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कश्मीरी पंडितों की केवल घर वापसी ही नहीं, पुश्तैनी संपत्ति पर कर सकेंगे दावा: सम्मान में सड़कों और कॉलेजों के नाम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने पिछले कुछ सालों में जम्मू-कश्मीर में जमीनी बदलावों की शुरुआत की है। इससे केंद्र शासित प्रदेश के विकास के नए रास्ते खुले हैं। इसने दशकों पहले इस्लामिक आतंकवाद के कारण अपना घर छोड़ने को मजबूर हुए कश्मीरी पंडितों की वापसी की राह भी खोली है। इसी कड़ी में सरकार ने दो महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं। पहला, श्रीनगर की प्रसिद्ध सड़कों, इमारतों और कॉलेजों का नाम इन हिंदुओं के सम्मान में रखने का फैसला। दूसरा, एक ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च किया गया है, जिसके जरिए कश्मीरी पंडित अपनी पुश्तैनी संपत्तियों पर दावा कर सकते हैं।

टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने प्रमुख कश्मीरी हिंदू और भारतीय समकालीन नाटककार मोनी लाल खेमू के नाम पर एक कॉलेज का नाम रखने का फैसला किया है। इसके अलावाएक सड़क का नाम कश्मीरी कवि और लेखक पंडित जिंदा कौल के नाम पर रखा जाएगा, जिन्हें ‘मास्टरजी’ के नाम से जाना जाता है।

हालाँकि, जैसा कि पहले से अपेक्षित था सरकार के इस कदम की कई राजनीतिक दलों ने आलोचना की है। ये दल इसे ‘टोकनवाद‘ के तौर पर देख रहे हैं। इन दलों का आरोप है कि सरकार घाटी को रहने योग्य बनाने के लिए गंभीर नहीं है।

ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने एक ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च किया है। इसके जरिए घर छोड़कर भागने को मजबूर किए गए कश्मीरी पंडित अपनी उन संपत्तियों पर दावा कर सकते हैं, जिस पर कब्जा कर लिया गया अथवा उन्हें बेचने को मजबूर किया गया था। कश्मीरी हिंदुओं ने सरकार के इस पहल की सराहना की है। फिल्म निर्माता और कश्मीरी हिंदू अशोक पंडित ने कहा कि जमीन को दोबारा हासिल करना और कश्मीरी हिंदुओं का पुनर्वास एक थका देने वाला काम है। उन्होंने सरकार से पूरी प्रक्रिया में समुदाय को शामिल करने का भी आग्रह किया।

एक अन्य कश्मीरी हिंदू कार्यकर्ता सुशील पंडित ने खुलासा किया कि संपत्ति हासिल करने के लिए एक कानून हिन्दुओं के पलायन के एक दशक बाद भी लाया गया था। हालाँकि, उससे केवल उत्पीड़न ही हुआ था। उन्होंने कहा, “अगर एक कश्मीरी पंडित अपनी संपत्तियों को बेचना चाहता था तो उससे पहले उसे यह साबित करना होता था कि वो किसी संकट में नहीं है। ऐसे में यह उत्पीड़न की एक और वजह बन गई, क्योंकि पैसे की जरूरत के लिए जो व्यक्ति अपनी जमीन बेच रहा होता था, उसे इसके बाद सरकारी अधिकारियों को भी रिश्वत देनी होती थी। इस तरह के आधे-अधूरे कानून समस्या से कहीं अधिक बदतर थे।”

पोर्टल लॉन्च करके कश्मीरी पंडितों के लिए अचल संपत्ति अधिनियम को पूरी तरह से लागू करते हुए सरकार ने जिला आयुक्तों को शक्तियों का हस्तांतरण भी सुनिश्चित किया है। इसके अतिरिक्त जिला आयुक्त यह भी सुनिश्चित करेंगे कि कश्मीरी पंडितों की संपत्तियों पर कोई कब्जा न हो, भले ही उसकी कोई शिकायत दर्ज न की गई हो।

तालिबान की सरकार में न भीम, न ब्राह्मण: बबुआ के साइकिल पर बैठ काबुल निकली बुआ, हाथ में त्रिशूल-साथ में रावण!

नमस्कार,
मैं चुच्चा कुमार

जो काम इस महान लोकतांत्रिक देश की वह सरकार नहीं कर पाई जो खुद के मजबूत होने का ढोल पीटती है, वह तालिबान ने कर दिखाया है। उसने साबित किया है कि 56 इंच के सीने से कुछ नहीं होता, एके-56 हाथ में हो तो बहुत कुछ हो जाता है। जो काम इस महान देश की न्यायपालिका नहीं कर सकी, वह अफगानिस्तान में सरकार के ऐलान ने कर दिया है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का ज्ञान लेकर भक्त जो कमाल न कर पाए, वह शरिया से चलने वालों ने कर दिखाया है। वाजपेयी यूँ ही नहीं कहते थे कि आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं!

