निखार नहीं होता, बल्कि केमिकल्स के कारण त्वचा को पहुँचने वाला नुकसान होता है। यह खतरनाक पारा स्किन के छोटे-छोटे छेदों (रोमछिद्रों) के रास्ते बहुत आसानी से शरीर के अंदर चला जाता है और धीरे-धीरे अंदरूनी अंगों को खराब करने लगता है।

किडनी पर सीधा हमला और ‘मेम्ब्रेनस नेफ्रोपैथी’ का खतरा

रोज इस प्रतिबंधित (बैन) क्रीम को लगाने की वजह से महिलाओं के शरीर में यह खतरनाक पारा जमा होता गया, जिसने सीधे उनकी किडनी को नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया। डॉक्टरों का कहना है कि त्वचा के रास्ते शरीर में पहुँचा यह जहर अंदरूनी अंगों को खराब करता है और शरीर की बीमारियों से लड़ने की ताकत (इम्यून सिस्टम) को बिगाड़ देता है। इससे किडनी पूरी तरह काम करना बंद कर सकती है, जिसका इलाज बहुत मुश्किल और महँगा होता है।

मेडिकल रिसर्च के मुताबिक, ऐसे ज्यादा पारे वाले ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने से किडनी की एक गंभीर बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस बीमारी में किडनी का फिल्टर करने वाला हिस्सा खराब हो जाता है, जिससे शरीर का जरूरी प्रोटीन पेशाब के रास्ते बाहर बहने लगता है। नागपुर की पीड़ित महिलाओं में भी ठीक यही बीमारी और लक्षण पाए गए, जो लंबे समय तक इस जहरीली क्रीम को लगाने की वजह से हुए थे।

भारतीय प्रशासनिक तंत्र और सरकार का कड़ा एक्शन

इस बड़े खतरे को देखते हुए भारत सरकार और महाराष्ट्र के विभाग (FDA) ने तुरंत कड़ा एक्शन लिया है। प्रशासन ने ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ के साथ दो और खराब ब्यूटी प्रोडक्ट्स- ‘फेस फ्रेश गोल्ड’ (क्रीम और सीरम) और ‘कॉस्मेटिक गोल्डन स्टार ब्यूटी क्रीम’ को पूरी तरह असुरक्षित घोषित कर दिया है। अब इन पर पूरी तरह बैन लगा दी गई है और लोगों से अपील की गई है कि वे इन्हें भूलकर भी न खरीदें।

इसके साथ ही, पूरे महाराष्ट्र में नकली और खराब कॉस्मेटिक्स बेचने वालों के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू कर दिया गया है। FDA कमिश्नर तुकाराम मुंडे की देखरेख में सिर्फ जून के महीने में ही 34 जगहों पर छापे मारे गए। इस कार्रवाई में 4 करोड़ रुपए से ज्यादा की नकली दवाएँ और खतरनाक ब्यूटी प्रोडक्ट्स जब्त किए गए हैं। साथ ही, नियम तोड़ने वाले दुकानदारों के खिलाफ 9 FIR दर्ज की गई हैं और दो लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है।

नियमों का सरेआम उल्लंघन और मुंबई में क्रिमिनल केस

जाँच करने वाले अधिकारियों को पता चला कि इन पाकिस्तानी क्रीमों के पैकेट पर कानून के मुताबिक कोई भी जरूरी जानकारी नहीं लिखी थी। पैकेट पर न तो बनाने वाली कंपनी का नाम-पता था, और न ही यह लिखा था कि क्रीम कब बनी है और कब खराब (Expire) होगी। यह पूरी तरह से कानून का उल्लंघन था, जिससे ग्राहकों को धोखे में रखकर उनकी जान से खिलवाड़ किया जा रहा था।

इसी बीच, मुंबई पुलिस ने चेंबूर इलाके के एक दुकानदार पर केस दर्ज किया है। इस दुकानदार पर आरोप है कि पाकिस्तान से सामान मँगाने पर रोक होने के बावजूद, वह छिपकर यह खतरनाक ‘गोरी ब्यूटी क्रीम’ बेच रहा था। अब पुलिस और एजेंसियाँ इस बात की गहराई से जाँच कर रही हैं कि रोक होने के बाद भी यह प्रतिबंधित क्रीम भारतीय बाजारों और दुकानों तक किस रास्ते से पहुँच रही थी।

ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया के जरिए भारत में एंट्री

इस मामले में एक और बड़ी चिंता की बात यह है कि रोक होने के बाद भी यह पाकिस्तानी क्रीम लोगों के घरों तक कैसे पहुँची। जाँच में पता चला कि इसे बेचने के लिए इंस्टाग्राम पेजों, रील्स और इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा रहा था। यहाँ तक कि मीशो (Meesho) जैसी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी कुछ बाहरी दुकानदारों (थर्ड-पार्टी सेलर्स) द्वारा यह खतरनाक क्रीम धड़ल्ले से बेची जा रही थी, जहाँ से आम महिलाओं ने इसे आसानी से ऑनलाइन ऑर्डर कर दिया।

सोशल मीडिया पर इसके विज्ञापनों और झूठे दावों को देखकर सीधी-सादी महिलाएँ इसके जाल में फँस गईं और इसे चेहरे के लिए बहुत अच्छा मान बैठीं। इंटरनेट पर इस क्रीम से बहुत जल्दी गोरा होने का झूठा प्रचार किया गया था, जिसे देखकर लोगों ने इसे खरीदा। अब सरकार ने सभी ऑनलाइन वेबसाइटों और छोटे-बड़े दुकानदारों को सख्त चेतावनी दी है कि वे इस क्रीम को तुरंत बेचना बंद कर दें, वरना उनके खिलाफ भी कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लग चुके हैं इस क्रीम पर प्रतिबंध

इस पाकिस्तानी क्रीम का यह सच सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में सामने आ चुका है। यह ब्रांड विदेशों में भी अपनी बदनामी के लिए जाना जाता है। साल 2021 में न्यूजीलैंड की सरकारी दवा संस्था ने अपने लोगों को चेतावनी देते हुए इस क्रीम को लगाने पर पूरी तरह रोक लगा दी थी, क्योंकि वहाँ की लैब जाँच में भी इसमें बहुत ज्यादा मात्रा में जहरीला पारा और शीशा पाया गया था।

इसके बाद, साल 2025 में फिलीपींस सरकार ने भी इस क्रीम के सभी प्रोडक्ट्स को सेहत के लिए खतरनाक बताते हुए चेतावनी जारी की थी। फिलीपींस सरकार का कहना था कि इस क्रीम को देश में बेचने की कोई कानूनी मंजूरी नहीं थी। दुनिया भर में बार-बार बैन होने के बाद भी, यह पाकिस्तानी ब्रांड तस्करी और इंटरनेट के गलत रास्तों के जरिए दुनिया के बाजारों में छिपकर बिकने की कोशिश कर रहा है।

सोशल मीडिया पर दिखा भारी आक्रोश और जनता का रिएक्शन

इस खुलासे के बाद इंटरनेट और सोशल मीडिया पर लोग बहुत गुस्से में हैं और इस पर बड़ी बहस छिड़ गई है। इस मामले को सबसे पहले ‘X’ (ट्विटर) पर चिराग बरजात्या नाम के एक व्यक्ति ने पोस्ट शेयर करके सामने लाया था, जिसके बाद यह खबर तेजी से फैल गई। इस पोस्ट को देखकर हजारों लोगों ने गुस्सा जताया और इसे भारतीयों के खिलाफ एक तरह का ‘केमिकल हमला’ (केमिकल टेररिज्म) कहा।

लोग न सिर्फ इस पाकिस्तानी क्रीम को कोस रहे हैं, बल्कि भारत की ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स पर भी सवाल उठा रहे हैं कि उन्होंने बिना जाँच-पड़ताल के इसे अपनी साइट पर कैसे बिकने दिया। लोगों का कहना है कि ऑनलाइन वेबसाइट्स को कोई भी विदेशी सामान बेचने से पहले उसकी सरकारी मंजूरी और लैब रिपोर्ट जरूर चेक करनी चाहिए। इसके साथ ही, लोग इंटरनेट पर अभियान चलाकर अपील कर रहे हैं कि अपने रिश्तेदारों और घर के काम करने वाले सहायकों को इसके बारे में सावधान करें, और अगर किसी के पास भी यह क्रीम दिखे, तो उसे तुरंत कचरे के डिब्बे में फेंक दें।

गोरेपन का जानलेवा भ्रम और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

पाकिस्तानी क्रीम का यह मामला दिखाता है कि गोरा होने की चाहत, टीवी-इंटरनेट के झूठे विज्ञापन और हमारी आज की आदतें कितनी खतरनाक हो सकती हैं। कुछ ही दिनों में गोरा करने का दावा करने वाली ये क्रीम असल में खूबसूरती बढ़ाने की चीज नहीं, बल्कि बोतलों में बंद धीमा जहर हैं, जो धीरे-धीरे हमारे शरीर के अंगों को खराब कर रही हैं। इस घटना से साफ है कि बिना डॉक्टर की सलाह या बिना सरकारी मंजूरी के इंटरनेट से कोई भी क्रीम या कॉस्मेटिक खरीदना जानलेवा हो सकता है।

