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हिजाब और बिकनी नहीं, माहवारी के बाद निकाह और हलाला से लड़ाई ज़रूरी: मजहबी दबाव के आगे क्यों झुकें स्कूल-कॉलेज?

ज्यादा बड़ी नहीं थी जब पहली बार देखा था कि स्कूल जाने वाली लड़कियाँ सर्दियों के बिना भी सिर ढकने वाला स्कार्फ पहनती हैं। मुझे तब कोई अंदाजा नहीं था कि ये क्या है, क्यों है, किसलिए पहना गया है। मैं चूँकि उस समय धूल से बचने के लिए मुँह पर रुमाल बाँधा करती थी तो पहले सोचा कि ये स्कार्फ भी शायद ऐसा कोई उपाय है। बहुत लंबे तक मन में इस स्कार्फ को लेकर जद्दोजहद चली… फिर धीरे-धीरे इसके बारे में समझ आया कि इसे मुस्लिमों में सिर ढकने के लिए पहना जाता है। बाकी की जानकारी तब हुई जब एक मुस्लिम सहेली बनी और उसने इसके बारे में सब बताया…

कर्नाटक में हुए हिजाब विवाद से पहले वो पुरानी बातें मेरे जहन से गायब थीं, पर पूरे बखेड़े के बाद जब जगह-जगह तर्क पढ़े, हिजाब को संवैधानिक अधिकार बताने के लिए आतुर लोग देखे, कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की दलीलें सुनीं, तो वो पुरानी बातें याद आती गईं। मैं, तब हिजाब शब्द से पूरी तरह अंजान थी इसलिए, सवाल किया था कि इसे पहनकर क्यों आते हो और आते हो तो क्लास में क्यों उतार देते हो? माहौल राजनैतिक नहीं था, इसलिए पहले जवाब मिला- “हमारे में ये जरूरी होता है।” और फिर आगे कहा गया- “हम जिस इलाके में रहते हैं वहाँ ज्यादा मुस्लिम ही हैं। इसलिए घर से निकलते वक्त इसे पहनते हैं और घर जाते समय पहनना पड़ता है। क्लास में इसलिए उतारते हैं क्योंकि यहाँ देखो कोई इसे नहीं पहनता।”

हिजाब का मुद्दा स्वेच्छा से जुड़ा?

उस उम्र में जितनी समझ होनी चाहिए मैंने उसी के हिसाब से उस लड़की की बातें अपने मन में बैठाईं और उसी के नजरिए से मैं आज भी इस पूरे मुद्दे को देखती हूँ। घटना चाहे आज की हो या 15 साल पुरानी…एक बात साफ है कि एक लोकतांत्रिक देश में, समानता के अधिकार के साथ, शिक्षा की चाह रखने वाली लड़की के लिए हिजाब का मुद्दा कभी भी ‘स्वेच्छा’ से जुड़ा नहीं हो सकता। हम माने चाहें न मानें लेकिन यदि कोई लड़की स्कूल के बाहर तक हिजाब पहनकर आई और क्लास में घुसने से पहले उसे उतार दिया तो ये दिखाता है कि किस हद्द तक मजहबी ठेकेदारों ने उस लड़की को गुलाम बनाया हुआ था जो क्लास में बैठकर एक समान दिखने के इच्छुक तो थी, लेकिन बाहर निकलते ही उसे डर भी था कि कहीं उसके आस-पास के लोग उसे कुछ न बोल दें।।

आज समय बदल गया है जो कभी मजहबी ठेकेदारों का डर था वो कट्टरपंथ में तब्दील हो गया है। थोपी गई चीजें स्वेच्छा से जुड़ी बताई जा रही है। हिजाब पहनकर क्लास लेने की लड़कियों की जिद्द दिखाती है कि किस हद्द तक उन्हें मानसिक तौर पर गुलाम बनाया जा चुका है कि वो एक शैक्षणिक संस्थान के बाहर खड़े होकर ये बातें कह रही हैं कि इस्लाम उनकी प्राथमिकता है और शिक्षा उनके लिए सेकेंड्री चीज है। सोचिए, अभी 6 माह ही हुए हैं जब पूरे विश्व ने अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद वहाँ की लड़कियों को शून्य में जाते देखा। हर कोई सिर्फ यही बता रहा था कि एक बार फिर कट्टरपंथ के आ जाने से लड़कियों का जीवन अंधकार में चला जाएगा।

माहवारी के बाद निकाह, हलाला पर कब लड़ेंगी मुस्लिम लड़कियाँ?

भारत में लोकतंत्र है, समान अधिकार देने वाला संविधान है- बावजूद इसके अगर पूरी लड़ाई मजहब से जुड़ी ही बना ली जाए तो कोई फरिश्ता भी मानसिक गुलामों को आजाद नहीं करवा पाएगा। जिन लड़कियों को ऐसा लग रहा है कि आखिर हिजाब पहनकर क्लास में बैठने की अनुमति से प्रशासन को क्या परेशानी है, वो बस इस बात की कल्पना करें कि उनकी ही कक्षा में कोई लड़की किसी अन्य रंग के दुपट्टे से सिर ढक कर बैठी है। क्या ये समानता होगी? जिस तरह शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षा का अधिकार सभी के लिए समान है वैसे ही वहाँ नियम भी सभी के लिए समान होने चाहिए। अगर हिजाब को लेकर इतना प्रेम है तो इसके लिए कई मजहबी संस्थानों की ओर रुख करने की आवश्यकता है जहाँ न इन्हें लेकर आपत्ति और न ही इन पर कोई विवाद। 

एक सामान्य कॉलेज या स्कूल, एक ऐसी जगह होते हैं, जहाँ ड्रेस कोड लागू करने का उद्देश्य ही ये होता है कि कोई न किसी से अलग दिखे और न ही किसी से कोई भेदभाव हो, बताइए वहाँ हिजाब की माँग की क्या जरूरत है । क्या इन लड़कियों को अधिकारों की लड़ाई लड़ने के क्रम में तीन तलाक, माहवारी के बाद निकाह, बहुविवाह या फिर हलाला जैसे नारकीय रीतियाँ नहीं दिखतीं? अगर ये मानसिक गुलामी नहीं हैं तो क्या है कि जिनका खुद पर इतना भी अधिकार नहीं है कि वो ये स्टैंड ले सकें कि उन्होंने किस प्रदर्शन में शामिल होना है किसमें नहीं!

