अपने पहले कार्यकाल से विदेशी संबंधों को मजबूत करने में जुटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (21 सितंबर 2021) को जहाँ फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से फोन पर हिंद प्रशांत क्षेत्र को लेकर बात की। वहीं बुधवार (22 सितंबर) को वह चार दिवसीय अमेरिकी दौरे पर निकल गए।
जानकारी के मुताबिक, फ्रांसीसी राष्ट्रपति से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हिंद प्रशांत क्षेत्र को लेकर बात करते हुए अफगानिस्तान के हालात पर भी चर्चा की। इसके बाद फ्रांसीसी राष्ट्रपति राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने ट्वीट किया और एक बार फिर हिंदी का प्रयोग कर भारतीयों का दिल जीत लिया।
उन्होंने लिखा, “नमस्ते, प्रिय साथी, प्रिय मित्र, हमारी रणनीतिक साझेदारी के महत्व की पुष्टि करने के लिए धन्यवाद। भारत और फ्रांस भारत-प्रशांत को सहयोग और साझा मूल्यों का क्षेत्र बनाने के लिए दृढ़ता से प्रतिबद्ध हैं। हम इस पर निर्माण करना जारी रखेंगे।”
"Thank you for reaffirming the importance of our Strategic Partnership. India and France are strongly committed to making the Indo-Pacific an area of cooperation and shared values. We will continue to build on this," tweets French President Emmanuel Macron pic.twitter.com/magNQzyh33
वहीं दूसरी ओर अमेरिका की चार दिवसीय यात्रा पर गए पीएम मोदी वहाँ पहली महिला उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस और राष्ट्रपति जो बायडेन से मुलाकात करेंगे। पीएम मोदी के साथ इस यात्रा पर विदेश मंत्री एस. जयशंकर, एनएसए अजीत डोभाल और विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला भी हैं।
इस दौरे की बाबत मंगलवार (21 सितंबर 2021) को विदेश सचिव हर्ष वर्धन श्रृंगला ने जानकारी दी थी। उन्होंने बताया कि 25 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी रिफॉर्म को लेकर स्पष्ट बात कर सकते हैं।
इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन 24 सितंबर को वाशिंगटन में अपनी बैठक में मजबूत और बहुआयामी भारत-अमेरिका संबंधों की समीक्षा करेंगे। इस बैठक में वैश्विक आतंकवाद, व्यापार, रक्षा समेत कई मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। भारत का कहना है कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और इंगलैंड के गठजोड़ का क्वाड देशों पर कोई असर नहीं होगा। इस नए गठजोड़ को ऑक्स का नाम दिया गया है।
जानकारी के मुताबिक, 4 दिवसीय इस दौरे में बायडेन से दो पक्षीय मीटिंग, उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से मुलाकात के अलावा पीएम मोदी क्वाड देशों की मीटिंग में शामिल होंगे, कोविड के मसले पर ग्लोबल मीटिंग में भाग लेंगे और अमेरिका की कंपनियों के सीईओ से मुलाकात करेंगे। इस बीच उनकी मुलाकात ऑस्ट्रेलिया के राष्ट्रपति स्कॉट मॉरिसन और जापान के पीएम योशीहिदे सुगा से भी हो सकती है। इसके अलावा वो यूएन की सालाना सभा को संबोधित भी करेंगे।
यहाँ बता दें कि चार दिवसीय यात्रा पर निकले पीएम मोदी अमेरिका के लिए भरी जाने वाली नॉन स्टाप उड़ान के लिए अफगानिस्तान के रास्ते का इस्तेमाल नहीं करेंगे। इस रास्ते से बचने के लिए पीएम का विमान पाकिस्तान के हवाई क्षेत्र के ऊपर से उड़ान भरेगा।
2015 में इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट ने भारत में हिंदुओं की आबादी को लेकर बहस छेड़ दी थी। इसमें बताया गया था कि 1947 में जब देश स्वतंत्र हुआ तो कुल जनसंख्या का 85 फीसदी हिंदू थे जो 2011 की जनगणना में घटकर 78.35 फीसदी हो गई। देश में एक ऐसा जमात है जो इस तरह के तमाम तथ्य, मुस्लिमों की लगातार आबादी बढ़ने से खास इलाकों में परिस्थितियों में आए बदलाव और जनसंख्या नियंत्रण कानून की जरूरत पर होने वाली हर बहस को मुस्लिम विरोधी बताते हैं। यह वर्ग मुस्लिमों की आबादी में विस्फोट को नकारते हुए उन्हें प्रताड़ित दिखाने की कोशिश भी करता है।
अब अमेरिकी थिंक टैंक प्यू (Pew) रिसर्च सेंटर का एक अध्ययन सामने आया है। इसके आँकड़ों से पता चलता है कि आज भी भारत में सबसे ज्यादा बच्चे मुस्लिम ही पैदा कर रहे हैं। इससे यह भी स्पष्ट है कि 1951 से 2011 के बीच भारत की आबादी तिगुनी हुई। लेकिन इसी दौरान मुस्लिमों की आबादी 5 गुना (3 करोड़ 50 लाख से 17 करोड़ 20 लाख) हो गई। जनसंख्या में मुस्लिमों की हिस्सेदारी बढ़ने की वजह बच्चे पैदा करने की उनकी लालसा बताई गई है। उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता के बाद भारत में पहली जनगणना 1951 में हुई थी।
भारत की धार्मिक संरचना पर केंद्रित इस रिपोर्ट के अनुसार इसके भारत की जनसंख्या का 79.8 फीसदी हिंदू है जो 2001 की जनगणना के मुकाबले 0.7 प्रतिशत कम है। इसके उलट 2001 से 2011 के बीच मुस्लिमों की आबादी 13.4 प्रतिशत बढ़ी है। जैन मतावलंबियों में प्रजनन दर सबसे कम है। देश की कुल आबादी में ईसाई, सिख, बौद्ध और जैन 6 फीसदी हैं। 1951 के बाद से ही इनकी जनसंख्या में स्थिरता है। बावजूद इसके धार्मिक संरचना में बदलाव की बड़ी वजह मुस्लिमों की प्रजनन दर है।
