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उइगर मुस्लिमों के अंग बेच रहा चीन, हो रही ₹7500 करोड़ की सालाना कमाई: UNHRC को भी है पता, सालों से चल रही तस्करी

चीन ने उइगर मुस्लिमों के अंगों का इस्तेमाल अब ब्लैक मार्किट में देह व्यापार के लिए भी करना शुरू कर दिया है। शिनजियांग प्रान्त में चीन पर अल्पसंख्यक उइगर मुस्लिमों के खिलाफ दमनकारी अभियान चलाने के आरोप दुनिया भर के मानवअधिकार संगठनों द्वारा लगाए जाते रहे हैं। अब पता चला है कि उइगर मुस्लिमों के अंगों को निकाल कर उन्हें ब्लैक मार्किट में बेचा जा रहा है। इससे चीन को करोड़ों डॉलर की कमाई हो रही है। इस मामले में दोषी साबित होने के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय चीन पर नए किस्म के प्रतिबंध थोप सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में स्थित अख़बार ‘द हेराल्ड सन’ ने ये नए खुलासे किए हैं। इसमें बताया गया है कि किसी उइगर मुस्लिम के स्वस्थ लिवर को चीन 1,60,000 डॉलर्स (1.20 करोड़ रुपए) में बेचा जा रहा है। अख़बार का दावा है कि इस तरह के धंधों से चीन को 1 बिलियन डॉलर (7492 करोड़ रुपयों) की कमाई हो रही है। इसका अर्थ है कि चीन के जिन प्रताड़ना कैंपों (Detention Centres) में इन उइगर मुस्लिमों को रखा जा रहा है, वहाँ जबरदस्ती उनके अंग निकाल लिए जा रहे हैं।

इस साल जून में भी सयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNHRC) ने इन प्रताड़ना कैंपों में उइगर मुस्लिमों के अंग निकाल कर ब्लैक मार्किट में बेचे जाने का मुद्दा उठाया था और कहा था कि ‘ऑर्गन हार्वेस्टिंग’ की इन करतूतों को लेकर विशेषज्ञ सतर्क हैं। सिर्फ उइगर मुस्लिम ही नहीं, बल्कि चीन में तिब्बतियों, ईसाईयों और फालुन गोंग नाम के मजहब को मानने वालों के साथ भी ऐसा ही सलूक किया जा रहा है। UNHRC का कहना था कि बिना सहमति लिए उइगर मुस्लिमों का ब्लड टेस्ट्स, अल्ट्रासाउंड और एक्सरेज़ कराया जाता है, ताकि चीन की सरकार को उनके शरीर के बारे में पूरी जानकारी हो जाए।

ऐसा कर के पहले ही सुनिश्चित कर लिया जाता है कि किसी उइगर मुस्लिम के अंग के ब्लैक मार्किट में कितने दाम मिलेंगे। ऑर्गन एलोकेशन के लिए एक विभाग बना दिया है, जिसके डेटाबेस में इन उइगर मुस्लिमों के अंगों के डिटेल्स रहते हैं। जिन अस्पतालों में ऑर्गन ट्रांसप्लांट किया जाता है, वो इन प्रताड़ना कैंपों के नजदीक ही स्थित होते हैं। ये भी बताया गया है कि ये चीजें लंबे समय से चल रही हैं। ‘ऑस्ट्रेलियन स्ट्रेटेजिक पॉलिसी इंस्टिट्यूट’ के अनुसार, 2017-19 के बीच 80,000 उइगर मुस्लिमों को देह-व्यापार का शिकार बनाया गया।

उन्हें वहाँ चीन के रीति-रिवाज सिखाएँ जाते हैं और मंदरीअन भाषा व मजहब का ज्ञान दिया जाता है, वो भी जबरदस्ती। साथ ही उन्हें अपने मजहब के किसी भी क्रियाकलाप में शामिल होने की अनुमति नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उइगर मुस्लिमों की 84 बिलियन डॉलर (6.29 लाख करोड़ रुपए) की संपत्ति जब्त की गई है। दिल, किडनी, लिवर, कॉर्निया और लिवर के अन्य पार्ट्स को निकाल कर उनका अवैध व्यापार किया जाता है। इसमें कई डॉक्टर और मेडिकल विशेषज्ञों का सहारा लिया जाता है।

UN ने तो इस मुद्दे को 2006-7 में ही चीन की सरकार के समक्ष उठाया था। चीन ने इसका दोष अवैध अंग तस्करों पर मढ़ते हुए कहा था कि इसकी जाँच के लिए डेटा उपलब्ध नहीं है। चीन इसी प्रकार के दमनकारी अभियान तिब्बत और ताइवान में भी चलाना चाहता है, लेकिन वहाँ उसकी दाल नहीं गल रही। चीन को उइगर मुस्लिमों के आतंकी संगठनों का भी डर है, जिसे ठीक करने के लिए उसने तालिबान से हाल ही में समझौता किया। चीन हर हाल में उइगरों के नामोंनिशान मिटाना चाहता है।

इससे पहले अंतरराष्ट्रीय संस्था इंटरनेशनल फोरम फॉर राइट्स एंड सिक्योरिटी (IFFRAS) ने बताया था कि चीन में लोगों के अंगों को जबरन काटकर उसका DNA इकट्‌ठा करने का काम हो रहा है। इसके लिए लोगों के साथ जबरदस्ती की जाती है। जब लोग इसका विरोध करते हैं तो उन्हें गायब कर दिया जाता है। चीन का एल्गोरिदम हिरासत में लिए गए लोगों के अंग जबरन काटकर डेवलप होता है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि लोगों को जेनेटिक डेटा लेने के लिए कैसे-कैसे परेशान किया गया।

‘कुछ प्रार्थना करना चाहते, कुछ पीना’: सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के पास शराब की दुकान को बंद करने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (29 अक्टूबर 2021) को पुडुचेरी में मंदिर के नजदीक स्थित एक बार को बंद करने का आदेश देने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने इसके पीछे तर्क देते हुए कहा कि पूजा की जगह से बार की पर्याप्त दूरी उसे बंद करने का आधार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यदि दोनों के बीच की दूरी 114.5 मीटर है, जो तय दूरी 100 मीटर से ज्‍यादा है। अदालत ने यह भी कहा कि हो सकता है कि कुछ लोग प्रार्थना करना चाहते हों और कुछ लोग पीना चाहते हों।

