भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेेंस स्टाफ (सीडीएस) दिवंगत जनरल बिपिन रावत को कभी गुंडा कहने वाली कॉन्ग्रेस आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए उनके कसीदे पढ़ रही है। कॉन्ग्रेस महासचिव राहुल गाँधी की गुरुवार (16 दिसंबर) को राजधानी देहरादून में आयोजित रैली से पहले पूरे शहर में पूर्व सीडीएस बिपिन रावत के सम्मान में पोस्टर लगाए गए हैं। बता दें कि जनरल रावत की एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में 8 दिसंबर 2021 को मृत्यु हो गई थी।
So posters have sprung up questioning Cong on its shameless behaviour of using General Rawat’s name after calling him “sadak ka gunda”! Uttarakhand is surely welcoming @RahulGandhi in its own style! https://t.co/H5tnvS0KtUpic.twitter.com/5mMxmHlG9d
पोस्टर में राहुल गाँधी के साथ-साथ कॉन्ग्रेस नेता संदीप दीक्षित दिख रहे हैं। साल 2017 के मीडिया रिपोर्ट का हवाले देते हुए पोस्टर में लिखा है, ‘कॉन्ग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने सेना प्रमुख (तत्कालीन) बिपिन रावत को सड़क का गुंडा कहा’। पोस्टर में आगे लिखा है, ‘क्या जनरल रावत को का गुंडा कहने वाले करेंगे सेना का सम्मान’। कॉन्ग्रेस द्वारा शहर में लगाए गए पोस्टर के जवाब के रूप में यह पोस्टर सामने आया है। ‘उत्तराखंड विजय सम्मान रैली’ नाम के पोस्टर पूर्व सीडीएस रावत की एक तस्वीर भी लगाई गई है।
इस पोस्टर को उत्तराखंड प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी ने लगवाया है। इसमें सीडीएस रावत की एक बड़ी है, लेकिन किसी कॉन्ग्रेस नेता की तस्वीर नहीं है। ट्विटर पर इसे साझा करते हुए आलोक भट्ट ने लिखा, “देखिए… जिसे कभी राहुल गाँधी के करीबी ने सड़क का गुंडा कहा था, उस जनरल को कॉन्ग्रेस ने कितनी जल्दी अपना लिया।”
दिल्ली बीजेपी के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने भी पोस्टर साझा किया है। एक ट्वीट में उन्होंने कहा, “कितना नीचे गिरेगी कांग्रेस? जिन बिपिन रावत जी का जीते जी कॉन्ग्रेस के नेता अपमान करते रहे, उन्हें सड़क का गुंडा कहते रहे, उनके निधन को 1 सप्ताह नहीं बिता और वोट बटोरने के लिए कॉन्ग्रेस की रैली में उनकी तस्वीरें लगाने लगे। धिक्कार है कॉन्ग्रेस पे।”
कितना नीचे गिरेगी कांग्रेस ? जिन बिपिन रावत जी का जीते जी कांग्रेस के नेता अपमान करते रहे, उन्हें सड़क का गुंडा कहते रहे, उनके निधन को 1 सप्ताह नही बिता और वोट बटोरने के लिए कांग्रेस की रैली में उनकी तस्वीरें लगाने लगे । धिक्कार है कांग्रेस पे pic.twitter.com/MuKQ77dhL7
ऑपइंडिया ने इस मुद्दे पर उनके विचार जानने लिए उत्तराखंड बीजेपी युवा मोर्चा के प्रभारी और दिल्ली भाजपा के प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा से बात की। इस दौरान उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी नेता, जिन्होंने जनरल रावत को सड़क का गुंडा कहा था, वह अभी भी पार्टी में शीर्ष पोजिशन में हैं। वह राहुल गाँधी के साथ रैलियाँ करते हैं। पार्टी उन लोगों के साथ खड़ी है, जो सेना को बलात्कारी कहते हैं। ऐसी पार्टी जब उनकी मृत्यु के एक हफ्ते के बाद पोस्टर में जनरल रावत के नाम का उपयोग करती है तो वह सम्मान के लिए नहीं, बल्कि वोट हासिल करने के लिए करती है।”
बता दें कि 8 दिसंबर को सीडीएस रावत और उनकी पत्नी सहित 14 लोगों को ले जाने वाला वायुसेना का हेलिकॉप्टर तमिलनाडु में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इस दुर्घटना में 13 लोगों की तत्काल मृत्यु हो गई थी, जबकि गंभीर रूप से घायल ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह एक सप्ताह तक जीवन-मृत्यु से लड़ने के बाद वीरगति को प्राप्त हो गए।
कोलकाता के इंडियन स्टैटिस्टकल इंस्टीट्यूट (ISI) में पढ़ाने वाली प्रोफेसर नीना गुप्ता को मैथ्स के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक ‘विकासशील देशों के युवा गणितज्ञों का 2021 DST-ICTP-IMU रामानुजन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अनुसार, नीना गुप्ता का नाम इतिहास में दर्ज किया जा चुका है क्योंकि यह पुरस्कार पाने वाली वह चौथी भारतीय और विश्व की तीसरी महिला हैं। सबसे दिलचस्प बात ये है कि जिन चार भारतीयों को रामानुजन पुरस्कार मिला है उनमें से तीन तो ISI के ही फैकल्टी सदस्य हैं। इससे पहले साल 2006 में 2006 में सुजाता रामादोरई, 2015 में अमलेंदू कृष्णा, 2018 में ऋतब्रत मुंशी को ये सम्मान मिला था।
इस पुरस्कार को पाने से पूर्व नीना गुप्ता को साल 2019 में ‘शांति स्वरूप भटनागर प्राइज फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी’ भी मिला था। उन्हें बीजगणित जियोमेट्री के फील्ड में Zariski cancellation problem को सॉल्व करने के लिए नेशलन साइंस अकेडमी द्वारा यंग साइंटिस्ट अवॉर्ड भी दिया गया था।
नीना के बारे में मौजूदा जानकारी से पता चलता है कि वो कोलकत्ता में पली-बढ़ी हैं और वहीं उन्होंने खालसा हाई स्कूल से अपनी स्कूलिंग पूरी की। इसके बाद उन्होंने मैथ्स ऑनर्स में बेथ्यून कॉलेज से बीएससी की डिग्री प्राप्त की, फिर इंडियन स्टैटिस्टकल इंस्टीट्यूट से गणित में मास्टर्स, पीएचडी की और फिर वहीं फैकल्टी सदस्य के तौर पर काम करने लगीं। वह बताती हैं कि उन्हें गणित विषय के लिए प्रेम का एहसास बचपन में ही हो गया था और उसी के बाद उन्होंने इस पर काम शुरू कर दिया था।
