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‘मथुरा की तैयारी है’: केशव मौर्य के बयान से अखिलेश यादव को लगी मिर्ची, सन् 1670 की गलती सुधारने का यही सही समय?

अयोध्या का निर्णय हो चुका है और कुछ ही महीनों में वहाँ भगवान श्रीराम का एक भव्य मंदिर खड़ा होकर भारत की नई पहचान बनेगा। 90 के दशक में कई कारसेवकों ने बलिदान दिया, पिछले लगभग 500 वर्षों में कई बार हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष हुआ और अदालत में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी गई, लेकिन बाबरी ढाँचे के विध्वंस के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम की जन्मभूमि उन्हें वापस मिल गई। 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अब मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा गरमा रहा है।

सबसे पहले आपको मथुरा में ताज़ा हालात की बात करें तो उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बयान के बाद से तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। यूपी के डिप्टी सीएम ने कहा है कि अयोध्या और काशी में भव्य मंदिर निर्माण जारी है और मथुरा की तैयारी है। ट्विटर पर उन्होंने इसके साथ ही ‘जय श्रीराम’, ‘जय शिव शम्भू’ और ‘जय श्री राधे-कृष्ण’ का टैग भी लगाया। तो क्या ये माना जाए कि हिन्दुओं के लिए अब अगला मुद्दा मथुरा में मुगलों के अवैध अतिक्रमण को दुरुस्त करना है?

पुलिस-प्रशासन लोगों से अपील कर रहा है कि वो 6 दिसंबर को होने वाले किसी कार्यक्रम में शामिल न हों। SSP गौरव ग्रोवर ने बताया कि धारा-144 पहले से ही लागू है और अगर कोई व्यक्ति अफवाहें फैलाने में संलिप्त पाया जाता है तो उसके विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि शहर के शांतिपूर्ण माहौल में खलल डालने का कार्य बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों से भी संपर्क स्थापित कर के उनके अंदर आत्मविश्वास भरा गया है।

बता दें कि जिस उत्तर प्रदेश में अब तक जाति के आधार पर राजनीतिक दल सत्ता हथियाया करते थे, वहाँ 2017 में समीकरण बदल गया और हिन्दू एकता के साथ-साथ केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कामकाज को देखते हुए जनता ने भाजपा को मौका दिया। गोरखपुर में इंसेफ्लाइटिस से निपटना हो या कोरोना महामारी का कुशल नियंत्रण, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जम कर प्रशंसा हुई। जेवर एयरपोर्ट हो या पूर्वांचल एक्सप्रेस, इंफ्रास्ट्रक्चर में भी खूब कार्य हुए हैं।

ऐसे में चुनाव से पहले मथुरा में कुछ हिन्दू संगठनों द्वारा शाही ईदगाह मस्जिद में श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करने के ऐलान ने पुलिस-प्रशासन को सतर्क कर दिया। उत्तर प्रदेश में 45% मतदाता OBC समुदाय से आते हैं और इनका 9% यादव समुदाय है। यादव समुदाय खुद को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज मानता है। लेकिन, इसके बावजूद 3 बार मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव और एक बार सीएम रहे उनके बेटे अखिलेश ने कभी मथुरा में श्रीकृष्ण मंदिर निर्माण का मुद्दा नहीं उठाया।

मुलायम परिवार की यहाँ बात इसीलिए की जा रही है, क्योंकि उनकी समाजवादी पार्टी राज्य के यादव समुदाय के वोटों का खुद को इकलौता ठेकेदार मानती आई है। जबकि बिहार और उत्तर प्रदेश, दोनों जगह देखा गया है कि हिंदुत्व और विकास के मुद्दे पर जातिवाद टूटा है और लोगों ने नरेंद्र मोदी के चेहरे को देख कर वोट दिया है। ऐसे में आज के माहौल में अखिलेश यादव का मथुरा में मंदिर निर्माण को लेकर नकारात्मक बयान देना उनके लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

अखिलेश यादव ने तंज कसते हुए कह डाला कि कोई नई रथ-यात्रा या मंत्र भाजपा को अगले चुनाव में नहीं बचा सकती है। राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने हाल ही में अखिलेश को चुनौती भी दी है कि वो मंच से सार्वजनिक रूप से ये बोलें कि मथुरा भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि है और अवैध तरीके से मस्जिद खड़ी हुई है। उन्होंने ये बोलने की चुनौती दी कि मथुरा में श्रीकृष्ण की जन्मभूमि पूरी तरह मस्जिद से मुक्त होनी चाहिए। जाहिर है, अखिलेश यादव ऐसा नहीं बोलेंगे।

इसका सबसे बड़ा कारण है – मुस्लिम तुष्टिकरण। उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग साढ़े 4 करोड़ आँकी गई है, जो वहाँ की कुल जनसंख्या का साढ़े 19 प्रतिशत के करीब है। ऐसे में अखिलेश यादव कभी नहीं चाहेंगे कि शाही ईदगाह मस्जिद के खिलाफ बयान देकर वो मुस्लिमों को नाराज करें। 13 दिसंबर, 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र में काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे, ऐसे में मथुरा-काशी का मामला अभी और आगे बढ़ेगा।

अखिलेश यादव ने सैफई में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करवाई थी। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने श्रीकृष्ण प्रतिमा की राजनीति खेली थी। वो भी ऐसी प्रतिमा, जिसमें वो युद्ध की मुद्रा में दिखे थे। फिर मथुरा पर चुप्पी क्यों? सपा अध्यक्ष अंकोर वाट की तर्ज पर भगवान विष्णु के नाम पर एक भव्य मंदिर और शहर के निर्माण का वादा भी कर चुके हैं। फिर उनके 8वें अवतार की जन्मभूमि से परहेज क्यों? उन्होंने इसके लिए विशेषज्ञों की समिति को कम्बोडिया तक भेजने की बातें की थीं।

