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कर्नाटक के वाल्मीकि फंड घोटाला मामले में कॉन्ग्रेस नेताओं पर ED के छापे, 1 MP-3 MLA के यहाँ हो रही तलाश: ST कल्याण का पैसा हुआ था लोकसभा चुनाव में इस्तेमाल

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस के एक सांसद और 3 विधायकों के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने छापे मारे हैं। यह कार्रवाई वाल्मीकि फंड घोटाला मामले में हुई है। ED की यह कार्रवाई कर्नाटक के बेल्लारी जिले में हुई है। वाल्मीकि घोटाला मामले में कॉन्ग्रेस के एक मंत्री की कुर्सी जा चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बुधवार (11 जून, 2025) को ED की टीमों ने 8 ठिकानों पर छापे मारे हैं। ED की कार्रवाई कॉन्ग्रेस सांसद ई तुकाराम, विधायक नारा भारत रेड्डी, विधायक जीएन गणेश और विधायक बी नागेन्द्र के ठिकानों पर हुई है। बी नागेन्द्र की ही मंत्री की कुर्सी इस मामले में गई थी।

इससे पहले भी एजेंसी इस मामले में छापेमारी कर चुकी है। वर्तमान कार्रवाई PMLA कानून के तहत की जा रही है, ऐसा रिपोर्ट्स में बताया गया है। इस कार्रवाई में क्या बरामदगी और पूछताछ भी हुई है, इसकी जानकारी सामने नहीं आई है।

यह मामला कर्नाटक में दलित और जनजातीय युवाओं के विकास के लिए बनाए गए KMVSTDC में करोड़ों की गड़बड़ी से जुड़ा हुआ है। ED ने इस मामले में चार्जशीट दायर की थी।

क्या है वाल्मीकि फंड घोटाला?

कर्नाटक सरकार KMVSTDC प्रदेश की जनजातीय जनता के कल्याण के लिए चलाती है। इसके अंतर्गत जनजातीय जनसंख्या के लिए रोजगार समेत विशेष योजनाएँ लाई जाती हैं। कर्नाटक सरकार इसके लिए अलग से बजट देती है। इसी महर्षि वाल्मीकि फंड में घोटाले की बात सामने आई थी।

यह पूरा मामला एक आत्महत्या से चालू हुआ था। मई, 2024 में इसी निगम से जुड़े एक 48 वर्षीय कर्मचारी ने आत्महत्या कर ली थी। उसकी मौत के बाद एक सुसाइड नोट मिला था। इसमें उसने आरोप लगाया था कि उसके उच्चाधिकारियों ने उस पर इस बात के लिए दबाव बनाया था कि वह निगम के खातों से पैसा ट्रांसफर करे।

उसने आरोप लगाया था कि यह काम निगम का पैसा हड़पने के लिए किया गया था। उसका आरोप था कि यह काम एक मंत्री के मौखिक आदेशों के आधार पर किया गया था। उसने अपने विभाग के अलावा यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया के कर्मचारियों पर भी आरोप लगाए थे। इसके बाद पूरे प्रदेश में हंगामा मच गया था।

आत्महत्या करने वाले कर्मचारी चंद्रशेखर ने सुसाइड नोट में बताया था कि उसे उच्चाधिकारियों ने इस बात के लिए निर्देशित किया था कि वह निगम के एक खाते से दूसरे खाते में पैसा ट्रांसफर करने के लिए पत्र लिखे। यह पैसा यूनियन बैंक के वसंत नगर ब्रांच से एमजी रोड ब्रांच में डाला जाना था।

इसी के तहत वाल्मीकि निगम के खातों से निकाला गया पैसा इसके बाद अन्य खातों में भेज दिया गया। इस पूरे खेल में ₹187 करोड़ का लेनदेन हुआ। इसमें से लगभग ₹88 करोड़ अवैध खातों में भेजा गया। जब यह मामला खुला तो चंद्रशेखर डर गया और उसने आत्महत्या कर ली।

यह पूरा मामला सामने आने के बाद कई बैंक कर्मचारियों समेत KMVSTDC के कई कर्मचारियों पर कार्रवाई की गई। इसके बाद उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा था। इस मामले में अब ED जाँच चल रही है। इस मामले में 25 लोगों को आरोपित बनाया गया था।

ED ने इस मामले में दायर चार्जशीट में बताया था कि बेल्लारी लोकसभा में लगभग 7 लाख वोटरों को इस फंड में घोटाले के पैसे से रिश्वत दी गई। यह रिश्वत उन्हें कॉन्ग्रेस को वोट देने के लिए दी गई। यह पैसा बी नागेन्द्र ने महर्षि वाल्मीकि जनजातीय विकास निगम में घोटाला करके जुटाया था।

बेल्लारी में ₹14 करोड़ की रिश्वत

ED ने बताया था कि बेल्लारी में 7 लाख वोटरों को लगभग ₹200 की रिश्वत दी गई। ED ने कहा था कि घोटाले के पैसे से चुनाव प्रभावित करने की कोशिश की गई। ED ने यह खुलासा बी नागेन्द्र के पूर्व निजी सचिव विजय गौड़ा के फोन की जाँच के बाद किया था। उसमें बेल्लारी में पैसा खर्च होने के सबूत मिले थे।

ED ने आरोप लगाया था कि बी नागेन्द्र के पास इस घोटाले का अधिकांश पैसा आया। ED को विजय गौड़ा ने बताया था कि उसने घोटाले का यह पैसा नागेन्द्र के कहने पर कई लोगों में बाँटा जो कॉन्ग्रेस से जुड़े हुए थे। यहाँ कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार ई तुकाराम के लिए घोटाले का पैसा उपयोग किया गया।

यह भी आरोप ED ने लगाया था कि बूथ पर काम करने वाले कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को ₹10000 इस घोटाले के पैसे से दिए गए। नागेन्द्र के घोटाले का यह पैसा बंटवाने में कॉन्ग्रेस के विधायकों ने भी सक्रिय रोल निभाया, यह भी ED ने बताया था। जाँच एजेंसी बताया था कि घोटाले में से लगभग ₹15 करोड़ का इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने के लिए किया गया।

ED के पास पैसे से लेनदेन की फोटो भी मौजूद हैं। चार्जशीट में यह भी कहा गया था कि बी नागेन्द्र ने इन आरोपों पर कोई साफ़ जवाब नहीं दिया है। बी नागेन्द्र ने बचने के लिए तीन आईफोन तोड़े हैं। ED ने यह भी आरोप लगाए हैं कि बी नागेन्द्र ने जब पैसों की गड़बड़ी की तो इसे वित्त विभाग ने भी नहीं चेक किया।

न्यूज चैनल की एंकर शाजिया निसार के घर से मिले ₹34 लाख कैश, पत्रकार आदर्श झा भी गिरफ्तार: जानिए क्या है ₹65 करोड़ की उगाही का मामला

नोएडा पुलिस ने दो पत्रकारों शाजिया निसार और आदर्श झा को उगाही के आरोप में गिरफ्तार किया है। शाजिया निसार ‘भारत 24’ में एंकर रही है, जबकि आदर्श झा एक डिजिटल पत्रकार हैं। इन पर ‘भारत 24’ चैनल के 75 वर्षीय सीएमडी जगदीश चंद्रा को ब्लैकमेल करने और उनसे ₹2.26 करोड़ से अधिक की उगाही करने का आरोप है। निसार ने कथित तौर पर झूठे बलात्कार के मामले में फँसाने की धमकी देकर ₹ 65 करोड़ माँगे थे।

धमकी और जबरन वसूली का आरोप

नोएडा पुलिस के अनुसार भारत 24 के मुख्य संपादक और सीईओ जगदीश चंद्रा ने एफआईआर दर्ज कराई है। अपनी शिकायत में चंद्रा ने कहा कि शाजिया निसार 2022 से चैनल के साथ काम कर रही थीं। उन्होंने कथित तौर पर उन्हें बलात्कार के झूठे मामले में फँसाने और ₹65 करोड़ न देने पर आत्महत्या करने की धमकी दी थी।

चंद्रा ने आरोप लगाया कि पिछले एक साल में उन्हें चेक के जरिए ₹2.26 करोड़ दिए गए और उनके पास इस बात के समर्थन में रिकॉर्डिंग और सबूत भी हैं। एफआईआर में लिखा है, “30 वर्षीय शाजिया निसार 2022 से मेरे चैनल में बतौर एंकर काम कर रही है। वह मुझे झूठे बलात्कार के मामले में फँसाने और आत्महत्या करने की धमकी देकर ब्लैकमेल कर रही है। वह मुझसे अवैध रूप से ₹60 करोड़ की माँग कर रही है। पिछले एक साल में उसने कई बार चेक के जरिए ₹2 करोड़ 26 लाख लिए हैं। मेरे पास इसके (लेनदेन के) सबूत हैं। आदर्श झा ब्लैकमेल करने में उसकी मदद कर रहा है।”

एफआईआर में एक डिजिटल न्यूज़ पोर्टल से जुड़े पत्रकार आदर्श झा का भी नाम ब्लैकमेल में शामिल बताया गया है। पुलिस ने बताया कि दोनों ने मिलकर ₹65 करोड़ की उगाही करने की कोशिश की। शिकायत 8 जून को दर्ज की गई थी।

