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सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों और पत्रकारों के खिलाफ त्रिपुरा पुलिस द्वारा लगाए गए UAPA पर स्टे लगाने से किया इनकार

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने त्रिपुरा पुलिस द्वारा फर्जी खबरें फैलाकर राज्य में सांप्रदायिक हिंसा भड़काने की कोशिश करने वाले 3 व्यक्तियों पर लगाए गए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) के तहत गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की है। हालाँकि, शीर्ष अदालत ने मामले में कोई स्टे ऑर्डर जारी नहीं किया और याचिकाकर्ताओं द्वारा माँगे गए यूएपीए के कुछ अन्य प्रावधानों के अधिकार को चुनौती देने वाली अन्य पिछली याचिकाओं के साथ मामले को टैग करने से इनकार कर दिया

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के सदस्य एडवोकेट मुकेश, नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन के सचिव एडवोकेट अंसार इंदौरी और न्यूजक्लिक के पत्रकार श्याम मीरा सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ FIR को रद्द करने और यूएपीए के कुछ प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती देने की माँग की गई। कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को भी नोटिस जारी किया है। साथ ही भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, डीवाई चंद्रचूड़ और सूर्यकांत की खंडपीठ ने इस दौरान पुलिस को आरोपितों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई करने से रोक दिया।

हालाँकि अदालत ने त्रिपुरा सरकार और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि इसका जवाब कब तक देना है। इसके अलावा, भले ही तीनों याचिकाकर्ताओं को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की गई हो, लेकिन अदालत ने मामले में पुलिस जाँच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के दो वकील मुकेश और अंसार इंदौरी उन चार वकीलों के एक समूह का हिस्सा थे, जिन्हें त्रिपुरा पुलिस ने यूएपीए के तहत बुक किया था। इस ग्रुप ने तथाकथित ‘फैक्ट-फाइंडिंग’ रिपोर्ट जारी किया था, जिसका टाइटल “Humanity under Attack in Tripura #MuslimsLivesMatter” था। रिपोर्ट में दावा किया गया कि दुर्गा पूजा के दौरान अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले के खिलाफ त्रिपुरा में हिंदुओं द्वारा विरोध प्रदर्शन के दौरान मुसलमानों पर बड़े पैमाने पर हमला किया गया था। इसके बाद पुलिस ने केस दर्ज किया था। 

तथाकथित रिपोर्ट में दावा किया गया था कि 12 मस्जिदों, 9 दुकानों और 3 मुस्लिमों के घरों पर हिंदू समूहों द्वारा विरोध प्रदर्शन के दौरान हमला किया गया था। इस दावे का पुलिस ने पूरी तरह से खंडन किया था। त्रिपुरा सरकार का कहना है कि विरोध के दौरान कुछ मामूली हाथापाई हुई, लेकिन त्रिपुरा में किसी मस्जिद पर कोई हमला नहीं हुआ, जैसा कि वकीलों और अन्य लोगों ने आरोप लगाया था।

मामले में बुक किए गए अन्य दो वकीलों में एहतेशाम हाशमी और अमित श्रीवास्तव थे, जो लॉयर्स फॉर डेमोक्रेसी के कन्वेनर हैं। चारों वकीलों ने स्व-घोषित फैक्ट-फाइंडिंग टीम के रूप में दौरा किया था और उसके बाद रिपोर्ट प्रकाशित की थी। 

दूसरी ओर, पत्रकार श्याम मीरा सिंह ने दावा किया था कि उन्हें पुलिस ने ट्विटर पर आरोप लगाने के लिए बुक किया था कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमलों के विरोध के परिणामस्वरूप त्रिपुरा जल रहा है। पत्रकार और दो वकीलों ने त्रिपुरा पुलिस द्वारा उनके खिलाफ दायर मामले को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी और यूएपीए के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी थी।

मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह को अदालत ने घोषित किया भगोड़ा, सरेंडर नहीं करने पर संपत्ति होगी कुर्क

मुंबई की एक अदालत ने बुधवार (17 नवंबर 2021) को जबरन वसूली के एक मामले में पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह को भगोड़ा घोषित कर दिया। सरकारी वकील शेखर जगताप ने बताया कि अदालत ने परमबीर सिंह को भगोड़ा अपराधी घोषित करने के मुंबई पुलिस के आवेदन को स्वीकार कर लिया है। मामलों की जाँच कर रही मुंबई पुलिस की अपराध शाखा ने इसकी माँग की थी। रिपोर्ट्स में यह भी बताया जा रहा है कि परमबीर सिंह लगातार समन जारी होने के बाद भी सामने नहीं आ रहे थे, इसलिए उन्हें भगोड़ा घोषित किया गया है।

बार एंड बेंच के अनुसार, परमबीर सिंह और दो अन्य आरोपितों विनय सिंह उर्फ बबलू और निलंबित सिपाही रियाज भाटी के खिलाफ होटल कारोबारी बिमल अग्रवाल की शिकायत के आधार पर दर्ज एक मामले में आवेदन दायर किया गया था। इसके साथ ही मुंबई पुलिस के अधिकारी सचिन वाजे को बर्खास्त कर दिया गया था। अग्रवाल ने आरोप लगाया था कि सिंह और वाजे ने उनसे 11 लाख रुपए की नकदी और कीमती सामान वसूला था।

