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‘नबी पर हमला मतलब सुसाइड नोट पर हस्ताक्षर, कोई नहीं बचा सकता’: महाराष्ट्र में इस्लामी स्कॉलर की धमकी, कमलेश तिवारी की दिलाई याद

पैगंबर मुहम्मद (Prophet Muhammad) को लेकर नूपुर शर्मा के कथित बयान को लेकर देश में मचे सियासी बवाल के बीच इस्लामिक कट्टरपंथी लगातार उन्हें हत्या की धमकियाँ दे रहे हैं। इसी क्रम में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें इस्लामिक विद्वान मोहम्मद हामिद इंजीनियर (Hamid Engineer) प्रेस कॉन्फ्रेंस कर खुलेआम हत्या की धमकियाँ दे रहा है।

मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट (MEMERI) द्वारा शेयर किए गए वीडियो में हामिद इंजीनियर को खुलेआम धमकी देते देखा गया। इसके मुताबिक, पैगंबर मुहम्मद पर जारी विवाद को लेकर 5 जून, 2022 को नागपुर में ‘अल्पसंख्यक डेमोक्रेटिक पार्टी’ ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित किया था। कॉन्फ्रेंस में उपस्थित ईमान तंजीम के राष्ट्रीय अध्यक्ष कथित इस्लामी स्कॉलर मोहम्मद हामिद इंजीनियर ने नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल के कथित बयानों को लेकर बात की।

नूपुर शर्मा और नवीन जिंदल पर बात करते हुए हामिद इंजीनियर ने बीजेपी से निलंबित दोनों नेताओं को खुलेआम मंच से हत्या की धमकी दी। इस्लामिक विद्वान कहा, “क्योंकि नबी एक करीम सल्लाहुताला ओसल्लम हमारे पैगंबर मुहम्मद पर हमला करना, उनकी इज्जत पर हमला करना इसका एक ही परिणाम है, और वो है मौत। तुम्हें कोई नहीं बचा सकता। तुम सुसाइड नोट पर हस्ताक्षर कर रहे हो। कमलेश तिवारी पाँच साल बाद मर चुका है। तुम ये न समझो कि आज मामला हल हो गया तो कल तुम्हें छोड़ दिया जाएगा। उस तार को मत छेड़ो।”

गौरतलब है कि साल 2019 में हिन्दू महासभा के नेता कमलेश तिवारी की इस्लामिक कट्टरपंथियों ने गला रेतकर हत्या कर दी थी।

उल्लेखनीय है कि बीते दिनों एक टीबी डिबेट के दौरान नूपुर शर्मा ने कथित तौर पर पैगंबर मुहम्मद को लेकर बयान दिया था। उनके इस बयान की क्लिप को ‘ऑल्ट न्यूज’ वाले जुबेर ने वायरल कर इस्लामिक कट्टरपंथियों को उकसाया। इसके बाद से एक तरह से शर्मा की हत्या को लेकर फतवे और इनामों की बारिश होने लगी।

इंजीनियरिंग पढ़ने गई, ड्राइवर से कर ली शादी: मनुस्मृति का जिक्र कर बोला HC – जो माँ-बाप के साथ किया, कल तुम्हारे बच्चे भी कर सकते हैं

कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) ने अपने प्रेमी संग शादी रचाने वाली एक लड़की के मामले में सुनवाई के दौरान कहा कि प्यार अंधा होता है और यह माता-पिता व परिवार और समाज से मिलने वाले स्नेह से अधिक शक्तिशाली हथियार भी बन जाता है। हालाँकि, कोर्ट ने मनुस्मृति का उदाहरण देकर सलाह भी दिया।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने किशोरी को अपने प्रेमी के साथ रहने की अनुमति तो दे दी, लेकिन बेहद कठोर टिप्पणी भी की। कोर्ट ने कहा कि उसने अपने माता-पिता के साथ जो किया है, कल को उसके बच्चे भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार कर सकते हैं।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान किशोरी के पिता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि कानून भले ही वैध विवाह की शर्तों को विनियमित कर सकता है, लेकिन ‘जीवनसाथी चुनने में माता-पिता सहित समाज की कोई भूमिका नहीं है’।

पिता ने याचिका में कहा था कि उसकी 19 साल की बेटी हॉस्टल में रहकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी। एक दिन वह हॉस्टल से गायब हो गई और पता चला कि कॉलेज में ही वैन चलाने वाला निखिल नाम का ड्राइवर उसे अपने साथ भगा ले गया है।

पिता ने दावा किया कि वैन ड्राइवर ने उसकी लड़की से दोस्ती की और उसकी मासूमियत का फायदा उठाकर उसे अपने प्यार के जाल में फँसा लिया। पिता ने आरोप लगाया कि वैन ड्राइवर ने उसकी बेटी को उकसाया और मंदिर में शादी कर ली।

जस्टिस बी वीरप्पा और जस्टिस केएस हेमलेखा की खंडपीठ के सामने लड़की ने कहा कि वह 28 अप्रैल 2003 को पैदा हुई थी और उम्र के हिसाब से बालिग है। वह निखिल से प्यार करती है और अपनी मर्जी से उसके साथ गई थी।

लड़की ने कहा कि दोनों ने 13 मई को एक मंदिर में शादी करने के बाद साथ रहे हैं। वह अपने पति के साथ रहना चाहती है और अपने माता-पिता के पास वापस नहीं जाना चाहती।

इस पर पीठ ने अपने माता-पिता के प्रति दयालु होने और बुढ़ापे में उनकी देखभाल करने के महत्व को उजागर करने को लेकर धर्म की अवधारणा के बारे में विस्तार बताया। कोर्ट ने महाराज मनु द्वारा प्रतिपादित हिंदू कानून ‘मनुस्मृति’ का भी उदाहरण दिया।

पीठ ने कहा, “मनुस्मृति के अनुसार, कोई भी व्यक्ति 100 वर्षों में भी अपने माता-पिता की उन सभी परेशानियों का भुगतान नहीं कर सकता है, जिन्हें वे उसे जन्म देने से लेकर वयस्क करने तक के दौरान उठाते हैं। इसलिए, हमेशा वही करने की कोशिश करें जो आपके माता-पिता और आपके शिक्षक को पसंद हो, तभी आपके द्वारा की गई कोई भी धार्मिक पूजा कुछ फल देगी।”

इस दौरान पीठ ने कहा कि हमारे इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब माता-पिता ने बच्चों के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया और बच्चों ने भी अपने माता-पिता के लिए अपने जीवन को उत्सर्ग कर दिया।

पीठ ने आगे कहा, “अगर दोनों के बीच प्रेम और स्नेह है तो परिवार में कोई विवाद नहीं हो सकता है। इसके साथ ही अपने अधिकारों की रक्षा के लिए बच्चों को माता-पिता के खिलाफ या अभिभावकों को बच्चों के खिलाफ अदालत जाने का कोई सवाल नहीं पैदा होता।”

पीठ ने अपने फैसले में कहा, “वर्तमान मामले के अजीबोगरीब तथ्य और परिस्थितियाँ स्पष्ट करती हैं कि प्रेम अंधा होता है तथा माता-पिता, परिवार के सदस्यों और समाज के प्यार एवं स्नेह की तुलना में वह अधिक शक्तिशाली हथियार बन जाता है।”

कोर्ट ने लड़की को आगाह करते हुए कहा, “बच्चों को भी यह जानने का समय आ गया है कि जीवन में प्रतिक्रिया, प्रतिध्वनि और प्रतिबिंब शामिल होते हैं। वे आज अपने माता-पिता के साथ जो कर रहे हैं, कल उनके साथ भी वही होगा।”

फिल्मों में नक्सली आतंकियों का समर्थन करते तेलुगु अभिनेता: युवा भारतीयों को भटकाने की साजिश, वामपंथ लेकर आता है नरसंहार

