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अभिनेत्री के घर पहुँची महाराष्ट्र पुलिस, लैपटॉप-फोन सहित कई उपकरण जब्त किए: पवार पर फेसबुक पोस्ट, एपिलेप्सी से रही हैं पीड़ित

राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के प्रमुख शरद पवार (Sharad Pawar) के खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट करने को लेकर गिरफ्तार की गई मराठी अभिनेत्री केतकी चितले (Ketaki Chitale) का लैपटॉप, मोबाइल फोन जैसे कई इलेक्ट्रॉनिक सामान भी पुलिस ने जब्त कर लिए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सोमवार (16 मई 2022) को अभिनेत्री के साथ मुंबई पुलिस नवी मुंबई के कलंबोली में उनके घर पहुँची और उनका सारा सामान अपने कब्जे में ले लिया।

बताया जा रहा है कि ठाणे क्राइम ब्रांच और कलंबोली पुलिस स्टेशन की टीमों ने सोमवार दोपहर मराठी एक्ट्रेस केतकी चितले के एवलॉन आवास की तलाशी। इस दौरान उन्होंने कई इलेक्ट्रानिक उपकरण जब्त किए। एक्ट्रेस के खिलाफ पाँच जिलों में कुल छह मामले दर्ज किए गए हैं और वह 18 मई तक पुलिस हिरासत में हैं।

पुणे की रहने वाले 29 वर्षीय केतकी चितले खुद के एपिलेप्सी (मिर्गी) से पीड़ित होने का दावा करती हैं। इसके साथ ही वह अपने इंस्टाग्राम पर ‘एपिलेप्सी वॉरियर क्वीन’ के साथ इस बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने वाली एक एक्टिविस्ट के रूप में भी खुद को पेश करती हैं।

उल्लेखनीय है कि केतकी चितले ने अपने फेसबुक पोस्ट पर एक मराठी में लिखी कविता शेयर की थी। इसमें शरद पवार के लिए ‘नरक इंतजार कर रहा है’, ‘तुम ब्राम्हणों से नफरत करते हो’, ‘तुम्हारा मुँह टेढ़ा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। केतकी के पोस्ट को लेकर NCP ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। वहीं, स्वप्निल नेटके नाम के व्यक्ति ने ठाणे शहर के कलवा पुलिस स्टेशन में सेक्शन 153 और 505 के तहत मामला दर्ज कराया था। अपनी शिकायत में नेटके ने दावा किया था कि पवार के खिलाफ केतकी के आपत्तिजनक पोस्ट के कारण राज्य में दोनों राजनीतिक दलों के बीच संबंध और तनावपूर्ण हो सकते हैं। कलवा पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज करने के बाद केस को ठाणे क्राइम ब्रांच को दे दिया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले केतकी (29) के खिलाफ ठाणे, पुणे और धुले जिलों में ऑनलाइन एफआईआर रजिस्टर कराई गई थी। एक्ट्रेस को ठाणे की पुलिस ने ही गिरफ्तार किया था। हालाँकि, पवार पर कमेंट के मामले में गिरफ्तार होने वाली केतकी दूसरी शख्स हैं। हाल ही में आरएसएस के पूर्व कार्यकर्ता और नासिक के 21 साल के छात्र निखिल भामरे ने पवार का नाम लिए बिना ही एक ट्वीट किया था, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें उठा लिया था। कथित तौर पर उसने लिखा था, “बारामती के गाँधी के लिए बारामती के नाथूराम गोडसे को बनाने का समय आ गया है।”

अम्बुजा और ACC में खरीदी बड़ी हिस्सेदारी, होल्सिम इंडिया से हुई ₹80000 करोड़ की डील: सीमेंट इंडस्ट्री का ‘किंग’ बन रहा अडानी समूह

जल्द ही देश की दो प्रमुख सीमेंट कम्पनियाँ अम्बुजा सीमेंट लिमिटेड और ACC लिमिटेड में बड़ी हिस्सेदारी अडानी ग्रुप की हो जाएगी। जहाँ सोमवार को बीएसई पर शुरुआती सौदों में अंबुजा सीमेंट्स और एसीसी के शेयरों में क्रमशः 3% और 7% की तेजी आई, वहीं गौतम अडानी के अडानी समूह ने रविवार (15 मई, 2022) को ही बता दिया था कि वह इन दोनों कंपनियों में स्विट्ज़रलैंड की कंपनी होल्सिम एजी की पूरी हिस्सेदारी खरीदेगी। यह देश के इंफ्रास्ट्रक्चर और मैटेरियल इंडस्ट्री का अबतक का सबसे बड़ा डील बताया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अडानी समूह ने स्विस निर्माण सामग्री निर्माता होल्सिम लिमिटेड की अंबुजा सीमेंट्स और एसीसी लिमिटेड में हिस्सेदारी को 10.5 अरब डॉलर (₹ 80,000 करोड़) में खरीदने के लिए सहमत हो गया है। बताया जा रहा है कि अडानी समूह विदेश में स्थित अपनी एक सब्सिडियरी के जरिए इस हिस्सेदारी को खरीद रही है।

