‘अल्पसंख्यक’ का दर्जा मिलने के मामले में जम्मू-कश्मीर का मामला काफी विचित्र और विडम्बनापूर्ण है। वहाँ मुस्लिम समुदाय की संख्या 68.31 प्रतिशत और हिन्दू समुदाय की संख्या मात्र 28.44 प्रतिशत है। लेकिन न सिर्फ केंद्र सरकार बल्कि अब तक की सभी राज्य सरकारों की नज़र में मुस्लिम समुदाय अल्पसंख्यक है। अब तक वही तमाम विशेषाधिकारों और योजनाओं का लाभ लेता रहा है। हिन्दू समुदाय वास्तविक अल्पसंख्यक होते हुए भी संवैधानिक विशेषाधिकारों, संरक्षण और उपचारों से वंचित रहा है।
जम्मू-कश्मीर बहुसंख्यकों को ‘अल्पसंख्यक’ बताने की राजनीति का सिरमौर है। अल्पसंख्यकता की यह उलटबाँसी कॉन्ग्रेस की ‘सेक्युलर’ राजनीति और लेफ्ट-लिबरल गिरोह की ‘प्रोग्रेसिव’ बौद्धिकता की देन है। आज अल्पसंख्यक की इस आधी-अधूरी और समुदाय विशेष को लाभ देने के लिए गढ़ी गई सुविधाजनक परिभाषा की समीक्षा करने और उसे तत्काल दुरुस्त करने की आवश्यकता है। इस परिभाषा और इसके प्रावधानों की आड़ में जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में वास्तविक अल्पसंख्यक (तथाकथित बहुसंख्यक) हिन्दू समुदाय का बहुसंख्यक (तथाकथित अल्पसंख्यक) मुस्लिम समुदाय द्वारा लगातार शोषण-उत्पीड़न किया गया है।
सबसे ज्यादा दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि शोषण, उत्पीड़न, अपमान और उपेक्षा का यह अनंत खेल राज्याश्रय में हुआ। अब इस उलटबांसी को शीर्षासन कराने का अवसर है। जिस वास्तविक अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय का एकाधिक बार नरसंहार हुआ, उसे बार-बार कश्मीर से उजाड़ा और खदेड़ा गया; उसके आँसू पोंछने और न्याय करने का समय आ गया है। यह तभी संभव है जबकि जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं को अविलंब अल्पसंख्यक घोषित करते हुए उन्हें सुरक्षा, सुविधा, सम्मान और संरक्षण प्रदान किया जाए।
सन् 2016 में एडवोकेट अंकुर शर्मा ने जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक घोषित करने के लिए एक जनहित याचिका उच्चतम न्यायालय में दायर की थी। उन्होंने अपनी याचिका के माध्यम से कहा था कि जम्मू-कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। लेकिन वहाँ अल्पसंख्यकों के लिए बनाई गई योजनाओं का लाभ मुसलमानों को मिल रहा है। जबकि वास्तविक अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय उपेक्षित, तिरस्कृत और प्रताड़ित हो रहा है।
उन्होंने मुसलमानों को मिले हुए अल्पसंख्यक समुदाय के दर्जे की समीक्षा करते हुए पूरे भारतवर्ष की जगह राज्य विशेष की जनसंख्या को इकाई मानते हुए अल्पसंख्यकों की पहचान करने और अल्पसंख्यक का दर्जा देने की माँग की थी। न्यायमूर्ति जेएस खेहर, न्यायमूर्ति डीवाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति एसके कौल की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार और राज्य सरकार को आपसी बातचीत द्वारा अविलंब सुलझाने का निर्देश दिया था। लेकिन आज तक इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है।
जम्मू-कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन और विस्थापन का लम्बा इतिहास है। इसकी शुरुआत 14वीं सदी में सुल्तान सिकन्दर बुतपरस्त के समय हुई। उसने तलवार के जोर पर अनेक हिन्दुओं का धर्म-परिवर्तन कराया और ऐसा न करने वालों को या तो मृत्यु का वरण करना पड़ा या फिर अपना घर-बार छोड़कर भागना पड़ा। 14वीं सदी से शुरू हुई विस्थापन की यह दर्दनाक दास्तान 20वीं सदी के आखिरी दशक तक जारी रही।
17वीं सदी में औरंगजेब ने भी वैसे ही जुल्मोसितम की पुनरावृत्ति की। सर्वाधिक चिंता की बात यह है कि आज़ादी के बाद और बावजूद भी यह सिलसिला थमा नहीं। सन् 1947 में भारत विभाजन के अलावा 1947, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1990 के नरसंहार के समय बड़ी संख्या में या तो हिन्दुओं की संगठित रूप से निर्मम हत्याएँ हुईं या फिर उन्हें कश्मीर से भगा दिया गया।
उल्लेखनीय है कि यह खूनी खेल भारत सरकार की प्रचलित परिभाषा के अनुसार “अल्पसंख्यकों” ने खेला। इस क्रमिक नस्लीय सफाए का परिणाम यह हुआ कि सनातन संस्कृति की सुरम्यस्थली और भारत की ज्ञानभूमि कश्मीर में हिन्दू समुदाय के लोग मुट्ठी भर ही रह गए। जम्मू-कश्मीर से कम-से-कम सात बार गैर-मुस्लिमों का विस्थापन हुआ है। जबरिया धर्मान्तरण और विस्थापन का सिलसिला शुरू होने से पहले जम्मू-कश्मीर में मुस्लिम समुदाय की संख्या उतनी ही नगण्य थी, जितनी कि आज कश्मीर घाटी में गैर-मुस्लिम समुदाय की रह गई है।
यह विचारणीय तथ्य है कि बाहर से आने वाले मुट्ठीभर अरब, तुर्क और मंगोल आक्रान्ताओं की संख्या आज इतनी ज्यादा क्यों और कैसे हो गई? अगर जम्मू-कश्मीर में जम्मू न होता तो हिन्दुओं का क्या हश्र हुआ होता; इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।
जनवरी 1990 की सर्द अँधेरी रातों में घाटी की गलियों और मस्जिदों में अज़ान नहीं “रालिव, गालिव, चालिव” की शैतानी आवाजें गूँजती थीं। इस एक महीने में ही लाखों हिन्दुओं को या तो अपने प्राण गँवाने पड़े या फिर जान बचाने के लिए भागना पड़ा। वे अपने ही देश में शरणार्थी बनने को विवश थे।
‘द कश्मीर फाइल्स’ नामक फिल्म में जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं के अल्पसंख्यक बनने की कहानी दर्शायी गई है। लेकिन यह विडम्बनापूर्ण ही है कि जो अल्प-संख्यक बना दिए गए, उन्हें सरकार की ओर से कोई संरक्षण, सुरक्षा या विशेषाधिकार नहीं दिया गया। क्या यह संविधान की मूल भावना से खिलवाड़ नहीं था?
आज भी अगर क्रमिक नस्लीय संहार के शिकार रहे गैर-मुस्लिम समुदाय जब घरवापसी करना चाहते हैं तो इस्लामिक आतंकी और उनके आका घाटी में खून की होली शुरू कर देते हैं; ताकि जम्मू-कश्मीर का जनसांख्यिकीय संतुलन उनके पक्ष में रहे। वे (जम्मू-कश्मीर में) बहु-संख्यक भी बने रहना चाहते हैं और (भारत की जनसंख्या के आधार पर केंद्र और राज्य सरकार द्वारा अल्पसंख्यकों को दिए जाने वाले विशेषाधिकारों) के फायदे भी लेते रहना चाहते हैं। यह ‘जम्मू-कश्मीर के अल्पसंख्यकों’ की असली कहानी है। यहाँ शिकारी को ही संवैधानिक संरक्षण और सरकारी प्रश्रय मिला हुआ है।
उल्लेखनीय है कि कश्मीर की तर्ज पर जम्मू क्षेत्र में भी सत्तारूढ़ पार्टियों- मुस्लिम/नेशनल कॉन्फ्रेंस, कॉन्ग्रेस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा हिन्दुओं को ‘अल्पसंख्यक’ बनाने की साजिश की गई। आज़ादी से लेकर 2019 तक जम्मू-कश्मीर के सभी मुख्यमंत्री मुस्लिम समुदाय से ही हुए हैं। शेख अब्दुल्ला से शुरू होने वाली यह कड़ी महबूबा मुफ़्ती पर आकर टूटती है।
म्यांमार के रोहिंग्याओं और बांग्लादेशी घुसपैठियों को जम्मू में साजिशन बसाया गया; ताकि यहाँ की जनसांख्यिकी को बदला जा सके। जम्मू के भटिंडी जैसे इलाके जम्मू की जनसांख्यिकी को बदलने की साजिशों के सबूत हैं।
रोशनी एक्ट के अंधेरों से भी हम सब परिचित हैं। रोशनी एक्ट का वास्तविक नाम ‘जमीन जिहाद’ है। इस एक्ट के तहत सरकारी जमीन को कौड़ियों के दाम समुदाय विशेष के पात्र-अपात्र व्यक्तियों को बाँटा गया। इस बंदरबाँट से न सिर्फ सरकारी खजाने को लूटा गया; बल्कि जम्मू संभाग की जनसांख्यिकी को भी बहुत नुकसान पहुँचाया गया। इकजुट जम्मू जैसे संगठनों ने जम्मू की जनसांख्यिकी को बदलने की सुनियोजित साजिशों के पर्दाफाश में अहम भूमिका निभाई है।
जिस प्रकार केरल के ‘अल्पसंख्यकों’ ने अपने धर्म के फैलाव और वर्चस्व के लिए लव जिहाद, नारकोटिक जिहाद और मार्क्स जिहाद का सहारा लिया है; उसी प्रकार जम्मू-कश्मीर के ‘अल्पसंख्यकों’ ने जम्मू की जनसांख्यिकी को बदलने के लिए जमीन जिहाद का सहारा लिया है। न सिर्फ जम्मू-कश्मीर के सभी मुख्यमंत्री मुस्लिम समुदाय से हुए हैं; बल्कि यहाँ की उच्चपदस्थ नौकरशाही, सरकारी अमले और सांसद-विधायकों का बहुसंख्यक हिस्सा मुस्लिम समुदाय से रहा है। यहाँ के उद्योग-धंधे, कारोबार-व्यापार और बाज़ार पर भी मुस्लिम समुदाय का ही एकछत्र राज रहा है।
फिर वे अल्पसंख्यक कैसे हैं? उन्हें किस प्रकार का संकट या असुरक्षा है? उन्हें किससे और क्या खतरा है? जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य में उन्हें अल्पसंख्यक मानते हुए विशेषाधिकार देना, उनके संरक्षण और विकास के लिए तमाम योजनाएँ बनाना, अल्पसंख्यक संस्थाएँ खोलना इस संवैधानिक प्रावधान का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है?