शिकायत के आधार पर, भारतीय दंड संहिता की धारा 384, 385 388, 389 (जबरन वसूली), 120 बी (आपराधिक साजिश) और 34 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। आवेदन में कहा गया है कि कई गैर-जमानती वारंट जारी करने के बावजूद तीनों आरोपित सामने नहीं आए। मुंबई पुलिस ने अपने आवेदन में धारा-82 के तहत तीन आरोपितों को फरार घोषित करने की माँग की थी।

मुंबई पुलिस की ओर से पेश सरकारी वकील शेखर जगताप ने अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट एसबी भाजीपले को तीनों आरोपितों के खिलाफ ठाणे की एक अदालत द्वारा जारी गैर-जमानती वारंट दिखाया। जगताप ने कहा, ”अगर परमबीर सिंह 30 दिनों के भीतर कानून के सामने नहीं आते हैं, तो मुंबई पुलिस उनकी संपत्तियों को कुर्क करने की प्रक्रिया शुरू करेगी।” उन्होंने बताया कि क्राइम ब्रांच मामले में दो अन्य आरोपितों विजय सिंह और रियाज भट के खिलाफ भी ऐसा ही आदेश दिए जाने की माँग कर रही है।  

परमबीर सिंह के देश से भागने और रूस में छिपे होने की की खबरों को लेकर महाराष्ट्र के गृहमंत्री दिलीप वालसे पाटिल ने सितंबर 2021 को कहा था कि सरकार परमबीर सिंह का पता लगाने की कोशिश कर रही है। बता दें कि परमबीर सिंह एंटीलिया बम कांड, मनसुख हिरेन हत्याकांड और मुंबई पुलिस द्वारा जबरन वसूली समेत कई मामलों में घिरे हैं। एनआईए ने उन्हें एंटीलिया और मनसुख हिरेन मामले में जाँच के लिए कई नोटिस भेज चुकी है।

झूठ, फेक न्यूज़, प्रोपेगेंडा, चोरी पकड़े जाने पर शोर… त्रिपुरा ने फिर साबित किया लेफ्ट-लिबरल गिरोह के लिए एजेंडा ही सबकुछ

त्रिपुरा पुलिस द्वारा एच डब्लू न्यूज़ नेटवर्क की पत्रकार समृद्धि सकुनिया और स्वर्णा झा को सांप्रदायिक सौहार्द्र भंग करने के उद्देश्य से फेक न्यूज़ फैलाने के लिए 14 नवंबर के दिन असम से गिरफ्तार कर लिया गया था। आरोप था कि एच डब्लू न्यूज़ नेटवर्क के लिए काम करने वाली समृद्धि सकुनिया ने 11 नवंबर को एक वीडियो ट्वीट करके यह दावा किया था कि त्रिपुरा के दुर्गा बाजार में गत 19 अक्टूबर को कुरान की एक प्रति को जला दिया गया था। जब स्थानीय प्रशासन ने सकुनिया द्वारा बताए गए घटनास्थल पर पहुँच कर उनकी खबर की पुष्टि करने की कोशिश की तब उनके दावे की पुष्टि नहीं हो सकी। यही कारण था कि स्थानीय पुलिस प्रशासन ने समृद्धि सकुनिया और स्वर्णा झा के खिलाफ एक केस दर्ज किया था।

ज्ञात हो कि बांग्लादेश में दुर्गापूजा के समय योजनाबद्ध तरीके से हिंदुओं के विरुद्ध की गई हिंसा, आगजनी, हत्या और बलात्कार के विरोध में गत माह त्रिपुरा में हिंदू संगठनों द्वारा विरोध में जुलूस निकाले गए और इस दौरान सांप्रदायिकता भड़क गई थी। इसी दौरान यह अफवाह भी उड़ाई गई कि किसी मस्जिद को जला दिया गया है। यह अफवाह झूठी थी और बाद में त्रिपुरा सरकार, स्थानीय प्रशासन और केंद्रीय गृह मंत्रलाय की ओर से मस्जिद के जलाए जाने की खबर का पूर्ण रूप से खंडन किया गया था।

पहले राज्य और उसके बाद केंद्र सरकार द्वारा मस्जिद जलाए जाने की अफवाह को पूर्ण रूप से झूठा बताए जाने के कई दिनों के बाद समृद्धि सकुनिया द्वारा त्रिपुरा के हिंसा की रिपोर्टिंग के नाम पर किए गए इस दावे की पुष्टि के लिए जब स्थानीय पुलिस प्रशासन ने मुस्लिम प्रेयर हाल के मालिक रहमत अली से पूछताछ की तब पता चला कि ऐसा कुछ नहीं हुआ था। जब सकुनिया से उनके ट्वीट के पीछे के सबूत को लेकर पूछताछ की गई तो उसने बिना कोई सबूत दिए पुलिस से ही कह दिया कि वह जाकर सबूत ढूंढे। सकुनिया के दावे की पुष्टि न कर पाने के बाद पुलिस प्रशासन ने उनके ट्वीट के पीछे के उद्देश्य पर शंका व्यक्त करते हुए उनके खिलाफ केस दायर किया था।

