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जेम्स बॉन्ड का रोल महिला कर सकती है क्या? डैनियल क्रेग ने कहा – ‘नहीं’

दुनियाभर में मशहूर ‘जेम्स बॉन्ड सीरीज’ की अगली फिल्म ‘नो टाइम टू डाय’ 30 सितंबर 2021 को रिलीज होने जा रही है। इस फिल्म में आखिरी बार जेम्स बॉन्ड की भूमिका में डैनियल क्रेग दिखाई देंगे। ऐसे में कई लोग उनसे कई सवाल कर रहे हैं। उनके पूछा जा रहा है कि क्या वो अपने बदले किसी महिला या साँवले रंग वाले एक्टर को उनके किरदार में देखना पसंद करेंगे।

रेडियो टाइम्स मैगजीन को जवाब देते हुए क्रेग कहते हैं, “इसका उत्तर बहुत सरल है। महिलाओं और एक्टर ऑफर कलर्स (साँवले रंग वाले एक्टर्स) के लिए बस बेहतर हिस्से होने चाहिए। एक महिला को जेम्स बॉन्ड की भूमिका क्यों निभानी चाहिए, जब एक महिला के लिए जेम्स बॉन्ड जैसा ही अच्छा पार्ट होना चाहिए?”

इससे पहले एक ऐसा ही कमेंट 2018 में बॉन्ड फ्रैंचाइज़ी के कार्यकारी निर्माता बारबरा ब्रोकोली द्वारा किया गया था। उन्होंने कहा था, “बॉन्ड पुरुष है। वह एक पुरुष चरित्र है। उसे एक पुरुष के रूप में लिखा गया था और मुझे लगता है कि वह शायद एक पुरुष के रूप में रहेगा।” उन्होंने कहा था, “और यह ठीक है। हमें पुरुष पात्रों को महिलाओं में बदलने की जरूरत नहीं है। आइए बस और अधिक महिला पात्र बनाएँ और कहानी को उन महिला पात्रों के अनुकूल बनाएँ। इसलिए ये अपेक्षा ही मत करिए कि आप कभी भी 007 में गुड इवनिंग, ‘मिस बॉन्ड’ सुनेंगे।

गौरतलब है कि आखिरी बार जेम्स बॉन्ड सीरीज में नजर आने जा रहे क्रेग की कुछ दिन पहले एक वीडियो सामने आई थी। इस वीडियो में दिख रहा था कि वो कैसे सेट पर अपनी फेयरवेल स्पीच देते हुए भावुक हो गए थे। कथिततौर पर वीडियो फिल्म के आखिरी दिन की शूटिंग का था।

इस वीडियो में डैनियल कहते हैं, “यहाँ बहुत सारे लोग हैं जिन्होंने 5 फिल्मों में मेरे साथ काम किया। और मुझे पता है कि कहने के लिए बहुत सारी बातें हैं कि मैं उन फिल्मों या उनके बारे में क्या सोचता हूँ…जो भी हो, लेकिन मैंने इन फिल्मों को हमेशा बेहद प्यार किया है और खास तौर पर यह वाली क्योंकि मैं रोजाना सुबह उठता था और आप लोगों के साथ काम करने का मौका मिलता था। यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा सम्मान है।”

जिस राजस्थान में सबसे ज्यादा रेप, वहाँ की पुलिस भेज रही गंदे मैसेज-चौकी में भी हो रही दरिंदगी: कॉन्ग्रेस है तो चुप्पी है

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) ने सितंबर 2021 में अपनी साल 2020 की रिपोर्ट जारी कर दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान में सबसे ज्यादा रेप केस दर्ज किए गए हैं। वहीं उत्तर प्रदेश में अपराध के ग्राफ में गिरावट देखी गई। केवल रेप मामलों की बात करें तो यहाँ भी उत्तर प्रदेश राजस्थान से पीछे है। राजस्थान में जहाँ 5,310 केस दुष्कर्म के आए तो वहीं उत्तर प्रेदश में ये आँकड़ा 2,769 का है।

महिलाओं के विरुद्ध हुए अपराधों में राजस्थान सबसे आगे।

सवाल है कि उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली पर समय-समय पर सवाल उठाने वाले आज NCRB के स्पष्ट रिकॉर्ड देखने के बावजूद  भी क्यों चुप बैठे हैं। क्या अब सवाल नहीं होना चाहिए कि आखिर आए दिन किसी न किसी कारण अखबारों में घिरी रहने वाली राजस्थान पुलिस अपराध रोकने के लिए क्या कर रही है। केवल मीडिया में आ रही खबरों की बात करें तो पता चलता है कि राजस्थान पुलिस बीतें दिनों कई कारणों से विवादों में थी। इनमें कुछ तो बहुत हालिया हैं।

राजस्थान पुलिस के दामन पर लगे दाग

आज ही खबर आई है कि राजस्थान का एक पुलिसकर्मी नाबालिगों के साथ अश्लील हरकत करने के आरोप में पकड़ा गया। पींसांगन थाने में कार्यरत कॉन्सटेबल की अश्लील चैटिंग सामने आई है। उस पर कई छात्रों ने मानसिक व शारीरिक रूप से तंग करने का आरोप लगाया है। इसके अलावा डराने और धमकाने की शिकायत भी छात्रों ने की है। इस खबर के आने से कुछ दिन पहले ही एक पुलिस अधिकारी की अश्लील हरकत के कारण राजस्थान पुलिस शर्मसार हुई थी। उस समय पुलिस अधिकारी का एक वीडियो वायरल हुआ था जहाँ वह महिला कॉन्सटेबल के सामने अश्लील हरकत करते पकड़ा गया था।

ऐसे ही 21 अगस्त को नागौर जिले के खुनखुना थाने में एक शिकायत दर्ज हुई जहाँ पुलिस अधिकारी के ख़िलाफ़ रेप का केस दर्ज हुआ था। पीड़िता ने शिकायत में कहा था कि वह साल 2018 में एक मामले में शिकायत दर्ज कराने थाने गई थी, वहीं आरोपित थानाधिकारी ने उसका नंबर लिया और उसे तंग करने लगा। इसके बाद एक दिन उसे होटल में बुला कर उसका रेप कर दिया।

साल 2021 के मार्च में ही अलवर के खड़ेली थाने में अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने गई 26 साल की महिला से थाना परिसर में ही सब इंस्पेक्टर द्वारा तीन दिन तक लगातार रेप किए जाने का मामला सामने आया था। फिर ACP कैलाश बोहरा को ऑफिस में पीड़िता के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़ा था। साल 2019 में चुरु जिले में एम दलित युवक की पुलिस हिरासत में हुई संदिग्ध मौत के मामले में भी पुलिस पर रेप के आरोप लगे थे।

तो, ये केवल चंद उदाहरण है जिन्हें हाल फिलहाल में मीडिया में जगह मिली और राजस्थान पुलिस का एक अलग चेहरा भी उजागर हुआ। अब प्रश्न ये है कि राजस्थान में कॉन्ग्रेस सरकार है। वही कॉन्ग्रेस जिसने दूसरे प्रदेश में घटित होती घटनाओं पर समय-समय पर सवाल उठाया लेकिन अपने ही प्रदेश में बढ़ रहे अपराध और पुलिस पर लगते इल्जामों पर क्यों मौन धारण किए रहे?

