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‘मुस्लिमों ने अभी तक PM मोदी और अमित शाह की हत्या क्यों नहीं की’: जिस कॉन्ग्रेस नेता ने कहा, उसे CM की मौजूदगी में अवॉर्ड

कॉन्ग्रेस नेता और तमिल वक्ता नेल्लई कन्नन को 2021 के कामराजर कथिर पुरस्कार (Kamarajar Kathir Award) से नवाजा गया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की उपस्थिति में चेन्नई में आयोजित एक कार्यक्रम में शुक्रवार (24 दिसंबर, 2021) को यह अवॉर्ड प्रदान किया गया। कन्नन वही कॉन्ग्रेस नेता हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की हत्या के लिए मुस्लिमों को उकसाया था। इसके बाद जनवरी 2020 में उन्हें तमिलनाडु पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था।

कन्नन के इस बयान का वीडियो पिछले साल वायरल हुआ था। वे कट्टरपंथी इस्लामी संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) की रैली को तिरुनेलवेली में संबोधित कर रहे थे। यह रैली नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के विरोध में बुलाई गई थी। कन्नन ने कहा था, “मुस्लिमों ने अभी तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को क्यों नहीं मारा? अगर उनकी (अमित शाह की) कहानी खत्म हो जाती है तो पीएम की कहानी भी खत्म हो जाएगी। मैं कुछ होने की उम्मीद कर रहा था, लेकिन कोई मुस्लिम ऐसा नहीं कर रहा है।”

कॉन्ग्रेस नेता का यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ। इस विवादित टिप्पणी को वहाँ पर जमा हुए मुस्लिम लोगों ने काफी सराहा भी था। लेकिन व्यापक तौर पर उनकी इस भड़काऊ टिप्पणी की निंदा की गई थी। भारतीय जनता पार्टी के तमिलनाडु प्रदेश महासचिव के एस नरेंद्रन ने कन्नन के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी। जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर सेलम सेंट्रल जेल में भेज दिया गया था। हालाँकि एक हफ्ते के भीतर ही उन्हें जमानत भी मिल गई थी।

उल्लेखनीय है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय में कन्नन तमिलनाडु कॉन्ग्रेस के एक प्रमुख नेता थे। 2006 में वे कुछ समय के लिए अन्नाद्रमुक में शामिल हो गए थे और उन्होंने राज्य भर में पार्टी के लिए प्रचार भी किया था। लेकिन एक साल बाद वह फिर कॉन्ग्रेस में लौट आए।

महिलाओं ने एक-दूसरे को काटा, एक के टूटे दाँत: मालकिनों की ‘डॉग फाइट’ देखते रहे कुत्ते

जर्मनी से एक अजीबो गरीब मामला सामने आया है। पूर्वी जर्मन राज्य थुरिंगिया में पालतू कुत्तों को लेकर हुई लड़ाई में कुत्तों के मालकिनों ने एक-दूसरे को ही काट लिया। यह मामला जब थाने पहुँचा, तो पुलिस भी हैरान हो गई।

पुलिस ने बताया ​कि कुत्तों को को ट्रेनिंग देने को लेकर दो कुत्तों के मालिक आपस में भिड़ गए। लड़ाई के दौरान जब कुत्ते के मालिक एक-दूसरे को काट रहे थे, तब उनके पालतू जानवर उन्हें टकटकी लगाकर देख रहे थे।

पुलिस के मुताबिक, यह झगड़ा तब शुरू हुआ, जब 27 वर्षीय महिला ने एक 51 वर्षीय महिला को अपने कुत्ते को मारते हुए देखा। वह यह देखकर आगबबूला हो गई और उम्रदराज महिला से अपने कुत्ते को मारने की वजह पूछने लगी, जिसको लेकर दोनों आपस में भिड़ गईं। देखते ही देखते विवाद इतना बढ़ गया कि मारपीट की नौबत आ गई।

मारपीट के वक्त वृद्ध महिला जमीन पर गिर गई और दूसरी महिला के काटने के कारण दाँत टूट गए। जर्मन पुलिस ने कहा, “कुत्ते केवल दोनों महिलाओं की लड़ाई देख रहे थे, उन्होंने ना तो उन्हें काटा और ना ही अपने मालिकों को बचाने का प्रयास किया।” बता दें कि दोनों महिलाओं को हाथापाई करने और एक-दूसरे को काटने के आरोप में अदालत में पेश होने को कहा गया है।

‘हम मृत्यु से नहीं डरते, कभी नहीं छोड़ेंगे अपना धर्म’: साहिबजादों के साथ वजीर खान की क्रूरता, चल बसी थीं माता गुजरी देवी भी

सिखों के अंतिम गुरु गोविंद सिंह और उनके चार सहिजबजादों के बलिदान का राष्ट्र आज भी ऋणी है। उनके बेटों फतेह सिंह और जोरावर सिंह को मुग़ल फ़ौज के सेनापति वजीर खान ने दीवार में ज़िंदा चुनवा दिया था। इस बलिदान को याद करते हुए हम हर वर्ष 27 दिसंबर को ‘साहिबजादा दिवस’ मनाते हैं। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने हर विद्यालयों में इस दिन कार्यक्रम कर के बच्चों को इस इतिहास के बारे में बताने का प्रण लिया है। सीएम योगी खुद इस अवसर पर आयोजित सिख कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं।

