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मुख़्तार अंसारी के एक गुर्गे की ₹60 करोड़ की संपत्ति जमींदोज, दूसरे का मकान ध्वस्त: फिर हरहराया CM योगी का बुलडोजर

उत्तर प्रदेश के बांदा जेल में बंद माफिया मुख्तार अंसारी और उसके करीबियों पर प्रशासन की ओर से लगातार कार्रवाई की जा रही है। मऊ प्रशासन ने सोमवार (11 अप्रैल, 2022) को मुख्तार अंसारी के करीबी गणेश दत्त मिश्रा की पाँच एकड़ भूमि पर अवैध प्लॉटिंग को बुलडोजर से ध्वस्त कराया। इसकी अनुमानित लागत 60 करोड़ बताई गई है।

जिलाधिकारी अरुण कुमार के निर्देश पर यह कार्रवाई हुई। सिटी मजिस्ट्रेट और सीओ सिटी ने पूरे दल-बल के साथ पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी के करीबी गणेश मिश्रा द्वारा भुजौटी में पाँच एकड़ भूमि पर की गई अवैध प्लॉटिंग के मुख्य द्वार और बाउंड्री को ध्वस्त कराया। वहीं मुख़्तार अंसारी के राइट हैंड और 50,000 रुपए के इनामी बदमाश अनुज कन्नौजिया के मकान पर भी बुलडोजर चला।

सिटी मजिस्ट्रेट त्रिभुवन ने बताया कि मुख्तार गैंग के मुख्य सहयोगी गणेश दत्त मिश्रा द्वारा अवैध तरीके से कमाई गई संपत्ति से यश, विक्रम, अनीता देवी, प्रीति वर्कशीट इंफ्रा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर विजय कुमार आदि के नाम से भूमि खरीद कर अवैध तरीके से प्लॉटिंग कर अवैध कॉलोनी बनाई जा रही थी। जिसे जिलाधिकारी के निर्देश के बाद ध्वस्त कराया गया। यह भूमि गाटा संख्या 163, 164 एवं 170 है।

उन्होंने बताया कि अवैध प्लॉटिंग और कॉलोनाइजर को चिह्नित किया जा रहा है। उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। सिटी मजिस्ट्रेट ने बताया कि प्लॉटिंग की जमीनों की जाँच के लिए राजस्व टीम को निर्देशित किया गया है। सरकारी भूमि के हेराफेरी की जांच अभिलेखों से की जा रही है। जाँच में कुछ भी गलत मिलता है तो संबंधित के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाएगा। 

मुख्तार के आर्थिक साम्राज्य पर कार्रवाई जारी

बांदा जेल में बंद मऊ जिले के सदर से बाहुबली पूर्व विधायक मुख्तार अंसारी पर आर्थिक चोट जारी है। पुलिस लगातार मुख्तार अंसारी और करीबियों की संपत्ति की जाँच कराकर जब्ती कार्रवाई कर रही है। रविवार (10, अप्रैल 2022) को गाजीपुर जिले में प्रशासन ने मुख्तार अंसारी की तीन करोड़ 25 लाख रुपए की बेनामी संपत्ति कुर्क कर ली।

महुआबाग स्थित शुभ्रा कॉम्प्लेक्स सामने यह प्लॉट मुख्तार अंसारी की अम्मी राबिया खातून के नाम पर थी। अकले गाजीपुर जिले में अब तक मुख्तार अंसारी की 60 करोड़ की संपत्ति कुर्क की जा चुकी है, जबकि गिरोह से संबंधित लोगों की करीब 100 करोड़ की अवैध संपत्ति ध्वस्त की जा चुकी है।

‘कश्मीर लॉ कालेज’ का Pak समर्थक प्रिंसिपल बर्खास्त, उठा रहा था करोड़ों की सैलरी: आतंकियों से सम्बन्ध, PM मोदी पर भद्दी टिप्पणी

जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में स्थित ‘कश्मीर लॉ कॉलेज (Kashmir Law College)’ ने पाकिस्तान का समर्थन करने वाले अपने प्रिंसिपल शेख शौकत (Sheikh Showkat) को बर्खास्त कर दिया है। कॉलेज प्रबंधन ने शौकत की जगह नई नियुक्ति के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है। ‘द न्यू इंडियन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, शौकत हमेशा से पाकिस्तान का समर्थन करता रहा है। उसने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों और कश्मीर के अलगाववादी संगठनों का समर्थन करते हुए उनकी हौसला अफजाई की है।

शौकत वर्ष 2016 में उस वक्त चर्चा में आया, जब उसने अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी, अरुंधति रॉय, प्रो. एसएआर गिलानी और अन्य लोगों के साथ ‘आजादी: द ओनली वे’ कन्वेशन की अध्यक्षता की थी। दिल्ली में ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेने के बाद शौकत पर भारत विरोधी भाषण देने के लिए देशद्रोह का आरोप लगाया गया था। दिल्ली पुलिस ने इस कन्वेशन, जिसमें भारत विरोधी नारे लगाए थे – उसका आयोजन करने के लिए वक्ताओं के खिलाफ धारा 124 ए (देशद्रोह), 120 बी (आपराधिक साजिश) और 149 (गैरकानूनी सभा) के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी।

रिपोर्टों के अनुसार, कॉलेज प्रशासन ने शौकत की संदिग्ध गतिविधियों का पता लगाने के लिए एक गुप्त जाँच शुरू की थी। कॉलेज को उस पर संदेह था कि उसने (शौकत) घाटी में सक्रिय अलगाववादियों और आतंकवादी नेटवर्क के साथ अंडरकवर संबंध बनाए हुए है। शौकत को एक मोहरे के रूप में भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा था। उसे अलगाववादियों और आतंकवादी द्वारा जम्मू-कश्मीर को लेकर जहर उगलने और झूठे भाषण देने के लिए तैयार किया गया था।

भारत सरकार के पैसों पर पलने वाला शेख शौकत अपने ही देश को खोखला कर रहा था। कॉलेज के प्रिंसिपल के तौर पर उसे वेतन के रूप में लगभग 5.1 करोड़ रुपए और अतिरिक्त भत्ते के रूप में 3.3 करोड़ रुपए मिलते थे। इसके अलावा अब उसे हर महीने 1 लाख रुपए से ज्यादा की पेंशन मिलती है। एक सार्वजनिक प्राधिकरण जिसकी पहचान अभी तक गुप्त रखी गई है, उसने शौकत के खिलाफ उसके आतंकी संबंधों को लेकर पेंशन संबंधी कानूनों के प्रासंगिक प्रावधानों को लागू करने के लिए जाँच की है।

पीएम मोदी के खिलाफ शेख की बेहुदा टिप्पणी

वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने के बाद नरेंद्र मोदी ने श्रीनगर का दौरा किया था। उस वक्त शौकत ने अपने एक लेख में लिखा था, “कई दशकों के बाद, मैं एक भारतीय प्रधानमंत्री के आगमन पर एयरपोर्ट रोड पर खड़ा था। मैं वहाँ प्रधानमंत्री का स्वागत करने के लिए नहीं, बल्कि एक नौकर को काम पर रखने के लिए उसे यहाँ लेने आया हुआ था, ताकि मैं अपने किचन गार्डन में उस नौकर से काम करवा सकूँ। एक बार जब मैं एक बिहारी मजदूर को अपने घर पर काम कराने के लिए ले जा रहा था, तो घटनास्थल पर मौजूद सीआरपीएफ के जवानों ने उसे मेरे साथ जाने की अनुमति नहीं दी।

उसी लेख में उन्होंने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी की रैली में शामिल होने के लिए जम्मू-कश्मीर में प्रवासी मजदूरों को जबरन बस में बैठाया गया। उन्होंने लिखा, “स्थानीय लोगों के आक्रोश को देखते हुए मजबूरी में मोदी की रैली में भीड़ दिखाने के लिए प्रवासी मजदूरों को शामिल किया गया।”

बता दें कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने घाटी में अलगाववादी और आतंकी संगठनों से संबंध होने की जानकारी मिलते ही विभिन्न विभागों के 5 सरकारी अधिकारियों को बर्खास्त ​करने के कुछ दिनों बाद ही अलगाववादी शेख शौकत को बर्खास्त किया था।

शहबाज शरीफ बने पाकिस्तान के PM: इमरान खान का नेशनल असेंबली से इस्तीफा, कहा- चोरों के साथ नहीं बैठ सकता