कॉन्ग्रेस का दोहरापन क्यों?

पिछले साल की बात है जब हाथरस में हुई घटना की बाबत राहुल गाँधी-प्रियंका गाँधी समेत तमाम कॉन्ग्रेसियों ने सोशल मीडिया के माध्यम से यूपी सरकार पर निशाना साधा था और पीड़ित परिवार के घर पहुँच-पहुँच कर अपनी संवेदनाएँ प्रकट की थी। दूसरी ओर वही राहुल-प्रियंका गाड़ी में बैठ ठहाके लगाते भी दिखे थे। इसी तरह तमाम मामलों में कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं ने समय-समय बात या बिन बात यूपी सरकार को कई मुद्दों में घेरा और प्रदेश या मजहब विशेष की बातें आते ही शांत हो गए।

ये कॉन्ग्रेस का पाखंड ही है कि वो यूपी में घट रही घटनाओं पर तभी चुप होते हैं जब जाति से आरोपित ब्राह्मण या फिर धर्म से हिंदू हो। इसके उलट अगर आरोपित विशेष समुदाय से होता है तो उस मुद्दे को वहीं छोड़ दिया जाता है। जैसे हाथरस के समय यूपी के बलरामपुर में दो युवकों – शाहिद पुत्र हबीबुल्ला निवासी गैंसड़ी और साहिल पुत्र हमीदुल्ला निवासी गैंसड़ी ने रेप की वारदात को अंजाम दिया था। मगर राहुल गाँधी या किसी कॉन्ग्रेस नेता ने उस मुद्दे में दिलचस्पी नहीं ली थी।

और, ज्ञात रहे हर मामले और हर मुद्दे में ये बिंदु हर बार उठता है कि बीजेपी शासित राज्यों में हर घटना या अपराध को जाति और मजहब के चश्मे से देखने वाली कॉन्ग्रेस राजस्थान में बढ़ रहे अपराधों पर क्यों मुँह फेर लेती है जबकि यहाँ की उस पुलिस पर आए दिन तरह-तरह के आरोप लगते हैं कि जिनका काम अपराधों को दर्ज करके उनमें कार्रवाई करना और जाँच कर दोषियों को सजा दिलवाना है। 

आज पाकिस्तान के लिए बैटिंग, कभी क्रिकेट कैंप में मौलवी से नमाज: वसीम जाफर पर ‘हनुमान की जय’ हटाने का भी आरोप

न्यूजीलैंड के बाद इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने सुरक्षा कारणों से पाकिस्तान का दौरा रद्द कर दिया है। पाकिस्तानियों के अलावा जिनको यह फैसला नागवार गुजरा है उनमें भारत के पूर्व क्रिकेटर वसीम जाफर भी हैं। उन्होंने ट्वीट कर इंग्लैंड के फैसले को बेहद निराशाजनक बताया है।

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) के साथ सहानुभूति रखने की वज​ह से जाफर सोशल मीडिया यूजर्स के निशाने पर भी आ गए हैं। जाफर का कहना है कि इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड पर पाकिस्तान और वेस्टइंडीज दोनों के एहसान हैं। उन्होंने ट्वीट किया, “पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के पास कई कारण हैं कि वो ECB से निराश हो। पिछले साल जब कोरोना की वैक्सीन भी नहीं आई थी तब पाकिस्तान और वेस्टइंडीज ने महामारी के दौरान भी इंग्लैंड का दौरा किया था।”

टीम इंडिया के पूर्व सलामी बल्लेबाज जाफर ने ट्वीट कर पाकिस्तान की हालत पर दुख प्रकट किया है।

इस पर एक ट्विटर यूजर ने जाफर को पाकिस्तानी प्रेमी कहते हुए लिखा, ”वसीम भाई वही हैं जो भारत-पाकिस्तान के मैच में खेल भावना के नाम पर पाकिस्तान को चीयर करते हैं।”

साभार: ट्विटर

अंकित जैन नाम के एक यूजर ने सन्नी देओल की फिल्म गदर का पोस्टर शेयर करते हुए लिखा, “मामाजी मैं आपको लाहौर छोड़ दूँ।”

एक ट्विटर यूजर ने लिखा, ”चुप कर बे वसीम। एकदम चुप। क्या नो विनर? उन्होंने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए यह फैसला लिया है। कुछ ने उन्हें सही चेतावनी दी होगी। उनके फैसले का सम्मान करें। आप उन पर आक्रोशित होने वाले कौन होते हैं? हमेशा उनके फैसले को गलत ठहराने की कोशिश न करें क्योंकि… उम्मीद है आप समझ गए होंगे। वाह भाई।”

एक और यूजर ने वसीम जाफर को आड़े हाथों लेते हुए लिखा, “कोरोना से बड़ा खतरा आतंकवाद है। एक बार को कोरोना जा सकता है, लेकिन आतंकवाद कभी खत्म नहीं हो सकता। ECB और NZ क्रिकेट बोर्ड ने पाकिस्तान में क्रिकेट नहीं खेलने का सही फैसला लिया है। आखिरकार यह उनके जीवन से जुड़ा मामला है।”

मुस्लिम क्रिकेटरों को तरजीह देने का आरोप

फरवरी 2021 में जाफर ने चयन समिति और क्रिकेट संघ के साथ विवाद को लेकर उत्तराखंड टीम के कोच पद से इस्तीफा दे दिया था। बीसीसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष व उत्तराखंड क्रिकेट संघ (सीएयू) के सचिव महिम वर्मा ने जाफर पर क्रिकेट संघ के अधिकारियों के साथ झगड़ा करने और अपने मजहबी पूर्वाग्रह के कारण क्रिकेट टीम को तोड़ने की कोशिश का आरोप लगाया था। वर्मा ने कहा था कि शुरू में उन्होंने जाफर को पूरा समर्थन दिया और घरेलू क्रिकेट में सबसे ज्यादा रन बनाने की उनकी उपलब्धि को ध्यान में रख उनके फैसलों को स्वीकार किया।

वर्मा ने कहा था कि उन्होंने खिलाड़ियों के चयन को लेकर जाफर पर कभी दबाव नहीं बनाया। उन्होंने बताया था कि जाफर टीम में इकबाल अब्दुल्ला, समद सल्ला और जय बिस्ता को गेस्ट खिलाड़ी के रूप में लाए। कुणाल चंदेला की जगह इकबाल अब्दुल्ला को जबरदस्ती टीम का कप्तान बनाया। सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी टी20 टूर्नामेंट में उनके फैसलों के कारण टीम 5 में से चार मैच हार गई।