रामानुजन अवार्ड जीतने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा कि उन्हें ये अवार्ड पाकर सम्मानित महसूस हो रहा है, लेकिन ये काफी नहीं है। एक शोधकर्ता होने के नाते उन्हें अब भी बहुत सी प्रॉब्लम सॉल्व करनी हैं। वह कहती हैं कि ये पुरस्कार पाने से उन्हें और अधिक मेहनत करने की प्रेरणा मिली है। शुरुआत में उनका सपना अच्छी डिग्री लेकर शादी करने का था। मगर जब उन्हें अपना इंटरेस्ट पता चला तो उन्होंने इस पर काम शुरू किया।
किसे मिलता है रामानुजन अवार्ड
रामानुजन अवार्ड विकासशील देशों के युवा मैथमेटिशियन को साल 2005 के बाद से हर वर्ष प्रदान किया जाता है। इस अवार्ड को, ‘अब्दुस सलाम इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेटिकल फिज़िक्स’ द्वारा भारत सरकार के ‘विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग’ तथा अंतरराष्ट्रीय गणितीय संघ (IMU) के साथ संयुक्त रूप से प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार हर साल 31 दिसंबर को विकासशील देश के उन शोधकर्ताओं को दिया जाता है, जिन्होंने अपने क्षेत्र (मैथ्स के क्षेत्र) में उत्कृष्ट काम किया हो और उनकी उम्र 45 या उससे कम हो। गणितीय विज्ञान की किसी भी शाखा में काम करने वाले शोधकर्त्ता इसके पात्र हैं। इसमें $15,000 अमेरिकी का नकद पुरस्कार दिया जाता है।
“देश के प्रधानमंत्री 24 घंटे यही सोचते हैं, सुबह उठते ही कहते हैं कि अडाणी-अंबानी को क्या दें, चलो आज एयरपोर्ट दे देते हैं, आज किसानों का खेत देते हैं…।” यह बात बीते 12 दिसंबर 2021 को कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कही थी। मौका था राजस्थान की राजधानी जयपुर में हुई कॉन्ग्रेस की ‘महँगाई हटाओ’ महारैली का। अडानी पर इस तरह निशाना साधना राहुल के लिए नई बात नहीं है। लेकिन दिलचस्प यह है कि जिस राजस्थान में उन्होंने यह बात कही, वहीं पर अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने अडानी ग्रुप (Adani Group) को 1600 हेक्टेयर जमीन देने का फैसला किया है। वह भी राहुल की रैली के केवल तीन दिन बाद।
गहलोत मंत्रिमंडल की बुधवार (15 दिसंबर 2021) को हुई बैठक में 1500 मेगावाट का सोलर पार्क बनाने के लिए अडानी ग्रुप को जमीन देने के फैसले पर मुहर लगाई गई। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में राहुल गाँधी के विरोधाभासी रवैए को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।
सोलर पार्क के लिए अडानी ग्रुप और राजस्थान सरकार ने एक जॉइंट वेंचर कंपनी बना रखी है। अब उसी को जमीन आवंटन किया जाएगा। कैबिनेट बैठक में राजस्थान सरकार की जॉइंट वेंचर कंपनी अडानी रिन्यूबल एनर्जी पार्क को जिलावार जमीन विभाजित की गई।
सोलर पार्क के लिए जैसलमेर के भीमसर, माधोपुरा, सदरासर गाँव में 1324.14 हेक्टेयर, बाटयाडू और नेडान गाँव में 276.86 हेक्टेयर जमीन देने पर सहमति दी गई। वहीं 30 मेगावाट विंड सोलर हाइब्रिड पावर प्रोजेक्ट के लिए अडानी ग्रुप को जैसलमेर के केरालियाँ गाँव में 64.38 हेक्टेयर सरकारी जमीन लीज पर मिलेगी। गौरतलब है कि गहलोत कैबिनेट की बुधवार को हुई बैठक में राजस्व विभाग से जुड़े 5 मुद्दों पर फैसले लिए गए, जिसमें 4 फैसले अडाणी ग्रुप की जमीन आवंटन से जुड़े थे।
राहुल गाँधी पर दोहरे मापदंड को लेकर छिड़ी बहस
गहलोत सरकार के अडानी ग्रुप को जमीन देने के बाद अब सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस के दोहरे रवैए को लेकर लोग कई तरह की प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं। आपको बता दें कि रैली के दौरान राहुल गाँधी ने केंद्र सरकार पर अडानी-अंबानी को फायदा पहुँचाने का आरोप लगाते हुए एयरपोर्ट, कोल मांइस, सुपर मार्केट आदि निजी हाथों में देने की बात कही थी।
राहुल ने कहा था, “आज आप जहाँ भी देखेंगे, आपको दो लोग दिखेंगे, रेल, पोर्ट… कहीं भी, ये उनकी गलती नहीं है। आपको कोई मुफ्त में दे तो क्या आप उनको वापस दे दोगे, गलती प्रधानमंत्री की है। लेकिन देश ऐसे नहीं चलता। देश गरीबों, मजदूरों, छोटे दुकानदारों, छोटे व्यापारियों का है। जैसे वे रोजगार पैदा करते हैं। अडानी और अंबानी नौकरी नहीं देंगे।”
उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पिछले दिनों कोलकाता के राज्य सचिवालय ‘नाबाना’ में मशहूर उद्योगपति गौतम अडानी से मुलाकात की थी। दोनों के बीच पश्चिम बंगाल में निवेश के विकल्पों पर बातचीत हुई। अडानी ने इस बात की भी पुष्टि की थी कि वे अगले वर्ष अप्रैल में होने वाले बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट में शिरकत करेंगे। इससे पहले ममता बनर्जी की टीएमसी भी मोदी सरकार पर अडानी को फायदा पहुँचाने का आरोप लगाती रही है।
आजादी के अमृत महोत्व का जश्न मनाते हुए 19 दिसंबर 2021 को कई जगह भारत का राष्ट्रगीत बड़ी तादाद में इकट्ठा होकर गुनगुनाया जाना है। काशी में तो दो लाख से ज्यादा लोगों द्वारा राष्ट्रगीत गाए जाने का ऐलान है। सोशल मीडिया पर भी यदि देखें तो नेटिजन्स अपनी देशभक्ति दिखाने के लिए गर्व से ‘वंदे मातरम’ लिखते हैं।
यह सब देख साफ है कि देश को समर्पित चाहे कोई भी अवसर हो, ‘एक सुर’ में गाया गया राष्ट्रगीत हमेशा देश के नागरिकों में उस नई ऊर्जा का संचार करता है, जो आम जन के चेहरे पर देखते ही बनती है। इस गीत के लिए दशकों से राष्ट्रप्रेमियों के मन में सम्मान है। कई क्रांतिकारी तो इसे गुनगुनाते हुए फाँसी के फंदे तक पर झूल गए और कुछ ने इसे समूचे भारत की तस्वीर बताया।
