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CM योगी के हेलीकॉप्टर की आपात लैंडिंग, वाराणसी में टेक ऑफ करते ही टकराया पक्षी: विकास कार्यों की समीक्षा के साथ किए थे बाबा विश्वनाथ के दर्शन

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हेलीकॉप्टर की वाराणसी में आपात लैंडिंग (Yogi Adityanath’s Helicopter Emergency Landing After Bird Hit) कराई गई है। वाराणसी का दौरा खत्म करने के बाद सीएम योगी सर्किट हाउस से लखनऊ के लिए रवाना हो रहे थे। जैसे ही उनके हेलीकॉप्टर ने टेक ऑफ किया, एक पक्षी आकर उससे टकरा गया। इसके तुरंत बाद पायलट ने हेलीकॉप्टर की आपात लैंडिंग करा दी।

शुरुआती तौर पर पता चला है कि यह हादसा उस वक्त हुआ, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का हेलीकॉप्टर वाराणसी के रिजर्व पुलिस लाइन्स ग्राउंड से लखनऊ के लिए रवाना हुआ। हालाँकि, दुर्घटना के बाद हेलीकॉप्टर की पुलिस लाइन में ही लैंडिंग करा दी गई। मुख्यमंत्री सर्किट हाउस में वापस आ गए हैं। वो पूरी तरह से सुरक्षित हैं। अब वह सरकारी विमान से लखनऊ के लिए रवाना होंगे।

रिपोर्ट के मुताबिक, वाराणसी के जिलाधिकारी कौशलराज शर्मा ने इसकी पुष्टि की है। उन्होंने कहा, “यहाँ (वाराणसी) से लखनऊ के लिए उड़ान भरने के बाद एक पक्षी सीएम योगी के हेलीकॉप्टर से टकरा गया, जिसके बाद उसे उतरना पड़ा।” उन्होंने कहा कि अब राजकीय विमान के जरिए बाबतपुर एयरपोर्ट से सीएम लखनऊ जाएँगे।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जुलाई में वाराणसी दौरा होना प्रस्तावित है। उससे पहले शनिवार (25 जून) को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वाराणसी के दौरे पर आए थे। इस दौरान उन्होंने विकास कार्यों समीक्षा के साथ ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन भी किए। वो वाराणसी में एक रात रुके भी।

कब तक रोएगी कॉन्ग्रेस: राजस्थान CM अशोक गहलोत 2020 वाले ‘पायलट दुख’ से परेशान, महाराष्ट्र में शिवसेना के लिए कॉन्ग्रेसी बैटिंग

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट (Sachin Pilot) के बीच की अंदरूनी खटास एक बार फिर से खुलकर सामने आ गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि गहलोत ने पायलट पर ताजा हमला करते हुए आरोप लगाया है कि वह 2020 में राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार को गिराने के लिए प्रयास कर रहे थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अशोक गहलोत ने सचिन पायलट पर ये जुबानी हमला केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र शेखावत के एक बयान के बाद किया है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र शेखावत ने कहा था कि पायलट ने मौके को गँवाया न होता तो सरकार बदल गई होती। इसके अलावा पानी भी पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) के जरिए प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में पहुँच गया होता।

इसी बयान को आधार बनाकर अब अशोक गहलोत अपने ही पूर्व उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट पर निशाना साध रहे हैं। सीकर के कोठ्यारी में अशोक गहलोत ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि सभी को पता है कि आप ही ने सरकार को गिराने की साजिश की थी। अब कह रहे हैं कि पायलट ने मौका गँवा दिया। आप खुद उनके साथ मिले हुए थे।

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के इस बयान के बाद एक बार फिर से पायलट और गहलोत खेमे की फूट खुलकर सामने आ गई है। आशंका इस बात की भी है कि दोनों नेताओं में कोल्ड वॉर फिर से शुरू हो सकता है।

गौरतलब है कि जुलाई 2020 में गहलोत सरकार की मुश्किलें तब बढ़ गई थीं, जब पायलट ने 30 विधायकों के अपने साथ होने का दावा किया था। खबर आई थी कि वो विधायक दल की बैठक में नहीं जाएँगे। हालाँकि, बाद में गाँधी परिवार से मेल मुलाकात के बाद पायलट मान गए थे। इसके साथ ही उन्होंने बीजेपी में शामिल होने की खबरों का भी खंडन किया था।

महाराष्ट्र संकट में फँसी कॉन्ग्रेस

कब खत्म होगा कॉन्ग्रेस का दुख? उधर राजस्थान में कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री अपनी ही पार्टी के नेता के बागी स्वभाव से दुखी हैं तो महाराष्ट्र में अपने सियासी साथी दल के नेता के की बदहाली पर कॉन्ग्रेसी मंत्री रोए जा रहे हैं। राष्ट्रपति शासन जैसे बड़े-बड़े शब्द फेंक कर कुर्सी बचाने की भीख माँग रहे हैं लगभग।

महाराष्ट्र में जारी सियासी संकट में शिव सैनिक गुंडों द्वारा हिंसा की खबरों को लेकर कॉन्ग्रेस नेता और राज्य के मंत्री नितिन राउत (Nitin Raut) ने कहा था कि अगर शिवसेना को कुछ हुआ तो मुंबई जलेगी। मुंबई में अलर्ट पर राउत ने कहा कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि शिवसैनिकों की हिंसा का बहाना बनाकर केंद्र सरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन न लगा पाए। नितिन राउत के मुताबिक, उद्धव गुट के समर्थक शिवसैनिकों को हिंसा करने से नहीं रोका गया तो केंद्र को सही मौका मिल जाएगा और वो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा देगी।

‘उसकी गिरफ्तारी से खुशी है क्योंकि उसने तमाम सीमाओं को तोड़ दिया था’ – आरबी श्रीकुमार पर ISRO के पूर्व वैज्ञानिक नम्बी नारायणन

गुजरात 2002 दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद पूर्व IPS अधिकारी आरबी श्रीकुमार (RB Sreekumar) को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस गिरफ्तारी पर इसरो (ISRO) के पूर्व वैज्ञानिक नम्बी नारायणन (Nambi Narayanan) ने संतोष जताया है। पूर्व वैज्ञानिक ने अपने साथ हुए एक केस में भी पूर्व IPS श्रीकुमार की भूमिका को गलत और पक्षपाती बताया है।

