उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इसी कड़ी में राज्य का चुनावी मूड भाँपने को विभिन्न मीडिया संस्थान कार्यक्रमों का आयोजन कर रहे हैं। ऐसा ही एक कार्यक्रम इंडिया टीवी की ओर से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में बुधवार (29 सितंबर 2021) को आयोजित किया गया। इस दौरान जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने प्रदेश की योगी सरकार पर जमकर हमला बोला।
इंडिया टीवी के ‘चुनाव मंच’ कार्यक्रम में मदनी ने कहा, “योगी सरकार में मुसलमान दबा हुआ महसूस कर रहा है। मुसलमानों को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। मुसलमानों को इस दौर से निकालने की जिम्मेदारी सरकार की है।” उन्होंने यह भी दावा किया कि मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए मुसलमानों की बात की जाती है। हर बात को सांप्रदायिक रंग दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जो मुसलमानों के साथ होने का दावा करते हैं, वे भी मुसलमानों के साथ नहीं हैं। साथ ही दोहराया कि हिंदुस्तान में मुसलमानों को अपनी वफादारी साबित करने की जरूरत नहीं।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने ‘जिहाद’ का भी बचाव किया। उन्होंने कहा कि जिहाद मुस्लिमों के ऊपर फर्ज है। वे इससे इनकार नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, “हम जिहाद करेंगे। जिहाद हमारी जिम्मेदारी है।” मदनी ने कहा कि अगर मीडिया साथ दे तो लोगों को जिहाद का सही मकसद समझाया सकता है।
उन्होंने कहा कि मुसलमानों की सबसे बड़ी कमजोरी है कि वे लाइक माइंडेड लोगों को अपने साथ जोड़ने में असफल हो रहे हैं। इसके अलावा उनका खुद का भी नजरिया ऐसा है, जिसकी वजह से वे आपस में बँट जाते हैं। बाहर वालों को ताकत भी इसी रवैए की वजह से मिलती है। तालिबान को लेकर मदनी ने कहा, “अगर तालिबान किसी जगह आए हैं तो इस पर भारत को और भारत के लोगों को ऐतराज करने का हक है। लेकिन आप एक बार उसको देखिए तो कि क्या हो रहा है, मुसलमानों से यह सवाल करेंगे?”
पाकिस्तान में हाल में उस समय खलबली मची जब खबर आई कि पाकिस्तान क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान इंजमाम उल हक को हार्ट अटैक आ गया है। सोशल मीडिया पर हर जगह उनके लिए दुआ पढ़ी जाने लगी। शाम तक देखा गया कि भारत से हर्षा भोगले और सचिन तेंदुलकर जैसे लोग भी इंजमाम के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए ट्वीट कर चुके थे।
ये सारे लोग पाकिस्तान की मीडिया रिपोर्ट्स पर यकीन कर रहे थे। इन्हें क्या मालूम था कि पाकिस्तानी मीडिया बिन सिर पाँव के खबरें चलाने में माहिर है जो जानकारी देने से पहले इतनी जहमत भी नहीं उठाता कि उसकी प्रमाणिकता जाँच ली जाए।
नीचे देख सकते हैं कि क्रिकविक के ट्वीट में जानकारी दी गई है कि सचिन तेंदुलकर ने इंजमाम के जल्दी स्वस्थ होने की कामना की है और इसमें हार्ट अटैक की बात साफ लिखी है। अब ये क्रिकविक खलीफ टेकनॉलजी का है और खलीफ टेकनॉलजी का एक ऑफिस लाहौर में है।
इसी तरह डॉन, जो कि पाकिस्तान का जाना माना समाचार स्रोत है, उसमें भी देख सकते हैं कि इंजमाम के हार्ट अटैक की खबर छापी गई है।
अब अपने ही देश की मीडिया के इस गैर जिम्मेदाराना रवैये को देख आज इंजमाम उल हक को खुद लोगों के सामने आना पड़ा। 51 वर्षीय इंजमाम ने अपने यूट्यूब चैनल पर बताया कि उन्हें कोई हार्ट अटैक नहीं आया है बल्कि वो अपनी पेट की खराबी के कारण अस्पताल गए थे।
हाँ, इस सफाई के साथ उन्होंने कहा कि पेट के इलाज के दौरान कुछ उनमें कुछ दिल संबंधी परेशानियाँ देखी गईं। लेकिन ये हार्ट अटैक नहीं था। 120 टेस्ट और 378 एक दिवसीय मैच खेलने वाले इंजमाम प्राइवेट अस्पताल में भर्ती हुए थे।
उन्होंने सफाई देते हुए कहा, “मैंने रिपोर्ट देखी कि मुझे दिल का दौरा पड़ा था। ऐसा कुछ नहीं है। मैं रूटीन जाँच के लिए अपने डॉक्टर के पास गया, जिन्होंने कहा कि वे एंजियोग्राफी करना चाहते हैं। एंजियोग्राफी के दौरान, उन्होंने देखा कि मेरी धमनी अवरुद्ध थी, इसलिए उन्होंने उस समस्या को कम करने के लिए स्टेंट डाले। यह सफल रहा और आसानी से हो गया। अस्पताल में 12 घंटे के बाद मैं वापस घर आ गया और अब अच्छा महसूस कर रहा हूँ। मुझे अच्छा लग रहा है।”
इंजमाम ने बताया कि उन्हें थोड़ा अजीब लग रहा था इसलिए वो डॉक्टर पर गए। ये चीज दिल के आस पास नहीं थी। लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि अगर वो चेक अप में लेट करते तो ये उनके दिल को डैमेज कर सकता था। अपनी इस वीडियो में इंजमाम ने उनकी स्वास्थ्य संबंधी अफवाहों को खारिज करते हुए देश विदेश से की गई दुआओं के लिए शुक्रिया अदा किया और अपील की कि अगर किसी को अपनी सेहत थोड़ी भी नासाज लगे तो वो डॉक्टर से संपर्क करने में हिचकें न।
एआईएमआईएम (AIMIM ) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ IAS अधिकारी मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन का समर्थन किया है। हाल ही में मोहम्मद इफ्तिखारुद्दीन का धर्मांतरण गैंग से कनेक्शन सामने आया है। ओवैसी ने कहा, ”IAS को धर्म के आधार पर निशाना बनाया गया है। उन्हें मुस्लिम होने की वजह से निशाना बनाया गया।”
ओवैसी ने ट्वीट किया, ”उत्तर प्रदेश सरकार ने वरिष्ठ आईएएस के 6 साल पुराने वीडियो की जाँच करने के लिए एसआईटी (SIT) का गठन किया। यह वीडियो उस समय का है जब यह सरकार सत्ता में भी नहीं थी। इससे यह स्पष्ट है कि उन्हें धर्म के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है।”
Uttar Pradesh govt set up an SIT to ‘investigate’ a 6 year old video of senior IAS Iftekhar sb. The video has been taken out of context & is from a time when this govt wasn’t even in power. This is blatant targeted harassment based on religion 1/2
उन्होंने आगे लिखा, ”अगर पैरामीटर यह है कि किसी भी अधिकारी को धार्मिक गतिविधि से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, तो कार्यालयों में सभी धार्मिक प्रतीकों/छवियों के इस्तेमाल पर रोक लगाएँ। यदि घर में अपने धर्म की चर्चा करना अपराध है तो सार्वजनिक धार्मिक उत्सव में भाग लेने वाले हर अधिकारी को दंडित करें। यह दोहरा मापदंड क्यों?”
