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NCP के गुंडों ने भाजपा प्रदेश प्रवक्ता को दफ्तर में घुस कर पीटा, कोई गिरफ़्तारी नहीं: फेसबुक पर डाली थी कविता

महाराष्ट्र में NCP (राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी) के गुंडों ने भाजपा के बुजुर्ग नेता विनायक आंबेकर की पिटाई की है। बताया जा रहा है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार के खिलाफ फेसबुक पोस्ट लिखने के लिए उन्होंने ऐसा किया। शरद पवार NCP के संस्थापक हैं और मौजूदा MVA (महा विकास अघाड़ी) सरकार का उन्हें सर्वेसर्वा माना जाता है। 81 वर्षीय शरद पवार तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। NCP कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी की भाजपा ने आलोचना की है।

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिस पर टिप्पणी करते हुए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने लिखा, “अभिव्यक्ति की आज़ादी के तथाकथित रक्षकों ने एक बुजुर्ग नागरिक की पिटाई की, एक महिला को सिर्फ इसीलिए गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उसने अपने मन की बात कही थी। उनकी इन करतूतों पर उनके साथी पहले से तय चुप्पी साधे रहते हैं। वो अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलते हैं।”

वीडियो में देखा जा सकता है कि विनायक आंबेकर के साथ NCP कार्यकर्ता बहस कर रहे होते हैं, तभी सफ़ेद शर्ट पहने एक NCP कार्यकर्ता उन्हें थप्पड़ मार देता है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रकांत पाटिल ने भी इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा कि वो भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता पर NCP के गुंडों द्वारा हमले की निंदा करते हैं और दोषियों को तुरंत सज़ा दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा किविचारों की लड़ाई विचारों से लड़ी जानी चाहिए, लेकिन ये घटना राज्य सरकार में माफिया की शक्ति को बताती है।

हालाँकि, अभी तक महाराष्ट्र पुलिस ने इस घटना को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की है। हालाँकि, पुणे दफ्तर में उनके साथ हुई मारपीट के बाद उन्होंने खड़क पुलिस थाने में मामला दर्ज कराया है। उन्होंने बताया कि वरिष्ठ भाजपा नेताओं के फोन कॉल आने के बाद उन्होंने स्वेच्छा से ही अपनी फेसबुक पोस्ट की दो लाइनें हटा दी थीं, लेकिन एक योजना बना कर हमला हुआ और वीडियो वायरल किया गया। उन्होंने कहा कि वो एक कविता थी, जिसमें किसी का नाम नहीं लिखा गया था।

जिस अमजद के ऑटो से कॉलेज आती-जाती थी, उसी ने BA की हिन्दू छात्रा को फँसाया: उलटा उसे ही भिजवाया जेल, 2 बच्चों का है अब्बा

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के सहारनपुर जिले से लव जिहाद (Love Jihad) का चौंकाने वाला मामला प्रकाश में आया है। यहाँ अमजद नाम के शख्स ने पहले एक हिंदू युवती को नाम बदलकर अपने झूठे प्रेम जाल में फँसाया और उसे भगा ले गया। फिर उससे बच्चा चोरी करवाने लगा। इसके बाद पीड़िता को जेल भिजवा दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना सहारनपुर थाना देहात कोतवाली की बताई जा रही है। पीड़िता बेटी बीए की छात्रा थी और अक्सर वो ऑटो से ही कॉलेज आती-जाती थी। इसी दौरान मौके का फायदा उठाते हुए ऑटो ड्रायवर अमजद ने नाम बदलकर अपने प्रेम के जाल में फँसा लिया। धीरे-धीरे दोनों दोनों में नजदीकियाँ बढ़ी और एक दिन अमजद उसे लेकर भाग गया। हालाँकि, वो उसे लेकर अपने घर जाने की बजाए जिला अस्पताल गया। उसने पीड़िता को बताया कि उसका कोई रिश्तेदार वहाँ भर्ती है।

आरोपित ने पीड़िता को दो दिन तक वहीं रखा और बाद में बच्चा चोरी की साजिश रचकर उसे जेल भिजवा दिया। जेल में करीब 8 महीने तक पीड़िता रही। इस बीच उसके परिजन जेल में उससे मिलते रहे, उसी दौरान उसने अपनी सारी आपबीती बयाँ की। पीड़िता की माँ के मुताबिक, आरोपित अमजद पहले से विवाहित है औऱ उसके 2 बच्चे भी हैं। बहरहाल 8 महीने की सजा काटने के बाद शुक्रवार 13 मई 2022 को जब जेल से बाहर आई तो वो काफी डरी हुई थी। प्रशासन ने उससे उसके घर भेजने की कोशिशें की, लेकिन उसने घर जाने से इनकार कर दिया। बाद में उसे नारी निकेतन भेज दिया गया।

हिंदू संगठनों ने एसएसपी से लगाई मदद की गुहार

इस बीच शनिवार (14 मई 2022) को हिंदू संगठनों ने जिले के एसएसपी आकाश तोमर से मुलाकात की। उन्हें ज्ञापन देकर हिंदू संगठनों ने पीड़िता के साथ हुई वारदात के बारे में बताया और कार्रवाई की माँग की। उसको लेकर एसपी सिटी राजेश गुप्ता के मुताबिक, केस संज्ञान में आया है और प्रार्थना पत्र के आधार पर मामले की जाँच कराई जाएगी।

बंगाली अभिनेत्री की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत: सिगरेट लेने गया लिव-इन पार्टनर, लौटा तो लटका मिला शव