बता दें कि पुडुचेरी के थ्रोबथियाम्‍मम मंदिर के प्रवेश द्वार से 114.5 मीटर की दूरी पर जोठी बार बना हुआ है। इसी को बंद कराने या शिफ्ट कराने को लेकर याचिका दायर की गई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, मद्रास HC ने भी बार को बंद करने या उसे स्थानांतरित करने से इनकार किया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की थी। 

मामले पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील नंदकुमार ने जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और बी वी नागरत्‍ना की बेंच के सामने कहा कि बार और मंदिर के बीच की दूरी कम होने के चलते कई लोग शराब पीकर मंदिर आते हैं और फिर हंगामा करते हैं। अकसर मंदिर के अनुष्‍ठानों और त्‍योहारों में दखल देते हैं। उनका तर्क था, “अगर बार बंद नहीं किया जा सकता तो जनभावनाओं का ध्‍यान रखते हुए उसे दूसरी जगह शिफ्ट किया जाना चाहिए।”

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “हम श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएँ आहत नहीं करना चाहते, लेकिन एक बार दोनों के बीच की संवैधानिक दूरी बन जाने के बाद कानूनी रूप से अदालतें ज्‍यादा कुछ नहीं कर सकतीं। ऊपर से मंदिर ट्रस्‍ट ने बार के नजदीक होने पर आपत्ति नहीं जताई है। हम हाईकोर्ट के फैसले में हस्‍तक्षेप क्‍यों करें?”

जब नंदकुमार ने फिर से बार में शराब पीकर आने वालों के मंदिर में हंगामा करने की दलील दी तो जस्टिस नागरत्‍ना ने कहा, “अगर बार 500 मीटर या 10,000 मीटर भी दूर हो तो भी शराब पीने वाले लोग जो मंदिर जाना चाहते हैं, वो वैसे ही हंगामा कर सकते हैं।”

HC ने क्‍या आदेश दिया था?

मद्रास हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस संजीब बैनर्जी और सेंथिलकुमार राममूर्ति की बेंच ने 16 जुलाई को सिंगल जज बेंच के आदेश को पलट दिया था। सिंगल जज वाली बेंच ने अथॉरिटीज से बार का लाइसेंस कैंसिल करने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ अपील पर HC की डिविजन बेंच ने कहा कि मंदिर से बार के बाहरी ढाँचे की दूरी 114.5 मीटर दर्शाई गई है, जो कि प्रतिबंध‍ित दूरी से ठीक-ठाक ज्‍यादा है। HC ने कहा था कि ऐसी स्थिति में बार का लाइसेंस रद्द करने का कोई मतलब नहीं बनता। हालाँकि HC ने साफ कहा कि अगर मंदिर और बार के बीच की जमीन पर नियमित रूप से धार्मिक गतिविधियाँ होती हैं तो अथॉरिटीज जरूरी कार्रवाई कर सकती है।

27 दिन बाद मन्नत लौटे आर्यन का ढोल-नगाड़ों से स्वागत, यूजर बोला- ‘नशेड़ी है वो स्वतंत्रता सेनानी नहीं’

ड्रग केस में गिरफ्तार हुए शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान आज 27 दिन बाद बेल पर ऑर्थर रोड जेल से रिहा हो गए हैं। उन्हें लेने खुद शाहरुख खान सुबह-सुबह जेल के बाहर गए थे। अब दोनों ‘मन्नत’ पहुँच गए हैं। वहीं आर्यन के साथ ड्रग लेकर पकड़े गए अरबाज मर्जेंट की रिहाई शाम तक होगी। उनके पिता असलम मर्चेंट ने ये बताया है।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया कि आर्यन शुक्रवार दोपहर से ही अपना सामान लेकर ऑफिस में बैठे थे लेकिन शाम 6 बजे तक उनकी रिहाई की कोई अनाउंसमेंट नहीं हुई और उन्हें वापस अपने बैरक में जाना पड़ा। 

दरअसल, शुक्रवार को आर्यन खान की रिहाई की उम्मीद हर किसी को थी। उनके घर के बाहर जश्न का माहौल भी था। लेकिन सेशन कोर्ट से वकील सतीश मानशिंदे ऑर्थर रोड जेल जाने में देर हो गए और आर्यन का जमानती आर्डर शाम 5:30 बजे तक जेल अधिकारियों के पास नहीं पहुँचा। नतीजन रिहाई आज जाकर हुई।

सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों के मुताबिक, मन्नत के बाहर शाहरुख के फैन्स का हुजूम उमड़ा पड़ा है। लोग ढोल नगाड़ों से आर्यन के वापस आने की खुशी मना रहे हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ यूजर्स ये सवाल कर रहे हैं कि इतना जश्न किस बात का हो रहा है क्या आर्यन ने कुछ बहुत बड़ा हासिल किया है। उसे बेल मिली है वो भी ड्रग केस में। अभी केस बंद भी नहीं हुआ।

चिराग लिखते हैं कि भारतीय मीडिया लगा पड़ा है कि किसी तरह आर्यन के लिए सहानुभूति जुटा सके। वह पूछते हैं कि आखिर एक ड्रग एडिक्ट को हीरो क्यों बनाया जा रहा है ।

नीरू लिखती हैं, “भाई आर्यन खान, शाहरुख खान का बेटा है, मीडिया ये दिखा रही है जैसे उसने भारत की सीमा पर जंग लड़ी हो और एक नायक की तरह घर आ रहा हो। ”

सत्यम सिंह ने लिखा, “स्वतंत्र सेनानी नहीं था, चरसी था साला।”

