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‘विश्वनाथ धाम जीर्णोद्धार राम मंदिर निर्माण की कड़ी में ही अगला कदम’: CM योगी ने अहिलायाबाई होल्कर और रणजीत सिंह को किया याद

वाराणसी में काशी विश्वनाथ धाम मंदिर कॉरिडोर के उद्घाटन के अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विश्व का सबसे लोकप्रिय नेता बताया। उन्होंने ‘नमामि शमीशान निर्वाण रूपं’ के साथ अपनी बात की शुरुआत की। इस अवसर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, यूपी के दोनों उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और दिनेश धर्म के अलावा राज्यपाल आनंदबेन पटेल भी मौजूद थीं। इस दौरान सीएम योगी ने कहा कि आज माँ गंगा प्रफुल्लित हैं, काशी के कोतवाल भैरव आह्वादित हैं और बाबा विश्वनाथ की कृपा हम पर बरस रही है।

उन्होंने कहा कि ये काशी का सौभाग्य है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यहाँ से सांसद बना कर भेजा गया। उन्होंने कहा कि सभी संत प्रधानमंत्री नरेंद्र के स्वागत के लिए आह्वादित हैं, क्योंकि हजारों वर्ष की तपस्या आज सच हो रही है। उन्होंने कहा कि 1777-80 के बीच में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बाबा विश्वनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में योगदान दिया, महाराजा रंजीत सिंह ने भी इसके लिए काम किया और आज पूज्य संत जनों ने आज अपनी आँखों से इसे भव्य और दिव्य बनते हुए देखा।

उन्होंने कहा कि आप अनुमान कर सकते हैं कि काशी में बाबा विश्वनाथ धाम का निर्माण अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के क्रम में ही अगली प्रक्रिया है। उन्होंने कुंभ के आयोजन से लेकर योग को विश्व स्तर पर स्थापित करने के प्रयासों के लिए पीएम मोदी का अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इसी काशी में आकर अपनी पीड़ा व्यक्ति की थी और यहाँ की तंग गलियों व गंदगी को देख कर व्यथित हुए थे, लेकिन अब उनके सपने को सच किया गया है।

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का उद्घाटन: इससे पहले क्या-क्या हुआ जानिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ककाशी विश्वनाथ मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद परिसर में पौधारोपण किया। बता दें कि हिन्दू धर्म में वनस्पति को देवी मानते हैं। इसके बाद पीएम मोदी ने उन श्रमजीवियों पर पुष्प वर्षा की, जिनकी मेहनत से काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का निर्माण संपन्न हुआ है। उन श्रमिकों को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं भूले और उनसे बातें की। उन पर फूल बरसाए। साथ ही उनमें से कइयों से बात कर के हालचाल और नाम-पता भी पूछा।

इसके बाद उन्होंने सभी श्रमिकों के साथ बैठ कर फोटो भी खिंचवाई। इस दौरान हर-हर महादेव का उद्घाटन होता था। इस दौरान पुरोहितों ने उन्हें भेंट भी दी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काशी विश्वनाथ धाम मंदिर का एक स्वरूप भी उन्हें भेंट किया।

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (13 दिसंबर, 2021) को वाराणसी पहुँचे। गंगा में डुबकी लगाने के बाद उन्होंने कलश में जल भरा, जिसके बाद मंदिर पहुँच कर आचार्यों की मौजूदगी में पूरे विधि-विधान से काशी विश्वेश्वर शिवलिंग की पूजा-अर्चना की। इस दौरान उन्होंने गंगाजल, बेलपत्र और पुष्प लेकर पूजा-अर्चना की। जहाँ पुरोहित घंटी बजा रहे थे, वहीं पीएम मोदी ने बाबा विश्वनाथ की आरती की। इस दौरान विश्व के कल्याण के लिए भी प्रार्थना की गई।

करीब आधे घंटे तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आचार्यों के साथ बाबा विश्वनाथ की पूजा-अर्चना की। अंत में क्षमा प्रार्थना भी की गई। कुर्ता-धोती और रुद्राक्ष पहने प्रधानमंत्री पूजा के बाद पुरोहितों के साथ बातें करते भी नजर आए।इस दौरान पुरोहितों ने कहा कि ये आपकी धर्म परायणता का परिणाम है कि ये कार्य हो रहा है। हालाँकि, पीएम मोदी ने इसके जवाब में कहा कि सब कुछ महादेव ही कराते हैं और उनकी इच्छा से ही ये सब हो रहा है। पूजा संपन्न होने के बाद पीएम मोदी हलके अंदाज़ में नजर आए।

काशी में भगवा विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में वहाँ के लोगों का भी कम योगदान नहीं है। वहाँ निर्माण के दौरान लगभग 500-600 घर हटाने पड़े, जिसके लिए लोगों ने स्वेच्छा से योगदान दिया और कोई केस-मुकदमा के बिना ही ये कार्य सफल हुआ। इसके उद्घाटन के लिए सोमवार (13 दिसंबर, 2021) को वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा की पूजा की। इसके बाद वो कपड़े बदल कर कलश में जल लेकर विश्वनाथ मंदिर पहुँचे, जहाँ जलाभिषेक किया।

जलाभिषेक के लिए जाते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुर्ता-धोती पहन रखी थी और एक गमछा रखा हुआ था। इस दौरान डमरू बजाते हुए पुरोहितों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान लगातार भक्ति गाने बज रहे थे और मंत्रोच्चार हो रहा था। इस दौरान सुरक्षा की काफी कड़ी व्यवस्था है और आसपास के सभी ऊँची जगहों पर पुलिस तैनात थी। बाबा विश्वनाथ धाम मंदिर में आचार्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भगवान शिव की पूजा संपन्न कराई।

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा में डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। इस दौरान पीएम मोदी को लाल वस्त्रों में नदी में डुबकी लगा कर मंत्रोच्चार करते हुए देखा गया। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों में माला और लोटा ले रखा था। इसके बाद पीएम मोदी ने मंदिर में जाकर अंजलि दी। मुख्य मंदिर परिसर में नया गलियारा बनाया गया है, जहाँ दीवारों में भगवा शिव से सम्बंधित श्लोक और इतिहास लिखा हुआ है।

इस दौरान पूरे काशी को सजाया गया है। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में लोग वहाँ उपस्थित थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत उत्तर प्रदेश मत्रिमंडल के कई सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल हैं। कहा जाता है कि काशी में ही भगवान विष्णु ने भी तपस्या की थी, जिसके बाद भगवान शिव के मस्तक हिलाने के कारण उनके कान से जो कर्णिका गिरी, उसे ही मणिकर्णिका कहा गया। काशी में ‘आनंद वन’ भी है, जिसके बारे में भगवान शिव ने कहा था कि ऐसी जगह विश्व में कहीं और नहीं होगी।

जिन श्रमिकों के कारण संभव हुआ काशी विश्वनाथ धाम का जीर्णोद्धार, उन्हें भी नहीं भूले PM मोदी: मजदूरों पर बरसाए फूल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ककाशी विश्वनाथ मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद परिसर में पौधारोपण किया। बता दें कि हिन्दू धर्म में वनस्पति को देवी मानते हैं। इसके बाद पीएम मोदी ने उन श्रमजीवियों पर पुष्प वर्षा की, जिनकी मेहनत से काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का निर्माण संपन्न हुआ है। उन श्रमिकों को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं भूले और उनसे बातें की। उन पर फूल बरसाए। साथ ही उनमें से कइयों से बात कर के हालचाल और नाम-पता भी पूछा।

इसके बाद उन्होंने सभी श्रमिकों के साथ बैठ कर फोटो भी खिंचवाई। इस दौरान हर-हर महादेव का उद्घाटन होता था। इस दौरान पुरोहितों ने उन्हें भेंट भी दी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने काशी विश्वनाथ धाम मंदिर का एक स्वरूप भी उन्हें भेंट किया।

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर: पीएम मोदी ने इससे पहले क्या-क्या किया