पश्चिम बंगाल के कोलकाता की बंगाली टीवी एक्ट्रेस पल्लबी डे की मौत हो गई है। रविवार (15 मई, 2022) को पल्लबी डे का शव उनके किराए के अपार्टमेंट में लटका मिला। 21 वर्षीय अभिनेत्री को अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन वहाँ उन्हें मत घोषित कर दिया गया। वो यहाँ अपने लिव इन पार्टनर के साथ किराए पर रही थीं।

रिपोर्ट के मुताबिक, डे ने दक्षिण कोलकाता के गरफा इलाके में पिछले महीने अप्रैल 2022 में ही किराए का अपार्टमेंट लिया था। मामले का खुलासा उस वक्त हुआ जब उसके दोस्त शग्निक चक्रबर्ती ने अपार्टमेंट में पल्लबी के शव को लटकता पाया। घबराए शग्निक ने अपार्टमेंट के केयरटेकर को इसकी जानकारी दी। इसके बाद मौके पर पहुँचे बिल्डिंग के केयरटेकर ने शव को अन्य लोगों की मदद से नीचे उतारा और पुलिस को इसकी जानकारी दी। शग्निक शुरू से ही पल्लबी डे के साथ रह रहे थे।

बहरहाल घटनास्थल पर पहुँची पुलिस ने शव को कब्जे में ले लिया। पुलिस का कहना है कि शुरुआती तौर पर यह खुदकुशी का मामला लग रहा है, लेकिन असली वजह का खुलासा पोस्टमार्टम के बाद ही हो सकता है। बहरहाल, अस्वाभाविक मौत का केस दर्ज किया गया है। इस केस ही हर एंगल से जाँच की जा रही है। इसके साथ ही पल्लबी डे के दोस्त शग्निक चक्रबर्ती से भी पूछताछ की जा रही है।

शग्निक ने पुलिस को बताया है कि वो रविवार को सुबह वो सिगरेट लाने के लिए जब जा रहे थे, तब तो सबकुछ ठीक था, लेकिन जब वो सिगरेट लेकर वापस लौटे तो पल्लबी का शव पंखे से लटकता मिला।

गौरतलब है कि 21 वर्षीय अभिनेत्री पल्लबी डे ‘आम्ही सिराजेर बेगम’, ‘कुंजा छाया’, ‘रेशम झापी’ और हाल ही में ‘मोन माने ना’ जैसे कई बंगाली धारावाहिकों में मुख्य भूमिका निभाई है। इस कारण से वो काफी फेमस भी हो चुकी थीं।

प्राइवेट स्कूल में ईसाई धर्मांतरण का धंधा, ‘हनुमान चालीसा’ पर आपत्तिजनक टिप्पणी: गरीब महिलाओं-बच्चियों को जुटाया, हिन्दू विरोधी भाषण

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के एक प्राइवेट स्कूल में ईसाई धर्मांतरण का मामला सामने आया है। बैरागढ़ इलाके में इसकी सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुँची। ये मामला ‘क्राइस्ट मेमोरियल स्कूल’ का है, जिसका संचालन करने वाले लोग ईसाई समुदाय से ही आते हैं। सूचना मिली कि यहाँ कुछ लोगों के ईसाई धर्मांतरण के प्रथम चरण की प्रक्रिया कराई जा रही है। हिन्दू समाज के कई महिला-पुरुष भी वहाँ पर उपस्थित थे।

कुल मिला कर स्कूल में शैक्षणिक कार्यों के नाम पर संदिग्ध गतिविधियाँ चल रही थीं। स्कूल के संचालक को भी हिन्दू धर्म के विरोध में भाषण देते हुए पाया गया। साथ ही कई ऐसी पुस्तकें भी मिली हैं, जिनमें हिन्दू धर्म के बारे में अनाप-शनाप लिख कर घृणा फैलाने का कार्य किया जा रहा था। बैरागढ़ पुलिस ने तुरंत छापेमारी कर वहाँ के लोगों को हिरासत में लिया और थाने ले गई। हिन्दू संगठनों ने भी बताया कि धर्म-परिवर्तन का काम कराया जा रहा था।

आक्रोशित हिन्दू संगठनों ने मौके पर पहुँच कर स्कूल का घेराव भी किया। उन्होंने वहाँ सब कुछ देखा और सबूत के रूप में वीडियो भी बना लिया। स्थानीय भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा भी इसकी सूचना मिलते ही हरकत में आए और कमिश्नर से बात कर के FIR की माँग की। पुलिस ने भी FIR दर्ज कर लिया है। स्कूल में ग्रामीण इलाकों से गरीब परिवार की महिलाओं-बच्चियों को भी बुलाया गया था। जहां-फूँक और ‘चमत्कार’ दिखाए जा रहे थे।

FIR में 5 लोगों को आरोपित बनाया गया है, जिसमें स्कूल के संचालक भी शामिल हैं। हिन्दू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी का आरोप भी है। साथ ही स्कूल में गरीबों को जुटा कर हनुमान चालीसा के खिलाफ भी गलत बातें की जा रही थीं। साथ ही अन्य सनातन धार्मिक ग्रंथों को भी निशाना बनाया जा रहा था। स्कूल के संचालकों के नाम मैनिस मैथ्यूज और पाल पोलूस हैं। हिन्दू विरोधी भाषण देने में ये दोनों सबसे आगे थे।

स्वामी विवेकानंद से मिलने जब पैदल ही चल पड़े थे महात्मा गाँधी… देशभक्ति में हजार गुणा वृद्धि का दिया था श्रेय

