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मुगल काल में हिंदुओं से उठवाए जाते थे गोवंश के अवशेष, अब बकरीद पर नहीं करेंगे ‘बड़े’ पशुओं की ‘कुर्बानी’ की सफाई : शाहजहाँपुर में हिंदू कर्मचारियों की माँग, पत्र लेकर DM के पास पहुँचे

उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर जिले में हिंदू सफाई कर्मचारियों ने साफ कर दिया है कि वो बकरीद के दौरान ‘बड़े पशुओं’ की कुर्बानी के अवशेषों को नहीं उठाएँगे। सफाई कर्मचारियों ने इसे लेकर जिलाधिकारी को पत्र भी लिखा है। पत्र में नगर निगम और नगर पंचायतों में कार्यरत हिंदू सफाई कर्मचारियों ने इस बार कुर्बानी के पशुओं के अवशेषों की सफाई कार्य में भाग नहीं लेने की बात कही है। उनका कहना है कि मुगलिया दौर से चल रहा ये काम उनकी धार्मिक आस्थाओं और परंपराओं के खिलाफ है और अब वह इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ाना चाहते।

मुगलिया दौर बीता तो उस दौर की व्यवस्था भी हो खत्म

सफाई कर्मचारी संघ के प्रदेश महामंत्री प्रदीप कुमार बाल्मीकि ने कहा कि जिस समुदाय द्वारा कुर्बानी की जाती है, उसी समुदाय के लोगों को उस कचरे और बचे हुए अवशेषों की सफाई करनी चाहिए। उनके अनुसार यह एक मजहबी उत्सव है, जिसमें वों हिस्सा नहीं लेना चाहते, क्योंकि यह उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाता है।

उनके अनुसार मुगल काल से यह कार्य हिंदू समुदाय के लोग करते आए हैं, लेकिन अब वे इसे अपनी धार्मिक आस्था के खिलाफ मानते है और इसी कारण से वो अब यह कार्य नहीं करना चाहते है। उनका कहना है कि 80% कर्मचारी हिंदू ऐसे कामों को नहीं करना चाहते है।

कर्मचारियों ने चेतावनी दी है कि यदि उन पर ये काम करने का दबाव डाला गया, तो वे सामूहिक रूप से हड़ताल पर चले जाएँगे। इसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी। बाल्मीकि समाज ने यह भी कहा है कि मुगल काल से लेकर अब तक यह काम हमेशा से ही हिंदू सफाई कर्मचारियों द्वारा किया जाता रहा है, लेकिन अब देश आजाद हो चुका है उन्हें भी अपने धर्म और आस्था के साथ जीने का संवैधानिक अधिकार है।

कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें कुर्बानी के अवशेषों की सफाई के दौरान स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गंदगी और बदबू की वजह से उन्हें अक्सर उल्टियाँ, सिर दर्द और मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ होती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह कार्य सफाई कर्मचारियों के लिए एक प्रकार की मानसिक प्रताड़ना बन जाता है। जो न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि उनके आत्म-सम्मान को भी ठेस पहुँचाता है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी और नगर निगम अधिकारी कर्मचारियों से बातचीत कर रहे हैं। प्रशासन स्थिति को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है।

आँकड़े सच बोलते हैं, लेकिन राहुल गाँधी झूठ बोलते हैं… ‘कार की बिक्री’ पर कॉन्ग्रेस सांसद फैला रहे थे फर्जी खबर, FADA के डेटा से सारी पोल खोली

अपने बयानों को लेकर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी अक्सर विवादों में घिरे रहते हैं। एक बार फिर राहुल गाँधी ने आम आदमी के लिए गाड़ियों की बिक्री में गिरावट को लेकर एक पोस्ट साझा किया जिस पर उन्हीं की आलोचना हो रही है।

कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने वाहनों और मोबाइल की बिक्री में कमी होने के आँकड़े बताकर सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की थी, लेकिन आधिकारिक आँकड़ों ने उनके बयान को झूठा करार दे दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर एक बार फिर लोगों के बीच वे हँसी के पात्र बन गए हैं।

राहुल गाँधी ने गुरुवार (5 जून 2025) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा की। उन्होंने लिखा कि आँकड़े सच बोलते हैं और दावा किया कि देश में बीते एक साल में दोपहिया वाहनों की बिक्री में 17%, कार की बिक्री में 8.6% की गिरावट हुई है। वहीं मोबाइल मार्केट 7% गिर गया है।

राहुल ने पोस्ट में लिखा, “खर्च और कर्ज़ – दोनों लगातार बढ़ रहे हैं: मकान का किराया, घरेलू महँगाई, शिक्षा का खर्च, लगभग हर चीज महँगी होती जा रही है। ये सिर्फ आँकड़े नहीं हैं, ये उस आर्थिक दबाव की हकीकत है जिसके नीचे हर आम भारतीय पिस रहा है।” हालाँकि ये आँकड़े उन्होंने कहाँ से लिए हैं, इसके बारे में उन्होंने जानकारी नहीं दी।

राहुल ने बात वहीं पर खत्म नहीं की बल्कि अपनी बात को पूँजीपतियों के साथ जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने आगे लिखा, “हमें ऐसी राजनीति चाहिए जो इवेंट्स की चमक से नहीं, आम जिंदगी की सच्चाई से जुड़ी हो – जो सही सवाल पूछे, हालात को समझे और जिम्मेदारी से जवाब दे। हमें ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जो हर भारतीय के लिए काम करे, न कि सिर्फ कुछ गिने-चुने पूँजीपतियों के लिए।”

राहुल के इस पोस्ट के बाद से ही उनकी जमकर आलोचना हो रही है। कुछ यूजर्स ने तो उनके पोस्ट में आधिकारिक आँकड़ों के स्क्रीनशॉट भी लगा दिए और बताया कि उनके आँकड़े उससे बिल्कुल मेल नहीं खाते।

असल में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने जो आँकड़े दिए हैं, वे इस इंडस्ट्री के आधिकारिक संगठनों के डेटा से बिल्कुल उल्टी कहानी कह रहे हैं।

फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) की रिपोर्ट में राहुल गाँधी के बताए हुए आँकड़े से बिल्कुल उलट जानकारी शामिल है। राहुल ने कहा कि वाहनों की बिक्री घटी है लेकिन FADA के अनुसार पैसेंजर व्हीकल में 4.87% की बढ़ोतरी हुई है। वहीं दो पहिया वाहनों में 7.71% तक की बढ़ोतरी हुई है।

यही कहानी सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) की भी है। SIAM की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, देश की ऑटो इंडस्ट्री ने वित्त वर्ष 25 में रिकॉर्ड 43 लाख पैसेंजर वाहनों की बिक्री की है। उनके अनुसार ये एक मील का पत्थर है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 2 प्रतिशत की वृद्धि थी।

लोगों ने राहुल को ये आधिकारिक आँकड़ें उनके पोस्ट में कमेंट करके पूछा है कि उनके आँकड़ें कहाँ से आए हैं। कुल मिलाकर, आम लोगों का मसीहा बनने के चक्कर में राहुल गाँधी ने एक बार फिर अपनी ही भद्द पिटवा ली।

बिहार के ‘पॉलिटिकल टूर’ पर राहुल गाँधी, दशरथ माँझी की मूर्ति को 2 बार पहनाई ‘एक हाथ’ से माला और देखा तक नहीं: माउंटेन मैन के परिवार से मिलना दलित प्रेम या सियासी मजबूरी?