If the parameter is that no officer should be connected to religious activity then prohibit use of all religious symbols/images in offices. If merely discussing faith at home is a crime then punish any officer participating in public religious celebration Why double standards?2/2
हाल ही में उत्तर प्रदेश स्थित कानपुर के वरिष्ठ IAS इफ्तिखारुद्दीन के 3 वीडियो वायरल हुए हैं, जिसमें वो कथित रूप से मंडलायुक्त पद पर तैनाती के दौरान सरकारी आवास में मुस्लिम कट्टरपंथियों को बुलाकर धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने वाले पाठ पढ़ा रहे हैं। उन पर अपने पद का दुरुपयोग करते हुए इस्लामी कट्टरता को बढ़ावा देने के आरोप लगे हैं। ‘मठ मंदिर समन्वय समिति’ ने इस बाबत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शिकायत की थी।
गौरतलब है कि सीएम योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में यह प्रकरण आने के बाद वीडियो की जाँच के लिए SIT का गठन किया गया है। एसआईटी के अध्यक्ष डीजी सीबीसीआईडी जीएल मीणा हैं एवं सदस्य एडीजी कानपुर जोन भानु भास्कर हैं। यह मामले की जाँच करके 7 दिन में शासन को अपनी रिपोर्ट देंगे। इस प्रकरण पर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भी नाराजगी जताई है।
वेदवर्धन तीर्थ स्वामी के तौर पर नामित 16 वर्षीय स्वामी अनिरुद्ध सरलथया उडुपी के शिरूर मठ के पीठाधिपति बने रहेंगे। कर्नाटक हाई कोर्ट ने उनकी नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने बुधावार (29 सितंबर 2021) को बाल संन्यास की वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि 18 वर्ष से पहले किसी व्यक्ति के संन्यास ग्रहण करने पर न तो धर्म प्रतिबंध लगाता है और न ही संविधान में इस पर प्रतिबंध है।
कार्यवाहक चीफ जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस सचिन शंकर मखदूम की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा, “संन्यास/भिक्षा दिए जाने की उम्र को लेकर कोई नियम नहीं है। 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति के संन्यास दीक्षा पर रोक लगाने को लेकर कोई कानून भी नहीं है। एमिक्स क्यूरी की दलीलों से यह भी स्पष्ट है कि धर्म 18 साल की उम्र से पहले संन्यासी बनने की अनुमति देता है। अन्य धर्मों में भी मसलन बौद्ध धर्म में कम उम्र के बच्चे भिक्षु बनते रहे हैं।”
अदालत ने इस याचिका के निपटारे के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता एसएस नागानंद को एमिकस क्यूरी के रूप में नियुक्त किया था। याचिका शिरूर मठ भक्त समिति (उडुपी) के सचिव और प्रबंध न्यासी पीएल आचार्य तथा अन्य पदाधिकारियों की ओर से दायर की गई थी।
याचिका में बाल संन्यास को बाल श्रम के समान बताते हुए कहा था कि यह नाबालिग को ‘भौतिक जीवन के परित्याग’ के लिए मजबूर करता है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन है। लिहाजा नाबालिग का मुख्य पुजारी के तौर पर अभिषेक करना उसे वह करने के लिए मजबूर करने के समान जो उसकी उम्र के अनुकूल नहीं है।
एमिकस क्यूरी ने अदालत को बताया कि मुख्य पुजारी का 18 वर्ष से कम होना महज संयोग है। बाल संन्यास ग्रहण करने को लेकर उम्र की सीमा नहीं और न यह बच्चे पर संन्यास थोपने जैसा है। दीक्षा लेने वाला व्यक्ति और उसके माता-पिता की सहमति के बगैर संन्यास की दीक्षा नहीं दी जाती है। अदालत ने उनके तर्कों को मानते हुए बाल संन्यास को वैधानिक माना। इससे पहले इस मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने शंकराचार्य के 12 साल की उम्र में स्वामी बनने का भी हवाला दिया था। राज्य सरकार के वकील ने भी इस याचिका को सुनवाई के योग्य नहीं बताते हुए विरोध किया था। उल्लेखनीय है कि शिरूर मठ के प्रमुख श्री लक्ष्मीवरा तीर्थ स्वामी का 2018 में निधन हो गया था।
झारखंड के जमशेदपुर में विश्व हिंदू परिषद ने 19 सितंबर 2021 को एक इमामबाड़ा में लोहे की चेन से बाँधकर रखी गई हिंदू लड़की को मुक्त कराया। यह इमामबाड़ा बिष्टुपुर थाने के बोधनवाला गैरेज के पीछे बह रही खरकई नदी के किनारे स्थित है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, लड़की को उसके माता-पिता भूत-प्रेत के शक में इमामबाड़ा लाए थे। वहाँ पर पीड़िता को रफीक नाम के इमामबाड़ा के मौलवी ने बाँधकर रखा था। विश्व हिंदू परिषद के लोगों ने पीड़िता को उसके चंगुल से आजाद करने के बाद पुलिस के हवाले कर दिया।
24 वर्षीय युवती परसुडीह के मक्कड़पुर स्थित मुंशी मोहल्ले की रहने वाली है। उसके परिवार वालों को शक था कि उस पर भूत सवार है। वे उसे इलाज के लिए इमामबाड़ा ले गए, जहाँ मौलवी रफीक ने उसे जंजीरों से बाँध दिया।