याद रखने की ज़रूरत है कि 80 के दशक में जब राम मंदिर के लिए आंदोलन तेज़ हुआ था, तब इसमें इसके साथ-साथ काशी और मथुरा की भी बात की। थोड़ा इतिहास में चलें तो हम पाएँगे कि सन् 1670 में औरंगजेब ने मथुरा पर हमला बोला और केशवदेव मंदिर को ध्वस्त कर के उसके ऊपर शाही ईदगाह मस्जिद बनवा दिया। ये पहली बार नहीं था जब इस्लामी आक्रांताओं ने ऐसा किया। औरंगजेब का सूबेदार अब्दुल नबी खान पहले से ही मथुरा में तबाही मचाता रहा था।

उससे पहले सन् 1017-18 में महमूद गजनी ने मथुरा पर हमला बोला था और कई मंदिरों को ध्वस्त कर के कइयों को जला डाला था। मथुरा का जिक्र पाणिनि ने अपने संस्कृत व्याकरण की पुस्तक में भी किया है। प्राचीन काल में मथुरा एक भव्य शहर हुआ करता था, जहाँ ब्राह्मणों की अच्छी-खासी जनसंख्या थी। जैन और बौद्ध समुदाय की भी इस स्थल में खासी आस्था थी। वामपंथी इतिहासकार भी मानते हैं कि ईसा से 600 वर्ष पूर्व तक के इस शहर के लोकप्रिय होने के प्रमाण मिलते हैं।

6 दिसंबर को अयोध्या में बाबरी विध्वंस की बरसी भी है, ऐसे में मथुरा में अभी से ही धारा-144 लगा दी गई है। पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया है तो कुछ नजरबंद किए गए हैं। ‘नारायणी सेना’ ने संकल्प यात्रा की योजना बनाई है। CRPF ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इबादतगाह मेंअचानक से लोगों की संख्या बढ़ गई है और संदिग्ध गतिविधियाँ देखी जा रही हैं। शाही ईदगाह मस्जिद में इतनी बड़ी संख्या में मुस्लिमों का आना ज़रूर ही चिंता का विषय है।

मथुरा का मुद्दा नया नहीं है। अदालत में इस मामले में याचिकाएँ दाखिल की गई हैं और उन सुनवाई होती रही है। 13.37 एकड़ जमीन पर दावा करते हुए हिन्दू यहाँ से शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की माँग करते रहे हैं। 1935 में इलाहाबाद उच्च-न्यायालय ने वाराणसी के हिन्दू राजा को भूमि के अधिकार सौंपे थे। 1951 में ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट’ बना और यहाँ भव्य मंदिर के निर्माण का संकल्प लिया गया। 1958 में ‘श्रीकृष्ण जन्म सेवा संघ’ का गठन हुआ।

इसी ट्रस्ट ने प्रबंधन का जिम्मा उठाया। 1968 का एक समझौता ही सारे विवाद की जड़ है जिसे मंदिर और मस्जिद पक्ष की बैठक के बाद तय किया गया था। उसमें मुस्लिमों को मस्जिद के प्रबंधन के अधिकार दे दिए गए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या दीपोत्सव में जब कारसेवकों पर मुलायम सिंह यादव की सरकार द्वारा करवाई गई गोलीबारी को याद किया, तब उन्होंने स्पष्ट कहा था कि अब कारसेवा होगी तो कृष्णभक्तों पर फूल बरसेंगे। उन्होंने कहा था कि तब यही लोग कारसेवा के लिए लाइन में खड़े होंगे।

ये हमने देखा, जब राम मंदिर के निर्माण के बाद इसके सालों से विरोध करते आ रहे लोगों ने भी समर्थन करना शुरू कर दिया। औरंगजेब ने अपने दरबार के ‘मुहतसिब’ की सलाह पर कृष्ण जन्मभूमि मंदिर को तोड़ा था, जो मजहबी मामले देखता था। इसीलिए, बाबरी और शाही ईदगाह में कोई अंतर नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ‘किसान आंदोलन’ का भी असर देखा गया, ऐसे में वहाँ विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और हिन्दुओं में मथुरा को लेकर भावनाएँ नए-नए ठेकेदारों के लिए भी समस्या पैदा कर सकता है।

राजस्थान के जालोर में 70 वर्षीय पुजारी की हत्या, कुटिया में घुसकर बादमाशों ने वृद्ध पर चाकू और सरिया से किया था हमला

राजस्थान के जालोर जिले में अज्ञात हमलावरों ने हनुमान मंदिर की कुटिया में सो रहे एक पुजारी की सोमवार (29 नवंबर 2021) की रात हत्या कर दी। पुलिस के अनुसार, चोरी के इरादे से बदमाश मंदिर में घुसे थे और पुजारी पर चाकू व सरिया से हमला कर उनकी हत्या कर दी। घटना देर रात 2 बजे की है। बुजुर्ग पुजारी के चिल्लाने के पर स्थानीय लोग पहुँचे तो घटना का पता चला। 

घटना की सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुँची और घायल पुजारी को इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती करवाया था। इलाज के दौरान मंगलवार (30 नवंबर 2021) की सुबह पुजारी की मौत हो गई। मृतक पुजारी बीते 30 सालों से कुटिया में रह रहे थे। फिलहाल पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज कर आरोपितों की तलाश शुरू कर दी है।