अब समय आ गया है कि हम सिर्फ सरकार या पुलिस के भरोसे न बैठें, बल्कि खुद भी सोचें। हमें यह समझना होगा कि जैसा हमारा प्राकृतिक रंग है, वही सबसे अच्छा और सेहतमंद है। गोरा होने की अंधी दौड़ में पड़कर अपनी जान जोखिम में डालना बहुत बड़ी बेवकूफी है। सरकार का इस क्रीम को बैन करना और छापे मारना बहुत अच्छा कदम है, लेकिन यह समस्या तभी पूरी तरह खत्म होगी जब हम खुद समझदार बनेंगे, झूठे विज्ञापनों के बहकावे में नहीं आएँगे और चोरी-छिपे आने वाले ऐसे जहरीले विदेशी सामानों को पूरी तरह ना कह देंगे।

‘आधी रात को निकाले हजारों प्रवासी’: बांग्लादेशी घुसपैठियों पर भारत की सख्त पुश-बैक नीति के खिलाफ Financial Times का विलाप, बंगाल सरकार पर बेबुनियाद हमला

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की अभूतपूर्व सफलता मिली। पार्टी ने पूर्व सीएम ममता बनर्जी की अखिल भारतीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (एआईटीसी या टीएमसी) को सत्ता से बेदखल करते हुए 200 सीटों का आँकड़ा पार किया। यह राज्य में ऐतिहासिक राजनीतिक बदलाव का प्रतीक था और इसने शासन में एक नए युग की शुरुआत की।

नई शुभेंदु सरकार ने भारत-बांग्लादेश की सीमा को सुरक्षित करना और अवैध माइग्रेशन के खिलाफ एक मजबूत नीति लागू करना जैसे महत्वपूर्ण कार्य शुरू किए, जिन्हें पिछली सरकार ने नजरअंदाज कर दिया था।

दरअसल, टीएमसी ने राज्य में बांग्लादेशी घुसपैठियों की एंट्री को बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार के साथ लगातार लड़ती रही, यहाँ तक ​​कि उसके नेताओं ने राष्ट्रीय सुरक्षा और हितों को नुकसान पहुँचाते हुए इस तरह के घुसपैठियों को बढ़ावा देने का दावा भी किया। हालाँकि, वोट बैंक की राजनीति के लिए अपनाई गई इस खतरनाक रणनीति को शुभेंदु अधिकारी सरकार ने रोक दिया।

घुसपैठियों का बचाव करने में जुटा गुट

1 जुलाई 2026 को फाइनेंशियल टाइम्स ने ‘भारत ने रात के अंधेरे में हजारों प्रवासियों को निष्कासित किया’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया इसके लेखक एंड्रेस शिपानी थे। यह लेख एक संप्रभु राष्ट्र की निर्वाचित राज्य सरकार के फैसलों के विरोध में था, जिसने अपने मतदाताओं के व्यापक हित में पड़ोसी देश से अवैध घुसपैठ पर रोक लगाने का प्रयास करते हुए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।

लेख में पाठकों को उकसाने के लिए सनसनीखेज शीर्षक का भी इस्तेमाल किया गया। जिसमें आरोप लगाया गया कि भारत में कानून का उल्लंघन करके प्रवेश करने वालों के बजाय वैध नागरिकों को निष्कासित किया जा रहा है।

कथित सरकारी क्रूरता और अन्याय की एक सनसनीखेज कहानी गढ़ते हुए लेख में दावा किया गया, “बांग्लादेशी सीमा रक्षक लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करके अपने भारतीय समकक्षों को लोगों को सीमा पार धकेलने से रोकते हैं।”

इसने बांग्लादेशी अधिकारियों के हवाले से कहा कि भारतीय पक्ष अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए अंधेरे का इस्तेमाल ढाल के रूप में करता है, जो मई में पश्चिम बंगाल में भगवा पार्टी के सत्ता में आने के बाद से और भी बढ़ गया है।

लेख में लांस कॉर्पोरल महमूद मसूद के हवाले से लिखा गया है कि उसने बताया, “वे अंधेरा होने का इंतजार करते हैं, फिर स्पॉटलाइट बंद कर देते हैं और सही मौके की तलाश करते हैं।” बांग्लादेश सीमा सुरक्षा के महानिदेशक मोहम्मद अशरफुज्जमान सिद्दीकी ने जोर देकर कहा, “वे भारतीय बाड़ के फाटक खोल देते हैं और लोगों को अँधेरे में धकेल देते हैं। वहाँ महिलाएँ होती हैं, बच्चे होते हैं और ये बेचारे लोग बीच में फँस जाते हैं।”

आर्टिकल में बताया गया है कि भारतीय और बांग्लादेशी अधिकारियों के अनुसार, राज्य ने हजारों लोगों को, जिनमें अधिकतर बंगाली मूल के मुस्लिम हैं, बांग्लादेश भेज दिया है। इसमें दावा किया गया है कि बांग्लादेशी अधिकारियों ने ‘भारत और बांग्लादेश की सीमा में मौजूद एक पतली बंजर भूमि जीरो लाइन में फँसे दर्जनों लोगों’ के बारे में बताया।

इसमें कहीं भी बांग्लादेश की आलोचना नहीं की गई है कि वह अपने नागरिकों को अपने यहाँ लाना क्यों नहीं चाहता? बल्कि बड़ी चालाकी से भारत को ‘खलनायक’ के रूप में पेश करने की कोशिश करता है। लेखक कहता है, “निर्वासन अभियान ने दोनों देशों के बीच नाजुक संबंधों को और खराब कर दिया है, हिंदू राष्ट्रवाद के बारे में आशंकाओं को रेखांकित किया है और पश्चिम बंगाल और दूसरे सीमावर्ती राज्यों में लाखों मुसलमानों के लिए असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।”

बेशक फाइनेंशियल टाइम्स ने तुरंत ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ का सहारा लिया। ज्यादातर लिबरल गैंग इस मूलभूत सिद्धांत का ही सहारा लेते हैं मोदी सरकार पर हमला करने के लिए। लेकिन यह हिन्दू राष्ट्रवाद का नहीं, बल्कि घुसपैठियों को पीड़ित के रूप में पेश करने के दुष्प्रचार का एक हिस्सा है।

धार्मिक रंग देने की कोशिश

लेख में भारत-बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक संबंधों और पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की भाषा में समानता का हवाला देते हुए तर्क दिया कि सरकार को देश में अवैध बांग्लादेशियों को शरण देना चाहिए था। इसमें बांग्लादेश को बस शांत रहने की सलाह दी गई है. क्योंकि उसके लोग पड़ोस में बेलगाम भाग रहे हैं।

असम जैसे राज्यों में बांग्लादेशियों के अनियंत्रित और बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवाह को एक भावुक ‘माइग्रेशन का इतिहास’ के रूप में चित्रित किया गया है। इसका इतिहास या वास्तविकता में कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद लेख में पश्चिम बंगाल सरकार पर अवैध बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर नाराजगी जताई गई।

आर्टिकल में इस बात पर जोर दिया गया कि राज्य में 30% मुस्लिम आबादी है, जिसका मतलब यह था कि इन कार्रवाइयों से उन पर असर पड़ने की संभावना है। यह बात नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी आंदोलन के दौरान फैलाई गई साजिश की याद दिलाती है, जिसमें कहा गया था कि इस कानून का इस्तेमाल दूसरी सबसे बड़ी बहुसंख्यक आबादी के खिलाफ हथियार के तौर पर किया जाएगा। हालाँकि इसके लागू होने के बाद ऐसी कोई बात सामने नहीं आई।

संविधान में भारतीय नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने की छूट है, लेकिन सरकार की विश्वसनीयता को कम करने और संदेह और विभाजन को बढ़ावा देने के लिए इस तरह की बयानबाजी से सच्चाई को दबाने और हिंसा के लिए भड़काने का प्रयास किया गया।

फाइनेंशियल टाइम्स ने जोर देते हुए कहा, “आलोचकों का कहना है कि निर्वासन की यह मुहिम भाजपा की भारत को मुस्लिम अल्पसंख्यकों की कीमत पर एक हिंदू राष्ट्र बनाने की इच्छा को दर्शाती है।” इसके बाद उसने ह्यूमन राइट्स वॉच की एशिया उप प्रमुख मीनाक्षी गाँगुली के हवाले से कहा कि भारतीय अधिकारी ज्यादातर मुस्लिम परिवारों को बेरहमी से बांग्लादेश में धकेलने या उन्हें सीमा पर छोड़ रहे हैं। साथ ही ‘मुस्लिम के प्रति इस निंदनीय शत्रुता को समाप्त करने’ की अपील की।

अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले तत्वों से निपटने के लिए सरकार की रणनीति को फाइनेंशियल टाइम्स द्वारा ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश करार दिया गया। एक तरह से मीडिया संस्थान यह संकेत देता है कि भारत को चुपचाप देखते रहना चाहिए। जबकि भारत के नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि बांग्लादेशी और रोहिंग्या न केवल देश की अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रहे हैं, बल्कि मुस्लिम सहित सही नागरिकों के अधिकारों का भी उल्लंघन कर रहे हैं।

बांग्लादेश न केवल अपने नागरिकों को स्वीकार करने से इनकार कर रहा है, बल्कि अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के खिलाफ दमन का एक शर्मनाक इतिहास भी रखता है। लेकिन इस गुट की विकृत विचारधारा उन अत्याचारों को सिर्फ देखती है जो नहीं हो रहा है। ये बांग्लादेश में हो रहे हिंदुओं पर अत्याचार को नजरअंदाज कर देती है।

न्यायिक आदेशों का सम्मान करने के लिए भाजपा सरकारों पर हमले

शिपानी ने पश्चिम बंगाल सरकार के ‘पता लगाओ, हटाओ और निर्वासित करो’ के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने खुद की कहा था, “उनके पदभार संभालने के बाद से लगभग 10000 अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को निष्कासित किया जा चुका है, जबकि 1800 अन्य निर्वासन की प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि इस मंच ने असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के इस मुद्दे पर अडिग रुख की भी आलोचना की। मंच ने उनके उन बयानों का जिक्र किया, जिनमें उन्होंने भारत में डेमोग्राफी बदलाव ला सकने वाले घुसपैठियों से निपटने के लिए अपनी सरकार की नीतियों पर प्रकाश डाला था और इसलिए उन्हें उनके वतन वापस भेजने का इरादा जताया था।

गौरतलब है कि अवैध घुसपैठियों की भारी संख्या के कारण जनसांख्यिकीय बदलाव की नाजुक स्थिति को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक ने माना था। 2025 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने कहा कि असम एक ‘मूक और दुर्भावनापूर्ण जनसांख्यिकीय आक्रमण’ का सामना कर रहा है और यह भी स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार के पास ‘भारतीय क्षेत्र से विदेशियों को निष्कासित करने का पूर्ण और असीमित अधिकार’ हैं। कोर्ट ने कहा, “राज्य के पास घोषित विदेशी नागरिक को निष्कासित करने की शक्ति है।”

असम में घुसपैठियों को शरण न देने में सीएम सरमा की अहम भूमिका रही है और उन्होंने घुसपैठियों के निर्वासन के लिए कठोर नीति अपनाई है। यह मुद्दा राज्य में विधानसभा चुनावों से पहले जारी किए गए पार्टी के घोषणापत्र का अभिन्न अंग रहा है। इसमें ‘विदेशी’ घोषित किए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का वादा किया गया था। उन्होंने वन और कृषि भूमि सहित कई एकड़ सार्वजनिक संपत्तियों को भी घुसपैठियों के कब्जे से मुक्त कराया है।

दोहरी मानसिकता का खुला प्रदर्शन

अदालत के आदेशों का पालन करने वाली सरकार से फाइनेंशियल टाइम्स को निश्चित रूप से चिढ़ होगी, क्योंकि यह उसके एजेंडे के खिलाफ था। हाल ही में भारत में हो रहे घटनाक्रमों पर बांग्लादेशी प्रधानमंत्री तारिक रहमान के बयान से भी इसका पता चलता है। बांग्लादेशी अधिकारियों ने अपने नागरिकों को स्वीकार करने में कोताही की है, जबकि पहले से ही करीब ’10 लाख रोहिंग्या’ शरणार्थी बने हुए हैं।

स्पष्ट रूप से बांग्लादेश के पास संकट को कम करने के लिए अपने ही नागरिकों को अस्वीकार करने का अधिकार है, लेकिन भारत, जो विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है, उसे खुद पर अतिरिक्त बोझ डालना होगा। इतना ही नहीं अपने संसाधनों के दुरुपयोग की अनुमति भी देनी होगी।

लेख में बताया गया है कि विदेश मामलों के राज्य मंत्री शमा ओबैद इस्लाम ने चेतावनी दी है कि अगर भारत अपना रुख नहीं बदलता है तो संबंध ‘तनावपूर्ण’ बने रहेंगे, जबकि उनके देश ने घोषणा की है कि वह एक भी रोहिंग्या का स्वागत नहीं करेगा।

दूसरी ओर, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत में अवैध प्रवासियों के साथ कानूनी रूप से व्यवहार किया जाएगा। भारत ने राष्ट्रीयता सत्यापन के लिए बांग्लादेशी अधिकारियों को 2680 से अधिक मामले भेजे हैं, लेकिन ये अभी भी लंबित हैं। कई मामलों में तो 5 साल की दूरी हो गई है।

एफटी ने एक भारतीय अधिकारी के हवाले से कहा है कि देश निकाला एक तरह से तत्काल निष्कासन है, लेकिन इसके लिए उस देश का सहयोग आवश्यक है, जहाँ हम निर्वासित कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, बांग्लादेश में ऐसा सहयोग कभी नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि भारत के पास अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।

लेख को भावनात्मक मूल्य बनाने के लिए एक ऐसे घुसपैठिए की कहानी भी बताई, जिसे देश में एक दशक से अधिक समय तक रहने के बाद आत्मसमर्पण करना पड़ा।

फाइनेंशियल टाइम्स के इस आर्टिकल में सच्चाई की कोई परवाह नहीं की गई और इसका मकसद एक दुर्भावनापूर्ण एजेंडा को बढ़ावा देना था। बांग्लादेश ने भारतीय अधिकारियों के साथ सहयोग करने में अनिच्छा दिखाई है। ऐसे में भारतीय अधिकारियों के पास क्या विकल्प बचते हैं? एफटी हमेशा की तरह निष्क्रियता का समर्थन करेगा।

कोई भी समझदार सरकार अपने देश में किसी को भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं दे सकती और न ही ऐसा करना चाहिए। खुली सीमाएँ किसी भी राष्ट्र के लिए अव्यावहारिक हैं, जिनमें भारत और बांग्लादेश भी शामिल हैं। यही कारण है कि मिस्र और जॉर्डन जैसे राष्ट्र विस्थापित फिलिस्तीनियों को स्वीकार करने से इनकार करते हैं, जबकि वे उनका भरपूर समर्थन करते हैं।

यूरोप और संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई विकसित पश्चिमी शक्तियाँ भी इस तरह के अनियंत्रित आप्रवासन का विरोध करती हैं, क्योंकि वे अपने हितों को प्राथमिकता देती हैं। हालाँकि फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, भारत को इस संप्रभु अधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे उसकी स्थिरता और सुरक्षा दोनों खतरे में पड़ सकती हैं।

हमें याद रखना चाहिए कि भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप पड़ोसी इस्लामी देशों में हिंदू समुदाय को अपने धर्म के कारण उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के परिणाम कश्मीर से लेकर मुर्शिदाबाद तक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

हालाँकि एफटी जैसे संगठनों के लिए, हिंदुओं को अपनी संस्कृति और भविष्य की रक्षा करने के अधिकारों से वंचित कर देना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे भारत को अपनी नीतियाँ तय करने की स्वायत्तता नहीं होनी चाहिए। ये आजादी केवल उन्हीं लोगों को दी जानी चाहिए जिन्हें इस्लामी-वामपंथी गुट उपयुक्त समझते हैं।

(यह लेख मूलरूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

Insta से चाइल्ड पोर्न हटाने के आदेश को ‘ब्लूमबर्ग’ बता रहा META के लिए ‘सिरदर्द’, पड़ी गालियाँ: जानिए कैसे विदेशी मीडिया के लिए बच्चों की सुरक्षा से ज्यादा भारत का विरोध है जरूरी

भारत को अक्सर मानवाधिकारों, संवेदनशीलता, न्याय, बाल संरक्षण और न जाने किस-किस पर ज्ञान देने वाला पश्चिमी मीडिया अपनी बारी आते ही सारी नैतिकता को भूल जाता है। कुछ दिन पहले जब भारत सरकार ने इंस्टाग्राम से चाइल्ड पोर्नोग्राफी हटाने के लिए अमेरिकी टेक कंपनी मेटा को एक नोटिस जारी किया तो ब्लूमबर्ग ने इस एक्शन की सराहना करने की जगह, इसे अपनी रिपोर्ट में Regulatory Headache बताया, जिसकी वजह से अब उन्हें गाली पड़ रही है।

मामला यह था कि भारत के आईटी मंत्रालय ने मेटा कंपनी को एक नोटिस भेजा था। इसमें इंस्टाग्राम पर बच्चों से जुड़ी अश्लील और आपत्तिजनक सामग्री (Child Pornography) वाले विज्ञापनों को तुरंत हटाने और 7 दिनों के भीतर जवाब देने को कहा गया था।