मीडिया से बात करते हुए एसएचओ अमित कुमार ने कहा, “जब उनसे उनके खाते में पैसे के बारे में पूछा गया, तो उनके पास इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं था। उन्होंने हमें बताया कि यह मुआवज़ा था।” चैनल स्टाफ़ की और शिकायतें भारत24 की कंसल्टिंग एडिटर अनीता हाडा और एचआर हेड अनुश्री धर ने आरोपी के खिलाफ़ दो और शिकायतें दर्ज कराईं।

हाडा ने निसार के उत्पीड़न के आरोपों को खारिज़ करते हुए कहा, “अगर ऐसा होता, तो वह शिकायत दर्ज करातीं। मैं उनका समर्थन करता।” कंपनी ने पहले पुलिस के पास जाने के बजाय निसार को पैसे क्यों दिए?, इस सवाल पर मीडिया से बात करते हुए हाडा ने कहा, “हमें कंपनी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने की चिंता थी।”

छापेमारी और बरामदगी

एफआईआर के बाद, नोएडा सेक्टर 58 पुलिस ने दिल्ली में निसार के आवास पर छापा मारा और 34.5 लाख रुपए नकद, तीन मोबाइल फोन, दो लैपटॉप और एक स्कॉर्पियो वाहन जब्त किया। गाजियाबाद के इंदिरापुरम में आदर्श झा के आवास पर भी छापेमारी की गई, जहाँ से उसे गिरफ्तार कर लिया गया। दोनों को गौतम बुद्ध नगर जिला न्यायालय में पेश किया गया और 15 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। पुलिस ने पुष्टि की है कि निसार की मां का नाम भी इस रैकेट में कथित भूमिका के लिए एफआईआर में दर्ज है, हालाँकि गिरफ्तारी अभी नहीं हुई है।

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई को मिला प्रमोशन, अब बने आर्मी के डिप्टी चीफ… बेटी ने पोस्ट में पिता को बताया ‘कूल’: उत्तम युद्ध सेवा मेडल भी मिला, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में थे सेना का चेहरा

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई को हाल ही में देश के सबसे बड़े सैन्य सम्मानों में से एक, ‘उत्तम युद्ध सेवा मेडल’ से नवाजा गया है। यह सम्मान उन्हें 4 जून 2025 को ‘डिफेंस इंवेस्टीचर सेरेमनी 2025 (फेज़-II)’ के दौरान दिया गया।

इसके अलावा, सोमवार (9 जून 2025) जनरल राजीव घई को भारतीय सेना में एक बेहद अहम पद, ‘डिप्टी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (स्ट्रेटेजी)’ भी सौंपा गया है। यह पद सेना के ऑपरेशन और खुफिया जैसे महत्वपूर्ण कामों की देखरेख करता है। उनकी बेटी, शरण घई ने भी सोशल मीडिया पर अपने ‘कूल’ पिता की जमकर तारीफ की है।

‘उत्तम’ सेवा का सम्मान और नई जिम्मेदारी

लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई इस समय ‘डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (DGMO)’ के पद पर भी कार्यरत हैं। राजीव घई को ‘उत्तम युद्ध सेवा मेडल’ से सम्मानित किया जाना उनकी असाधारण बहादुरी और युद्ध के समय दी गई बेहतरीन सेवाओं का प्रमाण है।

यह मेडल युद्ध या संघर्ष के दौरान असाधारण सेवा के लिए दिया जाने वाला एक उच्च सैन्य सम्मान है। यह ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ का युद्धकालीन रूप है और इसे सशस्त्र बलों के सभी रैंकों, जिनमें सहायक, आरक्षित और नर्सिंग कर्मचारी शामिल हैं, को आउटस्टैंडिंग ऑपरेशनल लीडरशिप और विशिष्ट सेवा के लिए दिया जाता है।

बेटी को है अपने ‘कूल’ डैड पर गर्व

बेटी शरण घई ने अपने पिता की तारीफ में एक दिल छू लेने वाला संदेश पोस्ट किया है। शरण घई ने लिखा, “आप पर बहुत गर्व है, डैड। यह देखकर खुशी हुई कि आखिर सब लोग समझ रहे हैं कि आप कितने कूल हैं। हम तो यह सब जानते ही थे। लव यू, @RgGhai, अगले जो भी अद्भुत काम आप करेंगे, उन्हें देखने का इंतजार नहीं कर सकती।” यह संदेश उनके पिता के प्रति उनकी गहरी भावनाओं और गर्व को दर्शाता है।

ऑपरेशन सिंदूर: ‘राख से राख’ तक का जवाब

लेफ्टिनेंट जनरल घई ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। यह सैन्य अभियान 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के जवाब में शुरू किया गया था, जिसमें 26 हिंदू पर्यटक मारे गए थे। इस ऑपरेशन में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में 9 आतंकवादी ठिकानों को निशाना बनाया गया और 100 से ज़्यादा आतंकवादियों को मार गिराया गया था।

इन हमलों के दौरान, पाकिस्तान के DGMO ने लेफ्टिनेंट जनरल घई को फोन किया और कथित तौर पर सीजफायर की गुहार लगाई थी। घई ने बाद में भारत के इस जवाब को ‘राख से राख‘ वाक्यांश का उपयोग करके समझाया था। जनरल घई ने बताया कि कैसे देश की एयर डिफेंस ने खतरों को बेअसर कर दिया।

पहले भी निभाई हैं महत्वपूर्ण भूमिकाएँ

इसी साल 2025 की शुरुआत में, लेफ्टिनेंट जनरल घई ने भारत-म्यांमार सीमा पर सुरक्षा स्थिति का आकलन करने के लिए मणिपुर का दौरा किया था। जनरल घई ने वहाँ बुनियादी ढाँचे और राज्य अधिकारियों के साथ समन्वय की समीक्षा की थी।

कुमाऊं रेजिमेंट के एक अनुभवी अधिकारी, श्री घई ने अक्टूबर 2024 में DGMO की भूमिका संभालने से पहले जम्मू और कश्मीर में चिनार कॉर्प्स का भी नेतृत्व किया था। उनका लंबा और शानदार करियर भारतीय सेना के प्रति उनके अटूट समर्पण और नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है।

क्या है ब्रिगेड 313? पाकिस्तान में अल-कायदा की आतंकी शाखा जिसे इस्लामाबाद नहीं चाहता कि आप जानें: सवाल सुन पीपीपी नेता शेरी रहमान की हुई बोलती बंद

स्काई न्यूज ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की उपाध्यक्ष शेरी रहमान का एक इंटरव्यू 10 जून को प्रसारित किया। इसमें अलकायदा से संबद्ध ब्रिगेड 313 के बारे में सवाल उठाए गए थे। स्काई न्यूज की पत्रकार यल्दा हकीम ने इस बारे में सवाल पूछा तो रहमान की बोलती बंद हो गई।

जब हकीम ने आतंकवाद अनुसंधान और विश्लेषण संघ (टीआरएसी) से प्राप्त जानकारी के आधार पर उनसे पूछा कि ब्रिगेड 313 पाकिस्तान से संचालित अल-कायदा के नेतृत्व वाला संगठन है और कश्मीर में हमलों का समन्वय कर रहा है, तो रहमान ने जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की।

उसने कहा, “क्या हम हर बार भारत में हमले के समय युद्ध करने जा रहे हैं? पाकिस्तान को बार-बार सीमा पार आतंकवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना ठीक नहीं है।” उसने आगे कहा कि भारत के भीतर कई तथाकथित विद्रोहियों की मौजूदगी है और दावा किया कि पाकिस्तान अब एक ‘बदला हुआ’ देश है।

इंटरव्यू के दौरान एफएटीएफ द्वारा पाकिस्तान की पिछली ग्रे-लिस्टिंग और 26/11 के साजिशकर्ता साजिद मीर की भूमिका पर भी चर्चा की गई। रहमान ने सीधे जवाब नहीं दिए, केवल इतना कहा कि पाकिस्तान का आतंकवाद के साथ ‘लंबा इतिहास’ है, जिसमें इससे लड़ना भी शामिल है। एक सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा, “आप आतंकवाद के बारे में बात करते रहते हैं, लेकिन वह पाकिस्तान का अतीत है। हम आतंकवाद से लड़ रहे हैं। पाकिस्तान अब काफी बदल चुका है।”

ब्रिगेड 313 क्या है?