पाकिस्तान में महीनों की राजनीतिक उठापटक के बीच आज शहबाज शरीफ पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री चुने गए हैं। शहबाज शरीफ को नेशनल असेंबली में निर्विरोध चुना गया है। वहीं नए पीएम के चुनाव के दौरान इमरान खान की पार्टी पीटीआई के सभी सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया। पूर्व PM इमरान खान के करीबी फवाद चौधरी ने ये भी एलान किया कि उनकी पार्टी के सभी सांसद सामूहिक इस्तीफा देंगे जिसका कई सांसदों ने विरोध भी किया।

बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के छोटे भाई शहबाज शरीफ (70 वर्षीय) पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सबसे लंबे तक मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। शाहबाज 2018 के चुनावों में PM पद के उम्मीदवार भी थे।

वहीं पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान ने शहबाज शरीफ पर भ्रष्टाचार सहित कई गंभीर आरोप लगाए हैं। नए प्रधानमंत्री के चुनाव से पहले इमरान खान ने नेशनल असेंबली के सदस्य के रूप में यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि वह ‘चोरों’ के साथ नहीं बैठेंगे।

इमरान खान ने कहा, “जिस व्यक्ति के खिलाफ अरबों रुपए का भ्रष्टाचार का मामला है। उस व्यक्ति को प्रधानमंत्री के रूप में चुना जाना शर्मनाक है। देश का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता है।

कौन हैं शाहबाज शरीफ

शाहबाज शरीफ पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (PML-N) के सांसद हैं और पाकिस्तान के पूर्व पीएम नवाज शरीफ के छोटे भाई हैं। वह 2018 से नेशनल असेंबली के सदस्य हैं और विपक्ष के नेता भी हैं।

गौरतलब है कि भारत पाकिस्तान के बँटवारे के पहले शरीफ परिवार जम्मू के अनंतनाग जिले में रहा करता था। बँटवारे के बाद शाहबाज ने लाहौर से ग्रेजुएशन किया। 80 के दशक में राजनीति में कदम रखने वाले शाहबाज शरीफ ने 1988 में पहला चुनाव जीता था। 1997 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बने, इसके बाद 2008 और 2013 में भी वह पंजाब के मुख्यमंत्री रहे हैं।

कॉन्ग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे से ED ने 2 घंटे की पूछताछ, ₹5000 करोड़ की संपत्ति गाँधी परिवार के पास जाने का है मामला

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने ‘नेशनल हेराल्ड’ मामले (National Herald Case) से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग संबंधी जाँच के सिलसिले में कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे से सोमवार (11अप्रैल, 2022) को पूछताछ की। जाँच अधिकारियों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि एजेंसी जाँच संबंधी कुछ पहलुओं को समझना चाहती है। इसलिए उनका बयान ‘धनशोधन रोकथाम कानून (PMLA)’ के तहत दर्ज किया जाएगा।

सुब्रमण्यन स्वामी की शिकायत पर शुरू हुई थी नेशनल हेराल्ड केस की जाँच

इस मामले में कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी भी आरोपित हैं। नेशनल हेराल्ड मामले की जाँच सुब्रमण्यन स्वामी की शिकायत पर शुरू की गई थी। उन्होंने 2012 में न्यायालय में अर्जी दायर कर कॉन्ग्रेस नेताओं पर आरोप लगाया था कि उन्होंने ‘यंग इंडिया लिमिटेड’ कंपनी के अंतर्गत एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड का अधिग्रहण कर लिया था।

मल्लिकार्जुन खड़गे यंग इंडिया और एजीएल के पदाधिकारी रह चुके हैं, इसलिए ईडी उनसे पूछताछ कर रही है। सुब्रमण्यन स्वामी का दावा था कि यंग इंडिया लिमिटेड ने गलत तरीके से नेशनल हेराल्ड की संपत्तियों का अधिग्रहण किया। सुब्रमण्यम स्वामी ने आरोप लगाया था कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने पार्टी के पैसे से सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी की कंपनी ‘यंग इंडिया’ को 90 करोड़ रुपए उधार दिए और इसके बाद उसी पैसे से गाँधी परिवार की कंपनी ‘यंग इंडिया’ ने नेशनल हेराल्ड अखबार निकालने वाली कंपनी एसोसिएट जनरल को खरीद लिया। 

ऐसे में कंपनी की करीब 5 हजार करोड़ की संपत्ति गाँधी परिवार के पास चली गई। इस मामले में सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर न्यायमूर्ति सुरेश कैत ने सोनिया और राहुल गाँधी, कॉन्ग्रेस महासचिव दिवंगत ऑस्कर फर्नांडिस, सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और यंग इंडिया से 12 अप्रैल तक स्वामी की याचिका पर जवाब देने को कहा है।

जानिए क्या है नेशनल हेराल्ड केस

गौरतलब है कि नेशनल हेराल्ड अखबार का प्रकाशन 1938 में शुरू किया गया था। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस अखबार का इस्तेमाल आजादी की लड़ाई में किया। नेहरू ने 1937 में एसोसिएटेड जर्नल बनाया था, जिसके तहत 3 अखबारों का प्रकाशन किया जा रहा था। हिंदी में नवजीवन, उर्दू में कौमी आवाज और अंग्रेजी में नेशनल हेराल्ड। लेकिन 2008 तक एसोसिएटेड जर्नल ने फैसला किया कि अब समाचार पत्रों का प्रकाशन नहीं किया जाएगा। तब कंपनी पर 90 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया। 

इसके बाद कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने ‘यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड’ नाम की एक नई अव्यवसायिक कंपनी बनाई। इसमें सोनिया और राहुल गाँधी सहित मोती लाल वोरा, सुमन दुबे, ऑस्कर फर्नांडिस और सैम पित्रोदा को निदेशक बनाया गया। नई कंपनी में सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी के पास 76 प्रतिशत शेयर थे जबकि बाकी के 24 प्रतिशत शेयर अन्य निदेशकों के पास थे।

गौरतलब है कि इसी तरह, प्रवर्तन निदेशालय ने इससे पहले दिसंबर 2018 में एसोसिएटेड जर्नल्स एंड नेशनल हेराल्ड केस के मामले में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा द्वारा आवंटित मोहाली में 30 करोड़ रुपए की संपत्ति कुर्क की थी।

‘हिंदुओं पर हमला हिंदुओं की ही गलती है, मुस्लिम इलाके में जाते क्यों हैं’ : रामनवमी पर हुई हिंसा पर लिबरलों का तर्क

हाल में हिंदू त्योहार मनाने के दौरान हिंदुओं पर हमले की कई घटनाएँ घटीं। करौली में 2 अप्रैल को हिंदू नव वर्ष के मौके पर शोभा यात्रा में भी हिंदुओं पर पत्थर बरसाए गए। इसके बाद वहाँ हिंसा और आगजनी हुई। राजस्थान पुलिस ने अपने बयान में कहा कि हिंदू, भड़काऊ गाने चला रहे थे और चूँकि इलाका मुस्लिम बहुल था इसलिए हिंसा भड़क गई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, PFI ने प्रशासन को पहले चेतावनी दी हुई थी कि हिंदू लोग, मुस्लिम बहुल इलाके में जुलूस निकालने वाले हैं जिससे संभव है कि हिंसा हो।

राम नवमी के मौके पर कई जगह हिंदुओं पर कई गुना तेजी से हमले किए गए। विभिन्न राज्यों में राम नवमी पर निकाली गई शोभा यात्रा पर मुस्लिम भीड़ ने आक्रमण किया। गुनाह बस इतना था कि हिंदू मुस्लिम इलाकों में से शोभा यात्रा निकाल रहे थे।

इसी तरह विश्व हिंदू परिषद ने भी राम नवमी पर एक यात्रा निकाली, लेकिन जैसे ही ये यात्रा हावड़ा के शिबपुर की जीटी रोड पर पीएम बस्ती के नजदीक फजीर बाजार के पास पहुँची तो यात्रा पर पथराव किया गया।

एक अन्य शोभा यात्रा जो गुजरात के हिम्मतनगर में निकली वहाँ पर भी ऐसे ही हमले हुए। फिर झारखंड के लोहारगढ़ से भी ऐसी रिपोर्ट आई। इसी तरह मध्य प्रदेश के खरगोन और कर्नाटक के मुलबगल में भी यही सब हुआ।