इस सीधी और संक्षिप्त खबर को ब्लूमबर्ग ने ‘कानूनी सिरदर्द’ करार दिया और लिखा- “भारत ने मेटा कंपनी को इंस्टाग्राम से बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री हटाने को कहा है, जो इस अमेरिकी कंपनी के लिए एक नया नियामकीय सिरदर्द है।”

गौरतलब हो कि बच्चों का शोषण और उनसे जुड़ी अश्लील सामग्री कोई छोटा-मोटा कॉरपोरेट मसला नहीं है, बल्कि यह एक बेहद गंभीर और घिनौना अपराध है। ब्लूमबर्ग ने संवेदनहीनता दिखाते हुए इस गंभीर अपराध को ऐसे पेश किया जैसे ये कोई सामान्य बात है और भारत सरकार मेटा कंपनी को कोई बेवजह का काम देकर टेक कंपनी को परेशान कर रही हो।

उनकी इस करतूत ने जाने-अनजाने में बच्चों के साथ होने वाले अपराध से ध्यान भटकाकर पूरा फोकस इस बात पर डाल दिया कि मेटा कंपनी को कितनी ‘असुविधा’ हो रही है, जबकि हकीकत तो यह है कि कंपनी ऐसे घटिया विज्ञापनों से पैसे कमा रही थी।

ब्लूमबर्ग और खबर लिखने वाले पत्रकार ‘संकल्प भरतियाल’ को यह समझने की ज़रूरत है कि बाल यौन शोषण कल्पना से सबसे गंभीर अपराधों में से एक है। इस खबर से ब्लूमबर्ग की संपादकीय नीति और उनकी नैतिकता पर सीधे सवाल खड़े हुए हैं, जिसकी वजह से उन्हें लोगों का गुस्सा झेलना पड़ रहा है।

ब्लूमबर्ग की ऐसी असंवेदनशीलता पर सवाल उठाते हुए, एक भारतीय एक्स यूज़र ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए लिखा- “सिरदर्द? बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री को हटाना कहना आपके लिए एक सिरदर्द है?”

एक अन्य यूज़र ने सवाल किया, “सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से बाल यौन सामग्री को हटाना किसी अमेरिकी टेक दिग्गज के लिए रेगुलेटरी सिरदर्द क्यों होगा? क्या अमेरिका मेटा प्लेटफॉर्म्स पर बाल यौन सामग्री की अनुमति देता है?”

एक और एक्स यूज़र ने लिखा, “ब्लूमबर्ग की समस्या यह नहीं है कि मेटा के प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण सामग्री मौजूद है- उनकी समस्या यह है कि भारत मेटा को इसे हटाने के लिए मजबूर कर रहा है। वे इस नैतिक जिम्मेदारी को ‘रेगुलेटरी हेडएक’ कहते हैं।

ब्लूमबर्ग का मानसिक स्तर गिर चुका है और वे अब ऐसा व्यवहार कर रहे हैं जैसे पीडोफिलिया कोई मुद्दा ही न हो।”

गौरतलब है कि ब्लूमबर्ग की यह हरकत देखकर ऐसा लगता है कि ने यह संवेदनहीनता उन्होंने सिर्फ इसलिए दिखाई क्योंकि यह मामला भारत के आदेश से जुड़ा था। और चूँकि ब्लूमबर्ग अक्सर अपने ओपिनियन वाले आर्टिकल के जरिए भारत विरोधी नैरेटिव चलाने के लिए पहले से ही बदनाम रहा है इसलिए इस बार भी हैरानी की बात नहीं है कि उन्होंने ऐसा किया। मगर, दुखद यह है कि ब्लूमबर्ग पर ऐसी हरकतें अक्सर भारतीय मूल के लेखकों द्वारा करवाई जाती है।

FIFA World Cup: फुटबॉल की सबसे लंबी रात; नेमार की विदाई, हालांड का इतिहास और रोनाल्डो का इम्तिहान

आर्थर जी. लेविस ने अपने काव्य-संग्रह ‘Stub Ends of Thoughts and Verse’ में लिखा था, “It’s not the size of the dog in the fight, but the size of the fight in the dog.” अर्थात, जीत हमेशा आकार नहीं, बल्कि भीतर धधकते साहस और संघर्ष की भूख तय करती है।

बीते दिन खेले गए दो मुकाबलों ने इस विचार को मानो हरे मैदान पर सजीव कर दिया।

न्यू जर्सी स्टेडियम की रोशनी में एक ओर पाँच बार की विश्वविजेता ब्राज़ील थी, तो दूसरी ओर वाइकिंग्स की अदम्य विरासत अपने कंधों पर लिए नॉर्वे। कागज़ पर ब्राज़ील कहीं अधिक शक्तिशाली दिख रही थी, लेकिन फुटबॉल का इतिहास बार-बार याद दिलाता है कि मैदान पर प्रतिष्ठा नहीं, प्रदर्शन बोलता है।

कोच कार्लो एन्सेलोटी ने अपनी टीम को 4-2-3-1 की पारंपरिक संरचना में उतारा। मिडफ़ील्ड की धुरी पर अनुभवी कैसेमीरो के साथ ब्रूनो गुइमाराएज़ थे। उनके आगे विनीसियस जूनियर, गेब्रियल मार्टिनेली और रायान की तेज़तर्रार तिकड़ी विपक्षी रक्षा-पंक्ति को भेदने के लिए तैयार थी, जबकि आक्रमण की अगुवाई शानदार फॉर्म में चल रहे माथियूस कुन्हा कर रहे थे। लाखों प्रशंसकों की निगाहें एक बार फिर नेमार जूनियर को खोज रही थीं, लेकिन वह लगातार दूसरी बार शुरुआती एकादश का हिस्सा नहीं थे।

रेफ़री इस्माइल एलफ़ात की पहली सीटी के साथ ही मुकाबले का आगाज़ होता है। शुरुआती क्षणों से ही नॉर्वे ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह केवल बचाव करने नहीं आई है। मानो किसी मतवाले हाथी की ऊर्जा उनके पैरों में उतर आई हो। तीसरे ही मिनट में नॉर्वे ने एक खतरनाक आक्रमण रचा, लेकिन एलेक्सांडर सोरलोथ ऑफ़साइड करार दिए गए। उधर ब्राज़ील ने भी कुछ ही मिनटों में अपनी लय पकड़ ली। गेंद पर नियंत्रण बढ़ा, पासिंग की गति तेज़ हुई और रायान ने एक शानदार अवसर भी बनाया, मगर अंतिम स्पर्श उन्हें गोल का सुख नहीं दे सका।

बारहवें मिनट में मुकाबले का पहला बड़ा मोड़ आता है। नॉर्वे के पेनाल्टी बॉक्स में ब्राज़ील के एक खिलाड़ी को गलत टैकल से गिरा दिया जाता है और रेफ़री बिना देर किए पेनाल्टी स्पॉट की ओर इशारा कर देते हैं।

विनीसियस जूनियर गेंद उठाकर आगे बढ़ते हैं। पूरा स्टेडियम मानो उनकी ओर देख रहा था। तभी डगआउट से निर्देश आता है और पेनाल्टी लेने की ज़िम्मेदारी ब्रूनो गुइमाराएज़ संभाल लेते हैं।

लेकिन अगले ही पल न्यू जर्सी स्टेडियम गूँज उठता है।

पिछले मुकाबले के नायक ओर्हान नायलांड अपनी दाईं ओर बिजली-सी फुर्ती के साथ डाइव लगाते हैं और शानदार बचाव करते हुए ब्राज़ील की पेनाल्टी को गोल में बदलने से रोक देते हैं। यह केवल एक सेव नहीं थी; यह पूरे मुकाबले की मानसिक दिशा बदल देने वाला क्षण था। नॉर्वे का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ चुका था और ब्राज़ील पहली बार दबाव महसूस करती दिखाई दी।

इसके बाद खेल लगातार एक छोर से दूसरे छोर तक बहता रहा। ब्राज़ील की ओर से रायान और विनीसियस जूनियर लगातार नॉर्वे की रक्षापंक्ति को परखते रहे, जबकि दूसरी ओर अर्लिंग हालांड और कप्तान मार्टिन ओडेगार्द भी गोल की दिशा में कई प्रयास करते रहे। दोनों टीमें आक्रमण कर रही थीं, दोनों अवसर बना रही थीं, लेकिन गोल जैसे दोनों गोलपोस्टों से रूठ गया था।

