छत्तीसगढ़ के रायपुर में अवैध तरीके से रह रहे बांग्लादेशी मियाँ-बीवी को गिरफ्तार किया है। उसको लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। मियाँ दिलावर खान 16 साल पहले भारत में अवैध तरीके से घुसा था। एक साल बाद उसने उसी तरह बॉर्डर पार करवाते हुए अपनी बीवी और बेटे को भारत में दाखिल करवा दिया। ये लोग रायपुर आकर रहने लगे। यहाँ इनके घर बेटी पैदा हुई।
₹1000 में बनाई मध्यप्रदेश बोर्ड की मार्कशीट
घुसपैठिए दिलावर खान के मुताबिक ₹1000 में मध्यप्रदेश बोर्ड की फर्जी मार्कशीट बनवाई। इसमें बोर्ड से जुड़े एक कर्मचारी ने मदद की। ये मार्कशीट मध्यप्रदेश के रीवा के त्योथर माध्यमिक स्कूल का है। वह किराए पर रहता था इस आधार पर किरायानामा बनवाया। इनके आधार पर पेन कार्ड, आधार कार्ड और पासपोर्ट भी बनवाया। परिवार से दूसरे सदस्यों के पास भी सरकारी पहचान पत्र मौजूद हैं।
मलेशिया में बेटा के होने की बात कही
दिलावर की बीवी परवीन खान और बेटी को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। बेटी का जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ था और वह नाबालिग है। दिलावर का कहना है कि उसका बेटा रायपुर में मेकेनिक का काम करता था। दिलावर ने जब उससे पैसे माँगे तो वह घर से अलग हो गया। कुछ दिनों बाद वह रायपुर छोड़कर चला गया। तीन साल पहले बेटे ने पुणे में होने की बात कही। पिछले साल उसने कहा कि उसका निकाह हो गया है और उसके ससुर ने उसे मलेशिया भिजवा दिया है। पुलिस उसके बेटे के बारे में पता कर रही है।
पुलिस का कहना है कि फर्जी दस्तावेज बनाने में जिन लोगों ने घुसपैठिए दिलावर खान और उसके परिवार की मदद की उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसमें मकान मालिक, दस्तावेज बनाने की अनुशंसा करने वाले लोग और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं। उसकी मददगार के बारे में जानकारी सामने आयी है कि ये लोग रायपुर और रीवा में छिपे हो सकते हैं।
रायपुर में घुसपैठिए दिलावर और उसके परिवार ने 4 घर बदले हैं। उसने मजदूरी और फिर सड़क किनारे ठेला लगाया जिसपर अंडे और बिरयानी बेचे।
गैंगरेप का झूठा केस दर्ज करवाने वाली एक महिला को लखनऊ की एक अदालत ने 7.5 वर्ष की सजा सुनाई है और ₹2 लाख का जुर्माना ठोंका है। अदालत ने यह भी कहा है कि रेप मामले में मिलने वाला मुआवजा अब रिपोर्ट दर्ज होने पर नहीं बल्कि चार्जशीट दायर होने पर मिलेगा। झूठे मुकदमे में लोगों को फँसाने को लेकर यह एक बड़ा निर्णय माना जा रहा है।
लखनऊ में एक कोर्ट ने रेखा देवी नाम की एक महिला द्वारा दर्ज किए गए एक गैंगरेप और SC-ST एक्ट के एक मामले में यह निर्णय सुनाया है। कोर्ट को पता चला कि अपने विरोधियों को फँसाने के लिए रेखा देवी ने राजेश और भूपेंद्र नाम के दो लोगों के खिलाफ गैंगरेप का झूठा मुकदमा दर्ज करवाया गया था।
पुलिस जाँच में यह आरोप गलत साबित हुए थे। कोर्ट ने इस सुनवाई में यह भी कहा कि ऐसे मामलों में मिलने वाले मुआवजे के पैसे के चलते झूठे मुकदमे बढ़ रहे हैं। कोर्ट ने लखनऊ के डीएम को आदेश दिया है कि अब पैसे तभी मिले तो जा जब पुलिस अपनी जाँच पूरी करके चार्जशीट दाखिल करे।
कोर्ट ने रेखा देवी को 7.5 वर्षों की सजा सुनाने के साथ ही ₹2.10 लाख का जुर्माना भी ठोंका है। कोर्ट यह भी आदेश दिया है कि पर लगाए गए जुर्माने का आधा हिस्सा उन लोगों को दिया जाए, जिन्हें झूठे केस में फँसाया गया था। सुनवाई के दौरान मामले में फँसाए भूपेंद्र की मौत हो चुकी थी, इसलिए मुआवजे की राशि उनके परिवार को मिलेगी।
क्या है पूरा मामला?
बाराबंकी की रेखा देवी ने 29 जून 2021 को पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी। रेखा देवी ने राजेश और भूपेंद्र नाम के दो लोगों पर उन्हें जान से मारने की धमकी देने और गैंगरेप करने का आरोप लगाया था।
यह घटना लखनऊ के बीकेटी थाने के इलाके की थी, इसलिए केस की जाँच वहीं भेज दी गई। रेखा देवी SC थीं इसलिए एक बड़े अधिकारी ने मामले की जाँच की। जाँच के दौरान सीओ को पता चला कि रेखा देवी ने झूठा केस दर्ज कराया था ताकि उन दोनों को फँसाया जा सके।
जाँच के बाद पुलिस ने राजेश और भूपेंद्र को बेकसूर बताया और रेखा देवी के खिलाफ झूठी शिकायत करने के लिए कार्रवाई करने की माँग की। कोर्ट ने इस फैसले से साफ कर दिया है कि अब कानून का गलत इस्तेमाल करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
उत्तर प्रदेश की बरेली पुलिस ने मोहम्मद जैश रिजवी और मोहम्मद शानू को गिरफ्तार किया है। ये लोग ‘हैदरी दल’ नाम के एक कट्टरपंथी समूह के मेंबर है, जो मुस्लिम लड़कियों के साथ बदसलूकी करते थे और बुर्के के साथ छेड़छाड़ करते थे।
पुलिस जाँच में पता चला है कि मोहम्मद जैश रिजवी और मोहम्मद शानू ने इंस्टाग्राम पर ‘हैदरी दल बरेली’ के नाम से एक पेज बनाया था। पेज पर महिलाओं की बदसलूकी वाली और निजता भंग करने वाली वीडियो और फोटो अपलोड करते थे। इसके अलावा ये दोनों ऑनलाइन बैंक अकाउंट और QR कोड के जरिए फंड इकट्ठा करते थे।
दिनांक 07.06.2025 को गाँधी उद्यान में कुछ युवकों द्वारा युवतियों की निजता भंग कर वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपलोड करने पर तत्समय अभियोग पंजीकरण के बाद कृत कार्यवाही के सम्बन्ध में सी0ओ0 नगर प्रथम श्री आशुतोष शिवम की बाइट#UPPolicehttps://t.co/xFige8xxtBpic.twitter.com/99U6H5MYDd
पुलिस ने इस मामले में पहले भी कार्रवाई करते हुए शहबाज रजा उर्फ सूफियान और समीर रजा को गिरफ्तार कर जेल भेजा था।
पूरा मामला क्या है?
