अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जो इस समय ईरान पर एयरस्ट्राइक करके चर्चा में हैं, वो एक दिन पहले तक नोबेल शांति पुरस्कार की चाह रखने के लिए सुर्खियों में बने हुए थे।
उन्होंने अपनी सोशल मीडिया साइट ट्रुथ सोशल पर एक लंबी पोस्ट लिखी थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि रवांडा और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) के बीच एक शांति समझौता हुआ है। ट्रम्प ने इसे अफ्रीका के लिए एक महान दिन और दुनिया के लिए भी एक महान दिन बताया।
इस समझौते का श्रेय खुद को देते हुए ट्रम्प ने यह भी कहा कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलनी चाहिए और यह अफसोस जताया कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला।
फोटो साभार: ट्रुथ सोशल
दिलचस्प बात यह है कि ट्रम्प ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा, भले ही उन्होंने कई अहम काम किए हों। उन्होंने दावा किया कि रवांडा-DRC शांति समझौते के अलावा उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध भी रोका था।
पाकिस्तान एंगल – क्या ट्रम्प ने खुद को नामांकित करवाया?
हाल ही में खबरें आई हैं कि डोनाल्ड ट्रम्प नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन की योजना बना रहे हैं। रिपोर्टो के मुताबिक, उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान अपने शांति प्रयासों का हवाला देकर यह नामांकन आगे बढ़ाने की कोशिश की।
कहा जा रहा है कि ट्रम्प ने इसके लिए पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर से अपनी नजदीकी का इस्तेमाल किया। यह विवाद उस समय शुरू हुआ जब 22 अप्रैल को पहलगाम में आतंकी हमला हुआ।
जिसकी जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ ने ली। इसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान और उसके कब्जे वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ नाम से सैन्य कार्रवाई की। इस कार्रवाई से परेशान होकर पाकिस्तान ने रॉकेट, मिसाइल और ड्रोन दागे, जिन्हें भारत की रक्षा प्रणाली ने नाकाम कर दिया, जिसके बाद ये ऑपरेशन 9 मई को खत्म हुआ।
पाकिस्तान के डीजीएमओ ने 10 मई को भारत के डीजीएमओ को फोन करके युद्ध विराम की माँग की थी। अमेरिका ने इस मामले में हस्तक्षेप करने की कोशिश की, लेकिन भारत ने साफ कर दिया कि वह किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं चाहता।
वहीं, पाकिस्तान ने अमेरिका पर दबाव डाला कि वह भारत को हमले रोकने के लिए मजबूर करे। पाकिस्तान के अनुरोध पर भारत ने सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई, लेकिन इससे पहले कि कोई औपचारिक घोषणा हो, डोनाल्ड ट्रम्प ने दावा कर दिया कि उन्होंने ही यह युद्ध रोका है। भारत ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह उसका खुद का निर्णय था और इसमें कोई तीसरा पक्ष शामिल नहीं था।
रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रम्प पाकिस्तान के लिए इसलिए नरम रुख अपना रहे हैं क्योंकि पाकिस्तान उन्होंने उन्हें उनका नाम नोबेल शांति पुरस्कार के लिए दिया है। ट्रम्प का पाकिस्तान को लेकर रुख पहले से उतार-चढ़ाव भरा रहा है कभी कड़ा, कभी दोस्ताना।
याद दिला दें की एक समय ट्रम्प पाकिस्तान पर आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप लगाते थे और चाहते थे कि अमेरिका उसकी फंडिंग बंद कर दे। आखिरकार, ओसामा बिन लादेन भी पाकिस्तान में ही तो पकड़ा गया था।
रवांडा-कांगो शांति समझौता – वास्तविक प्रगति या अवसरवाद?
डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी ट्रुथ सोशल पोस्ट में दावा किया कि उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ मिलकर डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) और रवांडा के बीच शांति समझौते की व्यवस्था की। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के प्रतिनिधि जल्द ही वाशिंगटन में समझौते पर दस्तखत करेंगे।
अगर सचाई की बात करें तो यह है कि रवांडा और DRC के बीच यह शांति प्रक्रिया कई सालों से अफ्रीकी संघ और संयुक्त राष्ट्र की मदद से चल रही थी। अमेरिका ने इसमें मदद की, लेकिन वह अकेला नहीं था।
कतर ने भी इस समझौते में अहम भूमिका निभाई और पहले अंगोला ने भी मध्यस्थता की थी, जिसने मार्च में खुद को अलग कर लिया। दोनों देशों ने पूर्वी DRC में हिंसा रोकने के लिए एक अनंतिम समझौते पर सहमति जताई है और 27 जून को वाशिंगटन में औपचारिक रूप से दस्तखत होने हैं।
ट्रम्प ने इस पूरी प्रक्रिया का पूरा श्रेय खुद को देने की कोशिश की और नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने की फिर से शिकायत की, लेकिन हकीकत यह है कि यह एक साझा कूटनीतिक प्रयास था और पूरी तरह से ट्रम्प को इसका श्रेय देना सही नहीं होगा।
क्या नोबेल के प्रति जुनून ओबामा के नोबेल शांति पुरस्कार से उपजा है?
ट्रंप की नाराज़गी शायद इस वजह से है कि बराक ओबामा को 2009 में नोबेल शांति पुरस्कार मिल गया था, वो भी उनके पहले कार्यकाल के कुछ ही महीनों बाद। जिसको लेकर ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर लिखा, “मैं चाहे कुछ भी कर लूँ, मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिलेगा।”
ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान, सर्बिया-कोसोवो, मिस्र-इथियोपिया और इजरायल-ईरान जैसे कई क्षेत्रों में संघर्ष रोकने का दावा किया। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि इन जगहों पर अब भी तनाव जारी है और खासकर मध्य पूर्व में हालात और भी खराब हो रहे हैं।
इससे सवाल उठता है कि क्या ट्रंप की कूटनीति वास्तव में नतीजे लाई है, या वो सिर्फ खुद को श्रेय देने में लगे हुए है, बिना किसी ठोस बदलाव के कुछ लोग उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में देखने लगे हैं जो दिखावा ज्यादा करते हैं, जैसे कि गिल्डरॉय लॉकहार्ट , जो नाम कमाने के लिए दूसरों की उपलब्धियों का श्रेय लेता है।
नोबेल बलपूर्वक?
नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकन आमतौर पर किसी योग्य व्यक्ति या संगठन द्वारा किया जाता है, लेकिन ट्रम्प का पाकिस्तान के जरिए नामांकन पाने की कोशिश उनकी निराशा को दिखाता है। जैसे अब ये शांति के लिए नहीं, बल्कि अपनी छवि और प्रतिष्ठा के लिए है।
ट्रम्प चाहते हैं कि लोग उन्हें नोबेल के लायक मानें, भले ही उन्होंने ऐसा कोई ठोस काम न किया हो। खुद ट्रम्प ने कहा, “लोग जानते हैं और यही मेरे लिए मायने रखता है।” लेकिन हकीकत ये है कि इतिहास शायद उन्हें इतनी आसानी से श्रेय नहीं देगा। दुनिया के कई हिस्सों में संघर्ष अब भी जारी हैं और ट्रम्प की शांति उपलब्धियाँ अब एक वास्तविक रिकॉर्ड की जगह सिर्फ दावों की लिस्ट लगती हैं।
आज ये साफ हो गया है कि ट्रम्प नोबेल शांति पुरस्कार पाना चाहते हैं जिसके लिए वो पूरी कोशिश कर रहे है। वो अलग-अलग देशों के संघर्ष गिनाने लगे हैं, यह कहते हुए कि उन्होंने वहाँ कुछ ऐसा किया है जिससे उन्हें यह पुरस्कार मिलना चाहिए।
उन्हें कल तक इससे फर्क नहीं पड़ रहा था कि मध्य पूर्व में हालात और बिगड़ रहे हैं या इजरायल पर ईरानी मिसाइलें गिर रही हैं। उनके लिए बस इतना काफी था कि ओबामा को मिला था, तो उन्हें उससे ज्यादा मिलना चाहिए।
नोट- ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग द्वारा लिखी गई है। इसका अनुवाद विवेकानंद मिश्रा ने किया है।
इजरायल ईरान युद्ध में अब अमेरिका सीधे रूप में शामिल हो गया है। अमेरिकी वायुसेना ने फोर्डो, नातांज और इस्फाहन परमाणु ठिकानों पर हमला किया है। राष्ट्रपति ट्रंप ने हमले की पुष्टि करते हुए कहा है कि यह एक बड़ा और सफल एयर स्ट्राइक था जिसमें अमेरिका के सभी लड़ाकू विमान सुरक्षित वापस लौट आए हैं।
उन्होंने कहा कि मुख्य निशाना ईरान का अहम परमाणु ठिकाना फोर्डो था जिसे पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है। राष्ट्र्पति ट्रंप ने इसे अमेरिकी सेना की उपलब्धि बताया। हमले के बाद अमेरिका ने मध्य-पूर्व में अपने सभी एयरबेस को अलर्ट कर दिया है।
राष्ट्रपति ट्रम्प ने शनिवार (21 जून 2025) रात व्हाइट हाउस से राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा, “हमारा उद्देश्य ईरान की परमाणु बम बनाने की क्षमता को नष्ट करना और दुनिया में आतंकवाद फैलाने वाले नंबर एक देश के परमाणु खतरे से लोगों को बचाना है। पिछले 40 साल से ईरान अमेरिका के खिलाफ काम कर रहा है और कई अमेरिकी इस नफरत का शिकार हुए हैं, इसलिए मैंने तय किया है कि अब इसे रोकना ही होगा।”
करीब दो हफ्ते पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के खिलाफ इजरायल के सैन्य हमले की जानकारी दी थी। हालाँकि इसके बाद उन्होने कहा था कोई नहीं जानता कि वह क्या करने जा रहे हैं।
अमेरिका ने अपने अत्याधुनिक फाइटर जेट्स बी2 बॉम्बर्स को मध्यपूर्व की ओर प्रशांत महासागर में रवाना किया था। इसके बाद कयास लगाए जा रहे थे कि अमेरिका रणनीति में बदलाव कर सीधा युद्ध में शामिल हो सकता है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को इस हमले के बाद चेतावनी दी है। उन्होने कहा है कि अगर ईरान ने अब भी शांति का रास्ता नहीं अपनाया तो इसके परिणाम और भी ज्यादा भयानक होंगे। ट्रंप ने कहा, “या तो ईरान में शांति होगी या फिर विनाश”
हमले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इजरायल के पीएम नेतन्याहू ने अमेरिका और राष्ट्रपति ट्रंप की तारीफ की और कहा, “राष्ट्रपति ट्रम्प और मैं अक्सर कहते हैं कि शक्ति के रास्ते ही शांति आती है। पहले शक्ति आती है, फिर शांति आती है।”
President Trump and I often say: ‘Peace through strength.’
— Benjamin Netanyahu – בנימין נתניהו (@netanyahu) June 22, 2025
ईरान ने इस हमले का बाद सरकारी टीवी चैनल के माध्यम से चेतावनी दी है। ईरान ने कहा है कि अब क्षेत्र में मौजूद हर अमेरिकी नागरिक या सैन्यकर्मी ईरान के टारगेट पर हैं।
इससे पहले ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई ने तीन नामों का जिक्र किया है जिनमें से कोई भी उनके उत्तराधिकारी बन सकते हैं। ये हैं- अलीरेजा अराफी अली असगर हेजाजी, हासिम हुसैनी बुशहरी और अली अकबर वेलायती। ये तीनों मोलवी हैं। इन नामों में खामेनेई के बेटे का नाम शामिल नहीं है।
पहले माना जा रहा था कि खोमेनेई का उत्तराधिकारी उनका बेटा मोजतबा होगा। अब इस बहस पर विराम लग गया है। रिपोर्ट के मुताबिक खामेनेई इस वक्त बंकर में छिपे हुए हैं। उनके आसपास कोई डिवाइस नहीं है ताकि कोई उनके लोकेशन को ट्रेस न कर सके। ये जानकारी ईरान के अधिकारियों ने दी है।
कॉन्ग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी आजकल कभी कभार अपने AC कमरों से निकल आते हैं। जब वह निकलते हैं तो उन्हें कोई ना कोई दुखी इंसान मिल जाता है। इसके बाद उस दुख की कहानी का एक सिरा मोदी सरकार से जोड़ कर उसकी आलोचना की जाती है।
देश पर 6 दशक से अधिक राज करने वाली कॉन्ग्रेस के डिफैक्टो मुखिया राहुल गाँधी इसी कड़ी में हाल ही में दिल्ली में अपने परनाना के नाम पर बनाई गई नेहरू प्लेस मार्केट पहुँचे। इसे एशिया की सबसे बड़ी कंप्यूटर और मोबाइल मार्केट होना का खिताब हासिल है।
“Make in India” promised a factory boom. So why is manufacturing at record lows, youth unemployment at record highs, and why have imports from China more than doubled?