रिपोर्ट के अनुसार स्विट्ज़रलैंड की कंपनी होल्सिम के पास अपनी सहयोगी कंपनी के जरिए अम्बुजा सीमेंट में 63.19% और ACC में 54.3% हिस्सेदारी है। वहीं इसमें 50.05% हिस्सेदारी अम्बुजा सीमेंट के जरिए लिया गया है। दोनों कंपनियों में होल्सिम की हिस्सेदारी खरीदने के लिए अडानी समूह 10.5 अरब डॉलर का भुगतान कर रही है।

इतने बड़े डील को देखते हुए कहा जा रहा है कि जहाँ अडानी समूह सीमेंट बिजिनेस में अपनी पकड़ बना रही है वहीं इस डील के साथ ही होल्सिम बिल्डिंग टेक्नोलॉजी पर फोकस करने की रणनीति पर काम कर रही है। कहा जा रहा है कि कंपनी सस्टेनेबल डेवेलपमेंट को ध्यान में रखते हुए भारत में अपने सीमेंट कारोबार को बेचना चाहती है।

रिपोर्ट के अनुसार यह भी दावा किया जा रहा है कि कंपनी ने इसी रणनीति के तहत सितम्बर 2021 में अपनी ब्राजीलियन यूनिट को 1 अरब डॉलर में बेचा था। इसके साथ ही होल्सिम कंपनी जिम्बाब्वे में भी अपने कारोबार को बेचने की तैयारी कर रही है।

गौरतलब है कि अम्बुजा सीमेंट भारत की एक लीडिंग सीमेंट कंपनी है। जिसकी स्थापना 1983 में की गई थी। वहीं ACC सीमेंट अम्बुजा की ही सब्सिडियरी कंपनी है।

जिसे पढ़ाया महिला सशक्तिकरण की मिसाल, उस रजिया सुल्ताना ने काशी में विश्वेश्वर मंदिर तोड़ बना दी मस्जिद: लोदी, तुगलक, खिलजी – सबने मचाई तबाही

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थित ज्ञानवापी विवादित ढाँचे के अंदर एक कुएँ से शिवलिंग मिला है, जिसे नमाजियों ने वजूखाना बना कर रख दिया था। अर्थात, वो वहाँ पर अपने हाथ-पाँव धो कर वर्षों से भोले बाबा को अपमानित कर रहे थे। संस्कृत में श्लोक से लेकर त्रिशूल और ॐ तक, ज्ञानवापी में अदालत के निर्देश पर हुए सर्वे में इतने सबूत मिले कि सब कुछ साफ़ हो गया। लेकिन, हमें फिर भी अपना इतिहास और इस मंदिर पर हुए हमलों को भूलना नहीं है।

पिछले लेख में हमने बताया था कि कैसे 10वीं और 11वीं शताब्दी में चन्द्रादित्य और गोविंदचंद्र जैसे प्रतापी गहड़वाल राजाओं ने शिव की नगरी की सुरक्षा की, लेकिन कन्नौज के शासक जयचंद की मृत्यु के बाद मुहम्मद गोरी और कुतुबुद्दीन ऐबक वहाँ टूट पड़ा और मंदिर को ध्वस्त कर दिया। पुनर्निर्माण शुरू हुआ तो ऐबक 4 साल बाद लौटा और काशी विश्वनाथ मंदिर सहित कई शिवालय ध्वस्त कर दिए। गुजरात के जैन मंत्री वास्तुपाल ने मंदिर को फिर से बनवाने के लिए तब 1 लाख रुपए भेजे थे।

अब थोड़ी आगे की बात कर लेते हैं। इल्तुतमिश की मौत होने के बाद उसकी बेटी रजिया सुल्ताना को दिल्ली की गद्दी मिली। उसे इतिहास में भले ही ‘बहादुर महिला’ बता कर पढ़ाया जाता रहा हो, लेकिन ये जानने लायक है कि उसने भी काशी में मंदिरों को ध्वस्त कर के विश्वनाथ मंदिर परिसर में ही एक मस्जिद बनवा दिया। ज्ञानवापी विवादित ढाँचे से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘रजिया मस्जिद’ की जगह भी मंदिर ही हुआ करता था।

इसके बाद सन् 1448 में मुहम्मद शाह तुगलक ने आसपास के छोटे-बड़े मंदिरों को भी ध्वस्त कर दिया और रजिया मस्जिद का और विस्तार किया। काशी के प्राचीन इतिहास को पढ़ें तो पता चलता है कि यहाँ कई पुष्कर थे, जिन्हें व्यवस्थित ढंग से तबाह कर के इस्लामी शासकों ने मस्जिद बनवाए। हालाँकि, उससे पहले 13वीं सदी में हिन्दुओं ने फिर से मंदिर को बना कर खड़ा कर दिया था। इसे हिन्दुओं की जिजीविषा कहें या फिर श्रद्धा, इतने अत्याचार और खून-खराबे के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी।

होयसल राजा नृसिंह तृतीया ने सन् 1279 में अपने राज्य के नागरिकों को तीर्थाटन के लिए काशी भेजा था, इसीलिए उस समय मंदिर पुनर्निर्मित हो गया रहा होगा। कर्नाटक के बेलूर और फिर हलेबीडू से शासन करने वाला ये कन्नड़ साम्राज्य दक्षिण भारत में कला, धर्म और आर्किटेक्चर के विकास के लिए जाना जाता है। अलाउद्दीन खिलजी (शासनकाल 1296-1316) के दौरान भी काशी में हिन्दुओं ने मंदिरों का पुनर्निर्माण जारी रखा।