बरेली और उत्तर भारत के कई शहरों में ‘हैदरी दल’ नाम का एक ग्रुप एक्टिव है। ये लोग खुद को इस्लाम और ‘बुर्का’ का रखवाला बताते हैं। इनका मुख्य काम मुस्लिम लड़कियों को गैर-मुस्लिम लड़कों के साथ देखने पर धमकाना और परेशान करना है।
ये ग्रुप ऐसी लड़कियों और लड़कों के वीडियो बनाता है, जिनमें उनकी निजी जानकारी (नाम, पता) उजागर की जाती है। ये वीडियो सोशल मीडिया पर डाले जाते हैं। कुछ वीडियो में ये सदस्य मुस्लिम लड़कियों से बदसलूकी करते हुए ‘घर पर कोई नहीं है तो अय्याशी करोगी?’ जैसी बातें कहते थे, और उनसे व उनके साथ मौजूद लड़कों से सारी जानकारी माँगते और वायरल करते थे।
ब्रिटेन में पाकिस्तानी मूल के गिरोहों द्वारा यौन शोषण के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार अकेले ब्रिटेन के रॉदरहैम बाल यौन शोषण के 64% मामलों के लिए 4% पाकिस्तानी जिम्मेदार हैं। फिर भी इसमें ‘पाकिस्तानी मुसलमानों’ का नाम नहीं है। बल्कि आरोपितों को ‘एशियाई’ कहा जा रहा है।
‘बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार’ पर राष्ट्रीय लेखा परीक्षक ने ब्रिटेन के ‘ग्रूमिंग गिरोह’ को लेकर कई खुलासे किए हैं। ब्रिटेन की गृह सचिव एयवेटे कूपर ने संसद को बैरोनेस लुईस की रिपोर्ट की जानकारी दी। 197 पेज की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘अज्ञानता और पूर्वाग्रह की संस्कृति’ की वजह से ग्रूमिंग गिरोहों द्वारा नाबालिगों के यौन शोषण के मामलों की जाँच ठीक से नहीं हो पाई। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन ग्रूमिंग गिरोहों में से अधिकांश पाकिस्तानी और ‘एशियाई’ पुरुष थे।
गौरतलब है कि ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों के नेतृत्व वाले ग्रूमिंग गिरोहों के हाथों बाल यौन शोषण का मुद्दा वर्षों से ब्रिटेन की एक ‘गंभीर समस्या’ रही है। 90 के दशक में करीब 11 साल की बच्चियों को ग्रूमिंग गिरोहों द्वारा उठाया गया। उसका चालीस सालों तक रेप किया गया। बच्चियों को पीटा गया, बेचा गया और यहाँ तक कि मार भी दिया गया। अकेले रॉदरहैम में ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों ने पिछले 16 वर्षों में 1,400 मासूमों को अपने हवस का शिकार बनाया।
रिपोर्ट की प्रस्तावना में ही लेडी केसी ने ‘समूह-आधारित बाल यौन शोषण’ शब्दों का इस्तेमाल कई बार कई पुरुषों द्वारा बच्चों के खिलाफ किए गए यौन शोषण से जुड़े अपराध के लिए किया है। इसमें बच्चियों के साथ किए गए बदसलूकी, जबरन गर्भपात, यौन संक्रमित बीमारियाँ और बच्चे के पैदा होने पर उन्हें माँ से अलग कर देने का जिक्र है।
अपराध और सोशल मीडिया का बाल यौन शोषण में इस्तेमाल
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि हर साल 500,000 से ज़्यादा बच्चे यौन शोषण का शिकार हो रहे हैं। पुलिस ने 2024 में लगभग 100,000 अपराध दर्ज किए हैं। इनमें से करीब 17,100 बाल यौन शोषण से जुड़े थे। हालाँकि पाकिस्तानी ग्रूमिंग गैंग का द्वारा अपराध का आँकड़ा मात्र 700 बताया गया है। लेडी केसी ने कहा कि यह ‘बेहद असंभव’ है।
यू.के. में ग्रूमिंग गैंग के अपराधों की प्रकृति के बारे में रिपोर्ट कहती है, “ऐसे मामलों में अक्सर बदमाश एक कमजोर बच्ची को अपना निशाना बनाता है। गरीब, नौकर या शारीरिक रूप से अक्षम बच्चियाँ। इन बच्चों को ये बताया जाता है कि ये उनके ‘बॉयफ्रेंड’ हैं। उन्हें प्यार और उपहार दिए जाते हैं। घूमाने के लिए बाहर ले जाते हैं। इसके बाद उन्हें सेक्स के लिए दूसरे पुरुषों को देते हैं। बच्चे को नियंत्रित करने के लिए ड्रग्स और अल्कोहल दिया जाता है और उनके साथ हिंसा और जबरदस्ती भी किया जाता है।”
रिपोर्ट में कहा गया है, “समय के साथ इस मॉडल में कोई खास बदलाव नहीं आया है, हालाँकि अब ग्रूमिंग गैंग ऑनलाइन भी काम कर रहे हैं, और हॉटस्पॉट्स भी बदल रहे हैं।” ‘समूह-आधारित बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार’ पर राष्ट्रीय ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि ये ग्रूमिंग गिरोह अक्सर सामाजिक संबंधों के आधार पर आपस में जुड़े होते हैं और इसलिए अक्सर उम्र, जातीय पृष्ठभूमि और सामाजिक-आर्थिक स्थिति में मोटे तौर पर एक जैसे होते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, “समूह में काम करने से अपराधियों पर इस खौफनाक करतूतों का कोई असर नहीं पड़ता है। महिलाओं के प्रति घृणा और असम्मान की स्थिति की वजह से ये पीड़िताओं की अनदेखी करते है।” रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ऑनलाइन यौन शोषण अपराध की वृद्धि से सामान्य रूप से बाल यौन शोषण की प्रकृति बदल गई है, जो अब सभी यौन शोषण अपराधों का 40% है।
खौफनाक आँकड़े
यू.के. के राष्ट्रीय पुलिस डेटा से पता चलता है कि 2023 में 78% बाल यौन शोषण की शिकार लड़कियाँ थी, जिनकी आयु 10 से 15 वर्ष के बीच थी। रिपोर्ट में लिखा गया है, “डेटा से पता चलता है कि अपराधियों की आयु अलग-अलग है, 2023 में 39% संदिग्ध 10 से 15 वर्ष की आयु के थे और 18% 18 से 29 वर्ष की आयु के थे। संदिग्धों की कम आयु बाल अपराध की रिपोर्टिंग में वृद्धि और ऑनलाइन गिरोह के काम करने की वजह से है। समूह-आधारित बाल यौन शोषण के पीड़ितों और अपराधियों के लिए एकत्र किया गया जातीय डेटा राष्ट्रीय स्तर पर कोई निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं है,”
रिपोर्ट में बताया गया है कि दुर्व्यवहार के पैटर्न में बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं आया है, लेकिन सोशल मीडिया की वजह से बच्चियों से संपर्क करने के तरीकों में थोड़ा बदलाव आया है। जहाँ पहले पीड़िता के साथ शुरुआती संपर्क शॉपिंग सेंटर, पार्क में शुरू होता था, वहीं आज संपर्क सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए हो रहा है। रिपोर्ट कहती है कि ग्रूमिंग और शोषण के लिए स्थान भले ही बदल गए हों, लेकिन मॉडल समान है। बार-बार लापता होना, शोषण के लिए बच्चों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना, उन्हें ‘आज्ञाकारी’ बनाने के लिए ड्रग्स और शराब का इस्तेमाल, होटलों में गुमनाम चेक इन और चेक आउट करना और बच्चों को आकर्षित करने वाले हॉट स्पॉट जैसे कि वेप शॉप ले जाना शामिल है।
अपराधी यौन शोषण के लिए पीड़िताओं की अश्लील तस्वीरों का इस्तेमाल करते हैं। ग्रूमिंग गिरोह नाबालिग लड़कियों को अपनी तस्वीरें साझा करने के लिए लुभाते हैं और फिर उन तस्वीरों का इस्तेमाल करके उन्हें ब्लैकमेल करते हैं और उन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की धमकी देते हैं। इस तरीके से पीड़िताओं को और अधिक यौन शोषण सहने के लिए मजबूर किया जाता है और यह कई सालों तक चलता रहता है।
रिपोर्ट में बच्चियों की अश्लील तस्वीरें लेने के अपराधों (IIOC) में वृद्धि का भी जिक्र किया गया है। दिसंबर 2014 में ऐसे मामले 4,261 थे जो दिसंबर 2024 में 41,033 हो गए यानी पिछले 10 सालों में ऐसे अपराधों में 863% की वृद्धि हुई है। यह पाया गया कि इनमें से ज़्यादातर अपराध सोशल मीडिया पर होते हैं।
ग्रूमिंग गिरोहों की और जानकारी देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है, ” कई मामलों में उन्होंने जाँच की, जिसमें अपराधी और पीड़िता अलग-अलग समुदायों से आए थे। अपराधियों द्वारा ऐसी बच्चियों के प्रति क्रूरता ज्यादा दिखी।”
