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दिल्ली के बच्चे तो पढ़ेंगे ही, पर CM केजरीवाल खुद कब पढ़ेंगे ‘देशभक्ति’ का पाठ

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी सरकार ने दिल्ली के स्कूली छात्रों के लिए देशभक्ति के पाठ्यक्रम को अनिवार्य कर दिया। नर्सरी से कक्षा 8 तक जहाँ हर दिन इसकी पढ़ाई होगी, वहीं क्लास 9 से 12 में पढ़ने वाले छात्रों को हफ्ते में एक बार इसे पढ़ाया जाएगा। इस कोर्स को लाने का उद्देश्य छात्रों के भीतर देशभक्ति को जगाना बताया जा रहा है। 

अरविंद केजरीवाल ने खुद ट्वीट कर इस कोर्स की जानकारी दी है। उन्होंने लिखा, “पिछले 74 साल में हमने अपने स्कूलों में फ़िजिक्स, केमेस्ट्री, मैथ तो पढ़ाए लेकिन बच्चों को देशभक्ति नहीं सिखाई, मुझे खुशी है कि आज दिल्ली सरकार ने ये शुरुआत की है। देशभक्ति पाठ्यक्रम के माध्यम से अब दिल्ली के सभी सरकारी स्कूलों में बच्चों को अपने देश से प्यार करना सिखाया जाएगा।”

सबसे पहले ताज्जुब की बात है कि ऐसा प्रस्ताव या पाठ्यक्रम वो सरकार लाई है जिसकी अगुवाई करने वाले नेता ही समय आने पर खुलकर देशभक्ति का प्रदर्शन नहीं कर पाते। फिर बात चाहे सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान सेना के शौर्य पर शक करने की हो या फिर देश के खिलाड़ियों की सराहना करने के समय चुपचाप बैठे रहने की। केजरीवाल कई बार ऐसा रवैया दिखाते मिले जैसे उन्हें राष्ट्रीय मुद्दों में कोई दिलचस्पी ही न हो।

याद करिए: 

  • इसी वर्ष जब स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के जवानों के लिए, खिलाड़ियों के लिए, सुरक्षाकर्मियों के लिए ताली बजवा रहे थे, उस समय वहाँ बैठे सब लोग तालियाँ बजाकर सम्मान दे रहे थे, लेकिन केजरीवाल को हाथ बाँधे देखा गया था।
  • पुलवामा हमले के समय जब देश के 40 जवान बलिदान हुए थे उस समय देश का हर नागरिक चाहता था कि पाकिस्तान से बदला लिया जाए। पीएम मोदी के नेतृत्व में देश ने बालाकोट एयर स्ट्राइक कर ऐसा किया भी। लेकिन उनकी सराहना करने की बजाय, सेना के साहस का लोहा मानने की बजाय केजरीवाल ने राजनीति की और आरोप मढ़ा कि भारत सरकार को पाकिस्तान और इमरान खान का समर्थन प्राप्त है।
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  • साल 2016 में भी केजरीवाल ने बाकायदा वीडियो जारी कर सेना द्वारा की गई स्ट्राइक के प्रमाण माँगे थे। खुद को सही दिखाने के लिए उन्होंने पाकिस्तानी प्रोपगेंडा का हवाला दिया था कि अगर सबूत मिल गए तो पाकिस्तान चुप हो जाएगा। केजरीवाल की इस हरकत का क्या असर हुआ था इसका अंदाजा इससे लगता है कि पाकिस्तानी यूजर ने ट्विटर पर #PakStandsWithKejriwal ट्रेंड करवा दिया था। यानी जो पाक के मन में चल रहा था उस पर दिल्ली में बैठे केजरीवाल वीडियो बना रहे थे।

अब ऐसे ही कई बार ‘अलग तरह की देशभक्ति’ के लिए अपनी पहचान बनाने वाले केजरीवाल जब बच्चों को देशभक्ति पढ़ाने की बात कर रहे हैं तो ये सबके लिए थोड़ा हास्यास्पद भी है और हैरान करने वाला भी। ये हैरानी इस बात पर है कि कैसे केजरीवाल सरकार इस बात को खुलेआम कह देती है कि जो काम वो करने जा रहे हैं वो इतिहास के पन्नों में कभी किसी ने किया ही नहीं। जबकि सच बात तो यह है कि 15 अगस्त और 26 जनवरी से पहले स्कूलों में होने वाले कार्यक्रम, उनमें पढ़ी जाने वाली कविताएँ, प्रस्तुत नाटक… सबका उद्देश्य यही होता है कि स्कूली जीवन में बच्चों के भीतर देशभक्ति जगाए रखा जाए।

खैर! ये कोई नई बातें आदत हैं। सीएम केजरीवाल के ट्वीट के नीचे भी ऐसे तमाम यूजर हैं जो कह रहे हैं कि सीएम को और उनके पार्टी नेताओं को देशभक्ति सिखाने से ज्यादा बच्चों से देशभक्ति सीखने की जरूरत है। लोगों के सवाल है कि सेना पर सवाल उठाकर कौन सी सरकार देशभक्ती दिखाती है। इन बातों से ये तो साफ है कि हर कोई अब उन प्रपंचों से वाकिफ हो चुका है जिसे आम आदमी पार्टी एक्सक्लूसिव काम के नाम पर पेश करती है। लेकिन, जो काम वो शिक्षा के नाम पर करती आई है, उसकी पोलपट्टी भी तमाम बार खुली है।