असल में वाजपेयी जानते थे शरिया की ताकत! तालिबान की ताकत! तभी तो विदेश मंत्री रहते जब अफगानिस्तान गए तो गजनी देखने का ख्वाब जताया था। अरे गजनी… वहीं से तो आया था शांतिदूत महमूद गजनवी, जिसने कई बार सोमनाथ मंदिर का सौंदर्यीकरण किया। पर इन्होंने वाजपेयी की सुनी कब।

खैर ताजा खबर यह है कि दिल्ली के बॉर्डर पर महीनों से जमे टेंट उखाड़े जा रहे हैं। करनाल में लंगर डाले किसान भी हट रहे हैं। सब कूच कर रहे हैं इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की ओर। वहाँ खड़ी है काबुल जाने के लिए विमान। इसे विमान में केवल किसान ही सवार नहीं होने जा रहे हैं। बुआ-बबुआ से लेकर भारत का पूरा विपक्ष इसके सवार हैं। यह तालिबान की ही ताकत है कि उसने उत्तर प्रदेश के चुनावों से पहले पूरे विपक्ष को एक कर दिया है। अब योगी जी की खैर नहीं। हें हें हें…

यह चमत्कार तालिबान के एक फैसले से हुआ है। मैं तो खैर इसे फैसला नहीं मानता है। मेरी नजर में यह मास्टरस्ट्रोक है। वक्त की जरूरत थी कि तालिबान कुछ ऐसा कर जिससे भारत का विपक्ष एक हो और इस सांप्रदायिक सरकार को उखाड़ फेंके। वह कैसा लोकतंत्र जो शरिया से न चले? तो तालिबान ने जो 33 मंत्रियों वाली अपनी नई सरकार बनाई है उसमें से 30 मंत्री पश्तून रखे हैं। गाँधी परिवार के समर्थन में 4 मेंबर हक्कानी फैमिली से भी लिए गए हैं। ताजिक और उज्बेक मूल के लोगों को जगह देकर अल्पसंख्यकों को उनका अधिकार भी दिया है। हजारा को बाहर रखा है ताकि उन शियाओं को संदेश मिले जो पड़ोसी मुल्क में सांप्रदायिक सरकार के साथ कई मौके पर खड़े दिखते हैं। पर मास्टरस्ट्रोक वह फैसला है जिसके तहत इस सरकार में न तो दलितों को रखा गया है, न पिछड़ों को। ब्राह्मणों को भी बाहर रखा गया है।

तालिबान ने ऐसा भारत के विपक्षी नेताओं को संदेश देने के लिए किया और चंद घंटे में इसका प्रभाव दिखने लगा है। हमारे संवाददाता अरिमल कुमार को टिकैत ने बताया हमने अल्लाह हू अकबर का नारा लगाया, लेकिन सरकार में केवल मीम को रखा गया। भीम को उनका हक दिलाने के लिए हमने तय किया है कि काबुल जाएँगे। बहन मायावती ने भी ब्राह्मण सम्मेलन रोक दिए हैं। बबुआ अखिलेश यादव ने परशुराम प्रतिमा का निर्माण रुकवा दिया है। ब्राह्मणों के लिए बुआ त्रिशूल लेकर रवाना हुई हैं। बबुआ ने हवाई अड्डे तक पहुँचने के लिए उन्हें अपनी साइकिल पर लिफ्ट दिया है। जय भीम-जय मीम वाले रावण भी साथ हैं। हमारे कैमरामैन खाबा ये एक्सक्लूसिव वीडियो लेकर आए हैं। आप इन्हें देखिए और सहेज कर रखिए। यह भारतीय राजनीति को बदलने वाले क्षण हैं।

पहली नजर में आपको भले ऐसे लगता हो कि ये सब तालिबान से नाराज हैं। पर दूर की सोचिए। शरिया वाली सरकार तो शांति प्रिय है। वार्ता में भरोसा रखती है। वे तो सबका साथ-सबका विकास सुनिश्चित कर देगी। लेकिन जब पलटन काबुल से लौटेगी तो सोचिए यहाँ क्या-क्या उखड़ेगा…

मजा आया न सोचकर… तो सलाम करिए तालिबान प्रवक्ता के उस मुँह को जिसने नई सरकार के गठन का ऐलान किया और लानत भेजिए उन महिलाओं को जो पर्दे का अपना अधिकार नहीं पाना चाहतीं। सजा ही इनकी नियति है। आखिर वह तालिबान की सरकार है और वहाँ साहस की भी मंदी नहीं है।

फुटबॉल मैच-खचाखच भरे स्टेडियम, लग रहे ‘F*ck जो बायडेन’ के नारे: अमेरिकी राष्ट्रपति के गले की हड्डी बना तालिबान