‘राम भक्त हनुमान की जय’ वाला स्लोगन बदला

वर्मा ने आगे आरोप लगाया था कि टीम का सहायक स्टाफ उन्हें बताता था कि जाफर कैंप के दौरान मौलवी लाते थे। मुश्ताक अली ट्रॉफी के दौरान टीम मैनेजर रहे नवनीत मिश्रा ने कथित तौर पर कहा कि तीन मौलवियों ने कैंप का दौरा किया। उन्होंने कहा कि जाफर ने उन्हें बताया कि मौलवी नमाज पढ़ने आए थे। कैंप के दौरान ऐसा दो बार हुआ। मिश्रा ने आगे बताया कि उत्तराखंड टीम ‘राम भक्त हनुमान की जय‘ नारे का इस्तेमाल करती थी। मैदान पर मौलवी बुलाने वाले जाफर ने इसे बदलवा दिया। मैनेजर ने कहा कि जाफर ने कहा था कि इस टीम में सभी धर्म के लोग हैं इसलिए इस स्लोगन को बदल देना चाहिए। जब उनसे कहा गया कि इसकी जगह ‘उत्तराखंड की जय’ कर लेते हैं तो उन्होंने जय से भी आपत्ति जताई। उनके कहने पर ‘गो उत्तराखंड’ टीम का स्लोगन रखा गया था।

ED के समन पर नहीं लगेगी रोक, दिल्ली HC से CM ममता के भतीजे को राहत नहीं: याचिका में कहा था – ‘हो रहा मीडिया ट्रायल’

दिल्ली हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई से राहत प्रदान करने से इनकार कर दिया। दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार (21 सितंबर, 2021) को अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी रुजीरा को ED द्वारा भेजे गए समन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। TMC को इस फैसले के बाद झटका लगा है।

दिल्ली उच्च-न्यायालय अब सोमवार (27 सितंबर, 2021) को इस मामले में अगली सुनवाई करेगा। कथित कथित कोयला खुदाई घोटाला मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने ED से तीन दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। केंद्रीय जाँच एजेंसी के समन के खिलाफ अभिषेक व रुजीरा बनर्जी ने अपील कर रखी है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से दरख्वास्त की थी कि ED के सभी समन पर रोक लगाई जाए।

इन दोनों ने दिल्ली उच्च-न्यायालय से अनुरोध किया था कि वो ED को आदेश दे कि उन्हें बार-बार समन देकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली न बुलाया जाए, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में ही पूछताछ व जाँच की कार्यवाही हो। न्यायाधीश योगेश खन्ना ने इस मामले की सुनवाई की। उन्हें धन-शोधन निवारण अधिनियम (Prevention of Money Laundering Act), 2002 की धारा-50 के तहत समन भेजा गया था।

इस मामले में बड़ी मात्रा में दस्तावेज ED ने जुटाए हैं, ऐसे में उस सम्बन्ध में अधिक जानकारी के लिए ED ने अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी रुजीरा को व्यक्तिगत रूप से पेश होने को कहा था। ED का कहना है कि ये मामला राष्ट्रीय है और किसी एक पुलिस थाने तक सीमित नहीं है। दोनों ने आरोप लगाए थे कि केंद्रीय एजेंसी कुछ लोगों को परेशान कर रही है तो कुछ को बचा रही है। साथ ही उन्हें बदनाम करने का आरोप भी लगाया था।

अभिषेक बनर्जी और रुजीरा ने अपनी याचिका में कहा था, “ED जानबूझ कर इस मामले की सूचनाएँ मीडिया में लीक कर रहा है। इस कारण ‘मीडिया ट्रायल’ किया जा रहा है, जिससे हमारी प्रतिष्ठा की मानहानि हो रही है। हमारे खिलाफ आधारहीन आरोप लगाए गए हैं।” वहीं ED इस मामले में पहले ही अभिषेक बनर्जी से पूछताछ कर चुका है। हालाँकि, दिल्ली उच्च-न्यायालय से उन्हें कोई राहत नहीं दी गई।

अप्रैल 2021 में ED ने अपने रिमांड नोट में बताया था कि राज्य में अवैध कोयला उत्खनन का काम सत्ताधारी राजनेताओं के संरक्षण में फल-फूल रहा था। माँझी, विनय और विकास के लिंक अभिषेक बनर्जी के परिवार से जुड़े हैं। पिछले 2 साल में माँझी ने 1352 करोड़ रुपए के अवैध कोयला खनन को अनुमति दी थी। विनय मिश्रा के जरिए ये लोग सत्ताधारी नेताओं से संपर्क में थे। वहीं अभिषेक बनर्जी ने कहा था कि सारी कोयला एजेंसियाँ केंद्र के अधीन आती हैं और उन पर केंद्रीय संस्थाएँ निगरानी रखती हैं।

क्या है हवाना सिंड्रोम, कैसे करता है वार? भारत में शिकार बनने का दावा कर रही अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA

ऐसे वक्त में जब पूरी दुनिया चीनी कोरोना वायरस के संक्रमण से उबरने की कोशिश में लगी है, अचानक से हवाना सिंड्रोम (Havana Syndrome) चर्चा में आ गया है। दरअसल दावा किया जा रहा है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के अधिकारी हाल ही में भारत में इसका शिकार हो गए। बताया जा रहा है कि यह तब हुआ जब अफगानिस्तान की सत्ता में तालिबान के लौटने के बाद बदले हालात पर चर्चा करने के लिए सीआईए निदेशक विलियम बर्न्स भारत में थे।

उन्होंने सीएनएन और न्यूयॉर्क टाइम्स को रहस्यमयी बीमारी हवाना सिंड्रोम (Havana syndrome) के लक्षणों के बारे में बताया। उनके मुताबिक, करीब 200 अमेरिकी अधिकारी और उनके परिवार के सदस्य हवाना सिंड्रोम से पीड़ित हो गए हैं। भारत में यह इस तरह का पहला मामला है। वैसे अमेरिकी अधिकारी सबसे पहले 2016 में इसके शिकार हुए थे। तब क्यूबा के अमेरिकी दूतावास में मौजूद अधिकारियों में इस रहस्यमयी बीमारी के लक्षण पाए गए थे।

क्या है, कैसे पड़ा नाम

करीब 5 साल पहले क्यूबा की राजधानी हवाना के अमेरिकी दूतावास में काम कर रहे अधिकारी एक-एक कर बीमार पड़ने लगे थे। उन्हें होटल के कमरों, घरों में अजीब सी आवाजें सुनाई देती थी। अधिकारियों ने अपने सिर में दबाव और झनझनाहट की शिकायत की थी। वे सभी थकान महसूस कर रहे थे। उनकी याददाश्त जा रही थी और उन्हें कान में दर्द और सुनने में भी तकलीफ हो रही थी। जब इन सभी के दिमाग का स्कैन कराया गया तो बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ।

बताया जाता है कि जिस प्रकार दुर्घटना या बम विस्फोट के दौरान ब्रेन टिश्यू (दिमागी ऊत्तकों) क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, वैसे ही इस बीमारी में होता है। इसके तुरंत बाद ही अमेरिकी सरकार ने अपने दूतावास के आधे से ज्यादा स्टाफ को वापस बुला लिया था। सबसे पहले इस अजीबोगरीब बीमारी के बारे में हवाना में पता चला था, इसलिए इसे ‘हवाना सिंड्रोम’ नाम दिया गया। उसके बाद ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, कोलंबिया, रूस और उज्बेकिस्तान में भी इसके मामले सामने आए थे।

लक्षण, कैसे होता है?