2000 के दशक की शुरुआत में गठित ब्रिगेड 313 एक पाकिस्तान-आधारित आतंकवादी गठबंधन है। इसे व्यापक रूप से इस क्षेत्र में अल-कायदा के सबसे घातक विस्तारों में से एक माना जाता है। आतंकी संगठन का नाम पैगम्बर मुहम्मद के 313 साथियों से प्रेरित है, जिन्होंने बद्र की लड़ाई लड़ी थी।

गठबंधन का नेतृत्व इलियास कश्मीरी ने किया था, जो पाकिस्तानी सेना का एक पूर्व कमांडो था, जो बाद में 2011 के अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे जाने से पहले अल-कायदा के शीर्ष कमांडरों में से एक बन गया था।

ब्रिगेड 313 कथित तौर पर एक हाइब्रिड संगठन के रूप में काम करता है। यह एक स्वतंत्र संगठन नहीं है, बल्कि लश्कर-ए-तैयबा, लश्कर-ए-झांगवी, हरकत-उल-जिहाद अल-इस्लामी, जैश-ए-मोहम्मद और तालिबान गुटों के आतंकवादियों का एक समन्वय है। यह अल-कायदा की छत्रछाया में काम करता है और इसके लश्कर अल-ज़िल या ‘शैडो आर्मी’ का हिस्सा है। ‘शैडो आर्मी’ को सटीकता और योजना के साथ हाई-प्रोफाइल आतंकवादी अभियानों को अंजाम देने के लिए जाना जाता है।

यह समूह पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर दोनों में टारगेटेड हत्याओं, बम विस्फोटों और समन्वित हमलों की एक श्रृंखला के पीछे रहा है। विश्लेषकों द्वारा इसे इस क्षेत्र की सबसे खतरनाक और प्रभावी जिहादी गुट में से एक बताया गया है। आतंकवाद निरोधक केंद्र के अनुसार, दक्षिण एशिया से परे, सीआईए ने विभिन्न यूरोपीय शहरों में ब्रिगेड 313 के गुर्गों की जानकारी ली है। इससे अंतरराष्ट्रीय खतरे भी पता चलता है।

बीबीसी के अनुसार, यह समूह हूजी के भीतर एक विशेष लड़ाकू इकाई है। यह भारत में भयानक मिशन को अंजाम देने में लगा रहता है। समूह से जुड़े आतंकवादियों ने कथित तौर पर पाकिस्तान की सेना और खुफिया नेटवर्क की मौन सहमति या सक्रिय समर्थन के साथ ऑपरेशन किए।

समूह की संचालन संरचना, भर्ती रणनीति और कई आतंकी संगठनों से सदस्यों के एकीकरण ने इसे वैश्विक जिहादी परिदृश्य में एक शक्तिशाली ताकत बना दिया है। जबकि कश्मीरी में सेना के अभियान ने घाटी में इसे कमजोर किया है। ब्रिगेड 313 की कट्टर विचारधारा और नेटवर्क अंतरराष्ट्रीय चिंता का कारण बने हुए हैं।

भारतीय तट के पास धू-धू कर जल रहा था सिंगापुर का जहाज, इंडियन नेवी ने सवार 18 लोगों की बचाई जान: इनमें 14 चीनी, बीजिंग ने जताया आभार

केरल के तट के पास समंदर में आग से जूझ रहे एक जहाज को भारतीय नौसेना ने अपनी दिलेरी से बचा लिया। यह जहाज सिंगापुर का था और इसमें 14 चीनी नागरिक सवार थे। इस बड़े बचाव अभियान के लिए चीन ने भारत का दिल से शुक्रिया अदा किया है।

कैसे लगी जहाज में आग?

सोमवार (9 जून 2025) की सुबह, केरल के कोझिकोड के पास एमवी वान हाई 503 नाम के सिंगापुर के एक बड़े कंटेनर जहाज में अचानक ज़ोरदार धमाका हुआ और फिर आग लग गई। इस जहाज पर कुल 22 क्रू मेंबर थे, जिनमें से 14 चीन के नागरिक थे और इनमें से 6 ताइवान से थे। जैसे ही भारतीय नौसेना को इस घटना की खबर मिली, उन्होंने बिना देर किए तुरंत कार्रवाई की।

आईएनएस सूरत नाम का नौसेना का एक जहाज कोच्चि बंदरगाह से तुरंत मौके पर भेजा गया। भारतीय तटरक्षक बल (ICG) ने भी बचाव के लिए कई जहाज और एक विमान को भेजा। आग पर काफी हद तक काबू पा लिया गया, लेकिन जहाज से घना धुआँ निकल रहा था।

सोमवार (9 जून 2025) देर रात तक 18 क्रू मेंबर को बचाकर सुरक्षित मंगलुरु लाया गया, लेकिन 4 लोग अभी भी लापता हैं। इस घटना में एक चीनी इंजीनियर बुरी तरह घायल हो गया है, जिसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

चीन ने जताया आभार

भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने भारतीय नौसेना और मुंबई कोस्ट गार्ड की जमकर तारीफ की और इस बचाव अभियान के लिए उनका शुक्रिया अदा किया। यू जिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्विटर) पर लिखा, “हम भारतीय नौसेना और मुंबई कोस्ट गार्ड की ओर से किए गए बचाव अभियान के लिए आभार व्यक्त करते हैं। हम चाहते हैं कि आगे के सर्च ऑपरेशन भी कामयाब रहें और घायल क्रू मेंबर जल्दी ठीक हों।”

इसके अलावा, इस घटना के बाद संभावित तेल रिसाव (oil spill) को लेकर अधिकारियों ने मंगलवार (10 जून 2025) को चेतावनी जारी की है, ताकि समंदर में प्रदूषण न फैले। यह घटना अंतरराष्ट्रीय सहयोग और भारतीय नौसेना की मुस्तैदी का एक बड़ा उदाहरण है।

जब हिमांशी नरवाल के बयान से मिली नैरेटिव को धार, तो वामपंथी मीडिया ने बनाया हीरो: अब अब्बू-बेटे की जोड़ी ने बनाई अश्लील AI वीडियो तो सिले होठ

22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम में एक आतंकी हमला हुआ। इस हमले की पहचान बनी वो तस्वीर, जिसमे एक महिला अपने मृत पति के पास बैठी है। यह फोटो लेफ्टिनेंट विनय नरवाल और उनकी नवविवाहिता पत्नी हिमांशी नरवाल की थी। फोटो में विनय जमीन पर पड़े थे और हिमांशी वहाँ बैठी थीं। इस फोटो ने पूरे देश में शोक और रोष भर दिया। हिमांशी की पीड़ा, इस फोटो के चलते पूरे देश की पीड़ा बन गई।

हमले के बाद स्वाभाविक तौर पर लोगों ने कश्मीरी आतंकियों और पाकिस्तान के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया आतंकियों के स्थानीय मददगारों पर भी लोगों का गुस्सा फूटा। इसके कुछ दिनों बाद हिमांशी ने मीडिया को एक बयान दिया।

उन्होंने कहा, “मुस्लिम और कश्मीरी लोगों का विरोध नहीं होना चाहिए।” उनका ये बयान कुछ लोगों को बहुत भाया। बयान को वामपंथी और कथित उदारवादी मीडिया ने खूब सराहा। ट्विटर से लेकर टीवी डिबेट तक इस बात की खूब सराहना भी की गई।

इस बयान को ‘अमन की आशा’ और पाकिस्तान से दोस्ती के राग गाने वाला गैंग भी खूब प्रचारित करता रहा। जिन मीडिया चैनल ने उस समय पर पाकिस्तान की सच्चाई विश्व के सामने दिखाना जारी रखा उन्हें ‘कट्टर’ और ‘हेट स्प्रेडर’ का टैग दे दिया गया। कुछ दक्षिणपंथी सोशल मीडिया अकाउंट्स ने हिमांशी का JNU से कनेक्शन भी निकाला।

इस पूरे विवाद के लगभग डेढ़ महीने बाद हिमांशी नरवाल से जुड़ी एक और खबर सामने आई। हाल ही में हिमांशी नरवाल का एक कथित अश्लील वीडियो वायरल हुआ। इस वीडियो में हिमांशी का चेहरा इस्तेमाल कर उनकी इज्जत तार-तार करने का प्रयास किया गया।

जब पुलिस ने जाँच की तो पता लगा कि यह अश्लील वीडियो AI का इस्तेमाल करके बनाया गया था। पुलिस को यह भी पता चला कि इसे बनाने के पीछे बिहार के दो मुस्लिम थे। यह दोनों बाप-बेटे हैं। उनको पुलिस ने बिहार के गोपालगंज से गिरफ्तार कर लिया गया। इनका नाम मोहिबुल हक़ और गुलाब जिलानी है।

लेकिन पिछले मामले के उलट इस बार मीडिया ने इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। ना तो हिमांशी नरवाल की खबर पर कोई डिबेट हुई ना इस पर किसी पत्रकार को ट्वीट करने की सूझी। उन खबरी समूहों ने तो और भी दूरी बरती, जो खुद को लिबरल बताते हैं।

सवाल उठता है कि जो हिमांशी नरवाल पहले वामपंथी मीडिया की ‘आज़ादी की आवाज़’ थी, उनके लिए अब कोई आवाज़ क्यों नहीं उठा रहा? न कोई बड़ी बहस हो रही है, न कोई हेडलाइन, न कोई लंबा चौड़ा ट्वीट। वामपंथी पत्रकारों और एक्टिविस्ट की टाइमलाइन इस मुद्दे पर बिल्कुल खामोश हो गई है। इससे पहले हिमांशी को लोकतंत्र का चेहरा घोषित करने वाले राजदीप सरदेसाई भी शांत रहे।

दरअसल बात यह यह है कि वर्तमान खबर भले ही हिमांशी नरवाल से जुड़ी हो, उनके सम्मान से जुड़ी हो, लेकिन यह वामपंथी मीडिया के एजेंडे के खिलाफ है। कल तक हिमांशी को आजादी का उदाहरण बताने वाली वामपंथी मीडिया यह खबर इसलिए दबा कर बैठ गई, क्योंकि इस बार आरोपित मुस्लिम हैं।

अगर वामपंथी मीडिया यह खबर चलाता तो उसे मुस्लिमों का नाम लिखना पड़ता, उसे बताना पड़ता कि मोहिबुल और उसके बेटे गुलाब ने एक बलिदानी की विधवा का अपमान किया है। ना सिर्फ उसने अपमान किया है बल्कि अश्लील वीडियो बनाई है, जो निकृष्टतम अपराध है।

