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‘कृष्ण भक्त बलात्कारी, अकबर से थे महाराणा प्रताप की पत्नी के संबंध’: हिंदू घृणा से सने प्रोफेसर को हाई कोर्ट ने नहीं दी राहत, काशी विश्वनाथ पर भी की थी अनर्गल बात

लखनऊ यूनिवर्सिटी के हिंदूफोबिक प्रोफेसर रविकांत चंदन को राहत देने से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इनकार कर दिया है। अदालत ने उसके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की अपील ठुकरा दी है। हालाँकि उसकी गिरफ्तारी से पहले सभी कानूनी औपचारिकताओं का पालन करने का निर्देश पुलिस को दिया गया है। हाई कोर्ट का यह आदेश शुक्रवार (20 मई 2022) को आया। रविकांत चंदन ने काशी विश्वनाथ और हिन्दू साधु-संतों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।

रविकांत चंदन के खिलाफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने लखनऊ के हसनगंज थाने में FIR दर्ज करवाई थी। FIR में हिन्दू भावनाओं को ठेस पहुँचाने का आरोप लगाया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एसोसिएट प्रोफेसर रविकांत चंदन इसी FIR को निरस्त करवाने की माँग के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट गया था। उसकी याचिका पर जस्टिस अरविन्द कुमार मिश्रा और जस्टिस मनीष माथुर की बेंच ने सुनवाई की।

हाई कोर्ट में प्रोफेसर रविकांत चंदन ने कहा, “मेरे ऊपर दर्ज धाराओं में अधिकतम 7 वर्ष की सजा है। लेकिन इसके बाद भी पुलिस लगातार मेरी गिरफ्तारी के प्रयास कर रही है। यह CRPC के सेक्शन 41(1)(b) और 41(A) का उल्लंघन है।” नियमानुसार ऐसे मामलों में गिरफ्तारी से पहले पुलिस आरोपित को नोटिस देती है। हाई कोर्ट ने पुलिस को इसका पालन करने को कहा। हाई कोर्ट ने प्रोफेसर द्वारा FIR को निरस्त करने की माँग ठुकराते हुए कहा कि अदालत के पास इसे निरस्त करने की कोई वजह नहीं है।

लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने प्रोफेसर रविकांत चंदन की टिप्पणी पर नाराजगी जताई है। छात्रों ने उसे बर्खास्त करने की माँग के साथ कुलपति कार्यालय पर धरना दिया। छात्रों ने आरोपित प्रोफेसर को कुंठित मानसिकता का बताते हुए जातिवादी करार दिया। एक छात्रनेता पर आरोपित प्रोफेसर की पिटाई का भी आरोप लगा था।

लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र अंकित तिवारी द्वारा ट्विटर पर 19 मई 2022 को कुलपति को दी गई शिकायत की कॉपी शेयर की गई है। इस शिकायत में प्रोफेसर रविकांत चंदन के बयानों के कुछ अंश बताए गए हैं। इस शिकायत के मुताबिक प्रोफेसर रविकांत ने कहा, “महाराणा प्रताप की पत्नी के अकबर से नाजायज संबंध थे। वे रात में सोने के लिए अकबर के पास जाया करती थीं। कृष्ण के अनुयायी बलात्कारी हैं। सीता रावण के घर अपनी मर्जी से रुकी थीं।” प्रोफेसर पर सोशल मीडिया के माध्यम से अराजक तत्वों को यूनिवर्सिटी कैम्पस में बुलाने का भी आरोप है।

काशी-मथुरा हिंदू देवताओं की जमीन: जानिए कैसे कानूनी तौर पर भी है हिंदुओं का अधिकार, क्यों वर्शिप एक्ट नहीं बन सकता इस्लामी बर्बरता की ढाल

वाराणसी के विवादित ज्ञानवापी ढाँचा (Gyanvapi Controversial Structure, Varanasi) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित पूजास्थल कानून-1991 पर शुक्रवार (20 मई 2022) को टिप्पणी की। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी स्थान के धार्मिक चरित्र के निर्धारण को पूजास्थल अधिनियम-1991 (Places of Worship Act 1991) प्रतिबंधित नहीं कर सकता।

वहीं, शाही ईदगाह ढाँचे और श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर (Shahi Idgah Mosque – Shri Krishna Janmbhoomi Temple) मामले में हिंदू पक्ष की याचिका को स्वीकार करते हुए मथुरा की कोर्ट ने भी कहा कि इसकी सुनवाई में पूजास्थल अधिनियम-1991 बाधा नहीं है।

हालाँकि, दोनों ही मामलों में कोर्ट स्वीकार किया है कि यह कानून सुनवाई में बाधा नहीं बन सकता, लेकिन तकनीकी तौर यह अधिनियम भारतीय कानून का हिस्सा है और विभिन्न परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट अपने विवेक के आधार पर इसका प्रयोग कर सकता है। ऐसे में यह कानून रहने के बावजूद उपरोक्त दोनों मामलों में हिंदुओं का पक्ष कितना मजबूत है, इस पर चर्चा करेंगे।

हम पहले ही बता चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने पूजास्थल अधिनियम-1991 को असंवैधानिक बताया और कहा कि ऐसा कानून बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है ही नहीं। उन्होंने कहा कि अवैध काम को वैध ठहराने के लिए सरकार कानून नहीं बना सकती। इस कानून द्वारा हिंदुओं, बौद्धों, जैनों और सिखों को उनके धार्मिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया है। इसके साथ ही उन्होंने इस कानून पर न्यायपालिका पर चोट बताया है।

भाजपा तो इस कानून का शुरू से विरोध करती रही है। कॉन्ग्रेस की सरकार द्वारा इस बिल को पेश करने के दौरान ही बहस में तत्कालीन भाजपा सांसद उमा भारती (Uma Bharti) ने इसे महाभारत के ‘द्रौपदी का चीरहरण’ कहा था। भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Adawani) ने कहा था कि इस कानून से जिन स्थानों पर तनाव नहीं है, वहाँ भी दोनों समुदायों में तनाव बढ़ेगा।