अफगानिस्तान की सत्ता पर जिस तरह से तालिबान काबिज हुआ और जिन हालातों में अमेरिकी सेना ने वहाँ से पलायन किया उसकी वजह से जो बायडेन निशाने पर हैं। घर में ही अमेरिकी राष्ट्रपति का लगातार विरोध हो रहा है और उनकी लोकप्रियता दिनोंदिन गिरती जा रही है। सार्वजनिक तौर पर विरोधों के बाद अब ‘f*ck जो बायडेन’ के नारे भी सुनाई पड़ रहे हैं।

कई कॉलेज फुटबॉल मैच के दौरान स्टेडियम में इस तरह के नारे सुने गए हैं। इसके अलावा इसे कई अन्य जगहों पर भी इसी तरह के नारों को सुना गया।

सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की बाढ़ आ गई है जिसमें लोग खुद या दूसरे इस तरह के नारे लगाते दिख रहे हैं। अपलोड किए गए वीडियो में से बहुत सारे कॉलेज फ़ुटबॉल मैचों के दौरान कैप्चर किए गए थे।

वीडियो में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि बहुत ही कम समय में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन की देश में लोकप्रियता में किस हद तक गिरावट आई है।

अफगानिस्तान से वापसी के बीच बायडेन की अप्रूवल रेटिंग में भारी गिरावट आई है। तालिबान के सत्ता में वापस आने से सैकड़ों अमेरिकी अफगानिस्तान में फँसे रह गए हैं। इसके अलावा अमेरिकी करदाताओं के पैसे से बने अरबों के हथियार और उपकरण भी अफगानिस्तान में छोड़ने पड़े हैं जो अब तालिबान के कब्जे में हैं।

इसी को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेनन की कड़ी आलोचना की जा रही है। इतना ही नहीं उनके राजनीतिक विरोधियों ने तो उनका इस्तीफा माँगना भी शुरू कर दिया है। यूएसए टुडे के मुताबिक, अगस्त के आखिरी हफ्ते में बायडेन की अप्रूवल रेटिंग गिरकर 41 फीसदी पर आ गई थी, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। जबकि, पिछले सप्ताह तक अधिकतर सर्वे में राष्ट्रपति जो बायडेन की अप्रूवल रेटिंग को 50 फीसदी से ऊपर दिखाया गया था।

हालाँकि, सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि 87 प्रतिशत डेमोक्रेट का अभी भी उन पर भरोसा कायम है। लेकिन तटस्थ लोगों में से केवल 32 प्रतिशत का मानना है कि बायडेन का काम संतोषजनक है।

आयशा मुखर्जी ने लिखा- समझती थी तलाक गंदा शब्द है… शिखर धवन का पोस्ट- …तभी बरकत आती है: 9 साल बाद राहें अलग

भारतीय क्रिकेटर शिखर धवन का वैवाहिक जीवन करीब 9 साल बाद बिखर गया है। आयशा मुखर्जी ने इंस्टाग्राम पर एक लंबा पोस्ट लिख दूसरी बार अपनी शादी टूटने का जिक्र किया है। इसके बाद इंस्टाग्राम पर शिखर धवन का भी एक पोस्ट आया। इसमें वह आईपीएल की जर्सी पहने नजर आए पर तलाक को लेकर कुछ नहीं कहा। इस पोस्ट में उन्होंने लिखा है, “किसी भी मुकाम को पाने के लिए पूरा जान, समझ, दिल लगता है। प्यार अपने काम के प्रति होनी चाहिए तभी बरकत आती है और खुशी भी मिलती है। अपने सपनों को हकीकत बनाने के लिए कड़ी मेहनत करते ​रहिए।”

आयशा और शिखर ने 2012 में शादी की थी। उनका एक बेटा जोरावर है जो सात साल का है। आयशा की पहली शादी से भी दो बच्चे हैं। सोशल मीडिया में तलाक की पुष्टि होने से पहले ही दोनों एक दूसरे को अनफॉलो कर चुके थे।

आयशा ने एक लंबे और भावुक पोस्ट में लिखा, मैं समझती थी कि तलाक एक गंदा शब्द है, जब तक कि मैं 2 बार तलाकशुदा नहीं हो गई।’ साथ ही उन्होंने अपने पहले तलाक के वक्त के अनुभवों को भी साझा किया है।

आयशा ने लिखा, “पहली बार जब मैं तलाक से गुज़री तो मैं बहुत डर गई थी और मुझे लगा जैसे मैं असफल हो गई थी और उस दौरान कुछ गलत कर रही थी। मुझे लगा जैसे मैंने सभी को नीचा दिखाया है और यहाँ तक ​​कि खुद को स्वार्थी भी महसूस किया है। मुझे लगा कि मैं अपने माता-पिता को निराश कर रही हूँ। मुझे यह भी लगा कि मैं अपने बच्चों को निराश कर रही हूँ। उस दौरान मुझे ऐसा लगता था कि मैंने भगवान का अपमान कर दिया है।”

