Home Blog Page 3066

लद्दाख में नौकरी के लिए अब उर्दू अनिवार्य नहीं: राजस्व विभाग ने बहाली की योग्यता बदली, BJP सांसद बोले- थोपी गई भाषा से मिली आजादी

लद्दाख प्रशासन ने राजस्व विभाग में होने वाली विभिन्न पदों पर बहाली के लिए योग्यता के तौर पर उर्दू की अनिवार्यता खत्म कर दी है। भाजपा सांसद जामयांग सेरिंग नामग्याल ने इसकी जानकारी दी है। उन्होंने आर्टिकल 370 के खत्म होने के बाद उर्दू की अनिवार्यता खत्म करने को सच्ची आजादी बताया है। नामग्याल ने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और लद्दाख के लेफ्टिनेंट गवर्नर राधाकृष्ण माथुर का शुक्रिया अदा किया है।

उन्होंने कहा, “केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के लेफ्टिनेंट गवर्नर की तरफ से एक नोटिस जारी कर ये बताया गया है कि राजस्व विभाग में 7 तारीख के बाद जितने भी पटवारी और नायब तहसीलदार पद के लिए भर्ती होगी, उसमें उर्दू अनिवार्य नहीं होगा। किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्याल से अगर आपके पास ग्रेजुएशन की डिग्री है तो आप आवेदन कर सकते हैं। मैं समझता हूँ कि लद्दाख के अलग से केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद हमने रिफॉर्मेटिव स्टेप लिया है। जो लोग उर्दू नहीं जानते हैं, उनके लिए, यानी पूरे लद्दाख के लिए यह भेदभाव वाली नीति थी, क्योंकि उर्दू लद्दाख के किसी भी बाशिंदे की, किसी भी कम्युनिटी, किसी भी जनजाति की मातृभाषा नहीं है। इसलिए यह राजस्व विभाग का पहला कदम है कि यह सामान्य भाषा में चले, फ्रेंडली हो, लोगों की पहुँच हो। इस पहले कदम के लिए मैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, लद्दाख के लेफ्टिनेंट गवर्नर राधाकृष्ण माथुर का शुक्रिया अदा करता हूँ। इससे लद्दाख की पूरी आवाम खुश है। मुझे उम्मीद थी कि इससे लद्दाख को अपनी पहचान बनाने और उभारने का मौका मिलेगा।”

प्रधान सचिव डॉ. पवन कोटवाल की ओर जारी अधिसूचना के मुताबिक ‘उर्दू की जानकारी’ की जगह ‘किसी भी मान्यता प्राप्त विश्वविद्याल से स्नातक की डिग्री’ को अनिवार्य बनाया गया है। बता दें कि लद्दाख में लेह और कारगिल दो जिले हैं। भूमि एवं राजस्व अभिलेखों की भाषा उर्दू रही है। कोर्ट (निचली अदालतें) और एफआईआर भी उर्दू में ही लिखी जाती हैं। सरकारी स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा का माध्यम उर्दू है, खासकर कश्मीर, कारगिल और जम्मू के मुस्लिम बहुल इलाकों में। 

उल्लेखनीय है कि लद्दाख के भाजपा सांसद जम्यांग सेरिंग नामग्याल ने पिछले साल गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर पटवारी और नायब तहसीलदार जैसे पदों पर बहाली के लिए राजस्व नियमों में बदलाव (उर्दू को हटाने) की माँग की थी। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को हटाने के बाद यह सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है। दशकों तक थोपी गई भाषा से वास्तविक स्वतंत्रता मिली। 

सिद्धार्थ ने अपने घटिया कमेंट को ‘जोक’ बता सायना नेहवाल से माँगी माफी, कहा- मैं कट्टर नारीवादी… आप मेरी चैंपियन

भारत की बैडमिंटन स्टार सायना नेहवाल पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के बाद एक्टर सिद्धार्थ ने उनसे माफी माँगी है। 11 जनवरी 2022 को देर रात सायना के नाम माफी पत्र जारी करते हुए सिद्धार्थ ने लिखा कि उन्होंने जो घटिया जोक लिखा था वो उसके लिए क्षमा माँगते हैं।

अपने माफी पत्र में उन्होंने लिखा, “सायना, मैं अपने कठोर जोक के लिए आपसे माफी माँगना चाहता हूँ जिसे मैंने आपके ट्वीट की प्रतिक्रिया में कुछ दिन पहले लिखा था। मैं आपकी कई बातों पर सहमत नहीं होता हूँ लेकिन मेरी नाराजगी या गुस्सा जब मैंने आपका ट्वीट पढ़ा, मेरे शब्दों या लहजे को जस्टिफाई नहीं कर सकता है। मुझे मालूम है कि मैं उससे अच्छा कह सकता था। रही बात मजाक की तो अगर उस मजाक को समझाना पड़े तो जाहिर है वो अच्छा जोक नहीं है। मैं उस मजाक की माफी माँगता हूँ जो सही से नहीं पहुँच पाया।”

सिद्धार्थ ने आगे लिखा, “हालाँकि मैं बताना चाहता हूँ कि शब्दों का खेल और हास्य की कोई गलत भावना नहीं थी जैसा कि लोगों ने समझा। मैं एक कट्टर नारीवादी साथी हूँ और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मेरे ट्वीट में कोई जेंडर निहित नहीं था। मेरा निश्चित रूप से एक महिला के रूप में आप पर हमला करने का कोई इरादा नहीं था। मैं आशा करता हूँ कि हम इन बातों को भूलेंगे और आप इस पत्र को स्वीकार करेंगे। आप हमेशा मेरी चैंपियन ही रहेंगी।”