आज कट्टरपंथी समूहों द्वारा ब्रेनवॉश होकर और उनका समर्थन पाकर, लोकतांत्रिक देश को संविधान में मिले अधिकारों का हवाला दिया जा रहा है। सोचिए अगर ये मजहबी कट्टरपंथ फैलता रहा और इसी तरह शैक्षणिक संस्थानों पर दबाव बनाता रहा तो कब तक आप खुद को लोकतांत्रिक देश का नागरिक कह पाएँगे और कब तक अधिकारों के नाम पर मजहबी या धार्मिक प्रेम को जगजाहिर कर पाएँगे।

मजहबी दबाव में क्यों आएँ स्कूल-कॉलेज

कर्नाटक में जो बवाल चल रहा है सोचिए उसका क्या केंद्र बिंदु है…..? सिर्फ मजहब, मजहब और मजहब। कहीं से कहीं तक शिक्षा की कोई बात ही नहीं है। लड़कियों को किसी ने भी हिजाब या बुर्का पहनने से मना नहीं किया है उन्हें बस कहा जा रहा है कि जब बच्चे बैठकर क्लास लेंगे वहाँ इसकी अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा लड़कियाँ चाहें तो उसे परिसर में पहनकर घूमें किसी को कोई आपत्ति भी नहीं है। मगर, बावजूद इसके उन लड़कियों को एक ऐसी जगह पर अपना लोहा मनवाना है जहाँ कुछ नियम हैं, कुछ कायदें हैं कानून हैं।

हर जगह अपनी मर्जियाँ नहीं चलतीं। जैसे हर धर्म-मजहब के अपने नियम हैं, उन्हें स्वतंत्रता है, वैसे ही संस्थान भी हैं। खासकर ऐसे संस्थान, जो सबके लिए निर्मित हुए हों। कोर्ट इस मामले में सुनवाई कर रहा है। हो सकता है फैसला लड़कियों के पक्ष में आए या हो सकता है ऐसा न भी हो। मगर, उससे पहले जो हालात अब बन चुके हैं उन पर विचार सबको करना ही पड़ेगा। बाहरी देशों में मजहबी बेड़ियाँ से बाहर निकलने पर लड़कियों को मारा जा रहा है, उनपर अत्याचार हो रहे हैं, प्रताड़नाएँ दी जा रही हैं, उन्हें देश छोड़ना पड़ रहा है और एक हम हैं, जो उस देश में रहकर अपना विकास नहीं कर पा रहे जिसने हमें किसी भी बेड़ी में बँधे बिना मनमुताबिक तौर-तरीकों जीने का पूरा-पूरा हक दिया है।

बिकनी और हिजाब संवैधानिक अधिकार

ये देश की विडंबना ही है कि एक ओर देश को बुर्काधारी लड़कियों को ये समझाना पड़ता है कि कैसे शैक्षणिक केंद्र में एकरूपता और समानता का महत्व हैं और दूसरी ओर पढ़ी लिखी प्रियंका को गाँधी अपने ट्वीट में लिखती हैं चाहे बिकनी हो, घूँघट हो या हिजाब हो, ये महिला का अधिकार है कि वो क्या पहनना चाहती है। इसका अधिकार लड़कियों को संविधान ने दिया है।

क्या संविधान ये अधिकार देता है कि बिकनी पहनकर क्लास ली जाए? या संविधान ये कहता है कि घूँघट में क्लास रूम में पहुँच जाया जाए या फिर रिप्ड जींस में पढ़ाई हो….अगर नहीं तो हिजाब के मना करने पर इतना बवाल क्यों? जैसे हम देश के नागरिक हैं वैसे ही संस्थान भी लोकतांत्रिक देश से जुड़ा हिस्सा है। ड्रेस कोड का नियम आज से नहीं चल रहा। सालोंसाल से इसे अपनाया गया है। जहाँ हिजाब पर आपत्ति नहीं है वहाँ कभी इसकी मनाही नहीं हुई, मगर यदि किसी संस्थान के नियमों के अनुसार, ड्रेस कोड के अतिरिक्त कुछ भी नियमों का उल्लंघन है तो उसमें मजहबी तौर पर जबरदस्ती करनी क्यों है।

स्कूल-कॉलेजों तक पहुँचे कट्टरपंथी समूहों के हाथ: भारत में इस्लाम को फैलाने के लिए दशकों से ले रहे हैं विदेशों से फंडिंग

कर्नाटक हिजाब विवाद (Karnataka Hijab Controversy) ने एक अभूतपूर्व मोड़ ले लिया है। अब पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और जमात-ए-इस्लामी हिंद जैसे कट्टरपंथी इस्लामवादी संगठन इन विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित कर रहे हैं। कट्टरपंथी इस्लामी संगठन मुस्लिम छात्राओं को राज्य सरकार द्वारा लागू किए गए ड्रेस कोड का उल्लंघन करने और क्लास के अंदर बुर्का पहनने के लिए उकसा रहे हैं।