पहले हाफ़ की समाप्ति पर स्कोरबोर्ड अब भी 0-0 ही दिखा रहा था।

दूसरे हाफ़ की शुरुआत के साथ ही नॉर्वे ने अपनी रणनीति में बदलाव किया। कोच सोलबाक्केन ने एंटोनियो नूसा और एलेक्सांडर सोरलोथ को बाहर बुलाकर आंद्रेस शेल्डेरुप और ऑस्कर बॉब को मैदान पर उतारा। जवाब में ब्राज़ील ने भी माथियूस कुन्हा की जगह युवा एंड्रिक को मौका दिया।

समय आगे बढ़ता गया और मुकाबला पहले से कहीं अधिक खुलने लगा। दोनों टीमें जीत की तलाश में लगातार जोखिम उठा रही थीं। ब्राज़ील गेंद पर अधिक नियंत्रण रख रही थी, जबकि नॉर्वे हर जवाबी हमले में खतरनाक दिख रही थी।
फिर भी घड़ी जब पैंसठवें मिनट तक पहुँची, स्कोर अब भी शून्य पर अटका हुआ था।

मैदान पर ऐसे खिलाड़ी मौजूद थे जो एक स्पर्श, एक दौड़ या एक शॉट से पूरे मुकाबले की कहानी बदल सकते थे। लेकिन फुटबॉल कभी-कभी धैर्य की भी परीक्षा लेता है; और इस रात, गोल अब भी दोनों टीमों की पहुँच से दूर था।

मुकाबले का अड़सठवाँ मिनट।

अचानक पूरा न्यू जर्सी स्टेडियम शोर से भर उठता है।

टचलाइन के पास एक परिचित चेहरा वार्म-अप समाप्त कर चौथे अधिकारी के साथ खड़ा था। वह खिलाड़ी, जिसे देखने के लिए करोड़ों लोग अब भी हर बार टीवी स्क्रीन के सामने बैठ जाते हैं।

एक गोल की तलाश में कोच कार्लो एन्सेलोटी आखिरकार अपना सबसे बड़ा दाँव चलते हैं।

गेब्रियल मार्टिनेली की जगह नेमार जूनियर मैदान पर उतरते हैं।

जैसे ही वह हरी घास पर कदम रखते हैं, स्टेडियम तालियों और नारों से गूँज उठता है। यह केवल एक बदलाव नहीं था; यह ब्राज़ील की आख़िरी उम्मीद थी।

लेकिन समय किसी का इंतज़ार नहीं करता।

पचहत्तरवें मिनट तक स्कोरबोर्ड अब भी 0-0 पर स्थिर था। हर बीतता सेकंड दोनों देशों के समर्थकों की धड़कनें और तेज़ कर रहा था। अब किसी भी टीम के लिए सबसे बड़ा भय एक लेट गोल था, वह गोल जो पूरे अभियान की दिशा बदल देता है।

और फिर…

उन्नासीवें मिनट में वही हुआ जिसकी कल्पना बहुत कम लोगों ने की थी।

बाएँ फ्लैंक पर स्थानापन्न खिलाड़ी आंद्रेस शेल्डेरुप गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। बॉक्स के किनारे पहुँचकर वह एक सटीक पास अर्लिंग हालांड की ओर बढ़ाते हैं। हालांड अपने सामने खड़े ब्राज़ीली डिफेंडर को एक झटके में छकाते हैं, संतुलन बनाते हैं और अगले ही पल दाएँ पैर से गोल की दिशा में विस्फोटक प्रहार करते हैं।

एलिसन बेकर पूरी ताकत से डाइव लगाते हैं। लेकिन इस बार उनकी उँगलियाँ गेंद तक नहीं पहुँच पातीं।

गेंद जाल से टकराती है।

गोल।

नॉर्वे 1, ब्राज़ील 0।

कुछ क्षण पहले तक पीले रंग में डूबा न्यू जर्सी स्टेडियम अचानक मौन हो चुका था। यह केवल एक गोल नहीं था; यह उस आत्मविश्वास पर पहला गहरा प्रहार था जिसके सहारे ब्राज़ील मैदान में उतरी थी।

ब्राज़ील संभल भी नहीं पाई थी कि दस मिनट बाद नॉर्वे ने दूसरी चोट कर दी।

एक बार फिर बाएँ किनारे से आंद्रेस शेल्डेरुप ने शानदार क्रॉस उठाया। एक बार फिर गेंद अर्लिंग हालांड तक पहुँची। और एक बार फिर विश्व फुटबॉल के इस घातक स्ट्राइकर ने एलिसन बेकर को छकाते हुए गेंद को गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा दिया।

नॉर्वे 2, ब्राज़ील 0।

ब्राज़ील के खिलाड़ियों के कंधे झुक चुके थे।

दर्शक-दीर्घा में बैठे लाखों समर्थकों के चेहरों से रंग उतर चुका था। दस मिनट पहले तक जो मुकाबला बराबरी पर था, वह अचानक ब्राज़ील की पकड़ से फिसल चुका था। निगाहें बार-बार डगआउट की ओर उठ रही थीं, लेकिन कार्लो एन्सेलोटी के पास भी इस तूफ़ान का कोई तत्काल उत्तर नहीं था।

फिर भी ब्राज़ील ने हार स्वीकार नहीं की।

हर आक्रमण के साथ वह वापसी की उम्मीद तलाशती रही। दूसरी ओर नॉर्वे अब अपने प्रत्येक खिलाड़ी के साथ केवल एक लक्ष्य लेकर खेल रही थी; किसी भी कीमत पर यह बढ़त बचानी है।

इंजरी टाइम चल रहा था।

90+8वें मिनट में नॉर्वे से एक चूक हो जाती है। अपने ही पेनाल्टी बॉक्स में किया गया फाउल रेफ़री इस्माइल एलफ़ात की नज़र से नहीं बचता और ब्राज़ील को पेनाल्टी मिल जाती है।

अब गेंद के पीछे खड़े थे नेमार जूनियर।

कंधों पर करोड़ों उम्मीदों का भार था, लेकिन यह भार उनके लिए नया नहीं था।

नेमार लंबी साँस लेते हैं।

दौड़ते हैं।

और सटीक प्रहार के साथ गेंद को गोलपोस्ट के भीतर पहुँचा देते हैं।

स्कोर अब 2-1 था।

उम्मीद अभी पूरी तरह मरी नहीं थी।

लेकिन फुटबॉल कभी-कभी आशा को केवल कुछ क्षणों का ही समय देता है।

दो मिनट बाद रेफ़री इस्माइल एलफ़ात अंतिम सीटी बजा देते हैं।

और उसी सीटी के साथ केवल ब्राज़ील का विश्व कप अभियान समाप्त नहीं होता।

उसके साथ समाप्त होता है एक ऐसे राजकुमार का अंतरराष्ट्रीय अध्याय भी, जो अपार प्रतिभा के बावजूद कभी विश्व फुटबॉल का ताज अपने सिर पर नहीं सजा सका।

कई प्रशंसकों को यह एहसास था कि शायद वे नेमार को आख़िरी बार विश्व कप में देख रहे हैं।

उनकी आँखें नम थीं।

ब्राज़ील के खिलाड़ी रो रहे थे।

दर्शक-दीर्घा में बैठे हज़ारों समर्थकों की आँखें भीग चुकी थीं।

उधर दूसरी ओर नॉर्वे इतिहास रच रही थी।

खिलाड़ी अपने समर्थकों के साथ विजय का उत्सव मना रहे थे। स्टेडियम में मौजूद अल्फ-इंगे हालांड अपने पुत्र को निहार रहे थे। जो सपना उनकी पीढ़ी पूरा नहीं कर सकी थी, उसे आज अर्लिंग हालांड ने साकार कर दिया था।

नॉर्वे ने पाँच बार की विश्व चैंपियन ब्राज़ील को पराजित कर क्वार्टर फ़ाइनल में प्रवेश कर लिया था।

यह केवल एक जीत नहीं थी; यह नॉर्वेजियन फुटबॉल के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखी जाने वाली रात थी।

ओस्लो की सड़कों पर उत्सव शुरू हो चुका था।

स्टेडियम में वाइकिंग क्लैप्स की गूँज दूर तक सुनाई दे रही थी।

मैच के बाद कोच स्टाले सोलबाक्केन ने कहा; यह नॉर्वेजियन फुटबॉल के इतिहास की सबसे महान रात है।

उधर अर्लिंग हालांड इस टूर्नामेंट में अपने सातवें गोल के साथ अब गोल्डन बूट की दौड़ में सबसे आगे निकल चुके थे।

मैच से पहले अधिकांश विशेषज्ञों ने ब्राज़ील की सहज जीत की भविष्यवाणी की थी। किसी ने 2-1 कहा, किसी ने 3-0।

लेकिन फुटबॉल भविष्यवाणियों से नहीं, मैदान पर लिखी गई कहानियों से याद रखा जाता है।

अपने सबसे घातक योद्धा अर्लिंग हालांड के दो गोल, ओर्हान नायलांड के अद्भुत बचाव और अंतिम क्षण तक अडिग रहे सामूहिक जज़्बे के दम पर नॉर्वे ने न केवल ब्राज़ील को पराजित किया, बल्कि विश्व फुटबॉल को यह भी याद दिला दिया कि साहस, अनुशासन और विश्वास जब एक साथ मैदान पर उतरते हैं, तब दिग्गज भी धराशायी हो जाते हैं।