राहुल गाँधी इन दिनों बिहार के राजनीतिक पर्यटन पर निकले हैं। गया पहुँचे, दशरथ माँझी के गाँव गए, उनकी मूर्ति पर माला चढ़ाई, परिवार से मिले और पूरे तामझाम के साथ दलित प्रेम का ढोंग रचाया। इस पूरे तामझाम का मकसद था – ‘दलित प्रेम’ का प्रदर्शन। लेकिन जो हुआ, उसने सियासत की पोल खोल दी।

दशरथ माँझी को पहनाई माला, लेकिन ढंग से देखा तक नहीं

दरअसल, गयाजी जिले के गहलौर गाँव में राहुल गाँधी दशरथ माँझी मेमोरियल पहुँचे। वहाँ माउंटेन मैन की मूर्ति पर माला चढ़ाई। लेकिन जिस तरह से उन्होंने ये किया, वो देखकर किसी का भी मन खट्टा हो जाए। दो बार माला चढ़ाई, लेकिन नजरें मूर्ति की तरफ उठी तक नहीं।

राहुल गाँधी ने एक हाथ से, तिरछे होकर जैसे जबरदस्ती कोई काम कर रहा हो, इसी तरह से इस ‘काम’ को निपटाया। चेहरे के हाव-भाव, मूर्ति की ओर नजरें और माला पहनाने का अंदाज – सब कुछ साफ बता रहा था कि राहुल गाँधी के लिए यह श्रद्धा नहीं, मजबूरी थी। एक हाथ से तिरछी माला, बिना नजरें मिलाए जल्दी-जल्दी दो बार माला चढ़ाना और आगे बढ़ जाना।

लोग भी तंज कस रहे हैं कि राहुल बाबा को माला चढ़ाने में भी मेहनत नहीं करनी। शायद सोच रहे होंगे कि बस फोटो खिंच जाए, बाकी तो जनता वैसे ही वोट दे देगी।

कौन थे दशरथ माँझी, जिनके घर सियासत चमकाने पहुँचे राहुल गाँधी

दशरथ माँझी, जिन्हें माउंटेन मैन कहा जाता है, उन्होंने 22 साल तक पहाड़ काटकर रास्ता बनाया। आज दशरथ माँझी का नाम है, तो वो राहुल गाँधी के ही परिवार, खानदान, पार्टी की वजह से। क्योंकि दशरथ माँझी की पत्नी फाल्गुनी की मौत जिस अव्यवस्था के कारण 1959 में हुई, वो उस समय की कॉन्ग्रेस सरकार की देन थी। 1960 से 1982 तक माँझी ने अकेले दम पर पहाड़ काटा, लेकिन कॉन्ग्रेस की सरकारें सोती रहीं।

इससे पहले भी भारत देश और बिहार की राजनीति पर कॉन्ग्रेस का ही वर्चस्व था और उसके बाद भी कॉन्ग्रेस का लंबे समय तक राज रहा, लेकिन विकास कार्यों की जगह कॉन्ग्रेस पार्टी ने आम जनता की तकलीफों और परेशानियों के प्रति मुँह मोड़े रखा। न कोई सड़क बनी, न अस्पताल, न कोई मदद मिली। माँझी ने अपनी मेहनत से जो रास्ता बनाया, उसकी सुध लेने में कॉन्ग्रेस को 22 साल लगे नहीं, बल्कि कभी सुध ली ही नहीं। आज राहुल गाँधी उन्हीं दशरथ माँझी के परिवार से मिल रहे हैं और महानता का बखान कर रहे हैं।

दलितों की अनदेखी का लंबा इतिहास

कॉन्ग्रेस का इतिहास देखें तो दलितों और गरीबों की अनदेखी की कहानियाँ भरी पड़ी हैं। दशरथ माँझी के समय से लेकर बाद तक, कॉन्ग्रेस ने बिहार में लंबा राज किया। लेकिन क्या बदला? गाँवों में सड़कें नहीं, अस्पताल नहीं, स्कूल नहीं। माँझी जैसे लोग अपनी जान जोखिम में डालकर पहाड़ काटते रहे और कॉन्ग्रेस की सरकारें कुर्सी की राजनीति में मस्त रहीं। बाद में जब लालू यादव और राबड़ी देवी की सरकारें आईं, जो कॉन्ग्रेस की सहयोगी थीं, तब भी माँझी की कोई सुध नहीं ली गई। 15 साल तक लालू-राबड़ी ने बिहार को जंगलराज में धकेला, लेकिन माँझी जैसे लोगों के लिए कुछ नहीं किया।

वो तो भला हो नीतीश कुमार और बीजेपी की जोड़ी का, जिन्होंने माँझी के बनाए रास्ते को पक्का करवाया। नीतीश ने माँझी को सम्मान दिया, उनके नाम पर सड़क बनवाई और पद्मश्री के लिए उनका नाम भेजा। यही नहीं, मृत्यु के बाद राजकीय सम्मान के साथ विदाई भी दी। लेकिन राहुल गाँधी आज माँझी के गाँव में जाकर उनकी महानता का बखान कर रहे हैं। अरे भाई, अगर तुम्हारी पार्टी ने उस समय थोड़ा सा ध्यान दिया होता, तो शायद माँझी को 22 साल तक हथौड़े-छेनी से पहाड़ तोड़ने की जरूरत ही न पड़ती।

माँझी का परिवार और कॉन्ग्रेस की टिकट की सियासत

अब बात करते हैं माँझी के परिवार की। दशरथ माँझी के बेटे भगीरथ माँझी कॉन्ग्रेस में शामिल हो चुके हैं। परिवार अब कॉन्ग्रेस से विधानसभा चुनाव का टिकट माँग रहा है। ये वही परिवार है, जिसे कॉन्ग्रेस ने दशरथ माँझी के जीते-जी कभी पूछा तक नहीं। माँझी 2007 तक जिंदा रहे, लेकिन कॉन्ग्रेस ने उनकी सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। अब जब बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, राहुल गाँधी को माँझी का गाँव याद आ गया। भगीरथ माँझी का हाथ पकड़कर फोटो खिंचवाए, वीडियो बनवाए और सोशल मीडिया पर वायरल करवाया। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सब दलितों के लिए सच्चा प्रेम है, या फिर वोटों की खातिर किया गया नाटक?

