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हिंदू परंपराओं से रणबीर-आलिया की शादी, कन्यादान पर सस्पेंस: शहनाई से पहले रानू मंडल का Video वायरल, दुल्हन बन गाया- कच्चा बादाम

बॉलीवुड एक्टर रणबीर कपूर और एक्ट्रेस आलिया भट्ट आज (14 अप्रैल, 2022) शादी के बँधन में बँधने वाले हैं। कपल की मेहंदी, हल्दी, प्री-वेडिंग सेरेमनी पहले ही हो चुकी है। बताया जा रहा है कि उनकी शादी हिंदू परंपराओं से होगी। हालाँकि, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ‘कन्यादान’ होगा या नहीं। याद दिला दें कि आलिया भट्ट ने पिछले साल मान्यवर ब्रांड के एक विज्ञापन में कन्यादान को पिछड़ी सोच बताया था।

आलिया भट्ट के पिता, महेश भट्ट की माँ शिरीन मोहम्मद अली मुस्लिम थीं, तो वहीं पिता नानाभाई भट्ट गुजराती ब्राह्मण थे। इस तरह से महेश भट्ट मुस्लिम और गुजराती ब्राह्मण दोनों ही हैं। ऐसे में यह साफ नहीं है कि शादी में इस्लामिक रीति-रिवाजों का पालन किया जाएगा या नहीं। इसी तरह, आलिया की माँ, सोनी राजदान कश्मीरी हिंदू होने के साथ-साथ ईसाई भी हैं। उनके पिता नरेंद्र नाथ राजदान कश्मीरी पंडित हैं तो वहीं उनकी माँ गर्ट्रूड होलज़र ब्रिटिश-जर्मन हैं। फिलहाल इस बात को लेकर भी कोई स्पष्टता नहीं है कि शादी के दौरान कोई ईसाई रस्म निभाई जाएगी या नहीं।

दोनों की प्री-वेडिंग सेरेमनी रणबीर के पाली हिल स्थित आवास पर हुई। समारोह में करीना कपूर खान, करिश्मा कपूर और करण जौहर समेत तमात हस्तियाँ मौजूद थीं। रणबीर कपूर की माँ नीतू कपूर ने इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी पोस्ट की थी जिसमें उन्होंने अपनी मेहंदी में दिवंगत पति ऋषि कपूर का नाम लिखवाया है।

साभार: Instagram

इस बीच खबर आ रही है कि रणबीर कपूर जल्द ही सोशल मीडिया पर डेब्यू कर अपने फैंस को सरप्राइज देंगे। ये सरप्राइज एक खास वीडियो मैसेज होगा। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक होने वाली पत्नी आलिया ने उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ज्वाइन करने के लिए मना लिया है। बता दें कि रणबीर कपूर ऐसे बॉलीवुड स्टार हैं, जो सालों से सोशल मीडिया से दूर हैं। ऐसे में उनका सोशल मीडिया पर कदम रखना फैंस के लिए किसी तोहफे से कम नहीं होगा। 

बेटियों को धन/ संपत्ति माना जाता है

गौरतलब है कि पिछले साल कपड़ों के ब्रांड मान्यवर के एड में आलिया भट्ट ने बताया था कि कैसे कन्यादान करना पिछड़ेपन को दिखाता है, जबकि कन्यामान एक बढ़िया विकल्प है। हालाँकि विवादों के बाद मान्यवर को अपना विज्ञापन वापस लेना पड़ा था। लेखक नित्यानंद मिश्रा ने तमाम भ्रांतियों को तोड़ते हुए धन का अर्थ समझाया, जो कि संस्कृति शब्दकोष से आता है। किताब के मुताबिक धन का अर्थ समृद्धि के अलावा वह भी होता है जो कि सबसे प्रिय हो या जिसे मूल्यवान माना जाए। वह कहते हैं, सनातन धर्म में केवल बेटियों को ही नहीं बेटों को भी धन माना गया है। इसे पुत्र धन भी कहा जाता है। उन्होंने संस्कृत श्लोक के जरिए समझाया कि सनातन धर्म में विद्या को भी धन कहा गया। “विद्याधनं सर्व धनं प्रधानम्” अर्थाथ विद्या का धन एक ऐसी मूल्यवान चीज है जो किसी को भी दी जा सकती है। 

एड में जैसे हिंदू परंपरा को पिछड़ा दिखाया गया और यह बताने की कोशिश की गई कि लड़कियों को हमेशा से शादी के समय दान की तरह दिया जाता रहा, जबकि मिश्रा के मुताबिक दान की तुलना धन से नहीं होनी चाहिए। सनातन में ‘दान’ की अवधारणा ज्ञान से लेकर जीवन तक व्याप्त है जिसे क्रमशः ‘विद्यादान’ या ‘जीवन दान’ के नाम से जाना जाता है। ‘कन्यादान’ की अवधारणा को उजागर करते हुए, मिश्रा ने ‘पुत्रदान’ की अवधारणा के बारे में भी बताया। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाने के लिए महाभारत के महाकाव्य के एक श्लोक का भी हवाला दिया।

ग्रंथों के अनुसार, कन्यादान अनुष्ठान के समय किए गए मंत्र, जप और अन्य रस्में दुल्हन को लक्ष्मी के रूप में दर्शाती हैं। दुल्हन के पिता द्वारा अपनी बेटी को नारायण (दूल्हे) को सौंपा जाता है और माना जाता है कि वह अपनी बेटी को किसी और के घर की ‘शोभा’ बना रहा है।

रणबीर और आलिया की शादी से पहले रानू मंडल (Ranu Mondal) का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें वह दुल्हन के कपड़े पहने नजर आ रही हैं और गाना कच्चा बादाम (Kacha Badam) गा रही हैं।

हिंदू युवा वाहिनी सम्मेलन में अस्तित्व रक्षा की बात, मुस्लिमों के खिलाफ नहीं था भाषण: दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया जवाब

दिल्ली में दिसंबर 2021 में आयोजित हिंदू युवा वाहिनी के सम्मेलन में हेट स्पीच नहीं दिया गया था। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी है। सुदर्शन न्यूज टीवी के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके पर इस कार्यक्रम में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भड़काऊ भाषण का आरोप था।

अदालत में दाखिल हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने कहा है कि हिन्दू युवा वाहिनी सम्मेलन में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कोई भी नफरत भरी बयानबाजी नहीं हुई थी। समाचार एजेंसी ANI द्वारा की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली पुलिस ने यह हलफनामा इकट्ठा किए गए सबूतों और वीडियो फुटेज के आधार पर दाखिल किया है। पुलिस ने बताया कि वह सभी बयानों और वीडियो फुटेज की गहन जाँच-पड़ताल के बाद वह इस नतीजे पर पहुँची है।