सही गलत की परिभाषा… जिस तरह समाज में नैतिकता के आधार पर, परिवार में विश्वास के आधार पर तय होती हैं, वैसे ही कोर्ट में ये परिभाषा सबूत के आधार पर निर्मित होती हैं। ये प्रक्रिया आज-कल में नहीं बनी। सालों से कोर्ट इसी बुनियाद पर अपने फैसले देता आया है। सबूत माँगने के पीछे वजह ये नहीं होती कि देश की न्याय व्यवस्था पीड़ित की शिकायत पर संदेह कर रही है। इसका मकसद सिर्फ इतना होता है कि किसी निर्दोष के साथ गलती से भी अन्याय न हो जाए।
मैरिटल रेप को लेकर इस समय जो देश में बहस चल रही है उसका कारण यही है- सबूत।
पहले एक पक्ष आता है जो माँग उठाता है कि शादीशुदा औरतों के साथ यदि उनका पति जबरन संबंध बनाए तो उसे रेपिस्ट करार देकर वही सजा मिले जो एक बलात्कारी की होती है। इस माँग के लिए ये पक्ष लंबे समय तक आवाज उठाता है, अपनी याचिकाएँ डालता है और अंत में दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले पर विधिवत सुनवाई करती है।
इस बीच एक दूसरा पक्ष भी आता है जो ये सवाल करता है कि अगर आप जबरन संबंध बनाने के आरोप में पति के लिए बलात्कारी सरीखी सजा चाहती हैं तो फिर इसमें सबूतों का आधार क्या होगा। क्या शादीशुदा औरत द्वारा लगाया गया इल्जाम काफी होगा या फिर कोर्ट के सामने कोई सबूत भी पेश किए जाएँगे कि पति ने सच में रेप किया? किस तरह से औरत के अधिकार धारा 375 के अपवाद 2 मात्र के हट जाने से संरक्षित होंगे और कैसे कोई निर्दोष पुरुष इस कानून का शिकार नहीं होगा?
अब आप कितनी ही दलील देकर इन बातों को साबित करें कि ये सवाल पितृसत्ता की उपज हैं और महिलाओं के साथ भेदभाव को बढ़ावा देने का प्रयास… लेकिन उन तमाम उदाहरणों को दबाना असम्भव है जो ये बताते हैं कि इस समाज में पुरुष भी मानसिक, सामाजिक, और भावनात्मक तौर पर गलत इल्जाम लगने से पीड़ित होते हैं और उनके पास कोई सबूत तक नहीं होता जो वो अदालत में पेश करके अपनी बेगुनाही को साबित कर सकें। नतीजन उन्हें तब तक सजा भोगनी पड़ती है जब तक कोई मसीहा उन्हें निर्दोष न करार दिलवा दे।
माँग पर संदेह क्यों? क्यों नहीं आ पाया दिल्ली हाईकोर्ट से फैसला?
आज हम एक कानून के लिए बहस कर रहे हैं जो विवाहित महिलाओं को अधिकार देगा कि वो पति को अपने विवेक के आधार पर समाज में बलात्कारी कह सकें… लेकिन इसी दौरान, हम ये सोचने से क्यों कतरा रहे हैं कि जब हर अपराध की सजा सबूत पर तय होती है तो फिर इस अपराध के लिए सबूत माँगने वाले गलत या नारीविरोधी कैसे हैं।
ये मत भूलिए कि हम अब भी उसी समाज का हिस्सा हैं जहाँ आधुनिक होते-होते भले ही तमाम तरह की हिचक को अधिकार के नाम पर खत्म कर दिया गया, लेकिन ‘सेक्स’ अब भी वो चीज है जो पति-पत्नी के बीच बंद कमरे में ही होता है। ऐसे परिवेश में फर्ज कीजिए कि कोई महिला शादी के कुछ सालों बाद दुनिया के सामने पति पर इल्जाम लगाए कि उसका बलात्कार हुआ है और वो चाहती है कि उसके पति को सजा देकर उसे न्याय मिले।
बताइए, ऐसी स्थिति में क्या है ऐसी कोई तकनीक, व्यवस्था या तंत्र… जो जाँच के दौरान महिला के बयान के अतिरिक्त ये पता लगा पाए कि शादी के बाद पति ने पत्नी के साथ कितनी बार मर्जी से सेक्स किया और कितनी बार जबरन…। ये सब केवल और केवल बयान पर निर्धारित होने वाला है, वो भी बिना दूसरे पक्ष की बात सुने, बिना ये सोचे कि ये इल्जाम दुर्भावना के चलते भी लगाए जा सकते है।
ध्यान रहे, बलात्कार कोई छोटा-मोटा इल्जाम नहीं है। हमारे समाज की मानसिक बनावट ऐसी है कि लोग बलात्कार का आरोप लग जाने मात्र से इंसान को घृणित नजरों से ही देखते हैं और समाज में जो थू-थू होती है वो अलग। कोई नहीं चाहता कि शादी के बाद भी उसे ये डर हो कि अपने साथी के साथ सेक्स करने पर उसे बलात्कारी बनाए जाने की संभावनाएँ हैं।
हो सकता है ये बातें थोड़ी अजीब हों। मगर दिल्ली हाईकोर्ट से भी अगर इस मुद्दे पर एकमत फैसला नहीं आ पाया तो उसका कारण यही है कि लोग समझ नहीं पा रहे कि जो माँग नारीवादी समूहों द्वारा की जा रही है, उसे यदि मान लिया जाए तो दूसरे पक्ष को सुनने के क्या विकल्प होने वाले हैं। क्या ऐसा कोई अधिकार पुरुष को मिलेगा कि अगर उसपे लगे इल्ज़ाम फर्जी निकलें तो पूरा समाज इकट्ठा होकर उसकी छवि को दोबारा बनाने के प्रयास करेगा जो एक आरोप मात्र से तार-तार हो गई या क्या ऐसे किसी कानून पर विचार हो रहा है कि पुरुष भी सामने आकर बता सके कि कितनी बार बिन इच्छा के उसके साथ बंद कमरे में संबंध बनाए गए या कितनी बार संतुष्ट न कर पाने के कारण उन्हें बिस्तर पर शर्मिंदा किया गया।
शायद नहीं… हम लोग इन पहलुओं पर बात ही नहीं कर रहे हैं। हम एकतरफा नारीवाद की नाव में चढ़ कर वो दुनिया चाहते हैं, जहाँ महिला सशक्तिकरण का अर्थ ऑर्गेस्म पर चिंतन तक सीमित रह जाए और बराबरी की माँग के नाम पर अपने हित में सारे कानून बनते जाएँ।
सोचिए कि हम कब इस बात पर चर्चा करेंगे कि जिस तरह से महिलाओं के अधिकारों के लिए महिला आयोग है वैसे पुरुष आयोग पर बात तक क्यों नहीं है जबकि पीड़ित वह भी बराबर हैं। हम कब इस बात को स्वीकार करेंगे कि जैसे हमबिस्तर होते समय पुरुष की इच्छाएँ होती है वैसे ही स्त्री की भी कुछ इच्छा होती है जिसके पूरा न होने पर खीझ इतनी होती है कि बात तलाक तक आ जाती है।
खबर की हेडलाइन का स्क्रीनशॉट