प्रश्न यह है कि पत्रकारिता की यह कौन सी विधा है कि एक पत्रकार द्वारा कुरान जलाए जाने जैसे गंभीर और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील खबर ट्वीट की जा रही है पर सबूत माँगने पर पत्रकार न केवल सबूत देने में असमर्थ है बल्कि यह भी कह दे रही है कि सबूत पुलिस खुद ढूँढ ले? रपट दाखिल करने के बाद स्थानीय प्रशासन ने समृद्धि सकुनिया और स्वर्णा झा को त्रिपुरा न छोड़ने की हिदायत दी थी पर दोनों ‘पत्रकार’ स्थानीय प्रशासन को सूचना दिए बिना त्रिपुरा छोड़कर निकल गई। यही कारण है कि त्रिपुरा पुलिस को असम पुलिस की मदद लेनी पड़ी और दोनों को असम में गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद इन दोनों ‘पत्रकारों’ को अदालत से जमानत मिल गई है पर गिरफ्तारी और जमानत के बीच मीडिया में शोर बहुत मचाया गया।

मीडिया का यह शोर बहुत तेज था और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आगे रखकर मचाया गया। शोर मचाते समय इस बात का ध्यान रखा गया कि पुलिस और स्थानीय प्रशासन द्वारा उठाए गए मूल प्रश्न को अनदेखा किया जाए। दूसरी तरफ पुलिस द्वारा उठाया गए मूल प्रश्न के पीछे की वजह इन पत्रकारों द्वारा न केवल त्रिपुरा में किए गए काम हो सकते हैं बल्कि एक पत्रकार के रूप में उनके इतिहास और रिकॉर्ड का भी प्रमुख योगदान होगा। इसके अलावा दोनों ‘पत्रकारों’ ने त्रिपुरा में होटल में अपनी पहचान छात्रों के रूप में बताई थी। ये ‘पत्रकार’ धर्मनगर, गोमती और अन्य मुस्लिम बहुत इलाके में गए और उनमें उन्होंने हिंदुओं के खिलाफ उत्तेजक बातें की जिसके उद्देश्य को लेकर स्थानीय प्रशासन के मन में शंका होना स्वाभाविक बात थी। पर आश्चर्य इस बात का है कि इन तथ्यों को दरकिनार कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का शोर मचाते हुए इन्हें मीडिया द्वारा समर्थन दिया गया।

देखा जाए तो लेफ्ट लिबरल गिरोह का यह आचरण नया नहीं है। पिछले दो दशकों में उनका यह आचरण हम 2002 के गुजरात दंगों के समय से देख रहे हैं। गुजरात दंगों के समय तीस्ता सीतलवाड़ से लेकर उस समय के प्रसिद्ध पत्रकारों की क्या भूमिका रही है वह जगजाहिर है। एनडीटीवी पत्रकारों की अपनी भूमिका पर तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वक्तव्य रिकॉर्ड पर है। तीस्ता सीतलवाड़ ने किस तरह नक़ली एफिडेविट और मुकदमों का मायाजाल रचा वह किसी से छिपा नहीं है। अरुंधति रॉय को सार्वजनिक तौर पर यह दावा करते हुए देखा गया है कि गोधरा में जलाए गए हिंदू बाबरी मस्जिद गिरा कर वापस आ रहे थे।

यह सब लगातार होते रहने के बावजूद लिबरल समाज हर बार मूल प्रश्नों और तथ्यों से बड़े आराम से मुँह मोड़ लेता है। तथ्य क्या हैं उससे अलग करने का फायदा यह होता है कि ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का शोर मचाकर अपने गिरोह के हर पाप को सही ठहरा लेते हैं। तीस्ता सीतलवाड़ और उनके पति के विरुद्ध उनके एनजीओ को मिले फंड में हेरा-फेरी के मुक़दमे और उसके पीछे के कारणों पर विमर्श नहीं मिलेगा। गुजरात दंगों को लेकर गवाहों को पढ़ाने और झूठे एफिडेविट फाइल करने पर बहस नहीं होने दी जाएगी पर आए दिन इस बात पर शोर मचाया जाता रहेगा कि राज्य सरकार उनके पीछे पड़ी है। शाहीन बाग़ में CAA विरोध के समय भी सीतलवाड़ को वहाँ उपस्थित लोगों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त किए गए इंटरलॉक्यूटर के सामने क्या कहना है वो सिखाते हुए पाया गया पर उनसे उनके उद्देश्य के बारे में सवाल करना असंभव सा है।



लिबरल गिरोह और उसके इकोसिस्टम के लोगों के लिए अब अपने एजेंडा को छिपाने की आवश्यकता भी नहीं पड़ती। अब ये इकोसिस्टम पूरी बेशर्मी के साथ अपना एजेंडा चलाता है। उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उनके आचरण को लेकर कहाँ क्या कहा जा रहा है। समर्थक मीडिया और पत्रकार इनके लिए ढाल का काम करने से पीछे नहीं हटते। उन्होंने एजेंडा के लिए लगभग हर आपत्तिजनक बात को अपना हथियार बना लिया है। यही कारण है कि आज एच डब्लू न्यूज़ नेटवर्क की समृद्धि सकुनिया या स्वर्णा झा को अपने गंभीर दावों को भी साबित करने की आवश्यकता नहीं पड़ती और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम उनके इस आचरण के बचाव में पर्याप्त शोर मचा लेता है ताकि तथ्य को गायब किया जा सके।