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (13 दिसंबर, 2021) को वाराणसी पहुँचे। गंगा में डुबकी लगाने के बाद उन्होंने कलश में जल भरा, जिसके बाद मंदिर पहुँच कर आचार्यों की मौजूदगी में पूरे विधि-विधान से काशी विश्वेश्वर शिवलिंग की पूजा-अर्चना की। इस दौरान उन्होंने गंगाजल, बेलपत्र और पुष्प लेकर पूजा-अर्चना की। जहाँ पुरोहित घंटी बजा रहे थे, वहीं पीएम मोदी ने बाबा विश्वनाथ की आरती की। इस दौरान विश्व के कल्याण के लिए भी प्रार्थना की गई।

करीब आधे घंटे तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आचार्यों के साथ बाबा विश्वनाथ की पूजा-अर्चना की। अंत में क्षमा प्रार्थना भी की गई। कुर्ता-धोती और रुद्राक्ष पहने प्रधानमंत्री पूजा के बाद पुरोहितों के साथ बातें करते भी नजर आए।इस दौरान पुरोहितों ने कहा कि ये आपकी धर्म परायणता का परिणाम है कि ये कार्य हो रहा है। हालाँकि, पीएम मोदी ने इसके जवाब में कहा कि सब कुछ महादेव ही कराते हैं और उनकी इच्छा से ही ये सब हो रहा है। पूजा संपन्न होने के बाद पीएम मोदी हलके अंदाज़ में नजर आए।

काशी में भगवा विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में वहाँ के लोगों का भी कम योगदान नहीं है। वहाँ निर्माण के दौरान लगभग 500-600 घर हटाने पड़े, जिसके लिए लोगों ने स्वेच्छा से योगदान दिया और कोई केस-मुकदमा के बिना ही ये कार्य सफल हुआ। इसके उद्घाटन के लिए सोमवार (13 दिसंबर, 2021) को वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा की पूजा की। इसके बाद वो कपड़े बदल कर कलश में जल लेकर विश्वनाथ मंदिर पहुँचे, जहाँ जलाभिषेक किया।

जलाभिषेक के लिए जाते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुर्ता-धोती पहन रखी थी और एक गमछा रखा हुआ था। इस दौरान डमरू बजाते हुए पुरोहितों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान लगातार भक्ति गाने बज रहे थे और मंत्रोच्चार हो रहा था। इस दौरान सुरक्षा की काफी कड़ी व्यवस्था है और आसपास के सभी ऊँची जगहों पर पुलिस तैनात थी। बाबा विश्वनाथ धाम मंदिर में आचार्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भगवान शिव की पूजा संपन्न कराई।

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा में डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। इस दौरान पीएम मोदी को लाल वस्त्रों में नदी में डुबकी लगा कर मंत्रोच्चार करते हुए देखा गया। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों में माला और लोटा ले रखा था। इसके बाद पीएम मोदी ने मंदिर में जाकर अंजलि दी। मुख्य मंदिर परिसर में नया गलियारा बनाया गया है, जहाँ दीवारों में भगवा शिव से सम्बंधित श्लोक और इतिहास लिखा हुआ है।

इस दौरान पूरे काशी को सजाया गया है। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में लोग वहाँ उपस्थित थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत उत्तर प्रदेश मत्रिमंडल के कई सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल हैं। कहा जाता है कि काशी में ही भगवान विष्णु ने भी तपस्या की थी, जिसके बाद भगवान शिव के मस्तक हिलाने के कारण उनके कान से जो कर्णिका गिरी, उसे ही मणिकर्णिका कहा गया। काशी में ‘आनंद वन’ भी है, जिसके बारे में भगवान शिव ने कहा था कि ऐसी जगह विश्व में कहीं और नहीं होगी।

BJP की महिला नेता ने शिवसेना सांसद संजय राउत के खिलाफ दिल्ली में कराई FIR, अपशब्दों के इस्तेमाल और जान से मारने की धमकी देने का लगाया आरोप

शिवसेना के राज्यसभा सांसद संजय राउत के खिलाफ भाजपा की महिला नेता ने दिल्ली में एक मामला दर्ज कराया है। भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय महामंत्री दीप्ति रावत ने एक इंटरव्यू में भाजपा की महिला कार्यकर्ताओं के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करने और उन्हें धमकाने का आरोप लगाते हुए गुरुवार (9 दिसंबर) को दिल्ली के मंडावली थाने में मामला दर्ज कराया।

दीप्ति रावत भारद्वाज ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि नौ दिसंबर को एक मराठी समाचार चैनल पर प्रसारित एक इंटरव्यू के दौरान शिवसेना सांसद राउत ने भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया और उन्हें जान से मारने की धमकी दी। शिकायत के दौरान भारद्वाज ने टीवी चैनल की क्लिपिंग्स को भी पुलिस के साथ साझा किया।

दिल्ली पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि शिकायत के आधार पर शिवसेना सांसद राउत के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 500 (मानहानि की सजा) और 509 (किसी महिला की मर्यादा को ठेस पहुँचाने के इरादे से शब्द, हावभाव का इस्तेमाल करना या ऐसा कृत्य करना) के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। इसके साथ ही भारद्वाज ने अपने ट्विटर हैंडल से संजय राउत से इस्तीफे और माफी की माँग की।

एफआईआर पर प्रतिक्रिया व्यक्ति करते हुए संजय राउत ने कहा, “मेरे खिलाफ दिल्ली में दर्ज एफआईआर राजनीतिक मकसद से और मेरी आवाज दबाने के लिए की गई है। यह मेरी पार्टी को बदनाम करने के लिए किया गया है, क्योंकि सीबीआई, आयकर, ईडी का इस्तेमाल मेरे खिलाफ नहीं किया जा सकता है। मैं सांसद हूँ, मेरे खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कराने के लिए कुछ लोगों को प्रोत्साहित करना सही नहीं है।”

‘आपकी धर्म परायणता के कारण हो रहा ये कार्य’: पुरोहितों ने की प्रशंसा तो बोले PM मोदी – सब महादेव की इच्छा से हो रहा

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (13 दिसंबर, 2021) को वाराणसी पहुँचे। गंगा में डुबकी लगाने के बाद उन्होंने कलश में जल भरा, जिसके बाद मंदिर पहुँच कर आचार्यों की मौजूदगी में पूरे विधि-विधान से काशी विश्वेश्वर शिवलिंग की पूजा-अर्चना की। इस दौरान उन्होंने गंगाजल, बेलपत्र और पुष्प लेकर पूजा-अर्चना की। जहाँ पुरोहित घंटी बजा रहे थे, वहीं पीएम मोदी ने बाबा विश्वनाथ की आरती की। इस दौरान विश्व के कल्याण के लिए भी प्रार्थना की गई।

करीब आधे घंटे तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आचार्यों के साथ बाबा विश्वनाथ की पूजा-अर्चना की। अंत में क्षमा प्रार्थना भी की गई। कुर्ता-धोती और रुद्राक्ष पहने प्रधानमंत्री पूजा के बाद पुरोहितों के साथ बातें करते भी नजर आए।इस दौरान पुरोहितों ने कहा कि ये आपकी धर्म परायणता का परिणाम है कि ये कार्य हो रहा है। हालाँकि, पीएम मोदी ने इसके जवाब में कहा कि सब कुछ महादेव ही कराते हैं और उनकी इच्छा से ही ये सब हो रहा है। पूजा संपन्न होने के बाद पीएम मोदी हलके अंदाज़ में नजर आए।

काशी विश्वनाथ धाम मंदिर उद्घाटन: अब तक क्या-क्या हुआ

काशी में भगवा विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में वहाँ के लोगों का भी कम योगदान नहीं है। वहाँ निर्माण के दौरान लगभग 500-600 घर हटाने पड़े, जिसके लिए लोगों ने स्वेच्छा से योगदान दिया और कोई केस-मुकदमा के बिना ही ये कार्य सफल हुआ। इसके उद्घाटन के लिए सोमवार (13 दिसंबर, 2021) को वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा की पूजा की। इसके बाद वो कपड़े बदल कर कलश में जल लेकर विश्वनाथ मंदिर पहुँचे, जहाँ जलाभिषेक किया।

जलाभिषेक के लिए जाते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुर्ता-धोती पहन रखी थी और एक गमछा रखा हुआ था। इस दौरान डमरू बजाते हुए पुरोहितों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान लगातार भक्ति गाने बज रहे थे और मंत्रोच्चार हो रहा था। इस दौरान सुरक्षा की काफी कड़ी व्यवस्था है और आसपास के सभी ऊँची जगहों पर पुलिस तैनात थी। बाबा विश्वनाथ धाम मंदिर में आचार्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भगवान शिव की पूजा संपन्न कराई।