वामपंथी मीडिया को यह हिम्मत ही नहीं है कि वह ऐसी खबरें चलाए। ऐसे मामले में वह समुदाय विशेष, मैन या कोई और जानकारी लिख लेता है और मुस्लिमों के अपराध बताने से कन्नी काटता है। याद रखिए कि इसी वामपंथी मीडिया ने हाल ही में नैनीताल में 70 वर्ष के मुस्लिम के 12 वर्षीय बच्ची के साथ रेप करने को ‘लव अफेयर’ बताया था।

असल में वामपंथी मीडिया को प्रेम ना तो हिमांशी नरवाल से है और ना उसे उनकी कोई चिंता है। उसे बस अपने नैरेटिव की चिंता है। पुरानी खबर नैरेटिव के हिसाब से थी, इसलिए उसको तवज्जो दी और अब मामला अपने हिसाब से नहीं दिखा तो किनारे हो लिए।

कर्मचारियों और यात्रियों के टैक्स के पैसे तक खा गए विजय माल्या, अब पॉडकास्ट में खेल रहे ‘विक्टिम कार्ड’: अभी भी बैंकों का ₹7000 करोड़ बकाया

विजय माल्या – ये एक ऐसा नाम है जो कभी भोग-विलासिता वाली समृद्ध जीवनशैली का एक पर्यायवाची हुआ करता था। कभी उन्हें ‘किंगफ़िशर’ के कैलेंडर लॉन्च के कार्यक्रमों में बिकनी मॉडल्स के साथ देखा जाता था, तो कभी उन्हें शिल्पा शेट्टी और कैटरीना कैफ जैसी अभिनेत्रियों के साथ देखा जाता था। कभी वो आकर्षक शहर सॉसलिटो में मैनशन ख़रीदने के लिए चर्चा में रहे, तो कभी वो IPL टीम ‘रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु’ (RCB) को ख़रीदने के कारण चर्चा में रहे। लेकिन, दो-दो बार निर्दलीय राज्यसभा सांसद बनने वाले विजय माल्या का साम्राज्य ऐसा ध्वस्त हुआ कि उन्हें भारत से भागना पड़ा।

अपने पिता के निधन के बाद 1983 में 28 वर्ष की उम्र में ‘यूनाइटेड ब्रुअरीज’ के चेयरमैन बने विजय माल्या देश छोड़कर भागने के 9 वर्ष बाद एक बार फिर से चर्चा में हैं। कारण – राज शमानी के साथ उनका पॉडकास्ट। 4 घंटे 18 मिनट से भी अधिक के इस पॉडकास्ट के बाद कुछ लोगों में उनके प्रति सहानुभूति जाग रही है। शायद इस पॉडकास्ट का लक्ष्य भी यही रहा हो। डाक्यूमेंट्स लेकर इस पॉडकास्ट में पहुँचे विजय माल्या ने ख़ुद को पीड़ित साबित करने की पूरी कोशिश की है और कहा है कि उन्होंने कोई धोखाधड़ी नहीं की, वो तो लोन वापस लौटाना चाहते थे।

राज शामानी का पॉडकास्ट, विजय माल्या का ‘विक्टिम कार्ड’

जिस तरह से विजय माल्या ने इस पॉडकास्ट में अरुण जेटली का नाम घसीटा है, उसके बाद एक ख़ास समूह को मोदी सरकार पर भी हमलावर होने का मौका मिल गया है। विजय माल्या का कहना है कि दिल्ली से देश छोड़कर भागने से पहले उन्होंने अरुण जेटली को बता दिया था। माल्या बताते हैं कि वो अरुण जेटली के दफ़्तर नहीं गए थे, या फिर उनके साथ कोई बैठक नहीं की थी – बल्कि चलते-चलते बता दिया था कि वो जा रहे हैं। तब भारत के वित्त मंत्री रहे अरुण जेटली अब इन आरोपों का जवाब देने के लिए इस देश में नहीं हैं।

इससे पहले सितंबर 2018 में भी विजय माल्या ने अरुण जेटली का नाम घसीटा था। तब भी विजय माल्या लंदन कोर्ट के इकट्ठा पत्रकारों से कहा था कि वो सेटलमेंट ऑफर लेकर अरुण जेटली से मिले थे। हालाँकि, अरुण जेटली ने इसे नकारते हुए कहा था कि ये सिर्फ़ कुछ ही मिनटों की मुलाक़ात थी जिसमें विजय माल्या ने कहा कि वो एक सेटलमेंट ऑफर तैयार कर रहे हैं। दोनों ही उस समय राज्यसभा सदस्य थे, ऐसे में सदन के गलियारों में एक सांसद द्वारा दूसरे से कुछ फुसफुसाने को ‘बैठक’ तो कम से कम नहीं ही कह सकते हैं।

अरुण जेटली ने तभी साफ़-साफ़ कह दिया था कि उन्होंने मुलाक़ात के लिए 2014 के बाद विजय माल्या को कभी अपॉइंटमेंट दिया ही नहीं। उन्होंने राज्यसभा सांसद होने का फ़ायदा उठाया और टहलते हुए उनके पास आकर ऑफर वाली बात कही। बकौल अरुण जेटली, वो विजय माल्या के झाँसा वाले ऑफर्स से बखूबी परिचित थे और उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि उनसे इसपर बात करने काकोई तुक नहीं है, वो ये ऑफर लेकर बैंकों के पास जाएँ। यानी, इस एक वक्त के आदान-प्रदान को विजय माल्या ने अबतक कहकर पेश किया। जबकि अरुण जेटली ने उन्हें आगे बातचीत का मौका तक नहीं दिया था।

अब भी विजय माल्या के पास बैंकों का भारी बकाया

विजय माल्या एक और दावा ये कर रहे हैं कि जो लोन उन्होंने लिया था वो तो उन्होंने चुका दिया है। ये ऐसा ही है जैसे कोई चोर कहे कि उसने 10 साल पूर्व किसी के घर को खाली किया था तो अब उसके ख़िलाफ़ सिर्फ़ इसीलिए कोई मामला नहीं बनता क्योंकि उसने लूटे हुए सामान लौटा दिए हैं। एक सच ये भी है कि विजय माल्या के पास अभी भी बैंकों के 7000 करोड़ रुपए बकाया हैं। बैंकों ने बताया है कि कुल बकाया 17,781 करोड़ रुपए का था, जिसमें से 10,815 करोड़ रुपए वसूले जा चुके हैं। यानी, 6997 करोड़ रुपए अब भी वसूले जाने बाकी हैं। उधर विजय माल्या का दावा है कि उनका लोन केवल 6200 करोड़ रुपए का ही था, जिसके बदले वो 14,000 करोड़ रुपए का भुगतान कर चुके हैं।

ये तो एक आम आदमी भी जानता है कि कोई भी ऋण ब्याज के साथ आता है। इससे आगे जानने वाली बात ये है कि इस ब्याज के ऊपर से भी एक ब्याज लगता है, जिसे पीनल इंटरेस्ट कहते हैं। विजय माल्या जैसे लोग जो समय पर लोन नहीं चुकाते और बैंकों के साथ सहयोग नहीं करते, उन्हें पीनल इंटरेस्ट भी देना होता है। इसीलिए, बैंक द्वारा दिए गए आँकड़ों और विजय माल्या के दावों में फ़र्क़ है। PMLA कोर्ट के आदेश के बाद जाँच एजेंसियाँ गोवा स्थित किंगफ़िशर बंगला समेत विजय माल्या की कई जब्त संपत्तियों को नीलाम कर चुकी है, क्योंकि ऋण वापस वसूलने का कोई और तरीका नहीं बचा था। विजय माल्या के खिलाफ ‘ऋण वसूली अपीलीय न्याधिकरण’ (DBT) में भी मामला चल रहा है। SBI, PNB, IDBI और Uco बैंक समेत 17 ऐसे बैंक हैं जिनका पैसा लेकर विजय माल्या भागे थे। उनपर केवल लोन न चुकाने का ही नहीं, बल्कि फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले भी चल रहे हैं।

बात ये है कि अब ये मामला सिर्फ़ विजय माल्या से जुड़ा हुआ नहीं है। IDBI बैंक के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर रहे योगेश अग्रवाल को विजय माल्या से जुड़े मामले में ही CBI ने गिरफ़्तार किया था। बैंक के पूर्व एग्जीक्यूटिव BK बत्रा भी गिरफ्तार हुआ था। जनवरी 2017 में इनके अलावा 7 अन्य भी गिरफ़्तार किए गए थे। इनमें किंगफिशर चीफ फाइनेंसियल ऑफिसर A रघुनाथन के अलावा 3 अन्य अधिकारी भी शामिल थे। आरोप है कि इन दोनों ने विजय माल्या को लेकर पक्षपात किया। यानी, उन्हें अनुचित तरीके से फ़ायदा पहुँचाया। किंगफिशर एयरलाइन्स के कमजोर वित्तीय रिकॉर्ड्स होने के बावजूद उसे 1000 करोड़ रुपए का लोन दिया गया। IDBI बैंक के जनरल मैनेजर रहे बुद्धदेव दासगुप्ता का नाम भी CBI की सप्लीमेंट्री चार्जशीट में था।