साल 2016 में एक खबर सामने आई थी कि पति अपनी पत्नी को सेक्स के दौरान संतुष्ट करने में नाकाम हुआ तो पत्नी ने उसे तलाक दे दिया। घटना मुर्शिदाबाद की थी। जिसमें लड़की के घरवालों ने ही लड़की को कहा था कि अगर उसकी यौन जरूरतें नहीं पूरी हो पा रहीं तो वो तलाक ले ले। अब इस खबर को पढ़िए और दो बार पढ़िए। फिर खबर के कैरेक्टर को उलटा करके सोचिए क्या कोई पुरुष अपने सेक्सुअल डिजायर न पूरी होने पर इस कदम को उठा पाए कानून इतनी आजादी उसे देता है या समाज उसे इतना हक देती है… नहीं। अरे हम तो इस बात पर भी नहीं सोचते हैं कि जैसे महिला रेप की शिकार है पुरुष भी तो हो सकता है।
हाल में इस संबंध में वास्तव फाउंडेशन ने सोचा और एक ऑनलाइन सर्वे करवाया गया। इस सर्वे की प्रमाणिकता क्या है ये नहीं कही जा सकती। लेकिन इसमें शामिल 87 फीसद मर्दों ने माना था कि वो भी जबरन सेक्स, मैरिटल रेप, यौन हिंसा या इच्छा के बिना पत्नी के साथ संबंध बनाने को फेस कर चुके हैं।
आज कोई भी निर्णय लेने से पहले हमें सोचना होगा कि पति को अचानक से बलात्कारी बताने का नॉर्म भारत में इतनी जल्दी कूल नहीं होने वाला। ये कोई संज्ञा या विशेषण भर नहीं है। इसके जुड़ते ही दुनिया भर की घृणा उस व्यक्ति के हिस्से आने लगेगी जिसकी अपेक्षा शायद उसने आजीवन नहीं की होती। कई बार शर्मसार होकर उसे जान तक देनी पड़ती है।
पुरुषों पर लगाए गलत इल्जामों के चंद उदाहरण
इतने के बावजूद आपको दूसरे पक्ष पर यकीन नहीं करना मत करिए। उन्हें पितृसत्ता का वाहक बताना है बताइए। लेकिन सवाल करिए खुद से कि क्या आप राहुल अग्रवाल के बारे में जानते हैं? उस राहुल के बारे में जिसके ऊपर उसकी पत्नी ने 498-ए धारा लगवाई हुई थी।
राहुल को लगातार अपनी पत्नी और ससुराल वालों से प्रताड़ना मिल रही थी और बच्चों से भी बात करने का उसके पास कोई रास्ता नहीं था। उसने छत से कूद कर सुसाइड इसलिए नहीं की क्योंकि वो एक इल्जाम लगने से आहत हो गया। उसने आत्महत्या इसलिए की क्योंकि उसके पास सबूत नहीं था अपनी बेगुनाही का। अपने सुसाइड नोट में राहुल लिखकर गए हैं कि साल 2020 में ही उनसे एक साइन करवाया गया था जिसमें लिखा था कि ससुराल वाले लोग राहुल की सुसाइड के जिम्मेदार नहीं होंगे। अब सोचिए प्रताड़ना किस हद्द तक दी जानी थी जो पहले ही अनुमान थे कि व्यक्ति आत्महत्या भी कर सकता है।
राहुल की सुसाइड नोट
अगला मामला अरविंद भारती का है। अरविंद ने अपनी जीवन को खत्म किया क्योंकि उसे उसकी पूर्व पत्नी ऋचा दहेज के केस में पहले फँसा चुकी थी और उस मामले में राहत मिलने के बाद भारती को रेप केस का मामला डाल दिया था। भारती की गलती इतनी थी कि ऋचा से तलाक के बाद दोबारा शादी चाहते थे लेकिन ऋचा ये कहने पर अड़ी थी कि वो अगर तू मेरा नहीं हुआ तो किसी का नहीं होगा। ऋचा की एक शिकायत ने अरविंद को 15 दिन जेल में डाले रखा, बिना इस जाँच के कि जो आरोप लगाए गए हैं वो सही हैं भी या नहीं। आए दिन समाज में जलील होना अरविंद नहीं सह पाए और आखिर में कानून को महिला के आगे बौना बताकर मौत को गले लगा लिया।
दीपिका भारद्वाज की वीडियो से लिया गया स्क्रीनशॉट
एक और केस देखिए। मुंबई का है। 2017 में 24 साल के एक लड़के पर 16 साल की लड़की से रेप करने के इल्जाम लगे। लड़के ने बार-बार खुद को बेगुनाह बताया। मगर केस चलता रहा क्योंकि लड़की प्रेगनेंट थी और घरवालों के बार-बार पूछने पर उसने 24 साल के लड़के का नाम लेकर कहा था कि वो उसके साथ संबंध में थी। लड़के को उसी साल पुलिस ने गिरफ्तार भी कर लिया। बाद में डीएनए जाँच ने ये साबित किया कि जिस लड़के को आरोपित बताया गया था उसका कभी नाबालिग के साथ कोई शारीरिक संबंध था ही नहीं। लड़की ने सिर्फ खुद को बचाने के लिए उस लड़के पर झूठा इल्जाम लगाया था।
3 RAPE cases on 3 different MEN in 1 YEAR
5 RAPE cases filed in total
A Married woman in JABALPUR has been misusing rape laws with elan saying no police or court or judge can do anything
— Deepika Narayan Bhardwaj (@DeepikaBhardwaj) May 9, 2022
हरियाणा के हिसार में बलबीर नामक एक व्यक्ति ने ट्रेन के आगे कूदकर जान दी थी। कारण था उसके बेटे के ससुराल वाले उसे रेप के झूठे केस में फँसाने की धमकी देते थे। परेशान होकर बलबीर ने आत्महत्या कर ली। इससे पहले बलबीर की पत्नी भी अपनी बहू के रोज-रोज झगड़ों से तंग आकर एक साल पहले आत्महत्या कर चुकी थी।
इसी तरह हाल में पुरुष अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली दीपिका नारायण भारद्वाज ने जबलपुर की एक महिला के विरुद्ध केस दर्ज किया था। ये महिला 1 साल में तीन लोगों के ऊपर 3 रेप केस दर्ज करवा चुकी है और 2016 से लेकर अब तक उसने कुल मिलाकर पुरुषों पर 5 रेप केस दर्ज करवाए हैं। सबसे दिलचस्प बात ये है कि ये महिला रेप की धारा में केस दर्ज करवाने के बाद आरोपित पुरुष के साथ चैटिंग करती है और उसे ‘वन मोर शॉट’ कहकर उकसाती भी है। ये स्क्रीनशॉट भी दीपिका ने अपने ट्विटर पर शेयर किया है।
अब आप सोचिए आप तैयार हैं क्या ये दावा करने के लिए कि धारा 375 से अपवाद हटने के बाद इसका दुरुपयोग नहीं होगा… कोई भी फैसला सुनाने से पहले एक बार भारतीय परिप्रेक्ष्य में चीजों को समझें, फिर अपना फैसला लें। नारीवादी समूह इस बात को मान रहा है कि शादीशुदा महिला के साथ जबरन संबंध बनाना अपराध घोषित हो यही समस्या का समाधान है। लेकिन वो ये जवाब नहीं दे रहा कि पुरुष ने जबरन संबंध बनाए या नहीं ये बात कैसे साबित होने वाली है।
क्या भारतीय समाज तैयार है पति को बलात्कारी बनाने के लिए?