जैसा कि पार्टी ने अक्सर कहा कि उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किए है। मगर ऑपइंडिया बताता रहा है कि कैसे किए जा रहे दावे हकीकत से अलग हैं। कैसे स्कूलों की संख्या, उनमें किए गए आमूलचूल बदलाव के दावे, शिक्षकों की भर्ती, शिक्षा की गुणवत्ता वाले वादे पूरी तरह सच नहीं है। इन बातों को समझने के लिए अभिषेक रंजन की रिपोर्ट पढ़िए जिसमें यह सामने आया था कि कैसे पूरी दिल्ली को अच्छी शिक्षा देने का वादा करने वाली केजरीवाल सरकार 5-10 प्रतिशत बच्चों को ही अच्छी शिक्षा दे पाई है और 90-95 फीसद बच्चे अछूते हैं। इसके अलावा आरटीआई आदि से ये बातें भी सामने आई थी कि 1 फरवरी 2015 को 9,598 शिक्षक पद रिक्त थे, 30 सितंबर 2019 तक यह संख्या बढ़कर 15,702 पहुँच गई।

India Tv - The RTI reply

‘रूपा की बनियान हम पहनेंगे… तो दीदी किसकी पूजा करेंगी’: शर्लिन चोपड़ा ने ‘राज कुंद्रा की पूजा’ पर किया पलटवार

अभिनेत्री गहना वशिष्ठ ने पिछले दिनों शर्लिन चोपड़ा को निशाने पर लेते हुए उन्हें राज कुंद्रा की पूजा करने की सलाह दी थी। अब इस पर शर्लिन ने पलटवार करते हुए कहा है कि यदि वह राज कुंद्रा की पूजा करेंगी तो दीदी (शिल्पा शेट्टी) क्या करेंगी। उन्होंने ट्वीट किया, “रूपा की बनियान हम पहनेंगे, तो रूपा क्या पहनेगी ? राज कुंद्रा की पूजा हम करेंगे, तो दीदी किसकी पूजा करेंगी? बताओ जरा?”

इससे पहले भी राज कुंद्रा की अभिनेत्री पत्नी शिल्पा शेट्टी को तंज कसते हुए शर्लिन ‘दीदी’ बता चुकी हैं। पिछले दिनों एक सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर कर उन्होंने कहा था, “दीदी आपने हाल ही में एक रिएलिटी शो के मंच पर आपने कहा कि जब आप रानी लक्ष्मीबाई जी की कहानी सुनती हैं तो गर्व से आपका सीना चौड़ा हो जाता है… आपने (शिल्पा शेट्टी) ये भी कहा था कि जिन महिलाओं ने भी अपने जीवन में संघर्ष किया है उन्हें आप साष्टांग दंडवत प्रणाम करती हैं। क्या उन महिलाओं में बेबस, लाचार और पीड़ित वो महिलाएँ भी शामिल हैं, जिन्होंने अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में जाकर अपने बयान दर्ज कराए थे।”

उल्लेखनीय है कि पोर्नोग्राफी केस में गिरफ्तार राज कुंद्रा दो महीने जेल में बिताने के बाद जमानत पर 21 सितंबर को घर लौट आए थे। लेकिन, विवाद थमता नहीं दिख रहा है। असल में कुंद्रा का व्हाट्सएप चैट लीक होने के बाद शर्लिन चोपड़ा का नाम इस मामले में सामने आया था। वहीं गहना वशिष्ठ पर पोर्न फिल्में बनवाने और उन्हें प्रसारित करवाने के आरोप हैं।

इस मामले के सामने आने के बाद से ही शर्लिन लगातार राज कुंद्रा और शिल्पा शेट्टी के खिलाफ मुखर हैं। इसके लिए उनकी आलोचना करते गहना वशिष्ठ ने उनको एहसान फरामोश बताया था। साथ ही राज कुंद्रा को बोल्ड कंटेट बनाने में घसीटने का आरोप भी लगाया था। ई टाइम्स को दिए इंटरव्यू में गहना ने कहा था, “वह (शर्लिन) साल 2012 से ही बोल्ड और अडल्ट कंटेंट बना रही थीं, जबकि राज कुंद्रा से तो वह महज ढाई साल पहले ही मिली थीं। राज कुंद्रा ने शर्लिन को पैसा कमाने में मदद की। लेकिन उसने उनको भी नहीं छोड़ा। वह जिस तरह का आलीशान जीवन आज जीती है वो आर्म्सप्राइस ऐप के लिए डेवलप किए गए कंटेंट के कारण हैं। शर्लिन को राज कुंद्रा का शुक्रगुजार होना चाहिए और उनकी पूजा करनी चाहिए। वह आज जो कुछ भी है, उन्हीं की वजह से है।”

गहना ने ये भी कहा था, “वह (शर्लिन) सिर्फ कपड़े उतारना जानती हैं और अब खबरों में बने रहने के लिए कीचड़ उछाल रही है। वह यह भी जानती हैं कि राज कुंद्रा के खिलाफ बोलने पर ही उसे लाइमलाइट मिलेगी।”

छत्तीसगढ़ में शादीशुदा पादरी ने किया विधवा से लगातार रेप: गर्भवती होने पर खुली पोल, 10 साल पहले बनाया था ईसाई

छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण को लेकर मचे बवाल के बीच प्रदेश के नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले में झाँसा देकर चर्च के शादीशुदा पादरी के पीड़िता विधवा से लगातार रेप करने की घटना सामने आई है। इस बीच जब पीड़िता प्रेगनेंट हो गई तो पादरी ने उसे मेडिकल स्टोर से गर्भ गिराने वाली दवाई खिला दी जिससे महिला की तबीयत बिगड़ गई और उसकी हालत नाजुक है। इस मामले में शिकायत होने के बाद पुलिस ने आरोपित पादरी को गिरफ्तार कर लिया है।

पुलिस के अनुसार, आरोपित की पहचान जिले के गीदम शहर के अटल आवास के नजदीक चर्च का पादरी बाबूलाल नाग (43) के रूप में हुई है। आरोपित पादरी शहर की ही 35 साल की एक विधवा महिला के संपर्क में था वहीं पीड़िता ने लगभग 10 साल पहले धर्मांतरण किया था।