नम्बी नारायणन ने 25 जून 2022 को अपने बयान में कहा, “मुझे पता चला कि वो (आरबी श्रीकुमार) फर्जी कहानियाँ गढ़ने और सनसनी फैलाने के आरोप में गिरफ्तार हो चुका है। ठीक यही उसने मेरे केस में भी किया था। हमारा सिस्टम ऐसा है, जहाँ कोई भी किसी के भी बारे में कुछ भी कह कर निकल सकता है। मुझे उसकी गिरफ्तारी से ख़ुशी है क्योंकि उसने तमाम सीमाओं को तोड़ दिया था। जो इसने मेरे साथ किया, उस पर मैं खुश था क्योंकि मुझे पता था कि ये अपनी हरकतें जारी रखेगा और एक दिन यही हरकतें उसे सजा दिलाएँगी।”

गौरतलब है कि 30 नवम्बर 1994 में नम्बी नारायणन को केरल पुलिस ने गिरफ्तार किया था। नम्बी पर पाकिस्तानियों को भारत के रॉकेट लॉन्चर की टेक्नोलॉजी सप्लाई का आरोप लगाया गया था। उनके फोन को टेप करने की भी आशंका जताई गई थी। थाने के अंदर रात में उन्हें बेंच पर सुलाया गया था। बाद में कोर्ट ने उन्हें 11 दिनों के पुलिस रिमांड पर भेज दिया था।

नम्बी नारायणन ने अपने साथ इस पुलिस कार्रवाई की शिकायत मानवाधिकार आयोग से की थी। NHRC ने इस मामले में केरल पुलिस और IB को मानवाधिकार उल्लंघन का दोषी पाया था। वैज्ञानिक नम्बी नारायणन को 10 लाख रुपए मुआवजा देने के भी आदेश दिए गए।

इस आदेश के खिलाफ केरल की सरकार हाईकोर्ट गई लेकिन साल 2012 में हाईकोर्ट ने भी केरल सरकार के खिलाफ ही फैसला दिया। बाद में इस केस की जाँच CBI को सौंप दी गई। CBI ने भी अपनी जाँच में केरल पुलिस स्टाफ को दोषी पाया था। केंद्रीय एजेंसी ने केरल पुलिस के उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री को पत्र लिखा लेकिन आरोपित पुलिस वालों पर कोई एक्शन नहीं लिया गया।

अधिकारियों के खिलाफ हाईकोर्ट से कार्रवाई की अपील की गई तो केरल हाईकोर्ट ने इसे राज्य सरकार के विवेक पर छोड़ दिया। CBI ने अपनी जाँच में पाया था कि यह साजिश भारत के स्पेश प्रोग्राम को बेपटरी करने के लिए रची गई थी। इसी के साथ इस पूरे मामले में भारत का अंतरिक्ष अभियान काफी पीछे चला गया था। IPS आरबी श्रीकुमार उस समय पुलिस में एडिशनल डॉयरेक्टर ऑफ़ इंटेलिजेंस के पद पर थे।

गे बार के पास कट्टर इस्लामी आतंकी हमला, गोलीबारी में 2 की मौत: नॉर्वे में LGBTQ की परेड रद्द, पूरे देश में अलर्ट

नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में गे बार के नजदीक हुई गोलीबारी को प्रशासन ने इस्लामी आतंकवाद करार दिया है, जिसके बाद ‘प्राइड फेस्टिवल’ को रद्द कर दिया गया है। इस हमले में दो लोगों की मौत हो गई। ये घटना शनिवार (25 जून, 2022) के सुबह की है, जब एक हमलावर ने गे बार और आसपास की सड़कों पर खड़े लोगों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। पुलिस इस्लामी आतंकी हमले के एंगल से इसकी जाँच कर रही है।

इस हमले में 20 लोग घायल भी हुए हैं। दोनों मृतक उस समय नॉर्वे के लोकप्रिय गे बार व नाइटक्लब ‘लंदन पब’ में थे, जब उन्हें गोली मारी गई। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि कई लोग जमीन पर पड़े हुए थे और कई चीख-चिल्ला रहे थे। ये घटना LGBTQ समुदाय के लिए हैरानी भरा है, क्योंकि वो वार्षिक ‘प्राइड परेड’ के लिए जुटे हुए थे। पुलिस की सलाह के बाद आयोजनों ने अब इसे रद्द कर दिया है। पुलिस का कहना है कि संदिग्ध आम लोगों में डर का माहौल बनाना चाहता था।

घटनास्थल से दो हथियार भी बरामद हुए हैं, जिनमें एक पूरी तरह ऑटोमैटिक बंदूक भी शामिल है। आरोपित एक 42 वर्ष का व्यक्ति है, जो ईरानी मूल का है। मृतकों की उम्र 50s और 60s में थी। 10 लोग जहाँ गंभीर रूप से घायल हैं, वहीं 11 को मामूली जख्म आए हैं। हालाँकि, किसी का भी जीवन खतरे में नहीं है। सामान्य से उच्चतम स्तर का अलर्ट पूरे देश में जारी किया गया है। नॉर्वे की सरकार ने इसे ‘कट्टर इस्लामी आतंकवाद’ बताया है।

संदिग्ध के बारे में ख़ुफ़िया एजेंसियाँ 2015 में ही सतर्क हो गई थीं, क्योंकि तभी उसके किसी इस्लामी गिरोह से जुड़ने की सूचना आई थी। हालाँकि, इसके बावजूद कई लोग इंद्रधनुषी झंडे लेकर सड़क पर उतरे और मार्च किया। दो किशोर इस हमले में बाल-बाल बच गए, जो ड्रिंक करने की उम्र न होने के कारण पब के अंदर नहीं थे, लेकिन मार्च में गए थे। संदिग्ध एक बैग लेकर आया था। लोगों ने उसे चिह्नित करने में पुलिस की मदद की। नॉर्वे में सामान्यतः औसत अपराध कम ही है। हालाँकि, यूरोप में ‘लोन वुल्फ अटैक’ का चलन बढ़ा है।

BJP के ईसाई नेता ने हवन-पाठ करके अपनाया सनातन धर्म: घरवापसी पर बोले- ‘मुझे हिंदू धर्म पसंद है, मेरे पूर्वज हिंदू थे’

मध्य प्रदेश के सागर में भारतीय जनता पार्टी के एक ईसाई नेता ने हिंदू धर्म अपनाया है। विवीन टोप्पो ने हिंदू धर्म स्वीकारते हुए कहा कि उन्हें ये धर्म अच्छा लगता है इसलिए उन्होंने इसका अनुसरण करने का फैसला किया है। कुछ दिन में आवेदन कलेक्टर को देकर कानूनी प्रक्रिया भी पूरी कर ली जाएगी।