हालाँकि मुस्लिम महिलाओं की प्रजनन दर भी 1992 से लेकर 2015 के बीच 4.4 बच्चे से कम होकर 2.6 बच्चे पर आ गई है। बावजूद इसके यह सबसे अधिक है। इस अध्ययन के अनुसार हिंदुओं की प्रजनन दर 2.1 तो जैनियों की सबसे कम 1.2 बच्चे प्रति महिला है।
मुस्लिमों में प्रजनन दर सबसे अधिक (साभार: प्यू रिसर्च सेंटर)
इससे पहले इसी साल जून में प्यू ने भारत के विभिन्न धर्मों पर अपने अध्ययन को लेकर एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें कहा गया था कि भारत की जनसंख्या विविधता भरी है और धर्म में खासी आस्था रखती है। दुनिया के अधिकतर हिन्दू, जैन और सिख भारत में ही रहते हैं, लेकिन साथ ही ये दुनिया की सबसे ज्यादा मुस्लिम जनसंख्या वाले देशों में से भी एक है। यहाँ बौद्ध और ईसाईयों की जनसंख्या भी दसियों लाख में है। इस अध्ययन के मुताबिक 74% मुस्लिमों ने कहा था कि मुस्लिमों को अपने मजहब की शरिया अदालत में ही जाना चाहिए। 1937 से ही भारत में मुस्लिमों के लिए मजहबी मामलों को निपटाने के लिए एक अलग न्यायिक व्यवस्था है, जिसे ‘दारुल-उल-क़ज़ा’ कहते हैं। काजी के अंतर्गत काम करने वाले इन अदालतों का फैसला मानने के लिए कानूनी रूप से किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता।
गौरतलब है कि प्यू रिसर्च सेंटर दुनिया का एक जाना माना थिंक टैंक है जो अक्सर दुनिया के अलग-अलग मसलों को लेकर अध्ययन करता रहता है। अफगानिस्तान में तालिबान का शासन आने से पहले प्यू ने 30 अप्रैल 2013 को एक सर्वे प्रकाशित किया था। इसमें 99% अफगानियों ने देश के आधिकारिक कानून के रूप में इस्लामी शरिया कानून का समर्थन किया था।
‘The World’s Muslims: Religion, politics and society’ नामक इस सर्वे में 23 देशों में इस्लामिक शरिया कानूनों को लेकर प्रश्न पूछे गए थे। इस सर्वे में 84% पाकिस्तानियों ने भी शरिया के पक्ष में अपनी स्वीकार्यता दिखाई थी। इसमें बताया गया था कि अधिकांश दक्षिण एशियाई देशों में ऐसे लोगों की संख्या अच्छी-खासी है जो शरिया का समर्थन करते हैं। सर्वे में एक रोचक तथ्य यह भी सामने आया था कि जो मुस्लिम दिन में कई बार नमाज पढ़ते हैं या इबादत करते हैं वे उनके मुकाबले जो अपेक्षाकृत कम इबादत करते हैं, शरिया को लेकर कहीं अधिक मुखर हैं।
मध्य प्रदेश के रीवा जिले की जवा तहसील में एक मामूली विवाद के बाद करीब आधा दर्जन+ मुस्लिमों (जैसा पीड़ितों ने बताया) ने घेर कर दो भाइयों ब्रजेंद्र दुबे और विवेक दुबे को बुरी तरह से मारा। उन्होंने दोनों पर मुर्गा काटने वाले औजार से भी हमला किया, जिससे ब्रिजेंद्र का सिर बहुत गहरा कट गया है। हमले में दोनों भाई बुरी तरह से घायल हुए हैं। इस मामले में पीड़ित ने ऑपइंडिया से बात की और उस दिन की हुई घटना के विषय में विस्तार से बताया।
घटना जवा के सितलहा गाँव की है। यहीं पर टोन्स नदी के किनारे स्थित पुल के पास ये घटना हुई थी। रविवार (12 सितंबर 2021) को हुई घटना के बारे में ऑपइंडिया से बात करते हुए ब्रजेंद्र दुबे ने बताया:
“टोन्स नदी के किनारे एक पेड़ गिर गया था, जो सूख चुका था। घर में लौकी की बेल को उस पर लटकाने के लिए पेड़ की टहनी लेने के लिए वहाँ गए थे। वहाँ पहुँच कर जब मैं उसकी डाल को तोड़ने लगा तो उन लोगों (आरोपितों) ने मना किया और बोले कि इसे नहीं ले जा सकते। ये हमारा है। इसके बाद मैंने उसे वहीं छोड़ दिया।”
ब्रजेंद्र ने आगे बताया, “इस घटना के अगले दिन मैं अपने भाई के साथ जवा जा रहा था। उसी दौरान फिरोज, अफरोज, गोलू, हुसैन, साहिल आदि ने घेर लिया। इन लोगों ने मोटे डंडों से हम पर हमला कर दिया और हमारे साथ मारपीट शुरू कर दी। इसके बाद तीन-चार और लोग भी आ गए और सभी ने मिलकर हमें मारा। उन लोगों ने हमारी हत्या की तैयारी की थी। उन्होंने हम पर मुर्गा काटने वाले औजार से हमला कर दिया। इसमें मैं और मेरा भाई बुरी तरह से घायल हो गए। हमने किसी तरह वहाँ से भाग कर अपनी जान बचाई।”
मार से गहरी चोट और मेमरी लॉस
घायल ब्रजेंद्र के मुताबिक, उनके परिजनों ने 108 नंबर पर एंबुलेंस को फोन किया और उसी के सहारे उन्हें उनके परिजन जवा ब्लॉक में इलाज के लिए लेकर गए। वहीं शिकायत के बाद पुलिस वालों ने उनका बयान भी लिया।
ब्रजेंद्र ने मुर्गा काटने वाले औजार के हमले से कटे हुए अपने सिर के जख्मों को भी हमें (ऑपइंडिया के रिपोर्टर) को दिखाया, जिनमें टाँके लगाए गए हैं। साथ ही ये भी बताया कि सिर में चोट लगने के कारण उनका दिमागी संतुलन अब बिगड़ गया है। सिर में कभी-कभी झटके लगते हैं और इस कारण वो लोगों को पहचानना भूल जाते हैं।