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा में डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। इस दौरान पीएम मोदी को लाल वस्त्रों में नदी में डुबकी लगा कर मंत्रोच्चार करते हुए देखा गया। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों में माला और लोटा ले रखा था। इसके बाद पीएम मोदी ने मंदिर में जाकर अंजलि दी। मुख्य मंदिर परिसर में नया गलियारा बनाया गया है, जहाँ दीवारों में भगवा शिव से सम्बंधित श्लोक और इतिहास लिखा हुआ है।

इस दौरान पूरे काशी को सजाया गया है। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में लोग वहाँ उपस्थित थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत उत्तर प्रदेश मत्रिमंडल के कई सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल हैं। कहा जाता है कि काशी में ही भगवान विष्णु ने भी तपस्या की थी, जिसके बाद भगवान शिव के मस्तक हिलाने के कारण उनके कान से जो कर्णिका गिरी, उसे ही मणिकर्णिका कहा गया। काशी में ‘आनंद वन’ भी है, जिसके बारे में भगवान शिव ने कहा था कि ऐसी जगह विश्व में कहीं और नहीं होगी।

बाबा विश्वनाथ के मंदिर पहुँचे PM मोदी का सैकड़ों डमरू बजा कर हुआ स्वागत, आचार्यों के साथ कर रहे हैं पूजा-अर्चना

काशी में भगवा विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में वहाँ के लोगों का भी कम योगदान नहीं है। वहाँ निर्माण के दौरान लगभग 500-600 घर हटाने पड़े, जिसके लिए लोगों ने स्वेच्छा से योगदान दिया और कोई केस-मुकदमा के बिना ही ये कार्य सफल हुआ। इसके उद्घाटन के लिए सोमवार (13 दिसंबर, 2021) को वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा की पूजा की। इसके बाद वो कपड़े बदल कर कलश में जल लेकर विश्वनाथ मंदिर पहुँचे, जहाँ जलाभिषेक किया।

जलाभिषेक के लिए जाते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुर्ता-धोती पहन रखी थी और एक गमछा रखा हुआ था। इस दौरान डमरू बजाते हुए पुरोहितों ने उनका स्वागत किया। इस दौरान लगातार भक्ति गाने बज रहे थे और मंत्रोच्चार हो रहा था। इस दौरान सुरक्षा की काफी कड़ी व्यवस्था है और आसपास के सभी ऊँची जगहों पर पुलिस तैनात थी। बाबा विश्वनाथ धाम मंदिर में आचार्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भगवान शिव की पूजा संपन्न कराई।

इससे पहले क्या-क्या हुआ

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा में डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। इस दौरान पीएम मोदी को लाल वस्त्रों में नदी में डुबकी लगा कर मंत्रोच्चार करते हुए देखा गया। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों में माला और लोटा ले रखा था। इसके बाद पीएम मोदी ने मंदिर में जाकर अंजलि दी। मुख्य मंदिर परिसर में नया गलियारा बनाया गया है, जहाँ दीवारों में भगवा शिव से सम्बंधित श्लोक और इतिहास लिखा हुआ है।

इस दौरान पूरे काशी को सजाया गया है। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में लोग वहाँ उपस्थित थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत उत्तर प्रदेश मत्रिमंडल के कई सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल हैं। कहा जाता है कि काशी में ही भगवान विष्णु ने भी तपस्या की थी, जिसके बाद भगवान शिव के मस्तक हिलाने के कारण उनके कान से जो कर्णिका गिरी, उसे ही मणिकर्णिका कहा गया। काशी में ‘आनंद वन’ भी है, जिसके बारे में भगवान शिव ने कहा था कि ऐसी जगह विश्व में कहीं और नहीं होगी।

‘सिंध-बलूचिस्तान को पाक से आजाद कराएँ PM मोदी, भारत के साथ संघ बना इतिहास की गलती को पलटेंगे’: अल्ताफ हुसैन ने कहा- इस दयालुता का कर्ज चुकाएँगे

पाकिस्तान के राजनीतिक दल मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (MQM) के नेता अल्ताफ हुसैन ने संयुक्त राष्ट्र, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय संसद और ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन से पाकिस्तान के कब्जे से सिंध और बलूचिस्तान को आजाद कराने की अपील की है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले इन दो क्षेत्रों के लोग दयनीय स्थिति में हैं और मदद के लिए संयुक्त राष्ट्र, ब्रिटेन और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की ओर देख रहे हैं। इन लोकतांत्रिक देशों को पाकिस्तान के कब्जे वाले इन दो क्षेत्रों के लोगों की अपील को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अनुसार इनकी स्वतंत्रता के लिए अपने प्रभाव और व्यावहारिक समर्थन को अमल में लाना चाहिए।

पाक सेना ने इन दो शहरों को आतंक का अड्डा बना दिया 

हुसैन ने कहा कि भारत सहित पड़ोसी देशों में आतंक को निर्यात करने वाली पाकिस्तान की सेना ने इन दोनों राज्यों को तालिबान, आईएसआईएस, लश्कर-ए-झंगवी (एलईजे), लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) जैसे आतंकवादी संगठनों के लिए एक सुरक्षित आश्रय में बदल दिया है। इस प्रकार की गतिविधि से पूरी दुनिया की शांति गंभीर रूप से दाँव पर है।

हुसैन ने कहा कि सिंध और बलूचिस्तान को पंजाब (पाकिस्तानी राज्य) और पाकिस्तानी सेना चीन के हाथों बेच दी है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के कब्जे वाले सिंध और बलूचिस्तान के लोगों की माँग पर चुप्पी पाकिस्तान की राक्षसी सेना को दुनिया भर के लाखों लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ करने देने के समान होगी।

भारत का विभाजन मानव इतिहास की सबसे बड़ी गलती: हुसैन

हुसैन ने कहा कि 1947 में हुआ भारत का विभाजन मानव इतिहास की सबसे बड़ी गलती थी। इसके कारण न केवल भूगोल का विभाजन हुआ, बल्कि लाखों लोगों का विस्थापन, परिवारों का विभाजन और लाखों महिलाएँ दुष्कर्म की शिकार हुईं। उन्होंने यह भी कहा कि विभाजन गरीब मुजाहिरों द्वारा नहीं, बल्कि मुस्लिम नवाबों, सामंतों और धनाढ्य अभिजात वर्ग द्वारा किया गया था, जो अंग्रेजों के एजेंट बन गए थे। उन्होंने एक साथ मिलकर भारत को विभाजित किया और हजारों वर्षों से साथ रहने वाले हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे के दुश्मन बन गए।

हुसैन ने कहा, “हर साल ईद, होली और दिवाली पर पाकिस्तान-भारत की सीमा पर सैनिक उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं और एक-दूसरे को गले लगाते हैं, लेकिन जब हम भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की बात करते हैं तो हम पर भारत समर्थक होने का आरोप लगाया जाता है।” एमक्यूएम सुप्रीमो ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनकी सरकार, भारतीय संसद और लोगों से अपील की कि भारत का विभाजन पूर्वजों की गलती थी। उन्होंने बहुत बड़ा पाप किया और मुहाजिरों (भारत से पाकिस्तान जाने वाले मुस्लिमों) को इसकी कीमत चुकानी पड़ रही है।

उन्होंने कहा कि सिंध और बलूचिस्तान अलग होता है तो वे पाकिस्तान के साथ नहीं, बल्कि यूरोपीय संघ की तर्ज पर भारत के साथ एक संघ बनाएँगे। उन्होंने पीएम मोदी से आग्रह किया कि पाकिस्तान में मुहाजिरों के लिए कोई जगह नहीं बची है। ऐसे में भारत को मुजाहिरों के लिए अपने दरवाजे खोलने चाहिए। उन्होंने कहा, “मैं वादा करता हूँ कि हम इतिहास की गलती को पलटेंगे और अपने काम से इस दयालुता का कर्ज चुकाएँगे।”

कौन हैं अल्ताफ हुसैन?