जानकारी के मुताबिक, विवीन टोप्पो ने सागर की मकरोनिया से इस बार नगर पालिका के वार्ड नंबर 15 से पर्चा भरा है। यहाँ 6 जुलाई को पार्षदी का चुनाव होगा। इसमें भाजपा की ओर से विवीन टोप्पो खड़े हुए हैं। चुनाव से चंद दिन पहले उन्होंने हिंदू धर्म अपनाकर खूब सुर्खियाँ बटोरी हैं।

विवीन ने अपना एक वीडियो भी जारी किया है। इसमें वह मंत्रों का उच्चारण और पूजा-पाठ करते हुए दिख रहे हैं। वीडियो में पंडित जब उनसे पूछते हैं कि उन्होंने हिंदू धर्म क्यों अपनाया तो उन्होंने कहा कि उन्हें हिंदू धर्म पसंद है और उनके पूर्व भी हिंदू थे इसलिए वह इसे स्वीकार कर रहे हैं। वीडियो में उन्हें रुद्राक्ष पहने देखा जा सकता है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में साझा विवीन के शपथ पत्र में लिखा दिख रहा है,

“मैं विवीन टोप्पो पिता राजेंद्र टोप्पो उम्र 33 वर्ष निवासी गोपेश्वर वार्ड मकरोनिया का स्थाई निवासी हूँ। बचपन से मेरी पहचान ईसाई धर्म से रही है। मेरे पूर्वज सनातन धर्म को मनाने वाले थे। वे अनुसूचित जन जाति के गौड़ ठाकुर थे। मेरी आस्था व पूजा पद्धति हिंदू धर्म की थी। वर्तमान में भी मैं हिंदू धर्म को मानता हूँ। हिंदू धर्म के त्यौहार व रीति रिवाजों को भी मानता हूँ। इसलिए ईसाई धर्म त्यागकर अपने मूल धर्म में परिवार सहित वापसी बिना किसी लोभ, लालच और डर के कर रहा हूँ। कुछ दिन में ही कलेक्टर के यहाँ धर्म परिवर्तन का आवेदन देकर कानूनी प्रक्रिया पूरी कर लूँगा।”

मालूम हो कि इससे पहले भी मध्य प्रदेश के मंदसौर और रतलाम से धर्म परिवर्तन के मामले उजाहर हुए थे। यहाँ 18 लोग इस्लाम को छोड़ हिंदू बने थे और गोबर व गोमूत्र से स्नान करके इन्होंने सनातन धर्म को स्वीकार किया था।

मरते हुए पल्लव राजा के दो अधूरे स्वप्न.. पुल्लालूर में भव्य मंदिर… अंग्रेजों-मुगलों नहीं, 7वीं शताब्दी में वातापी के युद्ध पर अरुण कृष्णन की पुस्तक

कुछ पुस्तकें महज पुस्तकें होती हैं, जबकि कुछ ‘दस्तावेज’ बन जाते हैं। जो दस्तावेज बन जाते हैं, उनमें भी एक श्रेणी ऐसी पुस्तकों की होती हैं जिनकी भाषा इतनी सरल और स्पष्ट होती है कि उस विषय का ABC न जानने वाला व्यक्ति भी A-Z स्पष्ट रूप से समझ जाता है। विषय समझ में आ जाए तो लेखक उसे फिक्शन के रूप में ढाल कर जनता तक मूल बात पहुँचा सकता है। अरुण कृष्णन ने एक ऐसी ही पुस्तक लिखी है ‘Battle of Vathapi: Nandi’s Charge‘ नाम की, जो वातापी में हुए चालुक्य और पल्लव साम्राज्य के बीच के युद्ध की कहानी को एक नए ढंग से कहती है।

वातापी प्राचीन चालुक्य समाज की राजधानी हुआ करती थी। आज इस जगह को कर्नाटक के बागलकोट में बादामी के नाम से जानते हैं। इस युद्ध में चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय की मृत्यु हो गई थी। 642 ईस्वी में हुए इस भयंकर युद्ध में पल्लव राजा नरसिंहवर्मन की विजय हुई थी। असल में पल्लव साम्राज्य लंबे समय से पुलकेशिन द्वितीय द्वारा उनके राजा महेन्द्रवर्मन को हराए जाने का बदला लेना चाहता था। विजय के बाद वातापी में चालुक्य राजा ने मल्लिकार्जुन मंदिर का निर्माण करवाया।

तो ये थी एकदम संक्षेप में विषय की जानकारी, अब पुस्तक पर आते हैं। लेकिन, उससे पहले लेखक की बात कर लेते हैं। सोशल मीडिया पर अक्सर वामपंथियों का बाजा बजाने वाले अरुण कृष्णन ‘nFactorial Analytical Sciences’ नामक कंपनी के संस्थापक और CEO हैं, जो रियल टाइम कर्मचारी-ग्राहक के बीच इंगेजमेंट के लिए प्लेटफॉर्म प्रोवाइड करती है। लेखक होने के साथ-साथ वो पेशे से एक डेटा साइंटिस्ट और संगीतकार भी हैं।

ये पुस्तक एक ट्राइलॉजी का हिस्सा है, जिसके अगले दोनों भाग के लिए आप शायद ही इंतजार कर पाएँ, बशर्ते कि आपने पहला भाग पढ़ रखा हो। ‘ऐतिहासिक उपन्यास’ की श्रेणी में ‘Battle of Vathapi: Nandi’s Charge’ शानदार नैरेशन और हमारी प्राचीन सभ्यता का दर्शन कराने के लिए जानी जाएगी। आप खुद इसे पढ़ते-पढ़ते सातवीं सदी में पहुँच जाएँगे और हर एक किरदार के भविष्य को लेकर अनुमान लगाते रहेंगे।

बात ये है कि वामपंथी इतिहासकारों और उपन्यास लेखकों ने कभी भारतीय इतिहास को छुआ ही नहीं। उन्होंने अंग्रेजों और मुगलों का गुणगान करते हुए दशकों काट दिए। प्राचीन काल की हर एक घटना से ऐसे कई उपन्यास अलग-अलग एंगल से निकल सकते हैं, ऐतिहासिक दस्तावेज निकल सकते हैं और वर्तमान की समस्याओं का समाधान भी मिल सकता है। आप अपने घर या दफ्तर में 10 लोगों से पुलकेशिन द्वितीय या नरसिंहवर्मन के बारे में ही पूछ लीजिए, शायद ही कोई कुछ बता पाए।