ब्रजेंद्र दुबे का छोटा भाई विवेक भी इस हमले में घायल हुए हैं और वह रीवा के संजय गाँधी अस्पताल में भर्ती हैं, जहाँ उनका इलाज चल रहा है। ऑपइंडिया को यह भी बताया गया है कि पीड़ित परिवार गरीब तबके से ताल्लुक रखता है और खेती करके अपना गुजर-बसर करते हैं।
गौहत्या का भी आरोप
ब्रजेंद्र ने ये भी बताया कि आरोपित लोग इलाके में गौहत्याएँ भी करते हैं। उन्होंने बताया कि रात के वक्त टोन्स नदी के पुल पर गाएँ आकर रुकती हैं और रात में ही ये लोग गायों के छोटे बछड़ों को पकड़ कर ले जाते हैं और उनकी हत्या कर देते हैं। इसके अलावा नदी के ही किनारे फिरोज (आरोपितों में से एक) ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर रखा है।
इस संबंध में ऑपइंडिया को जवा थाने के एसएचओ कन्हैया सिंह बघेल ने बताया है कि चार आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है। सभी के खिलाफ धारा 307 के तहत कार्रवाई की गई है। उनके अनुसार एक अन्य आरोपित साहिल अभी फरार चल रहा है। उसकी तलाश की जा रही है और जल्द ही उसे भी पकड़ लिया जाएगा।
एसएचओ कन्हैया सिंह बघेल ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिस जमीन को सरकारी बताया जा रहा है वो दरअसल, नगमा के ही लाखन सिंह पटेल की है। लाखन सिंह ने उस जमीन को फिरोज को दे रखा है।
आपको बता दें कि इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इस वीडियो में दोनों भाइयों को घेर कर बुरी तरह मारते देखा जा सकता है।
बिहार के मधुबनी जिले के झंझारपुर की एक अदालत ने छेड़खानी और रेप के आरोपित को ऐसी शर्त पर जमानत दी है जो चर्चा का विषय बन गया है। कोर्ट ने आरोपित को छह महीने तक गाँव की हर महिला के कपड़े धोने और इस्त्री (आयरन) कर उन्हें घर-घर जाकर लौटाने को कहा। ऐसा नहीं करने पर आरोपित की जमानत रद्द कर उसे दोबारा जेल भेज दिया जाएगा। अदालत ने यह शर्त इसलिए रखी ताकि आरोपित के मन में महिलाओं के प्रति सम्मान पनप सके।
एडीजे अविनाश कुमार (प्रथम) की कोर्ट ने इस शर्त के साथ जमानत दी है। आरोपित 20 साल का ललन कुमार है। उसे इसी साल 19 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ललन को फटकार लगाते हुए उससे उसके पेशे के बारे में पूछा था। जब उसने धोबी होने की बात कही तो अदालत ने उसे यह आदेश दिया। एनबीटी की रिपोर्ट के अनुसार गाँव में महिलाओं की आबादी करीब 2000 है।
कोर्ट के आदेश का पालन हो रहा है या नहीं इसकी निगरानी के निर्देश गाँव के मुखिया या सरपंच को करनी होगी। आरोपित को इनसे मुफ्त सेवा का प्रमाण-पत्र लेकर कोर्ट में पेश करना होगा। कोर्ट ने जमानत की कॉपी गाँव के सरपंच और मुखिया को भी भेजने को कहा है।
मीडिया रिपोर्ट में लौकहा थाना प्रभारी संतोष कुमार मंडल के हवाले से बताया गया है कि ललन पर 17 अप्रैल की रात गाँव की एक महिला के साथ छेड़खानी और दुष्कर्म के प्रयास का आरोप है। 18 अप्रैल को इस संबंध में मामला दर्ज हुआ था।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार एडीजे अविनाश कुमार पहले भी अपने अनोखे फैसलों के कारण चर्चा में रहे हैं। एक बार उन्होंने बाढ़ पीड़ितों को मुफ्त में दाल बाँटने की शर्त पर जमानत दी थी। वहीं एक मामले में आरोपित को गाँव में बनने वाले श्रमदान की शर्त पर जमानत प्रदान की थी।
खिलाफत आंदोलन को दिया गया भारतीय नेताओं का समर्थन वो घात था जिससे शायद भारत कभी उबर नहीं सका। खिलाफत का उद्देश्य तुर्की में खलीफा पद की पुन: स्थापना को समर्थन देना था। ऐसे में मोहनदास करमचंद गाँधी को लगा कि खिलाफत को समर्थन देना, मुस्लिमों को उनके साथ असहयोग आंदोलन में जोड़ देगा। उन्हें ये भी लगा कि अगर खलीफा के समर्थन में मुस्लिमों का साथ दिया गया तो वो बड़ी भारी तादाद में राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होंगे।
हालाँकि, इसके बाद मोपला मुसलमानों की कट्टरता थी जिसने 10,000 हिंदुओं के नरसंहार, सैंकड़ों हिंदू महिलाओं के बलात्कार और हिंदू मंदिरों के विध्वंस को अंजाम दिया। मालाबार नरसंहार के दौरान मोपला मुस्लिम अंधाधुंध हिंदुओं को मार रहे थे वो भी बेहद बर्बर ढंग से। एक वाकया है जिसके अनुसार 25 सितंबर 1921 को 38 हिंदुओं का बेरहमी से सिर कलम किया गया था और उनकी खोपड़ी कुएँ में फेंक दी गई थी। ये बात दस्तावेजों में भी दर्ज है कि जब मालाबार के तत्कालीन जिलाधिकारी इलाके में गए तो कई हिंदू कुएँ से मदद के लिए गुहार लगा रहे थे।
मालाबार अकेला ऐसा नरसंहार नहीं था जब हिंदुओं को मौत के घाट उतारा गया। तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर दीवान बहादुर सी गोपालन नायर ने अपनी पुस्तक में सांप्रदायिक संघर्ष की 50 से अधिक ऐसी घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया है, जब मालाबार के मुसलमानों ने हिंदुओं पर अत्याचार किए थे। ऐसे इतिहास के बावजूद, उस समय कम से कम कहने के लिए तो भारतीय नेतृत्व की प्रतिक्रिया शर्मनाक थी। मोहनदास करमचंद गाँधी ने मालाबार मुसलमानों के खिलाफत आंदोलन को इस उम्मीद में निर्विवाद समर्थन दिया था कि यह मुसलमानों को ‘राष्ट्रवादियों’ में बदल देगा, जिसके परिणामस्वरूप वे हिंदुओं के साथ ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ेंगे।