हालाँकि 2020 के गृह मंत्रालय के रिपोर्ट में समुदाय के नामों का उल्लेख नहीं किया गया है। लेकिन इससे साफ होता है कि मुस्लिम बलात्कार गिरोह यानी ग्रूमिंग गैंग, जिनमें से ज्यादातर पाकिस्तानी मूल के हैं, गैर-मुसलमानों के प्रति घृणा रखते हैं और गैर-मुस्लिम महिलाओं का यौन शोषण करके धार्मिक प्रभुत्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं। यह विकृत मानसिकता इन अपराधों के पीछे अहम वजह है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि “ऑपरेशन स्टोववुड का मानना है कि रॉदरहैम में लगभग दो-तिहाई अपराधी पाकिस्तानी पृष्ठभूमि से थे, और अधिकांश लड़कियाँ श्वेत थीं।” रॉदरहैम में बाल यौन शोषण के 64 प्रतिशत मामलों के लिए पाकिस्तानी पुरुष जिम्मेदार हैं।
इसके अलावा, ऑपरेशन स्टोववुड के तहत बाल यौन शोषण अपराधों के लिए दोषी ठहराए गए कुल 42 अपराधियों में से 62 प्रतिशत पाकिस्तानी पुरुष थे।
ब्रिटेन के अधिकारी जिहादियों का धर्म बताने से कतराते हैं। ऑडिट में पाया गया कि अधिकारियों ने जानबूझकर अपराधियों की धर्म- जाति दर्ज करने से परहेज किया। रिपोर्ट में कहा गया है, “हमने पाया कि अपराधियों की धर्म और जाति बताने से कतराया जाता है और दो तिहाई अपराधियों की जाति अभी भी दर्ज नहीं की गई है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर एकत्र किए गए डेटा से कोई सटीक आकलन देने में हम असमर्थ हैं।” रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि सीमित डेटा के बावजूद यह पाया गया कि अधिकांश अपराधी एशियाई जातीय पृष्ठभूमि के थे।
रिपोर्ट में पाया गया कि यू.के. के अधिकारी बाल यौन शोषण के मामलों में सटीक डेटा बेस तैयार करने और गंभीर केस की समीक्षा करने में विफल रहे हैं, अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर की बात है।
इसमें कहा गया है कि अभियोजन पर आपराधिक न्याय डेटा में वृद्धि देखी गई, लेकिन इसने बाल यौन शोषण के विभिन्न रूपों या समूहों में काम करने वाले अपराधियों के बीच अंतर नहीं किया गया। केसी रिपोर्ट ने इसे “सामूहिक विफलता” करार दिया है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि एशियाई या पाकिस्तानी पुरुषों द्वारा श्वेत लड़कियों को तैयार करने और उनका यौन शोषण करने के बारे में कई रिपोर्ट, समीक्षा सामने आई है। फिर भी सिस्टम “लगातार इसे पूरी तरह से स्वीकार करने या सटीक डेटा एकत्र करने में विफल रहा है ताकि इसकी प्रभावी रूप से जाँच की जा सके।” रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘एशियाई ग्रूमिंग गिरोहों’ के बारे में दावों को खारिज करने के लिए बार-बार त्रुटिपूर्ण डेटा का इस्तेमाल किया जाता है। ये पीड़िताओं के लिए नुकसानदेह है, साथ ही यूके में कानून का पालन करने वाले एशियाई समुदायों के लिए भी नुकसानदेह है।
हालाँकि यूनाइटेड किंगडम ने आखिरकार ग्रूमिंग गिरोह के सदस्यों के पाकिस्तानी मूल के होने की बात कबूल कर ली है। अपराधियों की जाति के बारे में जाँच कर रहा है, लेकिन देश अभी भी खतरे को भाँप नहीं पाया है। यह जाति की समस्या नहीं है, यह धार्मिक रूप से प्रेरित विकृति मानसिकता की समस्या है। इस विकृति को बढ़ावा देने में न केवल पुलिस ने मदद की है, बल्कि राजनेताओं ने भी हर संभव कोशिश की कि इन पाकिस्तानियों ‘बलात्कारी जिहादी’ न बोला जाए। उनकी धार्मिक कट्टरता की कभी निंदा न की जाए। ये लोग मुस्लिम ग्रूमिंग गिरोहों के खिलाफ़ कार्रवाई करके ‘नस्लवादी’ कहलाने से बचना चाहते हैं।
यह याद रखना चाहिए कि 2019 में यूके की सत्ताधारी लेबर पार्टी ने इस्लामोफोबिया की ऑल-पार्टी पार्लियामेंट्री ग्रुप ऑन ब्रिटिश मुस्लिम्स (APPG) परिभाषा को अपनाया था। इसके मुताबिक पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमिंग गिरोहों/बलात्कार गिरोहों की आलोचना करना मुसलमानों के खिलाफ़ ‘नस्लवादी’ है।
ब्रिटिश समाज की नजर में पीड़िता ही दोषी- ठहराने की शर्मनाक प्रवृत्ति पर प्रकाश डालती है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “नस्लीय मुद्दों से बचने के अलावा, हम समाज में टीनएज लड़कियों के प्रति एक अस्पष्ट रवैया भी बनाए रखते हैं। हम अक्सर उन्हें वयस्कों (तथाकथित ‘वयस्कीकरण’) के रूप में आँकते हैं। खासकर असहाय लड़कियों को, जिन्हें अक्सर समय से पहले ‘बड़ा होने’ के लिए मजबूर किया जाता है। वे अपने खुद के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के लिए दोषी करार दिए जाते हैं।”
इसमें आगे कहा गया है, ” अज्ञानता, पूर्वाग्रह और गलत इरादे अपराधियों को सजा दिलाने, उन पर मुकदमा चलाने और बच्चों को नुकसान से बचाने में मददगार साबित होते हैं।” रिपोर्ट में आगे पाया गया कि बाल यौन शोषण के कई मामलों को बलात्कार से हटा दिया गया और कम अपराध वाले श्रेणी में बदल दिया गया। यहाँ तक कि 13 से 15 साल की उम्र के बच्चे को अपराधी के साथ ‘प्रेम में’ या ‘सहमति’ के साथ सेक्स के रूप में लिया गया। केसी रिपोर्ट ने सहमति की उम्र और बाल यौन शोषण के मामलों से निपटने के लिए पुलिस के दृष्टिकोण के बारे में कई सिफारिशें कीं। केसी की रिपोर्ट ने ग्रूमिंग गिरोहों की राष्ट्रीय जाँच को प्रेरित किया है। हालाँकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ब्रिटिश पीएम कीर स्टारमर ने इस साल की शुरुआत में बाल यौन शोषण को लेकर राष्ट्रीय जाँच की मांगों को खारिज कर दिया था।
केसी ने 1990 के दशक के पुलिस डेटा का हवाला देते हुए बताया कि 10 से 18 साल की उम्र के 4,000 से ज़्यादा बच्चों को वेश्यावृत्ति से जुड़े अपराध में शामिल थे। 2015 में गंभीर अपराध अधिनियम में संशोधन के बाद “बाल वेश्यावृत्ति” शब्द को हटाया गया और उसकी जगह “बाल यौन शोषण” शब्द को लाया गया।
ग्रूमिंग गिरोहों को हमेशा बचाने की कोशिश की गई
जाहिर है, इस्लामोफोबिक और नस्लीय रूप से असंवेदनशील दिखने के डर ने ब्रिटेन के अधिकारियों को वर्षों तक पाकिस्तानी मुस्लिम ग्रूमर्स/बलात्कारियों के खिलाफ प्रभावी ढंग से कार्रवाई करने से रोका है। यूनाइटेड किंगडम के मुस्लिम-तुष्टीकरण करने वाले राजनीतिक दलों ने यह भी सुनिश्चित किया कि मुस्लिम समुदाय की आलोचना न की जाए। हालाँकि इस समुदाय के सदस्य विशेष रूप से पाकिस्तानी मूल के लोग, श्वेत और अन्य गैर-मुस्लिम लड़कियों का यौन शोषण करते रहे।
हमें याद रखना चाहिए कि लेबर पार्टी की सांसद सारा चैंपियन को 2017 में द सन में प्रकाशित एक लेख के लिए माफी माँगनी पड़ी थी जिसमें उन्होंने लिखा था कि “ब्रिटेन को ब्रिटिश पाकिस्तानी पुरुषों द्वारा श्वेत लड़कियों का बलात्कार और शोषण करने की समस्या है”। उन्होंने बताया कि ब्रिटेन में रिपोर्ट किए जा रहे बाल यौन शोषण में “मुख्य रूप से पाकिस्तानी पुरुष” शामिल हैं, उन्होंने कहा कि ‘नस्लवादी’ लेबल से बचने की प्रवृति अधिकारियों को जाँच करने से रोकती है।
2012 में, लेबर पार्टी के नेता और गृह मामलों की चयन समिति के अध्यक्ष कीथ वाज़ ने ग्रूमिंग जिहाद अपराधों को कम करके आँका और कहा कि वे नस्लीय रूप से प्रेरित नहीं हैं। उन्होने इस बात पर जोर दिया कि पूरे समुदाय को ‘कलंकित’ नहीं किया जाना चाहिए। ग्रूमिंग गिरोह के सदस्यों की पहचान उजागर न करने पर लेबर पार्टी का शुरू से जोर रहा है। ये मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति को दर्शाता है। 2011 में, पूर्व गृह सचिव जैक स्ट्रॉ ने पाकिस्तानी पुरुषों की सांस्कृतिक प्रथाओं को श्वेत लड़कियों के खिलाफ़ उनके अपराधों के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तानी पुरुष श्वेत लड़कियों को “आसान शिकार” के रूप में देखते हैं। नॉटिंघम क्राउन कोर्ट के न्यायाधीश ने दो पाकिस्तानी व्यक्तियों को कई नाबालिग श्वेत लड़कियों को बहला-फुसलाकर उनके साथ बलात्कार करने का दोषी ठहराया। हालाँकि अपराधियों की पहचान को कम आंका गया।
