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हिन्दू नव वर्ष मनाने की सज़ा: 2 छात्र निलंबित, 500 का खाना बंद करवाया, झारखंड के कॉलेज ने बताया ‘अनुशासनहीनता’

झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के जगन्नाथपुर पालिटेक्निक कालेज में हिन्दू नववर्ष मना रहे 2 छात्रों को निलंबित करने की खबर है। वहीं बताया जा रहा है कि 500 हिन्दू छात्रों को खाना मिलना भी बंद करवा दिया गया है। खबरों के मुताबिक हिन्दू नववर्ष का आयोजन कॉलेज मैनेजमेंट के हिसाब से अनुशासनहीनता है। इस घटना का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है जिसमें सज़ा पाए छात्रों से बात करने का दावा किया गया है। घटना 2 अप्रैल, 2022 (शनिवार) की है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ छात्रों का आरोप है कि शनिवार को कुछ छात्र हिन्दू नववर्ष मनाने के लिए हॉस्टल की छत पर जमा हुए थे। यहाँ इन छात्रों ने जय श्री राम का नारा लगाया। तभी स्कूल के प्रिंसिपल संजीव कुमार आए। उनके आने की जानकारी पाते ही कई छात्र हॉस्टल में अपने कमरों की तरफ भाग निकले। जब वो पहुँचे तब 3 छात्र अमृत, घनश्याम व एक अन्य उन्हें मौके पर मिले। उन्हें बताया गया कि उस कार्यक्रम के आयोजक वही तीन छात्र थे। प्रिंसिपल ने इनमें से 2 छात्रों को निलंबित कर दिया व एक छात्र को कॉलेज से निकाल दिया।

प्रिंसिपल की इस कार्रवाई से नाराज छात्रों की उनसे नोकझोंक भी हुई। छात्रों ने कार्यक्रम में शामिल हर किसी को सस्पेंड करने की माँग की। बताया जा रहा है कि शाम को स्कूल का मेस भी बंद करवा दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम को अश्वनी श्रीवास्तव नाम के एक व्यक्ति ने इस पूरी घटना को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन व कुछ अन्य लोगों को टैग कर के ट्वीट कर दिया। इस वीडियो में 500 हिन्दू छात्रों का खाना बंद करवाने का भी दावा किया गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और स्थानीय प्रशासन हरकत में आ गया।

वहीं स्कूल के प्रिंसिपल ने इस घटना पर अपनी सफाई पेश की है। उन्होंने बताया, “मुख्यमंत्री को ट्वीट की गई बातें पूरी तरह से गलत है। कॉलेज में हर समुदाय के बच्चे पढ़ते हैं। कुछ छात्र कॉलेज की छत पर जय श्रीराम का नारा लगाने लगे। इस से वातावरण पर गलत असर पड़ता है। इसी वजह से मैंने अमृत और घनश्याम नाम के छात्रों को सस्पेंड किया है। इन छात्रों के परिजनों को भी बुलाया गया है। अमृत हमारे स्कूल का टॉपर छात्र है। उसको मोबाइल से किसी ने उकसाया है।”

संवाद सूत्र समाचार पत्र

प्रिंसिपल संजीव ने आगे बताया, “मेस बंद करवाने वाली बात भी गलत है। मेस चलाने का काम छात्र खुद करते हैं। हम तो उन्हें खाने की सामग्री देते हैं। ऐसे में मैं मेस क्यों बंद करूंगा। मैंने घटना की जानकारी स्थानीय थाने और बी डी ओ को दे दी है। इसी के साथ मामले की जाँच के लिए सीनियर टीचर एम् एस झा के नेतृत्व में कर्मचारियों की 7 सदस्य की टीम गठित की गई है। हम किसी छात्र का भविष्य नहीं खराब करना चाहते बल्कि उन्हें अनुशासन में रखना चाहते हैं। किसी छात्र को निष्कासित किए जाने की बात गलत है।”

हलाल सर्टिफिकेट भी तुष्टिकरण की पैदाइश: जो काम सरकारी, उसमें मजहबी मुहर की घुसपैठ क्यों?

हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर काफी चर्चा चल रही है। पिछले कई रिपोर्टों में हमने बताया है कि कैसे हलाल मांस उद्योग गैर-मुस्लिमों के खिलाफ भेदभाव करता है और अंततः हलाल प्रक्रिया की मजहबी आवश्यकताओं को बनाए रखने के लिए गैर-मुस्लिमों को नौकरियों और रोजगार से अलग-थलग कर देता है।

कई कंपनियों, मुस्लिमों और हलाल समर्थकों ने यह स्पष्ट करने की कोशिश किया है कि गैर मांसाहारी खाद्य पदार्थों, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य एफएमसीजी सामानों जैसे शाकाहारी उत्पादों के लिए भी हलाल एक प्रमाणपत्र है। कुछ ने यह भी दावा किया कि हलाल प्रमाणन केवल ‘शुद्धता और प्रामाणिकता’ के लिए एक प्रमाणीकरण है, और हलाल प्रमाणीकरण (गैर-मांस उत्पादों पर) का अर्थ केवल यह है कि उत्पाद ‘अच्छा’ है।

बहस में उतरा क्विंट का पत्रकार

फिर भी हमें हलाल सर्टिफिकेट की जरूरत क्यों है? और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मजहब के अलावा इस प्रमाणन के पीछे क्या औचित्य है?