अब उस समय या तो एमके गाँधी हिंदुओं पर हुए अत्याचार के इतिहास से अपरिचित थे या उन्होंने खुद को मासूम दिखाना चुना…यह सोचना हमारे विवेक पर छोड़ दिया गया है क्योंकि इतिहास की किताबों में शायद ही कहीं भी भारत में इस्लामी कट्टरपंथ के विकास पर बात करते हुए मालाबार नरसंहार का या फिर खिलाफत आंदोलन की भूमिका का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। हालाँकि, गाँधी की मंशा उनकी एक भाषण से भी साफ होती है जो कि कालीकट में शौकत अली के साथ दी गई थी। वो तारीख 18 अगस्त 1920 की थी जब ‘महात्मा गाँधी ने असहयोग की भावना और खिलाफत के प्रश्न पर भाषण दिया था।
गाँधी ने कहा था वे मानते कि यदि भारतीय असहयोग की भावना को समझेंगे तो जरूर सफल होंगे और बर्मा के गवर्नर ने खुद कहा था कि अंग्रेज भारत पर शासन करना बलपूर्वक नहीं, बल्कि लोगों के समर्थन से जारी रखेंगे। इसके बाद उन्होंने लोगों से सरकार की गलतियों को बर्दाश्त नहीं करने का आह्वान किया।
वहाँ गाँधी बोले, “शाही (ब्रिटिश) सरकार ने जानबूझकर 70 लाख मुसलमानों द्वारा पोषित मजहबी भावनाओं की धज्जियाँ उड़ाई है।” गाँधी ने ये भी कहा कि उन्होंने खिलाफत के सवालों को ‘विशेष तरीके’ से समझा था और उन्हें विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों की भावनाओं को आहत किया है जैसा उन्होंने पहले नहीं किया था।
गाँधी ने कहा, “असहयोग की बातें उन्हें समझाई गई और यदि वे इसे स्वीकार नहीं करते तो भारत में रक्तपात होता। मैं मानता हूँ कि खून बहाने से उनकी बात नहीं मानी जाएगी। लेकिन जो आदमी क्रोध की स्थिति में है जिसके दिल को दुख पहुँचा है, वे अपने कर्मों के परिणाम की चिंता नहीं करता।”
भारतीय मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर की जा रही हिंसा को सही ठहराते हुए गाँधी ने कहा, “मैं आपको एक पल के लिए भारत के उत्तरी छोर पंजाब ले जाने का प्रस्ताव रखता हूँ ताकि दिखे कि दोनों सरकार ने पंजाब के लिए क्या किया है। मैं ये स्वीकार करने को तैयार हूँ कि अमृतसर में भीड़ कुछ समय के लिए पगला गई थी। उन्हें एक दुष्ट प्रशासन द्वारा उस पागलपन के लिए उकसाया गया था। लेकिन लोगों की ओर से दिखाया गया कोई भी पागलपन निर्दोषों के खून बहने को सही नहीं ठहरा सकता। उन्होंने इसके बदले क्या चुकाया? मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि कोई भी सभ्य सरकार पंजाब में उपजी स्थिति के लिए लोगों को सजा नहीं देती। वहाँ निर्दोष पुरुषों को मॉक ट्रॉयल और आजीवन कारावास से गुजरना पड़ा।”
यहाँ मोपला मुस्लिमों की बात करते हुए उन्होंने जलियाँवाला बाग नरसंहार को उठाया, जिसे ब्रिटिशों ने अंजाम दिया था और मुस्लिमों द्वारा किए गए नरसंहार पर लीपापोती करते हुए बात की कि कैसे ब्रिटिश सरकार ने जलियाँवाला बाग जैसी घटना पर एक्शन नहीं लिया।
गाँधी ने जलियाँवाला बाग के बारे में बात करते हुए और मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा को न्यायोचित दिखाने के लिए ये बताया कि अंग्रेजों ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई थी। अपनी बात कहते हुए गाँधी मुसलमानों और इस्लाम के कारणों पर बोलते रहे। गाँधी ने आगे बताया कि असहयोग आंदोलन में भाग लेना अंग्रेजों द्वारा इस्लाम के अपमान का बदला लेने का तरीका था और अगर आंदोलन को ठीक से अपनाया गया, तो यह जीत में समाप्त होगा।
उन्होंने पूछा, “क्या भारत के मुस्लिम जिन्हें लगता है कि उनके साथ गलत हुआ वो आत्म बलिदान के लिए तैयार हैं। अगर हम सरकार को लोगों की इच्छा मुताबिक मजबूर करना चाहते हैं, जैसा कि हमें करना चाहिए, तो हमारे लिए एकमात्र उपाय असहयोग है।”
सबसे अधिक समस्या वाली बात जो गाँधी ने कही, “यदि भारत के मुसलमान खिलाफत पर न्याय सुरक्षित करने के लिए सरकार को असहयोग की पेशकश करते हैं, तो यह हर हिंदू का कर्तव्य है कि वह अपने मुस्लिम भाइयों के साथ सहयोग करे।” गौर करने वाली बात यह है कि गाँधी ने यह भाषण 1920 में दिया वो भी उस समय जब मुसलमानों ने पहले से ही खिलाफत स्थापित करने की माँग और तुर्की में खिलाफत के समर्थन में हिंदुओं का नरसंहार करना शुरू कर दिया था।
मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं के नरसंहार के बावजूद गाँधी हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर हिंदुओं से अपील कर रहे थे कि वो मुस्लिमों का सहयोग दें। उन्होंने कहा, “मैं हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की सच्ची मित्रता को ब्रिटिश संबंध से असीम रूप से अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ। इसलिए, मैं यह सुझाव देने का साहस करता हूँ कि यदि वे मुसलमानों के साथ एकता के साथ रहना पसंद करते हैं, तो अब यह है कि उन्हें सबसे अच्छा अवसर मिला है और ऐसा अवसर एक सदी तक नहीं आएगा। मैं यह सुझाव देने का साहस करता हूँ कि अगर भारत सरकार और ब्रिटिश सरकार को पता चलता है कि खिलाफत और पंजाब के साथ हुए गलत को सही करने के लिए इस महान राष्ट्र का एक एक महान दृढ़ संकल्प है, तो सरकार हमारे साथ न्याय करेगी।”