Modi ji has mastered the art of slogans, not solutions. Since 2014, manufacturing has fallen to 14% of our… pic.twitter.com/HsL9PBUYpx
जब राहुल गाँधी यहाँ पहुँचे तो उन्हें पता चला कि इस देश में फोन बनाए जाते हैं। लेकिन इसमें उन्हें एक समस्या दिखी और यह समस्या उन्होंने ट्वीट के रूप में जाहिर की। राहुल गाँधी ने दावा किया कि भारत में मोदी सरकार आने के बाद निर्माण क्षेत्र बर्बाद हो गया है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि भारत में जो फोन निर्मित हो रहे हैं वह असल में मैन्युफैक्चरिंग नहीं बल्कि असेम्बलिंग यानी पुर्जों को एक साथ जोड़ना है। इसके साथ ही उन्होंने वीडियो में दावा किया कि हम चीन से कहीं पीछे हैं। उन्होंने चीन और भारत के बीच व्यापार घाटे का भी ठीकरा मोदी सरकार पर फोड़ा।
वैसे तो देश के नेता प्रतिपक्ष का मैन्युफैक्चरिंग जैसी चीजों के लिए चिंतित होना काफी प्रसन्नता की बात होती, लेकिन राहुल गाँधी असल में चिंतित नहीं हैं बल्कि वह झूठ बोल रहे हैं और आधे अधूरे तथ्य रख कर सरकार को घेरना चाह रहे हैं। ऑपइंडिया राहुल गाँधी के दावों की सच्चाई आपके सामने ला रहा है।
सबसे पहला दावा- असेम्बलिंग और मैन्युफैक्चरिंग
राहुल गाँधी ने कहा कि हमारे देश में जो स्मार्टफोन का निर्माण हो रहा है, वह असल में मेक इन इंडिया नहीं बल्कि असेम्बल इन इंडिया है। उन्होंने दावा किया कि हम सिर्फ पुर्जे जोड़ने के काम को मेक इन इंडिया कह रहे हैं। राहुल गाँधी ने दावा किया कि चीन से पुर्जे आते हैं और हम उन्हें जोड़ देते हैं।
राहुल गाँधी के इस दावे की सच्चाई हाल ही में आई एक रिपोर्ट बताती है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बनने वाले एप्पल के फोन और बाकी उत्पादों में लगने वाले 20% से अधिक पार्ट देश में ही बन रहे हैं। यानी भारत में बनने वाले किसी आईफोन के लगभग 20% पार्ट स्थानीय स्तर पर ही निर्मित होते हैं।
रिपोर्ट बताती है कि यह उपलब्धि एप्पल को अलग-अलग पार्ट सप्लाई करने वाले वेंडर्स ने हासिल की है। एप्पल के भारत भर में पार्ट सप्लायर्स मौजूद हैं। इनमें TDK कॉर्पोरेशन, होन हाई प्रिसिजन, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स, फॉक्सलिंक समेत तमाम कम्पनियाँ हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, सैमसंग और डिक्सन भी 20%-25% तक भारत में बने पार्ट ही उपयोग कर रही है। सरकार का लक्ष्य है कि इसे आने वाले वर्षों में 35%-40% के स्तर पर ले जाया जाए। इससे भारतीय उद्योग भी मजबूत होंगे और जरूरी पार्ट्स के लिए विदेशों पर निर्भरता भी कम होगी।
राहुल गाँधी को यह पता होना चाहिए कि दशकों से इस काम जुटा हुआ चीन भी अभी तक 35%-40% के स्तर पर पहुँच पाया है। भारत ने 20% की उपलब्धि 5 ही वर्षों में हासिल कर ली है। और उन्हें एक बात और समझनी चाहिए कि किसी भी वस्तु का निर्माण जब चालू होता है, तो उसका लोकलाइजेशन धीमे-धीमे होता है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण देश की ऑटो इंडस्ट्री है। 1980 के दशक में सुजुकी ने भारत में गाड़ियों को केवल एक साथ जोड़ना (असेम्बली) चालू किया थी लेकिन अब भारत में बनने वाली सुजुकी की हर गाड़ी में 95% पार्ट भारतीय होते हैं। यही स्थिति बाक़ी इंडस्ट्री की भी है।
राहुल गाँधी आज जिस असेम्बलिंग को कोस रहे हैं, उसने वित्त वर्ष 2024-25 में देश के निर्यात में ₹2 लाख करोड़ से अधिक का योगदान दिया है। इससे लाखों नौकरियाँ पैदा हुई हैं। हालाँकि, ऐसा पहली बार नहीं है जब राहुल या उनके गैंग ने भारत की इस उपलब्धि को कम कर दिखाने का प्रयास किया है।
इससे पहले उनके करीब रघुराम राजन भी ऐसी बातें कह चुके हैं। उनके करीबी कई लोग तो इसे पेचकसबाजी बताते थे। हालाँकि, जब भारत ने पार्ट्स भी स्थानीय स्तर पर बनाने चालू कर दिए, तो उनके होठ सिल गए हैं। राहुल गाँधी को पूरी सच्चाई देश को बतानी चाहिए।
दूसरा दावा- चीन पर बढ़ती निर्भरता
राहुल गाँधी वीडियो क दौरान दावा करते हैं कि बीते 10 वर्षों में हमारे चीन से आयात 2 गुना बढ़ गए हैं और मोदी सरकार दोनों देशों के बीच बढ़ते व्यापार घाटे के लिए दोषी है। यह बात ठीक है कि हम चीन से बड़ी मात्रा में चीजें आयात करते हैं और हमारा, उसका व्यापार घाटा भी बहुत बड़ा है।
लेकिन राहुल गाँधी एक बात इस दौरान बहुत करीने से छुपा ले जाते हैं। वह यह नहीं बताते कि भारत की चीन पर निर्भरता असल में UPA दौर में ही चालू हुई थी। मोदी सरकार को आयात में दोगुनी बढ़त के लिए कोसने वाले राहुल गाँधी की पार्टी के राज में भारत का चीन से व्यापार घाटा लगभग 20 गुना बढ़ा।
वर्ष 2004 में भारत चीन से आयात मात्र 7.5 बिलियन डॉलर (₹62 हजार करोड़) था। कॉन्ग्रेस के 2004 से 2014 के राज में या 8 गुना बढ़ कर लगभग 60 बिलियन डॉलर (₹5 लाख करोड़+) के पार पहुँच गया। यानी इस दौरान इसमें बिना किसी रोकटोक के 8 गुने की बढ़त हुई।
राहुल गाँधी को यह भी जानना चाहिए कि इसी दौरान भारत और चीन का व्यापार घाटा भी प्रति वर्ष 45% की रफ़्तार से बढ़ा। केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, 2004 और 2014 के बीच, भारत का व्यापार घाटा 2 बिलियन डॉलर से लगभग 40 बिलियन डॉलर हो गया।
आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2004 में भारत का चीन से व्यापार घाटा लगभग ना के बराबर था। कॉन्ग्रेस के सत्ता में रहते हुए 2014 में यह 40 बिलियन डॉलर (₹3.2 लाख करोड़+) के पार पहुँच गया। वर्तमान में मोदी सरकार ने इसे बीते कई वर्षों से नियंत्रित कर रखा है।
राहुल गाँधी और उनकी पार्टी को यह जवाब देना चाहिए कि आखिर क्यों उनकी सरकार के दौरान चीन के लिए भारत के बाजार के दरवाजे खोल दिए गए और क्यों उसके उत्पाद भारत में बिना रोक टोक के आते रहे। क्यों उस दौरान कॉन्ग्रेस ने भारत में निर्माण को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
यह काम भी मोदी सरकार ने ही चालू किया और PLI (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) की स्कीम निकाली। इसके चलते भारत के निर्माण क्षेत्र में दोबारा जान आई और विदेशी कम्पनियाँ चीन के बजाय भारत को भी एक विकल्प के तौर पर देखने लगीं।
तीसरा दावा- मैन्युफैक्चरिंग का घटता शेयर
राहुल गाँधी ने अपने इस वीडियो और ट्वीट में दावा किया कि भारत में निर्माण क्षेत्र का हिस्सा लगातार घट रहा है। उन्होंने यह बताया तो लेकिन दो तथ्य छुपा लिए। पहला तथ्य यह है कि जब भी कोई देश विकासशील से विकसित की यात्रा करता है, तो उसकी अर्थव्यवस्था में निर्माण और कृषि क्षेत्र का हिस्सा घटता है।
दूसरा यह कि जब भी कोई देश विकसित होने चलता है तो वह कृषि से निर्माण और फिर सेवा क्षेत्र की तरफ जाता है। लेकिन यह कॉन्ग्रेस की ही देन है कि भारत सीधे कृषि से सेवा क्षेत्र में जाने वाली अर्थव्यवस्था बना है। कॉन्ग्रेस को सलाह देने वाले अर्थशास्त्रियों ने लगातार इस बात का विरोध किया है कि भारत को निर्माण क्षेत्र पर फोकस बढ़ाना चाहिए।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण रघुराम राजन हैं। उन्होंने ही भारत को चीन की तरह निर्माण क्षेत्र पर ध्यान ना देने की सलाह दी थी। कॉन्ग्रेस के ही राज में 1991 तक तो भारत में आर्थिक सुधार नहीं हुए। इसके चलते निर्माण क्षेत्र नहीं पनपा। इसके बाद जब आर्थिक सुधार मजबूरी में किए भी गए तो हमने सेवा क्षेत्र की राह पकड़ी।
राहुल गाँधी जिस निर्माण क्षेत्र का हिस्सा GDP में घटने की बात कर रहे हैं, वह कोई नई बात नहीं है। यह प्रक्रिया कॉन्ग्रेस राज में ही चालू हो गई थी। असल बात यह है कि निर्माण क्षेत्र में भारत वापस अब अपनी मजबूती दर्ज करवा रहा है। इससे राहुल गाँधी को समस्या है।
कभी वह इसे असेम्बली इन इंडिया तो कभी चीन को फायदा पहुँचाने की प्रक्रिया बता रहे हैं। उनके पास इसका कोई विकल्प है, ऐसा भी नहीं है। राहुल गाँधी सिर्फ आलोचना के वास्ते ही भारत की इस उपलब्धि का मजाक उड़ा रहे हैं, हालाँकि यह सत्य के आसपास भी नहीं फटकता।
इंदिरा गाँधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए देश पर जो आपातकाल थोपा था उसके 50 वर्ष पूरे होने को हैं। इंदिरा गाँधी ने देश में 25 जून 1975 को आपातकाल घोषित किया और ये 21 मार्च 1977 तक चला। यह आजाद भारत का सबसे काला दौर माना जाता है, जब नागरिकों के सभी मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई थी।
सरकार ने सभी संस्थाओं का इस्तेमाल विरोध को दबाने के लिए किया। जो सरकार के खिलाफ बोले, उन्हें गिरफ्तार किया गया, पीटा गया और कई बार बिना सबूत के मार दिया गया। छात्र और युवा विशेष रूप से निशाना बने।
सरकार ने मीडिया पर सख्त सेंसरशिप लगाई, ताकि जनता तक सही जानकारी न पहुँचे। उस समय रेडियो और टीवी सरकार के नियंत्रण में थे, इसलिए केवल प्रेस ही स्वतंत्र माध्यम था, जिसे दबा दिया गया।
सरकार के साथ सहयोग करने वाले अफसरों और मीडिया के लोगों को इनाम दिए गए, जबकि जनता के दुख-दर्द को नजरअंदाज कर दिया गया। सत्ता के बल पर संविधान और अभिव्यक्ति का स्वतंत्रता को कुचलकर भारतीय लोकतंत्र को खत्म करने का प्रयास किया गया।
प्रिंट मीडिया और आपातकाल
आपातकाल के दौर में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना हर किसी का दायित्व था। पर आधिकांश मीडिया संस्थानों ने सत्ता के सामने घुटने टेकते हुए ‘प्रेस की आजादी’ को गिरवी रख दिया।
शुरुआत में कुछ अखबारों ने आपातकाल विरोध किया। कुछ ने अपने संपादकीय पन्ने खाली छापे। लेकिन सरकारी दबाव में जल्द ही ये विरोध बंद हो गया। मीडिया ने लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिबंधों को चुपचाप स्वीकार कर लिया।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने इस स्थिति को एक वाक्य में बयाँ किया, “जब इंदिरा गाँधी ने मीडिया को झुकने को कहा, तो वह रेंगने लगा।”
उस समय अखबारों में सिर्फ सरकार की तारीफ होती थी। इंदिरा गाँधी और उनके बेटे संजय गाँधी की शान में कसीदे पढ़े जाते थे। सरकार काढोल पीटते हुए विज्ञापन छापे जा रहे थे।प्रेस की आजादी के लिहाज से यह सबसे बुरे दौर में से एक था।
इंदिरा गाँधी भारत में आपातकाल की घोषणा करती हुई। (फोटो साभार: मिंट)
आपातकाल के दौरान भारत के कई प्रमुख अंग्रेजी समाचार पत्रों और पत्रकारों ने सरकार का समर्थन किया और प्रेस की स्वतंत्रता छोड़ दी। उद्योगपति कृष्ण कुमार बिड़ला के नेतृत्व में उस समय का मशहूर अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स (HT) ने इंदिरा गाँधी सरकार का साथ दिया।
टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) ने भी सरकारी रुख अपना लिया, क्योंकि इसके निदेशक मंडल का एक-तिहाई हिस्सा सरकार का समर्थन कर रहा था। मीडिया में आलोचना की स्वतंत्रता के लिए जगह खत्म हो गई, राजनीतिक कार्टून रातों-रात गायब हो गए। किसी ने भी प्रधानमंत्री की आलोचना करने की हिम्मत नहीं की। द हिंदू अखबार ने भी अत्यधिक सावधानी बरती और खुले विरोध से परहेज किया।