SS राजामौली की बाहुबली 1 और बाहुबली 2 में भल्लालदेव की भूमिका के साथ राणा दग्गुबाती (Rana Daggubati) पूरे भारत में घर-घर पहुँच गए। राणा एक बेहतरीन अभिनेता हैं और बाहुबली से उन्हें अखिल भारतीय पहचान मिलने तक उन्होंने कई फिल्में की हैं। राणा की आने वाली फिल्म का नाम ‘विराट पर्वम’ (‘Virata Parvam’) है, जो 17 जून को रिलीज होने वाली है। फिल्म में साईं पल्लवी, नंदिता दास और प्रियामणि भी अन्य भूमिकाओं में हैं।

फिल्म के ट्रेलर से पता चलता है कि राणा का केंद्रीय चरित्र रावण, एक नक्सली नेता जबकि साई पल्लवी गाँव की एक चहेती लड़की की भूमिका में हैं, जिसे रावण के लेखन से प्यार हो जाता है और अंततः खुद रावण से प्यार हो जाता है, फिर वह इसमें शामिल होने के लिए एक नक्सली बन जाती हैं।

अब नक्सलियों की कहानियाँ सुनाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन कोई भी जागरूक भारतीय जानता है कि इस आंदोलन ने कितनी हिंसा, रक्तपात और भ्रष्टाचार किया है। नक्सलवादी अक्सर नक्सल आंदोलन को न्याय और समानता के लिए एक धर्म युद्ध के रूप में चित्रित करने की कोशिश करते हैं, कुछ ऐसा ही है जो विराट पर्वम के ट्रेलर में बहुत नाटकीय संगीत और दृश्यों के साथ परोसा गया है, लेकिन वे यह भूलने का नाटक करते हैं कि नक्सली आतंकवादियों ने भी आदिवासियों का शोषण, हत्या और बलात्कार किया है। ये वही लोग हैं जो इनके अधिकारों की रक्षा का दावा करते रहे हैं।

विराट पर्वम के ट्रेलर में साईं पल्लवी

इन्हीं नक्सलियों ने सरकार के दूरदराज के इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए सड़क, स्वास्थ्य सेवा, नौकरी, स्कूल और अन्य सुविधाएँ मुहैया कराने के विचार को खारिज कर दिया। वे चाहते हैं कि उन क्षेत्रों में रहने वाले लोग हमेशा अंधविश्वास, बीमारियों और अराजकता के अंधेरे में रहें, एक आम भारतीय को मिलने वाले अवसरों से भी वंचित रहें।

वामपंथी राजनीतिक दल, जो इनके लिए विक्टिम कार्ड और भीतरी इलाकों में सक्रिय नक्सली आतंकवादियों के शहरी मुखौटा हैं। ये हर एक बुनियादी ढांचा परियोजना का विरोध करते हैं, चीन के लिए समर्थन की घोषणा करते हैं और युवाओं को अराजकतावादी आंदोलनों में भर्ती करने का प्रयास करते हैं जहाँ निराशा और अँधेरे में जीवन खो जाता है।

पिछले दशकों के राजनीतिक चाहे समीकरण जो भी हों, पर वास्तविकता यह है कि नक्सली आतंकवादी हैं, क्षेत्रीय आतंकवादी हैं जो भारतीय राष्ट्र के खिलाफ काम करते हैं, विदेशी शक्तियों से सहायता प्राप्त कर भारत को कमजोर करने का काम करते हैं।

तो क्यों मुख्यधारा के टॉलीवुड सितारे अपने लाखों समर्पित प्रशंसकों के साथ एक मृत, विघटित विचारधारा का रोमांटिककरण करने पर आमादा हैं, जो इस विचारधारा पर चलने वाले हर एक देश के लिए निराशा और विनाश के अलावा कुछ नहीं लाया है? वामपंथियों ने आधुनिक समय में किसी भी अन्य राजनीतिक शक्ति की तुलना में अधिक हत्याएँ की हैं, यहाँ तक ​​​​कि इस्लामी आतंकवादियों और परमाणु हथियारों से ज़्यादा लोगों को मार डाला है। वामपंथी विचारधाराएं देश दर देश तानाशाहों को हमेशा सत्ता में लाती रही हैं, जो जब-तब नरसंहार करते रहते हैं और अपनी प्रजा को सख्त निगरानी में रखते हैं। कंबोडिया हो, उत्तर कोरिया हो, दक्षिण अमेरिका हो, चीन हो या सोवियत रूस, कम्युनिस्ट वामपंथी विचारधाराएं हमेशा कयामत और सामूहिक हत्याएँ लेकर आई हैं।

तो यह असफल, अस्वीकृत, परित्यक्त विचारधारा क्यों है जिसमें मुख्यधारा के फिल्म निर्माताओं द्वारा मृत्यु और भ्रष्टता का रोमांटिक प्रदर्शन क्यों?

राम चरण और मेगास्टार चिरंजीवी की हालिया फिल्म आचार्य

जबकि अधिकांश भारत राजामौली द्वारा सुपर ऊर्जावान, नेत्रहीन असाधारण आरआरआर का आनंद और जश्न मना रहा है, जहाँ मेगास्टार चिरंजीवी के बेटे तेलुगु सुपरस्टार राम चरण स्वतंत्रता सेनानी अल्लूरी सीतारामराजू से प्रेरित भूमिका निभाते हैं, राम चरण ने एक और फिल्म आचार्य में भी अभिनय किया है, जहाँ उनके पिता चिरंजीवी ने भी मुख्य भूमिका निभाई है।

आचार्य और कुछ नहीं बल्कि एक ऐसी फिल्म के रूप में पैक किए गए नक्सलवाद को महिमामंडित करती है, जो भारतीय, हिंदू दृश्यों से भरपूर है। फिल्म हिंदू पारंपरिक दृश्यों के पर्दे के पीछे नक्सल विचारधारा को छुपाती है और यह चित्रित करने की कोशिश करती है कि यह केवल नक्सली हैं जो पारंपरिक आयुर्वेदिक प्रथाओं और ग्रामीणों और गाँव की रक्षा करते हैं जो जैव विविधता में समृद्ध हैं और गर्व से अपनी हिंदू प्रथाओं का पालन करते हैं।

फिल्म में ऐसे भी कई दृश्य हैं जब नक्सल नेता, पुलिस और अर्धसैनिक बलों को मारने वाले नायक के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसे प्राचीन आयुर्वेद की रक्षा करने वाली माँ दुर्गा की दिव्य शक्तियों द्वारा ‘चुना’ दिखाया जाता है।

माना कि कहानी सुनाना महत्वपूर्ण है, कहानी सुनाना सुंदर भी है। लेकिन क्या यह आवश्यक है कि झूठी कहानियाँ सुनाई जाए जो एक झूठ को बढ़ावा दें और पहले से पिछड़ी हुई जनसंख्या समूह को एक ऐसी विचारधारा की ओर धकेलें जो मृत्यु और निराशा के अलावा कुछ नहीं लाती है?

माना कि बताने लायक कहानियों को कहने की जरूरत है। लेकिन यह नियम किसने बनाया कि लोगों को बेवकूफ बनना है? माना कि सिस्टम के खिलाफ काम करने वाले एंग्री यंग मैन पर फोकस करने वाली फिल्में हमेशा लोकप्रिय रही हैं। चाहे वो पुष्पा, केजीएफ, या यहाँ तक ​​​​कि कई हॉलीवुड हिट्स को ही ले लें, लेकिन ऐसी राजनीति को आगे बढ़ाना जिसने भारत के पिछड़े क्षेत्रों को दशकों तक असुरक्षित और गरीबी में रखा है? कहाँ तक तर्कसंगत है? ऐसे में राणा दग्गुबाती, राम चरण और चिरंजीवी जैसे सुपरस्टार ऐसी फिल्मों के माध्यम से वास्तव में क्या हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं?