कर्मचारियों में हाहाकार, अय्याश में डूबे माल्या

CBI इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग की चार्जशीट भी दायर कर चुकी है। ये मामला सिर्फ़ लोन लेकर न चुकाने का नहीं है। अब ये मनी लॉन्ड्रिंग का भी है। ये ‘Wilfull Default’ का है, अर्थात जानबूझकर लोन न चुकाना। बैंक और कंपनी के अधिकारियों के गिरफ़्तार होने का कारण ये है कि इन सबने मिलकर साजिश रची। विजय माल्या ‘Wilfull Defaulter’ इसीलिए हैं, क्योंकि जब किंगफ़िशर एयरलाइन्स डूब रही थी उस समय उन्हें न लोन चुकाने की पड़ी थी और न कर्मचारियों को वेतन देने की। आज अपनी छवि चमकाने में लगे विजय माल्या का बचाव किसी वेब सीरीज के लिए तो ठीक आईडिया है, लेकिन वास्तविकता इससे भिन्न है।

2008 और 2015-16 में जब किंगफिंगशेर एयरलाइन्स के कर्मचारियों में वेतन को लेकर हाहाकार मचा था तब विजय माल्या विदेशों में संपत्तियाँ ख़रीदने में व्यस्त थे। इन 2 वर्षों में इंग्लैंड और फ्रांस में उन्होंने 330 करोड़ रुपए की संपत्तियाँ ख़रीदीं। विजय माल्या ने ‘फोर्स इंडिया फॉर्मूला वन लिमिटेड टीम’ (F1F1) टीम भी बनाई थी। जाँच में पता चला कि किंगफ़िशर एयरलाइन्स के बैंक खातों से इस टीम के बैंक खातों में 241 करोड़ रुपए भेजे गए। जिस खाते में पैसा भेजा गया वो लंदन के HSBC बैंक का था। लंदन के जिस लेडीवॉक प्रॉपर्टी में विजय माल्या रहते हैं, उसे भी 80 करोड़ रुपए में ख़रीदा गया था।

आइए, अब जो विजय माल्या कह रहे हैं कि वो फ्रॉड नहीं हैं उनकी कुछ और करतूतों के बारे में खुलासा किया जाए, क्योंकि शब्दों की चासनी में कई बार तथ्य छिप जाते हैं क्योंकि वो जटिल होते हैं। 2016 में विजय माल्या को डियागो PLC से $40 मिलियन मिले, जो अभी की तारीख़ में 342 करोड़ रुपए से भी अधिक होती है। विजय माल्या ने अपनी कंपनियों के जरिए जो लोन लिए थे, उनमें पर्सनल गारंटी एग्रीमेंट ये कहती थी कि इस धनराशि को वो अलिएनेट नहीं कर सकते थे। इसके बावजूद विजय माल्या ने इन रुपयों को अपने बेटे और परिजनों के खाते में भेज दिए। ये सीधा-सीधा बैंकों के साथ दिसंबर 2010 में हुए करार का उल्लंघन था, क्योंकि डियागो द्वारा दी गई ये धनराशि ‘एसेट’ की श्रेणी में आती थी।

ऐसा व्यक्ति जब कहे कि वो फ्रॉड नहीं है तो आश्चर्य होता है। 2017 में स्विस बैंकों के दस्तावेजों की मानें तो विजय माल्या की संपत्ति $1 बिलयन डॉलर (अभी की तारीख में 8500 करोड़ रुपए) थी। सिद्धार्थ माल्या के एक खाते में भी $13.33 मिलियन डॉलर भेजे गए थे। विजय माल्या ने किंगफ़िशर एयरलाइन्स के जरिए $60 मिलियन का एक एयरक्राफ्ट ख़रीदा था। इस एयरक्राफ्ट ने को एक डूबती हुई कंपनी के राजस्व में वृद्धि के लिए ख़रीदा गया था, ऐसा समझने की भूल मत कीजिए। ये एयरक्राफ्ट विजय माल्या की लग्जरियस लाइफस्टाइल के एक उपकरण के रूप में ख़रीदा गया था। इसका इस्तेमाल उन्होंने अपने और दोस्तों के व्यक्तिगत दौरों के लिए किया। इस एयरक्राफ्ट के संचालन में 100 करोड़ रुपए का ख़र्च आया। ये पैसा लोन का था।

केवल बैंक लोन का नहीं है मामला, मनी लॉन्ड्रिंग से लेकर आपराधिक षड्यंत्र तक

सीधी भाषा में समझें तो अगर आप अगर आप जानबूझकर क़ानून तोड़ते हैं तो आप अपराधी हैं, क्योंकि इंटेंट मायने रखता है। अगर उन्हें ख़ुद के निर्दोष होने का इतना ही यकीन होता तो वो बतौर राज्यसभा सांसद डिप्लोमेटिक पासपोर्ट का दुरुपयोग करके देश से भागते नहीं, बल्कि यहीं रहकर केस लड़ते और ये दस्तावेज अदालतों व जाँच एजेंसियों को दिखाते – किसी पॉडकास्टर को नहीं। अपनी कंपनी UB में भी विजय माल्या ने कम हेराफेरी नहीं की है। उन्होंने UB के 8.41% शेयर बिना बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और स्टॉक एक्सचेंज को सूचित किए ही बेच डाले। 5% से अधिक के शेयर्स ख़रीदने की स्थिति में ख़रीददार को भी स्टॉक एक्सचेंज को सूचित करना होता है।

UB का इस्तेमाल किंगफ़िशर एयरलाइन्स के लोन की गारंटी के रूप में किया गया था, लेकिन बाद में पता चला कि इस कंपनी का वैल्यूएशन उस लोन से कम है। अगस्त 2012 के बाद से ही किंगफ़िशर एयरलाइन्स के कर्मचारियों को सैलरी दिया जाना बंद कर दिया गया था। इसके बावजूद फरवरी 2014 में विजय माल्या ने 28.70 करोड़ रुपए IPL के खिलाड़ियों को ख़रीदने में व्यय किए। उनकी RCB ने युवराज सिंह को 14 करोड़ रुपए में ख़रीदा था। उस सीजन RCB ने 58 करोड़ रुपए से अधिक खिलाड़ियों को ख़रीदने और रिटेन करने में व्यय किए थे। जबकि उस समय तक कर्मचारियों के वेतन का 350 करोड़ रूपए बकाया था।

कहीं विरोध प्रदर्शन किए जा रहे थे कर्मचारियों द्वारा तो कहीं कई लोग अनिश्चितकाल के लिए अनशन पर थे, लेकिन विजय माल्या गोवा में पार्टियों में मशगूल थे। तेल कंपनियों से लेकर एयरक्राफ्ट पट्टेदाताओं (Lessors) तक, सबका बकाया था – केवल बैंकों और कर्मचारियों का ही नहीं। कर्मचारियों से PF और टैक्स के पैसे भी लिए, लेकिन सरकार को नहीं दिए। बड़ी बात ये कि तब सरकार भी कॉन्ग्रेस की थी, सबकुछ कॉन्ग्रेस की सरकारों में हो रहा था। विजय माल्या ने अरुण जेटली ही नहीं, प्रणब मुखर्जी का नाम लेकर भी कहा है कि 2008 की वैश्विक मंदी में जब वो तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के पास गए थे तब उन्होंने किंगफ़िशर एयरलाइन्स में कटौती न करने को कहा था। आज प्रणब मुखर्जी भी इन आरोपों का जवाब देने के लिए जीवित नहीं हैं।

लोन चुकाने के बावजूद विजय माल्या IPC की धारा-406, 409 और 420 के तहत आरोपित रहेंगे क्योंकि उनपर फ़र्ज़ी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने के भी आरोप हैं। लोन लेने के लिए पेश किए गए एक दस्तावेज में तो उन्होंने किंगफ़िशर एयरलाइन्स की वैल्यूएशन को बढ़ा-चढ़ाकर $500 मिलियन तक बता दिया था। जुलाई 2022 में विजय माल्या पर अदालत की अवमानना के मामले में 4 महीने की जेल की सज़ा सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाई जा चुकी है। सरकार पर उन्हें भरोसा नहीं है मान लिया, लेकिन न्यायपालिका?

लगभग 2000 कर्मचारियों का घर किंगफ़िशर एयरलाइन्स के तबाह होने के कारण बर्बाद हुए। उनके कारण 2018 में मोदी सरकार को फ्यूगुटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर एक्ट बनाना पड़ा। 2020 में UK की अदालत भी उनके प्रत्यर्पण का आदेश दे चुकी है, लेकिन इसके बाद विजय माल्या ने अन्य क़ानूनी तिकड़म आजमाकर इसे रोके रखा है। मामला अब सिर्फ़ रिकवरी का नहीं है – आपराधिक षडयंत्र, फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग का भी है। ED उनपर मनी लॉन्ड्रिंग का मामला चल रहा है। जाँच एजेंसी ने पाया कि उन्होंने लोन के पैसों में से 3500 करोड़ रुपए कहीं और डायवर्ट किया। यानी, पैसा लिया गया किसी और नाम पर लेकिन ख़र्च किया गया कहीं और।

व्यवस्था में भी थी कमज़ोरी, जिसका विजय माल्या ने उठाया फ़ायदा

इसके अलावा उनपर 100 करोड़ रुपए के सर्विस टैक्स की चोरी का मामला भी चल रहा है। 2012-15 में उनके ख़िलाफ़ हुई शिकायत में पाया गया था कि यात्रियों से वसूलने के बावजूद उन्होंने ये पैसे सरकार को नहीं दिए। मुंबई की एक अदालत ने उनके ख़िलाफ़ इसे लेकर ग़ैर-जमानती वॉरंट भी जारी किया था। SFIO (सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टीगेशन ऑफिस) भी 2016 में 17 शिकायतों के आधार पर नोटिस जारी कर चुका है। आरोप है कि 17 कंपनियों के जरिए लोन लेकर किंगफ़िशर एयरलाइन्स को फाइनेंस किया गया।