आगे उन्होंने लिखा, “आप कल्पना कीजिए कि मुझे तो दूसरी बार तलाक लेना पड़ा है। यह भयानक है। एक बार तलाकशुदा होने के कारण ऐसा लगा कि दूसरी बार मेरा बहुत कुछ दाँव पर लग गया है। बहुत कुछ साबित करना था, इसलिए शादी टूटी तो यह मेरे लिए काफी डरावना था। जब मैंने पहली बार इसे महसूस किया तो काफी भावुक हो गई। भय, असफलता और निराशा गुणात्मक रूप से बढ़ गए। मेरे लिए इसका क्या अर्थ है? यह मुझे और मेरे विवाह के संबंध को कैसे परिभाषित करता है?”

रिपोर्ट के मुताबिक, मेलबर्न में रहने वाली आयशा ब्रिटिश-बंगाली हैं और वो हरभजन सिंह की फेसबुक फ्रेंड थीं, जहाँ पर शिखर धवन ने उन्हें देखते ही अपना दिल दे दिया। उन्होंने आयशा को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी। दोनों में दोस्ती औऱ प्यार हुआ। इसके बाद उन्होंने 2009 में सगाई कर ली थी और 2012 में शादी। खास बात यह है कि आयशा धवन से 10 साल बड़ी हैं।

भूपेश बघेल के पिता की इंस्पेक्टर के टेबल पर खाने की फोटो Viral: भड़के लोग, कहा- ‘अंग्रेजों ने भी नेहरू जी को ऐसी ही जेल में डाला था’

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंद कुमार बघेल की सोशल मीडिया पर एक तस्वीर तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें वह पुलिस थाने में आराम से खाना खाते हुए दिखाई रहे हैं। तस्वीर में देख सकते हैं कि उनकी थाली इंस्पेक्टर की टेबल पर लगाई गई है।

नेटिजन्स ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वाले के साथ पुलिस थाने में ऐसा व्यवहार करने से बेहद आक्रोशित हैं। वायरल तस्वीर पर सोशल मीडिया यूजर्स तरह-तरह के कमेंट्स कर रहे हैं। कंचन श्रीवास्तव नाम की यूजर्स ने इस फोटो को शेयर करते हुए लिखा, ”भूपेश बघेल के पिता ने कथित तौर पर ब्राह्मणों के बारे में अनाप-शनाप बयान दिया था। आज उनके पिता को गिरफ्तार कर लिया गया। थाने में अभूतपूर्व स्वागत।”

एक यूजर ने वायरल फोटो पर कमेंट किया, “इस तरह गिरफ़्तार मुझे भी करवा दो, आलिशान महल में 15 साल के लिए बंद कर दो मैं मना नहीं करूँगी।”

दिलीप निराला नाम के यूजर ने लिखा, ”ब्राह्मणों को गाली देने के आरोप में छत्तीसगढ़ के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नन्द कुमार बघेल पुलिस की गिरफ्त में। अंग्रेजों ने भी लेहरू जी को ऐसी ही जेल में डाला था।”

एक अन्य यूजर ने लिखा,” अगर ऐसे अरेस्ट होते हैं, तो इससे ना होना ज्यादा बेहतर है।”

गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंद कुमार बघेल को ब्राह्मणों पर विवादित टिप्पणी के बाद गिरफ्तार किया गया है। गिरफ्तारी के बाद उन्हें रायपुर की अदालत में पेश किया गया, जहाँ उन्हें 15 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। अब उन्हें 21 सितंबर को फिर से अदालत में पेश किया जाएगा।

लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान नंद कुमार बघेल ने ब्राह्मण समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा था, “वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा। हम ब्राह्मणों को गंगा से वोल्गा (रूस की एक नदी) भेजेंगे, क्योंकि वे परदेशी हैं। जिस तरह से अंग्रेज लोग आए और चले गए। उसी तरह से ये ब्राह्मण लोग या तो सुधर जाएँ या गंगा से वोल्गा जाने के लिए तैयार हों।” इस पर विवाद गहराने के बाद मुख्यमंत्री बघेल ने पल्ला झाड़ते हुए कहा था कि वे पिता के रूप में उनका पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन माहौल बिगाड़ने वाले लोगों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार की घोषणा: ग्लोबल आतंकी सिराजुद्दीन हक्कानी को मिला गृह मंत्री का पद, मुल्ला हसन अखुंद होंगे PM

