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ठंड में ठिठुरती बच्ची बनी प्रेरणा, आज 18 राज्यों में उजियारा फैला रही है AROH: 5 लाख लोगों के जीवन में बदलाव लाने की कहानी

एक गैर सरकारी संस्था (NGO) है। नाम है- A Ray Of Hope (AROH)। इसका मकसद है गरीब और पिछड़े हुए लोगों की पढ़ाई, नौकरी और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करना है। इस फाउंडेशन का मुख्य उद्देश्य महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है। इसकी फाउंडर डॉ. नीलम गुप्ता हैं। फाउंडेशन की शुरुआत 2001 में हुई। मगर इसकी रुपरेखा काफी पहले ही नीलम गुप्ता के जेहन में तैयार हो गई थी, जरूरत थी तो बस उसे जमीन पर उतारने की और यह साकार हुआ 2001 में।

हालाँकि नीलम गुप्ता के लिए इसे शुरू करना इतना आसान नहीं रहा, क्योंकि वह भी हमारी-आपकी तरह ही मिडिल क्लास फैमिली से थी और मिडिल क्लास फैमिली में तो बस ऑफिस में जाकर 9-10 घंटे काम करना और उसके लिए सैलरी मिलने को ही नौकरी माना जाता है। इस बात से आप भी भलीभँति परिचित होंगे और कहीं न कहीं सहमत भी होंगे कि मिडिल क्लास फैमिली में सोशल सर्विस (दूसरों की मदद करना), दूसरों के सपनों को पूरा करने को कोई जॉब नहीं माना जाता है। 

बहरहाल नीलमा गुप्ता के इस चुनौती भरे सफर पर नजर करने से पहले बात करते हैं कि फाउंडेशन की शुरुआत किस तरह से हुई। नीलम को किन कारणों ने चुनौतियों से लड़कर इस फाउंडेशन की शुरुआत करने की प्रेरणा दी।

नीलम गुप्ता की लाइफ का टर्निंग प्वाइंट और AROH फाउंडेशन की शुरुआत

वह दिसंबर की सर्द सुबह थी। नीलम गुप्ता स्कूल जा रही थीं। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक गरीब बच्ची ठंड से काँप रही है। उसके शरीर पर कोई गर्म कपड़े नहीं है। उसने फटी, पतली, सूती कमीज पहनी हुई थी। बच्ची की इस हालत को देखकर उन्हें दया आ गई। उन्होंने अपनी स्वेटर उतार कर बच्ची को दे दिया। अगले दिन जब वह स्कूल जा रही थी तो उन्होंने उसी बच्ची को वही पुराने-फटे कपड़े पहने देखा। आज भी वह ठंड से काँप रही थी। यह देख वह थोड़ी सी हैरान रह गई। उन्होंने जब बच्ची से स्वेटर के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके पिता ने उसे कुछ पैसे में बेच दिया, क्योंकि उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं था। यह घटना गुप्ता की लाइफ का टर्निंग प्वाइंट था। उन्होंने उसी क्षण गरीब, जरूरतमंदों और वंचित लोगों के उत्थान के लिए काम करने और अधिक से अधिक लोगों को विकास के समान अवसर प्रदान करने का फैसला किया।

अब आते हैं नीलम गुप्ता के स्कूल से निकल कर पीएचडी करने और फिर AROH फाउंडेशन की शुरुआत करने के बीच आई चुनौतियों पर। नीलम का जन्म दिल्ली के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। उनके पिता एक सरकारी कर्मचारी थे और माँ हाउसवाइफ थीं। 80 और 90 के दशक में एक सरकारी कर्मचारी का परिवार काफी मुश्किलों से अपना गुजारा करते थे। नीलम कहती हैं कि वह चाहकर भी दूसरों की मदद करने की स्थिति में नहीं थे।

फाउंडेशन की शुरुआत करने को लेकर नीलम गुप्ता The Better India से बात करते हुए कहती हैं, “पहली और सबसे बड़ी चुनौती मेरे माता-पिता की तरफ से आई, जिन्होंने मुझे ‘फालतू विचार’ (‘stupid idea’) को छोड़ने और नौकरी करने व शादी करने के लिए कहा। मेरे माता-पिता ने दान करने को बेवकूफी भरा फैसला बताया। हम अपने पिता के कम वेतन में मुश्किल से समय गुजारते थे। मुझे वित्तीय स्थिरता हासिल करने और मेरे सपने को पंख देने के लिए सही समय की प्रतीक्षा करने के लिए कहा गया था।”

हालाँकि, नीलम ने दूसरों की मदद करने के अपने सपने को कभी नहीं छोड़ा। उन्होंने अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद एक प्रिंटिंग एंड पब्लिशिंग बिजनेस शुरू किया। इससे उन्होंने अच्छा पैसा कमाया और फिर 2001 में AROH लॉन्च किया। वह बताती हैं कि वह प्रिंटिंग एंड पब्लिशिंग बिजनेस से सालाना 3-5 लाख रुपए कमाती थी। इसने उनके अंदर सामाजिक क्षेत्र में उद्यम करने के लिए आत्मविश्वास पैदा किया।

2001 में स्थापित और पंजीकृत, AROH फाउंडेशन शिक्षा, कौशल विकास, स्थायी आजीविका, स्वास्थ्य और स्वच्छता के क्षेत्र में अच्छी तरह से डिज़ाइन किए गए कार्यक्रमों के माध्यम से गरीब और हाशिए के समुदायों को सशक्त बनाने की दिशा में काम करता है। वर्तमान में NGO भारत के 18 से अधिक राज्यों में फैला हुआ है। मेघालय के बीहड़ इलाकों से लेकर, छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित लाल गलियारों से लेकर सीतामढ़ी, बिहार के कई जिलों तक, भारत के दूरस्थ स्थानों में AROH काम कर रहा है।