इस दावे से कई सवाल उठते हैं।

सरकार द्वारा मौजूदा प्रमाणपत्र

अगर हम उत्पादों पर हलाल प्रमाणपत्र स्वीकार करना शुरू करते हैं, तो क्या इसका मतलब यह है कि आईएसआई और एफएसएसएआई जैसे उपभोक्ता उत्पादों पर मौजूदा सरकारी प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं हैं? क्या कोई पारदर्शी, वैज्ञानिक और अच्छी तरह से परिभाषित विधि है जो उत्पादों की तथाकथित शुद्धता, या अच्छाई तय करती है? इसका उत्तर नहीं होगा क्योंकि हलाल प्रमाणन धार्मिक इस्लामी संगठनों द्वारा जारी किया जाता है, उदाहरण के लिए, भारत में जमीयत उलमा-ए-हिंद, जिसकी विशेषता के क्षेत्रों में आतंकवादियों और हत्यारों को कानूनी सहायता प्रदान करना शामिल है।

हलाल प्रमाणन विशुद्ध रूप से इस्लामिक है, मजहबी है, यहाँ तक ​​कि गैर मांसाहारी उत्पादों में भी, क्योंकि यह मानता है कि उक्त उत्पादों में कोई ऐसी सामग्री है जो इस्लाम में निषिद्ध है। यह विचार अपने आप में भेदभावपूर्ण है क्योंकि यहाँ प्रमाणन का आधार एक मजहबी मान्यता है, चाहे इस्लाम में उस व्यक्ति की कोई आस्था, ‘अनुमति’ है या नहीं।

यह कहाँ रुकेगा?

हम पहले बता चुके हैं कि कैसे हलाल प्रमाणन का पूरा विचार अन्य समुदायों के प्रति भेदभावपूर्ण है। यह गैर-मुस्लिमों पर भी एक इस्लामी विश्वास थोपता है। हलाल प्रमाणन इस प्रकार एक समानांतर अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करता है। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में, जहाँ 80% से अधिक आबादी हिंदू है, और जहाँ कई संस्कृतियों के साथ-साथ कई धार्मिक मान्यताएँ पनपती हैं, हलाल का विचार ही भेदभावजनक, अपमानजनक है।

यदि गैर मांसाहार उत्पादों के लिए हलाल प्रमाणपत्र है, और आबादी का एक बड़ा वर्ग सौंदर्य प्रसाधन, गैर मांसाहारी खाद्य पदार्थों और अन्य एफएमसीजी उत्पादों जैसे उत्पादों की एक श्रृंखला पर चाहता है, तो यह कहाँ रुकता है? क्या होगा यदि प्रमाणन की यह आवश्यकता रेलवे स्टेशन भवनों, बसों, कपड़ों, रबर, पेट्रोलियम उत्पादों के रूप में भी बढ़ा दी जाए?

यदि एक समुदाय उत्पादों पर हलाल प्रमाणन की माँग करता है, और सरकार इसकी अनुमति देती है, तो अन्य समुदायों को समान प्रमाणपत्रों की माँग करने से कौन रोकेगा? क्या होगा अगर सिख, जैन और बौद्ध उपभोक्ता वस्तुओं को उपभोग के लिए ‘प्रमाणित’ करने की माँग करते हैं, जब उनके संबंधित अधिकारियों द्वारा उन्हें ठीक करार दिया गया हो? क्या होगा अगर बहुसंख्यक हिंदू भी इसकी माँग करें?

क्या यह जबरन वसूली के समान नहीं है? ‘हफ्ता वसूली’ की ‘प्रमाणित’ प्रणाली?

पहले से ही सरकार द्वारा निर्दिष्ट मानदंड, गुणवत्ता मानदंड और नियामक आवश्यकताएँ मौजूद हैं जिन्हें कंपनियों को अपने उत्पादों को विपणन के लिए प्रमाणित करने के लिए पूरा करना होता है। तो क्यों उन्हें एक विशेष समुदाय के लिए ‘प्रमाणित’ करने की यह समानांतर प्रणाली जारी है? चूँकि, सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है और इसे जनादेश नहीं दिया गया है? क्या यह सिर्फ एक खास समुदाय की माँगों को पूरा करने के लिए उस प्रमाणपत्र को ‘खरीदने’ के लिए कंपनियों से भारी पैसा बनाने का एक साधन नहीं है? क्या यह “हमें हर महीने 25,000 रुपए का भुगतान करें, या आप हमारे क्षेत्र में अपनी दुकान नहीं खोल सकते” का एक बदला हुआ रूप नहीं है?

सरकार इसकी अनुमति भी क्यों देती है?

FSSAI हलाल सर्टिफिकेट नहीं देता है। भारत में, कई धार्मिक निकाय हैं जो उत्पादों को तथाकथित प्रमाण पत्र जारी करते हैं, इस्लामी विश्वास के अनुसार उनकी ‘शुद्धता’ तय करते हैं। भारत में मुख्य हलाल प्रमाणन निकाय हैं

  • हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
  • हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
  • जमीयत उलमा-ए-महाराष्ट्र (जमीयत उलमा-ए-हिंद की एक राज्य इकाई)
  • जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट

इसलिए, एक संपूर्ण समानांतर प्रमाणन प्रक्रिया है जो संबंधित राज्य और राष्ट्रीय प्राधिकरणों के दायरे से बाहर चल रही है। भारत सरकार एक विशेष मजहब से संबद्ध निकायों को उपभोक्ता उत्पादों के लिए कथित मजहबी शुद्धता और स्वीकार्यता की गुणवत्ता जारी करने की अनुमति दे रही है।

क्या यह माल की गुणवत्ता और मानक के लिए सरकारी निकाय की प्रमाणन प्रक्रिया होने के पूरे विचार को कमजोर नहीं करता है? और एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य की सरकार, जहाँ हिंदू बहुसंख्यक हैं और ईसाई धर्म, सिख धर्म, जैन धर्म और बौद्ध धर्म जैसे कई धर्म और मजहबों के लोग महत्वपूर्ण संख्या में मौजूद हैं, एक विशेष धर्म को अपना प्रमाणन व्यवसाय चलाने की अनुमति क्यों दे रहा है?