कॉन्ग्रेस की चाल समझने की जरूरत है। दरअसल, कॉन्ग्रेस ने बिहार में पूरी लीडरशिप ही दलितों के इर्द-गिर्द रखी है। प्रदेश में पार्टी की कमान राजेश राम को सौंपी है। वो दरभंगा पहुँचे, तो भी बिना अनुमति ही आँबेडकर हॉस्टल में घुस गए और दलित छात्रों से संवाद करने लगे। पटना पहुँचे तो फुले फिल्म देखने लगे। राजगीर पहुँचे, तो दलितों-आदिवासियों के साथ संवाद कार्यक्रम किया।

और अब माउंटेन मैन के घर जाकर, माला चढ़ाकर वो इसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं। शायद, वो माँझी के परिवार को विधानसभा चुनाव का टिकट भी दे दें, ताकि खुद को दलितों का मसीहा साबित कर सकें… लेकिन जनता सब समझती है। अगर कॉन्ग्रेस को दलितों की इतनी ही फिक्र थी, तो 22 साल तक माँझी को क्यों भूल गए? 27 साल बाद उनकी मौत के बाद भी क्यों नहीं सुध ली? अब जब वोटों की जरूरत पड़ी, तो माला चढ़ाने और फोटो खिंचवाने का ड्रामा शुरू हो गया।

गाँधी परिवार का दलित विरोधी इतिहास

गाँधी परिवार का दलितों के प्रति रवैया हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। इंदिरा गाँधी के समय बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने से रोका गया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो दलित थे। इतना ही नहीं, उनके बेटे का सेक्स स्कैंडल इंदिरा ने अपनी बहू के अखबार में छपवाया, ताकि जगजीवन राम की छवि खराब हो। ये है गाँधी परिवार का दलित प्रेम? आज राहुल गाँधी बिहार में दलितों के घर जा रहे हैं, लेकिन उनका मन वहाँ है ही नहीं। माला चढ़ाते वक्त उनका चेहरा देख लीजिए, लगता है जैसे कोई जबरदस्ती करवा रहा हो।

राहुल गाँधी का ये बिहार दौरा उनका पाँचवाँ दौरा है पिछले पाँच महीनों में। पहले दरभंगा, पटना, समस्तीपुर, पश्चिम चंपारण और अब गया, राजगीर, बोधगया। हर जगह वही ड्रामा – माला चढ़ाओ, फोटो खिंचवाओ और सोशल मीडिया पर वायरल करवाओ। राजगीर में जरासंध स्मारक गए, बाबासाहेब आंबेडकर की मूर्ति पर माला चढ़ाई और फिर अति पिछड़े समाज के लोगों से मुलाकात की। लेकिन ये सब कितना सच्चा है? अगर दलितों और पिछड़ों की इतनी ही चिंता थी, तो कॉन्ग्रेस ने अपने 60 साल के शासन में उनके लिए क्या किया? बीजेपी भी यही आरोप लगा रही है।

राहुल गाँधी का बिहार दौरा और दशरथ माँझी के गाँव जाना, एक सोचा-समझा सियासी ड्रामा है। माला चढ़ाने का ढोंग, परिवार से मिलने का नाटक और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो – ये सब वोटों की खातिर है। कॉन्ग्रेस का इतिहास रहा है दलितों और गरीबों की अनदेखी का। दशरथ माँझी ने 22 साल तक पहाड़ काटा, लेकिन कॉन्ग्रेस की सरकारों ने उनकी सुध नहीं ली क्योंकि कॉन्ग्रेस का इतिहास रहा है वादे करने का, नारे देने का… लेकिन काम करने का नहीं। आज राहुल गाँधी माँझी के गाँव जाकर उनकी महानता का बखान कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि माँझी को वो सम्मान नहीं मिला, जो उन्हें कॉन्ग्रेस के राज में मिलना चाहिए था।

अब कोई संकट आए, तो पहले नरेंद्र मोदी से होगा सामना: J&K के कटरा में प्रधानमंत्री ने रेल कनेक्टिविटी का दिया उपहार, पाकिस्तान को फिर औकात दिखाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर में चेनाब रेलवे ब्रिज का उद्घाटन करने के बाद कटरा रेलवे स्टेशन से कटरा और श्रीनगर को जोड़ने वाली वंदे भारत एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इसके बाद उन्होंने कटरा में जनता को भी संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने लोगों को ‘ऑपरेशन सिंदूर’, पाकिस्तान को सख्त संदेश दिया और ये बताया कि चाहे कुछ भी हो जाए जम्मू-कश्मीर का विकास नहीं रुकने देंगे।

पीएम मोदी बोले कि यहाँ कई पीढ़ियाँ रेल कनेक्टिविटी का सपना देखते-देखते गुजर गईं। आज कई लोगों का सपना पूरा हुआ है। विकास के इस नए दौर के लिए सभी को बहुत-बहुत बधाई। उन्होंने बताया कि चेनाब ब्रिज एफिल टावर से भी ऊँचा है। उन्होंन सीएम उमर अब्दुल्लाह का भी जिक्र किया कि कैसे ये प्रोजेक्ट तब से बन रहा था जब वह 7वीं-8वीं में पढ़ते थे। पीएम बोले कि शायद ये अच्छा काम उनके हाथों ही होना था।

आगे उन्होंने पाकिस्तान पर हमला बोला। पीएम मोदी ने कहा कि पाकिस्तान ने कश्मीरियत पर हमला किया। पहलगाम में इंसानियत पर वार किया गया। जम्मू कश्मीर का युवा अब आतंकवाद को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार हो चुका है।

पीएम मोदी ने कहा कि एक महीने पहले 6 मई की रात पाकिस्तान पर कयामत बरसी थी। पाकिस्तान कभी ‘ऑपरेशन सिंदूर’ सोचेगा तो उसे अपनी हार याद आएगी। उसने कभी नहीं सोचा होगा कि भारत उनके यहाँ अंदर जाकर आतंक के ठिकानों पर हमला करेगा। पाकिस्तान में आतंक की इमारतें खंडहर बन गई हैं।

पीएम मोदी ने कहा कि 3 तारीख से अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है और इस बीच ईद का भी माहौल है। नरेंद्र मोदी का वादा है कि विकास नहीं रुकेगा। कोई बाधा आएगी तो उसे मोदी का सामना करना पड़ेगा। पीएम मोदी ने वादा किया कि सरकार किसी भी हालत में जम्मू-कश्मीर के विकास को बाधित नहीं होने देगी। पाकिस्तान हमले का जिक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि गोलीबारी में जिनके घरों का नुकसान हुआ है, उन्हें दो लाख रुपए दिए जाएँगे।