हिंदुओं को मुस्लिम इलाकों से नहीं जाना चाहिए, हिंसा उनकी गलती है: लिबरल तर्क

इन सबके बावजूद सारा दोष हिंदुओं पर मढ़ दिया जाता है कि आखिर उन्होंने अपने ही त्योहार पर गाने बजाकर यात्रा निकालने की जुर्ररत कैसे की। भारतीय सेकुलर लिबरलों का मानना है कि हिंदुओं को हमेशा विनम्र, मिलनसार होना चाहिए और उनमें कभी भी इतनी हिम्मत नहीं होनी चाहिए कि वो मुस्लिम इलाकों में एंट्री करें। अगर वो ऐसा करें और हिंसा भड़के तो भी गलती उन्हीं की हो।

हाल में एनडीटीवी के श्रीनिवासन जैन ने हिंदुओं पर हुए हमले के लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराया है। तर्क यही है कि आखिर हिंदू लोग मुस्लिम इलाके से गुजरे क्यों।

जैन ने अपनी बात कहते हुए लगातार बताया कि उनका मानना यही है कि जो हिंसा की घटनाएँ हुई उसके पीछे कारण केंद्र में बैठी मोदी सरकार है और साथ में वो हिंदू नेता हैं जो ‘यथास्थिति’ के खिलाफ बयान देते हैं। उदाहरण के लिए एक हिंदू नेता ने उस हलाल अर्थव्यवस्था के विरुद्ध बयान कैसे दिया जो मुस्लिमों को फायदा देती है और हिंदुओं के साथ भेदभाव करते हैं।

श्रीनिवासन का मानना है कि भेदभाव करने वाले प्रक्रिया पर सवाल उठाना हिंसा को भड़काना है और जो हिंसा होती है वो इसलिए होती है क्योंकि मोदी सत्ता में हैं। जैन अपनी बात को कहते हुए उन दर्जनों दंगों, बम विस्फोट, नरसंहार को नजरअंदाज करने का फैसला लेते हैं जो तब हुए जब मोदी सत्ता में नहीं थे।

वैसे ऐसा सोचने वाले श्रीनिवासन जैन अकेले नहीं हैं। सेकुलर-लिबरलों का पूरी जमात है जो मुस्लिम-इलाके वाली थ्योरी को मानती है। उनके मुताबिक, ‘मुस्लिम इलाके’ से जुलूस निकालना, हिसा को भड़काना है। अपने स्पष्टीकरण में ये लोग ये बिलकुल भूल जाते हैं कि वो मुस्लिम भीड़ ही थी जिसने हिंदुओं पर पत्थरबाजी की थी।

कॉन्ग्रेस नेता को देखिए:

और आखिर ये ‘मुस्लिम इलाका’ है क्या चीज? ये वही सवाल है जो अन्य लोग भी श्रीनिवासन जैन और उन जैसों से पूछ रहे हैं। क्या ये कोई अलग इलाके हैं जहाँ हिंदुओं को आने की अनुमति नहीं है? क्या ये वैसे ही इलाके हैं जहाँ स्वास्थ्यकर्मियों के ऊपर पत्थर बरसाए जाते थे जब वो कोविड संक्रमित लोगों को जाँचने जाते थे

इस तथाकथित सेकुलर, लोकतांत्रिक देश में स्वघोषित लिबरल, मुस्लिम बस्ती के विचार को प्रसारित करते हैं जहाँ गैर मुस्लिमों को जाने की, रहने की या गुजरने की अनुमति न हो। इससे पहले ऐसी ही सफाइयाँ बरखा दत्त द्वारा भी एक बार दी गई थी जब वो कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के लिए कश्मीरी पंडितों को ही जिम्मेदार बता रही थीं। बरखा ने कहा था कि कश्मीरी पंडितों का नरसंहार और पलायन की वजह वही लोग हैं क्योंकि उन्होंने घाटी में लोगों की नौकरियाँ उनसे ले ली थीं।

मुस्लिम इलाके ही वह वजह हैं जिनकी वजह से देश के टुकड़े हुए। मुस्लिम इलाके हैं जिसके कारण कश्मीर में रालिव- गैलिव-त्यासालिव गूँजा, मुस्लिम इलाके हैं कि क्यों श्रीनगर में बिहारी लोग मारे गए, मुस्लिम इलाके हैं वजह जिसके कारण पूर्वी बंगाल में लाखों बंगाली हिंदू मारे गए, बलात्कार किए गए। आखिर कब तक ये देश ऐसे मुस्लिम इलाकों की भरपाई करता रहेगा जहाँ देश के सेकुलर कानून लागू नहीं होते। 

कौन निर्णय लेगा कि मुस्लिम इलाका कौन सा है? क्या कोई निर्धारित नियम हैं कि गैर मुस्लिम लोग मुस्लिम इलाकों में एंट्री नहीं कर सकते। एक ऐसा देश जो मजहबी आधार पर विभाजन की बर्बरता से गुजर चुका हो, वहाँ तथाकथित एलिट लोगों द्वारा मजहबी धर्मांध को बढ़ावा दिया जा रहा है।

कहीं पथराव और आगजनी तो कहीं DJ को लेकर लाठी-डंडों से हमला: रामनवमी के दौरान मुस्लिम भीड़ के हमले की 10 घटनाएँ

रामनवमी के दिन देश के अलग-अलग हिस्सों से शोभायात्राओं पर हमले की खबरें हैं। इन हमलों में श्रद्धालुओं के अलावा पुलिसकर्मियों को भी निशाना बनाया गया है। हमले में जान-माल का भी नुकसान हुआ है। कुछ लोगों ने इन हमलों को सुनियोजित घटनाएँ बताया है। पुलिस ने इन घटनाओं में केस दर्ज कर के अपनी जाँच शुरू कर दी है। इन तमाम घटनाओं में विपक्षी मुस्लिम समुदाय से हैं। आइए, जानते हैं उनमें से कुछ प्रमुख हमलों के बारे में।

गुजरात के हिम्मतनगर से शुरुआत

गुजरात के हिम्मतनगर में पहले हमले की घटना सामने आई थी। 10 अप्रैल, 2022 (रविवार) को हुई इस घटना में शोभा यात्रा में चल रहे वाहनों को जला दिया गया था। पथराव में लगभग आधे दर्जन पुलिसकर्मी घायल हुए थे। इस घटना में आरोपितों के रुप में मुख्य रूप से राजू मेंटल, सिकंदर पठान, समीर पठान, खालिद पठान, मुबीन शेख, वाहिद पठान और उमर पठान आदि के नाम सामने आए थे। पुलिस हमलावरों की तलाश में दबिश दे रही है। घटना में घायलों और आरोपितों की गिरफ्तारी की अभी कोई आधिकारिक सूचना नहीं है।

गुजरात के ही आणंद में हुई झड़प

10 अप्रैल को ही गुजरात के आणंद जिले में रामनवमी के दौरान हिंसक झड़प हुई थी। यहाँ छपरिया के हनुमान मंदिर के पास निकली शोभायात्रा पर पत्थरबाजी हुई। इस घटना से नाराज लोगों ने वाहनों में तोड़फोड़ की। गुजरात के गृहमंत्री हर्ष संघवी ने इस घटना में शामिल आरोपितों को जल्द गिरफ्तार करने के प्रशासन को निर्देश दिए हैं। घटना में घायलों और आरोपितों की गिरफ्तारी की अभी कोई आधिकारिक सूचना नहीं है।

मध्यप्रदेश के खरगोन में आगजनी

10 अप्रैल 2022 को ही मध्यप्रदेश के खरगोन में रामनवमी की शोभा यात्रा के दौरान बज रहे DJ का बहाना बना कर भीड़ ने हमला किया था। इस हमले के बाद शहर के कुछ अन्य हिस्सों में भी हिंसा शुरू हो गई। घटना में पथराव और आगजनी हुई है। अन्य जिलों से अतिरिक्त पुलिस बल मँगा कर हालात को काबू में करने का प्रयास किया जा रहा है। घटना में घायलों और आरोपितों की गिरफ्तारी की अभी कोई आधिकारिक सूचना नहीं है। जिले के ADM ने हालात सामान्य होने और जिले में धारा 144 लागू होने की जानकारी दी है।