गुरु गोविंद सिंह के पीछे हाथ धो कर पड़ा था मुग़ल सूबेदार वजीर खान

यहाँ हम आपको माता गुजरी देवी और चार साहिबजादों का के बारे में बताएँगे, लेकिन उससे पहले ‘खालसा पंथ’ की स्थापना करने वाले गुरु गोविंद सिंह का संक्षिप्त परिचय। सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने सिर्फ एक संत एवं दार्शनिक, बल्कि एक कुशल योद्धा भी थे जिन्होंने क्रूर मुग़ल बादशाह औरंगजेब के विरुद्ध कई युद्ध लड़े। उनके पिता गुरु तेग बहादुर की औरंगजेब ने ही हत्या करवाई थी। इस कारण मात्र 9 वर्ष की उम्र में गोविंद सिंह को गुरु की पदवी संभालनी पड़ी।

औरंगजेब ने उनके पीछे वजीर खान को लगाया था। उसे सरहिंद का सूबेदार बना कर भेजा गया था और सिखों का दमन करने के लिए खुली छूट दी गई थी। गुरु गोविंद सिंह को उसके साथ कई युद्ध लड़ने पड़े। सतलुज से लेकर यमुना नदी के बीच के पूरे क्षेत्र पर वजीर खान का ही शासन चलता था। उसने गुरु गोविंद सिंह के 5 और 8 वर्षीय बेटों साहिबजादा फ़तेह सिंह और साहिबजादा जोरावर सिंह को उसने ज़िंदा पकड़ लिया था। इस्लाम न अपनाने पर उसने दोनों को ही दीवार में ज़िंदा चुनवा दिया था।

ये भी एक संयोग ही है कि वजीर खान का संहार करने वाले सिख योद्धा का नाम भी फ़तेह सिंह ही था, जो बन्दा सिंह बहादुर की सेना में थे। उन्होंने वजीर खान का सिर धड़ से अलग कर दिया था। इसे ‘चप्पर-चिड़ी’ के युद्ध के रूप में जाना जाता है। मई 1710 में सिखों ने वजीर खान को उसके किए की सज़ा दी थी। गुरु गोविंद सिंह ने सन् 1688 में भंगानी के युद्ध से लेकर 1705 ईस्वी में मुक्तसर के युद्ध तक दर्जनों युद्ध लड़े। उन्होंने अपने परिवार का बलिदान दे दिया लेकिन मुगलों के सामने झुके नहीं।

गुरु गोविंद सिंह की सिख सेना की लड़ाई मुगलों के साथ-साथ पहाड़ी राजाओं के साथ भी थी। चमकौर के युद्ध में सिख सेना का काफी नुक़सान हुआ था, लेकिन मुगलों पर वो भारी पड़े थे। बौखलाए औरंगजेब ने वजीर खान और जबरदस्त खान के नेतृत्व में एक विशाल फ़ौज को सिखों को कुचलने के लिए भेजा। सरहिंद, लाहौर और जम्मू के सूबेदारों के अलावा लगभग दो दर्जन पहाड़ी राजाओं के साथ गठबंधन कर के औरंगजेब ने एक बड़ी फ़ौज तैयार की और गुरु गोविंद सिंह को पकड़ने के लिए आनंदपुर साहिब भेजा।

कुरान की कसम खा कर भी पलट गए मुग़ल, गुरु पर किया हमला

गुरु गोविंद सिंह भी इस युद्ध के लिए तैयार थे और संख्या में कम होने के बावजूद खालसा सेना ने मुगलों के दाँत खट्टे कर दिए। शुरुआती झड़पों में मुगलों को अपनी पराजय स्पष्ट दिख रही थी। इसके बाद मुग़ल फ़ौज ने आनंदपुर साहिब को चारों ओर से घेर कर रसद-पानी की किल्लत पैदा कर दी। बाहर से क्षेत्र का सम्बन्ध टूटने के कारण भोजन-पानी का अभाव हो गया। मुगलों ने इस दौरान संधि का प्रस्ताव दिया और कहा कि अगर गुरु गोविंद सिंह दुर्ग छोड़ देते हैं तो उन्हें और उनके परिवार को सुरक्षित निकलने के लिए रास्ता दिया जाएगा।

इसके लिए मुग़ल सूबेदारों ने कुरान तक की कसम खाई। हालाँकि, उनमें कुछ सिख सैनिक ऐसे भी थे जो दुर्ग छोड़ कर चले गए लेकिन गुरु गोविंद सिंह ने पहले ही शर्त रख दी थी अगर वो ऐसा करते हैं तो गुरु-शिष्य का रिश्ता नहीं रहेगा। लगभग आठ महीने के समय तक आनंदपुर साहिब को मुगलों ने घेरे रखा। अंत में सिख सेना ने गुरु गोविंद सिंह, उनकी माँ गुजरी देवी और चारों साहिबजादों (अजीत सिंह, जुझार सिंह, जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह) के साथ दुर्ग छोड़ने की योजना बनाई।