अफगानिस्तान में तालिबान ने अपनी अंतरिम सरकार का गठन कर लिया है। सामने आई जानकारी के मुताबिक काउंसिल के हेड व प्रधानमंत्री मुल्ला हसन अखुंद होंगे। वह अब तक तालिबान की शीर्ष निर्णयकारी संस्था ‘रहबरी शूरा’ के प्रमुख रहे हैं।

अब्दुल गनी बरादर को देश का डिप्टी पीएम बनाया गया है। बरादर के साथ ही मुल्ला अबदस सलाम को भी हसन अखुंद के डिप्टी के तौर पर नियुक्त करने का फैसला लिया गया है। मुल्ला याकूब रक्षा मंत्री बने हैं। इसी तरह मिलिट्री चीफ का नाम अल्हाज मुल्ला फजल है।

खैरउल्लाह खैरख्वा को सूचना मंत्री का पद दिया गया है। अब्दुल हकीम को न्याय मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है। शेर अब्बास स्टानिकजई को डिप्टी विदेश मंत्री बनाया गया है। वहीं जबीउल्लाह मुजाहिद को सूचना मंत्रालय में डिप्टी मंत्री की कमान दी गई।

इसके अलावा काबुल के एक होटल में 2008 में हुए आतंकी हमले में वॉन्टेड रहे सिराजुद्दीन हक्कानी को गृह मंत्री का पद दिया गया है। सिराजुद्दीन हक्कानी एक ग्लोबल आतंकी है। वह भारतीय दूतावास पर हुए हमले में भी शामिल रहा है।

खबरों के अनुसार अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने सिराजुद्दीन हक्कानी की जानकारी देने पर 50 लाख अमेरिकी डॉलर का ऐलान किया था। उसके संबंध अल कायदा से भी रहे हैं। उसने पाकिस्तान में रहते हुए अफगानिस्तान में कई हमले करवाए थे। उसने अमेरिकी व नाटो सेनाओं को भी निशाना बनाया था। साल 2008 में हामिद करजई की हत्या की साजिश रचने के मामले में भी सिराजुद्दीन हक्कानी शामिल था।

तालिबानी प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद के अनुसार ये अंतरिम सरकार है। इसका गठन केवल 6 माह के लिए हुआ है। बता दें कि इस बार जिन मुल्ला हसन को पीएम का पद मिला है, वह तालिबान की 1996 की पिछली सरकार में विदेश मंत्री और डिप्टी प्राइम मिनिस्टर के पद पर थे।

झारखंड विधानसभा में नमाज के लिए कमरे का आवंटन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के नए अध्याय की शुरुआत, भविष्य और भी खतरनाक

कहा जाता है कि; पॉलिटिक्स इस द आर्ट ऑफ़ द पॉसीबल, अर्थात राजनीति संभावनाओं की कला है, अर्थात इसमें कभी भी कुछ भी हो सकता है। जब सबको लग रहा था कि हमारे राजनीतिक दल सेकुलरिज्म के नाम पर दशकों से चले आ रहे मुस्लिम तुष्टिकरण की परिपाटी से धीरे-धीरे निज को अलग करना सीख रहे हैं तभी झारखंड में सत्ताधारी दलों ने अपने कर्म और राजनीतिक चाल से साबित कर दिया कि; सबकुछ वैसा ही नहीं है जैसा सोचा जा रहा है।

प्रदेश विधानसभा से जारी आदेश में विधानसभा भवन के एक कमरे को नमाज पढ़ने के लिए आवंटित कर दिया गया। ऐसा पहली बार हुआ है जब एक विधानसभा भवन में नमाज पढ़ने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई है। सत्ताधारी दलों के इस कदम को लेकर भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने अपना विरोध दर्ज कराया है और आठ सितंबर को विधानसभा भवन के घेराव की घोषणा की है।

हमारे अधिकतर राजनीतिक दलों के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण ऐसी अफीम है जिसे पूरी तरह से भुला देना इन दलों और उनके नेताओं के लिए लगभग असंभव है। हाल यह है कि इससे छुटकारा पाने के लिए रिहैब सेंटर में भर्ती दल भी इस अफीम को एक बार फिर से चाटने का उपक्रम कर ही लेता है। ऐसा करके झारखंड में सत्ताधारी कॉन्ग्रेस पार्टी वही अफीम चाटने की कोशिश कर रही है जिसे पिछले तीन-चार वर्षों से वो भुला चुकी थी। 

दरअसल सेक्युलर दलों का यह राजनीतिक दर्शन इतनी गहरी जड़ें जमा चुका है कि चाहकर भी ये दल और उसके नेता इसका मोह नहीं छोड़ पाते। पिछले महीने ही झारखण्ड सरकार ने प्रदेश की रोजगार नीति में बदलाव करते हुए परीक्षा के माध्यम के तौर पर हिंदी संस्कृत को हटाने और उर्दू को रखने की घोषणा की थी। तब भी प्रतिक्रिया स्वरूप राज्य के विपक्षी दल भाजपा ने अपना विरोध जताया था।