माहवारी चल रहा था, कई बार गई वॉशरूम तो टीचर ने सारे कपड़े उतरवा दिए: हैदराबाद के सेंट एंड्रयूज स्कूल की घटना

हैदराबाद के सेंट एंड्रियूज स्कूल (St Andrews School) में एक 15 वर्षीय दलित छात्रा के साथ बदसलूकी की घटना सामने आई है।छात्रा 23 सितंबर को स्कूल में एक पेपर देने गई थी और उस समय उसकी माहवारी भी चल रही थी। ऐसे में उसे पेपर के बीच के कई बार वॉशरूम जाना पड़ा, जिसे देख टीचर को उस पर शक हुआ और टीचर उसे एक आया के साथ वॉशरूम में ले गई। वहाँ उससे उसके कपड़े उतरवाए गए और फिर अंडरगार्मेंट्स उतारने को मजबूर किया गया। टीचर दरअसल ये चेक करना चाहती थी कि कहीं छात्रा ने कपड़ों के भीतर मोबाइल तो नहीं छिपा रखा। अपने इसी शक में उसने लड़की को कपड़े उतारने पर मजबूर कर दिया लेकिन मिला कुछ नहीं। जब छात्रा की माँ को इसका पता चला तो उन्होंने इस संबंध में शिकायत लिखवाई और कार्रवाई की माँग की।

द न्यूज मिनट में प्रकाशित खबर के अनुसार, सेंट एंड्रियूज की छात्रा अनीता (बदला नाम) की माँ सुधा (बदला नाम) की शिकायत पर इस केस को आईपीसी की धारा 354, 504, 509 और एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(2) के तहत दर्ज किया गया है। सुधा ने इस केस में ‘तेलंगाना स्टेट कमीशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स’ को भी सूचित किया है। उनका कहना है कि वो अपनी बेटी के साथ हुए ऐसे बर्ताव से हैरान हैं और उनके अनुसार ये पहली दफा नहीं है जब स्कूल में उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया हो। बीते समय मे भी कई बार अनीता की टीचर ने पूरी क्लास में उलटा-सीधा बोला था। वो कभी कपड़ों पर बोलती थी तो कभी उसकी चाल-ढाल पर।

सुधा के मुताबिक उनकी बेटी को उनकी जाति की वजह से निशाना बनाया गया। वह लोग माला समुदाय के हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षिका का इस तरह से बच्ची के साथ बर्ताव और बीते समय में हुई घटनाएँ कि ये बताती है कि सबकुछ जानबूझकर हुआ। ऐसे में ये मानना भी जायज है कि उसके रंग और जाति की वजह से किया गया। सुधा कहती हैं कि ऐसे बर्ताव का असर उनकी बेटी पर आजीवन रह जाएगा। वो लोग हैरान हैं और शर्मसार भी कि उन्होंने पहले की घटनाओं को जाने दिया। 

वह कहती हैं, “ये शर्मनाक माहौल है जिसे सेंट एंड्रियूज स्कूल ने तैयार किया है। यहाँ बच्चों को बराबर नहीं देखा जाता और उन्हें जीवन भर ट्रॉमा से गुजरने के लिए ढकेला जाता है।” वह बताती है कि उनकी बेटी को एक बार छोटे कपड़े पहनने पर सुनाया गया था जबकि बाकी बच्चे भी वैसे कपड़े पहनके आए थे। वह कहती हैं कि हमेशा अनीता की हर बात के लिए आलोचना हुई। चाहे बात कपड़ों की हो, हेयरस्टाइल की हो या फिर ऑनलाइन क्लास के दौरान नेटवर्क फेल होने के कारण ऑफलाइन होने की। हर बार टीजर ने अनीता को कोसा।

लड़की की माँ कहती हैं कि जब उन्होंने इस संबंध में स्कूल प्रिंसिपल से शिकायत करनी चाही तो उन्हें कहा गया कि वो झूठ बोल रही है और ऐसी कोई घटना नहीं हुई। उन्होंने कहा कि बेटी पिछले साल कॉपी करते पकड़ी गई थी। सुधा का कहना है कि अगर ऐसा कुछ हुआ भी था तो उन्हें इस बारे में क्यों कुछ नहीं बताया गया। लेकिन इसके बदले उन्हें कोई जवाब नहीं मिला बल्कि उनकी बेटी पर इल्जाम लगते रहे।

सुधा अब बस स्कूल से टीचर के ख़िलाफ़ जाँच चाहती हैं और बेटी को गाली देने और उसको प्रताड़ित करने के लिए  कार्रवाई चाहती हैं। मगर स्कूल लगातार ऐसे किसी भी घटना से मना कर रहा है। प्रिंसिपल पदमाल्या सरमा का कहना है कि उनके स्कूल की जाँच में ऐसा कुछ सामने नहीं आया। वह कहती हैं कि उन्होंने तो टीचर को बच्ची की तारीफ करते देखा है। वह नहीं मानती कि उनके स्कूल में जाति-पाति से जुड़ी कोई बात हो सकती है। खुद को आर्मी ऑफिसर की पत्नी बताते हुए वह कहती हैं कि वो बच्चों के प्रति प्रोटेक्टिव हैं।