क्या अकाल तख्त शुल्क के बदले उपभोक्ता वस्तुओं को अपनी मुहर और प्रमाणन देता है? क्या कंपनियों को अपने उत्पादों को ईसाइयों द्वारा उपभोग के लिए मंजूरी देने के लिए वेटिकन को भुगतान करने की आवश्यकता है? क्या तिब्बती बौद्धों द्वारा उपयोग किए जाने वाले उत्पादों पर दलाई लामा अपनी मुहर जारी करते हैं? और हिंदू कहाँ आवेदन करते हैं?

‘धर्मनिरपेक्ष’ भारत में, विशेष रूप से एक समुदाय के लिए, सरकार की नाक के नीचे समानांतर अर्थव्यवस्था की व्यवस्था क्यों है? सिर्फ इसलिए कि वे इसकी माँग करते हैं? आखिर इसे कैसे न्यायसंगत ठहराया जा सकता है?

निष्कर्ष

मुसलमानों के लिए अपने उत्पादों का विक्रय करने के लिए हलाल प्रमाणपत्र की माँग करने वाली निजी कंपनियों को लक्षित करना एक हद तक निरर्थक और यहाँ तक ​​कि अनुचित भी है। इस मुद्दे की जिम्मेदारी सरकार पर है, या तो यह आदेश देना कि किसी भी कंपनी को अपना सामान बेचने के लिए सरकारी प्रमाणन पर्याप्त है या यह समझाना होगा कि उन्होंने एक विशेष समुदाय को एक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश में समानांतर प्रमाणन तंत्र की माँग और स्थापना करने की अनुमति क्यों दी है?

1 दिन में 3 हिंदू मंदिर बने निशाना: अब भागलपुर के बूढ़ानाथ मंदिर के नजदीक मिला बम

बिहार के भागलपुर के प्रसिद्ध बूढ़ानाथ मंदिर में विस्फोटक मिलने की खबर आई है। बताया जा रहा है कि मंदिर परिसर से सिर्फ 100 मीटर की दूरी पर मुख्य द्वार के पास एक शिवांस विवाह भवन है। वहीं ये बम रखा मिला। इसके बाद विवाह भवन के मालिक सोनू पांडे ने पुलिस को इस संबंध में जानकारी दी। अब जोग्सर थाने की पुलिस और डॉग स्क्वॉड टीम मौके पर पहुँच कर पूरे मामले की जाँच कर रहे है। वहीं स्थानीयों में मंदिर के इतने पास बम मिलने से दहशत का माहौल है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, शिवांस विवाह भवन के मालिक सोनू ने कहा कि वे 10 बजे दुकान बंद करके घर गए थे। इसके बाद उन्हें सुबह इस बम की सूचना मिली। उनका कहना है कि 3 अप्रैल को विवाह भवन की बुकिंग थी। कार्यक्रम में 100 आदमी का खाना था। पुलिस ने अब इस पूरे इलाके को सील कर दिया है। सीसीटीवी फुटेज के जरिए जाँच की जा रही है कि मंदिर के पास और विवाह भवन में ये बम किसने रखा।

बता दें कि मात्र 1 दिन में ये तीसरी घटना है जब हिंदू मंदिरों को निशाना बनाने का प्रयास हुआ हो। कल ही खबर आई थी कि ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर की रसोई में 40 चूल्हों में तोड़फोड़ की गई। आज सुबह पता चला कि किसी मुर्तजा अब्बासी ने गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में घुसकर सुरक्षाकर्मियों पर हमला बोला और अब बिहार के भागलपुर के बूढ़ानाथ मंदिर में विस्फोट रखे जाने की ये खबर है।

उल्लेखनीय है भागलपुर जिला पिछले कुछ दिनों में बम विस्फोट के लिए कुख्यात रहा है। मीडिया रिपोर्ट बताती हैं कि वहाँ एक साल में कम से कम 18 विस्फोटो की खबरें आ चुकी हैं। धमाके भले ही छोटे थे पर फिर भी इनमें 10 से अधिका लोगों के मरने की सूचना है। 31 मार्च को इसी जिले में एक मकान में धमाका हुआ था।

आग लगाने वालों को आग बुझाने की ट्रेनिंग: SDPI-PFI वालों को तैयार कर रहा था केरल का सरकारी विभाग, विरोध के बाद 2 अधिकारी निलंबित

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के कार्यकर्ताओं को आग बुझाने का प्रशिक्षण देने के मामले में केरल के दो दमकल अधिकारियों को निलंबित किया गया है। जानकारी के मुताबिक, बुधवार (30 मार्च, 2022) को अलुवा में पीएफआई द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में केरल पुलिस के अग्निशमन और बचाव कर्मियों ने संगठन के कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण दिया था। जिस पर विवाद उठ खड़ा हुआ। इसके बाद निलंबन की कार्रवाई की गई।