लेकिन यह दिन अभी समाप्त नहीं हुआ था।

कुछ ही घंटों बाद, भारतीय समयानुसार सुबह साढ़े छह बजे, विश्व फुटबॉल की निगाहें मेक्सिको सिटी के ऐतिहासिक ऐज़्टेका स्टेडियम पर टिक गईं।

यहाँ मेज़बान मेक्सिको के सामने थी यूरोप की सबसे प्रबल दावेदारों में गिनी जाने वाली इंग्लैंड।

दर्शक-दीर्घा गहरे हरे रंग की जर्सियों से पट चुकी थी। हजारों मेक्सिकन समर्थक अपने पारंपरिक गीतों और नारों के साथ अपनी टीम का उत्साह बढ़ा रहे थे।

ऐज़्टेका; वह दुर्ग जिसने दशकों तक मेक्सिकन फुटबॉल की सबसे बड़ी जीतों का साक्षी बनकर इतिहास रचा है, आज एक और अविस्मरणीय अध्याय अपने भीतर दर्ज करने के लिए तैयार खड़ा था।

अब बारी थी दिन के दूसरे महासंग्राम की।

ऐज़्टेका स्टेडियम में अपनी पारंपरिक गहरे हरे रंग की जर्सी पहने मेक्सिको मैदान पर उतरती है। दूसरी ओर कप्तान हैरी केन के नेतृत्व में इंग्लैंड की ‘थ्री लायन्स’ पूरे आत्मविश्वास के साथ इतिहास की एक और सीढ़ी चढ़ने को तैयार थी।

रेफ़री की पहली सीटी बजती है।

और मुकाबला शुरू होते ही तनाव अपने चरम पर पहुँच जाता है।

पहले ही मिनट में इंग्लैंड के मिडफ़ील्डर डेक्लन राइस को पीला कार्ड दिखा दिया जाता है। तीसरे मिनट में राउल जिमिनेज़ इंग्लैंड के गोल पर पहला गंभीर हमला बोल देते हैं।

शुरुआती क्षणों से ही मेक्सिको ने इंग्लैंड की कमर कस दी थी।

गेंद पर नियंत्रण, तेज़ पासिंग और आक्रामक प्रेसिंग; हर विभाग में मेक्सिको इंग्लैंड से एक कदम आगे दिखाई दे रही थी। इंग्लिश खिलाड़ियों के पास गेंद पहुँचती भी तो अगले ही क्षण हरे रंग की जर्सियाँ उन्हें चारों ओर से घेर लेतीं और गेंद वापस अपने कब्ज़े में ले लेतीं।

ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा मुकाबला इंग्लैंड के आधे हिस्से में सिमट गया हो।

राउल जिमिनेज़ ने एक और शानदार अवसर बनाया, लेकिन इंग्लिश डिफेंस ने समय रहते ख़तरा टाल दिया। कुछ ही देर बाद गिल्बर्टो मोरा ने भी गोल की दिशा में दमदार प्रयास किया। पहले हाइड्रेशन ब्रेक तक इंग्लैंड किसी तरह स्कोरलाइन को 0-0 पर रोकने में सफल रही।

ब्रेक के बाद इंग्लैंड ने अपनी रणनीति बदली।

अब उनका लक्ष्य गेंद पर नियंत्रण नहीं, बल्कि जवाबी हमले थे। वे धैर्य के साथ मेक्सिको को आगे आने दे रहे थे ताकि गेंद छीनते ही बिजली की गति से पलटवार किया जा सके।

यही बदलाव आगे चलकर निर्णायक साबित होने वाला था।

एंथनी गॉर्डन ने एक तेज़ आक्रमण रचा, लेकिन उनका प्रयास लक्ष्य से बाहर चला गया। दूसरी ओर मेक्सिको भी बिना किसी भय के लगातार हमले करती रही।

फिर अचानक…

छत्तीसवें मिनट में बुकायो साका के सटीक पास पर ज्यूड बेलिंघम बॉक्स के भीतर पहुँचते हैं और गेंद को गोल में बदल देते हैं।

इंग्लैंड 1, मेक्सिको 0।

मेक्सिको अभी इस झटके से उबर भी नहीं पाई थी कि दो मिनट बाद बेलिंघम ने फिर वही कहानी दोहरा दी।

एक और शानदार मूव।

एक और सटीक फ़िनिश।

और देखते ही देखते स्कोर 2-0 हो चुका था।

जो टीम कुछ क्षण पहले तक पूरे मैच पर हावी थी, वह अचानक बैकफुट पर पहुँच गई थी। ऐज़्टेका की गूँज कुछ पल के लिए थम-सी गई।

लेकिन मेक्सिको ने हार मानना नहीं सीखा था।

सिर्फ पाँच मिनट बाद हूलियान क्विन्योनेस ने हवा में उछलती गेंद पर अद्भुत वॉली लगाई और इंग्लैंड की बढ़त आधी कर दी।

स्कोर 2-1।

ऐज़्टेका एक बार फिर जीवित हो उठा।

45+1वें मिनट में राउल जिमिनेज़ ने दूर से जोरदार प्रहार किया, लेकिन गेंद लक्ष्य से भटक गई। कुछ ही देर बाद उनका हेडर भी गोल में तब्दील नहीं हो सका। फिर एक कॉर्नर मिला, फिर एक अवसर बना, लेकिन बराबरी का गोल नहीं आया।

पहला हाफ़ इंग्लैंड की 2-1 की बढ़त के साथ समाप्त हुआ, मगर स्कोरलाइन यह नहीं बता पा रही थी कि मेक्सिको ने इस मुकाबले में कितनी ऊर्जा और साहस झोंक दिया था।

दूसरे हाफ़ का आगाज़ हुआ।

मेक्सिको ने फिर वही आक्रामक लय पकड़ ली।

और चौवनवें मिनट में मुकाबले का सबसे बड़ा मोड़ सामने आया।

एक ख़तरनाक टैकल के लिए जारेल क्वान्सा को सीधा रेड कार्ड दिखा दिया गया।

अब इंग्लैंड को शेष मुकाबला केवल दस खिलाड़ियों के साथ खेलना था।

मौका देखकर मेक्सिको ने दबाव और बढ़ा दिया। हूलियान क्विन्योनेस ने फिर गोल की ओर हमला बोला, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी। उधर इंग्लैंड के कोच ने तुरंत सामरिक बदलाव करते हुए एक आक्रमणकारी खिलाड़ी को बाहर बुलाकर अतिरिक्त डिफेंडर मैदान पर उतार दिया।

लेकिन ठीक उसी समय मेक्सिको से एक ऐसी भूल हुई जिसकी कीमत उन्हें बहुत भारी पड़ने वाली थी।

सत्तावनवें मिनट में अपने ही पेनाल्टी बॉक्स के भीतर किया गया अनावश्यक फाउल इंग्लैंड के पक्ष में पेनाल्टी में बदल गया।

कप्तान हैरी केन गेंद के पीछे खड़े थे।

उन्होंने बिना कोई गलती किए गेंद को गोल में पहुँचा दिया।

इंग्लैंड 3, मेक्सिको 1।

जो संख्यात्मक बढ़त रेड कार्ड के कारण मेक्सिको को मिली थी, वह एक पल की असावधानी में लगभग निष्प्रभावी हो चुकी थी।

फिर भी मेक्सिको झुकी नहीं।

साठ मिनट के बाद एक बार फिर उसने लगातार आक्रमणों की झड़ी लगा दी।

और अड़सठवें मिनट में इस बार इंग्लैंड से चूक हुई।

हैरी केन अपने ही पेनाल्टी बॉक्स में मेक्सिको के खिलाड़ी को गिरा बैठते हैं और रेफ़री बिना हिचकिचाहट पेनाल्टी स्पॉट की ओर इशारा कर देते हैं।

राउल जिमिनेज़ आगे बढ़ते हैं।

एक शांत, सटीक और आत्मविश्वास से भरा प्रहार।

गेंद जाल में समा जाती है।

स्कोर अब 3-2 था।

ऐज़्टेका फिर गरज उठा।

अब दबाव पूरी तरह इंग्लैंड के कंधों पर था।

अगले बीस मिनट विश्व कप फुटबॉल के सबसे रोमांचक क्षणों में बदल गए।

मेक्सिको लगातार आक्रमण करती रही। हर पास, हर क्रॉस और हर शॉट के साथ स्टेडियम साँसें रोक लेता।