वो 21 दिसंबर, 1704 की रात थी। यही वो दिन था, जब मुगलों ने कुरान की सौगंध को धता बताते हुए खालसा सेना पर आक्रमण कर दिया। स्थान था सरसा नदी का तट। मौसम था ठंड और बारिश का। ऐसे कठिन समय में भी अजीत सिंह (19) और जुझार सिंह (14) को लेकर गुरु गोविंद सिंह किसी तरह चमकौर की गढ़ी तक पहुँचने में कामयाब रहे, लेकिन परिवार के बाकी लोग उनसे बिछुड़ गए। जोरावर सिंह और फ़तेह सिंह के साथ उनकी दादी थीं, माँ गुजरी देवी।

गुरु गोविंद सिंह का एक पुराना रसोइया था, जिसके गाँव में जाकर इन तीनों ने शरण ली। लेकिन, उसने विश्वासघात किया और दोनों बच्चों को वजीर खान को सौंप दिया। क्रूर वजीर खान ने इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया। उसने दोनों साहिबजादों के समक्ष शर्त रखी कि वो इस्लाम अपना लें, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया। वजीर खान ने उन दोनों को ज़िंदा दीवार में चुनवाने का आदेश दिया। दोनों छोटे बच्चों ने कहा कि वो अपना धर्म कभी नहीं छोड़ सकते।

इस दौरान उन्होंने अपने दादा गुरु तेग बहादुर के बलिदान को भी याद किया और कहा कि हम गुरु गोविंद सिंह के पुत्र हैं, जो अपना धर्म कभी नहीं छोड़ सकते। असल में पहले वजीर खान ने इन दोनों बच्चों को दीवार में चुनवाने के लिए मलेरकोटला के नवाब को सौंपना चाहा, जिसका भाई सिखों के साथ युद्ध में मारा गया था। लेकिन, उसने ऐसा करने से इनकार करते हुए कहा कि उस युद्ध में इन दोनों बालकों का क्या दोष? वजीर खान को लगा था कि वो बदले की आग में जल रहा होगा।

दोनों साहिबजादों में जोरावर सिंह बड़े थे। जब दीवार ऊपर उठने लगी तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। इस पर छोटे भाई ने पूछा कि क्या वो बलिदान देने से डर गए, इसीलिए रो रहे हैं? जोरावर सिंह ने जवाब दिया कि ऐसी बात नहीं हैं। वो तो ये सोच कर दुःखी हैं कि छोटा होने के कारण फ़तेह सिंह की दीवार में पहले समा जाएँगे और उनकी मृत्यु पहले हो जाएगी। उन्होंने कहा कि दुःख यही है कि मेरे से पहले बलिदान होने का अवसर तुम्हें मिल रहा है। उन्होंने कहा कि मैं मौत से नहीं डरता, वो मुझसे डरती है।

जानिए और क्या हुआ था आनंदपुर साहिब के युद्ध में, जिसके बाद हुआ चार साहिबजादों का बलिदान

किसी युद्ध में बच्चों के साथ इस तरह की अमानवीयता का उदाहरण पहले शायद ही कहीं मिलता है। फिर चमकौर की गढ़ी में भी युद्ध हुआ, जिसमें वीरता का प्रदर्शन करते हुए गुरु गोविंद सिंह के बाकी दोनों बेटों अजीत सिंह और जुझार सिंह का भी निधन हो गया। एक और बात जानने लायक है कि जिन 40 सिखों ने आनंदपुर साहिब छोड़ा था, बाद में उन्होंने सिखों को गुरु के पीछे संगठित करने में बड़ी भूमिका निभाई और अपने प्राण देकर प्रायश्चित किया।

यही युद्ध वो समय था, जब औरंगजेब ने गुरु गोविंद सिंह में दिलचस्पी ली और युद्ध के मैदान में सिखों के लाभकारी स्थिति में होने की बात कही। उसने गुरु गोविंद सिंह के व्यक्तित्व से लेकर उनके युद्ध कौशल के बारे में भी जानकारियाँ जुटाई। मुग़ल सैनिकों ने जब गुरु की प्रशंसा की तो औरंगजेब ने उन्हें अपने समक्ष पेश किए जाने का आदेश दे डाला। युद्ध में जब दूर-दूर से सिख पहुँचे तो वो खुश थे और एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे कि उन्हें गुरु और धर्म के लिए मृत्यु के वरण का मौका मिल रहा है।

ये सही बात थी कि आनंदपुर साहिब ऊँची जगह पर था और सिख सेना को मुगलों की गतिविधियों का पता चल रहा था, लेकिन वो खुले में भी थे और युद्ध के दौरान गड्ढे में भी गिर रहे थे। गुरु गोविंद सिंह ने मुगलों की तरफ तोप से वार का आदेश दिया, जिसके बाद मुग़ल फ़ौज उन हथियारों को जब्त करने के लिए आगे बढ़ीं। लेकिन, सिखों की गरजती बंदूकों ने उन्हें रोक दिया। फिर तीरों की बौछाड़ हुई और मुगलों के घोड़े और फौजी एक-दूसरे के ऊपर ही गिरने लगे।