इस बीमारी में देखने में परेशानी, जी मिचलाना, लड़खड़ाना, बैलेंस बिगड़ना, सिर चकराना आदि लक्षण पाए जाते हैं। इसके अलावा सुनने की क्षमता कम होना, सिर के अंदर तेज दबाव या वाइब्रेशन भी होता है।

अमेरिका की नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के अनुसार, यह सिंड्रोम ‘डायरेक्‍टेड, पल्‍सड रेडियो फ्रीक्‍वेंसी एनर्जी’ से होता है। सीआईए के निदेशक विलियम बर्न्‍स ने कहा है कि बहुत हद तक संभव है कि यह सिंड्रोम इंसानी नियंत्रण में हो और शायद रूस इसके पीछे हो। अमेरिका के ज्‍यादातर अधिकारी मानते हैं कि यह इलेक्‍ट्रॉनिक हथियारों से किया गया हमला है। हालाँकि, अभी तक किसी अंतिम नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सका है।

बता दें कि अमेरिकी रक्षा विभाग को लगता है कि रूस ऐसे हमले करवा रहा है। एक महीने के अंदर ऐसा दूसरी बार हुआ है जब बाइडन प्रशासन के अधिकारियों की अंतरराष्‍ट्रीय यात्रा रहस्‍यमय बीमारी से प्रभावित हुई है। अभी पिछले महीने ही अमेरिका की उपराष्‍ट्रपति कमला हैरिस की वियतनाम यात्रा को इसलिए कुछ समय के लिए टाल दिया गया था, क्‍योंकि अमेरिका के कई अधिकारी यात्रा से पहले हवाना सिंड्रोम का शिकार हो गए थे।

‘चोरी, गबन, करप्शन, फर्जीवाड़ा’: सारे आरोपों के धुले प्रोफेसर SS पांडेय होंगे मोतिहारी MGCUB के कुलपति? जानिए क्यों हो रहा विरोध

बिहार के पूर्वी चम्पारण जिले के मोतिहारी में स्थित महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (MGCUB) के कुलपति पद के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के पास जो आवेदन सामने आए थे, उनमें से एक नाम प्रोफेसर शील सिंधु पांडेय का भी है। उनका इंटरव्यू भी लिया जा चुका है और माना जा रहा है कि इस पद पर उनकी बहाली हो सकती है। लेकिन, उनके साथ इतने विवाद जुड़े हैं कि छात्र सशंकित नज़र आ रहे हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता आलोक राज ने इस बाबत केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र में लिखा था, “प्रोफेसर शील सिंधु पांडे विक्रम विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश में कुलपति रह चुके हैं जहाँ पर वे किताब खरीदने तथा अवैध नियुक्ति करने के मामले में हुए घोटाले के मुख्य आरोपित हैं। मध्य प्रदेश उच्च-न्यायालय में उन पर मुकदमा भी हुआ था। इस बाबत हाईकोर्ट ने उनसे जवाब भी माँगा था, लेकिन तब वो पकड़े जाने के कारण पहले ही इस्तीफा देकर निकल गए थे। वो अक्खड़, शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले और घोटालेबाज किस्म के व्यक्ति हैं।”

यहाँ तक कि इस मामले में मध्य प्रदेश राजभवन से भी उन्हें ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया गया था। उन्होंने इसका जवाब भी भेजा था, लेकिन किसी कार्रवाई से पहले ही उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। तब राजभवन ने कहा था कि अगर वो त्यागपत्र नहीं देते तो विश्वविद्यालय के नियमों के हिसाब से उन पर कार्रवाई होती। राज्यपाल ने पाया था कि उन्होंने चयन प्रक्रिया में भी नियमों का पालन नहीं किया है।

राजभवन द्वारा जारी आदेश के अनुसार, उन्होंने तीन दिन में ही विदेशी प्रकाशन की पुस्तकें मँगा कर उनका सत्यापन कर दिया था और राशि के भुगतान की अनुशंसा भी कर डाली थी – जो संदेहास्पद था। राजभवन ने माना था कि पुस्तकें क्रय करने का अनुबंध समाप्त हो जाने के बाद निगोशिएशन प्रणाली अपना कर सादे कागज़ पर अनुबंध करना शासन के वित्त विभाग के नियमों के विरुद्ध था।

नियमानुसार उन्हें इस प्रक्रिया के लिए निविदा आमंत्रित करना था और एक ही अनुबंध को बार-बार आगे नहीं बढ़ाना था। नए अनुबंध किए जाने थे, जो नहीं हुआ। राजभवन ने पाया था कि 68.60 लाख रुपए का भुगतान तो किया गया, लेकिन उसका सत्यापन नहीं हुआ, पुस्तकालय में उसकी प्रविष्टि दर्ज नहीं की गई और बिलों में इसका उल्लेख नहीं हुआ। वहीं चयन प्रक्रिया में भी उन पर अनियमितता के आरोप लगे थे।

राज्यपाल द्वारा जारी किए आदेश की प्रति

इस सम्बन्ध में भरत कुमार ने राज्यपाल को शिकायत भेजी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि कुलपति SS पांडेय और अन्य अधिकारियों द्वारा नियमों का उल्लंघन कर अपने स्वार्थ की पूर्ति की जा रही है और वित्तीय लाभ कमाया जा रहा है। उन्होंने लिखा था कि विक्रम विश्वविद्यालय में 3 वर्षों से प्रशासनिक अनियमितता के कारण शैक्षिक वातावरण प्रभावित हो रहा है। उन्होंने आर्थिक भ्रष्टाचार के साथ-साथ UGC के नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाए थे।

इस पत्र में लिखा था, “विश्वविद्यालय में आर्थिक अनियमितता का माहौल है। कुलपति SS पांडेय अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं। शासन के नियमों का पालन नहीं हो रहा है। हजारों की संख्या में विद्यार्थियों का भविष्य विवि की हठधर्मिता ही जिम्मेदार है। सारे टेंडर नियमों का उल्लंघन कर जारी किए जा रहे हैं। निगोसिएशन प्रणाली को अपना कर मध्य प्रदेश वित्त विभाग के आदेश का भी उल्लंघन किया गया है।”