दिल्ली पुलिस द्वारा दायर किए गए हलफनामे में सुदर्शन TV चैनल के मालिक सुरेश चव्हाणके का भी जिक्र करते हुए बताया गया है कि उन्होंने मुस्लिमों के बारे में ऐसा कुछ भी नहीं कहा, जो उनके खिलाफ हिंसा से प्रेरित हो या किसी भी समुदाय विशेष के खिलाफ कोई माहौल खड़ा कर रहा हो। दिल्ली पुलिस ने बताया कि हिन्दू युवा वाहिनी सम्मेलन में अपने धर्म को मजबूत करने और आसुरी ताकतों से लड़ने का आह्वान किया गया था।

इसी मामले में दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा, “हमें सहिष्णुता को दूसरों के नजरिए से भी देखना चाहिए। असहिष्णुता किसी लोकतंत्र के साथ स्वयं व्यक्ति के लिए भी घातक होती है। याचिकाकर्ता किसी निरपराध को कटघरे में खींचने के लिए उनके द्वारा कहे गए शब्दों को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ही बार-बार अभिव्यक्ति की आज़ादी का सम्मान करने के निर्देश दिए हैं। बशर्ते वो किसी अन्य धर्म के विरुद्ध न हों।” दिल्ली पुलिस ने यह भी बताया कि जाँच किए गए सबूतों से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ संभव ही नहीं है।

हाईकोर्ट के पूर्व जज एवं वरिष्ठ अधिवक्ता अंजना प्रकाश और पत्रकार कुर्बान अली ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके इन बयानों की निष्पक्ष जाँच कराने की माँग की थी। आरोप लगाया था कि 17 से 19 दिसम्बर 2021 के बीच दिल्ली और हरिद्वार में हुए 2 अलग-अलग कार्यक्रमों में मुस्लिमों के नरसंहार की बातें कही गईं थी।

याचिका में दिल्ली पुलिस पर बयान के समय मौजूद रहने और उसके बाद भी कोई कार्रवाई न करने का आरोप लगाया गया था। इसी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 12 दिसम्बर को उत्तराखंड पुलिस और दिल्ली पुलिस से जवाब-तलब किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी मामले में 13 अप्रैल (बुधवार) को उत्तराखंड पुलिस से अब तक की गई कार्रवाई की जानकारी दाखिल करने को कहा है।

40 गैलरी और नेहरू के साथ मोदी: प्रधानमंत्री संग्रहालय का उद्घाटन कर बोले PM- यह भविष्य के निर्माण का ऊर्जा केंद्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार (14 अप्रैल 2022) को दिल्ली स्थित तीन मूर्ति भवन में ‘प्रधानमंत्री संग्रहालय’ का उद्घाटन किया। काउंटर से टिकट खरीदकर उन्होंने अंदर प्रवेश किया। पीएम ने कहा कि इस म्यूजियम से स्वतंत्र भारत के इतिहास को जाना जा सकेगा। ये संग्रहालय लोक स्मृति की चीज है। इससे युवा वर्ग और भावी पीढ़ी प्रधानमंत्रियों और उनके योगदान के बारे में जानेगी और उनसे प्रेरणा लेगी। उन्होंने ये भी कहा कि देश जिस ऊँचाई पर है, वहाँ तक उसे पहुँचाने में हर सरकार ने अपना अभिन्न योगदान दिया है।

पीएम मोदी ने कहा, “जब देश आजादी के अमृत महोत्सव को मना रहा है। 75 सालों में देश ने अनेक गौरवमयी क्षणों को देखा है। ये संग्रहालय आज स्वतंत्र भारत के बाद बनी प्रत्येक सरकारों की विरासत का जीवंत प्रतिबिंब बन गया है। हर प्रधानमंत्री ने अपने समय की चुनौतियों को पार करते हुए देश को आगे ले जाने की कोशिशें की है।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले 25 साल देश के लिए बहुत अहम होने वाले हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि नवनिर्मित संग्रहालय भविष्य के निर्माण का ऊर्जा केंद्र बनेगा। इसके जरिए ये जाना जा सकेगा कि अलग-अलग समय में लीडरशिप की क्या चुनौतियाँ रही हैं और उनसे कैसे निपटा गया।

पीएम मोदी ने कहा, “म्यूजियम में प्रधानमंत्रियों से जुड़ी दुर्लभ तश्वीरें, भाषण, इंटरव्यू जैसी चीजों को संग्रहित किया गया है। भावी पीढ़ी को पता चलेगा कि कैसी-कैसी पृष्ठभूमि से आकर अलग-अलग प्रधानमंत्री बनते रहे हैं। गौरव की बात ये है कि हमारे अधिकतर प्रधानमंत्री साधारण परिवारों से आए थे। इसमें 40 से अधिक गैलरी हैं और करीब 4000 लोग एक साथ घूम सेकेंगे।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि विचारों में सहमति, असहमति और लोगों की विभिन्न प्रकार की राजनीतिक विचारधाराएँ हो सकती हैं, लेकिन सभी का लक्ष्य लोकतंत्र का विकास ही होना चाहिए। ये म्यूजियम केवल प्रधानमंत्रियों की उपलब्धियों का प्रतीक नहीं है, बल्कि ये हजारों वर्षों से फले-फूले लोकतांत्रिक संस्कारों का प्रतीक है। विदेशों से चोरी हुई मूर्तियों को वापस लाने, पुराने हो चुके संग्रहालयों को फिर से बनाने का अभियान बीते 7-8 सालों से चल रहा है। उल्लेखनीय है कि इस संग्रहालय में प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ी यादों का संग्रह है।

संस्कृत को राज एवं राष्ट्र भाषा बनाने को तैयार थी संविधान सभा, फिर किसने अटकाई पेंच: हिंदी को बढ़ावा देने से गरमाई राजनीति के बीच एक पन्ना ये भी

केंद्रीय गृह मंत्री, अमित शाह के हिंदी में कामकाज को बढ़ावा देने सम्बन्धी बयान पर राजनीति गरमा गई है। हमेशा की तरह, इस बार भी विरोध दक्षिण के राज्यों की तरफ से हुआ है। हालाँकि, अगर हम भारत की संवैधानिक प्रक्रियाओं की तरफ देखें तो उस दौर में हिंदी ही नहीं बल्कि संस्कृत को लेकर भी एक अलग ही तरह की दीवानगी देखने को मिलती है।

संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान संविधान सभा में ‘भाषा’ के विषय पर 12 से 14 सितम्बर 1949 को चर्चा हुई थी। इस लंबे वाद-विवाद के दौरान, सभा में दो पक्ष थे- पहला जो स्पष्ट रूप से संस्कृत को राज-भाषा एवं राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार करता था, और दूसरा पक्ष खिलाफ तो नहीं था, लेकिन उनके मन में कुछ प्रश्न जरुर थे। इसमें सबसे प्रमुख था कि संस्कृत को कैसे आम-जनजीवन का हिस्सा बनाया जा सकता है?