स्वामी विवेकानंद को अनेकों लोग एक आध्यात्मिक नेता के तौर पर देखते हैं। लेकिन उनका भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में योगदान अभी भी आम जनमानस से अनभिज्ञ है। 12 जनवरी 1863 को बंगाल के कलकत्ता में माता भुवनेश्वरी देवी और पिता विश्वनाथ दत्त के घर जन्में नरेंद्रनाथ दत्त जो बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए, मात्र 39 वर्ष 5 महीने और 24 दिन के जीवन में अगर उन्हीं के शब्दों में कहूँ तो 1500 वर्ष का कार्य कर गए।

स्वामी विवेकानंद 25 साल की उम्र में ही परिव्राजक संन्यासी के रूप में भारत भ्रमण पर निकल गए थे। भारत उस समय पराधीन था। हम पर अंग्रेज़ों का शासन था। अपने लगभग साढ़े चार वर्ष के भ्रमण के दौरान उन्होंने देखा कि वर्षों की गुलामी के कारण हर एक भारतीय के अंदर आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान, आत्म-गौरव और स्वावलम्बन पूर्णतः समाप्त हो गया है।

स्वामी विवेकानंद को अपना कार्य स्पष्ट हो गया था। वो राजनीती से दूर रह कर हर भारतवासी में आत्मविश्वास जगाने का कार्य करने वाले थे। उन्होंने यह आत्मविश्वास जगाने का, चरित्र-निर्माण का और मनुष्य-निर्माण का कार्य पूरे जीवन भर अनेकों कष्ट, कठिनाइयों को सहते हुए भी किया… क्योंकि इसके बिना आत्मविश्वास जागृत नहीं होता और बिना आत्मविश्वास के आत्मनिर्भर बनना संभव नहीं है, जो स्वाधीनता के लिए अत्यावश्यक है।

असहयोग, अहिंसा तथा शांतिपूर्ण प्रतिकार को अपने शस्त्र के रूप में अंग्रेजों के खिलाफ़ उपयोग करने वाले और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राजनेता हुए मोहनदास करमचन्द गाँधी। वो महात्मा गाँधी के नाम से मात्र भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध हैं। गाँधी भी स्वामी विवेकानंद के साहित्य से प्रेरणा लेते हैं। महात्मा गाँधी स्वामी विवेकानंद के बारे में लिखते हैं:

”स्वामी विवेकानंद के कार्यों को पढ़ने के बाद, देश के लिए मेरी देशभक्ति में हजार गुणा वृद्धि हुई।”

कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ महात्मा गाँधी में वह अनेकों बार स्वामी विवेकानंद की चर्चा करते हैं। महात्मा खुद स्वामी विवेकानंद से मिलना चाहते थे लेकिन वो मनोकामना ही रह गई, पूरी नहीं हुई।

महात्मा गाँधी अपनी आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में लिखते हैं कि अपने कलकत्ता प्रवास के दौरान वो एक दिन स्वामी विवेकानंद से मिलने के लिए बहुत उत्साह के साथ पैदल ही बेलुड़ मठ की ओर चल पड़े थे, लेकिन उनको यह जानकर बहुत निराशा हुई कि वो अस्वस्थ हैं और उनकी मुलाकत उनसे नहीं हो पाई। हालाँकि स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता से महात्मा गाँधी 2 बार मिले थे और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा भी की थी जो अधिक सफल नहीं रही थी, लेकिन उन्होंने भगिनी निवेदिता के हिन्दू धर्म के प्रति अत्यंत स्नेह की प्रसंशा की थी और उनके द्वारा रचित पुस्तकों का अध्ययन भी किया था।

स्वामी विवेकानंद के निधन के काफी बाद एक बार पुनः 30 जनवरी 1921 को उनकी जयंती कार्यक्रम में भाग लेते हुए महात्मा गाँधी ने बेलुड़मठ में भाषण देते हुए कहा था,

“मेरे हृदय में दिवंगत स्वामी विवेकानंद के लिए बहुत सम्मान है। मैंने उनकी कई पुस्तकें पढ़ी हैं। कई मामलों में मेरे आदर्श इस महान विभूति के आदर्शों के समान ही हैं। यदि विवेकानंद आज जीवित होते तो राष्ट्र जागरण में बहुत सहायता मिलती। किंतु उनकी आत्मा हमारे बीच है और उन्हें स्वराज स्थापना के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए।”

इन शब्दों से हमें स्पष्ट होता है की महात्मा गाँधी स्वामी विवेकानंद से कितने प्रभावित थे। उनके द्वारा गरीब, वंचित, शोषितों के लिए किए गए काम और उनके प्रति आत्मीय विचारों को महात्मा गाँधी अपने केरल प्रान्त के शहर कोल्लम (Kollam), जिसे पहले क्विलोन (Quilon) कहा जाता था, में 12 मार्च 1925 को दिए अपने एक भाषण में याद करते हैं। भाषण में वह कहते हैं कि जैसी सहानुभूति स्वामी विवेकानंद को अपने ही समृद्ध भाइयों के हाथों “दबाए गए” दरिद्रों के साथ थी, उन्हें भी वैसी ही सहानुभूति है।

स्वामी विवेकांनद का प्रभाव अनेकों ऐसे नेताओं पर रहा, जिनकी स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय सहभागिता रही… भले वह उनके जीवन काल के दौरान हो या बाद में।

भारतीय टीम ने जीता बैडमिंटन का ‘विश्व कप’, खिलाड़ियों ने लगाए ‘भारत माता की जय’ के नारे: ₹1 Cr देगा खेल मंत्रालय, PM मोदी ने की बात