साबित करना होगा कि ज्ञानवापी और ईदगाह इस्लामिक लॉ के तहत मस्जिद है

ऑपइंडिया से बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय मथुरा, काशी, भद्रकाली, भोजशाला जैसे विवादों में कानूनन हिंदुओं के पक्ष को मजबूत बताया और कहा कि इसके प्रमाण इन जगहों पर उपलब्ध हैं। ये प्रमाण हिंदुओं के पक्ष को मजबूत करते हैं।

एडवोकेट उपाध्याय ने बताया, “ये सब स्थान मस्जिद नहीं हैं। इन्हें मस्जिद साबित करने के लिए सबसे पहले इस्लामिक लॉ से इन्हें प्रूव करना पड़ेगा। ये मंदिर हैं या नहीं है, इसे हिंदू लॉ से प्रूव करना है। कोई भी स्थान ऐसा नहीं हो सकता कि वह मंदिर भी हो और मस्जिद भी। वह या तो मंदिर होगा या मस्जिद। अगर यह मस्जिद है तो आपको (मुस्लिम पक्ष को) कुछ बातें साबित करनी पड़ेंगी।”

इस्लामिक कानून के तहत मस्जिद बनाने के लिए आवश्यक शर्त की बात करते हुए उन्होंने कहा, “मस्जिद बनाने के लिए सबसे पहले यह साबित करना होगा कि ये यह जमीन मेरी है या हमने इसे किसी से खरीदा या फिर किसी ने अपनी इच्छा (बिना डर-भय, लालच के) से इसे दान किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात साबित करना होगा कि वहाँ पहले कोई स्ट्रक्चर नहीं था। इस्लामिक लॉ में मस्जिद के लिए यह पहली कंडीशन होती है। धार्मिक स्ट्रक्चर तो होना ही नहीं चाहिए।”

इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने आगे बताया, “अगर मकान, दलान, दुकान आदि कोई घरेलू ढाँचा है और वहाँ मस्जिद बनाना चाहते हैं…. मान लीजिए हमारे पास एक दुकान है और हम उसे अब नहीं चलाना चाहते और वहाँ एक मस्जिद बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले उस दुकान की एक-एक ईंट उखाड़नी पड़ेगी। इस्लामिक लॉ कहता है कि नींव में पहले के ढाँचे का एक ईंट भी नहीं होनी चाहिए। पहली ईंट जो लगनी चाहिए, वो मस्जिद के नाम की लगनी चाहिए।”

हिंदू कानून और इस्लामिक कानून के बीच फर्क का जिक्र करते हुए एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि मंदिरों में पहले मंदिर बन जाता है फिर नामकरण होता है, जबकि मस्जिदों में पहले नामकरण होता है फिर मस्जिद बनती है। इस्लामिक लॉ के तहत मस्जिद का जो नाम रख दिया जाता है, उसी के नाम की पहली ईंट मस्जिद निर्माण की नींव में रखी जाती है।

औरंगजेब और इतिहास को झूठा साबित करना होगा

अश्विनी उपाध्याय ने ज्ञानवापी मामले को लेकर ऑपइंडिया से कहा, “आप (मुस्लिम) कहते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद है तो आपको सबसे पहले औरंगजेब को झूठा साबित करना पड़ेगा। जो उसके इतिहासकार हैं, उनको झूठा साबित करना पड़ेगा। उसके ये भी साबित करना पड़ेगा कि फलाने आदमी ने जमीन दान किया या उससे खरीदा। यह भी साबित करना पड़ेगा कि फलाने बादशाह ने इस मस्जिद की पहली ईंट रखी थी यहाँ पर।”

ज्ञानवापी मामले में हिंदू पक्ष ने 20 मई को सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि इतिहासकार इस बात की पुष्टि करते हैं कि इस्लामी शासक औरंगजेब ने 9 अप्रैल 1669 को एक आदेश जारी किया था, जिसमें उसके प्रशासन को वाराणसी में स्थित भगवान आदि विश्वेश्वर के मंदिर को ध्वस्त करने का निर्देश दिया गया था। आदि विश्वेश्वर के मंदिर पर 1193 ईस्वी से 1669 ईस्वी तक हमला किया गया, लूटा गया और ध्वस्त किया गया।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि औरंगजेब ने अपने फरमान में और मुगल इतिहासकारों के रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि औरंगजेब या उसके बाद के शासकों ने विवादित भूमि पर वक्फ बनाने या किसी मुस्लिम या मुस्लिम निकाय को जमीन सौंपने का आदेश दिया था। हिंदू पक्ष की ओर कोर्ट में शामिल अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने याचिका में अदालत को बताया कि फरमान की कॉपी कोलकाता के एशियाटिक लाइब्रेरी रखे होनी की जानकारी मिली है।

हिंदू देवता की एक बार जमीन, हमेशा के लिए उनकी जमीन

अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “हिंदू लॉ कहता है कि एक बार वहाँ भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा कर दिया, उसके बाद उसकी दीवार तोड़ दीजिए, गुंबद उड़ा दीजिए, नमाज पढ़िए चाहे उसकी नींव की एक-एक ईंट उखाड़ दीजिए वह मंदिर ही रहेगा। एक बार मंदिर हो गया तो वह किसी भी रूप में हमेशा मंदिर ही रहेगा। जब तक वहाँ से मूर्ति का विसर्जन नहीं होगा, तब तक वह मंदिर ही कहलाएगा।”

हिंदू पक्ष ने कहा कि मस्जिद सिर्फ वक्फ या मुस्लिम की जमीन पर बनाई जा सकती है। इस मामले में मंदिर की भूमि और संपत्ति अनादि काल से देवता की है। इसके साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि किसी मुस्लिम शासक या किसी मुस्लिम के आदेश के तहत मंदिर की भूमि पर किए गए निर्माण को मस्जिद नहीं माना जा सकता है।

ज्ञानवापी विवादित परिसर में अभी भी भगवान की पूजा होती है और श्रद्धालुओं द्वारा पंचकोशी परिक्रमा की जाती है। हिंदू कानून भी कहता है कि देवता की भूमि हमेशा देवता के नाम पर रहती है। विदेशी शासन आने के बाद भी देवता का अधिकार खत्म नहीं होता।