इससे पहले एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया था कि कैसे कुख्यात कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन पीएफाई की छात्र शाखा कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) और प्रतिबंधित आतंकी संगठन जमात-ए-इस्लामी हिंद से प्रदर्शन करने वाली कुछ मुस्लिम छात्राएँ लगातार संपर्क में थीं और ये इन संगठनों के कहे अनुसार हिजाब पहनकर क्लास में जा रही थीं। इन छात्राओं ने ये भी बताया था कि कॉलेज में हिजाब पहनना उन्होंने दिसंबर 2021 से ही शुरू किया था।

हाल की घटनाओं से स्पष्ट है कि सीएफआई और जमात जैसे कट्टरपंथी इस्लामी संगठन न केवल कॉलेज में मुस्लिम छात्राओं का ब्रेनवॉश करने का प्रयास कर रहे हैं, बल्कि ये संगठन युवा मुस्लिम छात्राओं को पढ़ाई से गुमराह कर उन्हें कट्टर बनाने में सफल रहे हैं।

यह ध्यान देने योग्य है कि केरल और कर्नाटक राज्य में कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया और जमात-ए-इस्लामी हिंद, पीएफआई जैसे संगठनों ने अक्सर मुस्लिम युवाओं को कट्टरपंथी बनाने पर जोर दिया है। कट्टरपंथी इस्लामी संगठन केरल की तुलना में कर्नाटक में कम सफल रहा है। वहीं, केरल के युवाओं को पीएफआई गुमराह करने में अधिक सफल रहा है।

PFI, जमात को भारत में इस्लाम और कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिए विदेशों से फंड मिल रहा है: रिपोर्ट

पिछले साल केरल के एक पत्रकार ने सनसनीखेज खुलासा किया था कि कैसे भारत में इस्लामवाद को बढ़ावा देने के लिए पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया और जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी इस्लामी संगठन धन जुटा रहे हैं। एक क्लब हाउस चर्चा में केरल के पत्रकार एमपी बशीर ने देश में कट्टरपंथी इस्लाम को आगे बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय फंडिंग के बारे में भी खुलासा किया था।

अपने खुलासे में बशीर ने कहा था कि उन्होंने जमात-ए-इस्लामी हिंद द्वारा लिखे गए एक पत्र को एक्सेस किया था, जिसमें सऊदी अरब में किंग अब्दुल अजीज यूनिवर्सिटी से कट्टरपंथी इस्लामी संगठन को वित्तीय अनुदान बढ़ाने का अनुरोध किया गया था, ताकि वे केरल और भारत में इस्लामी ड्रेस कोड को बढ़ावा दे सकें। उन्होंने आगे कहा था कि जमात ने कुछ मुस्लिम महिला पत्रकारों के हिजाब नहीं पहनने पर भी आपत्ति जताई थी और कहा था कि बशीर को उन्हें हिजाब पहनने के लिए कहना चाहिए।

इसके अलावा, उन्होंने कहा था कि जमात-ए-इस्लामी हिंद ने महिलाओं के लिए इस्लामी ड्रेस कोड (Islamic dress code) को बढ़ावा देने के लिए भारत में एक योजना शुरू की थी और सऊदी अरब के Jeddah इस इस्लामी यूनिवर्सिटी से पिछले लगभग 30 सालों से धन प्राप्त किया था। पुलवामा हमले में नाम आने के बाद केंद्र सरकार ने इस कट्टर इस्लामिक संस्था को फरवरी 2019 में केंद्र सरकार ने बैन कर दिया था।

कट्टरपंथी इस्लामी संगठन पीएफआई का हिंसा फैलाने का इतिहास

पीएफआई का हिंसा करने का काफी पुराना इतिहास है। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के और हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों सहित देश भर में हुई हिंसा में पीएफआई की भूमिका संदिग्ध पाई गई और पीएफआई के कई सदस्यों को दंगों में शामिल रहने के लिए गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा, पिछले साल नवंबर में कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI ने देश के विभिन्न हिस्सों में दंगों और हिंसा के लिए उकसाने के आरोपित किसानों के विरोध को अपना समर्थन दिया था।

बता दें कि वर्ष 2019 में नागरिकता कानून के खिलाफ देश भर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों में आतंकियों ने भी हिस्सा लिया था। तोड़फोड़, आगजनी, पत्थरबाज़ी और दंगा भड़काने के मक़सद से इंडियन मुजाहिदीन और सिमी से जुड़े कट्टरपंथी आतंकी अपनी पूरी तैयारी के साथ नागरिकता क़ानून के खिलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों में शामिल हुए थे। इन प्रदर्शनों के लिए इन संगठनों ने भरपूर फंडिंग भी की थी। यह जानकारी ख़ुफ़िया एजेंसियों के माध्यम से मिली थी, जिसकी पुष्टि दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने की थी।

‘इमरान खान ने की थी सिद्धू को मंत्री बनाने के लिए सिफारिश, जानकर चुप रहीं सोनिया गाँधी’: कैप्टन अमरिंदर का खुलासा – ‘नवजोत पागल है’

पंजाब विधानसभा चुनाव (Punjab Assebmly Election-2022) के बीच पंजाब लोक कॉन्ग्रेस (PLC) के मुखिया कैप्टन अमरिंदर सिंह (Captain Amarinder Singh) ने नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) को लेकर बड़ा खुलासा किया है। उन्होंने कहा है कि नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कैबिनेट में मंत्री बनाने के लिए पाकिस्तान ने सिफारिश की थी। सिंह ने कहा कि उन्होंने ये मैसेज सोनिया गाँधी और प्रियंका गाँधी को भी भेजा था, लेकिन सोनिया ने इस पर कोई जबाव नहीं दिया।