हमारे समृद्ध इतिहास को ऐसे ही सामने लाने की जरूरत है, वो किसी भी रूप में आए – उसमें हमारी संस्कृति की महक होनी चाहिए, गुलामी की नहीं। पुस्तक को अरुण कृष्णन ने 54 भागों में बाँटा है, जो इसे पढ़ना आसान बना देता है। ये वो समय था जब बौद्ध-जैन धर्म के अनुयायियों की संख्या अपने शबाब पर थी और दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन का सूत्रपात हो रहा था। खुद अरुण कृष्णन लिखते हैं कि भले ही उन्होंने कागज़ पर जो-जो लिखा है एकदम वैसा-वैसा ही हुआ, लेकिन उन्हें आशा है कि पाठकों को इसकी थाह लगेगी कि असल में हुआ क्या था।

पुस्तक में कहानी कांची से शुरू होती है और उज्जैन में ख़त्म होती है। पुस्तक में सबसे विशेष ये है कि किरदारों को सरीके से ढाला गया है। चालुक्य साम्राज्य के प्रमुख गुप्तचर नागानंदी का किरदार इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। भले ही कहानी चालुक्य और पल्लव साम्राज्य की हो, लेकिन आपको उस समय के इतिहास के अन्य राजघरानों और राज्यों, जैसे गंगा राजवंश, पंड्या और चोल के अलावा श्रीलंका का भी जिक्र मिलेगा।

पहली बात तो ये कि पुस्तक को पढ़ने समय आपको ऐसा बिलकुल भी नहीं लगेगा कि अरुण कृष्णन की ये पहली ही किताब है। इस किताब को थ्रिलर की तरह बुनने का प्रयास किया गया है, जिसमें सफलता भी मिली है। इसमें चित्रित तत्कालीन भूगोल को दर्शाते नक़्शे याद दिलाते हैं कि ये कहानी वास्तविक है। जब मम्मला (नरसिंहवर्मन) के पिता अंतिम साँस गिन रहे होते हैं और अपने बेटे से अपने दो अधूरे स्वप्नों को पूरा करने का वचन लेते हैं, तभी हमें पता चल जाता है कि आगे मजा आने वाला है।

हम यहाँ जानबूझ कर उन दोनों बातों का जिक्र नहीं कर रहे, क्योंकि आप स्वयं पढ़ेंगे तो अधिक अच्छा रहेगा। कैसे पल्लव सेनापति परंज्योति ने अन्य राज्यों के साथ गठबंधन बनाए, कैसे कभी-कभी ऐसा लगा कि दिवंगत राजा का स्वप्न शायद पूरा नहीं हो पाएगा और कैसे कई घटनाएँ एक-एक कर एक-दूसरे से जुड़ती जाती हैं – इसे सही तरीके से लिखा गया है। हाँ, पाठकों को ये सलाह ज़रूर है कि हर एक किरदार के बारे में पहले ही अच्छे से पढ़ लें, वरना आगे आप कन्फ्यूज हो सकते हैं।

अक्सर ऐतिहासिक फिक्शन के नाम पर स्त्रियों का गलत तरीके से चित्रण किया जाता रहा है, एक नायक और एक विलेन को चुन कर कहानी उसी अनुरूप लिखी जाती है और सस्पेंस के चक्कर में कहानी से खेल हो जाता है। इस पुस्तक में ऐसा कुछ भी नहीं है। सबसे बड़ी बात कि ये धीमी भी नहीं है, जो बोर करे। दक्षिण भारत ही नहीं, भारत के उत्तरी हिस्से के लोगों को भी इसे पढ़ना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सोमनाथ पर केएम मुंशी की पुस्तकें सिर्फ गुजरातियों के लिए ही हैं।

हाँ, अगले भाग में अरुण कृष्णन को ये सलाह दी जा सकती है कि किरदारों को सामने लाने के साथ-साथ उनका बैकग्राउंड भी दिया जाए, ताकि पाठकों के जेहन में वो अंत तक रहें। मेरा मानना है कि अगर इसके आधार पर पटकथा तैयार के इसे वेब सीरीज के रूप में ढाला जाए, तो आराम से ये एक अच्छा कंटेंट साबित हो सकता है जो दुनिया को भारत के एक अलग ऐतिहासिक पहलू के बारे में बताएगा। कहानी में ह्वेन त्सांग नाम के एक रोचक चीनी किरदार भी है, जिसके बारे में आपने बचपन में भी सुना ही होगा।

अंत में बता दें कि ‘Battle of Vathapi: Nandi’s Charge‘ आपको एक नहीं, बल्कि तीन सामानांतर कहानियों का आनंद देगी। कई घटनाओं को आप वर्तमान से जोड़ कर भी देखेंगे। युद्ध में कैसे एक से बढ़ कर एक हथकंडे और रणनीतियाँ अपनाई गईं, ये पढ़ना रोचक है। रोमांस के नाम पर जबरदस्ती समय जाया नहीं किया गया है। जंगल, पानी, जमीन, किला – आपको कई जगह युद्ध देखने को मिलेगा। आशा है। पुस्तक को अन्य भाषाओं में भी अनुवाद कर के प्रस्तुत किया जाना चाहिए।

‘मेरे बेटे को तड़पा कर मारा’ : पंजाब विजिलेंस टीम की रेड में IAS संजय के बेटे कार्तिक की मौत, माँ ने लगाया DSP पर इल्जाम

पंजाब में आईएएस अधिकारी संजय पोपली के बेटे कार्तिक पोपली की मौत के बाद उनकी बीवी ने विजिलेंस टीम पर बेटे को तड़पा कर मारने का आरोप मढ़ा है। कार्तिक की माँ ने मीडिया में पुलिस दावे को खारिज करते हुए कहा है कि जाँच के नाम पर घर में घुसी टीम ने उनके बेटे को तड़पा कर मारा और उसके बाद वह वहाँ खड़े होकर हँसते रहे।

वीडियो में माँग को कहते सुना जा सकता है कार्तिक की माँ कहती है, “पहले वो मेरे पति को बुला ले गई। इतनी देर में गोली की आवाज आई और जाकर देखा तो कार्तिक खून में लथपथ था। मेरा बेटा इन्होंने मार दिया। उसको टॉर्चर किया। पूरी विजिलेंस टीम और डीएसपी, मुख्यमंत्री के दबाव में थे। उन्होंने झूठे केस लगाए। मेरा बेटा मारा। देखो सारे घर में खून है और वो लोग हँसते रहे।”