लड़की पिछले एक महीने से ‘भूत भगाने’ के दौर से गुजर रही थी। इस दौरान उसके पिता उसके साथ थे। लड़की का आरोप है कि भूत भगाने की प्रक्रिया के दौरान रफीक ने उसके साथ मारपीट की थी।
युवती की स्थिति बेहद खराब
जिस दिन लड़की को बचाया गया उस दिन विश्व हिंदू परिषद जमशेदपुर महानगर के जिलाध्यक्ष अजय गुप्ता ने मीडिया को बताया कि इमामबाड़ा में लड़की बेहद दयनीय स्थिति में मिली थी। उन्होंने आरोप लगाया कि लड़की के माता-पिता का धर्मान्तरण कराने के लिए ब्रेनवॉश किया गया था। उन्होंने कहा कि लड़की के पिता और सौतेली माँ संगठन का सहयोग करने के बजाय इमामबाड़ा के मौलवी का पक्ष ले रहे थे।
अजय गुप्ता ने कहा, “हम मानते हैं कि इमामबाड़ा में लड़की का यौन उत्पीड़न किया गया था। हमारे पास लड़की का ऑन-रिकॉर्ड स्टेटमेंट है जो आप चाहें तो हम आपको दे सकते हैं। जमशेदपुर के लिए यह दुखद स्थिति है कि इस शांतिपूर्ण क्षेत्र में धार्मिक सद्भाव को बाधित करने के लिए ऐसी घटनाएँ हो रही हैं। प्रशासन को मामले का संज्ञान लेना चाहिए और दोषी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।”
VHP नेता ने कहा, “हमारे पास इमामबाड़ा में लड़की के जंजीरों में जकड़े हुए होने का फुटेज है। हमारी संस्था की सदस्य रितिका बच्ची की काउंसलिंग कर रही थी। हमने लड़की को प्रशासन को सौंप दिया है और वे मामले में आगे अपडेट करेंगे।”
लड़की की छोटी बहन का इलाज इमामबाड़ा में हुआ
इस मामले को लेकर बिष्टुपुर थाने के प्रभारी विष्णु कुमार राउत ने कहा कि लड़की को मेडिकल परीक्षण के लिए भेजा गया है। रिपोर्ट मिलने के बाद पुलिस जाँच करेगी। उन्होंने कहा कि लड़की के पिता ने पुलिस को बताया था कि लड़की की छोटी बहन का इलाज इमामबाड़ा में किया गया था क्योंकि उस पर भी भूत भी था। उसके पिता ने पुलिस को बताया था कि वह इमामबाड़ा में इलाज से ‘ठीक’ हो गई थी।
बच्ची को छुड़ाने इमामबाड़ा पहुँची विहिप
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जानकारी मिलने के बाद जब विश्व हिंदू परिषद के सदस्य इमामबाड़ा पहुँचे तो उन्होंने युवती को जंजीरों में बंधा देखा। उसके चेहरे पर मारपीट के निशान थे। जब उससे इस बाबत पूछा गया कि क्यों बांधा गया है तो पीड़िता ने कहा, “उन्हें लगता है कि मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ। उन्हें लगता है कि मुझमें भूत है।”
वहीं रफीक से इसका कारण पूछा गया तो उसने कहा, “उस पर शैतान का कब्जा है। इसलिए हमने उसे बाँध रखा है। उसने अपने पिता, माँ और भाई के साथ मारपीट की।” वहीं जब विहिप के लोगों ने उससे पूछा कि वह उसके साथ क्या करेगा तो रफीक ने दावा किया कि उस स्थान पर एक ‘अलौकिक शक्ति’ है, जो ऐसे रोगियों का इलाज करती है।
रफीक ने दावा किया कि वहाँ 2004 में कर्बला का निर्माण किया गया था। इस बीच पीड़िता ने रफीक पर उसका यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाया है। जिस वक्त विहिप के लोग लड़की से बात कर रहे थे तो उसी दौरान वहाँ पहुँचे युवती के पिता ने उससे बातचीत नहीं करने को कहा। उन्होंने कहा, “मैं उसका पिता हूँ। उसकी बहन भी यहाँ है।”
पीड़िता की बहन ने कहा, “उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। वह शैतानों के कब्जे में है।” लेकिन जब पीड़िता के पिता से यह पूछा गया कि उन्हें किसने बताया कि उस पर भूत सवार है तो उनके पास कोई उत्तर नहीं था। उसके पिता ने दावा किया, “मुझे किसी ने नहीं बताया। मैं कह रहा हूँ कि उस पर भूत सवार है।”
युवती को जाँच के लिए भेजा गया एमजीएम अस्पताल
फिलहाल युवती को वहाँ से छुड़ाने के बाद उसे इलाज के लिए एमजीएम अस्पताल भेजा गया है। उसके परिवार को काउंसलिंग के लिए अस्पताल ले जाया गया। लड़की के इलाज के बाद उसे मानसिक इलाज के लिए राँची रेफर किया जाएगा।
इस मामले को लेकर डीएसपी पीसीआर अनिमेष गुप्ता ने कहा कि जब लड़की को थाने लाया गया तो वह होश में थी। उसने अपने और अपने परिवार के बारे में सटीक जानकारी दी। उसे अपना नाम और पता ठीक से याद था। उन्होंने कहा, “लड़की को मेडिकल जाँच के लिए भेजा गया है।”
काउंसलिंग के दौरान लड़की का बयान
विश्व हिंदू परिषद की रितिका ने पीड़िता की काउंसलिंग की और उसे आश्वासन दिया कि परिवार पुलिस के सामने कुछ भी कहे, संगठन उसका समर्थन करेगा। काउंसलिंग सेशन के दौरान लड़की ने बताया कि रफीक ने उसे जंजीर से बाँधकर रखा और उसके साथ मारपीट की।
उसने बताया, “वह मुझे एक गिलास पानी देता था और उसके बाद मुझे लगता था कि जैसे मैं बेहोश हो गई, हालाँकि मैं जाग रही थी, लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकती थी। इसके बाद वो मुझे उस जगह पर ले जाता था, जहाँ उसके पास एक दीपक होता था और वो कुछ बुदबुदाता था।”