AROH फाउंडेशन ने अपने विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से 5 लाख से अधिक लोगों की जिंदगी बदली है। उनके जीवन में सामाजिक-आर्थिक विकास हुआ है। NGO ने विभिन्न हस्तक्षेपों के माध्यम से एक लाख से अधिक महिलाओं के जीवन को प्रभावित किया है। अब तक फाउंडेशन ने 25,000 से अधिक युवाओं को प्रशिक्षित किया और उन्हें नौकरियों व स्वरोजगार में लगाया है। इसने संगठन में लगभग 200 लोगों को रोजगार देकर अर्थव्यवस्था में भी मदद की है।

AROH फाउंडेशन को भारत में सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है। फाउंडेशन को सभी 17 SDG को प्रभावित करने के अपने काम के लिए जाना जाता है, जिसके लिए इसे 2019 में ग्लोबल कॉम्पैक्ट इंडिया नेटवर्क से सर्वश्रेष्ठ NGO का पुरस्कार मिला।

फाउंडेशन की शुरुआत में, नीलम गुप्ता ने ग्रामीण क्षेत्रों में भारत सरकार की परियोजनाओं के लिए अनुसंधान और रणनीति नियोजन सहायता प्रदान की, लेकिन जल्द ही लोगों के साथ सीधे अपने NGO के माध्यम से काम करना शुरू कर दिया। सरकारी परियोजनाओं का अध्ययन करते समय, नीलम ने पाया कि सरकार की नीतियों और उनके कार्यान्वयन के बीच एक बड़ा गैप था और उन्हें लगा कि वह एक बदलाव ला सकती हैं।

वह कहती हैं, “मैं विकास की कमी के लिए सरकार और स्थानीय निकायों को दोष देने के बजाय अंतर को पाटना चाहती थी। मैंने महसूस किया कि गाँवों में गए बिना, बिना समस्याओं जाने और उन्हें सही रूप से विकसित किए बिना यह संभव नहीं होगा। मैंने सरकारी परियोजनाओं के लिए प्रयास किया, लेकिन ग्रामीण विकास मंत्रालय से अपना पहला प्रोजेक्ट पाने में मुझे लगभग आठ साल लग गए। यह एक कौशल विकास और नियोजन कार्यक्रम था जिसे स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना (SGSY) कहा जाता है।”

कार्यक्रम सफल रहा और 30 महिलाओं सहित लगभग 100 युवाओं को रिटेल, हॉस्पिटैलिटी और बीपीओ क्षेत्रों में रोजगार मिला। यह 2008 था और उन्होंने तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा। AROH ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और मेघालय जैसे राज्यों के दूरदराज के गाँवों में भारत सरकार के एकीकृत ग्राम विकास कार्यक्रम को लागू किया है। इस कार्यक्रम में भारत के 100 से अधिक गाँवों में 10000 व्यक्तिगत घरों का निर्माण, और 6000 सौर स्ट्रीट लाइट और 250 सोलर वाटर फिल्टरेशन यूनिट्स की स्थापना शामिल थी। संगठन ने 5000 हेक्टेयर से अधिक भूमि को बेहतर फसल और खेती की तकनीक के तहत लाया है और 100 से अधिक तालाबों का कायाकल्प किया है।

गाँवों में काम करने के दौरान और स्थानीय लोगों से सहयोग लेने में होने वाली परेशानियों के बारे में बात करते हुए नीलम कहती हैं, “लोग गाँवों में प्रवेश करने से डरते हैं। हमें समूहों द्वारा कहा गया है, यदि आप इस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं, तो आप जीवित नहीं लौटेंगे। आपका यहाँ पर कोई काम नहीं है। कई बार हमें ग्रामीणों के विरोध का सामना करना पड़ता है, वो सोचते हैं कि हम उनसे कुछ छीन रहे हैं। लेकिन मैंने अपने लोगों से कहा कि उनके साथ बैठो और उन्हें समझाओ कि हमारा काम उनके खिलाफ नहीं है। हम उन्हें समझाते हैं कि हम उनके लाभ के लिए काम कर रहे हैं। हम उनकी आजीविका और विकास के लिए काम कर रहे हैं।”

वह कहती हैं, “AROH फाउंडेशन का भविष्य केवल वही नहीं है जो मैंने सपना देखा है या प्लान बनाती हूँ। अब यह सभी कर्मचारियों और लाभार्थियों का सपना है। भविष्य की योजना में ऐसे मुद्दे भी शामिल हैं जिन पर समाज के हाशिए के वर्गों के संपूर्ण विकास के लिए तत्काल विचार और कार्रवाई की आवश्यकता है। लगभग दो दशकों के अपने अनुभव, विशेषज्ञता और सीखने के साथ, AROH के पास राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अपने आउटरीच में खुद को सबसे बड़े एनजीओ के रूप में स्थापित करने के लिए एक मजबूत रोडमैप है। मुझे AROH को एक विश्वसनीय संस्थान के रूप में स्थापित करने पर गर्व है जो नई ऊँचाइयों को छू रहा है और गरीबों के सशक्तिकरण के लिए काम कर रहा है।”

‘पिछड़ों और गरीबों की शक्ति का नाम है हनुमान, वो समाज को सँभालने वाले’: IGNOU प्रोफेसर्स से बोले केंद्र मंत्री – आप सब में उनके गुण

देश में हनुमान चालीसा को लेकर छिड़ी बहस के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान (Dharmendra Pradhan) ने नया बयान दिया है। उन्होंने मंगलवार (26 अप्रैल, 2022) को कहा कि इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) के प्रोफेसर भगवान हनुमान की तरह हैं जिन्हें अपनी शक्ति का आभास नहीं था। उन्होंने कहा कि इग्नू के प्रोफेसरों के काम की सराहना की जानी चाहिए।