अगर विवादित स्थानों पर वर्तमान कानून, इस्लामिक कानून, हिंदू कानून और संविधान के अनुच्छेदों में प्रदत्त अधिकारों के उल्लंघन पर गौर करें तो स्पष्ट है कि इन मामलों में हिंदुओं का पक्ष मजबूत है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जिन-जिन स्थानों को विवादित माना जा रहा है, वहाँ हिंदू देवताओं एवं प्रतीकों के निशान आज भी मौजूद हैं।

डीयू के प्रोफेसर रतनलाल को मिली जमानत, ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में मिले शिवलिंग को लेकर किया था ‘खतना’ वाला पोस्ट

दिल्ली यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर रतनलाल (Ratanlal) को ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के सर्वे में मिले शिवलिंग को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में तीस हजारी कोर्ट ने शनिवार (21 मई 2022) को जमानत दे दी। इस मामले में पुलिस ने रतनलाल को शुक्रवार (20 मई 2022) की रात को गिरफ्तार किया था। टिप्पणी के बाद से उसकी गिरफ्तारी की माँग लगातार उठ रही थी।

दिल्ली पुलिस ने जैसे ही उसे गिरफ्तार किया वामपंथी और लिबरल गैंग एक्टिव हो गया। SFI (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया) और AISA (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) ने प्रदर्शन करते हुए सड़क जाम कर दी थी।

दिल्ली पुलिस के DCP (उत्तरी) सागर सिंह कलसी ने उसकी गिरफ्तारी की पुष्टि की। उन्होंने कहा, “रतनलाल को फेसबुक पर धार्मिक भावनाओं के अपमान के आरोप में FIR संख्या 50/22 के तहत गिरफ्तार किया गया है।” गिरफ्तारी के बाद से रतनलाल ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है। अधिकतर लोग उनकी गिरफ्तारी को जायज और जरूरी बता रहे हैं। वहीं कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं।

रतनलाल की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए उसके वकील महमूद प्राचा ने कहा, “प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज केस झूठा है। FIR में कोई भी शिकायत ऐसी नहीं है जो संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आती हो। पुलिस के पास अधिकार ही नहीं है कि वो इस केस में लगी धाराओं में गिरफ्तारी कर सके, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट की अवमानना है। साथ ही ये अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3 का भी उल्लंघन है। प्रोफेसर बेगुनाह साबित होंगे।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोपित प्रोफेसर की गिरफ्तारी दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने की है। पुलिस को उसकी लोकेशन मौरिस नगर में मिली थी। उसकी गिरफ्तारी टेक्निकल सबूतों के आधार पर की गई है। रतनलाल DU में इतिहास का प्रोफेसर है। दिल्ली पुलिस को उसके खिलाफ मंगलवार (17 मई 2022) को धार्मिक भावनाएँ आहात करने की शिकायत मिली थी। यह शिकायत वकील विनीत जिंदल द्वारा दर्ज करवाई गई थी।

रतनलाल ने फेसबुक पर लिखा था, “यदि यह शिवलिंग है तो लगता है शायद शिव जी का भी खतना कर दिया गया था।” साथ ही पोस्ट में चिढ़ाने वाला इमोजी भी लगाई थी। इस पोस्ट पर उठे विरोध के बाद भी रतनलाल ने माफ़ी माँगने से इनकार कर दिया था। उसने अपनी बात कोर्ट में रखने का एलान किया था। आरोपित प्रोफेसर पर 153-A, 295-A IPC के तहत केस दर्ज हुआ था। केस दर्ज होने के बाद भी रतनलाल ने सोशल मीडिया के माध्यम से बयानबाजी जारी रखी थी।

गौरतलब है कि वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे विवादित ज्ञानवापी ढाँचे में न्यायालय के आदेश के बाद सर्वे के दौरान वजूखाना में स्थित एक शिवलिंग का पता चला था। पता चलने के बाद सिविल जज वाराणसी (सीनियर डिवीजन) रवि कुमार दिवाकर ने 16 मई,2022 को ही विवादित ज्ञानवापी स्ट्रक्चर को सील करने का आदेश दे दिया था।

लालू के ठिकानों CBI की रेड, अधिकारियों से धक्कामुक्की: नौकरी के बदले रिश्वत में लीं 1 लाख वर्गफूट+ जमीनें, लालू-राबड़ी, दो बेटियों सहित 15 लोगों पर FIR

रेलवे भर्ती घोटाले (Railway Recruitment Scam) में FIR दर्ज करने के बाद CBI ने शुक्रवार (20 मई 2022) को राजद (RJD) प्रमुख लालू यादव (Lalu Yadav), उनके परिवार और करीबी लोगों के 17 ठिकानों पर छापेमारी की और घोटाले से संबंधित दस्तावेज खंगाले। इस मामले लालू यादव रेलमंत्री रहने के दौरान नौकरी देने के बदले अलग-अलग लोगों से कुल 1,05,292 वर्गफीट जमीन उपहार के रूप में रिश्वत ली थी।

इस मामले में सीबीआई ने बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी (Rabri Devi), उनकी बेटी मीसा भारती (Misa Bharti), हेमा यादव (Hema Yadav), बेटे तेज प्रताप यादव (Tej Pratap Yadav) सहित कई लोगों से पूछताछ की। इस दौरान राजद कार्यकर्ताओं ने पटना में जमकर हंगामा किया। उन्होंने सीबीआई अधिकारियों के साथ धक्का-मुक्की और महिला अधिकारी को घेरकर उनके साथ बदतमीजी की। महिला अधिकारियों को किसी तरह पुलिस ने भीड़ के चंगुल से बचाया।

रेलवे भर्ती बोर्ड में बिना नोटिफिकेशन निकाले जमीन को लेकर नौकरी देने के मामले में CBI ने लालू यादव के खिलाफ शुक्रवार (20 मई 2022) को ही FIR दर्ज की है। सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, उनकी बेटी मीसा भारती और हेमा यादव सहित 15 लोगों पर केस दर्ज किया है।

