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‘इससे कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष पर फर्क नहीं पड़ेगा’: आतंकी यासीन मलिक के समर्थन में उतरे शाहिद अफरीदी, इमरान ने कहा – हिंदुत्व फासिस्ट मोदी सरकार

आतंकी यासीन मलिक को सज़ा सुनाए जाने के बीच पाकिस्तान के कई बड़े चेहरे इसके समर्थन में उतर आए हैं। पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी ने भी यासीन मलिक का समर्थन किया है। बता दें कि बुधवार (25 मई, 2022) को ही ‘राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA)’ की विशेष अदालत उसे सज़ा सुनाने वाली है। वायुसेना अधिकारियों के हत्यारे यासीन मलिक पर कई कश्मीरी पंडितों की हत्या का भी आरोप है।

शाहिद अफरीदी ने आतंकी का समर्थन करते हुए ट्वीट किया, “भारत अपने जबरदस्त मानवाधिकार हनन के कृत्यों के खिलाफ किए जाने वाली आलोचना की आवाज़ों को दबाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है, जो विफल होगा। यासीन मलिक पर मनगढंत आरोप लगाए जाने से कश्मीर की आज़ादी के संघर्ष पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मैं संयुक्त राष्ट्र (UN) से आग्रह करता हूँ कि कश्मीरी नेताओं के खिलाफ चल रहे अवैध और अन्यायपूर्ण ट्रायल्स पर संज्ञान ले।”

साथ ही शाहिद अफरीदी ने पीछे से अपनी एक तस्वीर भी पोस्ट की। उनके आगे पाकिस्तान के नेशनल फ्लैग और उसके कब्जे वाले कश्मीर (जिसे पाकिस्तानी ‘आज़ाद कश्मीर’ कहते हैं) के कथित झंडे को देखा जा सकता है। इससे पहले पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ ने भी यासीन मलिक का समर्थन करते हुए कहा था कि ‘भारत अधिकृत जम्मू कश्मीर’ में ‘कश्मीरी नेताओं के साथ दुर्व्यवहार’ का दुनिया को संज्ञान लेना चाहिए।

उन्होंने कहा था कि ‘प्रमुख कश्मीरी नेता’ यासीन मलिक पर आतंकवाद के ‘झूठे आरोप लगा कर’ दोषी ठहराने की प्रक्रिया ‘भारत के जबरदस्त मानवाधिकार हनन के आलोचकों को चुप कराने’ का एक विफल प्रयास है। उन्होंने ये भी कहा था कि मोदी सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। इसी तरह पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने ‘हिंदुत्व फासिस्ट’ बता दिया और यासीन मलिक पर लगे आरोपों को झूठा बताया।

इमरान खान ने ट्वीट किया कि अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को ‘भारत के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर’ में ‘हिंदुत्व फासिस्ट मोदी सरकार के आतंकवाद’ के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। बता दें कि यासीन मलिक की सज़ा पर बहस पूरी हो गई है और NIA ने उसे फाँसी देने की माँग की है। साढ़े 3 बजे इस मामले में फैसला सुनाया जाना है। यासीन मलिक को टेरर फंडिंग की भी NIA ने जाँच की। उस पर कश्मीर की शांति को भंग करने, भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और आतंकी गतिविधियों के आरोप साबित हुए हैं

गौरतलब है कि इसी महीने 2022 में यासीन मलिक ने कोर्ट में आतंकवाद के आरोपों को कबूल किया था। उसने पटियाला हाउस कोर्ट की एनआईए अदालत में अपनी गलती मानते हुए कोर्ट से कानून के मुताबिक सजा देने की माँग की थी। यासीन मलिक वो आतंकी है, जो कि घाटी में हिंदुओं के नरसंहार में सीधे तौर पर शामिल था। वो जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का अध्यक्ष होने के साथ ही पाकिस्तान का कट्टर समर्थक भी है। उस पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण का भी आरोप है।

144 दिन-212 मास शूटिंग: क्या टेक्सास के बच्चों की लाश से उठेगी अमेरिका में गन कल्चर की अर्थी, शराब खरीदने से आसान है हथियार पाना

टेक्सास में 18 साल एक युवक ने AK-47 से अपनी दादी को गोली मारी। फिर स्कूल पहुँचकर अंधाधुंध फायरिंग की। अमेरिका को हिला देने वाली यह घटना 24 मई 2022 को हुई। 22 लोगों की मौत हो गई।

इस घटना ने फिर से अमेरिका के ‘गन कल्चर’ को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। लेकिन अमेरिका में इस तरह की यह पहली घटना नहीं है। ऐसी घटनाओं से सीखने की अमेरिका का जो रिकॉर्ड है उससे लगता है कि शायद आखिरी भी न हो। 2022 अभी आधा भी नहीं बीता है। लेकिन अमेरिका में 144 दिन में सामूहिक गोलीबारी की 212 घटना हो चुकी है। ऐसी 27 घटना तो स्कूलों में भी हो चुकी है।

अमेरिका का ‘द गन कंट्रोल एक्ट 1968’

अमेरिका में इस तरह की घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण वहाँ का ‘गन एक्ट’ है। अमेरिका में ‘गन कल्चर’ का संबंध वहाँ के संविधान से जुड़ा है। इस देश में बंदूक रखने का कानूनी आधार संविधान के दूसरे संशोधन में निहित है। इसलिए बहुत आसानी से हथियारों की खरीदारी की जा सकती है। द गन कंट्रोल एक्ट 1968 (GCA) के मुताबिक, राइफल या कोई भी छोटा हथियार खरीदने के लिए उम्र कम से कम 18 साल होनी चाहिए। दूसरे हथियार जैसे हैंडगन खरीदने के लिए 21 साल की उम्र होनी चाहिए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 33 करोड़ की आबादी वाले अमेरिका में आम नागरिकों के पास 39 करोड़ हथियार हैं

अमेरिका के स्वतंत्र डेटा संग्रह करने वाले संगठन ‘गन वायलेंस आर्काइव’ की रिपोर्ट के मुताबिक, गन कल्चर के कारण अमेरिका में हिंसा पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने चुनाव के दौरान गन कल्चर पर रोक का वादा किया था, लेकिन इस पर अब तक कोई पहल नहीं की जा सकी है। ऑनलाइन साइट पर गन के पार्ट्स की खरीद पहले की तरह ही जारी है।