लेकिन दूसरी ओर जॉर्डन पिकफ़र्ड मानो दीवार बनकर खड़े थे।

उन्होंने एक के बाद एक कई ऐसे बचाव किए जो लगभग असंभव प्रतीत हो रहे थे।

दस खिलाड़ियों के साथ खेल रही इंग्लैंड ने अंतिम सीटी तक अनुशासन नहीं छोड़ा।

और अंततः वही अनुशासन उन्हें क्वार्टर फ़ाइनल का टिकट दिला गया।

इंग्लैंड 3, मेक्सिको 2।

मेक्सिको हार चुकी थी।

लेकिन यह उन हारों में से नहीं थी जिनमें सम्मान छिन जाता है।

वे लड़कर गिरे थे।

और शायद इसी कारण पूरे ऐज़्टेका ने अंतिम सीटी के बाद भी अपने खिलाड़ियों का सिर झुकने नहीं दिया।

विश्व कप के इतिहास में कुछ मुकाबले केवल परिणामों से नहीं, बल्कि अपने साहस, गति और भावनाओं से अमर हो जाते हैं।

यह भी उन्हीं में से एक था।

ज्यूड बेलिंघम के दो मिनट में आए दो गोल निर्णायक साबित हुए और ‘थ्री लायन्स’ क्वार्टर फ़ाइनल में पहुँच गई।

अब निगाहें अगले महासंग्राम पर टिक चुकी हैं।

आज रात डलास स्टेडियम में यूरोपीय फुटबॉल की दो महाशक्तियाँ; पुर्तगाल और स्पेन आमने-सामने होंगी।

यदि स्पेन विजयी होती है, तो संभव है कि फुटबॉल प्रेमी ठीक वैसे ही एक युग का अंत देखें, जैसा उन्होंने ब्राज़ील की हार के साथ नेमार के विदाई क्षणों में देखा।

क्या आज क्रिस्टियानो रोनाल्डो भी राष्ट्रीय टीम की जर्सी में अपना अंतिम मुकाबला खेलेंगे?

या फिर जीत के लिए सदैव भूखे रहने वाले रोनाल्डो एक बार फिर स्पेन जैसी दिग्गज टीम को टूर्नामेंट से बाहर का रास्ता दिखाकर अपने सफ़र को आगे बढ़ाएँगे?

याद रहे, स्पेन मौजूदा यूरोपीय चैंपियन है, लेकिन पुर्तगाल ने इसी स्पेन को यूईएफ़ए नेशन्स लीग के फ़ाइनल में पेनाल्टी शूटआउट में हराकर ट्रॉफी अपने नाम की थी।

इतिहास, प्रतिद्वंद्विता और दिग्गजों का यह टकराव; हर मायने में एक फ़ाइनल जैसा होने वाला है।

इसके बाद कल सुबह साढ़े पाँच बजे सिएटल में मेज़बान अमेरिका का सामना शानदार लय में चल रही बेल्जियम से होगा।

लेकिन उससे पहले…

पूरी दुनिया की निगाहें आज रात साढ़े बारह बजे डलास पर टिकी होंगी।

क्या यह क्रिस्टियानो रोनाल्डो की आख़िरी रात होगी?

या फिर एक बार फिर इतिहास उनके पक्ष में झुक जाएगा?

इस प्रश्न का उत्तर देगा केवल मैदान। यही रात अंतिम। यही रात भारी।

दिलजीत दोसांझ की ‘सतलुज’ पर फैलाया जा रहा ‘अर्धसत्य’: इसे कानूनी वजहों से ZEE5 ने हटाया, सरकार ने नहीं लगाया कोई बैन; जानिए पूरा मामला

करीब चार साल की देरी और तीन बार नाम बदलने के बाद हनी त्रेहान की मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी फिल्म रिलीज हुई। पहले इस फिल्म का नाम घल्लूघारा था, फिर इसे पंजाब ’95 और औखिर में सतलुज नाम दिया गया। दिलजीत दोसांझ इस फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे हैं।

फिल्म को ZEE5 पर भारत और दुनिया के दूसरे देशों में एक साथ रिलीज किया गया। लेकिन रिलीज होने के सिर्फ दो दिन बाद ही इसे भारत में ZEE5 से हटा दिया गया, जबकि दूसरे देशों में यह फिल्म पहले की तरह उपलब्ध रही। ZEE5 ने फिल्म हटाने की वजह बताते हुए सिर्फ इतना कहा कि यह फैसला ‘मौजूदा परिस्थितियों’ को देखते हुए लिया गया है।

आम धारणा के उलट, यह फिल्म किसी सरकारी बैन या आधिकारिक रोक की वजह से नहीं हटाई गई। इसकी असली वजह भारत के इंटरनेट नियमों का एक कम चर्चित प्रावधान है। इस नियम पर फिलहाल अदालत के आदेशों के कारण पूरी तरह अमल नहीं हो रहा है। ऐसे में जब किसी तरह का कानूनी सवाल उठता है, तो डिजिटल प्लेटफॉर्म अक्सर सावधानी बरतते हुए कंटेन्ट को हटा देते हैं।

ZEE5 ने साफ कहा कि वह इस फिल्म का समर्थन करता है और इसे दोबारा प्लेटफॉर्म पर लाने के लिए सभी जरूरी कानूनी और दूसरे विकल्पों पर काम कर रहा है। इससे यह साफ होता है कि यह मामला सीधे तौर पर सेंसरशिप का नहीं, बल्कि डिजिटल कंटेन्ट से जुड़े कानूनी नियमों की जटिल प्रक्रिया का है।

यानी जिस फिल्म को कई साल इंतजार के बाद आखिरकार दर्शक मिले थे, वह एक बार फिर लोगों की नजरों से ओझ हो गई। लेकिन इसकी वजब किसी सरकार की रोक नहीं, बल्कि अधूरे और उलझे हुए कानूनी नियम बने।

तीन साल और 127 बदलाव

फिल्म की मुश्किलें 2022 के आखिर में ही शुरू हो गई थीं, जब RSVP ने इसे केंद्रीय फिल्म प्रमाण बोर्ड (CBFC) के पास सर्टिफिकेट के लिए भेजा। करीब 6 महीने चली प्रक्रिया के बाद बोर्ड ने 21 बदलाव (कट) औऱ फिल्म का नाम बदलने की शर्त पर इसे मंजूरी दी। बोर्ड का कहना था कि फिल्म के कुछ दृश्य हिंसा को बढ़ावा दे सकते हैं या सिख युवाओं पर गलत असर डाल सकते हैं।

इसके बाद RSVP ने इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद माँगे गए बदलावों की संख्या बढ़कर 127 तक पहुँच गई। फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहान ने बाद में यह जानकारी साझा की।

बोर्ड ने फिल्म के नाम से ‘पंजाब’ शब्द हटाने की भी माँग की, जबकि पूरी कहानी पंजाब में ही दिखाई गई है। इसके अलावा पंजाब पुलिस का जिक्र हटाने और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का नाम न लेने की भी बात कही गई। हनी त्रेहान ने इन माँगों को इतिहास के कुछ हिस्सों को मिटाने की कोशिश बताया।

इसी लंबे विवाद के बीच 2023 में फिल्म का टोरोंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में होने वाला वर्ल्ड प्रीमियर भी रद्द हो गया। मीडिया रिपोर्ट्स में इसके पीछे राजनीतिक कारणों को जिम्मेदार बताया गया।

असल सवाल: IT नियम 2021 का नियम 9 क्या कहता है और यह अब तक लागू क्यों नहीं हो पाया?

सतलुज फिल्म के रिलीज और हटने की कहानी सीधे सेंसरशिप से ज्यादा भारत के डिजिटल कंटेन्ट से जुड़े नियमों को समझने की कहानी है। भारत में किसी फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज करने से पहले CBFC से सर्टिफिकेट लेना जरूरी होता है। यह नियम सिनेमैटोग्राफ नियम, 1952 के तहत लागू है। लेकिन OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज होने वाली फिल्मों और वेब सीरीज के लिए CBFC का सर्टिफिकेट जरूरी नहीं है।

दिसंबर 2025 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने लोकसभा में भी साफ किया था कि CBFC की जिम्मेदारी केवल सिनेमाघरों में दिखाई जाने वाली फिल्मों तक सीमित है। OTT प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेन्ट पर CBFC नियम लागू नहीं होते।

OTT प्लेटफॉर्म पर आने वाले कंटेन्ट के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम 2021 लागू होते हैं। इनमें सबसे अहम नियम 9 है। नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म को तय की गई आचार संहिता का पालन करना होता है। वहीं नियम 9(3) यह बताता है कि इन नियमों का पालन कैसे कराया जाएगा। इसके लिए तीन स्तर की स्व-नियमन (Self-Regulation) व्यवस्था बनाई गई है।

पहला स्तर: OTT प्लेटफॉर्म खुद शिकायतों की सुनवाई करता है। इसके लिए हर प्लेटफॉर्म को अपना शिकायत निवारण अधिकारी (Grievance Officer) नियुक्त करना होता है।
दूसरा स्तर: अगर मामला वहीं नहीं सुलझता, तो उसे उद्योग के स्व-नियामक संगठन (Self-Regulating Body) के पास भेजा जाता है।
तीसरा स्तर: इसके बाद भी जरूरत पड़ने पर मामला सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की अंतर-विभागीय निगरानी समिति के पास जाता है।