मंदिर की कुटिया में सो रहे पुजारी की हुई हत्या

मामला जालोर जिले में बागोड़ा थाना क्षेत्र के धुंबडिया गाँव का है। एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक, धुंबडिया गाँव के रहने वाले नेनूदास वैष्णव (70) बीते 30 सालों से हनुमान जी सेवा कर रहे थे और कुटिया बनाकर रह रहे थे। रोज की तरह सोमवार को भी वह पूजा करने के बाद सो गए थे। रात 2 बजे के करीब चोरी की नियत से कुछ बदमाश कुटिया में घुस आए, जिसे पुजारी ने देख लिया। इसके बाद बदमाशों ने पुजारी को ना सिर्फ लात-घूँसों से मारा-पीटा, बल्कि चाकू और सरिये से भी हमला किया। घटना के बाद से कुटिया में रखा दानपात्र भी गायब है।

आरोपित को पकड़ने के लिए पुलिस ने बनाई टीमें

इस मामले में डीएसपी (भीनमाल) शंकर लाल ने बताया कि पोस्टमॉर्टम कराने के बाद पुजारी के शव को परिवार के हवाले कर दिया गया। वहीं, आरोपितों को पकड़ने के लिए पुलिस की कई टीमों का गठन किया गया है। फिलहाल आरोपितों की तलाश में पुलिस जगह-जगह दबिश दे रही है। जालोर पुलिस ने बताया कि उक्त घटना की सूचना पर सीओ भीनमाल, थानाधिकारी बागोड़ा व थानाधिकारी भीनमाल द्वारा मौके पर पहुँचे।

रिपब्लिक टीवी की महिला पत्रकार को देख भड़के राकेश टिकैत, सवाल पूछने पर कहा- मुझे टच करती है, पुलिस बुलाओ, देखें वीडियो

दिल्ली-उत्तर प्रदेश के गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों के धरना प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत की बुधवार (1 दिसंबर 2021) को रिपब्लिक भारत न्यूज़ चैनल की महिला पत्रकार से तीखी बहस हो गई। बहस के दौरान का वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहा है, जिसमें किसान नेता राकेश टिकैत कहते हुए नजर आ रहे हैं, “मुझे आर भारत को जवाब नहीं देना है। आपको सुधार करने की जरूरत है।” वह आगे कहते हैं कि इनकी वीडियो बनाओ। ये यहाँ आकर बदतमीजी करते हैं।

इस दौरान महिला पत्रकार कहती है, “आपको जवाब क्यों नहीं देना है। सिर्फ एक सवाल का तो जवाब दे दीजिए। बदतमीजी तो हमारे साथ भी हो रही है।” तभी राकेश टिकैत के समर्थक पीछे से ‘भारतीय किसान यूनियन जिंदाबाद’ के नारे लगाने लगते हैं।

महिला पत्रकार ने जब हुड़दंग के बीच भी उनसे सवाल पूछना जारी रखा तो राकेश टिकैत महिला पत्रकार पर चिल्लाते हुए बोले, “कोई इसका वीडियो बनाओ। यह मुझसे बदतमीजी कर रही है। पुलिस बुलाओ, यह लड़की बदतमीजी करती है, मुझे टच करती है।”

महिला पत्रकार पर चिल्लाते हुए राकेश टिकैत ने उसे किसानों और भारत को बदनाम करने वाली बताया। इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसके बाद उनकी जमकर आलोचना हो रही है।

पत्रकार सुशांत सिन्हा ने इसका वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “पहले राकेश टिकैत के लोगों ने महापंचायत के वक्त महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी की थी और अब साइडलाइन किए जाने से बौखलाए राकेश टिकैत खुद इस स्तर पर चले गए कि महिला रिपोर्टर को कह रहे कि ‘टच करती है’। एक महिला के साथ यह दुर्व्यवहार किसी किसान का हो सकता है क्या? शर्मनाक।”

व्यालोक ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “ये दो कौड़ी का गटरछाप गुंडा खुद को किसान नेता कहता है। ये एक महिला का किस तरह अपमान कर रहा है, क्योंकि उसने एक खास चैनल का माइक पकड़ रखा है। अजीत अंजुुम और आरफा-राना अयूब जैसों को ये नहीं दिखाई देगा, आँखों पर कॉन्ग्रेस की चर्बी जो चढ़ी है।”

वीडियो में महिला पत्रकार ने आरोप लगाया कि किसान नेता सिर्फ उन्हीं मीडिया संस्थानों से बात करते हैं, जो उनकी मर्जी के सवाल पूछते हैं और सिर्फ उनकी ही बात जनता के सामने रखते हैं। दरअसल, संयुक्त किसान मोर्चा के नेता रिपब्लिक भारत पर पक्षपात पूर्ण रिपोर्टिंग करने का आरोप लगाते रहे हैं।

किसानों का कहना है कि रिपब्लिक भारत किसान प्रदर्शनकारियों के खिलाफ खबरें चलाता है। सिर्फ रिपब्लिक भारत ही नहीं, बल्कि किसान नेता उन सभी चैनलों को ‘गोदी मीडिया’ कहते हैं जो धरना प्रदर्शन की आड़ में हो रहे अपराधों या उनकी हठधर्मिता को दिखाते हैं।

ऐसा ही एक वाकया टीवी चैनल आजतक की एंकर चित्रा त्रिपाठी के साथ भी हुआ था। जब वह कवरेज के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर पहुँची तो किसानों ने उन्हें घेर कर ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगाने लगे थे।

गौरतलब है कि आज तक टीवी चैनल की पत्रकार और संपादक चित्रा त्रिपाठी रविवार (5 सितंबर 2021) को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में किसानों की महापंचायत को कवर करने के लिए गई थीं। वहाँ कृषि कानून विरोधी प्रदर्शनकारियों ने उन्हें काफी परेशान किया। प्रदर्शनकारी चित्रा के आसपास जमा हो गए और ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगाने लगे। आखिरकार कार्यक्रम को कवर करने के लिए गईं पत्रकार को मौके से खदेड़ दिया गया