भारतीय शटल बैडमिंटन टीम ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए थॉमस कप 2022 (Thomas Cup-2022) जीत लिया है। रविवार (15 मई 2022) को भारतीय शटलर्स ने शक्तिशाली इंडोनेशियाई टीम को 3-0 के बड़े अंतर से अजेय बढ़त हासिल करते हुए कप अपने नाम किया।

ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारत ने थॉमस कप जीता है। इस टूर्नामेंट को शटल बैडमिंटन का विश्व कप माना जाता है। रविवार को हुए फाइनल में भारत ने 14 बार के चैंपियन इंडोनेशिया को हराकर कप को देश के नाम किया। पाँच मुकाबलों की इस खिताबी मुकाबले में भारत ने लगातार तीन बार जीत हासिल की। इसमें दो सिंगल्स और एक डबल्स शामिल है।

बैडमिंटन का विश्व कप माने जाने वाले थॉमस कप 2022 में किदांबी श्रीकांत ने इंडोनेशिया के खिलाड़ी को 21-15, 23-21 से हराया। इससे पहले लक्ष्य सेन ने एंथनी गिंटिंग को 8-21, 21-17, 21-16 से हराकर भारत को 1-0 की बढ़त दिलाई थी।

दूसरे मैच में सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी और चिराग शेट्टी ने थाईलैंड के बैंकॉक में इम्पैक्ट एरिना में फाइनल में मोहम्मद अहसान और केविन संजय सुकामुल्जो के खिलाफ 18-21, 23-21, 21-19 से जीत दर्ज की थी।

इसके बाद टूर्नामेंट के सेमीफाइनल में डेनमार्क को 3-2 से हराकर भारतीय पुरुष बैडमिंटन टीम थॉमस कप के फाइनल में पहुँच गई थी। गौरतलब है कि थॉमस कप के इस सफर में भारतीय टीम को केवल एक बार हार का सामना करना पड़ा था। ग्रुप स्टेज मैच के दौरान भारत को चीनी ताइपे ने हराया था। इसके अलावा भारत अजेय रहा है।

रविवार को फाइनल का मुकाबला जीतने के बाद भारतीय टीम ने बैडमिंटन कोर्ट में अपनी खुशी जाहिर करते हुए जमकर ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए।

इस जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी खिलाड़ियों से बात की और उन्हें इस ऐतिहासिक जीत पर बधाइयाँ दी। इस बीच खिलाड़ियों के सम्मान के लिए केंद्रीय खेल मंत्रालय आगे आया है। मंत्रालय ने भारतीय शटलर टीम के लिए एक करोड़ रुपए की इनामी राशि का ऐलान किया।

चारमीनार के पास भाग्यलक्ष्मी मंदिर नहीं… काशी विश्वनाथ को औरंगजेब ने तोड़ा-लूटा भी नहीं: कॉन्ग्रेस ने लिखा, दिखाई हिंदू-घृणा की राजनीति

उत्तर प्रदेश में वाराणसी (Varanasi, Uttar Pradesh)के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Gyanvapi Controversial Structure) की सर्वे एवं वीडियोग्राफी के बीच कॉन्ग्रेस (Congress) ने शनिवार (14 मई 2022) को काशी विश्वनाथ मंदिर (Kashi Vishwanath Temple) के विध्वंस के लिए मुगल आक्रांता औरंगजेब (Mughal Invader Aurangzeb) को क्लीनचिट देने की कोशिश के बीच विवाद खड़ा कर दिया।

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे की वीडियोग्राफी और सर्वेक्षण के बीच लोकप्रिय ट्विटर हैंडल (@IndiaHistorypic) ने 12 मई को ट्विटर पर काशी विश्वनाथ मंदिर की क्षतिग्रस्त दीवार की एक पुरानी तस्वीर अपलोड की थी। तस्वीर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अभिलेखागार से ली गई थी।

इस तस्वीर का श्रेय ASI को देते हुए हैंडल ने लिखा था, “1890: काशी विश्वनाथ मंदिर की दीवार (मंदिर को मुगल सम्राट औरंगजेब द्वारा नष्ट कर दिया गया था) अब ज्ञानवापी मस्जिद, वाराणसी का हिस्सा है।”

तस्वीर देखने और उसके कैप्शन में औरंगजेब को अत्याचारी बताने पर कॉन्ग्रेस मुगल आक्रांता के बचाव में आ गई। महाराष्ट्र प्रदेश कॉन्ग्रेस सेवा दल के आधिकारिक हैंडल ने दावा किया कि प्राचीन हिंदू मंदिर को मुगल सम्राट ने नष्ट नहीं किया था। कॉन्ग्रेस के ट्विटर हैंडल ने दावा किया कि 1890 में ली गई तस्वीर यह कैसे साबित कर सकती है कि औरंगजेब ने ही मंदिर को तबाह किया था, जबकि उसकी मृत्यु लगभग दो शताब्दी पहले ही हुई थी।

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस सेवा दल ने कहा, “”औरंगजेब की मृत्यु 3 मार्च 1707 को हुई थी। 1890 में क्लिक की गई एक तस्वीर उस दीवार को कैसे दिखा सकती है जिसे 1707 में मरने वाले व्यक्ति द्वारा कथित रूप से तोड़ा गया था?”