बता दें कि सिद्धार्थ की माफी के बाद भी कुछ नेटिजन्स सिद्धार्थ पर गुस्सा उतार रहे हैं। माफी पत्र पढ़कर लोगों ने सिद्धार्थ को बेशर्म व्यक्ति करार दिया है। वहीं कुछ ने लिखा है कि ये फेमिनिस्ट हो ही नहीं सकता इसने हमेशा महिलाओं का अपमान किया है। सायना मामले पर तो ये सब बोल दिया लेकिन नाविका के लिए कहे गए शब्दों पर ये आदमी क्या कहेगा। कुछ यूजर्स सिद्धार्थ की लगातार महिलाओं पर की गई टिप्पणी देखकर कहते हैं कि उन्हें ट्विटर से बाहर का रास्ता दिखाना ही सबसे अच्छा होगा। यूजर्स ने इस बात पर भी सवाल उठाए हैं कि अपने माफी पत्र में वो किस बात को जोक लिख रहे हैं जबकि उन्होंने जो भी कहा था वो स्पष्ट शोषण था। सायना के समर्थन में उतरे लोगों का पूछना है कि क्या अब ऑनलाइन शोषण को एक कठोर मजाक कहकर सामान्य बना दिया जाएगा। 

उल्लेखनीय है कि इससे पहले महिलाओं पर ऑनलाइन टिप्पणी करने की सिद्धार्थ की आदत देखकर महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा था कि सिद्धार्थ ने अक्सर महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की हैं। उन्होंने बताया कि इस मामले में कार्रवाई के लिए NCW तमिलनाडु के DGP (पुलिस महानिरीक्षक) से संपर्क में है। ‘टाइम्स नाउ’ की महिला एंकर के खिलाफ अभिनेता के ट्वीट को भी NCW ने आपत्तिजनक, अनैतिक और महिलाओं की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने वाला बताया है। इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए NCW ने तमिलनाडु पुलिस को कार्रवाई करने और आगे उनके द्वारा इस तरह की हरकत न हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए भी कहा है। साथ ही निर्देश दिया है कि इस मामले में क्या कार्रवाई की गई, इस सम्बन्ध में आयोग को जल्द सूचित किया जाए। 

‘आज 12, कल 120 हो सकता है’: SC ने 12 भाजपा MLA को एक साल के लिए निलंबित करने पर महाराष्ट्र सरकार को लताड़ा, बताया ‘असंवैधानिक’

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (11 जनवरी 2022) को महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा पिछले साल जुलाई में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के 12 विधायकों को एक साल के लिए निलंबित करने के कदम को ‘निष्कासन से भी बदतर’ बताया है। सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति खानविलकर, न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति रवि कुमार की खंडपीठ ने विधानसभा द्वारा विधायकों के निलंबन के निर्णय को संविधान के अनुच्छेद 190(4) के तहत ‘असंवैधानिक’ बताया है।

बेंच ने कहा, “यदि किसी राज्य के विधान मंडल के सदन का कोई सदस्य 60 दिनों की अवधि के लिए सदन की अनुमति के बिना उसकी सभी बैठकों से अनुपस्थित रहता है तो सदन उसकी सीट को खाली घोषित कर सकता है,” सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि अध्यक्ष द्वारा इस विवाद को सुलझाकर इस संकट से बचा जा सकता था।

‘आज 12 है, कल 120 हो सकता है’, सुप्रीम कोर्ट ने मनमाने फैसले के लिए महाराष्ट्र सरकार की खिंचाई की

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने राज्य को याद दिलाया कि 12 निर्वाचन क्षेत्रों को इतने लंबे समय तक बिना प्रतिनिधित्व के नहीं रखा जा सकता है और इनको प्रतिनिधित्व का अधिकार है। पीठ ने महाराष्ट्र राज्य सरकार को फटकार लगाते हुए कहा कि इस तरह की मिसाल पेश करने से लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। न्यायमूर्ति खानविलकर ने कहा, “आज यह 12 है, कल 120 हो सकता है।”

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार के अधिवक्ता और सीनियर एडवोकेट सी आर्यमा सुंदरम के तर्क को मानने से इनकार कर दिया और कहा कि वह एक विधानसभा द्वारा लगाए गए दंड की मात्रा की जांच नहीं कर सकती है। इसके बाद सुंदरम ने राज्य से निर्देश प्राप्त करने के लिए कुछ पीठ से कुछ और समय देने का अनुरोध किया। इसके बाद सुनवाई अगले मंगलवार तक के लिए टाल दी गई।

बता दें कि वरिष्ठ अधिवक्ता सी आर्यमा सुंदरम ने सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार का प्रतिनिधित्व किया, जबकि निलंबित भाजपा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी, मुकुल रोहतगी, नीरज किशन कौल और सिद्धार्थ भटनागर तर्क प्रस्तुत किए।

महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी सरकार ने भाजपा के 12 विधायकों को एक साल के लिए विधानसभा से निलंबित किया है

बता दें कि महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना की गठबंधन वाली महा विकास अघाड़ी (MVA) की सरकार ने 5 जुलाई 2021 को भाजपा के 12 विधायकों को एक साल के लिए निलंबित कर दिया था। महाराष्ट्र विधानसभा के दो दिवसीय मानसून सत्र शुरू हुआ था, उस दौरान भाजपा के इन विधायकों पर महाराष्ट्र विधानसभा के पीठासीन सभापति भास्कर जाधव के खिलाफ कथित तौर पर असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर यह ऐक्शन लिया गया था।