रिपब्लिक टीवी को दिए इंटरव्यू में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने नवजोत सिंह सिद्धू को कॉन्ग्रेस में शामिल किए जाने के पीछे की कहानी बयाँ की। उन्होंने कहा, सिद्धू को पार्टी में ले आएँ? मैंने कहा कि पटियाला का लड़का है, लेकिन मैं उससे मिला नहीं हूँ, लेकिन मिल के देखता हूँ, तो मैंने उसको (सिद्धू) रिंग किया और कहा कि चलो एक मीटिंग करते हैं। मुझे आपसे कुछ बात करनी है। हमारी मीटिंग भी दिल्ली के इम्पीरियल होटल में फिक्स हो गई। लेकिन, सिद्धू ने कहा कि मैं खुले में मीटिंग नहीं करता तो मैंने कमरे का इंतजाम करवाया। आते ही उसने अपनी जेब से शिवलिंग निकाल कर टेबल पर रख दिया औऱ कहा कि मैं इसके बिना बात नहीं करता।”

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने आगे कहा, “हमारी बात शुरू हुई। इस दौरान सिद्धू ने कहा कि मैं 6 घंटे ध्यान लगाता हूँ। मैंने पूछा कैसा मेडिटेशन? तो उसने कहा कि तीन घंटे सुबह और तीन घंटे शाम को। उसमें से एक घंटे सुबह शाम मैं भगवान से बात करता हूँ, देश की अर्थव्यवस्था और हालातों के बारे में। मैंने तो सोनिया जी को जाकर कह दिया कि ये तो पागल है। इसे तो पार्टी से दूर ही रखो। लेकिन तीन महीने के बाद इसे पंजाब का प्रेसीडेंट बना दिया। दिल्ली में कोई सुनता ही नहीं।”

सिद्धू के लिए पाकिस्तान से सिफारिश का जिक्र करते हुए कैप्टन बताते है कि हम सभी को पता है कि 40 प्रतिशत पटियाला में मुस्लिम थे, जिनमें से अधिकतर पाकिस्तान चले गए। इसी तरह से कुछ ऐसे परिवार हैं, जिनके पुराने ताल्लुकात हैं। इसी में से एक कॉमन फ्रेंड ने एक मैसेज भेजा था। जिसमें कहा गया था कि इमरान खान कह रहे हैं कि इसको (सिद्धू) को कैबिनेट में शामिल कर लो। अगर ये बदमाशी करता है तो निकाल देना। उन्होंने आगे कहा कि उस मैसेज को सोनिया और प्रियंका को भेजा तो प्रियंका ने कहा कि इसने पाकिस्तान से सिफारिश करवाकर बड़ी बेवकूफी की है। जबकि सोनिया गाँधी ने कोई जबाव ही नहीं दिया। अमरिंदर सिंह के मुताबिक, नवजोत सिंह सिद्धू बहुत ही महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं। उनकी दोस्ती पाकिस्तान के नेताओं, प्रधानमंत्री और आर्मी के चीफ के साथ है।

पंजाब में कॉन्ग्रेस के सीएम फेस चरणजीत सिंह चन्नी को लेकर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि मैं चन्नी को बहुत अच्छे तरीके से जानता हूँ। 2007 में हमने इसे (चन्नी) निर्दलीय लड़ाया चुनाव लड़ाया और जिताया भी था। बाद में हमने इन्हें विपक्ष का नेता भी बनाया। पढ़ा लिखा लड़का था ये। सिद्धू, सुधजिंदर रंधावा और चन्नी तीनों मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। मेरे इस्तीफा देने के बाद से कॉन्ग्रेस में सबकुछ फटा हुआ है। इसके साथ सिंह ने रंधावा, चन्नी, सिद्धू और सुनील जाखड़ के मुख्यमंत्री बनने की लालसा पर कहा कि इन सभी में सबसे अधिक योग्य अगर कोई है तो वो केवल जाखड़ हैं।

पाकिस्तान दौरे के कारण देना पड़ा था इस्तीफा

गौरतलब है कि नवजोत सिंह सिद्धू 2017 में राज्य के उप मुख्यमंत्री बनाए गए थे। इसके बाद 2018 सिद्धू पाकिस्तान के दौरे पर चले गए। वहाँ उन्होंने पाकिस्तानी आर्मी के चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा को गले भी लगाया। जिसको लेकर काफी राजनीति भी हुई थी। इसके बाद उन्हें अपना इस्तीफा भी देना पड़ा था। हालाँकि, वो यहीं नहीं रुके उन्होंने नवंबर 2021 में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को अपना बड़ा भाई करार दिया था।

एक और पोस्टर गर्ल ने कॉन्ग्रेस को दिया झटका: प्रियंका गाँधी पर सवाल उठाते हुए वंदना सिंह का इस्तीफा, कहा- झंडा उठाने वाला भी नहीं बचेगा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 (Uttar Pradesh Assembly Election 2022) के लिए पहले चरण के चुनाव से एक दिन पहले बुधवार (9 फरवरी 2022) को कॉन्ग्रेस (Congress) ने अपना घोषणा पत्र (Menifesto) जारी किया। वहीं, पार्टी की पोस्टर गर्ल वंदना सिंह (Vandana Singh) पार्टी का हाथ छोड़ कर भाजपा (BJP) में शामिल हो गईं।

घोषणा पत्र को कॉन्ग्रेस महासचिव व उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गाँधी वाड्रा (Priyanka Gandhi Vadra) ने प्रदेश मुख्यालय पर ‘उन्नति विधान’ नाम से जारी किया। इसमें किसानों, व्यापारियों और बेरोजगारों के लिए कई ऐलान किए गए हैं। यह घोषणा पत्र का तीसरा हिस्सा है। इससे पहले पार्टी युवाओं के लिए ‘भर्ती विधान’ और महिलाओं के लिए ‘शक्ति विधान’ नाम से घोषणा पत्र जारी हो चुकी है।