केरल फायर एंड रेस्क्यू सर्विसेज विभाग की डायरेक्टर जनरल बी संध्या ने सर्कुलर जारी कर निलंबन की जानकारी दी। रिपोर्ट में कहा गया है कि विभाग के तकनीकी निदेशक द्वारा राज्य सरकार को सौंपी गई जाँच रिपोर्ट के बाद दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है और तीन अन्य का ट्रांसफर कर दिया गया है।

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने कहा कि इस मामले में उचित जाँच की जरूरत है और यह निलंबन पर्याप्त नहीं है। उन्होंने रिपब्लिक से बात करते हुए कहा, “राज्य सरकार केरल में PFI का समर्थन कर रही है और भाजपा एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने इस मुद्दे को जनता के सामने उठाया है। अब उन्होंने दो अधिकारियों को निलंबित कर दिया है, लेकिन विस्तृत जाँच होनी चाहिए।”

कोझिकोड से उठे इस विवाद पर सबसे पहले भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के सुरेंद्रन ने प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने ट्वीट किया था, “केरल फायर एंड रेस्क्यू सर्विस ने कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के सदस्यों को ट्रेनिंग दी। पीएफआई और एसडीपीआई कई आतंकी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। पिनराई विजयन की सरकार इन जिहादी बलों को रेड कॉर्पेट दे रही है।” उन्होंने अपने ट्वीट में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को टैग किया था।

बता दें कि केरल में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के कार्यकर्ताओं को दमकल अधिकारियों की तरफ से ट्रेनिंग दिए जाने से जुड़े कुछ वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। जिसके बाद राज्य में नया सियासी बवाल खड़ा हो गया। इधर, भारतीय जनता पार्टी मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की वाम सरकार पर सवाल उठाए तो वहीं राज्य सरकार ने भी दमकल विभाग से रिपोर्ट की माँग की थी।

विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने भी PFI के कार्यकर्ताओं को केरल में राज्य अग्निशमन व बचाव सेवा विभाग द्वारा विशेष प्रशिक्षण देने की आलोचना की थी। संगठन ने कहा कि कट्टरपंथी संगठन के कार्यकर्ताओं को उनकी यूनिफॉर्म में सरकारी प्रशिक्षण देना गलत है। विहिप के महासचिव मिलिंद परांडे ने कहा था कि सरकारी संस्थाएँ ऐसे संगठनों को प्रशिक्षण देकर मुस्लिमों का तुष्टिकरण कर रही हैं, जो समाज के लिए सही नहीं है। परांडे ने कहा कि केरल में हिंदू व ईसाई समुदाय लव जिहाद और अपनेसमुदाय समुदाय की लड़कियों के अपहरण से पीड़ित है। इसे रोकने के लिए केंद्र सरकार को कानून लाना चाहिए ताकि मुस्लिम और ईसाई मिशनरी द्वारा हिंदुओं के धर्म परिवर्तन पर रोक लगे। 

बता दें कि पीएफआई कट्टरपंथी इस्लामी संगठन है, जिसकी शुरुआत केरल में साल 2000 में हुई थी। कर्नाटक में हाल ही में हुए हिजाब विवाद में भी संगठन की भूमिका संदिग्ध रही है। सोशल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ इंडिया (SDPI), PFI की राजनीतिक शाखा है।

कर्नाटक में हिजाबी शिक्षिकाओं को परीक्षा की ड्यूटी नहीं: मंत्री का ऐलान, पूर्व VC भी बोले – छात्रों-शिक्षकों के लिए अलग रवैया सही नहीं

कर्नाटक सरकार ने हिजाब (Karnataka Hijab) पहनने वाले स्कूल और कॉलेज के शिक्षकों पर अहम फैसला लिया है। इसके तहत अब इन शिक्षकों की सेकंडरी स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट (SSLC) और प्री यूनिवर्सिटी (PU) में एग्जाम ड्यूटी नहीं लगाई जाएगी। प्राइमरी और सेकंडरी एजुकेशन मंत्री बीसी नागेश ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बताया कि सरकारी कर्मचारियों के लिए कोई ड्रेस कोड नहीं होगा।

बीसी नागेश ने कहा, “एग्जाम हॉल के अंदर छात्रों को हिजाब पहनने की अनुमति नहीं है, इसलिए नैतिक रूप से हम शिक्षकों को मजबूर नहीं कर रहे हैं। ऐसे में हमने हिजाब पहनने पर जोर दे रहे शिक्षकों को एग्जाम ड्यूटी से हटाने का फैसला लिया गया है।”

मैसूर स्थित सरकारी पीयू कॉलेज के प्रिंसिपल का कहना है, “अगर पीयू परीक्षा में निरीक्षकों की कमी होती है तो हम हाई स्कूल टीचर्स को भी बुला सकते हैं।” बेंगलुरू यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर और एकैडमियन एमएस थीमाप्पा ने सरकार के आदेश को तार्किक करार देते हुए कहा कि हम छात्रों और शिक्षकों के लिए अलग-अलग रवैया नहीं अपना सकते हैं।

पूर्व वीसी ने सुझाव दिया कि इस विवाद का एकमात्र समाधान यूनिफॉर्म कॉन्सेप्ट को समाप्त करना है। उन्होंने कहा, “मुझे ऐसा लगता है कि ड्रेस कोड समानता की भावना लाता है, बल्कि यह मानसिकता और दृष्टिकोण है जो समानता की अवधारणा का निर्माण करते हैं। यूनिफॉर्म को हटाना कट्टरपंथी हो सकता है, लेकिन यह सबसे अच्छा समाधान होगा।”