इस दौरान अधिकतर सदस्यों का ध्यान हिंदी की तरफ ज्यादा था। फिर भी कुछ सदस्यों ने संस्कृत के लिए प्रभावशाली तरीके से अपनी बात रखी। विशेष बात यह थी कि संस्कृत के पक्ष में जिन सदस्यों ने अपने तथ्य रखे, वे सभी गैर-हिंदी प्रदेशों से निवासी थे।

पहले दिन गोपालस्वामी आयंगर द्वारा एक प्रस्ताव रखा गया, जिसमें संस्कृत के पक्ष में विशेष रूप से कोई प्रावधान नहीं किया गया था। उन्होंने मात्र हिंदी के विकास के लिए एक निर्देश को शामिल किया था, “हिंदी भाषा के प्रसार में वृद्धि करना, उसका विकास करना ताकि वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सब तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके, तथा उसकी आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिन्दुस्तानी और अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्य होगा।”

उन्होंने उपरोक्त सन्दर्भ में भाषाओं की एक सूची भी प्रस्तुत की जिसमें असामिया, बांग्ला, कन्नड़, गुजराती, हिंदी, काश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, तामिल, तेलगू और उर्दू शामिल थी। आश्चर्यजनक रूप से, इसी दिन संविधान सभा में एक मुस्लिम सदस्य नजरुद्दीन अहमद ने संस्कृत की जमकर तारीफ की। उन्होंने डब्लू.सी. टेलर, मैक्सम्युलर, विलियम जॉन, विलियम हंटर, प्रोफ़ेसर बिटेन, प्रोफ़ेसर बोप, प्रोफ़ेसर विल्सन, प्रोफ़ेसर थॉमसन और प्रोफ़ेसर शहिदुल्ला जैसे विद्वानों के वक्तव्यों का उदाहरण देते हुए संस्कृत के महत्व पर प्रकाश डाला, और स्वयं भी स्वीकार किया, “वह एक बहुत उच्च कोटि की भाषा है।”

भाषण के अंत में नजरुद्दीन अहमद ने कहा कि हम सबको एक भाषा का विकास करना चाहिए और ग्रहण करने के पूर्व उसका परिक्षण करना चाहिए। मैं निवेदन करता हूँ कि बंगाली, और संस्कृत अन्य बहुत भाषाएँ है और उनपर विचार करना चाहिए।” एक और सदस्य बालकृष्ण शर्मा ने प्रत्यक्ष तो नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से संस्कृत को राज-भाषा बनाने के पक्ष में अपना वक्व्य दिया।

अगले दिन, इस दिन आर.वी. धुलेकर ने हिंदी के साथ-साथ संस्कृत का समर्थन करते हुए कहा, “आपमें से कुछ लोग चाहते है कि संस्कृत राष्ट्र भाषा हो जाए। मेरा निवेदन है कि संस्कृत अंतरराष्ट्रीय भाषा है- वह विश्व की भाषा है। संस्कृत भाषा में चार सौ धातु हैं। संस्कृत सब धातुओं की मूल है। संस्कृत सारे विश्व की भाषा है। आप देखेंगे कि हिंदी के राज-भाषा तथा राष्ट्र-भाषा हो जाने के पश्चात संस्कृत किसी दिन विश्व की भाषा हो जाएगी।”

संस्कृत को भारत की राज-भाषा और राष्ट्र भाषा बनाने के लिए लक्ष्मीकांत मैत्र (पश्चिम बंगाल) ने पहला संशोधन रखते हुए कहा, “देश के स्वतंत्र होने के पश्चात यदि इस देश की कोई भाषा राज-भाषा तथा राष्ट्र भाषा हो सकती है तो वह निःसंदेह संस्कृत ही है।”

लक्ष्मीकांत मैत्र ने संशोधन के उद्देश्य के संदर्भ में कहा, “मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि इसी समय से सभी लोग संस्कृत में बोलने लगेंगे। मेरे संशोधन का उद्देश्य यह नहीं है। मैंने अपने संशोधन में यह प्रस्ताव रखा है कि पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी उन सभी प्रयोजनों के लिए राज्य की राज-भाषा के रूप में प्रयोग की जाएगी, जिन प्रयोजनों के लिए वह संविधान के प्रारंभ के पूर्व प्रयोग की जाती थी। इस अवधि के पश्चात् अंग्रेजी के स्थान पर संस्कृत उत्तरोत्तर प्रयुक्त होगी।”

उन्होंने इस विषय पर बहुत ही लंबा और तथ्यपूर्ण भाषण दिया। साथ ही एक भावनात्मक अपील देते हुए उन्होंने कहा, “आपको अपने पूर्वजों की भाषा संस्कृत का हृदय से सम्मान करना चाहिए। एक बार तो संसार को बताइए कि हम भी अपनी आध्यात्मिक संस्कृति की सुसंपन्न परंपरा का सम्मान करना जानते है।”

अगले सदस्य उड़ीसा के लक्ष्मीनारायण साहू थे, और उनके अनुसार, “अगर सारे दक्षिण के भाई और सब लोग संस्कृत को मान (राष्ट्र भाषा) लेते है तो मेरा कोई हर्जा नहीं है, मैं भी उसको मान लूँगा।”

इसी दिन, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस विषय पर अपने विचार जोड़ते हुए कहा, “आज लोग संस्कृत पर हँसते है, संभवतः इस कारण कि वे यह समझते है कि किसी आधुनिक राज्य को जो कार्य करने होते है उनके लिए वह काम में नहीं लाई जा सकती। इस भाषा में अब भी ऐसा वृहत ज्ञान भंडार है जिससे भारत की वर्तमान पीढ़ी ने ही नहीं बल्कि पहले की पीढ़ियों ने भी ज्ञानोपार्जन किया। और वास्तव में उससे सभ्य संसार में ज्ञान और विद्या के सभी प्रेमियों ने ज्ञान प्राप्त किया। वह हमारी भाषा हैं, वह भारत की मातृ भाषा है। हम उसके प्रति केवल मौखिक सहानुभूति अथवा आदर प्रदर्शित करने के लिए नहीं किन्तु अपने राष्ट्र के हित साधन के लिए तथा अपने आत्मसाक्षात्कार के लिए और यह ज्ञान प्राप्त करने के लिए कि प्राचीन काल में हमनें कौन सी विधि संचित की थी और भविष्य में भी कर सकते है। वास्तव में, हम चाहते है कि संस्कृत को भारत की राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली में उसे सम्मानित स्थान प्राप्त हो।”