‘परिवार को ख़त्म करने की मिल रही धमकियाँ’: नवीन जिंदल ने महाराष्ट्र पुलिस के सामने पेश होने में जताई असमर्थता, माँगा 1 माह का समय

मुहम्मद पैगंबर पर कथित टिप्पणी के मामले में दिल्ली बीजेपी के पूर्व नेता नवीन जिंदल को महाराष्ट्र की भिवंडी पुलिस द्वारा जारी किए गए समन पर जबाव दिया है। जिंदल ने भिवंडी पुलिस के सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर को पत्र लिखकर पूछताछ के लिए उपस्थित होने के लिए एक महीने का समय माँगा है।

जिंदल ने भिवंडी पुलिस को लिखे पत्र में कहा है कि पैगंबर विवाद शुरू होने के बाद से लगातार उन्हें और उनके परिवार को हत्या की धमकियाँ दी जा रही हैं। पत्र में जिंदल ने लिखा, “हालात को देखते हुए मैं अपने घर दिल्ली से महाराष्ट्र में आपके समक्ष पेश होने की स्थिति में नहीं हूँ। इसलिए मुझे एक महीने का समय दें।”

इसके साथ ही उन्होंने भिवंडी पुलिस को एक सुझाव दिया है कि अगर फिर भी महाराष्ट्र पुलिस उनसे पूछताछ करना चाहती है तो पत्राचार के इसी माध्यम से वो अपना सवाल भेज दें और वो (जिंदल) अपना जबाव महाराष्ट्र पुलिस को भेज देंगे। जिंदल ने कहा है कि पुलिस के किसी भी तरीके की जाँच में सहयोग के लिए तैयार हैं।

महाराष्ट्र पुलिस को भाजपा के निलंबित नेता नवीन जिंदल का जवाब

क्या है पूरी मामला

गौरतलब है कि महाराष्ट्र पुलिस ने भारतीय जनता पार्टी के पूर्व नेता नवीन जिंदल को पैगंबर मुहम्मद पर उनकी टिप्पणी से संबंधित एक मामले में पूछताछ के लिए समन जारी किया था। इसके मुताबिक, जिंदल को पुलिस ने 15 जून को सुबह 11:30 बजे महाराष्ट्र के भिवंडी पुलिस स्टेशन में पेश होने को कहा गया था। उन्हें पुलिस की ओर से कहा गया था कि इस अवधि में वो ऐसा कोई भी काम नहीं करें, जिससे जाँच में बाधा पैदा हो। साथ ही सबूतों को नष्ट नहीं करने और उससे छेड़छाड़ नहीं करने को भी कहा गया था।

उधर इसी मामले में नूपुर शर्मा ने भी भिवंडी पुलिस से पूछताछ के लिए पेश होने के लिए एक महीने की मोहलत माँगी है। उल्लेखनीय है कि नवीन जिंदल और नूपुर शर्मा दोनों के ही खिलाफ भिवंडी पुलिस स्टेशन में केस दर्ज है।

राष्ट्रपति चुनाव पर CM ममता बनर्जी की बैठक को झटका, विपक्ष एकता फुस्स: फारूक अब्दुल्ला के लिए चला रहीं गोलबंदी?

देश में राष्ट्रपति चुनाव के लिए बिगुल बज चुका है। इसी क्रम में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार (15 जून, 2022) को एक संयुक्त रणनीति तैयार करने के लिए विपक्ष की बैठक दिल्ली के ‘कॉन्स्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया’ में बुलाई। बैठक में पहले राष्ट्रपति चुनाव पद के लिए एनसीपी चीफ शरद पवार के नाम का प्रस्ताव रखा गया। हालाँकि, जब उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया तो विपक्ष ने एक कॉमन उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर दिया।

बैठक के बाद ममता बनर्जी ने कहा, “आज कई दल यहाँ थे। हमने तय किया है कि हम केवल एक आम सहमति वाले उम्मीदवार को चुनेंगे। हर कोई इस उम्मीदवार को अपना समर्थन देगा। हम दूसरों के साथ परामर्श करेंगे। यह एक अच्छी शुरुआत है। कई महीनों के बाद हम एक साथ बैठे थे और हम इसे फिर से करेंगे।” सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्षी उम्मीदवारों के रूप में फारूक अब्दुल्ला और गोपालकृष्ण गाँधी के नामों का सुझाव दिया।

बैठक में कौन-कौन सी पार्टियाँ रहीं शामिल

इस बैठक में कम से कम 16 दलों के नेता शामिल रहे। इसमें कॉन्ग्रेस, समाजवादी पार्टी, एनसीपी, द्रमुक, राजद, शिवसेना, भाकपा, माकपा, भाकपा (माले), नेशनल कॉन्फ्रेंस, PDP, JD (S), RSP, IUML, RLD और JMM शामिल थी। वहीं इस बैठक में पवार के अलावा NCP नेता प्रफुल्ल पटेल, मल्लिकार्जुन खड़गे, कॉन्ग्रेस के जयराम रमेश और रणदीप सुरजेवाला, JD (S) के एचडी देवेगौड़ा और एचडी कुमारस्वामी, SP के अखिलेश यादव, पीडीपी के महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला बैठक में प्रमुख नेताओं में नेशनल कॉन्फ्रेंस भी शामिल थी।

गौरतलब है कि इस बैठक में निमंत्रण मिलने के बावजूद AAP, चंद्रबाबू नाडू की तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) और ओडिशा की सत्तारूढ़ बीजेडी ने इस मीटिंग से किनारा बनाए रखा। इसके अलावा शिरोमणि अकाली दल ने भी इस मीटिंग में नहीं शामिल होने का फैसला लिया। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, टीआरएस कॉन्ग्रेस के साथ एक मंच साझा नहीं करना चाहती। वहीं AAP ने कहा, “आगामी राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार की घोषणा के बाद ही इस मुद्दे पर विचार करेगी।”

ममता की मीटिंग हुई बेदम

उल्लेखनीय है कि इलेक्टोरल कॉलेज में एनडीए का वोट प्रतिशत आधे से अधिक है। इस चुनाव में किंग मेकर की भूमिका में बीजेडी, वाईएसआरसीपी, टीआरएस हैं। इन्ही पार्टियों ने ममता की मीटिंग से किनारा कर लिया है। ऐसे में एक बार फिर से भाजपा के खिलाफ एक मंच बनाने की ममता बनर्जी की कोशिश बेकार हो गई है। इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि पिछले सप्ताह ममता बनर्जी ने देशभर की 22 पार्टियों को बैठक के लिए निमंत्रण भेजा था, लेकिन इसमें शामिल केवल 16 पार्टियाँ ही हुईं।

इस बीच सूत्रों के हवाले से खबर है कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को मल्लिकार्जुन खड़गे, ममता बनर्जी और अखिलेश यादव सहित कई विपक्षी नेताओं को फोन किया और उनसे राष्ट्रपति चुनाव के लिए नाम सुझाने का अनुरोध किया। सूत्रों ने बताया कि जब उनसे राष्ट्रपति चुनाव के लिए सरकार द्वारा प्रस्तावित नाम के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और इसलिए विपक्षी नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया में कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई।

चुनाव आयोग के अनुसार, राष्ट्रपति चुनाव 2022 के लिए 18 जुलाई से वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसके बाद वोटों की गिनती 21 जुलाई को होगी। वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कार्यकाल 24 जुलाई को समाप्त हो रहा है। ऐसे में देश के नए राष्ट्रपति 25 जुलाई को अपने पद की शपथ लेंगे। लेकिन ये चुनाव सत्तारूढ़ बीजेपी के लिए भी किसी परीक्षा से कम नहीं होने वाला है।

याद हो कि 2019 लोकसभा चुनाव से पहले चंद्रबाबू नायडू भी विपक्ष को एकजुट करने निकले थे और बैठकें पर बैठकें कर रहे थे, लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनाव में उन्हें ऐसी हार मिली कि वो राष्ट्रीय के साथ-साथ राज्य की राजनीति से भी अप्रासंगिक हो गए।