प्राथमिकी दर्ज करने के बाद अधिकारियों ने दिल्ली और पटना के 16 ठिकानों पर छापेमारी की। पटना में अधिकारियों ने राबड़ी देवी और तेज प्रताप यादव से अलग-अलग कमरों में पूछताछ की। पूछताछ के लिए 3-3 अफसरों की दो टीमें बनाई गई। दिल्ली में मीसा भारती के आवास पर लालू यादव से CBI के एसपी और डीएसपी स्तर के अफसरों ने पूछताछ की।

चारा घोटाले में जेल की सजा काट कर जमानत पर लौटे लालू यादव सीबीआई को देखकर उनसे डॉक्टर बुलाने की माँग की और कहा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। इसके अलावा, पूछताछ के दौरान राबड़ी देवी ने अपने दो वकीलों को भी बुला लिया। राबड़ी देवी से पूछताछ के लिए महिला IPS अफसर भी मौजूद रहीं।

वहीं, गोपालगंज में लालू यादव के करीबी और स्वरेजी हाईस्कूल के शिक्षक देवेंद्र यादव के घर भी सीबीआई की करीब चार घंटे तक छापेमारी चली। इस दौरान अधिकारी आवश्यक कागजात के साथ देवेंद्र यादव को भी अपने साथ ले गए। उनका घर उचकागाँव थाना के इटावा गाँव में है।

क्या है मामला

दरअसल, रेलमंत्री रहने के दौरान लालू यादव ने साल 2004-2009 के दौरान रेलवे के समूह ‘डी’ में नौकरी देने के बदले अपने परिवार और करीबी लोगों के नाम पर जमीनें ली थीं। ये सारी जमीनें पटना में स्थित हैं। ये जमीन लालू यादव के परिवार द्वारा संचालित कंपनी के नाम पर उपहार के तौर पर लिया गया था।

दरअसल, रेलवे में इन नियुक्तियों के लिए कोई विज्ञापन या सार्वजनिक नोटिस नहीं निकाला गया था। इसके बावजूद पटना के जिन लोगों से जमीनें ली गईं उन्हें जबलपुर, कोलकाता, जयपुर और हाजीपुर में नियुक्ति दे दी गई।

इस मामले में सीबीआई ने लालू यादव के अलावा उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटी मीसा भारती, बेटी हेमा यादव, राज कुमार सिंह, मिथिलेश कुन्नार, अजय कुन्नारी, संजय राय, धर्मेंद्र राय, विकास कुमार, पिंटू कुमार, दिलचंद कुमार, प्रेमचंद कुमार, लालचंद कुमार, हृदयानंद चौधरी और अभिषेक कुमार पर एफआईआर दर्ज की है।

‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’: प्राचीन संस्कृत कॉलेज, सरस्वती मंदिर और जैन मंदिरों के खंडहर पर खड़ी है अजमेर की सबसे पुरानी मस्जिद

भारतीय सभ्यता की समृद्ध संस्कृति को इस्लामी आक्रांताओं ने सदियों तक नष्ट किया। मुगलों के हाथों हुए अत्याचारों के सबसे पुराने उदाहरणों में से एक है ‘अढाई दिन का झोपड़ा’ मस्जिद। जो कि राजस्थान के अजमेर शहर में स्थित है।

सैकड़ों पर्यटक यहाँ भ्रमण करने के लिए आते हैं, लेकिन इसके बावजूद मुस्लिम इस स्ट्रक्टचर का इस्तेमाल नमाज पढ़ने के लिए करते हैं। यह जानने के लिए कि यह इस्लामी अत्याचारों का स्पष्ट प्रमाण कैसे है, इसके इतिहास को जानना जरूरी है।

अढ़ाई दिन का झोपड़ा का इतिहास

आज आप जिसे ‘अढाई दिन का झोपड़ा‘ मानते हैं, वो मूल रूप से विशालकाय संस्कृत महाविद्यालय (सरस्वती कंठभरन महाविद्यालय) हुआ करता था, जहाँ संस्कृत में ही विषय पढ़ाए जाते थे। यह ज्ञान और बुद्धि की हिंदू देवी माता सरस्वती को समर्पित मंदिर था। इस भवन को महाराजा विग्रहराज चतुर्थ ने अधिकृत किया था। वह शाकंभरी चाहमना या चौहान वंश के राजा थे।

कई दस्तावेजों के अनुसार, मूल इमारत चौकोर आकार की थी। इसके हर कोने पर एक मीनार थी। भवन के पश्चिम दिशा में माता सरस्वती का मंदिर था। 19वीं शताब्दी में, उस स्थान पर एक शिलालेख (स्टोन स्लैब) मिली थी जो 1153 ई. पूर्व की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि शिलालेख के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मूल भवन का निर्माण 1153 के आसपास हुआ था।

हालाँकि, कुछ स्थानीय जैन किंवदंतियों का कहना है कि इमारत सेठ वीरमदेव कला द्वारा 660 ई में अधिकृत किया गया था। यह एक जैन तीर्थ के रूप में बनाया गया था और पंच कल्याणक माना जाता था। उल्लेखनीय है कि इस स्थल में उस समय की जैन और हिंदू दोनों स्थापत्य कला के तत्व मौजूद हैं।

एक मस्जिद के रूप में परिवर्तित करना

कहानी के अनुसार, 1192 ई. में, मुहम्मद गोरी ने महाराजा पृथ्वीराज चौहान को हराकर अजमेर पर अधिकार कर लिया। उसने अपने गुलाम सेनापति कुतुब-उद-दीन-ऐबक को शहर में मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया। ऐसा कहा जाता है कि उसने ऐबक को 60 घंटे के भीतर मंदिर स्थल पर मस्जिद के एक नमाज सेक्शन का निर्माण करने का आदेश दिया था ताकि वह नमाज अदा कर सके। चूँकि, इसका निर्माण ढाई दिन में हुआ था, इसीलिए इसे ‘अढाई दिन का झोपड़ा’ नाम दिया गया। हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक किंवदंती है। मस्जिद के निर्माण को पूरा करने में कई साल लग गए। उनके अनुसार, इसका नाम ढाई दिन के मेले से पड़ा है, जो हर साल मस्जिद में लगता है।