पुलिस ने बताया कि करीब 2 साल पहले पादरी ने महिला को शादी का झाँसा देकर प्रेम जाल में फँसा लिया और शादी का वादा कर रेप करता रहा। इस बीच पीड़िता दो माह की गर्भवती हो गई और उसने पादरी को अपने प्रेगनेंट होने की बात बताई। तब आरोपित पादरी ने रेप पीड़िता को गर्भपात के लिए मेडिकल स्टोर से दवाएँ लाकर जबरदस्ती खिला दी जिससे पीड़िता की तबियत बिगड़ने लगी। जिसके बाद पड़ोसियों ने पीड़िता को गीदम के अस्पताल में भर्ती कराया जहाँ हालत गंभीर देख डॉक्टरों ने जिला अस्पताल रेफर कर दिया। 

जानकारी के मुताबिक महिला की एक बेटी है और उसके पति की 12 साल पहले मौत हो गई थी। पति की मौत के बाद पीड़िता बेटी को सास-ससुर के पास छोड़ कर खुद मजदूरी करके जीवनयापन करने लगी। इस दौरान बीमार पड़ने पर वह काम पर नहीं जा पाई और आर्थिक तंगी से गुजरने लगी। तभी मिशनरी के लोगों से महिला का संपर्क हुआ। उन्होंने महिला का इलाज भी करवाया, जिसके बाद महिला ने धर्मांतरण कर लिया। पादरी ने महिला को रहने के लिए दूसरा मकान भी दिया था।

कॉन्ग्रेस के युवराज का फैलाया रायता समेटने में लगे ‘पत्रकार’, क्योंकि पंजाब जाए भाड़ में राहुल गाँधी का ‘इकबाल’ बना रहे

पंजाब में गहराए राजनीतिक संकट के बीच पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ट्विटर के जरिए वहाँ छाई अनिश्चितता और सीमावर्ती राज्य की बागडोर किसी कम भरोसेमंद व्यक्ति को सौंपने को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। पंजाब की सीमाएँ केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के साथ ही राजस्थान और गुजरात से लगती हैं। इसके अलावा पंजाब पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। जम्मू-कश्मीर और पंजाब में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से ऐतिहासिक तौर पर पीड़ित रहे हैं और अन्य राज्यों को भी इसके कारण समस्याओं का सामना करना पड़ा है।

यह बात सर्वविदित है कि पाकिस्तान कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद को फंडिंग करने के अलावा दशकों से पंजाब में खालिस्तानी अलगाववाद को बढ़ावा देता रहा है। राजस्थान और गुजरात भी सीमावर्ती राज्य हैं और इसी कड़ी में पंजाब निश्चित रूप से सरकार के लिए अधिक चिंता का विषय बना है।

हालाँकि, अब इसे गाँधी परिवार के लिए काम करने वाला मीडिया नया मोड़ दे रहा है। कुछ लोग कॉन्ग्रेस के भीतर के इस संकट का उपयोग मोदी सरकार के खिलाफ पंजाब के आम लोगों के मन में अविश्वास के बीज बोने के लिए कर रहे हैं। कुछ ऐसा जो पाकिस्तान को अच्छा लगेगा।

मसलन, पंजाब में नशीले पदार्थों का सेवन बड़ी समस्या है। खालिस्तानी भावनाओं को हवा देकर पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देने के प्रयास भी करता रहता है। लेकिन आम आदमी पार्टी की पूर्व नेता के लिए ये सब बातें ‘बेहूदा बकवास’ है।

एक और कॉन्ग्रेस-फ्रेंडली ‘पत्रकार’ सबा नकवी हैं। उन्होंने कॉन्ग्रेस की तरफ से मोर्चा सँभालते हुए कहा कि जो पंजाब को एक महत्वपूर्ण सीमावर्ती राज्य बताते हुए निशाना बना रहे हैं, वे ऐसा इसलिए कर पा रहे हैं क्योंकि उन्हें पंजाब के किसानों और सैनिकों पर भरोसा नहीं है। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि किसान और सैनिक इनके लिए सॉफ्ट टारगेट हैं, क्योंकि एक आम भारतीय को ‘गरीब किसान’ और ‘बहादुर सैनिकों’ की कहानी का हवाला देकर भावनात्मक रूप से भड़काना आसान है।

इस्लाम अपना चुके द क्विंट के पत्रकार आदित्य मेनन की एक अलग ही थ्योरी है। वह कहते हैं कि राज्य में हिंदू अल्पसंख्यक हैं, शायद इसलिए पंजाब का सीमावर्ती राज्य होना चिंता का विषय है।

अब इसे भी समझने की कोशिश कीजिए। इकोनॉमिक टाइम्स ने दो दिन पहले ‘चीनी सैनिकों की घुसपैठ’ पर एक रिपोर्ट पब्लिश की थी। सरकार और सुरक्षा अधिकारियों में से किसी ने भी इसकी पुष्टि नहीं की थी। मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी कुछ इसी तरह के दावे करते हुए कहा कि चीन ने एक पुल को भी नष्ट कर दिया। जबकि वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने ऐसी किसी भी घटना से इनकार किया है।

यह सबकुछ बिल्कुल उसी तरह जैसा इस जुलाई में भी देखने को मिला था। बिजनेस स्टैंडर्ड ने अजय शुक्ला के एक लेख प्रकाशित किया था। इसमें दावा किया गया था कि ईस्टर्न लद्दाख में भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच झड़प हुई थी। बाद में भारतीय सेना ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा था कि अजय शुक्ला द्वारा लिखा गया लेख अशुद्धियों और गलत सूचनाओं से भरा हुआ है। उन्होंने दुर्भावनापूर्ण इरादे से ऐसा किया।