आपको बता दें कि अमेरिका में 2021 में 693 सामूहिक गोलीबारी की घटनाएँ हुईं। 2020 में 611 जगह गोलीबारी हुई तो 2019 में 417 जगहों पर ऐसी ही वारदात को अंजाम दिया गया। आँकड़ों के मुताबिक, 2021 में अमेरिका के स्कूलों में गोलीबारी की 34 घटनाएँ सामने आईं। 2020 में 10 स्कूलों तो 2018 व 2019 में 24-24 घटनाएँ सामने आई थी।

टेक्सास की घटना के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है, “हमें पूछना होगा कि एक राष्ट्र के रूप में हम कब बंदूक की लॉबी के खिलाफ खड़े होंगे और वो करेंगे जो हमें करना चाहिए।” लेकिन हकीकत यही है कि अब तक न बाइडेन ने और न ही उनके पूर्ववर्तियों ने इस लॉबी पर शिकंजा कसने के लिए कुछ किया है।

किसी को बंदूक रखने की इजाजत देने से पहले उसकी पृष्ठभूमि की बेहतर ढंग से जाँच का अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने समर्थन किया था। लेकिन इन्हीं ट्रंप ने 2016 में राष्ट्रपति पद की दौड़ के दौरान बंदूक नियंत्रण का विरोध किया था। वर्ष 2017 में नैशनल राइफल एसोसिएशन के अधिवेशन में राष्ट्रपति ने कहा था कि वह हथियार रखने के संवैधानिक अधिकार में कभी भी दखल नहीं देंगे।

ट्रंप के पूर्ववर्ती बराक ओबामा ने भी माना था कि देश में गन लॉबी काफी ज्यादा मजबूत है। टेक्सास शूटिंग के बाद ओबामा ने इशारों में रिपब्लिकन पार्टी को गन लॉबी को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार ठहराया है और कहा है कि इसके खिलाफ बहुत पहले ही एक्शन लिया जाना चाहिए था, कोई भी एक्शन, मगर लिया जाना चाहिए था।

अमेरिका में गन लॉबी के इतना मजबूत होने का सबसे बड़ा कारण का उसका गन एक्ट है। अमेरिका में 21 साल से पहले शराब खरीदना गैर-कानूनी है, लेकिन वहाँ ज्यादातर राज्यों में युवा 18 वर्ष की उम्र से पहले ही एआर-15 मिलिट्री स्टाइल राइफल खरीद सकते हैं। 21 वर्ष के ऊपर के उम्र वाले किसी लाइसेंसी डीलर से इसे खरीद सकते हैं। वहीं, मिलिट्री स्टाइल राइफल के लिए कोई विशेष नियम या सख्ती नहीं है। इसके चलते यह हथियार सामूहिक गोलीबारी करने वाले हमलावरों का पसंदीदा हथियार बन गया है।

पर असली सवाल वही है हर ऐसी घटनाओं के बाद रोने वाला अमेरिका क्या वाकई में गन लॉबी के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत जुटा पाएगा? क्या अमेरिकी जनता और वहाँ का तंत्र हथियारों से अपने प्रेम को तिलांजलि दे पाएगा?

माना राहुल गाँधी ‘विनोद’ हैं, पर हर जगह हगने की ये जिद भी अच्छी नहीं: घर हो या कैंब्रिज भारत को नीचा दिखा रहे ‘बनराकस’

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी जिस समय कैंब्रिज के दौरे पर हैं, उसी समय भारत में वेब सीरिज ‘पंचायत’ का दूसरा सीजन चर्चा में है। इस सीरिज के एक दृश्य में फुलेरा ग्राम निवासी विनोद खुले में हगने की जिद करता दिखाया गया है। पंचायत का यह दृश्य इस देश के कॉन्ग्रेसियों, वामपंथियों, लिबरलों और सेकुलरों पर पूरी तरह फिट बैठता है। मौका, दस्तूर, मंच कुछ भी हो उन्हें खुले में हगना ही है। 

अब राहुल गाँधी को ही ले लीजिए। 23 मई 2022 को एक वैचारिक उल्टी में उन्होंने कहा कि भारत एक राष्ट्र नहीं है। उन्होंने वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द प्रिंट’ की स्तंभकार श्रुति कपिला के साथ चर्चा में कहा कि भारत यूरोपीय यूनियन की तरह राज्यों का संघ है न कि ब्रिटेन जैसा राष्ट्र। इस बीच उनका एक वीडियो भी वायरल हुआ है, जिसमें एक सवाल पर वे ऐसे निरुत्तर हुए नजर आए और अब इसी पर उनका मजाक बन रहा है। 

पहले राहुल गाँधी के वैचारिक दस्त पर बात करते हैं और समझते हैं कि कैसे कॉन्ग्रेस नेता ने ‘इंडिया एट 75’ नामक सम्मेलन में उपस्थिति दर्ज करवाकर अपनी उस स्तर पर थू-थू करवा ली है, जितनी शायद वो राजनीतिक रैलियों में मीम कंटेंट बनकर नहीं करवा पाते। सूट-बूट में डैडीज बॉय की छवि लेकर जब वो कार्यक्रम में शामिल हुए तो उन्हें देखकर ही पता चल गया था कि भीतर में कन्फ्यूज आत्मा और बाहर से खुद को बुद्धिजीवी दिखाने की जिद कुछ ही मिनट में उनकी छीछालेदर करवाने वाली है। थोड़ी देर बाद हुआ भी कुछ ऐसा ही।

संविधान की एक लाइन रटकर कार्यक्रम में पहुँचे राहुल गाँधी

राहुल ने वहाँ बोलना शुरू किया और दूसरी तरफ उनकी वीडियो देखते ही सोशल मीडिया पर उनकी निंदा शुरू हो गई। ऐसा होता भी क्यों न। राहुल गाँधी कैंब्रिज में बैठकर विदेशियों को समझा रहे थे कि भारत राज्यों का एक संघ है न कि एक राष्ट्र और इसी के तहत राज्यों के बीच बातचीत चल रही है। अपनी ‘बौद्धिकता’ का प्रमाण देते हुए राहुल ने कार्यक्रम में बता भी दिया कि कॉन्ग्रेस पार्टी भारत को एक राष्ट्र के तौर पर नहीं बल्कि राज्यों के संघ के दौर पर देखती हैं और इसीलिए जो आरएसएस भारत को एक राष्ट्र मानता है उनके मुताबिक वो उनसे बहुत अलग है।

अब अखंड भारत को खंड-खंड करने वाले इस बयान को सही साबित करने के लिए संविधान को कोट किया और बताया कि भारत को राज्यों का संघ बताने वाली परिभाषा उन्होंने ने नहीं दी, ये तो संविधान कहता है। हालाँकि इस दौरान राहुल स्कूल में पढ़ाए गए उस बेसिक ज्ञान को भूल जाते हैं जहाँ समझाया जाता था कि रटने से ज्यादा चीजों संदर्भ सहित समझना जरूरी है।