वहीं जब पीड़िता से यह पूछा गया क्या उसके परिवार ने उसका साथ दिया था, तो उसने इससे इनकार किया। युवती ने कहा, “मुझे मेरे पिता की अनुमति से इमामबाड़ा ले जाया गया।” उसके पिता और बहन ने दावा किया कि इमामबाड़ा में वे हर वक्त पीड़िता के साथ रहते थे। युवती ने यह भी बताया कि उसे बाँधकर रखा गया था, इसलिए वह अपने साथ हुए सुलूक की शिकायत के लिए पुलिस के पास भी नहीं जा पाई।
युवती को पानी में मिला कर दिया ड्रग्स
हिंदू पीठ कार्यालय में दिए गए बयान में लड़की ने कहा कि उसे नशीला पदार्थ मिला हुआ पानी दिया गया था, जिससे वो यह नहीं समझ पा रही थी कि उसके साथ क्या हो रहा है। लड़की ने कहा, “रफीक मुझे जंजीरों से बांधता था और फिर मेरा शारीरिक व यौन शोषण करता था।”
अवैध है इमामबाड़ा
इस घटना की जानकारी के लिए ऑपइंडिया ने हिंदू पीठ के अरुण सिंह और विश्व हिंदू परिषद के गोलू आजाद से संपर्क किया। उन्होंने कहा कि जमशेदपुर जिले में बिष्टुपुर नाम की एक जगह है। वहीं पर नदी के पास हुसैनी कर्बला (इमामबाड़ा) है। उन्होंने दावा किया कि कर्बला अवैध है। उस जगह पर भूत भगाना आम बात है। लोग हर शुक्रवार को यहाँ आते हैं।
उन्होंने कहा, “हमें एक लड़की के बारे में पता चला था, जिसे भूत भगाने के लिए वहाँ बांध दिया गया था। उसके माता-पिता को लग रहा था कि उस पर भूत सवार था। हमें यह भी पता चला कि वह एक अच्छे स्कूल की छात्रा थी। वह पिछले 32 दिनों से इमामबाड़ा में तथाकथित इलाज करवा रही थी। उसका मानसिक और शारीरिक शोषण किया गया। एक स्थानीय संगठन ने हमसे संपर्क किया और हमें लड़की के बारे में बताया।” वे 20 सितंबर की सुबह बच्ची को छुड़ाने वहाँ पहुँचे।
उन्होंने ये भी कहा, “जब हम वहाँ पहुँचे तो हमने उसे जंजीरों में बंधा हुआ देखा। हमने कुछ वीडियो बनाए और उसे रिलीज कर दिया। इसके बाद हमने पुलिस को बुलाया और उसे प्रशासन को सौंप दिया। उसका पहले जिला अस्पताल में इलाज किया गया और फिर आगे के इलाज के लिए राँची रेफर कर दिया गया। सिंह ने आगे कहा कि एक सप्ताह से अधिक समय हो गया है कि उसका मेडिकल किया गया था, लेकिन पुलिस ने उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी।
अरुण सिंह ने यह भी कहा कि इस मामले में हो रही देरी अपने आप में जाँच का विषय है। उन्होंने दावा किया कि ऑपइंडिया से बात करने से 30 मिनट पहले उन्होंने थाना प्रभारी से बात की थी। थाना प्रभारी ने बताया कि अभी रिपोर्ट नहीं मिली है।
जब हमने पूछा कि वे आगे क्या कार्रवाई करने की योजना बना रहे हैं, तो सिंह ने कहा, “प्रशासन ने हमसे कार्रवाई का वादा किया है, इसलिए हम उसकी प्रतीक्षा करेंगे। हालाँकि, अगर वे कोई कार्रवाई करने में विफल रहते हैं तो हम इमामबाड़े के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगे और प्रशासन से कार्रवाई करने का आग्रह करेंगे।”
ऑपइंडिया से बात करते हुए गोलू आजाद ने दावा किया कि पुलिस को कम से कम सात दिन पहले मेडिकल रिपोर्ट मिली थी। उन्होंने कहा, “यह जाँच का विषय है कि बिष्टुपुर थाना पुलिस यौन हमले के मामले में लड़की की मेडिकल रिपोर्ट क्यों जारी नहीं कर रही है। रिपोर्ट निगेटिव या पॉजिटिव आई तो पुलिस यह बताने में क्यों हिचकिचाती है? अगर कोई उनसे रिपोर्ट के बारे में पूछता है तो वे कहते हैं कि यह महत्वपूर्ण नहीं है।”
मामले में पुलिस का बयान
ऑपइंडिया ने बिष्टुपुर पुलिस थाने में इस मामले पर अपडेट लेने के लिए संपर्क किया तो जिस पुलिस अधिकारी ने हमसे बात की, उन्होंने अपना नाम नहीं बताया, लेकिन हमें बताया कि पिता ने लिखित में दिया था कि वह लड़की को खुद इमामबाड़ा ले गया। उस पर कोई दबाव नहीं था। उन्होंने कहा कि रफीक के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है।
हालाँकि, अभी तक स्पष्ट नहीं किया गया है कि इस तरह की अंधविश्वासी प्रथाएँ और भूत ‘भगाने’ के नाम पर लोगों के साथ क्रूर व्यवहार को जारी रखने की अनुमति क्यों दी जा रही है।
यूनाइटेड किंगडम की रॉयल मिंट ने इस साल भारतीयों को खास तोहफा देने की तैयारी की है। दरअसल, ब्रिटेन में भारतीय धनतेरस और दीवाली पर सोना खरीदने के लिए बेहद उत्साहित हैं। भारतीयों की संस्कृति को देखते हुए रॉयल मिंट ने इस बार हिंदू देवी लक्ष्मी की छवि में पहला गोल्ड बार लॉन्च किया है। इसे रॉयल मिंट की प्रोडक्ट डिजाइनर एमा नोबेल ने तैयार किया है। बताया जा रहा है कि इसके लिए कार्डिफ में स्थित श्री स्वामीनारायणन मंदिर की मदद ली गई है।
लक्ष्मी बार में 20 ग्राम सोना है। 20 ग्राम सोने से बने इस बार की कीमत 1080 पाउंड है। यानी भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत लगभग 1,60,869 रुपए हुई। गोल्ड बार को लेकर रॉयल मिंट का कहना है कि यह विविधता और समावेश के प्रति हमारी निरंतर प्रतिबद्धता और देश में विविध सांस्कृतिक समारोहों के विस्तार को दर्शाता है।