मुगलों को लगता था कि किले में होने के कारण सिखों को फायदा है। सिखों की दो बड़ी तोपें गरजी और मुग़ल फ़ौज सहित पहाड़ी राजा भी भाग खड़े हुए। उस दिन सिखों की जीत हुई। यही वो दिन था, जब बौखलाए मुगलों ने आनंदपुर साहिब आने-जाने के रास्तों को बंद करने का फैसला लिया। गुरु गोविंद सिंह की माँ भी सैनिकों की हालत देखते हुए किले को छोड़ने के पक्ष में थीं। कहते हैं, अपने दोनों पोतों की मृत्यु की खबर सुनते ही उन्हें ऐसा सदमा लगा था कि उनका भी निधन हो गया था।

यही कारण है कि दिसंबर महीने का सिख पंथ में एक अलग स्थान है। चमकौर के युद्ध में तो अंतिम सिख सैनिक भी बलिदान हो गया था लेकिन लड़ता रहा था। इस तरह गुरु गोविंद सिंह के चारों बेटों और माँ का बलिदान हुआ, लेकिन सिख सेना ने उन्हें किसी तरह बचाए रखा। इसके बाद ही वजीर खान को अपनी क्रूरता के कारण डर का एहसास होने लगा था। क्या आपको पता है कि वजीर खान ने दोनों साहिबजादों को उतने ठंड में भी एक ठंडी जगह पर रखा हुआ था।

ये चार साहिबजादों का बलिदान ही था कि आगे के सिखों में वीरता और बहादुरी कई गुनी हो गई और उनका साहस आसमान छूने लगा। बाबा बंदा सिंह बहादुर महाराष्ट्र के नांदेड़ से से पंजाब आए, ताकि वो इस क्रूर नरसंहार का बदला ले सकें। सरहिंद में मुगलों को सज़ा दी गई, वजीर खान मारा गया और इलाका सिखों के कब्जे में आ गया। इसी बलिदान का परिणाम था कि आगे चल कर महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में एक बड़े सिख साम्राज्य का उदय हुआ था।

मंदिर के पास समुदाय विशेष को शराब पीने से रोका तो RSS कार्यालय पर हमला: भारत माता की तस्वीर फाड़ी, आगरा में 10 अरेस्ट

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के आगरा (Agra) में समुदाय विशेष के लोगों ने शराब पीकर हंगामा करने पर टोकने के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के स्वयंसेवकों के साथ मारपीट की, जिसमें 6 लोग घायल हो गए हैं। इन में लोगों को गंभीर चोटें लगी हैं। घटना के बाद संघ और उससे जुड़े संगठनों के लोगों ने थाने का घेराव करते हुए अज्ञात लोगों के खिलाफ तहरीर दी है।

मामला आगरा के थाना लोहामंडी में आलमगंज चौकी के अंतर्गत संघ कार्यालय का है। भाजपा नेताओं अनुसार, कार्यालय के सामने ही राधा कृष्ण का मंदिर भी है। इसी मंदिर के सामने समुदाय विशेष के लोग जुटकर शराब पीते थे और हंगामा करते थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मंदिर के सामने शराब और मांस का सेवन करते हुए देखकर संघ के कार्यकर्ताओं ने उन्हें टोका। इस पर बदमाश वापस लौट गए और 50-70 लोगों के साथ लौटकर हमला कर दिया। इस दौरान भीड़ ने जमकर पथराव भी किया।

इतना ही नहीं, उपद्रवियों ने कार्यालय में रखी भारत माता की तस्वीर को भी तोड़ दिया। इस दौरान भीड़ कार्यालय में तोड़-फोड़ करती रही। भीड़ के हमले में वहाँ मौजूद विकास गुप्ता और शिवम कुमार गंभीर रूप से घायल हो गए। मामले की जानकारी मिलते ही विधायक सहित तमाम भाजपा नेता पहुँचकर थाने का घेराव किया।

उधर, आगरा दक्षिण के विधायक योगेंद्र उपाध्याय का आरोप है कि कार्यकर्ताओं को उपद्रवी उठाकर ले गए और उनके साथ मारपीट की। आरोप है कि कार्यकर्ताओं को जान मारने की धमकी भी दी गई। हालात की गंभीरता को देखते हुए एसएसपी सुधीर कुमार सिंह घटनास्थल पर पहुँचे और आरोपियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का भरोसा दिया। इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ तहरीर दी गयी है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एसएसपी ने बताया कि आरएसएस कार्यकर्ताओं पर हमला मामले में 40-50 अज्ञात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। आरोपियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत कार्रवाई की जाएगी। एसएसपी ने बताया कि इस मामले में 10 लोगों की गिरफ्तारी की गई है।

उपाध्याय ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पुलिस को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया गया है। अगर 24 घंटे के अंदर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तो इसका खामियाजा पुलिस अधिकारियों को भुगतना पड़ेगा। हालात को देखते हुए बाकी आरोपियों की खोजबीन के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है।

शिव तांडव स्त्रोत’ वाले video से चर्चा में आए संत कालीचरण पर छत्तीसगढ़ में FIR: ‘धर्म संसद’ में आपत्तिजनक टिप्पणी का आरोप