यह जगजाहिर है कि इस साल 26 जनवरी को कथित किसान आंदोलन की आड़ में लाल किले पर जो कुछ हुआ वह खालिस्तान प्रायोजित और समर्थित था। उसमें खालिस्तानी एलीमेंट शामिल थे। लेकिन इस तथ्य को नजरंदाज किया जाता रहा है क्योंकि यह बात कॉन्ग्रेस को असहज करती है। जाहिर है ये राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर तनिक भी चिंतित नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं जो कॉन्ग्रेस की मदद करे। भले ही कॉन्ग्रेस ने खुद से मेहनत करना छोड़ दिया हो।

पंजाब के सियासी संकट को देखें तो प्रतीत होता है कि कॉन्ग्रेस के नेताओं को इसकी कोई चिंता नहीं है। कैप्टन अमरिंदर सिंह बनाम नवजोत सिंह सिद्धू की लड़ाई को सुलझाने की कोशिश करने वाले राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी इतने अक्षम हैं कि दस दिनों के भीतर मुख्यमंत्री को हटा देते हैं। इसके बाद एक ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना दिया जाता है, जिस पर महिला IAS अधिकारी को गलत मैसेज भेजने का आरोप लगा था। इतना कम था कि प्रदेश अध्यक्ष ने भी अचानक से इस्तीफा दे दिया। इस दरम्यान राहुल गाँधी और उनकी माँ सोनिया गाँधी शिमला में छुट्टी मना रहे थे। ऐसा लगता है कि कॉन्ग्रेस के लिए यही काफी नहीं था तो उन्होंने कन्हैया कुमार और जिग्नेश मेवानी को कुछ इस तरह जोड़ा जैसे यह बेजोड़ सौदा हो।

इतना ही नहीं फैक्टचेकर्स ने तो यह साबित करने की जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली है कि कॉन्ग्रेस नेताओं, विशेष रूप से सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल गाँधी ने पार्टी अध्यक्ष के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की बेइज्जती नहीं की थी। तथाकथित फैक्ट चेकर्स ने अपनी बातों को साबित करने के लिए एक वीडियो भी साझा किया, जिसमें कोई भी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को कार से उतरते और वहाँ खड़े प्रधानमंत्री की अनदेखी करते हुए देख सकता है, लेकिन उनके लिए यह देश के प्रधानमंत्री का ‘अपमान’ नहीं था। मतलब जब तक किसी को नेता की सीट हड़पने के लिए शौचालय में बंद नहीं किया जाता, तब तक उसका अपमान नहीं माना जाता। अगर कभी ऐसा होता भी है तो उसे हमारे इतिहास की किताबों से हटा देते हैं, क्योंकि कॉन्ग्रेस के ‘इतिहासकार’ ही हमारे इतिहास की किताबों को लिखते हैं।

जैसे कि अमिताभ बच्चन ने ‘शराबी’ में कह रखा हो- इकोसिस्टम हो तो ऐसी हो, वरना ना हो।

मूल रूप से यह लेख अंग्रेजी में निरवा मेहता ने लिखा है। कुलदीप सिंह ने इसका अनुवाद किया है। मूल लेख पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।

‘ईद हुई है छठ भी होगी, मौलाना केजरीवाल परमिशन दे या न दे’: दिल्ली में सार्वजनिक जगहों पर छठ बैन से उबाल

राजधानी दिल्‍ली में इस बार भी लोगों को सार्वजनिक तौर पर छठ पूजा मनाने की अनुमति नहीं होगी। दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) द्वारा यह रोक लगाई गई है। इसको लेकर आदेश जारी करते हुए कहा गया है कि कोरोना के मामलों में भले ही गिरावट देखी जा रही है लेकिन त्योहारों के सीजन में संक्रमण के फैलने की आशंका बढ़ जाती है, ऐसे में सार्वजनिक जगहों पर पूजा करने का जोखिम नहीं लिया जा सकता है। आदेश के अनुसार सार्वजनिक स्थानों, मैदानों और मंदिरों में कार्यक्रमों पर भी पाबंदी रहेगी। DDMA का यह आदेश 15 नवंबर तक लागू रहेगा। बता दें कि 9 और 10 नवंबर को छठ पूजा है।

DDMA के आदेश के अनुसार त्योहारों के सीजन में दिल्ली में मेले के आयोजन, फूड स्टॉल, झूला लगाना या रैली निकालने की भी अनुमति नहीं होगी। किसी भी सार्वजनिक जगह पर उत्सवों के आयोजनों की अनुमति नहीं होगी। दिल्ली में उत्सवों के आयोजनों में खड़े होने या जमीन पर बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी, सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पालन करते हुए केवल कुर्सियों पर बैठने की अनुमति होगी। प्राधिकरण ने लोगों को सलाह दी है कि वह अपने घर पर ही सुरक्षित तरीके से छठ पूजा मनाएँ।

इस आदेश के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तमाम तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में बीजेपी नेता तेजिंदर पाल सिंह बग्गा ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को चुनौती देते हुए कहा है कि ईद हुई है छठ भी होगी, चाहे मौलाना केजरीवाल परमिशन दे या न दे। चैलेंज है।

उन्होंने कहा, “अभी-अभी अरविंद केजरीवाल जी ने ऐलान किया है कि इस बार दिल्ली के अंदर छठ मनाने की परमिशन नहीं दी जाएगी। जबकि ईद के समय लॉकडाउन चल रहा था, फिर भी सारे के सारे बाजार खुले हुए थे। पूरे देश ने देखा था। मैं अरविंद केजरीवाल जी से पूछना चाहता हूँ… मौलाना अरविंद केजरीवाल जी, जब आप ईद को लॉकडाउन के समय मनाने की परमिशन दे सकते हैं तो जब कोविड का केस 1 प्रतिशत भी नहीं है, जब आपने पूरे स्कूल खोलने की परमिशन दे दी है, जब आपने होटल को फुल कैपिसिटी में खोलने की परमिशन दे दी है, तो फिर क्यों हिंदू त्योहारों को टारगेट किया जा रहा है? मैं मौलाना केजरीवाल को चुनौती देता हूँ कि तुम चाहे परमिशन दो या न दो, छठ पूजा जिस प्रकार से मनाई जाती है, उसी प्रकार से धूम-धाम से मनाई जाएगी। तुम्हारी हिम्मत है तो रोक के दिखा देना।”