प्रदेश विधानसभा से निकले आदेश के बाद अब उत्तर प्रदेश विधानसभा में कानपुर से समाजवादी विधायक इरफ़ान सोलंकी ने भी यह माँग उठा दी है कि झारखण्ड की तरह ही उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी नमाज के लिए कमरा आवंटित हो। सोलंकी का कहना है कि; ऐसे कदम से साबित होगा कि हम प्रगति कर रहे हैं और साथ ही देश भी प्रगति कर रहा है।

क्या ऐसी माँग उत्तर प्रदेश तक ही रुक पाएगी? यह ऐसा सवाल है जिसका उत्तर आने वाले समय में बार-बार मिलने की संभावना है। सवाल यह है कि अचानक कौन सी आवश्यकता आ गई कि विधानसभा भवन में नमाज पढ़ने के लिए ऐसी व्यवस्था की जाय? क्या देश में पहले मुसलमान विधायक नहीं होते थे? या संविधान की किसी धारा के तहत प्रदेश विधानसभा में नमाज पढ़ना अचानक अनिवार्य कर दिया गया है?

धर्मनिरपेक्षता को आगे रखकर बार-बार “धर्म एक व्यक्तिगत विषय है” कहने वालों के लिए ऐसे आदेश में कोई बुराई नजर नहीं आएगी क्योंकि ऐसे आदेश उनकी नीति को आगे बढ़ाते हैं। ऐसे लोगों के लिए धर्म एक व्यक्तिगत विषय है, केवल कहने के लिए होता है और ये धर्म को व्यक्तिगत बनाए रखने की अपेक्षा हर समुदाय से करते भी नहीं। ये लोग यह सूक्ति केवल हिन्दुओं के लिए रिज़र्व रखते हैं।

पिछले कई वर्षों से नमाज पढ़ने का कार्यक्रम हाईवे से लेकर सड़कों और पार्कों में होता रहा है और विधानसभा में इसके लिए कमरा आवंटित करने का परिणाम यह होगा कि सार्वजनिक स्थलों पर पढ़ी जा रही नमाज का सामान्यीकरण हो जाएगा और भविष्य में सार्वजनिक स्थलों पर नमाज पढ़ने को लेकर जब बहस होगी या उसका विरोध किया जाएगा तब उसका बचाव यह कह कर किया जाएगा कि; जब देश की विधानसभाओं में इसके लिए पूरी व्यवस्था की गई है तो फिर हाईवे, पार्क या सड़कों पर पढ़े जाने पर विरोध सही नहीं है।

झारखंड में सत्ताधारी दलों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि उनके ऐसा करने से बाकी प्रदेशों की विधानसभा में नमाज़ के लिए कमरा आवंटित करने के लिए उठने वाली संभावित माँगों का क्या असर होगा? वर्तमान में कॉन्ग्रेस पार्टी ऐसा करने का जोखिम उठा सकती है क्योंकि उसके पास खोने या पाने के लिए बहुत कुछ है ही नहीं। झारखंड मुक्ति मोर्चा इसे लेकर कुछ कर नहीं सकती क्योंकि उसे कॉन्ग्रेस पार्टी का समर्थन चाहिए। 

अभी झारखंड में विरोध हो ही रहा था कि उत्तर प्रदेश में एक विधायक ने माँग उठा दी है। उन्हें देखकर और प्रदेशों के मुसलमान विधायक भी माँग उठाएंगे। ऐसी माँगों का कोई अंत नहीं होता और 1947 में उठी पाकिस्तान की माँग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अभी बहुत पुरानी बात नहीं है जब एक मौलाना ने बद्रीनाथ मंदिर में भी नमाज पढ़े जाने की माँग रखी थी। प्रश्न यह नहीं कि ऐसी माँगे कितनी अतार्किक हैं या इन्हें माना जाता है या नहीं, प्रश्न यह है कि बार-बार ऐसा करने से जिस बात या माँग के सामान्यीकरण किए जाने का खतरा लगातार बढ़ेगा उसके हल का रास्ता कहाँ से होकर जाता है?