राजभवन को पत्र भेज कर की गई थी शिकायत

MGCUB के ‘छात्र समुदाय’ ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस सम्बन्ध में पत्र भी लिखा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि 6 वर्षों बाद भी केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थिति ठीक नहीं है और न ही यहाँ स्नातक स्तर की पढ़ाई होती है। इस पत्र में आरोप लगाया गया है कि मंत्रालय की आँखों में धूल झोंक कर प्रोफेसर SS पांडेय फिर कुलपति बनने का ख्वाब देख रहे हैं। वो जबलपुर के रानी दुर्गा विवि में गणित के प्रोफेसर रहे हैं।

इस पत्र में लिखा है, “प्रोफेसर शील सिंधु पांडेय ने किताब खरीद में घोटाला किया है। उन्होंने नियुक्तियों में भी भ्रष्टाचार किया है। उच्च-न्यायालय ने उन्हें दोषी पाया था और राज्यपाल ने कार्रवाई की अनुशंसा की थी। हम अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं क्योंकि पहले से ही हमें मूलभूत सुविधाएँ नहीं मिल पाती हैं और हम SS पांडेय की उम्मीदवारी का विरोध करते हैं। इसीलिए, किसी योग्य कुलपति को ही यहाँ भेजा जाए।”

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को छात्रों का पत्र

वहीं सामाजिक कार्यकर्ता आलोक राज ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखे गए पत्र में लिखा है, “प्रोफेसर शील सिंधु पांडेय द्वारा लिए गए अवैधानिक, नियम विरुद्ध और स्वार्थपूर्ण निर्णयों के कारण विक्रम विश्वविद्यालय का माहौल खराब हुआ था और कैम्पस में अराजकता का वातावरण था। वो एक साबित भ्रष्टाचारी हैं। उन्हें हटाने का आदेश देना पड़ा था।उनकी नियुक्ति होती है तो MGCUB ‘भ्रूण-हत्या’ का शिकार हो जाएगा।”

सामाजिक कार्यकर्ता आलोक राज का केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पत्र

याद हो कि इससे पहले भी दो अन्य प्रोफेसरों को लेकर विवाद हुआ था। कहा जा रहा था कि उनमें से एक जहाँ वामपंथी विचारधारा के हैं, वहीं दूसरे ने नक्सलियों के प्रति सहानुभूति जताई है। दोनों ही प्रोफेसरों ने इन आरोपों को नकार दिया था। ऑपइंडिया से बात करते हुए उन दोनों ने आरोप लगाए थे कि एक साजिश के तहत ये दुष्प्रचार चलाया जा रहा है। अब सभी को शिक्षा मंत्रालय के अंतिम निर्णय का इंतजार है।

प्रोफेसर शील सिंधु पांडेय ने अपने ऊपर लगे आरोपों को नकारा

प्रोफेसर शील सिंधु पांडेय ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है। ऑपइंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि कुलपति एक कमिटी बना देता है, जो नियुक्तियाँ करता है। कुलपति उस कमिटी का अध्यक्ष नहीं होता। प्राइवेट कॉलेजों की नियुक्तियाँ स्थायी भी नहीं होती, कुछ महीनों बाद बहुतों को बाहर कर दिया जाता है। वहीं किताब खरीद घोटाला के आरोपों पर उन्होंने कहा कि विभागाध्यक्ष ही किताबों की सूची देता है।

उन्होंने बताया, “सारे HOD ये लिख कर देते हैं कि हमें कौन-कौन सी किताबें चाहिए, जिसके बाद कुलपति निर्णय लेता है। हमने भुगतान खुद से नहीं किया, कार्य परिषद में ले जाकर भुगतान किया है। 30 लोगों ने जब अनुसंशा की है, तो इसमें मेरी गलती कहाँ हुई? टेंडर तो मेरे से पहले वाले कुलपति ने ही कर दिया था। अब जहाँ से टेंडर हुआ, वहीं से खरीद होगी न? हमने 24% डिस्काउंट पर किताबें खरीदी हैं।”

प्रोफेसर एसएस पांडे ने कहा कि उनके खिलाफ लोकायुक्त और जाँच एजेंसियों ने भी कुछ नहीं पाया। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार आने के बाद सारी गड़बड़ियाँ शुरू हुईं और वो कहने लगे कि ये करो, वो करो, तो मैंने त्यागपत्र देना बेहतर समझा। राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों में मुझे नियुक्तियाँ मिल रही हैं, लेकिन वहाँ जाने में मैं इसीलिए इच्छुक नहीं हूँ, क्योंकि मैं काम करना चाहता हूँ।

तस्करी का ड्रग्स मुंद्रा बंदरगाह पर जब्त, इसलिए अडानी जिम्मेदार: कॉन्ग्रेसी-वामपंथी ‘पप्पू’ लॉजिक ने कराया छीछालेदर

गुजरात के कच्छ में मुंद्रा पोर्ट से राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) के अधिकारियों द्वारा 9,000 करोड़ रुपए की ड्रग्स जब्त किए जाने के बाद ट्विटर पर कॉन्ग्रेस समर्थकों और वामपंथी गिरोह की घटिया मानसिकता का एक बार फिर से प्रदर्शन देखने को मिला है।

चूँकि, बंदरगाह का प्रबंधन अडानी ग्रुप द्वारा किया जाता है, इसलिए कॉन्ग्रेस समर्थक और उनसे सहानुभूति रखते हुए उनके पाले में बैटिंग करने वाले वे सभी लोग, जो बहुत लम्बे समय से इस व्यापारिक समूह से खार हुए हैं, वे अपना ‘पप्पू’ लॉजिक लेकर सीधे समूह के अध्यक्ष गौतम अडानी पर बंदरगाह का प्रबंधन करने के कारण प्रतिबंधित पदार्थ की तस्करी का सीधा आरोप लगाने के लिए ट्विटर पर कूद पड़े।

कॉन्ग्रेस समर्थकों के एक ऐसे समूह, जिनके सामूहिक आईक्यू को राहुल गाँधी के प्रति उनकी भक्ति के व्युत्क्रमानुपाती बताया जाता है, ने ट्वीट कर अपनी ‘प्रतिभा’ का परिचय देते हुए दावा किया कि अडानी के बंदरगाह पर हेरोइन जब्त की गई थी, इसलिए यह अडानी ही होगी जो ड्रग्स की तस्करी कर रही है। अब कृपया ये मत पूछो कैसे?