छत्तीसगढ़ में संत कालीचरण महाराज के विरुद्द केस दर्ज किया गया है। आरोप है कि उन्होंने महात्मा गाँधी को लेकर एक धर्म संसद में अपमानजनक बातें कहीं। ये धर्म संसद 26 दिसंबर 2021 को रायपुर के रावण भाटा मैदान में आयोजित की गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने मोहनदास करमचंद गाँधी का नाम लेकर उनकी हत्या का जायज ठहराया। साथ ही गोडसे को नमन किया। कथिततौर पर उन्होंने मंच से कॉन्ग्रेस नेताओं की आलोचना करते हुए हिंदू नेता चुनने की बात भी श्रोताओं से कही। इसके अलावा उन्होंने इस्लाम को लेकर कहा कि इस्लाम का मकसद  राजनीति के जरिए देश पर कब्जा करने का है।

इस धर्मसंसद की वीडियो वायरल होने के बाद संत कालीचरण के खिलाफ छत्तीसगढ़ में ही टिकरापारा क्षेत्र में धारा 505(2), 294 IPC के तहत मामला दर्ज किया जा चुका है। ये शिकायत रायपुर के पूर्व महापौर और वर्तमान सभापति प्रमोद दुबे ने कराई है।

बता दें कि महात्मा गाँधी पर टिप्पणी करने के बाद संत कालीचरण के ख़िलाफ़़ कड़ी कार्रवाई की माँग की जा रही है। कई नेता उनके विरोध में ट्वीट कर रहे हैं। राहुल गाँधी ने भी आज महात्मा गाँधी का एक कोट शेयर किया है। आम आदमी पार्टी राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने भी वीडियो देख पीएम मोदी पर निशाना साधा है। उन्होंने पूछा है ये कि कौन है जो राष्ट्रपिता को गाली दे रहा है? मोदी जी इस पर कुछ बोलेंगे या दिल से माफ नहीं कर पाएँगे।

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष जुलाई माह के आसपास ही कालीचरण द्वारा गाया गया शिव तांडव स्त्रोत वायरल हुआ था। उस समय जगह-जगह उनकी वीडियो शेयर करके उनकी काफी सराहना हुई थी। बाद में उनकी आवाज में कई स्त्रोतों का पाठ किया गया। हालाँकि, अब एक साल बाद गाँधी पर टिप्पणी करने के कारण उनपर केस हो रहे हैं। कथिततौर पर उसी मंच पर महंत राम सुंदर ने भी उनका विरोध किया और ताली बजाने वालों से सवाल किया क्या गाँधी ‘गद्दार थे?’ हर$#^ थे? इन टिप्पणियों को सुनने के बाद महंत राम सुंदर ने खुद को इस धर्म संसद से अलग भी कर लिया, जिसके चलते उनकी काफी तारीफें हो रही हैं।

मोहम्मद अब्दुला ने कराया मुंडन, स्नान कर जनेऊ पहना; फिर से बने उमेश राय: बिहार में 15 साल बाद घर वापसी

बिहार के समस्तीपुर के मोहम्मद अब्दुल्ला फिर से उमेश राय बन गए हैं। 15 वर्ष बाद उन्होंने ‘घर वापसी’ (Ghar Wapsi) की है। एक व्यक्ति के संपर्क में आकर इस्लाम कबूलने वाले उमेश राय को बाद में एहसास हुआ कि मुस्लिम समुुदाय के लोग उसे अपना नहीं मानते। इसके बाद उन्होंने फिर से हिंदू धर्म में लौटने का फैसला किया।

बताया जा रहा है कि अब्दुल्ला का गाँव के ही मोहम्मद रियाज से विवाद चल रहा था। इसको लेकर बुलाई गई पंचायत में आरोपित की जगह खुद को दोषी ठहराने और अपने खिलाफ फैसला आने से वे आहत थे। इसके चलते उन्होंने वापस हिंदू धर्म अपनाने का निर्णय लिया। मामला समस्तीपुर के ताजपुर थाना क्षेत्र के भैरव खरा गाँव की है।

शनिवार (25 दिसंबर 2021) को गाँव के काली मंदिर में घर वापसी कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसमें मुख्य भूमिका हिंदू पुत्र संगठन की रही। सबसे पहले मोहम्मद अब्दुल्ला ने मुंडन करवाया। इसके बाद स्नान कर हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार पाग और जनेऊ देकर उनकी घर वापसी करवाई गई। जानकारी के मुताबिक मोहम्मद अब्दुल्ला से उमेश बने व्यक्ति के साथ उसके पड़ोस में रहने वाले मोहम्मद रियाज ने मारपीट की थी और उसकी हत्या का प्रयास किया था। इसको लेकर गाँव में मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों के द्वारा पंचायत की गई थी। पंचायत ने आरोपित की बजाए धर्म परिवर्तन करने वाले मोहम्मद अब्दुल्ला (अब उमेश) को दोषी ठहराते हुए उसके खिलाफ फैसला दिया। पंचायत के फैसले से आहत होकर उसने धर्म बदलने का फैसला लिया। उन्होंने 15 साल बाद फिर वापस हिंदू धर्म स्वीकार किया और अब्दुल्ला से उमेश बन गए।