इसमें द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया के संपादक और मशहूर पत्रकार खुशवंत सिंह भी शामिल थे जिन्होंने आपातकाल का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि मई 1975 तक देशभर में सरकार के खिलाफ बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे, जो कई बार हिंसक हो जाते थे।
उन्होंने बॉम्बे की सड़कों पर नारेबाज करते हुए लोगों को कारों और दुकानों को नुकसान पहुँचाते खुद से देखने की बात भी कही थी। उनके अनुसार, विपक्षी नेता चाहते थे कि देश की स्थिति इस कदर बिगड़ जाए कि इंदिरा गाँधी इस्तीफा देने के लिए मजबूर हो जाएँ।
बाद में खुशवंत सिंह को इंदिरा गाँधी की सरकार ने राज्यसभा भेजा। 2007 में उन्हें देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण भी दिया गया।
एक आज्ञाकारी प्रेस
आपातकाल के दौरान चुप्पी को कई पत्रकारों, संपादकों और अखबार मालिकों ने जायज ठहराने की भी कोशिश की। टाइम्स ऑफ इंडिया के बोर्ड का कहना था कि वे आपातकाल का विरोध नहीं करेंगे, क्योंकि यह उस समय का कानून था और उसका पालन करना जरूरी था।
इस फैसले के बारे में अखबार के वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा ने बताया, “हम इसके खिलाफ नहीं बोल सकते, यह तय कर लिया गया था। चूंकि अखबार निजी स्वामित्व में था, इसलिए हमें भी वही रुख अपनाना पड़ा।” उन्होंने यह भी बताया कि कुछ लोगों ने सुझाव दिया था कि अगर हम विरोध नहीं कर सकते, तो कम से कम समर्थन भी न करें और आखिरकार यही अखबार की नीति बन गई।
बाद में इंदर मल्होत्रा ने 1991 में इंदिरा गाँधी के राजनीतिक और निजी जीवन पर एक पुस्तक भी लिखी। सूचना और प्रसारण मंत्रालय की ओर से दिए गए सरकारी विज्ञापन और घोषणाएँ ज्यादातर इंदिरा गाँधी सरकार के नसबंदी अभियान को बढ़ावा देने के लिए थी, जिसकी जिम्मेदारी उनके बेटे संजय गाँधी ने संभाल रखी थी। खबरें इस तरह से लिखी जाती थीं कि वह सरकारी प्रचार अधिक लगता था।
इस स्थिति की व्याख्या करते हुए लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि प्रेस पर सेंसरशिप लागू होने के बाद सभी अखबार एक जैसे लगने लगे थे- बेरंग, नीरस और सरकारी घोषणाओं की कॉपी जैसे।
उस समय इंडियन एक्सप्रेस के चेन्नई संस्करण में रिपोर्टर रहे लेखक ज्ञानी शंकरन ने बताया था कि मीडिया के पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था। सेंसरशिप इतनी सख्त थी कि अगर किसी खबर को मंजूरी नहीं मिलती तो पन्ने खाली छोड़ने पड़ते थे या ‘प्याज का रायता कैसे बनाएँ’ जैसे कामचलाऊ लेख छापने पड़ते थे। सेंसर की अनुमति के बिना राजनीतिक खबर छापना मना था
आपातकाल के दौरान कुछ अखबारों और कई छोटे, स्वतंत्र पत्र-पत्रिकाओं ने सेंसरशिप का विरोध किया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने की कोशिश की। मीडिया विश्लेषक इंदु बी सिंह के अनुसार प्रेस को नियंत्रित करने के लिए इंदिरा गाँधी ने तीन मुख्य रणनीति अपनाई,
सरकारी विज्ञापनों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए करना
समाचार संगठनों का जबरन विलय?
पत्रकारों, अखबार मालिकों और शेयरधारकों में डर और असुरक्षा पैदा करना
उनके अनुसार इन रणनीतियों की वजह से अधिकांश मीडिया संस्थान सरकार के सामने झुक गए और स्वतंत्र पत्रकारिता लगभग खत्म हो गई।
आपातकाल का गुणगान करने का प्रयास
आपातकाल के दौरान कुछ प्रमुख मीडिया प्लेटफॉर्मों ने न केवल सरकार के आदेशों का पालन किया, बल्कि आपातकाल को सकारात्मक रूप देने की कोशिश भी की।
इंडिया टुडे में 15 दिसंबर 1975 को छपे एक लेख के अनुसार, सरकार ने दावा किया कि हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई और तिरुवनंतपुरम जैसे दक्षिणी शहरों में आपातकाल को जनता ने सकारात्मक रूप से स्वीकार किया है। लोगों ने यहाँ तक कहा कि यह कदम 1947 में ही उठा लिया जाना चाहिए था।
रिपोर्ट में बताया गया कि विरोध, हड़ताल और आंदोलनों को दमन किए जाने के बाद एक ‘शांत माहौल’ बना। इसे सरकार ने अपनी उपलब्धि बताया। इस उपलब्धि में गेहूं-चावल की पर्याप्त आपूर्ति, कीमतों पर नियंत्रण और बेहतर सरकारी कामकाज को भी गिनाया गया।
कॉन्ग्रेस के उस समय के मुख्यमंत्री देवराज उर्स ने कहा कि काम की रफ्तार बढ़ी है और लोग ज्यादा जिम्मेदार हो गए हैं। आंध्र प्रदेश ने कर संग्रह में रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद सरकार की वार्षिक योजना को बढ़ाकर 1870 करोड़ रुपए कर दिया गया।
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष देवकांत बरुआ ने भी आपातकाल को देश के लिए जरूरी बताया था। उन्होंने कहा था कि अगर भारत बचेगा, तभी बाकी सब बचेगा। उद्योगपति कृष्ण कुमार बिड़ला ने कहा था कि अर्थव्यवस्था पहले से बेहतर हुई है, काला धन और तस्करी पर लगाम लगी है और प्रवासी भारतीयों ने भी अपना निवेश बढ़ाया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि आपातकाल ने छात्रों को शिक्षा की ओर लौटने, कौशल प्रशिक्षण शुरू करने और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने में मदद की। हालाँकि, इंदिरा गाँधी को बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए आलोचना भी झेलनी पड़ी। इसके अलावा 20-सूत्रीय योजना के जरिए अर्थव्यवस्था पर सरकारी शिकंजा कसने को लेकर भी किरकिरी हुई। इसे निजी क्षेत्र की स्वतंत्रता का हनन और विकास के लिए बाधा माना गया।
आपातकाल के पीड़ितों को ही दोषी ठहराने की कोशिश
आपातकाल के दौरान इंडिया टुडे ने इंदिरा गाँधी को प्रेस की आजादी की समर्थक बताने की कोशिश की। उनकी रिपोर्ट में कहा गया था कि इंदिरा गाँधी अक्सर कहती थीं कि वे प्रेस को दबाना नहीं चाहती, जबकि असल में प्रेस पर कड़े प्रतिबंध लगे हुए थे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी आलोचना हो रही थी। लेख में यह भी जोड़ा गया था कि लोकतंत्र में स्वतंत्रता और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
इंडिया टुडे ने भारतीय प्रेस को ‘जीवंत’ के बजाय ‘जंगली’ बताया और आरोप लगाया कि यहाँ बिना सबूत के अफवाहें और अप्रमाणित रिपोर्टें छापी जाती हैं। उन्होंने यह तर्क दिया कि पश्चिमी देशों में सख्त मानहानि कानूनों के कारण ऐसी रिपोर्टिग संभव नहीं होती। लेख में यह भी दावा किया गया था कि आपातकाल के दौरान सेंसरशिप कानूनों को धीरे-धीरे नरम किया जा रहा है ताकि ‘रचनात्मक आलोचना’ को अनुमति दी जा सके।
इंडिया टुडे ने आपातकाल के विरोधियों को ‘शोर मचाने वाला अल्पसंख्यक’ कहा। इसके साथ ही ये सवाल भी उठाया कि क्या लोकतंत्र में बिना हिंसा के अनुशासन, मेहनत और सामाजिक कार्यकुशलता फिजूल है? इसमें बताया गया कि कुछ गैर-कॉन्ग्रेसी राज्य सरकारें जैसे गुजरात और तमिलनाडु ठीक से काम कर रही हैं ताकि ये दिखाया जा सके कि आपातकाल का विरोध बेबुनियाद है।
पत्रिका ने विपक्षी एकता को भी निशाना बनाया और आरोप लगाया था कि किसी वैचारिक लक्ष्य से परे वे सिर्फ इंदिरा गाँधी को सत्ता से हटाने के लिए एकजुट हुए हैं। कुछ विपक्षी नेताओं को ‘अपमानजनक कार्यों’ में शामिल होने के आरोप में की गई गिरफ्तारी को भी सही बताया गया। यहाँ तक कि स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण के जेल जाते वक्त राष्ट्रीय क्रांति की घोषणा का भी मजाक बनाया गया।
लेख में बेहद असंवेदनशील तरीके से सवाल ठातो हुए लिखा गया था कि ‘आपातकाल कहाँ है? सैनिक कहाँ हैं? बंदूकें कहाँ हैं?’ और दावा किया गया था कि आम लोग अब राहत महसूस कर रहे हैं क्योंकि चीजें सस्ती हुई हैं। लोग अपने परिवार का भरण-पोषण ठीक से कर पा रहे हैं। एक नेता ने तो यहाँ तक कह दिया कि भारत में पर्यटन बढ़ाने के लिहाज से आपातकाल का प्रचार किया जाना चाहिए। टैगलाइन हो, ‘आपातकाल देखने भारत आएँ।’
इसी तरह, इंडिया टुडे ने न केवल आपातकाल का समर्थन किया बल्कि आलोचकों और पीड़ितों का मजाक भी उड़ाया। साथ ही इंदिरा गाँधी को सहनशील नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। ये तब हो रहा था जब प्रेस की आजादी और लोकतंत्र की मूल भावना को ध्वस्त किया जा रहा था।
इंदिरा गाँधी के प्रति वफादारी
आपातकाल के दौरान कई मीडिया संगठनों ने कॉन्ग्रेस और इंदिरा गाँधी का समर्थन किया। इसके पीछे या तो कोई दबाव था या फिर उनका निजी फायदा शामिल था। इस कड़ी में टाइम्स ग्रुप एक बड़ा उदाहरण है।
टाइम्स ग्रुप को आजादी के बाद रामकृष्ण डालमिया ने ब्रिटिश मालिकों से खरीदा था। लेकिन उन्होंने एक बीमा कंपनी के अध्यक्ष पद का गलत इस्तेमाल किया, जिसकी ओर पंडित नेहरू की सरकार ने ध्यान नहीं दिया। बाद में इंदिरा गाँधी के पति फिरोज गाँधी ने संसद में इस घोटाले को उठाया। इसकी जाँच हुई और डालमिया को दोषी ठहराकर तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
इसके बाद नेहरू ने टाइम्स ग्रुप का स्वामित्व डालमिया के दामाद साहू शांति प्रसाद जैन को सौंपी। बाद में शांति प्रसाद जैन को भी सब्सिडी वाले अखबारी कागज को ब्लैक मार्केट में बेचने के आरोप में जेल जाना पड़ा। इसके बाद सरकार ने इस समूह पर खुद नियंत्रण कर लिया।
आपातकाल के दौरान इंदिरा गाँधी ने साहू शांति प्रसाद जैन के बेटे अशोक कुमार जैन को टाइम्स ग्रुप वापस दे दिया। यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि सरकार को उनके समर्थन की गारंटी मिल सके। अशोक जैन टाइम्स ग्रुप के वर्मान मालिक विनीत जैन और समीर जैन के पिता थे। उन्होंने बाद में सरकार विरोधी पत्रकारों को नौकरी से निकाल दिया।
अशोक जैन पर मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों में संलिप्त होने के आरोप लगे। एक मामले में स्विट्ज़रलैंड के एक बैंक खाते में 1.25 मिलियन डॉलर के अवैध ट्रांसफर की जाँच के चलते उन्हें देश छोड़ना पड़ा।
प्रेस की स्वतंत्रता पर इंदिरा का दबाव
आपातकाल के दौरान मीडिया के दमन कई तरीकों के किए जाने की कोशिश हुई। अखबार और पत्रिकाओं को छपने के लिए बिजली की जरूरत होती थी। दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग में मौजूद न्यूजप्रिंट की बिजली आपूर्ति सरकारी नियंत्रण थी। अखबारों को छपने से रोकने के लिए कई बार आपूर्ति को बाधित किया जाता था।
सरकार ने विदेशी मीडिया पर भी सख्ती की। उस समय पर 29 विदेशी पत्रकारों को भारत आने से रोका गया और 7 को देश से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। भारतीय मीडिया के भी 2 कार्टूनिस्ट, 6 फोटोग्राफरों समेत 54 पत्रकारों की मान्यता रद्द कर दी गई और लगभग 250 पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया था।