एक दूसरे ट्विटर यूजर ने सवाल किया कि क्या यही वजह है कि अडानी को देश में हवाई अड्डों और बंदरगाहों का नियंत्रण दिया गया है।

एक अन्य सोशल मीडिया यूजर ने अडानी ग्रुप पर अवैध तस्करी और बीजेपी को फंडिंग के जरिए बड़ा मुनाफा कमाने का आरोप लगाया।

वहीं एक और ट्विटर यूजर ने जोर देकर कहा कि अडानी पोर्ट्स ड्रग्स के आयात के लिए जिम्मेदार है क्योंकि जिस बंदरगाह से प्रतिबंधित सामग्री जब्त की गई थी, उसका प्रबंधन अडानी पोर्ट्स द्वारा किया जाता था।

एक ट्विटर यूजर दो हाथ और आगे निकलते हुए बंदरगाह पर ड्रग्स की जब्ती की तुलना बॉलीवुड की मशहूर हस्तियों से कर डाली, जिनके पास से ड्रग्स बरामद किया गया था। यूजर ने मीडिया पर बॉलीवुड ड्रग एडिक्ट्स पर हमला करने का आरोप लगाया, लेकिन अब मीडिया चुप हैं क्योंकि यह खेप गौतम अडानी के ग्रुप द्वारा संचालित पोर्ट में पकड़ी गई है।

यहाँ तक ​​कि राकांपा के पदाधिकारी भी ट्विटर पर अपना लो-आईक्यू दिखाने में पीछे नहीं रहे। राकांपा के राष्ट्रीय महासचिव सलीम सारंग ने एक ट्वीट कर आरोप लगाया कि मीडिया मुंद्रा बंदरगाह पर जब्त ड्रग्स के लिए अडानी को जवाबदेह नहीं ठहरा रहा है।

अगर कॉन्ग्रेस समर्थकों की माने तो उनके परिसरों से किसी भी तरह का प्रतिबंधित पदार्थ जब्त होने पर प्रबंधन अधिकारियों को दोषी ठहराया जाना चाहिए। इस तर्क से, केरल सरकार को उन सभी लोगों के लिए ज़िम्मेदार होना चाहिए जो सोना तस्करी में पकड़े गए हैं या दूसरे अपराधों में। इसी तरह, शायद अरविंद केजरीवाल और उद्धव ठाकरे को दोषी ठहराया जाना चाहिए, अगर अपराधी दिल्ली या मुंबई में अवैध वस्तुओं की तस्करी के लिए पकड़े जाते हैं।

इसके बाद भी कॉन्ग्रेस समर्थक मुंद्रा पोर्ट पर ड्रग्स की जब्ती के लिए गौतम अडानी और उनके व्यापारिक समूह को बदनाम करने के लिए प्रोपेगेंडा जारी रखते हैं। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि जिस जहाज में प्रतिबंधित पदार्थ थे वह ईरान से था और ड्रग्स रखने वाले कंटेनर अफगानिस्तान से थे। भारतीय जल सीमा में प्रवेश करते ही जहाज को पकड़ लिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, डीआरआई अधिकारियों को ड्रग्स के बारे में सतर्क कर दिया गया था और अंत में इतने बड़े हेरोइन शिपमेंट को जब्त करने के लिए कई दिनों तक ऑपरेशन चलाया गया था।

बंदरगाह पर लाखों करोड़ रुपए के कार्गो आते-जाते हैं और यह बंदरगाह अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों के सामूहिक प्रयासों के कारण ही संभव है कि नशीली दवाओं और अवैध वस्तुओं को सफलतापूर्वक पकड़ा गया है।

हिंदुओं का ‘कन्यादान’ और आलिया भट्ट का ‘कन्यामान’: खोखला है मान्यवर का विज्ञापन, हिंदू परंपरा को नीचा दिखाने का खेल

हिंदू परंपराएँ आज के समय में वामपंथियों के निशाने पर सबसे ज्यादा हैं। जैसे हम लोग इंतजार करते हैं कि किसी पर्व से नए काम की शुरुआत करेंगे वैसे ही ये वामपंथी इंतजार करते हैं कि हिंदू त्योहार आते ही ये अपने अभियानों की शुरुआत करेंगे। हमारे और इनके काम में फर्क बस ये होता है कि हमारे लिए शुभारंभ नारियल को तोड़ने के साथ होता है और इनका शुभारंभ ये बताने से होता है कि नारियल तोड़ना कैसे पिछड़ेपन की निशानी है और कैसे ये नासमझी वाला काम है।

ऐसे ही एक उदाहरण अभी हाल में मान्यवर के एड के दौरान भी देखने को मिला। इसमें बॉलीवुड एक्ट्रेस आलिया भट्ट को दिखाते हुए यह बताया गया कि कैसे कन्यादान करना एक पिछड़ेपन को दिखाता है जबकि कन्यामान एक बढ़िया विकल्प है।

कन्यादान होता क्या है?

अब लेखक नित्यानंद मिश्रा ने अपनी यूट्यूब वीडियो में भट्ट के इसी एड में तीन दिक्कतें क्या हैं उन पर बात की है। तमाम भ्रांतियों को तोड़ते हुए नित्यानंद मिश्रा ने धन का अर्थ समझाना शुरू किया जो कि संस्कृति शब्दकोष से आता है। किताब के मुताबिक धन का अर्थ समृद्धि के अलावा वह भी होता है जो कि सबसे प्रिय हो या उसे मूल्यवान माना जाए।

वह कहते हैं, सनातन धर्म में केवल बेटियों को ही नहीं बेटों को भी धन माना गया है। इसे पुत्र धन भी कहा जाता है। उन्होंने संस्कृत श्लोक के जरिए समझाया कि सनातन धर्म में विद्या को भी धन कहा गया। “विद्याधनं सर्व धनं प्रधानम्” अर्थाथ विद्या का धन एक ऐसी मूल्यवान चीज है जो किसी को भी दी जा सकती है। 

एड में जैसे हिंदू परंपरा को पिछड़ा दिखाया गया है और बताने की कोशिश हुई है लड़कियों को हमेशा से शादी के समय दान की तरह दिया जाता रहा। जबकि, मिश्रा के मुताबिक दान की तुलना धन से नहीं होनी चाहिए। सनातन में ‘दान’ की अवधारणा ज्ञान से लेकर जीवन तक व्याप्त है जिसे क्रमशः ‘विद्यादान’ या ‘जीवन दान’ के नाम से जाना जाता है। ‘कन्यादान’ की अवधारणा को उजागर करते हुए, मिश्रा ने ‘पुत्रदान’ की अवधारणा के बारे में भी बताया। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाने के लिए महाभारत के महाकाव्य के एक श्लोक का भी हवाला दिया।

‘कन्यादान से लेकर कन्यामान तक’

मिश्रा सवाल करते हैं कि आखिर कन्यादान को लड़कियों के अपमान की तरह क्यों लिया जाता है। इसके बाद उन्होंने वो मंत्र पढ़ कर सुनाए जिनका शादी के समय उच्चारण होता है।