कार्तिक की मौत के बाद उनकी माँ ने आरोप लगाते हुए कहा कि जब तक वह उन पुलिस वालों की वर्दी को नहीं उतरवातीं तब तक वह अपने बेटे के खून लगे हाथ को नहीं धोएँगी।

इस मामले में संजय पोपली की एक रिश्तेदार अणु प्रीत कुलर ने कहा, “विजिलेंस टीम ने संजय पोपली से कहा कि वो किसी पेपर पर साइन करें वरना उनके बेटे के लिए अच्छा नहीं होगा। उन्होंने उसे एक कमरे में बंद कर दिया और बेटे को ऊपर ले गए। हम नीचे खड़े थे। ऊपर से गोली की आवाज आई। विजिलेंस टीम ने ही उसे मारा है।”

बता दें कि चंडीगढ़ में कार्तिक पोपली की हत्या के बाद संजय पोपली के परिजनों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों पर पंजाब विजिलेंस ब्यूरो के डीएसपी अजय कुमार ने कहा कि ये मामला जाँच का है। ये सारे आरोप निराधार हैं। टीम वहाँ बस रिकवरी के लिए गई हैं। घटना के बारे में तो बाद में सूचना मिली। एसएसपी कुलदीप चहन घटना को लेकर बताया कि वो लोग भी यहाँ पड़ताल के लिए आए थे लेकिन गोली की आवाज आई। सत्यापन के बाद पता चला कि उनके बेटे ने खुद को लाइसेंसी गन से गोली मार ली है।

उल्लेखनीय है कि पंजाब विजिलेंस ब्यूरो ने पिछले सप्ताह आईएएस संजय पोपली को भ्रष्टाचार संबंधी मामलों में गिरफ्तार किया था। उन्हें चार दिन की पुलिस रिमांड में लिया गया था। अब चूँकि वो रिमांड खत्म हो रही थी तो विजिलेंस टीम कथिततौर पर दोबारा इसी मामले में आगे की पड़ताल के लिए उनके घर गई थी जहाँ उनकी कार्तिक के साथ बहस हुई और फिर उन्हें कमरे में ले जाया गया। इसके बाद गोली की आवाज सुनाई पड़ी और परिजनों ने ऊपर जाकर देखा तो कार्तिक खून से लथपथ पड़े थे।

‘संजय राउत भ$^% है’: शिवसेना में हुई फूट पर बोले शिंदे समर्थक, महिलाओं ने भी बकी गाली, देखें वीडियो

महाराष्ट्र में शिवसेना के दो गुट बँटने के बाद अब सोशल मीडिया पर हिंसा की खबरें आने लगी हैं। इसी बीच जहाँ उद्धव सरकार के समर्थन में खड़े शिवसैनिक एकनाथ शिंदे को सारी फूट के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, वहीं शिंदे का गुट इस पूरे राजनीतिक घमासान की वजह संजय राउत को मान रहा है। कहा जा रहा है कि एनसीपी-कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन करके शिवसेना की विचारधारा के साथ खिलवाड़ हुआ।

एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुई है जिसमें शिंदे गुट के समर्थक संजय राउत को गाली देते नजर आ रहे हैं। रिपोर्टर उनसे पूछता है कि संजय राउत तो एकनाथ शिंदे के बागी होने पर उन्हें गद्दार बोल रहे हैं। इस पर शिंदे का समर्थक कहता है कि ये कहना पूर्ण रूप से गलत है क्योंकि एकनाथ शिंदे ने अभी तक शिवसेना को नहीं छोड़ा है।

पीछे से एक अन्य समर्थक कहता है कि आज जो कुछ भी हो रहा है उसकी वजह संजय राउत ही हैं। उन्हीं की वजह से शिवसेना में इतनी बड़ी फूट हो गई है। इसी बीच एक अन्य व्यक्ति भीड़ से माइक की ओर आगे आता है और कहता है- “संजय राउत गद्दार है, भ$^% है।”

रिपोर्टर उन्हें कहता है कि वो अपशब्दों का इस्तेमाल न करें। लेकिन तभी एक महिला आगे आती है। रिपोर्टर पूछता है- “आप लोग शिवसैनिक हैं?” इस पर महिला कहती है- “हम लोग बालासाहेब के शिवसैनिक हैं…संजय राउत गद्दारी कर रहे हैं, इसलिए ये माहौल हो रहा है। संजय राउत भ$^% है।”

बता दें कि एक ओर जहाँ महाराष्ट्र में शिवसैनिक दो गुटों में बँट गए हैं। शिंदे गुट में शामिल बागी विधायकों में से एक दीपक केसरकर ने बालासाहेब के नाम पर नई पार्टी बनाने की भी बात कही है। इस गुट ने शुरू से ही इस बात को कहा है कि वो बालासाहेब के शिवसैनिक हैं और उनकी विचारधारा को आगे लेकर जाएँगे, जबकि उद्धव गुट ने कहा है कि बागी विधायकों को जो करना है करें लेकिन बालासाहेब के नाम का इस्तेमाल न करें।

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गर्भवती का भ्रूण आग में फेंकने से लेकर चूल्हे से गोधरा ट्रेन में आग तक: गुजरात दंगों पर वो 5 झूठ, जो नरेंद्र मोदी और हिन्दुओं को फँसाने के लिए फैलाए गए

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 जून, 2022) को बड़ा फैसला लेते हुए 2002 के गुजरात दंगों में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एसआईटी के द्वारा दी गई क्लीन चिट को बरकरार रखा। कोर्ट ने ये फैसला 28 फरवरी 2002 को अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में हिंसा के दौरान मारे गए कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद एहसान जाफरी की विधवा जकिया जाफरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये फैसला सुनाया। इस याचिका में मामले की जाँच के लिए गठित एसआईटी द्वारा पीएम मोदी और 62 अन्य को क्लीन चिट दिए जाने को चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस अपील को ही अयोग्य करार दिया। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली बेंच ने गुजरात दंगों में साजिश के आरोपों को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के साथ ही गोधरा में ट्रेन जलाए जाने और उसके बाद भड़के दंगे की आँच में सियासी रोटियाँ सेंकने की कोशिश करने वालों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। याचिका दायर करने वालों का आरोप था कि गुजरात के तत्कालीन सीएम रहे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में साजिश के तहत इस घटना को अंजाम दिया गया था।