अल्ताफ हुसैन लंबे समय से लंदन में निर्वासित जीवन बिता रहे हैं। अल्ताफ लंदन से ही अपनी राजनीतिक पार्टी एमक्यूएम की गतिविधियों को संचालित करते हैं। पाकिस्तान सरकार की तरफ से उनके ऊपर देशद्रोह समेत कई मामले दर्ज किए गए हैं। हुसैन को भारत समर्थक माना जाता है। भारत से इस तरह की अपील वह पहले भी कई बार चुके हैं।

उनका आरोप है कि बँटवारे के बाद भारत से पाकिस्‍तान आने वाले मुस्लिमों को वहाँ की सरकारों धोखा दिया है। उन लोगों को अलग समझकर उनके खिलाफ षड़यंत्र रचे गए और उन्‍हें जेलों में ठूंसा गया और यातनाएँ दी गईं। सरकारी नौकरियों का भी लाभ उन्‍हें कभी नहीं मिल सका। अल्‍ताफ हुसैन समय-समय पर पाकिस्‍तान सरकार और सेना की कारगुजारियों को सामने लाते रहते हैं।

भगवा वस्त्र, गले में रुद्राक्ष, गंगा स्नान के बाद PM मोदी ने बाबा विश्वनाथ का किया जलाभिषेक

काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के उद्घाटन के लिए वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने माँ गंगा में डुबकी लगाई और जलाभिषेक किया। इस दौरान पीएम मोदी को लाल वस्त्रों में नदी में डुबकी लगा कर मंत्रोच्चार करते हुए देखा गया। इस दौरान उन्होंने अपने हाथों में माला और लोटा ले रखा था। इसके बाद पीएम मोदी ने मंदिर में जाकर अंजलि दी। मुख्य मंदिर परिसर में नया गलियारा बनाया गया है, जहाँ दीवारों में भगवा शिव से सम्बंधित श्लोक और इतिहास लिखा हुआ है।

इस दौरान पूरे काशी को सजाया गया है। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में लोग वहाँ उपस्थित थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत उत्तर प्रदेश मत्रिमंडल के कई सदस्य इस कार्यक्रम में शामिल हैं। कहा जाता है कि काशी में ही भगवान विष्णु ने भी तपस्या की थी, जिसके बाद भगवान शिव के मस्तक हिलाने के कारण उनके कान से जो कर्णिका गिरी, उसे ही मणिकर्णिका कहा गया। काशी में ‘आनंद वन’ भी है, जिसके बारे में भगवान शिव ने कहा था कि ऐसी जगह विश्व में कहीं और नहीं होगी।

कैसा है कॉरिडोर?

ललिता घाट और विश्वनाथ मंदिर परिसर के बीच वाले कॉरिडोर के हिस्से को ‘मंदिर चौक’ का नाम दिया गया है। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के सूचना जनसंपर्क अधिकारी पीयूष तिवारी ने ऑपइंडिया को बताया, “प्रधानमंत्री यहीं से कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे। ये कॉरिडोर का सबसे बड़ा हिस्सा है। ज्यादा भीड़ होने पर हम इस हिस्से में श्रद्धालुओं को रोक भी सकते हैं ताकि मंदिर में अव्यवस्था न हो। इसी हिस्से में एम्पोरियम बनाए गए हैं।”

बाबा विश्वनाथ के परिसर का द्वार। परिसर के चारों दिशा में द्वारा बनाए गए हैं।

5.2 लाख वर्ग फीट में फैला है कॉरिडोर

कॉरिडोर 5.2 लाख वर्ग फीट में फैला हुआ है। इसमें 33,075 वर्ग फीट में काशी विश्वनाथ मंदिर का परिसर है। इस कॉरिडोर में एक साथ 02 लाख लोग जमा हो सकते हैं। निर्माण में मकराना, चुनार के लाल बलुआ पत्थर समेत 7 विशेष पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। विश्राम गृह, संग्रहालय, सुरक्षा कक्ष और पुस्तकालय भी कॉरिडोर का हिस्सा हैं। पूरे कॉरिडोर में वृक्षारोपण के लिए जगह बनाई गई है। इनमें परिजात, रुद्राक्ष, अशोक, बेल इत्यादि पेड़ लगेंगे ताकि पूरा परिसर हरा-भरा रहे।

पूरे कॉरिडोर में वृक्षारोपण के लिए इसी तरह से जगह छोड़ी गई है

तिवारी ने बताया, “पहले जो मंदिर का परिसर था, वह केवल 3500 स्क्वायर फीट था। कॉरिडोर के लिए जब हमने घरों की खरीद शुरू की तो पहले ड्रोन सर्वे करवाया। इसमें कई पुराने मंदिर दिखे। जब हमने निर्माण शुरू किया तो इस बात का ध्यान रखा कि परिसर में अगर कोई श्रद्धालु बाहर से आए तो उसे वह हर सुविधा दी जाए जो एक धार्मिक स्थल में उसे मिलना चाहिए।” वे बताते हैं, “मेन गेट के बगल में यात्री सुविधा केंद्र बनाया गया है। सुरक्षा जाँच के बाद श्रद्धालु मंदिर परिसर में प्रवेश करेंगे। इसमें चार द्वार बनाए गए हैं, जो चारों दिशाओं में हैं। यह परिसर चुनार के लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया है और इसका फर्श मकराना के सफेद संगमरमर से बना है। इस परिसर में अभी वृक्षारोपण होना है। इसी तरह गंगा की तरफ से भी प्रवेश की सुविधा है।”

बाबा का दर्शन करने के लिए कतारबद्ध श्रद्धालु

सुविधा केंद्र से लेकर वैदिक केंद्र तक

तिवारी ने बताया कि पूरे कॉरिडोर में तीन यात्री सुविधा केंद्र बनाए गए हैं। इसके अलावा गेस्ट हाउस, धार्मिक पुस्तकों की बिक्री का केंद्र, जलपान केंद्र, सिटी म्यूजियम, वाराणसी गैलरी, मुमुक्षु भवन इत्यादि भी हैं। योग साधना के लिए वैदिक केंद्र है। सिटी म्यूजियम और वाराणसी भवन दोनों संग्रहालय हैं और तिवारी के अनुसार अलग-अलग उद्देश्यों से बनाए गए हैं। कॉरिडोर में कैफे बिल्डिंग है। गंगा व्यू गैलरी है, जहाँ बैठकर गंगा का पूरा दृश्य देखा जा सकता है। इसके अलावा एम्पोरियम है। उन्होंने बताया, “एम्पोरियम वाले हिस्से में जीआई उत्पादों के बड़े-बड़े शोरूम होंगे।” वे कहते हैं, “इस परियोजना को बनाने का जो मुख्य उद्देश्य था वह यह है कि सावन के सोमवार और शिवरात्रि पर करीब ढाई से तीन लाख लोग आते हैं। उस दौरान पूरा शहर, पूरी गलियाँ ठसाठस भरी होती हैं। मंदिर तक पहुँचने के लिए लोगों को कम से कम तीन से चार किमी की दूरी तय करनी पड़ती थी। अब गंगा स्नान कर श्रद्धालु सीधे कॉरिडोर में प्रवेश करेंगे। बाबा का जलाभिषेक करेंगे और शहर में निकल जाएँगे। मंदिर परिसर वाले ही हिस्से में एक वक्त में कम से कम 10 हजार लोग अब आ सकते हैं।”

40 ऐसे मंदिर मिले जो घरों में दब गए थे

वाराणसी के आयुक्त दीपक अग्रवाल बताते हैं कि इस कॉरिडोर के लिए जिस बोर्ड का गठन किया गया था, उसने कुल 314 घरों की खरीद की थी। जब कॉरिडोर निर्माण के लिए इन घरों को तोड़ने का काम शुरू किया गया तो करीब 40 ऐसे प्राचीन मंदिर मिले जो अतिक्रमण की वजह से लुप्त हो चुके थे। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती कॉरिडोर वाले हिस्से में जिनलोगों की संपत्ति आ रही थी उन्हें अपनी जगह छोड़ने के लिए तैयार करना था। लेकिन लोग इसके लिए तैयार हुए, क्योंकि इस परियोजना में उनकी आस्था थी। हमने पारदर्शी और आकर्षक वित्तीय प्रस्ताव मुहैया कराया। कई परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति देखते हुए उन्हें कम जगह के एवज में भी अच्छा-खासा मुआवजा प्रदान किया गया। जिन्होंने अतिक्रमण कर रखा था उनके भी हितों का ध्यान रखा गया। अग्रवाल ने बताया कि जो प्राचीन मंदिर इस दौरान मिले उन्हें संरक्षित किया गया है और जल्द ही श्रदालु इनमें दर्शन कर सकेंगे। उल्लेखनीय है कि मंदिर परिसर में मुख्य मंदिरों के अलावा कई छोटे मंदिर बनाए गए हैं। इनमें से कुछ में देवताओं की पुर्नस्थापना हो चुकी है। कई ऐसे मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुल भी गए हैं। शेष में काम अंतिम दौर में है।