मस्जिद के केंद्रीय मीनार में एक शिलालेख है जिसमें इसके पूरा होने की तारीख जुमादा II 595 AH के रूप में उल्लेखित है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तारीख अप्रैल 1199 ई है। बाद में, कुतुब-उद-दीन-ऐबक के उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने 1213 ई में मस्जिद को सुशोभित किया। उन्होंने मस्जिद में एक स्क्रीन वॉल जोड़ा। उत्तरी मीनार पर उसके नाम का तो वहीं दक्षिणी मीनार पर कंस्ट्रक्शन सुपरवाइजर अहमद इब्न मुहम्मद अल-अरिद के नाम का एक शिलालेख है।

फिलहाल, यह बताना आसान नहीं है कि मस्जिद का कौन सा हिस्सा मूल रूप से सरस्वती मंदिर और संस्कृत स्कूल था क्योंकि मस्जिद के निर्माण में लगभग 25-30 हिंदू एवं जैन मंदिरों के खंडहरों का इस्तेमाल किया गया था।

मस्जिद पर सीता राम गोयल की रिपोर्ट

प्रसिद्ध इतिहासकार सीता राम गोयल ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेंपल: व्हाट हैपन्ड टू देम’ (‘Hindu Temples: What Happened To Them’) में मस्जिद का उल्लेख किया है। उन्होंने लेखक सैयद अहमद खान की पुस्तक ‘असर-उस-सनदीद’ का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया था कि अजमेर की मस्जिद, यानी अढाई दिन का झोपड़ा, हिंदू मंदिरों की सामग्री का उपयोग करके बनाया गया था।

मस्जिद पर अलेक्जेंडर कनिंघम की रिपोर्ट

अलेक्जेंडर कनिंघम को 1871 में ASI के महानिदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने ‘चार रिपोर्ट्स मेड ड्यूरिंग द इयर्स, 1862-63-64-65’ में मस्जिद का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। कनिंघम ने उल्लेख किया कि स्थल का निरीक्षण करने पर, उन्होंने पाया कि यह कई हिंदू मंदिरों के खंडहरों से बनाया गया था। उन्होंने कहा, “इसका नाम ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ इसके निर्माण की आश्चर्यजनक गति को दिखाता है और यह केवल हिंदू मंदिरों के तैयार मुफ्त सामग्री के इस्तेमाल से ही संभव था।”

कनिंघम ने आगे रिपोर्ट में मस्जिद का दौरा करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य के लेफ्टिनेंट-कर्नल जेम्स टॉड का हवाला दिया। टॉड ने कहा था कि पूरी इमारत मूल रूप से एक जैन मंदिर हो सकती है। हालाँकि, उन्होंने उन पर चार-हाथ वाले कई स्तंभ भी पाए जो स्वभाविक रूप से जैन के नहीं हो सकते थे। उन मूर्तियों के अलावा, देवी काली की एक आकृति थी।

उन्होंने आगे कहा, “कुल मिलाकर, 344 स्तंभ थे, लेकिन इनमें से दो ही मूल स्तंभ थे। हिंदू स्तंभों की वास्तविक संख्या 700 से कम नहीं हो सकती थी, जो 20 से 30 मंदिरों के खंडहर के बराबर है।

हिंदू मूर्तियों का ‘संरक्षण’

रिपोर्टों के अनुसार, 1990 के दशक तक, मस्जिद के अंदर कई प्राचीन हिंदू मूर्तियाँ बिखरी हुई थीं। 90 के दशक में, एएसआई ने उन्हें संरक्षित करने के लिए एक सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया। मूर्तियों को कैसे संरक्षित किया गया, इसके बारे में हाल ही में एक ट्विटर यूजर ने बताया। उन्होंने हाल ही में इस जगह का दौरा किया था।

एक ट्वीट थ्रेड में, ट्विटर यूजर धार्मिक स्टांस ने परिसर के अंदर एक बंद कमरे की कुछ तस्वीरें क्लिक कीं। उन्होंने कहा, “ASI ने परिसर में कुछ कमरों को सील कर दिया है। उनके दरवाजों के दरारों में से मुझे जो कुछ दिखा, उसे आप भी जूम करके देखें।” ट्विटर यूजर द्वारा दिए गए फोटो और वीडियो उन कमरों के अंदर बंद प्राचीन मूर्तियों की दयनीय स्थिति को दिखाता है।

वीडियो और तस्वीरें मार्च 2022 में क्लिक की गईं हैं। तस्वीरों को जूम करने पर, हिंदू संस्कृति की मूर्तियाँ स्पष्ट रूप से देखी जा सकती हैं। कमरे के पत्थरों में से एक को ASI द्वारा AJR5 AJP/92/99 के रूप में चिह्नित देखा जा सकता है।

अन्य नेटिजन्स द्वारा उल्लेख

2015 में, लोकप्रिय हैंडल ‘रिक्लेम टेंपल’ ने मस्जिद के बारे में पोस्ट किया और लिखा, “अढाई दिन का झोपड़ा, अजमेर का एक शानदार जैन मंदिर था, जब तक कि इस्लामिक आक्रमणकारी गोरी ने इसे मस्जिद में परिवर्तित नहीं किया।”

एक अन्य ट्विटर यूजर neutr0nium ने मस्जिद पर एक थ्रेड डाला। उन्होंने उल्लेख किया कि 18 वीं शताब्दी में मराठा राजा दौलत राव सिंधिया द्वारा एक मस्जिद में परिवर्तित होने और पुनर्निर्मित होने के बाद इसे लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया था। हालाँकि, यह एक मस्जिद बनी रही। 1947 में, एएसआई ने साइट पर कब्जा कर लिया।

उन्होंने उल्लेख किया कि साइट पर एएसआई द्वारा इसके इतिहास की व्याख्या करने वाला कोई सूचना बोर्ड नहीं लगाया गया है। उन्होंने कहा, “एएसआई बोर्ड सिर्फ यह बताता है कि यह कुतुबदीन द्वारा निर्मित एक मस्जिद है और अजमेर का सबसे पुराना स्मारक है।” यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह स्पष्ट होने के बावजूद कि पहले एक संस्कृत स्कूल और हिंदू एवं जैन मंदिर था, एएसआई साइट पर कहीं भी इसका उल्लेख नहीं है। इसे सिर्फ एक मस्जिद बताया गया है।”