अध्यापकों में हनुमान के गुण

हनुमान चालीसा को लेकर हाल में उठे विवादों (Hanuman Chalisa Controversy) पर केंद्रीय मंत्री ने कहा, “हमारे देश में सहिष्णुता के बारे में बोला जाता है और लिखा जाता है। कई बार हमें विदेशों से भी इस बारे में सलाह मिलती हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह हमारे लोकतंत्र में अंतर्निहित है।”

उन्होंने कहा कि इग्नू के सभी प्रोफेसर और देशभर में इसके क्षेत्रीय केंद्रों से जुड़े अध्यापकों में हनुमान जी के गुण हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा, “इग्नू में जो प्रोफेसर्स हैं, आप जहाँ-जहाँ सेंटर्स में बैठें हैं, आप लोग सच में हनुमान हो। आप लोग अंजनी पुत्र हो। अंजनी पुत्र का एक गुण है। वो समाज को सँभालने वाले, बचाने वाले और कभी-कभी साहित्यकार कहते हैं कि हनुमान आदिवासी हैं। वह पिछड़ों, गरीबों और वंचितों के प्रतिनिधित्व करने वाली शक्ति का नाम है हनुमान। उस हनुमान को अपना ताकत का अहसास खुद नहीं होता है। कभी-कभी उन्हें याद दिलाना पड़ता था कि आप क्या कर सकते हो। कोई ललकारता था, कोई समझाता था तो वो असंभव काम करते थे। आप इग्नू वाले भी हनुमान हो।”

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के 35वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए प्रधान ने यह बातें कहीं। दीक्षांत समारोह में देशभर में कुल 2,91,588 छात्रों ने डिग्री और डिप्लोमा हासिल किए जो अब तक की सबसे बड़ी संख्या है। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, “अगर हम भारत को ज्ञान आधारित आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते हैं, तो हमें अपने शिक्षा परिदृश्य में एक आदर्श बदलाव सुनिश्चित करना चाहिए।” उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति 2020 हमारी शिक्षा और कौशल के परिदृश्य को बदलने की दिशा में एक कदम है।

उन्होंने कहा, “इसके साथ ही प्रधान ने कहा कि हमें वसुधैव कुटुम्बकम की भावना के अनुरूप अपनी शिक्षा प्रणाली को अधिक समग्र, सहानुभूतिपूर्ण और वैश्विक भलाई के लिए अपनी सभ्यतागत संपदा और अपनी भारतीय ज्ञान प्रणाली की अपार क्षमता का उपयोग करना होगा।”

हनुमान चालीसा विवाद

गौरतलब है कि हनुमान चालीसा विवाद मामले में गिरफ्तार चल रही महाराष्ट्र के अमरावती से सांसद नवनीत राणा और उनके विधायक पति रवि राणा को फिलहाल मुंबई की सेशन कोर्ट से राहत नहीं मिली है। दोनों की जमानत याचिका पर मंगलवार को सुनवाई होनी थी, लेकिन कोर्ट की ओर से सुनवाई को टाल दिया गया। अब इस मामले में 29 अप्रैल को सुनवाई होगी। राणा दंपती को हनुमान चालीसा का पाठ करने को लेकर उठे विवाद के बाद गिरफ्तार किया गया था। राणा दंपती पर आईपीसी की धारा 15A और 353 के साथ-साथ बॉम्बे पुलिस एक्ट की धारा 135 के तहत FIR दर्ज है। सबसे बड़ी धारा 124A, यानी राजद्रोह की धारा भी लगाई गई है।

टेरर फंडिंग के लिए मेडिकल प्रोग्राम का इस्तेमाल, अलगाववादियों को तरजीह: पाकिस्तानी डिग्री पर इन कारणों से लग सकता है बैन

भारत सरकार विदेशों से मेडिकल ग्रेजुएट परीक्षा (FMGE) में शामिल होने के लिए पाकिस्तानी मेडिकल की डिग्री (Medical Degree) को अमान्य करार देने पर विचार कर रही है। पाकिस्तान से डिग्री पाने वालों को लेकर अधिकारियों ने कहा है कि मेडिकल स्पॉन्शरशिप प्रोग्राम का इस्तेमाल पाकिस्तान कथित तौर पर टेरर फंडिंग (Terror Funding) के लिए कर रहा है।

‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले को लेकर विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय औऱ राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की बैठक हो चुकी है। अधिकारियों ने कहा, “पाकिस्तानी संस्थानों में मेडिकल सीटें कई अलगाववादी संगठनों के लिए आवंटित की जाती हैं और बच्चों का एडमिशन कराने के बदले इन समूहों की पैसे जुटाने में मदद की जाती है। बीते वर्षों में पाकिस्तान में कई मेडिकल सीटें मारे गए आतंकियों के परिवार के सदस्यों को ऑफर की गई हैं।”

गौरतलब है कि इंडियन मेडिकल काउंसिल एक्ट (IMCA), 1956 के अनुसार, विदेशों से मेडकल की डिग्री लेने वालों को भारत में अगर प्रैक्टिस करना है तो उन्हें इसके लिए FMGE टेस्ट पास करना अनिवार्य है। ये परीक्षा हर साल जून और दिसंबर में एनईबी के द्वारा आयोजित की जाती है।