मुंबई के मानखुर्द इलाके में हमला

10 अप्रैल 2022 की ही रात मुंबई के मानखुर्द इलाके में रामनवमी के दौरान हमला हुआ है। पुलिस के मुताबिक इस हमले में आरोपितों की संख्या और हमले की वजह की जॉंच की जा रही है। इस दौरान लगभग 20 वाहनों में तोड़फोड़ की सूचना है। खाना का रहे लोगों का खाना भी गिरा देने की सूचना है। महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने किसी भी प्रकार से दंगा फैलाने की कोशिश करने वालों को चेतावनी दी है।

झारखंड के लोहरदगा में हिंसा

10 अप्रैल 2022 को झारखंड के लोहरदगा में रामनवमी के मेले में लगी दुकानों में आग लगा दी गई। कई वाहनों को जला दिया गया। दिल्ली जा रही राजधानी एक्सप्रेस ट्रेन पर भी पत्थर मारे गए। इस हिंसा में 3 लोग बुरी तरह से घायल बताए जा रहे हैं। जिले में धारा 144 लगा कर इंटरनेट बंद कर दिया गया है। पुलिस द्वारा अभी तक गिरफ्तारियों की सही जानकारी नहीं दी गई है।

झारखंड के बोकारो में शोभायात्रा पर पथराव

रामनवमी के ही दिन 10 अप्रैल 2022 को झारखंड के बोकारो में शोभायात्रा पर पथराव हुआ। यह घटना फुसरो के राजाबेड़ा स्थित गंजू मोहल्ले की है। घटना की जानकारी मिलने ही मौके पर भारी पुलिस बल पहुँच गया। पुलिस ने यहाँ आगे की शोभायात्रा रोक दी। हिन्दू संगठनों ने विरोध स्वरूप पुलिस द्वारा रोके गए स्थान पर ही अपनी बाइकें छोड़ दी थीं। इस मामले में भी पुलिस कार्रवाई की अभी तक आधिकारिक जानकारी नहीं दी गई है।

हावड़ा में रामनवमी जुलूस पर पत्थरबाजी

वहीं पश्चिम बंगाल के हावड़ा में भी VHP द्वारा निकाली गई रामनवमी की शोभा यात्रा पर हमले की खबर आई है। यह दावा इस घटना में वायरल हो रहे कुछ वीडियोज के आधार पर किया गया है। बताया जा रहा है कि इस हमले में पुलिस को भी निशाना बनाया गया है। घटनास्थल हावड़ा का फ़ाजिर बाजार बताया जा रहा है। इस घटना में दुकानों में आग लगाने का भी दावा किया गया है।

पश्चिम बंगाल के बाँकुड़ा की रैली में शामिल 17 लोग गिरफ्तार

एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल के बाँकुड़ा में रामनवमी के दौरान हंगामे का आरोप लगा कर पुलिस ने 17 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस मामले में पुलिस भी रैली आयोजकों पर दिए गए रास्ते के बजाय मस्जिद के रास्ते से जाने का आरोप लगा रही है। इस दौरान रैली में शामिल लोगों पर लाठीचार्ज भी किया गया है। यह घटना भी 10 अप्रैल 2022 की है।

JNU में वामपंथी छात्रों ने ABVP कार्यकर्ताओं पर हमला किया

रामनवमी के ही दिन 10 अप्रैल 2022 को वामपंथी छात्रों ने ABVP से जुड़े छात्रों पर हमला कर दिया। इस हमले के दौरान कुछ छात्र घायल हो गए हैं। ABVP से जुड़े छात्र रामनवमी को हवन कर रहे थे। इसी दौरान वामपंथी छात्रों ने माँसाहार का मुद्दा उठाया। उन्होंने छात्रों के मेस में माँस पकाने की माँग को ले कर हंगामा किया और तोड़फोड़ की। दिल्ली पुलिस जाँच के लिए JNU कैम्पस में गई थी। इस केस में FIR भी दर्ज कर ली गई है। अभी तक किसी की गिरफ्तारी की सूचना नहीं है।

मुंबई पुलिस ने हनुमान चालीसा बजा रहे मनसे के ‘रामरथ’ को जब्त किया

रामनवमी के दिन (10 अप्रैल, 2022) को राज ठाकरे की पार्टी मनसे ने शिवसेना भवन पर हनुमान चालीसा बजाने का एलान किया था। इस एलान के बाद उन्होंने एक रामरथ बनाया था जिस पर लाऊडस्पीकर लगाए गए थे। यह रामरथ शिवसेना भवन के आगे खड़ा कर के हनुमान चालीसा बजाने के दौरान ही मुंबई पुलिस द्वारा जब्त कर लिया गया। इसी के साथ एक मनसे कार्यकर्ता को हिरासत में भी ले लिया गया था। मनसे के इस कदम को आदित्य ठाकरे ने स्टंट बताया था।

‘मामा के बुलडोजर’ ने खरगोन में तोड़े पत्थरबाजों के अवैध निर्माण: रामनवमी शोभा यात्रा पर किया था हमला

रामनवमी पर खरगोन में हिंसा करने वालों के खिलाफ प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी है। सोमवार (11 अप्रैल, 2022) को अवैध निर्माणों को बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया गया। इसके लिए पाँच जेसीबी मशीनें लगाई गई।

जानकारी के मुताबिक चार सरकारी कर्मचारियों पर भी गाज गिरी है। इन पर अफवाहें फैलाने और हिंसा में शामिल होने के आरोप थे। इनमें से तीन दैनिक वेतनभोगी हैं और एक नियमित। नियमित कर्मचारी को सस्पेंड कर दिया गया है। वहीं दैनिक वेतनभोगियों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया है। इससे पहले, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संकेत दिया था कि राज्य सरकार पथराव, दंगा और आगजनी में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी।

सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए हैं, जहाँ भारी पुलिस बल की मौजूदगी के बीच जेसीबी मशीनों को अवैध मकानों को ध्वस्त करते हुए देखा जा सकता है।

सीएम शिवराज सिंह चौहान ने दिए थे कार्यवाही के निर्देश

इस घटना को लेकर राज्य के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि इस हिंसा में शामिल आरोपितों की पहचान कर ली गई है और उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। सीएम ने कहा था कि रामनवमी के अवसर पर खरगोन में हुई घटना दुर्भाग्यपूर्ण है। मध्य प्रदेश की धरती पर दंगाइयों के लिए कोई स्थान नहीं है। दंगाई चिन्हित कर लिए गए हैं, इनको छोड़ा नहीं जाएगा। उनके खिलाफ कठोरतम कार्यवाही की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा था कि इसके लिए राज्य सरकार क्लेम ट्रिब्यूनल का गठन कर रही है।

वहीं गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने मामले पर ट्वीट करते हुए कहा था, “खरगोन के गुनहगारों से सख्ती से निबटा जाएगा। वहाँ जिन घरों से पत्थर आए हैं, उन घरों को पत्थर का ढेर बनाएँगे। मध्य प्रदेश में कानून का राज है और सांप्रदायिक सौहार्द को किसी कीमत पर बिगड़ने नहीं दिया जाएगा। वहाँ पर पर्याप्त मात्रा में पुलिस बल मौजूद हैं। फिलहाल शांति है। दंगाइयों को लगातार चिन्हित किया जा रहा है। 77 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। कर्फ्यू अभी भी लगा हुआ है।”

क्या है पूरा मामला?