राजभवन में ‘भारत माता’ का पोस्टर देख भड़के केरल के 2 कम्युनिस्ट मंत्री, कार्यक्रम का किया बहिष्कार: राज्यपाल बोले- तस्वीर नहीं हटेगी, आपको जाना है तो जाओ

केरल में विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर राजभवन में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम में ‘भारत माता’ की तस्वीर वाम मोर्चा (LDF) सरकार की आँखों में चुभ गई और सरकार ने तस्वीर हटाने को लेकर अड़ियल रवैया अपनाया। इसके अलावा कृषि मंत्री पी प्रसाद और शिक्षा मंत्री वी शिवनकुट्टी ने शर्मनाक तरीके से कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया।

पिनाराई विजयन की सरकार में दो मंत्रियों ने मंच पर लगी ‘भारत माता‘ की तस्वीर को हटाने के लिए जोर दिया, जिसको राज्यपाल ने नहीं माना। इस पर कृषि मंत्री पी प्रसाद ने कहा कि RSS से जुड़ी ‘आईकोनोग्राफी’ वाली यह तस्वीर मानी नहीं जाएगी।

सरकार ने अपनी मानसिकता का परिचय देते हुए राजभवन के कार्यक्रम को छोड़कर अपना आधिकारिक समारोह सचिवालय के दरबार हॉल में शिफ्ट कर लिया। दूसरी ओर, राज्यपाल ने अकेले ही ‘भारत माता’ की तस्वीर के सामने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की गरिमा को बनाए रखा। यह मामला केरल सरकार की राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

सरकार का गैर-जिम्मेदाराना रुख

विश्व पर्यावरण दिवस जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर, जब देश और समाज को एक साथ आना चाहिए था, केरल सरकार ने एक तस्वीर पर आपत्ति जताकर राजनीतिक द्वेष को प्राथमिकता दी। कृषि मंत्री पी प्रसाद ने खुले तौर पर कहा कि RSS से जुड़ी ‘आइकॉनोग्राफी’ वाली यह तस्वीर स्वीकार्य नहीं है। यह बयान दर्शाता है कि केरल सरकार एक राष्ट्रीय प्रतीक को भी अपनी राजनीतिक विचारधारा के चश्मे से देखती है।

मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भले ही सीधे तौर पर बयान न दिया हो, लेकिन यह जानकारी सामने आई है कि कृषि मंत्री ने उनकी सहमति से ही राजभवन के कार्यक्रम का बहिष्कार किया। यह मुख्यमंत्री की मौन स्वीकृति को दर्शाता है, जिससे सरकार की मंशा पर संदेह गहराता है।

राज्यपाल ने क्या कहा?

राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर इस बात से खुश नहीं थे कि मंत्री ने ‘भारत माता’ की तस्वीर हटाने को कहा। राज्यपाल ने बताया कि उन्हें मंत्री के दफ्तर से कहा गया था कि ‘भारत माता’ की तस्वीर हटा दी जाए, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

राज्यपाल का कहना था कि ‘भारत माता’ उनके लिए बहुत अहम हैं, एक आदर्श हैं, और वे उन्हें हटा नहीं सकते। राज्यपाल ने यह भी बताया कि राजभवन में ‘भारत माता’ की तस्वीर लगाने का ये चलन उनके राज्यपाल बनने के बाद ही शुरू हुआ है।

यह पूरा विवाद ‘भारत माता’ की तस्वीर के इस्तेमाल को लेकर है, जिसे लेफ्ट सरकार RSS की विचारधारा से जोड़कर देख रही है, जबकि राज्यपाल इसे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बता रहे हैं. इस घटना से राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच के रिश्ते फिर से तनावपूर्ण हो गए हैं।

दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे पुल कश्मीर में बनकर तैयार, पीएम मोदी ने किया उद्घाटन: 22 साल में तैयार हुआ चिनाब रेलवे आर्च ब्रिज, कई मायनों में है खास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (6 जून 2025) को कश्मीर में दुनिया के सबसे ऊँचे पुल का उद्घाटन किया। चेनाब नदी पर बने इस पुल का उद्घाटन करते हुए पीएम मोदी ने तिरंगा लहराया। पुल पर चहलकदमी की और इसे तैयार करने वाले श्रमिकों से बात भी की।

रेल मंत्री अश्विन वैष्णव और सीएम उमर अब्दुल्ला के साथ पीएम मोदी हेलीकॉप्टर से रेलवे ब्रिज पहुँचे। इस पुल को तैयार होने में लगभग 22 साल लगे हैं क्योंकि इसके निर्माण के दौरान सुरक्षा और स्थिरता संबंधी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

कई मायनों में खास है ये आर्च ब्रिज

कश्मीर के सलाल बाँध के पास चेनाब नदी के ऊपर बनाया गया ये रेल ब्रिज दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च ब्रिज है। नदी से 359 मीटर की ऊंचाई पर स्थित स्टील से निर्मित ये पुल 1315 मीटर लंबा है। इस पुल को बनाने में लगभग 14,86 करोड़ रुपए की लागत आई है।

भूकंप जोन-5 क्षेत्र में स्थित होने के बाद भी इस पुल को हवा के थपेड़ों और भूकंप जैसी आपदाओं से निपटने के लिए खास तकनीक के साथ तैयार किया गया है। साथ ही इसे ब्लास्ट प्रूफ भी बनाया गया है। इसके अलावा जंग से बचने के लिए विशेष पेंट का इस्तेमाल किया गया है।

उद्धमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक, यानी यूएसबीआरएल, आजाद भारत का सबसे बड़ा और सबसे मुश्किल रेलवे प्रोजेक्ट है। यह 272 किलोमीटर लंबा रास्ता हिमालय की जंगली और मुश्किल भरी जमीन पर बना है। इस पूरे प्रोजेक्ट को बनाने में 43,780 करोड़ रुपये की लागत आई है।

यह रेल लाइन घाटियों, पहाड़ों और दर्रों को जोड़ती है, जो अपने आप में एक बहुत बड़ा काम है।ये पुल उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेलवे लिंक (USBRL) प्रोजेक्ट का हिस्सा है। इस पुल से जम्मू और श्रीनगर के बीच की दूरी को कम कर बेहतर कनेक्विटी स्थापित होगी।

इसकी ऊँचाई की खासियत की बात की जाए तो यह पुल एफिल टावर से भी बड़ा है और समुद्र तल से रेल की पटरी तक कुतुब मीनार से भी लगभग पाँच गुना ऊँचा है। इसके निर्माण में लगभग 30,000 मैट्रिक टन स्टील का उपयोग किया गया है।