मीडिया की आर्थिक निर्भरता सरकारी विज्ञापनों पर थी क्योंकि पाठकों से मिलने वाला पैसा अखबार चलाने के लिए काफी नहीं होता था। सरकार ने इसी कमजोरी का फायदा उठाकर मीडिया को नियंत्रित किया। संजय गाँधी के करीबी रहे सूचना और प्रसारण मंत्री विद्या चरण शुक्ला ने मीडिया को कड़े नियमों और सेंसरशिप में बाँध दिया।
1976 में लाया गया ‘आपत्तिजनक मामलों के प्रकाशन की रोकथाम अधिनियम’ प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगाने वाला कानून बन गया। इसने सरकार को किसी भी लेख या रिपोर्ट को ‘आपत्तिजनक’ बताकर उसे रोकने, प्रेस को बंद करने और सिक्योरिटी डिपॉजिट जब्त करने का अधिकार दे दिया। इसके कारण सरकार की नीतियों की आलोचना और विरोध पूरी तरह दब गए।
दुर्गा दास जैसे वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा कि इंदिरा गाँधी कभी भी प्रेस को स्वतंत्र नहीं मानती थी। उनका मानना था कि मीडिया को सरकार का पक्ष रखना चाहिए, न कि जनता की आवाज बनना चाहिए। यह साफ दिखाता है कि इंदिरा गाँधी ने आपातकाल के दौरान ही नहीं, बल्कि शुरुआत से ही प्रेस की आजादी को दबाने की कोशिश की थी।
कॉन्ग्रेस के शासन में मीडिया और प्रेस पर जितना बड़ा हमला आपातकाल के दौरान हुआ, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। उस दौर में कॉन्ग्रेस के समर्थक पत्रकार सबसे ज्यादा झुके हुए और सरकार के प्रति वफादार साबित हुए।
मूल रूप से अंग्रेजी में यह रिपोर्ट रुकमा राठौड़ ने लिखी है। विस्तार से पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें। हिंदी में इसका अनुवाद विवेकानंद मिश्र ने किया है।
न्यूयॉर्क शहर का मेयर बनने की रेस में शामिल जोहरान ममदानी का नाम इन दिनों खूब चर्चा में है। जोहरान, मशहूर फिल्ममेकर मीरा नायर और लेखक महमूद ममदानी का बेटा है। लेकिन उसकी चर्चा न तो किसी अच्छे काम के लिए है, न ही किसी बड़े विजन के लिए। उसका नाम विवादों में है, ऐसे विवादों में… जो भारत, हिंदुओं और यहूदियों के खिलाफ उसकी बयानबाजी और गतिविधियों से जुड़े हैं।
कभी पीएम मोदी को ‘फास्टिस्ट’ कहने वाला ममदानी भारत और हिंदुओं के खिलाफ लगातार आग उगलता रहा है। वो गुजरात दंगों को लेकर भी प्रोपेगेंडा चलाता रहा है और हिंदू विरोधी बयान भी देता रहा है।
चूँकि वो खुद को सोशलिस्ट कह कर लोगों के वोट पाना चाहता है, ऐसे में धीरे-धीरे ही सकती, उसका असली चेहरा बेनकाब होने लगा है। यही नहीं, इस चुनाव में उसका साथ भी वही जिहादी और इस्लामी कट्टरपंथी दे रहे हैं, जो भारत और हिंदुओं के खिलाफ ही नहीं, बल्कि यहूदियों के खिलाफ भी काम करते रहे हैं।
जोहरान खुद को ‘प्रोग्रेसिव’ और ‘सोशल जस्टिस’ का झंडाबरदार बताता है। लेकिन उसकी फंडिंग और समर्थन कहाँ से आ रहा है, ये देखकर उसकी असलियत सामने आती है।
भारत और हिंदू विरोधी होने के लिए कुख्यात काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस (CAIR) नाम का इस्लामी कट्टरपंथी संगठन जोहरान के सबसे बड़े समर्थकों में से एक है। CAIR ने जोहरान की कैंपेन को चलाने वाली सबसे बड़ी कमेटी ‘न्यूयॉर्कर्स फॉर लोअर कॉस्ट्स’ को एक लाख डॉलर (लगभग 83 लाख रुपए) का चंदा दिया है। ये पैसा दो किस्तों में आया – 30 मई 2025 को 25,000 डॉलर और 16 जून 2025 को 75,000 डॉलर।
CAIR पर पहले से ही भारत और हिंदू विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं, और अब उसका ममदानी को समर्थन देना कई सवाल खड़े कर रहा है।
CAIR का इतिहास देखें तो ये संगठन खुद को अमेरिका में मुस्लिमों के हक की लड़ाई लड़ने वाला बताता है। लेकिन हकीकत में ये भारत और हिंदुओं के खिलाफ लगातार जहर उगलता रहा है। 2022 में इसने एक रिपोर्ट निकाली थी, जिसमें अमेरिका में मुस्लिमों के साथ भेदभाव की बात कही गई थी।
लेकिन उसी CAIR ने भारत में हिंदू विरोधी प्रोपगैंडा को बढ़ावा दिया। मिसाल के तौर पर, 2021 में इसने ‘डिसमैंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ नाम के एक हिंदू विरोधी कॉन्फ्रेंस को सपोर्ट किया था। इतना ही नहीं, पिछले साल न्यू जर्सी में 26/11 के मुंबई हमले की सच्चाई दिखाने वाली एक मोबाइल बिलबोर्ड ट्रक को भी CAIR ने ‘नफरत फैलाने वाला’ करार दे दिया था।
CAIR का रुख सिर्फ हिंदू विरोधी ही नहीं, यहूदी विरोधी भी है। ये संगठन हमास जैसे आतंकी संगठन के समर्थन में भी खड़ा रहा है। 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल के निर्दोष नागरिकों का नरसंहार किया, CAIR के कुछ लोग उसका जश्न मना रहे थे।
जोहरान भी इस मामले में पीछे नहीं है। उसने ‘ग्लोबलाइज द इंतिफादा’ जैसे नारे का बचाव किया, जो यहूदियों के खिलाफ नफरत और हिंसा भड़काने वाला है। उसने इजरायल के अस्तित्व को मानने से भी इनकार किया है।
Mamdani, on The Bulwark podcast, says ‘Globalize the Intifada’ chant signifies, to him, a call for Palestinian human rights.
Adds: “The word has been used by the Holocaust Museum when translating the Warsaw Ghetto Uprising into Arabic — because it’s a word that means struggle.” pic.twitter.com/k2yeiSJpMy
CAIR के अलावा जोहरान को और भी ऐसे लोगों का समर्थन मिल रहा है, जो या तो भारत विरोधी हैं, हिंदू विरोधी हैं, या फिर यहूदी विरोधी। मिसाल के लिए यहूदी विरोधी बयानों के लिए जानी जाने वाली लिंडा सरसौर, उसने जोहरान की कैंपेन को 2,500 डॉलर दिए। इसके अलावा इजरायल विरोधी संगठन ‘इफनॉट नाउ’ से जुड़े ‘एंड द ऑक्यूपेशन’ ग्रुप ने भी उसे 1,000 डॉलर का चंदा दिया। इजरायल पर ‘नरसंहार’ का इल्जाम लगाने वाले न्यू जर्सी के ‘द ट्रुथ प्रोजेक्ट’ ने भी 9 जून 2025 को उसे 10,000 डॉलर दिए।
जोहरान का भारत और हिंदुओं के प्रति रवैया भी साफ है। उसने कई बार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘फासिस्ट’ और ‘वॉर क्रिमिनल’ कहा। 2002 के गुजरात दंगों को लेकर उसने झूठ बोला कि मोदी ने मुस्लिमों का कत्लेआम करवाया और गुजरात में अब मुस्लिम बचे ही नहीं। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट दी है, और गुजरात में मुस्लिम आबादी बढ़ी है। जोहरान ने मोदी की तुलना इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू से की और दोनों को एक ही श्रेणी में रखा।
साल 2020 में जब अयोध्या में राम मंदिर बन रहा था, जोहरान ने इसके खिलाफ रैली निकाली। उस रैली में हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक नारे लगाए गए, और इसे खालिस्तानी तत्वों ने आयोजित किया था। 2023 में जब मोदी न्यूयॉर्क आए, तब भी जोहरान ने उनके खिलाफ जहर उगला।
जोहरान ने मोदी से जुड़े हिंदुओं को ‘फासिस्ट’ कहा और न्यूयॉर्क के दो भारतीय-अमेरिकी नेताओं जेनिफर राजकुमार और केविन थॉमस पर हमला बोला, क्योंकि उन्होंने मोदी की आलोचना नहीं की। राजकुमार ने जवाब में जोहरान के बयानों को ‘चरमपंथी और विभाजनकारी’ बताया और वोटरों से नफरत को खारिज करने की अपील की।
जोहरान को सिर्फ CAIR ही नहीं, बल्कि इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) जैसे संगठनों का भी समर्थन मिल रहा है।
IAMC का इतिहास भी भारत और हिंदू विरोधी गतिविधियों से भरा है। इस संगठन के तार लश्कर-ए-तैयबा और जमात-ए-इस्लामी जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। 2021 में IAMC और CAIR ने मिलकर भारत को ‘कंट्री ऑफ पार्टिकुलर कंसर्न’ घोषित करने की कोशिश की थी। IAMC पर भारत में फर्जी खबरें और प्रोपगैंडा फैलाने का भी इल्जाम है और इसे UAPA के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ा है।
यहाँ तक कि हाल ही में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान भी IAMC और CAIR ने पाकिस्तान में पाकिस्तानी फौज समर्थित आतंकवादी प्रतिष्ठानों के खिलाफ भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की निंदा की थी।
इतना ही नहीं, जोहरान को सुनीता विश्वनाथ जैसी शख्सियतों का भी साथ मिला है, जो ‘हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) की को-फाउंडर हैं। ये संगठन जॉर्ज सोरोस से फंडिंग लेता है और हिंदू विरोधी एजेंडा चलाता है। सुनीता ने हाल ही में जोहरान का समर्थन करते हुए कहा कि वो ‘एक हिंदू’ के तौर पर उसके साथ खड़ी हैं, जबकि उनके काम और बयान हिंदुत्व के खिलाफ हैं। HfHR को IAMC और ‘ऑर्गनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया’ ने 2019 में बनाया था। इन संगठनों ने मिलकर 2019 में मोदी के ह्यूस्टन दौरे के खिलाफ प्रदर्शन भी किया था।
जोहरान की कैंपेन को भारत के कुछ वामपंथी मीडिया हाउस भी बढ़ावा दे रहे हैं। वो उसे ‘प्रोग्रेसिव मुस्लिम’ के तौर पर पेश करते हैं, लेकिन उसका भारत, हिंदू और यहूदी विरोधी रुख उसकी असलियत बयान करता है।
जोहरान का मकसद साफ है – वो उन ताकतों का साथ लेकर न्यूयॉर्क का मेयर बनना चाहता है, जो भारत और हिंदुओं के खिलाफ हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या न्यूयॉर्क जैसे शहर के लोग ऐसे शख्स को अपना नेता चुनेंगे, जिसका एजेंडा नफरत और विभाजन पर टिका है? बहरहाल, इस सवाल का जवाब तो वक्त बीतने के साथ सामने आ ही जाएगा।
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं। इसका हिंदी भावानुवाद सौम्या सिंह ने किया है।
कॉन्ग्रेस ने ईरान का समर्थन करके अपने ‘मुस्लिम वोट बैंक’ को खुश करने की कोशिश की है। उसने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष में किसी का भी पक्षकार नहीं बन रही, बल्कि वो तठस्थ है। यानी वो ईरान या इजरायल में से किसी एक पक्ष का भी साथ नहीं दे रही। कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने शनिवार (21 जून 2025) को ‘द हिंदू’ अखबार में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने ईरान को समर्थन दिया और मोदी सरकार की निष्पक्ष नीति की आलोचना की।
यह कदम कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष ने अपने घरेलू ‘मुस्लिम वोट बैंक’ को खुश करने के लिए उठाया, जो ‘उम्माह’ (मुस्लिम समुदाय) के हित में ईरान के साथ खड़ा है और इस बात को नजरअंदाज कर रहा है कि ईरान एक शिया-बहुल देश है, जब बात इजरायल के साथ संघर्ष की आती है।
सोनिया गाँधी ने अपने लेख में ईरान को पश्चिमी देशों और इजरायल की आक्रामकता का शिकार बताया। उन्होंने यह भी दावा किया कि अली होसैनी खामेनेई के नेतृत्व वाला इस्लामी गणराज्य भारत का ‘लंबे समय का दोस्त’ रहा है।
"New Delhi's silence on the devastation in Gaza and now on the unprovoked escalation against Iran reflects a disturbing departure from our moral and diplomatic traditions. This represents not just a loss of voice but also a surrender of values.