इन्हीं मंदिरों में से एक था पद्मेश्वर मंदिर, जिसे काशी विश्वनाथ मंदिर के सामने ही बनवाया गया था। ऐसा विवरण मिलता है कि 14वीं शताब्दी के अंत तक वाराणसी पुनः अपने पुराने गौरव की तरफ लौटने लगा था। 200 वर्ष पूर्व ऐबक-गोरी के विध्वंस से लोग उबर चुके थे। बाहर से लोग भी यहाँ आकर बस रहे थे। बाद में गुरु नानक भी काशी की तीर्थयात्रा के लिए आए थे, लेकिन तुगलक के समय ही जैन आचार्य जिनप्रभ सूरी के भी काशी तीर्थाटन का विवरण मिलता है।

हालाँकि, 1296 ईस्वी में बने पद्मेश्वर मंदिर को भी 15वीं शताब्दी के मध्य में तोड़ डाला गया। पद्म नाम के एक साधु ने इसका निर्माण करवाया था। आप जानते हैं कि ये मंदिर अब कहाँ है? इसके ऊपर ही लाल दरवाजा मस्जिद बनवा दिया गया, जिसे आज भी शर्की सुल्तानों का भव्य आर्किटेक्चर बता कर प्रचारित किया जाता है। उससे पहले 1302 ईस्वी में विश्वेश्वर नाम के एक व्यक्ति ने मणिकर्णकेश्वर मंदिर की स्थापना की थी।

फिरोजशाह तुगलक से लेकर सिकंदर लोदी तक, कई इस्लामी सुल्तानों ने काशी में मंदिरों को बारम्बार ध्वस्त किया। 14वीं शताब्दी के अंत में और 15वीं शताब्दी की शुरुआत में रामानंद ने भी काशी में रह कर शिक्षा दी। एक वैष्णव संत को शिव की नगरी से प्रेम हो गया, यही तो हिन्दू धर्म है। रैदास यहीं पर रामानंद के शिष्य बने। संत कबीर का जन्म यहीं हुआ, इसी काल में। फिर गुरु नानक यहाँ पहुँचे। फिर सन् 1494 में आता है सिकंदर लोदी।

सिकंदर लोदी ने कबीर को भी प्रताड़ित किया। उसने काशी में कई ऐसे मंदिर तोड़े, जिनका अपने खून-पसीने से हिन्दुओं ने पुनर्निर्माण किया था। 16वीं शताब्दी का पहला क्वार्टर ख़त्म होने के बाद दिल्ली में मुगलों का शासन आरंभ हो गया और इसके साथ ही काशी में मंदिरों का निर्माण भी रुक गया। हालाँकि, अकबर के कालखंड में टोडरमल और मानसिंह जैसे राजाओं ने मुगलों का वफादार रहते हुए ही काशी में कई मंदिरों और घाटों का निर्माण करवाया।

1514-1594 के कालखंड में ही जगद्गुरु नारायण भट्ट हुए, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘त्रिस्थली’ में काशी के विश्वनाथ मंदिर के बारे में लिखा है। इसमें उन्होंने कहा है कि अगर म्लेच्छों ने शिवलिंग को हटा दिया है तो वो खाली जगह ही हमारे लिए पवित्र है और उसकी पूजा की जानी चाहिए, अथवा कोई और शिवलिंग स्थापित किया जाना चाहिए। उनके शुरुआती जीवनकाल में मंदिर नहीं बना था, इससे ये पता चलता है। तुगलक और लोदी के विध्वंस से वाराणसी नहीं उबरी थी।

वो नारायण भट्ट ही थे, जिनकी प्रेरणा से राजा टोडरमल ने काशी में पुनः भव्य विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। आज जिस ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को आप देख रहे हैं, उसे औरंगजेब ने इसी मंदिर को तोड़ कर इसके ऊपर बनवाया था। काशी की मुक्ति के प्रयास लगातार चलते रहे और यहाँ पूजा-पाठ भी नहीं रोका गया। बार-बार आक्रमण के बावजूद काशी में पुनर्निर्माण चलता रहा। आगे के लेख में हम अकबर और उसके आगे के कालखंड में काशी की हुई दुर्दशा की चर्चा करेंगे।

इलाहाबाद HC में अधिवक्ता रस्तोगी की दलीलों से मुस्लिम पक्ष चित, कहा – वक्फ एक्ट हिन्दुओं में लागू नहीं होता, सतयुग से वहाँ है मंदिर

वाराणसी में विवादित ज्ञानवापी ढाँचे (Gyanvapi Mosque Survey) को लेकर सोमवार (16 मई 2022) को इलाहाबाद हाई कोर्ट में सुनवाई हुई। हाई कोर्ट में सुनवाई शुरू होते ही मंदिर पक्ष के अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने विवादित ज्ञानवापी ढाँचे परिसर में सर्वेक्षण के दौरान मिले विशाल शिवलिंग और मंदिर के तमाम अवशेषों की जानकारी दी। साथ ही सर्वे के दौरान विवादित ढाँचे के परिसर में मिले शिवलिंग वाली जगह को सील करने और वहाँ की सुरक्षा बढ़ाने को कहा।

हालाँकि, कोर्ट ने रस्तोगी की दलीलें सुनने के बाद सुनवाई टाल दी है। अब 20 मई (शुक्रवार दोपहर 12 बजे) को इस मामले की अगली सुनवाई होगी।