‘देवी-देवता ही हैं मंदिर की भूमि के मालिक’: सुप्रीम कोर्ट ने दिया मंदिरों को लेकर बड़ा फैसला, जानें क्या है मामला

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (7 सितंबर) को अपने फैसले में कहा कि देवी-देवता ही मंदिर से जुड़ी भूमि के मालिक हैं। जस्टिस हेमंत गुप्ता और एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा कि पुजारी केवल मंदिर की संपत्ति के प्रबंधन के उद्देश्य से भूमि से जुड़े काम कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए मध्य प्रदेश के एक मंदिर के मामले में यह फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया है कि देवता ही मंदिर से जुड़ी भूमि के मालिक हैं।

शीर्ष अदालत ने कहा, ”स्वामित्व स्तंभ में केवल देवता का नाम ही लिखा जाए, क्योंकि भूमि पर देवता का ही कब्जा होता है।” इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि भू राजस्व रिकॉर्ड से पुजारियों के नाम हटाए जाएँ। पुजारी केवल इन संपत्तियों के रखरखाव के लिए हैं।

उन्होंने कहा कि मंदिर की जमीन का पुजारी काश्तकार नहीं, सिर्फ रक्षक है। वह एक किराएदार जैसा है। कोर्ट ने कहा कि मंदिर में जो भी पुजारी होगा, वही वहाँ देवी देवताओं को भोग लगाएगा। पीठ ने आगे कहा, ”पुजारी केवल देवता की संपत्ति का प्रबंधन करने के प्रति उत्तरदायी है। यदि पुजारी अपने कार्य करने में, जैसे पूजा करने तथा भूमि का प्रबंधन करने संबंधी काम में विफल रहा तो उसे बदला भी जा सकता है। इस प्रकार उसे भूस्वामी नहीं माना जा सकता।”

बता दें कि मंदिर की संपत्ति को लेकर हमेशा विवाद बना रहता है। मंदिर की संपत्ति पर पुजारी और प्रबंधन के लोग अपने-अपने दावें ठोकते रहते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया है। इस आदेश में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा एमपी ला रेवेन्यू कोड, 1959 के तहत जारी किए गए दो परिपत्रों को रद्द कर दिया था। इन परिपत्रों में पुजारी के नाम राजस्व रिकॉर्ड से हटाने का आदेश दिया गया था, ताकि मंदिर की संपत्तियों को पुजारियों द्वारा अनधिकृत बिक्री से बचाया जा सके।

पुलिस बैरिकैडिंग तोड़ हजारों किसानों ने मचाया उत्पात, घेरा मिनी सचिवालय; लगाए BJP हाय-हाय के नारे: देखें Video

हरियाणा के करनाल जिले में किसान प्रदर्शनकारियों के कारण स्थिति अशांत हो गई है। प्रशासन के मना करने के बावजूद सैकड़ों किसानों ने बैरिकेड्स तोड़ते हुए, उन पर छलांग लगाते हुए मिनी सचिवालय की ओर कूच किया। अब स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।

समाचार एजेंसी एएनआई द्वारा साझा की गई वीडियो में देख सकते हैं कि कैसे हड़कंप मचाकर प्रदर्शनकारी आगे बढ़ रहे हैं और तेज-तेज चिल्ला रहे हैं। वीडियो में ‘जो बोले सो निहाल’ और ‘बीजेपी सरकार हाय-हाय’ के नारे लग रहे हैं।

एक अन्य वीडियो में बीकेयू नेता राकेश टिकैत सैकड़ों प्रदर्शनकारियों के साथ आगे बढ़ रहे हैं। बताया जा रहा है कि दो किलोमीटर तक किसानों की भीड़ बैरिकेड्स को तोड़ती हुई निकली। अनाज मंडी में ‘महापंचायत’ के बाद, प्रदर्शनकारियों ने करनाल में मिनी सचिवालय की ओर मार्च किया।

हालातों के मद्देनजर व कानून व्यवस्था को बिगड़ने से रोकने के लिए कुरुक्षेत्र, कैथल, जींद और पानीपत में इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गई हैं। क्षेत्र में मैसेज सेवाएँ भी बंद कर दी गई हैं। करनाल के एसपी गंगा राम पुनिया ने कहा,

“किसान महापंचायत के मद्देनजर जिला प्रशासन और पुलिस ने सुरक्षा के जरूरी इंतजाम किए हैं। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कुल 40 कंपनियों को तैनात किया गया है। सार्वजनिक गतिविधियाँ बिना किसी रुकावट के चल रही हैं।”

बता दें कि 28 अगस्त को जिले में हुए एक प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज मामले में अधिकारियों के विरुद्ध कड़े एक्शन की माँग को लेकर ये मार्च था। राकेश टिकैत ने इस बीच कहा, “हमने प्रशासन से उस आईएएस अधिकारी को निलंबित करने की माँग की थी, जिसने कथित तौर पर आंदोलनकारियों के सिर फोड़ने का आदेश पुलिस को दिया था।”

इसी संबंध में किसान संगठनों के नेताओं ने जिला प्रशासन के अधिकारियों से बातचीत की थी, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। इसके बाद किसानों ने मुख्यालय का घेराव करने का फैसला करते हुए कूच कर दिया। इस दौरान मिनी सचिवालय के पास प्रदेश सरकार के आदेश पर बड़ी संख्या में रैपिड एक्शन फोर्स के जवान तैनात रहे। मालूम हो कि मुजफ्फरनगर में महापंचायत के बाद यह दूसरा बड़ा आयोजन है, जिसमें राकेश टिकैत, योगेंद्र यादव, बलबीर सिंह राजेवाल, दर्शन पाल और जोगिंदर सिंह उग्रहन जैसे किसान नेता पहुँचे हुए हैं।