अब पुलिस इस मामले में सीसीटीवी फुटेज के जरिए छानबीन कर रही है। वहीं अन्य सबूतों पर भी गौर किया जा रहा है। मल्काज़गिरी के डीसीपी रक्षिता के मूर्ति कहते हैं, “मामला अभी जाँच के दायरे में। घटना संबंधी सबूत इकट्ठा किए जा रहे हैं।”

बता दें कि इस घटना के बाद अनीता ने 20 अक्टूबर से स्कूल जाना बंद कर दिया है। वो अकेले ऑनलाइन क्लास ले रही है। उसे डर है कि कहीं इस घटना की वजह से उसे स्कूल में किसी से कुछ सुनना न पड़े। कहीं टीचर उससे नाराज न हों या कहीं बच्चे उसका मजाक न उड़ाएँ। वहीं लड़की के घरवालों का पूछना है कि अगर अनीता का रूटीम चेकअप ही किया गया तो फिर उसे बाथरूम में ले जाने की क्या जरूरत थी।

तीन मंजिला मकान-जेवर सब कुछ रिक्शा वाले के नाम: मिलिए 1 करोड़ की प्रॉपर्टी दान करने वाली बुजुर्ग मिनाती पटनायक से

सोशल मीडिया में इन दिनों मिनाती पटनायक की दरियादिली की कहानी वायरल है। 63 वर्षीय पटनायक ओडिशा के कटक में रहती हैं। उन्होंने अपनी संपत्ति एक रिक्शा चालक को दान में दे दी है। यह रिक्शा चालक और उसका परिवार करीब 25 साल से उनकी सेवा कर रहा है। इस बुजुर्ग का महिला का कहना है कि पति और बेटी की मौत के बाद इस रिक्शा चालक का परिवार ही उनका सहारा बना।

रिपोर्ट के मुताबिक, मिनाती देवी ने कटक शहर के सुताहाट इलाके का अपना तीन मंजिला घर, सोने के गहने और बाकी की संपत्ति रिक्शा चालक बुद्धा सामल के नाम कर दी है। वह अपने परिवार के साथ फिलहाल मिनाती के ही घर में रह रहा है। जब मिनाती के पति और बेटी जिंदा थे तब भी बुद्धा सामल उनकी सेवा कर रहा था। मिनाती के पति कृष्ण कुमार पटनायक की साल 2020 में मौत हो गई थी। इसके बाद बेटी ही उनका सहारा थी। इसी साल उसकी भी मौत हो गई। इससे वो बिल्कुल टूट गईं।

मिनाती कहती हैं, “जब मैं बिखर गई थी और दुख में जी रही थी, तो मेरा कोई भी रिश्तेदार मेरे साथ नहीं खड़ा था। मैं बिल्कुल अकेली थी। लेकिन, यह रिक्शा चालक और उसका परिवार बिना किसी उम्मीद के मेरी देखभाल कर रहा था।” मिनाती बुद्धा सामल के नि:स्वार्थ प्रेम और समर्पण से इतनी अधिक प्रभावित हुई कि उन्होंने उसे अपनी 1 करोड़ की संपत्ति दान कर दी।

वे कहती हैं, “अब मेरी मौत के बाद कोई भी बुद्धा और उसके परिवार को परेशान नहीं करेगा।” मिनाती बताती हैं कि बुद्धा सामल भले ही 50 साल का है, लेकिन उसकी पत्नी उन्हें माँ ही कहती है। उसके बच्चे उन्हें दादी कहकर पुकारते हैं। मिनाती का मानना है कि बुद्धा सामल और उसके परिवार की सादगी और ईमानदारी के सामने ये दौलत कुछ भी नहीं है। सामल बुद्धा ने इसके लिए मिनाती का आभार प्रकट करते हुए कहा, “मैंने और मेरे परिवार ने हमेशा पति की मृत्यु के बाद उनकी देखभाल की। हम जीवित रहने तक उनकी देखभाल करेंगे।”

बरेली: पुलिस ने नजीर अहमद के घर का दरवाजा खुलवाया तो मिली पड़ोस की लड़की, अगवा कर जहर खिलाने का आरोप

उत्तर प्रदेश के बरेली में आपसी रंजिश के चलते युवती को जबरन जहर पिलाने का मामला सामने आया है। इस घटना को बरेली के बहेड़ी थाना क्षेत्र में बुधवार (17 नवंबर रात 1 बजे) को अंजाम दिया गया। बताया जा रहा है कि आरोपितोंं ने युवती को अपने घर में बुलाकर जबरन जहर पिला दिया। फिर खुद पुलिस को फोन कर इसकी जानकारी दी। सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और युवती को अस्पताल ले गई, जहाँ उसने दम तोड़ दिया।

इस मामले से जुड़ी अन्य जानकारी लेने के लिए ऑप​इंडिया ने बहेड़ी थाने से संपर्क किया। इंस्पेक्टर ओम प्रकाश गौतम ने बताया, “य​ह आपसी रंजिश का मामला है, जो 2018 से चला आ रहा है। दोनों पक्ष एक ही समुदाय के हैं और मिंतरपुर गाँव के रहने वाले हैं। इनके घर आसपास हैं। मृतका का नाम रेशमा है। उसने खुद जहर खाया है, या फिर उसे जबरन खिलाया गया है। वह नजीर अहमद घर में कैसे पहुँची इस पर जाँच जारी है।”