रस्तोगी ने बहस के दौरान कोर्ट में कहा कि हिंदू पक्ष कानून के अनुसार अपने भगवान के लिए केस लड़ रहे हैं। वक्फ एक्ट हिंदुओं से जुड़े मामलों में लागू नहीं होता है। रस्तोगी ने कहा, “यहाँ, हम कानून के अनुसार भगवान के लिए लड़ रहे हैं। कोई ढाँचा नहीं गिराया जा रहा है जैसा कि बाबरी मस्जिद मामले में हुआ था। यह मंदिर प्राचीन काल से अब तक अस्तित्व में है। अगर मुगलों ने पूर्व में किसी धार्मिक स्थल से छेड़छाड़ किया है, तो हम कोर्ट में जाने के लिए स्वतंत्र है।” मंदिर पक्ष के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि ज्ञानवापी ढाँचे की जगह सतयुग से मंदिर है

विजय शंकर रस्तोगी ने कोर्ट में बताया कि सन 1936 में दीन मोहम्मद, मोहम्मद हुसैन व मोहम्मद जकारिया ने बनारस अधीनस्थ अदालत में घोषणात्मक वाद दायर किया था। उन्होंने अदालत को बताया कि मुस्लिम वक्फ अधिनियम, 1960 हिन्दुओं पर लागू नहीं होता। यह भगवान विश्वेश्वर मंदिर के अंतर्गत आता है। रस्तोगी ने उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का हवाला देते हुए कहा कि उपासना स्थल की प्रकृति के संबंध में दिए गए निर्णय में सुधार किया जा सकता है।

रस्तोगी ने तर्क दिया, “क्या किसी मंदिर में नमाज पढ़ने से आपका धार्मिक चरित्र बदल सकता है? अगर कोई मुस्लिम मंदिर में नमाज पढ़ता है, तो उसे इस्लाम से बाहर कर दिया जाता है, इसलिए कोई भी मुस्लिम मंदिर में नमाज नहीं पढ़ सकता है।” रस्तोगी ने आगे कहा, “यह संपत्ति देवता के नाम पर है। मुस्लिमों का इससे कोई संबंध नहीं है।”

गौरतलब है कि वाराणसी स्थित ज्ञानवापी विवादित (Gyanvapi Mosque Survey) ढाँचे का तीन दिनों तक चले सर्वे का काम समाप्त हो गया है। सर्वे के तीसरे दिन हिन्दू पक्ष की तरफ से सोमवार (16 मई, 2022) को करीब 12 फीट 8 इंच लंबा शिवलिंग नंदी के सामने विवादित ढाँचे के वजूखाने में मिलने का दावा किया गया है। जिसके बाद वाराणसी सिविल कोर्ट के जज रवि कुमार दिवाकर ने शिवलिंग की जगह को सील करते हुए उसे सीआरपीएफ के हवाले कर दिया है। वहीं वजू पर भी पाबन्दी लगा दी है।

पूछताछ के नाम पर पत्रकार अमन चोपड़ा को प्रताड़ित करती रही राजस्थान पुलिस: 6 घंटे तक खाने और चाय पीने का भी मौका नहीं दिया

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (CM Ashok Gehlot) के नेतृत्व वाली राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार (Rajasthan Government) ‘न्यूज़ 18’ के पत्रकार अमन चोपड़ा (Aman Chopra) के पीछे पड़ी हुई है। दो मामलों में हाईकोर्ट द्वरा गिरफ्तारी पर स्टे लगाने के बाद राजस्थान ने डूंगरपुर में दर्ज एक केस में चोपड़ा को पूछताछ के नाम राजस्थान पुलिस उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित कर रही है।

News18 के अनुसार, अमन चोपड़ा को प्रताड़ित करने के लिए राजस्थान पुलिस उन्हें सुबह से शाम तक थाने में बैठाए रही। इस दौरान न ही उन्हें खाने के लिए कुछ दिया गया और ना ही चाय आदि ही दी गई। इस दौरान उनसे अनर्गल सवाल पूछकर उनका समय खराब किया जाता रहा और मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रताड़ित किया जाता रहा है।

पूछताछ के नाम पर राजस्थान पुलिस उन्हें झूटे मनी ट्रेल (अवैध लेनदेन) के मामले में फँसाने की कोशिश कर रही है। लाइव डिबेट से जुड़े मामले में पुलिस अमन चोपड़ा से सवाल कर रही है कि उनके खाते ये पैसे क्यों आए, कहाँ से आए, किसने भेजे, क्यों भेजे आदि-आदि।

राजस्थान पुलिस के सवालों से स्पष्ट है कि वह राजनीति साधने की कोशिश कर रही है। राजस्थान पुलिस ने अमन चोपड़ा से पूछ रही है कि जिस लाइव डिबेट को उन्होंने प्रसारित किया वो किसके कहने पर किया, इसे किसने लिखा, इसकी स्क्रिप्ट कहाँ से आई, इसके पीछे कौन है आदि-आदि।

हालाँकि, इस मामले में लाइव डिबेट की पूरी सीडी कोर्ट को सौंप दी गई थी। कोर्ट ने भी माना कि यह लाइव डिबेट है, लेकिन पुलिस ने कोर्ट को बताया कि वह चोपड़ा से पूछताछ करना चाहती है और इसके लिए उसने समय में दिया। हालाँकि, सुबह 11 बजे से शाम 5 तक राजस्थान पुलिस उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित करती रही।