मुजफ्फरनगर दंगों के लिए कभी टिकैत के पीछे पड़े रवीश कुमार को अब उनमें नजर आया हिंदू-मुस्लिम एकता का ‘मसीहा’: देखें वीडियो

मैग्सेसे पुरस्कार विजेता पत्रकार रवीश कुमार ने एक बार फिर अपनी पत्रकारिता का गिरगिटिया रंग दिखाया है। 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के लिए राकेश टिकैत की आलोचना करने वाले रवीश कुमार ने एनडीटीवी इंडिया पर अपने प्राइम टाइम शो के दौरान इस बार हिंदू-मुस्लिम एकता बनाने के लिए बीकेयू नेता की प्रशंसा की है। उन्होंने राकेश टिकैत की हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनावपूर्ण संबंधों को सुधारने के लिए सराहना की। उन्होंने यहाँ भी वही राग अलापा कि 2014 के बाद से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच संबंध तनावपूर्ण हो गए हैं।

रवीश ने हिंदू-मुस्लिम एकता बनाने के लिए इस बार राकेश टिकैत की सराहना की

कुमार ने अपने शो में कहा, “प्रधानमंत्री राकेश टिकैत और अन्य किसान नेताओं से उनकी शिकायतें सुनने के इच्छुक नहीं हैं, जबकि वह व्यक्तिगत रूप से एथलीटों को बुलाते हैं और उन्हें बधाई देते हैं।” रवीश ने आगे कहा कि शायद अपना समय बर्बाद करने की बजाए उन्हें अपना ध्यान कबड्डी, कुश्ती और अन्य खेलों में लगाना चाहिए।” रवीश कुमार ने कहा, ”2014 के बाद से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक सद्भाव खराब हो गया है। राकेश टिकैत जैसे नेता और अन्य किसान नेता किसान विरोध के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम एकता बना रहे हैं। प्रधानमंत्री को उनसे मिलने और उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए अपना समय देना चाहिए।”

राकेश टिकैत के कारण मुजफ्फरनगर में हुए दंगे: रवीश कुमार 2013 में

आपको याद दिला दें ये वही रवीश कुमार हैं, जिन्होंने साल 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों के लिए राकेश टिकैत को जिम्मेदार ठहराया था। कुमार ने टिकैत के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया था और उन पर अपने भड़काऊ भाषणों से सांप्रदायिक दंगे फैलाने का गंभीर आरोप लगाया था। सितंबर 2013 में, कुमार ने टिकैत और भाजपा पर उत्तर प्रदेश में तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार को अस्थिर करने के लिए हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़काने का आरोप लगाया था।

उन्होंने कहा था, ”उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक बैठक आयोजित की गई थी, जिससे इस क्षेत्र में तनाव पैदा हो गया है। बैठक में जो चर्चा हुई, उसे सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन पुलिस ने कहा कि उन्होंने 4 भाजपा नेताओं, दो बीकेयू नेताओं राकेश टिकैत और नरेंद्र टिकैत पर एक कॉन्ग्रेस नेता के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज की है।” 2013 के कुमार ने अपने शो में संकेत दिया था कि उन्होंने राकेश टिकैत को उन व्यक्तियों में से माना है, जो मुजफ्फरनगर की बैठक के बाद हुए हिंदू-मुस्लिम दंगों के बीज बोने के लिए जिम्मेदार थे।

अब वर्षों बाद, रवीश कुमार को राकेश टिकैत में हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने वाला नेता नजर आने लगा। वे उन्हें धर्मनिरपेक्ष नेता बताने से नहीं थक रहे हैं। या तो 2013 का टिकैत को लेकर उनका अनुमान पूरी तरह से गलत था, जब उन्होंने उन पर विभिन्न समुदायों के बीच दरार पैदा करने का आरोप लगाया था। या अब हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतिमान के रूप में टिकैत का उनका वर्तमान मूल्यांकन गलत है।

गौरतलब है कि ऊपरी तौर पर, रवीश कुमार के हृदय में अचानक आया परिवर्तन समझ से परे और हैरान करने वाला है। हालाँकि, उनका यह बदलाव वामपंथी झुकाव वाले लिबरल पत्रकारों द्वारा नियोजित एजेंडा लगता है, जो केंद्र सरकार को बदनाम करने और उनके खिलाफ लोगों में आक्रोश पैदा करने के लिए हर हथकंडे इस्तेमाल करते हैं।