खबरों के मुताबिक, बीजेपी विधायक पराग अलवानी, राम सतपुते, संजय कुटे, आशीष शेलार, अभिमन्यु पवार, गिरीश महाजन, अतुल भाटखलकर, शिरीष पिंपल, जयकुमार रावल, योगेश सागर, नारायण कुचे और कीर्ति कुमार बगडिया को सदन से निलंबित कर दिया गया था।

निलंबन महाराष्ट्र भाजपा के नेता देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि उन्हें संदेह है कि सदन में संख्या कम करने के लिए एमवीए सरकार ने यह कदम उठाया है। आरोपों से इनकार करते हुए उन्होंने कहा था, “सरकार ने घटना से एक कहानी बनाई और हमारे 12 विधायकों को निलंबित कर दिया। हमारे विधायकों ने स्पीकर को गाली नहीं दी। कुछ गरमागरम बहस हुई, लेकिन सभी विधायकों की ओर से हमारे वरिष्ठ सदस्य आशीष शेलार ने सभापति भास्कर जाधव से माफी माँगी थी। बाद में सरकार हमारे विधायकों को निलंबित करने के लिए यह योजना लेकर आई। हम अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।”

रिपोर्ट के अनुसार, जब सभापति भास्कर जाधव ने भाजपा विधायकों ने बोलने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया तो उन्होंने विपक्ष ने ओबीसी के मुद्दे पर महाराष्ट्र विधानसभा में हंगामा किया था। भाजपा ने लोकसेवा आयोग की लंबित परीक्षाओं और योग्य उम्मीदवारों की नियुक्ति के मुद्दे पर विस्तृत चर्चा करने के लिए स्थगन प्रस्ताव लाने की माँग की थी, लेकिन सभापति ने अनुरोध को ठुकरा दिया था।

‘चुनाव है, पंजाब सरकार ने नहीं दिया प्रदर्शनकारियों को हटाने का आदेश’: PM मोदी सुरक्षा चूक में खुलासा – जानबूझ कर अनजान बनी रही पुलिस

5 जनवरी, 2022 को बठिंडा के हुसैनीवाला में स्वतंत्रता के बलिदानियों को श्रद्धांजलि देने जा रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफिले को रोकने के लिए किसान प्रदर्शनकारियों द्वारा फ्लाईओवर जाम कर दिया गया, जिस कारण उन्हें 20 मिनट तक वहाँ फँसे रहने के बाद वापस दिल्ली लौटना पड़ा। इस मामले में पंजाब पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठे, जो प्रदर्शनकारियों के साथ चाय की चुस्की लेते हुए दिखी। पंजाब सरकार बयान बदलती रही। मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुँचा और जाँच के लिए कमिटी बनी।

इस मामले में ‘इंडिया टुडे’ ने अपनी ‘ऑन ग्राउंड इन्वेस्टीगेशन‘ के आधार पर खुलासा किया है कि पंजाब पुलिस ने जानबूझ कर कार्रवाई नहीं की और उसे सब पहले से पता था। इस ‘स्टिंग ऑपरेशन’ में सबसे पहले ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार ने फिरोजपुर के एसपी सुखदेव सिंह से मुलाकात की। परम मोदी की उस दिन फिरोजपुर में ही रैली थी, जिसे रद्द करना पड़ा था। इसमें उनसे पूछा गया कि आखिर राज्य की ख़ुफ़िया व्यवस्था इस प्रकरण में विफल कैसे हो गई?

इस पर उन्होंने बताया कि एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस को 2 जनवरी को ही इस सम्बन्ध में एक पत्र भेज कर सुझाव दिया गया था कि कुछ महत्वपूर्ण स्थानों पर ट्रैफिक रोका जाए और भाजपा कार्यकर्ताओं को पीएम मोदी की रैली तक पहुँचने से रोका जाए। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिकारियों को कई बार रिपोर्ट भेज कर आगाह किया गया कि प्रदर्शनकारी रैली के पंडाल में घुस सकते हैं और पुलिस द्वारा रोके जाने पर सड़क पर ही धरना देकर जाम लगा सकते हैं।

उन्होंने बताया कि ‘बलदेव सिंह जीरा ग्रुप [भारतीय किसान यूनियन क्रांतिकारी]’ ने पहले ही भीड़ जुटाने की साजिश रची थी। उन्होंने आगे मार्च किया और सड़क जाम कर दिया। इसके बाद फिर से पुलिस को सूचित किया गया। उन्होंने बताया कि 2, 3, 4 जनवरी को ADG (सिक्योरिटी) नागेश्वर राव आए भी थे, जिन्हें ब्लॉकेड के सम्बन्ध में आगाह करते हुए पत्र दिया गया। बता दें कि पीएम मोदी पहले हैलीकॉप्टर से फिरोजपुर जाने वाले थे, लेकिन मौसम खराब रहने के कारण उन्हें गाड़ी से यात्रा की योजना बनानी पड़ी।

हालाँकि, इस सम्बन्ध में SPG ने पहले ही पंजाब के प्रशासन से कह दिया था कि मौसम खराब रहने की स्थिति में सड़क से प्रधानमंत्री की यात्रा होगी और इस सम्बन्ध में प्रबंध किए जाएँ। यात्रा के दिन पुलिस अधिकारियों ने ख़ुफ़िया इनपुट्स पर चर्चा भी की थी। ‘इंडिया टुडे’ ने उस दिन की तस्वीरों के आधार पर खुलासा किया कि इसके बावजूद सड़क को क्लियर नहीं किया गया था। एसपी सुखदेव सिंह ने बताया कि उन्होंने एसएसपी को पहले से प्रदर्शनकारियों की गतिविधियों को लेकर सन्देश भेज दिया था।