गलत सहानुभूति, नस्लीय भेदभाव, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और नैतिकता के नाम पर यूनाइटेड किंगडम के नेता और पुलिस पाकिस्तानी पुरुषों को देश में लगभग चार दशकों तक कमज़ोर लड़कियों का बलात्कार करने और उनका शोषण करने से नहीं रोका और जवाबदेही से बचते रहे।
उपहार, ध्यान, प्यार का भ्रम, ड्रग्स, यौन शोषण और हिंसा: बलात्कार जिहादियों ने अपने गैर-मुस्लिम लक्ष्यों को कैसे ‘तैयार’ किया
बलात्कार जिहादी यानी ग्रूमिंग गैंग पहले लड़कियों पर पूरा नियंत्रण करते हैं। “इसकी शुरुआत किसी लड़की को बहुत से गिफ्ट देने, बॉयफ्रेंड बनने का झाँसा देकर उनके साथ अच्छा व्यवहार करना, उन पर ध्यान देना, उनके साथ रहस्य साझा करना हो सकता है। इस तरह वे बच्चों को दोस्तों और परिवार से अलग कर देते हैं। इससे बच्चियों को अपने दुर्व्यवहार करने वाले पर अधिक निर्भर हो जाते हैं, जिसे वे अपना ‘बॉयफ्रेंड’ मान सकते हैं। निर्भरता बढ़ाने और एक या अधिक पुरुषों के साथ सेक्स के बदले में ड्रग्स और शराब की पेशकश की जा सकती है। पीड़ितों के विरोध करने पर हिंसा और जबरदस्ती किया जाता है।
रिपोर्ट में 2010 में डर्बीशायर में 10 ब्रिटिश पाकिस्तानी और 1 श्वेत ब्रिटिश व्यक्ति को 26 लड़कियों को ‘इसी तरह तैयार करने’ और उनका यौन शोषण करने पर दोषी ठहराया गया। रॉदरहैम में 5 ‘एशियाई’ पुरुषों को दोषी ठहराया गया जो ग्रूमिंग गिरोह से जुड़े थे और पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम थे। इसी तरह रोशडेल में 2012 में नौ ‘एशियाई’ पुरुषों को सजा दी गई।
केसी रिपोर्ट ने अपराधियों की पाकिस्तानी मूल के होने का उल्लेख बहुत कम है, ऑपइंडिया ने विस्तार से बताया है कि कैसे ये ग्रूमिंग गिरोह मूल रूप से पाकिस्तानी मुसलमानों के समूह थे जो विशेष रूप से श्वेत और अन्य गैर-मुस्लिम लड़कियों को निशाना बनाते थे।
रिपोर्ट में ऑक्सफोर्डशायर और नॉर्थम्ब्रिया के 2013 के मामलों का भी उल्लेख है। इनमें अपराधी ज्यादातर पाकिस्तानी, अल्बानियाई, कुर्द, बांग्लादेशी, तुर्की, ईरानी, इराकी, पूर्वी यूरोपीय थे। इनकी आयु 27 से 44 वर्ष के बीच थी, जबकि पीड़ितों की आयु 13 से 25 वर्ष के बीच थी।
2015 में बर्मिंघम मेल में एक खबर वेस्ट मिडलैंड्स पुलिस के हवाले से की गई। इसमें रॉदरहैम में उन लोगों के साथ सड़क पर और ऑनलाइन ग्रूमिंग गिरोहों की कार्यप्रणाली में समानताओं का विवरण दिया गया था।
2015 की रिपोर्ट में पाया गया कि पहचाने गए 75 ग्रूमिंग संदिग्धों में से एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तानी जातीय पृष्ठभूमि (62%) से है, 12% श्वेत हैं और 5% अफ्रीकी कैरिबियन हैं।
केसी रिपोर्ट ने ये बात भी कही गई है कि स्थानीय पुलिस को कई वर्षों से ठीक-ठीक पता था कि क्या हो रहा है? लेकिन पुलिस को पाकिस्तानी पुरुषों से संबंधों के कारण समुदाय में तनाव की चिंता थी। केसी रिपोर्ट में ऑपरेशन टेंडरसी, ऑपरेशन लेंटेन, ऑपरेशन सैंक्चुअरी, ऑपरेशन शेल्टर, ब्रैडफोर्ड और कीघली के मामलों का उल्लेख है, जिसमें अधिकांश अपराधी पाकिस्तानी, बांग्लादेशी, तुर्की और अल्बानियाई मूल के पाए गए, जो मूल रूप से मुस्लिम थे। हालाँकि कुछ मामलों में अपराधी श्वेत पृष्ठभूमि के भी थे।
पुलिस की मिलीभगत और पीड़ित परिवारों पर ही कार्रवाई
1980 के दशक में टेलफ़ोर्ड शहर में 11 साल की कम उम्र की कमज़ोर लड़कियों को ग्रूमिंग गिरोहों या बलात्कार गिरोहों द्वारा पूरे चालीस साल तक उठाया गया, बलात्कार किया गया, पीटा गया, बेचा गया और यहाँ तक कि मार भी दिया गया। इनमें ज्यादातर श्वेत लड़कियाँ थी। इन्हें एक बलात्कारी से दूसरे बलात्कारी के पास भेजा जाता था। ये लोग ज़्यादातर ब्रिटिश पाकिस्तानी मूल के थे। इस दौरान तीन लड़कियों की हत्या कर दी गई और दो की मौत हो गई। 170,000 की आबादी वाले शहर में 1,000 से ज़्यादा लड़कियों को पीड़ित होना पड़ा। टेलफ़ोर्ड शहर में पाकिस्तानी ग्रूमिंग गिरोह सचमुच एक ‘रेप सेंटर’ चला रहे थे। हालाँकि पीड़ितों को शराब, सिगरेट खरीदकर, उनके मोबाइल टॉप-अप करके, उपहार खरीदकर उन्हें यह विश्वास दिलाते थे कि वे प्यार में हैं।
रॉदरहैम में भी इसी तरह का एक रैकेट चल रहा था, जिसमें 260,000 की आबादी वाले शहर में पाकिस्तानी मूल के पुरुषों द्वारा लगभग 1,500 लड़कियों का बलात्कार किया गया। उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, उन्हें बेचा गया और खरीदा गया। कई पीड़ितों के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और 1997 से 2013 तक यह दुर्व्यवहार बेरोकटोक चलता रहा। रोशडेल में ये मामला 2002 में सामने आया। यहाँ कम से कम 47 युवा लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसके बाद ये प्रतिक्रिया आ रही है कि ग्रूमिंग गिरोह “ग्रेट ब्रिटेन” की सड़कों पर खुलेआम घूमते रहते हैं।
हडर्सफ़ील्ड, रॉदरहैम, रोशडेल, ऑक्सफ़ोर्ड, ब्रिस्टल, पीटरबोरो और न्यूकैसल सहित यू.के. में कई स्थानों पर यौन शोषण के घोटाले व्यापक रूप से उजागर हुए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इंग्लैंड में लगभग 19,000 बच्चियों का यौन शोषण किया गया।
ये ‘ग्रूमिंग’ अपराध यूनाइटेड किंगडम को परेशान करना जारी रखते हैं क्योंकि नेशनल सोसाइटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ़ क्रुएल्टी टू चिल्ड्रन (NSPCC) ने 2023 में रिपोर्ट की थी कि पिछले पाँच वर्षों में युवाओं के खिलाफ़ ऑनलाइन ग्रूमिंग अपराधों में 82% की वृद्धि हुई है।
पाकिस्तानी मूल के पुरुषों द्वारा संचालित ग्रूमिंग गिरोहों द्वारा कमजोर श्वेत और अन्य गैर-मुस्लिम लड़कियों के साथ बलात्कार करने का मुद्दा सबसे पहले रॉदरहैम, रोशडेल और टेलफ़ोर्ड जैसे शहरों में सामने आया। रॉदरहैम पर 2014 की जे रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 1,400 बच्चों का 16 वर्षों में यौन शोषण किया गया। शोषण करने वाले अधिकांश पाकिस्तानी मूल के पुरुष थे।
कई मामलों में, बलात्कारियों को गिरफ्तार करने के बजाय, पुलिस ने पीड़ितों और उनके परिवारों को ही गिरफ्तार कर लिया। यह आमतौर पर स्थिति को ‘गलत तरीके से समझने’, ग्रूमिंग वाले हिस्से की जाँच करने में विफलता और ज़्यादातर मामलों में जानबूझकर मामले को छिपाने के कारण होता है। ऐसे मामलों में पीड़ितों को अपराधी माना जाता है।
कई सालों तक, यू.के. में ग्रूमिंग गिरोहों को मीडिया और इस्लाम समर्थक राजनेताओं द्वारा “एशियाई” या “दक्षिण एशियाई ग्रूमिंग गिरोह” बताकर बचाया जाता रहा। हालाँकि लुईस केसी की ऑडिट रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि ग्रूमिंग गिरोहों में ज्यादातर पाकिस्तानी मुसलमान शामिल हैं।
भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले अध्याय यानी आपातकाल को 50 वर्ष रहे हैं। 25 जून 1975 देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने यह कदम तब उठाया था, जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी गड़बड़ियों के चलते उनके निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया।
प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की जिद में इंदिरा गाँधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 का इस्तेमाल करते हुए देश में आपातकाल लागू किया। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने ‘आंतरिक अशांति’ का हवाला देते हुए इसकी मंजूरी भी दी। यह आपातकाल कुल 21 महीनों तक चला।