लेकिन, कहते हैं न हर नायाब चीज में कमी निकालकर उसे कोसने वाले लोग अपने ही समाज में होते हैं, कुछ ऐसा ही ‘वंदे मातरम’ के साथ भी हुआ। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित यह एक कविता थी जिसे 1882 में बंगाली उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया गया और 1896 में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने इसे गीतबद्ध किया।
जब पूरा देश इस गीत को गुनगुना रहा था। इसे सुन राष्ट्र प्रेम की नई परिभाषा गढ़ चुका था, श्री अरबिंदों ने इसे राष्ट्रवाद का मंत्र बता दिया था, लाला लाजपत राय ‘वंदे मातरम’ नाम से उर्दू साप्ताहिक निकाल रहे थे, मैडम भीकाजी कामा ‘वंदे मातरम’ लिखा भारतीय झंडा विदेश में लहरा चुकी थीं, तब मुस्लिम लीग ने इस गीत का विरोध 1908 में शुरू किया।
चूँकि, इस गीत में मातृभूमि की वंदना है और इसमें तुलना के तौर पर देवी-देवताओं का जिक्र किया गया है, इसलिए कुछ कट्टरपंथी व अलगाववादी विचार वाले लोगों ने इस पर नाराजगी दिखानी शुरू की। सर्वप्रथम अमृतसर में हुए अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के दूसरे अधिवेशन में 30 दिसंबर, 1908 को अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए सैयद अली इमाम ने वंदे मातरम का विरोध किया और इसके बाद खिलाफत आंदोलन के जरिए जब देश में कट्टरपंथ का बीज रोपा गया, उसके बाद यह भावना प्रबल होती गई कि वंदे मातरम इस्लाम विरोधी है।
नतीजन 1937 में कॉन्ग्रेस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित की और समिति में मुस्लिम प्रतिनिधि के तौर पर मौलाना अबुल कलाम आजाद को शामिल किया गया। आजाद ने गीत को पढ़ा और पाया कि इसके शुरूआती दो पद इस्लाम विरोधी नहीं हैं क्योंकि वो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गए हैं जबकि इन दो पदों के बाद हिंदू देवी देवताओं का उल्लेख है।
समिति के विचार-विमर्श के बाद एक फैसला आया और नेहरू के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने 26 अक्टूबर 1937 में एक लंबा बयान जारी कर दिया। इसमें मुस्लिम बंधुओं का विरोध देख अपील की गई थी कि वंदे मातरम को आनंदमठ से अलग करके पढ़ा जाए और इसके केवल दो ही छंद इस्तेमाल हों जिनमें हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख नहीं बल्कि मातृभूमि के सौन्दर्य और गुण की चर्चा है।
देश के सेकुलर नेताओं द्वारा हिंदू बहुल देश के लिए लिया गया यह फैसला उस समय बौना पड़ा जब जिन्ना जैसी कट्टरपंथी ताकतों ने दोबारा अपने फन उठाए। सैयद अली के विरोध के ठीक 3 दशक बाद मुहम्मद अली जिन्ना ने 1 मार्च 1938 में इस गीत के विरोध में मुहिम को छेड़ा और द न्यू टाइम्स ऑफ लाहौर में लिखा गया,
“पूरे भारत में मुसलमानों ने वंदे मातरम या मुस्लिम विरोधी गीत के किसी भी संस्करण को बाध्यकारी राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया है।”
जिन्ना का वंदे मातरम के लिए विरोध और इसके पीछे उनकी मंशा क्या थीं.. आज ये अलग से बताने की जरूरत नहीं है। उसकी जिद्द ने और मजहब परस्ती ने पूरे देश को दो हिस्सों में बाँट दिया। लेकिन उसके जैसी मानसिकता वाले लोग आज भी देश में पल बढ़ रहे हैं। बस फर्क ये है कि उसने इस्लाम के नाम पर खुले में अपना विरोध किया और अब सेकुलरिज्म के नाम पर तर्क दिए जाते हैं कि वंदे मातरम का अर्थ बुत-परस्ती से है इसलिए वह इसे नहीं गुनगुना सकते हैं।
आज भी वंदे मातरम का विरोध
पिछले दिनों वंदे मातरम का ऐसा ही विरोध बिहार विधानसभा में हुआ था तब ओवैसी की पार्टी के विधायकों ने इसे लोकतंत्र के विरुद्ध बताकर गाने से मना कर दिया था। अख्तरुल इमान ने कहा था कि उन्हें इससे समस्या है और किसी की मजाल नहीं है कि कोई उन्हें ये गाने को मजबूर करे।
इसी तरह समाजवादी पार्टी के नेता शफीकुर्रहमान बर्क ने भरी लोकसभा में वंदे मातरम को इस्लाम विरोधी बताया था। इसके बाद उर्दू में शपथ लेने के बाद बर्क ने कहा कि भारत का संविधान जिंदाबाद लेकिन जहाँ तक वंदे मातरम का सवाल है यह इस्लाम के खिलाफ है और वो इसका पालन नहीं कर सकते। सांसद के यह कहते ही सदन में और जोर-जोर से वंदे मातरम का नारा लगने लगा।
बर्क ने यह वंदे मातरम का अपमान पहली दफा नहीं किया था। 2013 में बीएसपी सांसद रहते हुए उन्होंने वंदे मातरम का बहिष्कार करने के लिए संसद से वॉकआउट किया था और उससे पूर्व उन्होंने 1997 में संसद के 50 साल पूरे होने पर आयोजित स्वर्ण जयंती कार्यक्रम में भी वंदे मातरम का बहिष्कार किया था। इसको लेकर तब उनका तर्क था कि वंदे मातरम का मतलब भारत माता की पूजा या वंदना करना है और इस्लाम में पूजा करना जायज नहीं है। जिसकी काफी आलोचना हुई थी।
21 अप्रैल 2019 में राजद के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने वंदे मातरम बोलने से इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें भारत माता की जय बोलने से कोई परहेज नहीं है, मगर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम गाना उनकी आस्था के खिलाफ है। सिद्दीकी ने कहा था, ‘‘जो एकेश्वर में विश्वास रखता है वह कभी भी वंदे मातरम नहीं गाएगा।”
लोकतांत्रिक देश के बड़े-बड़े नेताओं द्वारा ‘वंदे मातरम’ के लिए इतनी नफरत जाहिर है किसी को भी अचंभित करेगी ही, लेकिन बता दें उनके जहन में ये कट्टर बातें दशकों से डाली जाती रही हैं और आने वाली पीढ़ी को भी यही परोसा जा रहा है।