उन्होंने बताया, “दोपहर से पहले 11:45 में प्रदर्शनकारियों ने भीड़ जुटा दिया और वो मोगा रोड की तरफ बढ़ने लगे। इस सन्देश को दोपहर 12:07 में भेजा गया। इसके बाद 12:20 में फिरोजशाह बैरिकेड को तोड़ डाला गया। प्रदर्शनकारी उसी रूट पर आगे बढ़ रहे थे, जिधर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा तय थी। इस सम्बन्ध में 12:32 में मैसेज भेजा गया। पौने 1 बजे SSP को सूचित किया गया कि 200-225 प्रदर्शनकारियों ने VVIP रूट को ब्लॉक कर दिया है।”

12:50 में सुखदेव सिंह को बठिंडा के एसपी से ये पूछने के लिए कॉल किया गया कि क्या कोई ट्रैफिक जाम है? बकौल सुखदेव सिंह, जब उन्होंने बताया कि पूरी सड़क ही जाम है तब दूसरी तरफ से बठिंडा के एसपी ने कहा, “हम सब तो गए!” 12:52 में पीएम मोदी का काफिला वहाँ पहुँचा और 1:10 में उन्हें वापस लौटना पड़ा। फिरोजपुर स्थित कुलगढ़ी पुलिस थाने के SHO बीरबल सिंह ने बताया कि प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए राज्य सरकार का कोई आदेश नहीं आया।

उन्होंने कहा, “कुछ लोग गुस्से में हैं। वो जमा हो गए हैं। ये उनकी जगह है। ये उनकी जगह है। उनके अधिकार हैं। हम क्या कर सकते हैं? राज्य सरकार ने हमें आदेश नहीं दिया कि उनकी पिटाई करो। अगर हमें आदेश मिलता कि लाठी, आँसू गैस या गोली का इस्तेमाल कर उन्हें तितर-बितर किया जाए, तो हम उन्हें हटा सकते थे। लेकिन, चुनाव आ रहे हैं। हम बल का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे। अचानक से प्रदर्शनकारी जुट गए। कम्युनिकेशन गैप के कारण मुझे विरोध प्रदर्शन का पता नहीं चला।”

उन्होंने दावा किया कि उस दिन जिन प्रदर्शनकारियों ने सड़क जाम किया, वो किसानों के वेश में कट्टरवादी ताकतें थीं। प्रोटोकॉल्स का उल्लंघन करते हुए फ्लाईओवर के पास एक बाजार को भी खुला रखा गया था, जिसके अंदर एक शराब की दुकान भी बेधड़क खुली हुई थी। प्रदर्शनकारियों ने गाँव वालों को भी सड़क जाम करने के लिए उकसाया। लाठी लेकर दौड़ रहे युवक ग्रामीणों को जमा कर रहे थे। कई किसान यूनियन वहाँ सक्रिय थे। एक ग्रामीण ने बताया कि गुरुद्वारा पर सन्देश भेजा गया कि लोग जमा हों।

‘सीएम हाईकमान नहीं, पंजाब के लोग बनाते हैं’: सिद्धू फिर हुए बागी, कहा था- मनमोहन सिंह की तरह चन्नी भी इशारे पर चलें

पंजाब विधानसभा चुनाव (Punjab Assembly Election) के घोषणा होने की साथ ही कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) ने एक बार फिर बागी रुख अख्तियार कर लिया है। बुधवार (11 जनवरी 2022) को चंडीगढ़ प्रेस क्लब में बातचीत के दौरान उनसे मीडियाकर्मियों ने पार्टी के सीएम फेस को लेकर सवाल किया। इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा, “हर कोई सीएम बन सकता है क्या? सीएम हाईकमान नहीं बनाता, बल्कि पंजाब के लोग बनाते हैं। ये किसने कह दिया कि हाईकमान सीएम बनाएगा।”

सिद्धू ने कहा कि विधायक भी 5 साल पहले पंजाब के लोगों ने ही बनाए थे और उनसे ही सीएम चुना गया। विधायक बनेंगे या नहीं, यह भी पंजाब के लोगों को ही तय करना है। यह तभी होगा, जब कोई एजेंडा होगा। आप लोग किसी भ्रम में न रहें। पंजाब के लोगों को ही विधायक बनाने हैं और उन्हें ही सीएम बनाने हैं।

नवजोत सिंह सिद्धू ने पंजाब मॉडल पर चर्चा करते हुए कहा, “हम पंजाब मॉडल लेकर आए हैं। इसको लेकर पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा से बात हो गई है। इसे पार्टी के घोषणा पत्र में भी शामिल किया जाएगा।” बताया जा रहा है कि सिद्धू के पंजाब मॉडल में लीकर कॉर्पोरेशन बनाना, माइनिंग कॉपोरेशन, केबल रेग्युलेटर कमीशन, ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन बनाना शामिल होगा।

सिद्धू के कारण पंजाब कॉन्ग्रेस में कलह

हालाँकि, ऐसा पहली बार नहीं है कि सिद्धू के कारण पंजाब कॉन्ग्रेस में कलह पैदा हुई हो। सिद्धू खुद को पंजाब का सीएम चेहरा घोषित करवाना चाहते हैं। कॉन्ग्रेस द्वारा सामूहिक तौर पर चुनाव लड़े जाने के फैसले के बाद सिद्धू ने बागी अंदाज अपनाते हुए 29 दिसंबर 2021 को आलाकमान से सीएम फेस घोषित करने की माँग की थी। उन्होंने कहा था बिना दूल्हे के बाराती कैसा? चुनाव में दो चीजें अहम होती हैं- मुद्दा या फिर नेता का चेहरा। यह कॉन्ग्रेस हाईकमान को तय करना है कि वह मुद्दे के साथ जाता है या फिर चेहरे के साथ। 