इससे पहले जंतर मंतर धरना स्थल पर ‘किसानों’ ने मीडियाकर्मियों पर हमला किया था। एक घायल मीडियाकर्मी ने घटना की जानकारी देते हुए बताया था कि वहाँ पर कुछ ऐसे लोग सक्रिय थे, जो पत्रकारों को गालियाँ दे रहे थे। खून से लथपथ न्यूज 18 के कैमरामैन नागेंद्र ने बताया था, “उन्होंने एक महिला रिपोर्टर को गालियाँ दीं, जो किसानों के विरोध प्रदर्शन को कवर कर रही थीं और जब हमने उन्हें ऐसा करने से रोका तो उन्होंने मेरे सिर पर डंडे से हमला किया।”

‘गुजरात में किसके शासन में हुई बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोधी हिंसा?’: सवाल को लेकर विवाद, CBSE ने मानी गलती, होगी कार्रवाई

12वीं कक्षा के एक सवाल को लेकर ‘केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE)’ ने सफाई दी है। ये सवाल पहले टर्म की परीक्षा में समाज शास्त्र विषय में पूछी गई थी। अब CBSE ने बुधवार (1 दिसंबर, 2021) को शाम 6:45 बजे सफाई देते हुए कहा है कि ये सवाल अनुचित था और क्वेश्चन पेपर्स को सेट करने वाले ‘एक्सटर्नल सब्जेक्ट एक्सपर्ट्स’ के लिए जो आधिकारिक दिशानिर्देश तय किए गए हैं, उसका भी उल्लंघन है। CBSE ने अपनी गलती मानते हुए इसका संज्ञान लिया है।

CBSE की परीक्षा में इस सवाल पर हुआ बवाल

साथ ही संस्था ने आश्वस्त किया कि इसमें शामिल सभी दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी। जिस सवाल को लेकर ये विवाद है, उसमें पूछा गया था, “2002 में गुजरात में काफी बड़े पैमाने पर मुस्लिम विरोधी हिंसा का प्रसार किस राजनीतिक दल के शासनकाल में हुई?” OMR शीट में जवाब के रूप में ये चार विकल्प दिए गए थे- “कॉन्ग्रेस, भाजपा, डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन”। बता दें कि 2002 में गुजरात में नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे और वहाँ भाजपा की सरकार थी।

गोधरा में 59 हिन्दुओं को ज़िंदा जलाए जाने के बाद हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच संघर्ष छिड़ गया था। तभी इसे इसका नाम लेकर नरेंद्र मोदी को बदनाम करने की कोशिश की जाती रही है। हालाँकि, इस मामले में न तो जाँच एजेंसियों को कुछ मिला और अदालत से भी उन्हें क्लीन चिट मिल गई। बता दें कि CBSE के पेपर्स में आजकल सिर्फ किताबें ही नहीं, बल्कि बच्चों की समझ और सोच का भी परीक्षण किया जाता है। इसी बीच में इस तरह का सवाल सामने आने से संस्था की फजीहत हुई है।

मनजिंदर सिंह सिरसा हुए भाजपा में शामिल: पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले शिरोमणि अकाली दल को लगा बड़ा झटका

पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले शिरोमणि अकाली दल को बड़ा झटका लगा है। शिरोमणि अकाली दल के नेता और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के वर्तमान अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा बुधवार (1 दिसंबर 2021) को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय गृृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और धर्मेंद्र प्रधान आदि नेताओं की मौजूदगी में भाजपा में शामिल हो गए। सिरसा ने भाजपा में शामिल होने के साथ दिल्ली गुरुद्वारा प्रबंधन समिति से इस्तीफा दे दिया है।

भाजपा में शामिल होने के बाद सिरसा ने कहा, ”केंद्रीय गृहमंत्री और प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि सिखों के जितने भी मुद्दे हैं वे हल होने चाहिए, लेकिन ये राजनीति के भेंट चढ़े हैं। इसलिए मैं दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुआ हूँ।”

इससे पहले सिरसा ने ट्विटर पर अपना इस्तीफा साझा करते हुए लिखा, “सभी पदाधिकारियों, सदस्यों, कर्मचारियों और मेरे साथ काम करने वाले लोगों का आभार व्यक्त करता हूँ। मैं दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी से अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे रहा हूँ और आगामी DSGMC का चुनाव नहीं लडूँगा। अपने समुदाय, मानवता और राष्ट्र की सेवा करने की मेरी प्रतिबद्धता बनी रहेगी।”

सिरसा ने वीडियो के माध्यम से कहा कि वह निजी कारणों से वे दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधन समिति से इस्तीफा दे रहे हैं और इसके अगले चुनाव से वे खुद को दूर रखेंगे। उन्होंने दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्यों, देश और दुनिया के सिखों को धन्यवाद दिया, जिन्होंने उन्हें काफी मान बक्शा है। उन्होंने कहा, “मेरे सदस्यों, शुभचिंतकों को धन्यवाद, जिन्होंने अब तक मेरा समर्थन किया है।”

बता दें कि दिल्ली गुरुद्वारा चुनाव निकाय के निदेशक नरिंदर सिंह ने मंगलवार (30 नवंबर) को मनजिंदर सिंह सिरसा को डीएसजीएमसी के सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया था। उन्होंने कहा था कि सिरसा इस पद के लिए योग्य नहीं था, क्योंकि वह ‘गुरुमुखी‘ (पंजाबी लिखने के लिए सिखों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली लिपि) को पढ़ना और लिखना नहीं जानते हैं। दिल्ली सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1971 के अनुसार, इस पद के लिए ‘गुरुमुखी’ आना जरूरी है।