उदाहरण के लिए 2019 की घटना पढ़िए। उस साल 26 जनवरी को देवबंद में मदरसा जामिया हुसैनिया के मुफ़्ती तारिक़ कासमी ने 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर वंदे मातरम गाने और ‘भारत माता की जय’ भी बोलने पर पाबंदी लगा दी थी। फरमान में कहा गया था, “इस्लाम में सिर्फ़ अल्लाह की इबादत होती है। भारत माता की जय बोलते समय एक प्रतिमा का ख़याल आता है, इसी कारण मुस्लिमों को यह नारा नहीं लगाना चाहिए।”
वंदे मातरम के प्रति प्रेम
कट्टरपंथी विचारों के कारण जो विरोध हमारे राष्ट्रगीत का पिछले 112 सालों में हुआ, उसने कभी इसकी महत्ता पर असर नहीं डाला। देश और देश की सेना के सम्मान में आज भी ‘वंदे मातरम’ गर्व से गाया जाता है। 24 जनवरी 1950 को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने इसके शुरुआती दो स्टैंजा को राष्ट्रगीत घोषित किया था। उन्होंने इस गीत को लेकर कहा था,
“वंदे मातरम गीत, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को जन गण मन के समान सम्मानित किया जाएगा और इसे समान दर्जा दिया किया जाएगा।”
केरल के स्कूल में छात्र-छात्राओं के लिए समान ड्रेस कोड का फैसला मुस्लिम संगठन को रास नहीं आया है। पैंट-शर्ट को ड्रेस कोड घोषित करने के विरोध में मुस्लिम संगठन ने रैली निकाली है। राज्य की वामपंथी सरकार पर ड्रेस कोड जबरन थोपने का आरोप लगाया है। हालॉंकि राज्य सरकार इसे सही फैसला बता रही।
इस फैसले का केरल की मुस्लिम कॉर्डिनेशन कमेटी ने विरोध किया है। विरोध में बुधवार (15 दिसंबर) को कोझीकोड जिले के बालूसेरी में रैली निकाली गई। इस रैली में कहा गया, “हम इस बदलाव का विरोध करते हैं। यह फैसला अलोकतांत्रिक है। यह हमारे कपड़े पहनने के अधिकार का हनन है। यह उदार विचारधारा को हम पर थोपने जैसा है।” विरोध-प्रदर्शन स्कूल के गेट पर भी किया गया। प्रदर्शन के दौरान इस ड्रेस कोड को जबरदस्ती का आदेश भी बताया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बुधवार (15 दिसम्बर) को केरल के बालूसेरी गवर्नमेंट गर्ल्स हाईयर सेकंडरी स्कूल द्वारा युनिसेक्स यूनिफॉर्म नियम लागू किया गया है। समान यूनिफॉर्म का यही नियम राज्य के 1 दर्जन से ज्यादा अन्य स्कूलों में भी लागू किया गया है। पैंट-शर्ट का यह ड्रेस 10वीं क्लास के ऊपर के छात्रों पर लागू होगा। केरल के उच्च शिक्षामंत्री आर बिंदू ने इसका समर्थन किया। उन्होंने इसे एक क्रांतिकारी कदम बताया है।
At a time when the world is heralding an age of gender justice and equality, Balussery Govt Girls HSS has taken a radical step forward. Glad to have had the opportunity to officially inaugurate the school’s new gender neutral uniform, which students have welcomed with open arms. pic.twitter.com/eEQQXsRgWX
गौरतलब है कि इस से पहले भी पहनावे पर तमाम मौलाना और मौलवी बयान दे चुके हैं। जनवरी 2021 में ‘मिस प्लस वर्ल्ड मलेशिया 2020′ कार्यक्रम के दौरान कट्टरपंथी संगठनों और यहाँ तक कि मलेशिया की सरकार ने भी प्लस साइज महिलाओं के कार्यक्रम में आने को इस्लाम के खिलाफ बताया था। नवम्बर 2021 में केरल के इस्लामी स्कॉलर हुसैन सलाफ़ी ने मुस्लिम महिलाओं के लिए शॉपिंग मॉल को हराम बताया था। सितम्बर 2021 में दारुल उलूम के प्रिंसिपल और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने औरतों के लिए खेलकूद हराम, मर्दों के साथ पढ़ने से भटक जाएँगी’ जैसा बयान दिया था। अगस्त 2020 में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में टीवी देखना, कैरम खेलना, लॉटरी खरीदना और फ़ोन या कम्प्यूटर का इस्तेमाल कर के गाने सुनना ‘हराम‘ घोषित करते हुए 500 रुपयों से लेकर 7000 रुपए तक का जुर्माना और उसे न मानने वालों के लिए कान पकड़ कर उठक-बैठक कराने की सज़ा देने का एलान किया गया था।
सोशल मीडिया पर लड़की के नाम से फर्जी ID फिर अश्लील वीडियो बनाकर पैसे ऐंठने वाले एक गैंग को हरियाणा की पानीपत पुलिस ने पकड़ा है। इस गैंग का मुखिया रिज़वान है, जो राजस्थान के भरतपुर का निवासी है। रिज़वान के साथ एक अन्य साथी मोहम्म्द वकील को भी पकड़ा गया है। यह गिरोह सोशल मीडिया पर पहले फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजकर दोस्ती करता था, उसके बाद वारदात को अंजाम देता था। गिरफ्तारी की पुष्टि पानीपत पुलिस ने 14 दिसम्बर (मंगलवार) को की है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी महीने एक व्यक्ति ने थाना किला में अपने साथ 10 हजार रुपए की ठगी की शिकायत की थी। उसने बताया कि 5 दिसम्बर को उसके फेसबुक पर एक लड़की की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। बाद में विश्वास जीतकर फेसबुक मैसेंजर पर वीडियो कॉलिंग की गई। इसी दौरान आरोपितों की तरफ से एक लड़की के कपड़े उतारने की वीडियो बनाई गई। कुछ समय बाद पीड़ित को गूगल पे नंबर भेज कर 50 हजार रुपए की माँग की गई। बदनामी के डर से पीड़ित ने 10 हजार रुपए भेज भी दिए।
बाद में पीड़ित ने इसकी शिकायत किला थाना में की। मामले की जाँच सीआईए-1 ब्रांच को सौंपी गई है। जाँच के दौरान 8 दिसम्बर को रिज़वान पुत्र सरफुद्दीन को पुनहाना से पकड़ लिया गया। रिजवान भरतपुर के ओलन्दा का रहने वाला है, जबकि मोहम्मद वकील भरतपुर के ही कैथवाड़ा के रहने वाला है। उससे हुई पूछताछ के आधार पर मोहम्मद वकील को भी पकड़ा गया। रिजवान को 5 दिन और मोहम्मद वकील को 7 दिनों की पुलिस रिमांड पर भेजा गया है।