उमेश ने इस बारे में बताते हुए कहा, “सभी लोगों ने एक साथ मन बना लिया था कि मेरे साथ हुई घटना को छुपा लेना है और इसका मर्डर कर देना है। इसलिए हम वहाँ से भाग निकले। वहाँ किसी ने हमको सहारा नहीं दिया और जिसने गलती की, उसके साथ ही सब चले गए। दो दिन दूसरे के यहाँ सोया। मेरी पत्नी ने भी मेरी बात नहीं मानी। जिसके साथ हमने 15 साल गुजारे हैं उसने ही बात छुपा ली। इसलिए हम वहाँ से भाग आए। मेरी जान को खतरा है। मैं अपने मन से घर वापस आया हूँ। प्रशासन मुझे सुरक्षा प्रदान करें।” बीजेपी के स्थानीय विधायक वीरेंद्र कुमार ने उनकी घर वापसी का स्वागत करते हुए कहा कि वे अपने सनातन धर्म में लौट आए हैं।

सलमान खान ने बताया- 3 बार सांप ने डसा, शूटिंग के दौरान सिंगर के मुँह पर सांप काटने का भी Video वायरल

सांप के काटने के कारण अस्पताल में भर्ती हुए बॉलीवुड स्टार सलमान खान की तबीयत अब बिलकुल ठीक है। ये जानकारी खुद उन्होंने अपने फैन्स को मीडिया के जरिए दी। जन्मदिन का सेलीब्रेशन करने के लिए अपने फार्म हाउस पहुँचे सलमान को एक सांप ने शनिवार-रविवार की रात काट लिया था जिसके कारण उन्हें अस्पताल में 6 घंटे भर्ती होना पड़ा। हालाँकि, अब वो बिलकुल ठीक हैं। 

मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “एक कमरे में सांप घुस गया था तो बच्चे डर गए, मैं वहाँ चला गया। मैंने लकड़ी माँगी तो छोटी लकड़ी मिली, फिर मैंने बड़ी लकड़ी माँगी और उसके बाद सांप को उठाकर बाहर ले गया। इस दौरान सांप ने लकड़ी से लिपटना शुरू कर दिया और हाथ पर चढ़ने लगा। मैंने सांप को ऊपर से पकड़ा कि तभी आसपास के लोग चिल्लाने लगे। इसके बाद उसने मुझे तीन बार डसा। फिर मैंने सांप को छोड़ दिया और अस्पताल गए। वहाँ पता चला कि वह कंधारी/क्रेट सांप तो है, मगर अलग ढंग का है। अस्पताल में मुझे एंटी वेनम डोज लगी। अब मैं ठीक हूँ।”

अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद अब सलमान खान अपने फार्म हाउस पर आराम कर रहे हैं। वे यहाँ अपना 56वाँ बर्थडे मनाने आए थे। उनका कहना है कि सांप के काटने के बाद इस तरह से मुस्कुराना बहुत कठिन काम है। सलीम खान ने भी सलमान की सेहत पर बताया कि वो बिलकुल ठीक हैं। चिंता करने की कोई बात नहीं है। वो जहरीला सांप नहीं था। उसके जैसे जीवों का जंगलों में मिलना आम है। डॉक्टर ने कुछ दवाइयाँ बताई हैं। सलमान अब बिलकुल ठीक है।

सिंगर को सांप ने मुँह पर काटा

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ सलमान खान को सांप ने तब काटा जब वो उसे घर से बाहर कर रहे थे। वहीं मेटा नाम की एक गायिका हैं जिन्होंने सांप को छाती पर बैठा कर खुद मुसीबत मोल ले ली।

वीडियो से लिए गए स्क्रीनशॉट

खबर के अनुसार ये महिला सिंगर सांप को छाती पर लिटाकर एक म्यूजिक वीडियो शूट कर रहीं थीं। तभी काले सांप ने इनके मुँह पर डस लिया। ये जहरीला नहीं था। इस पूरे वाकये की वीडियो उन्होंने अपने ट्वीट पर शेयर की है। इस वीडियो को एक हफ्ते से भी कम समय में 4.4 लाख व्यूज मिल गए हैं। लोग बड़ी तादाद में इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

पहले खाने के लिए भीख माँगी, फिर जहर खाकर दी जान: 2 साल से शिवसेना शासन वाले BMC से नहीं मिली थी सैलरी

रमेश परमार की उम्र 25 साल थी। वह शिवसेना शासित बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) का सफाई कर्मचारी था। उसने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। वजह, उसे दो साल से सैलरी नहीं मिली थी। परिजनों के अनुसार इसके कारण वह कर्ज में डूबा था। ज्यादातर रात भूखे सो जाता था। आत्महत्या का मामला गरमाने के बाद बीएमसी ने रमेश के भाई को नौकरी और 1 लाख रुपए का मुआवजा दिया है।