हाँ, ये सही है कि अपराधी कई बार इतने शातिर होते हैं कि वो व्यवस्था की कमजोरी व इसमें जो छिद्र हैं उसका फ़ायदा उठाते हैं। अगर बैंक के कई अधिकारी भी इसमें शामिल हैं तो विजय माल्या ने यही किया। बैंकिंग व्यवस्था की कमजोरी ज़रूर जाहिर हुई। तभी 2018 में FEO एक्ट लाया गया था। इसके तहत किसी भगोड़े पर आरोप सही साबित होने से पहले देश-विदेशी स्थित संपत्ति जब्त की जा सकती है। RBI और वित्त मंत्रालय ने कई सुधार किए। लेकिन, व्यवस्था में दोष होने का ये अर्थ नहीं होता कि उसका फ़ायदा उठाने वाला व्यक्ति विक्टिम कार्ड खेले और वो निर्दोष हो।

रोज धमाके-रेड कॉरिडोर और पत्थरबाजी, ये थी UPA शासन की पहचान: 11 सालों में साफ हुए नक्सली-आतंक का हुआ खात्मा, आंतरिक सुरक्षा पर मोदी सरकार के एक्शन से बदले हालात

आंतरिक सुरक्षा किसी भी देश स्थिरता की रीढ़ होती है। खासकर भारत जैसे देश के लिए जहाँ इतनी बड़ी आबादी में लोग रहते हैं, वहाँ आंतरिक सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने का मतलब नागरिक असुरक्षा की स्थिति पैदा करना है।

देश की अंदरूनी सुरक्षा केवल आतंकवाद और हिंसा से निपटने तक सीमित नहीं होती बल्कि यह उस राष्ट्र के सामाजिक-आर्थिक विकास को भी प्रभावित करती है। लेकिन 2014 से पहले तक भारत आंतरिक सुरक्षा के संकट से लगातार जूझता रहा है।

कॉन्ग्रेस के निष्क्रिय रवैये से राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को मिला बल

कॉन्ग्रेस के शासनकाल में वर्ष 2004-2013 के बीच भारत एक के बाद एक आतंकवादी और नक्सली हमलों की चपेट में रहा। राजनीतिक कमजोरी और नीतिगत अभाव के कारण देश की आंतरिक सुरक्षा पंगु हो चुकी थी।

इस बीच माओवादी हिंसा अपने चरण पर थी। कॉन्ग्रेस राज में 2,213 से अधिक वामपंथी उग्रवाद की घटनाएँ कॉन्ग्रेस के शासनकाल में सामने आई हैं। उस वक्त सरकार की राजनीतिक ढील और काम करने के तौर तरीके ने हालात को और खराब कर दिया।

कॉन्ग्रेस सरकार में इस्लामी कट्टरपंथियों ने उठाया सिर

देश में 2004 से 2013 के बीच देश में पाकिस्तान समर्थित संगठनों को काफी मजबूती मिली। PFI(पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया) और SIMI(स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया) जैसे संगठनों ने राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर खुलकर काम करना शुरू कर दिया।

NDA सरकार के द्वारा 2001 में SIMI पर औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगा दिए जाने के बाद भी UPA शासन के दौरान प्रतिबंध प्रभावी ढंग से रूप लागू नहीं हुआ और अप्रभावी ही रहा। इसका नतीजा हुआ कि इन संगठनों ने नेपथ्य रूप से अपने जिहादी कामों को जारी रखा।

SIMI के थे अंतरराष्ट्रीय संगठनों से थे संबंध

यह भी सामने आया था कि SIMI का हमास और पाकिस्तान के हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी जैसे जिहादी संगठनों के साथ संबंध है। भारत में इस संगठन द्वारा चलाए गए देश विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाने वाले धन का एक स्रोत हमास भी था।

यह सभी पैसे अक्सर कतर, सऊदी अरब और संयुक्त राज्य अमेरिका के माध्यम से भेजा जाता था। SIMI ने केरल, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे विभिन्न राज्यों में अपनी पैठ जमा ली थी। कॉन्ग्रेस इससे मिलने वाले फायदे को हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी। नतीजतन कॉन्ग्रेस ने वह सब होने दिया जो देश की सुरक्षा के विरुद्ध था।

लगातार घाव झेलता रहा देश

कॉन्ग्रेस के शासनकाल में एक के बाद एक भीषण आतंकी वारदातों का गवाह रहे देश पर अब तक उन यातनाओं के घाव मौजूद हैं। 2004-2013 के बीच भारत के कई शहरों में क्रूर आतंकी हमले किए गए। इन हमलों में सैकड़ो लोगों की जान गई और हजारों लोग घायल हुए।

इसके अलावा देश के कई राज्यों में नक्सली हमले भी बढ़ते जा रहे थे। 2010 में घटित दंतेवाड़ा नरसंहार में माओवादियों ने छत्तीसगढ़ के 76 CRPF जवानों को मार डाला था। यह भारत के सबसे घातक उग्रवादी हमले में से एक था जिसमें 13 आम नागरिकों की भी जान गई थी।

साल 2013 में दरभा घाटी में भी माओवादियों ने एक राजनीतिक काफिले पर हमला कर दिया जिसमें कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र कर्मा और विद्याचरण शुक्ला समेत 29 लोग मारे गए। 2004 से 2013 के बीच भारत में बम धमाकों और आतंकी हमले की एक बाढ़ सी आ गई थी।

इनमें मुंबई लोकल ट्रेन धमाका(2006), जयपुर ब्लास्ट(2008), पुणे की जर्मन बेकरी ब्लास्ट (2010), हैदराबाद ब्लास्ट(2013), उत्तर प्रदेश के जौनपुर में 28 जुलाई 2005 को श्रमजीवी एक्सप्रेस में हुआ बम विस्फोट और 2005 में हुए दिल्ली बम विस्फोट शामिल हैं।

इन हमलों में सेकड़ो लोग मारे गए और इनमें आतंकी संगठन इंडियन मुजाहिदीन और लश्कर-ए-तैयबा से लेकर ISIS तक का हाथ था। देश में रेलवे स्टेशन, शॉपिंग मॉल, होटल और पार्कों समेत ऐसा कोई सार्वजनिक स्थान नहीं था जहां आतंकी हमले की आशंका ना जताई जा सके।

सुरक्षा एजेंसियों के बीच भी आपसी तालमेल का था अभाव

कॉन्ग्रेस के शासनकाल में NIA और RAW जैसी महत्वपूर्ण एजेंसियां अस्तित्व में तो थी लेकिन कॉन्ग्रेस की लचर नीति और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ ने सब मटियामेट कर दिया। सभी सुरक्षा एजेंसियां एकीकृत ना होकर अलग-अलग काम करती थी।

इससे आपसी तालमेल बिठाने में बेहद कठिनाई हुई। 2013 में गृह मामलों की संसदीय स्थाई समिति की रिपोर्ट के अनुसार 26/11 के हमले के बाद स्थापित मल्टी एजेंसी सेंटर में सूचना का प्रवाह काफी खराब था। इंटेलिजेंस और सुरक्षा बल अलग-अलग अपना कार्य कर रहे थे।

इससे देश की सुरक्षा जानकारी साझा करने में अनियमितता देखने को मिली। नतीजा यह हुआ की सीमा पार से घुसपैठ आम बात हो गई। इतना ही नहीं PFI(पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया) जैसे कट्टरपंथी समूह के लोगों को पकड़े जाने के बावजूद वह दंडमुक्त होकर काम कर रहे थे। पकड़े जाने के बाद भी सजा में देरी से आतंकवादी संगठनों का हौसला और मजबूत बना रहा। कॉन्ग्रेस ने अपने सत्ता-स्वार्थ के लिए देश की आंतरिक सुरक्षा को आंतरिक अलगाववाद की भेंट चढ़ा दी।

आतंक फंडिंग भी थी चुनौती

कॉन्ग्रेस की सरकार में आतंकवादियों को विदेश से खूब पैसा आता था। FATF(Financial Action Task Force) 2010 की मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार आतंकवादियों को फंडिंग करने में कई वित्तीय संस्थान शामिल थे।

हालत ऐसी थी कि साल 2013 में 42 करोड़ से अधिक नकली नोट जब्त किए गए जो मुख्य रूप से पाकिस्तान के माध्यम से भेजे गए थे। यह सारा पैसा देश में अराजकता फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। कट्टरपंथी संगठन इन पैसों का इस्तेमाल करके देश की सुरक्षा को खासा नुकसान पहुँचा रहे थे।

2014 के बाद आंतरिक सुरक्षा में आया निर्णायक बदलाव

केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद आंतरिक सुरक्षा को विशेष बल मिला। NIA(राष्ट्रीय जाँच ऐजेंसी) को 2019 में मिले संशोधित अधिकारों के बाद देश विरोधी ताकतों को निष्क्रिय करने की कवायद शुरू हो गई। NIA को यह अधिकार दिया गया कि उसे राज्य सरकार के बिना अनुमति के कार्यवाही करने का अधिकार है।

दरअसल राज्य सरकारों के साथ परस्पर तालमेल की कमी ने इन एजेंसियों को व्यावहारिक रूप से कम उपयोगी बना दिया था। लेकिन 2019 के बाद अधिकारों में किए गए बदलाव के बाद उनकी शक्तियाँ बढ़ा दी गईं। इससे आतंकवाद, मानव तस्करी और साइबर आतंकवाद पर रोक लगाना आसान हो गया।