पुलिस पूछताछ में आरोपितों ने बताया कि वो किसी और व्यक्ति की ID पर सिम खरीदते थे। फिर लड़की के नाम से फर्जी ID बनाकर लोगों से दोस्ती करते थे। इसी दौरान वो विश्वास कायम करके अश्लील वीडियो बना लिया करते थे। बाद में उसे वायरल करने की धमकी देकर पैसे ऐंठते थे।
अब वोटर कार्ड को भी आधार कार्ड से लिंक (Voter ID-Aadhaar Card Linking) करना अनिवार्य हो जाएगा। केंद्र सरकार ने बुधवार (15 दिसंबर 2021) को वोटर आईडी कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ने के लिए चुनावी कानून में प्रस्तावित संशोधनों को मँजूरी दे। साथ ही महिलाओं के लिए विवाह की कानूनी आयु 18 से 21 वर्ष तक बढ़ाने के प्रस्ताव पर भी मुहर लगा दी है। एक साल पहले स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में पीएम मोदी ने इस बारे में संकेत दिए थे।
वोटर आईडी भी आधार से होगा लिंक
चुनाव आयोग की सिफारिशों के आधार पर वर्तमान चुनाव कानून में 4 संशोधन किए जाएँगे। इसके अनुसार पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग करने वालों को वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने के लिए एक साल में चार बार मौका दिया जाएगा। अभी एक जनवरी या उससे पहले 18 वर्ष के होने वालों को मतदाता के रूप में रजिस्ट्रेशन की अनुमति दी जाती है। इसके अलावा सर्विस वोटर्स के लिए चुनावी कानून को जेंडर न्यूट्रल बनाया जाएगा।
नेशनल वोटर सर्विस पोर्टल, एसएमएस, फोन या बूथ स्तर के अधिकारियों के पास जाकर आधार को मतदाता पहचान पत्र (Voter ID Card) से जोड़ा जा सकता है। अभी आधार कार्ड को वोटर आईडी से लिंक करना अनिवार्य नहीं है। बताया जा रहा है कि फर्जी मतदान या मतदान में धाँधली को रोकने के उद्देश्य से यह कदम उठाया जा रहा है।
शादी के लिए महिलाओं की उम्र 18 से 21 करने की मँजूरी
कैबिनेट की मंजूरी के बाद, सरकार बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 में एक संशोधन पेश करेगी और इसके बाद विशेष विवाह अधिनियम और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 जैसे व्यक्तिगत कानूनों में संशोधन लाएगी। बुधवार को दी गई मँजूरी दिसंबर 2020 में जया जेटली की अध्यक्षता वाली केंद्र की टास्क फोर्स द्वारा नीति आयोग को सौंपी गई सिफारिशों पर आधारित है। इसका गठन मातृत्व की उम्र से संबंधित मामलों, मातृ मृत्यु दर को कम करने की आवश्यकता, पोषण में सुधार से संबंधित मामलों के लिए किया गया था।
जेटली ने कहा, “मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ कि सिफारिश के पीछे हमारा तर्क कभी भी जनसंख्या नियंत्रण का नहीं था। NFHS 5 (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण) द्वारा जारी हालिया आँकड़ों ने पहले ही संकेत दिए हैं कि कुल प्रजनन दर घट रही है और जनसंख्या नियंत्रण में है। इस विचार के पीछे महिलाओं के सशक्तिकरण का विचार है।”
जेटली ने आगे कहा, “हमें 16 विश्वविद्यालयों से जवाब मिले और युवाओं तक पहुँचने के लिए 15 से अधिक गैर सरकारी संगठनों को शामिल किया गया है। ग्रामीण और हाशिए के समुदायों और सभी धर्मों और शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों से समान रूप से फीडबैक लिया गया। हमें युवा वयस्कों से प्रतिक्रिया मिली कि शादी की उम्र 22-23 वर्ष होनी चाहिए। कुछ हलकों से आपत्तियाँ आई हैं, लेकिन हमने महसूस किया कि उन्हें कुछ समूहों ने ऐसा करने का निर्देश दिया था।”
क्या हुई है सिफारिश?
महिला और बाल विकास मंत्रालय द्वारा जून 2020 में गठित टास्क फोर्स में नीति आयोग के डॉ. वीके पॉल और डब्ल्यूसीडी, स्वास्थ्य और शिक्षा मंत्रालयों और विधायी विभाग के सचिव भी शामिल थे। इसने सिफारिश की है कि निर्णय की सामाजिक स्वीकृति को प्रोत्साहित करने के लिए एक व्यापक जन जागरूकता अभियान चलाया जाए। इसने दूर-दराज के क्षेत्रों में शैक्षणिक संस्थानों के मामले में परिवहन सहित लड़कियों के लिए स्कूलों और विश्वविद्यालयों तक पहुँच की भी माँग की है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (13 दिसंबर 2021) को ‘श्रीकाशी विश्वनाथ कॉरिडोर’ देश को समर्पित किया था। विश्वनाथ धाम की दिव्यता और भव्यता हर किसी को मोहित कर रही है। अब श्रद्धालु गंगा घाट से सीधे आकर बाबा का जलाभिषेक कर सकेंगे। पर वर्ग विशेष के कुछ लोग इससे असहज हैं। उन्हें लगा रहा है कि इस कॉरिडोर से ज्ञानवापी मस्जिद ढक गई है।
यूट्यूब चैनल यूपी तक ने ज्ञानवापी मस्जिद में नमाज अदा करने आए कुछ लोगों से बात की। कुछ ने मस्जिद के ढक जाने की बात कही तो किसी ने विकास सीमित होने की बात कही। मोहम्मद शागीर ने वाराणसी के बदलने की बात पर कहा कि ये सब कुछ बस वोट के लिए है। विकास कुछ भी नहीं हुआ है।
वहीं शौकत अली ने भी विकास के सीमित होने पर सहमति जताई। उनका कहना है कि ये सब बस मंदिर-मस्जिद तक ही है। बिलाल अहमद ने कहा कि ऐसा नहीं है कि पूरी वाराणसी बदल गई है। मंदिर-मस्जिद की एकता को दिखाने के लिए विकास का रूप दिया गया है। हमीद अंसारी का कहना है कि सिर्फ मंदिर का विकास हुआ है।
कोलकाता से आए नौशाद आलम ने कहा, “हम कोलकाता से यहाँ नमाज पढ़ने के लिए आए थे। हमको तो ये हालात देखकर समझ में नहीं आ रहा है कि मस्जिद को पूरी तरह से ढक दिया गया और मंदिर को इस तरह से विशाल बनाया गया है। ये क्या है? मैं टूरिस्ट हूँ। मैं यह दर्द महसूस कर सकता हूँ।”