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस सेवा दल का ट्वीट

कॉन्ग्रेस सेवा दल के बयान में कई खामियाँ

ट्विटर उपयोगकर्ता ‘IndiaHistorypics’ ने इस दावे का खंडन करते हुए कहा कि उसी नष्ट की गई दीवार को 1834 में ब्रिटिश विद्वान जेम्स प्रिंसेप द्वारा बनाए गए एक लिथोग्राफ में भी देखा गया है, जिसमें उल्लेख किया गया था कि मंदिर को औरंगजेब ने नष्ट कर दिया था। इस हैंडल ने कॉन्ग्रेस सेवा दल से कहा, “आगे आप ASI और ब्रिटिश लाइब्रेरी के साथ इस मामले को उठा सकते हैं, क्योंकि स्रोत उनका है।”

अपने अगले ट्वीट में ‘IndiaHistorypics’ ने कहा, “जेम्स प्रिंसेप द्वारा 1834 में निर्मित इस लिथोग्राफ में नष्ट काशी विश्वनाथ मंदिर की वही दीवार दिखाई गई है। इन्होंने भी कहा है कि मंदिर को औरंगजेब ने तोड़ा था।”

जेम्स प्रिंसेप (1799-1840) एक यूरोपीय वास्तुकार और विद्वान थे, जिन्हें प्राचीन भारतीय सम्राट अशोक के शिलालेखों को समझने का गौरव प्राप्त है। उन्हें वजन और माप की भारतीय प्रणाली में सुधार और एक समान सिक्का प्रणाली शुरू करने का श्रेय दिया जाता है।

कॉन्ग्रेस सेवा दल ने इस तथ्य को खारिज करने की कोशिश की कि औरंगजेब को मंदिर का विध्वंसकर्ता इसलिए कहा जा सकता, क्योंकि आंशिक रूप से नष्ट की गई दीवार की एक तस्वीर दशकों बाद ली गई थीं। हालाँकि, यह निर्विवाद तथ्य है कि मूल काशी विश्वनाथ मंदिर को औरंगजेब के शासन में नष्ट कर दिया गया था और मस्जिद को उसके खंडहरों पर बनाया गया था। मुसलमान भी इस तथ्य से इनकार नहीं करते हैं, वे केवल यह कहकर इसे सही ठहराते हैं कि औरंगजेब ने मंदिर में पुजारियों के कुछ अपराधों को देखकर मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश दिया था।

इंडियाहिस्ट्रीपिक्स द्वारा पोस्ट की गई तस्वीर में आंशिक रूप से नष्ट हुई दीवार दिखाई दे रही है। साथ ही ट्वीट में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यह मूल काशी विश्वनाथ मंदिर की दीवार है, जो अब ज्ञानवापी मस्जिद का हिस्सा है। मंदिर की दीवारें आज भी मस्जिद पर देखी जा सकती हैं, फिर भी कॉन्ग्रेस ने इस तथ्य पर सवाल उठाने की कोशिश की।

फिर भी औरंगजेब का बचाव करता रहा कॉन्ग्रेस सेवा दल

लोकप्रिय ट्विटर हैंडल ने बार-बार बताने की कोशिश की कि पोस्ट की गई तस्वीर ASI और ब्रिटिश संग्रहालय से ली गई हैं और नष्ट हुए मंदिर की दीवार अब मस्जिद का हिस्सा है। इसके बाद भी महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस सेवा दल ने इस तथ्य पर सवाल उठाना जारी रखा। इस तथ्य को माने के बजाय सेवा दल ने हैदराबाद में चारमीनार के बगल में स्थित भाग्यलक्ष्मी मंदिर का मामला उठाया।

सेवा दल ने कहा कि यह साबित करने के लिए कि ज्ञानवापी मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी, उन्हें पहले और बाद की तस्वीरों को देखने की जरूरत है, जो अलग-अलग समय में अलग-अलग जगह को दर्शाती हैं। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने हैदराबाद में चारमीनार की दो तस्वीरें अलग-अलग पोस्ट कीं। दूसरी रंगीन तस्वीर में चारमीनार के बगल में स्थित भाग्यलक्ष्मी मंदिर दिखाई दे रहा है, जबकि पहली ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर में मंदिर नहीं है। मंदिर का निर्माण 1960 के दशक में किया गया था और यह एक विवादित संरचना है, जिसके विस्तार को तेलंगाना उच्च न्यायालय ने रोक दिया है।

औरंगजेब के बचाव के लिए कॉन्ग्रेस पूरी तरह से असंगत विषय लेकर आई। भाग्यलक्ष्मी मंदिर एक अलग राज्य में पूरी तरह से अलग मुद्दा है। यह मंदिर कुछ दशक पहले ही बनाया गया था, इसलिए बिना मंदिर वाली तस्वीरें उपलब्ध हैं, लेकिन मूल काशी विश्वनाथ मंदिर के अस्तित्व का फोटोग्राफिक प्रमाण माँगना विचित्र है, क्योंकि इसे फोटोग्राफी के आविष्कार के सदियों पहले ध्वस्त कर दिया गया था। इसके अलावा, मस्जिद में दीवारों और अन्य खंडहरों के रूप में मंदिर के भौतिक प्रमाण हैं। इसके साथ ही इसके कई ऐतिहासिक और साहित्यिक साक्ष्य उपलब्ध हैं।

अपने खास उद्देश्य को लेकर सेवा दल ने दोनों तस्वीरों में चारमीनार के पास चार कमान को भी इंगित किया है। चारमीनार के पूरा होने के बाद 16वीं शताब्दी में कमानों का निर्माण किया गया था। इससे पता चलता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी दोनों तस्वीरों में इसे दिखाकर क्या साबित करना चाहती है।