10 अप्रैल को, खरगोन के तालाब चौक इलाके में रामनवमी की शोभा यात्रा निकाली गई थी। इस यात्रा के दौरान कुछ लोगों ने पथराव किया। 30 से ज्यादा दुकानों और मकानों में आग लगा दी गई और मंदिरों में भी तोड़फोड़ की गई। जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने आँसू गैस के गोले दागे। इस हिंसा के दौरान छह पुलिसकर्मियों समेत 24 लोग घायल हो गए। यहाँ तक कि SP सिद्धार्थ चौधरी को भी गोली लग गई। हमले के बाद शांति-व्यवस्था कायम रखने के लिए कर्फ्यू लगा दिया गया।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक यह घटना अचानक नहीं घटी। यह पूर्व नियोजित हमला था। उपद्रवियों ने पहले से ही छतों पर पत्थर और पेट्रोल बम जमा कर रखे थे। एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार आगजनी की घटना को अंजाम दिया गया। शाम की हिंसा के बाद रात के 12 बजे फिर से हिंसा भड़की थी।

अब वाघा जैसी परेड गुजरात में भी, दिखेगा जवानों का शौर्य: अमित शाह ने पाकिस्तान बॉर्डर पर व्यू प्वाइंट का किया उद्‌घाटन

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार (10 अप्रैल 2022) को गुजरात के बनासकांठा जिले के नडाबेट में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर व्यू प्वाइंट का उद्घाटन किया। यह गुजरात का पहला बॉर्डर प्वाइंट है। यहाँ बॉर्डर की फोटो गैलरी और हथियारों समेत टैंकों का प्रदर्शन किया जाएगा।

इस अवसर पर बोलते हुए अमित शाह ने परियोजना को पूरा करने के लिए पीएम मोदी को श्रेय दिया। उन्होंने कहा कि बहुउद्देशीय पर्यटन परियोजना पीएम मोदी के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में पूरी हुई। उन्होंने हमारी सीमाओं की रक्षा करने वाले बीएसएफ जवानों की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि देश की संप्रभुता की रक्षा करने वाले बीएसएफ के जवानों के कारण देश नई ऊँचाइयों को प्राप्त कर रहा है।

इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, राज्य के पर्यटन मंत्री पुनेश मोदी, बीएसएफ के महानिदेशक और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। अमित शाह ने नडाबेट में नादेश्वरी माता मंदिर का भी दौरा किया और पूजा-अर्चना की। ‘सीमा दर्शन प्रोजेक्ट’ के तहत यह गुजरात का पहला बॉर्डर व्यू प्वाइंट है। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, नडाबेट बॉर्डर व्यू पॉइंट पंजाब के अटारी-वाघा बॉर्डर से काफी अलग होगा, जहाँ परेड में पाकिस्तानी सेना भी भाग लेती है। नडाबेट में पाकिस्तानी सेना भाग नहीं लेगी और सीमा सुरक्षा बल (BSF) भारतीय बलों का प्रतिनिधित्व करेगा। नडाबेट का व्यू प्वाइंट भारत-पाकिस्तान सीमा से केवल 20 से 25 किलोमीटर पहले बनाया गया है। नडाबेट पर आने वाले पर्यटकों को बीएसएफ जवानों से संवाद करने, उनके जीवन व बहादुरी को नजदीक से देखने का मौका मिलेगा। यह प्रोजेक्ट गुजरात पर्यटन द्वारा बनासकांठा जिले के नडाबेट के निकट सुई गाँव में 125 करोड़ रुपए की लागत से स्थापित की गई है।

गुजरात स्टेट टूरिज्म के एमडी आलोक कुमार पांडे ने इस मामले पर बात करते हुए कहा, “यहाँ एक खास बिल्डिंग तैयार की गई है, जिसमें गुजरात के इतिहास से जुड़ी हर तरह की जानकारी स्टोर की गई है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह विचार क्षेत्र के युवाओं को बीएसएफ या भारतीय सेना में शामिल होने के लिए प्रेरित करेगा। लोगों को हमारी सीमा पर बीएसएफ जवानों के जीवन और कार्य को देखने का अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से इस परियोजना की शुरुआत की गई है।

इसके अलावा BSF को समर्पित एक संग्रहालय भी तैयार किया गया है। इसमें मिग-27 लड़ाकू जेट और बीएसएफ के विभिन्न स्तंभों सहित सशस्त्र बलों द्वारा उपयोग किए जाने वाले वाहनों और विमानों को प्रदर्शित किया गया है। अमित शाह ने कहा कि पायलट परियोजना अगले 10 सालों में 5 लाख से अधिक युवाओं को रोजगार देगी।

अर्धसत्य, फर्जी दावे और झूठ: इटली के आईजेएफ में राना अय्यूब ने किया देश को बदनाम, इन्वेस्टीगेशन के नाम पर परोसी मनगढ़ंत बातें

चंदा धोखाधड़ी के मामले में आरोपित राना अय्यूब को इस साल 6 अप्रैल से 10 अप्रैल, 2022 के बीच इटली के पेरुगिया में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता महोत्सव (आईजेएफ) के 16वें संस्करण में अध्यक्ष के रूप में आमंत्रित किया गया था। चर्चा का विषय था, “जब राज्य खतरा बन जाए: दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में खतरे में पत्रकारिता।”

सत्र, जो शुक्रवार (8 अप्रैल, 2022) को आयोजित किया गया था, को दो भागों में विभाजित किया गया था: दर्शकों से मुखातिब होकर राना अय्यूब ने संबोधन दिया, इसके बाद इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट्स (आईसीएफजे) के निदेशक जूली पोसेटी (Julie Posetti) के साथ विषय पर चर्चा हुई।

राना अय्यूब के भ्रामक बयान

कार्यक्रम में लगभग 5 मिनट में सोहराबुद्दीन मामले में अमित शाह की संलिप्तता के खारिज किए गए दावों को दोहराते हुए, अय्यूब ने दावा किया था, “टेलीविजन में कुछ शुरुआती प्रयासों के बाद, मैं तहलका नामक इस प्रकाशन में शामिल गई, जहाँ मेरी जाँच ने तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह को मुस्लिमों की गैर-न्यायिक हत्या के लिए सलाखों के पीछे भेज दिया था।”

अमित शाह को 25 जुलाई 2010 को कुख्यात अपराधी सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी के एनकाउंटर के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर हत्या, जबरन वसूली, अपहरण और भारतीय दंड संहिता की 5 अन्य धाराओं के तहत आरोप लगाया गया था।

हालाँकि, शाह की गिरफ्तारी के एक महीने के भीतर, गुजरात की तत्कालीन पुलिस प्रमुख गीता जौहरी ने खुलासा किया था कि सोहराबुद्दीन मामले में तत्कालीन गृह मंत्री सहित राजनेताओं को फँसाने के लिए सीबीआई के विशेष निदेशक बलविंदर सिंह ने उन पर दबाव डाल रहे थे।

गौरतलब है कि सीबीआई तब प्रतिद्वंद्वी कॉन्ग्रेस पार्टी के नियंत्रण में थी। बहरहाल, दिसंबर 2014 में अमित शाह को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। अदालत को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे ये साबित किया जा सके कि शाह ने पुलिस को गैर-न्यायिक हत्याओं को अंजाम देने का आदेश दिया था।

21 दिसंबर, 2018 को सीबीआई की एक विशेष अदालत ने सोहराबुद्दीन मामले में फर्जी तरीके से फँसाए गए सभी 22 आरोपितों को बरी कर दिया था। अदालत ने माना था कि सीबीआई (तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार के तहत) के पास सच्चाई खोजने की कोशिश करने के बजाय राजनीतिक नेताओं को फँसाने के लिए एक अलग योजना के तहत कार्य कर रही थी।

यह भी देखा गया था कि CBI द्वारा गवाहों के बयान, जिनका इस्तेमाल ‘फर्जी’ मुठभेड़ का आरोप लगाने के लिए किया गया था, गलत तरीके से दर्ज किए गए थे। जबकि राना अय्यूब ने अमित शाह को जेल भेजने के बारे में खुशी जताई थी, जबकि वह दर्शकों को इस बात पर गच्चा दे गईं कि उन्हें 7 साल पहले न्यायपालिका ने बरी कर दिया था।

प्रकाशक का छापने से इनकार और गुजरात फाइल्स की ‘सच्चाई’

राना अय्यूब ने दावा किया कि उनके नियोक्ता ‘तहलका’ ने ‘राजनीतिक दबाव’ का हवाला देते हुए गुजरात दंगों के उनके ‘कवरेज’ को प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया, “मैं तब केवल 26 वर्ष का थी। एक पत्रकार के लिए यह एक बड़ी बात थी जिसने उसकी जान जोखिम में डाल दी और लेकिन उसकी जाँच रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की गई।”

अय्यूब ने आगे कहा, “मैं हर पत्रकारिता संगठन के गई, लेकिन सबने मेरी रिपोर्ट छापने से इनकार कर दिया। और फिर, मैं प्रकाशकों के पास गई और कहा कि क्या आप मेरे स्टिंग ऑपरेशन के टेप की प्रतिलिपि प्रकाशित कर सकते हैं। और उन्होंने कहा, यह बहुत जोखिम भरी किताब है।”