उन्होंने विदेशियों के सामने लीडिंग नेता की तरह भारत की अवधारणा को समझा दिया। बस ये नहीं बता पाए कि जिस संविधान का उल्लेख वह कर रहे हैं उसी में ये बात भी लिखी है कि भारत एक संघ जरूर है लेकिन यह राज्यों के बीच हुए किसी समझौते का परिणाम बिलकुल भी नहीं है। पुष्टि के लिए नीचे संविधान में उल्लेखित अनुच्छेद 1 की परिभाषा पढ़ी जा सकती है और समझा जा सकता है कि राज्यों को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है। ये ऐसी है यूनियन है जो तितर-बितर नहीं हो सकती।

कंटेंट साभार: एम लक्ष्मीकांत की इंडियन पॉलिटी

राहुल गाँधी कार्यक्रम में भारत के राज्यों को अलग-अलग दिखाने की इतनी कोशिश करते हैं कि जब उनसे डॉ श्रुति भारत को अन्य देशों से अलग बताते हुए उदाहरण देती हैं कि वहाँ दो पार्टी वाला सिद्धांत है लेकिन भारत में ऐसा नहीं है तो विदेशी सिद्धांतों के मुरीद राहुल दोबारा से कहते हैं भारत को एक राष्ट्र की तरह नहीं, राज्यों की संघ की तरह देंखें और पाएँ कि हर जगह दो दो पार्टियाँ ही हैं। चाहे वो तमिलनाडु हो या उत्तर प्रदेश। हद्द तब हो जाती है जब राहुल गाँधी भारत को भारत की तरह न देखने की सलाह देते हैं और कहते हैं भारत-भारत होने से ज्यादा यूरोप जैसा है इसलिए उसे वैसे ही देखा जाना चाहिए।

चीन के प्रवक्ता बने कॉन्ग्रेस नेता

यूनियन ऑफ स्टेट के सवाल पर पर जी भर के उल-जुलूल बातें उगलने के बाद राहुल गाँधी चीन के प्रति अपने प्रेम को जाहिर करने से भी कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में नहीं चूँकते और वहाँ पर चीन की घुसपैठ का बचाव करते हैं। वह पड़ोसी देशों से भारत के संबंध वाले सवाल पर जब जवाब देते हैं तो किसी चीनी प्रवक्ता से कम उनकी छवि नहीं दिखती। राहुल जहाँ भारत को लेकर कहते हैं यहाँ की लोकतांत्रिक व्यवस्था चरमरा गई है और लोकतंत्र संस्थाएँ कमजोर हो गई है। वहीं चीन की तारीफ समझाते हुए कहते हैं, “बीते 100 सालों में दुनिया के सामने एक ही विजन था वो था मैरीटाइम विजन यानी समुद्री विस्तार का विजन है। इससे पहले लैंड पर आधारित विजन था। लेकिन अब पहली बार दुनिया के सामने दो विजन हैं- एक है चीन का टैरेस्टियल विजन और दूसरा है अमेरिका का मैरीटाइम विजन (जिसका भारत भी हिस्सा है)।”

राहुल गाँधी कहते हैं कि अभी चीन का बेल्ट एंड रोड सिस्टम दुनिया को एक टेरेस्टियल ट्रेडिंग सिस्टम में बदलने की मुहिम है और जैसे-जैसे चीन इसका विस्तार कर रही है वो अन्य देशों के साथ समृद्ध होने के आइडिया को शेयर कर रही है। राहुल चीन के विजन के इतने कायल दिखते हैं कि उन्हें अमेरिका और भारत दिशाहीन नजर आने लगते हैं। वो चीन की ओर से उसकी नीति का बखान करते हैं और बताते हैं चीन को हकीकत में दूसरे देशों से ये कहता है- “हम (चीन) आपको इंफ्रास्टक्चर दे रहे हैं, 5g दे रहे हैं, आगे बढ़ने के लिए देश को बेहतर बनाने के लिए पैसे दे रहे हैं।’

अब ज्ञात रहे कि राहुल गाँधी जिस योजना की इतनी तारीफ करके कैंब्रिज में गर्व से घूम रहे हैं वो वही योजना है जिससे अब तक चीन ने पाकिस्तान को अपनी अधीन बनाया और श्रीलंका को कर्ज में डुबोकर उसे शून्य होने पर मजबूर कर दिया। इसके अलावा कई छोटे-छोटे देशों की संपत्ति पर वो पहले ही कब्जे कर चुका है। सब इसी योजना के बदौलत। मगर, राहुल की शिकायत है कि जैसा ऑफर चीन दे रहा है वैसा पश्चिमी देश नहीं दे रहे, बस कहते हैं चीन को रोको। राहुल गाँधी आगे अपनी बात रखते हुए चीन से सुलह न करने पर भी पीएम मोदी के प्रति नाराजगी व्यक्त करते हैं। उनके अनुसार देश में कई लोग विदेशी मामलों के जानकार हैं जो इस मुद्दे को सुलझा सकते हैं लेकिन पीएम सुनें तभी तो…। आगे चीन के महिमामंडन में राहुल इतना खो जाते हैं कि भारत और चीन के बीच तनाव को वह रूस-यूक्रेन युद्ध से जोड़ देते हैं।

हिंसा-अहिंसा पर ब्लैंक

इस इंटरव्यू में हर मुद्दे पर विशेषज्ञ बनने के दौरान एक समय ऐसा भी आता है जब राहुल अपनी दुनिया में खो जाते हैं और उनसे सवाल हुआ है इसका ध्यान लंबी चुप्पी के बाद देते हैं। इंटरव्यू का ये स्लॉट इतना हास्यासपद है कि लोग राहुल की खिल्ली उड़ा रहे हैं और सलाह दे रहे हैं कि वो प्रेस से बात करने से पहले ट्यूशन लिया करें। दरअसल इंटरव्यू में श्रुति उनसे हिंसा और अहिंसा को लेकर उनके दृष्णिकोण पर सवाल करती हैं लेकिन वो अचानक मंच पर बैठे-बैठे चुप होकर इधर-उधर देखते जाते हैं और रुक-रुक कर जवाब देना शुरू करते हैं। ये क्षण ऐसा भी नहीं होता कि ये सोचकर तसल्ली की जाए कि राहुल गाँधी विदेशी मंच पर बोलने से अंदर चिंतन-मनन कर रहे थे क्योंकि इसके बाद भी वो सटीक जवाब देने की जगह बातों को घुमाते रहते हैं। पहले महान दिखाने के लिए ये कह देते हैं कि क्षमा करने को वो सही मानते हैं फिर कहते हैं लेकिन सटीक तरीका भी नहीं है।