वर्जिनिटी एक मिथ, सील-वील कुछ नहीं होती… बढ़िया है मैं बेगैरत, बेशर्म हूँ: बिग बॉस में धमाका मचाने वाली मूस जट्टाना

पंजाब के चंडीगढ़ की रहने वाली और बिग बॉस ओटीटी से लोगों के बीच पहचान बनाने वाली मूस जट्टाना या मुस्कान जट्टाना एक बार फिर सुर्खियों में हैं। खुद को बाइसेक्सुअल घोषित करने वाली मूस जट्टाना ने बिग बॉस ओटीटी में यह कहकर धमाका कर दिया था कि वह एक लड़की से ही शादी करना चाहती हैं। साथ ही उन्होंने भारत में वर्जिनिटी को लेकर चल रही बहस के बीच एक ऐसा बयान दिया है कि वे फिर से खबरों में आ गई हैं। 

मूस जट्टाना ने लोगों की सोच को लेकर कहा कि जब भी कोई भारतीय पुरुष अपने लिए लड़की देखने जाता है तो उसकी एक ही ख्वाहिश होती है कि उसे सीलबंद लड़की मिले, जबकि ऐसा कुछ होता ही नहीं है। उन्होंने अपने इंस्टाग्राम पर एक तस्वीर भी पोस्ट की है। तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा है कि आखिर वर्जिनिटी है क्या। 

मूस ने कहा- सील-वील कुुछ नहीं होता है

मूस जट्टाना ने कहा कि वर्जिनिटी एक मिथक है। सील-वील कुछ नहीं होती है। यह एक मांसपेशी होती है, जो बड़े होने के साथ खुद ही टूट जाती है। इसके बारे में सीखिए। लेकिन इसका उपयोग महिलाओं और लड़कियों को नीचा दिखाने के लिए मत कीजिए। भगवान का शुक्र है कि वह किसी संकुचित दिमाग वाले भारतीय परिवार के लिए कभी भी संस्कारी नहीं बन पाएँगी।

मूस ने कहा कि शुक्र है कि कोई भी माँ उन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगी। शुक्र है ऊपर वाले का। मूस ने कहा, “शुक्र है कि मैं बेगैरत, बदतमीज और बेशर्म हूँ। मैं चाहती हूँ कि किसी भी लड़की या महिला को निरर्थक परंपरा और उम्मीदों ना बंधना पड़े।”

शानदार सेक्स की दुआ

मूस ने आगे अपने पोस्ट में कहा, “मैं आप सभी बहनों के बेहतर जीवन की कामना करती हूँ। मैं आपके लिए अद्भुत सेक्स की कामना करती हूँ। बहुत सारी इंटीमेसी, प्रयोग और नई चीजें सीखने के लिए प्रार्थना करती हूँ। कोई भी अपनी इच्छाओं को ना रोके। मुझे आशा है कि आपको पूरी दुनिया देखने को मिले। मैं कामना करती हूँ कि आपका साथी आपके बर्तन धोए, बिस्तर सजाए। मैं चाहती हूँ कि आप स्वतंत्र और जीवन से भरपूर हों। मैं प्रार्थना करती हूँ कि आपके पार्टनर आपसे बहुत प्यार करे।” मूसा के इस पोस्ट पर कई लोगों ने उनका सपोर्ट किया है, जबकि कुछ लोगों ने नेगेटिव कमेंट कर उन्हें ट्रोल भी किया।

असम में भागने की कोशिश में सड़क दुर्घटना का शिकार हुआ जोरहाट मॉब लिंचिंग का मुख्य आरोपित, हुई मौत; चल रहे थे 90 केस

असम में जोरहाट में हुई मॉब लिंचिंग की घटना के मामले के मुख्य आरोपित नीरज दास की 1 दिसंबर की रात को सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। दरअसल, जब पुलिस उसे लेकर जा रही थी तो वो बचने के लिए जीप से बाहर कूद गया था, जिससे उसका ये हाल हुआ। उसे ‘कोला लोरा’ यानि काला लड़का कहा जाता था। दास छात्र नेता अनिमेष भुइयाँ को पीटने के मामले सहित पहले से ही कई अन्य मामलों में कुख्यात अपराधी रहा है।

नीरज दास की मौत जोरहाट जिले के सिनामारा खरिया चुक इलाके में हुई। पुलिस उसे लेकर जा रही थी तो उसने बचने के लिए बाहर छलांग लगाई, लेकिन वह दूसरी पुलिस की जीप से टकरा गया। बाद में उसे जोरहाट मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (JMCH) ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस घटना में तीन अन्य पुलिस वाले भी घायल हुए हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जब नीरज दास जीप से कूदा तो वो एस्कॉर्ट कार से टकराया, जिससे जीत का ड्रायवर संतुलन खो बैठा और गाड़ी दीवार से टकरा गई। कहा जा रहा है कि पुलिस एक नशीली ड्रग्स की तलाश में नीरज को लेकर जा रही थी, वहीं पुलिस का कहना है कि वो भागने की कोशिश कर रहा था।

एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक, “घटना बुधवार (1 दिसंबर 2021) को तड़के करीब 1:30 बजे घटी। वह एक ड्रग तस्कर था। उसने जोरहाट में नशीली दवाओं के ठिकानों की पहचान में मदद करने का आश्वासन दिया था। इसलिए हम उसे ड्रग नेटवर्क का भंडाफोड़ करने के लिए ले गए थे। लेकिन अब ऐसा लगता है कि वो हमें गुमराह कर रहा था। वो हमें ले जाकर वहाँ से भागने की कोई योजना बनाई थी।”