इस दौरान देश में नागरिको के मौलिक अधिकार छीन लिए गए, प्रेस की आज़ादी खत्म कर दी गई, अदालतों की स्वतंत्रता पर रोक लगा दी गई और पूरे देश भर में हजारों लोगों को जेल में ठूंस दिया गया। उन्हें आरोप भी नहीं बताए गए।
इस दौरान विपक्षी नेताओं जैसे कि अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जॉर्ज फर्नांडीस जैसे को भी जेल में बंद कर यातनाएँ दी गईं। संजय गाँधी के नेतृत्व में जबरन नसबंदी अभियान चलाया गया, जिसमें महिलाओ को प्रसव के दौरान जंजीरों में बाँधा गया और लोगों को बलपूर्वक नसबंदी के लिए मजबूर किया गया।
यह दौर भारत में लोकतंत्र के दमन और सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक बन गया। आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के करीबी लोग, जैसे संजय गाँधी, कमल नाथ और अंबिका सोनी, बहुत ताकतवर हो गए थे। इनका असर सांसदों से भी ज्यादा था।
संसद इस दौरान सिर्फ़ एक मुहर लगाने वाली संस्था बनकर रह गई थी। मीडिया की आज़ादी पूरी तरह से छीन ली गई थी। लालकृष्ण आडवाणी ने इस दौर को याद करते हुए कहा था, “मीडिया से झुकने को कहा गया, लेकिन उसने रेंगना चुना।”
पुलिस ने आम लोगों पर इतनी बर्बरता की कि कई लोग जिंदगी भर के लिए अपंग हो गए। देश में ऐसा माहौल बन गया था कि सरकार की नीतियों का विरोध करना अपराध मान लिया जाता था। हर किसी से उम्मीद की जाती थी कि वे सत्ताधारी पार्टी के प्रति वफादार रहें। इस तरह भारत धीरे-धीरे एक पुलिस राज्य बन गया, जहाँ डर और दमन का राज था।
कॉन्ग्रेस के प्रताड़ित ही बाद में राजनीतिक फायदे के लिए बने सहयोगी
50 साल बीत जाने के बाद भी, जहाँ-जहाँ कॉन्ग्रेस की सरकार है, वहाँ तानाशाही जैसा रवैया अब भी देखने को मिलता है। इसका ताजा उदाहरण कर्नाटक में देखने को मिला, जहाँ कॉन्ग्रेस सरकार ने हिंदू कार्यकर्ता चक्रवर्ती सुलीबेले को कर्नाटक राज्य अल्पसंख्यक आयोग की सिफारिशों के आधार पर निशाना बनाया।
पुलिस विभाग के डीजी और आईजीपी कार्यालय ने सभी थानों से उनके खिलाफ दर्ज मामलों की जानकारी माँगी है। एक कार्यक्रम में बोलते हुए, सुलीबेले ने आरोप लगाया कि सरकार ये सब आरसीबी (रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर) के एक कार्यक्रम में भगदड़ की घटना से जनता का ध्यान हटाने के लिए कर रही है।
एक और उदाहरण मध्य प्रदेश का है, जहाँ कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह को पार्टी से छह साल के लिए निकाल दिया गया, क्योंकि उन्होंने राहुल गाँधी और रॉबर्ट वाड्रा की सार्वजनिक आलोचना की थी। इससे साफ होता है कि कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में आज भी असहमति को दबाने और विरोध की आवाज को कुचलने की प्रवृत्ति जारी है।
आपातकाल के दौरान कई विपक्षी नेताओं को जेल में डाला गया और उन पर अत्याचार किए गए। ऐसा ही एक उदाहरण राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का है। उन्हें तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने मीसा कानून के तहत गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया था।
जेल में उनके साथ जो बुरा सलूक हुआ, वह उनके लिए इतना दर्दनाक था कि उन्होंने अपनी बेटी का नाम ही मीसा भारती रख दिया, ताकि वह उस दौर को कभी न भूलें। हालाँकि, अब हालात बदल गए हैं। राजद और कॉन्ग्रेस आज एक साथ हैं।
सितंबर 2023 में राहुल गाँधी खुद लालू यादव के घर गए थे, जहाँ लालू ने उन्हें अपने हाथों से बना मटन खिलाया था। यह दिखाता है कि राजनीति में पुराने विरोध भी समय के साथ बदल सकते हैं।
चोकालिंगा चिट्टीबाबू: DMK नेता जिसको स्टालिन को बचाने पर मिली यातनाएँ
लालू प्रसाद यादव अकेले ऐसे नेता नहीं थे जिन्हें आपातकाल के दौरान कॉन्ग्रेस सरकार ने जेल में डाला था, लेकिन आज वे राजनीतिक फायदा उठाने के लिए कॉन्ग्रेस के साथ खड़े हैं। ऐसा ही एक उदाहरण DMK प्रमुख और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री MK स्टालिन का भी है।
स्टालिन का जन्म 1 मार्च 1953 को हुआ था और जब उन्हें 1976 में गिरफ्तार किया गया, तब वे सिर्फ 23 साल के थे। अपनी आत्मकथा ‘उंगलिल ओरुवन’ (आप में से एक) में उन्होंने जेल के उस समय को ‘यातना शिविर’ कहा है।
उनके पिता 31 जनवरी 1976 को करुणानिधि की अगुवाई वाली DMK सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था। कुछ ही घंटों बाद, पुलिस स्टालिन को गिरफ्तार करने उनके घर गोपालपुरम पहुँची, लेकिन उस वक्त वे पास के शहर माथुरन्थकम में थे।
आज भले ही स्टालिन और उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस के साथ खड़ी हो, लेकिन आपातकाल के समय कॉन्ग्रेस के हाथों उन्हें भी गिरफ्तारी और अत्याचार झेलना पड़ा था। जब पुलिस करुणानिधि के घर पहुँची, तो अधिकारियो ने कहा कि वे यह देखने के लिए तलाशी लेना चाहते हैं कि स्टालिन वहाँ छिपे हुए तो नहीं हैं।
करुणानिधि ने तलाशी का विरोध नहीं किया और पुलिस को बताया कि स्टालिन अगली सुबह लौट आएँगे। उन्होंने यह भी कहा कि अगर जरूरत हो तो स्टालिन की जगह उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाए। जब स्टालिन 1 फरवरी 1976 को घर लौटे, तो उन्होंने अपनी माँ दयालु अम्माल और पत्नी दुर्गा को रोते हुए देखा।
उनके पिता करुणानिधि ने उन्हें समझाया कि पुलिस उनकी तलाश कर रही है और राजनीति में आने वालों को बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए। इसके बाद करुणानिधि ने खुद पुलिस को बताया कि स्टालिन लौट आया है और कहा कि उसे गिरफ्तार कर लें।
पुलिस ने स्टालिन को मीसा कानून (MISA – आंतरिक सुरक्षा अधिनियम) के तहत गिरफ्तार कर लिया। इस घटना से हमे समझा आता है कि आपातकाल के समय कॉन्ग्रेस सरकार ने विपक्षी नेताओं और उनके परिवारों को किस तरह से निशाना बनाया था।
आपातकाल के दौरान जेल में रहना अपने आप में बहुत कठिन और डरावना था। पुलिस की बर्बरता इतनी ज्यादा थी कि इससे किसी की भी हिम्मत टूट सकती थी। उस समय MK स्टालिन भी जेल में थे और उनकी हालत बहुत खराब थी। लेकिन उनकी DMK पार्टी के साथी नेताओं ने उन्हें संभाला और बचाया।
चोकलिंगा चिट्टीबाबू, जो DMK नेता और लोकसभा सांसद थे, उन्होंने स्टालिन को पुलिस की मार से बचाते हुए अपनी जान तक गँवा दी। स्टालिन ने 2009 में अपने परिवार के साथ जब जेल का दौरा किया, तो उन्होंने इस दर्दनाक घटना को याद किया। उन्होंने बताया कि चिट्टीबाबू ने उन्हें बचाने के लिए पुलिस की बर्बरता झेली और इसी कारण उनकी मौत हो गई।
करुणानिधि का मानना था कि जेल में जो अत्याचार स्टालिन ने देखे और झेले, वही उन्हें राजनीति में लाने का कारण बने। स्टालिन ने जुलाई 2019 में एक शादी समारोह के दौरान बताया कि कैसे अर्काट एन वीरासामी और चिट्टीबाबू की मजबूत मौजूदगी और नैतिक साहस ने उन्हें जेल में जिंदा रहने में मदद की।
चिट्टीबाबू, जिन्हें ‘मेयर चिट्टीबाबू’ के नाम से भी जाना जाता है, उन्होंने 1967 और 1971 में लोकसभा चुनाव जीते थे। उनका जन्म 4 जनवरी 1937 को हुआ था। 1976 में आपातकाल के दौरान मीसा (MISA) कानून के तहत उन्हें भी गिरफ्तार किया गया था।
स्टालिन ने मई 2023 में चिट्टीबाबू के सम्मान में एक पुल का नामकरण किया और उनके बलिदान को याद करते हुए गहरा आभार व्यक्त किया। चिट्टीबाबू की कुर्बानी आज भी याद की जाती है, क्योंकि उन्होंने स्टालिन की जान बचाने के लिए अपनी जान दे दी।