मद्रास के डॉ. पी. सुब्बारायण ने भी संस्कृत का पक्ष लेते हुए कहा, “मैं यह चाहता हूँ कि संस्कृत को पंद्रहवी भाषा के रूप में रखा जाए। हमारी प्राचीन भाषा है और हमें अपने संविधान में उसका उल्लेख करना ही चाहिए।”

असम के कुलधर चलिहा ने संस्कृत का स्पष्ट तौर पर समर्थन करते हुए कहा, “मेरी अपनी धारणा है कि संस्कृत को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार करना चाहिए। संस्कृत सारे भारत में छाई हुई है। चाहे आप कितना ही प्रयास क्यों न करें आप संस्कृत से छुटकारा नहीं पा सकते। वह हमारी संस्थाओं में व्याप्त है और हमारे जीवन में उसी के दर्शन का संचार है। हमें जो कुछ भी सुन्दर अथवा मूल्यवान वस्तु उपलब्ध है और जिन आदर्शों को हम बहुमूल्य समझते है, तथा जिनके लिए संघर्ष करते है, वे सब हमें संस्कृत साहित्य से ही प्राप्त हुए है।”

बंबई के बी.एम गुप्ते का मानना था, “मैं संस्कृत का विरोधी नहीं हूँ। हममें से अधिकांश उसका विरोध कर ही नहीं सकते क्योंकि वह भाषा हमारे रक्त में प्रविष्ट है। वह हमारी मातृ भाषाओं का स्त्रोत्र है और हमारी संस्कृति का भंडार है। केवल इतनी बात नहीं है कि मैं संस्कृत का विरोधी नहीं हूँ, मैं संस्कृत साहित्य की प्रशंसा करता हूँ। संसार का महानतम दर्शन, गहनतम विचार तथा सुन्दरतम कवित्व संस्कृत भाषा में ही है।” हालाँकि, वे संस्कृत और संस्कृतनिष्ठ हिंदी को जनसाधारण की भाषा बनाने को लेकर आशंकित थे।

अंतिम दिन, सरदार हुकम सिंह जोकि वस्तुतः हिंदी और संस्कृत के पक्ष में थे लेकिन संभवतः राजनैतिक कारणों से उन्होंने अपना मत बदल लिया था। फिर भी उन्होंने संस्कृत के प्रति अपना शुरूआती लगाव बताते हुए कहा, “जब मैंने प्राथमिक शिक्षा समाप्त की थी और मुझे फारसी तथा संस्कृत दोनों में एक विषय चुनना था तब मैंने संस्कृत चुनी थी और मुझे उसका शौक हो गया था। मैंने मैट्रिक तक उसे पढ़ा था।

पुरषोत्तम दास टंडन, जिनका हिंदी के प्रति लगाव जगजाहिर है और संविधान सभा में वे हिंदी को लेकर ज्यादा मुखर रहते थे। वे राजकीय प्रयोजनों में उसी को स्वीकर करने के पक्ष में थे। हालाँकि संस्कृत के प्रति उनका प्रेम भी हिंदी से कम नहीं था, “संस्कृत को अपनाने के विषय में भी कुछ कहा गया था। संस्कृत प्रेमियों के समक्ष मैं नतमस्तक हूँ। मैं भी उनमें से हूँ। मुझे संस्कृत से प्रेम है। मेरे विचार में, इस देश में उत्पन्न प्रत्येक भारतीय को संस्कृत पढ़नी चाहिए। संस्कृत द्वारा ही हमारी प्राचीन बपौती बनी रहेगी। किन्तु आज मुझे ऐसा प्रतीत होता है – यदि उसे अपनाया जा सके तो मुझे प्रसन्नता होगी और उसके पक्ष में मत दूँगा- किंतु मुझे ऐसा प्रतीत होता है यह कोई क्रियात्मक प्रस्थापना नहीं है कि संस्कृत को राजभाषा बना दिया जाए।”

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपना कोई मत नहीं रखा था। लेकिन, 11 सितम्बर, 1949 को हिंदुस्तान स्टैण्डर्ड में प्रकाशित एक खबर के अनुसार वे संस्कृत को आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार करने के पक्ष में थे। उसी दिन शाम को डॉ आंबेडकर ने पीटीआई के एक पत्रकार को कहा, “आखिर संस्कृत से दिक्कत क्या है?”

अंततः संस्कृत को भारत की राज-भाषा और राष्ट्र भाषा बनाने को लेकर लक्ष्मीकांत मैत्र के संशोधन को स्वीकार नहीं किया गया और आयंगर के 12 सितम्बर वाले निर्देश को ही संविधान का हिस्सा बनाया गया।

इमरान खान ने PM को मिला नेकलेस सरकारी खजाने में नहीं डाला, 18 करोड़ रुपए में बेचा: बुशरा बीवी ने ज्वेलर के पास भेजा था

पाकिस्तान (Pakistan) की सत्ता से बेदखल हो चुके पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान (Ex PM Imran Khan) की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। पीएम की कुर्सी छिन जाने के बाद अब वह नई मुसीबत में फँसते हुए नजर आ रहे हैं। ताजा मामला एक नेकलेस से जुड़ा हुआ है। कहा जा रहा है कि इमरान ने पीएम रहते हुए इस नेकलेस को 18 करोड़ रुपए में बेच दिया। इमरान को यह नेकलेस तोहफे में मिला था और नियमों के तहत उन्हें इसे सरकारी तोशा-खाना (राज्य उपहार भंडार) में जमा करवाना था, लेकिन इमरान ने ऐसा नहीं किया।

एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अब पाकिस्तान की शीर्ष जाँच एजेंसी फेडरल इनवेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने मामले की जाँच शुरू कर दी है। इमरान ने नेकलेस को सरकारी खजाने में जमा करवाने की बजाय इसे पूर्व विशेष सहायक जुल्फिकार बुखारी को दे दिया था, जिन्होंने इसे लाहौर के एक जौहरी को 18 करोड़ रुपए में बेच दिया था। नियम के मुताबिक, सार्वजनिक उपहारों को आधी कीमत देकर अपने पास रखा जा सकता है, लेकिन इमरान खान ने इसके एवज में कुछ रकम ही जमा किए।