पुलिस अधिकारी ने आगे कहा, “वह पुलिस की गाड़ी से बाहर कूद गया, उसके ठीक पीछे चल रही गाड़ी चल रही थी। उसे चलती कार से कूदता देख गाड़ी का ड्राइवर अपना कंट्रोल खो बैठा और गलती से उसे ठोकर लग गई। इससे उसकी मौत हो गई। हमारे तीन लोगों को भी दुर्घटना में चोटें आई हैं और उनका इलाज जेएमसीएच में किया जा रहा है।”

बहरहाल, कुख्यात अपराधी ‘कोला लोरा’ की मौत की खबर फैलने के बाद जोरहाट और गोलाघाट जिले में लोग जश्न मनाने के लिए सड़कों पर निकल आए। लोगों ने पटाखे भी फोड़े। उसके खिलाफ 90 से अधिक मामले दर्ज थे और वो जमानत पर बाहर था। उस पर तीन लोगों पर भीड़ के हमले के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था, जिसके कारण अनिमेष भुइयाँ की मौत हो गई और अन्य दो घायल हो गए।

इस घटना के बाद असम के लॉ एंड ऑर्डर स्पेशल डीजीपी जीडी सिंह ने ट्विटर हैंडल पर एक मैसेज पोस्ट किया।

हालाँकि, जोरहाट में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के नेता अनिमेष भुइयाँ की हत्या के मामले की जाँच कर रहे ऑफिसर सिंह ने अपने ट्वीट में नीरज दास उर्फ ​​काला लोरा के बारे में कुछ भी नहीं बताया है।

इसी तरह से मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने जीपी सिंह के ट्वीट पर कमेंट करते हुए कहा, “असम अपराध और अपराधी से मुक्त हो जाएगा- जो भी हो।”

झूठे आरोप पर भीड़ ने AASU नेता की हत्या की

28 वर्षीय अनिमंष भुइयाँ ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (AASU) की ब्रह्मपुत्र क्षेत्रीय समिति के शिक्षा सचिव थे। सोमवार (29 नवंबर 2021) को जोरहाट में निर्मल चरियाली के पास लगभग 50 लोगों की उन्मादी भीड़ ने उनकी हत्या कर दी थी। विवाद एक सड़क दुर्घटना को लेकर हुआ था। भीड़ ने भुइयाँ और दो अन्य स्थानीय पत्रकार मृदुस्मंत बरुआ और स्थानीय आसू नेता प्रणय दत्ता पर हमला किया जो उसके साथ यात्रा कर रहे थे। भीड़ का कहना था कि उनके काफिले ने स्कूटी सवार एक बुजुर्ग को टक्कर मार दिया था। लेकिन बाद में पता चला कि स्कूटर पर सवार व्यक्ति खुद गिर गया था और भुइयाँ और अन्य दो उस व्यक्ति की मदद के लिए गए थे। लेकिन उस शख्स ने उन पर मारपीट करने का आरोप लगाया, जिसके चलते नीरज दास के नेतृत्व में तीनों पर भीड़ ने हमला कर दिया। हमले में भुइयाँ की मौत हो गई, जबकि बरुआ और दत्ता को गंभीर चोटें आईं।

इस घटना का कुछ लोगों ने वीडियो भी बनाकर वायरल कर दिया। घटना एक व्यस्त गली में हुई, लेकिन किसी ने उन्हें भीड़ से बचाने के लिए बीच-बचाव नहीं किया।

जोरहाट के एसपी अंकुर जैन ने मीडिया को बताया है कि भुइयाँ की गाड़ी ने उस बुजुर्ग व्यक्ति को टक्कर नहीं दी थी। पुलिस अधिकारी के मुताबिक, बुजुर्ग खुद ही गाड़ी से गिरा था। वह (बुजुर्ग) खुद ही नशे में था और उसी ने बवाल किया था। भुइयाँ और दो अन्य उस बुजुर्ग व्यक्ति की मदद के लिए आगे आए, लेकिन उसने चिल्लाते हुए उन्हीं पर टक्कर मारने का आरोप लगाया। इस पर भीड़ हिंसक हो गई और उन पर हमला कर दिया। पुलिस के मुताबिक नीरज दास आदतन अपराधी था और वह वीडियो में नजर आ रहा था। वह नशीले पदार्थों की तस्करी में भी शामिल था।

इस मामले में संज्ञान लेते हुए असम के मुख्यमंत्री ने जीपी सिंह को व्यक्तिगत रूप से मामले की निगरानी करने, सभी आरोपितों को गिरफ्तार करने और एक महीने में चार्जशीट दाखिल करने का आदेश दिया था।

मॉब लिंचिंग मामले में नीरज दास सहित कम से कम 13 लोगों को घटना के एक दिन बाद गिरफ्तार किया गया है। इन सभी को 30 नवंबर को अदालत में पेश करने के लिए ले जाया गया था, जहाँ अदालत के बाहर गुस्साई भीड़ ने इनके साथ मारपीट की। वहीं जोरहाट बार एसोसिएशन ने मुकदमे के दौरान किसी भी आरोपित व्यक्ति का केस नहीं लड़ने का प्रस्ताव पास किया है।

बंगाली हिन्दुओं के लिए आवाज़ उठाने वाले हैंडल को Twitter ने सस्पेंड किया, इस्कॉन और बांग्लादेश हिन्दू यूनिटी काउंसिल पर भी की थी कार्रवाई

सोशल मीडिया जायंट Twitter ने बंगाली हिन्दुओं के लिए आवाज़ उठाने वाले हैंडल ‘स्टोरीज ऑफ बंगाली हिंदूज’ नाम के हैंडल को सस्पेंड कर दिया है। इस हैंडल का संचालन करने वाले डॉक्टर संदीप दास ने माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म की इस करतूत की जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि वो ये बताते हुए हताश हैं कि बंगाली हिन्दुओं के लिए आवाज़ उठाने वाले उनके ट्विटर हैंडल को सस्पेंड कर दिया गया है। उन्होंने बताया कि 1 दिसंबर, 2021 को सुबह 7:17 बजे उन्हें ये जानकारी मिली।