हमें कोई भी कानून को लाने से पहले ये बात समझनी होगी कि हम और आप उस समाज का किस्सा हैं जहाँ शादी के बाद सेक्स को न केवल कानूनन और सामाजिक तौर पर लीगल माना जाता है बल्कि मानसिक तौर पर इसे एक अधिकार समझ लेने का काम सदियों से व्यवहार में है। एक ऐसा मानसिक अधिकार जिसे लेकर व्यक्ति मानता है कि समाज का कोई व्यक्ति, परिवार का कोई सदस्य, उसे करने से नहीं रोकेगा… आप ऐसी व्यवस्था को एकदम से उखाड़ नहीं सकते… ये एक कड़वी सच्चाई है और इस कानून को लाने से जटिलताएँ होने वाली हैं इस बात में भी कोई संदेह नहीं है। अगर इस दिशा में कदम उठाना ही है तो सबसे पहले मानसिक शुद्धिकरण अनिवार्य है।
मानसिक शुद्धिकरण पहला उपाय
हाल में एनएफएचएस का एक डेटा आया है। 66 % पुरुषों ने इस बात को कहा है कि उन्हें इससे कोई समस्या नहीं है अगर उनकी पार्टनर थकान के कारण या किसी और वजह से सेक्स के लिए राजी न हो। इसके अलावा 80% से ज्यादा महिलाएँ भी मानती हैं कि अगर वो सेक्स के लिए मना करती हैं तो ये उनके पार्टनर के लिए ठीक है। इसमें समस्या नहीं है। केवल 8 फीसद महिलाएँ और 10 फीसद पुरुष ऐसे देखने मिलते हैं जिनके लिए सेक्स से इनकार करना एक बड़ा मुद्दा वरना बाकी इस बिंदु को सामान्य मानते हैं।
अब ये एनएफएचएस के आँकड़ों का जिक्र यहाँ इसलिए जरूरी है ताकि ये बात पता चले कि स्त्री-पुरुष उस राह पर आगे बढ़ रही है जहाँ बिस्तर पर अपने पार्टनर की सहमति उनके लिए जरूरी है। ये आँकड़ें समय के साथ बढ़ें और महिलाएँ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों यही समस्या के समाधान की ओर आगे बढ़ने में एक कदम होगा। क्योंकि फिलहाल, विकासशील भारत इतना परिपक्व नहीं है कि वो मैरिटल रेप का अर्थ भी समझ पाएँ या महिला ये जान पाए कि इसका प्रयोग कैसे और कहाँ होना है।
घरेलू हिंसा मामले तक में अभी तक औरतों ने सही से आवाज उठानी शुरू नहीं की है। उनकी जागरूकता का स्तर इतना है कि 45% को लगता है कि उनके साथ होने वाली मारपीट सही है। ऐसे में वो मैरिटल रेप जैसे मामलों में कैसे निर्णय लेंगी? जाहिर है कि किसी न किसी से प्रभावित होकर। अब सवाल है कि क्या जो व्यक्ति मैरिटल रेप का केस दर्ज कराने के लिए महिला को प्रेरित करेगा वो उस परिवार को समझेगा या फिर महिला को एक क्लाइंट और उसके बयान को सब्जेक्ट के तौर पर लेगा।
आप अपने ईर्द-गिर्द के समाज को देखेंगे तो पाएँगे कि देश में आज भी बड़ी संख्या में शादियाँ होती हैं जहाँ लड़का-लड़की रिश्ता तय होने से पहले एक दूसरे को जानते तक नहीं है। लेकिन मन में जो बात स्पष्ट होती है वो ये कि उस अंजान के साथ सेक्स उनके लिए समाज में शादी के बाद वैध होगा…। सोचिए ऐसी मानसिकता वाले लोग एकदम से कहाँ से बुद्धिजीवियों वाला दिमाग पाएँगे। उन्हें तो सुधारने के लिए सही-गलत उनकी चेतना में ही डालना जरूरी होगा। वरना आधा समाज पीड़ित और आधा बलात्कारियों में वर्गीकृत हो जाएगा।
सालों से एक दिशा में पोषित मानसिकता को चुनौती मानकर यदि आप समाज में सुधार की अपेक्षा करते हैं तो शायद इससे फर्क व्यापक स्तर पर आपको दिखेगा। लेकिन अचानक से! शायद ही ऐसा संभव हो। जिस फैसले की माँग कोर्ट से की जा रही है वो सिर्फ तथाकथित नारीवादी सिद्धांत पर कदमताल करने के लिए उचित है । इसमें पति को बलात्कारी बना देने के अधिकार की माँग के अलावा कोई और पहलू नहीं देखा जा रहा जबकि जस्टिस शकधर जिन्होंने इस माँग को लागू करने का के लिए समर्थन दिया है उन्होंने भी अपने बयान में ये बात जोड़ी है कि रेप कानून जेंडर न्यूट्रल होने चाहिए। उन्होंने कहा है कि इसके लिए विधायिका और कार्यपालिका को सोचना चाहिए। उन्होंने एक तरफ झुक कर बिलकुल नहीं कहा है कि जो माँग नारीवादी उठा रहे हैं वो उचित हैं।
अगर वाकई हम समस्या पर गंभीरता से अग्रसर होना चाहते हैं तो पहले युद्ध स्तर पर जागरूकता अभियान छेड़ना होगा। न केवल पुरुषों को महिलाओं की असहमति का सम्मान करना सिखाना होगा या महिलाओं को उनके स्वास्थ्य व अधिकारों के प्रति सचेत करना होगा बल्कि समाज के जहन में भी ये बात डालनी होगी कि मैरिटल रेप जैसी चीजें मानवाधिकार के विरुद्ध हैं। वरना यही समाज महिला से प्रश्न कर-करके, उसकी व्यथा को समझे बिना उनकी अस्मत पर सवाल खड़ा करके हँसता रहेगा।
ये सारी पृष्ठभूमि समझनी और समझाने के बाद भी ये सुनिश्चित करना होगा कि इस नए अधिकार का प्रयोग महिलाएँ सही दिशा में करेंगी और झूठे इल्जाम लगाने वालों को कोई माफी नहीं मिलेगी। अगर ऐसा किए बिना एकाएक पुरुष विरोधी कानून को अस्तित्व में लाया जाता है तो केवल और केवल ये एक कुत्सित प्रयास माना जाएगा उन नारीवादियों द्वारा जो शादी को संस्था मानती हैं और पति-पत्नी को उस संस्था का सदस्य जिसकी सदस्यता वो मनमुताबिक छोड़ सकता है। उनका ये जाहिर करना कि उन्हें महिलाओं की चिंता है और दूसरा पक्ष इस पर विचार तक नहीं कर रहा…एक तरह से भ्रमित करने वाली बातें है। भारतीय कानून में ऐसी धाराएँ हैं जो छोटी बच्ची से लेकर युवा लड़की और शादीशुदा महिलाओं के अधिकारों को संरक्षित करने के लिए बनाई गई हैं। इनके अलावा वो धाराएँ भी हैं जो विवाहित महिला के साथ होने वाली घरेलू हिंसा और यौन हिंसा को डील करती हैं… इसलिए ये कहना गलत है कि महिला के विरुद्ध हो रहे अपराधों पर संज्ञान नहीं लिया जा रहा।
धाराएँ: प्रयोग और दुरुपयोग
महिलाओं के विरुद्ध घरों में होने वाली हिंसा एक ऐसी क्रूर सच्चाई है जिससे कोई मुँह नहीं मोड़ सकता। संविधान ने ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए ही तमाम धाराएँ बनाई हैं। अगर महिला हिंसा का शिकार होती है तो उसे न्याय कैसे मिलेगा इसके लिए प्रोटेक्शन ऑफ वूमेन एंड डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट, 2005 जैसे कानून हैं और आईपीसी की 354, 377, 376-बी, 498-ए जैसी धाराएँ हैं।
धारा 354 छेड़खानी, लज्जा भंग करने वाले के विरुद्ध आपको आवाज उठाने का अधिकार देती है। 377 धारा कहती है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी के साथ अप्राकृतिक सेक्स करता है और उसे इससे आपत्ति है तो वो इसके विरुद्ध भी शिकायत दे सकती है। इसी तरह धारा 376 बी अधिकार देती है कि अगर कोई पति-पत्नी अलग रहने का मन बना चुके हैं या रह रहे हैं तो फिर पति का अपनी पत्नी से संबंध बनाना बलात्कार की श्रेणी में आएगा। जिसके लिए पति को 2 से 7 साल की सजा हो सकती है।
इसके अलावा एक धारा और भी है- 498-ए। ये धारा महिलाओं को उनके उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाई गई थी। इसके तहत शादीशुदा महिला को अधिकार दिया गया था कि अगर महिलाओं को उनके ससुराल में उनके पति या ससुराल वालों से किसी भी क्रूरता का सामना करना पड़ता है तो वो उनके विरुद्ध शिकायत दर्ज कर सकती हैं। हालाँकि समय के साथ इसका गलत प्रयोग हुआ। कई मामले सामने आए जब पति पक्ष को इस धारा के कारण कानूनी और सामाजिक प्रताड़नाएँ झेलनी पड़ीं। ऊपर जिस राहुल अग्रवाल का जिक्र किया है। वो इसी धारा के कारण प्रताड़ित किए गए और उन्होंने अंत में मौत को गले लगा लिया।
साल 2014 में अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य जजमेंट में कोर्ट ने माना भी था कि महिला इस धारा का दुरुपयोग कर रही है। अदालत ने चिंता जाहिर की थी इन धाराओं का गलत इस्तेमाल करके झूठे-झूठे केस दर्ज होते हैं। फिर परिवार की गिरफ्तारी तुरंत हो जाती है। इस धारा के दुरुपयोग को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि धारा के तहत दर्ज केस में तब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हो जब तक कि जाँच पूरी नहीं होती।
मैरिटल रेप का दुरुपयोग तो नहीं करेगा समाज?
आज तमाम पुरुष हैं जो जेंडर न्यूट्रल कानून न होने के चलते पीड़ित हैं। तमाम मामले हमारे सामने उदाहरण के तौर पर मौजूद हैं कि पति-पत्नी के विवाद में पति को और उसके घरवालों को सबक सिखाने के लिए आईपीसी की धाराओं का गलत प्रयोग किया गया और बिन किसी जाँच परख के पुरुष पक्ष पीड़ित होता रहा। अब आगे जब वैवाहिक रिश्ते में बलात्कार के कानून को जोड़ने की बात हो रही है तो ये ध्यान देना जरूरी है कि कहीं अगर एक अपवाद मात्र के हटने से एक इंसान को आपसी द्वेष के चलते बलात्कारी बना दिया गया और उसे सजा देकर जेल में डाल दिया गया तो उसके जीवन की भरपाई कौन करेगा। मौजूद धाराओं का गलत इस्तेमाल पहले ही उन पुरुषों को मानसिक तौर पर प्रताड़ित करने में खूब भूमिका निभा रहा है। क्या इस तरह अचानक से मैरिटल रेप का कॉन्सेप्ट स्थिति सुधारने की बजाय स्थिति को भयावह बनाना नहीं होगा।
ऑपइंडिया ने इस संबंध में पीड़ित पुरुषों की आवाज उठाने वाली कार्यकर्ता व पत्रकार दीपिका नारायण भारद्वाज से बात की। उन्होंने बताया कि वर्तमान में पत्नी के साथ जबरन संबंध बनाने वाले पति को बलात्कारी करार दिए जाने के लिए धारा 375 के अपवाद को खत्म करने की जो माँग उठाई जा रही है वो ग्राउंड रिएलिटी को देखकर नहीं लगती। ऐसा नहीं है कि यौन हिंसा का शिकार शादीशुदा महिलाओं के लिए कानून नहीं हैं। कानून हैं। लेकिन फिर भी अगर ये लोग चाहते हैं कि अपवाद खत्म करके जबरन संबंध बनाने वाले पतियों पर कार्रवाई हो तो हर पहलू को देखते हुए सोच-समझकर एक नया कानून बने तभी ठीक होगा। जो अपवाद धारा 375 का है उसे कुछ सोच समझ कर अपवाद बनाया गया था। इसे हटाना ठीक नहीं है। पहले ही कई कानूनों का दुरुपयोग हम समाज में देख रहे हैं।
इसी तरह सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अजय दत्ता की इस मुद्दे पर कहते हैं, “मैरिटल रेप बहुत संवेदनशील विषय है। विधि विशेषज्ञों को इस पर और ज्यादा सोचने की जरूरत है। एक स्त्री की इच्छा के विरुद्ध सेक्स रेप होता हैय़ पति-पत्नी के रिश्ते की बुनियाद में शारीरिक संबंध भी होते हैंय़ यह सच है कि सेक्स के लिए पत्नी की सहमति अनिवार्य होनी चाहिए, जबरन शारीरिक संबंध नहीं बनाए जाने चाहिए। पर इसे जुर्म की कैटेगरी में रखना अभी जल्दबाजी होगी जब तक की देश इतना प्रगतिशील न हो जाए कि उसे सहमति का अर्थ समझ में आए।”
क्या मैरिटल रेप को नकारना महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को नकारना है?