यह तीन स्तरीय व्यवस्था तय करती है कि OTT प्लेटफॉर्म अपने कंटेन्ट को कैसे जारी करेंगे और जरूरत पड़ने पर उसे हटाने या उस पर कार्रवाई करने का फैसला कैसे लिया जाएगा।

लेकिन सबसे अहम बात यह है कि IT नियम 2021 का नियम 9 लागू होने के कुछ ही दिनों बाद अदालत ने उस पर अंतरिम रोक लगा दी थी। 14 अगस्त 2021 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने नियम 9(1) और 9(3) पर रोक लगा दी। यह मामला पत्रकार निखिल वागले और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘द लीफलेट’ की ओर से दायर किया गया था। अदालत ने शुरुआती सुनवाई में माना कि इन नियमों में शामिल आचार संहिता संविधान के खिलाफ हो सकती है और केंद्र सरकार को IT कानून के तहत ऐसे नियम बनाने का अधिकार भी नहीं हो सकता।

इसके कुछ हफ्तों बाद मद्रास हाई कोर्ट ने भी इसी तरह की रोक लगाई और कहा कि बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश पूरे देश में लागू माना जाएगा।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2024 में इस नियम से जुड़े सभी मामलों को एक साथ सुनवाई के लिए दिल्ली हाई कोर्ट भेज दिया। वहाँ नवंबर 2024 से सुनवाई शुरू हुई, लेकिन अब तक इस मामले में अंतिम फैसला नहीं आया है। यानी नियम 9 को बने हुए लगभग पूरा समय बीत चुका है, लेकिन उस पर लगी अदालत की रोक अभी भी जारी है। इसके बावजूद केंद्र सरकार संसद में अब भी इन्हीं नियमों को भारत में OTT प्लेटफॉर्म के लिए लागू व्यवस्था बताती रही है।

सीधे शब्दों में कहें तो जिस नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म अपने कंटेन्ट का खुद वर्गीकरण (Self-Certification) करते हैं और शिकायत मिलने पर उसे हटाने जैसी कार्रवाई कर सकते हैं, वही नियम कई वर्षों से अदालत में चुनौती के दायरे में है और उस पर अंतरिम रोक लगी हुई है।

यानी सतलुज जिस कानूनी व्यवस्था के तहत OTT पर रिलीज हुई थी, उसी व्यवस्था के तहत बाद में उसे प्लेटफॉर्म से हटा भी दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया ऐसे नियमों के आधार पर हुई, जिनकी वैधता पर पिछले करीब पाँच साल से अदालतों में सुनवाई चल रही है और जिन पर अब तक अंतिम फैसला नहीं आया है।

फिल्म हटाने का फैसला ZEE5 का था, सरकार का नहीं

सतलुज के निर्माताओं ने फिल्म का पूरा और बिना किसी कट वाला संस्करण पहले ही दिन दुनिया भर में ZEE5 पर रिलीज करने का फैसला किया। उन्होंने फिल्म में और बदलाव करने के बजाए इसे उसी रूप में दर्शकों तक पहुँचाया, जैसा इसे पहले अलग-अलग फिल्म समारोहों में दिखाया गया था।

निर्माताओं का मकसद साफ था। वे चाहते थे कि दुनिया भर के दर्शक फिल्म को बिना किसी बदलाव के देख सकें, इससे पहले कि किसी तरह के नए दबाव के कारण इसमें और कट लगाने पड़ें। यह इसलिए भी अहम था क्योंकि फिल्म के आखिर में जसवंत सिंह खालड़ा की पुलिस हिरासत में हत्या को दिखाया गया है। अगर इस हिस्से में बदलाव किया जाता, तो फिल्म का मुख्य संदेश कमजोर पड़ जाता।

हालाँकि, रिलीज के सिर्फ दो दिन बाद ZEE5 ने फिल्म को भारत में अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। प्लेटफॉर्म ने हटाने की कोई साफ वजह नहीं बताई, लेकिन कहा कि वह तय कानूनी प्रक्रिया के तहत फिल्म को दोबारा उपलब्ध कराने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहा है।

अब तक इस मामले में सरकार की ओर से फिल्म हटाने का कोई आधिकारिक आदेश सामने नहीं आया है। यानी फिल्म को हटाने का फैसला ZEE5 ने अपनी आतंरिक शिकायत और स्व-नियमन प्रक्रिया के तहत लिया। यही वह कानूनी व्यवस्था है, जिस पर कई वर्षों से अदालत में सुनवाई चल रही है और जिस पर अभी भी अंतरिम रोक लगी हुई है।

रिकॉर्ड क्या कहते हैं?

फिल्म जिस मुद्दे को उठाती है, उसका सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंजाब में लापता हुए लोगों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन था? इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है। उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि इस कहानी के दो पहलू हैं और दोनों को समझना जरूरी है।

जसवंत सिंह खालड़ा, जो अमृतसर में एक बैंक मैनेजर थे, उन्होंने श्मशान घाटों में खरीदी गई लकड़ियों के रिकॉर्ड की जाँच की। इसी आधार पर उन्होंने दावा किया कि कई अज्ञात लोगों के शवों को गैरकानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। सितंबर 1995 में पंजाब पुलिस ने उनका अपहरण कर लिया और बाद में उनकी हत्या कर दी। इस मामले में 6 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

CBI की दिसंबर 1996 की रिपोर्ट में भी कहा गया कि केवल अमृतसर जिले में ही 2,097 लोगों का गैरकानूनी तरीके से अंतिम संस्कार किया गया था। इनमें से 582 लोगों की पहचान हो गई थी, जबकि 278 लोगों की आंशिक पहचान हो सकी थी।

बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर की याचिका पर सुनवाई करते हुए इसे बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया। अदालत ने इस मामले को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के पास भेजा। इसके बाद 2006 तक 1245 पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया गया।

लेकिन यह कहानी का सिर्फ एक हिस्सा है। दूसरी ओर, पंजाब में आतंकवाद विरोधी अभियान ऐसे समय चला, जब करीब एक दशक तक खालिस्तानी उग्रवाद ने राज्य में भारी हिंसा फैलाई थी। पुलिस अधिकारी केपीएस गिल के अनुसार, इस हिंसा में करीब 21,469 लोगों की जान गई। इनमें लगभग 11,700 आम नागरिक थे, जिन्हें खालिस्तानी उग्रवादी संगठनों ने मार डाला। मरने वालों में हजारों सिख और करीब 4,500 हिंदू भी शामिल थे।

Human Rights Watch की रिपोर्ट भी इन दोनों पहलुओं का जिक्र करती है। रिपोर्ट के अनुसार, एक तरफ खालिस्तानी संगठनों ने आम लोगों की हत्याएँ और राजनीतिक नेताओं पर हमले किए। वहीं दूसरी तरफ 1984 से 1995 के बीच सरकारी कार्रवाई के दौरान कई लोगों को बिना कानूनी प्रक्रिया के हिरासत में लिया गया, उनके साथ यातनाएँ हुईं और हजारों लोग लापता हो गए।

यानी अगर कोई फिल्म या लेख सिर्फ एक पक्ष दिखाता है, तो जरूरी नहीं कि वह गलत हो। लेकिन वह पूरी कहानी भी नहीं बता रहा होता। इस पूरे दौर को समझने के लिए दोनों पक्षों को साथ देखकर ही सही तस्वीर सामने आती है।

निष्कर्ष

अगर कोई कहता है कि सतलुज पर सरकार ने बैन लगा दिया, तो पूरी सच्चाई इससे थोड़ी अलग है। अब तक ऐसे कोई जानकारी सामने नहीं आई है कि सरकार ने फिल्म पर आधिकारिक रोक लगाई हो। फिल्म पहले IT नियम, 2021 के नियम 9 के तहत OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई और बाद में उसी व्यवस्था के तहत उसे हटा भी दिया गया। खास बात यह है कि इसी नियम पर 2021 से अदालतों में सुनवाई चल रही है और इसकी वैधता पर अब तक अंतिम फैसला नहीं आया है।

फिल्म के निर्माताओं रॉनी स्क्रूवाला की कंपनी RSVP Movies और MacGuffin Pictures ने पहले ही दिन का पूरा और बिना किसी कट वाला संस्करण ZEE5 के अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर रिलीज कर दिया था। इसलिए भारत में फिल्म हटने के बाद भी दुनिया के कई देशों में दर्शक इसे देख सकते थे।

कुल मिलाकर, पाँच साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद IT नियम 2021 के नियम 9 की कानूनी स्थित अब भी पूरी तरह साफ नहीं है। इसके बावजूद OTT प्लेटफॉर्म और कंटेन्ट बनाने वाले इसी व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)