राँची हिंसा में शामिल दंगाइयों के लिए उमड़ा कॉन्ग्रेस का प्यार: मंत्री उराँव बोले- तस्वीर नहीं लगानी चाहिए, MLA अंसारी ने माँगा ‘शहीद’ का दर्जा

इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद (Prophet Mohammad) के नाम पर देश की सड़कों पर उत्पात मचाने वाले दंगाइयों के लिए कॉन्ग्रेस नेताओं (Congress Leaders) का दर्द उभरकर सामने आ रहा है। झारखंड सरकार (Jharkhand Government) में मंत्री कॉन्ग्रेस के दो नेताओं ने दंगाइयों की तस्वीरों को लगाना गलत बताया। वहीं, एक अन्य मंत्री ने हिंसा के दौरान मारे गए एक दंगाई को शहीद का दर्जा देने की माँग की है।

राँची हिंसा को लेकर झारखंड के वित्त मंत्री रामेश्वर उराँव (Rameshwar Oraon) ने कहा कि हिंसा करने वाली भीड़ के सदस्यों की तस्वीरें प्रदर्शित करना मेरी निजी राय में गलत है। जनता की नजर में भले ही उन पर आरोप लगे हों, लेकिन कानून की नजर में वे अभी तक आरोपित नहीं हैं।

वहीं, झारखंड के जामताड़ा से कॉन्ग्रेस विधायक इरफान अंसारी ने मारे गए दंगाई के लिए शहीद के दर्जे की माँग, 50 लाख रुपए का मुआवजा और उसके परिजनों को सरकारी नौकरी देने की माँग की है। इसके साथ ही उन्होंने फायरिंग की मजिस्ट्रियल जाँच की भी माँग की है।

इरफान ने कहा, “मैं मजिस्ट्रियल जाँच की माँग करता हूँ। मेरी माँग है कि सरकार मरने वालों को ‘शहीद’ का दर्जा दे। उन्हें 50 लाख रुपये अनुग्रह राशि के साथ-साथ उनके परिवारों को सरकारी नौकरी भी दी जानी चाहिए। मैं इसके लिए लड़ूँगा।”

इरफान अंसारी ने आगे कहा, “मैं घटना की निंदा करता हूँ। झारखंड एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है। यहाँ सब एक साथ रहते हैं। राँची की घटना जाँच का विषय है। मेरी माँग है कि इसकी जाँच हो और सरकार निष्पक्ष जाँच करे।”

बता दें कि पैगंबर के कथित अपमान को लेकर राँची में हिंसा को अंजाम देने वाली भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान पुलिस की गोली से दो मुस्लिमों की मौत हो गई थी। जिन 2 दंगाइयों की मौत हुई है, उनके नाम मुदस्सिर उर्फ कैफी और मोहम्मद साहिल हैं। पुलिस को मजबूरन गोली तब चलानी पड़ी, जब उन पर पथराव होना शुरू हुआ और वाहनों को तोड़ा जाने लगा। दंगाइयों की तरफ से भी गोली चलने की बात कही गई है।

झारखंड में जामताड़ा से कॉन्ग्रेस विधायक इरफ़ान अंसारी (Congress MLA Irfan Ansari) ने दंगाइयों की बजाय पुलिस पर ही सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने गोली चलाने पर पुलिस की निंदा करते हुए राँची SP सिटी पर कार्रवाई और मरने वालों के परिवार को 50 लाख रुपए तथा सरकारी नौकरी की माँग की है।

गीता जलाने की करते थे बातें, लेकिन ‘रंगीला रसूल’ के लेखक को मार डाला: नूपुर शर्मा के लिए मौत माँग रहे कट्टरपंथी, भाईचारे की बात कर इतिहास दोहराएगा हिन्दू?

‘टाइम्स नाऊ’ की एक डिबेट में हिस्सा लेते हुए भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नुपूर शर्मा पर पैगंबर मुहम्मद के अपमान का आरोप लगा दिया गया, जिसके बाद उनकी जान खतरे में है। उनके विरुद्ध ‘ऑल्ट न्यूज’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर जैसे भारतीय मुसलमानों ने स्थिति को भड़काया और देखते ही देखते वह पैगंबर का अपमान करने वाली घोषित कर दी गईं। इसके बाद अब तमाम इस्लामी संगठन और तालिबान-अलकायदा जैसे आतंकी नुपूर के सिर काटने की माँग कर रहे हैं। वहीं भारत के कुछ संगठन सामने आए हैं जिन्होंने इस्लाम के खिलाफ बोलने वालों को दंड देने के लिए विशेष कानून बनाने की माँग की है।

उत्तर प्रदेश के दारुल उलूम ने माँग की है कि नुपूर शर्मा को दंड दिया जाए। उनका कहना है कि जो कोई इस्लाम के प्रतीकों पर आपत्तिजनक टिप्पणी करके देश में नफरत फैलाने की कोशिश करे उन पर सख्ती से कार्रवाई हो।

अब ये बयान तो ऐसा है कि किसी भी इस्लामी संगठनों से इसकी अपेक्षा की जा सकती है लेकिन दारुल देवबंद के मौलाना मुफ्ती ने कहा है कि वो ऐसा कानून चाहते हैं जिसमें इस्लाम का अपमान करने वालों को सजा दी जाए।

कथिततौर पर मौलाना ने कहा, “मैं हमारे प्रिय पैगंबर पर आपत्तिजनक टिप्पणी की कड़ी निंदा करता हूँ। किसी भी धर्म के अनुयायियों की मजहबी भावनाओं को अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर नहीं आहत किया जा सकता। पैगंबर का अपमान मुस्लिम नहीं सहेंगे।” अपने बयान में उन्होंने कहा कि भारत सरकार को ऐसा विशेष कानून लाना चाहिए जो उन लोगों को सजा दे जो मुस्लिमों के प्रतीकों को निशाना बनाते हों”

मौलाना ने सामाजिक सौहार्दता पर बात करते हुए कहा कि भारत के मुसलमानों को एक विशेष कानून की जरूरत है। उनके मुताबिक, “भारत एक सेकुलर देश है और लोग यहाँ साथ में सदियों से रह रहे हैं। ऐसे में सांप्रदायिक और चरमपंथी न केवल देश की शांति को बिगाड़ रहे हैं बल्कि देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को भी छेड़ रहे हैं।”

शुरू करने से पहले यहाँ थोड़ा अचंभित हो जाते हैं कि देखो कैसे इस्लामी कट्टरपंथी की नफरत भी सामाजिक ताने-बाने की बात कर रही है। जबकि सच ये है कि यही लोग समाज की शांति और लोकाचार को आगजनी, दंगों, प्रदर्शनों और ‘गुस्ताख-ए-रसूल की एक सजा- सिर तन से जुदा’ जैसा नारा देकर छिन्न-भिन्न करते हैं, फिर अपने उसी शिकार को समाज सौहार्दता बिगाड़ने का दोषी देते हैं जिसका ये लोग भावना आहत होने के कारण सिर कलम करना चाहते हैं। इन लोगों का ऐसा ढंग वाकई हैरान करने वाला है क्योंकि ये हर बार यही करते हैं। पहले ये खुद ही किसी बात से आहत होते हैं, फिर दंगों के लिए दौड़ते हैं, हिंसा करते हैं, फिर शांति भंग करने का इल्जाम दूसरे इंसान पर लगाते हैं। ये सब बिलकुल ब्लैकमेल करने के हथकंडों की तरह है। जैसे क्या हम आपका देश जलाकर आप पर इल्जाम लगा दें क्या?