इंस्पेक्टर ने बताया, “दोनों पक्षों में पहले से ही दुश्मनी चल रही है। उन्होंने एक-दूसरे के खिलाफ मुकदमे भी दर्ज कराए हैं। मुलजिम पक्ष की ओर से 2018 और 2019 में दो मुकदमे दर्ज करवाए गए हैं। एक मुकदमे में मृतका भी आरोपित है। नजीर अहमद के बेटे अनीश अहमद ने 2018 में युवती और उसके परिवार वालों के खिलाफ पहला मुकदमा दर्ज करवाया था। इसके बाद साल 2019 में उन्होंने दूसरा मामला दर्ज करवाया था, जिसमें लियाकत अली की बेटी रेशमा को आरोपित बनाया था।”

उन्होंने कहा कि हम इस मामले की गहनता से जाँच कर रहे है। इंस्पेक्टर का कहना है कि जब पुलिस मौके पर पहुँची तो लड़की नजीर अहमद के कमरे में बंद थी। काफी समझाने पर नजीर अहमद और उसके साथ मौजूद लोगों ने दरवाजा खोला। इसके बाद लड़की को अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ उसने दम तोड़ दिया।

वहीं दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, बहेड़ी की रहने वाली युवती के परिजन ने बताया कि वर्ष 2019 में पास के ही रहने वाले युवक अनीश ने उनकी बेटी के साथ छेड़छाड़ की थी। जब उसने इसका विरोध किया तो युवक के पिता नजीर अहमद और भाइयों शकील अहमद, अकील अहमद, खलील अहमद व दो अन्य रफी एवं अलीम ने मिलकर लड़की के साथ मारपीट की। उसके बाद मामले में सात आरोपितोंं के खिलाफ छेड़छाड़ मारपीट व अन्य धाराओं में बहेड़ी थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया था। 25 नवंबर को इस मामले में कोर्ट में सुनवाई होनी है। इस पर आरोपित युवती पर लगातार समझौते का दबाव बना रहे थे। जब वह नहीं मानी तो उन्होंने उसे अगवा कर लिया।

दिल्ली में हुई जान-पहचान, बिहार के गाँव में देने गया सामान: पकड़ कर शादी करा दी, एक हफ्ते कमरे में बंद रखा

कहते हैं कि शादी ऐसा लड्डू है जो खाए वो पछताए जो ना खाए वो भी पछताए… लेकिन उस स्थिति को क्या कहेंगे, जहाँ ये आपको जबरन गुंडई के दम पर खिलाया जाए, आपकी मर्जी के खिलाफ खिलाया जाए, हम बात कर रहे हैं- ‘पकड़ुआ’ या ‘पकड़ौआ’ विवाह की, जो बिहार के कुछ जिलों में बेहद पॉपुलर हैं और ये पिछले काफी समय से चला आ रहा है, हालाँकि समय बदलने के साथ इस प्रथा पर बहुत हद तक रोक भी लगी है लेकिन अभी भी ये कहीं-कहीं पर जारी है।

एक बार फिर से बिहार के गया जिले में पकड़ुआ विवाह का मामला सामने आया है। यहाँ छठ पूजा में अपने घर आए युवक का पहले अपहरण किया गया और फिर जबरन उसकी शादी करा दी गई। इस दौरान लगभग एक सप्ताह तक युवक को बंधक बनाए रखा गया। बाद में युवक किसी तरह झूठ बोलकर वहाँ से निकलने में कामयाब हुआ और थाने में घटना की पूरी जानकारी दी। घटना 10 नवंबर की बताई जा रही है।

जिले के मोहिउद्दीनपुर गाँव निवासी गुड्‍डू कुमार पिता उमाकांत प्रसाद ने नवादा नगर थाना पहुँचकर शिकायत दर्ज कराई कि उसका पकड़ुआ विवाह वजीरगंज थाना क्षेत्र के सरबहना गाँव में शंभु प्रसाद की बेटी रानी कुमारी के साथ करा दी गई। थाने में आपबीती सुनाते हुए गुड्‍डू ने बताया कि उसके साथ मारपीट की गई। युवक ने बताया कि उसे करीब एक सप्ताह तक कमरे में बंधक बनाकर रखा गया और प्रताड़ित किया गया। परीक्षा देने का बहाना बनाकर युवक वहाँ से भागकर अपने गाँव आया और थाने में शिकायत की।

जानकारी के मुताबिक पीड़ित युवक गुजरात के वापी स्थित एक निजी कंपनी में काम करता है। दिवाली के समय वह ‍अपने मौसा के यहाँ दिल्ली गया था, जो कि वहाँ फल बेचने का काम करते हैं। युवक ने कहा कि मौसा के पास में ही लड़की का बहनोई भी फल बेचने का काम करता है, वहाँ उसकी उससे जान-पहचान हो गई।

गुड्‍डू ने बताया कि इसी बीच छठ पूजा के लिए लड़की के बहनोई ने उससे सरबहना में फल पहुँचाने का अनुरोध किया। जब वह फल लेकर नवादा पहुँचा तो उसे बंधक बना लिया गया और उसका जबरन पकड़ुआ विवाह करा दिया गया।