मिड-डे की रमेश के चाचा पितांबर परमार ने बताया, “रमेश का एक छोटा भाई है, जो मानसिक रूप से विक्षिप्त है। पूरे परिवार की जिम्मेदारी उस पर ही थी। उसे पिछले दो साल से वेतन का भुगतान नहीं किया गया था। ज्यादातर वह रात को बिना कुछ खाए ही सो जाता था। उसने खाने के लिए भीख माँगी। रमेश पर कर्ज भी था और उसकी तबीयत खराब थी। अधिकारियों ने उसे बताया कि उसकी सर्विस फाइल कहीं फँस गई थी। गुरुवार (23 दिसंबर 2021) को वार्ड कार्यालय में ही उसने जहर खा लिया। हमने शुक्रवार सुबह उसका अंतिम संस्कार किया। हम उसकी मौत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग करते हैं।” 

BJP कॉरपोरेटर ने की 50 लाख मुआवजे की माँग

BJP कॉरपोरेटर विनोद मिश्रा ने इस आत्महत्या पर सवाल उठाते हुए बीएमसी अधिकारियों के खिलाफ FIR और मृतक के परिवार के लिए 50 लाख के मुआवजे की माँग की। स्थायी समिति ने शुक्रवार को मृतक सफाईकर्मी के भाई को नौकरी देने की मँजूरी दे दी। इसके बाद बीजेपी कॉरपोरेटर ने कहा, “बीएमसी ने रमेश के भाई को नौकरी दे दी। लेकिन इससे बीएमसी रमेश की मौत की जिम्मेदारी से नहीं बच सकता है।”

रमेश दो साल से अपने वेतन के भुगतान का इंतजार कर रहा था। जब उसको कोई वेतन की कोई उम्मीद नहीं दिखी तो उसने निराश होकर मौत को गले लगा लिया। रमेश के पिता भी बीएमसी में सफाई कर्मचारी थे। 2019 में पिता की मृत्यु के बाद उसे नौकरी दी गई थी। जब भी वह वेतन के लिए वरिष्ठ अधिकारियों के पास जाता था तो उससे यही कहा जाता था कि उसकी सर्विस फाइल नहीं मिली है।

बताया जाता है कि रमेश 20 दिसंबर को एक अधिकारी के पास अपनी फाइल लेकर पहुँचा और कहा कि 2 साल से उसके वेतन का भुगतान नहीं किया जा रहा है। अधिकारी ने उसकी कोई मदद न कर उसे सफाई में गड़बड़ी के लिए फटकार लगाई। इसके बाद उसने उम्मीद खो दी और सुसाइड कर लिया।

BMC ने 3 अधिकारियों को किया निलंबित

फिलहाल बीएमसी के शुरुआती जाँच में पता चला है कि अधिकारियों की ओर से लापरवाही की गई थी, जिसके बाद SWM विभाग के पी साउथ वार्ड से प्रशासनिक अधिकारी अनीता नाइक, मुख्य लेखपाल समीरा मांजरेकर और लेखपाल पंकज खिलारे को निलंबित कर दिया गया है। BMC का कहना है कि उन्होंने लापरवाही के लिए 3 अधिकारियों को निलंबित किया है। रमेश के परिवार को सहायता के रूप में उसके भाई को 1 लाख रुपए दिए हैं। अधिमान्य उपचार अधिनियम के तहत भाई को रोजगार दिया जाएगा। इसके साथ ही उन्होंने रमेश के बकाया वेतन भी जल्द देने की बात कही है। इसका भुगतान उसके भाई को किया जाएगा।

‘महारानी को मारूँगा, लूँगा जलियाँवाला बाग का बदला’: क्वीन एलिजाबेथ के महल में आरी-कमान के साथ पकड़ा गया युवक, वीडियो भी आई सामने

ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय के महल में क्रिसमस के बाद एक अजीब घटना घटी। बताया जा रहा है कि वहाँ एक युवक को महारानी के महल ‘विंडसर कैसल’ में हथियार लेकर घुसते देखा गया। बाद में इस युवक की गिरफ्तारी तो हो गई लेकिन इसके पास से मिले हथियार ने सबको सकते में ला दिया। 

दरअसल, छानबीन के दौरान एक वीडियो सामने आई जिसमें एक युवक भी आड़ी कमान लेकर महारानी को अमृतसर नरसंहार (जलियाँवाला बाग नरसंहार) के लिए मारने की धमकी दे रहा है। इस वीडियो में युवक ने हाथ में हथियार पकड़ा है और अपनी आवाज एडिट करके महारानी को धमकी दी है। अब अंदाजा लगाया जा रहा है कि धमकी देने वाला शख्स और महल में घुसते वक्त पकड़ा गया युवक दोनों एक ही है।

संदिग्ध युवक साउथएंप्टन से है। वहीं वीडियो में दिखे युवक की पहचान जसवंत सिंह चैल बताई जा रही है। जसवंत ने क्रिसमस के बाद स्नैपचैट पर सुबह के समय 8:06 पर एक वीडियो अपलोड की। इसमें उसने कहा था, “मुझे दुख है, जो मैंने किया उसके लिए और मैं करूँगा उसके लिए। मैं शाही परिवार की महारानी एलिजाबेथ की हत्या का प्रयास करूँगा। यह उन लोगों का बदला है जो 1919 के जलियाँवाला बाग हत्याकांड में मारे गए हैं।”