हर बार दोहराए जाने वाले हुए उसी एक पैटर्न के बावजूद ‘विशेष कानून की माँग’ केवल ये है कि मुस्लिम समुदाय की भावनाओं की रक्षा हो सके। कट्टरपंथियों की हिंसा के लिए पीड़ित को दोष देते हुए मौलाना मुफ्ती अब्दुल कासिम ने विशेष कानून को लाने की माँग की है ताकि उन लोगों को सजा हो सके जो मुस्लिमों के प्रतीकों का अपमान करते हैं, उनकी भावनाओं को आहत करते हैं। यही माँग अन्य संगठनों से भी आई है। यहाँ तक बॉलीवुड अभिनेता नसीरुद्दीन शाह तक ने ये कह दिया कि इस्लामी राज्यों में ईशनिंदा करने पर मौत की सजा मिलती है लेकिन भारत में कोई कार्रवाई तक नहीं हुई। भले ही शाह के इस बयान में प्रत्यक्ष रूप से विशेष कानून या मौत की माँग नहीं की गई लेकिन उनकी भावनाएँ साफ थीं कि आज का मुसलमान तभी ज्यादा खुश हो पाएगा जब देश में अलग से सख्त कानून आएगा जो मुस्लिमों की भावना आहत करने वालों को सजा देगा।

शायद किसी को ये विशेष कानून की माँग गैर-हानिकारक और गैर-जरूरी लग सकती है जिस पर शायद अभी हम ध्यान न दें। लेकिन इस दौरान ये पता होना चाहिए कि ये जो भी हो रहा है वह उन्हीं घटनाओं की पुनरावृत्ति है जिसके कारण भारत टूटा।

इस संदर्भ में महाश्य राजपाल को याद करना जरूरी है। उन्होंने रंगीला रसूल नाम से किताब छापी थी और अंत में इसके लिए वो मार दिए गए थे। हमने ज्यादातर इस किताब को लेकर बस यही सुना कि चूँकि महाशय राजपाल ने पैगंबर मोहम्मद पर ‘रंगीला रसूल’ नाम से व्यंग्य प्रकाशित किया था, इसलिए उन्हें मार दिया गया। लेकिन हम ये नहीं जानते कि उन्होंने ऐसा क्यों किया था। दरअसल 1923 में मुस्लिमों ने दो किताब प्रकाशित की थी। एक का नाम था- कृष्णा तेरी गीता जलानी पड़ेगी। इसमें उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को लेकर अभद्र और अश्लील टिप्पणियाँ की हुई थी। इसके बाद अगली किताब थी- उन्नीसवीं सदी का महर्षि। ये किताब आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती पर अभद्र टिप्पणी करते हुए लिखी गई थी।

इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा लिखी गई इन्हीं किताबों के बदले पंडित चामूपति लाल जो कि महाशय राजपाल के अच्छे दोस्त थे उन्होंने पैगंबर मोहम्मद पर एक व्यंग लिखा और राजपाल से यह वादा लिया कि वो कभी भी इस किताब के लेखक यानी कि उनका नाम किसी को नहीं बताएँगे। शायद वह परिणाम जानते थे। किताब बिन किसी नाम के पब्लिश की गई। लेखक के नाम की जगह लिखा गया- “दूध का दूध, पानी का पानी।”

इस किताब के पब्लिश होने के बाद मुस्लिम समुदाय भड़क उठा। मोहनदास करमचंद गाँधी ने अपनी ‘यंग इंडिया’ में एक तरफा भाईचारे को दर्शाते हुए इस किताब की निंदा की और इस बात को एक सिरे से नजरअंदाज किया गया कि कैसे पहले मुस्लिमों ने हिंदुओं को भड़काया। 1924 में ब्रिटिशों ने इस किताब को बैन कर दिया। किताब के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 ए के तहत तमाम केस दर्ज हुए। 1927 में महाश्य राजपाल को ये सबूत देख छोड़ दिया गया कि किताब में जो लिखा था वो सब तथ्यों पर आधारित था, इसलिए ये नहीं कह सकते कि इसने दो गुटों में नफरत बढ़ाई। जब इस किताब को लेकर फैसला कोर्ट ने सुनाया तो मुस्लिम भीड़ तिलमिला गई। उन्होंने दंगे शुरू कर दिए और महाश्य राजपाल का सिर तन से जुदा करने की माँग उठाई गई। नारों में बताया गया कि कैसे महाश्य राजपाल की हत्या शरीया में हलाल है।

जैसे ही मुस्लिम भीड़ उपद्रव पर उतरी उसके बाद 295 ए भी भीड़ की भावनाओं के मद्देनजर उसी साल ले आया गया। उससे पहले महाशय राजपाल को मारने की दो कोशिशें हो चुकी थीं। 

6 अप्रैल, 1929 को वो दिन आया जब एक 19 साल के इल्मुद्दीन नामक बढ़ई ने महाश्य राजपाल के सीने में 8 बार चाकू घोंपकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। जिस समय उन्हें मारा गया वो अपनी दुकान के बाहर बैठे हुए थे। इस घटना से पहले कोर्ट कार्रवाई के दौरान उन्हें ऑफर दिया गया था कि पंडित चामुपति लाल का नाम बता दें। हालाँकि उन्होंने ऐसा करने से मना किया और बाद में मुँह बंद रखने की कीमत चुकाई। महाशय राजपाल के साथ जो हुआ वो सिर्फ किताब प्रकाशित करने के कारण हुआ, वो भी तब जब कोर्ट ने उन्हें रिहा कर दिया था और मुस्लिमों को उनकी भावनाओं के लिए एक कानून भी दे दिया गया था।

घटना के कुछ ही समय बाद ही देश का विभाजन हुआ और देश को तोड़ने वाले वो थे जिन्हें लगा था कि वो मुस्लिमों को शांत करवा लेंगे। ‘रंगीला रसूल’ विवाद के बाद हिंदुओं ने खिलाफत आंदोलन देखा, जिसे कॉन्ग्रेस और मोहनदास करमचंद गाँधी द्वारा समर्थन प्राप्त था। हिंदुओं ने मोहम्मद अली जिन्ना जैसे मुस्लिम नेताओं का उदय भी देखा जिनके कारण देश के टुकड़े हुए।

अब देखें तो रंगीला रसूल ने विभाजन की वजह नहीं था, लेकिन इसे पीछे और विभाजन के पीछे एक सामान्य तार जरूर था- मोहम्मद अली जिन्ना। जिन्ना ने ही महाशय राजपाल के हत्यारे की पैरवी कोर्ट में की थी जिनकी तारीफों के कसीदे आज भी वामपंथियों द्वार पढ़े जाते हैं और उनके सम्मान में गीत लिखे जाते है। पाकिस्तान ने तो जिन्ना का गाजी कहकर भी नवाजा था।

देश का विभाजन मजहबी आधार पर हुआ। ये इसलिए नहीं था कि हिंदुओं ने मुस्लिमों की माँगों को स्वीकार नहीं किया था। ये इसलिए था क्योंकि मुसलमानों को लगने लगा था कि वे यहाँ उत्पीड़ित हो रहे हैं। मुस्लिम समुदाय ने एकजुट होकर आवाज उठाई थी कि वे अपने लिए एक राष्ट्र चहते हैं और अब काफिरों के साथ आगे नहीं रह सकते। इस्लामी राष्ट्रवाद के विचार ने जनमानस को मुख्य रूप से प्रभावित किया, जहाँ उम्माह के प्रति मुस्लिमों का झुकाव भारत की ओर से बहुत ज्यादा था। ये कहा जाने लगा कि मुस्लिम लोग अपनी विशिष्ट मजहबी, सांस्कृतिक और राजनीतिक विचारधारा के साथ एक जगह नहीं रह सकते, इसलिए उन्हें एक अलग राज्य चाहिए।