सिद्धू की अति महत्वाकांक्षा पर कॉन्ग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा था कि सिद्धू के अंदर टीम भावना की कमी है। वहीं, बीते हफ्ते सिद्धू के दबाव से परेशान आकर पंजाब के गृहमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा ने गृह मंत्रालय छोड़ने की पेशकश कर दी थी। रंधावा का कहना था कि जब से उन्हें गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली है, तभी से नवजोत सिद्धू उनसे नाराज हैं। 

नवजोत सिंह सिद्धू मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी को लेकर भी कह चुके हैं कि जिस तरह से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कॉनग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के इशारे पर चलते थे, उसी तरह वह भी चाहते हैं चन्नी उनके इशारे पर चलें।

पुलिस की गाड़ी के कारण गई जान, फिल्म निर्माता ने परिवार को दी ₹4 लाख की मदद: कभी थे रेस्टॉरेंट मैनेजर, कोरोना ने बना दिया डिलीवरी बॉय

दिल्ली की रोहिणी से एक मामला सामने आया है, जहाँ बतौर रेस्टॉरेंट मैनेजर काम करने वाले 38 वर्षीय सलिल त्रिपाठी की मौत हो गई। आरोप है कि दिल्ली पुलिस कॉन्स्टेबल ने उनके ऊपर SUV चढ़ा दी, जिस कारण उनकी मौत हुई। परिवार का खर्च उठाने के लिए वो फूड एग्रीगेटर कंपनी ‘Zomato’ में डिलीवरी एग्जीक्यूटिव के रूप में भी काम करते थे। ये घटना शनिवार (8 जनवरी, 2022) की है। फिल्म निर्माता मनीष मुंद्रा पीड़ित परिवार की मदद के लिए सामने आए हैं।

‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपनी खबर में बताया कि सलिल त्रिपाठी हडसन लेन स्थित ‘Ricos’ में बतौर मैनेजर काम करते थे। अतिरिक्त आय के लिए उन्होंने ‘Zomato’ के डिलीवरी एग्जीक्यूटिव के रूप में काम करना शुरू किया। बाबा साहब आंबेडकर हॉस्पिटल के पास जाईल सिंह नाम के एक दिल्ली पुलिस के कॉन्स्टेबल ने कथित रूप से अपनी गाड़ी से उनकी बाइक को टक्कर मार दी। इसके बाद वो कार एक DTC बस से जा टकराई। सलिल त्रिपाठी हवा में उछल गए और फिर एक डिवाइडर के पास नीचे जा गिरे।

उन्हें अस्पताल में ले जाया गया, लेकिन उससे पहले ही उनकी मौत हो चुकी थी। स्थानीय लोगों का कहना है कि कॉन्स्टेबल खराब तरीके से गाड़ी चला रहे थे और काफी रफ़्तार में भी थे। सोशल मीडिया पर डाले गए वीडियोज में घटना के बाद वहाँ लोगों को जमा देखा जा सकता है। वहीं पुलिस कॉन्स्टेबल अपनी यूनिफॉर्म में बैठे हुए हैं। कोरोना की पहली लहर में उनकी नौकरी चली गई थी। वहीं दूसरी लहर में उनके पिता चल बसे थे। ‘होटल मैनेजमेंट’ में स्नातक होने के बावजूद उन्हें बतौर डिलीवरी एग्जीक्यूटिव काम करना पड़ा।

रोहिणी की DCP प्रणव तायल ने बताया कि कॉन्स्टेबल को उसी रात गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्होंने बताया कि पुलिस स्थानीय लोगों के उस दावे की भी पड़ताल कर रही है, जिसमें कॉन्स्टेबल सिंह को शराब के नशे में बताया गया था। परिवार का कहना है कि वो रोज 7-8 घंटे डिलीवरी एग्जीक्यूटिव के रूप में काम कर के प्रति महीने 8-10 हजार रुपए कमा लेते थे, जो ऑर्डर्स और वर्कलोड पर निर्भर था। कोरोना से पहले वो रेस्टारेंट से 40-50 हजार रुपए प्रति महीने तक की आय कमा लेते थे।

उनकी पत्नी सुचित्रा का कहना है कि बेटा लगातार उनसे सवाल पूछ रहा है, अब उसे क्या बताएँ। उन्होंने कहा कि अब परिवार को देखने वाला कोई नहीं है। ऐसी स्थिति में ‘आँखों देखी (2014)’, ‘मसान (2015)’, ‘ढंक (2016)’ और ‘न्यूटन (2017)’ जैसी फ़िल्में बना चुके मनीष मुंद्रा ने सुचित्रा त्रिपाठी के बैंक खाते के बारे में पता लगाया और उन्हें 4 लाख रुपए की मदद की। अगर आप भी पीड़ित परिवार की मदद करना चाहते हैं तो बैंक खाते के विवरण इस प्रकार हैं:

Suchitra Tripathi
Bank of Maharashtra
Bank account : 00000068006999689
IFSCode: MAHB0001342