ये जानना भी दिलचस्प है कि गाँधी ने पंजाब के सिखों की देशभक्ति को खिलाफत आंदोलन से जोड़ा जो कि तुर्की में खलीफा की पुन: स्थापना के लिए लड़ा जा रहा था। भारतीय मुसलमानों की इस्लामी खलीफा संबंधी माँगों को जायज दिखाने के इन्हीं प्रयासों ने हिंदुओं पर तमाम अत्याचारों को जन्म दिया था, जबकि गाँधी हिंदुओं से ये अपेक्षा कर रहे थे हिंदू स्वयं के उत्पीड़कों के साथ एकजुट होकर रहें। हिंदुओं पर इस आभासी एकता का भार डालकर गाँधी ने उन्हें समझाया कि साथ रहना उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है। भले ही वो उन्हें मारें, परेशान करें, रेप करें। लेकिन हिंदुओं के चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए।
असहयोग के पहले चरण पर बात करने के बाद जो कि केवल ब्रिटिश ऑफर्स को नकारने तक था, शौकत अली ने कालीकट मुस्लिमों को अलग से खिलाफत आंदोलन के संबंध में अपनी माँग बताई। जैसा कि गाँधी की कालीकट में दी गई पहली स्पीच में देख सकते हैं कि उन्होंने भी हिंदुओं पर ही एकता का भार डाला जिनका पहले से नरसंहार हो रहा था। हकीकत में ये भाषण उस संदर्भ में था ही नहीं कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ा जाए। ये भाषण इस्लामी शासन की स्थापना के संदर्भ में संबोधित किया गया था।
एक ओर जहाँ गाँधी ने 18 अगस्त 1920 को ये स्पीच दी थी और 28 अप्रैल 1920 को खिलाफत आंदोलन आधिकारिक तौर पर शुरू हुआ था। वहीं एक प्रस्ताव अर्नाड तालुक के मुख्यालय मंजेरी में आयोजित किया गया।
गोपालन नय्यर की किताब का स्क्रीनशॉट
20 अगस्त 1921 के आसपास मुस्लिम जमातियों द्वारा हिंदुओं का मालाबार नरसंहार हुआ और मोहनदास करमचंद गाँधी ने 15 सितंबर 1921 की शाम को फिर से कालीकट की यात्रा की और उनका भाषण मद्रास के ट्रिप्लिकेन बीच पर दिया गया था।
जहाँ सैंकड़ों पुरुष काटे जा रहे थे, महिलाओं का रेप हो रहा था और बच्चे मारे जा रहे थे, गाँधी उस समय भी हिंदुओं को अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहे। जिस दौरान मोपला मुस्लिमों ने कट्टरता के चलते हिंदुओं को मारा, गाँधी ने मुस्लिमों पर नाराजगी दिखाने की जगह ब्रिटिश सरकार को कोसा कि उनकी वजह से मुस्लिम इतने बेलगाम और हिंसक हुए।
अब नीचे पढ़िए कि 16 सितंबर 1920 को कालीकट में गाँधी की स्पीच पर मद्रास मेल ने क्या लिखा था (यहाँ कुछ प्रासंगिक अंशों पर प्रकाश डाला गया है):
ये सरकार पर निर्भर करता था क्योंकि उनके पास इतनी शक्ति थी कि वो अली भाइयों को और अन्य प्रवक्ताओं को मालाबार के प्रभावित इलाकों में बुलाते ताकि अमन और सुकून लाया जा सकता। गाँधी इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि अगर ऐसा होता तो शायद हिंदुओं का खून नहीं बहता और न ही हिंदुओं के घर उजड़ते। लेकिन यहाँ उन्हें सरकार पर ये आरोप लगाने के लिए माफ किया जाना चाहिए कि उन्होंने (सरकार) इच्छा से आबादी को हिंसा के लिए भड़काया।
सरकारी तंत्र में बहादुर और ताकतवर लोगों के लिए जगह नहीं थी, ऐसे लोगों के लिए सरकार के पास सिर्फ जेल था। उन्होंने मालाबार में हुई घटना पर अफसोस जताया। मोपला जो कि काबू से बाहर थे वो पागल हो गए थे। उन्होंने खिलाफ़त के खिलाफ़ और अपने देश के विरुद्ध गुनाह किया। पूरा भारत अहिंसक बने रहने के बहकावे में था। कोई कारण नहीं था कि इस बात में संदेह हो कि ये मोपला असहयोग की भावना को नहीं समझे। असहयोगियों को भी प्रभावित हिस्सों में जाने से रोका गया। ये मानकर कि सारा दबाव सरकारी हलकों की ओर से आया और जबरन धर्म परिवर्तन एक सच था हिंदुओं को हिंदू- मुस्लिम एकता को दागदार नहीं करना चाहिए और इसे नहीं तोड़ना चाहिए।
प्रवक्ता हालाँकि ऐसे अनुमान लगाने के लिए तैयार नहीं थे लेकिन उन्हें इस बात के लिए मनाया कि जो लोग जबरन परिवर्तित किए गए हैं उन्हें प्रायश्चित की जरूरत नहीं है। याकूब हसन उन्हें बोल चुके थे कि जिन्हें परिवर्तित किया गया वो इस्लाम में स्वीकार्य नहीं हैं और उन्होंने अपने हिंदू धर्म में रहने के अधिकारों को नहीं खोया है। उजड़े घरों में राहत पहुँचाने के लिए सरकार कॉन्ग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं के रास्ते में हर बाधा डाल रही थी और खुद राहत पहुँचाने में कोई काम नहीं कर रही थी। सरकार ने उन्हें अनुमति दी या नहीं, यह उनका कर्तव्य था कि पीड़ितों की राहत के लिए धन इकट्ठा करें और यह सुनिश्चित करें कि उन्हें वह मिल गया जिसकी उन्हें आवश्यकता थी। उन्हें अभी यही नहीं पता कि सरकार इस भूमि के लोगों की ताकत और उत्थान को दबाने के लिए क्या करने जा रही थी।उनके पास इस गवाही पर विश्वास करने का कोई कारण नहीं था कि कई युवकों का अपमान किया गया क्योंकि उन्होंने खद्दर की टोपी और पोशाक पहनी थी। शांति के रखवालों ने नौजवानों के खद्दर के बनियान फाड़ दिए थे और उनको जला दिया था। मालाबार प्रशासन ने प्रताड़ित करने का एक नया तरीका खोजा था कि अगर किसी ने पंजाब में घटित चीजों से ज्यादा कुछ किया तो क्या किया जाएगा।