Twitter ने अपने नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए इस हैंडल को सस्पेंड किया है। बता दें कि ‘@storiesOfBHS’ नाम का ये ट्विटर हैंडल बंगाली हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार और उनके हक़ की आवाज़ उठाता था। डॉक्टर संदीप दास ने कहा कि हमारी ट्विटर पर यात्रा फ़िलहाल के लिए अकस्मात रूप से रुक गई है। शिक्षिका डॉक्टर इंदु विश्वनाथन ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये अस्वीकार्य है। उन्होंने हिन्दुओं की आवाज़ को सेंसर करने और चुप कराने की प्रक्रिया को वास्तविक बताया।

उन्होंने कहा, “क्या हिन्दुओं के अनुभवों को साझा करना हिंसा है? क्या हिन्दुओं की ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ शर्तों के साथ आती है?” साथ ही उन्होंने ट्विटर और इसके नए CEO पराग अग्रवाल को भी टैग किया। लोगों ने कहा कि ये हैंडल लगातार बंगाली हिन्दुओं की आवाज़ को उठा रहा था, इसीलिए ट्विटर ने ये हरकत की है। लोगों का कहना था कि संवेदनशीलता और ईमानदारी के साथ ये काम किया जा रहा था, वो कुछ लोगों को पसंद नहीं आया। लोगों ने कहा कि CEO भले नया आ गया, लेकिन तरीका अब भी ही फासिस्ट वाला है।

याद दिलाते चलें कि जहाँ एक तरफ बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे हमलों को वहाँ की मीडिया छिपा रही थी, वहीं अब माइक्रो ब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म ट्विटर से ‘इस्कॉन बांग्लादेश’ और ‘बांग्लादेश हिन्दू यूनिटी काउंसिल’ के हैंडल्स ही गायब हो गए थे। ये दोनों ही बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार व हिंसक हमलों की ख़बरों को दुनिया के सामने ला रहे थे और न्याय की माँग कर रहे थे। एक ओर मुस्लिम भीड़ हिंदू अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न कर रही थी, वहीं दूसरी ओर ट्विटर उन्हें अपनी बात ऑनलाइन नहीं रखने दे रहा था।

‘इसे मार डालो.. चलो ख़त्म करें.. किसी को पता नहीं चलना चाहिए’: कॉन्ग्रेस नेता का वीडियो वायरल, भाजपा MLA की हत्या की साजिश का आरोप

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विधायक एसआर विश्वनाथ की हत्या की साजिश रचने की चर्चा से जुड़ा सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुआ है। इसमें कॉन्ग्रेस नेता बेलूर गोपालकृष्ण किसी अन्य व्यक्ति से भाजपा विधायक की हत्या की योजना के बारे में बात करते हुए सुने जा सकते हैं।

दावा है कि वीडियो में विधायक एसआर विश्वनाथ की हत्या की योजना बनाते हुए दिखाया गया है, जो कर्नाटक विधानसभा में बेंगलुरु के येलहंका का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस वीडियो में की जा रही चर्चा कन्नड़ भाषा में है और कुल्ला देवराज का जिक्र किया गया है। वीडियो में हत्या के समय की चर्चा जाहिर तौर पर हो रही है। वीडियो में एक पूर्व पुलिस अधिकारी फोन पर बात करते हुए देखा गया है। बताया जा रहा है कि गोपालकृष्ण और देवराज को हिरासत में ले लिया गया है।

यह तीन मिनट की वीडियो क्लिप है जिसमें कॉन्ग्रेस नेता को एक अन्य व्यक्ति के साथ बातचीत करते हुए देखा जा सकता है। लह कहता है, “इसे मार डालो विधायक को खत्म करो। ठीक है। चलो खत्म करें, किसी को पता नहीं होना चाहिए…यह हमारे बीच होना चाहिए।” कॉन्ग्रेस नेता ने इसके लिए 1 करोड़ रुपए देने की भी बात कही। पुलिस ने कहा कि वीडियो में तारीख नहीं था और वे आगे की कार्रवाई के लिए मामले की जाँच कर रहे थे।

कर्नाटक के गृह मंत्री अरागा ज्ञानेंद्र ने कहा, “राज्य पुलिस ने मामले को गंभीरता से लिया है… विश्वनाथ ने भी मुझसे इस मुद्दे पर बात की।” अरागा ज्ञानेंद्र ने आगे कहा, “मुझे कल रात वीडियो के बारे में पता चला। पुलिस FIR दर्ज करने पर फैसला करेगी। हम (उसे) सुरक्षा देने के बारे में सोचेंगे। खुफिया विभाग (विश्वनाथ को सुरक्षा देने पर) फैसला करेगा। पुलिस फिलहाल मामले की जाँच कर रही है।”

इस घटना के बारे में बात करते हुए सीएम बसवराज बोम्मई ने कहा है, “मुझे अभी तक इस घटना के बारे में पता नहीं है। जल्द ही संबंधित अधिकारियों से बात करूँगा। इस बारे में मैं खुद विश्वनाथ से बात करूँगा।” उन्होंने आगे कहा कि वो देखेंगे कि उसके आधार पर क्या कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

‘पाठ्यक्रमों में वेदों को शामिल किया जाए, स्वतंत्रता सेनानियों के चित्रण की समीक्षा हो’: शिक्षा को लेकर संसदीय समिति की रिपोर्ट