मनीष मुंद्रा कोरोना की पहली और दूसरी लहर के दौरान भी लोगों की मदद कर के चर्चा में आए थे। ताज़ा मामले पर ऑपइंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “इस पूरे घटनाक्रम को जान कर मुझे दुःख हुआ। मैं पीड़ित परिवार के लिए कुछ करना चाहता था। ये किसी के साथ भी हो सकता है। एक मनुष्य के रूप में हमें ऐसे समय में मदद करनी चाहिए और जितना हो सके, योगदान देना चाहिए। यद्यपि ये ज़रूर है कि हम कितना कुछ भी कर लें, सलिल त्रिपाठी के परिवार को उन्हें लौटा नहीं सकते।”

अयोध्या में रहने वाले सलिल के बड़े भाई मनोज ने बताया कि एक ऐसा समय था जब वो अच्छी कमाई कर रहे थे और न सिर्फ खुद सुविधाजनक ज़िन्दगी जी रहे थे, बल्कि घर पर भी रुपए भेजते थे। लॉकडाउन के बाद सब बदल गया। मनोज पेशे से किसान हैं और उनके परिवार के पास बचत के रूप में कुछ नहीं है। उन्होंने मेरठ के ‘जेपी इंस्टिट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट एंड कैटरिंग टेक्नोलॉजी’ से स्नातक की डिग्री ली थी। 2003 से उन्होंने काम करना शुरू किया और पार्क होटल और सूर्या होटल जैसे प्रतिष्ठानों में काम किया था।

मनीष मुंद्रा की पहल के बाद कई अन्य लोग भी मदद के लिए सामने आए। अभय रावल नाम के एक व्यक्ति ने लिखा, “मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने, अपने बच्चे के लिए इकट्ठा किए थे, पर यह उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।” उन्होंने इसे एक छोटा सा योगदान बताया। आशुतोष पाठक और गौरव सहित कुछ अन्य लोगों ने भी इस खाते में रुपए डाले। लोगों ने झारखंड (तब बिहार) के देवघर में जन्मे 48 वर्षीय मनीष मुंद्रा की प्रशंसा भी की और उन्हें धन्यवाद दिया।

DMK सरकार ने श्री नरसिम्हा अंजनेयर स्वामी मंदिर को ढहाया, विरोध करने वाले 20 भक्तों को लिया हिरासत में: अवैध निर्माण का दिया हवाला

तमिलनाडु सरकार ने सोमवार (10 जनवरी 2022) को चेन्नई में श्री नरसिम्हा अंजनेयर स्वामी मंदिर को ध्वस्त कर दिया। सरकार ने इसके पीछे का कारण वरदराजपुरम में अड्यार नदी के किनारे का अतिक्रमण बताते हुए इसे अवैध मंदिर निर्माण करार देते हुए तोड़ दिया। तांबरम असिसटेंट कमिश्नर के नेतृत्व में पुलिस बल के साथ राजस्व अधिकारियों ने घटनास्थल का दौरा किया और मंदिर को गिराना शुरू कर दिया।

यह कार्रवाई मंदिर ट्रस्ट को तीन बार अतिक्रमण का नोटिस दिए जाने के बाद की गई है। गुस्साए हिंदू भक्तों ने विरोध प्रदर्शन किया और मंदिर के विध्वंस पर आपत्ति भी जताई। रिपोर्टों के अनुसार, सोमवार को विरोध करने और पुलिस के साथ बहस करने वाले लगभग 20 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और उन्हें पास के सामुदायिक हॉल में हिरासत में रखा गया है।

उल्लेखनीय है कि श्री नरसिम्हा अंजनेयर स्वामी का मंदिर पिछले 25 वर्षों से मुदिचुर के पास स्थित था और 55 सेंट भूमि पर बनाया गया था। कुछ साल पहले, राजस्व अधिकारियों ने पाया कि मंदिर का निर्माण अतिक्रमित जलाशय पर किया गया है और मंदिर के प्रतिनिधियों को नोटिस जारी किया। तांबरम में नरसिंह अंजनेयर मंदिर की मूर्तियों को विध्वंस के दौरान ट्रस्टियों को सौंप दिया गया था।

‘तटों पर बने मंदिरों पर अतिक्रमण का दावा नहीं किया जा सकता’- कामचीपुरम मठ

जानकारी के मुताबिक मंदिर 25 साल से है। इसे 2015 में गिरा दिया गया था और उसी स्थान पर फिर से बनाया गया था। इससे पहले जुलाई 2021 के महीने में तमिलनाडु सरकार ने स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत अतिक्रमण हटाने के नाम पर एक तालाब मुथनंकुलम के किनारे 125 साल पुराने मंदिर को गिरा दिया था। कामचीपुरम मठ ने तब बताया था कि अधिकांश हिंदू मंदिर नदी या झीलों के किनारे बनाए गए थे ताकि भक्त मंदिरों में प्रवेश करने से पहले स्नान कर सकें या अपने पैर और हाथ धो सकें, जिन्हें अतिक्रमण के रूप में दावा नहीं किया जा सकता है।

CM सरमा ने निभाया वादा, ओलंपिक में मैडल जीतने वाली लवलीना को DSP का नियुक्ति पत्र: पंजाब में दिव्यांग खिलाड़ी को नौकरी तक नहीं

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा (Himanta Biswa Sarma) बुधवार (12 जनवरी 2021) को टोक्यो ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली मुक्केबाज लवलीना बोरगोहेन (Lovlina Borgohain) को असम पुलिस में डीएसपी (DSP) पद का नियुक्ति पत्र (Appointment Letter) सौंपेंगे। समाचार एजेंसी एएनआई (ANI) ने असम के मुख्यमंत्री कार्यालय (Assam CMO) के हवाले से यह जानकारी दी है।