जब मालाबार मुसलमान हिंदुओं का नरसंहार कर रहे थे, महिलाओं का बलात्कार कर रहे थे और जबरन हिंदुओं का धर्मांतरण कर रहे थे, मोहनदास करमचंद गाँधी ने जोर देकर कहा कि उन्होंने ‘खिलाफत आंदोलन’ के खिलाफ गुनाह किया है, न कि हिंदुओं के खिलाफ। वास्तव में, उन्होंने आगे बढ़कर जोर देकर कहा था कि हिंदुओं को ‘अहिंसक’ रहना चाहिए चाहे कितने ही उकसावे का सामना करना पड़े।
गाँधी ने कहा कि भले ही यह सच है कि मुसलमान हिंदुओं को जबरन परिवर्तित कर रहे थे, मगर हिंदुओं को इस हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ने नहीं देना चाहिए। यहाँ ध्यान रहे कि गाँधी के लिए बेशक, बलात्कार, हत्याएँ और जबरन धर्मांतरण एकता को नहीं तोड़ रहे थे, लेकिन हिंदू, जिन्हें सताया जा रहा था, संभावित रूप से अपने स्वयं के उत्पीड़न के बारे में हल्का गुस्सा करके उस ‘एकता’ को तोड़ सकते थे।
यह स्पष्ट है कि नरसंहार के बावजूद, भारतीय नेतृत्व जिसमें प्रमुख रूप से गाँधी शामिल थे, उसने हिंदुओं को उनके चेहरे पर मुस्कान के साथ मरते रहने के लिए कहा और इस्लामी शासन स्थापित करने की माँग करने वाले आंदोलन को बेलगाम समर्थन दिया। ऐसे में इसके बाद हुए हिंदुओं के मालाबार नरसंहार को सीधे तौर पर उन नेताओं को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए जिन्होंने कायरता का प्रदर्शन किया और उस समय के बर्बर मुसलमानों को छोड़कर और ‘एकता’ की वेदी पर हिंदू जीवन का बलिदान दिया।
नोट: यह लेख ऑपइंडिया की एडिटर इन चीफ नुपूर जे शर्मा के मूल लेख पर आधारित है। इसका अनुवाद जयंती मिश्रा ने किया है। आप मूल लेख इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।
कर्नाटक विधानसभा में मंगलवार (21 सितंबर 2021) को हिंदुओं के ईसाई धर्मांतरण का मुद्दा उठाया गया। पूर्व मंत्री और भाजपा विधायक गूलीहट्टी शेखर ने इस मसले को उठाते हुए ईसाई मिशनरियों पर कार्रवाई की माँग की। उन्होंने यह भी बताया कि जो लोग इसका विरोध करते हैं उन्हें मिशनरी दुष्कर्म और प्रताड़ना के झूठे मामलों में फँसा रही है। राज्य के गृह मंत्री ए ज्ञानेंद्र ने उन्हें इस दिशा में कार्रवाई का भरोसा दिलाते हुए कहा कि प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन अपराध है।
गुलीहट्टी शेखर ने बताया कि उनकी माँ का भी धर्मान्तरण करा उन्हें अपने माथे पर कुमकुम का तिलक नहीं लगाने को कहा गया है। हालात ये हो गए हैं अब उनकी माँ घर के पूजा स्थल में स्थापित देवी-देवताओं की प्रतिमा तक को नहीं देखना चाहती है। फोन का रिंगटोन ईसाई प्रार्थनाओं में बदल लिया है।
विधायक ने बताया कि उनके इलाके में सक्रिय ईसाई मिशनरियों ने उनकी माँ को प्रार्थना करने के लिए बुलाया। उनसे कहा कि वे बेहतर महसूस करेंगी। फिर उन्हें अपने जाल में फँसा लिया। उन्होंने कहा, “घर में पूजा करने में हमें परेशानी हो रही। यह हमारे लिए बहुत मुश्किल हो गया है। अगर हम उन्हें (माँ) कुछ भी बताने की कोशिश करते हैं तो वह कहती है कि वह अपना जीवन समाप्त कर लेंगी।”
If you question those missionaries and their conversion activities they put a case on those people only who are questioning them. pic.twitter.com/cRZ3sLKGW8
होसादुर्ग विधानसभा में सक्रिय मिशनरियों की ओर ध्यान खींचते हुए विधायक ने बताया, “मिशनरी होसदुर्गा विधानसभा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण में लिप्त हैं। उन्होंने हिंदू धर्म से 18 से 20000 लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर दिया है।” बीजेपी नेता का आरोप है कि अनुसूचित जाति और जनजाति के जिन लोगों का धर्मान्तरण ईसाई मिशनरियों ने करवाया है जब उन्हें इसको लेकर समझाया जाता है तो वो झूठे रेप केस में फँसाने की धमकियाँ देते हैं।
राज्य के गृह मंत्री ज्ञानेंद्र आरागा ने धर्मान्तरण के मुद्दे को आपराधिक और संवेदनशील बताते हुए कार्रवाई करने की बात कही है। उन्होंने कहा कि राज्य समेत देशभर में एक सुव्यवस्थित तरीके और नेटवर्क के जरिए धर्मान्तरण कराया जा रहा है। मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार इस खतरे से निपटने के लिए दूसरे राज्यों के धर्मान्तरण के कानूनों का अध्ययन करेगी। वहीं विधानसभा अध्यक्ष वी हेगड़े ने इस दौरान कहा कि जब वे विपक्ष में थे तो उन्होंने भी इस मसले को उठाया था लेकिन तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने कहा कि दूसरे राज्यों ने इसे रोकने के लिए कानून बनाया है। यदि कर्नाटक में भी ऐसा किया जाता है तो इससे मदद मिलेगी।