DMK ने उसी कॉन्ग्रेस के साथ मिलाया हाथ
आपातकाल लगे हुए अब 50 साल बीत चुके हैं, लेकिन इसके ज़ख्म आज भी भारतीय लोकतंत्र में ताज़ा हैं। इस काले दौर की एक दर्दनाक याद DMK नेता और पूर्व सांसद चोकलिंगा चिट्टीबाबू की मौत है। उन्होंने युवा MK स्टालिन को पुलिस की बर्बरता से बचाते हुए गंभीर चोटें खाईं, जिससे उनकी मौत हो गई।
उनकी मौत कोई हादसा नहीं थी, बल्कि कॉन्ग्रेस सरकार की तानाशाही का नतीजा थी। यह दुख की बात है कि आज वही DMK, जिसकी सरकार को कॉन्ग्रेस ने गिरा दी थी और नेताओं को जेल में ठूंस दिया था वही आज राजनीतिक फायदे के लिए उसी कॉन्ग्रेस के साथ खड़ी है। उसको अपने नेता का बलिदान भी याद नहीं रहा।
कॉन्ग्रेस ने सिर्फ नेताओं को नहीं, बल्कि परिवारों को तोड़ा है और और लोकतंत्र का गला घोंटा। इसके पीछे उसने देश में ‘आंतरिक गड़बड़ी’ का हवा हवाई कारण बताया है। स्टालिन को बचाने के लिए जान देने वाले चिट्टीबाबू अगर आज होते, तो शायद DMK और कॉन्ग्रेस के इस गठबंधन को देखकर दुखी और हैरान होते।
चिट्टीबाबू के नाम पर पुल बनाना तभी सच्चा सम्मान होगा जब डीएमके उस पार्टी से नाता तोड़े जिसने उसकी आत्मा को कुचला था। ऐसा लगता है कि सत्ता की लालसा में DMK ने अपने अतीत और आत्मसम्मान को भुला दिया है। गोपालपुरम, जहाँ एक समय यातना और बलिदान की कहानियाँ थीं, अब बस राजनीतिक समझौतों का गवाह बनकर रह गया है।
देश को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आपातकाल कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी। यह कॉन्ग्रेस की विरासत पर एक काला धब्बा है, और एक चेतावनी है कि जब सत्ता का गलत इस्तेमाल होता है, तो संविधान भी बेबस हो सकता है।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बुधवार (18 जून 2025) की सुबह एक प्रेस बयान में बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत हुई।
जी-7 समिट से ट्रंप के जल्दी लौटने की वजह से दोनों नेताओं की तय मुलाकात नहीं हो पाई थी। इसके बाद ट्रंप के अनुरोध पर दोनों के बीच 35 मिनट से ज्यादा की औपचारिक फोन बातचीत हुई।
Foreign Secretary Vikram Misri announced that Prime Minister @narendramodi had a telephonic conversation with US President #DonaldTrump, which lasted approximately 35 minutes. During the discussion, PM Modi briefed President Trump about Operation Sindoor. PM Modi clarified that… pic.twitter.com/1RuPVc778V
ये फोन कॉल कई मायनों में बेहद अहम थी – न सिर्फ बातचीत के मुद्दों की वजह से, बल्कि इसके समय और उसमें दिए गए संदेशों की वजह से भी। आइए, जानते हैं कि ये बातचीत क्यों इतनी खास थी…
1- पहलगाम हमले के बाद पहली सीधी बात
विक्रम मिस्री ने साफ-साफ बताया कि 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम हमले के बाद ये पहली बार था जब पीएम मोदी और ट्रंप ने सीधे बात की। इस बातचीत में ट्रंप ने हमले में मारे गए लोगों के लिए संवेदना जताई और भारत के आतंकवाद के खिलाफ रुख का समर्थन किया।
ये बात इसलिए अहम है क्योंकि ट्रंप की बड़बोली और आत्ममुग्ध मीडिया टिप्पणियों से ऐसा लग रहा था जैसे भारत और अमेरिका के बीच कई बार बात हो चुकी हो। ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने व्यापार का दबाव डालकर भारत को पाकिस्तान से बात करने और युद्धविराम के लिए ‘राजी’ किया।
मिस्री के बयान ने साफ कर दिया कि ट्रंप का ये ‘शांति स्थापित करने’ वाला दावा पूरी तरह झूठा और भ्रामक था। ये बयान ट्रंप की गलत बयानबाजी को खुलेआम बेनकाब करता है।
2- ‘गोली का जवाब गोला’ का दोहराया संकल्प
फोन बातचीत में पीएम मोदी ने ट्रंप को दो टूक याद दिलाया कि भारत ने पूरी दुनिया को बता दिया है कि पहलगाम हमले का जवाब वो जबरदस्त तरीके से देगा। मोदी ने कहा कि 6-7 मई 2025 की रात को भारत की ऑपरेशन सिंदूर कार्रवाई एक संयमित, गैर-उकसावे वाली और सटीक सैन्य कार्रवाई थी, जो पीओके और पाकिस्तान में आतंकी ढाँचों पर केंद्रित थी।
पीएम मोदी ने डोनाल्ड ट्रंप को साफ बता दिया है कि भारत ने पहले भी पाकिस्तान की किसी भी उकसावे की कार्रवाई का जवाब दिया है और आगे भी देगा और वो भी बड़े पैमाने पर – ‘गोली का जवाब गोला’।
पीएम मोदी का ये बयान नये भारत की ताकत और आत्मविश्वास को दिखाता है। ये वो भारत है जो किसी विदेशी ताकत के इशारे पर नहीं चलता, बल्कि अपनी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा के लिए दुश्मन को करारा जवाब देता है। ये बयान शांत लेकिन दृढ़ संकल्प का प्रतीक है।
3- जेडी वेंस की चेतावनी और भारत का और बड़ा जवाब
पीएम मोदी ने ट्रंप को ये भी बताया कि ऑपरेशन सिंदूर के पहले चरण के बाद 9 मई की रात को अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने उन्हें फोन करके पाकिस्तान की ओर से एक ‘बड़े हमले’ की चेतावनी दी थी। भारत ने वेंस को बहुत साफ शब्दों में बता दिया कि पाकिस्तान की किसी भी उकसावे की कार्रवाई का जवाब भारत और जोरदार और बड़ा देगा। और भारत ने ऐसा ही किया।
पीएम मोदी ने ट्रंप को बताया कि पाकिस्तान की उकसावे की कार्रवाई के जवाब में भारत ने सटीक सैन्य हमले किए, जिन्होंने पाकिस्तान की हवाई सुरक्षा को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया और उनके हवाई अड्डों को बेकार कर दिया। भारत ने पूर्ण हवाई वर्चस्व हासिल कर लिया। इसके बाद पूरी तरह टूट चुका पाकिस्तान भारत से युद्धविराम की गुहार लगाने को मजबूर हो गया। ये भारत की सैन्य ताकत और रणनीतिक चतुराई का सबूत है।
4- व्यापार सौदे या मध्यस्थता की कोई बात नहीं
पीएम मोदी ने ट्रंप को साफ-साफ याद दिलाया कि न तो पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व के साथ और न ही अमेरिकी नेतृत्व के साथ किसी भी बातचीत में व्यापार का जिक्र तक हुआ। उन्होंने ये भी साफ किया कि भारत ने कभी भी अमेरिका के साथ ‘मध्यस्थता’ की बात नहीं की, क्योंकि भारत पाकिस्तान के साथ अपने द्विपक्षीय मुद्दों में किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को कभी स्वीकार नहीं करेगा। भारत में इस मुद्दे पर पूरी राजनीतिक सहमति है।
मोदी ने ट्रंप को बताया कि सैन्य कार्रवाई को रोकने की सारी बातचीत भारत और पाकिस्तान के स्थापित सैन्य चैनलों के जरिए हुई, जिसमें कोई तीसरा देश शामिल नहीं था और न ही कोई व्यापार सौदा इसका हिस्सा था। मोदी ने ये भी दोहराया कि ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ है और भारत अब किसी भी आतंकी हमले को युद्ध की कार्रवाई मानेगा। ये बयान भारत की स्पष्ट और अटल नीति को दर्शाता है।
5- ट्रंप का स्टॉपओवर न्योता ठुकराना एक बड़ा कदम
एक साहसिक और रणनीतिक कदम उठाते हुए, पीएम मोदी ने ट्रंप के अमेरिका में स्टॉपओवर मीटिंग के न्योते को विनम्रता से ठुकरा दिया। ट्रंप ने मोदी को कनाडा से भारत लौटते वक्त अमेरिका में रुककर मुलाकात करने का न्योता दिया था, लेकिन मोदी ने कहा कि उनके पास पहले से तय कार्यक्रम और जिम्मेदारियां हैं, इसलिए स्टॉपओवर संभव नहीं है। ये विनम्र इनकार एक ताकतवर संदेश देता है।
बिना कुछ कहे मोदी ने अमेरिका को बता दिया कि भारत अब कोई ‘छोटा देश’ नहीं है, जिसके नेता बड़े देशों के बुलावे पर दौड़ पड़ें। ये इनकार भारत की प्राथमिकताओं और आज की दुनिया में उसकी ताकत और आत्मसम्मान को दिखाता है। ये कदम भारत की बढ़ती वैश्विक हैसियत का प्रतीक है।
6- क्या ट्रंप ने मोदी को ‘फँसाने’ की कोशिश की?