…और इस तरह राहुल गाँधी लगभग 38 मिनट के इंटरव्यू में हर मामले पर टुकड़ों में इकट्ठा ज्ञान राहुल गाँधी कैंब्रिज में देकर आते हैं और फिर अलग अलग पोज में फोटो खिंचा कर उन्हें सीरियस नेता दिखाने का काम कॉन्ग्रेस के हर छोटे-बड़े कार्यकर्ता द्वारा किया जाता है।

अब आखिर में फिर से पंचायत पर लौटते हैं। फुलेरा एक ओडीएफ घोषित गाँव है। विनोद के घर का शौचालय एक मानवीय भूल की वजह से तैयार नहीं हो पाया है। उसे पूरा होने में करीब एक सप्ताह लगेगा। उसके पास शौच के लिए उप प्रधान के घर के शौचालय में जाने का विकल्प भी है। लेकिन, वह बनराकस के उकसावे में खुले में हगने का विकल्प चुनता है। दुर्भाग्य से इस देश के विपक्ष में बनराकस की भरमार है। लेकिन, जब इन बनराकस की मिलीभगत से विनोद विदेश में भी खुले में हगने की जिद पकड़ लेता है तो हँसी का पात्र भारत का लोकतंत्र भी बनता है। सो, भारत के लोकतंत्र को ऐसे बनराकस और विनोद से सावधान रहने की जरूरत है।

…जब स्वामी विवेकानंद खुद अफ्रीका जाकर वहाँ काम करना चाहते थे: अफ्रीकी दिवस पर विश्व बंधुत्व और भविष्य की कल्पना

मानव जाति के इतिहास में ऐसे उदाहरण दुर्लभ ही हैं, जहाँ किसी व्यक्ति द्वारा बोले गए परिचयात्मक शब्दों ने पूरे दर्शकों को इतना उत्साहित किया जितना कि स्वामी विवेकानंद के 1893 के विश्व धर्म संसद में अभूतपूर्व भाषण ने। “अमेरिका के बहनों और भाइयों” शब्दों से शुरुआत करते हुए, भाषण ने न केवल स्वामी विवेकानंद को किसी विशेष राष्ट्र या धर्म से अलग सार्वभौमिक बना दिया बल्कि दर्शकों को यह भी एहसास कराया कि वे एक महान व्यक्तित्व के समक्ष दर्शकों में थे, जो वास्तव में उन्हें अतुल्य भाईचारे का मार्ग दिखा सके।

इसके अलावा, मानव इतिहास में, हमें शायद ही कभी ऐसे नेता मिले हैं जो अपनी क्षेत्रीय पहचान पर गर्व करते हैं, और साथ ही साथ दुनिया भर में मानव जाति के लिए सार्वभौमिक चिंता रखते हैं। उनका दृष्टिकोण, मिशन, सरोकार और योगदान उनके देश के साथ-साथ मानवता के लिए प्रगति के लिए समान रूप से दिखाई देता है। स्वामी विवेकानंद “हिंदू योगी” जैसा कि उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उनके प्रवास के दौरान लंदन में बुलाया जाता था, इतिहास में एक ऐसा व्यक्ति है, जिन्हें अपने धर्म – “हिंदू धर्म” पर गर्व था और उन्हें अपने देश और संस्कृति से बहुत प्यार था।

स्वामी विवेकानंद “विश्व बन्धुत्व” को बढ़ावा देने के लिए समर्पित थे। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई भी कार्य उनके व्याख्यानों, पत्रों या उनके व्यावहारिक कार्यों में किसी भी विरोधाभास को प्रकट नहीं करता है – जो उन्होंने अपने जीवनकाल के दौरान किया, और बाद में अपने संगठन – रामकृष्ण मिशन के माध्यम से जारी रखा। संगठन का नाम उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शक, श्री रामकृष्ण परमहंस (1836-1886) के नाम पर रखा गया है, जिसे स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1897 में स्थापित किया था।

स्वामी विवेकानंद ने दुनिया के लगभग एक दर्जन देशों का दौरा किया, जहाँ उन्होंने व्याख्यान और कक्षाओं के रूप में अपने सार्वभौमिक संदेश का प्रचार किया। ज्यादातर वेदांत और योग की अवधारणा के तहत शीर्षक, जिसे उन्होंने कभी अपना नहीं कहा; लेकिन मुख्य रूप से वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भागवत गीता जैसे महान भारतीय साहित्य का सार बताया। 1902 में स्वामी विवेकानंद की समाधी के उपरांत, रामकृष्ण मिशन ने दुनिया भर में स्थापित अपने केंद्रों के माध्यम से “आत्मनो मोक्षार्थम् जगत्-हिताय च” के आदर्श वाक्य के साथ सेवा कार्य का विस्तार किया, जिसका अर्थ है “हमारे स्वयं के उद्धार के लिए और पृथ्वी पर सभी की भलाई के लिए”, जो स्वामी विवेकानंद द्वारा दिया गया था।

यह केंद्र संगठन के भिक्षुओं द्वारा चलाए जाते हैं, जो स्थानीय भक्तों (साधकों) के सहयोग से कई मानवीय उत्कृष्टता और सामाजिक कल्याण गतिविधियों को अंजाम देते हैं। स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण और मिशन पूरी दुनिया के लिए थे, इसलिए अफ्रीकी महाद्वीप भी कभी उनके दिमाग से नहीं छूटा। 1893 में स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण को अक्सर अफ्रीकी नेताओं द्वारा वर्तमान समय में अपने नागरिकों को उन मूल्यों की याद दिलाने के लिए संदर्भित किया गया है, जो उनके भाषण के लिए खड़े थे और आज के समय में भी सबसे महत्वपूर्ण हैं – करुणा, भाईचारा, सहिष्णुता, स्वीकृति।

अफ्रीकी राष्ट्र के लिए, जो खुद को सांप्रदायिकता, कट्टरता और उत्पीड़न के घेरे में पाते हैं; स्वामी विवेकानंद के विचारों की ओर मुड़ने का इससे बेहतर समय कभी नहीं रहा, जो इस दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने के लिए प्रमुख मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। अपने जीवनकाल के दौरान, जब स्वामी विवेकानंद केवल मिस्र (अफ्रीकी महाद्वीप में) की यात्रा करने में सक्षम थे, पश्चिम की अपनी पहली यात्रा पर थे। लेकिन महाद्वीप के लिए उनकी चिंता स्पष्ट रूप से स्वामी शिवानंद (रामकृष्ण परमहंस के प्रत्यक्ष शिष्य और स्वामी विवेकानंद के भाई भिक्षु) को जयपुर (भारत के राजस्थान राज्य की वर्तमान राजधानी) से 27 दिसंबर 1897 को लिखे गए उनके पत्र से स्पष्ट है।