बता दें कि आर्यन खान को 3 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया था। हाईकोर्ट में उन्हें बेल मिलने से पहले उनकी याचिका मजिस्ट्रेट कोर्ट और विशेष एनडीपीएस कोर्ट में खारिज की गई थी। अभी भी जो आर्यन को बेल मिली है वो कुछ शर्तों पर है। इन शर्तों के अनुसार आर्यन कोर्ट की इजाजत के ब‍िना देश छोड़कर नहीं जा सकते हैं। उन्‍हें NDPS कोर्ट में अपना पासपोर्ट जमा करना होगा। हर शुक्रवार को 11 बजे से 2 बजे तक एनसीबी दफ्तर में हाजिरी लगानी होगी।

रोशनी अली: हिंदू माँ और मुस्लिम अब्बा की बेटी, जिसकी याचिका पर कलकत्ता HC ने दिवाली से पहले पटाखों पर लगाया प्रतिबंध

कलकत्ता हाई कोर्ट ने शुक्रवार (29 अक्टूबर 2021) को दिवाली/काली पूजा के दौरान पूरे पश्चिम बंगाल में सभी प्रकार के पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया। रिपोर्टों के अनुसार, पटाखों पर प्रतिबंध राज्य में आने वाले अन्य सभी उत्सवों पर भी लागू होगा, जिनमें गुरु नानक जयंती, क्रिसमस और नए साल के जश्न शामिल हैं। एक ट्रैवलर सह फिल्म निर्मात्री रोशनी अली द्वारा अदालत में एक जनहित याचिका दायर किए जाने के बाद यह आदेश जारी किया गया।

गुरुवार (28 अक्टूबर 2021) को एक फेसबुक पोस्ट में, रोशनी अली ने पुष्टि की थी कि उन्होंने दिवाली से पहले पटाखों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के समक्ष एक जनहित याचिका (PIL) दायर की थी। उसने लिखा था, “मेरे वकील-मित्र रचित लखमनी मेरा समर्थन करेंगे और मेरी ओर से इस मामले में बहस करेंगे। शहर की वायु गुणवत्ता बहुत अस्वास्थकर है, पटाखों और सर्दियों की शुरुआत के साथ यह और भी खराब होना तय है। कृपया हमारे फेफड़ों को बचाने में मेरी मदद करें। कल हाई कोर्ट में हमारी सुनवाई है। मुझे शुभकामनाएँ दें और इसे शेयर करें।”

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

हालाँकि यह पहली बार नहीं है जब रोशनी अली ने दिवाली के दौरान पर्यावरण सक्रियता की ओर रुख किया हो। 15 नवंबर, 2018 को एक फेसबुक पोस्ट में, रोशनी अली ने पटाखे जलाकर दिवाली मनाने वालों को ‘सर्टिफाइड इडियट्स’ बताया था। उसने दावा किया था, “इस सारे प्लास्टिक को धापा ले जाया जाएगा और जला दिया जाएगा। फिर, हम जहरीली हवा में साँस लेंगे। प्लीज उठो, जागो।”

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

बीफ के प्रति प्रेम

तेजी से बदलती जलवायु के बारे में अपनी चिंताओं के बावजूद, रोशनी अली अपने फॉलोवर्स को बीफ स्टीक के लिए अपने प्यार के बारे में बताने से नहीं कतराती हैं। 7 साल पहले पोस्ट किए गए एक ट्वीट में उन्होंने लिखा था, “सीसीएफसी में बीफ स्टीक इतना अच्छा कभी नहीं लगा।” दिलचस्प बात यह है कि खाद्य उत्पादन से सभी ग्रीनहाउस गैसों का लगभग 60% केवल माँसाहार से होता है।

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

सिर्फ दिवाली ही नहीं, अली ने अन्य हिंदू त्योहारों से पहले भी पर्यावरण संरक्षण की आड़ का सहारा लिया था। पिछले साल अगस्त में गणेश चतुर्थी के दौरान, उसने सुझाव दिया कि भगवान गणेश का उत्सव व्यर्थ है। इसके पीछे तर्क देते हुए उसका कहना था कि हर दिन हाथियों के साथ ‘दुर्व्यवहार’ किया जाता है।

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

पिछले साल जन्माष्टमी के दौरान, उसने प्रोपेगेंडा फैलाया कि ‘क्रूरता- मुक्त दूध’ का आइडिया एक धोखा है और उसने हिंदुओं से शाकाहारी होने और प्लांट बेस्ड दूध पीने का आग्रह किया। उसने वर्तमान युग में और भगवान कृष्ण के शासनकाल के दौरान गाय के प्रति दृष्टिकोण में अंतर का हवाला देते हुए एक पोस्ट साझा किया था।

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

‘हिंदू अपराधबोध’ को जगाना और ‘धर्मनिरपेक्ष साख’ का प्रदर्शन

अगस्त 2020 में भव्य राम मंदिर के ‘भूमि पूजन’ के दिन, रोशनी अली ने अपने हिंदू फॉलोवर्स के बीच ‘अपराधबोध’ की भावना पैदा करने के लिए फेसबुक का सहारा लिया। उसने बहुप्रतीक्षित हिंदू मंदिर के निर्माण को गलत बताने के लिए रवींद्रनाथ टैगोर की ‘दीनो दान’ नामक एक कविता शेयर की थी। हिंदू भावनाओं का मजाक उड़ाने के लिए भूमि पूजन के संदर्भ में इस कविता का इस्तेमाल करते हुए उसने दावा किया कि टैगोर की कविता एक दूरदर्शी लीडर की भविष्यवाणी थी।

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

पिछले साल 5 अगस्त को, उसने एक ब्लॉग भी लिखा था, जिसका शीर्षक था, ‘#RamMandirAyodhya, सीता का अत्यंत अपमान।’ हालाँकि फिलहाल उसने अपने वेबसाइट से इस ब्लॉग को डिलीट कर दिया है।