ट्रंप के स्टॉपओवर न्योते का समय बहुत अहम है। अभी पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर अमेरिका में हैं। वो 15 जून से 5 दिन के दौरे पर हैं और ट्रंप से मुलाकात की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में ट्रंप का मोदी को स्टॉपओवर के लिए बुलाना शायद इस कोशिश का हिस्सा था कि वो मोदी और मुनीर को एक साथ एक कमरे में या एक मेज पर लाकर अपनी ‘शांति स्थापक’ वाली छवि को और चमकाएँ।
ट्रंप पहले भी दावा कर चुके हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच ‘परमाणु युद्ध’ रोका। उनकी बयानबाजी और आत्मप्रचार को देखते हुए, ये सोचना गलत नहीं कि वो मोदी और मुनीर की तस्वीरों का इस्तेमाल करके अपने ‘शांति स्थापक’ दावे को और बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते।
लेकिन मोदी ने स्टॉपओवर ठुकराकर ट्रंप की इस पीआर चाल को पूरी तरह नाकाम कर दिया। साथ ही मुनीर को भी बता दिया कि भारत उनकी तरह के नेताओं के साथ बेकार की नौटंकी में वक्त नहीं गँवाएगा। ये कदम ट्रंप और मुनीर दोनों को भारत की चतुराई और दृढ़ता का आइना दिखाता है।
7- भारत और पाकिस्तान बराबर नहीं: दुनिया को साफ संदेश
पीएम मोदी की इस फोन बातचीत ने चुपके से एक बहुत बड़ा संदेश दिया है। ट्रंप को भारत और पाकिस्तान के नेताओं को एक साथ बुलाने का मौका न देकर, मोदी ने साफ कर दिया है कि भारत और पाकिस्तान को एक जैसा नहीं माना जा सकता।
दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, एक मजबूत और आधुनिक सेना और एक स्थिर लोकतांत्रिक सरकार वाला भारत को एक टूटे-फूरे, आतंक से ग्रस्त, अस्थिर और गरीबी में डूबे पाकिस्तान के साथ नहीं जोड़ा जा सकता। ये संदेश न सिर्फ अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया के लिए है। मोदी ने बिना शब्दों के बता दिया कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर खड़ा है।
भारत यहाँ टिकने के लिए आया है। ये एक बहुध्रुवीय दुनिया है, और भारत उन ध्रुवों में से एक है जो अपने नियम बनाएगा और अपनी राह चुनेगा। भारत को नजरअंदाज करना या गलत समझना दुनिया की सबसे बड़ी भूल होगी।
ये संदेश पीएम मोदी ने जी-7 समिट से लौटते वक्त एक फोन कॉल में दे दिया। इस बातचीत ने न सिर्फ भारत की ताकत और संयम दिखाया, बल्कि ये भी साफ कर दिया कि भारत अब अपनी शर्तों पर दुनिया से बात करेगा।
G7 शिखर सम्मेलन के दौरान कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने भारत के पीएम नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इसके बाद मीडिया ने कार्नी से हरदीप सिंह निज्जर की हत्या पर सवाल किया। इस पर कनाडाई पीएम ने कहा कि कानूनी प्रक्रिया चल रही है, पर मुझे बोलने से पहले सतर्क रहना होगा।
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार तीन देशों के दौरे पर हैं। इनमें साइप्रस, कनाडा और क्रोएशिया शामिल है। G7 शिखर सम्मेलन में भी कनाडा ने पीएम मोदी को आमंत्रित किया था।
भारत G-7 देशों का हिस्सा नहीं है, पर आमंत्रण के बाद आउटरीच पार्टनर के तौर पर भारत शिखर सम्मेलन में शामिल हुआ। इस दौरान पीएम मोदी G7 सम्मेलन के लिए आए कई देशों के नेताओं से मिले और द्विपक्षीय वार्ता भी की।
मीडिया से बात करते हुए कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा कि पीएम मोदी के साथ उन्होंने प्रवर्तन (law enforcement) के महत्व और उसके प्रत्यक्ष सहयोग पर चर्चा की इसके अलावा अंतर्राष्ट्रीय दमन पर भी बात की गई।
#WATCH | Kananaskis: On whether he mentioned the Nijjar case during his meeting with PM Modi, Canadian PM Mark Carney says, "We discussed the importance of having the law enforcement dialogue, not just dialogue, cooperation directly, the importance of addressing transnational… pic.twitter.com/jxMCGQB7sf
इस दौरान मीडिया ने सवाल पूछा कि निज्जर हत्या के मामले को लेकर क्या पीएम मोदी से कोई चर्चा की गई। इस पर कार्नी ने कहा, “मामले की कानूनी प्रक्रिया चल रही है, लेकिन इस पर कुछ और कहने से पहले मुझे सावधानी बरतनी होगी।”
वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक पर कनाडा पीएम से मुलाकात के बाद लिखा कि दोनों देशों के बीच दोस्ती बढ़ाने पर काम किया जाएगा। इसके अलावा दोनों नेताओं ने व्यापार, एनर्जी, अंतरिक्ष, स्वच्छ ऊर्जा, दुर्लभ मिनरल्स और फर्टिलाइजर्स समेत कई अन्य मुद्दों पर चर्चा कर इस पर आगे काम करने की बात कही।
Had an excellent meeting with Prime Minister Mark Carney. Complimented him and the Canadian Government for successfully hosting the G7 Summit. India and Canada are connected by a strong belief in democracy, freedom and rule of law. PM Carney and I look forward to working closely… pic.twitter.com/QyadmnThwH
प्रधानमंत्री मोदी ने लिखा, “कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ शानदार बैठक हुई। भारत और कनाडा लोकतंत्र, स्वतंत्रता और कानून के शासन के साथ विश्वास से जुड़े हुए हैं और दोनों देशों की दोस्ती को आगे बढ़ाने पर काम करेंगे।
गौरतलब है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा घोषित आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की 18 जून 2023 को एक गुरुद्वारे के बाहर गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। यहाँ तक कि कनाडा के पूर्व पीएम जस्टिन ट्रूडो ने दावा किया था कि निज्जर की हत्या में भारतीय एजेंट जुड़े हुए हैं। इसके बाद दोनों देशों के बीच तनाव का माहौल बन गया था।
अक्टूबर 2024 में भारत ने कनाडा से अपने 6 डिप्लोमेट्स वापस बुला लिए थे। वहीं, कनाडा के डिप्लोमेट्स को भी भारत से वापस भेज दिया गया था। इसके बाद मार्च में चुने गए कनाडा के नए प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने दोनों देशों के बीच के तनाव को खत्म करने के लिए G7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी को आमंत्रित कर दोबारा दोस्ताना माहौल शुरू करने की कोशिश की है।
G-7 दुनिया की 7 उन्नत अर्थव्यवस्थाओं और यूरोपीय संघ का एक अनौपचारिक समूह है। इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं। रूस भी पहले इस समूह का हिस्सा था, लेकिन क्रीमिया देश पर कब्जा करने के बाद समूह से उसे निष्कासित कर दिया गया।
G7 शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री अल्बनीज समेत अन्य नेताओं के साथ मुलाकात कर द्विपक्षीय वार्ता की। G7 में प्रतिभाग करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी क्रोशिया के दौरे पर निकल गए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ अपनी बयानबाजी काफी तेज कर दी है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर सीधा संदेश देकर कहा, “अमेरिका जानता है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई कहाँ छिपे हैं, लेकिन ‘फिलहाल’ उन्हें मारेंगे नहीं।”
ट्रंप ने ईरान से ‘बिना शर्त आत्मसमर्पण’ करने की माँग की है, जिससे यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अमेरिका, इजरायल के हमलों में शामिल होगा।
वहीं, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने युद्ध का ऐलान करते हुए X (पहले ट्वीटर) कर कहा, “हमें आतंकवादी इजरायली शासन को करारा जवाब देना होगा। हम इजरायली समर्थकों पर कोई रहम नहीं दिखाएंगे।”
We must give a strong response to the terrorist Zionist regime. We will show the Zionists no mercy.
ट्रंप ने अपने ‘ट्रूथ सोशल’ प्लेटफॉर्म पर साफ शब्दों में लिखा, “हमें पता है कि तथाकथित ‘सर्वोच्च नेता’ कहाँ छिपा है। वो एक आसान निशाना है, पर फिलहाल सुरक्षित है, हम उसे मारेंगे नहीं।” ट्रंप ने यह भी चेतावनी दी कि अगर मिसाइलें नागरिकों या अमेरिकी सैनिकों पर दागी गईं तो अमेरिका का धैर्य जवाब दे जाएगा।
एक और चौंकाने वाले दावे में ट्रंप ने कहा कि ‘हमारे पास ईरान के आसमान पर पूरा और संपूर्ण कंट्रोल है’, और फिर ट्रंप ने अमेरिकी हथियारों की जमकर तारीफ की। ट्रंप का इशारा साफ था कि ईरान का डिफेंस सिस्टम अमेरिकी तकनीक के सामने कुछ भी नहीं है।
सो कर जागा चीन
जी-7 शिखर सम्मेलन से लौटते हुए ट्रंप ने पत्रकारों से कहा कि उन्हें ईरान-इजरायल संघर्ष में ‘युद्धविराम नहीं, बल्कि एक वास्तविक अंत’ चाहिए और वह ‘बातचीत के मूड में नहीं’ हैं। ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को ख़त्म करने के लिए पहले प्रस्तावित समझौते पर हस्ताक्षर न करने पर भी निराशा जताई।
इस बीच, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी इस लड़ाई पर पहली बार अपनी बात रखी है। शी जिनपिंग ने कहा कि चीन को मीडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में बढ़ते तनाव की बहुत चिंता है। शी जिनपिंग ने साफ किया कि चीन किसी भी ऐसे काम के खिलाफ है, जो किसी देश की आज़ादी या उसकी सीमाओं को नुकसान पहुँचाए।
ट्रंप के लगातार बयान बताते हैं कि अमेरिका का इस संघर्ष में सीधा हस्तक्षेप अब नज़दीक हो सकता है, जिससे इस क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।