इस पत्र में स्वामी विवेकानंद लिखते हैं:

“गिरगाँव, बंबई के श्री सेतलूर, जिन्हें आप मद्रास से अच्छी तरह जानते हैं, मुझे लिखते हैं कि अफ्रीका में भारतीय प्रवासियों की धार्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी को अफ्रीका भेजा जाए। वह निश्चित रूप से आदमी को भेज देंगे और सभी खर्च वहन करेंगे । मुझे डर है, काम वर्तमान में अनुकूल नहीं होगा, लेकिन यह वास्तव में एक आदर्श व्यक्ति के लिए काम है। आप जानते हैं कि प्रवासियों को वहाँ के गोरे लोग बिल्कुल पसंद नहीं करते हैं। भारतीयों की देखभाल करने के लिए और साथ ही शांत रहते हुए और अधिक संघर्ष नहीं पैदा करने का ही काम है। इससे तत्काल परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती है, परन्तु लंबे समय अंतराल में यह भारत के लिए अभी तक किए गए किसी भी प्रयास की तुलना में अधिक फायदेमंद काम साबित होगा।”

स्वामी विवेकानंद स्वयं अफ्रीकी महाद्वीप में काम शुरू करने के इच्छुक थे। विवेकानंद भारत के भीतर और बाहर दोनों जगह एक प्रभावशाली व्यक्तित्व थे। दक्षिण अफ्रीका में, औपनिवेशिक शासन के दौरान, भारतीय और हिंदू संस्कृति लगभग न के बराबर थी। इस समय के दौरान स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ और लेखन एक नई साँस के रूप में आई और उन औपनिवेशिक समाजों को प्रासंगिकता प्रदान करने और भारतीय डायस्पोरा के उत्थान में कामयाब रहे।

स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ हाशिए पर पड़े भारतीय अल्पसंख्यक समुदाय में गर्व की भावना पैदा करने में सक्षम थीं। स्वामी विवेकानंद किसी धर्म विशेष के खिलाफ या उसके पक्ष में नहीं थे। उनकी शिक्षाओं में सह-अस्तित्व के विभिन्न प्रथाओं के अधिकार शामिल हैं। विवेकानंद ने लगभग विशेष रूप से अंग्रेजी में पढ़ाया और लिखा और उन्होंने इस तथ्य का उपयोग व्यापक दर्शकों तक पहुँचने के लिए किया। उन्होंने एक कायाकल्पित भारत का मार्ग प्रशस्त किया और दुनिया भर में भारतीय डायस्पोरा के बीच नए सिरे से तालमेल और नए सिरे से गौरव लाया।

आज भारतीय मिशन के महाद्वीप में 4 केंद्र और 6 उप-केंद्र हैं, जिसमें वाकोस (मॉरीशस), लुसाका (ज़ाम्बिया), डरबन और फीनिक्स (दक्षिण अफ्रीका) में केंद्र हैं। मॉरीशस में सेंट जूलियन डी हॉटमैन, चैट्सवर्थ, लेडीस्मिथ, न्यूकैसल, पीटरमैरिट्सबर्ग और दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में उप-केंद्र हैं। हमें श्री शारदा देवी आश्रम का भी विवरण मिलता है, जो दक्षिण अफ्रीका के डरबन में महिलाओं के लिए एक केंद्र है।

ये केंद्र और उप-केंद्र स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और अन्य जैसे अधिक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नियमित आध्यात्मिक गतिविधियों और मानवीय और सामाजिक सेवा करते हैं। इसके अलावा, बच्चों और युवाओं पर ध्यान केंद्रित करने वाले कार्यक्रम भी उनके समग्र विकास और भलाई के लिए आयोजित किए जाते हैं। रामकृष्ण मिशन का अपना प्रकाशन भी है। यह बिल्कुल स्पष्ट है कि वंचित वर्ग से लेकर सक्षम वर्ग तक, मिशन बड़े पैमाने पर समाज में योगदान देता है।

स्वामी विवेकानंद की दृष्टि आधुनिक समय में एक प्रकाशस्तंभ के रूप में कार्य करती है। उन्हें अफ्रीकी देशों के लिए सत्य का स्रोत माना जाता है। इसने कई नेताओं के लिए रणनीतियों को लागू करने, नीतियाँ बनाने और अपने नागरिकों को एक साथ लाने और अन्य देशों के साथ जुड़ने और सुधारात्मक कदम उठाने में मदद करने का मार्ग प्रशस्त किया है। पूरे महाद्वीपों में, एक-दूसरे से लड़ने वाले राष्ट्र हैं, और उनके नागरिक आंतरिक रूप से जाति, रंग, पंथ की धारणा पर विभाजित हैं।

स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण में विश्व शांति के लिए दो महत्वपूर्ण आवश्यकताओं पर जोर दिया – भाईचारा और सार्वभौमिक स्वीकृति; और यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ये न केवल अफ्रीकी महाद्वीप बल्कि पूरी दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत है। यदि लोग इन मूल्यों को आत्मसात करना शुरू कर देते हैं जिनके लिए स्वामीजी खड़े थे, यदि केवल राष्ट्र करुणा और सहिष्णुता पर ध्यान केंद्रित करना शुरू करते हैं; क्या यह दुनिया सबके लिए एक बेहतर जगह नहीं बनेगी?