मालूम हो कि कर्नाटक में SSLC परीक्षा जारी है और अप्रैल के मध्य में खत्म होगी। वहीं, पीयू एग्जाम इस महीने के अंत में शुरू होंगे। पिछले हफ्ते मैसूर जिले में हिजाब पहनने की जिद पर अड़ी एक टीचर को परीक्षा ड्यूटी से हटा दिया गया था। विवाद बढ़ता देख सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों के शिक्षकों की SSLC और पीयू एग्जाम के लिए ड्यूटी लगाई गई है।

गौरतलब है कि बीते दिनों कर्नाटक के गडग जिले में सात शिक्षकों को SSLC परीक्षा में मुस्लिम छात्राओं को हिजाब (Hijab/Burqa) पहनने की अनुमति देने के कारण निलंबित कर दिया गया था। परीक्षा गडग के सीएस पाटिल बॉयज हाई स्कूल और सीएस पाटिल गर्ल्स हाई स्कूल में आयोजित की गई थीं, जिन शिक्षकों को सस्पेंड किया गया था, उनमें एसयू होक्कलड, एसएम पत्तर, एसजी गोडके, एसएस गुजामगड़ी और वीएन किवूदार, केबी भजंत्री और बीएस होनागुडी शामिल थे। सोशल मीडिया पर हिजाब पहनकर परीक्षा दे रही छात्राओं का वीडियो वायरल होने के बाद यह मामला प्रकाश में आया था।

28 मार्च, 2022 को कुछ मुस्लिम छात्राएँ हिजाब पहनकर परीक्षा हॉल में पहुँचीं थीं, जिन्हें ना तो शिक्षकों ने और ना ही सुपरवाइजर ने रोका। उन्होंने आधे घंटे से अधिक समय तक हिजाब पहनकर परीक्षा दी थी।

गमछे में हथियार छिपाकर लाया था ‘IIT का केमिकल इंजीनियर’, 10 मिनट तक जवानों पर वार करता रहा मुर्तजा अब्बासी: गोरखपुर मंदिर पर हमला ऐसे

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में 3 अप्रैल, 2022 (रविवार) को मुर्तज़ा अब्बासी ने धारदार हथियार ले कर घुसने का प्रयास किया। इस दौरान उसने रोके जाने पर ‘अल्लाह हु अकबर’ के नारों के साथ PAC के 2 जवानों को घायल कर दिया। मुर्तजा ने पुलिसकर्मियों के हथियार छीनने का भी प्रयास किया। पुलिस ने हमलावर को गिरफ्तार कर लिया है। घायल जवानों को अस्पताल में भर्ती करवाया गया है। आरोपित से पूछताछ की जा रही है।

मिली जानकारी के मुताबिक, मुर्तजा अब्बासी का घर गोरखपुर सिविल लाइंस के सिटी मॉल के सामने वाली गली में अब्बासी नर्सिंग होम के पास है। उसके अब्बा का नाम मनीर मुर्तजा है। उसने केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। अब्बासी द्वारा किए गए हमले के शिकार जवान PAC की 20वीं बटालियन आज़मगढ़ के हैं। घायल जवानों के नाम गोपाल गौड़ और अनिल कुमार पासवान हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुर्तजा अब्बासी लगभग 10 मिनट तक सुरक्षा बलों से लड़ा। इस दौरान उसने पुलिस की लोकल इंटेलिजेंस यूनिट (LIU) के जवान अनिल गुप्ता पर भी हमला किया था। साथ ही उसने खुद को पकड़ने वाले जवान अनुराग को भी चोट पहुँचाने का प्रयास किया।

‘गमछे में लपेट कर लाया था धारदार हथियर (बाँका)’: प्रत्यक्षदर्शी होमगार्ड जवान रमेश कुमार

इस घटना के चश्मदीद रमेश सिंह हैं जो होमगार्ड में जवान हैं। घटना के समय वो घटनास्थल पर ही ट्रैफिक ड्यूटी संभाल रहे थे। उन्होंने बताया, “हमलावर बाँका (धारदार हथियार) गमछे में छिपा कर लाया था। उसने (मुर्तजा) ने अचानक ही ड्यूटी पर बैठे दोनों जवानों पर हमला कर दिया। इस से दोनों जवान घायल हो गए। इसके बाद उसने मुझ पर भी हमला करने का प्रयास किया। वो हथियार लहराते हुए अंदर जाने की कोशिश करने लगा पर वो पकड़ा गया।”

‘मुर्तजा को पटक दिया था पुलिस वाले ने’: प्रत्यक्षदर्शी श्रद्धालु मंजू साहनी

घटना के समय गोरखनाथ मंदिर में दर्शन करने गई मंजू ने पूरा घटनाक्रम खुद देखा। उन्होंने बताया, “अचानक ही हमलावर बाँका ले कर आया और उसने पुलिस पर हमला कर दिया। अपने बचाव में पुलिसकर्मी ने उसको पटक दिया। इस दौरान दूसरा पुलिसकर्मी भी अपने साथी के बचाव में आया तो हमलावर ने उसको भी घायल कर दिया। कुछ ही देर बाद पुलिस के जवानों ने पब्लिक के साथ मिल कर हमलावर को पकड़ लिया।”