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

इसे फेसबुक पर शेयर करते हुए उसने लिखा था, ‘दक्षिण भारतीय उत्तर भारतीय एजेंडे से खतरा महसूस कर रहे हैं, ट्विटर पर #LandOfRavana ट्रेंड कर रहा है। इसी तरह इस्लामिक भावनाओं को ठेस पहुँची है। ट्विटर पर #ReturnBabrilandtoMuslims दोपहर से ट्रेंड कर रहा है। इस समय यह कहना थोड़ा मुश्किल है कि किस ट्विटर कैंपेन को राजनीतिक रूप से फंड दिया गया है।”

अली ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) का भी विरोध किया था, जिसमें 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत में अवैध रूप से रहने वाले तीन पड़ोसी देशों बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से सताए गए धार्मिक अल्पसंख्यकों की नागरिकता को तेजी से ट्रैक करने की माँग की गई थी।

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

अली ने विविधता के प्रति अपनी सहिष्णुता और बहुलवाद की अवधारणा को प्रदर्शित करने के लिए अपने स्वयं के उदाहरण का हवाला दिया। उसने दावा किया था, “मैं कौन हूँ? मेरे पिता एक मुस्लिम थे, मेरी माँ एक हिंदू थीं। मेरी पूरी शिक्षा ईसाई धर्म से काफी प्रभावित रही है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में मेरी मौसी हैं और मेरी दादी ब्रिटेन से थीं। मैंने सिल्वर बुद्धा पेंडेंट पहना हुआ है, जबकि मेरा पासपोर्ट कहता है कि मैं मुस्लिम हूँ। मैं हर हफ्ते काली मंदिर जाती हूँ, लेकिन मैं अपने ‘अली’ सरनेम से काफी प्यार करती हूँ, क्योंकि अपने पिता का मेरे पास बस यही बचा है।”

रोशनी अली के राजनीतिक विचार

रोशनी अली के फेसबुक और ट्विटर प्रोफाइल पर एक नज़र डालने से स्पष्ट रूप से उसका भाजपा और मोदी सरकार के खिलाफ रुख दिखता है। पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने वकील प्रशांत भूषण को कोर्ट की अवमानना का दोषी ठहराया था। यह मामला दो ट्वीट्स से संबंधित था, जिसमें प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट और विशेष रूप से सीजेआई बोबडे के खिलाफ आरोप लगाए थे। हालाँकि, अली ने शीर्ष अदालत की कार्रवाई को ‘अत्याचार’ करार दिया था।

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

कश्मीर मुद्दे पर बोलते हुए, अली ने भारत में वामपंथी-इस्लामवादी बैंडवागन के रट्टू तोते जैसा जवाब दिया। एक फेसबुक यूजर को जवाब देते हुए उसने टिप्पणी की थी, “…कई कश्मीरियों ने इतना अन्याय और क्रूरता देखी है कि वे आजादी चाहते हैं। अगर हम अत्याचार के साथ शासन करते हैं तो हम खुद को लोकतंत्र नहीं कह सकते हैं।”

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

रोशनी अली ने एक ‘प्रोपेगेंडा’ तस्वीर भी शेयर की थी, जिसे मूल रूप से ‘पत्रकार’ परंजॉय गुहा ठाकुरता ने पोस्ट किया था। इसके जरिए उसने यह बताने की कोशिश की कि सभी राजनीतिक नेताओं में से केवल ममता बनर्जी, जमीनी सर्वेक्षण में विश्वास करती हैं, जबकि अन्य हवाई सर्वेक्षण पर भरोसा करते हैं।

रोशनी अली के फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट

उल्लेखनीय है कि दिवाली ‘रोशनी’ का त्योहार है, जो रावण को हराकर भगवान राम की लंका से अयोध्या वापसी की याद में मनाया जाता है। रोशनी अली ने पहले राम मंदिर के निर्माण का विरोध किया था, हिंदुओं में अपराध की भावना पैदा करने की कोशिश की थी और गणेश चतुर्थी और जन्माष्टमी के दौरान पर्यावरण संरक्षण का आड़ ली थी। ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि दिवाली से पहले अली की सक्रियता एक बार फिर तेज हो गई है।

‘कश्मीर पर भारत का कब्जा’ – JNU में चर्चा के लिए वामपंथियों का टॉपिक: ABVP ने जलाए पोस्टर, एक्शन में प्रशासन

अक्सर विवादित आयोजनों के कारण चर्चा में रहने वाली जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी अब एक बार फिर खबरों में हैं। इस बार वजह है कश्मीर पर आयोजित होने वाला एक वेबिनार, जिसमें कश्मीर को- ‘इंडियन ऑक्यूपेशन इन कश्मीर (कश्मीर में भारत का कब्जा)’ बताया गया था। ये कार्यक्रम सेंटर फॉर वीमेंस स्टडीज आयोजित करवा रहा था। लेकिन वहाँ के एबीवीपी छात्रों ने इसका जमकर विरोध किया और प्रशासन ने कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही इसे रद्द कर दिया।

जेएनयू प्रशासन की ओर से जारी नोटिस में कहा गया, “इस कार्यक्रम को लेकर प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई थी। इसमें ‘Indian occupation in Kashmir’ जो शब्द लिखा गया है वह बेहद आपत्तिजनक है और प्रशासन इसकी निंदा करता है। साथ ही पूरे मामले को लेकर जाँच करने के लिए देता है।

विश्वविद्यालय के कुलपति एम जगदीश कुमार ने कहा, “जैसे ही हमारे संज्ञान में आया कि एक ऑनलाइन वेबिनार जिसका नाम- ‘जेंडर रेजिस्टेंस एंड फ्रेश चैलेंज इन पोस्ट-2019’ है और जिसे सेंटर फॉर वीमेंस स्टडीज द्वारा शुक्रवार को 8:30 बजे आयोजित किया जाना था, हमने तुरंत उसे रुकवाया।” वीसी ने बताया कि ऐसे आयोजन के लिए परमिशन नहीं माँगी गई थी। ये बहुत आपत्तिजनक और भड़काऊ है। ये देश की अखंडता और संप्रभुता पर सवाल उठाता है। जेएनयू ऐसे विवादस्पद वेबिनारों के लिए प्लेटफॉर्म नहीं बन सकता। मामले में जाँच चल रही है।