सह-लेखिका: डॉ. नेहा सिन्हा, असिस्टेंट प्रोफेसर-II एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, नोएडा

‘हम आंध्र प्रदेश में हैं या पाकिस्तान में’: जिन्ना टावर का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रखने की माँग पर हिरासत में लिए गए बीजेपी नेता और कार्यकर्ता

आंध्र प्रदेश के अमरावती में मंगलवार (24 मई, 2022) को गुंटूर में स्थित जिन्ना टावर का नाम बदलने के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव सुनील देवधर ने पार्टी के अन्य नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ मार्च निकाला। लेकिन, इस दौरान पुलिस ने बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव सुनील देवधर समेत कई नेताओं और पार्टी के कार्यकर्ताओं को हिरासत में ले लिया। ये सभी जिन्ना टावर का नाम बदलकर एपीजी अब्दुल कलाम रखने की माँग कर रहे थे।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी की युवा शाखा भाजयुमो की एक बैठक के बाद, भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जिन्ना टॉवर तक एक विरोध मार्च निकालने की कोशिश की। सुनील देवधर और बीजेपी के अन्य कार्यकर्ता जब जिन्ना टावर का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम टॉवर रखने की माँग को लेकर आगे बढ़े तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया और उन्हें हिरासत में ले लिया।

वहीं सुनील देवधर ने पुलिस पर बर्बरता का आरोप लगाया और कहा, “जिन्ना टावर का नाम बदलकर डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम रखने की माँग करने वाले देशभक्तों पर क्रूरता देखिए। निरंकुश वाईएस जगन के नेतृत्व वाली सरकार ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ में शामिल है। सरकार ने हमारी आवाज दबाने के लिए अपना असली रंग दिखाया है।”

वहीं बीजेपी के राज्यसभा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव ने ट्वीट कर बीजेपी नेताओं पर पुलिस कार्रवाई की निंदा की है। उन्होंने कहा है कि आश्चर्य है, “हम आंध्र प्रदेश में हैं या पाकिस्तान में हैं।”

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सोमू वीरराजू ने कहा, “न केवल उनकी पार्टी बल्कि लोगों ने भी जिन्ना टावर का नाम बदलने की माँग की है, जिन्ना का नाम हटाने और टावर का नाम अब्दुल कलाम के नाम पर रखने की माँग को व्यापक समर्थन मिल रहा है।” वीरराजू ने कहा, “राज्य सरकार हमारी माँग पर दमनकारी रुख नहीं अपना सकती है।”

गौरतलब है कि पिछले कई महीनों से, भाजपा और अन्य हिंदू संगठन पाकिस्तान के कायदे आजम रहे जिन्ना के नाम पर बने जिन्ना टॉवर का नाम बदलने की माँग कर रहे हैं, लेकिन वाईएस जगन मोहन रेड्डी सरकार इस माँग पर कोई ध्यान नहीं दे रही है। अपने उसी माँग के समर्थन में बजप्प नेता विरोध मार्च निकाल रहे थे।

जानकारी के लिए बता दें कि जिन्ना टॉवर आंध्र प्रदेश के गुंटूर शहर के महात्मा गांधी रोड पर स्थित एक ऐतिहासिक स्मारक है। इसे 1940 में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की यात्रा की याद में बनवाया गया था।

जो भोलेनाथ का नहीं… ईसाई-इस्लामी धर्मांतरण के खिलाफ सड़कों पर आदिवासी, धर्म परिवर्तन करने वालों को ST से बाहर करने की माँग

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड सहित देश के कई राज्यों में आदिवासी आंदोलनरत हैं। प्रदर्शन कर रहे हैं। रैलियाँ निकाल रहे हैं। सरकार को ज्ञापन सौंपे जा रहे हैं। नारे लग रहे हैं जो भोलेनाथ का नहीं, वह हमारा नहीं। इनकी माँग उन लोगों से एसटी दर्जा छीनने की है जो धर्म परिवर्तन कर ईसाई या मुस्लिम बन गए हैं।

इसी क्रम में मध्य प्रदेश के इंदौर, धार, सीहोर, खंडवा, श्योपुर, अशोकनगर, रतलाम-झाबुआ में रैली निकाली गई। वहीं छत्तीसगढ़ के कोंडागाँव और कोरबा में भी रैली निकालकर प्रदर्शन किया।

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जिन्होंने धर्म बदल लिया है वे आदिवासी आरक्षण का लाभ क्यों लेते हैं। धर्मांतरण करने वाले आदिवासी समुदाय के लोग या तो घर वापसी करें या फिर आदिवासियों के नाम पर सरकार से प्राप्त सुविधाएँ व आरक्षण का लाभ लेना बंद करें। इनकी माँग है कि धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासी समुदाय के लोगों को सरकारी नौकरियों और प्रवेश में आरक्षण लाभ से वंचित किया जाना चाहिए। इसके लिए उनकी डिलिस्टिंग किया जाए।

रतलाम-झबुआ से बीजेपी सांसद गुमान सिंह डामोर ने पिछले दिनों कहा था कि मध्य प्रदेश के 22 जिलों समेत सभी आदिवासी बहुल जिलों में डिलिस्टिंग रैलियों का आयोजन होगा। उनका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 342 में अनुसूचित जनजाति को आरक्षण देने के बारे में उल्लेख किया गया है। वहीं संविधान का अनुच्छेद 341 कहता है कि अगर इस जाति के लोग अन्य धर्म अपनाते हैं तो उन्हें आरक्षण से वंचित किया जाएगा।

ऐसे लोग जो धर्मांतरण कर ईसाई या मुस्लिम बन जाते हैं फिर भी अनुसूचित जनजाति वर्ग के आरक्षण का लाभ लेते हैं, उन्हें इस दायरे से बाहर करने की प्रक्रिया को डिलिस्टिंग कहते हैं। बताया जाता है कि इनकी वजह से अनुसूचित जनजाति वर्ग के हकदार 90% लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा है।

गौरतलब है कि डिलिस्टिंग को लेकर आंदोलन करीब 50 साल पहले कॉन्ग्रेस के ही डाक्टर कार्तिक उरांव ने शुरू किया था। इस आंदोलन के जरिए अपनी परंपराएँ छोड़ चुके लोगों को सूची से बाहर करने की आवाज उठाई जा रही। इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को 235 सांसदों के हस्ताक्षर सहित ज्ञापन देकर कानून बनाने के लिए संसद में भी प्रयास किया गया था। 1970 में भी 348 सांसदों ने ज्ञापन देकर जनजाति समाज के समर्थन में आवाज उठाई थी। बावजूद स्थिति आज भी जस की तस बनी हुई है।

मदरसे से पढ़ा, कबाड़ी से बन गया लश्कर के लिए बहाली करने वाला: फेसबुक पर फँसाता, फिर आतंकी बनाता था जुनैद

महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) ने मंगलवार (24 मई 2022) को पुणे के दापोडी इलाके से आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के लिए काम करने वाले शख्स को गिरफ्तार किया। उसकी पहचान जुनैद मोहम्मद के रूप में हुई है। जुनैद को पुणे की विशेष अदालत ने 3 जून तक एटीएस की हिरासत में भेज दिया है। जुनैद पर लश्कर के लिए आतंकवादियों की भर्ती करने का आरोप है। वह युवाओं का ब्रेनवॉश कर उन्हें दहशतगर्दी के रास्ते पर ले जाता था।