रॉयल मिंट के एंड्रयू डिकी ने कहा कि दीपावली के अवसर पर हम कुछ ऐसा तैयार करना चाहते थे, जो खूबसूरत भी हो और आधुनिकता को छूते हुए परंपरा को भी प्रदर्शित करे। यह डिजाइन कमाल का है। इसमें कमल के फूल पर पर एक देवी खड़ी हैं, जिनके हाथों में कमल है।
इस गोल्ड बार को रॉयल मिंट की आधिकारिक वेबसाइट से खरीदा जा सकता है। वेबसाइट पर मंगलवार (28 सितंबर, 2021) की सुबह 9 बजे से इसकी बिक्री शुरू हो गई है। इसकी पैकिंग पर ओम का चिह्न बनाया गया है। बताया जा रहा है कि इस बार श्री स्वामीनारायण मंदिर के दीपावली कार्यक्रम और लक्ष्मी पूजन कार्यक्रम में इसे भी शामिल किया जाएगा। यह कार्यक्रम चार नवंबर को होगा। इसमें रॉयल मिंट के प्रतिनिधि भी मौजूद रहेंगे। मंदिर के नीलेश कबाड़िया ने कहा कि यह बेहद सुखद है कि रॉयल मिंट जैसे अंतरराष्ट्रीय ब्रांड ने अपने उत्पाद में हिंदू त्योहार के प्रति ऐसा रुख अपनाया है।
हरियाणा के गुरुग्राम से पिछले दिनों एक वीडियो सामने आई थी जिसमें कुछ लोग सार्वजनिक स्थल पर नमाज पढ़े जाने का विरोध कर रहे थे। अब उसी मामले में गुरुग्राम पुलिस ने एक ट्वीट किया है और समझाना चाहा है कि क्षेत्र में नमाज तो हिंदुओं और मुस्लिमों की आपसी सहमति से पढ़ी जा रही थी।
अपने आधिकारिक ट्विटर अकॉउंट पर पुलिस ने लिखा, “सार्वजनिक स्थल पर नमाज का स्थान हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों ने आपसी बातचीत के बाद तय किया है। यह जगह भी उनमें से एक है। सांप्रदायिक सद्भाव और शांति बनाए रखना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और हम यह सुनिश्चित करेंगे।”
ये ट्विट कुछ दिन पहले का है जब गुरुग्राम निवासियों की वह वीडियो सामने आई थी जिसमें वह पब्लिक प्लेस पर नमाज पढ़े जाने का विरोध कर रहे थे। ये वीडियो इंटरनेट पर काफी वायरल हुई थी। सोशल मीडिया यूजर्स ने शहर में कानून और व्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाया था कि आखिर पुलिस ऐसी गतिविधियों को कैसे अनुमति दे सकते हैं।
गुरुग्राम पुलिस द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर नमाज पढ़ने को जायज ठहराता देख यूजर भड़क गए और पूछने लगे कि आखिर लोगों के विरोध को वो कैसे नकार सकते हैं और कैसे चलती सड़क पर नमाज पढ़ने को जायज कहा जा सकता है।
स्थानीय पूछ रहे हैं कि क्यों नमाज को मस्जिद में बैठ कर नहीं पढ़ा जा सकता। उनका सवाल है कि क्या आपसी सहमति से पब्लिक प्लेस पर अतिक्रमण करना सही है? और अगर इस केस में प्रशासन इतना ही ढिलाई दे रहा है तो क्या वो भी सड़कों पर बैठकर हनुमान चालीसा पढ़ें और पूजा-अर्चना करना शुरू कर दें।
एक यूजर ने कहा, “इस्लामी देशों में भी सार्वजनिक संपत्ति पर नमाज पढ़ना हराम है।” यूजर बोला, नमाज पढ़ना आस्था की बात है जिसे मस्जिद जैसी जगह पर अदा किया जाना चाहिए। इसलिए इन लोगों को समझाएँ कि वे एक पवित्र अभ्यास को अपवित्र न करें।
पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने पूछा कि आखिर गुरुग्राम पुलिस विरोध करने वालों की आवाज क्यों दबा रही है।
एक अन्य ट्विटर यूजर ने गुरुग्राम पुलिस के रुख पर प्रकाश डाला और ये बताया कि कैसे ये चीजें सीएम खट्टर के विचारों के विरुद्ध हैं जिन्होंने कहा था मुसलमानों को नमाज मस्जिदों में अदा करनी चाहिए।
कुछ लोगों ने उन प्रतिनिधियों के बारे में सवाल किया जिन्होंने हिंदू समुदाय की ओर से मुस्लिमों के साथ समझौता किया और सार्वजनिक स्थल पर नमाज पढ़ने को कह दिया। ये सवाल भी उठा कि क्या इस संबंध में अन्य धर्मों के लोगों से परामर्श लिया गया था।
एक यूजर सवाल करता है आपसी निर्णय से क्या मतलब है। क्या पुलिस अनुमति देती है दो समुदाय आपसी सहमति से कुछ ऐसा करें जो कानून व्यवस्था बिगाड़े।
गुरुग्राम में नमाज को लेकर शुरू हुआ विवाद
गौरतलब है कि पिछले दिनों गुरुग्राम के सेक्टर-47 में रहने वाले लोगों का वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो में दिख रहा था कि वह अपने पड़ोस में मुस्लिमों द्वारा सड़कों पर नमाज अदा करने से बेहद परेशान हैं। स्थानीय लोगों ने मौके पर इकट्ठा हुए मुस्लिमों का विरोध किया और उन पर कानून-व्यवस्था तोड़ने का आरोप लगाया।
सार्वजनिक स्थल पर नमाज का विरोध करने वाले स्थानीय निवासियों में से एक ने कहा था, “जिस तरह से मेरठ की लड़की को मारा गया और फरीदाबाद की लड़की को मौत के घाट उतार दिया गया, कहीं ये सब भविष्य में हमारी बेटियों का साथ भी ना हो जाए।” उन्होंने कहा, “पुलिस कुछ नहीं कर रही है, क्योंकि उनके पास हमारे खिलाफ कार्रवाई करने का आदेश है।”