क्या है पूरा मामला

23 अप्रैल 2022 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) ने एक गाइडलाइन जारी की थी, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान में शिक्षा हासिल कर लौटने वालों को भारत में नौकरी नहीं मिलेगी। भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में उनका दाखिला भी नहीं होगा। यूजीसी और एआईसीटीई ने यह भी स्पष्ट किया था कि पाकिस्तान से आए प्रवासी और उनके बच्चे जिन्हें भारत द्वारा नागरिकता प्रदान की गई है, वह गृह मंत्रालय की मँजूरी के बाद भारत में रोजगार पाने के पात्र होंगे।

यूजीसी के अध्यक्ष एम जगदीश कुमार (UGC Chairperson M Jagadesh Kumar) ने कहा था, “यूजीसी और एआईसीटीई भारतीय छात्रों के हित में ऐसे सार्वजनिक नोटिस जारी करते हैं, जो देश के बाहर अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं। हाल के दिनों में हमने देखा है कि कैसे हमारे छात्रों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए विदेशों में वापस नहीं जा सके।”

किन-किन अलगाववादियों के बच्चे पाकिस्तान से पढ़े

गौरतलब है कि अलगाववादी संगठन घाटी में लोगों को सेना के स्कूलों में जाने से रोकते हैं। वहाँ युवाओं को बरगलाकर उनसे पत्थरबाजी करवाते हैं, लेकिन वे अपने बच्चों को पाकिस्तान समेत दूसरे देशों में अच्छी शिक्षा दिलाते हैं। हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी का बेटा पाकिस्तान के रावलपिंडी में एक डॉक्टर है। इसके अलावा उनका दूसरा बेटा जहूर एक निजी एयरलाइन में क्रू मेंबर हैं। जबकि गिलानी की बेटी जेद्दा में टीचर है। 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी एक अन्य बेटी पाकिस्तान में मेडिकल की पढ़ाई कर रही थी।

इसी तरह से मुस्लिम लीग के मोहम्मद यूसुफ मीर और फारूक गतपुरी की बेटियाँ पाकिस्तान से मेडिकल की पढ़ाई कर रही थीं। वहीं डीपीएम नेता ख्वाजा फिरदौस वानी की बेटा भी पाकिस्तान से मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था।

इसी तरह से गिलानी के गुट का एक अन्य अलगाववादी नेता है अब्दुल अजीज डार। उनके दो बेटे उमर डार और आदिल डार पाकिस्तान में पढ़ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर डेमोक्रेटिक लिबरेशन पार्टी के चीफ हाशिम गुलाल का बेटा इकबाल और बिलाल लंदन में रहता है।

वहीं कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन दुख्तरान-ए-मिल्लत आसिया अंद्राबी के प्रमुख की बहन मरियम अंद्राबी अपने परिवार के साथ मलेशिया में रहती है। आसिया अपने बड़े बेटे को आगे की पढ़ाई के लिए मलेशिया भेजना चाहती थी, लेकिन उसे पासपोर्ट देने से इनकार कर दिया गया।

‘फिल्म हिंदी में बनाते हैं, बातें अंग्रेजी में करते हैं, स्क्रिप्ट रोमन में देते हैं’: बॉलीवुड के इंग्लिश कल्चर पर भड़के नवाजुद्दीन सिद्दीकी

बॉलीवुड एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी अपनी बेबाकी को लेकर जाने जाते हैं। वे अक्सर बॉलीवुड के दोहरे स्टैंडर्ड पर बोलते रहते हैं। बॉलीवुड में रंगभेद, नेपोटिज्म और रेसिज्म जैसे गंभीर मुद्दों पर अपनी बात रख चुके हैं। अब उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हिंदी के कम इस्तेमाल को लेकर बॉलीवुड पर निशाना साधा है।

उन्होंने कहा कि हम हिंदी फिल्में बनाते हैं, लेकिन हिंदी भाषा में बात करने में ही शर्म महसूस करते हैं। साउथ में ऐसा नहीं देखा जाता है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने टाइम्स नाउ नवभारत के दिए एक कार्यक्रम में यह बात कही। वे 23 अप्रैल 2022 को टाइम्स नेटवर्क इंडिया इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में ‘एस्पिरेशन टू एक्शन’ नाम के विशेष सत्र में बोल रहे थे।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बगैर किसी का नाम लिए कहा कि फिल्म हिंदी में बनाते हैं और स्क्रिप्ट रोमन में देते हैं। इससे फिल्म के सेट पर थिएटर आर्टिस्ट को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड का नाम बदल कर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री रखना चाहिए।

नवाज ने कहा कि जब उनके पास फिल्म की स्क्रिप्ट आती है तो रोमन में आती है। जिसे समझना मुशकिल हो जाता है। इसके लिए उन्हें देवनागरी में स्क्रिप्ट माँगनी पड़ती है। एक्टर ने कहा, “आप हिंदी में फिल्म बना रहे हो, लेकिन डायरेक्टर भी, असिस्टेंट भी, सारे इंग्लिश में बात कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि जब सारे अंग्रेजी में बात करते हैं तो इससे आर्टिस्ट की परफॉर्मेंस पर असर पड़ता है। आधी बात समझ आती है और आधी नहीं समझ में आती है। साउथ इंडस्ट्री में सब अपनी भाषा में बात करते हैं, गर्व महसूस करते हैं। तमिल फिल्म बन रही है तो सभी लोग तमिल में बात करेंगे। कन्नड़ फिल्म बन रही है तो सभी लोग कन्नड़ में बात करेंगे… तो एक माहौल बन जाता है। सबको सबकी बातें समझ आती हैं। इससे माहौल बनता है और कुछ अच्छा ही क्रिएट होता है। तभी साउथ की फिल्में हिट होती है। हमारे यहाँ ऐसा नहीं होता है।”