एटीएस ने जुनैद मोहम्मद समेत चार आरोपितों के खिलाफ आईपीसी और आईटी एक्ट की धाराओं 121 (ए), 153 (ए) और 116 के तहत प्राथमिकी दर्ज की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, जुनैद पर कश्मीर के आतंकी संगठन गजवाते-अल-हिंद से फंडिंग हासिल करने का भी आरोप है। महाराष्ट्र एटीएस द्वारा जारी एक प्रेस नोट में कहा गया है कि 30 दिसंबर, 2021 से खुफिया तरीके से जाँच चल रही थी। लेकिन इस मामले में 24 मई को प्राथमिकी दर्ज की गई। इसमें कहा गया है कि तीन अन्य आरोपित अभी भी फरार हैं।

एटीएस के मुताबिक, जुनैद जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के सदस्यों के संपर्क में था। आरोपित अलग-अलग राज्यों के युवकों को लश्कर में भर्ती करने की कोशिश कर रहा था। जाँच एजेंसी ने आरोप लगाया है कि वह आतंकवाद की ट्रेनिंग दिलाने के लिए युवकों को जम्मू-कश्मीर ले जाने की कोशिश कर रहा था।

जुनैद ने युवकों को लश्कर-ए-तैयबा से जोड़ने के लिए फेसबुक पर अलग-अलग नामों से 5 अकाउंट भी बनाए थे। इन अकाउंट से राष्ट्रविरोधी बातें पोस्ट करता था। युवाओं को देश के खिलाफ भड़काता और उन्हें लश्कर में शामिल होने के लिए उकसाता था। एटीएस ने कहा है, “जाँच में यह भी पता चला है कि इस काम के लिए आरोपित के बैंक अकाउंट में पैसे भी जमा किए गए थे।”

जाँच एजेंसी ने कहा कि जुनैद बेहद शातिर तरीके से अपने काम को अंजाम दे रहा था। उसने 10 बार अपने सिम कार्ड बदले थे। वह जिस सिम से अपने आकाओं से बात करता था, उसे तोड़ देता ​था और हर बार एक नया सिम कार्ड खरीदता था। उसने अलग-अलग कंपनियों के 10 सिम कार्ड इस्तेमाल किए थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, एटीएस आगे की जाँच के लिए जुनैद को कश्मीर ले जाएगी, जहाँ वह पिछले दो वर्षों में छह बार गया था। बता दें कि एटीएस की गिरफ्त में आया जुनैद 28 साल का है। वह बीते डेढ़ साल से पुणे में रह रहा था। जुनैद की पढ़ाई मदरसे में हुई है। आतंकी गतिविधियों में संलिप्त होने से पहले वह कबाड़ का धंधा करता था।

ज्ञानवापी के शिवलिंग को फव्वारा बनाने के लिए मुस्लिम पक्ष ने की तोड़फोड़, ड्रिल से किया छेद: हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन का खुलासा, बोले- कोर्ट में साबित कर देंगे सच

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के वजूखाने में मिले शिवलिंग को लेकर हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। सीएनएन-18 से बातचीत में उन्होंने बताया कि वजूखाने में मौजूद शिवलिंग को तोड़कर उसे फव्वारा बनाने का प्रयास हुआ है जिसका पता कुछ दिन पहले चला जब ये लोग फाउंटेन बनाने के लिए निर्मित ढाँचे को अपने साथ ले जा रहे थे।

विष्णु जैन ने शिवलिंग के नीचे बनाई गई आर्टिफिशियल दीवार को हटा कर जाँच की माँग की और एंकर से कहा,

“मैं आपको सच्चाई बता रहा हूँ। शिवलिंग इनके कब्जे में था वजू खाने में। ये लोग उसकी बेअदबी करते रहते थे। उसी में इन्होंने कुछ तोड़कर फव्वारे टाइप का ढाँचा बनाया। ये ढाँचा अब भी इनके स्टोर रूम में पड़ा हुआ है। अभी कुछ दिन पहले ये लोग उसे कहीं ले जा रहे थे तो सीआरपीएफ ने इन्हें रोक दिया… तो ये सब इन्होंने जो हमारे भगवान के साथ किया, हमारे देवता के साथ इन्होंने किया है, वो हमें पता है, उसकी लड़ाई हम लड़ रहे हैं, शिवलिंग हमको मिल गया है। अब उसकी पूजा आराधना करना उसका सम्मान करना हर हिंदू का फर्ज है।”

विष्णु जैन ने दावा किया कि अगर स्टोर रूम की वीडियो और फोटोग्राफी हो जाए तो ये साबित हो जाएगा कि कैसे शिवलिंग में ड्रिल घुसा कर उसे फाउंटेन बनाने का प्रयास हुआ। इससे ये भी साबित होगा कि कैसे शिवलिंग में 63 सेंटीमीटर छेद किया गया। शो में मौलाना से बातचीत के दौरान उन्होंने सवाल किया है कि आखिर दूसरा पक्ष बाहर कहता है कि वो हिंदुओं की इज्जत कर रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट में कहते हैं कि उन्हें वहीं वजू करना है जहाँ शिवलिंग है। ये कैसी इज्जत है हिंदुओं की।

बता दें कि हिंदू मंदिरों को उनकी पहचान दोबारा दिलाने के लिए कई केस लड़ने वाले विष्णु जैन ने कहा है कि उनकी लीगल टीम भारत के गौरवशाली इतिहास को पहचान दिलाने के लिए काम करेगी और जब तक ये नहीं होता, वह नहीं रुकेंगे। उन्होंने बार एंड बेंच से बातचीत में पूजा के अधिकार को मौलिक अधिकार बताते हुए कहा कि सर्वेक्षण के बाद परिसर में शिवलिंग मिला है। इस्लामी कानून के तहत ये जगह कभी मस्जिद नहीं हो सकती। वह अनुच्छेद 25 का हवाला देकर कहते हैं कि उन्हें वहाँ पर पूजा का अधिकार है। उन्होंने बताया कि मस्जिद में अगर मंदिर है या मंदिर को तोड़कर परिवर्तित करके मस्जिद बनाया गया है तो वो कभी मस्जिद नहीं गिना जाएगा।

खास लोगों को हर महीने ₹10 लाख भेजता था दाऊद इब्राहिम, नवाब मलिक ने माना- NCP कार्यकर्ता था हसीना पारकर का बॉडीगार्ड: रिपोर्ट