लेखक संजय दीक्षित ने लिखा, “अजमेर में अढ़ाई दिन का झोंपड़ा मस्जिद मंदिरों के विध्वंस का एक शुरुआती उदाहरण है। पृथ्वीराज की हार के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा देवी सरस्वती के मंदिर और एक विद्यापीठ को तोड़कर बनाया गया मस्जिद।”

मस्जिद बनाने के लिए हिंदू मंदिरों का विध्वंस

भारत में ऐसे हजारों स्थल हैं जहाँ मंदिरों को तोड़कर मस्जिदों और अन्य मुस्लिम संरचनाओं का निर्माण किया गया। इन संरचनाओं का निर्माण या तो मंदिर की सामग्री से किया गया है या फिर यह मंदिर की साइट पर स्थित है। बाबरी विवादित ढाँचा (भव्य राम मंदिर बनाने के लिए हिंदुओं को सौंप दी गई), ज्ञानवापी विवादित ढाँचा (वाराणसी में विवादित संरचना), और शाही ईदगाह (कृष्ण मंदिर परिसर के अंदर मथुरा की विवादित संरचना) कुछ प्रमुख उदाहरण हैं। इतिहासकार सीता राम गोयल ने अपनी पुस्तक हिंदू टेम्पल्स: व्हाट हैपन्ड टू देम में लगभग 1,800 ऐसे स्थलों का दस्तावेजीकरण किया है। पुस्तक के बारे में संक्षिप्त जानकारी यहाँ पढ़ी जा सकती है।

ज्ञानवापी मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: 8 हफ्ते में सुनवाई करें जिला जज, तब तक शिवलिंग का स्थान रहेगा सील, मुस्लिम पढ़ सकेंगे नमाज

वाराणसी के ज्ञानवापी विवाद ढाँचा (Gyanvapi Controversial Structure, Varanasi) मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (20 मई 2022) को निचली अदालत को ट्रांसफर करते हुए 8 सप्ताह में सुनवाई पूरी करने का आदेश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि मामला की सुनवाई पहले इसे वाराणसी जिला कोर्ट में होगी। तब तक सुप्रीम कोर्ट द्वारा 17 मई की सुनवाई में दिए गए निर्देश जारी रहेंगे।

17 मई को सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्देश में कहा था कि शिवलिंग वाले स्थान को सुरक्षित रखा जाए, मुस्लिमों को नमाज पढ़ने से रोक ना रोका जाए और सिर्फ 20 लोगों के नमाज पढ़ने वाला ऑर्डर लागू नहीं रहेगा। 

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि इस मामले को अनुभवी और परिपक्व जज द्वारा सुना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम ट्रायल जज पर सवाल नहीं उठा रहे हैं, लेकिन अधिक अनुभवी द्वारा यह मामला देखा जाना चाहिए, तभी दोनों पक्षों को लाभ होगा।” जिला जज मस्जिद के भीतर पूजा करने के मामले को देखेंगे।

बेंच ने कहा कि जिला जज को 25 साल का लंबा अनुभव है। इस मामले में सभी पक्षों के हित को सुनिश्चित किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह न समझा जाए कि मामले को निरस्त किया जा रहा है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के रास्ते आगे भी खुले रहेंगे।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने वीडियोग्राफी सर्वे की रिपोर्ट लीक होने पर चिंता जाहिर की। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि यह एक संवेदनशील मामला है कि इसको लेकर देश में एकता बनी रहनी चाहिए।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि विराजमान- शाही ईदगाह मामले में नहीं लागू होगा प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट: जानें मथुरा कोर्ट ने निर्णय में क्या कहा

मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान और शाही ईदगाह विवाद के मामले में पूजा स्थल अधिनियम 1991 (Places of Worship Act 1991) रुकावट नहीं होगी। यह अधिनियम इस केस में लागू नहीं होगा। यह बात जिला जज राजीव भारती ने अपने निर्णय में कहा है। इसकी जानकारी वादी के अधिवक्ता गोपाल खंडेलवाल ने दी। 

इसके साथ ही कोर्ट ने श्री कृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट और अन्य निजी पक्षों की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका को अनुमति दी और सितंबर 2020 में उनके मुकदमें को खारिज करने के एक सिविल कोर्ट के आदेश को पलट दिया

बता दें कि भगवान श्रीकृष्ण विराजमान को वादी बनाकर 13.37 एकड़ जमीन पर दावा पेश करने वाली सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री के केस को जिला जज राजीव भारती की अदालत ने गुरुवार (19 मई 2022) को सुनवाई योग्य मानते हुए दर्ज कर लिया। करीब दो वर्ष के लंबी अदालती प्रक्रिया के बाद उनकी याचिका को अदालत ने दर्ज करने संबंधी निर्णय दिया। अगली सुनवाई 26 मई को होगी। अदालत के निर्णय पर अधिवक्ता रंजना ने कहा कि यह भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की जीत है। 

समझौते को बताया गलत, रद्द करने की माँग

रंजना अग्निहोत्री ने 25 सितंबर 2020 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ जमीन पर दावा पेश किया था, जिसमें उन्होंने वर्ष 1973 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट और शाही ईदगाह के बीच हुए समझौते को गलत बताकर इसे रद्द करने की माँग की है। उनकी याचिका में बताया गया है कि 20 जुलाई 1973 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट और शाही मस्जिद इंतजामिया कमेटी के मध्य बीच समझौता हुआ था, जिसके तहत परिसर की जमीन को ईदगाह इंतजामिया कमेटी को दे दिया गया। बाद में समझौते की डिक्री (न्यायिक निर्णय) 7 नवंबर 1974 को हुई।