गोधरा के दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही पीएम मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। हालाँकि, उनके विरोधी काल्पनिक कहानियाँ गढ़ने से बाज नहीं आ रहे। ऐसे में इन दुष्प्रचारों को खारिज करना भी जरूरी था। फिर भी गोधरा ट्रेन जलने की घटना और उसके बाद हुए दंगों के बारे में गलत सूचनाओं, अफवाहों, और फर्जी खबरों से अपने करियर को गढ़ने की कोशिश करने वाले दुष्प्रचारकों के उन मिथकों का जिक्र भी जरूरी है। इसी तरह से यहाँ ऐसे कई मिथक हैं, जो कि गोधरा में एक ट्रेन के डिब्बे में महिलाओं और बच्चों सहित 59 हिंदुओं को जिंदा जलाने की घटना के बाद पैदा हुए।

मिथक 1: गर्भवती कौसर बानो का बलात्कार और पेट से भ्रूण बाहर निकालना

गुजरात दंगों के बाद कई लेफ्ट लिबरल मीडिया ने बड़े पैमाने पर ये खबर फैलाई कि एक गर्भवती मुस्लिम महिला का हिन्दुओं की भीड़ ने पहले बलात्कार किया और फिर तलवार से उसके पेट को फाड़कर उसके भ्रूण को बाहर निकाल लिया और उसे आग में फेंक दिया।

कई रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि वो कौसर बानो की भाभी सायरा बानो थी। सायरा बानो ने दावा किया, “उन्होंने मेरी भाभी की बहन कौसर बानो के साथ जो किया वह भयानक और जघन्य था। वह नौ माह की गर्भवती थी। उन्होंने उसका पेट काट दिया, उसके भ्रूण को तलवार से निकाल लिया और उसे धधकती आग में फेंक दिया। फिर उन्होंने उसे भी जला दिया।” कई कहानियाँ ऐसी भी हैं कि भ्रूण को तलवार से मार दिया गया था, जबकि कुछ में भ्रूण को तलवार की नोक पर घुमाया गया और फिर आग में फेंक दिया गया।

साल 2010 में आई एक रिपोर्ट में कौसर का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने भ्रूण को बरकरार पाया। 2 मार्च 2002 को शव परीक्षण करने वाले डॉ जे एस कनोरिया ने विशेष अदालत में सहायक दस्तावेज पेश किए और कहा कि महिला के गर्भ में भ्रूण बरकरार था। भ्रूण का वजन 2500 ग्राम और लंबाई 45 सेमी थी।

इसके अलावा पोस्टमार्टम व गवाहों के जरिए ये भी पता चला कि कौसर बानो की मौत दम घुटने, डर और सदमे से हुई थी और उसके शरीर पर किसी भी तरह की बाहरी या अंदरूनी चोट का कोई निशान नहीं था। उसके शरीर पर किसी तलवार का निशान भी नहीं था। ये पोस्टमार्टम 1 मार्च 2002 को किया गया था। दंगों के दौरान कनोरिया दौरान सरकारी सिविल अस्पताल में कार्यरत थे और उन्होंने बयान दिया था कि पोस्टमॉर्टम के बाद कौसर बानो के भ्रूण को हटा दिया गया था। पोस्टमॉर्टम 1 मार्च 2002 को किया गया था।

मिथक नं 2: चूल्हे से साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग

लिबरल्स हमेशा एक और मिथक फैलाते हैं, जिसमें दावे किए जाते हैं कि ‘आकस्मिक आग’ के कारण साबरमती एक्सप्रेस में आग लगी। हालाँकि, 27 फरवरी 2002 की गोधरा ट्रेन जलने की घटना की जाँच के लिए गुजरात सरकार द्वारा नियुक्त जाँच आयोग ‘नानावती-मेहता आयोग‘ ने इस दावे का खंडन किया था। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है, “गवाह ने इस बात से इनकार किया है कि कोच में एक बर्तन में ज्वलनशील तरल पदार्थ गिरने से कोच में ऐसी आग लग सकती थी। गवाह ने अपने कार्यालय द्वारा उस कोच की जाँच के समय ली गई तस्वीरों को पेश किया था।”

इसके अलावा गोधरा के दंगों के बाद एफएसएल में वैज्ञानिक मुकेश जोशी 2002 में तीन बार गोधरा गए थे। उन्होंने देखा था, “कोच एस/6 के बाहरी हिस्से पर पत्थरों से टकराने के कारण उसके निशान पड़े हुए हैं। कोच एस/6 और एस/7 के बाहरी हिस्से में भी जलने के निशान थे।”

नानावटी-मेहता आयोग ने घटना के विभिन्न प्रत्यक्षदर्शियों से भी बात की थी। इसमें कईयों ने बताया कि जैसे ही ट्रेन चली भीड़ ने डिब्बे के बाईं ओर से पथराव शुरू कर दिया था। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था, “सज्जनलाल रानीवाल ने कहा है कि जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म से बाहर निकली, बाईं ओर खड़ी भीड़ ने उस पर पथराव करना शुरू कर दिया। इसके चलते उन्हें उनके डिब्बे की खिड़कियों के दरवाजे और शटर बंद करने के लिए कहा गया था। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो सज्जनलाल के ऐसा कहने का और कोई कारण नहीं होता। वो तब तक खिड़कियाँ तब तक बंद नहीं करते, जब तक कि उसे ऐसा करने के लिए मजबूर न किया गया हो।”

आयोग ने आगे कहा, “यात्रियों ने यह भी कहा है कि चूँकि ट्रेन के बाईं ओर के लोगों ने ट्रेन पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया था, इसलिए उन्हें अपने कोच की खिड़कियाँ बंद करने की जरूरत थी। कुछ गवाहों के मुताबिक, ट्रेन पर फेंके गए पत्थरों के कारण एक या दो खिड़कियों के शीशे भी टूटे थे। इसी कारण कोच में यात्रियों को उस तरफ की खिड़कियों के टिन/धातु के शटर बंद करने जरूरत थी। हरिप्रसाद ने कहा था कि जिस समय ट्रेन स्टेशन से बाहर निकली, उसी समय से ट्रेन पर पथराव शुरू हो गया था और इस वजह से यात्रियों ने अपने कोच की खिड़कियाँ बंद कर दी थीं। उनके साक्ष्य पर संदेह का कोई कारण नहीं है।”