UAPA के तहत देश विरोधी ताकतों पर आसानी से कार्रवाई करते हुए आतंकवादी घोषित करने की क्षमता आ गई। इस कानून के माध्यम से कट्टरपंथियों की संपत्ति को आसानी से जप्त करना संभव हो गया। इतना ही नहीं विदेशों से आने वाला पैसा भी आतंकी अकाओं तक नहीं पहुंचने से पहले ही जांच एजेंसियों की नजर में आ जाता था।

अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद घुसपैठ में आई कमी

मोदी सरकार द्वारा 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाकर वहाँ पनप रहे अलगाववादी मानसिकता पर नकेल कसी गई। कश्मीर घाटी से पाकिस्तान के संपर्क को भी पूरी तरह खत्म कर दिया गया।

कश्मीर में स्थानीय भर्ती के माध्यम से युवाओं को पत्थरबाजी और देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने से रोका गया। धारा 370 के लागू होने के बाद पहले की तुलना में आतंकवादी घटनाओं में भी कमी दर्ज की गई। इसके साथ ही राज्य में बुनियादी विकास का ढांचा तैयार किया गया। इसके अलावा‌ कश्मीर में बलिदान होने वाले हमारे सैनिकों की संख्या में भी लगभग 48% की कमी आई।

नक्सलों पर भी हुआ प्रहार

सरकार ने 2014 से लेकर अब तक वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाकों को मुक्त कराया। इससे नक्सलवादी इलाकों में दोगुना कमी आई जहां एक साल में 1000 से अधिक माओवादी घटनाएं होतीं थी वहां केवल कुछ सौ रह गई।

सरकार द्वारा अबूझमाड़ के जंगलों और कर्रगुट्टा जैसे क्षेत्रों को नक्सल मुक्त किया गया। 2024 में करीब 400 से अधिक नक्सलियों को निष्क्रिय किया गया और बड़ी मात्रा में हथियार और ड्रोन जप्त किए गए।

डिजिटल पुलिसिंग को दिया गया बढ़ावा

मोदी सरकार के द्वारा लगभग 99% पुलिस स्टेशनों को CCTNS(Crime and criminal tracking network system) से जोड़ दिया गया। इसके अलावा पुलिस, अदालत, जेल और फोरेंसिक लैब को भी आपस में जोड़ा गया।

सीमाओं पर निगरानी बढ़ा दी गई। पंजाब में ड्रोन द्वारा नशे और हथियार की तस्करी को रोकने के लिए एंटी ड्रोन तकनीक लगाई गई। नतीजतन साल 2024 में अकेले पंजाब में 250+ अधिक ड्रोन पकड़े गए।

मोदी के नेतृत्व में भारत में स्थापित किया नया कीर्तिमान

साफ जाहिर होता है कि 2014 से पूर्व की स्थिति और वर्तमान भारत की अंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में काफी अंतर है। मोदी सरकार ने इसे राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से जोड़ दिया। हमारे देश की खुफिया एजेंसी का लोहा पूरी दुनिया मानने लगी।

आतंकवाद, नक्सलवाद और कट्टरपंथ जैसे खतरों से निपटने के लिए हम किसी पर आश्रित नहीं रहे। इसी का परिणाम है कि आज भारत लोकतांत्रिक मर्यादाओं में रहते हुए भी कठोर आतंकवाद विरोधी उपाय से निपटने में केवल सक्षम नहीं बल्कि अग्रणी भूमिका में है।

अमेरिका, यूरोप, भारत… घुसपैठियों को बाहर निकालना क्यों है इतना कठिन: कैसे एक्टिविस्ट-NGO बनाते हैं सुरक्षा की दीवाल, क्या है रास्ता?

भारत में वर्तमान में ऑपरेशन पुशबैक चल रहा है। इसके तहत बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का प्रयास हो रहा है। यह कार्रवाई अभी कुछ हजार लोगों तक ही सीमित है। इसी तरह अमेरिका में भी वर्तमान में घुसपैठियों को वापस भेजने की कार्रवाई चल रही है, इसको लेकर लॉस एंजिल्स शहर में दंगे हो रहे हैं। कमोबेश यही स्थिति यूरोप के कई देशों में है, जहाँ से घुसपैठियों को वापस भेजे जाने की माँग हो है। 

असल में एक बार जब अवैध प्रवासी किसी देश में प्रवेश कर जाते हैं तो चाहे वह भारत हो, अमेरिका फिर या यूरोप के देश, तो उन्हें वापस भेजना कानूनी अड़चन, राजनीतिक विरोध और एक्टिविज्म का एक चक्रव्यूह बन जाता है। कायदा तो यह होना चाहिए कि किसी देश मेंअवैध रूप से रहने वालों को उठा कर सीधे वापस भेज दिया जाना चाहिए। हालाँकि, यह लंबी अदालती लड़ाइयों, एक्टिविज्म और कानूनी दाँवपेंच में बदल गया है। 

दिलचस्प बात यह है कि जहाँ भारत जैसे देशों में घुसपैठियों को बाहर निकालना मुश्किल का काम है, वहीं पाकिस्तान धड़ाधड़ अफगानिस्तान के लोगों को निर्वासित कर रहा है। रिपोर्ट बताती है कि फरवरी 2025 तक, पाकिस्तान ने 800,000 से ज़्यादा अफ़गानों को बिना किसी बवाल के डिपोर्ट कर दिया है।

भारत में कोर्ट और एक्टिविस्ट लगाते हैं अड़ंगा

जनसंख्या के मामले में चीन की तुलना में भारत एक बहुत बड़ा देश नहीं है। भारत में जनसंख्या बहुत ज़्यादा है लेकिन यहाँ सांस लेने के लिए जगह हर दिन कम होती जा रही है। हमारे देश में संसाधन कम होते जा रहे हैं। चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत में ज़मीन, भोजन, और रोजगार बड़ी समस्या है। 

ऐसे देश में यह बात हैरान कर देती है कि बांग्लादेश और म्यांमार (खासकर रोहिंग्या) से आए घुसपैठिए लगातार कानूनका फ़ायदा उठाते हैं। हिरासत में लिए जाने के बाद बड़ी संख्या में NGO एक्टिविस्ट, प्रशांत भूषण और कपिल सिब्बल जैसे तथाकथित वरिष्ठ वकील खड़े हो जाते हैं। ये लोग इन्हें बचाने को सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाते हैं। हिरासत में लिए गए कई घुसपैठिए भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत याचिकाएँ दायर करते हैं, जिसमें उनके जीवन या स्वतंत्रता को ख़तरा बताया जाता है।

दुखद बात ये है कि हमारी न्यायपालिका इन्हें बाहर फेंके जाने से अक्सर रोक देती है। इसके चलते केंद्र और राज्य सरकारों को अवैध अप्रवासियों को बाहर नहीं निकाल पातीं। भले ही सुप्रीम कोर्ट अवैध अप्रवासियों को डिपोर्ट करने के पक्ष में हो, लेकिन घुसपैठिए अनुभवी वकीलों की मदद से दायर रिट से अंतरिम राहत पा जाते हैं।  इससे डिपोर्ट होने पर रोक लग जाती है और अदालती मामला सालों तक चलता रहता है। 

कानूनी व्यवस्था से इस तरह के प्रतिरोध के साथ, राज्य सरकारें अब इसे पूरी तरह से दरकिनार करके मामलों को तेज़ी से निपटाने की कोशिश कर रही हैं। उदाहरण के लिए, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में विदेशी ट्रिब्यूनल को दरकिनार करने और घुसपैठियों को बांग्लादेश और म्यांमार में वापस भेजने के लिए 1950 के कानून का हवाला दिया है।  इस कदम की भी यह एक्टिविस्ट आलोचना कर रहे हैं। 

अमेरिका में नेताओं ने दी हुई शरण

अमेरिका में भी घुसपैठ का हाल कमोबेश ऐसा ही है। यह जब एक बार घुसपैठिया अंदर आ जाता है तो उसको डिपोर्ट करना भीइसी तरह एक लंबा और विवादास्पद मामला बन जाता है। अमेरिका में लॉस एंजिल्स, न्यूयॉर्क और सैन फ्रांसिस्को जैसे कुछ ऐसे शहर हैं, जहाँ अधिकारियों को इन घुसपैठियों से पूछताछ करने या उन्हें हिरासत में लेने की अनुमति नहीं है। ये शहर डिपोर्ट करने के आदेशों या पुलिस के साथ सहयोग करने से साफ इनकार करते हैं, उन्हें कानून प्रवर्तन के राजनीतिक हथियार के रूप में देखते हैं।

जून 2025 की शुरुआत से लॉस एंजिल्स में इसी से जुड़ा एक नाटक चल रहा है। यहाँ घुसपैठियों पर जब एक्शन चालू हुआ तो इसके विरोध में प्रदर्शन होने लगे। पुलिस ने इन प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और रबर की गोलियाँ चलाई। यहाँ इसके बाद यूनियन नेता डेविड ह्यूर्टा को गिरफ्तार कर लिया गया, जिससे आक्रोश फैल गया। इसके बाद ऑपरेशन के दौरान 118 प्रवासियों को हिरासत में लिया गया।