पिछले साल अगस्त में ओलंपिक में पदक जीतकर देश का नाम रौशन करने वाली लवलीना को सीएम हिमंत ने 10 लाख रुपये नकद के साथ-साथ असम पुलिस में डीएसपी (DSP) का ऑफर दिया था। इसके साथ ही सीएम ने मुक्केबाज के नाम पर सड़क बनवाने और उनके गृह नगर में उनके नाम पर एक स्टेडियम बनाने का भी ऐलान किया था।

लवलीना असम के गोलाघाट स्थित एक छोटे से गाँव की रहने वाली हैं। उनका जीवन काफी संघर्ष भरा रहा है। 23 वर्षीय महिला मुक्केबाज लवलीना को सेमीफाइनल में विश्व चैंपियन तुर्की की बुसेनाज सुरमेनेली के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। इस मुकाबले में पहली बार ओलंपिक खेल रही लवलीना ने पूरा जोर लगाया था, लेकिन भारतीय मुक्केबाज को 0-5 से शिकस्त झेलनी पड़ी और कांस्य पदक से संतोष करना पड़ा था।

बता दें कि लवलीना की दोनों बहनें लीचा और लीमा भी किक बॉक्सर्स हैं। कम संसाधन होने के बावजूद उनके माता-पिता ने तीनों बेटियों को खेल के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। तीनों बेटियों के सपनों को पूरा करने के लिए उनकी माँ स्थानीय को-ऑपरेटिव से लोन लिया करती थीं।

बता दें कि वादा करने के बाद भी पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार ने जालंधर की रहने वाली दिव्यांग शतरंज प्लेयर मलिका हांडा को राज्य सरकार में नौकरी और वित्तीय सहायता देने में आना-कानी कर रही है। इसको लेकर मलिका ने सोशल मीडिया पर रोते हुए एक वीडियो शेयर किया था। इसमें उन्होंने पंजाब सरकार के रवैये को लेकर अपना दर्द लोगों के बीच साझा किया था।

10 साल से शतरंज खेल रहीं मलिका हांडा 7 बार की नेशनल डेफ चेस चैम्पियन मलिका हांडा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में कई पदक जीते हैं, जिनमें विश्व मूक-बधिर शतरंज चैम्पियनशिप में गोल्ड और एशियाई शतरंज चैम्पियनशिप में रजत पदक शामिल हैं।

‘BJP में 10वें नंबर का बल्लेबाज भी ओपनिंग आकर ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करता है’: लाइव डिबेट में CM धामी ने हरीश रावत की बोलती बंद की

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से पहले ‘टाइम्स नाउ’ चैनल पर ओपिनियन पोल पर बहस के दौरान एक ऐसा मौका आया, जब राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत आमने-सामने आए। हरीश रावत राज्य में कॉन्ग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा हैं, वहीं भाजपा ने इस बार पुष्कर सिंह धामी को आगे किया है। इस दौरान उन्होंने कहा कि हमारी पार्टी भाजपा एक ऐसी पार्टी है जहाँ किसी सामान्य कार्यकर्ता को कभी भी कोई भी जिम्मेदारी दी जाती है और वो ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करता है।

सीएम धामी ने खुद का उदाहरण देते हुए कहा कि वो किसी अहंकार में ये सब बातें नहीं बोल रहे हैं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की जनता देख रही है। उन्होंने कहा कि हमने न तो लोगों के ऊपर डम्पर चलाए हैं, न गाड़ियाँ चलाई हैं और न ही भ्रष्टाचार किया है। उन्होंने कहा कि हमने कोई काले कारनामे नहीं किए हैं, बल्कि काम किया है। उन्होंने हरीश रावत से कहा कि इन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी के अलावा कुछ और दिखाई नहीं देता। उन्होंने इसे ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ बताते हुए कहा कि कुर्सी के लिए लड़ाई इतनी ज्यादा है कि ये कुछ भी कर सकते हैं।

सीएम धामी ने हरीश रावत से पूछा कि वो इतने उत्तेजित क्यों हैं, क्या वो सर्वे देख कर घबरा गए हैं? उन्होंने कहा कि हरीश रावत को कई बार मौके दिए गए, इनके पास बहुत बड़ा अनुभव था। सीएम धामी ने कहा कि आपकी नजर में मैं अपरिपक्व हो सकता हूँ। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर देश को पीछे ले जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि पहले अपना घर सुलझा लीजिए, क्योंकि आपकी परिपक्वता लोगों ने देखी है। इस पर रावत ने कहा कि चुनाव हारने से किसी नेता की पहचान नहीं होती।

उन्होंने कहा कि एक सामान्य कार्यकर्ता भी भाजपा में सीएम बन सकता है और 10वें नंबर का बल्लेबाज भी ओपनिंग आकर अच्छी बल्लेबाजी कर सकता है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे हरीश रावत पिछले चुनाव में दोनों सीटों से हार गए थे। एक अन्य कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जिस पार्टी के नेताओं ने CDS जनरल बिपिन रावत को सड़क का गुंडा कहा, वह भी आज सैनिकों की बात कर रही है। उन्होंने कहा कि सेना का अपमान और तुष्टीकरण की राजनीति करना कॉन्ग्रेस का इतिहास रहा है।

जब CM अखिलेश के गाँव में रात भर पिटी पुलिस और सैफई महोत्सव पर उड़ाए गए ₹300 करोड़, कुछ ऐसा था सपा का शासन काल