मिथक नंबर 3: शॉर्ट सर्किट से ट्रेन में आग

साबरमती एक्सप्रेस में आग को लेकर मुकुल सिन्हा के जन संघर्ष मंच ने एक और शिगूफा छोड़ा था, जिसमें साजिश की थ्योरी को ‘शॉर्ट सर्किट’ करार दिया गया था। हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग का यह कहना था, “शॉर्ट सर्किट जन संघर्ष मंच द्वारा प्रचारित एक और संभावना है। कोच में शॉर्ट सर्किट होने की संभावना को दर्शाने के लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है और आयोग के समक्ष कोई सामग्री पेश नहीं की गई है। इस संभावना के समर्थन में कारण यह बताया गया है कि पहले कोच में धुआँ था और कुछ देर बाद आग की लपटें दिखाई दीं। आयोग की जाँच में कोच एस/6 के एक भी यात्री से यह नहीं पूछा गया कि क्या कोच में शॉर्ट-सर्किट जैसा कुछ हुआ है।”

इसके अलावा रिपोर्ट में कहा गया है, “आयोग द्वारा निरीक्षण के दौरान पक्षकारों की ओर से उपस्थित अधिवक्ताओं की उपस्थिति में यह देखा गया कि बिजली के तार कोच के ऊपरी हिस्सों में थे। अगर शॉर्ट सर्किट की वजह से आग लगती तो उस जगह बैठे यात्रियों को सबसे पहले इसका पता चलता। ऐसे में नीचे की बैठे यात्री खुद को बचाने के लिए ऊपर की बर्थ पर नहीं चढ़ते। उल्टे जो लोग ऊपर की बर्थ पर बैठे थे, वे फौरन नीचे आ जाते। यात्रियों ने तुरंत चारों दरवाजों से कोच छोड़ दिया होता और इतने लोगों की जान नहीं जाती।”

दुष्प्रचार फैलाने वाले जहाँ इसे आकस्मिक आग की घटना बताते हैं। वहीं जस्टिस नानावती-मेहता समिति की रिपोर्ट (पीडीएफ) ने स्पष्ट किया है कि गोधरा में किस साजिश के कारण 59 हिन्दुओं की मौत हुई। गोधरा रेलवे स्टेशन के ठीक बाद, ‘सिग्नल फलिया’ नामक एक सड़क और एक इलाका है। रिपोर्ट के मुताबिक, “यह पुलिया तक फैली हुई है और आगे ए केबिन की ओर जाती है। यह मुख्य रूप से घाँची मुस्लिमों का इलाका है।” यहाँ जब भी कोई ट्रेन आती, तो बहुत सारे अनधिकृत विक्रेता, मुख्य रूप से घाँची मुस्लिम प्लेटफॉर्म नाश्ता, कोल्ड ड्रिंक, बीड़ी आदि बेचते थे।

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि ट्रेन सुबह 7: 43 बजे प्लेटफॉर्म पर करीब पाँच घंटे की देरी से पहुँची। वहाँ पर इसका केवल 5 मिनट स्टॉप था। सबूतों वाले हिस्से में रिपोर्ट में नरसंहार के एक दिन बाद 28 फरवरी 2002 की मीडिया रिपोर्टों का हवाला है। इसमें मुख्यधारा के मीडिया ने रिपोर्ट किया था कि एक भीड़ ने हिंदुओं को आग लगा दी थी। उन्होंने उल्लेख किया कि हिंदू कारसेवा से लौट रहे थे और भीड़ ने ट्रेन के डिब्बों में पेट्रोल डालकर आग लगा दी।

सिग्नल फलिया पर ट्रेन के रोके जाने को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया ने उल्लेख किया था कि सिग्नल फलिया पर किसी ने चेन खींची थी। ट्रेन के रुकते ही कोच एस 6 और एस 7 पर पथराव से इसकी खिड़कियाँ टूट गईं। इसके बाद पेट्रोल बम अंदर फेंक दिए गए। इंडियन एक्सप्रेस ने भी चश्मदीद गवाहों के बयान दिए कि कैसे भीड़ ने पथराव के बाद कोच को आग लगा दी थी।

मिथक नं 4: कारसेवकों उकसाने वाली मुस्लिम लड़की किडनैप करने की कोशिश

गुजरात दंगों पर चौथी काल्पनिक कहानी एक ‘हाथापाई’ नैरेटिव गढ़ा गया कि ‘कारसेवकों’ ने एक मुस्लिम लड़की का अपहरण करने की कोशिश की। हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग ने इस परिकल्पना को खारिज करते हुए कहा कि कारसेवकों द्वारा एक मुस्लिम लड़की का अपहरण वास्तविकता से परे था। आयोग ने कहा, “इन सभी गवाहों और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सामग्रियों के साक्ष्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि ट्रेन में भीड़भाड़ और ट्रेन के अंदर और बीच के स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर कभी-कभार नारे लगाने के अलावा, रामसेवकों ने कुछ नहीं किया था और पहले कोई घटना नहीं हुई थी।”

आयोग के मुताबिक, हाथापाई के बाद मुस्लिम महिला के अपहरण के ‘प्रयास’ सही नहीं लगता। रिपोर्ट में कहा गया है, “अगर वे वास्तव में वडोदरा जाने के लिए स्टेशन गए होते, तो वे साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में सवार हो जाते, क्योंकि यह उन्हें पहले वडोदरा ले जाती, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया था। उनका अपहरण करने का कथित प्रयास उस समय किया गया, जब वे बुक स्टॉल के पास थे। इसका मतलब यह होगा कि वे लगभग प्लेटफॉर्म के ढके हुए हिस्से के बीच में थे और वे रेलवे ऑफिसों के काफी करीब थे।”

मुस्लिम महिला की गवाही को खारिज करते हुए आयोक कहता है, “सबूत बताते हैं कि स्टेशन पर कई लोग थे। वहाँ यात्रियों के अलावा कई मुस्लिम वेंडर भी थे। रेलवे कर्मचारी अपने कार्यालयों में मौजूद रहे। कुछ पुलिसकर्मी भी मौजूद थे। अगर वो अपने बचाव में चिल्लाई होती तो वो लोग तो जरूर सुनते जो उसके आसपास थे। लेकिन कोई भी उसके पक्ष का समर्थन करने के लिए आगे नहीं आया।”

आयोग की रिपोर्ट कहती है, “उसके (मुस्लिम महिला) सबूतों के अनुसार, वो बुकिंग क्लर्क के ऑफिस में गई, वहाँ क्या हुआ इसकी जानकारी उन्होंने किसी को नहीं दी। उस ऑफिस के अंदर उनके पास किसी भी चीज से डरने का कोई कारण नहीं था। बावजूद इसके मेमू ट्रेन का इंतजार करने की बजाय वो तुरंत संबंधियों के पास लौट आई। उनका यह स्पष्टीकरण कि वह बहुत डरी हुई थीं और उन्हें चक्कर आ रहा था और इसलिए उन्होंने उस दिन वडोदरा वापस नहीं जाने का फैसला किया था, सच नहीं लगता।”