एक्टर ने कहा कि हमारे यहाँ हर कोई अपनी खीर बना रहा होता है और एक्टर चुपचाप खड़ा रहता है। जो अच्छा एक्टर है, थिएटर का एक्टर है, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा, क्योंकि वो अंग्रेजी नहीं जानता। वो इधर-उधर देखता है, उसी के किरदार के बारे में बात कर रहे होते हैं, लेकिन उसे ही समझ नहीं आता। सिद्दीकी ने यह भी कहा कि थिएटर से आने वाले कई प्रतिभाशाली अभिनेता पॉश शहरी पृष्ठभूमि से नहीं आते हैं और वह मॉडर्न इंग्लिश बोलने में सहज नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अगर सेट पर हर कोई हिंदी में बात करेगा, तो अभिनेता के लिए यह समझना आसान होगा कि परफॉर्मेंस के मामले में उसके लिए क्या जरूरी है।

यह पूछे जाने पर कि क्या आजकल फिल्में राजनीतिक टूल बन गई है, सिद्दीकी ने कहा, “फिल्म तो फिल्म है। सभी प्रकार की फिल्में पहले भी बनीं, अभी भी बन रही हैं और आगे भी बनती रहेंगी। यह दर्शकों पर निर्भर करता है कि वे इसे कैसे देखते हैं, कैसे लेते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि हाल के दिनों में जिस तरह की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल रहीं, उससे वह निराश हैं।

गौरतलब है कि गृह मंत्री अमित शाह ने भी 9 अप्रैल 2022 को अंग्रेजी की जगह अधिक से अधिक हिंदी भाषा के के इस्तेमाल पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था, “विभिन्न राज्यों के लोगों को एक-दूसरे से हिंदी में बात करना चाहिए, न कि अंग्रेजी में। अब समय आ गया है कि राजभाषा को देश की एकता का महत्वपूर्ण अंग बनाया जाए। जब अन्य भाषा बोलने वाले राज्यों के लोग आपस में एक-दूसरे से बात करते हैं, तो यह भारत की भाषा में होना चाहिए।”

शाह ने यह भी कहा था कि हिंदी को अंग्रेजी के विकल्प के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए न कि स्थानीय भाषाओं के लिए। उन्होंने कहा कि जब तक हम अन्य स्थानीय भाषाओं के शब्दों को स्वीकार करके हिंदी को लचीला नहीं बनाते हैं तब तक इसका प्रचार नहीं किया जा सकेगा।

‘BJP ने गरीब मुस्लिमों को पैसे दे फिंकवाए पत्थर’: दिग्विजय सिंह ने गढ़ी नई थ्योरी, हिंदू आतंकवाद और 26/11 RSS ने करवाया के प्रणेता भी यही

मध्य प्रदेश के खरगोन में रामनवमी पर भड़की हिंसा की शुरुआत शोभा यात्रा पर फेंके गए पत्थरों के साथ हुई थी। इसकी कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हैं और पुलिस की कार्रवाई भी इन्हीं आधारो पर चल रही है। मगर, इन्हीं सब के बीच प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह एक नई थ्योरी लाए हैं। उनका कहना है कि ये सब कुछ भाजपा का किया हुआ है। उन्होंने ही गरीब मुस्लिमों को पैसे दिए, फिर उनसे पत्थर फिंकवाए।

दिलचस्प बात ये है कि दिग्विजय सिंह पर अपने आरोप सिद्ध करने के लिए कोई तथ्य नहीं हैं। वह कहते हैं, “मुझे कुछ शिकायतें मिली हैं जो सत्यापित नहीं हैं, लेकिन इन शिकायतों के अनुसार, भाजपा के कुछ लोग गरीब मुस्लिम लड़कों से पैसे देकर उनसे पत्थर फिंकवाते हैं।” आगे दिग्विजय सिंह ने ये भी स्पष्ट किया, “मेरे पास तथ्य नहीं हैं, इसलिए मैं सिर्फ आरोप लगा रहा हूँ, लेकिन मैं इन शिकायतों की जाँच करूँगा।”

दिग्विजय सिंह की अक्ल पर पड़ गए हैं पत्थर

दिग्विजय सिंह के इस बयान के बाद भाजपा नेता व प्रदेश मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, “दिग्विजय सिंह की अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं और जिस प्रकार से नेहरू परिवार की चाटुकारिता के लिए, तुष्टिकरण की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए वो जो बयानबाजी कर रहे हैं, वो केवल राजनीतिक हैं।” 

सारंग ने कहा,  “एक एफआईआर के बाद वो कह रहे हैं, ‘मैं आरोप नहीं लगा रहा, मैं बस बात बोल रहा हूँ’ तो आप अपनी बात भी किस तथ्य पर बोल रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी को न दंगा कराने की जरूरत है और न वो दंगा कराती है। भाजपा दंगा रोकती है। ये नेहरू परिवार और कॉन्ग्रेस का इतिहास है कि उन्होंने दंगे कराए ताकि उनकी राजनैतिक रोटियाँ सिंके। ये आरोप लगाकर दिग्विजय सिंह ने अपनी हैसीयत बताई है। उनकी बातों का न तथ्य है न आधार है।”

‘हिंदू आतंकवाद शब्द गढ़ने वाले दिग्विजय सिंह’

गौरतलब है कि मुस्लिम तुष्टिकरण पर अपनी राजनीति करने वाले दिग्विजय सिंह पहली बार नहीं है जब मुस्लिमों के बचाव में आए हों और हिंदुओं पर हुए हमले के लिए हिंदुओं को ही जिम्मेदार बताने का काम किया हो। यूपीए सरकार के दौरान दिग्विजय सिंह द्वारा भगवा आतंकवाद जैसे शब्द की नींव रखी गई जिसका खुलासा यूपीए सरकार के दौरान गृहमंत्रालय में अवर सचिव रहे आरवीएस मणि ने भी किया और बताया कि उनकी किताब ये स्पष्ट करती है कि कैसे दिग्विजय सिंह द्वारा हिंदू आतंक शब्द की नींव रखी गई और इसे फैलाय गया।