हिंदू समूहों के अनुसार, ये लोग दरगाहों का निर्माण कर भूमि पर अवैध रूप से कब्जा करने के लिए सार्वजनिक जगह पर नमाज अदा करते हैं। स्थानीय निवासियों का कहना है, “इससे महिलाएँ बेहद डरी हुई हैं। जब से सड़कों पर नमाज पढ़ना शुरू हुआ है, तब से चेन स्नेचिंग, छेड़खानी की घटनाएँ बढ़ गई हैं। सड़कों पर इस अवैध नमाज को रोका जाना चाहिए।” एक अन्य स्थानीय निवासी ने कहा, “हम यहाँ अवैध मस्जिद या मजार नहीं बनने देंगे।”
अफगानिस्तान में तालिबानी शासन आने के बाद से वहाँ के नागरिक डर के साये में जीने को मजबूर हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 220 से अधिक अफगान महिला जज तालिबानियों की सजा के भय से अभी भी खुफिया जगहों पर छिपी हुई हैं। उनका कसूर केवल इतना है कि वह महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ी। ये उन लोगों की रक्षक रही हैं, जो देश में हाशिए पर थे और न्याय चाहते थे।
खुफिया जगहों से छह पूर्व महिला जजों ने बीबीसी से बात की है। मासूमा (बदला हुआ नाम) ने अपने जज के करियर के दौरान सैकड़ों पुरुषों को महिलाओं के खिलाफ हिंसा, रेप, हत्या और प्रताड़ना के लिए सजा दी है, लेकिन जब से अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबानी आए हैं, उन्होंने जेल में बंद सभी कैदियों को रिहा कर दिया है। इसके बाद से उन्हें जान से मारने की धमकियाँ मिलने लगीं। उन्होंने बताया कि कई नंबरों से उनके फोन पर टैक्स्ट मैसेज, वॉयस नोट्स आए हैं। मासूमा ने बताया कि जब हमने यह सब सुना तब हम वहाँ से तुरंत भाग खड़े हुए। हमने अपना घर और सब कुछ वहीं छोड़ दिया।
बताया जा रहा है कि कई महीनों पहले एक दोषी को मासूमा ने 20 साल जेल की सजा सुनाई थी। वह तालिबान का सदस्य था, जिसने अपनी पत्नी की बेरहमी से हत्या की थी। वो कहती हैं, “मैं उस नौजवान महिला की सूरत अभी भी याद कर सकती हूँ। वो बहुत वीभत्स अपराध था।”
रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान में बीते 20 सालों में 270 महिलाएँ जजों के रूप में काम कर चुकी हैं। इनमें से कई देश की प्रसिद्ध और ताकतवर महिलाएँ हैं, जिन्हें लोग जानते हैं। बीबीसी के मुताबिक, कम से कम 220 पूर्व महिला जज अफगानिस्तान के विभिन्न प्रांतों में ही छिपी हुई हैं। उन्होंने जिन छह पूर्व जजों से बात की है, उन सभी ने लगभग एक जैसी बातें बताई हैं।
इन सभी को तालिबानी जान से मारने की धमकी दे रहे थे। ये वही तालिबानी हैं, जिन्हें महिला जजों ने पहले सजा दी थी। इनमें से चार वो पुरुष थे, जिनको अपनी पत्नी की हत्या के मामले में जेल में बंद किया गया था। धमकी मिलने के बाद सभी पूर्व जज अपने नंबर बदल चुकी हैं। वे अलग-अलग जगहों पर छिपी हुई हैं और कुछ दिनों में अपनी जगह बदलती रहती हैं।
गौरतलब है कि तालिबान के सत्ता में आने के बाद अफगानिस्तान के हालात अब तेजी से बदल रहे हैं। तालिबान ने शरिया कानूनों के तहत लोगों को बर्बर सजा देना भी शुरू कर दिया है। हाल ही में पश्चिमी अफगानिस्तान के हेरात शहर के मुख्य चौक में एक शख्स को तालिबान ने मारकर सार्वजनिक तौर पर क्रेन से लटका दिया था। इस घटना का वीडियो भी सामने आया है। इसे टोलो न्यूज की पत्रकार जहरा रहीमी ने ट्वीट करते हुए लिखा, “अत्याचार वापस आ गया है। तालिबान ने अफगानिस्तान के पश्चिम में हेरात शहर में एक व्यापारी के अपहरण के आरोप में चार लोगों को लटका दिया है।”
चिकमंगलूरु जिले में स्थित गुरु दत्तात्रेय पीठ-बाबा बुदनगिरि दरगाह विवाद से जुड़े मामले में एक महत्वपूर्ण आदेश में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मंगलवार (28 सितम्बर, 2021) को सरकार के 19 मार्च, 2018 को दिए उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें केवल एक मुजावर (वह मुस्लिम फ़कीर जो दरगाह का चढ़ावा लेता है) को स्वामी गुरु दत्तात्रेय को फूल चढ़ाने, पाद पूजा और ‘नंदा दीप’ प्रज्जवलित करने के लिए नियुक्त किया था। गौरतलब है कि ‘श्री गुरु दत्तात्रेय स्वामी पीठ’ को ‘श्री गुरु दत्तात्रेय बाबा बुदनास्वामी दरगाह’ के रूप में भी जाना जाता है।
यह देखते हुए कि चिकमंगलूरु में श्री गुरु दत्तात्रेय स्वामी और बाबा बुदनगिरी दरगाह पर 2018 का सरकारी आदेश हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के अधिकारों का उल्लंघन करता है, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया जिसने केवल शाह खदरी द्वारा निर्धारित मजहबी प्रथाओं को निभाने के लिए नियुक्त मुजावर को दोनों धर्मों के धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए अधिकृत किया था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य सरकार का यह आदेश दोनों समुदायों (हिंदू और मुस्लिम) को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदान किए गए धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति पी एस दिनेश कुमार ने कहा कि सरकारी आदेश में केवल एक मुजावर को गुफा के गर्भगृह में प्रवेश करने और हिंदुओं एवं मुसलमानों दोनों को ‘तीर्थ’ (चरणामृत) वितरित करने की अनुमति दी गई है।