इसके पहले राजस्थान पुलिस उनके अपार्टमेंट में घुस गई थी और अमन चोपड़ा के फ्लैट के दरवाजे पर वॉरंट चिपका दिया। इसके साथ ही पुलिस उनके दरवाजे पर कुर्सी डाल कर बैठी रही थी, ताकि उन्हें गिरफ्तार किया जा सके। इस संबंध में उसने नोएडा पुलिस से पहले इजाजत नहीं ली थी।

अब कर्नाटक के जामिया मस्जिद पर उठे सवाल, बोले हिन्दू संगठन- टीपू सुल्तान ने तोड़ा था हनुमान मंदिर, दीवार-खम्भे बताते हैं सच्चाई

वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Varanasi Gyanvapi Controversial Structure) के मंदिर होने के पुख्ता सबूत मिलने के बाद कर्नाटक (Kanataka) में इस्लामी शासक टीपू सुल्तान (Tipu Sultan) द्वारा बनवाई गई मस्जिद में पूजा-अर्चना करने की अनुमति हिंदू संगठनों ने माँगी है। इन संगठनों का कहना है कि विजयनगर साम्राज्य के श्रीरंगपट्टन किले (Srirangapatna Fort) में मौजूद जामिया मस्जिद (Jamia Masjid), जिसे मस्जिद अल-्अला (Masjid Al-Ala) भी कहा जाता है, एक हनुमान मंदिर है। इसकी दीवारों और खंभों से यह स्पष्ट है।

नरेंद्र मोदी विचार मंच के नेताओं का कहना है कि प्रदेश की राजधानी बेंगलुरु से 120 किलोमीटर दूर श्रीरंगपट्टन के किले में स्थित पूजा-अर्चना की माँग को लेकर मांड्या जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर इसमें पूजा करने और परिसर में स्थित तालाब में स्नान करने की अनुमति माँगी है। मंच के राज्य सचिव सीटी मंजूनाथ ने कहा कि यह हनुमान मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई गई है।

संगठन के लोगों का दावा है कि इस हनुमान मंदिर का नाम आंजनेय मंदिर था। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं कि विजयनगर साम्राज्य पर कब्जा करने के बाद मंदिर को मस्जिद में बदलने को लेकर टीपू सुल्तान ने फारस के राजा खलीफ को पत्र लिखा था। संगठन के लोगों ने पुरातत्व विभाग (ASI) से आग्रह किया कि वह इन दस्तावेजों पर विचार कर मामले की जाँच करे। बता दें कि यह किला इसकी इमारतें ASI के अधीन हैं।

वहीं, काली मठ के ऋषि कुमार स्वामी नाम के एक व्यक्ति का दावा है कि साल 1784 में हनुमान मंदिर को ध्वस्त करने के बाद टीपू सुल्तान द्वारा मस्जिद का निर्माण कराया था। उन्होंने कहा कि यह साबित करने के लिए मस्जिद में शिलालेख मौजूद है। मस्जिद के अंदर तत्कालीन होयसला साम्राज्य का प्रतीक है। बता दें कि मस्जिद गिराने की धमकी के आरोप में स्वामी गिरफ्तार भी हो चुके हैं। फिलहाल वे जमानत पर बाहर हैं। वहीं, पूजा की इजाजत माँगने के बाद मस्जिद कमिटी ने सुरक्षा की माँग की है।

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, कर्नाटक के पूर्व मंत्री केएस ईश्वरप्पा (KS Eshwarappa) ने दावा किया था कि मुस्लिम नेताओं ने भी स्वीकार किया है कि मस्जिद से पहले वहाँ एक मंदिर था और मुगल शासन के दौरान लगभग 36,000 मंदिरों को तोड़ा या क्षतिग्रस्त किया गया था। उन्होंने कहा था, “हम बिना कोई परेशानी पैदा किए सुप्रीम कोर्ट के नियम के मुताबिक सभी मंदिरों को दोबारा हासिल करेंगे।”

जहाँ मिला शिवलिंग उसी वजूखाने में हाथ-पैर धोते थे नमाजी, ‘मछलियाँ मर जाएँगी’ कह कर सर्वे रोकना चाहते थे मौलवी

वाराणसी में विवादित ज्ञानवापी में सर्वे के दौरान शिवलिंग के उस स्थान से मिलने का दावा किया जा रहा है जहाँ पर नमाज़ से पहले वज़ू किया जाता था। मिली जानकारी के मुताबिक शिवलिंग ज्ञानवापी के तालाबनुमा कुएँ में मिला है। इस जगह को वज़ूखाना कहा जाता था। इस तालाब के पानी को पम्प से खाली करवाया गया जिसके बाद उसमें शिवलिंग दिखाई दिया। बताया जा रहा है कि इस तालाब का पानी न निकालने के लिए मुस्लिम पक्ष की तरफ से तमाम तरह की दलीलें भी दी गईं।

मेजर सुरेंद्र पुनिया के मुताबिक, “नमाज़ पढ़ने वाले जानते थे कि तालाब में शिवलिंग हैं। इसीलिए तो मौलवी लोग तालाब के पानी को निकालने का विरोध कर रहे थे। वो कह रहे थे कि ‘मछलियाँ’ मर जाएँगी। पर सर्वे टीम ने पानी को बाहर निकाला तो 12 फिट 8 इंच का शिवलिंग निकला।”