ज्ञानवापी विवादित ढाँचा और सर्वे

ज्ञानवापी मस्जिद परिसर एक विवादित ढाँचा है, जिसे मुगल आक्रांता औरंगजेब द्वारा पुराने काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ कर उसके खंडहरों पर बनाया गया है। कुतुब अल-दीन ऐबक और औरंगजेब जैसे इस्लामी आक्रांताओं द्वारा कई बार इन्हें तोड़ा गया था।

आज तक इस प्राचीन मंदिर के कुछ हिस्से मस्जिद की बाहरी दीवारों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। खासकर पश्चिमी दीवार के दूर बैठा नंदी बैल और माँ श्रृंगार गौरी की मूर्तियाँ देखी जा सकती हैं। इसके अलावा, मंदिर के विध्वंस, मस्जिद के निर्माण और वर्तमान आसन्न स्थल पर मंदिर के पुनर्निर्माण के पर्याप्त ऐतिहासिक प्रमाण हैं। विवादित ढाँचे से सटे हुए काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में, जहाँ भक्त पूजा-अर्चना करते हैं, उसका निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 ईस्वी में कराया था।

वाराणसी की एक अदालत ने 12 मई को विवादित ढाँचे के वीडियोग्राफिक सर्वेक्षण की अनुमति दी थी। वाराणसी के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) रवि कुमार दिवाकर ने इसके लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे। इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट 17 मई को अदालत में प्रस्तुत की जाएगी।

जेम्स बॉन्ड के डायरेक्टर पर 3 महिलाओं ने लगाए यौन शोषण और टॉर्चर के आरोप: इंस्टा पर महिला अधिकारों का समर्थन, बाहर ‘बहन-भतीजी’ से रेप

हॉलीवुड फिल्म जेम्स बॉन्ड के निर्देशक कैरी जोजी फुकुनागा यौन शोषण के आरोपों में घिर गए हैं। फुकुनागा पर तीन यंग लड़कियों ने उनका यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया है। आरोप है कि 44 साल के फुकनागा ने एक एक्ट्रेस को इतना अधिक टॉर्चर किया कि वो पोस्ट ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) से पीड़ित हो गई।

दरअसल, इस ज्यादती का खुलासा उस वक्त हुआ, जब डायरेक्टर फुकुनागा ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर एक डॉक्यूमेंट शेयर कर महिलाओं के अधिकारों पर अपने समर्थन को दोहराया था। इसके साथ ही एक स्टोरी लिखकर चौंकाने वाला खुलासा किया कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ‘रो वी वेड’ फैसले को पलटने वाला है। ये वो फैसला था, जिसके गर्भपात को वैध करार दे दिया था।

23 साल की एक्ट्रेस का आऱोप

फुकुनागा पर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली 23 साल की एक्ट्रेस और प्रोफेशनल स्केटबोर्डर रैचेल विनबर्ग ने कहा कि वो आरोपित से उस वक्त मिली थीं, जब 18 साल की उम्र पूरा होने के एक दिन उन्हें एक विज्ञापन में काम दिया गया। उस दौरान उन्होंने सहमति से सेक्स किया, जो कि 21 साल की उम्र, यानी तीन साल तक चला। विनबर्ग ने कैरी फुकुनागा पर लालच और गाली देने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “तो उन्होंने इसे आज पोस्ट किया। ये मुझे **** करता है, क्योंकि उसे सचमुच में महिलाओं की बिल्कुल भी परवाह नहीं है। वो केवल उन्हें प्रताड़ित करता है। उससे डरकर मैंने कई साल बिताए। ये इंसान एक ग्रूमर है, जो सालों से ऐसा कर रहा है। महिलाएँ इससे बच के रहें।”

विनबर्ग ने आरोप लगाया कि कैरी उनके साथ अपने संबंधों को दुनिया से छुपा कर रखना चाहते थे और अगर कोई उन दोनों के रिश्ते को लेकर पूछे तो कैरी सभी के सामने उसे अपनी भतीजी, चचेरी बहन या बहन होने का नाटक करता था।

इसके अलावा कैरी फुकुनागा पर दो अन्य अभिनेत्रियों ने भी यौन शोषण का आरोप लगाया है। ये एक्ट्रेस जुड़वाँ थीं। इनके नाम हन्ना और केलिन लोश है। वे दोनों कैरी से साल 2018 में नेटफ्लिक्स के एक ड्रामा के सेट पर मिली थीं। उस वक्त उनकी उम्र 20 साल थी। कैरी ने उन दोनों का भी तीन साल तक यौन उत्पीड़न किया था। गौरतलब है कि ‘नो टाइम टू डाई’ जेम्स बॉन्ड सीरीज के डायरेक्टर के तौर पर कैरी फुकुनागा की अंतिम फिल्म थी।

राकेश टिकैत अब नहीं रहे ‘किसानों’ के नेता, भारतीय किसान यूनियन ने बाँध दिया बोरिया-बिस्तर: BKU में अब क्या-कौन?

केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के विरोध का अगुआ रहे भारतीय किसान यूनियन (BKU) में गुटबाजी अब खुलकर सामने आ गई है। संगठन ने राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) को BKU से निकाल दिया गया है। इसके साथ ही उनके भाई नरेश टिकैत (Naresh Tikait) को भी अध्यक्ष पद से हटा दिया गया है। नरेश की जगह राजेश सिंह चौहान (Rajesh Singh Chauhan) को अध्यक्ष बनाया गया है।

यह फैसला BKU के संस्थापक दिवंगत चौधरी महेन्द्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि के अवसर पर 15 मई को लखनऊ के गन्ना किसान संस्थान में संगठन के हुई नेताओं की बैठक लिया गया। संगठन के नेताओं का आरोप है कि BKU एक गैर-राजनीतिक संगठन है, लेकिन राकेश टिकैत ने अपने बयानों और गतिविधियों से इसे राजनीतिक रूप से दे दिया।

नेताओं की नाराजगी को समझते हुए राकेश टिकैत उन्हें मनाने पहुँचे थे। नाराज किसान नेताओं की अगुवाई कर रहे BKU उपाध्यक्ष हरिनाम सिंह वर्मा के आवास पर राकेश टिकैत संगठन के असंतुष्ट नेताओं को समझाने की कोशिश करते रहे, लेकिन इसमें वे नाकाम रहे। इसके बाद वे वापस लौट अपने घर लौट गए। 

टिकैत बंधुओं की राजनीतिक गतिविधियों को देखते हुए संगठन के असंतुष्ट नेताओं ने इस संगठन का नाम भारतीय किसान यूनियन (अराजनीतिक) है। इसके अध्यक्ष राजेश सिंह चौहान बनाए गए हैं। वहीं, उपाध्यक्ष मांगेराम त्यागी राष्ट्रीय प्रवक्ता धर्मेंद्र मलिक युवा प्रदेश अध्यक्ष चौधरी दिगंबर तथा प्रदेश अध्यक्ष हरिनाम सिंह वर्मा बनाए गए हैं।

राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राजेश सिंह चौहान ने कहा कि कार्यकारणी ने निर्णय लिया कि मूल संगठन भारतीय किसान यूनियन थी। अब भारतीय किसान यूनियन (अराजनीतिक) का गठन किया गया है। भारतीय किसान यूनियन अपने किसानों के मूल मुद्दों से भटक गई है और अब राजनीति करने लगी है। इसलिए भारतीय किसान यूनियन (अराजनीतिक) की आवश्यकता महसूस हुई।

उन्होंने कहा, “13 महीने के आंदोलन के बाद जब हम घर आए तो हमारे नेता राकेश टिकैत राजनीतिक तौर पर प्रेरित दिखाई दिए। हमारे नेताओं ने कुछ राजनीतिक दलों के प्रभाव में आकर एक दल के लिए प्रचार करने का आदेश तक दिया। मेरा काम राजनीति करना या किसी पार्टी के लिए काम करना नहीं है। मेरा काम किसान की लड़ाई लड़ना रहेगा। यह नया संगठन है।”

1400 ऊँट से लूट का माल ले गया मुहम्मद गोरी, कुतुबुद्दीन ने दोबारा तोड़ा काशी विश्वनाथ मंदिर, सैकड़ों शिवालय: जैन मंत्री ने पुनर्निर्माण को भेजा दान

काशी विश्वनाथ परिसर में स्थित ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में अदालत द्वारा नियुक्त एडवोकेट कमिश्नर के नेतृत्व में और पुलिस-प्रशासन की मौजूदगी में सर्वे और वीडियोग्राफ़ी का कार्य जारी है। किस तरह औरंगजेब ने एक मंदिर को ध्वस्त कर के इसके ऊपर मस्जिद का निर्माण करवाया, ये किसी से छिपा नहीं है। हिन्दुओं के संघर्ष के बाद अब सच्चाई सामने आ रही है। आइए, हम यहाँ काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास और इस्लामी आक्रांताओं की क्रूरता की चर्चा करते हैं और बताते हैं कैसे मुहम्मद गोरी और कुतुबुद्दीन ऐबक ने यहाँ तबाही मचाई।

काशी में 10वीं और 11वीं शताब्दी में गहड़वाल वंश का शासन था, जो उस समय भारतीय उपमहाद्वीप की बड़ी राजपूत शक्तियों में से एक हुआ करते थे। एक समय उनका शासन कन्नौज तक फैला हुआ था। आज के उत्तर प्रदेश और बिहार के कई जिलों पर ये राजवंश वाराणसी को राजधानी बना कर शासन करता था। इसके संस्थापक राजा चंद्रदेव/चन्द्रादित्य (1189-1103) थे (हालाँकि, उनके पुरखों का भी जिक्र मिलता है), जिन्होंने कमजोर होते गजनवी आक्रमणों के बीच एक अच्छी शासन व्यवस्था चलाई।

तभी उस समय के शिलालेखों में उन्हें ‘धरती का रक्षक’ भी कहा गया। तुर्कों के आक्रमण से उन्होंने साम्राज्य को सुरक्षित रखा। उस समय के दस्तावेजों की मानें तो राजा भोज और कर्ण की मृत्यु के बाद जब वेदों की वाणी गायब हो रही थी, ऐसे समय में चंद्रदेव ने वाराणसी, अयोध्या और दिल्ली की रक्षा की। इसी राजवंश में प्रतापी राजा गोविंदचंद्र (शासनकाल – 1114-1155) भी हुए, जिन्होंने 40 वर्षों से भी अधिक समय तक शासन किया।

ये वही राजा हैं, जिन्होंने राम मंदिर वाले स्थल पर एक मंदिर का निर्माण करवाया था। ‘विष्णु-हरि शिलालेख’ में इसका विवरण मिलता है, जो बाबरी विवादित ढाँचे के मलबे में पाया गया था। तब का मुस्लिम इतिहासकार सलमान दावा करता है कि कान्यकुब्ज (कन्नौज) पर सालार मसूद ने कब्ज़ा कर लिया था। हालाँकि, गोविंदचंद्र से हार के कारण इस्लामी आक्रांताओं को वहाँ से भागना पड़ा। तुर्क से वाराणसी को बचाने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है।