गुड्डू ने मामले की जानकारी देते हुए बताया कि वह लड़की के भाई के साथ कमरे में सोए हुए थे। उन्होंने कहा, “मैं ऐसे ही गंजी में सोया हुआ था। वह (लड़की का भाई) रात में कब किवाड़ (दरवाजा) खोल कर बाहर गया और गाँव के 10-12 लोगों को बुला कर आया। मुझे पता नहीं चला। वो लोग मुँह में गमछी बाँध कर आया और मुझे उठाया। मैं तो बिलकुल डर गया कि ये लोग क्या करने वाले हैं तो मैंने पूछा कि यह सब क्या हो रहा है तो उसने कहा कि पहले आप रूम के अंदर तो चलो। इसके बाद वो लोग मुझे जबरदस्ती रूम के अंदर लेकर गया। फिर रूम में बंद करके डरा-धमका कर जबरदस्ती शादी करवाया गया।”

गौरतलब है कि 2019 में पटना की फैमिली कोर्ट ने इसी तरह के एक मामले में पकड़ुआ विवाह को अवैध करार दिया था। 2017 में पीड़ित विनोद अपनी दोस्त की शादी में शामिल होने के लिए पटना गया था इसी दौरान उसके साथ मारपीट करके बंदूक की नोक पर जबरदस्ती शादी करवा दी गई थी।

‘टीवी डिबेट से सबसे ज्यादा प्रदूषण’: दिल्ली सरकार की पैरवी कर रहे थे सिंघवी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मुद्दे से न भटकें

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार (17 नवंबर 2021) को सुनवाई हुई। इस दौरान शीर्ष अदालत ने कई तल्ख टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश (CJI) एनवी रमना ने कहा कि टीवी डिबेट सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रहे हैं। उन्होंने कहा कि इन बहसों में ​हर किसी का अपना एजेंडा होता है और टिप्पणियों का इस्तेमाल संदर्भ के बाहर किया जाता है।

य​ह टिप्पणी दिल्ली सरकार के वकील अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलों के जवाब में आई। दरअसल सिंघवी का जोर पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण पर था। उनका कहना था कि इस तथ्य को नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने सिंघवी को यह भी कहा कि वे प्रदूषण के मुद्दे से न भटकें। वे जो मुद्दा उठा रहे हैं वह प्रासंगिक नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय ने पराली से प्रदूषण के लिए किसानों को कोसने के लिए सरकारों को फटकार लगाई। कहा कि किसी भी तरह के दूसरे प्रदूषण से कहीं अधिक प्रदूषण टीवी चैनलों में होने वाली डिबेट से फैलता है। उन्हें समझ में नहीं आता कि क्या हो रहा है और क्या मुद्दा है। मुख्य न्यायाधीश ने सरकार और लोगों को जिम्मेदारी समझने की सलाह देते हुए कहा कि सबकुछ न्यायिक आदेशों के जरिए नहीं किया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि टीवी चैनलों पर उनके खिलाफ गुमराह करने वाली टिप्पणियाँ की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि चैनलों में पराली जलाए जाने के मामले में उनपर अदालत को गुमराह करने का आरोप लगाया जा रहा है। इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि कोर्ट गुमराह नहीं है।

सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) ने दिल्‍ली और एनसीआर के राज्‍यों के लिए दिशा-निर्देश जारी किया है। इस पर केंद्र का रुख यह है कि केंद्र सरकार के कर्मचारी वर्क फ्रॉम होम (WFH) की जगह कार पुलिंग करें, ताकि सड़क पर केंद्र सरकार के वाहनों की संख्या कम हो। 

इससे पहले सोमवार (15 नवंबर 2021) को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से वायु प्रदूषण के मुद्दे पर आपात बैठक बुलाने को कहा था। इसके बाद मंगलवार (16 नवंबर 2021) को कमिशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट की वर्चुअल बैठक हुई थी। 

अंतरिक्ष में टला बड़ा हादसा! टकराने से बचे चंद्रयान-2 और नासा का LRO: ISRO ने ऐसे हासिल की कामयाबी

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के चंद्रयान-2 ऑर्बिटर और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) के बीच 20 अक्टूबर 2021 को अंतरिक्ष में टकराने की आशंका पैदा हो गई थी। हालाँकि इसरो ने चंद्रयान-2 ऑर्बिटर के मार्ग में बदलाव कर इसे टालने में कामयाबी हासिल कर ली।

इसरो ने सोमवार (15 नवंबर 2021) को एक बयान जारी कर बताया कि 20 अक्टूबर को चंद्रयान-2 ऑर्बिटर (CH2O) और लूनर रिकॉनिसेंस ऑर्बिटर (LRO) भारतीय समयानुसार दिन के 11.15 बजे चंद्रमा के उत्तरी ध्रुव के पास एक-दूसरे के बेहद करीब आने वाले थे।  

इसरो के बयान के अनुसार दोनों ही एजेंसियों ने एक सप्ताह पहले से स्थिति का विश्लेषण करना शुरू कर दिया था और इस नतीजे पर पहुँचे थे कि निर्धारित समय पर दोनों ऑर्बिटर के बीच रेडियल दूरी 100 मीटर से भी कम होगी और निकटतम दूरी उक्त समय पर मात्र 3 किलोमीटर रह जाएगी।