नौशाद ने आक्रोशित होते हुए कहा, “आपको दिखाई नहीं दे रहा है? क्या आपको मस्जिद दिख रहा है? मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। आप लोग सच्चाई को कैसे छुपा सकते हैं? एक चीज को ढक दिया गया और दूसरे को भव्य बनाया गया। यह हिंदुस्तान है। यहाँ लोकतंत्र है। संविधान में कहा गया है कि सबको बराबर का हक है। आप किसी के हक को दबा दीजिएगा, ऐसा होता है क्या? पहली बार मैंने इस मस्जिद में नमाज अदा किया और जो दुख हुआ है, वह मैंने 40 साल के जीवन में कभी महसूस नहीं किया था।”
इतना कहने के बाद नौशाद आलम रोने लगे। एंकर ने उन्हें ढाढस बँधाया और फिर सवाल किया कि आपको क्या लगता है कि एकतरफा विकास हुआ है तो नौशाद ने कहा, “विकास की बात छोड़िए, किसी के अधिकार को दबा दिया गया है।” इसके बाद वह रोने लगे और आगे बात करने से इनकार कर दिया।
गौरतलब है कि 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब ने एक फरमान जारी कर काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वस्त करने का आदेश दिया था। यह फरमान एशियाटिक लाइब्रेरी, कोलकाता में आज भी सुरक्षित है। उस समय के लेखक साकी मुस्तइद खाँ द्वारा लिखित ‘मासीदे आलमगिरी’ में इस ध्वंस का वर्णन है। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी।
झारखंड की राजधानी रांची में विश्व हिन्दू परिषद (VHP) के पदाधिकारी की हत्या कर दी गई है। मृतक का नाम मुकेश सोनी था। हत्या गोली मार कर की गई है। हत्यारे कौन हैं, इसकी जानकारी पुलिस जुटा रही है। घटना बुधवार (15 दिसम्बर) शाम 6.30 की है।
राँची के मैक्लुस्कीगंज थाना क्षेत्र में विश्व हिंदू परिषद के खलारी प्रखंड अध्यक्ष मुकेश सोनी की गोली मारकर हत्या,दुकान से घर लौटने के दौरान अपराधियों ने मारी गोली।#Ranchi#Jharkhandpic.twitter.com/tObFhfgDHv
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मृतक मुकेश की उम्र लगभग 38 वर्ष थी। वो विहिप के खलारी प्रखंड के अध्यक्ष थे। उन्हें गोली तब मारी गई जब वे खलारी थाना क्षेत्र स्थित मैक्लुस्कीगंज से अपने आभूषण की दुकान बंद कर घर लौट रहे थे। घटनास्थल खलारी और मायापुर के बीच में पड़ता है। मुकेश सोनी के सीने में 2 गोलियाँ मारी गई। स्थानीय लोगों ने मुकेश को डकरा सेंट्रल हॉस्पिटल पहुँचाया, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
रिपोर्ट के मुताबिक गोली लगने के बाद उन्होंने मोबाइल के जरिए परिजनों को इसकी सूचना दी। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में कहा गया है कि मुकेश सोनी ने अपनी पत्नी को फोन मिलाकर घटना की जानकारी दी थी। इसी दौरान वो बात करते हुए बेहोश हो गए थे। मामले की जानकारी पुलिस को मिली तो वह मौके पर पहुँची। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। खलारी DSP अनिमेष नथानी और SHO खलारी फरीद आलम ने लोगों से घटना के बारे में जानकारी ली। DSP के मुताबिक आरोपितों को जल्द ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा। एसपी देहात नौशाद आलम के मुताबिक CCTV फुटेज निकाली जा रही है। जल्द ही घटना का पर्दाफाश किया जाएगा।
रांची से भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा सांसद संजय सेठ ने इस घटना के बाद हेमंत सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने लिखा है कि झारखंड को केरल और पश्चिम बंगाल जैसा बनाने की साजिश चल रही है। यहाँ भाजपा और संघ विचार परिवार के लोगों को टारगेट किया जा रहा है। उनकी हत्याएँ की जा रही है।
विहिप खलारी प्रखंड अध्यक्ष मुकेश सोनी की हत्या राज्य सरकार और प्रशासन की विफलता है। झारखण्ड में भाजपा और संघ विचार परिवार को टारगेट किया जा रहा है। उनकी हत्याएं की जा रही है। झारखंड को केरल और पश्चिम बंगाल बनाने की साजिश हो रही है, जिसे किसी भी कीमत पर सफल नहीं होने दिया जाएगा। pic.twitter.com/OQkctExncj
पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास ने इसे राजनैतिक हत्या बताया है। उन्होंने कहा कि अगर जल्द ही आरोपित गिरफ्तार नहीं किए गए तो भाजपा आंदोलन करेगी।
झारखंड में कानून व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है।
विहिप खलारी प्रखंड अध्यक्ष मुकेश सोनी की हत्या हेमंत सरकार की विफलता है।
झारखंड में राजनीतिक हत्याओं के दौर चल पड़ा है। भाजपा कार्यकर्ता न तो बंगाल में डरा है न केरल में। अपराधियों की शीघ्र गिरफ्तारी नहीं हुई तो भाजपा आंदोलन करेगी। pic.twitter.com/w0e2TRSw2i
झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इसे बेहद गंभीर मामला कहा है। उन्होंने इसे झारखंड में बेलगाम अपराधी और प्रशासनिक विफलता की तस्वीर बताया है।
झारखंड में बेलगाम अपराधी और प्रशासनिक विफलता की एक और तस्वीर । खलारी में विश्व हिंदू परिषद के प्रखंड अध्यक्ष मुकेश सोनी की अपराधियों के द्वारा गोली मार कर हत्या किए जाने की खबर सामने आ रही है। यह मामला अत्यंत गंभीर है, अपराधियों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी सुनिश्चित हो। pic.twitter.com/H3ZsZYAnxQ
सिमरिया विधानसभा से भाजपा विधायक किशुन कुमार दास ने भी हेमंत सोरेन सरकार की आलोचना की । उनके मुताबिक हेमंत सरकार में क़ानून-व्यवस्था नष्ट हो चुकी है।