अपने दावों को सही साबित करने के लिए कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष ने लिखा, “1994 में ईरान ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में कश्मीर के मुद्दे पर भारत के खिलाफ एक प्रस्ताव को रोकने में मदद की थी।” लेकिन सोनिया ने यह नहीं बताया कि ईरान ने कश्मीर पर कई बार अपना रुख बदला है और उसके सुप्रीम लीडर ने सोशल मीडिया पर भारत के खिलाफ कई बार गलत बयान दिए हैं।
ईरान ने ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन’ (OIC) के कश्मीर संपर्क समूह में कश्मीरियों के ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ का समर्थन किया है, जिससे पाकिस्तान के रुख को बल मिलता है। अली होसैनी खामेनेई ने भी जम्मू-कश्मीर, जो भारत का अभिन्न हिस्सा है, उस पर अपनी इस्लामी गणराज्य की स्थिति को साफ कर दिया है।
साल 2017 से ईरान के सुप्रीम लीडर ने कई बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट में कश्मीर को ‘स्वतंत्र क्षेत्र’ दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने बदनाम तरीके से कहा था, “हर किसी को यमन, बहरीन और कश्मीर के लोगों का खुलकर समर्थन करना चाहिए।”
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के तुरंत बाद अली होसैनी खामेनेई ने ट्वीट किया, “हम कश्मीर में मुसलमानों की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। हमारे भारत के साथ अच्छे संबंध हैं, लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि भारत सरकार कश्मीर के सम्मानित लोगों के प्रति निष्पक्ष नीति अपनाए और इस क्षेत्र में मुसलमानों पर अत्याचार और दमन को रोके।”
अली होसैनी खामेनेई के ट्वीट का स्क्रीनग्रैब
मार्च 2020 में एक और ऐसा ही ट्वीट आया – “दुनियाभर के मुसलमानों के दिल भारत में मुसलमानों के नरसंहार से दुखी हैं। भारत सरकार को कट्टर हिंदुओं और उनकी पार्टियों का सामना करना चाहिए और मुसलमानों का नरसंहार रोकना चाहिए, ताकि भारत इस्लामी दुनिया से अलग-थलग न पड़े।”
पिछले साल खामेनेई ने पोस्ट किया, “इस्लाम के दुश्मन हमेशा हमें हमारी साझा इस्लामी पहचान के प्रति उदासीन बनाने की कोशिश करते हैं। हम खुद को मुसलमान नहीं मान सकते अगर हम म्यांमार, गाजा, भारत या किसी अन्य जगह पर एक मुसलमान के दुख से बेखबर रहें।”
इससे साफ है कि ईरान भारत का ‘लंबे समय का दोस्त’ नहीं है, खासकर जब बात जम्मू-कश्मीर की आती है। दूसरी ओर इजरायल ने हमेशा भारत का खुलकर समर्थन किया है और पाकिस्तान के खिलाफ युद्धों में हमारी मदद की है।
अली होसैनी खामेनेई के ट्वीट का स्क्रीनग्रैब
सोनिया गाँधी का ‘द हिंदू’ में लिखा लेख, जिसमें इजरायल को बदनाम किया गया और ईरान की तारीफ की गई है। इसका कूटनीति से कम और देश के भीतर अपने मुख्य वोट बैंक (इस्लामी) के साथ वैचारिक तालमेल से ज्यादा लेना-देना है, खासकर चुनावों से पहले।
इजरायल-ईरान संघर्ष ने कॉन्ग्रेस को अपने मुस्लिम समर्थकों को यह संदेश देने का मौका दिया कि यह पुरानी पार्टी ‘यहूदी’ इजरायल के खिलाफ उम्माह के साथ खड़ी है। यही कारण है कि कॉन्ग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा ने इस साल मार्च में इजरायली सरकार पर हमला बोला था।
सोनिया गाँधी ने अपने लेख में मोदी सरकार पर इजरायल-ईरान संघर्ष में किसी का पक्ष न लेने का आरोप लगाया।
सोनिया ने लिखा, “इस मानवीय आपदा के सामने, नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत की लंबे समय से चली आ रही और सिद्धांतवादी नीति को लगभग छोड़ दिया है, जिसमें एक स्वतंत्र, संप्रभु फिलिस्तीन की कल्पना की जाती थी, जो इजरायल के साथ आपसी सुरक्षा और सम्मान के साथ शांति में रहे।”
सोनिया ने आगे लिखा, “गाजा में तबाही और अब ईरान के खिलाफ बिना उकसावे की आक्रामकता पर नई दिल्ली की चुप्पी हमारी नैतिक और कूटनीतिक परंपराओं से एक परेशान करने वाला विचलन है। यह न केवल आवाज की हानि है, बल्कि मूल्यों का समर्पण भी है। अभी भी देर नहीं हुई है। भारत को स्पष्ट बोलना चाहिए, जिम्मेदारी से काम करना चाहिए और पश्चिमी एशिया में तनाव कम करने और बातचीत की ओर लौटने के लिए हर कूटनीतिक रास्ते का इस्तेमाल करना चाहिए।”
मोदी सरकार का वैश्विक संघर्षों पर रुख
कॉन्ग्रेस पार्टी के उलट, जो अपने घरेलू वोट बैंक को खुश करने के लिए कूटनीतिक संबंधों को खतरे में डालने को तैयार है, मोदी सरकार ने वैश्विक संघर्षों में सावधानी, संयम और रणनीतिक संतुलन दिखाया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि भारत शांति के पक्ष में है। यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान भारत ने किसी भी देश का पक्ष नहीं लिया, भले ही पश्चिमी देश यूक्रेन को हथियार देकर युद्ध को बढ़ावा दे रहे थे।
शांति और तनाव कम करने की बार-बार अपील के कारण रूस ने वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच भारत को सस्ते दामों पर कच्चा तेल दिया। भारत ने रूस और यूक्रेन दोनों में फँसे भारतीय नागरिकों के लिए सुरक्षित रास्ते बनाए और ‘ऑपरेशन गंगा‘ के तहत उन्हें हवाई जहाज से घर वापस लाया।
इजरायल-हमास युद्ध के दौरान भी भारत ने यही रास्ता अपनाया। भारत ने आतंकी संगठन हमास और इजरायली नागरिकों पर उसके क्रूर हमले की कड़ी निंदा की, लेकिन फिलिस्तीनी लोगों के लिए मानवीय सहायता भी भेजी।
भारत ने इस संघर्ष पर किसी भी प्रस्ताव पर वोट नहीं दिया और भारतीय संसद में पूछे गए सवाल के जवाब में अपनी स्थिति साफ की।
फरवरी 2024 में मोदी सरकार ने कहा, “भारत की फिलिस्तीन नीति लंबे समय से चली आ रही और सुसंगत है। हमने एक बातचीत के जरिए दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन किया है, जिसमें एक स्वतंत्र, संप्रभु और व्यवहार्य फिलिस्तीन की स्थापना हो, जो सुरक्षित और मान्यता प्राप्त सीमाओं के भीतर इजरायल के साथ शांति में रहे।”
सरकार ने आगे कहा, “भारत ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर हुए आतंकी हमलों और इजरायल-हमास संघर्ष में नागरिकों की मौत की कड़ी निंदा की है। हमने संयम और तनाव कम करने की अपील की है और बातचीत और कूटनीति के जरिए शांतिपूर्ण समाधान पर जोर दिया है। हमने बचे हुए बंधकों की रिहाई की भी माँग की है। प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री ने कई नेताओं से बात की है, जिनमें इजरायल के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री, और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति और विदेश मंत्री शामिल हैं। विदेश मंत्री ने 20 जनवरी 2024 को कंपाला में फिलिस्तीनी विदेश मंत्री से मुलाकात की और दो-राष्ट्र समाधान के लिए भारत के समर्थन को दोहराया।”
ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच भी भारत ने शानदार संतुलन दिखाया और ‘ऑपरेशन सिंधु’ के तहत दोनों देशों में फँसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला।
भारत ने इजरायल के साथ मजबूत रक्षा, खुफिया और व्यापार संबंध बनाए रखा है, जिसमें हर साल 2 बिलियन डॉलर से ज्यादा के सैन्य उपकरण (मिसाइल, ड्रोन, निगरानी उपकरण) आयात होते हैं। साथ ही भारत ईरान के साथ भी महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जैसे कि इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) और चाबहार बंदरगाह। इसके साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा रहा है।
मिडिल-ईस्ट का संघर्ष कई पहलुओं वाला, जटिल और पेचीदा है। बाहरी दबाव के बावजूद, मोदी सरकार की निष्पक्ष और कूटनीतिक नीति की वजह से भारत को सभी पक्षों से फायदा मिल रहा है।