इमरान खान को हीरों के नेकलेस के साथ-साथ कुछ उपहार साल 2021 में खाड़ी देशों की यात्रा दौरान एक सुल्तान ने दिया था। बताया जा रहा है कि इमरान खान की पत्नी बुशरा बीबी को यह उपहार अच्छा लगा और इसे अपने पास रख लिया और बाद में इसे बेचने के लिए दे दिया। बुशरा ने मिले कुछ अन्य गिफ्ट अपने पास रख लिए और कुछ अपनी दोस्त फराह खान या फराह शहजादी को दिए।

बताया जा रहा है कि इस मामले में बुशरा बीबी और फराह शहजादी पर मामला दर्ज किया जाएगा। फराह शहजादी इमरान खान के प्रधानमंत्री पद छोड़ने से पहले ही पाकिस्तान छोड़कर दुबई के रास्ते अमेरिका चली गई हैं। वहीं, जुल्फिकार बुखारी ने इस आरोप को बेबुनियाद झूठा बताया है।

बताया जा रहा है कि इमरान खान की सरकार गिरने से पहले ही इस मामले की जाँच FIA ने शुरू कर दी थी। इस मामले की जानकारी FIA ने ISI को भी भी दे दी थी। जाँच के दौरान एजेंसी ने लाहौर के उस ज्वेलरी शोरूम के मालिक और मैनेजर को उठा लिया और उनसे पूछताछ की थी। इसके बाद सच सामने आ गया था। इसके साथ ही एजेंसी को CCTV फुटेज भी मिला था। इसमें जुल्फिकार बुखारी शोरूम में दिख रहे हैं। इस नेकलेस बरामद करके तोशाखाना में जमा करा दिया गया है।

गौरतलब है कि हाल ही में इमरान खान के नेतृत्व वाली सरकार को नैशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग का सामना करना पड़ा था, जहाँ हार के बाद उनकी कुर्सी चली गई थी। इसके बाद देश की कमान पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज के नेता शहबाज शरीफ के हाथों में आ गई है। इमरान खान अविश्वास प्रस्ताव के जरिए सत्ता गँवाने वाले पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री हैं। यह बता भी दीगर है कि पाकिस्तान में किसी भी प्रधानमंत्री ने आज तक अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा नहीं किया है।

‘हिजाब स्कूलों के लिए नहीं, महिलाओं को काबू करने के लिए’: बोले UP मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष- मौलवियों ने जानबूझकर खड़ा किया विवाद

कर्नाटक हिजाब विवाद को उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष इफ्तिखार अहमद जावेद ने मंगलवार (12 अप्रैल 2022) को मुस्लिम मौलवियों की साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि ये विवाद मुस्लिमों के गलत नेतृत्व के कारण उपजा था। मौलवियों ने महिलाओं को अपने काबू में रखने और उन्हें मुस्लिम पितृसत्ता में छोटा महसूस कराने के लिए जानबूझकर हिजाब विवाद को जन्म दिया।

जावेद ने आरोप लगाया कि मौलवियों ने तीन तलाक, कई महिलाओं से निकाह या हिजाब विवाद को जन्म देकर मुस्लिम महिलाओं की आजादी को कुचलने की कोशिश की। मुस्लिमों में सबसे बड़ी दिक्कत नेतृत्व की है। मौलवियों को शांति बिल्कुल भी पसंद नहीं। उन्होंने आगे कहा, “वे हमेशा चाहते हैं कि कुछ मुद्दे विवाद पैदा करें।”

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मदरसा बोर्ड के चीफ ने कहा, “हिजाब में एक बहुत ही स्पष्ट अवधारणा है। महिलाएँ इसे घर, मस्जिदों, मजारों, शादियों और बाजारों में पहनने की हकदार हैं। लेकिन वो हिजाब को सेना में, केबिन क्रू के तौर पर, पुलिस फोर्स में, डॉक्टरों के रूप में, वकीलों के रूप में और यहाँ तक ​​कि इसे स्कूल पहनकर जाने का दावा नहीं कर सकती हैं। हिजाब ये सब काम करने के लिए नहीं है। मुस्लिम महिलाओं को मुख्यधारा से बाहर रखने के लिए जानबूझकर हिजाब का इस्तेमाल किया गया।”

इससे पहले इफ्तिखार अहमद जावेद ने बीते 25 मार्च 2022 को प्रदेश के सभी मदरसों में राष्ट्रगान को अनिवार्य कर दिया था। उन्होंने कहा था, “राष्ट्रगान विभिन्न स्कूलों में गाया जाता है और हम मदरसा के छात्रों में भी देशभक्ति की भावना जगाना चाहते हैं, ताकि वे हमारे इतिहास और संस्कृति को जान सकें।”

कब हुआ हिजाब विवाद

पीयू कॉलेज का यह मामला सबसे पहले 2 जनवरी 2022 को सामने आया था, जब 6 मुस्लिम छात्राएँ क्लासरूम के भीतर हिजाब पहनने पर अड़ गई थीं। कॉलेज के प्रिंसिपल रूद्र गौड़ा ने कहा था कि छात्राएँ कॉलेज परिसर में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में इसकी इजाजत नहीं है। प्रिंसिपल के मुताबिक, कक्षा में एकरूपता बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया है।

हालाँकि, उसके बाद से हालात लगातार बिगड़ते चले गए। हिजाब विवाद को बढ़ाने में प्रतिबंधित कट्टर इस्लामिक संगठन पीएफआई और उसकी स्कूल शाखा सीएफआई का नाम भी सामने आया था। बाद में हिजाब विवाद कर्नाटक हाई कोर्ट की दहलीज पर पहुँचा, जहाँ कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि हिजाब इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है। सभी को स्कूलों में यूनिफॉर्म कोड का पालन करना होगा।

स्लीपर सेल, चादर फैलाकर मुस्लिम इलाकों में चंदा, 3 दिन पहले से ही दंगाइयों का जुटान: खंभात में रामनवमी जुलूस पर हमले का ऐसे बना प्लान

गुजरात (Gujarat) के खंभात हिंसा की जाँच में कुछ और नए खुलासे हुए हैं। इस मामले में गिरफ्तार आरोपितों ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि हिंसा का मकसद हिन्दुओं के मन में मुस्लिमों का डर बैठाना था, ताकि भविष्य में वे मुस्लिम इलाकों से शोभा यात्रा निकालने का साहस न कर सकें। इस मामले में अब तक तीन मौलवियों सहित 11 आरोपित गिरफ्तार किए गए हैं। इन आरोपितों में 6 लोग इस साजिश रचने में शामिल थे।