वहीं पत्रकार मीनाक्षी श्रीयन ने लिखा, “हिंदू आस्थाओं पर केजरीवाल सरकार का हथौड़ा। दिल्ली में छठ पूजा पर लगाया प्रतिबंध। पब्लिक प्लेस में नहीं हो सकेगी छठ पूजा। दिल्ली में स्कूल खुल चुके हैं, ईद भी मनाई गई लेकिन छठ पूजा नहीं हो सकेगी।”

एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, “दिल्ली सरकार ने सार्वजानिक स्थान पर छठ पूजा न करने का हुक्म जारी किया। लेकिन रोड पर और सार्वजानिक जगह पर लोग नमाज पढ़ते हैं तब इनको साँप सूँघ जाता है।”

दिलीप श्रीवास्तव ने लिखा, “दिल्ली में छठ पूजा बैन। आने वाले समय में दिल्ली में हिंदुओं के सारे कर्मकाण्ड बैन होने वाले हैं। और वोट दो दोगले केजरी को।”

दिल्‍ली-एनसीआर के लाखों लोग दिल्‍ली सरकार के इस फैसले से प्रभावित होंगे। बता दें कि देश की राजधानी में यूपी-बिहार के लाखों परिवार रहते हैं जो छठ पूजन करते हैं। छठ ना सिर्फ बिहार बल्कि उत्तर प्रदेश में भी बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। छठ के वक्‍त दिल्‍ली में नदी और घाटों पर मेले जैसा नजारा रहता है। यहाँ पर हजारों परिवार छठ मनाते नजर आते हैं। दिल्‍ली के प्रमुख घाट जैसे यमुना घाट, हिंडन घाट, राजघाट और सचिवालय घाट जैसे कई जगहों पर छठ मनाने वालों की भीड़ रहती है। 

गौरतलब है कि पिछले साल भी दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने आदेश जारी करते हुए कहा था कि सार्वजनिक स्थलों पर छठ पूजा का आयोजन नहीं किया जाएगा। सरकार के द्वारा जारी पत्र में कहा गया था कि दिल्‍ली में पब्‍लिक प्‍लेस पर छठ पूजा मनाने की छूट नहीं होगी। इसके लिए बकायदा सभी डीएम और पुलिस के सभी डीडीसी को पत्र लिखा गया था कि वह सुनिश्‍चित करें कि सार्वजानिक स्थानों पर छठ पूजा न हो।

हाइवे हमेशा के लिए ब्लॉक नहीं कर सकते, खाली कराना प्रशासन का काम: किसानों के प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट

किसान आंदोलन के चलते बाधित दिल्ली की सड़कों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (सितंबर 30, 2021) को टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि किसी हाइवे को इस तरह स्थायी रूप से बंद नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि इस मामले में पहले ही स्पष्ट आदेश दिए जा चुके हैं। सरकार उसे लागू नहीं करवा पा रही।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, नोएडा निवासी मोनिका अग्रवाल द्वारा दायर की गई याचिका पर न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई की। उन्होंने कहा कि शिकायतों का निवारण न्यायिक मंचों, आंदोलन और संसदीय बहस के माध्यम से हो सकता है लेकिन राजमार्गों को अवरुद्ध करके नहीं।

केंद्रीय सरकार के साथ दिल्ली, हरियाणा और यूपी की राज्य सरकारों से कोर्ट ने पूछा, “आखिर राजमार्गों को कैसे अवरुद्ध किया जा सकता है? ये सब कहाँ जाकर खत्म होगा।” अदालत ने कहा कि उन्होंने इस संबंध में कानून बनाए हैं और इन्हें लागू करना कार्यपालिका का कर्तव्य है।

पीठ ने कहा, “अगर हम कोई निर्देश देते हैं, तो आप कहेंगे कि हम कार्यपालिका के काम में घुस गए। कानून को कैसे लागू किया जाए यह आपका काम है। कोर्ट के पास इसे लागू करने का कोई तरीका नहीं है।”

याचिकाकर्ता, मोनिका अग्रवाल ने अपनी याचिका में कहा था सार्वजनिक सड़कों को साफ रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित विभिन्न निर्देशों के बावजूद, उनका पालन नहीं किया गया है। याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता के सिंगल मदर होने के कारण उसे नोएडा से दिल्ली की यात्रा करना दुःस्वप्न बन गया है। इसमें उन्हें 20 मिनट की जगह 2 घंटे लगते हैं और ऐसा दो हफ्तों से हो रहा है।

बता दें कि इस मामले में अगली सुनवाई 4 अक्टूबर को होगी। इस बार सॉलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि उन्होंने हाई लेवल कमेटी बनाई थी कि प्रदर्शन करने वाले संगठनों से बात हो लेकिन संगठनों ने सुनवाई करने से मना कर दिया। अब बेंच ने उन्हें एक आवेदन दायर करने का निर्देश दिया है।

‘नाम बदल दें जम्मू-कश्मीर के अधिकारी’: कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी की माँग, ट्रेंड करने लगा LAWDA