‘आतंकी एंगल की भी हो रही है जाँच’: अखिल कुमार, ADG ज़ोन गोरखपुर

गोरखपुर जोन के ADG अखिल कुमार ने इस घटना पर बयान देते हुए कहा, “हमलावर गोरखपुर के ही सिविल लाइंस का रहने वाला है। उसने यह हमला शाम के लगभग 7 बजे किया। इस दौरान मंदिर के साइकिल स्टैंड के पास पुलिस पिकेट को निशाना बनाया। हमले के लिए धारदार हथियार प्रयोग में लाया गया। हमलावर को अनुराग नाम के बहादुर सिपाही ने पकड़ा है। हमलावर मजहबी नारे लगा रहा था। इस कारण से इसके टेरर एंगल की भी जाँच करवाई जा रही है। इस जाँच में ATS भी शामिल है। हमलावर के पास से मोबाइल फोन, लैपटॉप, एयर टिकट के अलावा भी कुछ चीजें पुलिस को मिली हैं जिसकी जानकारी हम अभी नहीं दे सकते हैं। मुर्तजा काफी पढ़ा लिखा है। उसने साल 2015 में मुंबई IIT से ग्रेजुएशन किया है। इस पूरे प्रकरण की गहराई से पड़ताल की जा रही है।”

24 घंटे में 2 बार नवाज शरीफ को बनाया निशाना: लंदन के दफ्तर में तोड़फोड़, हमलावरों की गाड़ी में इमरान की पार्टी का झंडा

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने रविवार (3 अप्रैल 2022) को प्रधानमंत्री इमरान खान के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए नेशनल असेंबली (NA) को भंग कर दिया। पाकिस्तान में अब अगले 90 दिनों के भीतर चुनाव हो सकते हैं। इस सियासी उथलपुथल के बीच पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री और पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के सुप्रीमो नवाज शरीफ को एक बार फिर निशाना बनाया गया है। यह शरीफ पर 24 घंटे के अंदर दूसरा हमला है।

नवाज शरीफ इन दिनों लंदन में हैं। जानकारी के मुताबिक इस बार उनके ब्रिटेन स्थित कार्यालय को निशाना बनाया गया। करीब 20 नकाबपोश लोगों ने उनके कार्यालय पर हमला बोला और तोड़फोड़ की। अभी तक इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। आरोप लगाया जा रहा है कि नवाज शरीफ पर हमला करने वाले इमरान खान के समर्थक थे। वे सभी उनकी पार्टी पीटीआई से जुड़े हुए हैं।

जियो न्यूज और द न्यूज इंटरनेशनल के रिपोर्टर मुर्तजा अली शाह ने एक ट्वीट शेयर करते हुए लिखा है, “लंदन में आज दूसरी बार पूर्व पीएम नवाज शरीफ के कार्यालय पर करीब 20 लोगों के एक समूह ने हमला किया। हमले के वक्त नवाज कार्यालय के अंदर थे।” ट्वीट में मुर्तजा ने कहा कि यूके पुलिस को बार-बार कॉल करने के बावजूद वह हिंसा को रोकने में विफल रही। हमलावरों के तीन कारों में PTI के झंडे थे।

इससे पहले एक आदमी ने नवाज पर मोबाइल फेंका था, जिससे उनका बॉडीगार्ड चोटिल हो गया था। नवाज पर हुए हमले पर उनकी बेटी मरियम नवाज शरीफ ने कहा था कि प्रधानमंत्री इमरान खान को उकसाने, भड़काने और देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार करना चाहिए।

राष्ट्रपति द्वारा नेशनल असेंबली को भंग किए जाने के बाद इमरान खान को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री पद से हटा दिया गया है। पाकिस्तान एक नोटिफिकेशन जारी कर बताया गया है कि इमरान खान आधिकारिक तौर पर अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नहीं हैं। रविवार को इमरान खान सरकार के खिलाफ लाए गए विपक्ष के अव‍िश्‍वास प्रस्‍ताव को नेशनल असेंबली के डिप्‍टी स्‍पीकर ने अनुच्छेद 5 का हावाला देते हुए खारिज कर दिया था। इसके बाद इमरान खान की सलाह पर राष्‍ट्रपति आरिफ अल्‍वी ने नेशनल असेंबली को भंग कर दिया। 

इसको लेकर विपक्ष आक्रोशित है। नवाज शरीफ ने कहा है कि इमरान खान ने संविधान का अपमान किया है, सत्ता के नशे में कानून को रौंदा है। उन्होंने कहा, “इमरान खान के लिए देश से पहले उनका अहंकार है। संविधान का अपमान याद रखा जाएगा। साजिश में शामिल सभी देशद्रोही हैं।” शरीफ ने ये भी कहा कि देश के खिलाफ ‘साजिश’ में शामिल प्रधानमंत्री इमरान खान और अन्य लोग घोर राजद्रोह के दोषी हैं और इनके खिलाफ संविधान के उल्लंघन का मामला चलाया जाना चाहिए।

रूबल ख़त्म कर देगा डॉलर का दबदबा? पुतिन का वो ऐलान, जिसने पश्चिम में मचाई खलबली: रूसी मुद्रा में गजब की तेज़ी

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध लगातार जारी है। अमेरिका समेत दुनियाभर के कई देश रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा रहे हैं। बावजूद इसके जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन समेत कई देश अभी भी रूस के पेट्रोलियम औऱ गैस पर निर्भर हैं। इसे देखते हुए रूस ने ये ऐलान कर दिया कि दुनिया के जिस किसी भी देश को उसके साथ व्यापार करना है तो उसे रूबल में ही करना होगा।