बता दें कि सेंटर फॉर वीमेंस स्टडीज द्वारा आयोजित कार्यक्रम का विरोध जेएनयू के फैकल्टी मेंबर द्वारा भी किया गया था। वहाँ एबीवीपी के छात्रों ने कार्यक्रम के पोस्टरों की प्रतियों को जलाकर अपना विरोध जताया। उन्होंने पोस्टर में इस्तेमाल हुए शब्दों को राष्ट्र विरोधी कहा। साथ ही इस मामले में कानूनी कार्रवाई की माँग की। उन्होंने कहा कि जेएनयू के कम्युनिस्ट गिरोह कश्मीर की अस्थिरता के लिए हमेशा अपना प्रोपेगैंडा’ जारी रखते हैं।

एबीवीपी-जेएनयू सचिव रोहित कुमार ने कहा, “हम महिला अध्ययन केंद्र की अध्यक्ष, संबंधित संकायों और जेएनयू रजिस्ट्रार के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की माँग करते हैं, जिन्होंने कार्यक्रम की अनुमति दी थी और जिन्होंने इस तरह के वेबिनार का आयोजन तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर किया है।”

एबीवीपी जेएनयू ने उन लोगों के खिलाफ़ माँग की जो केंद्र द्वारा आयोजित इस वेबिनार की आयोजन टीम का हिस्सा रहे हैं। एबीपी द्वारा जारी प्रेस रिलीज में कहा गया कि 6 फरवरी, 2016 को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के कम्युनिस्टों द्वारा आयोजित राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम की याद दिलाते हुए, भारत की संप्रभुता को कमजोर करने वाला एक और कार्यक्रम भारत के सामाजिक विज्ञान स्कूल में महिला अध्ययन केंद्र में सामने आया है। 

बांग्लादेश में फिर मानव तस्करी का भंडाफोड़, 23 महिलाओं को बचाया गया, 12 तस्कर गिरफ्तार

बांग्लादेश एक बार फिर मानव तस्करी के कारण खबरों में है। वहाँ की राजधानी ढाका में 23 महिलाओं को रैपिड एक्शन बटालियन (रैब) फोर्स ने समय रहते रेस्क्यू किया है। तस्कर, उन सबको विदेश भेजने की तैयारी में थे। पुलिस ने जानकारी दी कि इस कार्रवाई में 10-12 तस्कर भी धरे गए हैं।

बांग्लादेशी मीडिया साइट ‘द डेली स्टार’ के मुताबिक ये जानकारी रैब के लीगल और मीडिया विंग एएनएम इमरान खान ने दी है। उन्होंने बताया कि ये छापेमारी मीरपुर, उत्तरा और तेजगाँव में की गई थी। रैब के एएसपी मोहम्मद साजेदुल इस्लाम ने बताया कि इस रेड के वक्त 10-12 तस्करों को भी गिरफ्तार किया गया।

अब आगे इस संबंध में जानकारी रैब की प्रेस कॉन्फ्रेंस में आएगी। लेकिन बता दें कि बांग्लादेश में मानव तस्करी का खेल आज का नहीं है। साल 2012 की बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि कैसे बांग्लादेश में लड़कियों को झांसा देकर उन्हें भारत में (विदेशों में) बेच दिया जाता है। 

बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, “मानव तस्करों के चंगुल में फँसी ऐसी महिलाओं का कोई पुख्ता आँकड़ा नहीं है लेकिन महिला अधिकारों के कार्यकर्ताओं का मानना है कि हर साल हजारों की संख्या में बांगलादेशी लड़कियों को भारत और खाड़ी के देशों में अवैध तरीके से भेजा जाता है।”

इसके अलावा याद दिला दें कि अभी हाल में बेंगलुरू में एक गैंगरेप का मामला हुआ था। जहाँ 4 बांग्लादेशियों ने एक महिला का बलात्कार करते हुए उसकी वीडियो वायरल कर दी थी। उस समय भी पुलिस की पड़ताल में ये बात निकल कर आई थी कि जिस पीड़िता को पहले नॉर्थ ईस्ट की बताया जा रहा था, वो बांग्लादेशी थी। उसे भी मानव तस्करी के जरिए भारत लाया गया था। पुलिस ने आशंका जताई थी कि सभी आरोपित किसी गैंग का हिस्सा थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार पीड़िता को वित्तीय समस्याओं के कारण प्रताड़ित किया गया था। वीडियो में एक महिला समेत 5 दरिदों ने उसके साथ हैवानियत की सभी हदें पार कर दी थीं। वीडियो में पीड़िता चिल्ला रही थी, “कृपया मेरे साथ ऐसा मत करो। वीडियो रिकॉर्ड मत करो” लेकिन किसी दरिंदे उसकी एक न सुनी। बाद में वीडियो से तस्वीर लेकर पुलिस ने इस चारों को पकड़ने का काम किया था। इन सबने महिला से रेप करते हुए उसके प्राइवेट पार्ट में शराब की बोतल घुसा दी थी। 

स्कूल के प्रिंसिपल ने 2nd क्लास के बच्चे को छत से उल्टा लटकाया, UP पुलिस-प्रशासन ने भेजा जेल

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में एक प्राइवेट स्कूल के प्रिंसिपल की बेहद शर्मनाक और हैरान करने वाली हरकत सामने आई है। यहाँ शरारत करने पर कक्षा 2 के छात्र को सजा के तौर पर प्रिंसिपल ने बिल्डिंग की छत से एक पैर पकड़ कर उल्टा लटका दिया। इस दौरान वहाँ अन्य छात्र-छात्राएँ भी मौजूद थे। एक बच्चे ने बताया कि प्रिंसिपल ने तकरीबन 10 मिनट तक बच्चे को हवा में लटका कर रखा।