इस पूरे मुद्दे पर इतनी बातचीत के बाद ये स्पष्ट हो जानी चाहिए कि यौन हिंसा-शारीरिक हिंसा पर बोलना और मैरिटल रेप पर बोलना दो अलग बातें हैं। जब सेक्सुअल वायलेंस या फिजिकल वायलेंस पर कोई अपनी राय रखता है तो उसे ये बात स्पष्ट होती है कि पति हो या पत्नी, शादी के बाद भी किसी को ये अधिकार नहीं दिया जाता है कि वो अपने साथी पर हाथ उठाए। अगर इसके बावजूद ऐसा होता है और उसपर संज्ञान लेकर आरोपित के विरुद्ध कार्रवाई होती है। इसके गवाह सिर्फ घरवाले, बाहरवाले नहीं होते बल्कि शरीर पर छूटे घाव के निशान भी होते हैं जो साबित करते हैं कि हिंसा को अंजाम दिया गया है। इसके उलट मैरिटल रेप में कोई स्थिति स्पष्ट नहीं है। शादी के बाद सेक्स होता है इसे पूरी दुनिया जानती है लेकिन बंद कमरे में वो सहमति से हुआ या असहमति से इसके गवाब सिर्फ दो लोग होते हैं। जिसमें एक पक्ष दूसरे को दोषी बताता है और दोषी खुद को निर्दोष। ऐसी जटिल परिस्थिति में बिन सबूत के निर्णय कैसे लिया जाना ये सवाल उठना लाजिमी है।
IPL में पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों (Pakistan Cricket) की एंट्री बंद होने और आतंकवाद के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का सामना करने वाली पाकिस्तान की क्रिकेट टीम की तारणहार आजकल एक सट्टेबाज कंपनी है। भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले 10 सालों से कोई क्रिकेट मैच नहीं हुआ है, लेकिन वहाँ की घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट PSL (पाकिस्तान सुपर लीग) 2021 को एक ऐसी कंपनी स्पॉन्सर किया, जो अपना मुनाफा भारत से कमाती है। बता दें कि IPL में सट्टेबाजी को लेकर पाकिस्तान से जुड़े फिक्सिंग नेटवर्क को लेकर शनिवार (14 मई 2022) को CBI ने दो FIR दर्ज की है।
PSL की वर्तमान स्पॉन्सर कंपनी है Sky247.net, जो क्रिकेट सट्टेबाजी का काम करती है। भारत में चलने वाले कई सट्टेबाजी ऐप में से एक Sky247 भी है। इस एप का संचालन वेस्टइंडीज (West Indies) के क्यूराको द्वीप से किया जाता है और वैश्विक स्तर पर क्रिकेट में ऑनलाइन सट्टेबाजी का खेल खेलाया जाता है। कहा जाता है कि इस ऑनलाइन सट्टेबाजी ऐप के 70 प्रतिशत ग्राहक भारतीय हैं। इस तरह का अधिकांश रेवेन्यू भारतीयों ग्राहकों से मिलता है। इस कंपनी का वैल्यू 2640 करोड़ रुपए है।
PSL के अलावा, यह पाकिस्तान के एक अन्य अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान भी यह कंपनी प्रायोजक थी। पिछले साल पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका के बीच अबूधाबी में T-20 सीरीज की प्रायोजक भी यही कंपनी थी। इसके अलावा भी इस कंपनी कई क्रिकेट मैचों का स्पॉन्सर किया।
नई दुनिया की रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो साल में Sky247 ने लंका प्रीमियर लीग के साथ-साथ UAE और आयरलैंड के बीच खेली गई टी-20 सीरीज और कई टी-10 सीरीज की प्रयोजक रही है। इसके अलावा, भारतीय क्रिकेट के श्रीलंका दौरे की भी सट्टेबाजी की यही कंपनी प्रायोजक थी। इसी बात से इस कंपनी के मुनाफा का अंदाजा लगाया जा सकता है।
भारत में सट्टेबाज में शामिल ये कंपनियाँ IIFA अवॉर्ड तक के प्रायोजकों में शामिल हैं। 18-21 मई को अबू धाबी में होने वाले इस अवॉर्ड की स्पॉन्सर कंपनियों में यह कंपनी भी शामिल है। इससे भारत में इनकी जड़ों का पता लगाया जा सकता है। भारत में सट्टेबाजी गैर-कानूनी है, लेकिन ऑनलाइन सट्टेबाजी को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं है।
साल 2019 में एक मुकदमे में दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार से कहा था कि ऑनलाइन सट्टेबाजी को प्रतिबंधित करना है या नहीं, यह निर्णय सरकार को लेना चाहिए। इसके जवाब में भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कोर्ट से कहा था कि वह ऐसी वेबसाइट को प्रतिबंधित नहीं कर सकती, जो विदेशों से संचालित हो रही हैं।
बता दें कि IPL में सट्टेबाजी के तार पाकिस्तान से जुड़े पाए गए हैं। भारत की केंद्रीय जाँच एजेंसी CBI ने इस नेटवर्क का भंडाफोड़ करते हुए शनिवार (14 मई 2022) को 3 लोगों को गिरफ्तार करते हुए दो प्राथमिकी दर्ज की है। सीबीआई को सूचना मिली कि IPL में सट्टेबाजी का एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है, जिसमें पाकिस्तानी बुकी भी शामिल हैं। इन्होंने सट्टेबाजी के लिए कई फर्जी आईडी के जरिये बैंक अकाउंट खोले हैं और विदेशों में बैठे लोग सट्टेबाजी रैकेट के जरिये हवाला ट्रांजेक्शन भी कर रहे हैं।
दिल्ली के मुंडका में लगी भीषण आग में लपटों के बीच फंसे लोगों के लिए शुक्रवार को देवदूत बनकर दो क्रेन चालक आए। मुंडका से गुजरते वक्त इन्होंने देखा कि एक 4 मंजिला इमारत धू-धू कर जल रही है और उसके अंदर कई सारे लोग फँसे हुए हैं। इसके बाद इन्होंने अपनी परवाह न करते हुए 50 से भी अधिक लोगों को बचाया।
न्यूज 18 की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक, इस क्रेन के ड्रायवर थे दयानंद तिवारी और उनके साथ एक अन्य ड्रायवर अनिल तिवारी थे। दयानंद बताते हैं कि वो लोग मुंडका उद्योग से लौट रहे थे। रास्ते में देखा कि एक बिल्डिंग धू-धू कर चल रही है। इस पर उन लोगों ने लोगों की मदद करने के लिए रॉन्ग साइड से क्रेन लेकर जाने का फैसला किया।
क्रेन ड्रायवर दयानंद तिवारी बताते हैं कि वो फुटपाथ पर क्रेन को चढ़ा दिए और उसके बीच से निकलकर वहाँ पहुँचे। इस बीच एक आदमी ने भी उनसे मदद माँगी की आ लगी है और क्रेन लेकर उसकी मदद करो। दयानंद तिवारी ने कहा कि हम लोगों ने करीब 50 लोगों को बचाया। इसमें ज्यादातर महिलाएँ और बच्चे थे।
काँच टूट रहा था और आग लपटें मार रही थी
एक अन्य चालक अनिल तिवारी का कहना है कि उन लोगों ने 50-55 लोगों को रेस्क्यू किया। वो बताते हैं कि रेस्क्यू बहुत ही मुश्किल था, क्योंकि ऊपर से 11,000 वोल्ट का तार गुजर रहा था। बिल्डिंग से आग की लपटें उठ रही थीं, जिसके कारण खुद के भी जलने का खतरा बना हुआ था। वहाँ पर भीड़ और गर्मी दोनों बहुत ज्यादा थे, जिस कारण से शरीर साथ नहीं दे रहा था। हालाँकि, दमकल के आने तक हम लोग वहाँ रहे और फिर वहाँ से चले गए। आग से बचने के लिए तो कुछ लोग रस्सी के सहारे भी कूद रहे थे, जिन्हें क्रेन ड्रायवरों ने ही अपने बेल्ट दिए ताकि वो सुरक्षित रहें।
क्या है मामला
शुक्रवार 13 मई को दिल्ली के मुंडका क्षेत्र में एक बिल्डिंग में लगी भीषण आग में 27 लोगों की जलकर मौत हो गई थी। 12 लोग बुरी तरह से झुलसे भी थे, जिनका इलाज चल रहा है। पुलिस ने कम्पनी के 2 मालिकों को भी गिरफ्तार कर लिया था।
ऐसी ही हिम्मत राजस्थान में पुलिस कॉन्स्टेबल ने दिखाई थी
गौरतलब है कि दिल्ली के क्रेन ड्रायवरों की ही तरह हिम्मत बीते दिनों राजस्थान पुलिस के एक कॉन्स्टेबल ने भी दिखाई थी। पिछले महीने अप्रैल (2022) में जब करौली में हिंसा भड़की तो आगजनी के दौरान एक घर जल रहा था। उसमें कई महिलाएँ और एक बच्ची भी थी। इन्हें बचाने के लिए राजस्थान पुलिस के कॉन्स्टेबल नेत्रेश शर्मा आग की लपटों के बीच एक छोटी सी बच्ची को खुद से चिपका भागते दिखे थे। उनके पीछे-पीछे एक महिला भी अपनी जान बचाकर भाग रही थी।