इस ऐलान के बाद से पश्चिमी देशों में खलबली सी मच गई है। दुनियाभर के कई देश रूस के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं, तो कुछ अब रूस के इस फैसले के सामने झुकते भी नजर आ रहे हैं। पिछले गुरुवार (31 मार्च, 2022) को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक आदेश जारी किया, जिसके मुताबिक, रूसी गैस लेने वाले यूरोपीय देशों को रूसी बैंकों में खाते खोलने होंगे। साथ ही ये भी कहा गया कि अगर रूबल में भुगतान नहीं किया जाता तो वो उसे डिफॉल्ट मानेंगे। पुतिन के नए आदेश का अर्थ यह हुआ कि अब पश्चिमी देशों की कंपनियों को अपनी करेंसी रूसी बैंक में ट्रांसफर करनी पड़ेगी। रूस का यह आदेश 1 अप्रैल, 2022 से प्रभावी हो चुका है।

इस बीच अब स्लोवाकिया ने ऐलान कर दिया है कि वो रूस की माँग के मुताबिक, उसे रूबल में ही पेमेंट करेगा। स्लोवाकिया के आर्थिक मंत्री रिचर्ड सुलिक ने कहा कि उनका देश 85 फीसदी तक रूसी रूबल पर निर्भर है। वो इसके लिए मना भी नहीं कर सकते।

क्यों रूबल में व्यापार के लिए कह रहे पुतिन

जब से पुतिन ने केवल रूबल में व्यापार करने की बात कही है तभी से रूबल की कीमत बढ़ गई है। इससे पहले 24 फरवरी को जब युद्ध शुरू हुआ था तो रूसी रूबल की कीमतें काफी गिर गई थीं। पुतिन के रूबल में लेनदेन करने के ऐलान के बाद डॉलर के मुकाबले इसकी कीमतों में तेजी दर्ज की गई। यह डॉलर के मुकाबले 85 पर पहुँच गया है, जो कि 145 के निचले अंक से तो काफी बेहतर है।

दरअसल, अभी तक दुनियाभर का अधिकतर व्यापार अमेरिकन डॉलर में होता रहा है। लेकिन जब अमेरिका ने रूस पर प्रतिबंध का ऐलान किया तो उसे काउंटर करने के लिए पुतिन ने अपनी मुद्रा में ही व्यापार करने का फैसला किया। इसका फायदा यह होगा कि इससे रूस की मुद्रा मजबूत होगी और रूस को अधिक कैश मिलेगा।

ऐसे में अगर प्रतिबंधों को और अधिक कड़ा किया गया तो इससे डॉलर और यूरो को ही नुकसान होगा। इसका एक असर यह भी होगा कि डॉलर का अंतरराष्ट्रीय एकाधिकार भी खत्म होगा। उल्लेखनीय है कि यूरोप का एक तिहाई तेल और गैस रूस से आयात किया जाता है। अगर यूरोपीय देश रूबल में पेमेंट करने के लिए मान जाते हैं तो रूबल की वैश्विक डिमांड बढ़ जाएगी। इससे रूस औऱ मजबूत होगा। रूस ने तो बैंक विदेशियों के साथ लेनदेन के लिए गजप्रॉम बैंक का सेलेक्शन भी कर लिया है।

रूस का स्पष्ट रूप से कहना है कि न तो कोई हमें कुछ भी फ्री में देता है और न ही हम कोई चैरिटी चलाते हैं। खास बात ये है कि पुतिन की इस चाल में पश्चिमी देश फँस गए हैं। अभी हाल ही में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत का दौरा किया था। उन्होंने कहा था कि वो चाहते हैं कि लेनदेन रुपए और रूबल में हो। मार्च में जिस करेंसी ने सबसे ज्यादा तेज़ी दिखाई और सबसे बेहतर प्रदर्शन किया, वो रूबल ही है।

‘होश में रख कर नहीं कर सकते पशु की हत्या’: रमजान में हलाल को लेकर कर्नाटक सरकार का आदेश, विरोध में उतरी कॉन्ग्रेस

कर्नाटक के पशुपालन और पशु चिकित्सा सेवा विभाग ने जानवरों को हलाल करने से पहले क्या प्रक्रिया अपनानी है, इस संबंध में आदेश जारी किए हैं। इस आदेश में सभी बूचड़खानों को निर्देश दिए गए हैं कि वो किसी भी जानवर का कत्ल करते समय उसे होश में नहीं रख सकते। यानी हलाल किए जाने से पहले पशु को बेहोश करना आवश्यक होगा। 

इस प्रक्रिया को स्टनिंग कहा जाता है। इसमें जानवर के सिर पर मारकर या गैस या बिजली के झटके देकर उसे बेहोश किया जाता है। इसके बाद जानवर को हलाल करने के लिए जो प्रक्रिया होती है वो अपनाई जाती है। 

कर्नाटक सरकार द्वारा जारी आदेश के बाद बेंगलुरु नगर निगम से कहा गया है कि बूचड़खानों और चिकन की दुकानों को लाइसेंस जारी करते समय इस तरह की सुविधा जाँच ली जाए। बोम्मई सरकार ने यह फैसला रमजान का महीना शुरू होने के बीच लिया है। इससे पहले हिंदू संगठन हलाल मीट का विरोध करते इसके बहिष्कार की अपील की थी।