उत्तर प्रदेश में 10 फरवरी से 7 मार्च के बीच 7 चरणों में विधानसभा चुनाव (Uttar Pradesh Assembly Election 2022) होने जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (UP Chief Minister Yogi Adityanath) एक बार फिर सूबे में कमल खिलाकर इतिहास रचेंगे या सपा प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) की साइकल रेस जीतेगी? इस सवाल का सटीक जवाब तो 10 मार्च को मतगणना के बाद मिलेगा, लेकिन हालिया सर्वेे मुख्यमंत्री योगी को ही वापसी बता रहे हैं।

सी वोटर और एबीपी न्यूज के ताजा ओपिनियन पोल के मुताबिक यूपी में एक बार फिर योगी सरकार बन सकती है। बीजेपी का कमल 223 से 235 सीटों पर खिल सकता है। अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी 2017 के मुकाबले बढ़त हासिल करती दिख रही है, लेकिन सत्ता से दूर दिख रही है। सर्वे के मुताबिक, सपा इस बार 145 से 157 सीटें जीत सकती है।

सत्ता पाने की होड़ में जुटी समाजवादी पार्टी के शासनकाल में अपराधों की स्थिति और कानून-व्यवस्था पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। इस बीच लगभग 7 साल पुरानी एक खबर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। यह खबर बताती है कि आज से तकरीबन 7 साल पहले 2014 में यूपी के सैफई (तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के गाँव) में पुलिस के साथ क्या बर्ताव किया गया था और सरकारी फंड का इस्तेमाल किस तरह से किया जाता था।

सीएम योगी आदित्यनाथ के मीडिया सलाहकार शलभमणि त्रिपाठी ने इस वाकया को ताजा करने के लिए सोशल मीडिया पर दैनिक जागरण की खबर का स्क्रीनशॉट शेयर किया है। उन्होंने याद दिलाया कि नई नहीं, वही सपा है। इस खबर के मुताबिक, सैफई में होने वाले महोत्सव में हंगामा होने पर परिस्थिति थोड़ी विपरीत दिखी। यहाँ ग्रामीणों ने ही पुलिसवालों को पीट दिया था। दरअसल, हंगामा भड़कने पर पुलिसकर्मियों ने परिस्थिति को नियंत्रित करने के लिए थोड़ी सख्ती दिखाई। उन्होंने हंगामा कर रहे लोगों को शांत करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें कहाँ पता था कि अखिलेश की सरकार में जनता पुलिस पर हावी हो जाएगी। उन लोगों ने ही उलटा पुलिस को पीटना शुरू कर दिया। पुलिस ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इसकी शिकायत की, लेकिन मुख्यमंत्री का गाँव होने की वजह से उनके हाथ भी बँधे थे।

जानकारी के मुताबिक, तत्कालीन सरकार ने इस महोत्सव पर 300 करोड़ रुपए फूँक दिए। खूब नाच-गाने हुए। सभी सरकारी अधिकारियों ने इसका लुत्फ उठाया। बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान और अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को भी प्रोग्राम में शिरकत करने के लिए बुलाया गया था। 

मालूम हो कि सितंबर 2013 में मुजफ्फरनगर में दंगे हुए थे और उसी साल दिसंबर में सैफई में खूब नाच-गाने हुए थे। मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों को लेकर सरकार पर सवाल उठे तो भीषण ठंड के बाद भी शिविर उजाड़ दिए गए और दूसरी ओर सरकार के ‘घर’ सैफई में महोत्सव के बहाने हुए जश्न के नाम पर सैकड़ों करोड़ बहा दिए गए। पीड़ितों के आँसू पोंछने के लिए अगर सरकार महोत्सव का खर्च बचा लेती तो उसके आधे में ही हर एक दंगा पीड़ित को छत नसीब हो जाती। वहीं, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह का कहना था कि अखिलेश ने जितना खर्च सैफई महोत्सव और विदेश यात्रा में किया, उतने में यूपी की योगी सरकार ने दो मेडिकल कॉलेज बना दिए।

दंगा पीड़ितों का नाम लेकर विपक्ष ने मुलायम और अखिलेश को टारगेट किया और मीडिया ने भी सवाल पूछे। सवालों के जवाब में मुलायम सिंह ने जो कहा था वो जख्मों पर सिर्फ नमक नहीं, मिर्च मिलाकर छिड़कने जैसा ही था। तब मुलायम सिंह ने कहा था, “शिविरों में एक भी दंगा पीड़ित नहीं है, सब लोग लौट चुके हैं। अब जो बचे हैं वे कॉन्ग्रेस और बीजेपी के लोग हैं, जो सरकार की छवि खराब करना चाहते हैं।”

दरअसल दंगों के बाद पीड़ितों के लिए कुछ ही दूरी पर कैंप लगाए गए थे और भारी ठंड के चलते वहाँ रह रहे लोगों का बुरा हाल था। लोगों की हालत को लेकर वही सवाल जब यूपी के तत्कालीन मुख्य सचिव के सामने उठा तो उन्होंने भी समाजवादी राग ही सुना दिए, बस शब्द अलग थे। तत्कालीन मुख्य सचिव ने कहा था, “ठंड से कोई नहीं मरता। ठंड से निमोनिया हो सकता है और कोई निमोनिया से मर सकता है, लेकिन ठंड से कोई नहीं मरता। अगर लोग ठंड से मरते तो साइबेरिया में कोई जिंदा नहीं रहता।”

अखिलेश के सत्ता में आने के कुछ ही दिनों बाद मुजफ्फरनगर दंगे ने एक बदनुमा दाग लगा दिया था। प्रतापगढ़ में सीओ जियाउल हक की हत्या की घटना हो या फिर मथुरा का जवाहर बाग कांड… इनसे अखिलेश की सरकार कठघरे में ही रही।