वीडियो में आगे उसने कहा, “यह उन लोगों का भी बदला है जो नस्लीय रूप से भेदभाव का शिकार हुए। मैं एक भारतीय सिख हूँ। मेरा नाम जसवंत सिंह चैल था, अब मेरा नाम डार्थ जोन्स है।”

जानकारी के मुताबिक, इस वीडियो में खुद को डॉर्थ जोन्स बताने वाले युवक ने अजीब सी हुडी और मुखौटा पहना हुआ है और साथ ही साथ वह अपनी पहचान भी बता रहा है। हालाँकि जो व्यक्ति रानी के महल में सुरक्षा उल्लंघन करता पाया गया उसका नाम पुलिस ने नहीं बताया है। अनुमान यही लगाए जा रहे हैं कि सीसीटीवी में दिखा व्यक्ति और वीडियो में नजर आया शख्स एक ही है क्योंकि उसके पास से भी आरी-कमान ही मिला है। फिलहाल युवक को मेंटल हेल्थ एक्ट के तहत धारा लगाकर गिरफ्तार किया गया है।

बता दें कि वीडियो में दिखे युवक ने जिस नरसंहार का बदला महारानी से लेने को कहा है, वो नरसंहार 1919 में हुआ जलियाँवाला बाग नरसंहार है। इसमें ब्रिटिश सेना ने 13 अप्रैल 1919 को सैंकड़ों प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलवाई थी, जिसमें 379 प्रदर्शनकारी मारे गए थे और 1200 के करीब घायल हुए थे। संयोग की बात है कि कल जब युवक को महारानी के महल से पकड़ा गया उस दिन उन क्रांतिकारी ऊधम सिंह की भी जयंती है जिन्होंने इस नरसंहार का बदला लेने के लिए विदेश में अंग्रेजी अधिकारी को मौत के घाट उतारा था।

अकेले बाहर नहीं जा सकेंगी महिलाएँ, महिला पत्रकारों को भी पहनना पड़ेगा हिजाब: तालिबान का फरमान – गाड़ी में गाना नहीं बजेगा

अफगानिस्तान (Afghanistan) में तालिबान (Taliban) का शासन शुरू होने के बाद से ही वहाँ पर जन सामान्य के अधिकारों को कुचला जा रहा है। महिलाओं के अधिकारों पर पहरे बिठाए जा रहे हैं। इसी क्रम में तालिबान एक और क्रूर आदेश आ गया है। इसके तहत तालिबान ने रविवार (26 दिसंबर 2021) को अफगानिस्तान की महिलाओं पर कड़ाइयाँ बढ़ाते हुए आदेश जारी किया कि अब महिलाएँ अपने घर से अकेले बाहर भी नहीं निकल सकती। अगर उन्हें बाहर जाना है तो वे अपने किसी पुरुष रिश्तेदार के साथ ही जा सकेंगी।

रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान के शिष्टाचार मंत्रालय की ओर से जारी किए गए आदेश में इस्लामिक अमीरात के सभी गाड़ी मालिकों को केवल हिजाब पहनने वाली महिलाओं को ही गाड़ी में बैठाने का आदेश दिया गया है। इस बात की जानकारी तालिबान के शिष्टाचार मंत्रालय के प्रवक्ता सादिक अकिफ मुहाजिर ने दी। उन्होंने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया, “45 मील (72 किलोमीटर) से अधिक की यात्रा करने वाली महिलाओं को सवारी की पेशकश नहीं की जानी चाहिए, अगर उनके साथ परिवार का कोई सदस्य नहीं है।”

इसके साथ ही पत्रकारों के अधिकारों पर भी कैंची चलाई गई है। तालिबानी मंत्रालय ने सख्त आदेश में कहा है कि महिला टीवी पत्रकारों को हिजाब पहनकर रिपोर्टिंग करनी होगी। इसके अलावा मुहाजिर के मुताबिक, अब से गाड़ी मालिक अपनी गाड़ियों में गाने नहीं बजाएँगे। बता दें कि तालिबान की नजर में हिजाब का मतलब बालों को ढँकने से लेकर चेहरे के घूंघट या पूरे शरीर को ढंकने तक वाले कपड़े हैं। हालाँकि, अधिकांश अफगान महिलाएँ पहले से ही हेडस्कार्फ़ पहनती हैं।

गौरतलब है कि तालिबान ने इसी साल अगस्त में अफगानिस्तान पर कब्जा किया था। इसके बाद उसने वादा किया था कि वो 90 के दशक वाले तालिबानी शासन से अलग इस बार महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करेगा। हालाँकि, हो इसका उल्टा रहा है।

तालिबान एक-एक करके अफगान नागरिकों के अधिकारों को खत्म कर रहा है। महिलाओं पर प्रतिबंध लगाने के साथ ही उसने अफगान नागरिकों से उनका मतदान का अधिकार छीन लिया है। तालिबान सरकार ने देश के कुछ मंत्रालयों और चुनाव निकाय को खत्म कर दिया है। तालिबान का कहना है कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।