2019 में जब कॉरिडोर का निर्माण कार्य शुरू हुआ था

प्रोपेगेंडा बनाम हकीकत

जब से काशी कॉरिडोर की बात शुरू हुई कॉन्ग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल, उसकी पालतू मीडिया और लिबरल-सेकुलर गैंग इस दुष्प्रचार में जुटा है कि काशी के मूल स्वरूप के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। मंदिरों को ध्वस्त किया जा रहा है। यह दुष्प्रचार अब भी जारी है। राम के अस्तित्व को नहीं मानने वाले लोगों की जलन समझी जा सकती है। उन्हें भला कैसे कबूल हो कि जो मंदिर कल तक दृष्टिगोचर नहीं था, वह अब भव्य दिखे। हिंदू गौरव की पुर्नस्थापना हो। हमसे बातचीत में स्थानीय लोगों के भाव भी कुछ इसी तरह प्रकट हुए।

‘विपक्ष को पच नहीं रहा’

पंकज दुबे बनारस की सड़कों पर 25 साल से ऑटो चला रहे हैं। वे कहते हैं, “काशी कॉरिडोर अति सुंदर है। जो हुआ है, अच्छा हुआ है। सही है। ऐसा बहुत पहले हो जाना चाहिए। बाहर से भी जो लोग आ रहे हैं उनको यह आकर्षित करता है। इससे यह भी संदेश जा रहा है कि बनारस विकास कर रहा है।” वे कहते हैं, “इससे टूरिस्ट बढ़ेंगे। धंधा बढ़ेगा।” निर्माण के दौरान मंदिरों को तोड़ने की बात पर वे कहते हैं, “यह सब विपक्ष चिल्ला रहा है। उनको पच नहीं रहा है। बजट तो उनके पास भी था, लेकिन काम नहीं किए। अब काम दिख रहा है तो वे झूठा प्रचार कर रहे हैं।”https://www.youtube.com/embed/aqppwUOHlj8

‘मोदी-योगी राज में धरोहरों का विकास’

रोशनी वर्मा काशी की दुर्लभ शिल्पकला ‘गुलाबी मीनाकारी’ का प्रशिक्षण ले रही हैं। वे काशी के गायघाट की रहने वाली हैं और युवा हैं। उनका कहना है, “हमारे काशी के हर गली में मंदिर हैं। पहले बहुत सारे मंदिरों का हमें पता नहीं था। कॉरिडोर के निर्माण से हमें उनके बारे में पता चला है। पहले मंदिर के बिल्कुल पास में घर थे, जिससे मंदिर का पता ही नहीं चलता था। अब मंदिर के बास बहुत स्पेस है। कितने भी लोग जुट जाए भीड़भाड़ नहीं होती। दर्शन करने में भी सहूलियत रहती है।” वे कहती हैं, “मोदी-योगी सरकार में हमारी मिट्टी से जुड़ी चीजों, धरोहरों और क्राफ्ट को संरक्षण दिया जा रहा है। उनका विकास हो रहा। उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा। अब लोग उनके बारे में जान रहे हैं और रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं।”

गंगा स्नान, काल भैरव की आरती… देश को श्रीकाशी विश्वनाथ कॉरिडोर समर्पित करने पहुँचे PM मोदी, हर हर महादेव से गूँज रहा वाराणसी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (13 दिसंबर, 2021) काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर देश को समर्पित करने के लिए वाराणसी पहुँचे हैं। यहाँ सैंकड़ों की भीड़ का अभिवादन करने के बाद उन्होंने ‘काशी के कोतवाल’ यानी काल भैरव के मंदिर में पूजा-अर्चना की। ललिता घाट पर प्रधानमंत्री ने गंगा स्नान किया। यहीं से वे कॉरिडोर देश को समर्पित करने विश्वनाथ धाम में प्रवेश करेंगे।

जानकारी के मुताबिक, काशी विश्वनाथ धाम का लोकार्पण रेवती नक्षत्र में किया जाना है। राम मंदिर के लिए मुहूर्त तैयार करने वाले आचार्य गणेश्वर शास्त्री द्राविड़ ने बताया कि 13 दिसंबर को रेवती नक्षत्र में दिन में 1:37 बजे से 1:57 बजे तक 20 मिनट का शुभ मुहूर्त प्राप्त हुआ है। यह मुहूर्त हर दृष्टि से उत्तम है।

कैसा है कॉरिडोर?

ललिता घाट और विश्वनाथ मंदिर परिसर के बीच वाले कॉरिडोर के हिस्से को ‘मंदिर चौक’ का नाम दिया गया है। श्रीकाशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के सूचना जनसंपर्क अधिकारी पीयूष तिवारी ने ऑपइंडिया को बताया, “प्रधानमंत्री यहीं से कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे। ये कॉरिडोर का सबसे बड़ा हिस्सा है। ज्यादा भीड़ होने पर हम इस हिस्से में श्रद्धालुओं को रोक भी सकते हैं ताकि मंदिर में अव्यवस्था न हो। इसी हिस्से में एम्पोरियम बनाए गए हैं।”

5.2 लाख वर्ग फीट में फैला है कॉरिडोर

कॉरिडोर 5.2 लाख वर्ग फीट में फैला हुआ है। इसमें 33,075 वर्ग फीट में काशी विश्वनाथ मंदिर का परिसर है। इस कॉरिडोर में एक साथ 02 लाख लोग जमा हो सकते हैं। निर्माण में मकराना, चुनार के लाल बलुआ पत्थर समेत 7 विशेष पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। विश्राम गृह, संग्रहालय, सुरक्षा कक्ष और पुस्तकालय भी कॉरिडोर का हिस्सा हैं। पूरे कॉरिडोर में वृक्षारोपण के लिए जगह बनाई गई है। इनमें परिजात, रुद्राक्ष, अशोक, बेल इत्यादि पेड़ लगेंगे ताकि पूरा परिसर हरा-भरा रहे।

तिवारी ने बताया, “पहले जो मंदिर का परिसर था, वह केवल 3500 स्क्वायर फीट था। कॉरिडोर के लिए जब हमने घरों की खरीद शुरू की तो पहले ड्रोन सर्वे करवाया। इसमें कई पुराने मंदिर दिखे। जब हमने निर्माण शुरू किया तो इस बात का ध्यान रखा कि परिसर में अगर कोई श्रद्धालु बाहर से आए तो उसे वह हर सुविधा दी जाए जो एक धार्मिक स्थल में उसे मिलना चाहिए।” वे बताते हैं, “मेन गेट के बगल में यात्री सुविधा केंद्र बनाया गया है। सुरक्षा जाँच के बाद श्रद्धालु मंदिर परिसर में प्रवेश करेंगे। इसमें चार द्वार बनाए गए हैं, जो चारों दिशाओं में हैं। यह परिसर चुनार के लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया है और इसका फर्श मकराना के सफेद संगमरमर से बना है। इस परिसर में अभी वृक्षारोपण होना है। इसी तरह गंगा की तरफ से भी प्रवेश की सुविधा है।”