एक स्थानीय समाचार दिव्य भास्कर के मुताबिक, इस पूरी घटना को अंजाम देने के लिए स्लीपर सेल ने लंबी तैयारी की थी। आरोपित रामनवमी के 3 दिन पहले ही खंभात में जमा हो गए थे। तैयारियों को अंजाम देने के लिए ईंट-पत्थरों को भी जमा कर लिया था, ताकि शोभा यात्रा पर पत्थरबाजी की जा सके। इस पूरी साजिश को अंजाम देने के लिए मुस्लिम इलाकों में चादर फैलाकर चंदा इकट्ठा किया गया था। जमा हुए इन पैसों का इस्तेमाल केस के बाद गिरफ्तार आरोपितों की जमानत करवाने और उनके केसों को लड़ने के लिए करना था।

इस पूरी घटना का मुख्य आरोपित मौलवी रज़्ज़ाक उर्फ अयूब है। DJ की आवाज पर हंगामे की शुरुआत उसी ने सबसे पहले की थी। इसी हंगामे के दौरान शोभा यात्रा में शामिल लोगों और पुलिस पर पत्थरबाजी शुरू हो गई थी। इस केस की जाँच अब SIT कर रही है। जिले के SP अजीत ने बताया कि हमला पूरी सुनियोजित और साजिश के तहत किए गए थे। इस मामले में अब तक कुल 57 आरोपित चिन्हित कर लिए गए हैं। फिलहाल पुलिस इस केस में विदेशी लिंक की तलाश कर रही है।

गुजरात डेली समाचार के मुताबिक पूरे प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा फैलाने का प्लान बनाया गया था, लेकिन इस साजिश को बहुत अधिक समर्थन नहीं मिला। इस साजिश के स्क्रीनशॉट पाकिस्तान तक की सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं। पुलिस आरोपितों के फोन और मैसेज के रिकॉर्ड तलाश रही है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक पुलिस ने बताया, “हमले के दौरान पूरे शहर में सोशल मीडिया पर मैसेज भेजे गए। इन संदेशों का मकसद अन्य इलाकों के लोगों को भड़काना था। इसके बाद मुख्य आरोपितों द्वारा अपने रिश्तेदारों को ऐसे संदेश भेजे गए जैसे कि वो कानून-व्यवस्था को सुधारने में पुलिस की मदद कर रहे हों। मौलवी अयूब के साथ माज़िद, जमशेद खान पठान, मौलवी वोहरा उर्फ़ मुस्तकीम, मोहम्मद सैयद और मतीन वोहरा भी इस घटना के मुख्य साजिशकर्ता हैं। रज़्ज़ाक के साथ साजिश में शामिल अन्य आरोपितों में कुछ ने हमलावरों को छिपाने की भी जिम्मेदारी ली थी।”

क्या PM आवास योजना के पैसे से लाभार्थी कर रहे हैं अवैध निर्माण? खरगोन में हसीना फखरू के घर पर चले बुलडोजर से उठे सवाल

मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा खरगोन में प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) या पीएमएवाई के तहत सहायता प्राप्त एक घर को हाल ही में अवैध कब्जे के खिलाफ संचालित कार्रवाई के तहत, बुलडोजर से ढहाने की खबर सामने आई थी। राज्य में अवैध अतिक्रमण को रोकने के लिए शिवराज सिंह चौहान सरकार द्वारा अपनाई गई ‘बुलडोजिंग’ नीति का जहाँ सराहना हो रही है वहीं इस एक्शन ने काफी लोगों की भौंहें चढ़ा दी हैं।

वहीं रामनवमी पर निकले शोभायात्रा पर हुए हमले के बाद रविवार, 10 अप्रैल, 2022 को रामनवमी के जुलूस में पथराव करने वाले उपद्रवियों के खिलाफ खरगोन प्रशासन ने सख्त कार्रवाई की। अपराधियों के अवैध रूप से बने भवनों और घरों को मध्य प्रदेश प्रशासन ने बुलडोजर चलाकर जमींदोज कर दिया था। इसके बाद, जैसे ही एक हसीना फखरू के घर को ध्वस्त करने की खबरें आईं, जो कथित तौर पर प्रधानमंत्री आवास योजना या पीएमएवाई (शहरी) के तहत बनाई गई थी।

मीडिया इस बात को उजागर करने के लिए मचल पड़ा कि पीएमएवाई के तहत बने घर को पथराव करने वालों के खिलाफ कार्रवाई के परिणामस्वरूप ध्वस्त कर दिया गया था। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख किया गया है। ऐसे में सवाल यह भी उठाया गया कि ऐसे घर की जाँच क्यों की जा रही है जो खुद एक सरकारी योजना के तहत बनाया गया था।

हालाँकि, यह पूरी तरह से भ्रामक दावा है, क्योंकि पथराव की घटना के कारण घर को ध्वस्त नहीं किया गया था। इसे बुलडोज़ किया गया था क्योंकि इसे पीएमएवाई अनुदान का उपयोग करके अवैध रूप से बनाया गया था। जिसके लिए प्रशासन ने पहले ही अग्रिम नोटिस जारी किया था, और उसी के अनुसार मकान को गिराया गया। प्रशासन के अनुसार अतिक्रमित जमीन पर मकान बनाया गया था, इसलिए इसे गिराया गया।

नीचे तस्वीर में प्रशासन द्वारा मकान मालिक हसीना फकरू को भेजे गए नोटिस आप देख सकते हैं, जो उन्हें 7 अप्रैल, 2022 को भेजा गया था – राम नवमी हिंसा से तीन दिन पहले, जिसमें विशेष रूप से उस जमीन का उल्लेख करता है जिस पर ‘कच्चा’ (अस्थायी) घर बनाया गया था। नोटिस में कहा गया है कि 30×30 = 900 वर्ग फुट जमीन, जिस पर फखरू का घर बनाया गया था, बिना किसी अधिकारी की अनुमति के कब्जा कर लिया गया था। नोटिस में कहा गया है, “जैसा कि आपके द्वारा किया गया अतिक्रमण साबित हो गया है, अदालत ने जमीन पर अवैध निर्माण को ध्वस्त करने का आदेश दिया है।”

तहसील कोर्ट द्वारा भेजा गया नोटिस

तहसील कोर्ट अपने आदेश में कहता है कि पत्र प्राप्त होने के तीन दिन बाद मकान को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए और इसकी सूचना न्यायालय को लिखित में दी जाए। नोटिस में कहा गया है कि यदि इसका पालन नहीं किया जाता है, तो प्रशासन आधिकारिक तरीके से कार्रवाई करते हुए भूमि पर कब्ज़ा ले लेगा। वहीं 10 अप्रैल को नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद हसीना फखरू के घर पर पूछताछ शुरू हो गई, और प्रशासन ने सरकारी जमीन पर बनाए गए मकान को बुलडोजर चलाकर ध्वस्त कर दिया।