मिथक संख्या 5: दागी आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट और नरेंद्र मोदी की मुलाकात

लिबरल मीडिया अक्सर एक और शिगूफा छोड़ता रहा है। वो ये कि पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने 27 फरवरी 2022 को सीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनके घर पर मुलाकात की थी। इस बैठक में विशेष रूप से पीएम मोदी को गोधरा में ट्रेन जलाए जाने की घटना के मद्देनजर नरसंहार में शामिल होने के लिए फंसाने के लिए विशेष रूप से प्रकाश डाला गया था।

हालाँकि, नानावती-मेहता आयोग के मुताबिक, हिरासत में मौत के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने झूठ बोला था कि वो 27 फरवरी 2022 को नरेंद्र मोदी से मिला था। मोदी विरोधी लॉबी का फेस बने भट्ट ने 2011 में आरोप लगाया कि 2002 के गोधरा दंगों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 फरवरी 2002 को अपने आवास पर एक बैठक बुलाई थी, ताकि हिन्दुओं को मुस्लिमों के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने दिया जाए, जिससे राज्य में गोधरा जैसी घटना की पुनरावृत्ति न हो।

भट्ट ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपे गए एक हलफनामे में दावा किया था कि यह बैठक साबरमती एक्सप्रेस जलने की घटना के बाद हुई थी, जिसमें 59 अयोध्या कारसेवक मारे गए थे। उस कथित बैठक के समय भट्ट स्टेट इंटेलीजेंस के डिप्टी कमिश्नर थे। उन्होंने हलफनामे में आगे कहा कि बैठक में आठ शीर्ष पुलिस अधिकारी भी शामिल हुए थे। भट्ट ने यह भी आरोप लगाया कि दंगों की जाँच के लिए गठित एसआईटी गुजरात सरकार को बचाने की कोशिश कर रही है।

जबकि, नानावती-मेहता आयोग भट्ट के दावों का खंडन करता है। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्होंने (संजीव भट्ट) बैठक में अपनी उपस्थिति को साबित करने के लिए झूठे दस्तावेज़, एक फैक्स संदेश का इस्तेमाल किया। जस्टिस जीटी नानावती और अक्षय मेहता की रिपोर्ट के दूसरे हिस्से में कहा गया है, “सबूतों पर विचार करने पर यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि 27 फरवरी 2002 को सीएम आवास पर हुई बैठक को लेकर भट्ट झूठ बोल रहे हैं। बैठक में उपस्थित होने के उनके द्वारा किए गए दावे झूठे प्रतीत होते हैं।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि मुख्यमंत्री मोदी के बयानों के बारे में भट्ट के दावे उनके द्वारा बनाई गई एक कहानी थी। आयोग ने कहा कि फैक्स संदेश की प्रति, जिसका उपयोग कर भट्ट ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बैठक का दावा किया था, वास्तव में पीपी उपाध्याय द्वारा 2 मार्च 2002 को भेजी गई थी। ये पांडर्व पंचमहल की घटना को लेकर था।

झूठे साक्ष्य गढ़े, निर्दोष को फँसाने की कोशिश: तीस्ता सीतलवाड़ के साथ-साथ RB श्रीकुमार और संजीव भट्ट पर भी FIR, गुजरात दंगा मामला

गुजरात पुलिस ने रिटायर्ड IPS आरबी श्रीकुमार, संजीव भट्ट और NGO संचालक तीस्ता सीतलवाड़ के विरुद्ध विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है। क्राइम ब्रांच के पुलिस इंस्पेक्टर ने ये मामला दर्ज कराया है। मुंबई के जुहू तारा रोड स्थित निरन्त में रहने वाली तीस्ता सीतलवाड़, गाँधीनगर के सेक्टर-8 स्थित श्री लक्ष्मीदीपम में रहने वाले आरबी श्रीकुमार और अहमदाबाद के सुशील नगर सोसाइटी में रहने वाले संजीव भट्ट का नाम इस FIR में है।

संजीव भट्ट फ़िलहाल पालनपुर जिला जेल में कैद हैं। राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए दर्ज इस FIR में शुक्रवार (24 जून, 2022) को आए सुप्रीम कोर्ट का हवाला दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “मामले के अंत में हमें यह प्रतीत होता है कि गुजरात राज्य के असंतुष्ट अधिकारियों के साथ मिल कर कुछ लोगों ने सनसनी पैदा करने के संयुक्त प्रयास किए, जिसके तहत ऐसे ‘खुलासे’ किए गए, जिनकी असत्यता का उन्हें खुद भी भान था।”

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इन लोगों ने खुलासे की एक बृहद जाँच के बाद SIT ने पोल खोल दी। बता दें कि गुजरात दंगों में मारे गए सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जाकिया जाफरी को चेहरा बना कर एक पूरा का पूरा गिरोह पिछले 2 दशक से इस मामले को हवा देने में लगा हुआ था। मुद्दे को गर्म रखने के लिए इन लोगों ने जानबूझ कर कुटिल चाल चली, जिससे इनकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं – ऐसा कहते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने ऐसा करने वाले लोगों को जाँच के बाद न्याय के दायरे में लाने की सलाह दी।

सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद गुजरात ATS ने दर्ज किया मामला

गुजरात दंगों को लेकर अफवाह फैलाने और झूठे खुलासे करने वाले इन तीनों के खिलाफ IPC की धारा-478, 471 (लोगों को भड़काने के लिए इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों का कपटपूर्ण इस्तेमाल), 194 (किसी को दोषी साबित करने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ना), 211 (किसी निर्दोष व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने की मंशा से झूठे आरोप लगाना), 218 (लोक सेवकों द्वारा रिकार्ड्स को गलत तरीके से फ्रेम करना) और 120B के तहत मामला दर्ज किया गया है।

तीस्ता सीतलवाड़ और आरबी श्रीकुमार को आधिकारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया है। गुजरात पुलिस ने FIR में घटनाक्रम का विवरण देते हुए बताया है कि दंगों में कैसे पुलिस ने कानून सम्मत कार्रवाई और जाँच की। तीस्ता सीतलवाड़ को अब मुंबई से अहमदाबाद ले जाया जाएगा। सांताक्रुज पुलिस थाने में इसके लिए ज़रूरी प्रक्रिया पूरी की गई। तीस्ता सीतलवाड़ खुद के सामाजिक कार्यकर्ता होने का दावा करती हैं।