कक्षा 2 का छात्र डर और दहशत में चीखता-चिल्लाता रहा, लेकिन माफी माँगने के बाद ही प्रिंसिपल ने उसे वापस खींचा। बच्चे को लटकाने का फोटो सोशल मीडिया वायरल हो गया, जिसके बाद छात्र के पिता रणजीत यादव की शिकायत पर जिलाधिकारी ने प्रिंसिपल के खिलाफ धारा 352, 506 व 75 जुवेनाइल एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया। इसके बाद प्रिंसिपल मनोज विश्वकर्मा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। गिरफ्तार होने पर, स्कूल के प्रिंसिपल ने कहा कि उन्हें अपने किए पर पछतावा है।

गोलगप्पे खाने के दौरान बच्चे ने की शरारत

मामला मिर्जापुर के अहरौरा में स्थित सद्भावना शिक्षण संस्थान जूनियर हाईस्कूल (प्राइवेट स्कूल) का है। बताया जा रहा है कि गुरुवार की दोपहर स्कूल में कक्षा 2 में पढ़ने वाले छात्र ने गोलगप्पा खाने के दौरान बच्चों के साथ शरारत कर दी थी। इसके लिए प्रिंसिपल मनोज विश्वकर्मा ने उसे सजा के तौर पर ऐसी सजा दी, जो वह शायद कभी ना भूल पाए।

प्रिंसिपल मनोज विश्वकर्मा ने बच्चे का एक पैर पकड़ कर बिल्डिंग से उल्टा लटका दिया। बच्चा डर से चीखता-चिल्लाता रहा। इस दौरान वहाँ पर और भी बच्चे मौजूद थे। तभी किसी ने प्रिंसिपल की इस हरकत की फोटो खींच ली और सोशल मीडिया पर वायरल कर दी।

जिलाधिकारी प्रवीण कुमार लक्षकर ने मामले का संज्ञान लेते हुए बेसिक शिक्षा अधिकारी को तत्काल मौके पर जाकर जाँच करने का आदेश दिया। उन्होंने प्रिंसिपल के खिलाफ FIR दर्ज कराने का भी आदेश दिया। पीड़ित बच्चे के पिता ने आरोपित प्रिंसिपल के खिलाफ नजदीकी थाने में मुकदमा दर्ज करवा दिया है।

बच्चे के पिता रंजीत यादव ने कहा, “मेरा बेटा सिर्फ दूसरे बच्चों के साथ गोल गप्पे खाने गया था और वह थोड़ा शरारती है। मेरे बच्चे के शरारत पर उसके स्कूल के प्रिंसिपल ने ऐसी सजा दी, जिससे मेरे बेटे की जान को खतरा हो सकता था।” बताया जा रहा है कि स्कूल की मान्यता भी निरस्त कर दी जाएगी। इसके लिए कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

‘मेटा की जगह मीट बढ़िया, अगर ये कंपनी सोनिया गाँधी की होती तो वो बेटा रखती’: फेसबुक का नया नाम नहीं आया रास, खूब बनें मीम्स

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक का नाम बदलकर ‘मेटा’ कर दिया गया है। दरअसल, फेसबुक के फाउंडर और सीईओ मार्क जुकरबर्ग भविष्य के वर्चुअल रियलिटी विजन (मेटावर्स) को देखते हुए ऐसा नाम रखा है। हालाँकि, यूजर्स को यह नाम कुछ जम नहीं रहा है। यही कारण है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर पर फेसबुक के नए नाम का जमकर मजाक उड़ाया जा रहा है।

इसको लेकर लोग मजेदार मीम्स शेयर कर रहे हैं। वहीं, कई लोग कह रहे हैं कि फेसबुक रीब्रांडिंग करके मुख्य मुद्दों से ध्यान भटका रहा है। एक यूजर ने एक पोस्टर शेयर करते हुए लिखा, ”अल्लाह माफ करे बहुत मनहूस लग रहे हो.. मत करो… रहने दो।” एक अन्य यूजर ने लिखा, “मेटा की जगह मीट नाम बढ़िया है।”

अतीव आनंद ने लिखा, ”ज़ुकरबर्ग ने फेसबुक का नाम बदल कर ‘मेटा’ कर दिया। अगर ये कंपनी सोनिया गाँधी की होती तो वो ‘बेटा’ करती।”

अजय साहनी नाम के यूजर ने लिखा, ”मार्क जुकरबर्ग ने योगी आदित्यनाथ से प्रभावित होकर ‘फेसबुक’ का नाम बदलकर ‘मेटा’ रख दिया।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, ”फेसबुक ने भी अपना नाम बदल कर ‘मेटा’ रख लिया, पर चमचे अपना अध्यक्ष नहीं बदल पाए।”

आशुतोष श्रीवास्तव नाम के एक यूजर ने लिखा, ”मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुक के मसलों को सुलझाने के लिए ‘मेटा’ नाम का सहारा लिया है।”

बता दें कि फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग ने फेसबुक इंक (फेसबुक कंपनी का पहले का नाम) कंपनी का नाम बदलकर गुरुवार (28 अक्टूबर, 2021) को मेटा (Meta) कर लिया है। फेसबुक ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से सिलसिलेवार ट्वीट कर इसकी जानकारी दी। एक ट्वीट में कंपनी ने कहा, “जिन ऐप्स- इंस्टाग्राम, मैसेंजर और वॉट्सऐप- को हमने बनाया है, उनके नाम वहीं रहेंगे।” विभिन्न ऐप और तकनीकों को इस नए ब्रांड के तहत लाया जाएगा। हालाँकि, कंपनी अपना कारपोरेट ढाँचा नहीं बदलेगी।

बेल के बाद भी आर्यन खान की जेल में गुजरेगी एक और रात: रिहाई के लिए पूजा भट्ट ने किया नवाब मलिक का शुक्रिया, कही ये बात

आर्यन खान केस में गिरफ्तारी से लेकर जमानत तक महाराष्ट्र के मंत्री नवाब मलिक ने खुलकर बॉलीवुड का समर्थन किया और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की कार्रवाई पर सवालिया निशाना लगाया। उद्धव सरकार में मंत्री नवाब मलिक ने एनसीबी के जोनल डायरेक्टर समीर वानखेड़े के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है। इस बीच अब जब आर्यन खान को जमानत मिल गई तो एक्ट्रेस पूजा भट्ट ने नवाब मलिक का शुक्रिया अता किया है।