शिवलिंग मिलने के बाद सीनियर डिवीजन सिविल जज रवि कुमार दिवाकर ने विवादित ज्ञानवापी ढाँचे को सील करने के आदेश दिए। अपने आदेश में उन्होंने लिखा कि शिवलिंग एक ठोस प्रमाण है। इसी के साथ उन्होंने CRPF को ज्ञानवापी परिसर को अपनी सुरक्षा में लेने का आदेश देते हुए मुस्लिमों के उसमें घुसने पर रोक लगा दी।

क्या होता है वज़ूखाना

वज़ूखाना वो जगह है जहाँ नमाज़ी नमाज़ से पहले अपने हाथों और पैरों को साफ़ करते हैं। इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक ऐसा इबादत से पहले साफ-सफाई के लिए किया जाता है। वज़ूखाना मूलतः 2 शब्दों से मिल कर बना है। पहला वज़ू जिसका अर्थ होता है शरीर के अंगों को साफ़ करना और दूसरा खाना जिसका मतलब उस जगह से है जहाँ वज़ू किया जाता है।

ज्ञानवापी की सच्चाई सामने आने पर कट्टरपंथियों को ‘बाबरी 2.0’ का डर: कह रहे – कोर्ट भी मिला हुआ है, धोखे से रख दी हिन्दू प्रतिमा

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थित ज्ञानवापी विवादित ढाँचे की सच्चाई क्या सामने आई, पूरा का पूरा लिबरल और कट्टर इस्लामी गिरोह एकदम से बौखला सा गया है। बता दें कि जिस ज्ञानवापी को ‘मस्जिद’ बता कर मुस्लिम वहाँ नमाज पढ़ते आ रहे थे और जिस वजूखाने में साढ़े तीन सदी से हाथ-पाँव धो रहे थे, वहीं पर शिवलिंग मिला है। अदालत की निगरानी में हुई प्रक्रिया में सच्चाई सामने आने के बावजूद इस्लामी गिरोह इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

अमित कुमार नाम के एक लिबरल ने हिन्दुओं को यथास्थिति बनाए रखने के लिए कहा। दरअसल, ‘C Voter’ के संस्थापक यशवंत देशमुख ने लिखा था, “सदियों से जो भी ज्ञानवापी में जाते होंगे, लाज़िम है उनको साफ़ दिखता होगा वो ज़बरदस्ती तोड़े गए मंदिर में खड़े हैं। लाज़िम है उनको पता होगा उस जगह के क्या मायने हैं। लाज़िम है वो अन्याय अत्याचार के उस अध्याय को जानते होंगे। क्या एक बार भी उनके दिल में गंगा-जमनी टीस नहीं उठी?”

इस पर अमित कुमार नाम के यूजर ने लिखा कि इतिहास में युद्धों का समय था और स्पेन में सभी मस्जिदों को चर्चा बना दिया गया, तुर्की में सभी चर्च मस्जिद में तब्दील कर दिए गए और इजरायल में सभी सिनेगॉग (यहूदी मंदिर) चर्च बना दिए गए। उसने सलाह दी कि या तो भारतीय इससे आगे बढ़ें, या फिर नागरिक अशांति और प्रतिबंधों का सामना करें। इस पर यशवंत देशमुख ने जवाब दिया कि इतिहास का भान होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी भी शांतिपूर्ण समझौते के लिए सच्चाई का सामना आना ज़रूरी है, इतिहास हमें यही सिखाता है। उन्होंने कहा कि इतिहास चाहे कितना भी असुविधाजनक हो, उसे छिपा या दबा देना या फिर ऐसा कह देना एकदम से ये हुआ ही नहीं था – इससे सिर्फ और सिर्फ हमारी खामियाँ ही उजागर होंगी। इस पर नजीब नाम के यूजर ने उन्हें ‘सँपोला’ बताते हुए दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि बाबरी के राम जन्मभूमि होने के कोई सबूत नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद मस्जिद को ध्वस्त कर के बहुसंख्यकों को सौंप दिया गया।

समीउल्लाह खान ने ऐलान किया कि मुस्लिम समुदाय फिर से ‘भव्य’ बाबरी ‘मस्जिद’ का निर्माण कराएगा और ‘ज्ञानवापी मस्जिद’ को भी फिर से खोलेगा, जिसे दुनिया भी देखेगी। उसने दोनों ढाँचों की तस्वीरें भी शेयर की।

इसी तरह नवाजिश निहाल नाम के यूजर ने लिखा, “उन्होंने तो कहा था कि बाबरी उन्हें दे दो, इससे वो संतुष्ट हो जाएँगे।” हालाँकि, लोगों ने उसे जवाब दिया कि हिन्दुओं को कुछ भी माँग कर नहीं मिला है, बल्कि कानूनी प्रक्रिया अपना कर और अत्याचार सह कर उन्हें ये हासिल हुआ है।

फैज़ान नाम के एक एक मुस्लिम कट्टरपंथी ने दावा किया कि हिन्दू अब ‘बाबरी 2.0’ की तैयारी कर रहे हैं। उसने दावा किया कि बाबरी में हिन्दू प्रतिमा रख दी गई थी और अब ज्ञानवापी के लिए भी यही मॉडल अपनाया जा रहा है। उसने उन ‘वोकिया’ मुस्लिमों को शर्म करने की सलाह दी, जो कथित तौर पर सेक्युलरिज्म के लिए बाबरी हिन्दुओं को दे देने की सलाह दे रहे थे।