उधर, प्रियंका मौर्या के बाद वंदना सिंह कॉन्ग्रेस की दूसरी पोस्टर गर्ल हैं, जिन्होंने इस्तीफा दिया है। वह “लड़की हूँ लड़ सकती हूँ” अभियान की प्रमुख चेहरा थीं। कॉन्ग्रेस पार्टी से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हुईं वंदना सिंह उत्तर प्रदेश महिला कॉन्ग्रेस के मध्य ज़ोन की उपाध्यक्ष थीं।

वंदना सिंह ने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए कहा कि प्रियंका गाँधी पार्टी के पदाधिकारियों से भी मुलाकात नहीं करती हैं। कॉन्ग्रेस छोड़ने के बाद वंदना सिंह ने कहा, “मैं 5-6 साल से कॉन्ग्रेस में सक्रिय हूँ। पदाधिकारी हूँ, महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष हूँ। प्रियंका जी ने कहा कि महिलाओं को 40 फीसदी मौका देंगे तो मुझे लगा कि मुझे भी मौका दिया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यदि इसी तरह पुराने लोगों को नजरअंदाज किया गया तो कोई पार्टी का झंडा उठाने वाला भी नहीं रहेगा।”

वंदना सिंह का कहना है कि उन्होंने दो विधानसभा सीटों से टिकट माँगा था, लेकिन पार्टी में कर्मठ और ईमानदार कार्यकर्ताओं की अनदेखी होती है। जो लोग उनके चहेते हैं या जिनका सोर्स है बहुत ऊपर तक सिर्फ वहीं लोग उनके मिल सकते हैं। वंदना सिंह ने कहा कि पार्टी में कल के आए और करीबी लोगों को मान सम्मान दिया जा रहा है और पार्टी के लोगों को एवं उनकी मेहनत को अनदेखा किया जा रहा है। 

वंदना सिंह से पहले प्रियंका मौर्य ने पार्टी को कहा था अलविदा

गौरतलब है कि वंदना सिंह से पहले ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ के नारे की मुख्य पोस्टर गर्ल प्रियंका मौर्या ने भी कॉन्ग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने भी प्रियंका गाँधी और पार्टी पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था। प्रियंका मौर्या ने कॉन्ग्रेस पर टिकट बँटवारे में घोटाले का आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था कि प्रियंका गाँधी के सचिव ने टिकट के लिए उनसे पैसे माँगे थे।

मौर्या ने कहा था, “लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ को केवल एक नारा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लड़की के रूप में मुझे चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी, क्योंकि मैं रिश्वत नहीं दे सकती थी। टिकट मुझे देने की बजाय एक महीने पहले पार्टी में शामिल हुए एक व्यक्ति को दिया गया।” मौर्या ने कहा था कि वह सरोजिनी नगर विधानसभा क्षेत्र में एक साल से अधिक समय से लगातार काम करने में जुटी हैं, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिली।

यूपी में सात चरणों में होगा चुनाव

उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों पर 7 चरणों में मतदान होना है। पहले चरण का मतदान 10 फरवरी को होगा, जिसमें प्रदेश के 11 जिलों की 58 सीटों पर मतदान किया जाएगा। 10 मार्च को यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजे आएँगे। कॉन्ग्रेस कई सालों बाद यूपी में सभी 403 विधानसभा सीटों अकेले पर चुनाव लड़ रही है। 

नशे की हालत में प्रमोशन, गणपति बप्पा के जयकारे, देवी-देवताओं के अपमान का आरोप: कौन हैं बिग बॉस वाली सरयू रॉय

बिग बॉस तेलुगु (Bigg Boss Telugu) की एक्स कंटेस्टेंट सरयू रॉय (Sarayu Roy) को देवी-देवताओं का अपमान करने और हिंदुओं की भावनाएँ भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। हैदराबाद पुलिस ने बुधवार (9 फरवरी 2022) को रॉय को उसके तीन दोस्तों के साथ गिरफ्तार किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, विश्व हिंदू परिषद (VHP) का आरोप है कि सरयू ने पिछले साल रिलीज हुई अपनी शॉर्ट फिल्म के प्रमोशन के दौरान हिंदू देवी-देवताओं का अपमान किया था। VHP के जिला अध्यक्ष चपुरी अशोक ने तेलंगाना के सिर्सिल्ला में सरयू के खिलाफ शिकायत की थी। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया था कि सरयू और उसके साथी कलाकारों ने हिंदू समुदाय और महिलाओं को नीचा दिखाया था। इसके बाद पुलिस ने ‘बिग बॉस’ की एक्स कंटेस्टेंट के खिलाफ FIR दर्ज की थी। बाद में यह मामला बंजारा हिल्स थाने में स्थानांतरित कर दिया गया। अब उसी मामले में सरयू को गिरफ्तार किया गया है।

सोशल मीडिया पर उनके थाने में घुसने के कई वीडियो और तस्वीरें वायरल हो रही हैं। हालाँकि सरयू ने रिपोर्टों का खंडन करते हुए कहा कि उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है। वह केवल पूछताछ के सिलसिले में पुलिस स्टेशन गई थीं।

बता दें कि सरयू और उसके साथियों को शॉर्ट फिल्म के प्रमोशन के दौरान नशे की हालत में गणपति बप्पा मोरिया के नारे लगाते हुए देखा गया था। सरयू राय तेलुगु बिग बॉस सीजन 4 में नजर आई थीं। वह टीवी में भी काम कर चुकी हैं। उन्होंने तेलुगु के ‘पर्चम’, ‘गंगवार’ जैसे शोज में भी काम किया है। वह यूट्यूब की जानी मानी कंटेंट क्रिएटर भी हैं। यूट्यूब पर उनके चैनल 7Arts के 1.3 मिलियन सब्सक्राइबर्स हैं।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने बुर्का मामला बड़ी बेंच के पास भेजा, 2 सप्ताह तक स्कूल-कॉलेजों के आसपास प्रदर्शन पर प्रतिबंध