कानून व्यवस्था नष्ट हो चुकी हेमंत सरकार के राज में हत्याओं का दौर बदस्तूर जारी है. दुकान से घर लौटने के क्रम में अपराधियों ने विश्व हिंदू परिषद के खलारी प्रखंड अध्यक्ष मुकेश सोनी जी की गोली मारकर हत्या कर दी,अत्यंत दुःखद खबर! अपराधियों की जल्द धरपकड़ कर कठोरतम कार्रवाई करे सरकार pic.twitter.com/c4kMoB1rTS
रांची की मेयर और भाजपा की भाजपा की राष्ट्रीय सचिव डॉ. आशा लकड़ा ने इस घटना को हेमंत सरकार का जंगलराज कहा है।
रांची के खलारी प्रखंड के विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ता श्री मुकेश सोनी की अपराधियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। राज्य में लगातार संघ-संगठन और भाजपा कार्यकर्ताओं को टारगेट कर उनकी सुनियोजित हत्या की जा रही है।राज्य में हेमंत राज में जगंल राज्य कायम।@BJP4India@BJP4Jharkhand
घटना की जानकारी के बाद अस्पताल के बाहर भीड़ जुटने लगी। मृतक मुकेश सोनी की बसें पहले रांची से खलारी चलती थीं। बाद में वो ज्वैलरी के कारोबार में आ गए थे। परिवार में पत्नी के अलावा 6 वर्ष की बेटी और 3 साल का बेटा है। ऑपइंडिया ने इस मामले की जानकारी के लिए स्थानीय SHO को फोन मिलाया तो उनका फोन सम्पर्क से बाहर बताया। SP देहात के कार्यालय का फोन उठाया नहीं गया।
ऑपइंडिया ने मृतक मुकेश सोनी की फेसबुक प्रोफ़ाइल को खँगाला। उन्होने 8 दिसंबर को CDS जनरल रावत के बलिदान पर हँसने वाले वर्ग विशेष के लोगों की आलोचना की थी। 8 दिसम्बर को ही उन्होंने ‘भारत में एक पाकिस्तान बसता है’ लिखा था।
भारत में विधायिका और कार्यपालिका की आलोचना सरेआम होती है। इनमें सुधार की जरूरत पर जोर दिया जाता है। लेकिन न्यायपालिका को लेकर एक तरह की खामोशी देखने को मिलती है। जबकि अदालतों में आम लोगों के 4.5 करोड़ केस पेंडिंग हैं। ‘तारीख पर तारीख़’ की व्यवस्था में केस लड़ते-लड़ते पीढ़ियाँ खप जाती हैं। लेकिन, कई ऐसे मामले हैं जब सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे आधी रात को भी खोले गए हैं।
हजारों बार ये कहावत दोहराई जा चुकी है कि न्याय में देरी का अर्थ है, न्याय न मिलना। अदालतों में मामलों की संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है और 2019 के बाद से तो औसतन हर मिनट 23 नए मामले दर्ज हो रहे हैं। ऊँची अदालतों में 41% ऐसे मामले हैं, जो 5 वर्ष से अधिक समय से पेंडिंग पड़े हुए हैं। 45 लाख से भी अधिक केस ऐसे हैं, जिन्हें दर्ज हुए 10 वर्ष से अधिक हो गए। उच्च-न्यायालयों में जजों की 42% सीटें खाली हैं। जज ही नहीं हैं तो सुनवाई कैसे होगी?
तेलंगाना, पटना, राजस्थान, ओडिशा और दिल्ली जैसे हाईकोर्ट में तो जजों के आधे पद खाली पड़े हुए हैं। निचली अदालतों में जजों की 21% सीटें खाली हैं। बिहार (40%)और हरियाणा (38%) में ये उच्च स्तर पर है। यहाँ तक कि फ़ास्ट ट्रैक अदालतों में भी 9.2 लाख केस पेंडिंग पड़े हुए हैं। भारत की जेलों में तो 4.8 कैदियों में से 3.3 लाख ऐसे हैं, जिनकी सुनवाई चल रही है। 5000 ऐसे हैं, जो सुनवाई के दौरान 5 वर्षों या उससे अधिक समय से जेल में बंद हैं।
निर्भया मामला: जब आरोपितों के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई
निर्भया मामले के बारे में अधिकतर लोगों को पता है, लेकिन आगे बढ़ने से पहले इस घटना का संक्षिप्त परिचय ज़रूरी है। 16 दिसंबर, 2012 को जब निर्भया (बदला हुआ नाम) अपने एक दोस्त के साथ बस में सफर कर रही थीं, एक नाबालिग समेत 6 लोगों ने मुनिरका बस स्टैंड से खुली उस चलती हुई बस में लड़की के साथ गैंगरेप किया और उसके पुरुष मित्र की पिटाई की। करीब दो सप्ताह तक चले इलाज के बाद निर्भया ने दम तोड़ दिया। 11 मार्च, 2013 में बलात्कारियों में से एक राम सिंह ने तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी।
उसी साल 13 सितंबर को फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने सभी बलात्कारियों को मौत की सज़ा सुनाई। अगले साल 13 मार्च को दिल्ली हाईकोर्ट ने सज़ा बरक़रार रखी। 2017 में 5 मई को सुप्रीम कोर्ट ने भी फाँसी की सज़ा बरकरार रखी। इसके बाद समीक्षा याचिकाओं और माफ़ी याचिकाओं का दौर चला। निर्भया के परिवार को भी इस दौरान इन याचिकाओं के खिलाफ कोर्ट का रुख करना पड़ा। एक आरोपित ने मानसिक बीमारी का बहाना बनाया, इन सब में सुनवाई लम्बी खींचती रही।
मार्च 2020 में इन बलात्कारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट को रात में सुनवाई करनी पड़ी, उनकी फाँसी के समय (सुबह 5:30 बजे) से कुछ ही घंटों पहले तक। एक आरोपित ने अपनी फाँसी रोकने के लिए याचिका लगा दी और सुप्रीम कोर्ट को आधी रात को ‘स्पेशल हियरिंग’ करनी पड़ी। उनके वकील ने सुप्रीम कोर्ट के एक उच्च-स्तरीय अधिकारी से इस बाबत संपर्क किया था। 3 जजों को रात को बैठ कर 45 मिनट सुनवाई करनी पड़ी।
#Nirbhaya ‘s mother said in TV interview : only for terrorist court opens at midnight NOT for daughter of India
हालाँकि, सुनवाई में याचिका रद्द की गई और बलात्कारियों की फाँसी का मार्ग प्रशस्त हुआ। वकील एपी सिंह ने सुनवाई को एकाध दिन और खींचने के लिए कुछ और बहाने बनाए। उसी शाम को पहले ये सभी हाईकोर्ट पहुँचे थे, जहाँ से फिर रात को सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाल दी गई। सोचिए, 8 सालों तक निर्भया के परिवार को किस दौर से गुजरना पड़ा होगा। दोष कब का साबित हो गया था, लेकिन अलग-अलग कानूनी दाँव-पेंच का इस्तेमाल कर-कर के इसे लटकाया जाता रहा।