एक अन्य मुस्लिम यूजर ने अपने ही समाज के लोगों को गाली देते हुए कहा कि जो शांति की बातें करते हुए बाबरी हिन्दुओं को दे देने की बातें कर रहे थे, उनका सिर अब शर्म से झुक जाना चाहिए।

अनीस अहमद ने भी अदालत के उस आदेश पर नाराजगी व्यक्त की, जिसमें शिवलिंग वाली जगह को सील कर के वहाँ लोगों की आवाजाही को प्रतिबंधित कर दिया गया है। उसने दावा किया कि न्यायपालिका और प्रशासन ने मिल कर ऐसे ही बाबरी में नमाज रुकवाई थी। उसने ये भी कहा कि ज्ञानवापी के लिए चरण दर चरण की योजना तैयार की गई है।

हबीब उर रहमान नाम के ट्विटर यूजर ने लिखा, “बाबरी मस्जिद अंत नहीं था, बल्कि ये आतंकवाद की शुरुआत थी। अदालत द्वारा जगह को सील करने का आदेश देना पक्षपात है। ये वजूखाना का तालाब है, शिवलिंग नहीं है। ज्ञानवापी एक मस्जिद है और ये हमेशा एक मस्जिद ही रहेगा।”

AIMIM के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “बाबरी मस्जिद में दिसंबर 1949 में जो हुआ था, उसे ठीक उसी तरह से दोहराया जा रहा है। अदालत का आदेश मस्जिद की मजहबी प्रकृति को बदलने वाला है। ये 1991 के धार्मिक स्थल कानून का उल्लंघन है। ये मेरा डर था और अब ये सत्य होता दिख रहा है। ये मस्जिद था और क़यामत तक ज्ञानवापी मस्जिद ही रहेगा।”

वहीं प्रोपेगंडा पत्रकार और कोविड के नाम पर चंदा जमा कर पचाने की आरोपित राना अय्यूब ने कहा, “उन लिबरल पत्रकारों आवाज़ लगाइए, जिन्होंने बाबरी पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया था और ये कहा था कि ये घृणा की राजनीति का अंत है। तुमलोग सच में इतने नौसिखिए नहीं हो कि शुरुआत को अंत समझ लो। ये सब तुम्हारे कारण हो रहा है मौकापरस्तों और धर्मांधों।”

इसी तरह ‘The Wire’ की आरफा खानुम शेरवानी ने लिखा, “इस रात की सुबह नहीं! 1991 के धर्मस्थल कानून स्पष्ट रूप से हर धर्मस्थल को आज़ादी के वक्त की यथास्थिति में बनाए रखने को कहता है। मौजूदा पीढ़ी पर अत्याचार करने के लिए इतिहास को माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए। इस कानून का उल्लंघन करने वाली याचिकाओं को अदालतें स्वीकार ही क्यों करती हैं?”

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो वाराणसी के विवादित ज्ञानवापी ढाँचे से एक शिवलिंग मिला है, जो बेशकीमती पत्ना पत्थर का बना हुआ है। सर्वे में शामिल एक सूत्र के मुताबिक, “यह वही शिवलिंग है, जिसे अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल ने बनारस के पंडित नारायण भट्ट के साथ मिलकर 1585 में स्थापित कराया था। इस शिवलिंग का रंग हरा है। इसके ऊपर का कुछ हिस्सा औरंगजेब की तबाही में क्षतिग्रस्त हो गया था। इस शिवलिंग का साइज करीब 2 मीटर है। यह देखने में काफी आकर्षक है। शिवलिंग श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में स्थापित नंदी के सामने वाले ज्ञानवापी के हिस्से में है।

महेश बाबू की फिल्म के आगे रणवीर सिंह की ‘जयेशभाई जोरदार’ हुई फेल, 1 वीकेंड की कमाई में ₹150 करोड़ का फासला: रामगोपाल वर्मा ने फिर उड़ाया बॉलीवुड का मजाक

बॉलीवुड बनाम साउथ सिनेमा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। सोशल मीडिया पर खासा एक्टिव रहने वाले डायरेक्टर राम गोपाल वर्मा (Ram Gopal Varma) अक्सर बॉलीवुड की फिल्मों और इस इंडस्ट्री में काम करने वाले कलाकारों पर तंज कसते रहते हैं। इस बार भी निर्माता, निर्देशक ने अपने ट्विटर हैंडल पर हिंदी सिनेमा की बिग बजट फिल्मों के सामने दक्षिण भारतीय फिल्मों की सफलता पर तंज कसा है। उन्होंने ट्वीट किया, “पहला वीकेंड कलेक्शन। हिन्दी में रणवीर सिंह (Ranveer Singh) अभिनीत ‘जयेशभाई जोरदार’ (Jayeshbhai Jordaar) ने कमाए 11.75 करोड़ रुपए। वहीं, महेश बाबू (Mahesh Babu) अभिनीत फिल्म ‘सरकारू वारी पाटा’ (Sarkaru Vaari Paata) ने 135 करोड़ रुपए की कमाई की। “

डायरेक्टर के ट्वीट पर रिप्लाई करते हुए फिल्म क्रिटिक कमाल आर खान उर्फ केआरके (KRK) ने लिखा, “ये 11.75 करोड़ भी फेक हैं। रियल तो 10 करोड़ भी नहीं हैं। पब्लिक ने कुत्ता बना दिया इनको।”