पूजा भट्ट ने नवाब मलिक को बोला शुक्रिया

दरअसल, बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्टार किड को जमानत दे दी है। आर्यन की जमानत के बाद नवाब मलिक ने मीडिया से रूबरू हुए इस केस को बॉलीवुड को बदनाम करने की कोशिश बताया। अपने बयान में नवाब मलिक ने कहा था कि जिस तरह का फर्जी मामला बनाया गया, उसमें आर्यन की पहले ही जमानत को सकती थी। उन्होंने कहा कि वकीलों के जरिए NCB हमेशा अपनी भूमिका बदलती रहती है। वहीं, एक्ट्रेस पूजा भट्ट ने मंत्री का एक वीडियो शेयर करते हुए ट्विटर पर उनका शुक्रिया किया

‘यह हमें कम अनाथ महसूस कराता है’

पूजा ने ट्विटर पर मंत्री का वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रति नफरत के फर्जी अभियान के खिलाफ स्टैंड लेने के लिए आपका धन्यवाद। यह हमें कम अनाथ महसूस कराता है। बॉलीवुड और बॉम्बे/मुंबई आंतरिक रूप से जुड़े हुए हैं। आखिरकार यह सपनों का शहर है और इसने वर्षों से लाखों लोगों को कायम रखा है।”

‘बॉलीवुड को बदनाम करने की साजिश’ 

बता दें कि मीडिया से बात करते हुए नवाब मलिक ने कहा, “बॉलीवुड को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है और इसे मुंबई से उत्तर प्रदेश में स्थानांतरित की जा रही है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नोएडा में एक फिल्म सिटी बनाने की योजना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि योगी महाराज नोएडा में फिल्म सिटी बनाना चाहते हैं। ताज महल होटल में आकर जितने भी BJP वाली सोच के समर्थकों से मिले, उन्हें लगता है कि बॉलीवुड को बदनाम कर बॉलीवुड मुंबई से बाहर चला जाएगा और योगी सोच रहे हैं कि यूपीवुड तैयार हो जाएगा तो यह उनकी गलतफहमी है। उनका सपना धरा रह जाएगा।”

आज जेल में ही गुजरेगी आर्यन खान की रात

वहीं, शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान की रिहाई 29 अक्टूबर को नहीं हो सकी। शाहरुख समेत उनके रिश्तेदार रिहाई का इंतजार कर रहे थे, लेकिन बेल ऑर्डर की कॉपी एनडीपीएस कोर्ट से आर्थर रोड जेल में 5:30 बजे तक नहीं पहुँची। इस वजह से जमानत मिलने के बाद भी आर्यन को आज रात जेल में ही काटनी पड़ेगी।

बताया जा रहा है कि आर्यन शनिवार (30 अक्टूबर 2021) को सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे के बीच में जेल से बाहर निकल सकते हैं। मगर ऐसा तभी मुमकिन होगा जब रिलीज ऑर्डर टाइम पर मिल जाएगा। साथ ही इस पर भी निर्भर करता है कि आर्थर रोड जेल के जमानत बॉक्स में कितने रिलीज ऑर्डर पेंडिंग हैं। अगर पहले से ज्यादा रिलीज ऑर्डर्स हैं तो थोड़ा वक्त लग सकता है और अगर कम रिलीज ऑर्डर हैं तो ज्यादा समय नहीं लगेगा।

बांग्लादेश में बंगाली राष्ट्रवाद से इस्लामी कट्टरपंथ की यात्रा: 22% से घटकर मात्र 9.5% रह गए हिन्दू, उन पर भी संकट

आर्चर के. ब्लड पूर्वी पाकिस्तान में अमेरिकी काउंसल जनरल के तौर पर कार्यरत थे और बांग्लादेश की स्वतंत्रता के दौरान ढाका में मौजूद थे। उन्होंने वहाँ जो अपनी आँखों से देखा, उसे अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘द क्रुअल बर्थ ऑफ बांग्लादेश’ में लिखा है। उन्होंने लिखा, “28 मार्च को मैंने एक टेलीग्राम लिखा, जिसका शीर्षक ‘सेलेक्टिव नरसंहार’ था। जहाँ तक मुझे पता है, मैंने इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल किया है, लेकिन यह आखिरी बार भी नहीं था। यहाँ ढाका में हम पाकिस्तानी सेना द्वारा आतंक के मूक और भयभीत साक्षी बने हुए हैं। ढाका की सड़कें हिंदुओं से पट चुकी हैं।”

इस घटनाक्रम के दौरान ही आखिरकार पूर्वी पाकिस्तान को पश्चिमी पाकिस्तान से स्वतंत्रता मिल गई और एक नए देश, बांग्लादेश का उदय हुआ। अब एक उम्मीद पैदा हुई कि कम-से-कम बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों को संरक्षण मिलेगा। पाकिस्तान की सेना अथवा प्रशासन ने उन पर जो अत्याचार किए, उनसे भी उन्हें छुटकारा मिल जाएगा। मगर, बांग्लादेश की नियति में ऐसा होना संभव ही नहीं था। आजादी के कुछ सालों बाद ही वहाँ कट्टर धर्मांधता फैलाकर उसे एक इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर दिया गया। संविधान में भी शरीयत के अनुसार बदलाव कर दिए गए और इसी के साथ बांग्लादेश में भी गैर-मुसलमानों का दमन शुरू हो गया।

हालाँकि, बांग्लादेश शुरुआत में ऐसा नहीं था जैसा आज दिखाई देता है। साल 1971 में जब बांग्लादेश स्वतंत्र होकर नया देश बना तो शेख मुजीबुर्रहमान ने बांग्ला भाषा में राष्ट्र के नाम एक संदेश भेजा, जिसके आखिरी शब्द ‘जॉय बांग्ला’ यानि ‘बंगाल की विजय’ हो थे। उनका अपने देशवासियों को संबोधन उर्दू अथवा अरबी में नहीं, बल्कि बांग्ला भाषा में था।