उदाहरण के लिए मिडिल ईस्ट के 8 इस्लामी देशों – सऊदी अरब, अफगानिस्तान, फिलिस्तीन, मालदीव, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मिस्र और कुवैत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने उच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया है। इनमें शामिल हैं-
किंग अब्दुलअजीज़ का ऑर्डर (2016) – सऊदी अरब का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
अमानुल्लाह खान का ऑर्डर (2016) – अफगानिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
फिलिस्तीन राज्य का ऑर्डर (2018) – फिलिस्तीन का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
इज्जुद्दीन का ऑर्डर (2019) – मालदीव का विदेशी गणमान्य व्यक्तियों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान
ज़ायद का ऑर्डर (2019) – संयुक्त अरब अमीरात (UAE) का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
रेनेसाँ का ऑर्डर (2019) – बहरीन का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
नाइल का ऑर्डर (2023) – मिस्र का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
मुबारक द ग्रेट का ऑर्डर (2024) – कुवैत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
ये सम्मान मोदी सरकार की कूटनीतिक संतुलन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मजबूत व्यक्तित्व और विश्व व्यवस्था में भारत के बढ़ते प्रभाव का सबूत हैं।
अगर भारत ने वैश्विक संघर्षों में सक्रिय रूप से पक्ष लिया होता और पक्षपात किया होता, तो हमें व्यापार संबंधों में नुकसान, मित्र देशों से दूरी और उन युद्धों में अनजाने में उलझने की कीमत चुकानी पड़ती, जो हमने शुरू नहीं किए।
कॉन्ग्रेस भले ही मोदी सरकार पर इजरायल-ईरान संघर्ष या इजरायल-हमास युद्ध में पक्ष न लेने का आरोप लगाए, लेकिन पीछे देखें तो यह भारत के लिए सबसे सही फैसला था, है और रहेगा।
अब UPSC की परीक्षा में बैठ रहे अभ्यर्थियों को अपने आखिरी मौके के बाद भी निराश नहीं होना पड़ेगा। सिविल सेवा जैसी अन्य परीक्षाओं में अपनी लगन और मेहनत के बल पर अगर अभ्यर्थी इंटरव्यू तक पहुँच जाता है और फिर भी मेरिट में पिछड़ जाता है तो भी उसे सरकारी नौकरी, पब्लिक सेक्टर यूनिट (PSU) और निजी कंपनियों में बड़े ओहदों पर काम करने का मौका मिल सकता है। ये संभव होगा ‘प्रतिभा सेतु’ के जरिए। देश की प्रतिभाओं और बुद्धिमत्ता रखने वाले लोगों को सरकार ‘प्रतिभा सेतु’ नाम की नई योजना से जोड़ेगी।
क्या है प्रतिभा सेतु
प्रतिभा (PRATIBHA) का पूरा नाम ‘प्रोफेशनल रिसोर्स एंड टैलेंट इंटीग्रेशन- ब्रिज फॉर हायरिंग एस्पिरेंट्स’ है। प्रतिभा सेतु को पहले पब्लिक डिस्क्लोजर स्कीम (PDS) के नाम से जाना जाता था। इसे 20 अगस्त 2018 में शुरू किया गया था। तब सिर्फ उम्मीदवारों के नाम सूची में डाला जाता है। अब इसके नाम और प्रारूप में बदलाव किया गया है।
प्रतिभा सेतु के अंदर प्रतिभा पोर्टल बनाया गया है। इसके तहत UPSC की 8 परीक्षाओं के उम्मीदवारों को प्रतिभा सेतु से जोड़ा जाएगा। अंतिम मेरिट सूची से चूकने वाले अभ्यर्थियों की जानकारी सरकारी मंत्रालय, स्वायत्त कंपनियों और निजी संगठनों को साझा किया जाएगा। इच्छुक उम्मीदवारों इसके जरिए नौकरियों के अवसर मिलेंगे।
किन परीक्षाओं के अभ्यर्थियों को मिलेगा मौका
‘प्रतिभा सेतु’ में उन अभ्यर्थियों की जानकारी शामिल होगी जिन्होंने UPSC परीक्षा के सभी चरणों को पास किया हो, इंटरव्यू तक पहुँचा हो लेकिन मेरिट की अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाए हैं।
इसके तहत सिविल सेवा (CSE), आर्थिक और सांख्यिकी सेवा (IESS), संयुक्त चिकित्सा सेवा (CMS), वन सेवा (IFS), रक्षा रेवा (CDS), इंजीनियरिंग सेवा (ESE), भू-वैज्ञानिक (CGSE) और केंद्रीय शस्त्र पुलिस बल (ACS) की परीक्षाएँ शामिल हैं। इन परीक्षाओं से UPSC के पास अब तक 10,000 से अधिक उम्मीदवारों का डेटा मौजूद है।
हालाँकि इसमें NDA, NA, CBI (DSP) LDCE, CISF AC (EXE) LDCE, SO/Steno समेत अन्य परीक्षाओं को अब तक शामिल नहीं किया गया है। उम्मीदवारों की जानकारी प्रतिभा सेतु पर साझा करने से पहले उनकी सहमति भी ली जाएगी।
उनकी शैक्षणिक योग्यता, संपर्क विवरण और बॉयोडेटा जैसी जानकारियाँ शामिल की जाएँगी। पहली बार संयुक्त चिकित्सा सेवा की 2017 की परीक्षा के अभ्यर्थियों के नामों की सूची जारी की थी। UPSC के अनुसार यह प्रतिभा पोर्टल में चयनित हुए अभ्यर्थी भी यूपीएससी परीक्षा में चयनित अभ्यर्थियों के बराबर ही प्रतिभावान हैं जिन्हें बेहतर रोजगार की संभावनाएँ दी जा रही है।
इसके तहत एक पारदर्शी और व्यवस्थित नियुक्ति का आधार तय किया गया है ताकि जिन लोगों को यूपीएससी में मौका नहीं मिल पाया उन्हें अन्य जगहों पर बेहतर अवसर मिल सके और उनकी प्रतिभा का नुकसान न हो।
जो संगठन प्रतिभा पोर्टल पर उम्मीदवारों को नौकरी देने के इच्छुक होंगे, यूपीएससी उन्हें लॉगिन आईडी प्रदान करेगा। इससे ये संगठन उम्मीदवारों के विवरण आसानी से देख सकते हैं। निजी कंपनियाँ भी इसके तहत यूपीएससी पोर्टल के माध्यम से प्रतिभा पोर्टल पर साइनअप कर सकती हैं।
उम्मीदवारों की जानकारी के आधार पर नियोक्ता उन तक आसानी से पहुँच सकते हैं। असल में प्रतिभा सेतु का मुख्य उद्देश्य यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना और भारत और प्रतिभाशाली लोगों की पहुँच बड़े सरकारी और बेहतर निजी संगठनों तक पहुँचाना है।
UPSC में परीक्षा में असफल हो जाने पर अभ्यर्थी इस कदर निराश हो जाते हैं कि वे अवसाद और तनाव के चरम तक पहुँच जाते है। इससे उनकी मेहनत और प्रतिभा का नुकसान तो होता ही है पर साथ ही देश का भी कहीं न कहीं नुकसान होता है। कई लोग ऐसे भी हैं जो एक बार के बाद दूसरी बार परीक्षा देने की स्थिति तक नहीं आ पाते।
साथ ही कई बार अभ्यर्थी के पास परीक्षा देने का आखिरी मौका होता है। इसमें वह अपनी जी जीन से मेहनत करता है। आखिरी चरण तक पहुँचने के बाद भी अगर अंतिम सूची तक में उसका नाम न आए तो अभ्यर्थी के पास किसी अन्य काम को करने के बारे में सोचने के लिए भी कुछ नहीं रह जाता या काफी समय लग जाता है। उन्हे अपना भविष्य गर्त में नजर आने लगता है।
प्रतिभा सेतु से इस तरह के हुनरमंद उम्मीदवारों को वो मौका मिल सकता है कि वह अपने समय को गँवाए बिना समय पर रोजगार के विकल्प तलाश सके और अपनी प्रतिभा को सही जगह इस्तेमाल कर सके।
सागरिका घोष ने ‘द प्रिंट’ पर मोदी सरकार की आलोचना करते हुए एक लेख लिखा है, जिसमें सागरिका घोष ने 11 साल में हुई ‘दुर्घटनाओं’ और प्राकृतिक आपदाओं के लिए भी सरकार को घेरा है। आइए जानते हैं कि सागरिका घोष की बातों में कितनी सच्चाई है।
सागरिका घोष का ‘सच’ और हकीकत: दीदी के चश्मे से देश देखना
सागरिका घोष अपने लेख में मोदी सरकार पर ‘सत्यमेव जयते’ का सम्मान न करने और केवल ‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ पर ध्यान देने का आरोप लगा रही हैं। सागरिका घोष M-O-D-I सिंड्रोम यानी Misinformation, Opacity, Distractions, and Incompetence (गलत सूचना, अस्पष्टता, भटकाव और अक्षमता) का जिक्र कर रही हैं।
लेकिन, सागरिका घोष की अपनी बातों में ही कितनी सच्चाई है, यह हमें देखना होगा। लगता है सागरिका जी को अपनी ‘दीदी’ यानी ममता बनर्जी को छोड़कर कोई और काम करता हुआ पसंद ही नहीं आता।
M-O-D-I सिंड्रोम या टीएमसी का ‘T-R-A-G-E-D-Y’ सिंड्रोम?