शिक्षा पर गठित संसदीय समिति ने पक्षपात रहित शैक्षिक पाठ्यक्रमों को बनाने और भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों को स्कूली इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में किस तरह से दिखाया गया है इसकी समीक्षा करने की अनुशंसा की है। समिति ने सुझाव दिया है कि वेदों के प्राचीन ज्ञान को भी स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए।

मंगलवार 30 नवंबर 2021 को संसदीय समिति ने राज्यसभा के पटल पर अपनी रिपोर्ट को रखा। इसमें समिति ने इस बात पर जोर दिया है कि पाठ्यक्रमों में सिख और मराठा इतिहास के साथ-साथ लिंग-समावेशी साहित्य को शामिल करने की आवश्यकता है।

भाजपा सांसद विनय पी सहस्रबुद्धे की अध्यक्षता वाली इस समिति में राज्यसभा के 10 सदस्य हैं। समिति में BJP के चार सांसद और TMC (सुष्मिता देव), CPM (बिकास रंजन भट्टाचार्य), DMK (आरएस भारती), अन्नाद्रमुक (एम थंबीदुरै), सपा के (विशंभर प्रसाद निषाद) और कॉन्ग्रेस से (अखिलेश प्रसाद सिंह) शामिल हैं। इसके अलावा, इसमें 21 लोकसभा सदस्य हैं, जिनमें से 12 भाजपा से और 2 कॉन्ग्रेस और एक-एक सदस्य TMC, CPM, जद (यू), शिवसेना, YSRCP, DMK और BJD से शामिल हैं।

समिति की रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि प्रमुख इतिहासकारों के साथ मिलकर इस बात की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है कि देश के विभिन्न भागों से आने वाले स्वंतत्रता संग्राम सेनानियों को किताबों में अब तक कितनी जगह दी गई है। इससे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अधिक संतुलित और विवेकपूर्ण धारणा को बल प्रदान कर बच्चों के सामने तर्कसंगत और न्यायपूर्ण नजरिया पेश किया जा सकेगा। इसका फायदा यह होगा कि जिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अब तक गुमनामी में रखा गया, उन्हें भी इतिहास में जगह मिलेगी।

समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, NCERT और SCERT को स्कूल के पाठ्यक्रमों में वेदों और प्राचीन भारतीय ज्ञान को शामिल किया जाना चाहिए। इसके साथ ही नालंदा, विक्रमशिला और तक्षशिला जैसे भारतीय विश्वविद्यालयों में अपनाई गई शिक्षा पद्धतियों का अध्ययन किया जाना चाहिए और उन्हें शिक्षकों के लिए मॉडल के तौर पर पेश करने के लिए उसमें बदलाव किया जाना चाहिए।

इस रिपोर्ट में समिति के कुछ ऐसे अवलोकन को भी शामिल किया गया है, जिससे पता चलता है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के कई ऐतिहासिक आँकड़ों और स्वतंत्रता सेनानियों को गलत तरीके से चित्रित किया गया है। समिति ने NCERT को सुझाव दिया है कि वो इतिहास की किताबों के लेखन के नियमों की समीक्षा करे, ताकि इतिहास की किताबों में विभिन्न युगों, कालों और घटनाओं को महत्व दिया जा सके।

रिपोर्ट के में कहा गया है, “ये देखा गया है कि स्कूली किताबों में विक्रमादित्य, चोल, चालुक्य, विजयनगर, गोंडवाना या त्रावनकोर और उत्तर-पूर्व के अहोम जैसे कुछ महान भारतीय साम्राज्यों को पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया है। विश्व के पटल पर भारत की स्थिति को स्पष्ट करने के इनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।” समिति ने यह भी पाया कि भारतीय पाठ्यपुस्तकों में महिलाओं के योगदान को कमतर आँका गया है। इसीलिए पाठ्यक्रमों में महाश्वेता देवी, कल्पना चावला, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, कित्तूर चेन्नम्मा, एम एस सुब्बुलक्ष्मी, और सावित्रीबाई फुले जैसी प्रमुख महिलाओं के योगदान को भी शामिल करने की सिफारिश की गई है।

हाल ही में 26 नवंबर को की गई एक अन्य सिफारिश कहा गया है कि किताबों को पक्षपात से रहित होना चाहिए। साथ ही इन्हें राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के अलावा संविधान में निहित मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता पैदा करने वाला होना चाहिए। देश के नायकों के बारे में गैर-ऐतिहासिक तथ्यों और विकृतियों को हटाने, महिलाओं की उपलब्धि पर प्रकाश डालने पर जोर देने के साथ ही संसदीय समिति स्कूली पाठ्यपुस्तकों में संशोधन करने के लिए एक रिपोर्ट पर काम शुरू कर चुकी है।

इस बीच भारतीय इतिहास कॉन्ग्रेस (IHC) ने समिति का विरोध करते हुए कहा है कि समीक्षा आवश्यक है, लेकिन इसे देश के मान्यता प्राप्त विद्वानों को शामिल करके किया जाना चाहिए।

NCERT ने इस्लामिक आक्रमणकारियों को दिया अधिक महत्व

इस मामले में ऑपइंडिया पहले ही बता चुका है कि शिक्षा पर संसदीय समिति के समक्ष जुलाई 2021 में पेश की गई एक प्रतिष्ठित थिंक टैंक की शोध रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा प्रकाशित इतिहास की पाठ्यपुस्तकें और केरल सरकार द्वारा जारी पाठ्यपुस्तकों में मुगल शासकों और जाति के मुद्दों पर अधिक जोर है, जबकि हिंदू राजाओं, भारतीय संतों, समाज सुधारकों आदि की उपलब्धियों का बहुत ही कम उल्लेख किया जाता है।