पुल समेत पूरे क्षेत्र को CCTV लैस किया गया है। इस प्रोजेक्ट में बिना बैलास्ट (पटरियों के बीच-सीमेंट के खंबे) की पटरियाँ बिछाई गई हैं, जो 943 पुलों और 36 बड़े टनलों से होकर गुजरती हैं। इन टनलों की कुल लंबाई 119 किलोमीटर है। इनमें से सबसे खास है टी-50 टनल, जो भारत की सबसे लंबी रेलवे टनल है और इसकी लंबाई 12.7 किलोमीटर से भी ज्यादा है।

बेंगलुरु में भगदड़ पर बोले थे कॉन्ग्रेसी CM- हमें नहीं थी जानकारी…अब ‘परमिशन लेटर’ में लिखा मिला नाम: कर्नाटक HC ने माँगा सिद्धारमैया सरकार से जवाब- 11 मौतों का कौन जिम्मेदार

आईपीएल में आरसीबी की जीत के बाद बेंगलुरु में हुई भगदड़ मामले में नई बातें निकल कर सामने आ रही हैं। अभी तक जहाँ कहा जा रहा था कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भगदड़ मामले पर ये कहा है कि उन्हें कार्यक्रम की जानकारी नहीं थी। वहीं अब एक पत्र सामने आया है जिसमें साफ तौर पर टीम के सम्मान समारोह में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री सबका नाम लिखा है। ये पत्र विधान सौधा में कार्यक्रम को लेकर कर्नाटक राज्य क्रिकेट संघ द्वारा लिखा गया था।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक राज्य क्रिकेट संघ (KSCA) ने सरकार को विधान सौधा में सम्मान समारोह के लिए 3 जून को आयोजन की अनुमति माँगी थी। पत्र में ये भी कहा गया कि कार्यक्रम में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री भी शामिल होंगे और RCB के खिलाड़ियों और स्टाफ को सम्मानित करेंगे।

अब जाहिर है अगर विधान सौधा को लेकर ऐसा पत्र लिखा गया है तो चिन्नास्वामी स्टेडियम को लेकर भी ऐसी अनुमति माँगी गई होगी और तभी व्यवस्था देखते हुए पुलिस ने एक दिन में दो जगह सिक्योरिटी दे पाने में असमर्थता जताई होगी। बावजूद पुलिस की मनाही के ये कार्यक्रम हुआ। जब भगदड़ हो गई तब सीएम सिद्धारमैया का बयान आया कि स्टेडियम समारोह से राज्य सरकार का कोई लेना-देना नहीं था।

यहाँ मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने ये कहकर किनारा कर लिया कि विधान सौधा में 1 लाख लोग जुटे लेकिन वहाँ कुछ नहीं हुआ और स्टेडियम में क्षमता से अधिक लोगों के आने के कारण वहाँ इस तरह की घटना हो गई। साथ ही स्टेडियम में हुए कार्यक्रम से भी सरकार की भूमिका को सिर्फ अनुमति देने तक सीमित बता दिया था और भगदड़ की तुलना कुंभ से करते दिखे थे। वहीं डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार तो कार्यक्रम की अनुमति देने का ये कहकर बचाव करते दिखे कि उन्होंने प्रोग्राम 10 मिनट में निपटा दिया था।

इतने संवेदनशील मुद्दे पर कॉन्ग्रेस सरकार का ये रवैया देखने के बाद इस मुद्दे पर भाजपा ने उन्हें जमकर घेरा था और सवाल खड़े किए थे कि अपनी वाहवाही के लिए उन्होने ये कार्यक्रम को अनुमति दी और अब 11 मौतों की जिम्मेदारी लेने से पीछे हट रहे हैं। कल तक ये बस आरोप थे कि इन कार्यक्रमों की जानकारी सरकार के पास थी, पुलिस ने इसे मना किया था, फिर भी ये आयोजित हुए। मगर, अब पत्र आने के बाद साफ है कि कार्यक्रम सरकार की मंजूरी से ही आयोजित हुआ।

मैच जीतने के बाद भगदड़

IPL 2025 विजेताओं के लिए विधान सौधा में सम्मान समारोह पहले ही दिन में आयोजित किया गया था। इसके बाद स्टेडियम में जश्न मनाने के लिए दूसरा आयोजन किया किया गया।

इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) के शुरू होने के 18 वर्षों में पहली बार RCB ने फाइनल मैच जीता। 3 जून 2025 को आखिरी मैच खत्म होने के बाद मैच जीतने की खुशी में 4 जून को बेंगलुरू के चिन्नास्वामी स्टेडियम में विक्ट्री परेड का आयोजन किया गया। टीम भी बुधवार को अपने प्रशंसकों से मिलने जाने वाली थी।

हालाँकि, पुलिस ने विजय परेड के लिए अनुमति देने से इनकार कर दिया था और सरकार को सूचित किया था 4 जून को होने वाले विधान सौधा और स्टेडियम समारोह की अनुमति न देकर इसे रविवार (8 जून 2025) तक स्थगित कर देना चाहिए। फिर भी आयोजन हुआ और भगदड़ मची।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी जारी की नोटिस

इसके साथ ही बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुए भगदड़ के मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट ने भी सरकार को नोटिस जारी किया है। गुरुवार (5 जून 2025) को मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस तरह की घटनाओ को लेकर एक SOP तय होने की बात भी कही।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज किया है। एक्टिंग जस्टिस वी कामेश्वर राव और जस्टिस सीएम जोशी की बेंच ने इस मामले की पूरी रिपोर्ट माँगी है।

कर्नाटक HC ने कहा है कि भगदड़ जैसी घटनाओं से बचने के लिए सरकार के पास एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोटोकॉल (SOP) होना चाहिए। इसमें इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि आयोजन से जुड़े जश्न में एंबुलेंस की व्यवस्था है या नहीं और पास के अस्पताल को भी आयोजन की जानकारी होनी चाहिए।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, जीत के जश्न के लिए घोषणा की गई था कि स्टेडियम में प्रशंसकों को निःशुल्क एंट्री दी जाएगी। इसके बाद स्टेडियम के बाहर भारी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए। इसके बाद वहाँ भगदड़ मच गई जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई और 50+ लोग घायल हो गए। हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई मंगलवार (10 जून 2025) को तय की है।

भगदड़ की घटना को लेकर पुलिस ने रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (आरसीबी) के साथ कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन और DNA एंटरटेनमेंट (इवेंट मैनेजमेंट कंपनी) के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।

इसके साथ ही 4 जून 2025 को ही भगदड़ की मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश दिए गए। जाँच की अगुवाई करने वाले स्थानीय जिलाधिकारी जी जगदीश ने कहा कि कर्नाटक राज्य क्रिकेट एसोसिएशन, रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु और पुलिस आयुक्त बी दयानंद को जाँच के लिए नोटिस भेजा गया है।