इसलिए, पीएमएवाई फंड का उपयोग करके बनाए गए इस विशेष घर के विध्वंस का पत्थरबाजों के घरों से कोई संबंध नहीं था, जिन्हें ध्वस्त कर दिया गया था। हाँ, दोनों विध्वंस एक ही समय में हुए, और मीडिया के एक धड़े ने झूठे और भ्रामक दावों के तहत इस सच को छिपाते हुए इसे भी पत्थरबाजी की कार्रवाई के तहत दिखा दिया।

हालाँकि, जैसा कि कुछ लोगों ने बताया, पीएमएवाई (शहरी) की केंद्र सरकार की योजना के तहत बनाए गए एक घर पर कार्रवाई पर सवाल उठाया जा रहा है। जबकि मकान मालकिन हसीना ने अपने घर को केंद्र की आवास नीति योजना से सहायता प्राप्त होने का सबूत दिया है, सोशल मीडिया सहित कई जगह इस बारे में सवाल उठाए गए हैं कि जिस जमीन पर सरकारी योजना के तहत घर बनाया गया है उसे अवैध कैसे कहा जा सकता है। इसे समझने के लिए, हमें सबसे पहले पीएमएवाई के बारे में गहराई से विचार करने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री आवास योजना में क्या शामिल है?

जून 2015 में शुरू की गई, इस योजना का उद्देश्य वर्ष 2022 तक शहरी क्षेत्रों में सभी के लिए आवास प्रदान करने का है। सरकारी वेबसाइट के अनुसार, इस मिशन के तहत घर बनाने के इच्छुक लाभार्थियों को केंद्रीय आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। यह नीति अलग-अलग राज्यों के लिए जलवायु विज्ञान, प्रशासनिक नीतियों और राज्य के संदर्भ के अनुसार ही भूमि अधिग्रहण और घरों के डिजाइन के लिए अलग-अलग नियम निर्धारित करती है। गौरतलब है कि PMAY एक विकेन्द्रीकृत योजना है जिसमें सरकार व्यक्तिगत रूप से उनके लिए घर बनाने के बजाय लाभार्थियों को धनराशि उपलब्ध कराती है।

योजना के तहत, सरकार निर्माण के विभिन्न स्तरों के उचित निरीक्षण के बाद लाभार्थियों को धन स्वीकृत करती है और घरों के वास्तविक निर्माण में शामिल नहीं होती है। मध्य प्रदेश के लिए पीएमएवाई दिशानिर्देशों में चरणबद्ध निर्माण के अनुसार धनराशि स्वीकृत करने के नियम निर्धारित किए गए हैं। लाभार्थी के सूचीबद्ध होने के बाद सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में पैसा जमा किया जाता है और प्लिंथ स्तर, स्लैब स्तर का निर्माण पूरा होने के बाद, निर्माण प्रक्रिया पूरी होने के बाद अंतिम पैसा जमा किया जाता है।

सर्कुलर में विशेष रूप से यह नियम है कि यदि लाभार्थी के पास अपनी जमीन नहीं है, तो स्थानीय निगम के आवास विभाग को इसके लिए 30-40 वर्ग मीटर के बीच की भूमि का पता लगाना चाहिए। यह स्थानीय प्राधिकरण द्वारा उचित आश्वासन भी माँगता है कि घर के निर्माण के लिए चुनी गई भूमि कानूनी रूप से लाभार्थी के स्वामित्व में है।

जबकि हाल ही में तहसील कोर्ट ने अधिसूचित किया है कि हसीना फखरू द्वारा किया गया निर्माण एक अतिक्रमण है, जो यह स्पष्ट करता है कि इस मामले में पीएमएवाई के तहत भूमि अधिग्रहण की उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। जिस पर प्रशासन ने कार्रवाई की है। यह पूरा मामला जमीन हड़पने का लगता है। जिस पर प्रशासन ने संज्ञान लेकर कार्रवाई की है। न कि यह मामला पत्थरबाजी के खिलाफ लिए गए एक्शन के तहत आता है।

‘मुसलमान औरतों का बुर्का हम उतरवाएँगे…’: मुस्लिम महिला का आरोप- जय श्रीराम बुलवाया, जाँच में निकला किराएदारी का विवाद

दिल्ली के सदर बाजार की एक महिला का वीडियो वायरल हुआ था। इसमें वह तीन हिंदू युवकों पर बुर्का खींचने और जय श्रीराम बुलवाने का आरोप लगा रही थी। दिल्ली पुलिस ने जब मामले की जाँच की तो आरोप झूठे निकले। पता चला कि महिला का आरोपितों के साथ काफी समय से किराएदारी विवाद चल रहा है। जब उससे मकान खाली करने को कहा गया तो उसने पूरे मामले को सांप्रदायिक रंग दे दिया।

मामले में शिकायत 12 अप्रैल 2022 (मंगलवार) को की गई थी। महिला का दावा था कि उसके साथ यह घटना 11-12 अप्रैल की दरम्यानी रात हुई थी। जाँच में आरोप झूठे पाए जाने के बाद पुलिस ने मामले को सांप्रदायिक रंग देने वालों को चेताया भी है।

वायरल वीडियो में बुर्का पहने एक महिला दिखाई दे रही है। महिला बता रही है, “रात के 2 बजे मैं अपनी वालिदा को देखकर अपने घर आ रही थी। मेरा भाई 4 कदम पीछे था, जो मुझे छोड़ने आ रहा था। मेरे पड़ोस के 3 शरारती लड़कों ने जिसमें एक राहुल है, उसने मेरे बुर्के के आस्तीन को खींचा। उन्होंने कहा कि मुसलमान औरतों का बुर्का हम उतरवाएँगे। मेरे भाई ने मुझे बचाने की कोशिश की तो उससे भी जय श्रीराम बोलने को कहा। उन्होंने कहा कि हम मुसलमानों को रहने नहीं देंगे।”