कथित पत्रकार अय्यूब ने अपनी पुस्तक को स्वयं प्रकाशित करने के लिए अपनी माँ के सोने को गिरवी रखने का भी दावा किया। 2004 से 2014 के बीच कॉन्ग्रेस पार्टी सत्ता में रही और नरेंद्र मोदी और अमित शाह को फँसाने के लिए सक्रिय रूप से कोशिश कर रही थी, यह देखते हुए उनके दावों पर किसी को भी ज्यादा भरोसा नहीं है।

अयूब की किताब कॉन्ग्रेस के लिए एकदम सही गोला-बारूद टाइप मसाला होती। ऐसे में यह कह पाना मुश्किल है कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने राना अय्यूब के लिए ऐसा शत्रुतापूर्ण माहौल बनाया कि उन्हें अपने दम पर कोई प्रकाशक भी नहीं मिला।

जबकि कथित पत्रकार का कहना है कि उनकी पुस्तक की सामग्री राजनीतिक दबाव के कारण तहलका द्वारा प्रकाशित नहीं की गई थी, जबकि पूर्व प्रबंध निदेशक और संगठन की संस्थापक शोमा चौधरी ने 2016 में ही विवाद को सुलझा लिया था।

एक ट्वीट में, उन्होंने स्पष्ट किया था, “राणा अय्यूब एक साहसी रिपोर्टर हैं लेकिन उनकी स्टोरी तहलका में प्रकाशित नहीं हुई थी क्योंकि यह संपादकीय मानकों को पूरा नहीं करती थी न कि राजनीतिक दबाव था।”

दिलचस्प बात यह है कि राना अय्यूब ने 2016 में यानी भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान, “गुजरात फाइल्स: एनाटॉमी ऑफ ए कवर अप” शीर्षक से अपनी पुस्तक प्रकाशित की। यह इस दावे पर सवाल खड़ा करता है कि अगर सीएम मोदी सच को ‘छिपाना’ चाहते थे, तो वह पीएम बनने के बाद अय्यूब की किताब के प्रकाशन की अनुमति क्यों देंगे?

उक्त पुस्तक, जिसे कथित पत्रकार गुजरात दंगों के बारे में ‘अंतिम सत्य’ होने का दावा करती हैं, को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने काल्पनिक बताकर रद्दी घोषित कर दिया था।

कोर्ट ने कहा था, “राना अय्यूब की किताब किसी काम की नहीं है। यह अनुमानों, कल्पनाओं और मनगढ़ंत बातों पर आधारित है, और इसका कोई प्रमाणिक साक्ष्य नहीं है। किसी व्यक्ति की राय साक्ष्य के दायरे में नहीं होती है।” ऑपइंडिया ने एक विस्तृत रिपोर्ट में, 2002 के दंगों पर अपनी ‘काल्पनिक किताब’ में लिखने के लिए चुने गए हर झूठ को पहले खारिज कर दिया था।

हिंदू रैली में पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की फर्जी खबर

आगे सत्र में लगभग 14 मिनट में, राना अय्यूब ने दावा किया, “युवा पत्रकार, चार दिन पहले, एक हिंदू रैली में मुस्लिमों के खिलाफ हेट-स्पीच को कवर करने के लिए बाहर थे। जहाँ उन्हें बुरी तरह पीटा गया, जिहादी कहा गया और पुलिस ने उल्टा पत्रकारों के खिलाफ ही मामला दर्ज किया।

इस महीने की शुरुआत में, दिल्ली पुलिस ने हिंदू महापंचायत में पत्रकारों की कथित हिरासत वाली फैलाई गई फर्जी खबरों का खंडन किया था। क्विंट के रिपोर्टर मेघनाद बोस ने मूल रूप से दावा किया था कि उन्हें और ‘चार अन्य मुस्लिम पत्रकारों’ को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि दिल्ली में एक कार्यक्रम में हिन्दुओं की भीड़ द्वारा उन पर ‘हमला’ किया गया था।

जबकि उत्तर-पश्चिम दिल्ली के पुलिस उपायुक्त ने स्पष्ट किया था, “कुछ पत्रकारों ने स्वेच्छा से, अपनी मर्जी से, भीड़ से बचने के लिए, जो उनकी उपस्थिति से उत्तेजित हो रही थी, कार्यक्रम स्थल पर तैनात पीसीआर वैन में बैठ गए और सुरक्षा कारणों से वहाँ से बचकर निकलने की कोशिश की।”

“किसी को हिरासत में नहीं लिया गया। उचित पुलिस सुरक्षा प्रदान की गई थी, ”उसने जोड़ा था। डीसीपी उत्तर-पश्चिम दिल्ली के अनुसार, बोस द्वारा दावा किए गए ‘हमले’ के आरोप तब थे जब हिंदू कार्यकर्ताओं ने पत्रकारों की उपस्थिति पर आपत्ति जताई थी, जो एक खुले तौर पर ‘हिंदू’ समारोह में हुआ था।

इसके अलावा, डीसीपी ने कहा कि पत्रकारों को सुरक्षा के लिए स्वेच्छा से पुलिस वैन पर चढ़ने और वहाँ से निकालने में पुलिस सुरक्षा प्रदान की गई थी। जबकि कार्यक्रम के दौरान पुलिस द्वारा किसी पत्रकार को हिरासत में नहीं लिया गया था, डीसीपी ने यह भी कहा था कि गलत सूचना फैलाने वालों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई शुरू की जाएगी।

गुजरात दंगे, पीएम मोदी और सीएए को लेकर फैलाया गया झूठ

2002 के गुजरात दंगे मीडिया के एक वर्ग के लिए ‘अच्छा कच्चा माल’ साबित हुए, जिससे ऐसे लोगों ने नरेंद्र मोदी को ‘गुजरात के कसाई’ के रूप में भी पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2002 और 2012 के बीच एक दशक तक, कई पत्रकार इसी की बदौलत आगे बढ़े। और सबने गुजरात के तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

2012 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के नेतृत्व में एक विशेष जाँच दल (एसआईटी) को गुजरात दंगों में नरेंद्र मोदी की संलिप्तता का कोई सबूत नहीं मिला। इसके बावजूद, जिन्होंने गुजरात दंगों से अपना करियर बनाया, वे झूठ को ‘पोस्ट-ट्रुथ’ में बदलने की उम्मीद में दोहराते रहते हैं। जैसे, यह उम्मीद की जा रही थी कि राना अय्यूब 2002 के दंगों और अंतरराष्ट्रीय मंच पर सहानुभूति हासिल करने के लिए पीएम मोदी की कथित भूमिका को फिर से हवा देंगी।

कार्यक्रम के लगभग 18 मिनट बाद, अय्यूब ने दावा किया, “मुझे याद है जब उन्हें (मोदी) भारत के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में घोषित किया गया था, बहुत सारे अच्छे पत्रकारों ने कहा था कि हमें उन्हें एक मौका देना चाहिए। मुझे समझ में नहीं आता कि आप किसी ऐसे व्यक्ति को मौका कैसे देते हैं जिसने सामूहिक हत्या की है और उसे सक्षम बनाया है। यह भी कोई पैमाना कैसे है?”

दिल्ली दंगों में पुलिस कांस्टेबल पर बंदूक ताने शाहरुख खान

लगभग 20 मिनट बाद, अय्यूब ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि मानवीय कानून भारत के नागरिकों के रूप में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भेदभाव करता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि पीएम मोदी के ‘फासीवादी शासन’ ने छात्रों और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया और उन्हें आतंकी मामलों में फँसाया।

यह जानने के बावजूद कि सीएए ने भारतीय मुस्लिमों की नागरिकता नहीं छीनी, बल्कि पड़ोसी इस्लामिक देशों से सताए गए धार्मिक अल्पसंख्यकों की नागरिकता को तेजी से ट्रैक किया, जो वर्तमान में बिना किसी कानूनी स्थिति के भारत में रह रहे हैं। उसने दंगा आरोपित सफूरा जरगर की ‘गर्भावस्था’ का भी हवाला दिया ताकि उसके पक्ष में सहानुभूति की लहर पैदा हो। जबकि सीएए मौजूदा भारतीय नागरिकों से संबंधित नहीं है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो और सीएए किसी को भी नहीं रोकता है, सामान्य प्रक्रिया में मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करने से तो रोक ही दें। भारत में पहले से ही शरणार्थी के रूप में रह रहे धार्मिक रूप से प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के लिए सीएए केवल एक बार का उपाय था।