इस निर्देश के बाद कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर जानवर को बेहोश करके काटा गया तो उसे हलाल नहीं माना जाएगा। हलाल प्रक्रिया में धीरे-धीरे जानवर को काटा जाता है और सारा खून निकलने के बाद मीट का प्रयोग किया जाता है। वहीं हिंदू रिवाज के अनुसार, झटके से काटे गए जानवर का मीट इस्तेमाल किया जाता है।

उल्लेखनीय है कि 1 अप्रैल को पशुपालन व पशु चिकित्सा सेवाओं के उपनिदेशक ने जानवरों के प्रति क्रूरता की रोकथाम नियम 2001 का हवाला देते हुए बेंगलुरु नागरिक निकाय को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा था कि जानवरों को मारने से पहले उन्हें बेहोश किया जाए। पत्र में यह भी कहा गया था कि उनके विभाग को जनता से शिकायतें मिली हैं कि जानवरों के वध से पहले जो सरकारी नियमों की अनदेखी हो रही है।

कॉन्ग्रेस का विरोध

इस पत्र के बाद डीके कर्नाटक कॉन्ग्रेस के प्रमुख डीके शिवकुमार ने लोगों से कहा कि वे पशुपालन विभाग द्वारा जारी किए गए पत्र से घबराए नहीं। अगर कोई परेशान करे तो उन्हें फोन करें। वह अपने कार्यकर्ताओं को मौके पर भेजेंगे। उन्होंने कहा, “मैं इंसानों को सर्जरी से पहले बेहोश होते देखा है जानवरों को नहीं। मैं पहली बार आश्चर्यचकित हूँ ऐसे नियम पर। देश में लोगों के खाने की आदतें हजारों साल से विकसित हुई हैं। लोग जैसा कर रहे थे उन्हें वैसे करते रहना चाहिए।” उन्होंने भाजपा पर कर्नाटक को बर्बाद करने का आरोप मढ़ा और कहा सभी समुदायों को साथ रहने दो।

क्या हिंदू नववर्ष पर करौली में हिंसा के पीछे PFI? दंगों से पहले ही CM गहलोत को लिख दी थी चिट्ठी, अब RSS को दोषी बता रहे कॉन्ग्रेस के मंत्री

राजस्थान के करौली में हिंदू नव वर्ष पर 2 अप्रैल 2022 को हिंसा हुई थी। क्या इसके पीछे कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) का हाथ है? यह सवाल एक पत्र से खड़ा हुआ है जो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को इस हिंसा से ठीक पहले लिखी गई थी।

1 अप्रैल को PFI ने एक प्रेस रिलीज जारी कर विवाद की बात कही थी। इस संबंध में राजस्थान प्रदेश अध्यक्ष मोहम्मद आसिफ द्वारा सीएम को चिट्ठी लिखने की बात बताई थी। य​ह चिट्ठी राज्य के पुलिस महानिदेशक को भेजे जाने की बात भी कही जा रही है। उल्लेखनीय है कि हाल के समय में देश के कई हिस्सों में सुनियोजित हिंसा में पीएफआई का नाम सामने आया है।

इस पत्र में लिखा गया था, “दिनांक 2 से 4 अप्रैल तक राजस्थान के तमाम जिलों, तहसीलों और कस्बों में RSS और उनके अन्य संगठनों द्वारा हिन्दू नववर्ष के अवसर पर भगवा रैली आयोजित की जा रही है। इन रैलियों में धार्मिक उन्माद फैलाने वाले नारों को प्रतिबंधित करने, साम्प्रदायिक सौहार्द को बचाने, कानून-व्यवस्था को कायम रखने और इन आयोजनों को शांतिपूर्ण ढंग से पूरा करवाने की माँग की जाती है।”

1 अप्रैल को पीएफआई ने एक प्रेस रिलीज भी जारी की थी

इस संबंध में पूछे जाने पर राजस्थान सरकार के मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास ने कहा, “सरकार के पास इनपुट था। पुलिस ने उसकी तैयारी भी की थी। सब जगह पुलिस साथ में चल रही थी। हम बहुत सख्त हैं और आगे कार्रवाई भी होगी। लेकिन जिस तरफ से BJP के लोग जुलूस निकाल रहे हैं, तो अगर BJP और RSS अपने कार्यालय में बैठ कर तय करवाते हैं कि राजस्थान में दंगे करवाने हैं तो इसका कोई इलाज ही नहीं है। इनका एजेंडा तय है कि दंगे करवाने हैं।”

वहीं राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने करौली हिंसा के मामले में एक उच्चस्तरीय बैठक की। इस बैठक के बाद उन्होंने कहा, “अपराधी चाहे किसी भी धर्म, जाति या वर्ग का हो। उसे बख्शा नहीं जाएगा।”

इस मामले की जाँच के लिए SIT का गठन कर दिया गया है। SIT की टीम मौके से सबूत जुटा रही है। पुलिस ने अब तक कुल 13 लोगों की गिरफ्तारी बताई है। लगभग 15 लोग हिरासत में हैं जिनसे पूछताछ की जा रही है। CCTV फुटेज चेक कर बाकी आरोपितों की पहचान करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

करौली हिंसा में कुल 43 लोग घायल हुए थे। अभी भी इंटरनेट बंद हैं। जिन छात्रों की क्लास 12 बोर्ड की परीक्षाएँ चल रही हैं, उनके प्रवेश पत्र ही उनके पास के तौर पर काम आएँगे। बच्चों को परीक्षा केंद्र तक ले जाने के लिए उनके अभिभावकों को भी छूट दी गई है। सरकारी कर्मचारी अपना पहचान-पत्र दिखा कर ऑफिस जा सकते हैं।