अदालत ने तत्कालीन कर्नाटक सरकार के आदेश को रद्द करते हुए अपने आदेश में कहा, “”संविधान का अनुच्छेद 25 अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म के स्वतंत्र अभ्यास और प्रचार की गारंटी देता है। जबकि सरकारी आक्षेपित आदेश (2018 के) द्वारा, सबसे पहले, राज्य ने हिंदू समुदाय के उनके धर्म के अनुसार पूजा और अर्चना करने के अधिकार का उल्लंघन किया है। दूसरे, राज्य ने मुजावर पर ‘पादुका पूजा’ करने और उसकी आस्था के विपरीत ‘नंदा दीप’ जलाने के लिए नियुक्त किया है। ये दोनों अधिनियम भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा गारंटीकृत दोनों समुदायों के अधिकारों का घोर उल्लंघन है।”
वहीं भाजपा ने कर्नाटक उच्च न्यायालय के इस आदेश की सराहना की, जिसमें उसने राज्य सरकार को चिकमंगलूरु के बाबा बुदनगिरी पहाड़ों में स्थित गुफा मंदिर स्वामी दत्तात्रेय पीठ में एक हिंदू पुजारी नियुक्त करने का निर्देश दिया है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और चिकमंगलूरु से विधायक सीटी रवि ने फैसले पर खुशी व्यक्त करने के लिए ट्वीट किया और सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार को राज्य में अपने शासन के दौरान हिन्दुओं के साथ किए अन्याय के लिए लताड़ लगाई।
बीजेपी नेता CT रवि ने अपने ट्वीट में लिखा, “हिंदुओं के लिए बहुत बड़ी जीत। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सरकार को दत्ता पीठ में हिंदू पुजारियों को नियुक्त करने का आदेश दिया। न्यायमूर्ति नागमोहन दास समिति की पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट को खारिज करने के उच्च न्यायालय के फैसले का मैं स्वागत करता हूँ।”
Let us not forget that as Chief Minister, @siddaramaiah had appointed a Communist to deprive Hindus their right to worship Guru Dattatreya in Datta Peeta.
How can any self respecting Hindu appoint a Mujawar to Datta Peeta?
रवि ने कहा कि यह कॉन्ग्रेस के सिद्धारमैया थे जिन्होंने एक मुस्लिम मौलवी को धर्मस्थल के पुजारी के रूप में स्थापित करने के लिए झूठ का ऐसा जाल बुना था, जो कई सदियों पहले के इतिहास और परंपरा के साथ खिलवाड़ है।
बता दें कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी) की रिपोर्ट भी पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं थी, क्योंकि एचसीएल ने बंदोबस्ती आयुक्त की दूसरी रिपोर्ट को खारिज कर दिया था, जिसके समक्ष इसी मुद्दे पर एचसीएल के एक सदस्य ने अपना पक्ष रखा था।
एचएलसी के सदस्यों में से एक, कन्नड़ विश्वविद्यालय, हम्पी के प्रोफेसर, रहमत तारिकेरे (Rahmath Tarikere) ने पहले धर्मस्थल पर अपने विचार व्यक्त करते हुए बंदोबस्ती आयुक्त के समक्ष पेश किया था, जिसे अदालत ने रिकॉर्ड से नोट किया।
HC के आदेश में यह भी कहा गया है कि मैसूर पुरातत्व विभाग, 1932 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, श्री गुरु दत्तात्रेय स्वामी पीठ बाबा बुदनगिरी में एक छोटी सी गुफा है, जो हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए पवित्र है। आदेश में कहा गया है कि बंदोबस्ती आयुक्त की रिपोर्ट ने सही दर्ज किया गया था कि श्री दत्तात्रेय को उनकी पुण्य पत्नी अनसूया और हिंदू त्रिमूर्ति, देवताओं, ब्रह्मा, विष्णु और शिव के अवतार ऋषि अथरी के पुत्र के रूप में जाना जाता है।
गौरतलब है कि यह मंदिर चंद्र द्रोण रेंज पर है, जो हिमालय और नीलगिरी के बीच की कुछ सबसे ऊँची पर्वतमालाओं में से एक है। इसका इतिहास यह है कि यह एक सूफी संत बाबा बुदन थे, जो पहली बार यमन से कॉफी के बीज लाए थे, जिन्हें उस समय पहली बार इन पर्वत श्रृंखलाओं में रोपा गया था। तभी से उस क्षेत्र में सूफी संत बाबा बदन का प्रभाव भी माना जाता है।
लेकिन वास्तविक विवाद दत्तात्रेय स्वामी पीठ के आसपास है, जो अदालत के दस्तावेजों के अनुसार, मैसूर धार्मिक और धर्मार्थ संस्थान अधिनियम, 1927 के तहत एक प्रमुख मुजराई मंदिर था, जिस पर कर्नाटक राज्य वक्फ बोर्ड द्वारा 6 अप्रैल, 1973 को आपातकाल घोषित होने से ठीक पहले पर कब्जा कर लिया गया था। कहा जाता है कि आपात काल के बाद यह 1978 में वापस ले लिया गया था लेकिन हिन्दू-मुस्लिमों के बीच विवाद बना रहा। क्योंकि राज्य में मुस्लिमों को कॉन्ग्रेस सरकार का संरक्षण मिलता रहा।