सागरिका घोष मोदी सरकार को M-O-D-I सिंड्रोम (Misinformation, Opacity, Distractions, and Incompetence) का शिकार बता रही हैं। लेकिन, अगर हम पश्चिम बंगाल में उनकी ही पार्टी TMC के राज को देखें, तो हमें एक नया और अधिक भयावह सिंड्रोम दिखाई देता है, जो T-R-A-G-E-D-Y (त्रासदी) है।
T (Terror) आतंक का राज- पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के शासनकाल से भी कई गुना ज्यादा अत्याचार TMC के राज में हो रहा है। हिंदुओं की जान की दुश्मन बनी हुई है TMC सरकार। हिंदुओं के घरों पर बम फेंके जाते हैं, पत्थर बरसाए जाते हैं, आग लगाई जाती है। महिलाओं के साथ दुष्कर्म और पुरुषों को मार डालने, उनके प्राइवेट पार्ट देखने जैसी घिनौनी हरकतें आम हैं। मालदा और मुर्शिदाबाद में हिंदुओं को अपने घर छोड़ने पर मजबूर किया गया, राज्यपाल सीवी आनंद बोस को पीड़ितों से मिलने जाना पड़ा। वहीं, संदेशखाली में TMC के गुंडे महिलाओं के साथ रेप-गैंगरेप की घटनाओं को अंजाम देते और टीएमसी महिलाओं को भी हवस का शिकार बनाते। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) और राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की टीमें भी पीड़ितों से मिलीं, जिन्होंने डर और उत्पीड़न की भयावह कहानियाँ सुनाईं।
R (Riot) सुनियोजित दंगे– रामनवमी पर हुई हिंसा सुनियोजित थी, जैसा कि पटना हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस नरसिम्हा रेड्डी की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट में बताया। पुलिस ने खुद पीड़ितों से मिलने जा रही टीम को रोका, यह दिखाता है कि सरकार क्या छुपाना चाहती थी। हावड़ा और बाँकुड़ा में हिंदुओं के जुलूस पर हमला हुआ और उलटा हिंदुओं को ही गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि मुहर्रम के जुलूस में ऐसी हिम्मत नहीं दिखाई जाती।
A (Anarchy) अराजकता और कानून का अभाव- 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद बड़े पैमाने पर राजनीतिक हिंसा हुई। टीएमसी के गुंडों ने भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर हमले किए, उनकी हत्याएँ कीं। हजारों लोग डर के मारे अपने घर छोड़कर भाग गए, जिनमें से कई आज भी विस्थापित हैं। जॉय प्रकाश यादव, कुश खेत्रपाल और अभिजीत सरकार जैसे भाजपा कार्यकर्ताओं की बर्बर हत्याएँ हुईं, जिन पर सागरिका घोष जैसे पत्रकारों की चुप्पी सवाल खड़ा करती है। अभिजीत सरकार की हत्या तो फेसबुक लाइव पर हुई थी। TMC के गुंडों ने परिवारों को जान से मारने की धमकी दी, और मुख्य आरोपित खुले घूम रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी TMC कार्यकर्ताओं के जरिए एक हिंदू परिवार पर हमला करने के मामले में उनकी जमानत रद्द करते हुए इसे ‘लोकतंत्र पर गंभीर हमला’ बताया था।
G (Grooming Jihad) धर्मांतरण का खतरा– सागरिका घोष ने खुद ग्रूमिंग जिहाद के खतरे को ‘मानसिक उन्माद’ यानि पागलपन कहकर खारिज कर दिया, जबकि यह हिंदू परिवारों के लिए एक गंभीर खतरा है। यह दिखाता है कि सागरिका घोष सच्चाई को कैसे तोड़-मरोड़ कर पेश करती हैं और पीड़ितों को ही दोषी ठहराती हैं।
E (Electoral Violence) चुनावी हिंसा का नंगा नाच- चुनावों के बाद TMC की जीत के नशे में चूर गुंडों ने भाजपा समर्थकों को निशाना बनाया, उनके घरों पर हमला किया और उन्हें उजाड़ दिया। यहाँ तक कि केंद्रीय योजनाओं का लाभ भी भाजपा समर्थकों को नहीं मिलता है।
D (Demographic Change) जनसंख्या असंतुलन का खेल- पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठियों को जानबूझकर बसाया जा रहा है, रोहिंग्या मुस्लिमों को आधार कार्ड और घर दिए जा रहे हैं। यह सब वोट बैंक की राजनीति के लिए किया जा रहा है, जिसका सीधा असर राज्य की Demographic पर पड़ रहा है और हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ रहे हैं।
Y (Yield to Lies) झूठ के आगे घुटने टेकना- पश्चिम बंगाल की फिल्म इंडस्ट्री को TMC ने पूरी तरह से कंट्रोल कर रखा है। जो सरकार की तारीफ करता है उसे काम मिलता है, विरोधियों को बाहर कर दिया जाता है। भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने खुद बताया है कि कैसे उन्हें काम नहीं मिलता क्योंकि वह भाजपा में हैं। राष्ट्रीय मीडिया में पश्चिम बंगाल की हिंसा को उस स्तर की कवरेज नहीं मिलती, क्योंकि TMC सरकार सच्चाई को दबाने का काम करती है।
दुर्घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं पर बचकानी सोच
सागरिका घोष ने अहमदाबाद विमान दुर्घटना, ट्रेन पटरी से उतरने और कुंभ मेले में भगदड़ जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है। सागरिका घोष का यह तर्क कि ऐसी दुर्घटनाएँ और प्राकृतिक आपदाएँ (जैसे कोविड-19 से हुई मौतें) सीधे सरकार की ‘खामियाँ’ हैं, पूरी तरह से बेतुका और बचकाना है।
क्या किसी सरकार का कंट्रोल विमान दुर्घटनाओं या कुंभ जैसे बड़े आयोजनों में होने वाली भगदड़ पर हो सकता है, जब लाखों लोग एक साथ आते हैं? ऐसी घटनाएँ दुनिया भर में होती हैं और अक्सर नियति और अप्रत्याशित परिस्थितियों के अधीन होती हैं।
यह तो भगवान की माया और नियति का खेल है, जिसे किसी भी सरकार के पाले में डालना नासमझी और बचकानापन है। यदि सागरिका जी यह मानती हैं कि उनकी ‘ममता दीदी’ के राज में ऐसी दुर्घटनाएँ नहीं होतीं या प्राकृतिक आपदाएँ नहीं आतीं, तो यह उनकी संकीर्ण सोच का प्रमाण है।
कोविड-19 के आँकड़ों पर आरोप
कोविड-19 से हुई मौतों के आँकड़ों को लेकर भी सागरिका घोष ने सवाल उठाए हैं। यह सच है कि वैश्विक महामारी के दौरान आँकड़ों को लेकर बहस हुई है, लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि ऐसी अभूतपूर्व स्थिति में सटीक आँकड़ों का संग्रह एक जटिल चुनौती थी।
सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए हर संभव प्रयास किया, और दुनिया के कई देशों में भी ऐसे ही आँकड़े सामने आए थे, जो बाद में संशोधित हुए। क्या वह यह कहना चाह रही हैं कि दुनिया की किसी भी सरकार ने कोविड से हुई मौतों के सही आँकड़े नहीं दिए?
क्या सागरिका घोष ममता दीदी को भारत का पीएम बनाने का सपना देख रही हैं?
सागरिका घोष को तृणमूल कॉन्ग्रेस ने राज्यसभा भेजा है। उनके पति राजदीप सरदेसाई को ‘रसगुल्ला पत्रकारिता’ के लिए जाना जाता है, जिन्होंने ममता बनर्जी से पश्चिम बंगाल की हिंसा पर कभी कड़े सवाल नहीं पूछे, ताकि उनके ‘चाय पर चर्चा’ में ‘रसगुल्ले’ मिलते रहें। यह सब देखकर तो यही लगता है कि सागरिका घोष ममता दीदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाने का ख्वाब देख रही हैं।
लेकिन, क्या उन्हें यह नहीं दिखता कि जिस ममता दीदी के राज में हिंदुओं का अस्तित्व खतरे में है, महिलाएँ असुरक्षित हैं, और पूरी कानून-व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, वह भारत को कैसे चला सकती हैं? क्या उनका सपना भारत को एक इस्लामी मुल्क बनाने का है, जहाँ हिंदुओं को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जाए?
जिस सरकार के राज में रामनवमी के जुलूस पर पत्थरबाजी होती है, धर्मांतरण के खतरे को ‘मानसिक उन्माद’ यानि पागलपन बताया जाता है, और अपने ही नागरिकों को घर छोड़ने पर मजबूर किया जाता है, क्या ऐसी सरकार देश को आगे ले जा सकती है?
आईना देखना जरूरी है
सागरिका घोष मोदी सरकार पर ‘झूठ’ बोलने और ‘जवाबदेही से बचने’ का आरोप लगा रही हैं। लेकिन, उन्हें सबसे पहले कहीं और झांकना होगा। जिस पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा है, वह पश्चिम बंगाल में अराजकता, हिंसा और तुष्टिकरण का प्रतीक बन चुकी है।
भारत में मोदी सरकार ने विकास के कई आयाम गढ़े हैं, चाहे वह सड़कें हों, एयर पोर्ट हों या डिजिटल इंडिया का सपना। हाँ, कोई भी सरकार पूर्ण नहीं होती और गलतियाँ भी होती हैं, लेकिन उन्हें ऐसे पेश करना जैसे हर आपदा और दुर्घटना के लिए सिर्फ सरकार जिम्मेदार है, यह निराधार और राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है।
भारत की जनता मोदी के कामकाज से प्रेरित होकर उन्हें वोट देती है, जबकि ममता दीदी दादागिरी करके वोट छीनती हैं।
सागरिका घोष जी, आपको यह समझना होगा कि पत्रकारिता का धर्म सच्चाई दिखाना होता है, न कि किसी विशेष राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा देना। अगर आपको ‘M-O-D-I सिंड्रोम’ दिखाई देता है, तो अपनी ही पार्टी के ‘T-R-A-G-E-D-Y सिंड्रोम’ पर भी नजर डालनी चाहिए।
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में एक बार फिर हिंदू समुदाय के उत्पीड़न का मामला सामने आया है। सिंध प्रांत के शाहदादपुर शहर में चार हिंदू भाई-बहनों जिया बाई (22 साल), दिया बाई (20 साल), दिशा बाई (16 साल) और उनके चचेरे भाई हरजीत कुमार (13 साल) का अपहरण कर लिया गया। इन मासूम बच्चों को जबरन इस्लाम मजहब अपनाने के लिए मजबूर किया गया।
इस मामले में हिंदुओं ने विरोध-प्रदर्शन किया और मामले को मीडिया में उठाया, जिसके बाद बैकफुट पर आए प्रशासन ने चारों बच्चों को बरामद कर लिया। हालाँकि उनका अपहरण करने वाले आरोपितों को कोर्ट ने बरी कर दिया।
यही नहीं, कोर्ट ने 2 बालिग लड़कियों को सेफ हाउस भिजवा दिया, तो 2 नाबालिग बच्चों की कस्टडी के लिए माँ-बाप से ही 10-10 मिलियन पाकिस्तानी रूपए यानी 1-1 करोड़ पाकिस्तानी रुपए का बॉन्ड भरवाया, ताकी दोनों बच्चों की घर वापसी न कराई जा सके और वो इस्लाम की प्रैक्टिस करते रहें। यानी हिंदू माँ-बाप अपने ही जबरन मुस्लिम बनाए गए बच्चों को इस्लामी तरीके से पालते रहें और इसकी गारंटी भी दें कि वो हिंदू नहीं बनेंगे।
कोर्ट के ऑर्डर की कॉपी (फोटो साभार: X_SindhHindu)
क्या है पूरा मामला
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये घटना सिंध प्रांत के शाहदादपुर शहर की है, जो हिंदुओं की छोटी-मोटी आबादी वाला इलाका है। जिया, दिया, दिशा और हरजीत एक साधारण हिंदू परिवार से हैं। जिया और दिया मेडिकल की पढ़ाई कर रही हैं, जबकि दिशा 10वीं कक्षा की छात्रा है। हरजीत जो सिर्फ 13 साल का है, स्कूल में 8वीं कक्षा में पढ़ता है।
एक दिन ये चारों बच्चे अचानक गायब हो गए। परिवार ने आस-पास तलाश की, लेकिन कुछ पता नहीं चला। फिर खबर मिली कि बच्चों को शाहदादपुर से कराची ले जाया गया है। माँ ने स्थानीय पुलिस में शिकायत दर्ज की और बताया कि एक कंप्यूटर शिक्षक फरहान खासखेली ने बच्चों को बहलाकर उनका अपहरण किया।
माँ का कहना था कि फरहान ने पहले बच्चों से दोस्ती की, खासकर जिया और दिया से, जो उसकी कोचिंग क्लास में जाती थीं। उसने बच्चों को नौकरी और बेहतर जिंदगी का लालच दिया और फिर मौका पाकर उन्हें अगवा कर लिया।
This is no isolated case systematic forced conversions target Sindhi #Hindus.
Three Hindu sisters—Disha, Diya, Jiya plus brother Vikash & cousin Ganesh abducted at gunpoint in Shahdadpur, Sindh??. Found in Karachi police station, claimed to have “willingly converted into… pic.twitter.com/DXtpl0NCtc
कुछ घंटों बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें चारों बच्चे दिख रहे थे। वीडियो में वे कह रहे थे कि उन्होंने अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल किया है। लेकिन परिवार और हिंदू समुदाय का कहना है कि बच्चे डरे हुए थे और उन्हें जबरन ऐसा कहने के लिए मजबूर किया गया। खासकर 13 साल के हरजीत को देखकर माँ का दिल टूट गया।
Abducted, Coerced, “Converted” ? Three Hindu sisters—Disha, Diya, and Jiya—along with their brother Vikash and cousin Ganesh were reportedly abducted at gunpoint in Shahdadpur, Sindh??. Day later, they were found in Nazim abad Police station Karachi, where police claimed they… pic.twitter.com/8IKFVEhWQ2
— Hindu Sindh हिंदू सिंध…هندو سنڌ (@SindhHindu) June 20, 2025
बच्चे की माँ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में रोते हुए कहा, “मेरा बेटा इतना छोटा है, उसे धर्म की क्या समझ? मेरी बेटियों को मुझसे छीन लिया गया।” माँ ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो जरदारी से मदद की गुहार लगाई।
?HINDU GIRLS FORCED TO CONVERT IN ISLAM?
Three minor Hindu girls and a boy were abducted and converted to Islam in Shahdadpur, Sindh, Pakistan.
Their mothers are mourning and pleading with Bilawal Bhutto to return their daughters.