अय्यूब हालाँकि यहाँ यह भी जिक्र करने से चूक गईं कि जरगर को अप्रैल 2020 में गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों में शामिल होने के लिए गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस ने यह भी दावा किया था कि वह “नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनपीआर) को वापस लेने के लिए भारत सरकार को मजबूर करने के लिए अस्थिर करने और विघटित करने की साजिश का हिस्सा थी।”

खुद को प्रताड़ित दिखाने कि इस झूठी आदत और सार्वजनिक रूप से बोले गए झूठ से सीएए के जरिए हिंसक विरोधों को हवा दी गई, जो अंततः दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों में परिणत हुआ। दिल्ली दंगे 3 दिनों से अधिक समय तक चला और 50 से अधिक लोगों ने इसमें अपनी जान गँवाई।

मीडिया का एक वर्ग, जिसमें राना अय्यूब एक हिस्सा हैं, ने यह आरोप लगाया कि दिल्ली के दंगे एक ‘मुस्लिम विरोधी नरसंहार’ थे और मोदी सरकार को नाजियों और मुसलमानों को यहूदी के रूप में चित्रित करने की कोशिश की। यह राज्य को धमकी देने वाली इस्लामी भीड़, पथराव और बंदूकें (जैसे शाहरुख पठान) की की तस्वीरें और वीडियो सामने थे। दंगों में लगभग आधे पीड़ित हिंदू थे और कई रिपोर्टों से पता चला था कि कुछ मुस्लिम समूहों ने दंगों के लिए पूरी तैयारी की थी, पड़ोसी हिंदुओं पर हमला करने के लिए पत्थर, पेट्रोल बम और तेजाब तक एकत्र किया था।

गौरी लंकेश और सिद्दीकी कप्पन के बारे में आधा सच

राना अय्यूब ने वैश्विक मंच पर भारत की एक ख़राब छवि पेश करने के लिए सिद्दीकी कप्पन और गौरी लंकेश की हत्या का संदर्भ दिया।

सत्र के लगभग 21वें मिनट में, अय्यूब ने आरोप लगाया कि उनकी ‘दोस्त’ गौरी लंकेश, जिन्होंने ‘गुजरात फाइल्स’ का कन्नड़ में अनुवाद किया था, को दक्षिणपंथी कट्टरपंथियों ने गोली मार दी थी। अगले ही पल कथित पत्रकार ने खुद का खंडन करते हुए कहा कि गौरी लंकेश को आज तक किसने मारा यह कोई नहीं जानता।

उसने ‘पत्रकार’ सिद्दीकी कप्पन की भी सराहना की, जिसे 5 अक्टूबर, 2020 को एक नकली आईडी के साथ हाथरस में प्रवेश करने की कोशिश करते हुए गिरफ्तार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने हलफनामे में, उत्तर प्रदेश सरकार ने बताया कि कप्पन राज्य में जातिगत विभाजन और कानून व्यवस्था की गड़बड़ी पैदा करने के लिए पत्रकारिता की आड़ का इस्तेमाल कर रहे थे।

कप्पन कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से जुड़ा था। उत्तर प्रदेश सरकार ने थेजस में कप्पन द्वारा 30 नवंबर, 2011 की एक फ्रंट-पेज कहानी की एक प्रति अदालत में पेश की थी, जिसमें उसने दावा किया था कि अल-कायदा आतंकवादी ओसामा बिन लादेन एक ‘शहीद’ था।

सरकार ने खुलासा किया कि सिद्दीकी कप्पन कई अन्य दंगों का भी मास्टरमाइंड था, जो थेजस संपादकों के साथ मिलकर केरल राज्य में धार्मिक अशांति पैदा करना चाहता था। वहीं प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में सिद्दीकी कप्पन के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है।

हाथरस मामले में रेप के बेबुनियाद आरोप

अय्यूब ने यह भी आरोप लगाया कि हाथरस मामले में 19 वर्षीय पीड़िता के साथ बलात्कार किया गया था, हालाँकि फोरेंसिक और मेडिकल रिपोर्ट दोनों ने यौन उत्पीड़न के आरोपों को खारिज कर दिया गया था। बता दें कि हाथरस की घटना 14 सितंबर, 2020 को हुई थी, जिसके बाद पीड़िता को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उसने 29 सितंबर को दम तोड़ दिया।

पीड़िता के भाई ने भी घटना वाले दिन दर्ज कराई गई शिकायत में रेप का जिक्र नहीं किया था। बलात्कार के आरोप बहुत बाद में 22 सितंबर, 2020 को सामने आए, जब पुलिस ने पीड़िता का बयान दर्ज किया था। हाथरस मामले ने देश में बड़े पैमाने पर राजनीतिक बहस छेड़ दी, खासकर मीडिया रिपोर्टों में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और दावा किया कि पीड़िता के साथ क्रूरता की गई थी।

गौरतलब है कि पीड़िता के शुरुआती बयान, परिवार की प्राथमिकी और बयान सभी में गला घोंटने की कोशिश का आरोप लगाया गया था। हालाँकि, बाद में, परिवार ने अपने आरोपों की सूची में बलात्कार और अंततः सामूहिक बलात्कार के आरोपों को जोड़ा। चूँकि पीड़िता दलित थी, इसलिए राजनीतिक दलों ने जातिगत हिंसा के कोण का फायदा उठाने की कोशिश की थी।

मामले की पूरी टाइमलाइन, मीडिया की गलत रिपोर्ट, राजनीतिक स्पिन और विवाद, और सरकार द्वारा की गई कार्रवाई यहाँ पढ़ी जा सकती हैं। ऐसे झूठे नैरेटिव के आधार पर, वामपंथी, लिबरलों ने पत्रकारों के जरिए इस मामले को गरमाए रखने की कोशिश की, जाहिर तौर पर पूरा मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में राजनीतिक लाभ के लिए खड़ा किया गया था।

राना अय्यूब कोविड -19 चंदा घोटाला

जूली पोसेट्टी के साथ अपनी बातचीत के दौरान, राना अय्यूब ने आरोप लगाया कि व्यक्तिगत लाभ के लिए कोविड -19 फंड के दुरुपयोग के आरोप तब लगे जब उन्होंने दूसरी लहर के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कोविड -19 के कथित कुप्रबंधन की आलोचना की।

अय्यूब ने जोर देकर कहा, “₹10-12 करोड़ एक छोटी राशि है जो सार्वजनिक जाँच के योग्य नहीं है। लेकिन अब मेरे खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज है। मैं आपको एक छोटा सा उदाहरण दूँगी। जब मैं बोलने के लिए यहाँ आने के लिए अदालत के फैसले का इंतजार कर रही थी। तब जज ने कहा कि यह तो छोटी सी रकम है। भले ही यह 10 या 12 करोड़ था, फिर भी यहाँ आने का क्या औचित्य है?”

अय्यूब ने आगे बोलते हुए कहा, “आप जानते हैं कि समाचार चैनल क्या कह रहे थे: न्यायाधीश ने राणा अय्यूब पर 10-12 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाया।” तभी मेजबान ने हस्तक्षेप किया, “सिर्फ संदर्भ के लिए, क्या हम 20,000 डॉलर के बारे में बात कर रहे हैं।”

राना अय्यूब ने जूली पोसेट्टी को करेक्ट करने की जहमत उठाने के बजाय उसके साथ खेल कर दिया। यह जानते हुए कि दर्शक डॉलर से रुपए की विनिमय दरों से अच्छी तरह वाकिफ नहीं थे।

अयूब ने दर्शकों को यह नैरेटिव दिया कि ₹10-12 करोड़ मात्र 20,000 अमेरिकी डालर के बराबर है, एक कथित ‘छोटी राशि’ जिसके लिए उसके कद के पत्रकार से पूछताछ नहीं की जानी चाहिए। वास्तव में, भारतीय रुपए में 12 करोड़ लगभग 1.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर के बराबर है।

अय्यूब ने कोविड के नाम पर वसूला चंदा, निजी खातों में रखा

इस साल 10 फरवरी को, ऑपइंडिया ने बताया था कि ईडी ने मनी लॉन्डरिंग अधिनियम के तहत अय्यूब और उसके परिवार के खातों में 1.77 करोड़ रुपए जब्त किए थे। खुलासा होने के कुछ दिनों बाद, अय्यूब ने एक बयान में आरोप लगाया कि उसे “पत्रकारिता” के लिए फँसाया जा रहा है और उसने पैसे का दुरुपयोग नहीं किया।