कर्नाटक में बुर्के को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन के मामले पर कर्नाटक उच्च-न्यायालय में भी सुनवाई हुई। कर्नाटक हाईकोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब/बुर्के में एंट्री की अनुमति के सम्बन्ध में दायर मामले को एक बड़ी बेंच को ट्रांसफर कर दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि न सिर्फ ‘पर्सनल लॉ’, बल्कि संवैधानिक पहलुओं पर भी विचार करना ज़रूरी है, इसीलिए इसे बड़ी बेंच के पास भेजा जाएगा। इस मामले में कई वकील अपना पक्ष रखना चाह रहे थे, लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि ये PIL नहीं है।

अब इस मामले को कर्नाटक उच्च-न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाएगा, जो इस पर सुनवाई के लिए एक बड़ी बेंच का गठन करेंगे। इस दौरान बुर्का पक्ष के वकीलों ने माँग की कि छात्रों को अपनी आस्था का पालन करते हुए स्कूल-कॉलेज जाने की अनुमति दी जाए। उन्होंने कुछ अंतरिम व्यवस्था करने की माँग की, ताकि छात्रों की ‘पढ़ाई’ हो सके। वहीं एडवोकेट जनरल ने कहा कि ये सिर्फ राज्य का मामला नहीं है, बल्कि हर संस्थान की अपनी अलग स्वयात्तता है।

AG ने कहा कि पहले के कई बड़े निर्णय हैं, जिनसे पता चलता है कि हिजाब ‘मजहबी प्रैक्टिस’ का अभिन्न हिस्सा नहीं है। उन्होंने कहा कि छात्रों को शैक्षणिक संस्थानों द्वारा तय किए गए ड्रेस में ही कक्षाएँ अटेंड करनी चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि सायरा बानो के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि हदीथ को ‘दूसरे दर्जे का’ स्रोत ही माना जाना चाहिए। उन्होंने छात्राओं को हिजाब पहनने के लिए अंतरिम राहत दिए जाने के फैसले का विरोध किया।

उन्होंने कहा कि अंतरिम राहत देने का मतलब ये होगा कि याचिका की माँग मान ली गई है। वकीलों का कहना था कि कर्नाटक के शिक्षा विभाग के नियम-कानूनों में ड्रेस को लेकर कुछ भी नहीं है। बुर्का पक्ष के वकीलों का कहना था कि छात्रों को अपनी पसंद के कपड़े पहन कर स्कूल जाने की अनुमति दी जाए। ‘कॉलेज डेवलपमेंट कमिटी’ ने भी अंतरिम राहत देने की माँग का विरोध किया। इस दौरान कोर्ट में वक वकील को चिल्लाने के लिए जज ने डाँट भी पिलाई।

बता दें कि मीडिया भले ही इसे हिजाब का मामला बता रहा हो, लेकिन विरोध प्रदर्शनों और पहनावे को देख कर स्पष्ट है कि मामला बुर्के को लेकर है। उधर बेंगलुरु प्रशासन ने स्कूल-कॉलेजों के 200 मीटर के घेरे में विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगा दी है। अगले दो सप्ताह तक ये रोक जारी रहेगी। इस घेरे में धारा-144 लगी रहेगी। सभी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के लिए ये निर्णय जारी रहेगा। कर्नाटक सरकार भी जल्द ही कुछ फैसले ले सकती है।

‘हिजाब हमारी प्राथमिकता, एजुकेशन सेकेंडरी’: बुर्का पहनने पर अड़ी कर्नाटक की छात्राओं को सुनिए, कहा- हाईकोर्ट खिलाफ नहीं जा सकता

कर्नाटक (Karnataka) के स्कूलों में हिजाब (Hijab) पहनने को लेकर प्रदर्शन करने वाली मुस्लिम छात्राओं का मामला हाईकोर्ट (High Court) पहुँच गया है। इस बीच इन मुस्लिम छात्राओं ने ये भी स्पष्ट कर दिया है कि इनके लिए शिक्षा नहीं हिजाब महत्वपूर्ण है। इसका खुलासा उस वक्त हुआ जब 8 फरवरी 2022 को टाइम्स नाउ का एक रिपोर्टर दोनों पक्षों से बात कर रहा था।

दरअसल, फील्ड रिपोर्टिंग के दौरान रिपोर्टर ने हिजाब पहनी हुई लड़कियों के एक ग्रुप से बात की। इस दौरान रिपोर्टर ने उन लड़कियों से कहा कि हिंदू छात्र कह रहे हैं कि वे भगवा गमछा लेकर हिजाब का विरोध जारी रखेंगे। इस पर एक मुस्लिम लड़की ने कहा, “वे भगवा गमछा ले सकते हैं। हमें इससे कोई दिक्कत नहीं है। हम उनके धर्म का सम्मान करते हैं। उन्हें हमारा सम्मान करना चाहिए।”

इस पर रिपोर्टर ने सवाल किया कि क्या कर्नाटक हाईकोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब के खिलाफ निर्णय दिया है? इस पर एक लड़की ने कहा, “यह (हिजाब) हमारी पहली प्राथमिकता है। एजुकेशन सेकेंडरी है।” मुस्लिम लड़कियों ने एक स्वर में कहा कि हाईकोर्ट को हिजाब पहनने की इजाजत देनी चाहिए, क्योंकि कोर्ट संविधान के खिलाफ नहीं जा सकता।”