जिला जज ने अपने निर्णय में यह कहा 

श्रीकृष्ण विराजमान और उनकी भक्त रंजना अग्निहोत्री ने इसी डिक्री को रद्द करने की माँग की है। जिला जज ने रिवीजन स्वीकार करने के निर्णय में कहा है कि चूँकि याचिकाकर्ता द्वारा समझौता और डिक्री को चैलेंज किया गया है, इसीलिए उपासना स्थल अधिनियम इस केस में लागू नहीं होगा। वादी के अधिवक्ता गोपाल खंडेलवाल ने बताया कि केस में समझौता और डिक्री को आधार बनाया गया है, इसलिए अदालत ने इस मामले में उपासना स्थल अधिनियम 1991 का लागू होना नहीं माना है।

TMC के शिक्षा मंत्री की ‘शिक्षक’ बेटी की स्कूल में ‘नो एंट्री’, कलकत्ता HC ने दिया पूरी सैलरी वापस करने का आदेश: शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़ा है मामला

कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुक्रवार (20 मई 2022) को पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती घोटाले से संबंधित याचिका पर सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने शिक्षा मंत्री परेश अधिकारी की बेटी अंकिता अधिकारी को अगले आदेश तक स्कूल परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने मंत्री की बेटी को अपने कार्यकाल के दौरान प्राप्त किए गए वेतन को लौटाने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि यह वेतन दो किश्तों में लौटानी होगी।

यह फैसला सीबीआई के मंत्री अधिकारी और उनकी बेटी के खिलाफ FIR दर्ज करने के एक दिन बाद आया है। दरअसल, पिछले दिनों कलकत्ता हाई कोर्ट ने दोनों के खिलाफ सीबीआई समन का डेडलाइन सेट किया था। उन्हें सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में अवैध रूप से शिक्षकों की भर्ती करने और मेरिट सूची से अनुपस्थिति के बावजूद अपनी बेटी को नौकरी आवंटित करने के लिए तलब किया गया था। इस डेडलाइन के खत्म होने के बाद सीबीआई ने FIR दर्ज की थी।

एजेंसी ने वरिष्ठ टीएमसी नेता और उद्योग मंत्री पार्थ चटर्जी से भी पूछताछ की थी क्योंकि कथित भर्ती घोटाला तब हुआ था जब वह शिक्षा मंत्री थे। शिक्षा राज्य मंत्री अधिकारी से 19 मई को पूछताछ की गई थी।

इस बीच, भाजपा नेताओं ने SSC घोटाले के मुद्दे पर ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया और परेश अधिकारी एवं पार्थ चटर्जी दोनों के इस्तीफे की माँग की।

क्या है SSC घोटाला

पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती घोटाला, जिसे आमतौर पर SSC घोटाले के रूप में जाना जाता है, 2014 से 2016 तक SSC द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय चयन परीक्षा (एसएलटी) के माध्यम से आयोजित भर्ती प्रक्रिया को देखता है। राज्य स्तरीय चयन परीक्षा (SLST) के उम्मीदवार ने आरोप लगाया था कि कम अंक प्राप्त करने वाले कई उम्मीदवारों को मेरिट लिस्ट में उच्च रैंक दिया गया। उन्होंने आगे कहा कि जो उम्मीदवार मेरिट लिस्ट में नहीं थे, उन्हें भी नियुक्ति पत्र (Appointment Letter) भेजा गया था।

इसके अलावा, वर्ष 2016 में, पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के तहत माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में ग्रुप C और ग्रुप D के कर्मचारियों की भर्ती के संबंध में भ्रष्टाचार के कई आरोप सामने आए। यह मामला इस साल मार्च में तब सामने आया था जब राज्य के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी पाई गई थी।

इससे पहले एकल पीठ ने सीबीआई को एसएससी सलाहकार समिति के पूर्व अध्यक्ष एसपी सिन्हा और पैनल के अन्य पूर्व सदस्यों से पूछताछ करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने सीबीआई को पूर्व सदस्यों से पूछताछ के बाद रिपोर्ट दाखिल करने को कहा था। अप्रैल में, CBI ने पश्चिम बंगाल स्कूल शिक्षा निदेशालय के पूर्व उप निदेशक आलोक कुमार सरकार और एसएससी के अज्ञात अधिकारियों के खिलाफ भी FIR दर्ज की थी।

FIR के अनुसार, आरोपित ने ग्रुप-डी स्टाफ पदों के लिए लगभग 500 अयोग्य उम्मीदवारों को नियुक्त करने में अनुचित लाभ उठाया था। कथित तौर पर, उन्होंने विभागीय नियमों की भी धज्जियाँ उड़ाईं और इसके लिए जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया। केंद्रीय एजेंसी के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी, 420, 468 और 471 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। 

8 अप्रैल को सीबीआई ने आरोपितों से पूछताछ की और कोर्ट में विस्तृत रिपोर्ट पेश की। कोर्ट ने तत्कालीन शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को सीबीआई के सामने पेश होने को कहा। सीबीआई ने मंत्री परेश अधिकारी और उनकी बेटी अंकिता अधिकारी पर धारा 120 बी, 420 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 7 के तहत आरोपित बनाया है। 

‘प्राइवेट पार्ट दिखाया और इरोटिक मसाज के बदले घोड़ा देने का दिया ऑफर’: एलन मस्क पर यौन उत्पीड़न का आरोप, मुँह बंद रखने के लिए दिए ₹1.94 करोड़

दुनिया के सबसे अमीर आदमी और स्पेसएक्स व टेस्ला के CEO एलन मस्क (Elon Musk) पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगा है। यौन उत्पीड़न का यह मामला 2016 का है। इस मामले में एक फ्लाइट अटेंडेंट को चुप रहने के लिए 2018 में स्पेसएक्स ने 250000 डॉलर (करीब ₹1.94 करोड़) दिए थे। बिजनेस इनसाइडर की रिपोर्ट के मुताबिक, फ्लाइट अटेंडेंट स्पेसएक्स की कॉरपोरेट जेट फ्लाइट के लिए कॉन्ट्रैक्ट बेस पर काम करती थी। उसने आरोप लगाया है कि मस्क ने बिना सहमति के उसके पैर पर हाथ फेरा और इरोटिक मसाज के बदले महँगे गिफ्ट का ऑफर दिया।