बॉलीवुड फिल्ममेकर अनुराग कश्यप पर सेक्शुअल हैरेसमेंट का आरोप लगा चुकीं एक्ट्रेस पायल घोष एक बार फिर से लाइम लाइट में हैं। दरअसल, एक्ट्रेस ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वह बता रही हैं कि कुछ लोगों ने उन पर जानलेवा हमला किया है।
सोमवार (20 सितंबर 2021) को शेयर किए गए वीडियो में पायल कहती हैं, ”हाय, मैं पायल घोष हूँ और कल मैं कुछ दवाएँ खरीदने गई थी। उसके बाद जब मैं अपने ड्राइविंग सीट पर बैठने की कोशिश कर रही थी, तभी वहाँ कुछ लोग आए और मुझ पर जानलेवा हमला करने की कोशिश की।”
उन्होंने बताया, ”उनके हाथ में एक बोतल थी। मुझे नहीं पता कि उसमें क्या था। शायद एसिड या कुछ और हो सकता है। उन्होंने मुझे रॉड से मारने की भी कोशिश की। जब मैं चिल्लाई तो उनकी रॉड मेरे बाएँ हाथ पर गिर गई, जिससे मैं जख्मी हो गई। इसके बाद वो सभी लोग भाग गए।”
पायल ने बताया कि सभी लोगों ने मास्क पहना हुआ था। इसलिए वो किसी को भी पहचान नहीं पाईं। उन्होंने कहा कि वो FIR दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन जाएँगी। पायल ने आरोप लगाया कि बॉम्बे में पहली बार इस तरह की घटना उनके साथ हुई है। पायल का यह वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है।
गौरतलब है कि कुछ वक्त पहले पायल ने खुद को अनुराग कश्यप से खतरा बताया था। पायल घोष ने इस मुद्दे पर ट्वीट करते हुए लिखा था, “अनुराग कश्यप ने खुद का इस्तेमाल करके मुझ पर बेहद बुरी तरह दबाव बनाया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी मेरा आपसे अनुरोध है कि इस आदमी पर कार्रवाई कीजिए, जिससे दुनिया को पता चले कि इस रचनात्मक इंसान के पीछे कितना बड़ा राक्षस छुपा हुआ है। मुझे पता है यह इंसान मुझे नुकसान पहुँचा सकता है, मेरी सुरक्षा खतरे में है, मदद करिए।”
पायल घोष ने महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख को भी पत्र लिखकर सुरक्षा की माँग की थी।
अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध मौत के मामले में सीएम योगी आदित्यनाथ ने जाँच के लिए एसआईटी (SIT) का गठन करने का आदेश दिया है। प्रयागराज के डीआईजी सर्वश्रेष्ठ त्रिपाठी ने विशेष जाँच दल (एसआईटी) का गठन कर टीम का नेतृत्व डेप्यूटी एसपी अजीत सिंह चौहान को सौंपा है।
सीएम योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार (21 सितंबर 2021) को प्रयागराज में श्री मठ बाघम्बरी गद्दी में महंत नरेंद्र गिरि के पार्थिव शरीर का अंतिम दर्शन करने के बाद उनको श्रद्धांजलि दी। इसके बाद उन्होंने कहा
”महान संत की मौत के मामले में जाँच में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी और किसी पर भी संदेह होने पर उसके साथ सख्ती से पेश आया जाएगा।”
फिलहाल, पुलिस महंत नरेंद्र गिरि को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में उनके शिष्य योगगुरु आनंद गिरि, हनुमान मंदिर के पुजारी आद्या तिवारी और उनके बेटे संदीप तिवारी को गिरफ्तार कर उनसे पूछताछ कर रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, महंत नरेंद्र गिरि आत्महत्या मामले में प्रयागराज में गठित एसआईटी में डेप्यूटी एसपी अजीत सिंह चौहान के साथ इंस्पेक्टर महेश को भी रखा गया है। इस मामले में डीआइजी सर्वश्रेष्ठ त्रिपाठी ने कहा कि जरूरत पड़ी तो कुछ लोगों का लाई डिटेक्टर टेस्ट भी कराए जाएँगे।
बताया जा रहा है कि पुलिस महंत नरेन्द्र गिरि की मौत से जुड़े दो वीडियो की जाँच कर रही है। एक वीडियो में नरेंद्र गिरि को ब्लैकमेल करने की बात कही जा रही है। इस वीडियो का जिक्र महंत नरेन्द्र गिरि के कथित सुसाइड नोट में भी किया गया है। वहीं, दूसरे वीडियो को महंत गिरि ने खुद बनाया था, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ हो रही साजिश के बारे में बताया है। इन वीडियो के आधार पर जाँच के बाद बड़ा खुलासा हो सकता है।
बता दें कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा था कि महंत नरेंद्र गिरि ने अपने सुसाइड नोट में बलवीर गिरि को मठ और मंदिर की व्यवस्था देखने को कहा था। उन्होंने लिखा था, ”प्रिय बलवीर गिरि मठ, मंदिर की व्यवस्था का प्रयास करना, जिस तरह से मैंने किया। इसी तरह से करना। नितेश गिरी एवं मणि सभी महात्मा बलवीर गिरि का सहयोग करना। परमपूज्य महंत हरिगोविंद गिरि एवं सभी से निवेदन है कि मढ़ी का महंत बलवीर गिरि को बनाना।”
इस पूरे मामले (सुसाइड नोट) पर अखिल भारतीय संत समिति और गंगा महासभा के महासचिव जीतेंद्रानंद सरस्वती का कहना है कि वह (महंत नरेंद्र गिरि) इतना बड़ा सुसाइड नोट लिख ही नहीं सकते। उन्हें जानने वालों का कहना है कि वो कामचलाऊ रूप से ही लिखते-पढ़ते थे और सामान्यतः हस्ताक्षर से काम चलाते थे।