सुविधा केंद्र से लेकर वैदिक केंद्र तक

तिवारी ने बताया कि पूरे कॉरिडोर में तीन यात्री सुविधा केंद्र बनाए गए हैं। इसके अलावा गेस्ट हाउस, धार्मिक पुस्तकों की बिक्री का केंद्र, जलपान केंद्र, सिटी म्यूजियम, वाराणसी गैलरी, मुमुक्षु भवन इत्यादि भी हैं। योग साधना के लिए वैदिक केंद्र है। सिटी म्यूजियम और वाराणसी भवन दोनों संग्रहालय हैं और तिवारी के अनुसार अलग-अलग उद्देश्यों से बनाए गए हैं। कॉरिडोर में कैफे बिल्डिंग है। गंगा व्यू गैलरी है, जहाँ बैठकर गंगा का पूरा दृश्य देखा जा सकता है। इसके अलावा एम्पोरियम है। उन्होंने बताया, “एम्पोरियम वाले हिस्से में जीआई उत्पादों के बड़े-बड़े शोरूम होंगे।” वे कहते हैं, “इस परियोजना को बनाने का जो मुख्य उद्देश्य था वह यह है कि सावन के सोमवार और शिवरात्रि पर करीब ढाई से तीन लाख लोग आते हैं। उस दौरान पूरा शहर, पूरी गलियाँ ठसाठस भरी होती हैं। मंदिर तक पहुँचने के लिए लोगों को कम से कम तीन से चार किमी की दूरी तय करनी पड़ती थी। अब गंगा स्नान कर श्रद्धालु सीधे कॉरिडोर में प्रवेश करेंगे। बाबा का जलाभिषेक करेंगे और शहर में निकल जाएँगे। मंदिर परिसर वाले ही हिस्से में एक वक्त में कम से कम 10 हजार लोग अब आ सकते हैं।”

40 ऐसे मंदिर मिले जो घरों में दब गए थे

वाराणसी के आयुक्त दीपक अग्रवाल बताते हैं कि इस कॉरिडोर के लिए जिस बोर्ड का गठन किया गया था, उसने कुल 314 घरों की खरीद की थी। जब कॉरिडोर निर्माण के लिए इन घरों को तोड़ने का काम शुरू किया गया तो करीब 40 ऐसे प्राचीन मंदिर मिले जो अतिक्रमण की वजह से लुप्त हो चुके थे। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती कॉरिडोर वाले हिस्से में जिनलोगों की संपत्ति आ रही थी उन्हें अपनी जगह छोड़ने के लिए तैयार करना था। लेकिन लोग इसके लिए तैयार हुए, क्योंकि इस परियोजना में उनकी आस्था थी। हमने पारदर्शी और आकर्षक वित्तीय प्रस्ताव मुहैया कराया। कई परिवारों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति देखते हुए उन्हें कम जगह के एवज में भी अच्छा-खासा मुआवजा प्रदान किया गया। जिन्होंने अतिक्रमण कर रखा था उनके भी हितों का ध्यान रखा गया। अग्रवाल ने बताया कि जो प्राचीन मंदिर इस दौरान मिले उन्हें संरक्षित किया गया है और जल्द ही श्रदालु इनमें दर्शन कर सकेंगे। उल्लेखनीय है कि मंदिर परिसर में मुख्य मंदिरों के अलावा कई छोटे मंदिर बनाए गए हैं। इनमें से कुछ में देवताओं की पुर्नस्थापना हो चुकी है। कई ऐसे मंदिर श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुल भी गए हैं। शेष में काम अंतिम दौर में है।

1000 साल बाद वही काशी, 352 साल बाद वह ज्ञानवापी कूप जिसमें शिवलिंग लेकर कूद गए थे पुजारी; 27 मंदिरों की मणिमाला भी

माँ गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित, वाराणसी दुनिया का सबसे पुराना जीवंत शहर और भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक राजधानी है। वहीं महादेव की नगरी काशी की पूरी भव्यता काशी विश्वनाथ मंदिर में है, जिसमें शिव, विश्वेश्वर या विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग है। जो अब काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के रूप में विशाल आकार लेकर 1000 साल पुराने अपने उसी अखंड स्वरुप में है जो 11वीं सदी तक हुआ करती थी। यूँ तो काशी नित्य निरंतर रंग-उमंग से भरी रहती है, वही काशी जहाँ सप्त वार में नौ त्योहार मनाने की परंपरा रही है; आज वो काशी एक नव त्योहार के रंग में रंगी है और हो भी क्यों नहीं काशी पुराधिपती बाबा विश्वनाथ के भव्य दरबार के लोकार्पण की जो तैयारी है।

बता दें कि विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग का भारत के आध्यात्मिक इतिहास में बहुत ही अनूठा महत्व है। परंपरा यह है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में बिखरे हुए अन्य ज्योतिर्लिंगों के दर्शन से अर्जित गुण काशी विश्वनाथ मंदिर में एकल यात्रा द्वारा शिव भक्तों को प्राप्त होते हैं। ऐसे में अद्भुत, अद्वितीय, अलौकिक और भव्य श्री काशी विश्वनाथ धाम आज 13 दिसंबर, 2021 को अगहन मास की दशमी तिथि को रवियोग में पीएम नरेंद्र मोदी जनता को समर्पित करेंगे। पीएम मोदी आज जब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे तो उस समय 12 ज्योतिर्लिंगों और 51 सिद्धपीठों के पुजारी भी उपस्थित रहेंगे। इसके साथ ही ‘न भूतो न भविष्यति’ की तर्ज पर काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण समारोह को भव्य रूप देने के लिए सनातन धर्म के सभी संप्रदायों की आज प्रांगण में उपस्थिति होगी।

आज गौरव का दिन है। जिसका स्वागत होना चाहिए। वर्षो से यहाँ आते साधु-संतों, सन्यासियों, साधकों के साथ ही काशी और काशीवासियों के हृदय की आवाज को और उनके मन में दबे उस प्रतिकार को बिना विध्वंश के अपनी सृजनात्मक क्षमता द्वारा बदल देने का जो कार्य काशी के सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है। उसे मैं महीनों से यहाँ आने-जाने वाले सभी शिव भक्तों की आँखों में पढ़ रहा हूँ। सभी दिव्य और भव्य काशी के इस बदलते स्वरुप को देखकर गदगद हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो प्रधानमंत्री ने अंजुमन इंतजामिया जामा मस्जिद (ज्ञानवापी मस्जिद) के रूप में बाबा विश्वनाथ परिसर में खींची गई छोटी लकीर को एक कॉरिडोर के रूप में एक बड़ी लकीर खींच कर बेहद छोटा कर दिया है। ज्ञानवापी अर्थात ज्ञान का कुआँ की जो प्राचीन अवधारणा है उस आधारभूत संरचना को धरातल पर लाने का जो संकल्प प्रधानमंत्री ने लिया था वो अब आम जनमानस के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है।

आनंद कानन की जो परिकल्पना रही है वो अब एक बार फिर काशी में आकर ले चुकी है जहाँ एक ओर माँ गंगा की अविरल धारा है तो दूसरी ओर स्वर्ग से उतरी पतित-पावनी गंगा को अपनी जटा में स्थान देने वाले काशी पुराधिपती बाबा विश्वनाथ अब एक सीध में बिना किसी अड़चन के एकाकार हो चुके है। अट्ठारवीं सदी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के द्वारा जिस यज्ञ का अनुष्ठान किया गया था, अलौकिक काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के रूप में प्रधामंत्री मोदी ने 352 साल बाद उसे सिद्धि प्रदान की है।

काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर

बाबा विश्वनाथ जो काशी के सर्वमान्य राजा है और राजराजेश्वर के रूप में यहाँ विराजमान है। उनके मंदिर परिसर की जो स्वर्णमयी आभा होनी चाहिए उसे मूर्तरूप देने का काम प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता और सनातन धर्म और हिन्दुओं के प्रति अहोभाव को दर्शाता है। जिनके द्वारा कोरोना जैसी महामारी के बीच भी मात्र 33 माह में एक असंभव सा दिखने वाला कार्य संभव हुआ है। आज मंदिर परिसर में पहुँचने वाला हर शिव भक्त हर काशीवाशी अभिभूत है। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा की बाबा विश्वनाथ दरबार का जो स्वरूप उन्होंने जीवनपर्यंत देखा वो इस अद्भुत स्वरूप में कैसे परिलक्षित हुआ। मंदिर के मुख्य अर्चक महंत श्रीकांत मिश्र भी इस बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं, “आज मंदिर का जो दिव्य और भव्य परिसर सबके सामने है वो बाबा काशी विश्वनाथ की इच्छा और प्रधानमंत्री मोदी के सार्थक और दृढ़ इच्छशक्ति के कारण ही संभव हुआ हैं।”