हालाँकि, कई सारे लेफ्ट और लिबरल्स मीडिया गिरोहों ने इन खबरों को दरकिनार कर दिया। उन्होंने इसे दिखाने लायक ही नहीं समझा। ऐसा लगता है कि हिंदू होने के कारण कुछ मीडिया और कथित उदारवादी लोग इन लोगों की हिम्मद और साहस को दुनिया के सामने ही नहीं लाना चाहते हैं।
इजरायली डिफेंस फोर्स और फिलिस्तीन के लड़ाकों के बीच वेस्ट बैंक में हुई गोलीबारी में मीडिया संस्थान ‘अल जजीरा’ की पत्रकार शिरीन अबू अकलेह (51) की गोली मारकर हत्या करने के दो दिन बाद एक इस्लामी विद्वान ने विवादित बयान दिया है। कामरान नाम के इस्लामी विद्वान ने मुस्लिमों से मारी गई पत्रकार के लिए किसी भी तरह की प्रार्थना नहीं करने के लिए कहने के बाद मामला गर्मा गया है।
‘योर मदरसा‘ नाम के संगठन के संस्थापक कामरान ने शुक्रवार (13 मई) को ट्वीट किया, “मैंने देखा है कि कई सारे मुस्लिम फ़िलिस्तीन में गलत तरीके से मारी गई पत्रकार शिरीन अबू अकलेह के लिए दुआ कर रहे हैं। वह एक ईसाई थी।” मुस्लिम विद्वान ने जोर देकर कहा, “ये केवल एक रिमाइंडर है कि विद्वानों के बीच किसी भी तरह का मतभेद नहीं है कि कोई गैर-मुस्लिमों की मृत्यु के बाद क्षमा और दया के लिए प्रार्थना नहीं कर सकता है।”
कामरान के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
इस्लामिक किताब का हवाला देते हुए कामरान ने दावा किया कि जो मुस्लिम एक काफिर (मुशरिकून) के लिए पश्चाताप करते हैं, वे नरक की आग में जलकर बर्बाद हो जाते हैं।
कामरान ने आगे कहा, “यह पैगंबर और उन लोगों के लिए सही नहीं है जो कि अल्लाह से ‘मुशरिकून’ के लिए माफी माँगते हैं। वे चाहे रिश्तेदार ही हों, उनके लिए ये स्पष्ट है कि वे नर्क में रहने वाले हैं। क्षमा माँगते हैं, भले ही वे रिश्तेदार हों, उनके लिए यह स्पष्ट हो गया है कि वे आग के निवासी हैं। [9: 113 ]।” मुस्लिम विद्वान का कहना था कि लोगों को अपनी जागरूकता को बढ़ाकर अन्याय के खिलाफ खड़े हों? हाँ। उसके लिए दुआ करें? नहीं।”
कामरान के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
फिर क्या था, इस ट्वीट के बाद इस्लामिक विद्वान के फॉलोवर्स ने ‘अल जजीरा’ की पत्रकार के धर्म पर चर्चा करना शुरू कर दिया। इसी क्रम में एक और इस्लामिस्ट ने पूछा, “जब पैगम्बर को अपनी अम्मी के लिए दुआ माँगने का अधिकार नहीं था, तो कोई कैसे किसी मरी हुई काफिर के लिए दुआ करने का दुस्साहस कैसे कर सकता है। आपके लिए ज्यादा अहम कौन है? उनकी अम्मी या फिर एक ईसाई पत्रकार जो जज़ीरा के लिए काम करती हैं? जाहिर है उनकी अम्मी।”
ट्वीट का स्क्रीनशॉट
इसी तरह से एक अन्य ट्विटर यूजर ने इस बात पर आश्चर्य जताया कि शिरीन अबू अकलेह सही में ‘काफिर’ थीं। इस शब्द का इस्तेमाल दुनियाभर के इस्लामिस्ट गैर-मुस्लिमों को प्रताड़ित करने के लिए व्यापक रूप से करते है।
ट्वीट का स्क्रीनशॉट
इसी क्रम में कई और इस्मावादियों ने ये जानने के लिए ट्वीट किया कि क्या सही में अल जज़ीरा की मृत पत्रकार गैर-मुस्लिम थीं।
ट्वीट का स्क्रीनशॉट
शिरीन अबू अकलेह की हत्या
वेस्ट बैंक में इजरायल की डिफेंस फोर्स और फिलिस्तीन के लड़ाकों के बीच इसी साल 11 मई 2022 को गोलीबारी हो रही थी और जेनिन शहर में अल जजीरा की पत्रकार शिरीन अबू अकलेह रिपोर्टिंग कर रही थीं। उसी दौरान उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस घटना की आलोचना करते हुए अल जजीरा ने एक बयान जारी कर कहा था कि पत्रकार की हत्या अंतरराष्ट्रीय कानूनों उल्लंघन है।
अबू अकलेह की हत्या को जघन्य अपराध करार देते हुए अल जजीरा ने कहा, “हम दिवंगत साथी शिरीन की हत्या के लिए इजरायली सरकार और कब्जा कर रही फौजों को जिम्मेदार ठहराते हैं।” इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अबू अकलेह की टारगेटेड किलिंग के लिए इजरायली डिफेंस फोर्स को जिम्मदार ठहराया है। इस घटना के बाद न्यूयॉर्क टाइम्स को भी अपनी हेडलाइन को भी बदलना पड़ा था।
UP के अलीगढ़ जिले में जामा मस्जिद के पब्लिक प्लेस पर बने होने का दावा किया गया है। यह दावा RTI से मिले एक जवाब के बाद किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि केशव दत्त शर्मा द्वारा सूचना के अधिकारी के तहत माँगे गए जवाब में नगर निगम ने स्वीकार किया है कि जामा मस्जिद सार्वजनिक स्थान पर बनी हुई है। अब इस मस्जिद को तोड़ने के लिए DM (जिलाधिकारी) को पत्र लिखा गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मस्जिद अलीगढ़ के ऊपरकोट इलाके में है। यह 300 साल पुरानी बताई जा रही है। भाजपा नेताओं ने भी अब इस मस्जिद के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी है। उन्होंने मस्जिद को अवैध बताया और तोड़ने की माँग की जबकि समाजवादी पार्टी ने इसे जनहित मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश करार दिया है।
RTI एक्टिविस्ट केशव ने’ जन सूचना अधिकार अधिनियम’ के तहत जून 2021 में ये सवाल किए थे। इस RTI में यह भी पूछा गया था कि जमीन किसकी है और इसका टैक्स कितना भरा जाता है? इन सवालों के जवाब में अलीगढ़ नगर निगम ने जवाब दिया कि जामा मस्जिद जिस स्थान पर बनी है, वहाँ का मालिकाना हक किसी के भी पास नहीं है और वो सार्वजनिक स्थान पर बनी हुई है। नगर निगम द्वारा जवाब मिलने के बाद RTI एक्टिविस्ट ने 8 मई 2022 को अलीगढ़ के DM के साथ आयुक्त, नगर निगम कमिश्नर, और विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को लेटर जामा मस्जिद को सार्वजनिक भूमि पर कब्ज़ा बताया। इसी के साथ उन्होंने पत्र में लिखा है कि यदि 15 दिनों के अंदर स्थानीय प्रशासन ने मस्जिद के कब्ज़े से सार्वजनिक भूमि न मुक्त करवाई तो वो अदालत जाएँगे।
इस पूरे विवाद में भाजपा नेता और अलीगढ़ की पूर्व मेयर का शकुंतला भारती भी बयान आया है। उन्होंने कहा, “अगर नगर निगम इस बात को स्वीकार कर रहा है कि जामा मस्जिद सार्वजनिक भूमि पर बनी है तो उसको टूटना चाहिए। इसके लिए मैं सरकार को पत्र लिखूँगी। इसी के साथ मैं इस बात से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी अवगत करवाऊँगी।”
अलीगढ़ के नगर आयुक्त गौरांग राठी के मुताबिक, “किसी भी पार्टी का हमें कोई भी पत्र प्राप्त नहीं हुआ है। RTI में जो जवाब माँगा गया था हमने उसका सही जवाब दिया है। अभी किसी भी धर्मस्थल पर कोई भी कार्रवाई पर विचार नहीं हो रहा है। फिलहाल नगर निगम सिर्फ अतिक्रमण विरोधी अभियान पोखर की जमीन से अवैध कब्जे और सफाई व्यवस्था करने के लिए चला रहा है।” वहीं अलीगढ़ के ADM ने इस मुद्दे पर कहा, “हमारे पास कोई शिकायत नहीं आई है। न ही इस मामले की कोई जाँच पेंडिंग है। 300 साल पुरानी उस मस्जिद पर कोई विवाद नहीं है। RTI में जो सूचना माँगी गई थी वो दी गई। यदि कोई शिकायत मिलेगी तो उस पर नियमानुसार जाँच करवाई जाएगी।”
समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व विधायक जमीर उल्लाह ने इस मामले में भाजपा पर लोगों को आम मुद्दे से भटकने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा, “यह मस्जिद सन 1728 में बनाई गई थी। तब साबित खान राज्यपाल थे। तब नगर निगम और भाजपा कोई नहीं था। RTI डालने वाले की ही मंशा गलत है और वो माहौल खराब करना चाहता है। वो लोग पागल हैं जो इस मस्जिद को तोड़ने की बात करते हैं। उनकी सोच गंदी है। जामा मस्जिद को सरकार का संरक्षण है। यह और किला सरकार के गज़ट में है।”
पटकथा लेखक से गीतकार और फिर ट्विटर ट्रोल तक का सफर तय करने वाले जावेद अख्तर ने एक बार फिर से मुगलों का महिमामंडन किया है। इस बार उन्होंने अकबर को आक्रांता मानने से इनकार कर दिया। ये सब तब शुरू हुआ, जब इस्लामी इतिहास के जानकर तारिक फतह ने ‘गरुड़ प्रकाशन’ के संस्थापक संक्रांत सानु का एक उद्धरण शेयर किया। आक्रांताओं की आलोचना को जावेद अख्तर बर्दाश्त नहीं कर पाए और टपक पड़े।
तारिक फतह ने संक्रांत सानु का जो उद्धरण ट्वीट किया, वो है, “भारत एकमात्र ऐसी मुख्य सभ्यता है, जहाँ आपको व्यवस्थित तरीके से ये पढ़ाया जाता है कि आप अपनी ही विरासत से घृणा करें और इसे तबाह करने वाले आक्रांताओं का गुणगान करें। और इस (मूर्खता को) सेक्युलरिज्म कहा जाता है।” इस पर जावेद अख्तर ने पूछा कि क्या आप अमेरिका में हर एक श्वेत व्यक्ति को आक्रांता कहेंगे और उनके वंशजों को विदेशी बताएँगे?
उन्होंने आगे दावा किया कि अकबर एक भारतीय था, लेकिन आपके (तारिक फतह) माता-पिता भारतीय नहीं थे क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान में जाकर बसने का निर्णय लिया। जावेद अख्तर ने लिखा कि तारिक फतह सऊदी अरब में 11 वर्षों तक सुविधापूर्वक जीवन व्यतीत करने के बाद सेक्युलरिज्म का पाठ पढ़ा रहे हैं। साथ ही उन्होंने अंत में ‘Just Shut Up (एकदम चुप रहो)’ भी लिखा। तारिक फतह ने इसके बाद तगड़ा जवाब दिया।
उन्होंने लिखा, “जावेद अख्तर इस्लामी आक्रमण और हिंदुस्तान की तबाही के मुद्दे पर बहस करते समय नाली में गिरना पसंद करते हैं। मैंने जो संक्रांत सानु का उद्धरण शेयर किया था, उस पर जवाब देने की बजाए वो मुझे चुप रहने के लिए कह रहे हैं। मुझे बताया गया है कि जावेद अख्तर के पूर्वक अरब के थे, जिनका वंश खलीफा तक जाता है।” इस पर जावेद अख्तर कहने लगे कि उन्होंने तीन दशकों से भी अधिक समय से तीन तलाक, पर्दा प्रथा और मस्जिदों में लाउडस्पीकर का विरोध किया है।
. Since more than three decades I have openly opposed 3 talaqs ,parda ,loudspeaker in the mosques but at the same time I equally oppose the fanatic Hindu fringe too That is secularism . While you are just a spineless opportunist who is no more than a bootlicker of the powerful
लेकिन, साथ ही जावेद अख्तर ने ये भी कहा कि वो ‘कट्टरपंथी हिन्दू समूह’ का भी विरोध करते हैं और यही धर्मनिरपेक्षता है। उन्होंने तारिक फतह को एक ‘रीढ़विहीन मौकापरस्त’ करार देते हुए कहा कि वो ‘सत्ता के जूते चाटने वाले’ के अलावा और कुछ भी नहीं हैं। संक्रांत सानु ने भी जावेद अख्तर को याद दिलाया कि उत्तरी अमेरिका में किसी बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम से पहले वहाँ के मूल निवासियों के सम्मान में ‘लैंड एक्नॉलेजमेंट’ होता है, सोचिए ये भारत में भी हमारी जमीन पर बने मस्जिदों में नमाज से पहले हो?
उत्तर प्रदेश के वाराणसी (Varanasi, Uttar Pradesh) के विवादित ज्ञानवापी ढाँचे (Gyanvapi) में आज रविवार (15 मई 2022) को सर्वे और वीडियोग्राफी का काम दूसरे दिन भी पूरा हो गया। तहखाने के नीचे एक सुंरग और एक अन्य कमरा मिला है, जिसमें मलबा भरा हुआ है। वहीं, ढाँचे के गुंबद, पश्चिमी दीवार और नमाज की जगह का सर्वे किया गया। हालाँकि, ढाँचा परिसर में मौजूद वजूखाने के पास तालाब को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष में विवाद भी हुआ। हिंदू पक्ष का कहना था कि तालाब का पानी निकालकर इसकी वीडियोग्राफी की जाए, जबकि पानी निकालने का मुस्लिम पक्ष ने विरोध किया।
दूसरे दिन के सर्वे में मस्जिद के गुंबदों और नमाज वाली जगह की वीडियोग्राफी की गई। इस दौरान टीम ने ढाँचे की छत पर चढ़कर दीवारों को देखा। गुंबद पर जाने के लिए ढाँचे के पश्चिमी दीवार की तरफ बने एक दरवाजे का ताला खोला गया। यह दरवाजा 3.5 फीट का है। जिसके जरिए कमीशन की टीम गुंबद तक पहुँची।
इसके अलावा, जिस मिट्टी का जिक्र ASI को सर्वे करने के आदेश में किया गया था, उसकी भी वीडियोग्राफी करवाई गई है। सबसे बड़ी बात है कि आज दूसरे दिन के सर्वे में तहखाने के अंदर एक सुरंग मिली है। टीम ने इसकी भी वीडियोग्राफी की है। माना जा रहा है कि सर्वे का पूरा काम आज ही पूरा हो जाएगा। हालाँकि, इसको लेकर किसी तरह का बयान अभी सामने नहीं आया है।
बता दें कि ढाँचे के तहखानों के बंद तालों की चाबी 16 साल बाद समाने आई है। इसके पहले जनवरी 1993 में विवाद के बाद तहखानों में ताले बंद करके चाबी को राजकीय कोषागार में जमा करा दिया गया था। हालाँकि, साल 2006 में किसी कारणवश इसे निकालकर पुलिस को दी गई थी। यही कारण है कि चाबी नहीं मिलने पर न्यायालय ने ताला तोड़ने के लिए कहा था।
अमर उजाला के अनुसार, न्यायालय द्वारा अधिकृत कमीशन की कार्रवाई खत्म होने के बाद इस चाबी को अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमिटी के हवाले कर दिया जाएगा और ये उन्हीं के पास रहेंगी। दरअसल, जिलाधिकारी ने स्पष्ट कहा था कि अगर किसी के पास चाबी है तो लाकर दे, नहीं ताला तोड़कर काम पूरा किया जाएगा और फिर ताला लगाकर कोषागार में जमा कर दिया जाएगा। इसके बाद मस्जिद कमिटी ने चाबी सौंप दिया था। इसके बाद मुस्लिम पक्ष ने कमीशन को चाबी सौंपा। इसके पहले मुस्लिम पक्ष ने चाबी होने से इनकार कर दिया था।
वहीं, खाता संख्या 9130 को मापने के लिए तहसील की ओर से टीम का गठन किया गया है। तहसील में दर्ज रिकॉर्ड को कमीशन की कार्यवाही में शामिल किया गया है। बता दें कि इस कार्यवाही की रिपोर्ट 17 मई तक अदालत में प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया है।
‘विश्व वैदिक सनातन संघ’ के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह बिसेन ने कहा था कि ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में सर्वे और वीडियोग्राफ़ी के दौरान ऐसी-ऐसी चीजें मिलीं, जो सभी लोगों की कल्पना से परे और उम्मीद से बहुत ज्यादा मिला है। उन्होंने जानकारी दी कि जहाँ कुछ तालों को खोलना पड़ा, वहीं कुछ को तोड़ना पड़ा। उन्होंने बताया कि सर्वे के लिए भी बहुत कुछ है। उन्होंने बताया कि सर्वे की रिपोर्ट भी सबके सामने आएगी। शनिवार को हुए सर्वे में दीवारों पर दिखे स्वास्तिक और त्रिशूल के चिन्ह मिलने के दावे किए गए हैं।
आतंकियों से साठ-गाँठ रखने वाले कश्मीर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अल्ताफ हुसैन पंडित को बर्खास्त कर दिया गया है। उस पर न सिर्फ सक्रिय आतंकी गतिविधियों में शामिल रहने बल्कि बुरहान वानी के मारे जाने के बाद सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल रहने का भी आरोप है।