BJP की नेता और केंद्रीय राज्य मंत्री शोभा करंदजाने ने भी इस मामले पर हाईकोर्ट का सवतः संज्ञान लेने के लिए पत्र लिखा था।

34 सालों में 36+ हमले… अमरनाथ यात्रा बार-बार निशाने पर: आखिर ‘हिंदुस्तान’ में हिंदू कब तक होगा इस्लामी आतंक का शिकार, इस बार सुरक्षा में तैनात हुए 50 हजार+ जवान

हिमालय की गोद में बसा अमरनाथ धाम एक बार फिर श्रद्धालुओं के जयकारों से गूँजने को तैयार है। जम्मू-कश्मीर प्रशासन के अनुसार, इस बार यात्रा 3 जुलाई 2025 से शुरू होकर 9 अगस्त 2025 तक चलेगी। उम्मीद जताई जा रही है कि इस वर्ष 5 लाख से ज़्यादा श्रद्धालु ‘बाबा बर्फानी’ के दर्शन के लिए पहुँचेंगे।

इस बीच वर्ष 2025 की अमरनाथ यात्रा की तैयारियों ने रफ़्तार पकड़ ली है और प्रशासन सुरक्षा, सुविधा और श्रद्धालुओं की संख्या को लेकर हर मोर्चे पर मुस्तैद दिखाई दे रहा है। हाल ही हुए पहलगाम आतंकी हमले के कारण इस यात्रा को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।

अमरनाथ यात्रा के सुरक्षा इंतजाम

कहते हैं जब आस्था पर्वतों से टकराती है, तो वह अमर बन जाती है। श्री अमरनाथ यात्रा न सिर्फ धार्मिक विश्वास का प्रतीक है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता और भक्ति भावना की जीवंत मिसाल भी है, इसलिए देशभर से श्रद्धालु ‘बाबा बर्फानी’ के दर्शन को उत्साहित हैं और प्रशासन उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम भी कर रहा है।

दरअसल, अमरनाथ यात्रा के लिए दो रास्तों से होते हुए यात्री गुफा तक जाते हैं, जिसमें एक रास्ता पहलगाम मार्ग का है जो 48 किलोमीटर लंबा और आसान है, मगर कुछ दिनों पहले ही वहाँ आतंकी हमला हुआ था, जिसमें 26 लोगों की जान चली गई। वहीं दूसरा, बालटाल मार्ग है जो 14 किलोमीटर छोटा लेकिन ज्यादा कठिन है। इस हमले के बाद सरकार ने यात्रा की सुरक्षा को सबसे बड़ी प्राथमिकता दी है, ताकि श्रद्धालु सुरक्षित माहौल में यात्रा कर सकें।

इसी क्रम में, इस साल 38 दिन की इस यात्रा में सबसे ज्यादा सुरक्षाकर्मी, श्रद्धालुओं की सुरक्षा में तैनात किए जाएँगे। लगभग 50 हजार। इनमें जम्मू कश्मीर पुलिस, CRPF, BSF, CISF, ITBP और SSB जैसी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवान शामिल हैं। इसके अलावा जगह-जगह बम स्क्वॉड भी होगा और यात्रा पर निगरानी केवल सीसीटीवी कैमरों से नहीं, बल्कि ड्रोन समेत AI तकनीक आदि से रखी जाएगी। वहीं, जब श्रद्धालुओं का काफिला जाएगा तो नेशनल हाईवे की ओर जाने वाले रास्ते भी ब्लॉक होंगे। हर काफिले पर जैमर लगा होगा। सीआरपीएफ जवानों के हाथ में सैटेलाइट फोन भी होंगे। इतना ही नहीं, यात्रियों को रेडियो फ्रीक्वेंसी वाली आईडी दी जाएगी जो उनके साथ काफिले पर भी होग और चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाकर्मी तैनात रहेंगे।

कुल मिलाकर, इस बार अमरनाथ यात्रा को पूरी तरह सुरक्षित और शांतिपूर्ण बनाने के लिए सरकार ने हर जरूरी कदम उठाए हैं, ताकि श्रद्धालु बिना किसी डर के अपनी यात्रा पूरी कर सकें।

अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमलों का इतिहास

अमरनाथ यात्रा 1990 से ही इस्लामिक आतंकियों के निशाने पर रही है। 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 32 साल में यात्रा के बीच करीबन 36 बार आतंकी हमले हुए हैं। सबसे पहला हमला 1993 में हुआ था और इसके बाद लगातार चार सालों तक, यानी 1996 तक, आतंकियों ने हर साल लगतार हमले किए। सबसे बड़ा हमला साल 2000 में हुआ।

उस वक्त लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने पहलगाम बेस कैंप पर अंधाधुंध फायरिंग की, जिसमें 32 लोगों की मौत हो गई और करीब 60 लोग घायल हो गए। इसके बाद 2001 में फिर हमला हुआ। इस बार शेशनाग झील के पास यात्रियों के कैंप पर ग्रेनेड फेंके गए, जिसमें 12 लोगों की जान गई और 15 लोग घायल हुए।

2002 में भी ग्रेनेड हमला हुआ और 2006 में अमरनाथ यात्रियों की बस को निशाना बनाया गया। फिर 2017 में एक बार फिर हमला हुआ, आतंकियों ने यात्रियों की बस पर फायरिंग कर दी, जिसमें 7 लोगों की मौत हुई और 32 लोग घायल हो गए। इसके बाद से सुरक्षा व्यवस्था इतनी मजबूत हो गई कि पिछले 6 सालों में (2017 के बाद से) कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ। लेकिन अब, जब यात्रा शुरू होने में सिर्फ दो महीने बचे हैं, पहलगाम आतंकी हमले ने फिर से कश्मीर घाटी का माहौल बिगाड़ने की कोशिश की है।

क्यों है हिंदुओं की आस्था पर इतना खतरा?