26/11 हमले में RSS को बदनाम करने की कोशिश

इतना ही नहीं 2008 में हुआ 26/11 एक आतंकी हमला था। लेकिन कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसे आरएसएस द्वारा किया गया हमला बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बकायदा दिग्विजय सिंह द्वारा इस संबंध में एक किताब का लोकार्पण किया गया और हिंदू आतंकवाद शब्द की अवधारणा गढ़ी गई। इस काम में दिग्विजय सिंह का साथ सोनिया गाँधी, अहमद पटेल और राहुल गाँधी ने भी दिया था।

‘भगवा पहने हैं, ब्रह्मदंड लिए हैं, अंदर नहीं जा सकते’: जगद्गुरु परमहंसाचार्य को ताजमहल में जाने से रोका, कहा- भगवान शिव की दबी पिंडी का दर्शन करने आया था

अयोध्या की तपस्वी छावनी के संत जगद्गुरु परमहंसाचार्य (Jagadguru Paramhansacharya) को ताजमहल (Taj Mahal) में जाने से रोके जाने का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि जगद्गुरु मंगलवार (26 अप्रैल 2022) को शिष्यों के साथ ताजमहल गए थे। उन्होंने प्रवेश के लिए टिकट भी लिया था। उनका कहना है कि सुरक्षाकर्मियों ने भगवा वस्त्र और ब्रह्मदंड के कारण उन्हें प्रवेश देने से इनकार कर दिया।

जगद्गुरु परमहंसाचार्य ने बताया है कि शाम के करीब 5:35 बजे थे। वे अपने तीन शिष्यों के साथ ताजमहल गए थे। उन्होंने टिकट भी लिया था। लेकिन सुरक्षा में तैनात जवानों ने उनके भगवा कपड़े पर आपत्ति जाहिर की। जब उनका एक शिष्य इस घटना का वीडियो बनाने लगा तो सीआईएसएफ के जवानों ने मोबाइल छीन सारे फोटो डिलीट करवा दिए। कथित तौर पर उनके टिकट भी सुरक्षाकर्मियों ने ले लिए।

हिंदू संत के मुताबिक, वो अयोध्या से अलीगढ़ एक भक्त के परिवार में बीमार हुई एक महिला को आशीर्वाद देने के लिए आए थे। उसके बाद वे ताजमहल देखने के लिए आगरा पहुँचे। उन्होंने कहा, “यहाँ भगवान शिव की पिंडी दबी हुई है। उसके दर्शन करने आए थे। लेकिन कहा गया कि भगवा पहनकर और ब्रह्मदंड लेकर अंदर नहीं जा सकते।”

परमहंसाचार्य के एक शिष्य के मुताबिक, मथुरा, अयोध्या और काशी में तो मोबाइल भी नहीं ले जा सकते हैं, लेकिन कभी किसी ने ब्रह्मदंड को नहीं रोका। रिपोर्ट के मुताबिक, जब सीआईएसएफ के जवानों ने जगद्गुरु को रोका तो वहाँ मौजूद एक दक्षिण भारतीय ने उनका मजाक उड़ाया और कहा कि दाढ़ी तो रखे ही हैं, बस टोपी लगा लो तो काम हो जाता। जगद्गुरु के एक शिष्य ने कहा कि गेट पर उन्हें बताया गया कि यहाँ योगी आदित्यनाथ को भी रोका गया था।

तमिलनाडु: रथ यात्रा के दौरान बड़ा हादसा, हाईटेंशन तार की चपेट में आने से 11 की मौत

तमिलनाडु में एक हादसे में करंट लगने से 11 लोगों की मौत हो गई है। इनमें दो बच्चे भी हैं। 15 लोग घायल बताए जा रहे हैं। यह हादसा बुधवार (26 अप्रैल 2022) तड़के कालीमेदु गाँव में हुआ। अप्पर मंदिर से निकली रथ यात्रा के दौरान यह घटना हुई। घायलों का तंजावुर मेडिकल कॉलेज में इलाज चल रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक रथ मुड़ने की कोशिश कर रही थी। इसी दौरान कोई बाधा आने से वह पलट गई। पुलिस और प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि पलटते समय रथ हाईटेंशन लाइन के संपर्क में आ गया। इसके बाद करंट पूरे रथ में फैल गया।

प्रदेश के मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख रुपए का मुआवजा देने का ऐलान किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हादसे पर दुख जताते हुए PMNRF से मृतकों के परिजनों को 2-2 लाख और घायलों को 50,000 रुपए मुआवजे के तौर पर देने का ऐलान किया है।

तिरुचिरापल्ली के मध्य क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक वी बालकृष्णन ने बताया, “हादसे के संबंध में FIR दर्ज कर ली गई है। जाँच जारी है। फिलहाल यह बात सामने आई है कि संतुलन बिगड़ने के बाद रथ में करंट फैल गई जिसके कारण यह हादसा हुआ।” रिपब्लिक टीवी से बात करते हुए, उन्होंने कहा, “सुबह लगभग 3.00 बजे यह त्रासदी हुई। यू-टर्न लेने की कोशिश करते समय रथ का संतुलन खो गया। हम अभी यकीनी तौर पर नहीं कह सकते कि रथ सीधे तार के संपर्क में आया था या बिजली के आर्क के संपर्क में। बिजली बोर्ड के अधिकारी मौके पर थे। हम पहले सटीक विवरण का पता लगाएँगे।”