फिल्मी दुनिया को अलविदा कह चुकीं पूर्व अभिनेत्री सना खान और उनके शौहर मौलाना अनस सईद इन दिनों खासा सुर्खियों में हैं। इसकी वजह सना खान का सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक वीडियो है। वीडियो में सना इस्लामी जलसों को संबोधित करती हुई दिखाई दे रही हैं। इस दौरान सना खान वहाँ मौजूद लोगों को बताती हैं कि किस तरह उन्होंने बॉलीवुड को छोड़ा और उनके शौहर अनस पहले उन्हें क्या कहकर बुलाते थे।
सना ने कहा, ”आप यकीन नहीं मानोगे कि अनस शुरुआत में मुझे बहन बुलाते थे। मैं जब भी यह सोचती हूँ, मुझे बहुत हँसी आती है।” उन्होंने आगे कहा, ”वह मुझे एक दावत में मिले थे। उनका काम था कि अगर कोई एक भी इंडस्ट्री से सही रास्ते पर आ जाती है, तो और बहनों का भी फायदा हो जाएगा। इस दौरान जब वो मुझे मिले तो जी बहन, जी बहन कह रहे थे और मैं भी उन्हें जी मौलाना, जी मौलाना कह रही थी। मुझे क्या पता था ये मेरे हमसफर बन जाएँगे।” उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
एक यूजर ने लिखा, ”सुनिए, पहले बहन बुलाया फिर शौहर बन गए। बहन बुलाते-बुलाते क्या प्यार हो सकता है? अगर बहन का दर्जा दिया तो फिर कोई किसी को शौहर की नज़र से कैसे देख सकता है? इनके रिश्ते से मुझे कोई शिकायत नहीं, बल्कि रिश्ते की बुनियाद से है।”
सुनिए, पहले बहन बुलाया फिर पति बन गए। बहन बुलाते-बुलाते क्या प्यार हो सकता है? अगर बहन का दर्जा दिया तो फिर कोई किसी को शौहर की नज़र से कैसे देख सकता है? इनके रिश्ते से मुझे कोई शिकायत नहीं, बल्कि रिश्ते की बुनियाद से है। #SanaKhan#Marriagepic.twitter.com/73bEkKyVKu
एक अन्य यूजर ने लिखा, ”इंडस्ट्री से कोई एक बहन सही रास्ते पर आ जाती है, तो और बहनों का फायदा हो जाएगा। सना खान इसका मतलब ये है क्या कि इंडस्ट्री में लड़कियाँ गलत रास्ते पर हैं। दूसरा की बहन केवल मुँह पर होता है।”
इंडस्ट्री से कोई एक बहन सही रास्ते पर आ जाती है, तो और बहनो का फ़ायदा हो जाएगा – #SanaKhan
मतलब, एक की इंडस्ट्री में लड़कियाँ ग़लत रास्ते पर हैं। दूसरा की बहन केवल मुँह पर होता है।
कुछ दिन पहले अनस का भी यूट्यूब पर एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह वीडियो में सना खान के बारे में बता रहे हैं। वीडियो में अनस ने बताया था कि वह पहले सना खान को बहन कहा करते थे। मौलाना अनस के कुछ ऐसे और भी वीडियो वायरल हुए थे, जिसमें वो इस्लामी जलसों में अपनी और शादी की कहानियाँ भी सुनाते नजर आए। उन्होंने बताया कि सना खान से कैसे उनका निकाह हुआ।
बता दें कि बॉलीवुड में एंट्री के साथ ही सना खान का अफेयर मशहूर कोरियोग्राफर मेलविन लुईस से था। दोनों लंबे अरसे तक लव रिलेशनशिप में रहे लेकिन बाद में इनका ब्रेकअप हो गया था।
दुनियाभर में मशहूर ‘जेम्स बॉन्ड सीरीज’ की अगली फिल्म ‘नो टाइम टू डाय’ 30 सितंबर 2021 को रिलीज होने जा रही है। इस फिल्म में आखिरी बार जेम्स बॉन्ड की भूमिका में डैनियल क्रेग दिखाई देंगे। ऐसे में कई लोग उनसे कई सवाल कर रहे हैं। उनके पूछा जा रहा है कि क्या वो अपने बदले किसी महिला या साँवले रंग वाले एक्टर को उनके किरदार में देखना पसंद करेंगे।
रेडियो टाइम्स मैगजीन को जवाब देते हुए क्रेग कहते हैं, “इसका उत्तर बहुत सरल है। महिलाओं और एक्टर ऑफर कलर्स (साँवले रंग वाले एक्टर्स) के लिए बस बेहतर हिस्से होने चाहिए। एक महिला को जेम्स बॉन्ड की भूमिका क्यों निभानी चाहिए, जब एक महिला के लिए जेम्स बॉन्ड जैसा ही अच्छा पार्ट होना चाहिए?”
इससे पहले एक ऐसा ही कमेंट 2018 में बॉन्ड फ्रैंचाइज़ी के कार्यकारी निर्माता बारबरा ब्रोकोली द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा था, “बॉन्ड पुरुष है। वह एक पुरुष चरित्र है। उसे एक पुरुष के रूप में लिखा गया था और मुझे लगता है कि वह शायद एक पुरुष के रूप में रहेगा।” उन्होंने कहा था, “और यह ठीक है। हमें पुरुष पात्रों को महिलाओं में बदलने की जरूरत नहीं है। आइए बस और अधिक महिला पात्र बनाएँ और कहानी को उन महिला पात्रों के अनुकूल बनाएँ। इसलिए ये अपेक्षा ही मत करिए कि आप कभी भी 007 में गुड इवनिंग, ‘मिस बॉन्ड’ सुनेंगे।
गौरतलब है कि आखिरी बार जेम्स बॉन्ड सीरीज में नजर आने जा रहे क्रेग की कुछ दिन पहले एक वीडियो सामने आई थी। इस वीडियो में दिख रहा था कि वो कैसे सेट पर अपनी फेयरवेल स्पीच देते हुए भावुक हो गए थे। कथिततौर पर वीडियो फिल्म के आखिरी दिन की शूटिंग का था।
Daniel Craig's emotional speech after wrapping #NoTimeToDie — 15 years of Bond ?
इस वीडियो में डैनियल कहते हैं, “यहाँ बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने 5 फिल्मों में मेरे साथ काम किया। और मुझे पता है कि कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं कि मैं उन फिल्मों या उनके बारे में क्या सोचता हूँ…जो भी हो, लेकिन मैंने इन फिल्मों को हमेशा बेहद प्यार किया है और खास तौर पर यह वाली क्योंकि मैं रोजाना सुबह उठता था और आप लोगों के साथ काम करने का मौका मिलता था। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है।”