कॉन्ग्रेस नेता और वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने गुरुवार (30 सितंबर 2021) को जम्मू-कश्मीर प्रशासन से एक असामान्य अनुरोध करते हुए लेक एंड वाटरवेज डेवलपमेंट अथॉरिटी (LAWDA) का नाम बदलने अथवा उसमें संशोधन करने की माँग की। जम्मू-कश्मीर प्रशासन से अनुरोध के साथ ही उन्होंने भाजपा पर भी कटाक्ष किया और कहा कि वह नाम परिवर्तन के बहुत बड़े प्रशंसक नहीं हैं, लेकिन उन्होंने इस बार अपवाद बनाया है।

कॉन्ग्रेस के सीनियर लीडर ने नाम बदलने का अनुरोध करने का कारण बताया कि इसका संक्षिप्त नाम कुछ और ही लगता है। दरअसल, यह मामला गुरुवार को उस वक्त सामने आया जब एएनआई ने झीलों और जलमार्ग विकास प्राधिकरण (LAWDA) द्वारा श्रीनगर में डल झील में किए गए सफाई अभियान की खबर ट्वीट की। LAWDA के उपाध्यक्ष डॉ बशीर अहमद भट ने बताया कि प्रसिद्ध झील की सफाई के लिए 15-16 मशीनों को तैनात किया गया है। जबकि पिछले साल कोविड-19 के कारण यह रुक गया था।

ट्वीट के तुरंत बाद एक हिंदी शब्द से इसकी समानता को दर्शाते हुए अथॉरिटी का संक्षिप्त नाम LAWDA ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा। संगठन का पूरा नाम वास्तव में ‘जम्मू और कश्मीर झील और जलमार्ग विकास प्राधिकरण’ है, जिसे जम्मू और कश्मीर सरकार द्वारा राज्य के जल निकायों और जलमार्गों की देखभाल, प्रबंधन और संरक्षण के लिए एक स्वायत्त निकाय के रूप में बनाया गया था। इसलिए, प्राधिकरण का संक्षिप्त रूप JKLAWDA होना चाहिए, लेकिन इसके बजाय ANI ने LAWDA का उपयोग किया था।

दिलचस्प बात यह है कि संगठन की वेबसाइट LAWDA शब्द का उपयोग नहीं करती है। इसमें भी संगठन को JK LDA के रूप में संदर्भित किया गया है। हालाँकि, संगठन का फेसबुक पेज पर इसे LAWDA लिखा गया है, भले ही इसे JKLDA के नाम से जाना जाता हो। इसके अलावा संगठन अपने आधिकारिक कम्युनिकेशन में भी JK LAWDA का ही उपयोग करता है। उदाहरण के लिए, वेबसाइट पर अपलोड किए गए कुछ निविदा नोटिस इस संक्षिप्त नाम का उपयोग करते हैं, जबकि कुछ में एलडीए का उपयोग किया जाता है। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि संगठन स्वयं कुछ आधिकारिक दस्तावेजों में LAWDA शब्द का उपयोग कर रहा है।

LAWDA के द्वारा जारी किया गया नोटिस

उल्लेखनीय है कि ऐसा पहली बार नहीं है कि LAWDA शब्द सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है। जब भी संगठन से जुड़ी कुछ खबरें सामने आती हैं तो netizens इसके संक्षिप्त नाम पर जोर देते हुए ट्वीट करते हैं।

अगर सिंघवी के द्वारा की माँग को देखें तो ऐसा लगता है कि अगर प्राधिकरण चाहे तो इसे हटाकर इसका संक्षिप्त नाम बनाने के लिए पूरे नाम का उपयोग कर सकता है, जो कि JKLAWDA होगा। हालाँकि, शब्द के बीच में स्वर नहीं होने के कारण यहाँ प्रत्येक शब्द का उच्चारण अलग-अलग करना होगा। संक्षिप्त रूप में ‘ए’ जोड़ने से संक्षिप्त नाम LAWDA बन जाता है, जिसे एक शब्द के रूप में उच्चारित किया जा सकता है, और इस प्रकार छह अलग-अलग अक्षरों के उच्चारण की तुलना में इसका उच्चारण करना बहुत आसान हो जाता है। हो सकता है कि संगठन अपने नाम को जलमार्ग और झील विकास प्राधिकरण के रूप में शब्दों की अदला-बदली कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो यह ‘वाल्डा’ बन जाएगा।

तम्मी अंकल से कॉन्ग्रेस तक, नवजोत से अमरिंदर तक: कभी गले पड़ते तो कभी भागते ‘सिक्सर सिद्धू’

नवजोत सिंह सिद्धू। क्रि​केटर से कमेंटेटर बने और फिर नेता। बीच में कुछ साल कॉमेडी संग भी लग गए। लेकिन 57 साल के सिद्धू की इस यात्रा में जो चीज हमेशा देखने को मिली है, वह है उनका अस्थिर स्वभाव। पीछे पड़ने या कहें कि गले पड़ने की उनकी आदत जितनी पुरानी है, उतनी ही पुरानी झटके से जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ भागने की उनकी फितरत भी रही है। इस ग्राउंड पर उनका प्रदर्शन परिवार, करियर और राजनीति हर लेवल पर एक जैसा रहा है। कभी कोई गिरावट नहीं!