बिजनेस इनसाइडर की रिपोर्ट में फ्लाइट अटेंडेट की दोस्त के इंटरव्यू और डॉक्यूमेंट्स के आधार पर कहा गया है कि मस्क ने उसे अपना प्राइवेट पार्ट दिखाया और उसे इरोटिक मसाज के बदले घोड़ा देने का ऑफर दिया, क्योंकि वह घुड़सवारी करती थी। रिपोर्ट में आगे यह भी कहा गया है कि फ्लाइट अटेंडेंट को मसाज की ट्रेनिंग और इसका लाइसेंस लेने के लिए कहा गया था, ताकि वह मस्क की मसाज कर सके। बताया जा रहा है कि मस्क के गल्फस्ट्रीम G650ER के प्राइवेट केबिन में ये घटना हुई थी।

अटेंडेंट ने अपनी दोस्त को बताया था कि रॉकेट लॉन्च कंपनी स्पेसएक्स के संस्थापक एलन मस्क ने 2016 में फ्लाइट के दौरान अपने पूरे शरीर की मसाज करवाने के लिए उसे अपने केबिन में आने के लिए कहा था। जब वह उनके केबिन में पहुँची, तो वह बिना कपड़ों के बेड पर लेटे हुए थे। मस्क ने केवल शरीर के निचले आधे हिस्से को चादर से ढक रखा था। मालिश के दौरान मस्क ने उसे अपना प्राइवेट पार्ट भी दिखाया और फिर उसकी पैर को छुआ। महिला कर्मचारी ने अपनी दोस्त को यह भी बताया था कि प्राइवेट कैबिन में मसाज के दौरान मस्क ने उससे सेक्स के लिए भी पूछा था।

इसके बाद मस्क ने उसे सेक्सुअल एक्ट में इन्वॉल्व होने के लिए घोड़ा गिफ्ट करने का ऑफर दिया। अटेंडेंट ने मना कर दिया और बिना किसी सेक्सुअल एक्ट में इन्वॉल्व हुए मालिश करना जारी रखा। उसने कहा, “फ्लाइट अटेंडेंट इज नॉट फॉर सेल। वह पैसे और गिफ्ट के लिए सेक्सुअल फेवर नहीं करती।” यह घटना लंदन की फ्लाइट के दौरान हुई थी।

इनसाइडर ने जब इन आरोपों को लेकर मस्क से संपर्क किया तो, उन्होंने जवाब देने के लिए और समय माँगते हुए कहा कि इस कहानी में और भी कई पहलू हैं जो सामने नहीं आए हैं। उन्होंने इसे राजनीति से प्रेरित बताते हुए लिखा, “अगर मैं यही सब कर रहा होता तो 30 साल के करियर में ये सारी बातें सामने आ चुकी होतीं।”

एलन मस्क ने इस मामले को लेकर शुक्रवार को एक ट्वीट भी किया है। इसे उन्होंने ‘एलनगेट’ नाम दिया है। दरअसल, मार्च 2021 में उन्होंने एक ट्वीट किया था, जिसमें उन्होंने कहा था, “अगर मुझसे जुड़ा कभी कोई स्कैंडल सामने आता है, तो प्लीज इसे एलनगेट कहना।” अपने ट्वीट के साथ उन्होंने फनी इमोजी भी बनाया है। हालाँकि, अब यह ट्वीट उनके ट्विटर हैंडल से डिलीट कर दिया गया है।

ज्ञानवापी वजूखाना में मिले शिवलिंग पर जड़ा था हीरा: रिपोर्ट में दावा- कब्जे के बाद निकाले जाने से आई दरार

वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Gyanvapi Controversial Structure, Varanasi) की वीडियोग्राफिक सर्वे में सामने आए शिवलिंग में कभी हीरे जड़े हुए थे। जब मुस्लिम आक्रांताओं ने आदि विश्वेश्वर मंदिर पर हमला किया, तब उन्होंने उस रत्न को उखाड़ लिया और अपने साथ ले गए। शिवलिंग के ऊपर दिखने वाला चिह्न उसी हीरे के जड़ने का निशान है।

हिंदू पक्ष के वकील हरिशंकर जैन ने बताया, “मेरी जानकारी के मुताबिक, जो मूल शिवलिंग है, वहाँ पर हीरे रखने की जगह बनी हुई थी। शिवलिंग के ऊपर जो स्थान बना है वह हीरे रखने की जगह है। शिवलिंग के ऊपर हीरे रखने की जगह है, जहाँ से हीरे गायब हैं और यह पूरा-पूरा शिवलिंग है।” उन्होंने कहा कि फव्वारे की बात लोगों को बेवकूफ बनाने की बात है।

हरिशंकर जैन का कहना है कि औरंगजेब आकर मंदिरों का विध्वंस किया था। हालाँकि, वह आदि विश्वेश्वर का पूरा मंदिर ध्वस्त नहीं कर पाया था। उन्होंने कहा कि वे 274 पेज का दस्तावेज कोर्ट में जमा करा चुके हैं।

उन्होंने कहा कि इस डॉक्युमेंट में काशी क्या है, इसका महत्व क्या है आदि जानकारी दी गई है। उन्होंने कहा कि काशी एक धार्मिक नगरी है, जिसे भगवान शिव ने बसाया था और इसका उल्लेख पुराणों और शास्त्रों में भी है।

जैन ने बताया कि पुराने मंदिर के ऊपर ही गुंबद बना दिया गया है। गुंबद के नीचे मंदिर की शिखा है। इसके बारे में भी रिपोर्ट दी गई है। उन्होंने बताया कि इसकी तस्वीर उनके पास है।

आजतक के अनुसार, रिपोर्ट के एक पेज में कहा गया है कि तहखाने की दीवार पर पान के पत्ते के आकार की फूल की 6 आकृतियाँ बनी हुई हैं। वहीं, तहखाने में 4 खंबे पुराने तरीके के हैं, जिनकी ऊँचाई 8 फीट है। खंभों के चारों ओर नीचे लेकर ऊपर तक घंटी, कलश और फूल की आकृतियाँ बनी हैं। एक खंभे पर पुरातन हिंदी भाषा में सात लाइनें खुदी हुई हैं।