साभार :ISRO

दोनों एजेंसियों ने माना कि दोनों के संभावित टक्कर को टालने के लिए CAM (Collision Avoidance Manoeuvre) की जरूरत है। दोनों एजेंसी इस बात पर सहमत थे कि इसरो का ऑर्बिटर उसी से गुजरेगा। इसके लिए CH2O की कक्षा को बदलना होगा। इसके बाद इसरो ने 18 अक्टूबर को भारतीय समयानुसार रात 8.22 बजे चंद्रयान-2 ऑर्बिटर की नई कक्षा निर्धारित की और ये भी सुनिश्चित किया कि निकट भविष्य में दोनों की ऐसी कोई निकटता न हो। बता दें कि चंद्रयान -2 और एलआरओ चंद्रमा की लगभग ध्रुवीय कक्षा में परिक्रमा करते हैं और इसलिए दोनों अंतरिक्ष यान चंद्र ध्रुवों पर एक दूसरे के करीब आते हैं।

उल्लेखनीय है कि पृथ्वी की कक्षा में उपग्रहों के मलबे और अन्य अंतरिक्ष वस्तुओं के कारण टकराव के जोखिम को कम करने के लिए अंतरिक्ष एजेंसियों के लिए CAM की कवायद सामान्य गतिविधि है। इसरो नियमित रूप से ऐसे महत्वपूर्ण करीबी दूरी के ऑब्जेक्ट्स की निगरानी करता है। हालाँकि, यह पहली बार है जब इसरो के एक महत्वपूर्ण अंतरिक्ष अन्वेषण मिशन के लिए इस तरह की कवायद करने की जरूरत पड़ी।

UP में सपा तो J&K में कॉन्ग्रेस को झटका: 4 MLC बीजेपी में आए, सोनिया को चिट्ठी भेज गुलाम नबी के करीबियों का इस्तीफा

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं राजनीतिक सरगर्मियाँ तेज होती जा रही। इसी बीच अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका लगा है। पार्टी के 4 विधानपार्षद बीजेपी में शामिल हो गए हैं। दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर से कॉन्गेस के लिए बुरी खबर आई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के समर्थक बताए जा रहे कई नेताओं ने इस्तीफा दे दिया है। इन्होंने अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को चिट्ठी भेज पार्टी नीतियों को लेकर नाराजगी जताई है।

बुधवार (17 नवंबर 2021) को रमा निरंजन सहित समाजवादी पार्टी के चार एमएलसी उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और केशव प्रसाद मौर्य तथा पार्टी के राज्य प्रमुख स्वतंत्र देव सिंह की मौजूदगी में बीजेपी में शामिल हुए। इस मौके पर निरंजन के पति ने भी बीजेपी की सदस्यता ली। BJP में शामिल हुए MLC हैं- रविशंकर सिंह, सीपी चंद्र, रमा निरंजन और नरेंद्र भाटी। इस दौरान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने कहा कि आज अखिलेश यादव को नींद नहीं आएगी।

स्वतंत्र देव सिंह ने आगे कहा कि कई दशकों से सपा के वफादार सिपाही रहे नरेंद्र भाटी अब भाजपा से जुड़ गए हैं। इससे पार्टी मजबूत होगी और सपा का सफाया होगा। रविशंकर के आने से बलिया और आसपास के क्षेत्र में भाजपा मजबूत होगी। सीपी चंद ने भाजपा में वापसी की है। रमा निरंजन के आने से बुंदेलखंड में भाजपा मजबूत होगी। सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी रहे नरेन्‍द्र सिंह भाटी 7 मार्च 2016 को एमएलसी बने थे।

जम्मू-कश्मीर कॉन्ग्रेस में अंतर्कलह

कॉन्ग्रेस के जी-23 समूह के नेता गुलाम नबी आजाद के समर्थकों के इस्तीफ से जम्मू-कश्मीर में पार्टी की भीतरी लड़ाई सामने आ गई है। बताया जा रहा है कि 7 प्रमुख नेताओं ने इस्तीफा दिया है। रिपब्लिक टीवी ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि जीएम सरूरी, विकार रसूल वानी, जुगल किशोर शर्मा, मनोहर लाल शर्मा, नरेश गुप्ता, गुलाम नबी मोंगा, सुभाष गुप्ता, अमीन भट और अनवर भट ने सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और जम्मू-कश्मीर कॉन्ग्रेस प्रभारी रजनी पाटिल को इस्तीफा भेजा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि केंद्रशासित प्रदेश में उन्हें पार्टी से संबंधित मामलों को लेकर अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया।

अपने इस्तीफे में इन नेताओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें प्रदेश कॉन्ग्रेस नेतृत्व के ‘शत्रुतापूर्ण रवैये’ के चलते यह कदम उठाना पड़ा है। साथ ही उन्होंने प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर पर भी निशाना साधा है। इन नेताओं का यह भी कहना है कि वे पिछले करीब एक साल से पार्टी नेतृत्व से मिलने का समय माँग रहे थे, लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था। पत्र में कहा गया है कि इसकी वजह से 200 शीर्ष नेता अब तक पार्टी से इस्तीफा दे चुके हैं।