कर्नाटक का बुर्का विवाद

पिछले महीने की शुरुआत में कर्नाटक के उडुपी स्थित पीयू कॉलेज से शुरू हुआ बुर्का विवाद बड़ा रूप ले चुका है। चिंता की बात यह है कि इस मामले में लेफ्ट-लिबरल्स और कट्टरपंथी इस्लामी इन लड़कियों का समर्थन करते हुए उन्हें बुर्का पहनकर स्कूल जाने के लिए उकसा रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि इस विवाद की शुरुआत में ही उडुपी में कॉलेज के अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया था कि सभी विद्यार्थियों को ड्रेस कोड का पालन करना पड़ेगा औऱ कैंपस के अंदर मुस्लिम लड़कियाँ हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में इसकी इजाजत नहीं है। राज्य के शिक्षा मंत्रालय ने भी कॉलेजों में हिजाब के खिलाफ अपना रुख बदलने से साफ इनकार कर दिया है।

गौरतलब है कि कर्नाटक में हो रहे इसी विवाद के बीच शिमोगा में दो गुटों के बीच पत्थरबाजी हो गई। उसके बाद विरोध प्रदर्शन राज्य के कई इलाकों में फैलने लगा इसके बाद धारा 144 लगाते हुए राज्य के सभी शिक्षण संस्थानों को तीन दिनों के लिए बंद कर दिया है। वहीं दूसरी ओर कर्नाटक हाईकोर्ट एक मुस्लिम छात्रा द्वारा कर्नाटक में हिजाब पहनने के अधिकार की माँग वाली याचिका पर सुनवाई के बाद मामले को बड़े बेंच के पास भेज दिया है।

‘बिकनी पहन कर मोदी का बिस्तर…’: रुबिका लियाकत ने स्कूलों में बुर्के का किया विरोध तो गाली-गलौज पर उतर गए इस्लामी कट्टरपंथी

कर्नाटक के शैक्षणिक संस्थानों में बुर्का पहन कर आने की अनुमति के लिए मुस्लिम छात्र हिंसा पर उतारू हैं। वहीं सोशल मीडिया पर भी मीडिया का गिरोह विशेष और विपक्षी दल इसे मुद्दा बनाए हुए हैं। जब ‘ABP News’ की पत्रकार रुबिका लियाकत ने कहा कि स्कूलों-कॉलेजों में हिजाब या बिकनी नहीं चलेगा, तो वामपंथी और इस्लामी कट्टरपंथी उन पर पिल पड़े। जबकि रुबिका लियाकत भी मुस्लिम ही हैं। अयान खान नाम के यूजर ने उनसे पूछ डाला, “क्या तुमने कभी हिजाब पहना है?”

कॉन्ग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी ने ट्वीट किया था कि लड़की बिकनी पहने या हिजाब, ये तय करने का अधिकार उन्हें संविधान देता है। हालाँकि, इस दौरान वो ये भूल गईं कि स्कूल-कॉलेजों में अनुशासन पर महत्व दिया जाता है और वहाँ तय ड्रेस कोड का अनुसरण करना होता है। रुबिका लियाकत ने प्रियंका गाँधी को जवाब दिया, “प्रियंका गाँधी जी, आप तो लड़कियों को लड़ना सिखा रही थीं। आपसे ये उम्मीद नहीं थी। स्कूल में न बिकनी चलेगी, न घूँघट, न ही हिजाब चलेगा।”

इसके बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के सोशल मीडिया डिपार्टमेंट के अध्यक्ष रोहन गुप्ता ने उनसे पूछा कि प्रियंका गाँधी की ट्वीट में हिजाब शब्द कहाँ लिखा है? इस पर रुबिका लियाकत ने पलटवार करते हुए उनसे पूछा कि स्कूल की नोटिस में ये कहाँ लिखा है कि बाहर आप बुर्का/हिजाब नहीं पहन सकते? अबसर आलम नाम के यूजर ने लिखा, “तुमसे ज्ञान नहीं चाहिए रुबिका।” इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें ‘दलाल’ कह कर भी सम्बोधित किया। सद्दाम शेख ने लिखा, “अल्लाह के पास सत्ता की दलाली नहीं, हमारे नेक आमाल जाएँगे। आप ईमानदारी का टॉनिक खाइए।”

नसीम अहमद सिद्दीकी नाम के सोशल मीडिया यूजर ने आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करते हुए लिखा, “बिकनी पहन कर तू नरेंद्र मोदी का बिस्तर गर्म करती रहो। तुझे क्या पता कि इस्लाम और शरीयत क्या है। पत्रकारिता छोड़ और किसी वेश्या के कोठे पर बैठ जा।”

रुबिका लियाकत के लिए महिला विरोधी भाषा का किया गया प्रयोग

इन सबके अलावा भी कई अन्य लोगों ने रुबिका लियाकत पर निशाना साधा। सोशल मीडिया पर ‘घूँघट’ का विरोध करने वाले कई एक्टिविस्ट्स अब इस्लाम में महिलाओं को जबरन पहनाए जाने वाले बुर्का का समर्थन कर रहे हैं। उच्च-न्यायालय में इसके समर्थन में कुरान और हदीस से दलीलें दी जा रही हैं। जबकि सच्चाई ये है कि कट्टर सोच वाले मौलानाओं ने महिलाओं पर कई बंदिशें लगाई हुई हैं और ’72 हूर’ की बातें करते हुए उनका अक्सर अपमान करते रहते हैं।

पहले 12 साल की ‘बहन’ से निकाह, फिर सिर किया कलम: हाथ में बीवी का कटा सिर और चेहरे पर हँसी, सज्जाद के वायरल Video से हिले सभी