क्या दो राष्ट्र सिद्धांत मुस्लिम समुदाय द्वारा महसूस की जा रही उत्पीड़न और अलगाव की भावना थी, जैसा कि कई वामपंथी इतिहासकारों ने हमें बताया? या इसे वीर सावरकर द्वारा चलाया गया जैसा कि वो दावा करते हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सैयद अहमद खान ने 1876 में कहा था, “मैं ये बात मान चुका हूँ कि हिंदू और मुसलमान कभी भी एक राष्ट्र में नहीं रह सकते क्योंकि इनका मजहब और जीने का तरीका दोनों एक दूसरे अलग है।”  इस कथन के 7 वर्षों बाद सैयद अहमद ने दोबारा अपने बोल दोहराए। उन्होंने कहा, “दोस्तों, भारत में दो महत्वपूर्ण समूह रहते हैं, जिन्हें हिंदुओं और मुसलमान नाम से जाना जाता है। हिंदू या मुसलमान होना आंतरिक विश्वास का मामला है जिसका आपसी संबंधों और बाहरी स्थिति से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए ऊपर वाले का हिस्सा उसपर छोड़ दें और अपने हिस्से की चिंता करें। भारत हम दोनों का घर है। भारत में लंबे समय से रहने के कारण दोनों का खून बदल चुका है।”

12 साल बाद उन्होंने कहा, “मान लो, अंग्रेजी साम्राज्य और सेना देश छोड़ दे। अपने साथ सबी तोपें, उनके शानदार हथियार और अन्य सभी चीजें लेकर चला जाए तो भारत का शासक कौन होगा? क्या ये संभव है कि इन परिस्थितियों में दो समूह मुसलमान और हिंदू एक सिंहासन पर बैठ सकें और सत्ता में बराबर रहें? निश्चित रूप से नहीं। यह आवश्यक है कि उनमें से कोई एक, दूसरे के ऊपर विजय प्राप्त करे। यह सोचना कि दोनों साथ में रह सकेंगे असंभव और अकल्पनीय है। जब तक एक समूह दूसरे समूह के ऊपर विजय प्राप्त नहीं कर लेता, उसे अपने अधीन नहीं बना लेता तब तक देश में शांति का शासन नहीं होगा।”

जिन्ना ने कहा था, “ये एक ख्वाब ही है कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ राष्ट्र बनाएँगे।” जिन्ना ने महाशय राजपाल के हत्यारे की पैरवी के कुछ सालों बाद ही 1940 में मुस्लिम लीग को संबोधित करते हुए कहा था, “हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग धार्मिक दर्शन, सामाजिक रीति-रिवाजों और साहित्यिक परंपराओं से जुड़े हैं। वे न तो अंतर्विवाह करते हैं और न ही एक साथ खाते हैं, और वास्तव में वे दो अलग-अलग सभ्यताओं से संबंधित हैं जो मुख्य रूप से परस्पर विरोधी विचारों और धारणाओं पर आधारित हैं।”

महाशय राजपाल की हत्या ही दो राष्ट्र सिद्धांत थी जिसे एक व्यक्ति के खून से विस्तृत रूप से लिखा गया था। मुस्लिम समुदाय वाकई ये मानता था कि हिंदू और मुसलमानों का रहन-सहन इतना अलग है कि वो लोग कभी शांति से एक साथ नहीं रह सकते। रंगीला रसूल के मामले में देखें जिन्होंने हिंदू देवी-देवताओं के विरुद्ध भड़काऊ बातें लिखीं उसे कभी कोई नुकसान नहीं हुआ। जो शुरुआत में नाराजगी थी उसे भी महात्मा गाँधी और बुद्धिजीवियों द्वारा दबा दी गई। ज्यादातर लोग आज भी नहीं जानते हैं कि रंगीला रसूल हिंदू धर्म पर व्यंग्य करने की एक प्रतिक्रिया थी, न कि कोई मुस्लिमों के विरुद्ध नफरत।

वैसी स्थितियों में मुस्लिमों ने खुद सोच लिया कि हिंदुओं का अपमान स्वीकार्य है लेकिन ‘गुस्तान-ए-रसूल की सजा, सिर तन से जुदा’ है चाहे कानून में इसकी इजाजत हो या न हो। मुस्लिम समgदाय शरीया के मुताबिक जीना चाहते थे फिर चाहे राज्य उन्हें ये अनुमति दे या न दे, उनका इरादा इस इसे छीनना और लागू करके वो करने का था जो होता है- यानी चाकू लेकर महाशय राजपाल की हत्या।

सच्चाई यह है कि जिन्ना ने राजपाल के हत्यारे की पैरवी की थी और ये बताया कि ये कारनामा तो इस्लामी जगत में बहादुरी का प्रमाण है। ये उसी नेता द्वारा किया गया जिसने बाद में मुसलमानों की पाक जमीन तैयार की क्योंकि वो मानते थे काफिरों के लिए मौत की सजा ही जायज है। कोएनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक ‘डीकोलोनाइजिंग द हिंदू माइंड’ में इसका उल्लेख किया है।

कोएनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक ‘डीकोलोनाइजिंग द हिंदू माइंड’

आज जब नुपूर शर्मा मामले में दोबारा भावनाओं को आहत होने से बचाने के लिए विशेष कानून की माँग की जा रही है तो हमें इतिहास से सबक लेना होगा।

नुपूर शर्मा ने न केवल देश के कट्टरपंथियों की बल्कि कई इस्लामी देशों की नींव हिला कर रख दी है। उन्होंने जो टिप्पणी की वो लगातार ज्ञानवापी के शिवलिंग का मजाक उड़ता देखने के बाद की। कई मौलानाओं ने शिवलिंग को लेकर कहा था कि हिंदू लिंग की पूजा क्यों करते हैं। कुछ ने सड़क में खड़े किसी भी ढाँचे को शिवलिंग से जोड़ उसका अपमान किया और हिंदू धर्म को एक बर्बर पंथ के रूप में प्रदर्शित करने का प्रयास किया। ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि हिंदू अपना धार्मिक स्थल वापस चाहते हैं जिन्हें मुस्लिम आक्रमणकारियों ने तोड़ा। रंगीला रसूल मामले की तरह लगता है कि हिंदू समुदाय पर हुए शुरुआती हमले फिर भुला दिए गए थे। हालाँकि नुपूर शर्मा की टिप्पणी ने इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। जगह जगह गुस्ताख ए रसूल की एक सजा सिर तन से जुदा बोला जाने लगा, नुपूर के पुतले लगाए गए, उन्हें बीच रास्ते में फाँसी पर लटका दिखाया गया आदि।

ये सड़कों पर उतरती भीड़ बिलकुल वैसी है जैसी रंगीला रसूल का पहला संस्करण देख उतरी थी। ये लोग सच में मानते हैं कि देश का कानून जो काफिरों के राज्य में काफिरों ने बनाया है उससे बड़ा शरीया है।

यदि रंगीला रसूल विवाद और महाशय राजपाल की हत्या टू नेशन थ्योरी का एक एक्शन थी, तो नूपुर शर्मा की घटना इसका एक्शन रीप्ले है।

कम्युनिज्म के जनक माने जाने वाले कार्ल मार्क्स ने सन् 1854 कुरान और इससे निकलने वाले ‘मुस्लिम कानून’ के विषय में कहा था, “ये लोगों के नस्ल और भूगोल को स्पष्ट शब्दों में सिर्फ दो वर्गों में विभाजित कर देता है – इस्लाम में विश्वास रखने वाले, अर्थात मुस्लिम और दूसरा काफिर। काफिर, मतलब उनका दुश्मन। इस्लाम ‘काफिर’ के विषय में जो सिद्धांत देता है, उससे मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों के बीच अनंत काल तक दुश्मनी की व्यवस्था बनी रहेगी।”

उस समय में मोहनदास करमचंद गाँधी ने महाशय राजपाल की निंदा की लेकिन उपद्रवी भीड़ की नहीं। इसके बाद गाँधी ने मोपला मुसलमानों को सराहा और खिलाफत को समर्थन देकर हिंदुओं को उनके ही नरसंहार का जिम्मेदार ठहरा दिया। उस समय भी हमने देखा था कि इस्लामवादियों की भावना के मद्देनजर कैसे कानून ले आया गया।