घटना के एक वीडियो में देखा जा सकता है कि लाइव वायर के संपर्क में आने से रथ पूरी तरह से नष्ट हो गया। गौरतलब है कि हर साल तमिलनाडु में वार्षिक रथ उत्सव में बड़ी संख्या में भक्त भाग लेते हैं।

2 बच्चों की माँ, डॉक्टर की बीवी: कराची यूनिवर्सिटी में जिस महिला ने खुद को उड़ाया उसने 2 साल पहले ज्वाइन किया था बलूच लिबरेशन आर्मी

पाकिस्तान के कराची में चीनी नागरिकों को निशाना बनाने वाली फिदायीन हमलावर से जुड़ी अब तमाम जानकारी मीडिया में हैं। बताया जा रहा है कि बलूच लिबरेशन आर्मी की यह पहली महिला हमलावर 2 साल पहले ही संगठन से जुड़ी थी। इसके बाद वह अपने आपको इस मिशन के लिए तैयार करने लगी। हमलावर की पहचान शरी बलूच के तौर पर हुई है। ये भी पता चला है कि इस घटना के बाद उसके शौहर ने अपनी बीवी पर फ़ख़्र जताया है।

कौन थी शरी बलूच?

इंडिया टुडे पत्रकार गौरव सी सावंत लिखते हैं, “कराची की फिदायीन हमलावर शरी बलूच बेहद पढ़ी लिखी थी और दो बच्चों की माँ थी। उसने जूलॉजी में एमएससी के बाद एम.फिल की थी। वह बलूच लिबरेशन आर्मी से होने के नाते पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जा रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ लड़ रही थी और बलूच लिबरेशन आर्मी की मजीद ब्रिगेड का हिस्सा थी- जो कि पाकिस्तान में चीनियों को निशाना बनाने के लिए बनाई गई है।”

अगले ट्वीट में शरी बलूच के बारे में बताया गया कि 2 साल पहले लिबरेशन आर्मी से जुड़ने वाली 30 साल की टीचर को उसके दो बच्चे होने के कारण पीछे हटने को भी कहा गया था। लेकिन शरी ने किसी की नहीं सुनी। कथिततौर पर बलूच लिबरेशन आर्मी ने अपनी स्पेशल स्क्वॉड इसीलिए तैयार की है ताकि चीनी नागरिकों को निशाना बनाया जा सके। उनका मकसद, चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर को विफल करना है।

हमलावर का शौहर जता रहा गर्व

इस हमले के बाद कहा जा रहा है कि शरी के शौहर ने एक संदेश जारी करते हुए अपनी बीवी के किए पर गर्व किया है। ट्विटर पर हबीतन बशीर बलूच ने लिखा है, “शरी जान, तुम्हारे निस्वार्थ कार्य ने मुझे खामोश कर दिया है लेकिन मैं आज गर्व से झूम रहा हूँ। महरोच और मीर हसन को यह सोचकर बहुत गर्व होगा कि उनकी माँ कितनी महान महिला थी। तुम हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहोगी।”

गौरतलब है कि पाकिस्तान के कराची शहर की यूनिवर्सिटी के बाहर बलूच विद्रोही शरी द्वारा 26 अप्रैल को फिदायीन हमले में जिस कार को निशाना बनाया गया उसमें चीन की 3 महिला प्रोफेसर, एक पाकिस्तानी ड्राइवर और एक गार्ड था। घटना के बाद बलूच लिबरेशन आर्मी ने बयान जारी करके इस हमले की जिम्मेदारी ली। बयान में लिखा गया कि शरी उनके समूह की पहली महिला फिदायीन हमलावर थीं। यह हमला बलूच प्रतिरोध के इतिहास में एक नया अध्याय है।

इसके अलावा बलूच लिबरेशन आर्मी की ओर से इस संबंध में एक वीडियो भी जारी किया गया है। वीडियो में नकाबपोश व्यक्ति कहता नजर आ रहा है- “हम पाकिस्तानी फौज और चीन की सरकार से कहते हैं कि वो बलोचिस्तान से चले जाएँ। वो हमारे गाँवों को तबाह कर चुके हैं। हमने चीनियों पर हमले के लिए एक नई यूनिट बनाई है। ये उन चीनियों को निशाना बनाएगी जो चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी CPEC के लिए काम कर रहे हैं।”

उल्लेखनीय है कि सीपीईसी का विरोध बलूच विद्रोहियों द्वारा काफी समय से हो रहा है। इनको गुस्सा इस बात का है कि उनके यहाँ समंदर से चीनी ट्रॉले मछलियाँ पकड़ती हैं और एक्सपोर्ट करती हैं। जिससे स्थानीय जो मछलियों के जरिए अपनी रोजी -रोटी कमाते थे उनके पास कोई रोजगार नहीं है। इसके अलावा बलूच विद्रोहियों के निशाने पर पाकिस्तानी सेना भी है। कुछ दिन पहले बलूच विद्रोहियों ने 60 पाकिस्तानी सैनिकों को मारा था। बलूच लोग अक्सर पाकिस्तानी सेना पर तमाम अत्याचार के आरोप लगाते रहते हैं।

‘UCC अल्पसंख्यकों के खिलाफ, मुस्लिम इसे नहीं मानेंगे’: AIMPLB को यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं कबूल, कहा- मजहब के हिसाब से जीना अधिकार

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) का विरोध किया है। मंगलवार (26 अप्रैल 2022) को संगठन की ओर से जारी बयान में इसे असंवैधानिक और अल्पसंख्यक विरोधी बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि मुस्लिम इसे कबूल नहीं करेंगे।