गौरतलब है कि हिंदुओं की आस्था पर हमलों की कहानी कोई अब की नहीं है। सालों से होते आए हमलों से ये बात तो साफ है कि इस्लामी आतंकवादियों को केवल हिंदू धार्मिक स्थलों और यात्राओं से समस्या नहीं है, बल्कि उन्हें हिंदुओं से ही दिक्त है। यही वजह है कि कभी वो वैष्णो देवी गए श्रद्धालुओं को अपना निशाना बनाते हैं तो कभी पहलगाम घूमने गए पर्यटकों को।

इनका प्रयास हिंदुओं के मन में खौफ को जगा कर उन्हें मानसिक तौर पर कमजोर करना है ताकि ऐसी यात्रा कभी सफल नए हो सकें, जबकि हैरान कर देने वाली बात ये है कि कभी कोई मुस्लिम त्योहार या नमाज होती है, तो क्या हमने कभी सुना है कि वहाँ आतंकी हमले हुए हों? शायद नहीं।

हमारे देश में मस्जिदों को सुरक्षा देने की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन मंदिरों और तीर्थ यात्राओं को किले की तरह सुरक्षा देनी पड़ती है। इससे हम ये समझ पाते है कि अपने ही देश में हिंदू असुरक्षित हैं। भारत में हिंदू बहुसंख्यक जरूर हैं, लेकिन इसके बावजूद अपनी आस्था को लेकर उन्हें बार-बार सावधानी बरतनी पड़ती है। यह स्थिति तब और विचलित करती है जब यह देश ‘हिंदुस्तान’ कहलाता है, मगर हिंदू ही अपने त्योहारों, मंदिरों और यात्राओं पर डर के साए में रहते हैं।

ये केवल अमरनाथ यात्रा तक सीमित नहीं है। काशी, अयोध्या, मथुरा जैसे स्थानों पर भी बार-बार विवाद और विरोध खड़ा किया जाता है। अगर कोई हिंदू मंदिर के लिए आवाज उठाए, तो उसे ‘कट्टरपंथी’  कहा जाता है, लेकिन कोई मजहबी संगठन खुलेआम धमकी दे, तो उसे ‘अल्पसंख्यकों का अधिकार’ बताया जाता है।

ये समस्या सिर्फ सीमा पार से फैलाए जा रहे आतंकवाद की नहीं है, बल्कि देश के भीतर पनप पही एक कट्टरपंथी मानसिकता की है, जो हिंदुओं की आस्था को बार-बार नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। इस मानसिकता वाले लोगों को हिंदुओं के पूजा-पाठ, मंदिर, और तीर्थ यात्राओं से तकलीफ होती है। ये खुलेआम कहते हैं कि अगर इनके इलाके में मंदिर बना तो उसे उन्हें जलाना या तोड़ना पड़ेगा। ये लोग कमाते तो भारत में है मगर जब मौका मिलता है तो मजहब परस्ती दिखाते हुए पाकिस्तान के प्रति अपना प्रेम जाहिर करते हैं।

क्या है ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ जिसे लेकर आमने-सामने आ गए दो ‘जिगरी’? मस्क को क्यों सता रहा अमेरिका के दिवालिया होने का डर, ट्रंप क्यों हैं इसे लेकर बेफिक्र

डोनाल्ड ट्रंप और टेस्ला तथा स्पेस एक्स के मालिक एलन मस्क के बीच का विवाद अब बढ़ता जा रहा है। मस्क ने ट्रंप के ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ के खिलाफ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर खुले तौर पर विरोध जताया। मस्क ने इस बिल को कॉन्ग्रेस के खर्च से भरा, बेतुका और शर्मनाक बताया और इसे सरकारी खर्च कम करने के अपने मिशन के खिलाफ करार दिया। इस बिल का ट्रंप की प्राथमिकता के विपरीत प्रभाव पड़ा है, जिसमें सरकारी खर्च में कटौती का वादा किया गया था।

विवाद का कारण

इस विवाद का पहला कारण ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ है। यह बिल उन नीतियों को लेकर मस्क की चिंता को दर्शाता है, जो उनकी कंपनियों, खासकर टेस्ला पर असर डाल सकती हैं। मस्क का मानना है कि इस बिल के तहत इलेक्ट्रिक कारों के लिए जो सब्सिडी मिलती थी, उसमें कमी आएगी, जो उनके बिजनेस मॉडल को नुकसान पहुँचा सकता है।

इस बिल में संशोधन के कारण टेस्ला की बिक्री पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि इससे इलेक्ट्रिक वाहन (EV) के लिए दी जाने वाली फाइनेंशियल मदद में कटौती हो सकती है। मस्क ने इस बिल को कड़ी आलोचना करते हुए इसे ‘अमेरिका को दिवालिया बनाने वाला’ बताया और अपने 20 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स से इसे खत्म करने की अपील की। उन्होंने कहा, “अमेरिका को दिवालिया बनाना ठीक नहीं है।”

‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ क्या है?

‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ में विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों और परियोजनाओं के लिए बड़ी मात्रा में धन शामिल है। मस्क और अन्य क्रिटिक्स का मानना है कि यह बिल अनावश्यक और अत्यधिक खर्च को बढ़ावा देता है, जिससे राष्ट्रीय ऋण बढ़ेगा और अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। विशेष रूप से, यह बिल इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए कर क्रेडिट को प्रभावित करता है, जिससे एलन मस्क की टेस्ला जैसी कंपनियों को नुकसान होगा।

  • अत्यधिक सरकारी खर्च: यह बिल सरकारी खर्च को बेतहाशा बढ़ाता है, जो सरकारी खर्च में कटौती के ट्रंप प्रशासन के वादों के खिलाफ है।
  • टेस्ला सब्सिडी में कटौती: यह इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए टैक्स क्रेडिट को कम करता है, जिससे टेस्ला जैसी कंपनियों को मिलने वाली सब्सिडी में कमी आएगी। मस्क का मानना है कि इससे टेस्ला की बिक्री प्रभावित होगी।
  • मंदी का खतरा: मस्क ने चेतावनी दी है कि ट्रंप की टैरिफ नीतियाँ, बिल के साथ मिलकर, इस साल के अंत में अमेरिका को मंदी में धकेल सकती हैं।

इसके जवाब में, ट्रंप ने मस्क की कंपनियों के सभी सरकारी कॉन्ट्रैक्ट और सब्सिडी को रद्द करने की धमकी दी है, जिसमें टेस्ला, स्पेसएक्स और स्टारलिंक जैसी प्रमुख कंपनियाँ शामिल हैं। ट्रंप का तर्क है कि मस्क इसलिए नाराज हैं क्योंकि बिल ने इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए कर क्रेडिट को खत्म कर दिया है, जो उनके लिए एक बड़ी राशि थी।

ट्रंप-मस्क के रिश्ते में बदलाव

मस्क और ट्रंप के बीच यह विवाद उस समय हुआ है जब दोनों का आपसी संबंध पहले काफी अच्छा था। मस्क ने 2024 के चुनाव अभियान में ट्रंप का समर्थन किया था और लगभग 300 मिलियन डॉलर (2576 करोड़) का योगदान दिया था। इसके बाद मस्क को ट्रंप के प्रशासन में सरकारी दक्षता विभाग (DOGE) का प्रमुख बनाया गया था, जहाँ मस्क ने सरकारी विभागों में सुधार करने के प्रयास किए थे।