आज हम लिबरलों को कट्टरपंथी भीड़ की निंदा करने की बजाय नुपूर शर्मा की निंदा करते देखते हैं। हमारे पास ऐसे राजनेता हैं जो नुपूर शर्मा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा देते हैं ताकि इस्लामी देशों से उनके संबंध न खराब हों जिसके बाद मुस्लिम भीड़ सड़कों पर आती है और जुमा नमाज के बाद दंगे करती है। आज हमारे पास वो लोग हैं जो इस्लामी कट्टरपंथ के अस्तित्व को नकारते हैं जिससे भारत जूझ रहा है और दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों को मुस्लिमों के विरुद्ध रची गई साजिश बताते हैं। आज हमें कट्टरपंथी भावना को दूर भगाने के लिए विशेष कानून की जरूरत लगती है।

भारत एक बहुत संवेदनशील मुकाम पर खड़ा है। हमने पहले भी दो राष्ट्र सिद्धांत के एक्शन में होने को नकारा था और आँख मूंदे रहना चुना था और अगर आज भी हम दोबारा भाईचारे, बहुलवाद, समकालिक संस्कृति जैसे शब्दों पर विचार को केंद्रित करके गलती दोहराना चुनते हैं तो वो समय दूर नहीं जब दोबारा से माँ भारती पर खतरा मंडराएगा। एक समय आएगा जब हम सोचेंगे कि काश हम भारत के पहले विभाजत से सीख ले लेते – और उस दिन हम अपने बच्चों की ओर देखेंगे और उन्हें ये समझाना कठिन होगा कि हमने उस चीज के लिए कुछ भी क्यों नहीं किया जिसे हम रोक सकते थे।

नोट: ये आर्टिकल ऑपइंडिया की चीफ एडिटर नुपूर शर्मा के मूल लेख पर आधारित है। आप लिंक पर क्लिक कर उसे पढ़ सकते हैं। इसका अनुवाद जयन्ती मिश्रा ने किया है।

कानपुर में रुपए देकर मदरसे के बच्चों से कराई पत्थरबाजी, बिरयानी खिलाकर पढ़ाया गया मजहबी कट्टरता का पाठ: CCTV फुटेज से हुआ खुलासा

उत्तर प्रदेश के कानपुर में 3 जून, 2022 को जुमे की नमाज के बाद हुई हिंसा के मामले में मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे पुलिस की रडार पर है। हिंसा के दौरान इन बच्चों ने जमकर पत्थरबाजी की और बम फेंके थे। CCTV फुटेज और वायरल फोटो-वीडियो की जाँच से इस बात की पुष्टि हुई है। इस मामले में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के आदेश पर पुलिस ने जाँच शुरू की तो ऐसे कई चौकाने वाले खुलासे हुए।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस की जाँच में यह बात भी सामने आई है कि जिले में हिंसा कराने के लिए मदरसे के बच्चों को पैसे दिए गए थे। यहाँ तक कि हिंसा से पहले उन्हें कई बार बिरयानी भी खिलाई गई। साथ ही बच्चों को मजहबी कट्‌टरता का भी पाठ पढ़ाया गया था।

बता दें कि कश्मीर में पत्थरबाजी करने के लिए आतंकी समूह भी ऐसा करते रहे हैं। जिससे इलाके के मदरसे में पढ़ने वाले छात्र भी अब पुलिस के रडार पर हैं। इसके अलावा एक बार फिर से कानपुर हिंसा के आरोपितों को पाँच दिन की रिमांड पर लेने के लिए कोर्ट में अर्जी दी गई है। वहीं इस मामले में कानपुर पुलिस जल्द ही जाँच पूरी करके अपनी रिपोर्ट NCPCR को सौंपेगी।

रिपोर्ट के अनुसार, JCP आनंद प्रकाश तिवारी ने बताया, “बच्चों का हिंसा में शामिल होना गंभीर बात है। NCPCR ने भी इसका संज्ञान लेते हुए कानपुर पुलिस कमिश्नर विजय सिंह मीणा को जाँच का आदेश दिया है। अभी तक कि जाँच में सामने आया कि नाबालिग बच्चों को रुपए देकर हिंसा के लिए डायवर्ट किया गया।”

उन्होंने बताया कि बच्चों तक फंड सीधे नहीं, बल्कि अलग-अलग चैनल से भेजे गए। यानी इलाके के नेताओं और गली-मोहल्ले के लोगों से रुपए बँटवाए गए। जिससे तय समय पर सैकड़ों नाबालिग हाथ में पत्थर लेकर सड़कों पर उतर आए थे और जमकर पथराव और बमबाजी किया था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस की जाँच में कानपुर के नामी बिल्डर हाजी वसी समेत आठ बिल्डरों का नाम सामने आया है। जिन्होंने कानपुर हिंसा के मास्टरमाइंड हयात जफर हाशमी को फंडिंग करते थे। पुलिस अब इस बात की भी जाँच कर रही है कि कहीं इस पैसे का इस्तेमाल हिंसा फैलाने के लिए तो नहीं किया गया है।

गौरतलब है कि कानपुर (Kanpur ) में 3 जून को इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा की गई हिंसा के दौरान पेट्रोल बमों का इस्तेमाल किया गया था। इसको लेकर अब खुलासा हुआ है कि घटना के 48 घंटे पहले ही चरमपंथियों ने सुनियोजित तरीके से बोतलों में पेट्रोल इकट्ठा किया था। हिंसा के दैरान कानपुर में दंगाइयों ने करीब 50 धमाके किए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, कट्टरपंथियों ने शहर के डिप्टी पड़ाव स्थित भारत पेट्रोलियम के पंप से बोतलों में पेट्रोल भरवाया था। सीसीटीवी फुटेज से इसका खुलासा होने के बाद कानपुर के जिलाधिकारी ने पेट्रोल पंप का लाइसेंस कैंसिल कर दिया है। इसके साथ ही सभी 37 पंपों की जाँच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम गठित कर दिया था।

UAE ने 4 महीने के लिए सस्पेंड किया भारत से गेहूँ निर्यात: NDTV की खबर पर लिबरल गिरोह की उछल-कूद, यहाँ जानिए असली माजरा

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने बड़ा कदम उठाते हुए भारत से आयात किए गए गेहूँ और गेहूँ के आटे को दूसरे देशों को निर्यात करने से मना कर दिया है। वहाँ के अर्थव्यवस्था मंत्रालय ने गेंहूँ के वैश्विक व्यापार प्रवाह का हवाला देते हुए अगले 4 महीने के लिए इस निर्यात पर बैन लगा दिया है।

उल्लेखनीय है कि भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा गेंहूँ उत्पादक देश है। दुबई के कदम को लेकर रॉयटर्स ने एक न्यूज पब्लिश की, जिसे वामपंथी एजेंडा चलाने वाले चैनल NDTV ने ट्वीट किया। फिर क्या था न्यूज को जाने बिना ही कथित लिबरल्स, वामपंथी और इस्लामवादी मोदी सरकार को कोसने में लग गए। किसी ने भी ये आयात और निर्यात में अंतर समझने की कोशिश नहीं की। एनडीटीवी ने ट्वीट किया, “ब्रेकिंग: यूएई भारतीय गेहूँ के निर्यात को चार महीने के लिए बंद करेगा।”

इसके बाद शुरू होती है लिबरल वामपंथियों की अंधी दौड़। इसी क्रम में मिस्टर खान ना में ट्विटर यूजर ने श्रीलंका संकट की ओर इशारा करते हुए कहा कि अगले कुछ दिनों में भारत की हालत श्रीलंका के जैसी होने वाली है।

इस पर पलटवार करते हुए सीमा गुप्ता नाम की यूजर ने कमेंट किया कि बेवकूफ धर्म को निर्यात और आयात के बीच अंतर नहीं समझ आता।