उन्होंने एक विदेशी इस्लामी हमलावर को बुरी तरह हराया था। इस तरह हिन्दू राजा अपनी जान पर खेल कर हिन्दू धरोहरों की रक्षा करते रहे, लेकिन मुहम्मद गोरी ने 12वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारत में एक के बाद एक लूट और विध्वंस की घटनाओं को अंजाम दिया। सन् 1193 में कन्नौज के राजा जयचंद और कुतुबुद्दीन ऐबक के बीच यमुना नदी के किनारे चंदावर (अभी फिरोजाबाद) में एक भीषण युद्ध हुआ, जिसमें जयचंद की मृत्यु हो गई।

पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गोरी के बीच हुए युद्ध में इस्लामी सेना की जबरदस्त हार हुई थी, लेकिन अगले एक वर्ष में ही वो दोबारा लौटा और पृथ्वीराज चौहान की हार के साथ ही दिल्ली में इस्लामी सत्ता की स्थापना हो गई। जयचंद के खिलाफ युद्ध में खुद मुहम्मद गोरी और कुतुबुद्दीक ऐबक अपनी-अपनी फ़ौज के साथ था। जयचंद का कटा हुए सिर इन दोनों इस्लामी शासकों के सामने लाया गया। इसके बाद, मुहम्मद गोरी वाराणसी की तरफ बढ़ा।

पृथ्वीराज चौहान और जयचंद जैसे हिन्दू राजाओं की मृत्यु के बाद वाराणसी को बचाने वाला शायद ही कोई था। वाराणसी में लूटपाट का भयंकर मंजर देखने को मिला। मंदिर के मंदिर तोड़ डाले गए। वाराणसी न सिर्फ एक धार्मिक नगरी थी, बल्कि व्यापार और वित्त का भी बड़ा केंद्र था ये स्थल। ऐसे में मुहम्मद गोरी ने मनमाने ढंग से लूटपाट मचाई। कहते हैं, यहाँ से लूटे हुए माल को ले जाने के लिए उसे 1400 ऊँटों की ज़रूरत पड़ी थी।

कन्नौज जैसा बड़ा महत्वपूर्ण शहर भी इसके बाद प्रभावहीन हो गया और इल्तुतमिश के आक्रमण के बाद इसका बचा-खुचा प्रभाव भी समाप्त हो गया। काशी विश्वनाथ मंदिर को भी इसी दौरान ध्वस्त किया गया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी उठाई। राजा जयचंद के पुत्र हरीशचंद्र इस दौरान कन्नौज को फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे। जबकि कुतुबुद्दीन ऐबक सैयद जमालुद्दीन को नियुक्त कर वहाँ से निकल गया था।

हरीशचंद्र और आम लोगों ने जब मंदिर का निर्माण पुनः शुरू कर दिया, तब कुतुबुद्दीन ऐबक ने 4 वर्षों बाद फिर से अपनी फ़ौज के साथ हमला किया और भारी तबाही मचाई। कुतुबुद्दीक ऐबक ने विश्वेश्वर, अविमुक्तेश्वर, कृतिवासेश्वर, काल भैरव, आदि महादेव, सिद्धेश्वर, बाणेश्वर, कपालेश्वर और बालीश्वर समेत सैकड़ों शिवालयों को तबाह कर दिया। इस तबाही के कारण अगले पाँच-छः दशकों तक ये मंदिर इसी अवस्था में रहे।

तुर्कों का शासन था और दिल्ली में उनकी अवस्था और मजबूत ही होती जा रही थी, ऐसे में कुछेक साधु-संतों के अलावा धर्म की मशाल को ज़िंदा रखने वाले लोग कम ही बचे थे। काशी वही है, जिसके बारे में 7वीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेन सांग ने वर्णन किया है कि उसने यहाँ सैकड़ों शिव मंदिर देखे और हजारों साधु-श्रद्धालु भी अपने शरीर पर भस्म मल कर घूमते हुए उसे दिखे। उसने एक 30 मीटर ऊँची शिव प्रतिमा का भी जिक्र किया है।

हालाँकि, 13वीं शताब्दी के मध्य में ही मुहम्मद गोरी की मौत हो गई और कुतुबुद्दीन ऐबक भी इस दशक के अंत तक मर गया। लेकिन, दिल्ली सल्तनत का काशी पर कब्ज़ा जारी रहा। इसके बाद इल्तुतमिश और फिर उसकी बेटी रजिया सुल्तान का शासन हुआ। इल्तुतमिश के समय ही एक जिक्र मिलता है कि जैन व्यापारी वास्तुपाल ने काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए 1 लाख रुपए भेजे थे। स्थानीय स्तर पे हिन्दुओं ने फिर से दबदबा बना लिया था।

वास्तुपाल का नाम जब आया तो उनके बारे में बता दें कि वो गुजरात में वाघेला राजा वीरधवल और फिर उनके बेटे विशालदेव के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। उन्होंने न जाने कितने ही मंदिरों का निर्माण करवाया। तब के लोकप्रिय जैन साधु हेमचन्द्र के अनुयायी वास्तुपाल ने काशी और प्रयाग में मंदिरों के निर्माण करवाए। एक अंदाज़ा है कि उन्होंने उस समय 300 करोड़ रुपए मंदिरों के निर्माण पर खर्च कर दिए। हालाँकि, इस दौरान वाघेला राजाओं का सेना पर खर्च कम हो गया और अल्लाउद्दीन खिलजी से अंतिम राजा कर्ण को हार का सामना करना पड़ा।