शिलान्यास से निर्माण तक की कुछ झलकियाँ

इससे पहले कि आगे इतिहास की बात करूँ आपकी जानकारी के लिए बता देता हूँ कि काशी विश्वनाथ धाम में 27 मंदिरों की एक खास मणिमाला भी तैयार की गई है। यह वे मंदिर हैं, जिनमें कुछ मंदिर तो काशी विश्वनाथ के साथ ही स्थापित किए गए थे और बाकी समय-समय पर काशीपुराधिपति के विग्रहों के रूप में यहाँ बसाए गए थे। जलासेन घाट से गंगा स्नान के बाद जल लेकर चलने वाले शिव भक्त इस मणिमाला को साक्षी मानकर ही गर्भगृह तक जाएँगे और यहाँ से दर्शन के बाद इन विग्रहों की परिक्रमा का जो प्राचीन विधान था वह पुनः स्थापित हुआ है। परियोजना के दूसरे चरण में 97 विग्रह व प्रतिमाओं की स्थापना और तीसरे चरण में 145 शिवलिंगों को भी स्थापित किया जाएगा।

पिछले एक महीने में कई बार इस मंदिर परिसर में गया और तब भी गया था जब इस परियोजना के लिए ड्रोन सर्वे के बाद 300 से ज़्यादा भवन खरीदे गए और उनके अंदर कैद किए गए काशी खंड के अनेक मंदिरों को मुक्त कराया गया। एक हजार साल से काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वंस का जो दंश भोग रहा था, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने उससे मुक्ति दिलाई है। आज जो कॉरिडोर हमारे सामने है ग्यारहवीं शताब्दी तक इस मंदिर परिसर की शक्ल कमोबेश ऐसी ही थी, जैसी आज आकार दी गई है।

काशी विश्वनाथ सिर्फ़ एक मंदिर नहीं बल्कि मंदिरों का संकुल था। मंदिर परिसर के चारों तरफ़ कॉरिडोर की शक्ल में कई कक्ष थे, जहाँ संस्कृत, ज्योतिष, तंत्र और आध्यात्म की शिक्षा दी जाती थी। गुरुकुल परंपरा के तहत विद्यार्थी यहीं अपने गुरु के सानिध्य में बैठकर वेद, पुराण, धर्म और दर्शन का ज्ञान अर्जित करते थे। कहा जाता है कि 1669 में औरंगजेब ने जब इस मंदिर संकुल को तोड़ने का आदेश दिया था तो उसकी एक वजह यह भी थी कि उसका सनातन धर्म के प्रति आकर्षित होता भाई दारा शिकोह यहाँ संस्कृत पढ़ता था।

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा इसका जिक्र करते हुए बताते है, “दारा शिकोह ने औरंगजेब और इस्लाम से बग़ावत की थी। इसलिए औरंगजेब ने 18 अप्रैल 1669 को मंदिर तोड़ने का फ़रमान जारी किया। फ़ारसी में लिखे इस फ़रमान में दर्ज था कि “वहाँ मूर्ख पंडित, रद्दी किताबों से दुष्ट विद्या पढ़ाते हैं।”

सोचिए हिन्दू धर्म और शास्त्रों के प्रति कैसी घृणा थी उन मुग़लों में जिन्होंने भारत की मूल संस्कृति, यहाँ की आध्यात्मिकता को मिटाने का दुस्साहस किया और हम सैकड़ों सालों से, यहाँ तक कि आजाद होने के बाद भी वर्षों तक उस विध्वंश का दंश झेलते रहे।

काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के बनने-उजड़ने का सिलसिला

कहा जाता है कि बाबा विश्वनाथ का यह मंदिर काशी में भगवान शिव और माता पार्वती का आदि स्थान भी है। 11वीं सदी तक यह अपने मूल रूप में बना रहा, सबसे पहले इस मंदिर के टूटने का उल्लेख 1034 में मिलता है। इसके बाद 1194 में मोहम्मद गोरी ने इसे लूटने के बाद तोड़ा। काशी वासियों ने इसे उस समय अपने हिसाब से बनाया लेकिन वर्ष 1447 में एक बार फिर इसे जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तुड़वा दिया। फिर वर्ष 1585 में राजा टोडरमल की सहायता से पंडित नारायण भट्ट ने इसे बनवाया था लेकिन वर्ष 1632 में शाहजहाँ ने एक बार फिर काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाने के लिए मुग़ल सेना की एक टुकड़ी भेज दी। लेकिन हिन्दुओं के प्रतिरोध के कारण मुग़लों की सेना अपने मकसद में कामयाब न हो पाई। हालाँकि, इस संघर्ष में काशी के 63 मंदिर नष्ट हो गए।

इसके बाद सबसे बड़ा विध्वंश आततायी औरंगजेब ने करवाया जो काशी के माथे पर सबसे बड़े कलंक के रूप में आज भी विद्यमान है। साक़ी मुस्तइद खाँ की किताब ‘मासिर -ए-आलमगीरी’ के मुताबिक़ 16 जिलकदा हिजरी- 1079 यानी 18 अप्रैल 1669 को एक फ़रमान जारी कर औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने का आदेश दिया। साथ ही यहाँ के ब्राह्मणों-पुरोहितों, विद्वानों को मुसलमान बनाने का आदेश भी पारित किया था।

मंदिर से औरंगजेब के ग़ुस्से की एक वजह यह थी यह परिसर संस्कृत शिक्षा बड़ा केन्द्र था और दाराशिकोह यहाँ संस्कृत पढ़ता था। और इस बार मंदिर की महज एक दीवार को छोड़कर जो आज भी मौजूद है और साफ दिखाई देती है, समूचा मंदिर संकुल ध्वस्त कर दिया गया। 15 रब- उल-आख़िर यानी 2 सितम्बर 1669 को बादशाह को खबर दी गई कि मंदिर न सिर्फ़ गिरा दिया है, बल्कि उसकी जगह मस्जिद की तामीर करा दी गई है। मंदिर के खंडहरों पर ही बना वह मस्जिद बाहर से ही स्पष्ट दीखता है जिसके लिए न किसी पुरातात्विक सर्वे की जरुरत है न किसी खुदाई की।

प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर की वह आखिरी बची दिवार जो ज्ञानवापी मस्जिद का हिस्सा है

एक और घटना जो उस समय घटी वह यह है कि स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को कोई क्षति न हो इसके लिए मंदिर के महंत शिवलिंग को लेकर ज्ञानवापी कुंड में ही कूद गए थे। हमले के दौरान मुगल सेना ने मंदिर के बाहर स्थापित विशाल नंदी की प्रतिमा को भी तोड़ने का प्रयास किया था लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी वे नंदी की प्रतिमा को नहीं तोड़ सके। जो आज भी अपने महादेव के इंतजार में मंदिर के उसी पुराने परिसर जो अब ज्ञानवापी मस्जिद है, की तरफ एक टक देख रहे हैं।

पहला तस्वीर में प्राचीन नंदी की प्रतिमा और दूसरी तस्वीर है अब कॉरिडोर का हिस्सा हो चुके नंदी महराज का लेकिन नजर अभी भी ज्ञानवापी पर है

हालाँकि, तब से आज तक विश्वनाथ मंदिर परिसर से दूर रहे ज्ञानवापी कूप और विशाल नंदी को एक बार फिर विश्वनाथ मंदिर परिसर में शामिल कर लिया गया है। और यह संभव हुआ है विश्वनाथ धाम के निर्माण के बाद। इस प्रकार 352 साल पहले अलग हुआ यह ज्ञानवापी कूप एक बार फिर विश्वनाथ धाम परिसर में आ गया है। लेकिन नंदी महराज की दिशा और दृष्टि से कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है। जो कहीं न कहीं बाबा विश्वनाथ की मुक्ति का आवाहन तब तक करते रहेंगे जब तक वो अपने महादेव को देख नहीं लेते।