इसी रेस में शामिल होते हुए जसप्रीत सिंह नाम के एक अन्य यूजर ने ट्वीट को समझे बिना कहा, “लगता है कि हमारे विदेशी संबंधों का सत्यानाश करके मानेंगे।”

@AffuRida नाम की एक यूजर ने भी इसी अंधी दौड़ में शामिल होते हुए कहा कि जिस दिन अरब भारत को तेल और गैस की आपूर्ति करना बंद कर देगा तो पूरा देश एक महीने के लिए रुक जाएगा।

फोटो साभार: मद्रासी का ट्विटर अकाउंट

यहीं नहीं, कथित लिबरल एक्ट्रेस रिचा चड्ढा ने भी न्यूज को समझे बिना ही झूठ फैलाने में लग गई। एक्ट्रेस ने लिखा, “नफरत के अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रभावों का स्वागत है।”

फोटो साभार: ऋचा चड्डा का ट्विटर अकाउंट

ऋचा चड्ढा के आईक्यू पर सवाल उठाते हुए फर्रागो अब्दुल्ला ने कहा कि आईक्यू के इस स्तर पर तो एक्ट्रेस राहुल गाँधी की प्रतियोगी बन सकती हैं।

एनडीटीवी के ट्वीट को समझे बिना हरनीत सिंह नाम की यूजर ने सरकार पर तंज कसने की कोशिश करते हुए कहा कि हम वहाँ बुलडोजर कब भेज रहे हैं।

फोटो साभार: हरनीत सिंह का ट्विटर अकाउंट

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच पूरी दुनिया में गेंहू की माँग में बढ़ोतरी हुई है। इसी क्रम में भारत ने 14 मई को गेहूँ के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि, पहले से जारी साख पत्र (एलसी) द्वारा समर्थित और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की माँग करने वाले देशों को इससे छूट दी गई है। यूएई सरकार के आदेश के मुताबिक, 13 मई से पहले यूएई में लाए गए भारतीय गेहूँ का निर्यात या पुन: निर्यात करने की इच्छा रखने वाली कंपनियों को पहले अर्थव्यवस्था मंत्रालय को आवेदन करना होगा।

‘हर मुस्लिम लड़की हिन्दू से करे शादी, हैदराबाद से बच्चियों को खरीद ले जाते हैं शेख’: बोले तारिक फतेह – हिंसा के लिए मौलवी जिम्मेदार

लेखक तारिक फतेह ने पैगंबर मुहम्मद पर टिप्पणी का आरोप लगा कर नूपुर शर्मा के विरुद्ध हो रहे विरोध प्रदर्शन व हिंसा के ताज़ा घटनाक्रम पर अपनी राय रखी है। कनाडा में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के विद्वान तारिक फतेह को इस्लाम के इतिहास पर शोध के लिए जाना जाता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारत का मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व आज के हिसाब से नहीं है, ये न तो ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी (FOE)’ को मान्यता देता है, न ही कोई आलोचना बर्दाश्त करता है।

उन्होंने दुनिया भर में मुस्लिमों के पिछड़ने का कारण भी यही बताया। उन्होंने कहा कि भले नूपुर शर्मा का लहजा ठीक न हो, लेकिन उन्होंने शिवलिंग पर की जा रही आपत्तिजनक टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने कहा कि मुस्लिम नेतृत्व अभी भी 12वीं शताब्दी में जी रहा है, जहाँ उनका विश्वास लूटमार करने, गर्दन काटने, गर्दन काटने, पत्थरबाजी करने, घर जलाने में है। वरिष्ठ लेखक ने इसे मौजूदा मुस्लिम लीडरशिप की हताशा बताते हुए कहा कि अभी हो रही हिंसा देश का बँटवारा कराने वाली ताकतों का ही काम है।

‘दैनिक भास्कर’ से एक्सक्लूसिव बातचीत करते हुए तारिक फतेह ने कहा कि भारत का मुस्लिम नेतृत्व खुद को उम्माह से जोड़ता है और ये देवबंदी मौलवियों के हाथ में है। उन्होंने कहा कि अब न औरंगजेब जैसे मुग़ल आने वाले हैं, न तैमूर। ये सब कब के मर चुके। उन्होंने हिंसा के लिए मदरसों और मस्जिदों से निकलने वाले नेताओं और देवबंदी मौलवियों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के मुस्लिम ‘कुफ्र पर जीत’ की दुआ माँगते हैं।

उन्होंने कहा कि जब तक ‘काफिर’ शब्द का इस्तेमाल होता रहेगा, भारत का मुस्लिम भारतीय नहीं बन सकेगा। उन्होंने सवाल दागा कि काफिर है कौन – हिन्दू, ईसाई और यहूदी? उन्होंने समाधान बताया कि मुस्लिमों को ऐसी लीडरशिप चाहिए, जो राजनीति और मजहब को अलग रखे। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की सोच है कि क़यामत का दिन तब तक नहीं आएगा, जब तक सारे हिन्दुओं को न मार डाला जाए और मंदिरों को न ध्वस्त किया जाए।

बकौल तारिक फतेह, मुस्लिम भारत को इस नजर से देखते हैं कि इस पर कब्ज़ा करना है। उन्होंने यूपी में दंगाइयों के घरों पर हो रही बुलडोजर कार्रवाई पर कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कानून-व्यवस्था का प्रबंधन करना बेहतर समझते हैं, बेवजह उपद्रव करना मुस्लिमों का कसूर है। उन्होंने अरब की शिकायतों का जश्न मनाने वालों पर कहा कि इन्हें अपना मानना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने निशाना साधा कि जिस क़तर में अल्पसंख्यकों को मतदान तक का अधिकार नहीं, वो भारत को ज्ञान दे रहा।

उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी जैसों को दरकिनार कर आरिफ मोहम्मद खान जैसे नेताओं को आगे लाने की वकालत करने हुए कहा कि जब शेख लोग हैदराबाद से बाकियों को खरीद कर ले जाते हैं, तब ओवैसी जैसे लोग चुप रहे हैं। उन्होंने ऐसे नेताओं पर अपने हिसाब से संविधान के दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए कहा कि वो भारत को इस्लामी रियासत समझते हैं। तारिक फतह ने कहा कि मौलवियों को मारपीट के अलावा कुछ नहीं सूझता। उन्होंने पाकिस्तान में अल्पसंख्यक विरोधी घटनाओं का उदाहरण दिया।

तारिक फतेह ने कहा, “इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद के इंतकाल के साथ ही दंगे शुरू हो गए। 18 घंटे तक नबी को दफनाया नहीं जा सका था। जागरूकता के कारण मुस्लिम अब एक्स-मुस्लिम बनते जा रहे। जिन मुस्लिम कट्टरपंथियों के कारण पाकिस्तान बना, वो यहीं रह गए। पैगंबर ने कभी भारत पर कब्ज़ा करने को नहीं कहा। क़तर के प्रति यहाँ के मुस्लिमों की निष्ठा है, जिसकी कोई हैसियत नहीं। PM मोदी ने अपने 8 वर्षों के शासनकाल में मुस्लिमों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा। काशी-मथुरा पर मुस्लिम खुद विवाद ख़त्म करने की पहल करें।”

तारिक फतेह ने कहा कि हर मुस्लिम लड़की को हिन्दू लड़के से शादी करनी चाहिए। उन्होंने दिलीप कुमार जैसे अच्छे मुस्लिमों का उदाहरण दिया। उन्होंने शाहरुख़ खान और आमिर खान से अपील की कि वो मौलवियों को अपने घर जाने को कहें। आमिर खान की पत्नी किरण राव ने भारत में डर लगने की बात कही थी। इस पर तारिक फतेह ने उन्हें दुनिया के अन्य मुस्लिमों की हालत देखने की सलाह दी। नसीरुद्दीन शाह को समझदार बताते हुए उन्होंने कहा कि वो कभी-कभी दबाव में आकर गलतबयानी कर जाते हैं।