नाटकीयता से भरपूर सिद्धू की इस यात्रा की शुरुआत राजनीति से ही करते हैं। अमरिंदर सिंह को किनारे कर जब कॉन्ग्रेस नेतृत्व को लग रहा था कि उसने पंजाब में आंतरिक संघर्ष पर काबू पा लिया है, प्रदेश अध्यक्ष पद से सिद्धू ने अचानक इस्तीफा दे पार्टी की हालत ‘माया मिली न राम’ जैसी कर दी। इस्तीफा देने का दिन भी वो चुना जिसे कॉन्ग्रेस ने अपने एक प्लान (कन्हैया कुमार को पार्टी में शामिल करवाना) को अंजाम तक पहुँचाने के लिए चुना था।

इससे पहले सिद्धू इसी तरह राज्यसभा की सांसदी से इस्तीफा देकर बीजेपी से भागे थे। तब उन्होंने खुद को जन्मजात कॉन्ग्रेसी बताया था। उस समय वे उसी अमरिंदर सिंह के गले पड़ते दिखे थे, जिनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्होंने पीछे पड़ छीन ली। इस दौरान वे पाकिस्तान जाकर उसकी फौज के मुखिया जनरल कमर जावेद बाजवा के गले भी लग आए।

गेंदबाजों खासकर स्पिनरों के पीछे पड़ने के अपने इस हुनर की वजह से सिद्धू को प्रशंसक ‘सिक्सर सिद्धू’ भी कहते हैं। लेकिन, आज भी लोग 1996 का वो वाकया याद करते हैं जब वे टीम इंडिया को इंग्लैंड दौरे के बीच ही छोड़ आए थे। अचानक उठाए गए उनके इस कदम की वजह तत्कालीन कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन के साथ उनके मतभेद बताए जाते रहे हैं। बीसीसीआई के पूर्व सचिव जयवंत लेले ने इस घटना के सालों बाद अपनी किताब में बताया कि अजहर ने एक ऐसे शब्द का इस्तेमाल किया था जो हैदराबाद में सामान्य है पर उत्तर भारत में इसे गाली के तौर पर देखा जाता है। इसी से उखड़ सिद्धू ने दौरा बीच में ही छोड़ दिया था।

क्रिकेट से नाम कमाने वाले सिद्धू ने जब कमेंट्री की दुनिया में एंट्री की तो उन पर अपने कॉन्ट्रेक्ट से भागने के आरोप लगे। स्टार इंडिया के साथ 22.5 करोड़ रुपए की कमेंट्री डील का उनका मामला 2015 में कोर्ट तक पहुँच गया था। अरसे तक कपिल शर्मा के शो से जुड़े रहने वाले सिद्धू ने इससे अपना नाता तोड़ने से पहले भी अपने जिद्द और अहंकार का उसी तरह प्रदर्शन किया था जो पंजाब से जुड़े हालिया राजनीतिक घटनाक्रम में देखने को मिला है।

दिलचस्प यह है कि कपिल शर्मा शो के एक एपिसोड में उनकी डॉक्टर/नेता पत्नी नवजोत कौर ने खुलासा किया था कि कैसे जब वह पढ़ाई कर रहीं थी तो सिद्धू उनके पीछे पड़ गए थे। साथ ही यह भी बताया था कि शादी के बाद जब उनकी सहेलियाँ और रिश्तेदार मिलने आते तो सिद्धू भागकर बाथरूम में छिप जाते थे। इसी शो में मौजूद उनके एक दोस्त ने दुनिया को बताया था कि कैसे पड़ोस वाले तम्मी अंकल से सिद्धू भागा करते। इस भागमभाग में एक बार वे उस बेड के नीचे भी छिप गए थे जिस पर तम्मी अंकल बैठे थे।

सिद्धू के इस पीछे पड़ने और भागने की यात्रा को देखकर तो केवल इतना ही कहा जा सकता है कि कभी तो ठहर जाओ गुरु! पर ये उनका अस्थिर स्वभाव ही है कि इस्तीफे के बाद से ही नेटिजन्स उनका ‘नेक्स्ट टारगेट’ भी बताने लगे हैं।

‘कन्यादान’ एड की वजह से मुश्किल में फँसीं आलिया भट्ट: मुंबई में शिकायत दर्ज, हिन्दू परंपराओं का मजाक उड़ाना पड़ा भारी

बॉलीवुड एक्ट्रेस आलिया भट्ट खिलाफ मुंबई के सांताक्रूज थाने में शिकायत दर्ज कराई गई हैं। दरअसल अपने नए टीवी एड की वजह से ‍मुश्‍किलों में घिर गई हैं। इस विज्ञापन में ‘कन्यादान’ की परंपरा पर सवाल उठाया गया है। कपड़े के ब्रांड मान्यवर के इस विज्ञापन में विवाह के दौरान होने वाले ‘कन्यादान’ को एक दमनकारी परंपरा के तौर पर दिखाया गया है और उसकी जगह ‘कन्यामान’ को एक विकल्प के तौर पर सुझाया गया है। मान्यवर ने दावा किया कि इससे परंपराओं के बारे में प्रगतिशील तरीकों को सोचने को बढ़ावा दे रहा है।

इस विज्ञापन के सामने आते ही आलिया पर हिन्दू धर्म की परंपराओं का मजाक उड़ाने का आरोप लगने लगा। खबरों के अनुसार शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि आलिया भट्ट ने हिन्दू भावनाओं को आहत‍ किया है और कन्यादान को प्रतिगामी तरीके से दिखाया है।

इस मामले में मान्यवार कंपनी और आलिया भट्ट के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है। इस विज्ञापन में आलिया भट्ट को दुल्हन के रूप में दिखाया गया है। वह शादी के मंडप में बैठी हैं और सवाल करती हैं कि मैं क्या कोई दान की चीज हूँ?