एक बार फिर वापस लौटते हैं इतिहास के पन्नों में, औरंगजेब के आदेश पर उस समय मंदिर संकुल को तुड़वा कर बाबा विश्वनाथ मंदिर के ही ऊपर एक मस्जिद बना दी गई। जिसे बाद में औरंगजेब द्वारा दिया गया नाम था अंजुमन इंतजामिया जामा मस्जिद, जिसे बाद में ज्ञानवापी के नाम पर ज्ञानवापी मस्जिद कहा गया। ज्ञानवापी यानी ज्ञान का कुँआ। उसके बाद कई चरणों में काशीवासियों, होल्कर और सिन्धिया सरदारों की मदद से मंदिर परिसर का स्वरुप बनता-बिगड़ता रहा। लेकिन उसकी वह अलौकिक भव्यता नहीं लौटी जो काशी में कभी हुआ करती थी।

औरंगजेब के जाने बाद मंदिर के पुनर्निर्माण का संघर्ष जारी रहा। 1752 से लेकर 1780 तक मराठा सरदार दत्ता जी सिन्धिया और मल्हार राव होल्कर ने मंदिर की मुक्ति के प्रयास किए। पर 1777 और 80 के बीच इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर को सफलता मिली। महारानी अहिल्याबाई ने मंदिर तो बनवा दिया पर वह उसका वह पुराना वैभव और गौरव नहीं लौटा पाई। 1836 में महाराजा रणजीत सिंह ने इसके शिखर को स्वर्ण मंडित कराया। वहीं तभी से संकुल के दूसरे मंदिरों पर पुजारियों-पुरोहितों का क़ब्ज़ा हो गया और धीरे-धीरे मंदिर परिसर एक ऐसी गलियों की बस्ती में बदल गया जिसके घरों में प्राचीन मंदिर तक क़ैद हो गए।

आने वाले समय में काशी मंदिर पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया, जिस कारण मंदिर का निर्माण रोक दिया गया। फिर साल 1809 में काशी के हिन्दुओं द्वारा मंदिर तोड़कर बनाई गई ज्ञानवापी मस्जिद पर कब्जा कर लिया गया। इस प्रकार काशी मंदिर के निर्माण और विध्वंस की घटनाएँ 11वीं सदी से लेकर 15वीं सदी तक चलती रही। हालाँकि, 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने ‘वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल’ को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने के लिए कहा था, लेकिन यह कभी संभव ही नहीं हो पाया। तब से ही जारी यह विवाद आज तक चल रहा है।

28 जनवरी, 1983 को मंदिर को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इसका प्रबंधन तब से डॉ विभूति नारायण सिंह को एक ट्रस्ट के रूप में सौंपा गया है। इसमें पूर्व काशी नरेश, अध्यक्ष के रूप में और मंडल के आयुक्त के चेयरमैन के साथ एक कार्यकारी समिति बनाई गई। अभी एक न्यास परिषद भी है जो मंदिर के पूजा सम्बन्धी प्रावधानों को भी देखता है।

एक और बात वर्तमान आकार में मुख्य मंदिर 1780 में इंदौर की स्वर्गीय महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा बनाया गया था। 1785 में गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स के कहने पर तत्कालीन कलेक्टर मोहम्मद इब्राहीम खान द्वारा मंदिर के सामने एक नौबतखाना बनाया गया था। 1839 में, मंदिर के दो गुंबदों को पंजाब केसरी महाराजा रणजीत सिंह द्वारा दान किए गए सोने से कवर किया गया। तीसरा गुंबद अभी भी वैसे ही बिना स्वर्ण जड़ित है। जिस पर योगी सरकार ने ध्यान देते हुए संस्कृति धार्मिक मामले मंत्रालय के जरिए मंदिर के तीसरे शिखर को भी स्वर्णमंडित करने में गहरी दिलचस्पी ले रहा है।

कहते हैं इतिहास के अपने प्रस्थान बिन्दु होते है। काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के रूप में आज का यह स्वरूप निर्माण का तीसरा प्रस्थान बिन्दु है। जब भी इतिहास में काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के पुनर्निर्माण का ज़िक्र किया जाएगा, मंदिर का पुनरुद्धार करने वाली महारानी अहिल्या बाई होल्कर, इसके शिखर को स्वर्ण मंडित करने वाले महाराजा रणजीत सिंह और मंदिर को उसकी ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आभा लौटाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम सामने होगा।

स्कूल में दुबली-पतली होने पर उड़ाते थे मजाक, मिस यूनिवर्स के मंच पर ‘म्याऊं-म्याऊं’ करवाया: सुष्मिता-लारा के बाद हरनाज संधू ने मनवाया भारतीय सौंदर्य का लोहा

इजरायल में आयोजित मिस यूनिवर्स 2021 कार्यक्रम में 79 देशों की सुंदरियों को पीछे छोड़ते हुए भारत की हरनाज संधू ने 70 वें मिस यूनिवर्स के खिताब को अपने नाम कर लिया है। इससे पहले वह मिस दिवा यूनिवर्स 2021 का ताज भी अपने नाम कर चुकी हैं। हरनाज से पहले ये खिताब 27 साल पहले 1994 में सुष्मिता सेन और 21 साल पहले 2000 में लारा दत्ता ने जीता था।

हरनाज के बारे में बता दें कि वह पंजाब के चंडीगढ़ की रहने वाली हैं। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई चंडीगढ़ के शिवालिक पब्लिक स्कूल से की। चंडीगढ़ से ही ग्रैजुएट होने के बाद वह मास्टर की पढ़ाई कर रही हैं।

कुछ रिपोर्ट्स बताती है कि जब वो स्कूल में थी तब उनका दुबला-पतला होने के कारण मजाक उड़ता था। इस कारण वह डिप्रेशन में भी थी। हालाँकि, परिवार का साथ पाकर वह बुरे अनुभवों से उभर पाईं। बाद में उन्होंने 2017 में मिस चंडीगढ़ का खिताब जीता। 2018 में उन्हें मिस मैक्स इमर्जिंग स्टार इंडिया 2018 का ताज मिला। 2019 में वह मिस इंडिया की प्रतियोगिता में शामिल हुईं और टॉप 12 तक अपनी जगह बनाई। 2021 में उन्हें मिस दिवा यूनिवर्स का खिताब मिला और फिर अब उनके हिस्सा मिस यूनिवर्स का ताज आया है।

इस प्रतियोगिता में संधू ने कहा, “आज का युवा जिस सबसे बड़े दबाव का सामना कर रहा है, वह है खुद पर विश्वास करना। आपका यह जानना कि आप अलग हैं ही आपको सबसे खूबसूरत बनाता है। अपनी तुलना दूसरों से न करें और अन्य महत्वपूर्ण चीजों के बारे में बात करें। बाहर निकलों और अपने बारे में बोलो क्योंकि आप ही अपने जीवन के कर्ता हो। आप अपनी आवाज हो। मैंने खुद पर यकीन किया इसलिए आज मैं यहाँ हूँ।”

अपने ट्विटर पर श्री हरमंदिर साहिब की एक वीडियो साझा करके संधू ने भगवान को शुक्रिया अदा किया और बताया कि परिणाम जो भी हो वो खुद को पहले ही यहाँ तक पहुँचने पर विजेता मानती हैं। उन्होंने इस कार्यक्रम के हर क्षण को जिया है। इस कार्यक्रम में एक सवाल के जवाब में संधू ने प्रकृति के बिगड़ते संतुलन पर अपनी निराशा जताई।

इसके अलावा स्टेज पर कुछ ऐसा भी हुआ जिसने तमाम सोशल मीडिया यूजर्स को नाराज कर दिया। दरअसल, शो के होस्ट स्टीव हार्ली ने आयोजन में सबके सामने संधू से किसी जानवर की आवाज निकालने के लिए कहा था। उनका कहना था कि उन्होंने ये सुना है कि संधू ऐसी आवाजें निकाल लेती हैं तो वो किसी एक जानवर की आवाज निकालें।

स्टीव की ऐसी डिमांड पर संधू थोड़ा हिचकिचाईं, मगर बाद में उन्होंने बिल्ली की आवाज (म्याऊं-म्याऊं) निकाल दी। जब शो की यह वीडियो क्लिप वायरल होनी शुरू हुई तो लोगों ने इसे वाहियात सवाल और डिमांड बताया। वहीं कुछ ने संधू की कहीं बातों को प्रेरणा बताया।