जब एक आतंकी की फाँसी रुकवाने के लिए आधी रात को खुली देश की सर्वोच्च अदालत
याकूब मेमन और उसकी फाँसी रोकने के लिए हुई आधी रात की सुनवाई से पहले इस आतंकी से आपका परिचय करा देते हैं। जुलाई 1962 में जन्मा याकूब अब्दुल रज्जाक मेमन पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) था, लेकिन 1993 के बम धमाकों में उसका बड़ा रोल सामने आया। उसका भाई टाइगर मेमन भी इस आतंकी घटना में शामिल था। उसने अपनी कमाई दाऊद इब्राहिम और टाइगर मेमन को दी, मुंबई को दहलाने के लिए। 30 जुलाई, 2015 को उसे नागपुर में फाँसी पर लटकाया गया।
उसकी फाँसी रुकवाने के लिए प्रशांत भूषण सरीखे वकीलों ने आधी रात में सुप्रीम कोर्ट खुलवाई, जहाँ डेढ़ घंटे तक सुनवाई हुई। इसके बाद उसकी फाँसी रोकने वाली याचिका को खारिज किया गया। तत्कालीन मुख्य न्यायधीश एचएल दत्तू से लेकर जज दीपक मिश्रा के घरों तक के दरवाजे इसके लिए खटखटाए गए। उससे पहले सुबह के 3 बजे सुप्रीम कोर्ट कभी नहीं खुली थी। 3 जजों की पीठ ने ये सुनवाई की। सोचिए, 2007 में ही उसका दोष सिद्ध हो गया था, लेकिन फाँसी होते-होते 8 साल लग गए।
पूरी रात याकूब मेमन को बचाने के लिए ड्रामा चलता रहा। प्रशांत भूषण और वृंदा ग्रोवर जैसे अधिवक्ता इसका नेतृत्व कर रहे थे। रात के समय तत्कालीन अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी को सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल से फोन गया कि रात के ढाई बजे अर्जेन्ट सुनवाई है। पत्रकारों का भी जमावड़ा लग गया कोर्ट संख्या 4 में। वकील आनंद ग्रोवर ने आतंकी के लिए ‘जीवन के अधिकार’ की दलीलें दी। AG ने तब स्पष्ट कहा था कि फाँसी रुक गई तो ये मामला एक कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया में फँस जाएगा।
ऐसे अन्य मामले, जब रात को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई
इसी तरह एक मामला है निठारी केस का, जिसे नोएडा सीरियल मर्डर के रूप में भी जानते हैं। मोनिंदर सिंह पंधेर और उसका नौकर सुरिंदर कोली इस मामले में मुख्य अभियुक्त है (ये मामला अब भी चल रहा)। 19 से अधिक बच्चों की हत्या के मामले इन दोनों पर चल रहे हैं। दोनों को मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी है। CBI को मामला सौंपा गया। 17 बच्चों के कंकाल या अंग मिले, जिनके पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला कि उनमें से 11 लड़कियाँ थीं। एक मृतक की उम्र 18 से अधिक भी है।
2005-06 में हुए इस हत्याकांड के लिए दोनों को फाँसी की सज़ा सुनाई गई, लेकिन जब मार्च 2014 में जब सुरिंदर कोली की मौत की सज़ा की तारीख और समय मुक़र्रर कर दिया गया था, तब उसके वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। फाँसी के तय समय से मात्र दो घंटे पहले। और सुप्रीम कोर्ट ने फाँसी पर रोक भी लगा दी। अब आप सोचिए, क्या एक आम आदमी की इतनी हैसियत है? निठारी मामले के बारे में आप जितना पढ़ेंगे, आपकी रूह उतनी ही काँपेगी।
Breaking: Supreme Court Chief Justice woke up middle of the night and stayed (for a week) Surinder Koli’s execution planned for the morning
2014 में भारत सरकार बनाम शत्रुघ्न चौहान मामले में 16 दोषियों को मौत की सज़ा शाम 4 बजे सुनाई गई थी, लेकिन उससे एक रात पहले सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी सतशिवम के घर तक वकील पहुँच गए। रात के 11:30 में सुनवाई हुई और फाँसी पर रोक लगी। इसी तरह अप्रैल 2014 में हत्या के दोषी मंगलाल बरेरा के लिए कोर्ट रात में खुली। जम कर राजनीति हुई। इसी तरह 2018 में कॉन्ग्रेस पार्टी ने भाजपा पर कर्नाटक में उसकी सरकार गिराने का आरोप लगाया और रात में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।
हालाँकि, ये सब कुछ नया नहीं है। शक्तिशाली और प्रभावशाली लोगों के लिए कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका – तीनों ही साध्य है। 1985 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश इएस वेंकटरमैया को रात के समय जगाया गया और उद्योगपति एलएम थापर को जमानत दी गई। दिसंबर 1992 में बाबरी ढाँचे के विध्वंस के बाद रात को सुप्रीम कोर्ट के जजों ने सुनवाई की। तत्कालीन CJI एमएन वेंकटचलिआह के आवास पर ही अदालती सुनवाई की प्रक्रिया हुई।
इसी सुनवाई के बाद आदेश दिया गया कि अयोध्या में यथास्थिति बरक़रार रखी जाए। राजधानी दिल्ली का एक रंगा-बिल्ला आपराधिक मामला भी है, जब तत्कालीन CJI जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ (कार्यकाल फरवरी 1978 से जुलाई 1985 तक) की अध्यक्षता वाली पीठ ने देर रात बैठ कर उनकी फाँसी रोकने वाली याचिका पर सुनवाई की। 1998 में कल्याण सिंह बनाम जगदम्बिका पाल मामले में सदन में बहुमत साबित करने का आदेश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आधी रात को सुनवाई की।
जैसा कि आपने देखा, इन सब में कोई ऐसा मामला नहीं है जहाँ कोई आम आदमी सुप्रीम कोर्ट पहुँचा हो और उसे न्याय देने के लिए सुनवाई हुई हो। लेकिन, बलात्कारियों, उद्योगपतियों और हत्यारों के लिए सुप्रीम कोर्ट रात में खुली और सुनवाई भी हुई। वकीलों की फ़ौज CJI के घर तक पहुँची और उन्हें जगाया। सवाल गलत-सही का नहीं, सवाल ये है कि क्या एक गरीब आदमी न्याय के लिए CJI के घर का दरवाजा जाकर खटखटाए तो क्या होगा? रात के समय, जब वो सो रहे हों…