हालाँकि, उसके सभी दावों को एक ट्विटर उपयोगकर्ता हॉक आई ने खारिज कर दिया था, जो पिछले साल कथित चंदा धोखाधड़ी का उजागर करने वाले पहले व्यक्ति थे। ईडी ने अपने कुर्की आदेश में कहा है, “राना अय्यूब ने पूर्व नियोजित तरीके से और दानदाताओं को धोखा दिया है।”

आदेश में इस बात पर जोर दिया गया कि ‘घोटाला’ उस समय से शुरू हुआ जब उन्हें धन प्राप्त हुआ, जिसका उपयोग उसने कोविड -19 राहत कार्य के लिए नहीं किया। इसके बजाय उसने ₹50 लाख की सावधि जमा की और राशि को अपने पिता और बहन के बचत खाते में नेट बैंकिंग के माध्यम से स्थानांतरित कर दिया। आप यहाँ लिंक पर क्लिक करके कोविड-19 फंड के दुरुपयोग के आरोपों के बारे में पढ़ सकते हैं। ईडी ने यह भी कहा था कि अय्यूब ने राहत कार्य दिखाने के लिए जो बिल मुहैया कराए थे, वो भी फर्जी है।

29 मार्च को, राणा अय्यूब को भारतीय आव्रजन अधिकारियों ने लंदन के लिए एक उड़ान भरने से रोक दिया था, क्योंकि उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला लंबित था। 4 अप्रैल को, उन्हें दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा शर्तों के साथ विदेश यात्रा करने की अनुमति दी गई थी कि वह अपनी यात्रा, संपर्कों और ठहरने की जगह का विवरण दें।

आकार पटेल मामले का विकृत रूप

सत्र के लगभग 39 मिनट में, जूली पोसेटी ने दावा किया कि भारत सरकार भारतीय पत्रकारों की अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से जुड़ने पर प्रतिबंध लगा रही है। राना अय्यूब ने पुष्टि में सिर हिलाया और अपने दावों को मजबूत करने के लिए आकार पटेल का मामला उठाया, हालाँकि सच्चाई कुछ और ही है।

इसी साल 6 अप्रैल को आकार पटेल को अमेरिका जाने वाली फ्लाइट में बेंगलुरु एयरपोर्ट पर रोक दिया गया था। एमनेस्टी इंडिया के पूर्व प्रमुख ने ट्वीट किया था कि उन्हें एग्जिट कंट्रोल लिस्ट में डाल दिया गया है।

उन्होंने कहा कि सीबीआई के एक अधिकारी ने उन्हें सूचित किया कि एफसीआरए उल्लंघन के संबंध में एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के खिलाफ मामले के कारण उनके खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी है। हालाँकि, बाद में उन्हें दिल्ली में राउज़ एवेन्यू कोर्ट द्वारा अस्थायी राहत प्रदान की गई। और सीबीआई ने कहा है कि वे अदालत के आदेश को चुनौती देंगे।

दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने उसी कोर्ट के एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के उस आदेश पर रोक लगा दी थी जहाँ सीबीआई को पटेल के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर को तुरंत वापस लेने का निर्देश दिया गया था।

पिछले साल फरवरी में प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की 17.66 करोड़ रुपए की चल संपत्ति कुर्क की थी। ईडी ने पाया था कि भारत सरकार द्वारा एफसीआरए लाइसेंस रद्द करने के बाद, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया फाउंडेशन ट्रस्ट और अन्य एमनेस्टी संस्थाओं ने विदेशों से धन प्राप्त करने के लिए ‘नए तरीके’ अपनाए थे।

निष्कर्ष

राना अय्यूब ने घंटे भर के सत्र के दौरान, एक पत्रकार के रूप में अपने विवादास्पद करियर के इर्द-गिर्द एक भावनात्मक कहानी गढ़ी। अपने निराधार दावों को पुष्ट करने के लिए, उसने अर्धसत्य, अनुमानों और झूठ का सहारा लिया।

इस बात से पूरी तरह अवगत होने के बावजूद कि अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारिता महोत्सव के 16वें संस्करण में मुख्य रूप से पश्चिमी दर्शकों को भारत के आंतरिक मामलों के बारे में कुछ भी नहीं पता था, कथित पत्रकार ने गलत सूचना और झूठे दावों को फैलाने के लिए उस मंच का इस्तेमाल किया।

वहीं अंतरराष्ट्रीय मंच ने खुद को पीड़ित दिखाने की कहानी को दोहराने के लिए एक सही अवसर के रूप में कार्य किया, जैसा कि उसके मुस्लिम होने के जानबूझकर इस्तेमाल किए गए संदर्भ से स्पष्ट है। मॉडरेटर की ‘अज्ञानता’ और अय्यूब की ‘पत्रकारिता’ की जवाबदेही की कमी के कारण, दुनिया भर के श्रोताओं को एक बार फिर झूठ परोसा गया।

‘पहले The Kashmir Files के लिए शाबाशी दी, अब फिल्म को बता रहे साजिश’: विवेक अग्निहोत्री ने शरद पवार की ‘हिपोक्रेसी’ की खोली पोल

द कश्मीर फाइल्स को लेकर हाल में एनसीपी प्रमुख शरद पवार का फिर बयान आने के बाद अब फिल्म के निर्देशक विवेक अग्रिहोत्री ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि कैसे शरद पवार इस फिल्म को लेकर कुछ दिन पहले दी गई अपनी ही राय से पलट गए हैं। इस बयान की मानें तो पहले शरद पवार ने द कश्मीर फाइल्स की तारीफ की थी। मगर अब वह उसे सुनियोजित साजिश बता रहे हैं।

शरद पवार का बयान देख विवेक अग्रिहोत्री ने एक बार फिर उनकी हिपोक्रेसी का खुलासा किया। उन्होंने लिखा, “उस शख्स का नाम विवेक रंजन अग्निहोत्री था जो आपको कुछ दिन पहले प्लेन में मिला था। उसने आपके और आपकी पत्नी के पैर छुए थे और आपने उसने आशीर्वाद देकर उसे फिल्म के लिए शुभकामनाएँ दी थी कि उसने कश्मीर हिंदुओं के नरसंहार पर लाजवाब फिल्म बनाई है।”

बता दें कि कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार पर बनी द कश्मीर फाइल्स पिछले एक माह से चर्चा में है। देश-विदेश तक में इस फिल्म की सराहना की जा रही है। ऐसे में इस बीच कल फिर शरद पवार का इस फिल्म पर बयान आया। उन्होंने कहा,

“एक शख्स ने फिल्म (द कश्मीर फाइल्स) बनाई। इस फिल्म में हिंदुओं पर हमला होते दिखाया गया है। यह फिल्म दिखाता है कि बहुसंख्यक हमेशा अल्पसंख्यक पर हमला करते हैं और जब वह बहुसंख्यक मुस्लिम होता है तो हिंदू समुदाय असुरक्षित हो जाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सत्ता में बैठे लोगों ने इस फिल्म का प्रचार किया।”

उन्होंने आरोप लगाया कि धार्मिक आधार पर समाज में दरार पैदा करने की कोशिश की जा रही है। पवार ने कहा, “हिंदुओं और मुस्लिमों, दलितों और गैर-दलितों के बीच कुछ हलकों में दरार पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है। हमें इसकी जाँच करनी चाहिए।” उन्होंने इसे सुनियोजित साजिश करार देते हुए देश में पैदा हो रही सांप्रदायिक स्थिति पर भी गंभीर चिंता जताई।

₹250 करोड़ के पार पहुँची द कश्मीर फाइल्स

बता दें कि जिस फिल्म को लेकर शरद पवार जैसे लोग विरोध में उतरे हुए है उस फिल्म ने हाल में 250 करोड़ रुपए की कमाई करके नया रिकॉर्ड बनाया। कहा जा रहा है कि शायद ही कोई फिल्म हो जिसकी ओपनिंग मात्र 3 करोड़ से हुई हो लेकिन चौथे हफ्ते तक उसने 250 करोड़ रुपए का कलेक्शन कर लिया हो। इसके अलावा महामारी के बाद वो पहली फिल्म है जिसने इस आँकड़े को छुआ।