ट्रम्प सरकार ने इसके बाद टाइटल 10 कानून के तहत 4,000 नेशनल गार्ड सैनिकों और 700 मरीन को तैनात करके जवाब दिया। इसके बाद तो बवाल और बढ़ा। कई कारों को जला दिया गया, सड़कों को अवरुद्ध कर दिया गया, कई पत्रकारों को घायल कर दिया गया। 

इस पूरे बवाल से ट्रंप सरकार की घुसपैठियों को लेकर नीति और किसी शहर को उनके लिए स्वर्ग बनाने की राजनीति माना जा सकता है। इन सब चक्करों में डिपोर्टेशन और भी कठिन हो जाता है। 

भले ही अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सख्त सीमा प्रवर्तन और भूमि से अवैध अप्रवासियों को हटाने के लिए जोर दे रहे हैं, लेकिन कानूनी प्रणाली और कुछ विशिष्ट शहर इससे कड़ी लड़ाई लड़ रहे हैं। डिपोर्ट किए जाने वाले लोगों में कई सैकड़ों भारतीय भी थे जो अवैध रूप से अमेरिका में घुस आए थे।

यूरोप में कानून सबसे बड़ी अड़चन

यूरोपियन यूनियन के देशों में  घुसपैठियों को निकलने जाने में सबसे मजबूत अड़चन यहाँ के कानून हैं। मानवाधिकारों पर यूरोपीय सम्मेलन (ECHR) उन व्यक्तियों को डिपोर्ट करने पर रोक लगाता है, जिनको यातना या अमानवीय व्यवहार का जोखिम हो। 

इसके तहत यूरोपियन यूनियन के देशों को डिपोर्ट करते टाइम तमाम मानदंड पूरे पड़ते हैं, जिससे प्रक्रिया लगभग असंभव हो जाती है। हालाँकि, ये नियम स्थानीय लोगों के जीवन को नरक बना रहे हैं। यूरोपीय देशों में बड़े पैमाने पर अपराध, स्थानीय महिलाओं के साथ बलात्कार और डेमोग्राफी बदलाव आम हो गए हैं। 

हाल के दिनों में, इन नीतियों के खिलाफ़ विरोध हुआ है। बढ़ते दबाव के बीच, कुछ सरकारें (इटली, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क) खुले तौर पर ECHR में सुधार करने या यहाँ तक कि इससे बाहर निकलने पर विचार कर रही हैं, इसे प्रवासन पर ‘संप्रभु नियंत्रण में बाधा’ के रूप में देख रही हैं।

क्या सहिष्णु होना बन रहा है बाधा?

जो लोकतांत्रिक देश अपने यहाँ अधिकारों, सही न्यायिक प्रक्रिया और समानता के अधिकार जैसे ढिंढोरे पीटते हैं, वहीं यह घुसपैठियों को निकालने की कार्रवाई और कठिन हो जाती है। 

यहाँ जब भी किसी घुसपैठिए को निकाला जाना होता है तो उसके समर्थक कोर्ट पहुँच याचिका ठोक देते हैं। यह संवैधानिक, अंतरराष्ट्रीय या मानवीय आधार पर लगाई जाती हैं। दुखद बात यह है कि अधिकतर फ़ैसले घुसपैठियों पक्ष में होते हैं, देश के नागरिकों के पक्ष में नहीं। 

जमीनी स्तर के NGO से लेकर नागरिक संगठनों तक के कार्यकर्ता इसके लिए जन समर्थन जुटाते हैं, कानूनी चुनौतियाँ देते हैं, विरोध प्रदर्शन आयोजित करते हैं और मीडिया में सनसनी फैलाते हैं।

इसके बाद वामपंथी-उदारवादी मीडिया घुसपैठियों की दुख भरी कहानी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है। इस कार्रवाई से लोगों के मन में ग्लानि उत्पन्न करने का प्रयास होता है। इसके अलावा नेता भी इसे अपने राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं और खुद का वोटबैंक बनाते हैं। इससे डिपोर्ट करना और भी कठिन काम हो जाता है। 

पाकिस्तान ने दिखाया- कानूनी अड़चन ना होता होता है मददगार

जब अमेरिका और NATO सेना ने अफ़गानिस्तान छोड़ा और तालिबान ने सत्ता संभाली, तो लाखों अफ़गान अवैध रूप से पाकिस्तान और दुनिया के अन्य हिस्सों में चले गए। पाकिस्तान ने जल्द ही अफ़गानों को वापस खदेड़ना शुरू कर दिया। 

2023-25 ​​के बीच, अफ़गानों को निशाना बनाकर डिपोर्ट किया गया। संयुक्त राष्ट्र और पाकिस्तानी स्रोतों के अनुमानों के अनुसार जनवरी 2025 तक निर्वासित लोगों की संख्या 813,300 से अधिक और जून 2025 तक लगभग दस लाख हो जाएगी। पाकिस्तान को इस काम में ना किसी कानूनी अड़चन का सामना करना पड़ा और ना ही कोई एक्टिविज्म करने आया। ऐसा इसलिए क्योंकि पाकिस्तान में मानवाधिकार का ना कोई मोल है और ना ही वहाँ इस पर काम करने वाले कथित एक्टिविस्ट हैं। 

सहनशील होने की अपनी कीमत

असल में, अधिकारों का आवश्यकता से अधिक सम्मान करने वाले समाज अपने ही हाथ बाँध लेते हैं। कानूनी ढांचे, कार्यकर्ता प्रतिरोध और जन भावनाएँ अवैध घुसपैठियों के इर्द-गिर्द अदृश्य दीवारें खड़ी कर देती हैं। न्याय और स्वतंत्रता के नैतिक गुण प्रशासनिक कार्रवाई को धीमा कर देते हैं। 

जहाँ एक और अधिकारों को ज्यादा देखने पर यूरोप जैसे हाल होने का खतरा है तो वहीं पाकिस्तान जैसी अमानवीय कार्रवाई भारत नहीं कर सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि घुसपैठियों को लेकर क्या किया जाना चाहिए। 

अब सवाल यह है कि कौन सा मॉडल बेहतर है? अधिकार-उन्मुख लोकतंत्र धीमे, गड़बड़ और कानूनी रूप से संघर्षशील हो सकते हैं, लेकिन वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता को संरक्षित करते हैं। जो देश उन सुरक्षा उपायों को त्याग देते हैं, वे डिपोर्ट करने का लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन कहीं ना कहीं तो हमें रेखा खींचनी होगी।

जिन महाराजा सुहेलदेव ने आक्रांता सालार मसूद को पहुँचाया ‘जहन्नुम’, उनकी 40 फीट की मूर्ति का CM योगी ने किया अनावरण: शौर्य मेले में भी लिया हिस्सा, बहराइच को दी ₹1200 करोड़+ की योजनाएँ

सीएम योगी आदित्यानाथ ने यूपी को 1243 करोड़ की 384 परियोजनाओं की सौगात दी है। 10 जून 2025 को बहराइच में आयोजित भव्य समारोह में उन्होने कई परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया।

इस मौके पर उन्होंने कहा कि भारत के मठों और मंदिरों को लूटने वाले और भारतीय संस्कृति को नेस्तनाबूद करने का मंसूबा लेकर आने वाले सैयद सालार मसूद गाजी को महाराजा सुहेलदेव ने अपनी कूटनीति और युद्धनीति का करिश्मा दिखाया और जहन्नुम में पहुँचा दिया।

बीएसपी, एसपी और कॉन्ग्रेस पर हमला करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म, संस्कृति , राष्ट्र की रक्षा करने वाले महाराजा सुहेलदेव के पराक्रम को भुला कर विदेशी आक्रांताओं का महिलामंडन किया गया

उन्होंने कहा, “बहराइच का मुख्य आयोजन महाराजा सुहेलदेव जी के नाम पर होगा। बालार्क ऋषि या आदिशक्ति माँ पाटेश्वरी देवी के नाम पर होगा। महाराजा सुहेलदेव के पराक्रम को भुलाकर विदेशी आक्रांताओं का महिमामंडन कर हर वर्ष उनका विवाह कराते थे। ये सब मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति की वजह से हो रहा था। पीएम मोदी के नेतृत्व में जब एनडीए की सरकार बनी तो देशी रियासतों को मिलानेवाले सरदार पटेल का सम्मान किया गया। अयोध्या में राम दरबार भी सज गया और काशी, अयोध्या के बाद मथुरा में कॉरिडोर का काम शुरू हो रहा है।”

महाराजा सुहेलदेव पर शोध करने वाले विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान करने की योजना शुरू की गई है। मुख्यमंत्री ने महाराजा सुहेलदेव विजयोत्सव में दशकों से अपनी भूमिका निभाने वाले दिवंगत पंडित हनुमान शर्मा, पंडित गुलाब चंद शुक्ल,विहिप के पूर्व अध्यक्ष संतराम सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित की।

सीएम योगी ने चित्तौरा झील के तट पर निर्मित महाराजा सुहेलदेव स्मारक का लोकार्पण किया। करीब ₹39.49 करोड़ की लागत से इसका निर्माण कराया गया है। महाराजा सुहेलदेव की 40 फीट ऊँची प्रतिमा है जिसके हाथ में भाला और कंधे पर धनुष है और वह घोड़े पर सवार हैं।

इस मौके पर 5 बच्चों का अन्नप्राशन भी कराया गया। ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा ने इस मौके पर शौर्य मेले का आयोजन किया। राजभर ने ही कार्यक्रम को आयोजित करने का ऐलान किया था।