इस विज्ञापन के बारे में आलिया भट्ट ने कहा था, “मैं पूरी तरह से इस विचारधारा से इत्तेफाक रखती हूँ और ये एक ऐसी चीज है जो मेरे दिल के बहुत करीब है। मैं इस बात से खुश हूँ कि मैं इस एड का हिस्सा बन पाई और लोगों तक एक ऐसा संदेश पहुँचा पाई जिससे समाज में एक सकारात्मक बदलाव हो।”

हालाँकि, ये कोई पहली बार नहीं है, जब किसी ब्रांड ने अपने मार्केटिंग के जरिए हिंदू रीति-रिवाजों पर कुठाराघात करने की कोशिश की हो। हाल के दिनों में कई ब्रांड विशेष रूप से तनिष्क को उसकी इस तरह की सक्रियता के लिए गंभीर प्रतिक्रिया देखने को मिली।

खास बात यह है कि कंपनी ने इस विज्ञापन के लिए काम पर रखा तो किसे, एक बॉलीवुड अभिनेत्री को जबकि बॉलीवुड खुद शोषण और महिलाओं के ऑब्जेक्टिफिकेशन के लिए कुख्यात है। उल्लेखनीय है कि ब्रांड हिंदू धर्म और परंपराओं को ही बार-बार इसलिए निशाना बनाते हैं, क्योंकि वो स्पष्ट रूप से अन्य धर्मों की समस्याग्रस्त प्रथाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाने से डरते हैं।

अगर आप विज्ञापन को ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे कि पूरे विज्ञापन को विचित्र तरीके से बनाया गया। जबकि ब्रांड को भी यह पता है कि वो जिस तरह का सुझाव दे रहे हैं वह पूरी तरह से निंदनीय है और इसका कोई मतलब नहीं है। वे पूरी तरह से जानते हैं कि कोई भी कपड़ों के ब्रांड की सिफारिश के आधार पर प्राचीन रीति-रिवाजों को नहीं बदलेगा और फिर भी, उन्हें वास्तव में परवाह नहीं है क्योंकि यह केवल एक मार्केटिंग नौटंकी के बारे में है और कुछ नहीं। अन्य धर्मों के रीति-रिवाजों पर उनकी चुप्पी जो वास्तव में महिलाओं को नुकसान पहुँचाती है, उनके प्रोपेगंडा के बारे में बहुत कुछ बताती है।

‘मैं वो अमरिंदर सिंह नहीं…’ कैप्टन-कॉन्ग्रेस की लड़ाई में फुटबॉल टीम के गोलकीपर परेशान, सोशल मीडिया पर खूब हो रहे Tag

भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के गोलकीपर अमरिंदर सिंह ने गुरुवार (30 सितंबर, 2021) को मीडिया हाउस से अपील करते हुए कहा कि पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह पर उन्हें टैग करना बंद करें। फुटबॉल खिलाड़ी ने एक ट्वीट में कहा, “डियर न्यूज मीडिया, पत्रकार, मैं भारतीय फुटबॉल टीम का गोलकीपर अमरिंदर सिंह हूँ, न कि पंजाब राज्य का पूर्व मुख्यमंत्री। कृपया मुझे टैग करना बंद करें।”

वहीं पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने भी फुटबॉल खिलाड़ी अमरिंदर सिंह के प्रति इस परेशानी के लिए सहानुभूति व्यक्त करते हुए ट्वीट किया।

दरअसल पंजाब में सियासी बवाल जारी है। पहले पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था फिर नवजोत सिंह सिद्धू ने इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद से पंजाब कॉन्ग्रेस में जमकर उठा-पटक जारी है। सोशल मीडिया पर लोग जमकर पंजाब कॉन्ग्रेस की सियासत पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इस बीच लोग कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह भारतीय फुटबॉल टीम के गोलकीपर अमरिंदर सिंह को टैग कर रहे हैं, जिनका राजनीति से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। वह देश के लिए फुटबॉल खेलते हैं। फुटबॉलर अमरिंदर सिंह के ट्विटर हैंडल को पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की जगह मीडिया समेत कई ट्विटर यूजर्स ने टैग किया है।

हाल ही में कैप्टन अमरिंदर की जगह फुटबॉल खिलाड़ी को टैग करने वाला ट्वीट
हाल ही में कैप्टन अमरिंदर की जगह फुटबॉल खिलाड़ी को टैग करने वाला ट्वीट

आपको बता दें कि भारतीय फुटबॉल टीम के गोलकीपर अमरिंदर सिंह का ट्विटर हैंडल @Amrinder_1 है और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का @capt_amarinder है। यही वजह है कि लोगों को इस तरह का कन्फ्यूजन हो रहा है।

कन्फ्यूजन होने का एक और कारण नाम की स्पेलिंग है। आम तौर पर, जब लोग ‘अमरिंदर’ नाम का उच्चारण करते हैं, तो वे ‘m’ के बाद ‘a’ का इस्तेमाल नहीं करते हैं, लेकिन पंजाब के पूर्व सीएम के नाम में ‘m’ के बाद ‘a’ का इस्तेमाल होता है। इसके विपरीत, फुटबॉल खिलाड़ी के नाम में ‘m’ के बाद ‘a’ नहीं है।

जब कोई ट्विटर पर “अमरिंदर” को टैग करने की कोशिश करता है, तो पूर्व सीएम की आईडी ऐसे दिखाई देती है

ऐसे में जब कोई ‘अमरिंदर’ सर्च करता है, तो पहला रिजल्ट खिलाड़ी की आईडी के रूप में सामने आता है और ऐसा लगता है कि किसी ने यह जाँचने की जहमत नहीं उठाई कि क्या वे सही व्यक्ति को टैग कर रहे हैं।

जब कोई ट्विटर पर “अमरिंदर” को टैग करने की कोशिश करता है, तो फुटबॉल खिलाड़ी की आईडी दिखाई देती है

दिलचस्प बात यह है कि उन्हें कैप्टन सिंह की जगह लंबे समय से टैग किया जा रहा है क्योंकि पिछले महीनों के कई ट्वीट भी मिले हैं।

कैप्टन अमरिंदर की जगह फुटबॉल खिलाड़ी को टैग करने वाला पुराना ट्वीट
कैप्टन अमरिंदर की जगह फुटबॉल खिलाड़ी को टैग करने वाला पुराना ट्वीट
कैप्टन अमरिंदर की जगह फुटबॉल खिलाड़ी को टैग करने वाला पुराना ट्वीट

फुटबॉलर अमरिंदर सिंह ISL में भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के गोलकीपर और ATK मोहन बागान FC हैं।