हिंदू समुदाय के विरोध और प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पुलिस ने हरकत में आई। पुलिस ने बताया कि उन्होंने बच्चों को हैदराबाद से छुड़ाया और एक संदिग्ध को पकड़ा। लेकिन परिवार का कहना है कि पुलिस ने शुरू में कोई मदद नहीं की और उल्टा उन्हें धमकाया। अदालत में बच्चों को पेश किया गया। जिया और दिया, जो बालिग थीं, ने कहा कि वे अपनी मर्जी से इस्लाम कबूल करना चाहती हैं। लेकिन परिवार का दावा है कि वे दबाव में थीं।
नाबालिग दिशा और हरजीत को माता-पिता को सौंप दिया गया। हालाँकि इसके लिए 2 करोड़ पाकिस्तानी रुपए बतौर बॉन्ड भरने का भी आदेश दिया गया है।
Shahdadpur conversion case, three Hindu sisters and their male cousin were presented in a local court under heavy police presence. The court decided to hand over the a minor girl and the boy to their parents, while the two adult girls were sent to a safe house. #sindhmatterspic.twitter.com/2yUVCXiBJV
— Sindh Matters – سندھ میٹرز (@SindhMatters) June 20, 2025
हालाँकि अदालत ने दोनों आरोपितों फरहान खासखेली और जुल्फिकार खासखेली को अपहरण और जबरन धर्मांतरण के आरोपों से बरी कर दिया। इस फैसले से पीड़ित परिवार और हिंदू समुदाय में निराशा छा गई।
हिंदू पंचायत के प्रमुख राजेश कुमार ने इसे ‘सांस्कृतिक आतंकवाद’ कहा। उन्होंने बच्चों की तस्वीरें दिखाते हुए सवाल उठाया, “क्या ये बच्चे इतने समझदार हैं कि धर्म बदलने का फैसला ले सकें? यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समुदाय का दुख है।”
ये मामला इतना गंभीर था कि सिंध मानवाधिकार कमीशन ने भी इस पर संज्ञान लिया। तो सिंध असेंबली में भी मामला उठा। हालाँकि कोर्ट का आदेश साफ बता रहा है कि हिंदुओं के साथ न्याय तो नहीं ही हो सकता, इसके बदले उन्हें अपने बच्चों को पाने के लिए भी 2 करोड़ पाकिस्तानी रुपए बतौर बॉन्ड भी भरना पड़ेगा।
— Sindh Human Rights Commission (SHRC) (@SHRC_official) June 19, 2025
पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ अत्याचार कोई नई बात नहीं
पाकिस्तान में हिंदुओं के साथ अत्याचार कोई नई बात नहीं है। खासकर सिंध और पंजाब के ग्रामीण इलाकों में, जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हैं.. वहाँ ऐसी घटनाएँ आम हैं। हिंदू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण, जबरन इस्लाम कबूल करवाना और उनका निकाह करवाने की घटनाएँ लगातार होती रहती हैं। हिंदू पंचायत के अनुसार, हर साल सैकड़ों हिंदू लड़कियों का अपहरण होता है और उनमें से ज्यादातर मामलों में कोई कार्रवाई नहीं होती।
अपहरण और जबरन धर्मांतरण: सिंध के बदिन, घोटकी, और शाहदादपुर जैसे इलाकों में हिंदू लड़कियों को निशाना बनाया जाता है। अक्सर स्थाानीय प्रभावशाली लोग या मजहबी कट्टरपंथी गरीब हिंदू परिवारों की लड़कियों को बहलाते हैं, लालच देते हैं या डराते हैं। इसके बाद उनका धर्म परिवर्तन करवाकर निकाह कर लिया जाता है। ऐसी लड़कियों की उम्र ज्यादातर 12 से 20 साल होती है। कई बार तो 10 साल की बच्चियों को भी नहीं छोड़ा जाता।
न्याय नहीं मिलता: पुलिस और अदालतें ज्यादातर ऐसे मामलों में ढीला रवैया अपनाती हैं। अगर परिवार गरीब या कमजोर हो, तो उनकी सुनवाई नहीं होती। राजेश कुमार ने बताया कि सिर्फ उन्हीं मामलों में कार्रवाई हो पाती है, जिनमें पीड़ित बच्चे प्रभावशाली परिवारों से होते हैं। गरीब हिंदुओं को पाकिस्तान में इंसाफ नहीं मिलता।
सामाजिक दबाव: धर्म परिवर्तन के बाद लड़कियों को उनके परिवार से मिलने की इजाजत नहीं दी जाती। कई बार उन्हें धमकाया जाता है कि अगर वे अपने परिवार के पास गईं, तो उनकी जान को खतरा होगा। इससे परिवार पूरी तरह टूट जाता है।
तेजी से घटती हिंदू आबादी: पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी लगातार कम हो रही है। साल 1947 में आजादी के समय, पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी लगभग 15-20% थी। आज यह घटकर केवल 2-3% रह गई है। इसका सबसे बड़ा कारण है उत्पीड़न, भेदभाव और जबरन धर्मांतरण। सिंध जहाँ हिंदुओं की आबादी थोड़ी ज्यादा है (लगभग 8-10%), वहाँ भी हालात बदतर हैं। हिंदू समुदाय के लोग डर के मारे या तो देश छोड़कर भारत चले जाते हैं या चुपचाप अत्याचार सहते हैं।
आर्थिक और सामाजिक भेदभाव: हिंदुओं को नौकरियों, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कई हिंदू परिवार गरीबी और सामाजिक बहिष्कार के कारण कमजोर हो गए हैं।
पलायन: हर साल हजारों हिंदू परिवार भारत या अन्य देशों में शरण लेते हैं। लेकिन उनके लिए नई जगह पर बसना आसान नहीं होता। जो लोग रह जाते हैं, वे डर और असुरक्षा में जीते हैं।
सांस्कृतिक पहचान पर खतरा: जबरन धर्मांतरण और अपहरण की घटनाएँ हिंदुओं की सांस्कृतिक पहचान को मिटाने की कोशिश हैं। मंदिरों पर हमले, धार्मिक त्योहारों पर पाबंदी और सामुदायिक उत्पीड़न से हिंदू समुदाय का मनोबल टूट रहा है।
पाकिस्तान के जन्म से चला आ रहा हिंदुओं का उत्पीड़न, अपहरण, जबरन धर्मांतरण और तेजी से घटती उनकी आबादी दिखाती है कि हिंदुओं के लिए पाकिस्तान में इंसाफ और सुरक्षा एक सपना है। जरूरी है कि दुनिया इस मसले पर आवाज उठाए और हिंदू समुदाय को वह सम्मान और हक मिले, जो हर इंसान का अधिकार है। चार भाई-बहनों का अपहरण और जबरन धर्मांतरण पाकिस्तान में हिंदुओं की स्थिति को साफ बता देता है।
सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि पुलिस और अदालतें ऐसे मामलों में इंसाफ नहीं देतीं। यह व्यवस्थित उत्पीड़न का सबूत है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठनों को इस पर ध्यान देना चाहिए। पाकिस्तान सरकार को चाहिए कि हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए सख्त कानून बनाए और उन्हें लागू करे। ताकि कोई भी डर के बिना अपनी आस्था और पहचान के साथ जी सके।
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) पर जब मैं टीवी, समाचार और सोशल मीडिया के माध्यम से चारों ओर लाखों-करोड़ों लोगों को एक साथ योग करते देखती हूँ, तो मेरे स्कूल के दिन आँखों के सामने तैर जाते हैं। यह नज़ारा अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विदेशों में भी योग का जलवा है।
मेरे लिए यह किसी अद्भुत कहानी से कम नहीं, क्योंकि आज से 10-15 साल पहले योग को उस नजरिए से देखा ही नहीं जाता था, जैसा आज इसे देखा जा रहा है। 1 दशक पहले जहाँ योग को ऋषि मुनियों की तपस्या का हिस्सा माना जाता था, वहीं आज इसे जन-जन की जरुरत और दिनचर्या माना जा रहा है।
कुछ लोग योग को एक धंधा बना चुके हैं, वहीं बड़ी सँख्या में लोग इसे सकारात्मक रूप से अपनाकर दूसरों को जागरूक करने में लगे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस योग दिवस पर 40 देशों के करीब 3 लाख लोगों के साथ मिलकर योग किया। लेकिन मैं पीएम मोदी की एक बात से बिल्कुल सहमत हो चुकी हूँ। पीएम ने संदेश दिया कि योग की कोई सीमा नहीं है, यह सभी का है और सभी के लिए है, और अशांत दुनिया में शांति का रास्ता दिखाता है।
पहले और अब के योग में बड़ा अंतर: मेरी नज़र से
मुझे आज भी याद है, जब मैं छठी से 12वीं क्लास तक स्कूल में योग करती थी और प्रतियोगिताओं में सर्टिफिकेट भी जीतती थी। तब योग मेरे लिए बस एक ‘विषय’ था – पढ़ाई-लिखाई का एक हिस्सा, जिससे मैं सक्रिय रहती थी, मेरा शरीर स्वस्थ रहता था, दिमाग तेज होता था और चेहरे पर चमक भी आती थी। मेरी मासूम सी सोच थी कि योग से बस चर्बी नहीं बढ़ती और लंबी उम्र तक जवान रहा जा सकता है।
लेकिन उस दौर में समाज में योग को लेकर आज जैसी जागरूकता नहीं थी। लोग इसे ज्यादातर ऋषि-मुनियों की साधना या कुछ खास, आध्यात्मिक लोगों का काम मानते थे। आम आदमी के लिए योग करना कई बार एक मुश्किल या बोझ जैसा लगता था।
एक दशक पहले योग के फायदे इतने खुलकर सामने नहीं आए थे, और न ही लोग इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने के लिए इतने उत्सुक थे।
योग क्रांति: एक वैश्विक आवश्यकता और नए अवसर
फिर आया ‘योग क्रांति’ का दौर। 21 जून 2015 को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर साल अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की पहल की, तब से योग के प्रति लोगों की सोच में सचमुच एक बड़ा बदलाव आया है।
आज योग सिर्फ एक व्यायाम नहीं, बल्कि एक जीवनशैली बन गया है। अब यह किसी मजबूरी की तरह नहीं, बल्कि हमारे स्वस्थ रहने के लिए एक बड़ी आवश्यकता के रूप में देखा जाता है। पहले जहाँ योग कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित था, आज यह एक वैश्विक आंदोलन बन चुका है।
पीएम मोदी की इस पहल का ही नतीजा है कि आज दुनिया के कोने-कोने में, पहाड़ों से लेकर समंदर तक, लोग योग का अभ्यास कर रहे हैं। पीएम मोदी ने बताया कि जब उन्होंने 2015 में इस दिवस की बात की थी, तब 175 देश उनके साथ खड़े थे। आज उन्हें खुशी है कि योग लोगों के जीवन का हिस्सा बन गया है।
अब तो दिव्यांग साथी ब्रेल में योग शास्त्र पढ़ा रहे हैं, और गाँवों में भी लोग योग ओलंपियाड में भाग ले रहे हैं। योग का महत्व कोविड महामारी के दौरान और भी स्पष्ट हुआ। लोगों ने तन-मन को स्वस्थ रखने के लिए इसमें विश्वास जताया।
लॉकडाउन के बाद, पार्कों में योग कक्षाओं की संख्या बढ़ी, और कई योग केंद्र ऑनलाइन व ऑफलाइन मोड में सामने आए। इससे न केवल लोगों को फिट रहने में मदद मिली, बल्कि योग एक करियर और रोजगार के बड़े क्षेत्र के रूप में भी उभरा है।
दीप्ति कुलश्रेष्ठ और प्रीति वर्मा जैसी योग शिक्षिकाएँ, जो वर्षों से इस क्षेत्र में हैं, बताती हैं कि पीएम मोदी के प्रयासों से योग को आज जो लोकप्रियता मिली है, वह अभूतपूर्व है। लोग अब योग को पुरानी बात नहीं मानते, बल्कि इसकी ज़रूरत महसूस कर रहे हैं। यहाँ तक कि जनसंपर्क जैसे अन्य क्षेत्रों में कार्यरत लोग भी अब योग कक्षाएँ दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें इसमें अपार संभावनाएँ दिख रही हैं।
योग: स्वास्थ्य, पहचान और कमाई का जरिया
आज के डिजिटल युग में, सोशल मीडिया पर योग वीडियो की बाढ़ आ गई है। लोग योग करके अपनी दिनचर्या साझा कर रहे हैं, दूसरों को प्रेरित कर रहे हैं, और बहुत से लोग इसे कमाई का जरिया भी बना रहे हैं। योग अब ‘मी टू वी’ (मैं से हम तक) के भाव को समझा रहा है, जहाँ यह एक व्यक्तिगत अभ्यास से बढ़कर वैश्विक साझेदारी का माध्यम बन रहा है। भारत अपने योग विज्ञान को आधुनिक रिसर्च से जोड़कर इसका और प्रचार-प्रसार कर रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी का आह्वान है कि हम सब मिलकर योग को एक जन आंदोलन बनाएँ। एक ऐसा आंदोलन जो दुनिया को शांति, स्वास्थ्य और समरसता की ओर ले जाए। जहाँ हर व्यक्ति योग से अपने दिन की शुरुआत करे और