महाराष्ट्र के मंत्री और एनसीपी नेता नवाब मलिक (Nawab Malik) तथा भगोड़े आतंकी दाऊद इब्राहिम (Dawood Ibrahim) के डी गैंग के बीच लिंक की पड़ताल कर रही प्रवर्तन निदेशालय (ED) को कई अहम जानकारी हाथ लगी है। बताया जा रहा है कि दाऊद हर महीने अपने खास लोगों को 10-10 लाख रुपए भेजता था। दाऊद की बहन हसीना पारकर का बॉडीगार्ड सलीम पटेल एनसीपी से जुड़ा हुआ था। यह बात भी सामने आई है कि जाँच एजेंसी ने मलिक के बेटों और पत्नी को भी समन भेजा था, लेकिन वह पूछताछ के लिए पेश नहीं हुए।

रिपोर्ट के अनुसार खालिद उस्मान शेख ने ईडी को बताया है कि दाऊद हर महीने इकबाल कासकर, पने भाई-बहनों, रिश्तेदारों और कुछ खास लोगों को 10-10 लाख रुपए भेज रहा था। कासकर को भी ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार किया था। वहीं खालिद उस्मान कासकर के एक बचपन के दोस्त का छोटा भाई है।

यह बात भी सामने आई है कि नवाब मलिक ने ईडी पूछताछ में सलीम पटेल को 2022 से जानने की बात कबूली है। उन्होंने बताया है कि पटेल एनसीपी का कार्यकर्ता था और पार्टी की मुंबई ईकाई के अध्यक्ष रहे चंद्रकांत त्रिपाठी के नेतृत्व में काम करता था। ईडी का दावा है कि नवाब मलिक ने डी-कंपनी के सदस्यों के साथ मिलकर गोवावाला कॉम्प्लेक्स हड़पने के लिए आपराधिक साजिश रची। इस संबंध में ED की चार्जशीट पर स्पेशल कोर्ट ने 20 मई 2022 को संज्ञान लिया था। कोर्ट ने कहा था कि इस बात के सबूत हैं कि मलिक सीधे तौर पर और जानबूझकर कुर्ला स्थित गोवावाला कंपाउंड पर कब्जा करने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग और आपराधिक साजिश में शामिल थे।

ईडी ने चार्जशीट में यह भी बताया है कि नवाब मलिक के बेटे और पत्नी समन भेजने के बावजूद पूछताछ के लिए नहीं आए। एजेंसी के अनुसार मनी लॉन्ड्रिंग मामले में मलिक की पत्नी को दो बार और बेटे फराज मलिक को 5 बार समन भेजा गया था।

मनी लॉन्ड्रिंग मामले ईडी महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और नेशनलिस्ट कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के नेता नवाब मलिक की गैंगस्टर दाउद इब्राहिम के साथ लिंक की जाँच कर रही है। पिछले दिनों अदालत ने नवाब मलिक के डी गैंग के साथ लिंक की बात मानी थी। अब नवाब मलिक के दोनों बेटे और पत्नी ईडी के समक्ष पेश होने में आना-कानी कर रहे हैं।

‘अंबेडकर’ पर जला आंध्र प्रदेश का अमलापुरम, मंत्री-विधायक के घर फूँके: पुलिस पर पथराव, MLA ने बताया- वे बोतलों में पेट्रोल लेकर आए थे

आंध्र प्रदेश के कोनासीमा जिले का नाम बदलने के विरोध में मंगलवार (24 मई 2022) को अमलापुरम में हिंसक प्रदर्शन हुआ। उग्र भीड़ ने राज्य के परिवहन मंत्री पी विश्वरूपा और मुम्मिडीवरम के विधायक पी सतीश के घर को आग के हवाले कर दिया। पुलिस पर पथराव किया गया। वाहनों को आग लगा दी गई। रिपोर्टों के अनुसार उग्र भीड़ जिले का नाम बीआर अंबेडकर कोनासीमा करने का विरोध कर रही थी।

राज्य की सत्ताधारी पार्टी वाईएसआर कॉन्ग्रेस ने इस हिंसा के लिए असामाजिक तत्वों को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं विपक्षी दलों ने जगनमोहन रेड्डी सरकार पर स्थिति को नियंत्रित करने में नाकाम रहने के आरोप लगाया है। राज्य के प्रमुख विपक्षी दलों तेलुगु देशम पार्टी, भाजपा, जन सेना और कॉन्ग्रेस ने अमलापुरम में स्थिति को काबू करने में नाकाम रही सरकार पर निशाना साधा है। तेलुगु देशम के प्रमुख एन चंद्रबाबू नायडू ने एक बयान में कहा, ‘‘कोनासीमा में आगजनी दुर्भाग्यपूर्ण है जिसे शांति के लिए जाना जाता है। गृह मंत्री ने एक नाजुक मुद्दे पर निराधार आरोप लगाए। यह पूरी तरह से सरकार और पुलिस की विफलता है।’’

वहीं, राज्य की गृह मंत्री टी वनिता ने कहा कि भीड़ द्वारा किए गए पथराव में करीब 20 पुलिसकर्मी घायल हो गए। प्रदर्शनकारियों ने एक स्कूल बस को आग के हवाले कर दिया। इसको देखते हुए अमलापुरम में धारा 144 लगा दी गई है। स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए अतिरिक्त पुलिस बल भेजे गए हैं। एलुरु रेंज के पुलिस उप महानिरीक्षक जी पाला राजू ने कहा है कि पुलिस अमलापुरम में स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। उन्होंने बताया कि घायल पुलिसकर्मी खतरे से बाहर हैं।

अमलापुरम में 24 मई को हुई आगजनी के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हैं। विधायक पी सतीश ने बताया, ‘‘यह बहुत ही भयावह था। 1000 से 1500 लोगों की भीड़ ने आकर हमारे घर को जला दिया। वे बोतलों में पेट्रोल लेकर आए हुए थे। यह स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि उन्होंने यह सब जानबूझकर किया।”

गौरतलब है कि जगन सरकार ने 2019 विधानसभा चुनावों के दौरान नए जिलों का वादा किया था। बीते अप्रैल सरकार ने 13 नए जिलों के गठन की घोषणा की थी, जिसके बाद राज्य में जिलों की संख्या बढ़कर 26 हो गई है। इसी घोषणा के तहत पूर्वी गोदावरी जिले से अलग कोनासीमा का गठन किया था। बीते दिनों इसका नाम बदलकर बीआर अंबेडकर कोनासीमा कर दिया गया। इसको लेकर स्थानीय लोग आपत्ति जता रहे हैं। उनका कहना है कि जिले का नाम नहीं बदला जाना चाहिए।