ईरान (Iran) का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में सज्जाद हैदरी नाम का एक शख्स अपनी बीवी का कटा हुआ सिर हाथ में पकड़कर खुलेआम सड़क पर घूमता हुआ दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीवी के कथित एडल्टरी (adultery) का पता चलने पर हैदरी ने उसका सिर कलम कर दिया। वायरल वीडियो ने लोगों को झकझोर रख दिया है।

न्यूयॉर्क पोस्ट ने ईस्ट2वेस्ट न्यूज की रिपोर्ट के हवाले से लिखा, वीभत्स फुटेज में सज्जाद हैदरी को दक्षिण-पश्चिमी प्रांत खुज़ेस्तान के एक शहर अहवाज़ के पास शनिवार (5 फरवरी) को घूमते हुए देखा गया। उसने अपने हाथ में अपनी 17 वर्षीया बीवी मोना हैदरी का सिर और दूसरे हाथ में ब्लेड ले रखा था।

बताया जा रहा है कि मोना सज्जाद की ​चेचरी बहन थी। ईरान की राष्ट्रीय प्रतिरोध परिषद की महिला समिति के अनुसार, 12 वर्ष की उम्र में मोना का आरोपित के साथ जबरन निकाह कर दिया गया था। हैदरी मोना का घरेलू उत्पीड़न (domestic abuse) भी करता था। इन दोनों का 3 वर्ष का एक बेटा भी है। मोना अपने शौहर के जुल्मों से इतना परेशान हो गई थी कि उससे तलाक लेना चाहती थी। एक बार वह अपने शौहर को छोड़कर अकेले रहने के लिए तुर्की (Turkey) भी चली गई थी, लेकिन दूसरे देश में अकेले ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाई और ईरान लौट आई।

कुछ दिनों बाद सज्जाद ने अपने भाई के साथ मिलकर मोना की हत्या की योजना बनाई। दोनों ने पहले उसके हाथ-पैर बाँध दिए और फिर उसका सिर कलम (Honor killing in iran) कर दिया। यहाँ तक कि उसके शौहर का वीडियो और तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं, जिसमें वो महिला का सिर हाथ में लेकर मुस्कुराते हुए गली से जा रहा है। एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि पारिवारिक मतभेद के चलते आरोपित ने अपनी बीवी की हत्या की। दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

बता दें कि इस घटना के बाद लोगों में खासा रोष है और वे अपने गुस्से को सोशल मीडिया पर जाहिर कर रहे हैं। यहाँ तक कि शादी की उम्र बढ़ाने को लेकर भी माँग उठ रही है। अभी ईरान में लड़कियों की शादी के लिए कानूनी उम्र 13 साल है। खबरों के अनुसार, ईरान में हर साल 375-450 महिलाओं की ऑनर किलिंग के नाम पर हत्या कर दी जाती है।

अखिलेश के जोड़ीदार राजभर बोले- सरकार बनी तो मोटरसाइकिल पर 3 लोग कर सकेंगे सवारी

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर (Om Prakash Rajbhar) आए दिन अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं। अब उन्होंने अपने गठबंधन की सरकार बनने पर बाइक पर तीन लोगों को सवारी करने की इजाजत देने की बात कही। अपनी बात के समर्थन में उन्होंने 70 सीटों वाले रेल के डिब्बे में तीन सौ लोगों के सवार होने की दलील दी है। वे अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा के साथ मिलकर विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं।

राजभर ने कहा, “ट्रेन के एक कोच में 70 सीटें होती हैं। लेकिन उसमें बैठते हैं 300 लोग, पर ट्रेन का चालान नहीं होता। 9 सवारी पर जीप की पासिंग होती है, लेकिन 22 लोग उसमें भी बैठते हैं। मोटर साइकिल का दो सवारी का पास हो तो फिर इसका चालान क्यों होता है।” उन्होंने कहा, “पुलिसवाले चालान करते हैं। लेकिन कहीं कोई विवाद या झगड़ा होने और कोई एप्लीकेशन मिलने पर मोटरसाइकिल पर एक सिपाही और दारोगा गाँव में जाते हैं। आरोपित को पकड़कर बीच में बैठाया तो तीन सवारी हो गए। ऐसे में दारोगा का चालान नहीं होता। इसलिए हमारी सरकार के बनते ही तीन सवारी फ्री कर दिया जाएगा। अन्यथा जीप और ट्रेन का भी चालान किया जाएगा।”

इससे पहले ओम प्रकाश राजभर ने सपा गठबंधन की तुलना इलेक्ट्रॉन, प्रोटान और न्यूट्रॉन से की थी। 7 फरवरी को उन्होंने वाराणसी में कहा था कि अखिलेश यादव, जयंत चौधरी और हम मिलकर इलेक्ट्रॉन, प्रोटान और न्यूट्रॉन हैं और तीनों साथ आकर एटम बम बन चुके हैं। साथ ही गैंगस्टर मुख्तार अंसारी का समर्थन करते हुए कहा था कि वो जहाँ से भी चुनाव लड़ना चाहेंगे, हम उन्हें अपने सिंबल पर चुनाव लड़ाएँगे। जब बृजेश सिंह बीजेपी के सिंबल पर चुनाव लड़ सकते हैं तो मुख्तार अंसारी क्यों नहीं?

इससे पहले वर्ष 2018 में उन्होंने कहा था कि उनका पार्टी का ये सिद्धांत है कि जब भी उनकी पार्टी की सरकार बनेगी तो 6-6 महीने में एक व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया जाएगा। राजभर का कहना था कि अगर 6-6 महीने के लिए सभी जातियों के नेताओं को सीएम बना दिया जाए तो क्या बुरा है? गौरतलब है कि 10 फरवरी 2022 को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान होगा और 10 मार्च 2022 को चुनाव के परिणाम घोषित किए जाएँगे।