साल 1973 में बांग्लादेश में चुनाव हुए और मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व वाली अवामी लीग को 300 में से 293 सीटें हासिल हुईं। उन्होंने अन्य दलों के साथ मिलकर सरकार का गठन किया। अगले ही साल ‘द पीपल रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश’ को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता मिल गई और 25 सितंबर को मुजीबुर्रहमान ने बांग्लादेश के पहले प्रधानमंत्री के तौर पर संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेम्बली को ऐतिहासिक रूप से बांग्ला भाषा में संबोधित किया।

यह एक दुर्भाग्य ही था कि बांग्लादेश के वास्तुकार और राष्ट्रपिता ‘बंगबन्धु’ शेख मुजीबुर्रहमान को इस बंगाली राष्ट्रवाद को सफल होते देखने का मौका नहीं मिला। 15 अगस्त 1975, जिस दिन भारत अपनी स्वतंत्रता का जश्न मना रहा था, उसी दिन उनकी हत्या कर दी गई। एक देश जो कि अपनी वास्तविक पहचान के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपना कर कुछ कदम ही आगे बढ़ा था, वहाँ अब मार्शल लॉ लग गया था। नागरिकों के अधिकार छीन लिए गए, राजनैतिक हत्याएँ और षड्यंत्र सामान्य घटनाक्रम हो चुके थे।

सैन्य तख्तापलट के बाद जनरल जियाउर्रहमान का सत्ता पर कब्जा हो गए। उन्होंने स्वयं को राष्ट्रपति और माशिउर रहमान को प्रधानमंत्री घोषित कर दिया। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण संयोग ही था कि एक तरफ बांग्लादेश में जियाउर्रहमान थे तो उसी दौरान पाकिस्तान में भी सेना ने तख्तापलट कर दिया और मुहम्मद ज़िया-उल-हक़ वहाँ के राष्ट्रपति बन गए। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो की पोती और पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर अली भुट्टो की बेटी, फातिमा भुट्टो अपनी पुस्तक ‘सॉग्स ऑफ ब्लड एंड स्वर्ड’ में लिखती हैं, “जिया का शासन न केवल अत्यधिक क्रूर था- सार्वजनिक कोड़े और फाँसी का आदेश देना- बल्कि अपमान करने में भी पारंगत था।” हालाँकि, दोनों देशों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि इन दोनों ही नेताओं ने अपने-अपने राष्ट्रों को कट्टरपंथ, रूढ़िवाद और मजहबी उन्माद में जबरन झोंक दिया था।

जनरल जियाउर्रहमान ने साल 1979 में संविधान में पाँचवां संशोधन कर ‘बंगाली राष्ट्रवाद’ शब्द हटाकर ‘बांग्लादेशी राष्ट्रवाद’ जोड़ दिया। साथ ही संविधान की प्रस्तावना को धर्मनिरपेक्षता के स्थान पर धार्मिक, यानी इस्लामिक पहचान दे दी गई। साल 1971 के युद्ध के बाद जमात-ए-इस्लामी के सभी नेता बांग्लादेश से पाकिस्तान भाग गए थे और शेख मुजीबुर्रहमान ने जमात पर पाकिस्तान को समर्थन देने के कारण प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन, जियाउर्रहमान ने जमात-ए-इस्लामी को वापस बांग्लादेश ही नहीं बुलाया, बल्कि उसे राजनैतिक गतिविधियों में भी हिस्सा लेने की अनुमति दे दी।

साल 1982 में प्रकाशित पुस्तक ‘बांग्लादेश, द फर्स्ट डिकेड’ के लेखक मार्कस फ़्रांडा लिखते हैं, “बांग्लादेशी राष्ट्रवाद को विकसित करने से जिया शासन अंततः कट्टरपंथी इस्लाम पर एकदम निर्भर हो गया और उसने एकीकृत विचारधारा के रूप में इस्लाम को स्वीकार कर लिया था।”

जियाउर्रहमान की हत्या के बाद कौन कितना कट्टरपंथी और मजहबी होगा, इसको लेकर होड़ मचने लगी। प्रोफेसर विलेम वैन शेंडेल अपनी पुस्तक, ‘ए हिस्ट्री ऑफ़ बांग्लादेश’ में लिखते हैं कि 1981 में जिया की मौत के बाद उनकी पत्नी खालिदा जिया और उनके समर्थकों पर उनके विचारों को प्रचारित करने का जिम्मा आ गया।”

दूसरी तरफ, बांग्लादेश की कमान अगले तानाशाह हुसैन मोहम्मद इर्शाद के हाथों में आ गई। उन्होंने बांग्लादेश में आठवाँ संविधान संशोधन लागू कर इस्लाम को वहाँ का राजकीय धर्म घोषित कर दिया। इर्शाद ने मस्जिदों के निर्माण के लिए सरकारी खजाना भी खोल दिया था। ‘बांग्लादेश: द नेक्स्ट अफगानिस्तान’ के लेखक हिरणमय करलेकर लिखते हैं कि इर्शाद और उसके बाद जमात, बांग्लादेश में एकदम मजबूत हो गई और उसने पाकिस्तान और सऊदी अरब के पैसे से दूर-दराज के गाँवों में मदरसे खोल दिए और शरीयत को स्थापित कर दिया।

जमात को राजनैतिक संरक्षण मिलने से बांग्लादेश में गैर-मुसलमानों के सामने उनके जीवन की सुरक्षा का प्रश्न खड़ा हो गया। हालाँकि, अभी यह संस्था वहाँ प्रतिबंधित है, लेकिन इसकी गतिविधियाँ पहले की तरह आज भी जारी हैं। इसका नतीजा यह है कि साल 1951 में बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) में हिन्दू आबादी 22 प्रतिशत थी, जो कि 2011 में घटकर मात्र 9.5 प्रतिशत रह गई है। अब जो वहाँ बचे हुए हिंदू है, वे हर दिन धार्मिक उत्पीड़न और क्रूरता का शिकार हो रहे हैं।