मुस्लिमों द्वारा कब्जे के बाद से ही मंदिर को ‘श्री गुरु दत्तात्रेय स्वामी पीठ’ और ‘श्री गुरुदत्तात्रेय बाबाबुदन स्वामी दरगाह’ के रूप में जाना जाता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछते हैं, जहाँ मुस्लिम अब इसे दरगाह बताते हैं और वहीं हिन्दुओं की आस्था के अनुसार और सरकारी रिकॉर्ड में भी यह मंदिर है। यही वजह है कि कर्नाटक में यह आज भी दक्षिणपंथी समूह और मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए जाने जानी वाली कॉन्ग्रेस के बीच विवाद की एक हड्डी है। दोनों एक दूसरे पर इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाते हैं। कहा जाता है चुनाव के मद्देनजर ही मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने वहाँ मुजावर की नियुक्ति की थी।
वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध जिस एकजुटता का दुनिया भर से आह्वान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार अंतराष्ट्रीय मंचों से किया है, उस पर सकारात्मक रूप से तमाम देशों के साथ फ्रांस ने भी अपने प्रभावी कदम बढ़ा दिए हैं । फ्रांस के आंतरिक मामलों के मंत्री (गृहमंत्री) के अनुसार अब फ्रांस सीधे आतंकवाद की जड़ों पर वार करेगा।
फ्रांसीसी मंत्री ने ये बयान एक स्थानीय अखबार ले फ़िगारो को दिए हैं, जिसने दुनिया भर में इबादतगाहों को ले कर सतर्कता और सन्देह की नई बहस छेड़ दी है। फ्रांसीसी सरकार की आंतरिक जाँच में मज़हबी चरमपंथ को बढ़ावा देने में वहाँ के इबादतगाहों की प्रमुख भूमिका सामने आ रही है।
आंतरिक मामलों के मंत्री गेराल्ड डार्मैनिन (Gerald Darmanin) के अनुसार अब तक 89 इबादतगाहों में से लगभग एक तिहाई की जाँच की जा चुकी है। इन 89 इबादतगाहों में चरमपंथ को बढ़ावा देने की शिकायत मिली थी। फ्रांस सरकार की खुफिया जाँच रिपोर्ट में इन सभी को कट्टरपंथ का केंद्र मान कर चिन्हित किया गया था, जिन पर जल्द ही कड़ी कार्यवाही संभावित है।
इस मामले में तत्काल ही 6 इबादतगाहों (मस्जिदों) को बंद करने के शासकीय आदेश जारी कर दिए गए हैं। इसी के साथ फ्रांस की सुरक्षा व खुफिया एजेंसी इन चरमपंथी केंद्रों से जुड़े अन्य प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कट्टरपंथी तत्वों की तलाश कर रही हैं।
कभी वामपंथी शासकों के प्रभाव में लंबे समय तक शासित रहे फ्रांस ने ईराक-ISIS युद्ध के दौरान तमाम सीरियाई व इराकियों को मानवता के आधार पर शरण दी थी परंतु उसके बाद संसार के सबसे सुंदर व पर्यटन योग्य देशों में शामिल रहे फ्रांस में आतंकी हमलों की अंतहीन श्रृंखला शुरू हो गई ।
इस पूरे मामले में उच्चस्तरीय जाँच कर रहीं फ्रांसीसी जाँच एजेंसियों ने इस्लामिक प्रकाशकों Nawa और LDNA नाम से कुख्यात ब्लैक अफ्रीकन डिफेंस लीग पर भी कठोर कार्रवाई करने के लिए कहा है। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि ब्लैक अफ्रीकन डिफेंस लीग ने जून 2020 में फ्रांस की राजधानी पेरिस की सड़कों पर उतर कर अमेरिकी दूतावास के आगे सरकार व पुलिस विरोधी रैली की थी, जिसमें उसने सैकड़ो की संख्या में भीड़ जुटा कर शक्ति प्रदर्शन किया था ।
ब्लैक अफ्रीकन डिफेंस लीग से ही संबन्धित संस्था ब्लैक वीमेन डिफेंस लीग है, जिसने अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप शासन के अंतिम समय में हुए नस्लीय दंगो में पूरे संसार में अमेरिका की छवि गिराने और आखिरकार ट्रम्प की भी हार में एक अहम रोल अदा किया था।
फ्रांसीसी मंत्री ने जिस दूसरे संदिग्ध समूह Nawa को उल्लेखित किया, वो फ्रांस में यहूदियों के प्रति घृणा का भाव फैलाने, उनको देश से निकालने की मुहिम के साथ समलैंगिक लोगों को पत्थर से मार-मार कर जान से मार डालने को बढ़ावा देने का समर्थन करता है। कुल मिला कर दूसरे शब्दों में ये भी कहा जा सकता है कि Nawa वहाँ की सरकार को अस्थिर करने और वहाँ के मूल्यों को समाप्त करने की दिशा में कार्य कर रहा है। इस समूह का मुख्य प्रभाव फ्रांस के दक्षिणी क्षेत्र में अधिक है, जो फिलहाल पूर्ण रूप से शांत नहीं है।
इस समूहों के साथ फ्रांसीसी मंत्री ने आने वाले एक वर्ष में 10 अन्य चरमपंथी व विघटनवादी समूहों पर भी कार्रवाई की बात कही है, जो फ्रांस विरोधी गतिविधियों में शामिल हैं या रहे हैं। आपको बता दें कि राष्ट्रहित में उठे किसी भी कठोर कदम को इस्लामोफोबिया बताने वालों को गत सप्ताह झटका देते हुए फ्रांस की सर्वोच्च प्रशासनिक अदालत, काउंसिल ऑफ स्टेट ने मज़हबी चरमपंथ के विरुद्ध फ्रांस की सरकार के एक्शन को स्वीकृति प्रदान कर दी थी।
यह कार्रवाई अक्टूबर 2020 में एक शिक्षक सैमुअल पेटी की निर्मम हत्या के बाद शुरू की गई थी, जिन्हें कक्षा के दौरान चार्ली हेब्दो पत्रिका द्वारा प्रकाशित पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाने का बहाना बना कर मार डाला गया था ।
फ्रांस की बहुसंख्यक जनता भी सरकार के कदम के साथ खड़ी होती दिखाई दे रही है। फ्रांस का बड़ा वर्ग शरणार्थी के नाम पर आतंकी स्वरूप में आ चुके घुसपैठियों को देश से बाहर खदेड़ने की भी मुहिम चला रहा है। इसी अभियान के तहत सोशल मीडिया पर No More Refugees कैम्पेन भी चलाया जा रहा है।