न्यूज एजेंसी एएनआई (ANI) की एडिटर इन चीफ स्मिता प्रकाश ने खान सर (Khan Sir) के साथ एक पॉडकास्ट किया है। ANI के यूट्यूब चैनल पर 14 जून 2025 को अपलोड किए गए इस पॉडकास्ट को 15 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। पर उससे भी अधिक इस पॉडकास्ट के क्लिप सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे हैं जो छात्रों के खान सर की ‘बौद्धिक क्षमता’ का बखान कर रहे हैं।
सामान्य तौर पर हर व्यक्ति को अपने से पहले की पीढ़ी पिछड़ी और अपने बाद की पीढ़ी निखट्टू लगती है, पर एक कथित कोचिंग गुरु से ऐसे विषयों पर गंभीरता की अपेक्षा की जाती है। लेकिन हाल ही में गुपचुप निकाह करने वाले खान सर से जब पॉडकास्ट के दौरान स्मिता प्रकाश ने इसी को लेकर सवाल किया तो उनका जवाब हैरान करने वाला था।
उन्होंने इस सवाल को खारिज करने की कोशिश की। उसी पीढ़ी को गैर जिम्मेदार, लापरवाह बताने की कोशिश की जिसके कारण वे ‘खान सर’ बने हैं। सवाल करने की नई पीढ़ी के साहस और आत्मविश्वास का जिक्र करते हुए स्मिता प्रकाश ने पूछा कि हम जब बच्चे थे तो गाँधी-नेहरू को हीरो की तरह देखते थे। कोई दूसरा विचार नहीं हो सकता था। लेकिन आज के बच्चे बहस करते हैं, पढ़ते-सुनते हैं और कई मसलों पर उनके फैसलों को लेकर सवाल भी उठाते हैं।
इसके जवाब में खान सर कहते हैं, “आजकल की जेनरेशन जो 4 बजे तक अपना डेढ़ जीबी डाटा खत्म कर देती है। हफ्ते में जिनको कोई काम नहीं करना है, फिर भी संडे को आराम करते हैं। ये जेनरेशन जो आज अपने मुखिया के खिलाफ सवाल नहीं उठाता। जिसके सामने दो कौड़ी का ठेकेदार घटिया मसाला डालकर नालियाँ बना देता है, जिसका ढक्कन टूट जाता है, ये उसके खिलाफ आवाज नहीं उठाता है। ये जेनरेशन गाँधी पर आवाज उठाती है जो गुलामी में महारानी से लड़ गया था। जो अपने विधायक से नहीं लड़ सकता है, बिना पैसा खिलाए प्रधानमंत्री आवास योजना से घर नहीं बनवा सकता है, वो आवाज उठाता है कि गाँधी सही थे या गलत।”
नीचे लगे वीडियो में आप 2:40 से यह बातचीत सुन सकते हैं।
जैसा कि अपने सवाल में ही स्मिता प्रकाश ने गाँधी-नेहरू को लेकर अपनी पीढ़ी की समस्या के बारे में बताया है, यह माना जा सकता है कि ‘खान सर’ के पास भी इनको लेकर दूसरा कोई विचार नहीं हो। इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन गाँधी-नेहरू पर सवाल करने वालों को जिस गंभीरता से उन्होंने खारिज किया है, यह मसखरी से अधिक कुछ नहीं है।
बिहारी टोन वाली अपनी मसखरी में बात करते हुए ‘खान सर’ यह भी भूल गए कि जिस पीढ़ी को वे खारिज कर रहे हैं, उसने ही अपना डाटा फूँक-फूँक कर फैसल खान को ‘खान सर’ बनाया है। वे भूल गए यही पीढ़ी गाँव-गाँव गलियों का मोबाइल से वीडियो बनाकर भ्रष्टाचार उजागर करती है। यह पीढ़ी आरटीआई का इस्तेमाल कर जवाब माँगती है। सालभर सोशल मीडिया पोस्ट्स के जरिए अपने जन प्रतिनिधियों का निकम्मापन उजागर करती है।
इस पीढ़ी के सवालों/विचारों से सहमत/असहमत होना ‘खान सर’ का अधिकार है। पर वे इस बात को खारिज नहीं कर सकते कि इस पीढ़ी के पास अपने पुरानी पीढ़ियों से सवाल पूछने का कहीं अधिक साहस है। यह पीढ़ी कहीं अधिक आत्मविश्वास से भरी हुई है। तकनीक और ज्ञान को सहजता से ग्रहण कर लेने की उसकी क्षमता पुरानी पीढ़ियों से कहीं अधिक है। यह पीढ़ी यह सब कुछ उस समयकाल में कर रही है जो पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है। वह उस दौर में फल-फूल रही है जब दुनिया ने कोरोना जैसा वैश्विक संकट देखा है। जब गाँव के दायरे फैलकर ग्लोबल विलेज का विस्तार पा चुकी है।
ऐसा नहीं है कि ढाई घंटे से लंबे इस पॉडकास्ट में ‘खान सर’ का छिछलापन/मसखरापन केवल इसी एक सवाल के जवाब में उजागर होता है। ऑपरेशन सिंदूर से लेकर अग्निवीर तक, नेहरू-पटेल जैसे से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों से लेकर मौजूदा समय से जुड़े सवालों तक उन्होंने इसका भरपूर प्रदर्शन किया है।
ऐसा भी नहीं है कि ‘खान सर’ को इस नई पीढ़ी की क्षमता का पता नहीं है। उनके पास कोचिंग के लिए आने वाले लोग इसी पीढ़ी के हैं। इस पीढ़ी से ‘खान सर’ का हम जैसों से कहीं अधिक रोजाना का सीधा संवाद है। इस पीढ़ी की मेहनत की प्रशंसा करते हुए वे हाल में तब भी दिखे थे जब NEET में उनके ही संस्थान के कुछ बच्चों ने सफलता हासिल की। इस नतीजे से पहले तक ‘खान सर’ की छवि ग्रुप डी के एग्जाम क्लियर कराने वाले मास्टर के तौर पर ही थी।
बावजूद इसके इस पॉडकास्ट में जिस तरह से ‘खान सर’ ने जवाब दिए हैं, उससे पता चलता है कि वे नई पीढ़ी के डाटा से बनी प्रसिद्धि को भुनाकर उसी ‘महीन एजेंडा’ को अब आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे यह देश कहीं आगे की यात्रा कर चुका है। उनकी यह कोशिश बिहार में BPSC परीक्षा के नियमों में बदलाव के विरुद्ध छात्रों के प्रदर्शन के दौरान भी दिखी थी।
पर ‘खान सर’ को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके अंतर्मन की दबी-कुचली इच्छाओं का भार डाटा फूँकने वाली पीढ़ी क्लासरूम की चौहद्दी के बाहर शायद ही उठाने को तैयार हो। बेहतर होगा कि अपना डाटा फूँक वे नई पीढ़ी से इस पॉडकास्ट से दूर रहने की अपील करें, क्योंकि इसमें उन्होंने जो हगा उसका दुर्गंध फैलाने के लिए नई पीढ़ी ने अपने डाटा का इस्तेमाल कर दिया तो संकट ‘खान जीएस रिसर्च सेंटर’ के जरिए फुलाए गए गुब्बारे की हवा भी निकाल सकता है।
कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की नई आरक्षण सूची जारी करने पर रोक लगा दी है। यह नई सूची राज्य की सत्तारूढ़ ममता बनर्जी सरकार ने बनाई है। इसमें 76 जातियों को जगह दी गई है। इनमें से 85%+ जातियाँ मुस्लिम थीं। कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले पर भाजपा नेताओं ने प्रसन्नता व्यक्त की है।
कलकत्ता हाई कोर्ट की जस्टिस तपब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस राजशेखर मंथा की बेंच ने मंगलवार (17 जून, 2025) को यह निर्णय सुनाया। बेंच ने बंगाल सरकार की इस नई OBC आरक्षण लिस्ट के जारी किए जाने पर रोक लगाई है। यह रोक अंतरिम तौर पर लगाई गई है जो 31 जुलाई, 2025 तक जारी रहेगी।
#BREAKING The Calcutta High Court has stayed the implementation of the West Bengal government's OBC list notification until July 31. The decision was made by a division bench comprising Justice Tapabrata Chakraborty and Justice Rajasekhar Mantha pic.twitter.com/H6hKz5s4Bc
कलकत्ता हाई कोर्ट ने इसी के साथ बंगाल सरकार के पोर्टल पर भी रोक लगा दी है। बंगाल सरकार ने इस पोर्टल के जरिए जातियों के आवेदन खोले थे। इस मामले की अगली सुनवाई 31 जुलाई, 2025 तक है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने यह निर्णय एक याचिका पर सुनाया है।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि पश्चिम बंगाल नई सूची में फिर से उन जातियों को जोड़ रही है, जिनका आरक्षण पिछली बार कलकत्ता हाई कोर्ट ने खत्म कर दिया था। इस फैसले का राज्य के नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने स्वागत किया है।
उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “मैं ममता बनर्जी सरकार द्वारा तैयार की गई नई OBC सूची में 76 मुस्लिम वर्गों को शामिल करने पर रोक लगाने के ऐतिहासिक निर्णय के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ। यह एक अहंकारी राज्य सरकार के खिलाफ न्यायपालिका की एक शानदार जीत है… ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC सरकार की तुष्टिकरण की राजनीति, OBC सूची में लगभग 90% नए मुस्लिम वर्गों के शामिल करने से स्पष्ट है और यह समानता तथा निष्पक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन है।”
I extend my heartfelt gratitude to the Hon'ble High Court at Calcutta for the landmark decision to stay the inclusion of 76 Muslim classes in the new OBC list prepared by the Mamata Banerjee Government. This is a resounding victory of the Judiciary against an arrogant State…
उन्होंने कहा कि 2010 में TMC के आने से पहले OBC वर्गों में केवल 20% मुस्लिम थे लेकिन ममता बनर्जी के शासन में यह संख्या आसमान छू गई है। उन्होंने कहा कि इसके चलते आरक्षण के हक़दार हिन्दुओं का हक़ मारा जा रहा है।
भाजपा नेता अमित मालवीय ने इस फैसले को तुष्टिकरण की राजनीति पर चोट बताया है। अमित मालवीय ने इससे पहले कहा था कि ममता बनर्जी की सरकार द्वारा बनाई गई नई 2 सूचियों में 76 में 67 जातियाँ मुस्लिम हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि लिस्ट A में मुस्लिमों को 84% जबकि लिस्ट B में 90% जगह दी गई है।
Another blow to Mamata Banerjee’s politics of appeasement!
The Calcutta High Court has stayed the West Bengal Government’s recent notifications that attempted to reintroduce OBC reservations for several Muslim groups — the very same classifications that were earlier struck down… https://t.co/UY8D91NIN7
वहीं मीडिया रिपोर्ट्स ने बताया है ममता सरकार ने 76 में से 74 जातियाँ वही रखी हैं जिनका आरक्षण मई, 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने खत्म कर दिया था। ममता बनर्जी की सरकार इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।