मंत्र का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा मंत्र के अनुसार, दुल्हन के माता-पिता को राजा वरुण देवता के रूप में संदर्भित किया गया है जिसका अर्थ है महासागरों का स्वामी। इसी प्रकार बेटी को सूर्य देवता के रूप में जाना जाता है और दूल्हे को विष्णु देवता या आकाश में रहने वाले के रूप में जाना जाता है। यह क्षितिज से सूर्योदय के समय सूर्य की गति को दर्शाता है (जैसा कि एक समुद्र के किनारे से देखा जाता है) यह दिखाता है कि जैसे समुद्र से आकाश में सूर्यदेव के जाने से नए दिन की शुरुआत होती है वैसे ही आम जीवन में जब सूर्य रूपी कन्या अपने माता पिता के पास से पति के पास जाती है तो एक नए जीवन की शुरुआत होती है।

वह बताते हैं कि कैसे कन्यादान का मतलब होता ही कन्यामान है और इसे अलग से बताने की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने अपनी वीडियो में यह भी बताया कि कैसे संस्कृत में देव शब्द का प्रयोग पुरूष के लिए देवता का महिलाओं के लिए और दैव्यातम का नपुंसकलिंग हैं।

कन्यादान पर मौजूद अन्य ग्रंथों के अनुसार, अनुष्ठान के समय किए गए मंत्र, जप और अन्य क्रियाएँ दुल्हन को लक्ष्मी के रूप में दर्शाती हैं। दुल्हन के पिता द्वारा अपनी बेटी को नारायण (दूल्हे) को देने का प्रतीकात्मक कार्य माना जाता है कि वह अपनी बेटी को किसी और के घर की ‘शोभा’ बना रहे हैं।

शोध,अध्ययन और ज्ञान लेकर हो विज्ञापन निर्माण

बता दें कि ये वो दौर है जब ब्रांड्स को अपने AC वाले दफ्तर से बाहर निकलना चाहिए और समझना चाहिए कि एक फैंसी लैपटॉप और बीयर की बोतल हाथ में पकड़ना काफी नहीं है अच्छा कैंपेन चलाने के लिए। सनातन धर्म से जुड़े विज्ञापनों को बनाने से पहले उससे जुड़ी हर परंपरा पर रिसर्च करनी चाहिए। विज्ञापनों में ऐसी समस्याएँ तभी पैदा होती है जब धर्म को लेकर किसी में कम समझ हो और वो शब्दों का अर्थ संदर्भ के अलावा अनुवाद के माध्यम से खोजने का प्रयास करे।

उदाहरण साक्षात यही है कि विज्ञापन लिखने वाले ने बिना ‘धन’ का अर्थ जाने उसे संपदा से जोड़ दिया। यही कारण है कि इस विज्ञापन की निंदा हो रही है। अगर कन्यादान रस्म को लेकर थोड़ी भी जानकारी लेने की कोशिश करते तो पता चलता है कि ये अनुष्ठान न ही अपमानजनक है और न ही पिछड़ा। रही बात मार्केटिंग की तो ये जाहिर सी बात है कि उनके खरीददारों को भी नहीं अच्छा लगेगा कि जिस कार्यक्रम के लिए वो उनके परिधान खरीद रहे हैं वो दरअसल पिछड़ा है।

आँखों में आँसू ले 2 महीने बाद घर आए राज कुंद्रा: 119 पोर्न वीडियो मिले थे, ₹9 करोड़ में बेचने का था प्लान

पोर्नोग्राफी केस में गिरफ्तार राज कुंद्रा दो महीने जेल में बिताने के बाद मंगलवार (21 सितंबर 2021) को घर लौटे। उन्हें सोमवार को बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमानत दी थी। घर पहुँचने पर कुंद्रा इमोशनल दिखे। उनकी आँखों में आँसू था। जेल से उनके छूटने के पहले सोशल मीडिया में उनकी पत्नी शिल्पा शेट्टी और बेटे वियान द्वारा शेयर किया गया पोस्ट चर्चा में रहा।

इस बीच कुछ मीडिया रिपोर्टों में मुंबई पुलिस के हवाले से बताया गया है कि कुंद्रा के पास 119 पोर्न फिल्मों का कलेक्शन था। इसका सौदा वे 9 करोड़ रुपया में करना चाहते थे। उनकी योजना दो साल में अपने ऐप के यूजर्स 3 गुना और मुनाफा 8 गुना करने की थी। जाँच के दौरान पुलिस को ये वीडियो कुंद्रा के मोबाइल, लैपटॉप और हार्ड डिस्क से मिले थे। उनके खिलाफ मुंबई पुलिस 1500 पन्नों की चार्जशीट दायर कर चुकी है। इसमें शिल्पा सहित 43 गवाहों के बयान दर्ज हैं।

हाईकोर्ट ने कुंद्रा को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके पर जमानत दी थी। उन पर पोर्न फिल्में बनाने और वेब एप्लीकेशन पर पब्लिश करने का आरोप है। इस मामले में शर्लिन चोपड़ा और पूनम पांडे सहित कई एक्ट्रेस ने भी उन पर आरोप लगाए थे। वहीं पूछताछ के दौरान शिल्पा ने कुंद्रा के इस धंधे के बारे में किसी तरह की जानकारी होने से इनकार किया था।

राज कुंद्रा के जेल से छूटने की खबर मिलते ही वियान ने इंस्टाग्राम पर गणेश स्थापना की तस्वीर शेयर की। इसमें वे मम्मी शिल्पा और अपनी बहन के साथ नजर आ रहे हैं। इस तस्वीर को पोस्ट करते हुए वियान ने लिखा, “जिंदगी भगवान गणेश की सूंड जितनी लंबी है। मुश्किलें उनके चूहे जितनी छोटी हैं। लम्हें मोदक जितने मीठे हैं। गणपती बप्पा मोरया।”

वहीं, शिल्पा ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर इंद्रधनुष की एक तस्वीर शेयर की है, जिस पर लिखा है, ”इंद्रधनुष का होना यह साबित करता है कि एक बुरे तूफान के बाद खूबसूरत चीजें हो सकती हैं।”

शिल्पा शेट्टी की इंस्टाग्राम स्टोरी

गौरतलब है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को सुनवाई के दौरान शिल्पा शेट्टी और उनके बच्चों के बारे में मीडिया में आई खबरों को लेकर चिंता जताई थी। जस्टिस पटेल ने कहा था कि उन्हें शिल्पा शेट्टी की चिंता नहीं है। वह खुद को सँभाल लेंगी, लेकिन अदालत को उनके नाबालिग बच्चों की चिंता है।

अभी पप्पू पास नहीं हुआ! पंजाब की पिच पर राहुल गाँधी का इम्तिहान शेष: कैप्टन ही नहीं, दोराहे पर कॉन्ग्रेस भी

कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री पद के लिए सार्वजनिक तौर पर कई नामों की चर्चा हुई। प्रदेश के सबसे बड़े नेता के इस्तीफे के बाद अटकलें लगनी ही थी। नवजोत सिंह सिद्धू से लेकर अंबिका सोनी और सुनील जाखड़ से लेकर सुखजिंदर रंधावा तक का नाम उछला या उछाला गया पर अंत में चरनजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। कुछ ख़बरों की मानें तो चन्नी खुद गुलदस्ता लिए रंधावा को बधाई देने निकल पड़े थे। यह पंजाब कॉन्ग्रेस का अपना एचडी देवेगौड़ा मोमेंट था। ऐसा मोमेंट उस रणनीति का परिणाम होता है जिसके तहत पद के लिए ऐसे नेता का नाम आगे कर दिया जाता है कि सब हतप्रभ रह जाते हैं और कुछ समय के लिए किसी भी संभावित विवाद से छुटकारा मिल जाता है। 

ऐसी राजनीतिक चाल के पीछे एक सोच यह भी होती है कि कमज़ोर नेता को पद दे दिया जाए तो उससे कुछ भी करवाया जा सकता है। कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे मजबूत नेता को हटाने के बाद उत्पन्न हुई परिस्थिति को किसी कमजोर नेता को मुख्यमंत्री नियुक्त करके ही सँभाला जा सकता था और पार्टी ने वही किया। 

पर क्या कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए हर विवाद से छुटकारा मिलना तय है? चन्नी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद पार्टी के पंजाब प्रभारी हरीश रावत को आनन-फानन में यह घोषणा क्यों करनी पड़ी कि पार्टी अगला विधानसभा चुनाव नवजोत सिंह सिद्धू को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाकर लड़ेगी? प्रश्न यह उठता है कि यदि सिद्धू को मुख्यमंत्री पद के लिए आगे रखकर ही अगला चुनाव लड़ना है तो उन्हें अभी मुख्यमंत्री पद क्यों नहीं दिया गया? शायद ऐसे किसी प्रश्न के कारण ही रावत की घोषणा के बाद पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला से भी बयान दिलवाना पड़ा कि पार्टी अगला विधानसभा चुनाव सिद्धू और चन्नी, दोनों को आगे रखकर लड़ेगी। सिद्धू के लिए फिलहाल मामला उतना सीधा नहीं रहा जितना वे समझ रहे थे। 

कैप्टन अमरिंदर सिंह अभी भी कॉन्ग्रेस पार्टी में हैं। साथ ही वे पहले ही कह चुके हैं कि यदि पार्टी सिद्धू को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाती है तो वे इसका विरोध करेंगे, क्योंकि उनके अनुसार सिद्धू वर्तमान पाकिस्तानी जनरल बाजवा के करीब हैं और यह बात राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। हालाँकि सिद्धू को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर उन्होंने खतरे की केटेगरी तय करने की जिम्मेदारी सुरक्षा एजेंसियों पर डाल दी। पर यदि पंजाब जैसे महत्वपूर्ण सीमावर्ती प्रदेश का सबसे कद्दावर नेता और कल तक मुख्यमंत्री रहा व्यक्ति ऐसी बात कहता है तो उसे गंभीरता से न लिए जाने का कोई कारण दिखाई नहीं देता। ऊपर से कैप्टन खुद भी सैनिक रह चुके हैं और हल्की बातें करने के लिए नहीं जाने जाते। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह कॉन्ग्रेस पार्टी और सिद्धू के खिलाफ केवल खुद खड़े नहीं हुए हैं, बल्कि पार्टी और सिद्धू के विरोधियों के हाथ भी एक राजनीतिक अस्त्र पकड़ा दिया है। 

नए मुख्यमंत्री ने शपथ लेने के बाद किसानों के बिजली और पानी के बिल माफ करने के वादे के साथ-साथ केंद्र सरकार से कृषि कानूनों को रद्द करने की अपील के साथ अपना कार्यकाल शुरू कर दिया। ऑफिस में उनका पहला दिन और ये बयान बताते हैं कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कृषि कानूनों को लेकर खुद जो शोर मचाना बंद कर दिया था, नए मुख्यमंत्री वही शोर फिर से शुरू करके अपनी नियुक्ति को सही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका पहला दिन कुछ हद तक यह भी इंगित कर रहा है कि पार्टी किस मुद्दे को आगे रखकर चुनाव लड़ना चाहती है। अभी तक के रुझान से स्पष्ट है कि आगामी पंजाब चुनाव मुद्दाविहीन शोर के बारे में अधिक होगा। 

इन सबके बीच जो सबसे बड़ा प्रश्न होगा वह ये होगा कि कैप्टन अमरिंदर सिंह का अगला राजनीतिक कदम क्या होगा? राजनीतिक रूप से वे चाहे जैसा कदम उठाएँ, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि वे निकट भविष्य में पंजाब की राजनीति में प्रासंगिक रहेंगे। उनके और कॉन्ग्रेस हाईकमान के बीच की रस्साकशी नई नहीं है। दरअसल 2019 के समय भी कई लोगों का यह मानना था कि कैप्टन उस समय ही कॉन्ग्रेस से अलग हो सकते थे। यह स्थिति दोबारा खड़ी हो गई है और इस बार तो ऐसे स्तर पर पहुँच चुकी है जहाँ कैप्टन खुद यह कह रहे हैं कि उन्हें लगातार अपमानित किया जा रहा है और उनके इस्तीफे के पीछे यही एक कारण है। पर यह तय है कि इस्तीफे के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी और नवजोत सिद्धू की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। भले ही राहुल गाँधी का नाम कहीं दिखाई या सुनाई नहीं दे रहा है पर आम धारणा यही है कि कैप्टन को हटाने का फैसला उनका है। ऐसे में यह बदलाव भविष्य में उनकी नेतृत्व क्षमता की परीक्षा लेगा। 

अब चूँकि सब कुछ खुल कर सामने आ गया है इसलिए कैप्टन के लिए विकल्प बहुत कम रह गए हैं। एक अटकल के जवाब में उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे अकाली दल के साथ किसी तरह की राजनीति के पक्ष में नहीं हैं, पर यही बात उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के लिए नहीं कही है। ऐसे में राजनीतिक अटकलों और प्रतिक्रियाओं पर ध्यान कुछ दिनों तक तेज़ रहेगा। कैप्टन ने अभी तक केवल यह कहा है कि वे मित्रों के साथ विचार करने के बाद ही कोई निर्णय लेंगे। एक वरिष्ठ नेता यदि ऐसा कहे तो अधिकतर निष्कर्ष यही रहता है कि किसी नए राजनीतिक समीकरण के अस्तित्व में आने की प्रबल संभावना है। फिलहाल इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बदलाव पंजाब कॉन्ग्रेस में ही नहीं, पंजाब की राजनीति में भी होने वाला है।