लेकिन अब मस्क ने ट्रंप की नीतियों पर आलोचना करना शुरू कर दिया, खासकर उनके ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ और ‘टैरीफ पॉलिसी’ के खिलाफ। मस्क ने यह भी कहा कि यह बिल ‘सरकारी खर्च में कटौती के उनके प्रयासों के खिलाफ है।’

ट्रंप का जवाब

ट्रंप ने मस्क के खिलाफ प्रतिक्रिया देते हुए इलेक्ट्रॉनिक सब्सिडी और सरकारी अनुबंधों को खत्म करने की धमकी दी है। ट्रंप ने टेस्ला के खिलाफ किसी तरह की प्रतिक्रिया को लेकर मस्क पर आक्रमण किया और कहा कि मस्क अब उनके प्रशासन में विश्वासघात कर रहे हैं।

इसके अलावा, ट्रंप ने मस्क पर आरोप लगाया कि वह ‘एप्स्टीन फाइल्स‘ से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक करने के बजाय उसे छिपा रहे हैं, जिससे यह आरोप और भी गंभीर हो गया।

मस्क के ‘एप्स्टीन फाइल्स’ वाले आरोप ने स्थिति को और भी जटिल बना दिया। मस्क ने कहा कि ट्रंप का ‘एप्स्टीन के मामलों से गहरा संबंध’ है और इसका सार्वजनिक होना बाकी है। इस आरोप ने ट्रंप और मस्क के रिश्ते में और तल्खी ला दी। ट्रंप ने इस आरोप को खारिज किया, हालाँकि मस्क ने इसे लेकर अपनी आलोचना जारी रखी।

भविष्य में क्या हो सकता है

यह विवाद ट्रंप और मस्क के बीच एक राजनीतिक और व्यक्तिगत संघर्ष में बदलता जा रहा है। मस्क ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अगर ट्रंप के समर्थक और रिपब्लिकन सांसदों ने इस बिल का समर्थन किया, तो वह अगले चुनाव में इन राजनेताओं को निकाल देंगे। इसके साथ ही, मस्क ने यह भी स्पष्ट किया कि वह ट्रंप के खिलाफ ‘इंपीचमेंट’ की प्रक्रिया का समर्थन करते हैं।

यह विवाद अमेरिका की राजनीति और उद्योगों में गहरे असर डाल सकता है। ‘टेस्ला और स्पेस एक्स’ जैसे बड़े व्यापारों को सरकारी सब्सिडी और अनुबंधों पर निर्भर रहने के कारण, यह आर्थिक अस्थिरता का कारण बन सकता है।

एलन मस्क और डोनाल्ड ट्रंप के बीच बढ़ता विवाद केवल व्यक्तिगत आरोपों और सरकार से संबंधित मुद्दों तक सीमित नहीं है। यह अमेरिकी राजनीति, उद्योग और अर्थव्यवस्था पर गहरे प्रभाव डाल सकता है। यह स्थिति दिखाती है कि कैसे बड़े उद्योगपति और राजनीतिक नेता एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बनाए रखने में विफल हो सकते हैं, खासकर जब उनके आपसी हितों में टकराव होता है।

रवीन्द्र, कपिल, पीयूष… एक वसीम अहमद ने ओढ़ रखी थी कई हिंदू पहचान, ‘पत्रकार’ बन नौकरी लगाने का देता था झाँसा: नोएडा पुलिस ने किया गिरफ्तार, 100 से ठगी

रवीन्द्र शर्मा, कपिल भाटी, पीयूष भाटी, रोहित कुमार, रोहित चंदेला और राहुल भाटी… ये वो नाम हैं जिनके सहारे नोएडा में एक मुस्लिम नौकरी के नाम पर ठगी करता था। लाखों सब्स्क्राइबर का यूट्यूब चैनल चलाने वाला यह ठग युवाओं को ओप्पो, वीवो जैसी कम्पनियों में नौकरी दिलाने के नाम पर लाखों ठग चुका था। वह खुद को ‘पत्रकार’ बताता था।

नोएडा पुलिस ने बुधवार (04 मई, 2025) को इस ठग को गिरफ्तार किया है। इसका नाम वसीम अहमद है। वसीम उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले का रहने वाला है और फिलहाल नोएडा के इकोटेक-3 इलाके में रह रहा था। पुलिस ने बताया है कि वसीम पिछले 6 महीने से नोएडा के सेक्टर-81 में एक फर्जी ऑफिस चला रहा था।

वसीम खुद को पत्रकार बताकर बेरोजगार युवाओं को नौकरी का झाँसा देकर उनसे ठगी करता था। यहाँ वह एक फर्जी ऑफिस चलाता था। DCP सेंट्रल नोएडा शक्ति मोहन अवस्थी ने बताया कि आरोपित ने ऑफिस में 2 महिलाओं को भी काम पर रखा था, जिन्हें वह ₹12,000 सैलरी देता था। वह 100+ लोगों को ठग चुका था।

यहाँ से वो युवाओं को सैमसंग, ओप्पो, वीवो, और एलजी जैसी नामी कंपनियों में नौकरी दिलाने का झाँसा देता था। पूछताछ में वसीम ने बताया कि उसके पास एक यूट्यूब चैनल है जिसका नाम ‘टुडे जॉब्स नोएडा’ है।

इस चैनल पर वह फर्जी नौकरी के विज्ञापन डालता था, जिससे कई बेरोजगार युवा उसकी बातों में आ जाते थे। वह उनसे रजिस्ट्रेशन फीस और फाइल चार्ज के नाम पर पैसे लेता और फिर एक नकली इंटरव्यू के बाद उन्हें फर्जी नियुक्ति पत्र थमा देता था।

स्क्रीन शॉर्ट ऑफ चैनल

जब युवाओं को असली कंपनी से कोई जवाब नहीं मिलता और वे वसीम से संपर्क करने की कोशिश करते, तो वह अपना मोबाइल फोन बंद कर देता था। इसी का शिकार हुए एक पीड़ित योगेंद्र ने 26 अप्रैल, 2025 को शिकायत की जिसके बाद सेक्टर-63 थाना पुलिस ने इस मामले की जाँच शुरू की।

खुफिया जानकारी के आधार पर पुलिस ने बुधवार को वसीम को गिरफ्तार कर लिया। उसके पास से 200 से ज्यादा विजिटिंग कार्ड, नौकरी से जुड़े दस्तावेज, इंटरव्यू फॉर्म, दो मोबाइल फोन और एक कार बरामद हुई है।

डीसीपी अवस्थी ने बताया कि वसीम का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड है और वह इसी तरह की ठगी के मामलों में पहले भी सेक्टर-49 और सेक्टर-20 के थानों में गिरफ्तार हो चुका है। पुलिस अब उससे पूछताछ कर रही है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इस गैंग में और कौन-कौन शामिल है।