बीते दिनों बॉक्स ऑफिस पर साउथ की फिल्मों को मिल रही कामयाबी से खुश वर्मा ने अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा था, “जिस तरह दक्षिण की फिल्में सिनेमाघरों में कमाल कर रही हैं और उत्तर भारत की फिल्में नहीं चल पा रही हैं, उसे देखकर ऐसा लग रहा है कि बॉलीवुड अब जल्द ही सिर्फ ओटीटी के लिए फिल्में बनाना शुरू कर देगा।”

‘केजीएफ 2’ की सफलता पर बात करते हुए राम गोपाल वर्मा ने हाल ही में लिखा था, “यश स्टारर ‘केजीएफ चैप्टर 2’ की बॉक्स ऑफिस कलेक्शन अन्य सभी सितारों और स्टार निर्देशकों को खत्म करते जा रहा है।” राम गोपाल वर्मा ने ट्वीट किया था, “केजीएफ चैप्टर 2 एक आँधी की तरह है, जो सभी बड़ी फिल्मों के दिग्गजों को निगल रहा है।” इसके बाद निर्माता ने अपने दूसरे ट्वीट में लिखा, “केजीएफ 2 एक काले बादल की तरह है, जो दूसरी सभी बड़ी फिल्मों पर कहर बरपा रहा है। काले बादलों का जाल सभी कलाकारों और निर्देशकों को धीरे-धीरे खत्म कर रहा है।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बॉलीवुड के हाथ इन दिनों केवल निराशा ही लग रही है। एक के बाद फिल्म बॉक्स आफिस पर फुस्स हो रही है। ईद के मौके पर रिलीज हुई ‘हीरोपंती 2’ और ‘रनवे 34 के बुरी तरह फ्लॉप होने के बाद रणवीर सिंह स्‍टारर ‘जयेशभाई जोरदार’ (Jayeshbhai Jordaar) ने भी बॉक्स आफिस पर दम तोड़ दिया है। दिव्‍यांग ठक्‍कर के डायरेक्‍शन में बनी इस फिल्‍म की हालत इतनी पस्‍त है कि यह पहले वीकेंड में 12 करोड़ रुपए भी नहीं कमा सकी है। वहीं महेश बाबू की फिल्म 1 वीकेंड में 160 करोड़ रुपए की कमाई कर चुकी है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस ने बांदीपोरा में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकी मॉड्यूल का किया भंडाफोड़, पाकिस्तान से ट्रेंड आरिफ एजाज सहित 7 गिरफ्तार

जम्मू कश्मीर में सुरक्षाबलों के हाथ बड़ी कामयाबी लगी है। पुलिस ने सुरक्षाबलों के साथ मिलकर बांदीपोरा जिले में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के एक आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया। सुरक्षाबलों ने बांदीपोरा में सात आतंकियों और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार किया है। 

इनके पास से आपत्तिजनक सामग्री, हथियार और गोला-बारूद, और चार दोपहिया सहित छह वाहन जब्त किए गए हैं। पुलिस ने जो हथियार और गोला-बारूद बरामद किया है, उनमें दो पिस्तौल, तीन पिस्टल मैगजीन, 25 पिस्टल राउंड और तीन हथगोले शामिल हैं।

गिरफ्तार किए गए आतंकवादियों में एक पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आए आतंकवादी के अलावा दो हाइब्रिड आतंकवादी और चार आतंकियों के सहयोगी शामिल हैं। पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आए आतंकवादी की पहचान नदिहाल के अनफॉल निवासी आरिफ एजाज शेहरी के रूप में हुई है। शेहरी 2018 में वाघा बॉर्डर के जरिए वैध वीजा पर पाकिस्तान गया था और अवैध हथियार ट्रेनिंग लेने के बाद वापस भारत में घुसपैठ कर गया था और बांदीपोरा में प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर के साथ सक्रिय रूप से काम करना शुरू कर दिया था।

वहीं दो हाइब्रिड आतंकवादियों की पहचान रामपोरा निवासी एजाज अहमद रेशी और गुंडपोरा निवासी शारिक अहमद लोन के रूप में हुई है। गिरफ्तार आतंकवादियों को खास तौर पर बांदीपोरा जिले में पुलिस/सुरक्षा बलों और अन्य आसान ठिकानों पर हमले करने का काम सौंपा गया था।

इसके साथ ही गिरफ्तार किए गए चार आतंकी साथियों की पहचान बांदीपोरा निवासी रियाज अहमद मीर उर्फ मेठा सेहरी, तवहीदाबाद बाग निवासी मोहम्मद वजा उर्फ गुल बाब, चिट्टीबंडी अरागा निवासी मकसूद अहमद मलिक और तवहीदाबाद बाग निवासी शीमा शफी वजा के तौर पर हुई है।

शुरुआती जाँच से पता चला है कि गिरफ्तार आतंकियों के सहयोगी बांदीपोरा जिले में आतंकवादियों को पनाह देने, आतंकवादियों के परिवहन सहित रसद / सामग्री सहायता देने में शामिल थे। गिरफ्तार महिला आतंकवादी सहयोगी बांदीपोरा शहर में वाई-फाई हॉटस्पॉट, आवास और आतंकवादियों को फेरी लगाने में भी शामिल थी। मामले में संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है।