बयान में AIMPLB महासचिव खालिद शैफुल्लाह रहमानी के हवाले से बताया गया है कि संविधान मजहब के हिसाब से जीवन जीने की अनुमति देता है। इसे मौलिक अधिकारों में रखा गया है। रहमानी ने कहा है कि समान नागरिक संहिता मुस्लिमों को कबूल नहीं है और सरकार ऐसा करने से बचे। उनका दावा है कि समान नागरिक संहिता की बात बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था से लोगों का ध्यान भटकाने और नफरत फैलाने का एजेंडा है।

AIMPLB की यह प्रतिक्रिया ऐसे वक्त में सामने आई है जब पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि भाजपा शासित राज्यों में समान नागिरक संहिता कानून लागू किया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि CAA, अनुच्छेद 370, राम मंदिर और तीन तलाक के बाद अब समान नागरिक संहिता पार्टी के एजेंडे में है। इसके बाद उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव मौर्या ने भी संकेत दिए थे कि प्रदेश सरकार इसे लागू करने पर विचार कर रही है। उन्होंने कहा था, “यूपी और देश की जनता के लिए यह जरूरी है कि पूरे देश में एक कानून लागू किया जाए। पहले की सरकारों ने तुष्टिकरण की राजनीति के कारण इस पर ध्यान नहीं दिया।”

उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड के हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने सत्ता में वापसी पर समान नागरिक संहिता का वादा किया था। चुनावों में जीत के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे लागू करने की प्रतिबद्धता दोहराते हुए एक कमिटी का गठन किया था। माना जा रहा है कि अन्य बीजेपी शासित राज्यों में भी इसी मॉडल पर UCC लागू किया जाएगा।

क्या है समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता को सरल शब्दों में समझा जाए तो यह एक ऐसा कानून है, जो देश के हर समुदाय पर समुदाय लागू होता है। व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो, जाति का हो या समुदाय का हो, उसके लिए एक ही कानून होगा। अंग्रेजों ने आपराधिक और राजस्व से जुड़े कानूनों को भारतीय दंड संहिता 1860 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872, भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872, विशिष्ट राहत अधिनियम 1877 आदि के माध्यम से सब पर लागू किया, लेकिन शादी, विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति आदि से जुड़े मसलों को सभी धार्मिक समूहों के लिए उनकी मान्यताओं के आधार पर छोड़ दिया।

इन्हीं सिविल कानूनों को में से हिंदुओं वाले पर्सनल कानूनों को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खत्म किया और मुस्लिमों को इससे अलग रखा। हिंदुओं की धार्मिक प्रथाओं के तहत जारी कानूनों को निरस्त कर हिंदू कोड बिल के जरिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956, हिंदू नाबालिग एवं अभिभावक अधिनियम 1956, हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम 1956 लागू कर दिया गया। वहीं, मुस्लिमों के लिए उनके पर्सनल लॉ को बना रखा, जिसको लेकर विवाद जारी है। इसकी वजह से न्यायालयों में मुस्लिम आरोपितों या अभियोजकों के मामले में कुरान और इस्लामिक रीति-रिवाजों का हवाला सुनवाई के दौरान देना पड़ता है।

इन्हीं कानूनों को सभी धर्मों के लिए एक समान बनाने की जब माँग होती है तो मुस्लिम इसका विरोध करते हैं। मुस्लिमों का कहना है कि उनका कानून कुरान और हदीसों पर आधारित है, इसलिए वे इसकी को मानेंगे और उसमें किसी तरह के बदलाव का विरोध करेंगे। इन कानूनों में मुस्लिमों द्वारा चार शादियाँ करने की छूट सबसे बड़ा विवाद की वजह है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी समान नागरिक संहिता का खुलकर विरोध करता रहा है।

कोर्ट ने दिया काशी ज्ञानवापी परिसर में वीडियोग्राफी का आदेश, देव विग्रहों की स्थितियों का लगेगा पता: ईद बाद शुरू होगी प्रक्रिया

वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी परिसर में स्थित माँ श्रृंगार गौरी और अन्य देव विग्रहों की पूजा अर्चना के मामले में मंगलवार (26 अप्रैल, 2022) को सीनियर डिवीजन के सिविल जज रवि कुमार ने फैसला सुनाया है कि इस बार ईद के बाद 10 मई से पहले एडवोकेट कमिश्नर से मौके का मुआयना करा वहाँ की वीडियोग्राफी कराई जाएगी। कमिश्नर द्वारा अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंपने के बाद इस पर सुनवाई होगी।

रिपोर्ट के मुताबिक, माँ श्रंगार गौरी और अन्य देव विग्रहों के बारे में स्थितियों का पता लगाने के लिए इसी महीने की 8 तारीख को अदालत ने एडवोकेट कमिश्नर को नियुक्त किया था। इसके बाद एडवोकेट कमिश्नर द्वारा कार्रवाई को लेकर 18 अप्रैल को कोर्ट में एक प्रार्थना पत्र दायर किया था। याचिका में दावा किया गया था कि श्रृंगार गोरी बैरिकेडिंग के बाहर है। ऐसे में उसके अंदर मुस्लिमों और सुरक्षाकर्मियों के अलावा कोई और नहीं जा सकता। एडवोकेट कमिश्नर को रोकने की माँग की गई थी।

क्या है पूरा मामला

यह मामला 18 अगस्त 2021 का है, जब दिल्ली की रहने वाली राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, सीता शाहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक की ओर से कोर्ट में एक याचिका दायर कर श्रृंगार माता के नियमित दर्शन और पूजा-अर्चना करने की इजाजत माँगी थी। इसमें दावा किया गया था कि ऐसा न करने देना हिंदुओं के हितों का उल्लंघन होगा। इसमें विपक्ष के तौर पर अंजुमन इंतजामिया मसाजिद, वाराणसी के कमिश्नर, पुलिस कमिश्नर, जिले के डीएम और राज्य सरकार को चुना गया था।