बताया जा रहा है कि कश्मीर यूनिवर्सिटी में अल्ताफ हुसैन पंडित ने अपनी नियुक्ति के दौरान कैरेक्टर वेरिफिकेशन के सभी प्रक्रियाओं का पालन भी ठीक से नहीं किया था। यह बर्खास्तगी शुक्रवार (14 मई 2022) को की गई है।
Dismissal from service of Mr Altaf Hussain Pandit Professor in Chemistry Department University of Kashmir S/0 Ghulam Hassan Pandit R/o Wadoora Bala Sopore in terms of sub-clause c of the provisoto clause 2 of Article 311 of the Constitution of India. @diprjkpic.twitter.com/P2HMFe4kCh
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक प्रोफेसर अल्ताफ हुसैन साल 1990 से 1993 तक आतंकी समूह JKLF (जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट) का सक्रिय सदस्य था। इसके बाद वो 2015 से 2017 तक कश्मीर यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (KUTA) का मेंबर बना। अल्ताफ इसी KUTA का उपाध्यक्ष 2017 से 2018 तक रहा था। वो सरकार के खिलाफ होने वाले कई प्रदर्शनों में प्रमुखता से शामिल रहता था।
प्रोफेसर अल्ताफ हुसैन पंडित ने हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद साल 2016 में होने वाले प्रदर्शन के लिए कॉलेज के छात्रों की भीड़ जमा की थी। खुद भी इसमें शामिल रहा था। इसके अलावा वो कश्मीर यूनिवर्सिटी का कैलेंडर भी इस तरह बनाने के प्रयास में रहता था ताकि गिलानी के द्वारा किए जाने वाले विरोध-प्रदर्शनों के समय कॉलेज-यूनिवर्सिटी बंद रहें, वहाँ के लड़के ज्यादा से ज्यादा इनमें शामिल हो सकें।
TOI EXCLUSIVE: Kashmir Univ professor sacked over terror links had mobilised students for protests after Burhan Wani’s killing in 2016 and wanted Univ academic calendar synced with Geelani protest calendar. Surprisingly, his background verification for govt service was never done https://t.co/KWLV5LDyfj
अल्ताफ के खिलाफ जाँच कर रही कमेटी ने यह भी पाया कि उसने प्रोफेसर के तौर पर नियुक्ति के लिए जरूरी कैरेक्टर वेरिफिकेशन भी नहीं करवाया था। यह वेरिफिकेशन हर सरकारी सेवा में भर्ती होने से पहले जरूरी होता है। जम्मू-कश्मीर सरकार के एक सीनियर अधिकारी के मुताबिक, “एक जाँच से पता चला है कि अल्ताफ उन सैकड़ों लोगों में से एक था, जो सरकारी विरोधी कार्यों को करने के बाद भी सरकारी नौकरी में शामिल हो गया। ऐसा इसलिए हो पाया क्योकि सिस्टम ही दूषित हो चुका था।”
अल्ताफ को उसकी हरकतों के चलते कश्मीर यूनिवर्सिटी का गिलानी कहा जाता था। वो न सिर्फ कश्मीर के प्रशासन में बल्कि वहाँ के छात्रों में हुर्रियत की विचारधारा को फैला रहा था। वह छात्रों को कभी डर और कभी सपोर्ट के बहाने पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित भारत विरोधी प्रदर्शनों के लिए तैयार करता था। जाँच एजेंसियों का दावा है कि अल्ताफ हुसैन इस बात से दुखी था कि साल 2016 के बाद कश्मीर यूनिवर्सिटी का कोई भी छात्र प्रदर्शन के दौरान मरा क्यों नहीं।
प्रोफेसर अल्ताफ हुसैन पंडित ने MSC तक पढ़ाई की है। उसने रसायन विज्ञान में पीएचडी के लिए एप्लाई कर रखा है। वह साल 2004 में कश्मीर यूनिवर्सिटी में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती हुआ था। अल्ताफ मूल रूप से सोपोर के वदूरा का रहने वाला है। बचपन से वह अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी और गुलाम मोहम्मद भट की सोच से प्रभावित था। वह सन 1990 में सीमा पर से हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी ले कर आया था और बाद में JKLF का सक्रिय आतंकी बन गया था। बाद में वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के लिए गया। इस दौरान वो जमात ए इस्लामी से जुड़ा रहा।
अल्ताफ कश्मीर यूनिवर्सिटी का सिस्टम पाकिस्तान के हिसाब से चलाना चाहता था। साल 2016 से कश्मीर यूनिवर्सिटी के 3 छात्र और एक असिस्टेंट प्रोफेसर आतंकी संगठन ज्वाइन कर चुके हैं। छात्रों के नाम इमरान नबी, शौकत अहमद भट और मोहम्मद आमिर मलिक हैं जबकि असिटेंट प्रोफेसर का नाम रफीक भट है। बताया जा रहा है कि एजेंसियों ने पहले ही अल्ताफ के बारे में चेतावनी दी थी कि वो अपनी भारत विरोधी विचारधारा कई लोगों के दिमाग में डाल रहा है।
कश्मीर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अल्ताफ हुसैन पंडित को बर्खास्त किए जाने से इस यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र नाराज हैं। वो धरने पर बैठे हैं। उनका कहना है कि बर्खास्त किए प्रोफेसर को वापस नौकरी पर लाओ।
मछली और मोतियों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध तमिलनाडु के तूतूकूड़ी (Thoothukudi, Tamil Nadu) में एक महिला ने दावा किया है कि उसने 36 साल एक पुरुष के वेश में जीवन जिया है। महिला का कहना है कि अपनी इकलौती बेटी को सुरक्षित रूप से पालने के लिए उसने ऐसा किया, ताकि बुरे लोगों से बचा जा सके।
तूतूकूड़ी शहर से 30 किलोमीटर दूर स्थित कट्टनायकनपट्टी गाँव की रहने वाली एस पेटीअम्मल ने अपने पति की आकस्मिक मौत के बाद इकलौती बेटी को पालने के लिए कई तरह के संघर्ष किए। इस दौरान उन्हें कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिनमें यौन ताने सुनना भी शामिल है। इस सब स्थितियों को देखते हुए उन्होंने एक निर्णय लिया और समाज के सामने ‘मुथु’ नाम की एक पुरुष बन गईं।
न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए पेटीअम्मल ने कहा, “शादी के 15 दिन बाद ही मैंने अपने पति शिव को खो दिया। तब मैं सिर्फ 20 साल की थी। इसी दौरान मैंने अपनी बेटी षडमुंगसुंदरी को जन्म दिया। मैंने फिर से शादी नहीं करने का फैसला किया, लेकिन अकेले बच्चे की परवरिश करना मुश्किल हो गया। मैंने निर्माण स्थलों, होटलों और चाय की दुकानों में काम किया, लेकिन मुझे इन सभी जगहों पर प्रताड़ना झेलनी पड़ी।”
एक युवा अकेली महिला के रूप में समाज के नजरिए और जीवन की कठिनाइयों को देखते हुए पेटीअम्मल तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर गई और वहाँ उन्होंने अपनी पूरी वेश-भूषा बदल ली। उन्होंने साड़ी को छोड़कर शर्ट और लुंगी पहन लिया और खुद का नाम मुथु देकर समाज के सामने एक पुरुष के रूप में सामने आई।
अपनी असली पहचान को छिपाए रखने की बात को लेकर पेटीअम्मल ने बताया, “हम 20 साल पहले कट्टुनायक्कनपट्टी में बस गए थे। केवल मेरे घर आने वाले करीबी रिश्तेदार और मेरी बेटी को पता था कि मैं एक महिला हूँ।”
पेटीअम्मल की बेटी षडमुंगसुंदरी की शादी हो गई, लेकिन पेटीअम्मल अब भी अपनी पहचान बदलना नहीं चाहती हैं। उनका कहना है कि इस पहचान ने उनकी बेटी को सुरक्षित जीवन दिया। इसलिए वह मरते दम तक वह मुथु ही रहेंगी। वहीं, उनका आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी पुरुष के रूप में हैं। हालाँकि, अब उन्होंने मनरेगा जॉब में उन्होंने महिला पहचान दिया है, क्योंकि उनसे अब कड़ी मेहनत वाला काम नहीं हो पाता।
उन्होंने कहा कि उनके पास न घर है और ही बचत की कोई रकम। उन्होंने सरकार से सहायता की माँग की है। वहीं, कलेक्टर ने मामले की जाँच करने के बाद उन्हें किसी सामाजिक कल्याण योजना से जोड़ने की बात कही है।