पुलिस को शाहीन द्वारा दी गई शिकायत

दिल्ली पुलिस ने बताया किराएदारी का विवाद

शाहीन के आरोपों की पोल दिल्ली पुलिस ने खोल दी। उत्तरी दिल्ली के DCP सागर सिंह कलसी ने बताया, “12 अप्रैल 2022 को दिल्ली के थाना सदर बाजार में सुबह-सुबह एक झगड़े की कॉल आई थी। कॉल करने वाली महिला ने बताया कि कुछ लड़कों ने उसके साथ झगड़ा किया है। पुलिस ने तुरंत मौके पर पहुँच कर जाँच की। जाँच के बाद पता चला कि सभी लोग आपस में परिचित हैं। इनका किराएदारी का विवाद भी कोर्ट में चल रहा है।” उन्होंने बताया कि यह बात जानकारी में है कि सोशल मीडिया पर कुछ लोग इस मामले को कम्युनल एंगल दे रहे हैं। ये बात बेबुनियाद है। ऐसे किसी भी मैसेज को फैलाना अपराध माना जाएगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोप लगाने वाली शाहीन ने भी पुलिस के आगे अपना बयान बदल लिया है। आरोपित किए गए तीनों लड़के मकान मालिक बताए जा रहे हैं जो किराएदार शाहीन से अपना घर खाली करवाना चाह रहे थे। इसी बात को लेकर देर रात विवाद हुआ था। घटना के समय तीनों लड़के शराब के नशे में बताए जा रहे हैं।

फरहान और शादाब ने सोशल मीडिया में दी हवा

इस मामले को सबसे पहले फरहान याह्या ने हिंदुस्तान लाइव नाम के फेसबुक पेज पर शेयर किया। उसने इसका शीर्षक दिया, “बुर्के में भाई के साथ जा रही महिला से बदसलूकी। जबरन जय श्री राम के नारे लगवाने का भाई-बहन का दावा। थाना सदर में दी गई शिकायत। एक लड़के को पुलिस ने पकड़ा। 2 गिरफ्त से बाहर।” दिल्ली पुलिस की सख्त संदेश के बाद फरहान ने फेसबुक पोस्ट डिलीट कर ली। लेकिन तब तक यह वायरल हो चुकी थी।

फेसबुक स्क्रीनशॉट

इसी तरह शादाब नाम के एक व्यक्ति ने अपने यूट्यूब चैनल ‘द शादाब वर्ल्ड न्यूज़’ पर 13 अप्रैल को इसी घटना को साम्प्रदायिक रंग देकर शेयर किया। खास बात ये है कि दिल्ली पुलिस की चेतावनी के बाद भी शादाब ने यह वीडियो खबर लिखे जाने तक डिलीट नहीं किया था।

‘मेरी हालत नसबंदी वाले दुल्हे जैसी’: हार्दिक पटेल बोले- मुझे मीटिंग में नहीं बुलाते, गुजरात कॉन्ग्रेस के हैं कार्यकारी अध्यक्ष

पाटीदार नेता और गुजरात कॉन्ग्रेस (Gujarat Congress) के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल (hardik Patel) का पार्टी से मोहभंग होता नजर आ रहा है। हार्दिक राज्य में होने वाला आगामी विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन उनका कहना है कि पार्टी लगातार उनकी अनदेखी कर रही है। उन्होंने कहा कि पार्टी में उनकी हालात उस दूल्हे की तरह हो गई है, जिसकी शादी के बाद नसबंदी करा दी गई हो।

हार्दिक ने बुधवार (13 अप्रैल 2022) को कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया कि उन्हें गुजरात प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी (PCC) की बैठक में भाग लेने के लिए नहीं बुलाया जाता। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी निर्णय में उन्हें शामिल नहीं किया जाता है। उन्होंने कहा, “इस पद का क्या मतलब है? गुजरात कॉन्ग्रेस में कार्यकारी अध्यक्ष का मतलब शादी के बाद दूल्हे की नसबंदी करवाने के बराबर है।”

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 2015 के एक मामले में हार्दिक पटेल की सजा पर रोक लगाने के बाद उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की थी। इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी पर खुद को नजरअंदाज करने का आरोप लगा दिया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस पाटीदारों का अपमान कर रही है। इस दौरान उन्होंने पाटीदार नेता नरेश पटेल का मामला भी उठाया।

हार्दिक पटेल ने कहा कि कॉन्ग्रेस में निर्णय-शक्ति का अभाव है। केंद्र व प्रदेश में नेता अधिक होने के कारण फैसला ही नहीं हो पाता है, लेकिन नरेश पटेल पर पार्टी को निर्णय लेना ही पड़ेगा। उन्होंने कहा कि 2015 के स्थानीय निकाय चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव में पाटीदार आंदोलन का कॉन्ग्रेस को फायदा मिला, लेकिन 16 विधायक पार्टी छोड़कर चले गए। कॉन्ग्रेस उन्हें बिकाऊ बताकर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। सभी बिके नहीं हो सकते, पार्टी में भी कोई कमी रही होगी।

कॉन्ग्रेस पर पाटीदारों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए हार्दिक ने कहा कि साल 2019 और 2021 में इसी कारण पार्टी की हार हुई। उन्होंने कहा कि 2017 में कन्ग्रेस ने उनका उपयोग किया, इस साल नरेश पटेल का उपयोग करना चाहती है तो क्या 2027 में किसी दूसरे पटेल को तलाश करेंगे। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस किसी का सम्मान नहीं कर सकती तो नहीं करे, लेकिन अपमान करने का भी उसे अधिकार नहीं है।

बता दें कि खोडलधाम ट्रस्ट के मुखिया नरेश पटेल (Naresh Patel) पिछले कुछ महीनों से सक्रिय राजनीति में आने के संकेत दे रहे हैं। हार्दिक का कहना है कि कॉन्ग्रेस से हरी झंडी नहीं मिलने के कारण पार्टी में उनका प्रवेश अटक गया है। उन्होंने कहा कि नरेश पटेल का पार्टी में क्या स्थान रहेगा, इसका फैसला करने में देर नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कार्यकारी अध्यक्ष को भी पर्याप्त सम्मान मिलना चाहिए।

बता दें कि साल 2015 के आरक्षण आंदोलन से संबंधित एक मामले में गुजरात की मेहसाणा की एक अदालत ने साल 2018 में हार्दिक पटेल को दो साल की सजा सुनाई थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (12 अप्रैल 2022) को रोक लगा दी है।

गुजरात के पिछले विधानसभा चुनावों से पहले हार्दिक पटेल ने आरक्षण को लेकर आंदोलन किया था और वह एक युवा नेता के रूप में उभरे थे। उसके बाद कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने खुद उन्हें पार्टी में शामिल कराया था। इसके बाद हार्दिक ने कहा था कि पार्टी में उन्हें कोई भूमिका नहीं दी जा ही है। इसके बाद उन्हें साल 2020 में प्रदेश कॉन्ग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया था।